Quotation

जीवन क्या है? बाधाओं की एक जंजीर है। बेशक, जो लोग शरीर और संसार के रिश्ते तक ही सीमित हैं उनके लिये वह ऐसा ही है। परन्तु जो लोग तत्व ज्ञान से प्रेम करते हैं उनके लिये ऐसा नहीं है।

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अपने ही भावों के द्वारा तुम अपने जीवन, अपने संसार और अपनी प्रकृति को सुधार सकते या बिगाड़ सकते हो। अपनी विचार शक्ति द्वारा अपने भीतर जैसा भवन बनाकर खड़ा करोगे बाह्य जीवन उसी के अनुरूप बनने लगेगा।

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यह मत कहो कि मैं ही एक पूर्ण हूँ, मुझमें ही सब ताकत है, मैं ही सब कुछ हूँ, सबसे श्रेष्ठ हूँ। वरन् यों कहो कि मुझमें भी कुछ है, मैं भी मनुष्य हूँ मेरे अन्दर जो कुछ है उसे बढ़ा सकता हूँ, उन्नत और विकसित कर सकता हूँ।

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जो दूसरों को दिये बिना खुद लेना चाहता है वह पाता तो कुछ नहीं खोता बहुत है।


आओ, अन्तर में मुँह डालें

कितना खोया, कितना पाया, चलो हिसाब लगा लें।

अपनी पूँजी देखें, आओ, अन्तर में मुख डालें।।

मेरा पड़ोसी व्यापारी हर वर्ष अपने कार वार का हिसाब बनाता है। चिट्ठा बाँधता है। बड़ी तीक्ष्ण दृष्टि से हर आंकड़े को देखता है कि किसमें कितना लाभ हुआ और कितनी हानि। जिस मद में लाभ हुआ है उस मद में और बारीकी के साथ देखता है कि आगामी वर्ष और अधिक लाभ किस प्रकार उठा सकता हूँ। जिस व्यापार में हानि हुई है उसे बन्द करने या हानि के कारण की ढ़ूँढ़ कर बन्द कर देने का हिसाब बनाता है। पूँजी को तो बड़े ही उत्साह, लालसा और एकाग्रता पूर्वक देखता है। बैंक में इतना हुन्डी पर्चों में इतना, सूद पर इतना, गोदाम के माल में इतना, तिजोरी में इतना, कुल मिलाकर इतना हुआ। गत वर्ष की अपेक्षा कुछ बढ़ गया है तो वह प्रसन्न होता है। घट गया है तो चिन्तातुर होता है। रात रात भर जाग कर नफा नुकसान पर विचार करता है। पूँजी को सुरक्षित रखने की सबसे अधिक चिन्ता है। मेरा पैसा कहीं डूब न जाय, इस मामले में वह बहुत सतर्क है। उसका व्यापार खूब चलता है, वह खूब प्रसन्न रहता है।

इन पंक्तियों के पाठक भी कुछ न कुछ व्यापार करते होंगे। वे भी मेरे पड़ोसी व्यापारी की भाँति अपने हिसाब का चिट्ठा बनाते होंगे और लाभ हानि पर गंभीरता पूर्वक विचार करते होंगे। समय समय पर अपने शरीर और घर की देखभाल करके उसके सुधार और मरम्मत का प्रयत्न करते होंगे। क्या नहीं करते होंगे?

चलिये, आपको आज आपके असली व्यापार घर ले चलता हूँ। इस क्षण बाहर का सारा बोझा उतार बाहर ही रख दीजिये। क्योंकि इतनी चिन्ताऐं इतनी ममताऐं इतनी तृष्णाऐं लादकर आप उस सँकरी गली होकर चल नहीं सकेंगे, जिसमें होकर अपने असली व्यापार गृह तक पहुँचना है। मेरा कहना मानिये। कुछ क्षण के लिए इस बोझ को उतार दीजिए। विश्वास रखिए इन्हें कोई चुराने का नहीं। यह चीजें आपकों ही आपका वाहन बनाना पसन्द करती हैं। कहीं नहीं जायेगी, आपकी प्रतीक्षा में यहाँ की यही बैठी रहेंगी।

अब आप जरा हलके हो गये, अच्छा किया। चलिये जरा जल्दी जल्दी चलिये। इस अंधेरी गली में होकर चलने में कुछ जी घबरावेगा, बुरा मालूम पड़ेगा, दुर्गन्ध आवेगी, चिन्ता की बात नहीं चले चलिए। वहाँ तक चलन पड़ेगा। यह आ गया आपका असली व्यापार गृह, बाहर जितने सामान थे उससे करोड़ों गुने ठाठ बाठ यहाँ मौजूद हैं। आनन्द के अक्षय भण्डार यहाँ भरे हुए हैं। पवित्रता का उद्यान लगा हुआ है। अमृत के तालाब भरे हुए हैं एक प्रकार का स्वर्गीय वैभव इस स्थल पर मौजूद है। सहस्त्रों कर्मचारी काम कर रहें हैं। ओहो- यही देव दुर्लभ आपका व्यापार गृह है। आप बड़े सौभाग्यशाली हैं। परन्तु हैं। इसमें इतनी अव्यवस्था क्यों हैं? इसमें जगह- जगह इतनी गन्दगी के ढेर कैसे लगे हुए हैं? महल में चमगादड़ कैसे बस गए? अमृत सरोवर में गंदा नाला किसने मिला दिया? प्रकाश स्तम्भों को तोड़- फोड़ किसने दिया? नन्दन वन में गधे कैसे लोट रहें हैं? अरे। यहाँ तो अव्यवस्था का पूरा साम्राज्य है। नौकर शाही की तूती बोर रही है। जिसके जी में जो आता है वही करता है। इन लोगों ने गन्दगी के ढेर लगाकर इस सारे स्वर्ग सरोवर को नरक बना दिया है।

शायद आपने इधर कभी ध्यान नहीं दिया। यहाँ रखे हुए गट्ठों के बोझ ने कदाचित आपको इस ओर ध्यान देने नहीं दिया है। अन्यथा कभी तो अपने इस घर की देखभाल की होती। मेरा पड़ोसी व्यापारी जिस प्रकार साल चिट्ठे बाँधता है, हर रोज रोकड़ खाते लिखता है आपने तो मुद्दतों से वैसा नहीं किया। यह देखिये हिसाब बहियाँ तो मुद्दतों से नहीं लिखी गई। चलिए उसकी ओर देखें वहाँ भी कुछ बचा है या नहीं? अरे यहाँ तो वर्षों से एक पाई भी जमा नहीं हुई, पुराना जो कुछ जमा था उसी में से खर्च हो रहा है, सिर्फ थोड़े से पैसे उस कोने में पड़े हैं। इनके चुकने के बाद क्या होगा?

आपने मुद्दतों से न तो चिट्ठा बाँधा और न हिसाब तैयार किया कि आपके व्यापार में कितना हानि लाभ हो रहा हैं? कितना कमा रहें हैं और कितना गँवा रहे हैं? पूँजी घटी है या बढ़ी है? आपने कभी यह भी विचार किया नहीं मालूम होता कि घाटा होते होते जब दिवालिया बन जावेंगे तो हमारा क्या होगा? पड़ोसी व्यापारी से क्या आप यह नहीं सीख सकते थे कि आपको भी अपने जीवन व्यापार में धर्म की कितनी पूँजी इकट्ठी की या पाप का कितना कर्ज सिर पर चढ़ गया?

ठीक है, जिन्होंने अपना सारा कारोबार नौकरों के सुपुर्द कर दिया है। और खुद उसकी सारी सुधबुध भूल गया हो एवं झूठी ममता के गट्ठों को छाती से चिपका कर इधर उधर भटक रहा हो, उसको इसी प्रकार हानि उठानी चाहिए।

ईश्वर का अमर पुत्र संसार का त्राण करने की शक्ति से परिपूर्ण, पवित्रता का पुञ्ज, देवत्व का भण्डार, मनुष्य अपने सरे व्यापार को भूल गया है। अमृतमयी मानसरोवर को नारकीय दुर्गन्धि भरा नाला बना रखा है। अपनी अखण्ड ज्योति को पद दलित करके चारों ओर अन्धकार पूर्ण बना दिया है। हाय रे। मनुष्य, तू इतना भूल गया। इतनी आत्म विस्मृति, इतना आत्म पीड़न।

क्षण भर बैठकर अपने अन्तर को खोजो तो सही। इसमें इतनी कुवासनाऐं, कुचालें, कुटिलताऐं घुस पड़ गई। वे इतनी सावधानी के साथ अपना स्थान बनाकर बैठ गई हैं कि अपना रूप प्रकट नहीं होने देती। मोटे तौर पर जब हम अपनी ओर देखते हैं तो हम स्वयं अपने को कैसा निर्दोष, सौम्य, सदाचारी और धार्मिक समझते हैं परन्तु जब गम्भीरता के साथ जब परीक्षा करने बैठते हैं तो कितनी कुवासनाऐं अपने अन्दर भरी पाते हैं। हृदय कितने अज्ञानान्धकार से भरा हुआ पातें हैं। अपना वर्चस्व बाह्य वस्तुओं को मान रहे हैं, सारी ममता नश्वर वस्तुओं में अटकाये हुए है। बंदरिया जिस प्रकार अपने बच्चे को छाती से लगाये फिरती है उसी नश्वर माया मोह को गले में पहने फिरते हैं।

हे विशुद्ध। अपने को पहचानो, अपने असली व्यापार को मत भूलो, तुम पूर्ण और विकसित बनने के लिए हो, पूर्णता प्राप्त करो, विकास की ओर बढ़ो, आत्मशक्ति को पहचानों, अब तक कितना खो चुके कितना नष्ट कर चुके इसका हिसाब लगाओ। भले प्रकार सोचो कि क्या तुम वही हो जो आज बने हुए हो। भले प्रकार विचार करो कि क्या तुम्हारा यही कर्तव्य है जिसमें आज जुटे हुए हो। भौतिक वस्तुओं को जुटाने में जितना परिश्रम कर रहे हो, क्या वह सार्थक होगा? धूप शीत का ध्यान न देकर बालू के जो पहाड़ इकट्ठे कर रहे हो क्या वह हवा के एक ही झोंके में उड़ नहीं जावेंगे?

हे अमर। अपने असली रूप और असली धर्म का चिन्तन करो, नकलों पर मत ललचाओं, असल को खोजो। अपने अन्तर में मुँह डालो, अंतर्मुखी होओ, देखो कि अब तक कितना खो चुके हो, बहुत घाटा हुआ, पाया कुछ नहीं। व्यापार में बड़ी हानि हुई, अब इस घाटे को पूरा करने में लगो। हिसाब लगाओं कि कितनी पूँजी शेष रह गई है। इसे किस प्रकार चोरों से बचावें।

नित्य प्रति अंतर में मुँह डालों अच्छी तरह विचार करो कि मेरे स्वर्ग सोपान को नरक बनाने वाले पिशाच किस कोने में छिपे बैठे हैं। उन्हें मशाल जलाकर ढ़ूँढ़ों और घर से निकाल बाहर करो। तभी तुम्हारा नन्दन वन फिर से हरा भरा हो सकेगा।


अहिंसा

महात्मा गांधी

अब हम अस्तेय व्रत का विचार करेंगे। यदि गम्भीर विचार करके देखें तो मालूम होगा कि सब व्रत सत्य और अहिंसा के अथवा सत्य के गर्भ में रहते हैं और वे इस तरह बताये जा सकते हैं-

या तो सत्य में से अहिंसा को स्थापित करें या सत्य अहिंसा की जोड़ी मानें। दोनों एक ही वस्तु हैं। तो भी मेरा मन पहले की ओर ही झुकता है। और अन्तिम स्थिति भी जोड़ी से, द्वन्द्व से अतीत है। परम सत्य अकेला खड़ा रहता है। सत्य साध्य है, अहिंसा एक साधन ।। अहिंसा क्या है, जानते हैं, पालन कठिन है। सत्य को तो अंशतः ही जानते हैं। सम्पूर्णतया जानना देही के लिये कठिन है। वैसे ही जैसे अहिंसा का सम्पूर्ण पालन देही के लिये कठिन है।

अस्तेय अर्थात चोरी न करना। कोई यह न मानेगा कि चोरी करने वाला सत्य को जानता और प्रेम धर्म का पालन करता है, तो भी चोरी का अपराध तो इस सब, कम या ज्यादा मात्रा में, जान में या अजान में करते ही हैं। दूसरे की वस्तु को उसकी अनुमति के बिना लेना तो चोरी है ही, परन्तु मनुष्य अपनी कही जाने वाली चीज भी चुराता है। उदाहरणार्थ किसी पिता का अपने बालकों के जाने बिना, उन्हें मालूम न होने देने की इच्छा से, चुपचाप किसी चीज का खाना। यह कहा जा सकता है कि आश्रम की वस्तु, भण्डार हम सब का है, परन्तु उसमें से जो चुपचाप गुड़ की डली भी लेता है, वह चोर है। एक बालक दूसरे बालक की कलम लेकर मेरी कहता है। किसी के जानते हुए भी उसकी चीज को उसकी आज्ञा के बिना लेना चोरी है। यह समझ कर कि किसी की भी नहीं है, किसी चीज को अपने पास रख लेने में भी चोरी है। अर्थात राम में मिली हुई चीज के मालिक हम नहीं, बल्कि उस प्रदेश का राजा या व्यवस्थापक है। आश्रम के नजदीक मिली हुई कोई भी चीज आश्रम के मन्त्री को सौंपी जानी चाहिये और यदि वह आश्रम की न हो तो मन्त्री उसे सिपाही को सौंप दे। इतने तक तो समझना साधारणतः सहज ही है। परन्तु अस्तेय इससे बहुत आगे जाता है। जिस चीज की लेने की हमें आवश्यकता न हो, उसे जिसके पास वह है, उसकी आज्ञा लेकर भी लेना चोरी है। ऐसी एक भी चीज न लेनी चाहिये, जिसकी जरूरत न हो। संसार में इस तरह की अधिक से अधिक चोरी खाद्य पदार्थों की होती है। मुझे अमुक फल की हाजत आवश्यकता नहीं है, तो भी यदि मैं उसे लेता हूँ तो वह चोरी है। मनुष्य हमेशा इस बात को नहीं जानता कि उसकी आवश्यकता कितनी है, और प्रायः हममें से सब अपनी आवश्यकताओं को जितनी होनी चाहिये, उससे अधिक बढ़ा लेते हैं। विचार करने से हमें मालूम होगा के हम अपनी बहुतेरी आवश्यकताओं को कम कर सकते हैं। अस्तेय व्रत का पालन करने वाला उत्तरोत्तर अपनी आवश्यकताओं को कम करेगा। इस दुनियाँ की अधिकांश कंगालियत अस्तेय के भंग के कारण पैदा हुई है।

उक्त समस्त चोरियों को बाह्य या शारीरिक चोरी कह सकते है। इससे सूक्ष्म और आत्मा को नीचे गिराने वाली या पतित बनाये रखने वाली चोरी, मानसिक है। मन से किसी की चीज को पाने की इच्छा करना या उस पर जूठी नजर डालना चोरी है। बड़े बूढ़े या बालक का किसी उम्दा चीज को देखकर ललचा जाता मानसिक चोरी है। उपवास करने वाला शरीर से नहीं खाता, परन्तु दूसरे को खाते देख यदि वह मन ही मन स्वाद करने लगता है, तो चोरी करता है और उपवास को तोड़ता है। यदि उपवासी उपवास छोड़ते समय खाने का ही विचार करता है, कह सकते हैं कि वह अस्तेय और उपवास दोनों भंग करता है। अस्तेय व्रत का पालक भविष्य में प्राप्त होने वाली चीजों के लिये हवाई किले नहीं बांधा करता। बहुतेरी चोरियों का मूल कारण आपकी यह जूठी इच्छा ही मालूम होगी। आज जो केवल विचार ही में है, कल उसे पाने के लिये हम भले बुरे उपाय सोचने लग जायेंगे और जैसे चीज की वैसे ही विचार की भी चोरी होती है। अमुक उत्तम विचार अपने मन में उत्पन्न न होने पर भी जो अहंकार वश उसे अपना बताता है वह विचार की चोरी करता है। दुनियाँ के इतिहास में बहुतेरे विद्वानों ने भी ऐसी चोरी की है और आज भी होती रहती है। मान लीजिये कि मैं आन्ध्र देश में एक नई किस्म का चर्खा देख आया, वैसा चर्खा मैंने आश्रम में बनवाया और उसे अपना आविष्कार कहना शुरु किया तो स्पष्ट है कि मैंने इस तरह दूसरे के आविष्कार की चोरी की है। असत्याचरण तो किया ही है।

अतएव अस्तेय व्रत का पालन करने वाले को बहुत नम्र, बहुत विचारशील, बहुत सावधान और बहुत सादगी से रहना पड़ता है।

- सप्त महाव्रत


मृत्यु कोई वस्तु नहीं है।

(स्व. स्वामी विवेकानन्द का एक भाषण)

आत्मा अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य और अशोष्य हैं, अर्थात् वह तलवार की धार से कट नहीं सकती, आग में जल नहीं सकती, पानी में डूब नहीं सकती और वायु उसे सुखा नहीं सकती। प्रत्येक जीवात्मा एक गोलाकार के समान है जिसकी गोलाई की सीमा नहीं पर उसका मध्य बिन्दु किसी शरीर में रहता है। यही मध्य बिन्दु जब एक शरीर से दूसरे शरीर में चला जाता है, तब कहते हैं कि पहले शरीर की मृत्यु हुई, वास्तव में मृत्यु कोई वस्तु नहीं है। आत्मा जड़ पदार्थों से कभी बाँधा नहीं जा सकता। वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और पूर्ण है। कभी कभी कारणवश जड़ पदार्थों के साथ उसका संयोग होने से यह भावना करता है कि मैं जड़ पदार्थ हूँ।

आप कहेंगे कि आत्मा अमर है, मृत्यु कोई वस्तु नहीं है, पूर्व जन्म के कर्मानुसार आत्मा देह धारण करता है, इन बातों को हम मानते हैं, पर तूफान में पड़ी हुई नाव की तरह इस संसार सागर के तूफान से आत्मा का छुटकारा पाने का क्या कोई उपाय नहीं है? कालचक्र के फेरे से कौन बचा है? कार्य और कारण की दो धारी छुरी किसके गले पर नहीं फिरती? उस कालचक्र की मशीन में अनाथ विधवायें आश्रयहीन बालक और उन्मत्त सत्ताधीश एक ही से पिसे जाते हैं। ऐसा कौर है जो कालचक्र के स्मरण से भय न करता हो? सारे संसार से यही करुण ध्वनि उठती है कि क्या इस कराल काल के चक्र से कठोर छुरी की धार से, भयानक तूफान से हमें कोई बचा सकता है?

वेद इन प्रश्नों का ललकार कर उत्तर देते हैं- “मित्रों, डरो मत, तुम सच्चिदानंद स्वरूप हो, जिस सनातन प्राचीन रूप से तुम्हारा जन्म हुआ है उसको पहचानो, तुम्हारा बेड़ा पार है।” ‘सच्चिदानन्द की संतान’ कितना मधुर शब्द है। अपने को आप पाप समझते हैं किन्तु वेदान्त कहता है कि आप पूर्ण हैं, पवित्र हैं, पूर्णानंद रूप हैं, आपको पापी कौन कह सकता है? मनुष्य को पापी कहना ही महा पाप है। तुम जड़ शरीर नहीं हो, शरीर तो तुम्हारा एक नौकर है। उठो, जागो और निज को पहचानो, तुम नित्य शुद्ध, बुद्ध और मुक्त हो।

वेदों ने काल के कराल पंजे से छूटने को बताया है कि- “उस स्वरूप की पूजा करो जिससे सृष्टि के सब नियम चलते हैं, जिसकी आज्ञा से पाँचों तत्व अपना काम करते हैं और जो मृत्यु का हरण करता है।” उसी से ऋषि लोग प्रार्थना करते हैं कि “हे सर्वव्यापी दया मय, तू ही हमारा पिता, तू ही माता, बन्धु, मित्र है तू ही संसार की सब शक्तियों का अधिष्ठाता है और विश्व का भार सहता है हम इस जीवन का भार सह सकने की शक्ति की तुझसे याचना करते हैं।” इस जन्म तथा अन्य जन्मों में उससे बढ़कर और किसी पर प्रेम न हो यह भावना मन में दृढ़ कर लेना ही उसकी पूजा करना है।

कमल पत्र के समान मनुष्य को संसार से अलिप्त रहना चाहिये। कर्म करते हुये भी उससे उत्पन्न होने वाले सुख दुख से यदि मनुष्य अलग रहे तो उसे निराशा का सामना न करना होगा। सब काम निष्काम होकर करो तुम्हें कभी दुख न होगा।

राजपाट से रहित होकर राजा युधिष्ठिर हिमालय पर्वत पर जा रहे थे तब एक बार द्रौपदी ने उन से पूछा महाराज, आप ईश्वर के अनन्य भक्त होकर इस प्रकार दुख क्यों भोगते हैं? “इस पर युधिष्ठिर ने कहा-देवी, हम हिमालय के उत्तुँग और मनोहर शृंगों पर क्या इससे कुछ बदला पाने की इच्छा से प्रेम करते हैं? सुन्दर और उदात्त वस्तु पर प्रेम करना मेरा स्वभाव ही है, जो सुन्दरता का सागर और उदात्त से भी उदात्त है उस पर मैं कैसे प्रेम न करूंगा? संसार में वही एक प्रेम का स्थान है। प्रेम के परिवर्तन में, मैं कुछ भी नहीं चाहता।”

इस प्रकार का परमात्मा के प्रति अनन्य प्रेम होना मृत्यु से बचने का सच्चा उपाय है। सत्य ईश्वर प्रेम के उपरान्त मृत्यु नहीं होती और होती भी है तो उसमें कष्ट नहीं होता।


प्रभु की माया।

(ले.-श्री. मूलशंकर नरभेराम ओझा)

प्रभु की माया अपार है, अपनी माया को प्रभु आप ही जानते हैं। उनके सिवाय उसे कोई नहीं जानता, न जान ही सकता है। प्रभु की माया नहीं जानी जा सकती हाँ, प्रभु जाने जा सकते हैं। जो प्रभु में लय हो जाता है, प्रभु के साथ एक ही भाव को प्राप्त हो जाता है, वही प्रभु को जान भी लेता है- अतः प्रभु नहीं जाने जाते हैं, परन्तु प्रभु की माया दुर्जेय है, वह नहीं जानी जाती-यही प्रभु की माया है।

प्रभु ही सारे जगत में फैले हैं, परन्तु कोई भी पूर्ण रूप से नहीं है, इसी कारण प्रभु की पूर्ण माया को कोई नहीं जानता। जो जानता है, अंश रूप में ही जानता है। सब इतना ही जान सकते हैं, ज्ञान की इतनी ही गम्य है, विद्या की इतनी ही गति है, बुद्धि की इतनी बलिहारी है। यही प्रभु की माया है।

इतना जानना भी हर किसी का काम नहीं है। जानने की इच्छा तो चाहे सब में हों, परन्तु यत्न तो कोई-सा ही करता है और उनमें से भी कोई विरला ही जान पाता है। जो जान जाता है, प्रभु उसका भी मुँह बन्द कर देते हैं, विधि तो वह बतला सकता है, पर उससे क्या मिलता है-यह नहीं बतला सकता। कुछ पूछों तो इतना ही कह सकता है कि प्रभु................ प्रभु? कहाँ? और प्रेम में गदगद हो गया। जिस पर प्रभु कृपा करते हैं उसी की यह अवस्था होती है। यही प्रभु की माया है।

जो इतना जानता है और अहंकार नहीं करता यह जानता है कि इतना जान लेना कुछ भी नहीं है। वह यत्न करता रहता है और उस पर प्रभु की और भी अधिक कृपा हो जाती है और इतना जानना ही उसके लिये प्रेम का कारण बन जाता है। अर्थात् जो मान जाता हैं वही प्रेम करने लगता है। प्रभु स्वयं प्रेमरूप हैं, अतः जानने वाले को भी प्रेम ही प्रदान करते हैं, वह अद्वितीय प्रेमी उसे भी प्रेमी बना लेता है, फिर प्रेमियों का प्रेम का खेल आरम्भ हो जाता है। यह भी प्रभु की माया है।

इस प्रेम की लीला में क्या नहीं होता, और क्या होता है? यह प्रेमी ही जानता है, जो जानना चाहे, प्रेमी बन देखे। प्रेम में प्रेमी इतना जानने से भी आगे बढ़ जाता है, यहाँ तक कि प्रेमवश प्रेमी प्रभु प्रीतम में लीन हो जाता है। फिर प्रीतम के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रहता। हाँ, फिर न प्रेमी रहता है, न प्रीतम। दोनों प्रेमरूप हो जाते हैं। प्रेम ही प्रभु का अपना रूप है, प्रभु के रूप में प्रेमी समा गया, दो की जगह एक ही रह गया, वहीं पूर्ण प्रभु को जानता है। यही प्रभु की माया है।

परन्तु सब एक ही एक है, तो फिर कौन जाने? किसे जाने? और क्या जाने? जानने वाला (ज्ञाता) और जाना जानने वाला (ज्ञेय) से दोनों एक ही हैं, एक हो रहे हैं अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय ज्ञानरूप हो गये हैं। जानने वाला जानकर सब कुछ भूल गया फिर अब ज्ञाता क्या बतावे? प्रेमी चुप हैं, ज्ञानी गुम है। यही प्रभु की माया है।

अब दूसरी बात सोचिये। जो अंश रूप में जानता है और अहंकार करता है। जो अंश रूप में ही जानकर फूल जाता है, वह ढिंढोरा पीटता है कि मैं जानता हूँ। पर तत्त्वतः वह अभी अधूरा ही जानता है। और जो अहंकारवश होकर, प्रभु के प्रेमरूप को नहीं देखता, प्रेम नहीं करता वह अधूरा ही रहता है, कोण ज्ञान और निरी विद्वत्ता निष्फल जाती है। वह प्रभु का पूर्ण रूप नहीं जानता, न जान ही सकता है। यही प्रभु की माया है।

इसी कारण जो मानता है, वह कहता नहीं फिरता, जो अंश में जानता है-वह जानना न जानने के तुल्य है जो थोड़ा सा जानता है वही कहता फिरता है। जो कहता है, वह खो देता है। जो कहता फिरता है, वास्तव में वही नहीं जानता है। यही प्रभु की माया है।


अभिलाषा का अभिशाप।

(श्रीमती सावित्री देवी तिवारी, जयपुर)

इस क्षण भंगुर विश्व को जब हम आवश्यकता से अधिक प्रेम करने लग जाते हैं तब हमारा मधुर जीवन दुखों के अग्नि कुण्ड में स्वाहा होने लगता है। नहीं, नहीं कहते हुए भी अपना पैर बराबर क्लेशों की कीचड़ में फंसा लेते हैं। क्या आपने सोचा कि इसका कारण क्या है? अनावश्यक अभिलाषा इसका कारण है। अभिलाषा से एकाँकी सम्बन्ध रखने वाले व्यक्तियों का जीवन सदैव न बुझने वाली अग्नि में धायं-धायं जलता रहता है उनके मुख पर न तो मृदुल हास्य होता है और न प्रसन्नता अठखेलियाँ करती दिखाई देती हैं।

वह सत्य है कि मनुष्य का जीवन-मरण एक बलवती अभिलाषा के ही कारण होता है। उसके विभिन्न रूप, विभिन्न चरित्र अभिलाषाओं की छायाएं हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक सचाई है कि हम संसार की किन्हीं वस्तुओं से पूर्णतः उदासीन नहीं हो सकते। अभिलाषा की इस अनिवार्य सत्ता के विरुद्ध कुछ कहने का मेरा आशय नहीं है। यहाँ मुझे इतना ही कहना है कि अनावश्यक अभिलाषाएं त्याज्य हैं।

शेखचिल्ली के से मनसूबे न बाँधकर यदि आवश्यक कर्त्तव्य कर्मों की इच्छा की जाय तो मानव जीवन बहुत सरल और सुखमय हो सकता है। आवश्यक इच्छाएं सात्विक होती हैं इसलिये उनमें आँधी का सा प्रबल वेग और भूकम्प का सा हाहाकार नहीं होता। चटोरी जीभ वाला कुत्ता पेट भरा होने पर भी हर भोजन पर ललचाई दृष्टि डालता है। ऐसे लोगों की जीवन सरिता टेड़े-मेड़े मार्गों पर टकराती रहती है उनका हृदय अतृप्त तृष्णा की तप्त लौ में जलता रहता है।

हम कितनी ही इच्छा करें, इसका परिणाम जीवन उद्देश्य की तराजू में तोला जाना चाहिये जीवन दैवत्व का प्रतिबिम्ब है। ईश्वर की इच्छा है कि मनुष्य प्रेम, सत्य, और उदारता का जीवन व्यतीत करे और पूर्णता को प्राप्त हो। इसके अतिरिक्त और कोई उद्देश्य हो ही नहीं सकता। इन्द्रियों का सुखोपभोग वैसा है जैसा कुत्ता सूखी हड्डी चबाने पर अपने जबड़े से निकला हुआ रक्त पीकर प्रसन्न होता है। असल में इन्द्रियों के सुख सुख की भ्रमपूर्ण कल्पना मात्र हैं-अन्यथा सुखी दिखाई देने वाले सब लोग भीतर ही भीतर आन्तरिक उद्वेगों से क्यों जलते रहते? सभी दार्शनिक दृष्टियाँ बताती हैं कि मनुष्य का उद्देश्य पवित्रता और पूर्णता है। इसलिये हमारी इच्छाएं भी पवित्रता और पूर्णता का ही स्वप्न देखने वाली होनी चाहियें। इसके अतिरिक्त और जो अभिलाषाएं बच रहती हैं, वह आवश्यक हैं।

नौकर अपने जीवन निर्वाह के लिये वस्तुएं प्राप्त के लिये दत्त-चित्त होकर काम करता है। मधु मक्खियाँ शहद इकठ्ठा करने के लिये कठोर परिश्रम करती हैं। प्रकृति का प्रत्येक परमाणु अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये अविरत गति से चल रहा है तो क्या हमें अपने महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिये अभिलाषा का आश्रय न करना चाहिये?

हम पवित्रता और पूर्णता के लिये आवश्यक अभिलाषा करें तो यह अभिलाषा ही शान्ति, सन्तोष प्रेम और सौंदर्य के रूप में हमारे चेहरों पर खिल पड़ेगी और जीवन का उपाय सुरक्षित सुगन्ध से भर जायगा।

परन्तु साँसारिक, तुच्छ, स्वार्थपूर्ण इन्द्रियों के सुखोपभोग करने की अभिलाषाएं करें तो वही अशान्ति और क्लेश का रूप धारण करके अंधेरी रात के समान सामने आ खड़ी होंगी। ऐसी अभिलाषाएं मनुष्य जीवन के लिये अभिशाप ही हो सकती हैं।

स्वरयोग से रोग निवारण

(ले. श्री नारायणप्रसाद तिवारी ‘उज्ज्वल’ कान्हीबाड़ा)

मैस्मेरिज्म, हिप्नोटिज्म, ऑकल्ट साइन्स आदि सब इसी के अंतर्गत हैं तथा स्वर योग भी योग का एक अंग है। स्वास्थ्यनाशक रोगों का उपचार स्वरयोग द्वारा किया जा सकता है, औषधियों की अपेक्षा यदि कोई श्रद्धा और योग शक्ति से या ईश्वरीय शक्ति को अन्दर में उतारकर रोग से पूरी तरह छुटकारा पा सके तो इससे केवल द्रव्य ही की बचत नहीं किन्तु मनुष्य सुखपूर्वक पूर्णायु भोगने योग्य भी होता है। प्रकृति देवी के सहारे रहने वाले एक ग्रामवासी को कृत्रिम सभ्य कहलाने वाले शहर निवासी की अपेक्षा आप अधिक स्वस्थ तथा हृष्ट पुष्ट देखेंगे, वह अनपढ़ तथा अज्ञानी होते हुए, अव्यक्त रूप से प्रकृति का सहारा लेता है। इसी सिद्धान्त पर अब मैं सूक्ष्म रूप से उन उपायों का वर्णन करूंगा जो रोग निवारण के लिये ईश्वरीय शक्ति पर निर्भर हैं।

मानव शारीरिक शक्ति, प्राण शक्ति का एक रूप है और योग क्रिया बहुत कुछ प्राण शक्ति पर अवलंबित है। योग द्वारा रोग मोचन के अनेक रूप हैं जो भद्दे से भद्दे झाड़ फूँक से लेकर मैस्मेरिज्म, हिप्नोटिज्म, टेलीपैथी, स्प्रिचुआलिज्म जैसे प्रचलित परिष्कृत रूप तक हैं। प्रकृति दज वायु शक्ति और सूर्य रश्मि सबके लिये मुक्त है और प्रत्येक पुरुष उदारता से इनका सद् उपयोग कर लाभ प्राप्त कर सकता है।

चूहे मरने पर संक्रामक रोग प्लेग का भय होता है जब बदन में अंगड़ाइयां आती है, दर्द होता है तो बुखार की सूचना होती हैं, छीकें आरम्भ होते ही जुकाम का नोटिस मिलता है आदि ऐसे लक्षण विशेष भास होने पर रोग विशेष के आक्रमण की शंका हुआ करती है। शारीरिक रोग इस बात का चिन्ह हैं कि शरीर में कहीं कुछ अपूर्णता या दुर्बलता है अथवा भौतिक प्रकृति विरोधी शक्तियों के स्पर्श के लिये कहीं से खुली हुई है तो यह स्पष्ट है कि रोग बाहर से हमारे अन्दर आते हैं। जब ये आते हैं तभी यदि कोई इनके आने का अनुभव कर सके और इनके शरीर में प्रवेश करने के पहले ही इन्हें दूर फेंक देने की शक्ति और अभ्यास उसमें हो जाय तो ऐसा व्यक्ति रोग से मुक्त रह सकता है जब यह आक्रमण अंदर से उठता हुआ दिखाई देता है तो समझना यही चाहिये कि आया तो बाहर से है पर अब चेतना में प्रवेश करने के पहले पकड़ा नहीं जा सका, इस प्रकार रोग शरीर को आक्राँत कर लेता है। इस भौतिक शरीर में रोग घुसने के पहले ही इसे रोक दिया जा सकता है और यह क्रिया स्वर योग द्वारा सरलता तथा सफलतापूर्वक की जा सकती हैं, यहाँ यह शंका हो सकती है कि स्वर योग में ऐसी क्या खूबी हैं, समाधान यह है कि समस्त रोग शरीर में सूक्ष्म चेतना और सूक्ष्म शरीर के ज्ञान तन्तुमय या प्राण भौतिक कोष द्वारा प्रवेश करते हैं। जिसे भी सूक्ष्म शरीर का ज्ञान है अथवा सूक्ष्म चेतना से सचेतन है वह रोगों को रास्ते में ही अटका सकता है, हाँ यह सम्भव हो सकता है कि निद्रावस्था में अथवा अचेतन अवस्था में जब कि आप असावधान हैं कोई रोग आकस्मिक आक्रमण कर दे प्रायः शत्रु इसी प्रकार वार करते हैं, किंतु फिर भी आँतरिक साधन द्वारा प्रथम आत्मरक्षा के लिये शत्रु प्रहार को वहीं रोक कर वहाँ से भगाया जा सकता है। स्वर योग द्वारा, रोग के लक्षणों का तनिक भी आभास न होने पर भविष्य का ज्ञान होकर उससे बचने का भी उपाय हो सकता है।

इच्छा शक्ति के दो भेद हैं ऑटो सजेशन और सैल्फ सजेशन। अर्थात् झाड़ फूँक, जंत्र, मंत्र आदि द्वारा दूसरों को भला चंगा करना ऑटो सजेशन है। स्वर योग सैल्फ सजेशन है।

निःसंदेह रोग पर अंदर से क्रिया की जा सकती है परन्तु कार्य सदा सहज नहीं होता। कारण जड़ प्रकृति बहुत अधिक प्रतिरोध किया करती है, इसमें अकथ प्रयत्न की आवश्यकता है संभवतः आरम्भ में यह प्रयास असफल प्रतीत हो किंतु क्रमशः अभ्यास करने पर शरीर या किसी रोग विशेष पर नियंत्रण करने की शक्ति बढ़ जाती हैं और रोग के आकस्मिक आक्रमण को आँतरिक साधनों के द्वारा आराम कर लेना सहज हो जाता हैं, हाँ जीर्ण रोग का अंतः क्रिया द्वारा उपचार करना आरम्भ में कठिन अवश्य है, किंतु फिर भी शरीर की सामयिक अस्वस्थता सहज में दूर होकर लाभ हो सकता हैं यह भी सफलता प्राप्त की एक सीढ़ी हैं इसके बाद अपने अभ्यास को इतना बढ़ाओं कि तुम्हें पूर्ण सफलता प्राप्त हो।

श्वास विज्ञान में प्रधानता इस बात की है कि श्वास सदा नाक से ली जावे जिसे मुंह से श्वास लेने की आदत हो उसे छोड़ दें तब आगे अभ्यास करे श्वास लेने के रक्षा की सामग्री प्रकृतिप्रदत्त है किंतु मुँह से लेकर फेफड़े तक ऐसी कोई चीज नहीं है जो हवा को छान करके साफ करे, मुँह से श्वास लेने में जब सर्द हवा फेफड़ों में पहुँचती हैं तो भारी शाँति पहुँचाती है यहाँ तक कि श्वास अवयवों में प्रायः सूजन आ जाती है और नाक के नथुनों से काम लिये जाने के कारण वे साफ नहीं रहते और नासिका सम्बन्धी रोग हो जाया करते हैं।

अनेक रोग प्रायः अपान वायु की गड़बड़ी के कारण ही हुआ करते हैं नाभि से गुदा तक अपान वायु का स्थान है और हम जो श्वास मुख अथवा नाक से लेते हैं वह नाभि तक जाती है जिसका नाम प्राणवायु है, इस प्रकार नाभि समान वायु का स्थान और भी वायुओं के पृथक स्थान शरीर में हैं जिनका रोग और निरोगता से क्या संबंध है यह किसी अगले अंक में वर्णन करूंगा।

अपूर्ण)


Quotation

जो पाने की आशा से देता है वह देता नहीं। देता तो वही है जो देने के लिये देता है। निष्कृष्ट, निस्वार्थ होकर देता है।


माफ कर दो।

(अध्यापक जहूरबख्श)

हजरत अली हजरत मुहम्मद साहब के दामाद और मुसलमानों के चौथे खलीफा थे। अपनी अद्भुत वीरता, न्याय-शीलता, दया और उदारता के कारण उनका नाम सदैव इतिहास के पृष्ठों पर चमकता रहेगा। परन्तु यह संसार भी एक विचित्र पहेली है, इसमें हजरत अली जैसे सज्जन को भी शत्रुओं से सामना करना पड़ा। उनके इन शत्रुओं में इव्न मुलजिम तो बड़ा ही भयानक निकला। उसने हजरत अली के प्राण लेकर ही शान्ति लाभ किया। वह पहले उनके लश्कर में था और लड़ झगड़कर भाग गया था।

एक दिन हजरत अली कूफा नगर की मस्जिद में सुबह की नमाज पढ़ रहे थे। जिस समय सब लोग सिजदा करने झुके, वहाँ सहसा इव्न मुलजिम आ पहुँचा। उसने झपटकर हजरत अली पर हमला किया और जहर की बुझी हुई तलवार से उनको तीन जगह घायल कर दिया।

नमाज खत्म होते ही कुछ लोग तो हजरत अली को संभालने में लगे और कुछ लोग इव्न मुलजिम के पीछे दौड़े। थोड़ी दूर जाकर उन्होंने इव्न मुलजिम को पकड़ लिया और वे उसे हजरत अली के सामने ले आये। इसी समय कुछ लोग हजरत अली के लिये शरबत का प्याला तैयार करके लाये। हजरत ने फरमाया-”यह शरबत पहले इव्न मुलजिम को पिलाओ। वह दौड़ते-दौड़ते हांफने लगा है, और प्यासा मालूम होता है।”

घाव बहुत गहरे लगे थे। जब हजरत अली का अन्तिम समय निकट आ गया, तब उनके प्रेमियों ने उनसे पूछा-”आप अपने खूनी की बात क्या हुक्म देते हैं?” उन्होंने जवाब दिया-”अगर मेरा कहना मानो, तो उसे माफ कर देना।”


सुमन की सुगन्ध।

(ले. श्री. आत्माराम देवकर, हटा, दमोह)

सुमन कोमल और सुगंधित होता है। सुमन का अर्थ सुन्दर-स्वच्छ मन भी है। जो स्वामी तुलसीदास जी ने संतों के हृदय को जल के समान निर्मल और नवनीत (मक्खन) के समान कोमल बताया है। मक्खन अपने दुख से द्रवीभूत हो जाता है। जब तपाया जाय तभी पिघल उठता है। पर सज्जनों का हृदय दूसरों के दुख देखकर भी पिघल उठता है। कई पुष्पों में भी यह गुण होता है। वे संसार का वैभव और प्रकाश उल्लास देखकर हंसते हैं और उस पर कालिमा पुती देखकर मुरझा जाते हैं। कमल का फूल सूर्य निकलते ही खिल जाता है और रात्रि आते ही मुरझा जाता है, इस प्रकार के पुष्पों को उच्च श्रेणी में गिना जाता है। उच्च श्रेणी का सुमन (सुन्दर मन) वही है जो दूसरों का वैभव देखकर प्रसन्न होता है और दीन दुखियों को देखकर दुखी होता है।

रामायण कहती है कि “संत हृदय नवनीत समाना। कहा कविन पै कहा न जाना॥ निज परिताप द्रवै नवनीता। पर दुख द्रवै सो संत पुनीता॥” पराये दुखों को देखकर भगवान बुद्ध की तरह जिसका अन्तस्थल रो पड़ता है वास्तव में वह सच्चा संत है। किसी का कष्ट देखकर जो आँसू निकलते हैं उसमें उसके सारे पाप ताप घुलकर बह जाते हैं और अन्तस्थल परम पवित्र हो जाता।

ऐसे पवित्र सुमनों में मनमोहक सुगन्धि अपने आप आकर्षित हो जाती है। समुद्र में सम्मिलित होने के लिये नदियाँ अपने आप दौड़ पड़ती हैं। दयालु आत्मा में अन्य समस्त गुण अपने आप भर जाते हैं और वह वायु के साथ जब इधर उधर फैलते हैं तो सुगन्ध कहलाते हैं। इसी सुगंध के आधार पर वे सुमन देवताओं के मस्तक पर चढ़ते हैं।

यदि तुम्हारा मन सुमन है तो उसमें निश्चय ही सद्गुणों की सुगंध भर जायगी और उस सुगंध पर संसार निछावर होगा।


तलवार या प्रेम?

(श्री. बालेश्वरसिंह जी आरा)

किसी पर विजय प्राप्त करने के लिये मनुष्य के पास दो ही साधन उपलब्ध हो सकते हैं। एक तलवार तथा दूसरा प्रेम।

तलवार से किसी को अपने वश में किया जा सकता है, उससे अपना आदेश मनवाया जा सकता है। किन्तु यह विजय क्षणिक है, इससे किसी के हृदय पर अधिकार नहीं जमाया जा सकता है। परास्त मनुष्य तभी तक अपने को परास्त समझता है जब तक वह निर्बल है और उसके पास ईंट का जवाब पत्थर से देने का साधन उपलब्ध नहीं है। वह भीतर ही भीतर ऐसे सुअवसर की प्रतीक्षा में रहता है जब वह अपने शत्रु से बदला लेने में अपने को समर्थ समझ सके और एक न एक दिन उसे ऐसा अवसर मिल ही जाता है।

प्रेम से प्राप्त किया हुआ अधिकार स्थायी होता है। विजयी न अपने को विजयी समझता है और न विजित अपने को विजित। वे सदा के लिये सच्चे मित्र बन जाते हैं। एक के हृदय पर दूसरे का अटल अधिकार हो जाता है।

शक्तिशाली लोग तलवार का प्रयोग इसलिये करते हैं कि उनकी शक्ति को अपने काम में ला सकें। यह कार्य प्रेम से भी हो सकता है। राम के साथ वानरों की असंख्य सेना, ईसा और बुद्ध के अगणित अनुयायी, गान्धी के अनेक सत्याग्रही इस बात के साक्षी हैं कि प्रेम का बन्धन तलवार के भय से प्रबल है।

आप दूसरों को अपना सहायक बनाना चाहते हैं, उनकी शक्ति का उपयोग करना चाहते हैं, यश या ऐश्वर्य चाहते हैं तो प्रेम शस्त्र को अपनाइये, यह तलवार की अपेक्षा सैकड़ों गुनी शक्ति रखता है।


अहंभाव का प्रसार करो।

(ले. शिवनारायण शर्मा हैडमास्टर, माईथान आगरा)

वानप्रस्थ आश्रम

(1)

ब्रह्मचर्य अवस्था में विद्या (ज्ञान) संग्रह करके गृहस्थाश्रम प्रवेश करते हैं, फिर आश्रमोचित अनेक प्रकार के कर्तव्य सम्पादन करके, कर्म द्वारा ज्ञान का परिपाक साधनपूर्वक वानप्रस्थाश्रम लेते हैं। फिर संन्यासाश्रम में प्रवेश करके ब्रह्म में लीन होते हैं। यह प्राचीन प्रथा सार्वजनिक नियम के ऊपर स्थापित और आत्म प्रसार के अनुकूल है। वयोवृद्धि के साथ हमारी देह और मन के अनेक परिवर्तन होते जाते हैं, फिर उनके साथ दैहिक और मानसिक क्रिया भी बदलती जाती है। बचपन के सुख-दुख, हर्ष-विषाद, जवानी- प्रौढ़ और बुढ़ापे में नये नये आकार धारण करते हैं। जो जो वस्तुयें, कार्य और विचार एक अवस्था में अतुल आनन्द वा अत्यन्त दुःख के कारण होती हैं, दूसरी अवस्था में उनकी वह शक्ति नहीं रहती। बालिका गुड़ियों के खेल पुत्र कन्या के लालन पालन में कितनी आनन्द से विह्वल है, किंतु युवती उससे परितृप्त नहीं, उसे यथार्थ पुत्र कन्या की आवश्यकता है। आत्म विकास के साथ आत्म तृप्ति करने वाले पदार्थों की सीमा बढ़ाना आवश्यक है। संसार की अनित्यता अनुभव करके, बुढ़िया युवावस्था में जिस पुत्र कन्या रूप गुड़ियों को लेकर मग्न थी, शायद अब वह उनमें उतनी मुग्ध न रह सके, उसको चित्त की सुख शाँति के लिये अधिकतर नित्य वस्तु की आवश्यकता होती है।

तत्त्वज्ञ दूरदर्शी ऋषियों ने विश्व का कल्याण व्रत साधन के उद्देश्य से मानव जीवन चार भागों में विभक्त करके उसका क्रम विकास के उपयोगी कर्तव्य निश्चित किये हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम में ज्ञान का जो संग्रह होता है, गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रम में उसकी उन्नति, परिणति एवं संन्यस्त आश्रम उसकी पूर्ण परिणत साधन करते हैं। मुक्ति ही जीवन का उद्देश्य और परिणत है; आत्मा के प्रसार वा विकास की पूर्णता के साथ मुक्ति का कुछ भी प्रभेद नहीं है। जब तक सर्वत्र भेदभाव पुष्ट होता रहे, सर्वत्र एकत्व अनुभव न हो, सारा संसार जब तक एक सूत्र में गुंथित न दिखाई पड़े, तब तक मानव शोक मोह परित्याग कर चिरशान्ति उपभोग का अधिकारी नहीं है। अपना पराया यह भेद ज्ञान नष्ट होने पर, सर्वत्र एकता का अनुभव होने पर, शोक-मोह को स्थान फिर कहाँ? एकत्व का अनुभव ही यथार्थ तत्व ज्ञान है और तत्व ज्ञान ही मुक्ति का साक्षात् कारण है। जगत् में सब ही सुख के लिये लालायित हैं, किन्तु जिस सुख में दुःख मिला हुआ हो, वह सुख सुख ही नहीं है। यदि दुख रहित वा दुःख से निरपेक्ष कोई सुख हो तो वही सुख यथार्थ सुख वा शान्ति है, विचार कर देखिये तो किसी भी ससीम वस्तु में आप सुख सिद्ध नहीं कर सकेंगे। सीमा पर पहुँचने पर अनन्त विकासशील मानवात्मा मानो हाथ जोड़े हुये, बिल्कुल समीपता से, क्षुब्ध चित्त से करुणामय स्वर से, सतृष्ण नयन से असीम प्रार्थना में प्रवृत्त हो रही हैं। जब मानवात्मा ससीम प्रदेश में ससीम देशान्तर में पर्यटन करके, असीम साम्राज्य में, असीमात्मा के प्रसाद से असीमत्व पर अधिकार करता है, तब ही वह यथार्थ सुख या शान्ति सम्भोग करता है। ससीम प्रदेश में ही अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति कामना एवं प्राप्त वस्तु के वियोग (नाश) की आशंका रहती है। एवं इस कारण निरन्तर अशान्ति भोगनी पड़ती है। असीम साम्राज्य में अप्राप्त कुछ नहीं है और प्राप्त वस्तु के नाश की आशंका भी नहीं है। अतएव उसी स्थल में सदा सुख और शाँति विराजती है।

ब्रह्मचारी का कार्यक्षेत्र संकीर्ण है, आत्मोन्नति साधन ही उसका प्रधान कर्तव्य है। विद्वान पुरुषों का गुरुगृह ही उसका विश्व है।

इस संकीर्ण रंगमंच पर उसके जीवन अंश अभिनीत होने की व्यवस्था है। यहाँ वह बिल्कुल पराधीन है, उसे जो कुछ करना होगा वह गुरु की अनुमति लेकर ही करना होगा, बिना तर्क के गुरु का उपदेश प्रतिपालन करना होगा। प्रथम मृदु फिर क्रम से कठोर संयम द्वारा शरीर और मन को कार्मोपयोगी करना होगा। जीवन द्वितीय विभाग के सब कर्तव्य का पालन के लिये ब्रह्मचारी को देह मन जिस प्रकार संगठित करना आवश्यक है, उसी प्रकार संगठित कर लेने पर आर्य ऋषि उसे गृहस्थाश्रम में प्रवेश का अधिकार देते हैं। कर्मक्षेत्र में गृहस्थ को जो तुमुल संग्राम करना होगा, सैकड़ों अत्याचार अविचार के विरुद्ध उसे खड़ा होना होगा, सैकड़ों प्रलोभनों को पददलित करना होगा, अनेक शुद्ध हृदय दुर्बलताओं का त्याग कर कर्तव्य मार्ग पर आगे बढ़ना होगा, साधुओं की सेवा और दुष्कृतों के संस्कार के लिये, एवं धर्म की रक्षा के लिये तथा अधर्म के विनाश के लिये उसे सैकड़ों बार महा विपद में पड़ना होगा, यह विचार कर शिष्य को मंगल कामना से प्राज्ञ और सुदूरदर्शी गुरु उसे धर्म कवच से आच्छादित और कर्म वीरोपयोगी अनेक प्रकार के आग्नेयास्त्र से सुसज्जित कर सैकड़ों शत्रुओं से क्षोभित संसार समराँगण में प्रेरण करते हैं। ब्रह्मचारी संकीर्ण कार्यक्षेत्र परित्याग कर अब विस्तीर्ण कार्यक्षेत्र में प्रवेश करता हैं। कार्यक्षेत्र प्रसारित होने के साथ ही साथ उसके अहंभाव का प्रसार भी होने लगा। स्त्री, पुत्र, कन्या, आत्मीय कुटुम्ब, अतिथि, अभ्यागत, दीन-दुखी, रोगी, विकलाँग, इत्यादि बहुत से पालन करने योग्य प्राणियों से घिरकर गृहस्थ का अहंभाव दिन दिन फैलने लगा। असंख्य कर्तव्य आकर उसके सामने उदित होने लगे और उन्हें सम्पादन करने के लिये वह अपने मन और प्राण उत्सर्ग करने लगे। कार्यक्षेत्र में वे अनुभव करने लगे कि देह के किसी अंग का अमंगल होने पर सारा शरीर पीड़ित वा अमंगल ग्रस्त हो जाता है। मन की कोई एक वृत्ति हैं तो ड़ड़ड़ड़ से सारी वृत्तियाँ उसकी छूत से थोड़ी वे ड़ड़ड़ड़ कृसत हो जाती हैं। परिवार में किसी एक का ड़ड़ड़ड़ कल्याण होने से समग्र समाज का अभ्युदय गिर जाता है। एवं समाज विशेष का अमंगल समग्र मानव समाज को अमंगल का भागी बनाता है। वह अनुभव कर सकते हैं कि यह मेरा नर जीवन विश्व जीवन का ही एक अंशमात्र है एवं वृक्ष, लता, पशु, पक्षी, कीट-पतंग इत्यादि सबके मंगल के साथ मानव जाति का मंगल अति घनिष्ठ भाव से सम्बन्ध हैं। यह अनुभव करने लगता हैं कि क्या सजीव क्या निर्जीव सारा विश्व ही मानव जीवन से मिला हुआ है। कर्म द्वारा उसके ज्ञान का जितना परिपाक होने लगा उतना ही वह ब्रह्म से स्तम्ब पर्यन्त एक सूत्र में गुंथित देखने लगा, उतना ही वह सर्वत्र एकत्व अनुभव करने लगा। किन्तु हाय! जिस तरह घनघोर घटा से छाई हुई अमावस की अंधेरी रात में क्षण प्रभा क्षणकाल के लिये अन्धकार दूर करके दूसरे क्षण ही असीम आकाश में विलीन हो जाती है उसी प्रकार आत्मतत्व विरोधिनी माया द्वारा आच्छन्न जीव के चित्त में अद्वैत का विवेक क्षणभर के लिए चमककर फिर विलीन हो जाता है।

कार्यक्षेत्र में प्रवेश करने पर मैं को जिस तरह जगत के साथ अच्छी तरह मिला हुआ देखते हैं, उस तरह किसी एकदम उस मैं का परित्याग नहीं कर सकते। कार्यक्षेत्र में रहने “हमारी देह” ‘हमारा घर’ ‘हमारा पुत्र’ ‘हमारी प्रजा’ ‘हमारा धर्म’ ‘हमारा कर्म’ इत्यादि सर्वत्र ही ‘हमारा’ ‘हमारा’ नाव आ पड़ता हैं। मैं को सर्वत्र प्रसारित करना चाहिये, किन्तु उसे जितना ही प्रसारित करो, ‘मुझ से’ “मैं” रख देने से वह फिर सब ही ‘मेरा’ कर डालता है। यह मेरा (अपना) अंश नष्ट कर देने के लिये ही वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की आवश्यकता है।

अतएव मैं संसार का परित्याग कर अरण्य प्रवेश करूंगा। “मेरा” कहने के लिये अपना कुछ भी न रखूँगा। अथवा समग्र विश्व ही अपना करूंगा। दिव्य चक्षुः सम्पन्न परमर्षियों ने यह सब जानकर ही हमारी इस वयस में अरण्याश्रम की व्यवस्था की थी कि गृहस्थ जब त्वचा की शिथिलता, केशों की सफेदी और पुत्र का पुत्र (नाती) देख ले, तब अरण्य का आश्रय करे। (मनु)

वानप्रस्थाश्रम लेने पर वन में “अपना” कुछ नहीं कह सकेंगे, विषय संपत्ति सब त्याग देंगे। स्त्री


वीर्य रक्षा के उपाय

(पं0 राजेन्द्र प्रसाद जैन, हि. सा. विशारद, अनर्दपुर)

मनुष्य जीवन की सार्थकता उसके स्वस्थ और सुदृढ़ होने में है। उत्तम स्वास्थ्य के लिये वीर्य रक्षा आवश्यक है। स्वास्थ्य लाभ, बल बुद्धि का विकास, योगाभ्यास, विद्या पढ़ना, शारीरिक परिश्रम इनमें से वीर्य रक्षा के बिना कोई भी काम ठीक तरह से नहीं हो सकता। उत्साह, बल, स्फूर्ति और निरोगता यह सब बातें वीर्य रक्षा पर ही अवलंबित हैं।

आजकल बहुत से नवयुवक बुरी संगति और बुरे विचारों में पड़कर वीर्य नष्ट करने लगते है अन्त में उन्हें प्रमेह, स्वप्नदोष आदि रोग घेर लेते हैं। बहुत सी दवादारु करने पर भी उन्हें विशेष लाभ नहीं होता। इसी प्रकार कुछ नवयुवक इन्द्रिय वेग को रोक सकने में अपने को असमर्थ सा पाते हैं। कितने ही लोग ऐसे हैं जो ब्रह्मचर्य पालन करने की इच्छा रखते हुये भी अपने को काबू में नहीं रख सकते और भ्रष्ट हो जाते हैं।

नीचे कुछ ऐसे उपाय बताये जाते हैं जिनका यदि ठीक तौर से पालन किया जाय तो वीर्य रक्षा बड़ी आसानी से हो सकती है। जिन्हें स्वप्नदोष तथा अन्य प्रकार से धातु पात होने का रोग लग गया है वे भी अच्छे हो सकते हैं।

नियम

(1) भोजन सात्त्विक करना चाहिये। मिर्च, मसाले, खटाई, अधिक मीठा, गरम चीजें, मद्य, माँस आदि त्याग देना चाहिये। नियत समय पर, भूख से कुछ कम मात्रा में ताजी, सादा, और सात्विक भोजन खूब चबा चबा कर खाना चाहिये।

(2) रात को जल्दी सोना और सवेरे जल्दी उठना चाहिये। सूर्योदय से कम से कम एक घंटा पहले उठना आवश्यक है।

(3) पेशाब करके तथा हाथ पैर धोकर कुल्ला करके ईश्वर का चिन्तन करते हुये सोना उचित है।

(4) जहाँ तक हो सके सदाचारी, ईश्वर भक्त, शुभ कार्य करने वाले तथा उत्तम विचार वाले पुरुषों का सत्संग करना चाहिये। बुरे लोगों की संगति में कदापि न रहें।

(6) प्रातःकाल स्वच्छ वायु में नित्य कई मील पैदल घूमने जाना चाहिये।

(7) मन को हमेशा किसी काम में लगाये रहना चाहिये। बेकार बैठे रहना, आलस्य या प्रमाद में पड़े रहना अनुचित है।

(8) उत्तम कोटि की शिक्षा देने वाली पुस्तकों का ही स्वाध्याय करना चाहिये। कामोत्तेजक या अश्लील पुस्तकों, चित्रों को पास भी नहीं आने देना चाहिये।

(9) मल या मूत्र त्यागने के उपरान्त के इन्द्रिय को शीतल जल से धोना चाहिये। स्नान भी जहाँ तक हो सके ठंडे पानी से ही करना चाहिये।

(10) कुछ न कुछ शारीरिक परिश्रम अवश्य करना चाहिये। हो सके तो नियमित रूप से व्यायाम आसन, प्राणायाम आदि का अभ्यास करना चाहिये।

(11) संसार की नश्वरता का बार बार चिन्तन करना चाहिये और अपनी मृत्यु को भूलना न चाहिये।

(12) स्त्री को पुरुषों के शरीर में और पुरुषों को स्त्री के शरीर में मलीनता की भावना करनी चाहिये। मन में कल्पना करके शरीर के रक्त, माँस, हड्डी, मल, मूत्र आदि अपवित्र वस्तुओं का स्वरूप देखना चाहिये और जिस स्त्री या पुरुष की ओर मन जाता हो उसके शरीर को घृणित मल मूल के पिण्ड रूप में देखना चाहिये।

(13) महीने में कम से कम दो दिन उपवास करना चाहिये। इसके लिये अमावस्या, पूर्णमासी या दोनों एकादशी अधिक उपयुक्त हैं।

(14) वीर पुरुषों, ब्रह्मचारियों और कामवासना से दूर रहने वाले लोगों के चरित्रों का मनन करना चाहिये।

(15) जब इन्द्रियों का वेग प्रबल हो रहा हो तो किसी काम में लग जाना चाहिये या अपने को इष्टदेव, गुरु, माता, पिता आदि पूज्य जनों के सम्मुख खड़ा होने की भावना करनी चाहिये।

(16) नियमपूर्वक रोज कुछ समय ईश्वर का भजन अवश्य करना चाहिये।

इन नियमों का पालन करने से वे दुष्ट वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं जिनके कारण अनावश्यक कामोत्तेजना होती है। धीरे धीरे हृदय पवित्र होने लगता है और शुभ कर्मों की इच्छा उत्पन्न होती है, साथ ही कामवासना की नीच विचार अपने आप दूर होने लगते हैं। इससे वीर्य रक्षा करना सुगम हो जाता है।


आगे के लिये बचाओ।

(इंजील के आधार पर)

एक धनवान मनुष्य था। उसे सब प्रकार के सुख, ऐश्वर्य प्राप्त थे। मखमली वस्त्र और सोने के जेवरों से उसकी देह सजी रहती थी। सारे दिन शौक मौज करने के अतिरिक्त उसके पास और कोई काम न था।

इलियाजर नामक एक कंगाल उसी धनवान का पड़ौसी था। वृद्धावस्था और बीमारी के कारण बेचारा कुछ कर नहीं सकता था इसलिये अपने धनवान पड़ौसी के द्वार पर जाता और उसकी मेज के नीचे भोजन के जो किनके गिर पड़ते बीन बीन कर पेट में डाल लेता। धनी के पास किसी बात की कमी न थी पर उसने कंगाल की हालत पर न तो कभी तरस खाया और न उसकी कुछ मदद की।

इलियाजर धर्मात्मा था। गरीबी और अशक्त होने के कारण वह किसी की कुछ सेवा नहीं कर सकता था इससे उसे बड़ा दुख होता। उसके पाँवों में घाव हो गये थे। जब कभी वह कुत्तों को देख पाता तो उन्हें प्यार से बुलाता और अपने घाव उनके चाटने के लिये खोल देता। अपना थोड़ा सा रक्त माँस कुत्तों को दान करके वह अपने दुख को हल्का कर लेता और अपने कष्टों के लिये प्रभु को धन्यवाद देता, जिनके कारण वह ईश्वर को हर घड़ी याद करता रहता है।

समय आने पर इलियाजर मरा। थोड़े ही दिन बाद उस धनी को भी मरना पड़ा। प्रेत लोक में दोनों ही पहुँचे। धनी को घोर पीड़ाओं से भरे नरक में रखा गया वहाँ वह असहनीय पीड़ायें सहने लगा। ममन्तिक कष्टों से वह तड़प रहा था कि उसकी निगाह दूसरी ओर गई। उसने देखा कि स्वर्ग के देवता इब्राहीम की गोद में इलियाजर बैठा हुआ है और विपुल ऐश्वर्यों का उपभोग कर रहा है।

धनी का गला भर आया। उसने चीखकर इब्राहीम से कहा-हे पिता! दया कर इलियाजर को मेरे पास भेजिये ताकि वह मेरे जलते हुये गले में कुछ पानी की बूंदें डाल दे मैं प्यास के मारे मरा जा रहा हूँ।

इब्राहीम ने कहा-पुत्र! प्रभु का न्याय बड़ा कठोर है उसमें पक्षपात को स्थान नहीं है। तू जीते जी अपनी सम्पत्ति पा चुका। अब अधिक तुझे कैसे मिल सकता है? काश, तूने उस समय बचाकर कुछ इस समय के लिये संचित किया होता तो आज इस तरह यहाँ न तड़पता।


महाबन्ध मुद्रा

(लेखक-श्री उमेश चन्द्र जी, श्रीराम तीर्थ योगाश्रम 288 सेन्डहर्स्ट रोड़, बम्बई 4)

जब साधक योग के अन्तरंग साधन में प्रविष्ट होता है, तब उसे अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होने लगते हैं, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि इन चारों को योग के अंतरंग साधन कहते हैं, प्रत्याहार और धारणादि के अभ्यास काल में कुँडलिनी शक्ति जाग्रत करनी पड़ती है, कुण्डलिनी शक्ति के उत्थान के समय में और होने के पश्चात् साधक की बुद्धि अत्यन्त तीव्र हो जाती है, शरीर अत्यन्त तेजोमय बनता है, कुण्डलिनी उत्थान के लिये खेचरी मुद्रा, महामुद्रा, महाबन्ध मुद्रा, महा वेद मुद्रा, विपरीत करणी मुद्रा, ताड़न मुद्रा, परिधान युक्ति, परिचालन मुद्रा और शक्तिचालन मुद्रा आदि उत्कृष्ट अनेक मुद्राओं का अभ्यास करना पड़ता है। आगे एक ऐसी मुद्रा का उल्लेख किया जाता है।

महाबन्ध मुद्रा करने की रीति

प्रथम बायाँ पैर शिवनी (अंडकोष और गुदा का मध्य स्थान) में और दाहिने पैर की एड़ी को बाँये पैर की जंघा के मूल (स्वाधिष्ठान कमल के बाजू) में रखें। बाई हथेली और दाहिनी हथेली को दाहिने पैर के घुटने पर रखें, कमर पीठ रीढ़ और सिर सीधा रखें, छाती को जरा आगे की तरफ झुका कर रखें, आँखें बन्द रखें, शरीर को साधारण कड़क रखें, फिर दोनों नासिका संघर्षण (एक बार श्वांस को फेफड़े में भरना और तुरन्त ही खाली कर देना उसे एक घर्षण कहते हैं) कर के बाई नासिका से पूरक कर (श्वांस भीतर लेना) कुँभक के समय दोनों हाथों से दाहिने पैर के घुटने को पकड़े रहे, जालंधर बंध (दाढ़ी को कंठ कूप में लगाना) रखें, और यथाशक्ति कुँभक करने के पश्चात् दाहिनी नासिका से शनैः-2 रेचक करें, रेचक के समय में उड्डियान बंध (पेट को अंदर पीठ की तरफ ले जाना) करें। कुम्भक समय में उत्कृष्ट भावना करें। जैसे कि :- मैं आज से उन्नति मार्ग पर चढ़ रहा हूँ “मेरे शरीर में जो दुर्बलता, अपवित्रता न्यूनता रूपी दोष हैं वह आज से और इसी क्षण से दूर हो रहा है, मैं इस दुनिया में आज से शुभ कार्यों में ही जुट गया “सर्व दिशा, सर्व देवता, सर्व प्राणी, एवं चराचर वस्तु में से आनन्द ही आनन्द ही लूट रहा हूँ, देख रहा हूँ, सुन रहा हूँ, और उसी में तल्लीन तदाकार हो रहा हूँ” आज से मेरा मन अत्यन्त शुभ स्फटिकमणि के समान परम पवित्र हो रहा है।

जिसे मोक्ष का ही पथिक बनना हो, “तो मेरा पंचप्राण एकत्र हो रहा है” ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र गणपति आदि सर्व देवता, मूलाधार चक्र स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र , विशुद्ध चक्र और ब्रह्म रंध्र में अत्यन्त संतप्त हो रहे हैं “स्वाधिष्ठान चक्र में अनेक काल से कर्माशय कोष को वैघृत (वेष्ठित) कर गाढ़ निद्रा में सोई हुई कुण्डलिनी उत्थान होने की तैयारी कर रही है” मूलाधार चक्र से लेकर ब्रह्म रंध्र तक का रास्ता खुल रहा है “सुषुम्ना नाड़ी अत्यन्त शुद्ध होकर प्राण को उर्ध्व गति को ले जाने की तैयारी कर रही हैं” “सारे शरीर की नाड़ियाँ शुद्ध हो रही हैं” आदि विचार प्रवाह को चालू रखें।

उपरोक्त विधि के अनुसार बायें पैर बाजू से एक बार पूरक, कुँभक, और रेचक होने पर तुरन्त ही पैर को बदली करें। अर्थात् दाहिने पैर को सिवनी में रखे और बाँये पैर को दाहिने पैर की जंघा मूल में (उसकी बाजू में रखें) इस समय दाहिनी नासिका से पूरक करें, यथाशक्ति कुम्भक के पश्चात् बायाँ नासा रंध्र से शनैः-2 रेचक करें। इसी प्रकार एक बार बायीं बाजू और तुरन्त ही दूसरी बार दाहिनी बाजू पाँच-पाँच घर्षण तथा पूरक कुम्भक और रेचक करें, तब एक महाबंध मुद्रा सम्पूर्ण हुई समझना। मुद्रा के समय में उत्कृष्ट भावनायें अवश्य करें और तीन बंध ही नियमित रूप से करें।

पूरक, कुम्भक, रेचक का समय का जिस व्यक्ति को मुद्रा के विषय में अनभिज्ञ हों वे व्यक्ति अनुलोम विलोम प्राणायाम का अभ्यास करें, क्योंकि फेफड़ा को एकदम अधिक प्रमाण में परिश्रम नहीं होना चाहिये, यद्यपि जिसको बिना प्राणायाम सीखे मुद्रा का अभ्यास करना हो तो वह स्त्री पुरुष, मुद्रा के अभ्यास काल में घर्षण खूब जोर से नहीं करे किन्तु सामान्य रूप से करें। एक मात्रा :- एक सेकेंड समझना। भूतकाल में योगाभ्यास नहीं किये हुये स्त्री पुरुष प्रथम थोड़े दिन तक चार मात्रा कुम्भक करे, और आठ मात्रा रेचक करे जैसा जैसा फेफड़े में विकास इन्द्रिय स्वाधीन, प्राण काबू में मन निरोध, बुद्धि स्थिर, अहंकार शमन तथा चित्त शाँत बनता जाय वैसा-2 मात्रा की संख्या को बढ़ाते जायं, सामान्य तथा व्यवहार में कुशलता मिलाने के लिये इच्छा रखने वाले स्त्री पुरुष 16 मात्रा पूरक 64 कुम्भक और 32 मात्रा रेचक करें। मुमुक्षु वर्ग (मोक्ष गामी) होवे तो 64 से अधिक मात्रा कुम्भक कर सकते हैं किंतु कम से कम 16 मात्रा पूरक और 32 मात्रा तक रेचक होना आवश्यक है।

मुद्रा का प्रमाण

5 दिन तक दो बार 5 से 12 दिन 4 बार 12 से 20 दिन तक 5 बार 20 से 30 दिन तक बार 30 दिन के पश्चात् यथाशक्ति 9 से 12 बार नित्य नियम पूर्वक करता रहे, इस मुद्रा को 12 वर्ष के 100 वर्ष तक स्त्री पुरुष कर सकते हैं।

इससे लाभ

इस मुद्रा के अल्प समय के अभ्यास से शरीर में एक प्रकार का आनन्द मालूम होता है, मन की खराब वृत्तियाँ नष्ट होती है, खराब व्यसनों से मुक्त होने के लिये मुद्रा एक अमूल्य साधन हैं, मुमुक्षुओं के शरीर की नाड़ियाँ शुद्ध हो जाती हैं, प्राण, अपान, समान, उदान, और व्यान वायु एकत्र होकर सुशुम्ना नाड़ी में प्रवेश करने लगती है, उदान वायु समान वायु में, समान वायु व्यान वायु में, व्यान वायु अपान वायु में अपान वायु प्राण चक्र में लय होती है, उस समय अनहद आनन्द मालूम होगा, मन में असीम सुख का भरन होता है एवं आत्मानंद की प्राप्ति होती है।


तत्व दर्शियों से जिज्ञासा

पं. श्री कान्त जी एक होनहार और भावुक जिज्ञासु हैं। उनके जैसी शंकाएं अन्य जिज्ञासुओं के हृदय में भी उठती होंगी। इसलिये विद्वानों से प्रार्थना है कि वे इन शंकाओं का संक्षिप्त और सार गर्भित उत्तर देने की कृपा करें।

-संपादक

“ईश्वर मुक्त है या अमुक?” यदि मुक्त है तो फिर सृष्टि की इच्छा क्यों करता है? यदि अमुक्त है तो फिर पूज्य कैसा? यदि मुक्ता-मुक्त है तब तो वह अलौकिक एवं वर्णनातीत हुआ अतः उसके दर्शन के लिए हरिभजन करना क्यों कर उपयुक्त है? कर्म फल अटल हैं ऐसी अवस्था में हरिभजन हमारे भाग्य चक्र को कैसे बदल सकते है? शंका तो यह है कि ईश्वर अपने शक्ति बल से ऐसा करता है तब तो वह राग द्वेष मुक्त नहीं कहा जा सकता। अनन्तः हरिभजन की सार्वजनिक अथवा सार्वभौम प्रणाली क्या है? सबसे आश्चर्य तो यह है कि ईश्वर चोर को चोरी करने की प्रेरणा कर सज्जनों को जागे रहने का आदेश देता है। अन्त में वह चोर को पकड़वाकर आप वे दाग बच जाता है और कर्म फल उसे भुगतना पड़ता है। यह कहाँ का न्याय है? यह विचारधारा हमारे लघु जीवन स्त्रोत में बहुत दिनों से बहती आ रही है। यद्यपि आस्तिकता की बाँध से कभी-कभी दिशा बदल जाती है पर तुरन्त ही मौका पाकर उसे जर्जर कर पूर्व धारण करती है। आशा है कि ‘ज्योति’ के उद्भट विद्वान इसके लिए अगस्त्य होंगे। इससे हम उनके चिर कृतज्ञ रहेंगे।

-श्री कान्त, नारायणपुर,

पो. एकंगर सराय, पटना।


स्वास्तिक

(लेखक-विद्याभूषण पं0 मोहन शर्मा, विशारद)

पूर्व सम्पादक ‘मोहिनी’

धर्म प्राण भारतवर्ष के धार्मिक इति वृत्त में जिस भाँति वेदान्त ज्ञान को प्रधानता दी गई गई है और जिसकी गम्भीरता तथा सत्यता को प्रकारान्तर से समस्त भूमण्डल के तत्वज्ञानियों ने उन्मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया है। उसी भाँति एतदेशीय धार्मिक चिन्हों में ‘स्वस्तिक’"की प्राचीनता, समीचीनता और उपादेयता आदि सर्वतोभावेन अपरिहार्य है और इसका पृथ्वी के सुदूर देशों तक में धार्मिक कार्यों से लेकर राष्ट्रीय कार्यों तक के लिये मंगल भावना की पवित्रता के नाम पर विविध रूप से प्रयोग अथवा व्यवहार होता हुआ देखा जाता है। जीवन विज्ञान का प्रकृत रूप से प्रबोध कराने वाले वेदादि ग्रन्थों में जहाँ चक्र रूपी धार्मिक चिन्ह का उल्लेख हुआ है, वहाँ स्वस्तिक का पूर्ण भावार्थ उससे हम लेते हैं। स्वस्तिक ‘ओम’ अथवा ‘0’ शून्य का ही दूसरा स्वरूप है। शून्य से उत्पत्ति होकर शून्य में ही सृष्टि का लय होता है। (श्वक्द्गह्ब्ह्लद्धद्बठ्ठद्द ष्ड्डद्वद्गह्य ह्लश भ्द्गह्श) की थ्यूरी इसी मांगलिक चिन्ह ‘स्वस्तिक’ में सन्निहित हैं। ‘ओम’ के और ‘शून्य’ के इस दूसरे स्वरूप को केवल पवित्र और कल्याणकारी ही नहीं माना गया अपितु समग्र संसार का प्राकृतिक सुख और शान्ति इसी एक चिन्ह में केन्द्रित है। उसकी सत्ता इसी स्वस्तिक में समाई है। ऐसा आर्ष ग्रन्थों और सद्गुरु के अनमोल, सुनहली वचनों पर से प्रमाणित है।

विश्व की प्रत्येक सभ्य और प्राचीन जाति के अपने अपने अलग धार्मिक या राष्ट्रीय चिन्ह मिलते हैं। इन पवित्र धार्मिक चिन्हों (Religious Inscriptions) और संसार प्रसिद्ध भाषाओं की लिपिओं (Scripts) के इतिहास को उलटने से हम मानव मस्तिष्क की अनुसन्धानमयी सूझों और विकासोन्मुख बुद्धि के अपूर्व चमत्कारों को समझने का बल प्राप्त करते हैं। पृथ्वी की अन्य सभ्य जातियाँ प्रश्न गौण रखकर तब की आर्य और अब की हिंदू जाति के प्रचलित धार्मिक चिन्हों और विविध जन्मों पर ही हम विवेक की दृष्टि से सोचने बैठें तो यह विषय एक अबूझ पहेली जैसा ही जान पड़ेगा। क्योंकि इन चिन्हों का देश में प्रचार और व्यवहार जारी रहने पर भी काल और अवस्था के भेदानुसार इनका महत्व और यथार्थता जन साधारण के ज्ञान के क्षेत्र से कोसों दूर जा छिपे हैं। इस विषय में विरोधियों की तर्क और युक्तियों को विफल सिद्ध करने वाली कोई पुस्तक भी सुप्राय नहीं हैं, जिसमें इनका सांगोपांग वर्णन दिया गया हो। कई वर्ष पूर्व हिंदी भाषा में धार्मिक पवित्र चिन्हों पर एक हस्तलिखित पुस्तक जिसमें संशोधन और सुधार की गुंजाइश थी, श्री0 पं0 ईशनारायण जोशी, हस्तरेखा विशारद के संग्रहालय में मैंने देखी थी। वह किन्हीं अवाहय कारणों से अब तक प्रकाशित नहीं हो सकी। सम्भवतः देश के अन्य किसी विद्वान ने भी इस ओर मनोयोग दिया हो, पर जहाँ तक मुझे पता है इस ढंग की कोई भी पुस्तक देश के किसी भी उन्नत भाषा साहित्य में अद्यावधि प्रकाशित नहीं हुये। चिन्ह और लिपिशास्त्र के विद्वानों की प्रतिभा का सुन्दर उपयोग होने के लिये यह क्षेत्र आज भी खाली पड़ा हैं।

वेदादि ग्रन्थों के अतिरिक्त पुराण ग्रन्थों को टटोलने पर गणेश पुराण में स्वस्तिक का कई स्थलों पर स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है। गणेश पुराण के मतानुसार भी स्वस्तिक ‘ओम’ का ही प्रतिरूप सिद्ध है। कल्याण, शुभ, लाभ और मंगल का जो भाव है , उसी का नाम स्वस्तिक है। गणेश पुराण में उल्लेख है कि स्वस्तिक, गणपति, गजानन (!) का स्वरूप है। माँगलिक कार्यों में इसकी प्रतिष्ठा अनिवार्यतः आवश्यक है। अतः इसे नियमानुसार प्रतिष्ठित न किया जाय और आरम्भ में न बनाया जाय तो कार्य की सिद्धि नहीं होती, ऐसा भाव एतद्देशीय हिन्दू जाति में स्मरणातीत काल से ही दृढ़ीभूत अवस्था में पाया जा रहा है।

समुद्र मंथन की जग प्रसिद्ध दैवी घटना के समय भयंकर कालकूट की उत्पत्ति होने पर समग्र पृथ्वी के जीव कण्ठ गत प्राण हो चुके थे। तब जगत जननी महामाया पार्वती ने संसार को इस महान् दुख से निष्कृति दिलाने के निमित्त अपने शरणायन्न देव और दनुजों को उपदेश दिया कि हे देव! और दैत्य!! तुमने ‘स्वस्तिक’ रूपी गणध्यक्ष गणपति की पूजार्चा नहीं की, इसी कारण पृथ्वी में यह संहार दुदृश्य उपस्थित हुआ है। तब दैव और दनुजों ने ‘स्वस्तिक’ प्रथम गणपति का स्वरूप बनाकर लिखा और तब महामाया पार्वती के स्नेहानुरोध तथा प्रार्थना करने पर त्रिशूलपाणि, त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर महादेव क्षण में कालकूट का पान कर गये। तभी से मृत्युञ्जय! भगवान शंकर का कालकूट नाम पड़ा। कहने का तात्पर्य यह कि समुद्र मंथन की घटना के पीछे भी ‘स्वस्तिक’ का अपना सुनहला इतिहास छिपा है। संसार के उस महान दैवी संकट में स्वस्तिक की उपयोगिता दुख निवारणार्थ किस रूप में कारणभूत हुये, यह इस घटना पर से स्पष्ट प्रगट है।

धन, लाभ, विजय प्राप्ति, सुख और कीर्ति की उपलब्धि तथा परलौकिक सुगति के प्रीत्यर्थ भी भारत की विभिन्न जातियों में लोग स्वस्तिक की मर्यादा मानने और पालने के अभ्यासी हैं। भारतवर्षीय वणिक समाज में स्वस्तिक का स्थान और प्रयोजनीयता और भी महत्वपूर्ण है। उनके गृह, द्वार, तिजोरियां, बही-खाते आदि लक्ष्मी और सिद्धि की प्रसन्नता प्राप्त करने के उद्देश्य से सिन्दूर रञ्जित स्वस्तिक द्वारा सदैव अभिषिक्त रहते हैं। दीपोत्सव पर लक्ष्मी पूजा में स्वस्तिक को जिस भाँति प्रधानता दी जाती है वह किसी से अप्रगट नहीं है। इस प्रकार भारतीयों की धार्मिक दृष्टि में ‘स्वस्तिक’ कल्याण का प्रदाता, मोक्ष का दाता और अष्ट सिद्धि नवनिद्धि की प्रकृत वृष्टि करने वाला सिद्ध हैं। दूसरे शब्दों में “स्वस्तिक” स्वमेव स्वस्ति और मंगल का स्वरूप है। जीवन के द्वंद्व-द्वेष, कलह, विघ्न, कठिनाइयाँ इससे कट जाती हैं। उनके अग्रिम परिहार का एकमात्र धार्मिक उपाय, शुभ और माँगलिक कार्यों में स्वस्तिक का विधिवत प्रयोग होना है। पहिले की आर्य और अब की हिन्दू जाति सदैव काल से पुण्यानुष्ठान आदि में स्वस्तिक को मान्यता देती आई है, आज भी दे रही है और भविष्यत् में भी इसी भाँति प्रतिष्ठा और मान्य देती जावेगी।

चर्खा जिसे मैं अपनी भाषा में चक्र भगवान ही कहूँगा, हिन्दुओं का एक प्राचीनतम अस्त्र है। यद्यपि विश्ववंद्य महात्मा गाँधी के सदुपदेश से हिंदू जाति का ध्यान अब पुनः चर्खे के प्रति आकृष्ट हुआ है परन्तु प्राचीनकाल में यह चर्खा इस देश की राष्ट्रीय ही नहीं अपितु महान धार्मिक निधि के रूप में परिगणित होता था। सुप्रसिद्ध ग्रन्थ वृतराज में उल्लेख आया है कि इस देश की स्त्रियों के पक्ष में सिंही की संक्रान्त के दिन चर्खे का वृत्त रखना और पुरोहित से चर्खे की कथा सुनना विधेय था। हिन्दू स्त्रियाँ आज के दिन चर्खे को धो पोंछकर उसमें सिन्दूर रञ्जित स्वस्तिक के अंकित करती थी। यह वृत और त्यौहार काल और अवस्था के भेदानुसार आज हिन्दू समाज से लुप्त प्रायः हो गया हैं। अब कहीं भी हिन्दू रमणियाँ चर्खे का वृत देखकर उसमें स्वस्तिक की प्रतिष्ठा करती हुई नहीं देखी जाती। अस्तु,

इस अवनीतल पर भारतवर्ष ही एक ऐसा देवालय है, जहाँ हिन्दुओं के मन्दिर, जैनियों के देवालय चैत्यालय, बौद्धों के उपासना गृह, यहूदियों सिनोगोग, पारसियों के अग्नि मन्दिर, मुसलमानों की मस्जिदें और ईसाइयों के गिर्जे एक साथ मिलते हैं। यदि विवेक पूर्वक सूक्ष्म दृष्टि से विचार करें तो आर्यों के इस पवित्रतम धार्मिक चिन्ह स्वास्तिक को किसी न किसी रूप में इन मन्दिरों और इबादतगाहों के लिए, धर्मकार्यों के लिये सबने ही माना है पारसी लोग आतिशपरस्त अर्थात् अग्नि पुराण कहलाते हैं इनमें धरित्री के क्रोड़ पर भाँति भाँति के र्मक चिन्ह लिखने की आर्यों जैसी ही प्रथा प्रचलित हैं।

-अपूर्ण


सफल जीवन


सफल जीवन (kavita)

जीवन सफल वही होता हैं।

उछल-उछल जो सर्वनाश की टक्कर पर टक्कर सहता है।

नंगी खड़ग धार की अपने सीने पर चोटें सहता है॥

चाह नहीं; परवाह नहीं, कुछ आह नहीं, जिसके अंतर में।

चाहे आफत, महा प्रलय के, सौ तूफान उठें क्षण भर में॥

टुकड़े हों बोटी बोटी के, रोटी के पड़ जायें लाले।

कभी न लौटे निज मंजिल से और न भिक्षा-पात्र संभाले॥

किसी देश द्रोही के आगे, अपना मस्तक जो न झुकाये।

किसी खून के प्यासे को जो कभी न अपना खून पिलाये॥

देख! देख!! गड्ढे का पानी सावन का बादल होता है।

जीवन सफल वही होता है॥

(श्री. शशि)


अपने आधार पर


अपने आधार पर (kavita)

लूं आधार कहाँ तक तेरा, कब तक का तू है साथी?

बनी जहाँ तक तब तक का तू, बिगड़ गई क्या बन आती?

उठने दे मुझको पाँवों पर निज बल का अभिमान रहे।

बनने दे ऐसा पत्थर जो अविचल प्रवल प्रहार सहे॥

निज बल पर ही लड़ने वाले, विजित हुआ करते रण में।

इसी सत्य का अमर गीत गुञ्जादे मेरे कण-कण में॥

मैं न बाल हूँ, वृद्ध नहीं हूँ, भिक्षुक नहीं, अपाहिज, हीन।

मुझे न वाँछित तेरा आश्रय, खड़ा नहीं होकर मैं दीन॥

****

मेरा बोझ न लादों मुझको चलने दो अपने पथ में।

मुझ पर कृपा दिखाने वाले, बैठ चलो मेरे रथ में॥

(श्री. शिवनायणजी गौड़, लश्कर)


प्रभु से-


प्रभु से (Kavita)

प्रभो पड़ी है नाव भंवर में आकर पार लगा दो।

प्रबल पवन के झोंके आते, इनका वेग मिटा दो॥

उड़ता फिरता हूँ तृण जैसा आश्रय प्राप्त न होता।

भव सागर की पीड़ाओं से व्याकुल होता, रोता॥

गज के फन्द छुड़ाने वाले! मेरे प्राण बचाओ।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, प्रेम पियूष पिलाओ॥

गणिका, गीध, अजामिल, तारे, मुझको पार लगाना।

शिला अहिल्या की उद्धारी, मुझे भूल मत जाना॥

****

चरण शरण में पड़ा हुआ हूँ, नाथ न ठुकरा देना।

दीन बन्धु! डूबा जाता हूँ, मेरी भी सुधि लेना॥

(श्री. विश्वम्भरदयाल अग्रवाल, ‘विश्व’ बरेली)


जीवन मेला


जीवन मेला (kavita)

जीवन-मेला दो दिन का है, यहाँ किसी का रहना क्या।

क्षण भर में मैदान साफ हैं दुख-सुख का फिर कहना क्या।

तरह-तरह के रूप लिये जो बैठे मानव इधर उधर।

कह सकता है कहो कौन, कब चला जायगा कहाँ, किधर?

‘गिरह-कटों- से होशियार रह, साफ निकल जा बचकर तू।

‘घोर उमस है, अमित भीड़ है’ हो न विकल जा बचकर तू।

लगीं दुकानें देख-भाल ले, माल कहाँ का सच्चा है।

समझ बूझ कर दाम लगाना, काम यहाँ का कच्चा है।

ध्रुव-निश्चित, है यह परदेशी यहाँ न रहने पायेंगे।

एक-एक कर आये थे जो, एक-एक कर जायेंगे॥

पल भर के इस मेले में क्यों ऐंठा ऐंठा फिरता रे!

दौड़ा दौड़ा घूम व्यर्थ मत, मन में ला सुस्थिरता रे!

(मास्टर उमादत्त सारस्वत, बिसवाँ (सीतापुर)


साधकों का पृष्ठ

जो साधक हमारी बताई हुई विधियों से अभ्यास कर रहे हैं, अपने अनुभव प्रकाशनार्थ भेजते रहें। जिससे दूसरे लोग भी ‘लाभ उठा सकें।

-सम्पादक

(1)

गत मास आपकी भेजी हुई ‘मैं क्या हूँ’ पुस्तक हस्तगत हुई। पढ़कर अति सन्तुष्ट हुए। निराशा रूपी जीवन में आशा का संचार हुआ। नेत्र हीन मनुष्य जिस प्रकार नेत्र पाकर आनन्द होता है ठीक उसी प्रकार इस पुस्तक को पाकर मैं अपने जीवन को सुखी अनुभव करने लगा हूँ। आप हमारे सच्चे पथ प्रदर्शक मित्र हैं। आपके बताये हुए अभ्यास पर चल रहा हूँ। इस थोड़े से समय में ही मुझे आश्चर्यजनक लाभ हुआ। जब से अभ्यास आरम्भ किया है तब से अपनी भूलें बहुत बुरी प्रतीत हो रही हैं। मेरी अन्तरात्मा कहती है कि इन बुरी आदतों को छोड़ो। ज्ञात होता है कि शीघ्र ही मेरी जिन्दगी में नये परिवर्तन होने वाला है।

-त्रिलोक नाथ शुक्ल, नगर पारकर।

(2)

यह गांव शहर से बहुत दूर है। अशिक्षित और गरीब लोगों की आबादी 95 फीसदी है। शेष 5 फीसदी मध्यम श्रेणी के हैं। यहाँ कोई वैद्य, हकीम न था। बीमार पड़ने पर सात मील दूर के कस्बे से दवा लानी पड़ती थी। मैं थोड़ा सा पढ़ा हूँ पर आपकी ‘सूर्य चिकित्सा’ पुस्तक को अच्छी तरह समझ लिया है और उसी के अनुसार बीमारों का इलाज करना शुरू कर दिया है पास के चार पाँच गाँव के बीमार मुझसे ही दवा लेने आते हैं। 80 फीसदी का दुख दूर हो जाता है।

-भीमजी कामदार, मोरी वाड़ा।

(3)

इस महीने मैंने मस्तिष्क सम्बन्धी खराबियों के बीमारों को हाथ में लिया है। प्राण चिकित्सा विधि से इनका उपचार कर रहा हूँ। एक औरत के सिर पर रोज भूत चढ़ता है। दो पागल ऐसे हैं जो जंजीरों से बंधे रहते हैं खोलते ही लोगों को मारते हैं। एक नवयुवक रात को सोते सोते एकदम डर जाता हैं और घिग्घी बाँधकर रोने लगता है। तीन और भी ऐसे ही है। इस प्रकार मस्तिष्क सम्बन्धी रोगियों पर उपचार चालू है। आज पन्द्रहवाँ दिन है। सभी बीमारों को आधे से अधिक फायदा है। उम्मीद है कि एक को छोड़कर शेष इसी महीने अच्छे हो जायेंगे। इस अद्भुत चिकित्सा प्रणाली को आश्चर्य की तरह देखने के लिये लोग दूर दूर से रोज आते रहते हैं।

-रणवीर सिंह सोलंकी, बदलपुर।

(4)

पिछले पाँच महीनों से प्राण चिकित्सा के तरीके से केवल बच्चों का इलाज कर रही हूँ। सारे कस्बे की स्त्रियाँ मुझसे सेवा लेती हैं। किसी से कुछ न माँगने पर भी अच्छी आमदनी हो जाती है। इस नये विज्ञान की सफलता देखकर यहाँ के वैद्य लोग मन ही मन बहुत कुढ़ते हैं, उन्होंने अफवाह फैलाई थी कि मैं ‘डायन’ हूँ और मौका पाते ही बच्चों को खा जाऊंगी। इस प्रकार की नीचतापूर्ण अफवाहें फैलाने का जिन्होंने प्रयत्न किया था, वे स्वयं जनता की निगाह में घृणा के पात्र बन गये हैं। अपनी सच्चाई और ईमानदारी दर्पण की तरह स्वच्छ होने के कारण सर्वथा बाहर पाती हूँ।

सावित्री देवी, अमीगाँव।

(5)

मैस्मरेजम का अभ्यास बढ़ रहा है। चार पाँच मिनट में पात्र को नींद आ जाती है। चौबीस आदमियों पर आज़माइश की थी जिनमें से बीस निद्रित हो गये। हिप्नोटिज्म के तरीके से निद्रित करने की विधि कच्ची है, इसमें पात्र को थोड़ी सी झपकी आती है। मैस्मरेजम की नींद इतनी गहरी होती है कि एक पात्र के कान पर ढोल बजाया गया तो भी वह न जगा। अब आप पर काया प्रवेश का आगे का अभ्यास बताने की कृपा करें।

-हरगोबिन्द शिवड़े, कराँची।


आत्मचित्र

(रचयिता- श्री मोहनलाल गुप्ता)

मुझमें दुख का संसार बसा करता है,

माया में मन लाचार फँसा करता हैं,

हूँ चढ़ा रहा नित अश्रुमाल मैं जिस पर

वह भी मुझसे हर बार हँसा करता है!

मैं सब को बराबर प्यार किया करता हूँ,

पर किसी पर न अधिकार किया करता हूँ,

अमृत क्या, विष भी प्रेम सहित जो देता-

मैं कभी नहीं इन्कार किया करता हूँ!

भूलों पर भी मैं भूल किया करता हूँ,

आघातों पर मैं धूल दिया करता हूँ,

मेरे पथ में जो शूल निरन्तर बोते-

उनको भी मैं मृदु फूल दिया करता हूँ!

मैं सबको जग में आस दिया करता हूँ,

पर अपना ही विश्वास किया करता हूँ,

मेरा उपवन जो लूट, दे रहे पतझड़-

मैं उनको भी मधुमास दिया करता हूँ!

विपदाओं को मैं स्वयं वरा करता हूँ,

तूफानों में घर स्वयं खड़ा करता हूँ,

है नहीं विजय का हर्ष, पराजय का दुख-

बाधाओं से मैं नित्य लड़ा करता हूँ!

दिल से जिसको मान लिया करता हूँ,

अहरह उसका ही ध्यान किया करता हूँ,

वसुधा की विपुल विभूति नहीं है भाती-

उस पर ही जीवन दान किया करता हूँ!

असह्य वेदना भार लिये फिरता हूँ,

उस में अगणित उद्गार लिए लिए फिरता हूँ,

घन-स्वाति-बूँद पाने की अभिलाषा में-

चातक सी बिकल पुकार लिए फिरता हूँ!

रह मौन, सभी कुछ झेल लिया करता हूँ,

अंगारों से भी खेल लिया करता हूं,

जो समझ मंझेडडडडड भू, दुरडडडडड व्योम से रहते-

मैं उनसे भी मेल किया करता हूँ!

जग में सबकी, पहचान करता हूँ,

दे सुधा स्वयं विषपान किया करता हूँ,

अभिशापों को वरदान भाग्य का कहकर-

रादन में भी मुस्कान किया करता हूँ!

*समाप्त*


Quotation

शरीर आत्मा का स्थान है, इसलिये तीर्थ क्षेत्र है। उसकी रक्षा करना चाहिये।

मेरी जो इच्छा है वही हो, इस प्रकार आकांक्षा न करके यदि तुम ऐसा विचार करो कि चाहे जिस प्रकार की ही घटना हो मैं उसे प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करूंगा तो तुम सुखी होंगे।

ईश्वर एक है, किन्तु उसके नाम और भाव अनेक हैं, उसे जो जिसे नाम से पुकारता है, वह उसे उसी भाव से दिखाई देता है।

जीवन का नियम यह है कि उचित का ग्रहण और अनुचित का त्याग करे। मन, वाणी और कर्म में सत्य का आश्रय ही संसार की अमूल्य निधि है।


Quotation

रात्रि के समय आकाश मंडल में असंख्य तारे चमकते हुए दिखाई देते हैं, किन्तु सूर्योदय होने पर एक भी तारा दिखाई नहीं देता, तो क्या कह सकते हैं कि दिन में तारे नहीं रहते, अतएव हे मनुष्यों अज्ञान वश परमात्मा को न देख सकने के कारण उसके अस्तित्व में सन्देह मत करो।

समुद्र में मोती अवश्य रहते हैं, लेकिन परिश्रम के बिना नहीं मिलते। इसी प्रकार संसार में ईश्वर विद्यमान रहने पर भी बिना प्रयास के नहीं मिलता।

भगवान शरीर के भीतर कैसे विराजते हैं? जैसे चिक के भीतर बड़े घर की स्त्रियाँ। वे तो सबको देखती हैं लेकिन उनको कोई नहीं देख पाता, इसी प्रकार भगवान है।


ईश्वर हमें दीखता क्यों नहीं?

(ले. श्री जगन्नाथ प्रसाद शर्मा, नरायना)

आज भौतिक विज्ञानी बड़े जोरों के साथ इस बात की पुष्टि करने में लगे हुए हैं कि ईश्वर नाम की कोई वस्तु नहीं है, प्राकृतिक नियमों के द्वारा होने वाली रासायनिक प्रक्रिया द्वारा जीवों का जन्म मरण और उत्थान पतन होता है। उनका सबसे प्रमुख तर्क यह है कि ईश्वर जब दिखलाई नहीं पड़ता तो उसका होना कैसे माना जाय? जो चीज सामने नहीं है, या जिसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता उस वस्तु के अस्तित्व में क्यों विश्वास करें?

विचार करने पर मालूम होता है कि उपरोक्त शंकाऐं निर्मूल हैं। मनुष्य का ज्ञान इतना विकसित और परिपूर्ण नहीं है कि उससे जो बातें स्पष्ट न होती हो उनका अस्तित्व स्वीकार करने से इंकार किया जा सके। बहुत सी बातें ऐसी हैं जिनका प्रत्यक्ष प्रमाण न होने पर भी मानते हैं।

इस विषय में एक सन्त ने खोज करके आठ ऐसे कारण ढ़ूँढ़ निकाले हैं जिसके कारण मनुष्य को चीजें नहीं दीख पड़ती है, यद्यपि उन वस्तुओं का अभाव नहीं हैं। वे सन्त महोदय कहते हैं-

दूर, समीप, इन्द्रिय की हानि।

मन चंचल, सूक्ष्म विवधान।।

तिरोभाव सजातो संग।

अष्ट हेत कर अनुभव भंग।।

अर्थात्- दूर, पास, इन्द्रिय हानि, चंचल मन, सूक्ष्म विवधान, तिरोभाव और स्वजाति संग इन आठ कारणों से अनुभव भंग हो जाता है। यानी वस्तु का अस्तित्व होते हुए भी वह अनुभव में नहीं आती। उपरोक्त आठों बातों का खुलासा इस प्रकार है-

दूर- पक्षी उड़ता हुआ जब दूर चला जाता है तो वह दिखलाई नहीं पड़ता है।

समीप- अति निकट होने के कारण भी कोई वस्तु जानी नहीं जाती। जैसे आँखों में लगा हुआ सुरमा दिखाई नहीं देता।

इन्द्रिय हानि- पहचानने योग्य इन्द्रिय के न होने पर भी अनुभव नहीं होता। जैसे अन्धे को रुप दिखाई नहीं पड़ता।

मन चंचल- किसी चीज पर मन न ठहरने से भी उसका ज्ञान नहीं होता। जब हम किसी कार्य में पूरे मनोयोग के साथ लगे होते हैं और एक ही चीज में तन्मयता होती है तो पास में होकर कौन निकल गया या समीप में ही कौन क्या कर रहा है इसका पता नहीं चलता।

सूक्ष्म- सूक्ष्म वस्तुओं का भी पता नहीं चलता। रोग कीटाणु, शब्द, लहरें, विचार कम्पन आदि असंख्य सूक्ष्म वस्तुऐं हमारे अत्यन्त सन्निकट घूमती रहती है पर उनका अनुभव नहीं होता।

विविधान- आड़ में छिपी हुई चीजें मालूम नहीं होती। पर्दे के पीछे बैठा हुआ आदमी, जमीन में गड़ा धन, संदूक में बन्द वस्तुऐं विदित नहीं होती। यद्यपि इनका अभाव नहीं है।

तिरोभाव- कारण विशेष से भी प्रकट वस्तु गुप्त हो जाती है। जैसे दिन में तारे नहीं दीखते।

स्वजाति संग- अपने ही सदृश्य बहुत सी वस्तुओं के मिल जाने से भी चीज छिप जाती है। जैसे समुद्र में वर्षा का जल लुप्त होता है। मदिरा की एक बोतल नदी में डाल दी जाय तो फिर उसे अलग नहीं देखा जा सकता। यद्यपि वह उसी में विद्यमान है।

उपरोक्त छोटी मोटी वस्तुओं को भी जब कारण वश मनुष्य नहीं देख सकता तो सूक्ष्म वस्तुओं का ज्ञान किस प्रकार हो? और ईश्वर जिसके लिए श्रुति चिल्लाती है- अणोरणीयाम् ...... अणुओं से भी अणु है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है। वह महासूक्ष्म तत्व यदि आदमी की अपूर्ण इन्द्रियों से पहचाना नहीं जाता तो इससे यह न समझना चाहिये कि वह है ही नहीं। भैंसे ने रत्नों की माला नहीं पहनी या नहीं देखी इसी कारण यदि वह उसके अभाव को मानने लगे तो यह उसकी मूर्खता ही होगी।

ईश्वर सर्वत्र है। यह संसार उसी में समाया हुआ है। अखिल ब्रह्माण्डों में उसी की सत्ता है। उसे ध्यान पूर्वक देखिये। दिखाई देगा। आपका हृदय अन्धकार पूर्ण है तो उसमें विवेक का दीपक जलाइये। धुँधला सा प्रकाश होते ही देखेंगे कि आपके मन मन्दिर के किसी कोने में बैठा हुआ आनन्द कन्द, मन्द मन्द मुरली बजा रहा है।


वे कौन हैं?

(ले. श्री सुदर्शन, सं. संकीर्तन)

जो ईश्वर को कहीं मानते, जो कहते हैं कि धर्म कोई चीज नहीं लेकिन जिनका हृदय दीनों की आर्त पुकार पर रो उठता है, जो किसी के क्षुधा से तड़पते हुए शिशु को देखकर अपने वैभव को धिक्कारते हैं, जो भूखों को रोटी और नंगों को वस्त्र देने के लिए संसार की शक्तियों से युद्ध करते हैं और ऐसे युद्ध में अपने धन, गृह, परिवार, शरीर एवं प्राणों तक की आहुति दे देने से नहीं हिचकिचाते, हम कहते है कि वे नास्तिक हैं।

जो धर्म के नाम पर आडम्बर करना नहीं जानते, वो साधुता की आड़ में अपनी दुर्बलताओं को नहीं छिपाना चाहते, जो ईश्वर के नाम पर दूसरों का रक्त शोषण नहीं करते, जिन्हें भगवान की पूजा के नाम पर विलास करना पसन्द नहीं, जो परमार्थ की बहाने बाजी करके दीनों की गांठ का पैसा नहीं छीनते और न उसकी आड़ में अपनी दुर्वासनाओं की पूर्ति ही करते हैं, उन्हें हम अधार्मिक और नास्तिक बताते हैं।

मनुष्य फिर भी मनुष्य है, यदि उसमें त्रुटियाँ न होती तो वह मनुष्य होकर देवता होता। पर जो अपनी त्रुटियों को स्पष्ट स्वीकार कर लेते हैं, जो अपने हृदय को किसी विशेष स्वार्थ से छिपाये नहीं रहना चाहते, जो अपने विचार को स्पष्टतः व्यक्त कर देते हैं, जो अपनी दुर्बलताओं को दूसरे के सिर नहीं मढ़ते वे मनुष्य सच्चे मनुष्य हैं। चाहे उनके विचारों में कितनी ही भ्रान्ति क्यों न हो, उनमें कितनी ही त्रुटियाँ क्यों न हों। वे मनुष्य हैं और यदि देवता कभी मनुष्य में अवतरित हो सकता है तो सर्व प्रथम उनमें अवतरित होगा।

जो दोष करके छिपाना चाहते हैं जो अपनी त्रुटियों को दूसरे के सिर मढ़ने का अवसर देखा करते हैं, जिनमें इतना साहस नहीं कि अपने सच्चे विचारों को अभिव्यक्त कर सकें, जो स्वार्थ और यश के नाश के भय से हृदय में कुछ कहते और करते कुछ रहते हैं वे मनुष्याकृति में पशु हैं। उन्हें अभी मनुष्य बनने के लिये साधन करना होगा। जो दोष करते हैं स्वयं- दोषी बताते हैं औरों को, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों का शोषण करते फिरते हैं, जिन्हें अकारण किसी को सताने और किसी का अपमान करने में आनन्द आता है, जो निन्दा करने में प्रसन्न होते हैं, जिनके लिए निर्बल का उत्पीड़न एक मनोरंजन है, दूसरों का अपमान कला है वे न तो मनुष्य हैं न पशु। भगवान ही जाने कि वे पिशाच भी हैं या उससे भी........। वे कभी मनुष्य बन पायेंगे इसकी आशा कम से कम कोई मनुष्य तो नहीं कर सकता।

यहाँ तक तो ठीक। मुझे आज ऐसे लोगों के विषय में पूछना है जो इनसे भी कुछ आगे हैं। मनुष्य समाज में विशेषकर भारतीय हिन्दू समाज में एक ऐसे नराकृति रखने वाली प्राणी हैं जो अपने को देवता घोषित करते हैं। जनता के समक्ष वे साक्षात ईश्वर हैं, जिन्हें धर्म की घनीभूत मूर्ति, धर्म के प्रवर्तक, संरक्षक, प्रचारक, प्रतिष्ठापक, उपदेशक और सर्वेसर्वा समझते हैं, जो मनुष्य को धर्म में प्रवृत्त करने का अपने को एक मात्र उत्तरदायी कहते हैं। इतना होने पर भी जो घोर से घोर पाप करते नहीं हिचकते, जो सचमुच पाप और व्यभिचार के पुजारी और प्राचारक हैं शोषण उत्पीड़ण और विलास जिनका स्वाभाविक कृत्य है मैं पूछता हूँ कि उन्हें क्या कहकर पुकारा जावे?

श्रद्धा के पावन पुष्पों को जो कुचल कर फेंक देना कुछ समझते ही नहीं, जिनके लिये देव प्रतिमाओं की ओट केवल विलास का साधन है, वे दान के उपहार जा हृदय के अगाध प्रेम के साथ अपने आराध्य के चरणों में चढ़ाये गये हैं केवल विषय तृप्ति के उपकरण हैं, जिनके वचन लोगों को मुग्ध करके अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिये हैं वे कौन हैं?

जो अपने को त्यागी कहते हैं पर भोग जिनके रोम रोम में भरा है, जो अपने को भक्त कहते हैं पर जो पूजा के उपहार को वेश्या के घर फेंकते हैं, जो दूसरों के धर्माचार्य हैं पर धर्म जिनके कृत्यों से कोसों दूर रहता है, जो परमार्थ का बागाडम्बर करके भी हृदय में उसे कुछ नहीं मानते वे कौन हैं?

मुख में हाथ भर की जिह्वा है जो कहने का साहस करेगा? आस्तिक और धर्ममूर्ति के वेश में नास्तिकता और अधर्म विस्तारक कौन है? समाज दे सकेगा इस प्रश्न का उत्तर?

जो पवित्र आध्यात्मिक केन्द्रों से लम्बे चौड़े उपदेश देते हैं पर जिनका एकान्तवास सुरा की दुर्गन्धि से पूरित होता है, जिन्होंने पूजा के पवित्र स्थानों को चोर, ठग, गुण्डों का अड्डा बना रखा है, जिन धर्म के प्रतिनिधियों का इन लोगों की सहायता के बिना कार्य ही नहीं चलता, श्रद्धा और धर्म की भावना से गई माता बहनों की ओर जो दूषित दृष्टि से देखते हैं, उनके साथ कुचेष्टाओं के करने से भी नहीं चूकते, जिनकी दृष्टि गरीबों की गांठ और उपासिकाओं पर ही रहती है, वे देवता और धर्माचार्य कहलाने वाले वस्तुतः कौन हैं?

धार्मिक समाज को अब इन प्रश्नों का उत्तर देना होगा। अन्ध श्रद्धा में अपना सर्वनाश करते हुए हम अब यों ही भटकते नहीं रह सकते। भगवान और धर्म के नाम पर कुत्सित कर्मों के इन आडम्बर प्रधान लोगों को एक बार खुले नेत्रों से देखना होगा। हमें सोचना होगा कि हमारी पूजा और धार्मिक श्रद्धा अपने आराध्य तक पहुँचती भी है या नहीं। नहीं पहुँचती है तो मध्य में हड़प जाने वाले इन बने हुये देव दानवों को पहचानना होगा कि ये कौन हैं? इनके द्वारा अपनी होती हुई लूट की हमें रक्षा करनी ही पड़ेगी।


Quotation

जीवनोद्देश्य की खोज में लगाना सबसे बड़ा सौभाग्य है, उसे कहीं बाहर ढ़ूँढ़ने की अपेक्षा अपने हृदय में तलाश करना चाहिये।

संसार में सुखी रहने का एक ही उपाय है और वह है हृदय में शान्ति बनाये रखना।

जो मनुष्य दूसरों को आघात पहुँचाते हैं, वे वास्तव में स्वयं अपने को घायल करते हैं।


कुछ पढ़ो, कुछ गुनो।

(ले. श्री दशरथ दीन भटनागर, जावरा)

हम पढ़ते बहुत हैं पर गुनते कुछ नहीं। कई सज्जनों को अध्यात्म विद्या की चर्चा करना बहुत पसंद होता है। भजन- कीर्तन, कथा- उत्सव, पूजा- पाठ के अवसरों पर वे आगे रहते हैं। रामायण, गीता, भागवत या जिन पुस्तकों को उन्होंने पढ़ा होता है उनकी चर्चा बड़े उत्साह से करते हैं। खोज खोज कर उसमें से बारीकियाँ निकालते हैं। शंका और तर्कों का संग्रह करते हैं और उनका समाधान सोचकर तैयार रखते हैं। समय समय पर वे उन प्रसंगों को दुहराते हैं, कुछ मनोरंजक उपाख्यान याद करके मौके बे मौके उन्हें लोगों को सुनाते रहते हैं। ऐसी प्रकृति के लोगों में कुछ तो सचमुच महात्मा होते हैं पर अधिकांश बड़े विचित्र पुरुष होते हैं। उनके मुख और हृदय आपस में एक दूसरे से बिलकुल भिन्न होते हैं। उन सज्जनों के कहने और करने में बड़ा अन्तर होता है।

संसार में सर्वत्र सत्य धर्म, ईश्वर और अध्यात्म विद्या का ऊँचा स्थान है। इन महान सत्य स्तंभों की ओर जिनका मुख है उन्हें साधारण दृष्टि से आदरणीय और पूज्य समझा जाता है। अतएव जो लोग धर्म विषयक चर्चा करते हैं वह भी श्रद्धास्पद गिने जाते हैं और प्रशंसा के पात्र होते हैं। इसी लोभ के कारण अनेक व्यक्ति धर्म चर्चा में रुचि रखते हैं। साधुओं जैसा ढोंग रचते हैं किन्तु अपने खुद के मन में धर्मोपदेशों को स्थान नहीं देते।

इसी प्रकार बहुत पढ़ने और सुनने के कुछ लोग बड़े प्रेमी होते हैं। असंख्य पुस्तकें पढ़ने और उपदेश सुनने की इच्छा सदैव बनी रहती हैं। यह कोई बुरी बात नहीं है। उन्नति के लिए श्रवण और पठन दोनों आवश्यक हैं। परन्तु यदि इस श्रवण पठन की छाप व्यवहारिक जीवन में न पड़े तो वह एक प्रकार का व्यसन ही होगा। केवल रुचि भिन्नता के नियमानुसार उन्होंने ताश, शतरंज, चौपड़ आदि खेलने की अपेक्षा पढ़ने सुनने का व्यसन धारण कर लिया होता है। कोई आदमी जिस पात्र में पानी रखना चाहे उसकी पेंदी में मोटे छेद कर दे तो उसमें क्या ठहरेगा? ऐसा घड़ा जिस पर चिकनाई पुती हुई हो पानी में डालने पर भी जल को अपने अन्दर ग्रहण न करेगा। गंगाजी पड़े हुए कछुओं की तरह वे उस ज्ञान सुरसरी के लाभ से वंचित रह जाते हैं। उनके मुख से उपदेशों की झड़ी सुनकर बाहरी लोगों की श्रद्धा अवश्य जम जाती है परन्तु वह भी स्थायी नहीं होती। वास्तविकता का पता लगने पर वह भी उड़ जाती है। कागज के फूल पर जितनी देर भौंरे को लुभाना चाहिये उतनी देर लोग उनके आस पास चक्कर काटते हैं और असलियत के मालूम होते ही निराश होकर वहाँ से चले जाते हैं।

ऐसे वाचक ज्ञानी एक भले प्रकार के विषयी है। ज्ञान गंगा का मुकाबिला जो कथा के बेंगनों से करते हैं उन्होंने व्यर्थ ही अपना समय इसमें बर्बाद किया। वाचक ज्ञान से उसके अभिमानी को उतना ही लाभ है जितना गधे को अपने ऊपर लदे हुए सुस्वादु व्यंजनों से। लड्डू लड्डू चिल्लाने से किसका पेट भरा है। जो पानी में घुसना नहीं चाहता उसे तैरने का मजा कैसे मिलेगा?

इसलिए जरूरत इस बात की है कि कुछ पढ़ो, कुछ गुनों जितना सीखो उस पर मनन करो। आ कल विज्ञान ने ज्ञान प्राप्त के साधनों को बड़ा सरल कर दिया है। अलभ्य ज्ञानमयी पुस्तकें स्वल्प मूल्य में सर्वत्र सुलभ हैं। सद्गुरुओं, महापुरुषों से उपदेश ग्रहण करने के लिए जाना आना सुगम है। प्राचीन काल में यह सुविधाऐं नहीं थी, फिर भी जिज्ञासु ज्ञान से वंचित नहीं रहते थे। प्रकृति कल्पवृक्ष है। उसके अक्षय भण्डार में किसी चीज की कमी नहीं। जो जिस चीज को चाहता है उसे वह वस्तु आसानी से मिल जाती है। सच्ची जिज्ञासा का होना ही प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन सिद्ध हुआ है।

प्रकृति की पाठशाला में हर विषय के प्रोफेसर मौजूद हैं वे हर समय उपदेश दिया करते हैं। दृष्टि उठाकर जिधर देखिये उधर से ही कुछ उपदेश मिलेगा। हँसते हुए तो पल्लवित वृक्ष लताऐं, कल- कल करती नदियाँ, गर्वोन्नत पर्वत, मन्द पवन मानों हमारी ओर कुछ संकेत करते हैं और चुपके- चुपके कुछ शिक्षा प्रद पाठ पढ़ाते हैं। महान तत्ववेत्ता और दृष्टा ऋषियों ने इसी कालेज में इतना ज्ञान सींख लिया था जिसकी आज थाह लेन भी कठिन है। अपने अन्दर ग्रहण करने का यन्त्र सावधान हो तो अनायास बहुत कुछ मिल सकता है। बुड्ढे रोगी और मृतकों को रोज निकलते देखा जाता है। पर किसी पर कोई असर नहीं होता। महात्मा बुद्ध ने सड़क पर जाते हुए एक बुड्ढे को देखा उन्होंने सोचा क्या मैं भी ऐसा वृद्ध हो जाऊँगा? दूसरा एक रोगी उन्हें दिखाई दिया वे सोचने लगे क्या मैं भी ऐसा रोगी हो सकता हूँ? ठठरी पर कसे हुए मुर्दे ने तो मानो उनके गाल पर तमाचा मारा कि मूर्ख तुझे भी मेरी तरह मरना है। कुद्ध तिलमिला गये और उन्होंने सन्यास ले लिया। पूजनीय मूर्तियों का कीट पतंगों द्वारा अपवित्र होना रोज देखा जाता है। किसी को कोई विशेष अनुभूति नहीं होती। स्वामी दयानन्द ने शिव मूर्ति पर चूहे को फुँदकता देखा तो उनकी आँखें खुल गई। मानों चूहे ने अवतार लेकर उन्हें उपदेश दिया हो कि मैं केवल इस मूर्ति तक ही सीमित नहीं हूँ। मेरी सत्ता इससे अधिक है। एक कथा है कि ऋषि दत्तात्रेय न २४ गुरु बनाये जिनमें कई पशु पक्षी भी थे।

ईश्वर हमारे भीतर और बाहर हर घड़ी उपदेशों की वर्षा करता रहता है। प्रकृति की हर चीज कुछ शिक्षा देती है। रोजमर्रा घटित होने वाली घटनाऐं एक नसीहत लेकर आती हैं। सत्संग और सद्ग्रन्थों में तो उनका संग्रह एक ही स्थान पर मिल जाता हैं। विचारणीय प्रश्न यही है कि हम अपने को चिकना घड़ा न बनाकर सीखने की शक्ति कायम रखें। इन उपदेशों को सुनें, मनन करें और अपने जीवन व्यवहार में उतारें। जो कुछ पढ़ते हैं उसे पढ़ने को व्यसन की सीमा तक ही न रखें वरन् कुछ पढ़े और कुछ गुनें।

जिनका पढ़ने का व्यसन इतना बढ़ गया है कि वे अपने को पूर्ण ज्ञानी समझते हुए कर्तव्य में उसे उतारने की जरूरत नहीं समझते, उनकी बीमारी भयंकर हैं। इससे तो वही लोग अच्छे हैं जो ज्ञान के अभाव में अपने आचरणों का सुधार नहीं कर सकते हैें। उनसे यह तो आशा की जा सकती है कि कभी इन्हें समुचित ज्ञान मिला तो वह बदल जायेंगे। वाल्मीकि ज्ञान के अभाव में वधिक बने हुए थे। ज्ञान का प्रसाद पाते ही ऋषि हो गये। किन्तु बेहद हठी रावण और दैत्य गुरु शुक्राचार्य? इनका सुधार होना कठिन था। जो सो रहा है उसे जगाया जा सकता है किन्तु जो जागते हुए भी सोने का बहाना करके पड़ा हुआ है उसे कौन जगावेगा?

बहुत सुनने और उससे कुछ भी लाभ न उठाने का व्यसन ऐसा ही है जैसा खाये हुए भोजन का जैसे का तैसा मल रूप में निकल जाना। ऐसी बीमारी हममें से किसी को हो जाय तो उसकी चिकित्सा के लिए तुरन्त दौड़ धूप की जायेगी। तब ढेरों सदुपदेश प्राप्त करके भी जो उसमें से कुछ भी ग्रहण नहीं करते और ज्यों का त्यों उन्हें मल रूप में निकाल देते हैं उनका रोग उपेक्षणीय क्यों समझा जाय? हम आत्म निरीक्षण करें, चिन्तन करें, मनन करें। जो उपदेश पढ़ते और सुनते हैं उन्हें ग्रहण कर रहे हैं या नहीं, इस बात का भली प्रकार परीक्षण करें। यदि अब तक भूल में रहे हैं तो आगें के लिए सचेत हो जावें यह आदर्श हर क्षण अपने सामने रहे- ‘‘कुछ पढ़ो, कुछ गुनो।’’

जिसमें स्थिरता, संयम, मनुष्य के प्रति विश्वास और सहयोग बुद्धि हैं, वही संसार का सफल व्यवस्थापक हो सकता है।

आत्मिक ज्ञान से बुराई का नाश और भलाई के नियमों का ज्ञान हो जाता है। जिसने पूर्ण आत्मिक ज्ञान प्राप्त कर लिया वह पाप कर्मों में नहीं गिरता।

अपने क्षणिक और काल्पनिक सुख को छोड़ोगे तो नित्य और स्थायी सुख को प्राप्त करोगे।

अपने संकुचित स्वार्थों को छोड़ों अपने ही लाभ के लिए सम्पूर्ण वस्तुओं को मत चाहो। फिर तुम स्वर्ग के देवता बन जाओगे और तुम्हारे अंग अंग सार्वभौम प्रेम उमड़ पड़ेगा।

कितने ही अभागे मनुष्य ऐसे है जिनके पास विपुल धन सम्पदा है तो भी दुखी है और कितने ही भाग्यशाली मनुष्य ऐसे है जो अपना खर्च मुश्किल से चला पाते है फिर भी प्रसन्न हैं।


उद्देश्य ऊँचा रखो।

(ले. श्री व्यंकटलाल पुरोहित, खिलचीपुर)

ऐसे मनुष्यों की कमी नहीं जो सांसारिक थपेड़ों से थक गये हैं। जिन्हें निराशा ने घेर लिया है। उदासीनता जिनके पीछे पड़ गई हैं। शान्ति चाहते हैं पर वह कहीं नहीं मिलती। बल और वैभव की कामना करते हैं पर प्राप्त नहीं कर सकते। गुजरी हुई आशा और अभिलाषाओं को वापिस बुलाना चाहते हैं पर वे उन्हें पहले से ही छोड़ चुकी हैं। दुर्भाग्य की जंजीरों से जकड़ा हुआ आदमी चिन्तातुर चेहरा, कुरेदती हुई आँखों को अतृप्त आकांक्षाऐं लिए हुए मृत्यु पथ की ओर घिसटता जाता है।

क्या आपने सोचा कि ऐसा क्यों होता है? उसकी नीच इच्छाओं ने उसे ऐसा बना दिया है। प्रकृति के भण्डार में भले और बुरे तत्व प्रचुर परिमाण में भरे हुए हैं। उन दोनों खजानों का दरवाजा हर किसी के लिए खुला हुआ है। जो जितना चाहे उतना ग्रहण कर ले। इसके लिए सबको छूट दी गई है। ईश्वर की लीला विचित्र है। पाप और पतन के तत्वों का निर्माण कुछ ऐसे ढंग से हुआ है कि वह तड़क- भड़क लिए होते हैं चमक उनमें विशेष रूप में होती है। पास जाते ही झुलसा देने वाली अग्नि का रंग खूब चमकीला और सुनहरी होता है। भले तत्वों में यह बात नहीं। उनमें सादगी है। रूप भी साधारण है। बाहर से देखने में कोई खास आकर्षण नहीं मालूम होता। इसलिए अज्ञानी मनुष्य छोटे बच्चों की तरह खिलौने के लिए ललचा पड़ता है। परिणाम में सिवाय हानि के और हो ही क्या सकता है?

पाप पूर्णतत्वों की आकर्षकता और मनुष्य के उस ओर झुकाव से हमारा निर्माता अपरिचित नहीं था। उसने देखा कि यदि लोग पाप को ही समेटेंगे तो दुनियाँ ऐसे हिंसक पशुओं का अखाड़ा बन जायेगी जो अपने शरीर को छोड़कर शेष चीजों को खा जाना चाहेंगे। संसार में अव्यवस्था की हद हो जायेगी। सब लोग अपने लिये इतने भोग चाहेंगे जितने खजाने में भी नहीं है। इसलिए उसने पाप तत्वों के साथ मारक शक्ति और पुण्य तत्वों के साथ योग तत्वों का समावेश भी कर दिया है। उस परमपिता को हमें धन्यवाद देना चाहिये कि इस दुनियाँ को उसने वासना का अग्रिकुण्ड बनाने से बचा लिया।

मिट्टी के खिलौने जितनी आसानी से मिल जाते हैं उतनी आसानी से सोना नहीं मिलता। पापों की ओर आसानी से मन चल जाता है किन्तु पुण्य कर्मों की ओर प्रवृत्त करने में काफी परिश्रम करना पड़ता है। पानी की धारा नीच पथ पर कितनी तेजी से अग्रसर होती है, किन्तु अगर ऊँचे स्थान पर चढ़ाना हो तो पम्प आदि लगाने का प्रयत्न किया जाता है। बुरे विचार तामसी संकल्प ऐसे पदार्थ है जो बड़ा मनोरंजन करते हुए मन में धँस आते हैं और साथ ही अपनी मारक शक्ति को भी ले जाते हैं। स्वार्थमयी नीच भावनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण करके जाना गया है कि काले रंग की छुरियों के सामान तीक्ष्ण तेजाब की तरह दाहक होती है। उन्हें जहाँ थोड़ा सा भी स्थान मिला कि अपने सदृश्य और भी बहुत सी सामग्री खींच लेती हैं। विचारों में भी पृथ्वी आदि तत्वों की भाँति खिंचने की शक्ति होती है। तदनुसार अपनी भावना को पुष्ट करने वाले उसी जाति के विचार उड़ उड़कर वहीं एकत्रित होने लगते हैं। यही बात भले विचारों के सम्बन्ध में हैं। वे भी अपने सजातीयों की अपने साथ इकट्ठे करके बहु कुटुम्बी बनने में पीछे नहीं रहते।

जिन्होंने बहुत समय तक बुरे विचारों को अपने मन में स्थान दिया है। उन्हें चिन्ता भय और निराशा का शिकार होना ही चाहिए। उससे बदला लूँगा, इसका सर्वनाश करके छोड़ूंगा, उसे किसी जाल में फँसाऊँगा, अमुक व्यक्ति को नीचा दिखाना चाहिए, इसे ठगना चाहिए ऐसी भावनायें ही मारक शक्ति रखती है। क्योंकि प्रत्येक विचार में बल होता है और उसी के द्वारा कोई मारक शक्ति अपनी सजातीय शक्ति को बाहर से खींचकर इतने अधिक परिमाण में इकट्ठी कर लेती है कि उनके धारण करने वाला स्वयं भयभीत हो जाता है। यह तेजाब जब तक दूसरे पर गिर कर नष्ट करेगा उससे पहले जिस टीन के डिब्बें में रखा हुआ है उसे ही गला डालेगा।

मुझे मोटर चाहिए, कोठी चाहिए, जेवर चाहिए, बहुत सा धन चाहिए, उच्च पद चाहिए, कीर्ति चाहिये, स्त्रियाँ चाहिए, सुन्दर व्यञ्जन चाहिए, नौकर चाहिए, अमुक चीज चाहिए। यह चाहिए की रट भी आकाश मण्डल में मँडराती हुई प्राणियों की "चाहिए" वाली प्यास को अपने में मिलाकर बड़ी उग्र हो जाती है। चातक की तरह तृषा ही उसके चारों ओर डोलती है। यह अभागा पक्षी हर क्षण प्यासा ही बना रहता है, जबकि दूसरे जीव जन्तु अपनी तृषा निवृत्त करके आनन्द के साथ सोए होते हैं। जिस भूमि पर आग जलती रही है उसके भीतर भी बहुत गहराई तक उष्णता प्रवेश कर जाती है और अग्नि के हटा लेने पर भी भूमि बहुत समय तक गरम बनी रहती है। जिसने अपना सारा समय प्यास- प्यास रटने में लगाया है, उसे प्यास न होने पर भी प्यास ही मालूम होती हैं। चिल्लाते- चिल्लाते कंठ सूख जाता है, होटों पर पपड़ी पड़ जाती है। यही भान होता है मुझे पानी चाहिए चाहे उसका उदर जल से परिपूर्ण ही क्यों न हो।

जो लोग थके हुए होते हैं, अशान्त और निराशा से घिरे रहते हैं, दुर्भाग्य और चिन्ताओं से जकड़े होते हैं समझना चाहिए कि इन्होंने कुविचारों को अपना साथी बनाया है। स्वार्थ पूर्ण नीच भावनाओं से प्रेम किया है। दूसरों को हानि पहुँचाने और किसी भी प्रकार अपना स्वार्थ साधन करने के ही संकल्प इनके मन में उठते रहे हैं। वे या तो अब भी मौजूद हैं या अशक्तता के कारण निर्बल होते हुए भी बीज रूप में मौजूद हैं। यदि वे हट गये हैं तो भी उनकी उष्णता मिटी नहीं है। नीच उद्देश्यों का निश्चित परिणाम क्लेश है। भय और आशंका इसके दोनों बाजू हैं। बुरे इरादे सफल नहीं हो पाते, इसका यही एक कारण है कि जहाँ वे रहते हैं उस स्थान को पहले ही खुरच खाते हैं। कसाई के कोसने से ‘पड़ा’ इसीलिए नहीं मरता कि उसका मन ऐसी आशंकाओं से परिप्लुत रहता है कि निर्दोष ‘पड़ा’ अकारण मेरे कहने से कैसे मर सकता है। गरम लोहे की गेंद को हाथ में लेकर आप किसके ऊपर और कितने जोर से फेंक सकते हैं? बुरे विचार दूसरों को जितनी हानि पहुँचाते हैं उससे कई गुणा अधिक उसके धारण करने वाले को पहुँचा देते हैं। जो अनेक मानसिक कष्टों से दुखी हो रहा है, समझना चाहिए कि अपने घर में जो बबूल बो रखे थे उन्हें के कांटे इसके पैरों में चुभ रहे हैं।

इसके विपरीत, परोपकार और प्रेम की भावनाऐं बड़ी शीतल एवं बल दायक होती है। प्रसन्नता और शक्ति उनका वरदान होता है। जिसका उद्देश्य ऊँचा है, जो भलाई के विचार को सामने रखकर किसी कार्य में प्रवृत्त होता है उसका साहस बढ़ता जाता है। कठिनाइयों में वह घबराता नहीं। असफलताऐं उसे ऐसी लगती हैं मानों ईश्वर उसके साहस की परीक्षा ले रहा है। ऐसे अवसरों पर वह भी बड़ी श्रद्धा एवं निष्ठा प्रकट करता है। सदुद्देश्यों में एक दैवी गुंजन होता है जिसमें से एक ईश्वरीय सन्देश मिलता रहता है। अनिश्चितता का अंधकार जब चारों ओर छाया होता है तब भी उसे भीतर से एक प्रकाश मिलता हैं जिसके द्वारा अपने पथ पर निश्चल भाव से चला जाता है। जिसका उद्देश्य ऊँचा है उन्हें पग पग पर सफलता है। हार भी उनके लिए जीत है। प्रभु ईसा को कांटों का ताज पहनाया गया और क्रूस पर टांग कर उसकी जान ले ली गई, फिर भी वह हारा नहीं। पराजित ईशा आज हँस रहा है और विजयी सिकन्दर अर्थी से बाहर हाथ निकाल कर कुछ न मिलने पर पश्चाताप के आंसू बहा रहा है। क्यों? इसलिए कि दोनों के उद्देश्यों में अन्तर था।


Quotation

एक धन कुबेर ने कहा कि- मैंनें धन कमाया और अपने ही लाभ के लिए खर्च किया, फलस्वरुप जिन्दगी का सारा आनन्द खो बैठा। अब मैं उतना सुखी नहीं हूँ जितना गरीबी की अवस्था में रहता था।

अपना जीवन फूल जैसा बनाओ। वह अपनी सुगन्धि से संसार पर आनन्द बरसाने के लिए पैदा हुआ होता है। अपने जीवन को दूसरों की भलाई में लगा कर तुम भी पुष्प जैसा जीवन बना सकते हो।

प्रकृति को देखो, वह सबकी खुले हाथों से निरन्तर हवा देती रहती है फिर भी उसे न तो घाटा होता है और न अभाव सताता है। अपने लिए ही सब कुछ चाहने वाला और बड़ा लोभ करने वाला एक दिन सब कुछ खो बैठता है।


कर्मयोग-रहस्य

ले. स्व. स्वामी विवेकानन्द जी

आप अपने बीते हुए जीवन पर विचार कीजिये। अनेक बार आपको दुखों से सामना करना पड़ा होगा। इसका कारण क्या है? किसी कार्य को करते समय आप अपनी सब शक्ति और उत्साह उसी मे लगा देते हैं। आप की दृष्टि उसके फल की ओर लग जाती है परन्तु कभी कभी इतना करने पर भी अपयश के सिवाय कुछ और हाथ नहीं आता। फिर तो आपकी सांप छछूँदर की सी गति हो जाती है। कर्म की अत्यन्त आसक्ति के कारण मोह वश आप न उस कार्य को छोड़ सकते और न सुख पूर्वक चला ही सकते हैें। परिणाम में आपको दुख भोगना पड़ता है। शहद के बरतन पर मक्खी शहद खाने की इच्छा से बैठती है, परन्तु उसी शहद में पैर पड़ जाने से बेचारी प्राण गँवा देती है। हमारा जीवन सुख भोगने के लिये है, परन्तु उससे लाभ उठाकर दूसरे ही सुख भोगने लगे और हमारा जीवन दुखमय बन गया। राज्यासन पर विराजमान हो अधिकार चलाने के उद्देश्य से हम संसार में आये, परन्तु सृष्टि के गुलाम बन कर कारावास का अनुभव करने लगे। सुखदाई वस्तुयें हमारा कलेजा खा रही हैं। सृष्टि की सब सम्पत्ति हजम करने क हमारे विचार हैं, परन्तु सृष्टि ही हमारा सर्वस्व छीन रही है। ऐसी विपरीत बातें क्यों होती हैं? हम कर्म में आसक्त रहते हैं, सृष्टि के जाल में अपने आप जा फँसते हैं यही इस विपत्ति का कारण है।

कुटुम्बी मित्र, धर्म कर्म, बुद्धि और बाहरी विषयों के प्रति लोगों की जो आशक्ति देखी जाती है, वह केवल सुख प्राप्ति के लिये है। परन्तु जिस आसक्ति को लोग सुख का साधन समझ बैठे हैं, उससे सुख के बजाय दुख ही उठाना पड़ता है। बिना अनाशक्त हुए हमें आनन्द नहीं मिलेगा। इच्छाओं का अंकुर हृदय में उत्पन्न होते ही उसे उखाड़ कर फेंक देने की जिनमें शक्ति है, उनके पास दुखों की रूह तक नहीं पहुंच सकती। अत्यन्त आसक्त मनुष्य उत्साह के साथ जिस प्रकार कर्म करता है, उसी प्रकार कर्म करते हुये भी उससे एक कद नाता तोड़ देने की जिसमें समझ है, वही प्रकृति द्वारा अनन्त सुखों का उपभोग कर सकता है। परन्तु यह दशा तब प्राप्त हो सकती है, जब उत्साह से कार्य करने की आसक्ति और उससे पृथक होने की अनासक्ति का बल समान हो। कुछ लोग बिलकुल अनासक्त दीख पड़ते हैं। न उनका किसी पर प्रेम होता है और न वे संसार में ही लीन रहते हैं, मानों उनका हृदय पत्थर का ही बना होता हैं। वे कभी दुखी नहीं दिखाई पड़ते। परन्तु संसार में उनकी योग्यता कुछ भी नहीं हैं, क्योंकि उनका मनुष्यत्व नष्ट हो चुका हैं। परन्तु ऐसी अनासक्ति से तो आसक्त होकर दुख भोगना ही अच्छा। पत्थर बन बैठने से दुखों से सामना नहीं करना पड़ता यह बात सही है, परन्तु फिर से सुखों से भी वञ्चित रहना पड़ता है। यह केवल चित्त की दुर्बलता मा। है। यह एक प्रकार का मरण है। उसके मन की दुर्बलता सब प्रकार के बन्धनों की जड़ है। दुर्बल मनुष्य संसार में तुच्छ गिना जाता है, उसे यश प्राप्ति की आशा ही न रखनी चाहिये। शारीरिक और मानसिक दुख रोग जन्तु हैं परन्तु जब तक हमारा शरीर सुदृढ़ है तब तक उसमें प्रवेश करने की उन्हें हिम्मत नहीं होती। तब तक दुखों की क्या मजाल है जो वे हमारी ओर आँख उठाकर भी देखें। शक्ति ही हमारा जीवन और दुर्बलता ही मरण है।

किसी वस्तु पर प्रेम करना, अपना सारा ध्यान उसी में देना, दूसरों के हित साधन में अपने आपको भूल जाना, यहाँ तक कि कोई तलवार लेकर मारने आवे तो भी उस ओर से मन चलायमान न हो, इतनी आसक्ति हो जाना भी एक प्रकार का दैवी गुण है। वह एक प्रदत्त शक्ति है, परन्तु उसी के साथ मन को एकदम अनासक्त बनाने का गुण भी मनुष्य के लिये आवश्यक है, क्योंकि केवल एक ही गुण के बल पर कोई पूर्ण नहीं हो सकता। भिखारी कभी सुखी नहीं रहते, क्योंकि उन्हें अपने निर्वाह की सामग्री जुटाने में लोगों की दया और तिरस्कार का अनुभव करना पड़ता है। यदि हम अपने कर्म का प्रतिफल चाहेंगे तो हमारी गिनती भिखारियों में होकर हमें सुख नहीं मिलेगा। देन लेन को वैश्य वृत्ति अवलम्बन करने से हमारी हाय- हाय क्योंकर छूट सकती हैं? धार्मिक लोग भी कीर्ति की अपेक्षा रखते हैं, प्रेमी प्रेम का बदला चाहते हैं। इस प्रकार की अपेक्षा या चाह ही सब दुखों की जड़ है। कभी कभी व्यापार में हानि उठानी पड़ती है, प्रेम के बदले दुख भोगने पड़ते हैं, इसका कारण क्या है? हमारे कार्य अनासक्त होकर किये हुये नहीं होते, आशा हमें फँसाती है और संसार हमारा तमाशा देखता है। प्रतिफल की आशा न रखने वाले को ही सच्ची यश प्राप्ति होती है। साधारण तौर से विचार करने पर यह बात व्यवहार से विरुद्ध दीख पड़ेगी, परन्तु वास्तव में इसमें कोई विरोध नहीं किन्तु विरोधाभास मात्र है। जिन्हें किसी प्रकार के नीतिफल की इच्छा नहीं, ऐसे लोगों को अनेक कष्ट भोगते हुए हम देखते हैं, परन्तु उनके वे कष्ट उन्हें प्राप्त होने वाले सुखों के आगे पासंग के बराबर भी नहीं होते। भगवान ईसा ने जन्म पर्यन्त निस्वार्थ भाव से परोपकार किया और अन्त में उसे फाँसी की सजा मिली। यह बात असत्य नहीं है, परन्तु सोचना चाहिये कि अनासक्ति के बल पर उसने साधारण विषय सम्पादन नहीं किया था। करोड़ों को मुक्ति का रास्ता बताने का पवित्र यश उसे प्राप्त हुआ था अनासक्त होकर कर्म करने से आत्मा को प्राप्त हुये अनन्त सुखों के आगे उसके शारीरिक कष्ट बहुत थोड़े थे। कर्म के प्रतिफल की इच्छा करना ही दुखों को निमन्त्रण करना है। यदि आपको सुखी होना हो तो कर्म का प्रतिफल न चाहो।

इस बात को आप कभी न भूलें कि आपका जन्म देने के लिये है, लेने के लिये नहीं। इसलिए आपके जो कुछ देना हो वह बिना इतराज किये, बदले की इच्छा न रखकर दे दो, नहीं तो दुख भोगने पड़ेंगे। प्रकृति के नियम इतने कड़े हैं कि आप खुशी से न देंगे तो वह आपसे जबरदस्ती छीन लेगी। आप अपने सर्वस्व को चाहे जितने दिनों तक छाती से लगाये रहें, एक दिन प्रकृति उसे आपकी छाती पर सवार होकर लिये बिना न छोड़ेगी। प्रकृति बेईमान नहीं है। आपके दान का बदला वह अवश्य चुका देगी सूर्य समुद्र का जल सोखता है तो सी जल से पुनः पृथ्वी को तर भी कर देता है। एक से लेकर दूसरे को और दूसरे से लेकर पहिले को देना सृष्टि का काम ही है। उसके नियमों में बाधा डालने की हमारी शक्ति नहीं है। आप जितना अधिक देंगे उससे हजार गुना प्रकृति से आप पावेंगे, परन्तु वह पाने के लिए धीरज धरना होगा, अनासक्त बनना होगा।

अपनी पूर्व दशा पर विचार कर क्या हम यह नहीं समझ लेते कि जिन पर प्रेम करते हैं वे ही हमें गुलाम बना रहे हैं, ईश्वर की ओर से विमुख कर रहे हैं, कठपुतलियों की तरह नचा रहे हैं। परन्तु मोह वश हम पुनः उन्हीं की चंगुल में जा फँसते हैं। संसार में सच्चा प्रेम, सच्चा निस्वार्थ भाव दुर्लभ है, यह जानकर भी हम संसार से अलिप्त रहने का उद्योग नहीं करते। आसक्ति हमारी जान मार रही है। अभ्यास से कौन सी बात सिद्ध नहीं होती? आसक्ति को भी अभ्यास से हम हटा सकते हैं। दुख भागने की जब तक हम तैयारी न कर लेंगे, तब तक वे हमारे पास भी नहीं आवेंगे। हम खुद दुखों के लिये मन में घर बना रखते हैं, फिर यदि वे उसमें आकर बसे तो उनका क्या कसूर हैं? जहाँ मरा हुआ जानवर पड़ा रहेगा, वहीं कौए और गीध से खाते हुए दीख पड़ेंगे। रोग जब किसी शरीर को अपने योग्य समझ लेता है, तभी उसमें प्रवेश करता है।

आपको अपने पुरुषार्थ की प्रशंसा करते समय लोगों को वही दिखाने का यत्न करत हैं कि मैं सब कुछ जानता हूँ, मैं जो चाहे सो कर सकता हूँ, मैं शुद्ध निर्दोष हूँ, ईश्वर हूँ, निष्कलंक हूँ, परन्तु उसी समय आपके शरीर पर कोई छोटी सी कंकड़ी फेंके तो तोप का गोला लगने क बराबर आपको दुख होता है, आपका मनोबल इतना कमजोर हैं, आपकी सहन शक्ति इतनी अल्प है, तो फिर आप सर्व समर्थ कैसे हैं? जब मन ही इतना दुर्बल है कि एक अकिंचन मूर्ख के उद्योग से आपकी शान्ति भंग होती है, तब दुख बेचारे आपका पीछा क्यों न करेंगे? परमात्मा की शान्ति को भंग करने की भला किसमें सामर्थ्य है? यदि आप सचमुच परमेश्वर हैं तो सारा संसार भी उलटा होकर टँग जाय, आपकी शान्ति कभी भंग नहीं हो सकती। आप नरक के ओर से छोर तक चले जावें, कभी आपको कष्ट न होंगे। वास्तव में आप जो कुछ मुँह से कहते हैं उसका अनुभव नहीं करते इसी से संसार को दोषी ठहराते हैं। आप अपने दोषों को पहिले हटा दीजिये तब लोगों को दोषी कहिये। फलाना मुझे दुख देता है, फलाना मेरे कान उमेठता है, यह कहना आपको शोभा नहीं देता। कोई किसी को दुख नहीं देता, आप स्वयं दुख भोगते हैं, इसमें लोगों का क्या कसूर है? दूसरों के देखने में आप जितना समय लगाते हैं उतना अपने दोष सुधारने में लगाइये। आप अपना चरित्र सुधारेंगे, अपना आचरण पवित्र बनायेंगे तो संसार आप ही सुधर जायेगा। संसार को सुधारने के साधन हम मनुष्य ही है। जिस दिन आप पूर्ण हो जायेंगे, उस दिन संसार अपूर्ण न रहेगा। आप स्वयं पवित्र बनने के उद्योग में लगिये, यही कर्मयोग का रहस्य है।


Quotation

यदि तुम पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहते हो तो पूर्ण प्रेम को प्राप्त करो। यदि उच्च पद पर पहुँचना चाहते हो तो दया और सहानुभूति का हृदय में बसाओ।

इस नियमानुवर्ती संसार में यदि स्वाधीन होना चाहते हो तो अपने विचार स्वतन्त्र रखो और स्वतन्त्र विचारों की कदर करना सीखो।

धोखा देना संसा की सबसे बड़ी निर्बलता है। छल कपट करना भारी मूखर्ता है। जो दूसरों को ठगने की कोशिश करता है, वह पहले आप ही ठगा जाता है।

विचारक वह है, जिसने अपनी सद् विवेक बुद्धि का विकास किया है, जिसकी बुद्धि कार्य और कारण का सम्बन्ध समझती है और जिसका हृदय सत्य असत्य को जान सकता है।

उपासना में अनेक विघ्न आते हैं। जो विघ्नों से विरक्त रहकर शान्ति और निर्भयता के साथ अटल भाव से आगे बढ़ते हैं उन्हीं की उपासना सफल होती है। औरों के हाथ में तो उपासना के उपकरण रह जाते हैं।


दूसरों से कैसा व्यवहार करें?

ले. श्री विद्या विनोद व्यास मेरठ

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसे अपना सारा जीवन दूसरों के साथ बिताना पड़ता है। आपस में मिलने- जुलने की, बातचीत करने की, पूछताछ की और देन- लेन की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। दूसरों से कोई ताल्लुक न रख कर अब जिन्दगी भी कायम नहीं रखी जा सकती। मनुष्य ने जब से अपनी जंगली दशा छोड़कर समाज में रहना सीखा है तभी से उसकी आवश्यकताओं और रहन सहन के अंगों में ऐसा परिवर्तन हो गया है कि वह रीछ की तरह एकान्त जीवन नहीं बिता सकता। जब सारा जीवन ही उसे दूसरों के सहयोग के आधार पर बिताना है तो स्वभावतः से यह सीखना चाहिये कि दूसरों से कैसा व्यवहार करे? समाज शास्त्रियों ने इस प्रश्न का विस्तृत विवेचन करके थोड़े से शब्दों में इसका उत्तर दिया है कि दूसरों के साथ वैसा व्यवहार करें जैसा अपने लिए चाहते हैं। हर कोई चाहता है कि हमारे साथ भलमनसाहत का बर्ताव किया जाय। इसके लिए यह जरूरी है दूसरों से भी वैसी ही भलमनसाहत के साथ बरतें।

कई व्यक्तियों से मिलने की पुरानी याद हमें अभी तक बनी हुई है। एक सज्जन का स्वभाव बड़ा रुखा था। उनके घर पर मिलने गये तो पहले तो बहुत देर तक अपने काम में लगे रहे। पीछे रूखे स्वर में पूछा, कहिये कैसे आये? मैं उन्हीं के लाभ का कुछ सन्देश लेकर गया था। इस प्रकार की रुखाई को देखकर मुझे धक्का लगा और जिस लाभ को विस्तार के साथ बताकर उन्हें पूरी जानकारी कराना चाहता था, उसकी चर्चा न करके यों ही आपके दर्शनों के लिए आया था कहकर दो मिनट बाद उठ आया। वे अपने सम्बन्धी होते हैं फिर भी उस दिन की रुखाई मेरे दिल में चुभ गई और फिर इतने वर्षों में शायद एक बार ही किसी अत्यन्त जरूरी कार्यवश कुछ क्षण के लिए मिला हूँ।

मेरे एक दूसरे मित्र के स्वभाव में बड़ी नम्रता है। देखते ही अपने आसन से उठ खड़े होंगे। अभिवादन के पश्चात् कुशल समाचार पूछेंगे और किसी जरूरी काम में लगे होंगे तो उस काम को निपटा कर बातें करने की आज्ञा मांगेंगे। कभी कभी एक एक घन्टे बाद वे बात करने का समय निकाल पाते हैं पर उनके पास बैठकर इतना समय खर्च करते हुए भी किसी को बुरा नहीं लगता। बातचीत में प्रेम और सौजन्यता सनी होती है। उनसे बात करते हुए ऐसा मालूम होता है मानों किसी सगे भाई बन्धु से घुलकर बातें कर रहे हैं। बातचीत करने का ऐसा सुन्दर ढंग उन्हें है कि कुछ ही मिनटों में स्नेह पूर्वक आगन्तुक को आने का अभिप्राय पूछ लेते हैं और उसका उचित उत्तर दे देते हैं। अपना या दूसरे का समय व्यर्थ की बातों में नष्ट करने का या बार बार बैठने का वे आग्रह नहीं करते फिर भी थोड़े ही समय में चाय, पानी, पान, इलाइची से उन्हें जो कुछ सत्कार करना होता है, और जो बातें कहनी सुननी होती है उन्हें करके थोड़े ही समय में विदा दे देते हैं।

एक अन्य अपरिचित सज्जन जिनका नाम पता मुझे बिना डायरी देखें याद नहीं आ सकता भलमनसाहत में अद्भुत दीखे। हम उस वर्ष प्रयाग कुम्भ मेले पर इटावा स्टेशन से साथ हुए थे। रेल के डिब्बे में भीड़ अधिक थी। सब लोग धक्का मुक्का कर रहे थे। इन सज्जन ने डिब्बे में घुसने के बाद पास वाले लोगों को प्रेम पूर्वक समझाना आरम्भ किया। आत्मीयता से भरे उनके वाक्यों ने कुछ ही क्षण में डिब्बे में शान्ति कर दी। उन्होंने सब यात्रियों को बिना माँगे अपनी सेवा दी। जिनका सामान बेढंगे तौर से रखा था, उसे ठीक रखवाया, जिनके बच्चे प्यासे थे उनको पानी पिलाने का खुद इन्तजाम किया और भी जिसको जैसी छोटी मोटी तकलीफ थी, दूर करवाई। प्रयाग पहुँचते पहुँचते वे उस डिब्बे के सारे यात्रियों के नेता बन गये। स्टेशन से वे अलग होना चाहते थे, पर साथियों ने ऐसा नहीं करने दिया। चार रोज तक सब लोग गंगा तट पर ठहरे और भोजन ,, दर्शन, स्नान, मनोरंजन, खरीद करने का सारा प्रोग्राम उन्हीं की अध्यक्षता में हुआ। जब विदा हुए तो सब बारी- बारी उनसे गले मिले थे। उस बात को बीते एक मुद्दत गुजर गई पर मैं उस स्मृति को भूल नहीं सका हूँ।

ऐसे लोग तो रोज बहुत से मिलते हैं जिन्हें अपने मतलब से मतलब। काम की बात की, झंझट काटा। दूसरों के प्रति न तो उन्हें कोई सहानुभूति होती है और न रंच।

व्यवहार की श्रेणी में यों तो बहुत सी बातें आ जाती है पर आज इस लेख में हमारा तात्पर्य केवल बोल चाल, आव भगत से है। जब तक दूसरों के व्यवहार करने की कला को आप नहीं सीख लेते तब तक काम चलाऊ पन से आगे नहीं बढ़ सकते। दूसरे अपने कैसे हो जाते हैं? परदेशी भी भाई से अधिक मददगार कैसे बन जाते हैं और मुसीबत के समय वे मुक्त हस्त से सहायता कैसे देते हैं? हर जगह अपने अनुकूल परिस्थितियाँ कैसे बन जाती हैं? चारों ओर मित्र ही मित्र क्यों दिखाई देते हैं? इस प्रश्नों का उत्तर एक ही शब्द में निहित है- अपनी भलमनसाहत के कारण। कहते हैं कि आप भला तो जग भला। हम खुद भले हैं तो हमारे लिए संसार जरूर भला हो जायेगा।

दूसरी व्यवहारिक बातों की शिक्षा बाहरी लोगों से मिल जाती है। भोजन करने के लिए किस प्रकार बैठना चाहिए, कुल्ला कहाँ करना चाहिए, स्नान करने में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, अभिवादन में क्या शब्द कहने चाहिए, किसे किस स्थान पर बिठाना चाहिए आदि नियम अपने घर वालों, पड़ोसी या मित्रों से पूछकर सीख सकते हैं। किन्तु भलमनसाहत के व्यवहार की न तो कोई शिक्षा प्रणाली है और न शिक्षा स्थान। भिन्न- भिन्न अवसरों पर किससे क्या व्यवहार किया जाय, इसकी शिक्षा कोई किस प्रकार दे सकता है? अगणित प्रकार के अवसर आ सकते हैं और उन अवसरों पर विभिन्न लोगों के साथ विभिन्न प्रकार का व्यवहार करना पड़ सकता है। ऐसी दशा में बहरी शिक्षा कहाँ तक काम देगी? और फिर यदि बनावटी शिष्टाचार या नकली नम्रता सीख भी ली तो झूठी और मुलम्मा होगी। बाहर से भलमनसाहत दिखावे और भीतर से कपट भरा हो तो महात्मा गाँधी के शब्दों में यह नम्रता नहीं लुचपन होगा।

भलमनसाहत सद्व्यवहार की जड़ में बन्धुत्व, आत्मीयता, प्रेम, दूसरों का हित चिन्तन और निस्वार्थ भावनाऐं होनी चाहिए। दूसरों को अपना समझकर उनके हित का ध्यान रखते हुए उदारता पूर्वक जो बर्ताव किया जाता है वही उत्तम व्यवहार है। यदि आप दूसरों को अपना बनाना चाहते हैं, दूसरों से ऐसा व्यवहार कराना चाहते हैं जिसे आप अपने लिए पसन्द करें तो स्मरण रखिये, आपको यह कला सीखनी पड़ेगी कि दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करें? यह व्यवहार केवल भलमनसाहत का बर्ताव हो सकता है। भले बनिये भलमनसाहत का बर्ताव कीजिए। आप देखेंगे आपके चारों ओर मित्र ही मित्र हैं और सब तरफ से प्रेम एवं सहानुभूति के पुष्पों की वर्षा हो रही है।


स्मरण शक्ति और उसका विकाश

(ले. श्री गिरराज किशोर विशारद, चिरहोली)

मनोबल और इच्छा शक्ति के द्वारा सभी मानसिक शक्तियाँ विकास कर सकती हैं इस सिद्धान्त को पाठक अखण्ड ज्योति के पिछले अंकों में अनेक स्थलों पर पढ़ चुके होंगे। स्मरण शक्ति के विकास पर भी वह सिद्धान्त वैसा ही लागू होता है जैसा अन्य शक्तियों पर। जिस भोज्य पदार्थ में घृत डाला जाता है वह सुस्वादु बन जाता है, जिस भूमि में खाद डालते है वही उर्वरा हो जाती है। पोषक तत्वों का गुण ही ऐसा है उनका समावेश जिन वस्तुओं में होगा निश्चय ही उनमें जागृति होगी।

पिछले अंकों के वर्णन के बाद अब मुझे यह बताने की आवश्यकता नहीं रही कि स्मरण शक्ति क्या है और उसमें न्यूनता किस प्रकार आ जाती है। आज तो मैं उन उपायों पर प्रकाश डालने जा रहा हूँ जिनके द्वारा इच्छा शक्ति का संयोग करके याददाश्त को बढ़ाया जा सकता है। यहाँ पाठकों को यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि इन उपायों द्वारा प्राप्त होने वाली सफलता इधर पूरा ध्यान देने पर अवलम्बित है। निष्ठा के साथ जो लोग इन साधनों को अपनावेंगे वे ही भरपूर लाभ उठा सकेंगे। जिनके मन में क्षण क्षण में सन्देह उठता है, आत्म विश्वास होता नहीं, निराशा और असफलता की भावना से जो ढक गये हैं। उन्हें पहले अपने उन्हीं दुर्गुणों को दूर करके तब इधर आना चाहिए अन्यथा कोई कहले लायक लाभ न होगा और व्यर्थ ही इन परीक्षित प्रयोगों को कोसने का कष्ट उठाना पड़ेगा।

अभ्यास करने के लिए नित्य किसी एकान्त स्थान में जाओ। यह स्थान सुन्दर और स्वच्छ होना चाहिए। हरे भरे उद्यान इसके लिए सर्वोत्तम हैं। परन्तु यदि इसकी सुविधा न हो सके तो एकान्त कोठरी से काम चलाया जा सकता है। यह ऐसी होनी चाहिए जिसमें हवा और प्रकाश अच्छी तरह आते जाते हो। स्थान चुन लेने के बाद बैठने का प्रबन्ध करना चाहिए। अकड़कर लट्ठ की तरह बैठने की हम सलाह नहीं देते। विचित्र प्रकार के ऐसे आसन जिन्हें लगाकर बैठने से घुटने दर्द करने लगते हैं और पावों को बड़ा कष्ट होता है। इस साधन के लिए कुछ भी लाभदायक नहीं। छाती को आगे निकाल कर बैठने की भी जरूरत नहीं है। बल्कि शरीर को बिलकुल शिथिल करके बैठना ठीक होगा। आराम कुर्सी मिल सके तो सबसे अच्छा, न मिले तो मसंद या कपड़ों के गट्ठे का सहारा लेकर बैठ सकते हैं। सिर के नीचे कुछ ऊँचे तकिये लगा कर चारपाई पर पड़े रहने से भी काम चल सकता है ।। इस प्रकार अभ्यास के लिये बैठ जाने के बाद मन को कुछ देर के लिए चिन्ताओं से मुक्त कर देना चाहिए। ऐसी भावना करनी चाहिए मानों समस्त संसार से प्रथक होकर मैं केवल अपने शरीर तक ही सीमित रह गया हूँ। इस प्रकार करते करते कुछ देर में मन बिलकुल शान्त हो जायेगा। चारों ओर निस्तब्धता प्रतीत होने लगेगी। अब आप अपने अहम् को जागृत कीजिए और उसे मस्तिष्क का निरीक्षण कराने के लिए उसी प्रकार ले चलिए जैसे एक कारखानेदार अपनी फैक्टरी के सब कामों को बड़े ध्यान पूर्वक देखने जाता है। अन्य मस्तिष्कीय अवयवों की देख भल करने के बाद मस्तिष्क के स्मरण शक्ति धारक परमाणुओं को अन्तर नेत्रों से देखिये। देखिये, यह कैसे सफेद चमक रहे हैं, पूर्व स्मृति को धारण किये रहने के प्रमाण स्वरूप इनके बाहर और भीतरी भागों में सूक्ष्म रेखाऐं अंकित है। इनके पास जाकर ध्यान पूर्वक देखिए और परीक्षण कीजिए कि क्यों यह अच्छी तरह काम नहीं करते? क्यों यह पिछली बातों को इतनी जल्दी भुला देते हैं? आपको ऐसा प्रतीत होगा कि वे बाह्य कारणों की उष्णता से कुछ गरम हो रहे हैं और थक कर निद्रित से हो गये हैं। अच्छी तरह ज्यादा अच्छी तरह देखिये, कदाचित इसके अतिरिक्त और कोई कारण प्रतीत न होगा। क्योंकि आपके मस्तिष्क के सम्पूर्ण अवयव परमात्मा ने स्वयं अपने हाथों बनाये हैं और उनमें किसी प्रकार की त्रुटि नहीं रहने दी है। उनका संगठन इस प्रकार किया गया है कि बड़ी से बड़े मानसिक शक्तियों को वे आसानी से धारा और समुन्नत कर सकें।

चूंकि आपका अहम् सम्पूर्ण शरीर का शासक है। उसकी आज्ञा का पालन हर एक कर्मचारी को करना पड़ेगा। मस्तिष्क भी शरीर का एक अंग है। आज्ञा पाते ही उसी के अनुसार कार्य करने उसके लिए अनिवार्य है। दृढ़ शासक की भाँति अपने स्थान पर खड़े हूजिए और स्मृति धारक परमाणुओं की राजा की भाँति हुक्म दीजिए कि हराम खोरी न करके वे मुस्तैदी सिपाही की भाँति काम करें। आप देखेंगे कि बिना एक क्षण की भी देर लगाये वे अंग कुल बुलाने लगे और अपने प्रमाद पर लज्जित होते हुए मुस्तैदी से कार्य करने को तैयार होने लगे। आपका कर्तव्य यही समाप्त नहीं हो जाता वरन् कुछ और भी शेष रह जाता है। जब किसी भृत्य के ऊपर कष्ट आता है तो शासक उदासीन न रह कर उसे दूर करने का प्रयत्न भी करता है। आपके उन अंगों में उष्णता और थकान है। इसको दूर करने के लिए शीतलता और शक्ति की आवश्यकता है। चिन्तित मत हूजिए कि यह वस्तुऐं कहाँ से आवेंगी। प्रकृति के खजाने में यह वस्तुऐं बड़ी इफरात के साथ भरी पड़ी है। यह खजाना अनन्त आकाश में चारों ओर भरा पड़ा हैं। आप में जन्म जात शक्ति है कि खजाने में से चाहे जो वस्तु चाहे जितने परिमाण में लेकर उपभोग कर सकें। प्रकृति के इसी भंडार में से शीतलता और शक्ति के परिमाण खींचिए और अपने स्मृति धारक परमाणुओं के दीजिए। देखिए उनमें कैसी शीतलता और स्फूर्ति आने लगी। अब वे शान्ति और कार्य क्षमता का अनुभव कर रहे हैं। अच्छा, अभी यह चीजें उन्हें और दीजिए अब आप प्रचुर मात्रा में शीतलता और शक्ति प्रकृति भण्डार में से ले लेकर उनके ऊपर डाल रहे हैं। अब तो काफी डाल चुके, देखिए वे कैसे ठंडे और सतेज दीख पड़ते हैं। आगे से यह ठीक काम करेंगे। इनमें शक्ति का अभाव अब नहीं है, कष्ट दूर हो गया है, प्रमाद छोड़ दिया है। निश्चित रहिए, आज्ञा का ठीक पालन होगा और पूर्ण स्मरणों को भली भाँति धारण किया जायेगा। विश्वास पूर्वक बहुत देर तक खड़े खड़े आप देख सकते हैं। आज्ञा का पालन किया जा रहा है, पूर्व स्मृतियाँ जग रही हैं और आगे से स्मरण चिन्हों को ठीक अंकित करने की व्यवस्था हो रही है। तीव्र गति से यह सब प्रक्रिया हो रही है। आप निस्संदेह होकर विश्वास कीजिए। मेरा मस्तिष्क शीतल और शक्ति सम्पन्न हो रहा है। उष्णता और थकान को बहुत दूर खदेड़ दिया गया है। मस्तिष्कीय सतेज परमाणु अपनी कार्य व्यवस्था को बड़ी तेजी से सुधार रहे हैं, सारा यन्त्र ठीक संचालित हो रहा है। पूर्व स्मृतियाँ जाग रही है और भविष्य के अंकन ठीक होने का समुचित प्रबन्ध हो गया है। अब मेरा मस्तिष्क बिलकुल निर्दोष, शीतल, सशक्त और कार्यक्षम है।

कल्पना लोक में इतनी देर घूमना शेख चिल्ली के इरादे नहीं है। यह मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों द्वारा बनाई हुई मानसिक चिकित्सा का एक आजमाया नुसखा है। कल्पना के आधार पर समस्त संसार की प्रक्रियाऐं चल रही है। पुत्र, स्त्री, धन आपके हैं यह कल्पना होती तदनुसार वे आपके हो गये हैं। उपरोक्त कल्पना तोड़ते ही वे विराने से मालूम होने लगेंगे। इस स्थल पर यह समझने के लिए स्थान नहीं है कि कल्पना किस प्रकार के जबरदस्त परिवर्तन कर सकती है। इसके लिए तो फिर किसी समय पाठकों के सामने उपस्थित हूँगा। आज तो इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि आप उपरोक्त कल्पना मय साधन को आरम्भ कर सकते हैं। इस पर मन जितना विश्वास पूर्वक जमेगा जितनी भावना दृढ़ और सन्देह रहित होगी उतना ही शीघ्र लाभ होगा। अपने अनुभवों के बल पर मुझे यह कहने दीजिये कि किसी भी साधक के दृढ़ता पूर्वक अभ्यास करने के बाद न तो असफलता हुई है और न पछताना पड़ा है।

शिथिलावस्था में जप कीजिए और अवकाश के अन्य क्षण में भावन करते रहिए- मेरा मस्तिष्क शीतल और शक्ति सम्पन्न हो रहा है। उष्णता और थकान को बहुत दूर खदेड़ दिया गया है। मस्तिष्कीय सतेज परमाणु अपनी कार्य व्यवस्था को बड़ी तेजी से सुधार रहे हैं। सारा यन्त्र ठीक संचालित हो रहा है। पूर्व स्मृतियाँ जाग रही हैं और भविष्य के अंकन ठीक होने का समुचित प्रबन्ध हो गया है। अब मेरा मस्तिष्क निर्दोष, शीतल, सशक्त और कार्यक्षम है। यह मन्त्र आपको अभीष्ट फल दे सकेगा।


मैस्मरेजम से अपना लाभ

(ले. प्रो. धीरेन्द्र नाथ चक्रवर्ती, बी.एस.सी.)

पिछले तीन अंकों के पाठकों को अब मुझे यह नहीं बताना है कि मैस्मरेजम आत्मशक्ति के विकास का अमोघ साधन है। हमारे एक मित्र ने मैस्मरेजम का हिन्दी नामकरण ‘आत्मशक्ति विकास विद्या’ कहा है। उनका कहना है कि मैस्मरेजम नाम अनुपयुक्त और अपूर्ण है। क्योंकि इस विद्या की एक खास प्रणाली में बाँध देने का डाक्टर मेस्मर ने प्रयत्न भले ही किया हो पर इसका मूल विज्ञान भारतीय ऋषि मुनि लाखों वर्षों से जानते और काम में लाते रहे हैं। दूसरे मेस्मरेजम की वर्तमान प्रणाली में कुछ थोड़े ही काम हो सकते हैं, जबकि यह महाविज्ञान उससे हजारों गुने चमत्कार बताने में समर्थ है।

उपरोक्त मित्र की बात बहुत हद तक सच है। संसार में इस विद्या की शिक्षा भारत वर्ष से ही गई है और पाश्चात्य लोग अभी एक छोटे दायरे तक ही खोजें कर सके हैं। किन्तु जब तक भारतीय योग विज्ञान की कोई सर्व सुलभ और क्रमबद्ध प्रणाली को खोज न निकाला जय तब तक अपने पाठकों से हम यही कहने को तैयार हो सकते हैं कि मैस्मरेजम प्रणाली का उपयोग न किया जाय। यह तो अनुचित होता है कि दूसरों द्वारा आविष्कृत या संस्कारित प्रणाली को ही अपना बताया जाता। अस्तु अभी हम इस पद्यति को मैस्मरेजम के नाम से ही पुकारेंगे और उसके अनुसार जो कार्य हो सकते हैं उन्हीं का उल्लेख करेंगे।

मैस्मरेजम प्रणाली के अभ्यास से मनुष्य की अपनी इच्छा शक्ति बढ़ती है। मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में यह कार्यों को चलाने के योग्य उत्साह, साहस, बल और प्रेरणा मिलती है। डाक्टरों की दृष्टि में यही इच्छा शक्ति अभाव पूरक है। वे कहते है कि स्मरण शक्ति, कल्पना शक्ति धारण शक्ति, सन्तुलन शक्ति आदि मानसिक शक्तियों का विकास इच्छा शक्ति पर अवलम्बित है और उसी के प्रभाव से सारे रोग अच्छे होते हैं। रोग मुक्त होने की जितनी ही तीव्र इच्छा होगी उतनी ही जल्दी सफलता मिलेगी। निर्बल इच्छा शक्ति वाले अधिक दिन बीमार पड़े रहते हैं एवं जिनकी इच्छा बिलकुल कमजोर हो गई होती है उनका तो जीवन भी दुर्लभ होता है। योगियों की दृष्टि में इच्छा शक्ति समाधि मूलक है। वे स्वीकार करते हैं कि धारणा, ध्यान, कल्प, मन्त्र, तन्त्र तथा अलौकिक शक्तियों सिद्धियाँ प्राप्त करने का मार्ग तीव्र इच्छा के अतिरिक्त और कोई है ही नहीं। भौतिक वैज्ञानिक इच्छा को मनुष्य की आकर्षण शक्ति मानते हैं। वे कहते हैं कि प्रकृति में सब प्रकार के दिव्य परमाणु घूमते रहते हैं। इनमें से जो जिस प्रकार के जितने परमाणु लेना चाहता है अपनी आकर्षण शक्ति से खींच सकता है। बड़े बड़े शक्ति शालियों की शक्ति का वे यही विश्लेषण करते हैं कि इतना पदार्थ उन्हें किसी वरदान में नहीं मिला वरन् अपनी इच्छा शक्ति के आकर्षण द्वारा उन्होंने उसे खींच कर अपने में भर लिया है। मैस्मरेजम प्रणाली के आविष्कारक डाक्टर मेस्मर स्वयं कहते हैं- इस प्रणाली में बहुत अधिक सामर्थ्य है। इसकी सम्भावनाऐं आशातीत हैं। इस विद्या की आधारशिला इच्छा शक्ति है। जो जितना चाहे आत्मिक बल सम्पादन कर सकता है और उसके आधार पर वर्तमान समय में होने वाले चमत्कार या इससे भी अधिक हो सकते हैं।

उपरोक्त सब दृष्टिकोणों से हमें सहमत होना चाहिये। क्योंकि इन सभी प्रकार के परीक्षकों के मत सत्य से परिपूर्ण हैं। महात्मा ईसा ने एक शब्द में इन सबों की पुष्टि कर दी है कि जो द्वार खटखटावेगा उसके लिए खोला जायेगा। भारतीय जनता जहाँ चाह तहाँ राह की उक्ति को सन्देह रहित होकर मानती है। गत अंक में कहे हुये उन शब्दों को मुझे फिर दुहराने दीजिऐ। लोग पूछते हैं इस विद्या से क्या हो सकता है? मैं उनसे पूछता हूँ इस विद्या से क्या नहीं हो सकता?

मैस्मरेजम विद्या द्वारा होने वाले चमत्कारों की ऊँचाई इच्छा शक्ति के अभ्यास पर अवलम्बित है। जिसके पास जितना है वह उतने से अपना बिराना हित कर सकेगा। कई आदमी काम काज में जुटे रहने पर भी थोड़े समय में काफी अभ्यास कर लेते हैं और कई मुद्दों से झक मारते रहने पर भी कुछ नहीं पाते। क्योंकि जैसे तैसे वे अभ्यास करते तो हैं, पर मन सन्देहों से भरा रहता है। क्षण- क्षण पर संकल्प विकल्प उठते रहते हैं कि न जाने कुछ लाभ होगा या नहीं। सफलता नहीं होगी या उलटी हानि तो नहीं हो जायेगी। जिनका ऐसा मन है वे इस महाविद्या की तो बात ही क्या, साधारण काम काजों में सफलीभूत नही हो सकेंगे। साधारण कोटि के श्रद्धालु अभ्यासी तीन से लेकर छै मास तक के समय में काम चलाऊ शक्ति उपार्जन कर सकते हैं। निरन्तर अभ्यास के साथ दीर्घकाल सेवन करने पर जब दृढ़ भूमि हो जाती है उस समय की तो बात ही दूसरी है।

बढ़ी हुई इच्छा शक्ति के आधार पर विभिन्न साधना द्वारा अपने शारीरिक रोग आसानी से दूर किये जा सकते हैं, निर्बल और कुरूप अंगों को सुडौल बनाया जा सकता है। विज्ञापन बाजों द्वारा दिखाये गये सब्ज बाग या उच्च कोटि के योगियों जैस काया कल्प तो नहीं परन्तु हाँ साधारण ऐसा कायाकल्प किया जा सकता है जिससे शरीर बदला हुआ मालूम पड़े। सब अवयव ऐसे हो जाय जिनमें पर्याप्त चेतना और स्फूर्ति भरी हुई हो। नसों में नवीन खून दौड़ता हुआ प्रतीत हो। फिर भी यह स्मरण रखना चाहिए कि शरीर का ढांचा जैसा बन चुका है वह घट बढ़ नहीं सकता। रक्त मांस में सफाई और वृद्धि हो सकती है परन्तु टेढ़े दाँत सीधे नहीं हो सकते। दाँतों में दर्द है तो वह बन्द हो जायेगा पर वे रहेंगे उसी शकल में। मानसिक लाभ भी खूब होता है। मस्तिष्क में छाई हुई गर्मी, आंखों काा जलना, मन का एक काम पर न जमना, बार बार चित्त का उचाट खाना, शिर में चक्कर आना या भारीपन रहना, पागलपन, उन्माद, बुद्धि में भ्रम, अच्छी नींद न आना, स्वप्न अधिक आना, स्थूल बुद्धि, किसी बात को बारीकी से सोच न सकना, याददाश्त की कमी, मस्तक शूल आदि विकारों पर मैस्मरेजम विद्या का उत्तम असर पड़ता है। कुछ दिन का अभ्यास साधक को सुलझा हुआ दिमाग दे देता है।

कई प्रकार के बाहरी कारणों से आदमी चिन्ता, निराशा, भय, क्रोध, शोक, बेचैनी आदि का शिकार बन जाता है। परिस्थितियों का वातावरण निर्बल मन से उलझकर कुछ ऐसे मानसिक विषम लाज रच देते हैं जिसमें उलझकर जाल में जकड़े हुए पक्षी की तरह मन फड़फड़ाता रहता है और हर क्षण किसी विपत्ति का आभाष करता रहता। इन्हीं मानसिक विषम जालों को प्रायः दुर्भाग्य, दुॢदत, ग्रह अनिष्ट, दैवी कोप, अभिशाप आदि नामों से पुकारते हैं। मैस्मरेजम का शस्त्र इन विषम जालों को काटने में पूरी तरह समर्थ होता है। इसके द्वारा ऐसी स्थिति का प्राप्त होना स्वाभाविक ही है जो दूसरों पर प्रभाव डाल सके और साधक का व्यक्तित्व ऊँचा कर सके। जहाँ वह जावे लोगों को अपने काबू में कर सके, अपनी छाप उनके मनों पर बिठा सके।

जिनका झुकाव ईश्वर पथ, आत्म साधना, दैवी खोज की ओर है उनके लिए इस विद्या का थोड़ा सा साधन भी अन्य क्रियाओं को वर्षों करने की अपेक्षा अधिक लाभप्रद होगा। मैस्मरेजम विद्या हमारे सूक्ष्म शरीर को परिपुष्ट बनाती है, उसकी गुप्त शक्तियों को जगाती है। इस प्रकार अदृश्य शरीर इतना बलवान हो जाता है कि शरीर के अन्दर की पाचन क्रिया रक्त संचार आदि को प्रत्यक्ष देख सके। दूर- दूर की चीजों को देख सके। उड़कर दूसरे स्थानों पर जा सके और वहाँ के घटनाओं का दर्शन कर सकें। उस दशा में वह पारदर्शी हो जाता है। ‘ऐक्स रे किरणें’ जिस प्रकार बाक्स के अन्दर रखे हुए जेवरों का भी फोटो ले सकती है सी प्रकार परिपुष्ट सूक्ष्म शरीर दूसरे लोग क्या सोच रहे हैं? कहाँ क्या गुप्त रहस्य है? यह भी जान सकता है। ‘छाया पुुरुष’ के सिद्ध करने की योगियों में बड़ी चर्चा होती है। इस पथ के पथिक जानते हैं कि जिन लोगों को छाया पुरुष सिद्ध होता है वह उससे दैवी सेवक की भाँति काम ले सकते हैं। विक्रमादित्य के पास ‘वीर’ का होना प्रसिद्ध है। जिनके पास ऐसे दैवी दूत होते हैं वे उनसे परोक्ष कार्यों मे भरपूर मदद लेते हैं। यह छाया पुरुष और कुछ नहीं केवल अपने सूक्ष्म शरीर को उन कार्यों के योग्य बना लेना है। यक्षिणी, कर्ण पिशाचिनी, भैरवी, बेताल कई आदमियों को सिद्ध होते हैं। तन्त्र शास्त्रों में ऐसी सिद्धियों के वर्णन और प्रयोग भरे पड़े हैं। एक वैज्ञानिक की भाँति उनकी कसौटी पर कसना यही सिद्ध करेगा कि यह और कुछ नहीं केवल सूक्ष्म शरीर की शक्ति है। शास्त्रज्ञों ने उसे बाहरी शक्ति का स्वरूप यह सोच कर दिया है कि साधक में कहीं हीन या अविश्वास का भाव न आ जावे। आदमी स्वभावतः अपने को तुच्छ समझता है और किसी दैवी सहायता की याचना करता रहता है। शास्त्रज्ञों ने इसी मानवी कमजोरी को ध्यान में रखते हुए उन सिद्धियों को बाह्य शक्ति का रूप दे दिया है।

आत्म दर्शन और ईश्वर साक्षात्कार के लिए राजयोग के आचार्य पातञ्जलि ने धारणा, ध्यान और समाधि को अन्तिम सीढ़ियाँ बताया है। इसकी साधना का प्रयोग भी उनमें उपयोगी है। ईश्वर साक्षात्कार का यह सुगम और अल्प समय साध्य उपाय हो सकता है।


Quotation

महान परिश्रम पूर्वक बिन्दु को साधने वाले अखण्ड ब्रह्मचारी के लिए कोई वस्तु ऐसी नहीं जो असम्भव हो।

तुम जैसा चाहो वैसा बन सकते हो बशर्ते कि प्रतिज्ञा कर लो और उस पर दृढ़ रहो।

वीर पुरुष मृत्यु का एक बार ही आस्वादन करता है किन्तु कायर मृत्यु आने के पहले कई बार मर चुका होता है।

शरीर नाशवान् है उसके लिए चिन्ता नहीं करनी चाहिए, चिन्ता तो सदैव स्थिर रहने वाले यश की करनी चाहिए।

पृथ्वी की ओर देखो, वह कितनी क्षमा शील है। लोग उसे चीरते हैं और वह खेती की उपज के साथ हँस पड़ती है।

जिस प्रकार कोई बुद्धिमान पुरुष अनाज छोड़कर मिट्टी नहीं खाता, उसी प्रकार ज्ञानी मनुष्य सन्मार्ग को छोड़कर कुमार्ग ग्रहण नहीं कर सकता।

डरपोक आदमी अपनी कायरता में डरता है। गुण्डों से, भूत प्रेत से या शेर शम शेर से नहीं।


मरने के बाद हमारा क्या होता है?

(ले. श्री प्रबोध चन्द्र गौतम, साहित्य रत्न, कुर्ग)

कई मतों के अनुसार मरने के बाद हम चौरासी लाख योनियों में घूमते हैं। उन सब में एक चक्र घूम आने के बाद फिर मनुष्य शरीर पाते हैं। योनियाँ कितनी है इस पर बहस नहीं, आमतौर से भारतवर्ष में मोटा सिद्धान्त यह माना जाता है कि कई बार नीच योनियाँ प्राप्त करके तब नरदेह मिलती है। जिन आचार्यों ने इस मत का प्रतिपादन किया है, उन्होंने लोगों को मनुष्य शरीर की श्रेष्ठता और बहुमूल्यता का अनुभव करने के लिए ही यह उपदेश दिया प्रतीत होता है। क्योंकि तर्क, अनुभव और प्रमाण इसके विपरीत जाते हैं। मोक्ष न मिलने तक नाना जन्म धारण करना तो ठीक है परन्तु मनुष्य का नीच अविकसित जीवों में जन्म लेना ठीक नहीं। मनुष्य का जीव उस चेतना में जग गया होता है कि वह ज्ञान रहित योनियों में नहीं गिरता। उसने अपनी सूक्ष्म इन्द्रियाँ, बुद्धि, मन और अंतःप्रेरणा इतनी जाग्रत कर ली होती है कि पशु शरीर में वे समा नहीं सकती। निश्चय ही किसी बैल को उस ङ्क्षपजड़े में कैद नहीं किया जा सकता जिसमें बुलबुल पाली जाती है।

यह तर्क करना निरर्थक है कि मनुष्य ने जो पाप कर्म किये हैं उनका शारीरिक दण्ड नीच योनियों में जाये बिना कैसे मिलेगा? विचार पूर्वक देखा जाय तो पशु योनि दुख या दण्ड योनि नहीं है। जिस प्रकार का हमें सुख- दुख होता है वैसी अनुभूति नीच जीवों को नहीं होती। केवल तात्कालिक शारीरिक कष्ट उन्हें होता है परन्तु मानसिक व्यथा तो पास नहीं फटकती। सूक्ष्म परीक्षण करने पर पशु दण्ड योनि नहीं ठहरती। दया का पात्र दुखी जीवन भी मनुष्य जैसा क्लेश और कष्ट अनुभव नहीं करता। यदि दुख ही अनुभव न हो तो दण्ड कैसा? सच पूछा जाय तो मनुष्य शरीर ही दण्ड योनि है। जरा सा फोड़ा हो जाने या किसी के द्वारा अपमानित होने पर कितनी व्यथा वह अनुभव करता है? फिर शारीरिक कष्ट भी इसी योनि में अधिक है। रोगी, अपाहिज, पागल, अंग- भंग जितनी संख्या में मनुष्य होते हैं उतने पशु नहीं।

जिन मनुष्यों की भावनाऐं नीच है। स्वार्थ, हिंसा, कपट, दुराचार से जिनकी वृत्तियाँ भरी हुई हैं। वे अपनी इच्छाओं से आकर्षित होकर ऐसे समाज में जन्म धारण करते हैं जहाँ उनकी पूर्व सम्पत्ति से मिलती जुलती चीजें प्राप्त हो सकें। पुरानी इच्छाओं का अर्थ यह नहीं है कि जन्म भर जो कार्य किसे हैं वही निश्चित आकांक्षाऐं है। नहीं, इच्छाऐं भौतिक वस्तुऐं हैं उन्हें काट डालना और नई बना लेना मनुष्य के वश से बाहर की बात नहीं है। अजामिल और गणिका की कथाऐं इसकी पुष्टि करती है। अकेले वाल्मीक ही नहीं असंख्य कुकर्मी कुछ ही क्षणों के पश्चात् धर्मात्मा हो गये हैं। रामायण की ‘‘अन्त राम कहि आवत नाही’’ वाली चौपाई इसकी यथार्थता सिद्ध करती है कि अन्तिम क्षणों में भी यदि भावना प्रबलतम, उच्च हो जाय तो भव सागर से निस्तार हो सकता है। पुराने कल्मष कट सकते हैं। नया जन्म धारण करने के लिए वे इच्छाऐं अधिक महत्त्व रखती हैं जिन्हें मृत्यु से पूर्व पाने के कारण जीव अपनी स्वतन्त्रतावस्था में धारण किये रहता है। इनका एकदम पलट जाना तो एक अपवाद हुआ। साधारणतः यह जीवन भर के कामों और विचारों के कारण बनी होती है और प्रबलतम परिवर्तन के बिना काटी नहीं जा सकती। यदि ऐसा न होता तो लोग जन्म भर साधन करने की अपेक्षा केवल बुढ़ापे के लिए आत्म चिन्तन छोड़ रखते।

अपनी भावना के अनुकूल जन्म धारण करने में एक और सन्देह हो सकता है कि इससे तो जीव सब प्रकार स्वतन्त्र हो गया, उस पर कर्मफल प्राप्त करने के लिए कोई नियन्त्रण नहीं रखा गया? इसका पूरा समाधान तो ‘‘जीव का अस्तित्व और उसकी क्रिया’’ विषय को पूरी तरह समझे बिना नहीं हो सकता। पाठक इस तत्व को भी अखण्ड ज्योति के किसी आगामी अंक में पढ़ेंगे। यहाँ पर तो इतना ही कहा जा सकता है कि नियन्त्रण हैं अवश्य, पर जेलखाने की तरह नहीं। उसकी छूट रिहाई, सजा, मजदूरी किसी दफ्तर में नहीं रखी जाती। वरन् प्रकृति के ऐसे नियमों के साथ उसे जकड़ दिया जाता है जो गुप्तचर के समान हर क्षण पीछा करते हैं और दण्ड पुरस्कार चुकाने की व्यवस्था करते रहते हैं। जीव का परतन्त्र कहना ईश्वर का अपमान करना है वह कर्म करने और अपने योग्य साधन प्राप्त कर लेने में सर्वथा स्वतन्त्र है। यहाँ ईश्वर की लीला देखिए वे ही कर्म और साधन उसकी इच्छा के अनुरुप फल देने वाले बन जाते हैं। जो सुस्वादु भोजन एक के लिए पुष्टिकर हैं दूसरे के वे ही प्राण ले सकते हैं। प्रकृति का खजाना सबके लिये खुला है। वस्तुऐं वे ही है और सबको मिल सकती हैं परन्तु पीतल के बर्तन में पड़ते ही खटाई कड़ुवी हो जाती है। मनुष्य की नीच और उच्च आकांक्षाऐं साधारण पदार्थों को ही अपने दुख सुख का कारण बना लेती हैं। यही स्वर्ग नरक है। पाप से नरक और पुण्य के स्वर्ग इसी प्रकार मिलता है। हरे भरे वन पर्वतों में जहाँ तपस्वी स्वर्ग सुख भोगते हैं, वही एक कायर पुरुष रह जाय तो दो ही दिन में अधमरा हो जायेगा। चाहे कुछ भय वहाँ न हो, पर दिन को शेर और रात को राक्षस उसके मस्तिष्क के चारों ओर नाचेंगे।

आचार्यों का अनुभव है कि मनुष्य मरने के बाद मनुष्य योनि में ही जन्म धारण करता है। यह बात अनुभव में आई हुई भी है। प्रति वर्ष ऐसी अनेक घटनायें समाचार पत्रों में छपा करती है कि अमुक बच्चे ने अपने पूर्व जन्म का हाल बताया, पुराने सम्बन्धियों को पहचाना, कम्पनी गुप्त बातों को बताया आदि। ऐसी घटनाओं पर दृष्टि डालने और अनेक पूर्व जन्म और वर्तमान की स्थिति पर विचार करने से ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों की दशा प्रायः सब दृष्टियों से मिलती जुलती है। यदि अत्यन्त पुण्य कर्मों से मनुष्य जन्म मिलना माना जाय तो पिछले जन्म के उनके कोई कर्म बहुत ऊँचे नहीं मालूूम पड़ते। इस प्रकार यह मानना पड़ता है कि जिस कक्षा तक मनुष्य पहुँच गया है उससे नीचे नहीं उतर सकता। जीव का धर्म विकास करना है वह पूर्णता के प्राप्त होने के लिए भीतर ही भीतर प्रबल प्रयत्न कर रहा है। और विकास की ओर अग्रसर हो रहा है। नीचे उतरना नहीं हो सकता, वह पीछे नहीं हट सकता। भले बुरे कर्मों का इस समय पाप पुण्य की दृष्टि से विचार न करके जड़ता और चेतना की दृष्टि से सन्तुलन कीजिए। आपको मालूम पड़ेगा कि चालाकी चोरी, ठगी के मूल में भी जड़ता से उठ कर चेतना और विकास में जाने का प्रयत्न है। भले ही उस भीतरी प्रेरणा की दुष्वृत्तियों ने गड़बड़ा कर अपने सांचे में ढाल लिया है, परन्तु उसके पीछे विकास का तत्व अवश्य है। ऐसा विकाशोन्मुखी मनुष्य प्राणी निश्चय ही अगले जन्म में अपने तुल्य देह पर आकर्षित होगा और उसे ही ग्रहण कर लेगा।

किन्हीं पशुओं में बहुत अधिक ज्ञान होता है। यहाँ यह न समझना चाहिए कि इसमें मनुष्य की आत्मा ने प्रवेश कर लिया है। असल में वे नीच जीव ही बहुत दिनों से मनुष्य के संसर्ग में रहते और क्रमिक विकास में बढ़ते- बढ़ते इस योग्य हो गये होते हैं कि अपनी वर्तमान श्रेणी से उठकर ज्ञान योगियों की ओर बढे।

कभी कभी कुछ उच्च आत्माऐं नीच वातावरण में जन्म ले लेती है। ऐसा वे स्वेच्छा से करती हैं। उनका उद्देश्य उस श्रेणी के लोगों के बीच में से दूषित विचार मण्डल बदलने आदि की इच्छा होती है।


हृदय से (कविता)

(ले. श्री लक्ष्मीनारायण गुप्त, कमलेश, मौदका)

हृदय। न विचलो अपने पथ से, अभी बहुत बढ़ना होगा।

ऊँची अगम दुसाध्य शिखिर पर, साहस कर चढ़ना होगा।।

बढ़ो बढ़ो, आगे मत ठहरो, इधर उधर मत ललचाओ।

एक ध्येय, पथ एक, एक की ओर, अकेले ही जाओ।

अपना है कर्तव्य कठिन असि की धारा पर चलना है।

दीप शिखा बन कर प्रकाश फैलाना तिल तिल जलना है।।


क्या मूर्ति पूजा अवैज्ञानिक है?

(ले. प्रो. पी. डबल्यू. रेले, न्यूयार्क)

गतांक से आगे

पूजा के पश्चात मुफ्त बँटने वाले चरणामृत दूध, दही या अन्य भोज्य पदार्थों में तुलसी के पत्ते डाले जाते हैं। यह कितनी प्रसन्नता की बात है। रोग नाशक वनस्पतियों में तुलसी का स्थान सर्वोपरि है। अल्ट्रा वायलेट नामक विद्युत किरण तुलसी में से सदैव प्रवाहित होती रहती हैं एवं आक्सीजन और नाइट्रोजन गैसों का ऐसा सुन्दर संमिश्रण तुलसी द्वारा वायु को मिलता है, जो स्वास्थ्य के लिए अमृत तुल्य है। उपरोक्त विद्युत किरणें मानवीय शरीर में धँसे हुए विजातीय द्रव्यों को भाप की तरह उड़ा देने की सामर्थ्य रखती है। विद्युत चिकित्सक इन किरणों को यन्त्रों द्वारा आविर्भूत करके रोगियों को रोग मुक्त करने की क्रिया करते हैं। मलेरिया के ज्वरों में उपरोक्त चिकित्सा आश्चर्य जनक असर दिखाती है। यही विद्युत किरणें तुलसी के हरे भरे पौधों में पाई जाती है। आपने देखा होगा कि मच्छड़ अक्सर तुलसी के पत्तों पर नहीं बैठते। क्योंकि वे किरणें उन्हें अपने लिए घातक मालूम होती हैं। तुलसी का स्पर्श करके जो हवा आती है वह भी विचित्र गुण रखने वाली होती है। पैरिस नगर में ऐसे कई चिकित्सा मंदिर खुले हैं जिनमें तुलसी के पौधों के उपयोग से ही समस्त रोगों का इलाज किया जाता है। इन चिकित्सा गृहों में तुलसी के बड़े- बड़े बगीचे लगे हुए हैं, जिसकी वायु सेवन से ही रोगी को बहुत कुछ शान्ति मिल जाती है।

ऐसी उत्तम वस्तु का भोज्य पदार्थों में मिश्रण होना बड़ा ही लाभदायक है। तुलसी के कुछ पत्ते पानी में डालकर आप पीवें तो वह एक गिलास शर्बत के बराबर बल दे सकते हैं। मुफ्त का पंचामृत सचमुच एक पौष्टिक द्रव है, जिसे भारतीय पुजारी बिलकुल मुफ्त बाँटते हैं। हमारे यहाँ इस न्यूयार्क शहर में यदि कोई इस प्रकार की वितरण शाला खोले तो उसे पंचामृत का दाम भी चाय के एक प्याले की बराबर रखना पड़ेगा। मैं इस बात से प्रसन्न हूँ कि बिना वैज्ञानिक यन्त्रों का परीक्षण किये हुए भी पुजारी लोग यह जानते हैं कि उस लाभकारी पौधें के पत्तों को दाँतों से कुतरना या पीसना हानिकारक हैं क्योंकि एक तो इससे मसूड़ों को हानि पहुँचती है दूसरे बड़े टुकड़ों के रूप में पेट के अन्दर जाकर वे जितना लाभ पहुँचा सकते हैं उतना बिलकुल पीसे होने पर नहीं। मेरा खयाल है कि यदि कदाचित हिन्दू मूर्ति पूजक इस बात को जानते न होते तो वे पानी में टुकड़े- टुकड़े करके तुलसी दल डालने की अपेक्षा उसे पीसकर पंचामृत बनाने की क्रिया करते।

चन्दन लगाने का विधान भी ऐसा ही है। यों तो वह सुगन्धित काष्ट कोई विशेष महत्व नहीं रखता। परन्तु जितना इसे बारीक घिसा जाता है उतनी ही इसकी गुप्त शक्ति भीतर से उक्स आती है। चन्दन के चूर्ण और घिसे हुए प्रवाही लेप की परीक्षा करने पर दोनों में एक दूसरे से बहुत ही भिन्न गुण मालूम होते हैं। घिसा हुआ द्रव रूप चन्दन एक औषधि बन जाता है जिसका किसी स्थान पर पोतना शीतलता और शान्ति दिये बिना नहीं रह सकता। शरीर के समस्त अंगों में शिर को सबसे अधिक शीतलता की आवश्यकता होती है। इसलिए उसी स्थान पर इसका लेप करने की व्यवस्था सराहनीय है। इस स्थल पर एक बात कहे बिना मैं नहीं रह सकता कि लेप सूख जाने पर हानि पहुँचाते हैं। चन्दन में तेल की स्वल्प मात्रा पाई जाती है। इससे इस लेप में कुछ तो नमी रहती है फिर भी वह सूखकर कड़ा हो जाता है और हानि कर सकता है। विचारशील पुजारियों का ध्यान इस ओर आकर्षित होने की आवश्यकता है।

पूजा में पुष्पों को प्रमुख स्थान मिलना ही चाहिए था। पुष्प एक दैवी उपहार है। प्रकृति से मनुष्य को जितनी भी......(missing page)