आत्मलोचन (कविता)

(ले.-श्री जिज्ञासु)

तरुणी का रति सा यौवन, नर शशि जैसा सुन्दर था।

पल भर पीछे एक वृद्ध थी, झुका एक का सर था॥

उस दिन के धनपति को देखा भिक्षा पात्र संभाले।

नीरव मरघट में सोते देखे सिंहासन वाले॥

चला चली का मेला था, यह गया और वह आया।

सुख का स्वप्न देखने वाला, लुढ़क पड़ा चिल्लाया॥

जो कहते थे हम शासक हैं, धनी गुणी, बलशाली।

वे ठठरी पर लदे हुए थे, कर थे उनके खाली॥

यह सब देखा, देख रहा हूँ, फिर भी आंखें मींचीं।

विष के फल जिन पर आते हैं, वही लताएं सींचीं॥

जान रहा हूँ, जान, जानकर, भी अनजान बना हूँ।

गंगा के तट के पर रहता हूँ, फिर भी कीच सना हूँ॥

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देखो मुझे देखने वालों, मैं कैसा बौराया।

जाग रहा हूं, पर सोने वाले का स्वाँग बनाया॥

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अखण्ड ज्योति के कुछ अमूल्य रत्न!

यह पुस्तक आपको देव-दूत बना सकती है !!

अपनी अनन्त शक्ति द्वारा, पीड़ित संसार का भला कीजिये।

अखण्ड ज्योति कार्यालय द्वारा सद्ज्ञान ग्रन्थमाला नामक एक पुस्तकमाला का प्रकाशन भी आरम्भ हो गया है। इस योजना के अनुसार ऐसे ग्रन्थ रत्न प्रकाशित किये जायेंगे जो मानव जीवन में एक नवीन क्रान्ति उपस्थित करते हैं। जिस अलभ्य ज्ञान के लिये जीवन का बहुत बड़ा भाग तलाश और अभ्यास में लगाना पड़ता है। उसे वैज्ञानिक ढंग से सुगम तरीकों द्वारा समझाया जाता है और पुस्तक प्रकाशन से पूर्व उस विषय को पूरी तरह से अनुभव एवं परीक्षा की कसौटी पर कस लिया जाता है। यह ग्रन्थमाला किसी ऐसी पुस्तकों को कदापि प्रकाशित न करेगी जिसकी भली-भाँति परीक्षा न कर ली गई हो।

अब तक जो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, उनका परिचय इस प्रकार है  :-

1 मैं क्या हूँ ? - यह पुस्तक आत्मा के अमरत्व और उसके वास्तविक स्वरूप का प्रत्यक्ष चित्र है। साँसारिक भ्रम और माया के कठिन बन्धनों से छुटकारा पाकर आत्मा कैसे मुक्त हो सकती है। इसमें आत्म साक्षात्कार के कुछ अभ्यास बताए गये हैं। इन साधनों को घरेलू काम काजों में लगे रह कर भी प्रतिदिन थोड़े समय में कर सकते हैं और अमर फल प्राप्त कर सकते हैं। मूल्य।

2 सूर्य चिकित्सा विज्ञान - सूर्य की प्रचण्ड रोगनाशक शक्ति से कठिन और असाध्य रोगों को भी दूर किया जा सकता है। डाक्टरों के अनेक अनुसंधानों का सार लेकर लिखा गया है और यह पुस्तक एक स्वतन्त्र चिकित्सा शास्त्र बन गई है। इसी के आधार पर साधारण बुद्धि का आदमी डाक्टरों की भाँति इलाज करके हजारों व्यक्तियों को रोग मुक्त कर सकता है। मूल्य।

3 प्राण चिकित्सा विज्ञान - मनुष्य के अन्दर गजब की विद्युत शक्ति है इसका प्रयोग करके अपने और दूसरों के कष्टों को दूर किया जा सकता है। झाड़-फूँक और तन्त्र-मंत्रों की प्राचीन पद्धति को यह पुस्तक वैज्ञानिक स्वरूप में उपस्थित करती है। विदेशों में इस विधि से बड़े-बड़े अस्पताल चल रहे हैं। मूल्य।

4 पर काया प्रवेश - मनुष्य के शरीर में प्रेतात्माओं के घुस आने की बात सब लोग जानते हैं। इस पुस्तक में मैस्मरेज्म के ढंग पर कुछ अनुभव उपाय बताये गये हैं जिनके आधार पर आप जीवित अवस्था में भी दूसरों के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं और उनके विचारों में आश्चर्य जनक परिवर्तन करके उन्हें अपनी इच्छानुसार चलने को मजबूर कर सकते हैं। मूल्य।) वी0 पी0 से मंगाने पर।) पोस्टेज अलग देनी होगी इसलिये मूल्य मनीऑर्डर से भेजना चाहिये। पुस्तक सुरक्षित पहुँचे इसलिये) का टिकट कम लगाते हैं। फलस्वरूप वे ) की वैरंग होकर आपको मिलेगी।

नोट- पर काया प्रवेश जनवरी में छपेगी जो सज्जन अन्य पुस्तकों के साथ उसका भी मूल्य भेजना चाहें भेज सकते हैं। दाम जमा रहेंगे पुस्तक छपते ही भेज दी जायगी।

अखण्ड-ज्योति कार्यालय,

फ्रीगंज आगरा


एक हर्ष समाचार।

‘अखण्ड ज्योति कार्यालय’ मथुरा जी चला गया।

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पत्र आदि “अखण्ड-ज्योति कार्यालय मथुरा” के पते पर भेजिए।

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पाठकों को यह जान कर प्रसन्नता होगी कि अखण्ड ज्योति कार्यालय ता0 25 दिसम्बर को आगरा से उठकर मथुरा चला जायगा।

अखण्ड ज्योति भगवान कृष्ण के अखण्ड और सत्य शिव सुन्दर आदेशों का प्रकाश जन साधारण के हृदयों तक पहुँचाने के उद्देश्य को लेकर अवतरित हुई है। आत्म ज्ञान, संयम श्रेष्ठ आचरण और उदारता के पवित्र आदर्शों से गीता का अन्तः करण भरा हुआ है। अखण्ड ज्योति उन्हीं महातत्त्वों को भिन्न-भिन्न स्वरों में गाती रहती है। गोविन्द और उनकी गीता के अमृत निर्झर की ही कुछ बूँदें, माया की तप्त अग्नि में जलते हुए प्राणियों पर छिड़कते रहने का हमारा यह प्रयत्न है।

जिस मुरली की मधुर ध्वनि को सुनकर रोती हुई दुनिया के परमाणु एक शान्ति और संतोष की साँस लेते हैं उसका पार्थिव केन्द्र उस पुण्य प्रसूता मथुरा नगरी में अब भी दिख पड़ता है। अपने आदर्शों के अनुसार हमें अपना काबा काशी मथुरा अनुभव हो रहा है। युग बीत गये परन्तु भावुक भक्तों के लिए ब्रज की पवित्र रज अब भी उतनी ही शान्ति-दायिनी हो जितनी उस योगिराज के समय में थी।

उसी नगरी की रज में लोटते रहने की मुद्दतों से अभिलाषा थी। प्रभु की कितनी कृपा है कि आज वह अभिलाषा पूरी हो रही है। अब अखण्ड ज्योति सहित स्थायी तौर से वहाँ रहने का अवसर मिलेगा, और देश भर के वहाँ पधारने वाले भज्जनो का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। अखण्ड ज्योति के हजारों प्रेमी जो वहाँ पधारेंगे अपने दर्शन देकर हमें कृतार्थ करते रहेंगे यह कितने हर्ष की बात है।

कार्यालय विश्राम घाट पर एक छोटे से कमरे में स्थापित किया गया हैं। पधारने वाले सज्जन उसे आसानी से पा सकेंगे। पत्र व्यवहार के लिये मुहल्ले का उल्लेख किया जाये तो भी कुछ हर्ज नहीं। अखण्ड-ज्योति कार्यालय, मथुरा के पते पर पत्र, रजिस्ट्री, मनीआर्डर आदि भेजे जा सकेंगे। अब आगरे के पते पर पत्र व्यवहार न करके मथुरा के पते पर ही करना चाहिए। पाठक इसे अच्छी तरह नोट कर लें।

आशा है कि इस स्थान परिवर्तन से प्रेमी पाठकों को प्रसन्नता होगी।

सम्पादक

’अखण्ड ज्योति’ कार्यालय, मथुरा ।


अखण्ड ज्योति के नियम

(1)  अखण्ड ज्योति का वार्षिक मूल्य 1 रु0 एक प्रति का नौ पैसा है। मूल्य मनीआर्डर से ही भेजना चाहिये। वी0 पी0 मंगाने पर। अधिक देने पड़ते हैं।

(2)  लेख या कविताएँ केवल आध्यात्मिक योगशास्त्र, तन्त्र विज्ञान, मैस्मरेजम, मानसिक शक्तियों की विवेचना, प्राकृतिक चिकित्सा तथा सदाचार पर ही आने चाहिए। अन्य विषयों को स्थान न दिया जायेगा। लेख जहाँ तक हो सके छोटे होने चाहिए।

(3)  उत्तर के लिए जवाबी कार्ड या टिकट भेजना चाहिए अन्यथा उत्तर नहीं दिया जाएगा।

(4)  प्रत्येक अंक जरूरत भर ही छपाया जाता है, इसलिए पुराना अंक एक भी नहीं बचता। पुराने अंक लेने के लिए कोई सज्जन पत्र व्यवहार न करें।

(5)  अखण्ड ज्योति के मूल्य में कमी करने के लिए पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिए अखण्ड ज्योति के ग्राहक नहीं बनाये जाते।

(6)  अखण्ड ज्योति की एजेन्सी कम से कम 6 प्रति, प्रति मास लेने पर दी जाती है। जिन्हें एजेन्सी लेनी हो वे कमीशन आदि के बारे में पत्र व्यवहार करें।

(7)  अखण्ड ज्योति प्रति मास 20 तारीख को निकल जाती है। हमारे यहाँ से दो बार जाँच कर सब ग्राहकों के पास अखबार भेजा जाता है। फिर भी जिनको एक सप्ताह के अन्दर न मिले उन्हें रुष्ट न होकर डाकखाने उत्तर सहित हमें लिखना चाहिए।

(8)  अध्यात्म विद्या प्रेमियों के चित्र अखण्ड ज्योति में छापे जाते हैं। पाठकों से प्रार्थना है कि वे लोकसेवी, सदाचारी एवं ईश्वर भक्त सज्जनों के परिचय भिजवाने की कृपा करें।

पत्र व्यवहार का पता

मैनेजर-अखण्ड ज्योति फ्रीगंज, आगरा।


सफल मनुष्य जीवन

विचारों में हम उठते हैं और विचारों से ही गिरते हैं। उनसे ही खड़े होते हैं और उनसे ही चलते हैं। उनकी जबरदस्त शक्ति से सबका भाग्य बनता है। जो आदमी अपने विचार का स्वामी बनकर रहता है, जो आदमी इच्छाओं को अपने वश में रखता है और जो प्रेमपूर्ण सचाई के तथा साहस भरे विचार करता है वह अपने आदर्श को सत्य के प्रकाश में ढूंढ़ लेता है।

तुम्हारे जीवन के जो क्षण व्यतीत हो रहे हैं उनको सादे, मधुर, पवित्र, सुन्दर, श्रेष्ठ आशापूर्ण, उच्च तथा नम्र विचारों से भरो। वे विचार तुम्हारे जीवन क्षेत्र में अपने अनुरूप फल पैदा करेंगे फल। स्वरूप तुम्हारा दैनिक जीवन आन्तरिक शुभ विचारों का जीता जागता चित्र बन जायेगा। ऐसा जीवन ही ‘सफल मनुष्य जीवन’ होता है।


हमारा धन्यवाद स्वीकार कीजिये।

इस अंक के साथ अखंड-ज्योति का पहला वर्ष समाप्त हो रहा है। इस अवसर पर हम अपने प्रेमी पाठकों को धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकते जिनकी गुण ग्राहकता, सहानुभूति तथा सद्भावनाओं के कारण वह इतनी उन्नति कर सकी है। हिन्दी संसार में अखबारी की ‘बाल्य मृत्यु’ प्रसिद्ध है। आये दिन नये अखबार निकलते हैं और बन्द हो जाते हैं। जन्म के कुछ ही समय बाद घाटे का समान उनकी गर्दन पर चढ़ बैठता है और वे बेचारे दम तोड़ देते हैं। अखंड-ज्योति ऐसे आक्रमण से बची रही हो सो बात नहीं है, उसने उन मर्मान्तक आक्रमणों को सहा है किन्तु पाठकों के जिस प्रेम की अमर टुटी को पीकर वह जीवित है और जीवित रहेगी उसके लिये अपने पाठकों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करना और धन्यवाद देना हमारा प्रथम कर्तव्य है।

अखंड ज्योति, छपे कागजों को बेचने का व्यापार करने के उद्देश्य से नहीं निकाली गई है। इसका अपना एक मिशन-उद्देश्य है। मनुष्य सम्राटों के सम्राट, सच्चिदानन्द परमात्मा का उत्तराधिकारी, राजकुमार है। मनुष्य की शक्ति महान है। परमात्मा में जो गुण हैं वे सब उसमें भरे हुए हैं किन्तु जिस प्रकार एक सिंह का बच्चा भेड़ों के साथ रहकर अपने को भेड़ समझने लगा था वही दशा माया के संसर्ग से मनुष्य की हुई है। अखंड ज्योति का मिशन है कि हर सिंह अपने वास्तविक स्वरूप को जाने और अपने अधिकारों का दावा पेश करे। हमारा कार्य उस दर्पण के समान है जिसमें अपना रूप देखकर सौंदर्यवान देहधारी प्रसन्नता प्राप्त करते हैं। मनुष्य अपने में देवत्व का दर्शन करे और वह वस्तु जिसकी तलाश में युगों से मारा-मारा फिर रहा है अपने अन्दर प्राप्त करे इसी कामना से अखंड ज्योति अवतरित हुई है। हमारे लिये यह प्रभु की सच्ची भक्ति है कि उसके पुत्रों को उसकी गोद तक पहुँचाने का एक विनम्र प्रयत्न करें। गत एक वर्ष से हमने दर-दर पर अपने इसी उद्देश्य का अलख जगाया है।

फकीरों की तरह द्वार-द्वार पर अलख जगाने सशरीर हम न पहुँच सके न सही। कागज के पत्रों पर अपने विचार और अपनी आन्तरिक भावनाओं को लपेट लपेट कर हमने दूर देशों में उन्हें भेजा है क्या यह प्रयत्न व्यर्थ गया? नहीं। अपने अज्ञान के कारण संसार के दारुण दुखों से पीड़ित जन समूह ने, सत्य मार्ग को खोजने वाले जिज्ञासुओं ने, कान खोलकर सुना कि यह क्या कहती है। इस एक वर्ष में करीब चौथाई लाख व्यक्तियों के घर वह कई कई बार अलख जगाने पहुँची। जिनने इस अलख को सुना उनमें से बहुतों ने उसे प्यार किया, आश्रय दिया और छाती से लगा लिया। इन पंक्तियों को लिखते समय अखंड ज्योति का उदार परिवार शरीर सहित हमारे निकट नहीं बैठा है परन्तु उनकी अत्यंत पवित्र और उच्च भावनाओं को हम अपने चारों ओर मँडराते देख रहे हैं। इतना बहुमूल्य पुरस्कार पाकर हम अपने को धन्य मान रहे हैं और वह धन्य ध्वनि हमारे मानस तन्तुओं में झंकृत होकर प्रतिध्वनि के रूप में अखंड ज्योति के लिये शुभकामना करने वाले समस्त सदस्यों के लिये प्रेरित हो रही है। यही हमारा विनम्र धन्यवाद, प्रेम और आशीर्वाद है पाठक इसे स्वीकार करें।

अखंड ज्योति का प्रथम वर्ष कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण रहा आध्यात्मिक तत्व के विशिष्ट पहलुओं पर विचार-विनिमय करने के लिये देश विदेश से कोई अठारह हजार व्यक्तियों के अड़तीस हजार चालीस निजी पत्र आए। इन सब का अपनी योग्यता के अनुसार विस्तारपूर्वक समाधान किया गया। यह सज्जन कृपापूर्वक उत्तर के लिये टिकट भेजते रहे हैं पर जिन्होंने नहीं भेजे उनके लिए लिफाफे भेजने में कार्यालय को एक सौ चौरानवे रुपये अपनी जेब से खर्च करने पड़े। तीन सौ के करीब जिज्ञासु अपनी रुचियों के अनुसार विभिन्न प्रकार के साधन इनसे परामर्श लेकर कर रहे हैं। सूर्य चिकित्सा और प्राण चिकित्सा विधि से अनेक सज्जन दीन दुखियों का भला कर रहे हैं। “पर काया प्रवेश” जैसे दुरूह विषय को पत्र व्यवहार द्वारा सिकानेडडडडड और उसे पुस्तक रूप में प्रकाशित करने का प्रयत्न निश्चय ही बड़ी अद्भुत बात है क्योंकि यह विषय कार्यरूप में इतनी सफलता के साथ प्रयोग में आते हुए और कहीं नहीं देखा गया था। कुछ अभ्यासियों के सहयोग से पीड़ित की चिकित्सा करने का ‘आनंद प्रतिष्ठा’ नामक केन्द्र स्थापित किया गया था जिसके द्वारा दो सौ से अधिक व्यक्तियों को स्वास्थ्य लाभ हुआ इनमें से तीस तो ऐसे थे जिनके प्राण बचने की लोगों को बहुत कम आशा थी। इतने कार्य किये जा सके। अपनी तुच्छ योग्यता और सेवा के इतने परिणाम को देख कर हमारी छाती फूल उठती है और प्रभु की प्रभुता को देख कर प्रसन्नता से होंठ खिल उठते हैं।

कदाचित कुछ प्रेमी इस बाहरी रूप को देखकर अखंड ज्योति की भीतरी स्थिति भी जानना चाहते होंगे उन्हें कुछ थोड़ा सा भीतरी परिचय करा देना इसलिये आवश्यक प्रतीत होता है कि पाठको को हम अपना परिवार समझते हैं उन्हें हक है कि अपनी चीज के बाहरी रूप को देखने के साथ-साथ भीतरी बातें भी जानें।

अखंड ज्योति का संचालन इन पंक्तियों के लेखक-संपादक-आर्थिक दृष्टि से कोई ऊंचा व्यक्ति नहीं है। अपनी कुल एक हजार रुपये की छोटी−सी पूँजी से उसने इतने बड़े उत्तरदायित्व के जहाज का लंगार खोल दिया था। उसका विश्वास है ‘नरसी भगत’ वाले ‘सावलियाँ शाह’ इस जहाज को पार लगाएंगे। छह सात महीने में संचालक की वह पूँजी समाप्त हो गई और घाटे का मसान गला घोटने के लिये सामने आ खड़ा हुआ। अर्थ चिन्ता बड़ी कठिन होती है। आमदनी बढ़ाना या खर्च घटाना वही दो सूरतें हो सकती थीं। आमदनी बढ़ती न दिखी तो खर्च घटाया। तिरंगा मुखपृष्ठ छोड़ना पड़ा, भीतर की रंगीन तस्वीर बंद कर दी गई, कागज हलका हुआ, रोगियों का उपचार करने वाले अभ्यासियों को तितर बितर हो जाने दिया दफ्तर का मकान पन्द्रह रुपये माहवार किराये से घटाकर चार रुपये महीने के छोटे कमरे में लाया गया।

जिन अमूल्य पुस्तकों का विज्ञापन किया गया था वह बहुत लेट छपीं, कई तो अब तक बिना छपे पड़ी हैं और जिज्ञासु लोग उस सद्ज्ञान से वंचित हैं। चंद अनिवार्य कार्यकर्ताओं को छोड़कर शेष कर्मचारियों का कार्य भी संपादक ने अपने ही हाथ में ले लिया और नित्य सोलह घंटे स्वयं काम करने की व्यवस्था हुईं। इस प्रकार खर्च में बहुत कुछ कमी करके घाटे को हलका किया गया। फिर भी असुविधा दूर नहीं हो सकती हैं। डेढ़ रुपया वार्षिक मूल्य में अखबार के कागज छपा, पोस्टेज आदि के बाद इस महंगी के जमाने में भला क्या बच सकता है? ऐसी दशा में कार्य की महत्ता को देखते हुए घाटे का होना स्वभाविक ही है।

असंख्य पीड़ियों को लाभ हुआ परन्तु आनंद प्रतिष्ठान द्वारा अपनी नीति ‘न माँगने’ की होने के कारण ‘न कुछ’ के बराबर आय हुई। उतने से अभ्यासियों का खर्च तो दूर कागज लिफाफों का व्यय भी पूरा न हुआ तब माँगने की नीति ग्रहण करने के बजाय उस अत्यंत उपयोगी कार्य को ही बंद कर देना पड़ा। इसी प्रकार अखंड ज्योति के लिये अपने उदार बंधुओं से याचना करते तो झोली खाली न रहती। परन्तु हम इस बात पर विश्वास करते हैं कि लोकोपयोगी कार्य, जो जनता जनार्दन की निस्वार्थ सेवा के लिये पवित्र भावनाओं से किये गए हैं, यज्ञ हैं और यज्ञ की बाह्य व्यवस्था का भार प्रभु पर है। “योगक्षेमं बहाम्यहम्” वह प्रतिज्ञा बद्ध है कि सत्य धर्म की रक्षा करे। फिर हम किसी से क्या याचना करें? यदि हमारे कार्य अपवित्र हैं, हमारी भावनायें हीन हैं तो हमें नष्ट होना ही चाहिये और यदि हम धर्म प्रचार के मिशन के लिये जीवित हैं तो वह घट-घट वासी परमात्मा जिन्हें निमित्त बनाना चाहता होगा उनके हृदय में प्रेरणा करेगा कि इस मुरझाते हुए धर्म तरु को सींचने के लिये अपने भरे हुये जल पात्रों में से एक-एक चुल्लू इसके लिये भी त्याग करें। अखंड ज्योति परिवार गुण ग्राहकों, सच्ची सेवा का महत्व जानने वाले बंधु जनों, उच्च अधिकारारूढों, महापुरुषों, साधु महात्माओं, ईश्वर भक्तों, और सुहृदयों से भरा पड़ा है। ईश्वर जब उनके हृदयों में प्रेरणा करेगा तो वे अपनी श्रद्धानुसार इस मुरझाते हुये धर्म तरु को सींचने के लिये स्वयं दौड़ेंगे। यह काम हमारा नहीं है कि अपनी तप विशुद्ध कर्तव्य को पूरा करने के साथ-साथ झोली भी पसारे फिरें। हमें ‘नरसी भगत’ वाले ‘साँवलिया शाह’ पर विश्वास है। कदाचित वह परीक्षा कर रहे हैं। आज नहीं तो कल उन्हें अर्थ संकट के कारण मुरझाते हुए इस धर्म तरु को सींचने का प्रबन्ध करना पड़ेगा। अखंड ज्योति अखण्ड है वह खंडित नहीं होगी। तेल निबट जायगा तो बत्ती जलेगी, बत्ती निबट जायगी तो दोवट जलेगी। जब तक जीवन रहेगा। जला जायगा। अपने पड़ोसियों तक प्रकाश पहुँचाने के लिये टिमटिमाता रहा जायगा।

अखंड ज्योति के पाठकों को यह रोना सुनाकर उनके प्रफुल्लित हृदय पर दुख की एक रेखा दौड़ाने की हमारी कोई इच्छा नहीं थी पर प्रसंगवश सचाई को छिपाया न जा सका। हमें इस सम्बन्ध में और किसी से कुछ नहीं कहना है। परिवार से हमें एक ही बात की याचना करनी है वह यह है कि हमारे पवित्र उद्देश्यों के प्रचार में मदद करें। यह कर्तव्य जितना हमारा है उतना ही हर एक पाठक का है। यह एक पवित्र पुण्य कर्तव्य है जो हम सबको करना ही चाहिये। आत्म ज्ञान के महान मिशन को मनुष्य मात्र तक तभी पहुँचाया जा सकता है जब जंजीर की सभी कड़ियाँ अपना अपना विस्तार करें। जो ज्ञान आप तक पहुँच रहा है उसे दूसरों तक पहुँचाइए। आप जब अखंड ज्योति को पढ़ लें तो दूसरों को पढ़ने दें। जो पढ़े नहीं हैं, उन्हें पढ़कर सुनावें, जिनकी इस विषय में रुचि नहीं है उनमें रुचि उत्पन्न करें, जो ग्राहक बन सकें। उनसे बलपूर्वक इसके लिये अनुरोध करें। डेढ़ तथा रुपया मूल्य सब दृष्टियों से कम है इन घाटे के दिनों में तो कमी करना और भी कष्टप्रद है फिर भी यदि कोई जिज्ञासु असमर्थ हो और ग्राहक बनना चाहते हों तो उतना ही पैसा दे दें जितना वे दे सकते हैं। जो उधार ग्राहक बनना चाहें वे भी बन सकते हैं, सुविधानुसार पैसे चुका दें। हमें प्रत्येक पाठक की ईमानदारी पर पूर्ण विश्वास है।

आज गत वर्ष के अन्त और नवीन वर्ष के आगमन की संध्या में हमारी एक और भी इच्छा हो रही है वह यह कि अखण्ड ज्योति के सभी प्रेमी पाठक अपने कुशल समाचार व अपनी आध्यात्मिक आकाँक्षायें हमें लिख भेजें। और गत वर्ष के अखण्ड ज्योति के कार्य की निष्पक्ष समालोचना करते हुये बतावें कि इसको और अधिक उत्तम कैसे बनाया जा सकता है। हमें एक पत्र लिखते में पाठको का एक लिफाफा अवश्य खर्च होगा पर इसमें हम लोग एक दूसरे के हृदयों के अधिक निकट आवेंगे। हमें पता है कि प्रेमी पाठक अपने प्रेम सम्बन्ध का इस वर्ष-संध्या के उपलक्ष में एक पत्र द्वारा अपने प्रेम सम्बन्ध का परिचय देंगे।

अन्त में हम अपने समस्त परिवार से अपनी एक वर्ष की त्रुटियों के लिये क्षमा माँगते हैं और उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि भविष्य में उत्तमोत्तम सामग्री एवं सद्भावनाओं के साथ अपना अलख जगाने का कार्य अधिकाधिक उत्साह के साथ जारी रखेंगे। आपने पिछले वर्ष जो सहयोग दिया है और आगे देने वाले हैं उसके लिये एक बार पुनः हमारा हार्दिक धन्यवाद स्वीकार कीजिये।


Quotation

जीवन क्या है? बाधाओं की एक जंजीर है। बेशक, जो लोग शरीर और संसार के रिश्ते तक ही सीमित हैं उनके लिये वह ऐसा ही है। परन्तु जो लोग तत्व ज्ञान से प्रेम करते है उनके लिये ऐसा नहीं है।

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अपने ही भावों के द्वारा तुम अपने जीवन, अपने संसार और अपनी प्रकृति को सुधार सकते या बिगाड़ सकते हो। अपनी विचार शक्ति द्वारा अपने भीतर जैसा भवन बनाकर खड़ा करोगे बाह्य जीवन उसी के अनुरूप बनने लगेगा।

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यह मत कहो कि मैं ही एक पूर्ण हूँ। मुझमें ही सब ताकत है, मैं ही सब कुछ हूँ सबसे श्रेष्ठ हूँ। वरन् यों कहो कि मुझमें भी कुछ है, मैं भी मनुष्य हूँ मेरे अन्दर जो कुछ है उसे बढ़ा सकता हूँ उन्नत और विकसित कर सकता हूँ।

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जो दूसरों को दिये बिना खुद लेना चाहता है वह पाता तो कुछ नहीं, खोता बहुत है।

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गीता या रामायण पढ़ो।

(महात्मा गाँधी)

बहुतेरे नौजवान कोशिश करते हुए भी पाप से बच नहीं पाते। वे हिम्मत खो बैठते हैं और फिर दिन ब दिन पाप की गहराई में कदम बढ़ाते जाते हैं। बहुतेरे तो बाद में पाप ही को पुण्य भी मानने लगते हैं। ऐसों को मैं कई बार गीता जी और रामायण पढ़ने और उन पर विचार करने की सलाह देता हूँ। लेकिन वे इस बात में दिलचस्पी नहीं ले सकते। इसी तरह के नौजवानों की दिलजमई के लिये, उन्हें धीरज बँधाने की गरज से, एक नौजवान के पत्र का कुछ हिस्सा, जो इस विषय से सम्बन्ध रखता है। नीचे देता हूँ:-

“मन साधारणतः स्वस्थ है। लेकिन जब कुछ दिनों तक मन बिल्कुल स्वस्थ रह चुकता है, और खुद इस बात का खयाल हो आता है तो फिर से पछाड़ खानी ही पड़ती है। विकार इतने जबरदस्त बन जाते हैं कि उनका विरोध करने में बुद्धिमानी नहीं मालूम पड़ती, लेकिन ऐसे समय प्रार्थना, गीता पाठ और तुलसीकृत रामायण से बड़ी मदद मिलती है। रामायण को एक बार पढ़ चुका हूँ, दुबारा सती की कथा तक आ पहुँचा हूँ। एक समय था, जब रामायण का नाम सुनते ही जी घबराता था, लेकिन आज तो उनके पन्ने पन्ने में रस पा रहा हूँ। एक पृष्ठ को पाँच पाँच बार पढ़ता हूँ। फिर भी दिल ऊबता नहीं। काकभुशुंडि जी की जिस कथा के कारण मेरे दिल में तुलसी रामायण के प्रति घृणा पैदा हो गई थी, वह बुरी लगती थी, वही आज सबसे अच्छी मालूम होती है। उसमें मैं, गीता के 11 वें अध्याय से भी ज्यादा काव्य देख रहा हूँ। दो चार साल पहले आधे दिल से स्वच्छता पाने की कोशिश करने पर भी उसे न पाकर जो निराशा पैदा होती थी, आज उस निराशा का पता भी नहीं है, उल्टे मन में विचार आता है कि जो विकास अनन्त काल बाद होने वाला है उसे आज ही पा लेने का हठ करना कितनी मूर्खता है सारे दिन कातते समय और रामायण का अभ्यास करते समय आराम मिलता है।”

इस पत्र के लेखक में जितनी निराशा और जितना अविश्वास था, शायद ही किसी दूसरे नौजवान में उतनी निराशा और उतना अविश्वास हो। दोषों में उसके शरीर में घर कर लिया था। लेकिन आज उसमें जिस श्रद्धा का उदय हुआ है उससे नवयुवक-जगत में आशा का संचार होना चाहिये। जो लोग अपनी इन्द्रियों को जीत सके हैं उनके अनुभव का भरोसा करके लगन के साथ रामायण वगैरह का अभ्यास करने वाले का दिल पिघले बिना रह ही नहीं सकता। मामूली विषयों के अभ्यास के लिये भी जब हमें अक्सर बरसों तक मेहनत करनी पड़ती है। कई तरकीबों से काम लेना पड़ता है तो जिसमें सारी जिन्दगी की और उसके बाद की शान्ति का भी खयाल छिपा हुआ है उस विषय के अभ्यास के लिये हममें कितनी लगन होनी चाहिये? तिस पर भी लोग थोड़े से थोड़ा समय और ध्यान देकर रामायण तथा गीता में रस पान करने की आशा रखते हैं उनके लिये क्या कहा जाय?

ऊपर के पत्र में लिखा है कि पत्र लेखक की अपने स्वस्थ तन्दुरुस्त होने का खयाल आते ही विकार फिर से चढ़ दौड़ते हैं। जो बात शरीर के लिए ठीक है वही मन के लिए भी ठीक है। जिसका शरीर बिलकुल चंगा है उसे अपने अच्छेपन का खयाल कभी आता ही नहीं, न उसको कोई जरूरत ही है। क्योंकि तन्दुरुस्ती तो शरीर का स्वभाव है। यही बात मन को लागू होती है जिस दिन मन की तन्दुरुस्ती का खयाल आवे, समझ लो विकार पास आकर झाँक रहे हैं। अतः मन को हमेशा स्वस्थ बनाये रखने का एक मात्र उपाय हमेशा अच्छे विचारों में लगाये रखना है। इसी कारण राम-नाम वगैरह के जप की बात को शोध हुई वे गेय माने गये और जिसके हृदय में हर घड़ी राम का निवास हो उस पर विकार चढ़ाई कर ही नहीं सकते। सच तो यह है कि जो शुद्ध-से राम-नाम का जप करता है समय पाकर, राम नाम उसके हृदय में घर कर लेता है। इस तरह हृदय प्रवेश होने के बाद राम नाम उस मनुष्य के लिये अभेद्य किला बन जाता है। बुराई, बुराई का ख्याल करते रहने से नहीं मिटती हाँ अच्छाई का विचार करने से बुराई जरूर मिट जाती है। लेकिन बहुत बार देखा गया है कि लोग सच्ची नियत से उलटी तरकीबें काम में लाते हैं। ‘यह कैसे आई, कहाँ से आई,’ वगैरह विचार करने से बुराई का ध्यान बढ़ता जाता है। बुराई को, मेटने का यह उपाय हिंसक कहा जा सकता है। इसका सच्चा उपाय तो बुराई से असहयोग करना है। जब बुराई हम पर आक्रमण करे तो उससे भाग जा कहने की कोई जरूरत नहीं। हमें तो यह समझ लेना चाहिये कि बुराई नाम की कोई चीज ही नहीं और हमेशा स्वच्छता का, अच्छाई का विचार करते रहना चाहिये। ‘भाग जा’ कहने में डर का भाव है। उसका विचार तक न करने में निडरता है। हमें सदा विश्वास बढ़ाते रहना चाहिये कि बुराई हमें छू तक नहीं सकती। अनुभव द्वारा हमें यह सब सिद्ध किया जा सकता है।


Quotation

अमुक चीज तुम्हें अच्छी नहीं लगती केवल इसी बुनियाद पर उसे बुरा मत मान लो और न उसके विनाश की चेष्टा करो। यह मत समझ बैठो कि तुम्हारे विचार सर्वथा भ्रमरहित हैं और तुम जो करना चाहते हो वही सर्वश्रेष्ठ है।

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दूसरों की अवनति करके, दूसरों का बुरा करके तुम अपनी उन्नति या भलाई कभी नहीं कर सकते। तुम्हारा मंगल उसी कार्य में होगा जिसमें दूसरों का मंगल भरा हो।

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वेदों का अमर संदेश

( ले.  -  पं. गोविन्द प्रसाद कौशिक  )

यन्मे छिद्रंचक्षुषो हृदयस्य मनसो।

वाडतितृण्णं बृहस्पतिर्मे तद्दधातु॥      -यजु0 36

अपनी इन्द्रियों और अवयवों में जो-जो दोष होंगे वे ईश्वर की कृपा से दूर हो सकते हैं। मनुष्यों को उचित है कि वे ज्ञानी गुरु के पास जावें, उनकी सहायता से अपने दोषों को दूर करें और पवित्र बनें।

अजैष्माद्यासनाम चाभूमाअनामसो वयम्      -   ऋग॰ 10। 164। 5

सबसे पहले हमको निर्दोष बनना चाहिए। पश्चात् परस्पर प्रेम का बर्ताव करना चाहिये। जिससे विजय और यश हो सकता है।

आच्यायमानाः प्रजया धनेन।

शुद्धा पूता भवत यज्ञियासः॥

संतान और धन प्राप्त करके, सबको अपनी उन्नति करनी चाहिये। अन्दर से, बाहर से शुद्ध पवित्र और निर्दोष बनकर सबको श्रेष्ठ बनना चाहिए।

अग्नेनय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्॥

युजोध्यस्मज्हुराण मेने भूयिष्ठाँते नम उक्ति विधेम॥                         - यजु0 40। 16

सत्य मार्ग से ही उन्नति प्राप्त करनी चाहिये। परमेश्वर सब कार्यों को यथावत् जानता है इसलिए उससे कोई भी पाप करके बच नहीं सकता। कुटेवों और पापों को शुद्ध करके दूर करना चाहिए और प्रतिदिन परमेश्वर की भक्ति तथा उपासना करनी चाहिये।

अतिक्रामन्तो दुरिया पदानि ।

शतंहिमाः सर्ववीरा मदेम ॥               --  अथर्व 12। 2। 24

मन से दुष्ट विचारों को दूर करना चाहिए। अच्छे निर्भय और धैर्यमय विचारों को अपने मन में धारण करना चाहिए और सौ वर्ष तक वीर पुरुषों के साथ आनन्द से जीवन व्यतीत करना चाहिए।


मृत्यु कोई वस्तु नहीं है।

(स्व. स्वामी विवेकानन्द का एक भाषण)

आत्मा अच्छेद्य, अदाद्य, अक्लेद्य और अशोपप्य है, अर्थात् वह तलवार की धार से कट नहीं सकता, आग से जल नहीं सकता, पानी में डूब नहीं सकता और वायु उसे सुखा नहीं सकती। प्रत्येक जीवात्मा एक गोलाकार के समान है जिसकी गोलाई की सीमा नहीं पर उसका मध्य बिन्दु किसी शरीर में रहता है। यही मध्य बिन्दु जब एक शरीर से दूसरे शरीर में चला जाता है, तब कहते हैं कि पहले शरीर की मृत्यु हुई, वास्तव में मृत्यु कोई वस्तु नहीं है। आत्मा जड़ पदार्थों से कमी बाँधा नहीं जा सकता। वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और पूर्ण है। कभी कभी कारणवश जड़ पदार्थों के साथ उसका संयोग होने से यह भावना करता है कि मैं जड़ पदार्थ हूँ।

आप कहेंगे कि आत्मा अमर है। मृत्यु कोई वस्तु नहीं है, पूर्व जन्म के कर्मानुसार आत्मा देह धारण करता है, इन बातों को हम मानते हैं, पर तूफान में पड़ी हुई नाव की तरह इस संसार सागर के तूफान से आत्मा का छुटकारा पाने का क्या कोई उपाय नहीं है? कालचक्र के फेरे से कौन बचा है? कार्य और कारण की दोधारी छुरी किसके गले पर नहीं फिरती? उस कालचक्र की मशीन में अनाथ विधवायें आश्रयहीन बालक और उन्मत्त सत्ताधीश एक ही से पिसे जाते हैं। ऐसा कौन है जो कालचक्र के स्मरण में भय न करता हो? सारे संसार से यही करुण ध्वनि उठती है कि क्या इस कराल काल के चक्र से कठोर छुरी की धार से, भयानक तूफान से हमें कोई बचा सकता है?

वेद इन प्रश्नों का ललकार कर उत्तर देते हैं- “मित्रो, डरो मत, तुम सच्चिदानंद स्वरूप हो, जिस सनातन प्राचीन रूप से तुम्हारा जन्म हुआ है उसको पहचानो, तुम्हारा बेड़ा पार है।” ‘सच्चिदानंद की संतान’ कितना मधुर शब्द है। अपने को आप पाप समझते है किन्तु वेदान्त कहता है कि आप पूर्ण हैं, पवित्र हैं, पूर्णानंद रूप हैं, आपको पापी कौन कह सकता है? मनुष्य को पापी कहना ही महापाप है। तुम जड़ शरीर नहीं हो, शरीर तो तुम्हारा एक नौकर हों, उठो जागो और निज को पहचानो तुम नित्य शुद्ध, बुद्ध और मुक्त हो।

वेदों ने काल के कराल पंजे से छूटने को बताया है कि- “उस स्वरूप की पूजा करो जिससे सृष्टि के सब नियम चलते हैं, जिसकी आज्ञा से पाँचों तत्व अपना काम करते हैं और जो मृत्यु का हरण करता है।” उसी से ऋषि लोग प्रार्थना करते हैं कि “हे सर्वव्यापी दयामय, तू ही हमारा पिता, तू ही माता, बन्धु, मित्र है तू ही संसार की सब शक्तियों का अधिष्ठाता है और विश्व का भार सहता है हम इस जीवन का भार सह सकने की शक्ति की तुझसे याचना करते हैं।” इस जन्म तथा अन्य जन्मों में उससे बढ़कर और किसी पर प्रेम न हो यह भावना मन में दृढ़ कर लेना ही उसकी पूजा करना है।

कमल पत्र के समान मनुष्य को संसार से अलिप्त रहना चाहिये। कर्म करते हुये भी उससे उत्पन्न होने वाले सुख दुख से यदि मनुष्य अलग रहे तो उसे निराशा का सामना न करना होगा। सब काम निष्काम होकर करो तुम्हें कभी दुख न होगा।

राजपाट से रहित होकर राजा युधिष्ठिर हिमालय पर्वत पर जा रहे थे तब एक बार द्रौपदी ने उस से पूछा महाराज, आप ईश्वर के भक्त होकर इस प्रकार कष्ट क्यों भोगते हैं? “इस पर युधिष्ठिर ने कहा-देवी, हम हिमालय के उत्तंग और मनोहर शृंगों पर क्या इससे कुछ बदला पाने की इच्छा से प्रेम करते हैं? सुन्दर और उदात्त वस्तु पर प्रेम करना मेरा स्वभाव ही है, जो सुन्दरता का सागर और उदात्त से भी उदात्त है उस पर मैं कैसे प्रेम न करूंगा? संसार में वही एक प्रेम का स्थान है। प्रेम के परिवर्तन में मैं कुछ भी नहीं चाहता।

इस प्रकार का परमात्मा के प्रति अनन्य प्रेम होना मृत्यु से बचने का सच्चा उपाय है। सत्य ईश्वर प्रेम के उपरान्त मृत्यु नहीं होती और होती भी है तो उसमें कष्ट नहीं होता।


प्रभु की माया

(ले.- मूलशंकर नरभेराम ओझा)

प्रभु की माया अपार है, माया को प्रभु आप ही जानते हैं। उनके सिवाय उसे कोई नहीं जानता, न जान ही सकता है। प्रभु की माया नहीं जानी जा सकती हाँ, प्रभु जाने जा सकते हैं। जो प्रभु में लय हो जाता है, प्रभु के साथ एक ही भाव को प्राप्त हो जाता है, वही प्रभु को जान भी लेता है-

प्रभु ही सारे जगत में फैले है, परन्तु कोई भी पूर्ण रूप से नहीं है इसी कारण प्रभु की पूर्ण माया को कोई नहीं जानता। जो जानता है, अंश रूप में ही जानता है। सब इतना ही जान सकते हैं, ज्ञान की इतनी ही गम्य है, विद्या की इतनी ही गति है, बुद्धि की इतनी ही बलिहारी है। यही प्रभु की माया है।

इतना जानना भी हर किसी का काम नहीं है। जानने की इच्छा तो चाहे सब में हो, परन्तु यत्र तो कोई सा ही करता है और उनमें से भी कोई विरला ही जान पाता है। जो जान जाता है प्रभु उसका भी मुँह बन्द कर देते हैं, विधि तो वह बतला सकता है, पर उससे क्या मिलता है- यह नहीं बतला सकता। कुछ पूछो तो इतना ही कह सकता है कि प्रभु प्रभु? कहाँ? और प्रेम में गदगद हो गया। जिस पर प्रभु कृपा करते हैं उसी की यह अवस्था होती हैं। यही प्रभु की माया है।

जो इतना जानता है और अहंकार नहीं करता, यह जानता है कि इतना जान लेना कुछ भी नहीं है। वह यत्न करता रहता है और उस पर प्रभु की और भी अधिक कृपा हो जाती है और इतना जानना ही उसके लिये प्रेम का कारण बन जाता है। अर्थात् जो जान जाता है वही प्रेम करने लगता है। प्रभु स्वयं प्रेमरूप हैं, अतः जानने वाले को भी प्रेम ही प्रदान करते हैं, वह अद्वितीय प्रेमी उसे भी प्रेमी बना लेता है, फिर प्रेमियों का प्रेम का खेल आरम्भ हो जाता है। यह भी प्रभु की माया है।

इस प्रेम की लीला में क्या नहीं होता, और क्या होता है? वह प्रेमी ही जानता है, जो जानना चाहे, प्रेमी बन देखे। प्रेम में प्रेमी इतना जानने से भी आगे बढ़ जाता है, यहाँ तक कि प्रेमवश प्रेमी प्रभु प्रीतम में लीन हो जाता है। फिर प्रीतम के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रहता। हाँ, फिर न प्रेमी रहता है, न प्रीतम। दोनों प्रेमरूप हो जाते हैं। प्रेम ही प्रभु का अपना रूप है, प्रभु के रूप में प्रेमी समा गया, दो की जगह एक ही रह गया,वही पूर्ण प्रभु को जानता है। यही प्रभु की माया है।

परन्तु सब एक ही एक है तो फिर कौन जाने? किसे जाने? और क्या जाने? जानने वाला (ज्ञाता) और जाना जानने वाला (ज्ञेय) से दोनों एक ही हैं। एक हो रहे हैं अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय ज्ञानरूप हो गये हैं। जानने वाला जानकर सब कुछ भूल गया फिर अब ज्ञाता क्या बतावे? प्रेमी चुप है, ज्ञानी गुम है। यही प्रभु की माया है।

अब दूसरी बात सोचिये। जो अंशरूप में जानता है और अहंकार करता है। जो अंशरूप में ही जान कर फूल जाता है, वह ढिंढोरा पीटता है कि मैं जानता हूँ। पर तत्वतः वह अभी अधूरा ही जानता है। और जो अहंकार वश होकर, प्रभु के प्रेमरूप को नहीं देखता, प्रेम नहीं करता वह अधूरा ही रहता है, कोरा ज्ञान और निरी विद्वत्ता निष्फल जाती है। वह प्रभु का पूरा रूप नहीं जानता न जान ही सकता है। यही प्रभु की माया है।

इसी कारण जो जानता है, वह कहता नहीं फिरता, जो अंश में जानता है-वह जानना न जानने के तुल्य है। जो थोड़ा सा जानता है वही कहता फिरता है। जो कहता है, वह खो देता है। जो कहता फिरता है, वास्तव में वही नहीं जानता है। यही प्रभु की माया है।


अभिलाषा का अभिशाप

(श्रीमती सावित्री देवी तिवारी, जयपुर)

इस क्षणभंगुर विश्व को जब हम आवश्यकता से अधिक प्रेम करने लग जाते हैं तब हमारा मधुर जीवन दुखों के अग्निकुण्ड में स्वाहा होने लगता है। नहीं-नहीं कहते हुए भी अपना पैर बराबर क्लेशों की कीचड़ में फंसा लेते हैं। क्या आपने सोचा कि इसका कारण क्या है? अनावश्यक अभिलाषा इसका कारण है। अभिलाषा से एकाँगी सम्बन्ध रखने वाले व्यक्तियों का जीवन सदैव न बुझने वाली अग्नि में धाँय धांय जलता रहता है उनके मुख पर न तो मृदुल हास्य होता है और न प्रसन्नता अठखेलियाँ करती दिखाई देती है।

यह सत्य है कि मनुष्य का जीवन मरण एक बलवती अभिलाषा के ही कारण होता है। उसके विभिन्न रूप विभिन्न चरित्र अभिलाषाओं की छायाएं हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक सचाई है कि हम संसार की किन्हीं वस्तुओं से पूर्णतः उदासीन नहीं हो सकते। अभिलाषा की इस अनिवार्य सत्ता के विरुद्ध कुछ कहने का मेरा आशय नहीं है। वहाँ मुझे इतना ही कहना है कि अनावश्यक अभिलाषाएं त्याज्य हैं।

शेखचिल्ली के से मनसूबे न बाँधकर यदि आवश्यक कर्त्तव्य कर्मों की इच्छा की जाय तो मानव जीवन बहुत सरल और सुखमय हो सकता है। आवश्यक इच्छाएं सात्विक होती हैं इसलिए उनमें आँधी का सा प्रबल वेग और भूकम्प का सा हाहाकार नहीं होता। चटोरी जीभ वाला कुत्ता पेट भरा होने पर भी भोजन पर ललचाई दृष्टि डालता है। ऐसे लोगों की जीवन सरिता टेड़े-मेड़े मार्गों पर टकराती रहती हैं उनका हृदय अतृप्त तृष्णा की तप्त लौ में जलता रहता है।

हम कितनी ही इच्छा करें? इसका परिणाम जीवन उद्देश्य की तराजू में तोला जाना चाहिये। जीवन दैवत्व का प्रतिबिम्ब है। ईश्वर की इच्छा है कि मनुष्य प्रेम, सत्य, और उदारता का जीवन व्यतीत करे और पूर्णता को प्राप्त हो। इसके अतिरिक्त और कोई उद्देश्य हो ही नहीं सकता। इन्द्रियों का सुखोपभोग वैसा है जैसा कुत्ता सूखी हड्डी चबाने पर अपने जबड़ों से निकला हुआ रक्त पीकर प्रसन्न होता है। असल में इन्द्रियों के सुख सुख की भ्रमपूर्ण कल्पना मात्र हैं-अन्यथा सुखी दिखाई देने वाले सब लोग भीतर ही भीतर आन्तरिक उद्वेगों से क्यों जलते रहते? सभी दार्शनिक दृष्टियाँ बताती है कि मनुष्य का उद्देश्य पवित्रता और पूर्णता का ही स्वप्न देखने वाला होना चाहिए। इसके अतिरिक्त और जो अभिलाषाएं बच रहती हैं वह आवश्यक हैं।

नौकर अपने निर्वाह के लिये वस्तुएं प्राप्त के लिये दत्त चित्त होकर काम करता रहता है। मधु मक्खियाँ शहद इकट्ठा करने के लिये कठोर परिश्रम करती हैं। प्रकृति का प्रत्येक परमाणु अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये अविरल गति से चल रहा है तो क्या हमें अपने महान उद्देश्य की पूर्ति के लिये अभिलाषा का आश्रय न करना चाहिये?

हम पवित्रता और पूर्णता के लिये आवश्यक अभिलाषा करें तो यह अभिलाषा ही शान्ति, सन्तोष प्रेम और सौंदर्य के रूप में हमारे चेहरों पर खिल पड़ेगी और जीवन का उपाय सुरक्षित सुगन्ध से भर जायेगा।

परन्तु साँसारिक, तुच्छ, स्वार्थपूर्ण इन्द्रियों के सुखोपभोग करने की अभिलाषाएं करें तो वही अशान्ति और क्लेश का रूप धारण करके अंधेरी रात के समान सामने आ खड़ी होगी। ऐसी अभिलाषाएं मनुष्य जीवन के लिये अभिशाप ही हो सकती हैं।


स्वरयोग से रोग निवारण

(ले. श्री नारायण प्रसाद तिवारी ‘उज्ज्वल’ कान्हीवाड़ा)

मैस्मरेज्म, हिप्नोटिज्म, ऑकल्ट साइन्स आदि सब इसी के अन्तरंग हैं तथा स्वर योग भी योग का एक अंग है। स्वास्थ्यनाशक रोगों का उपचार स्वरयोग द्वारा किया जा सकता है, औषधियों की अपेक्षा यदि कोई श्रद्धा और योग शक्ति से या ईश्वर शक्ति को अन्दर में उतार कर रोग से पूरी तरह छुटकारा पा सके तो इससे केवल द्रव्य ही की बचत नहीं किन्तु मनुष्य सुखपूर्वक पूर्णायु भोगने योग्य भी होता है। प्रकृति देवी के सहारे रहने वाले एक ग्रामवासी को कृत्रिम सभ्य कहलाने वाले शहर निवासी की अपेक्षा आप अधिक स्वस्थ तथा हृष्ट पुष्ट देखेंगे वह अनपढ़ तथा अज्ञानी होते हुए अव्यक्त रूप से प्रकृति का सहारा लेता है। इसी सिद्धान्त पर अब मैं सूक्ष्म रूप से उन उपायों का वर्णन करूंगा। जो रोग निवारण के लिए ईश्वरीय शक्ति पर निर्भर है।

मानव शारीरिक शक्ति, प्राण शक्ति का एक रूप है और योगक्रिया बहुत कुछ प्राण शक्ति पर अवलंबित है। योग द्वारा रोग मोचन के अनेक रूप हैं जो भद्दे से भद्दे झाड़-फूँक से लेकर मैस्मरेज्म, हिप्नोटिज्म टेलीपैथी स्प्रिचुआलिज्म जैसे प्रचलित परिष्कृत तक हैं। प्रकृति दजडडडडड वायु शक्ति और सूर्य रश्मि सब के लिये मुक्त है और प्रत्येक पुरुष उदारता से इनका सदुपयोग कर लाभ प्राप्त कर सकता है।

चूहे मरने पर संक्रामक रोग प्लेग का भय होता है, जब बदन में अंगड़ाइयाँ आती हैं, दर्द होता है तो बुखार की सूचना होती है। छींकें आरम्भ होती हैं। जुकाम का नोटिस मिलता है आदि ऐसे लक्षण विशेष भास होने पर रोग विशेष के आक्रमण की शंका हुआ करती है। शारीरिक रोग इस बात का चिन्ह हैं कि शरीर में कहीं कुछ अपूर्णता या दुर्बलता है अथवा भौतिक प्रकृति विरोधी शक्तियों के स्पर्श के लिये कहीं से खुली है हुई तो यह स्पष्ट है कि रोग बाहर से हमारे अन्दर आते हैं। जब ये आते हैं तभी यदि कोई इनके आने का अनुभव कर सके और इनके शरीर में प्रवेश करने के पहले ही इन्हें दूर फेंक देने की शक्ति और अभ्यास उसमें हो जाय तो ऐसा व्यक्ति रोग से मुक्त रह सकता है जब यह आक्रमण अन्दर से उठता हुआ दिखाई देता है तो समझना यही चाहिये कि आया तो बाहर से है पर अब चेतना में प्रवेश करने के पहले पकड़ा नहीं जा सका, इस प्रकार रोग शरीर को आक्राँत कर लेता है इस भौतिक शरीर में रोग घुसने के पहले ही इसे रोक दिया जा सकता है, और यह क्रिया स्वर योग द्वारा सरलता तथा सफलतापूर्वक की जा सकती है, यहाँ यह शंका हो सकती है कि स्वर योग में ऐसी क्या खूबी है, समाधान यह है कि समस्त रोग शरीर में सूक्ष्म चेतना और सूक्ष्म शरीर के ज्ञान तन्तुमय या प्राण भौतिक कोष द्वारा प्रवेश करते हैं। जिसे भी सूक्ष्म शरीर का ज्ञान है अथवा सूक्ष्म चेतना से सचेतन है वह रोगों को रास्ते में ही अटका सकता है, हाँ यह सम्भव हो सकता है कि निद्रावस्था में अथवा अचेतन अवस्था में जब कि आप असावधान हैं कोई कोई रोग आकस्मिक आक्रमण करें दे प्रायः शत्रु इसी प्रकार वार करते हैं किन्तु फिर भी आँतरिक साधन द्वारा प्रथम आत्मरक्षा के लिये शत्रु प्रहार को वहीं रोक कर वहाँ से भगाया जा सकता है। स्वर योग द्वारा रोग के लक्षणों का तनिक भी आभास न होने पर भविष्य का ज्ञान होकर उससे बचने का भी उपाय हो सकता है।

इच्छा शक्ति के दो भेद हैं ऑटो सजेशन और सैल्फ सजेशन। अर्थात् झाड़ फूँक, तंत्र, मंत्र आदि द्वारा दूसरों को भला चंगा करना ऑटो सजेशन है। स्वर योग सैल्फ सजेशन है।

निःसंदेह रोग पर अंदर से क्रिया की जा सकती है परन्तु कार्य सदा सहज नहीं होता। कारण जड़ प्रकृति बहुत अधिक प्रतिरोध किया करती है, इसमें अकथ प्रयत्न की आवश्यकता है संभवतः आरम्भ में यह प्रयास असफल प्रतीत हों किन्तु क्रमशः अभ्यास करने पर शरीर या किसी रोग विशेष पर नियंत्रण करने की शक्ति बढ़ जाती है और रोग के आकस्मिक आक्रमण को आँतरिक साधनों के द्वारा आराम कर लेना सहज हो जाता है, हाँ जीर्ण रोग का अंतः क्रिया द्वारा उपचार करना आरम्भ में कठिन अवश्य है, किंतु फिर भी शरीर की सामाजिक अस्वस्थता सहज में दूर होकर लाभ हो सकता है, यह भी सफलता प्राप्ति की एक सीढ़ी है इसके बाद अपने अभ्यास को बढ़ाओं कि तुम्हें पूर्ण सफलता प्राप्त हो।

श्वास विज्ञान में प्रधानता इस बात की है कि श्वास सदा नाक से ली जावे जिसे मुँह से श्वास लेने की आदत हो उसे छोड़ दे तब आगे अभ्यास करे श्वास लेने के अवयवों की रक्षा की सामग्री प्रकृतिप्रदत्त है किंतु मुँह से लेकर फेफड़े तक ऐसी कोई चीज नहीं है जो हवा को छान करके साफ करे, मुँह से श्वास लेने में जब सर्द हवा फेफड़ों में पहुँचती है तो भारी क्षति पहुंचती है यहाँ तक कि श्वास अवयवों में प्रायः सूजन आ जाती है और नाक के नथुनों से कम काम लिये जाने के कारण वे साफ नहीं रहते और नासिका सम्बन्धी रोग हो जाया करते हैं।

अपने रोग प्रायः अपान वायु की गड़बड़ी के कारण ही हुआ करते हैं। नाभि से गुदा तक अपान वायु का स्थान है और हम जो श्वास मुख अथवा नाक से लेते है वह नाभि तक जाते है जिसका नाम प्राणवायु है, इस प्रकार नाभी समान वायु का स्थान है और भी वायु का स्थान है और भी वायुओं के पृथक स्थान शरीर में हैं। जिनका रोग और निरोगता से क्या संबंध है यह किसी अगले अंक में वर्णन करूंगा। अपूर्ण


Quotation

जो पाने की आशा से देता है वह नहीं । देना तो वही है जो देने के लिये है। निष्कपट, निस्वार्थ होकर देता है।


माफ कर दो।

(अध्यापक जहूरवख्श)

हजरत अली हजरत मुहम्मद साहब के दामाद और मुसलमानों के चौथे खलीफा थे । अपनी अद्भुत वीरता, न्यायशीलता , दया और उदारता के कारण उनका नाम सदैव इतिहास के पृष्ठों पर चमकता रहेगा। परन्तु , यह संसार भी एक विचित्र पहेली है। इसमें हजरत अली -जैसे सज्जन को भी शत्रुओं से सामना करना पड़ा । उनके इन शत्रुओं में इब्न मुलजिम तो बड़ा ही भयानक निकला। उसने हजरत अली के प्राण लेकर ही शान्ति-लाभ किया। वह पहले उनके लश्कर में था और लड़- झगड़ कर भाग गया था।

एक दिन हजरत अली कूफा नगर की मस्जिद में सुबह की नमाज पढ़ रहे थे। जिस समय सब लोग सिजदा करने झुके, वहाँ सहसा इब्न मुलजिम आ पहुँचा। उसने झपटकर हजरत अली पर हमला किया और जहर की बुझी हुई तलवार से उनको तीन जगह घायल कर दिया।

नमाज खतम होते ही कुछ लोग तो हजरत अली को संभालने में लगे और कुछ लोग तो इब्न मुलजिम के पीछे दौड़े। थोड़ी दूर जाकर उन्होंने इब्न मुलजिम को पकड़ लिया और वे उसे हजरत अली के सामने ले आये। इसी समय लोग हजरत अली के लिये शरबत का प्याला तैयार करके लाये। हजरत ने फरमाया -“ यह शरबत पहले इब्न मुलजिम को पिलाओ। वह दौड़ते-दौड़ते हाँफने लगा है। और प्यासा मालूम होता है।”

घाव बहुत गहरे लगे थे। जब हजरत अली का अन्तिम समय निकट आ गया, तब उनके प्रेमियों ने उनसे पूछा-”आप अपने खूनी की बावत क्या हुक्म देते हैं?” उन्होंने जवाब दिया-”अगर मेरा कहना मानो, तो उसे माफ कर देना।”


सुमन की सुगन्ध

(ले. श्री. आत्माराम देवकर, हटा, दमोह)

सुमन कोमल और सुगंधित होता है। सुमन का अर्थ सुन्दर स्वच्छ मन भी है। जो स्वामी तुलसीदास जी ने संतों के हृदय को जल के समान निर्मल और नवनीत (मक्खन) के समान कोमल बताया है। मक्खन अपने दुख से द्रवीभूत हो जाता है। जब तपाया जाय तभी पिघल उठता है। पर सज्जनों का हृदय दूसरों के दुख देखकर भी पिघल उठता है। कई पुष्पों में भी यह गुण होता है। वे संसार का वैभव और प्रकाश उल्लास देखकर हंसते हैं और उस पर कालिमा पुती देखकर मुरझा जाते हैं। कमल का फूल सूर्य निकलते ही खिल जाता है और रात्रि आते ही मुरझा जाता है इस प्रकार के पुष्पों को उच्च श्रेणी में गिना जाता है। उच्च श्रेणी का सुमन (सुन्दर मन) वही है जो दूसरों का वैभव देखकर प्रसन्न होता है और दीन दुखियों को देखकर दुखी होता है।

रामायण कहती है कि “संत हृदय नवनीत समाना। कहा कविन पै कहा न जाना॥ निज परिताप द्रवै नवनीता। पर दुख द्रवै सो संत पुनीता॥” पराये दुखों को देखकर भगवान बुद्ध की तरह जिसका अन्तस्थल रो पड़ता है वास्तव में वह सच्चा संत है। किसी का कष्ट देखकर जो आँसू निकलते हैं उसमें उसके सारे ताप घुलकर वह जाते है और अन्त स्थल परम पवित्र हो जाता।

ऐसे पवित्र सुमनों में मनमोहक सुगन्धि अपने आप आकर्षित हो जाती है। समुद्र में सम्मिलित होने के लिये नदियाँ अपने आप दौड़ पड़ती हैं। दयालु आत्मा में अन्य समस्त गुण अपने आप भर जाते हैं और वह वायु के साथ जब इधर-उधर फैलते हैं तो सुगन्ध कहलाते हैं। इसी सुगंध के आधार पर वे सुमन देवताओं के मस्तक पर चढ़ते हैं।

यदि तुम्हारा मन सुमन है तो उसमें निश्चय ही सद्गुणों की सुगंध भर जायगी और उस सुगंध पर संसार निछावर होगा।


तलवार या प्रेम?

(श्री. बालेश्वर सिंह जी)

किसी पर विजय प्राप्त करने के लिये मनुष्य के पास दो ही साधन उपलब्ध हो सकते हैं। एक तलवार तथा दूसरा प्रेम।

तलवार से किसी को अपने वश में किया जा सकता है, उससे अपना आदेश मनवाया जा सकता है। किन्तु यह विजय क्षणिक है, इससे किसी के हृदय पर अधिकार नहीं जमाया जा सकता है। परास्त मनुष्य तभी तक अपने को परास्त समझता है जब तक वह निर्बल है और उसके पास ईंट का जवाब पत्थर से देने का साधन उपलब्ध नहीं है। वह भीतर ही भीतर ऐसे सुअवसर की प्रतीक्षा में रहता है जब वह अपने शत्रु से बदला लेने में अपने को समर्थ समझ सके। और एक न एक दिन उसे ऐसा अवसर मिल ही जाता है।

प्रेम से प्राप्त किया हुआ अधिकार स्थायी होता है। विजयी न अपने को विजयी समझता है और न विजित अपने को विजित। वे सदा के लिये सच्चे मित्र बन जाते है। एक के हृदय पर दूसरे का अटल अधिकार हो जाता है।

शक्तिशाली लोग तलवार का प्रयोग इसलिये करते हैं कि उनकी शक्ति को अपने काम में ला सके। यह कार्य प्रेम से भी हो सकता है। राम के साथ बानरों की असंख्य सेना, ईसा और बुद्ध के अनगित अनुयायी गान्धी के अनेक सत्याग्रही इस बात के साक्षी हैं कि प्रेम का बन्धन तलवार के भय से प्रबल है।

आप दूसरों को अपना सहायक बनाना चाहते हैं, उनकी शक्ति का उपयोग करना चाहते हैं, यश या ऐश्वर्य चाहते हैं तो प्रेम शस्त्र को अपनाइये यह तलवार की अपेक्षा सैंकड़ों गुनी शक्ति रखता है।


अहंभाव का प्रसार करो।

(ले. शिवनारायण शर्मा हैडमास्टर, माईथान आगरा)

वान प्रस्थ आश्रम

ब्रह्मचर्य अवस्था में विद्या (ज्ञान) संग्रह करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते हैं, फिर आश्रमोचित अनेक प्रकार के कर्तव्य सम्पादन करके कर्म द्वारा ज्ञान का परिपाक साधन पूर्वक वानप्रस्थाश्रम लेते हैं। फिर संन्यासाश्रम में प्रवेश करके ब्रह्म चिन्ता में मग्न रह कर ब्रह्म में लीन होते हैं। यह प्राचीन प्रथा सार्वजनिक नियम के ऊपर स्थापित और आत्म प्रसार के अनुकूल है। वयोवृद्धि के साथ हमारी देह और मन में अनेक परिवर्तन होते जाते हैं फिर उनके साथ दैहिक और मानसिक क्रिया भी बदलती जाती है। बचपन के सुख-दुख, हर्ष-विषाद, जवानी प्रौढ़ और बुढ़ापे में नये-नये आकार धारण करते हैं। जो-जो वस्तुयें, कार्य और विचार एक अवस्था में अतुल आनन्द वा अत्यन्त दुःख का कारण होती हैं, दूसरी अवस्था में उनकी वह शक्ति नहीं रहती। बालिका, गुड़ियों के खेल, पुत्र कन्या के लालन-पालन में कितने आनन्द से विह्वल है, किंतु युवती उससे परितृप्त नहीं उसे यथार्थ पुत्र कन्या की आवश्यकता है। आत्मा विकास के साथ आत्म तृप्ति करने वाले पदार्थों की सीमा बढ़ाना आवश्यक है। संसार की अनित्यता अनुभव करके, बुढ़िया युवावस्था में जिस पुत्र कन्या रूपी गुड़ियों को लेकर मग्न थी, शायद अब वह उनमें उतनी मुग्ध न रह सके, उसके चित्त की सुख-शाँति के लिये अधिकतर नित्य वस्तु की आवश्यकता होती है।

तत्वज्ञ दूरदर्शी ऋषियों ने विश्व का कल्याण व्रत साधन के उद्देश्य से मानव जीवन चार भागों में विभक्त करके उसका क्रम विकास के उपयोगी कर्तव्य निश्चित किये हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम में ज्ञान का जो संग्रह होता है, गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रम में उसकी उन्नति परिणति एवं संन्यस्त आश्रम उसकी पूर्ण परिणित साधन करते हैं। मुक्ति ही जीवन का उद्देश्य और परिणित है, आत्मा के प्रसार वा विकास की पूर्णता के साथ मुक्ति का कुछ भी प्रभेद नहीं है। जब तक सर्वत्र भेद भाव पुष्ट होता रहे, सर्वत्र एकत्व अनुभव न हो, सारा संसार जब तक एक सूत्र में गुंथित न दिखाई पड़े, तब तक मानव शोक मोह परित्याग कर चिरशान्ति उपयोग का अधिकारी नहीं है। अपना-पराया यह भेद ज्ञान नष्ट होने पर, सर्वत्र एकता का अनुभव होने पर शोक मोह को स्थान फिर कहाँ? एकत्व का अनुभव ही यथार्थ तत्व ज्ञान है और तत्व ज्ञान ही भक्ति का साक्षात कारण है। जगत में सब ही सुख के लिये लालायित हैं किन्तु जिस सुख में दुःख मिला हुआ हो, वह सुख सुख ही नहीं है। यदि दुख रहित या दुःख से निरपेक्ष कोई सुख हो तो वही सुख यथार्थ सुख व शान्ति है, विचार कर देखिये तो किसी भी असीम वस्तु में आप सुख सिद्ध नहीं कर सकेंगे। सीमा पर पहुँचने पर अनन्त विकासशील मानवात्मा मानो हाथ जोड़े हुए, बिलकुल समीपता से, स्तब्धचित्त से करुणामय स्वर से, सतृष्ण नयन से असाध्य प्रार्थना में प्रवृत्त हो रहा है। जब मानवात्मा ससीम प्रदेश में ससीम देशान्तर में पर्यटन करके, असीम साम्राज्य में असीमात्मा के प्रसाद से असीमत्व पर अधिकार करता है, तब ही वह यथार्थ सुख वा शान्ति सम्भोग करता है। ससीम प्रदेश में ही अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति कामना एवं प्राप्त वस्तु के वियोग (नाश) की आशंका रहती है। एवं इस कारण निरन्तर अशान्ति भोगनी पड़ती है। असीम साम्राज्य में अप्राप्त कुछ नहीं है और प्राप्त वस्तु के नाश की आशंका भी नहीं है। अतएव उसी स्थल में सदा सुख और शाँति विराजती है।

ब्रह्मचारी का कार्यक्षेत्र संकीर्ण है आत्मोन्नति साधन ही उसका प्रधान कर्तव्य है। विद्यालय वा गुरुगृह ही उसका विश्व है।

इस संकीर्ण रंग मंच पर उसके जीवन अंश अभिनीत होने की व्यवस्था है। यहाँ वह बिलकुल पराधीन है, उसे जो कुछ करना होगा वह गुरु की अनुमति लेकर ही करना होगा, बिना तर्क के गुरु का उपदेश प्रतिपालन करना होगा। प्रथम मृदु फिर क्रम से कठोर संयम द्वारा शरीर और मन को कार्मोंपयोगी करना होगा। जीवन द्वितीय विभाग के सब कर्तव्य का पालन के लिये ब्रह्मचारी को देह मन जिस प्रकार संगठित करना आवश्यक है, उसी प्रकार संगठित कर लेने पर आर्य ऋषि उसे गृहस्थाश्रम में प्रवेश का अधिकार देते हैं। कर्म क्षेत्र में गृहस्थ को जो तुमुल संग्राम करना होगा, सैंकड़ों अत्याचार अविचार के विरुद्ध उसे खड़ा होना होगा, सैंकड़ों प्रलोभनों को पद दलित करना होगा, अनेक शुद्ध हृदय दुर्बलताओं का त्याग कर कर्तव्य मार्ग पर आगे बढ़ना होगा, साधुओं की सेवा और दुष्कृतों के संस्कार के लिये एवं धर्म की रक्षा के लिये तथा अधर्म के विनाश के लिये उसे सैंकड़ों बार महाविपद में पड़ना होगा, यह विचार कर शिष्य को मंगल कामना से प्राज्ञ और सुदूरदर्शी गुरु उसे धर्म कवच से आच्छादित और कर्म वीरोपयोगी अनेक प्रकार के आग्नेयास्त्र से सुसज्जित कर सैंकड़ों शत्रुओं से क्षोभित संसार समरागंण में प्रेरणा करते हैं। ब्रह्मचारी संकीर्ण कार्यक्षेत्र परित्याग कर अब विस्तीर्ण कार्यक्षेत्र में प्रवेश करता है। कार्यक्षेत्र प्रसारित होने के साथ ही साथ उसके अहंभाव का प्रसार भी होने लगा। स्त्री पुत्र, कन्या, आत्मीय कुटुम्ब, अतिथि, अभ्यागत, दीन दुखी, रोगी, विकलाँग, इत्यादि बहुत से पालन करने योग्य प्राणियों से घिरकर गृहस्थ का अहंभाव दिन दिन फैलने लगा। असंख्य कर्तव्य आकर उसके सामने उदित होने लगे और उन्हें सम्पादन करने के लिये वह अपने मन और प्राण उत्सर्ग करने लगे। कार्यक्षेत्र में वे अनुभव करने लगे कि देह के किसी अंग का अमंगल होने पर सारा शरीर पीड़ित वा अमंगल ग्रस्त हो जाता है। मन की कोई एक वृत्ति विकृत होने से सारी वृत्तियाँ उसकी छूत से थोड़ी बहुत विकृत हो जाती हैं। परिवार में किसी एक का अकल्याण होने से समग्र समाज का अभ्युदय गिर जाता है। एवं समाज विशेष का अमंगल समग्र मानव समाज की अमंगल का भागी बनाता है। वह अनुभव कर सकते हैं कि यह मेरा नर-जीवन विश्व जीवन का ही एक अंशमात्र है एवं वृक्ष, लता पशु, पक्षी, कीट पतंग इत्यादि सबके मंगल के साथ मानव जाति का मंगल अति घनिष्ठ भाव से सम्बन्ध है। वह अनुभव करने लगता है कि क्या सजीव क्या निर्जीव सारा विश्व ही मानव जीवन से मिला हुआ है। कर्म द्वारा उसके ज्ञान का जितना परिपाक होने लगा उतना ही वह ब्रह्म से स्तम्ब पर्यन्त एक सूत्र में गुंथित देखने लगा,उतना ही वह सर्वत्र एकत्व अनुभव करने लगा। किन्तु हाय। जिस तरह घनघोर घटा। से छाई हुई अमावस की अंधेरी रात में क्षण-प्रभा क्षण काल के लिये अन्धकार दूर करके दूसरे क्षण ही असीम आकाश में विलीन हो जाती है उसी प्रकार आत्मतत्व विरोधिनी माया द्वारा आच्छन्न जीव के चित्त में अद्वैत का विवेक क्षण भर के लिए चमक कर फिर विलीन हो जाता है।

कार्यक्षेत्र में प्रवेश करने पर मैं को जिस तरह जगत के साथ अच्छी तरह मिला हुआ देखते है, उस तरह कभी एकदम उस मैं का परित्याग नहीं कर सकते। कार्यक्षेत्र में रहने “हमारी देह”, “हमारा घर”, “हमारा पुत्र”, “हमारी प्रज्ञा”, “हमारा धर्म”, “हमारा कर्म” इत्यादि सर्वत्र ही हमारा हमारा भाव आ पड़ते हैं। मैं को सर्वत्र प्रसारित करना चाहिये किन्तु उसे जितना ही प्रसारित करो, ‘मुझ से’ ‘मैं’ रख देने से वह फिर सब ही मेरा मेरा कर डालता है। यह मेरा (अपना) अंश नष्ट कर देने के लिये ही वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की आवश्यकता है।

अतएव मैं संसार का परित्याग कर अरण्य- प्रवेश करूंगा। “मेरा” कहने के लिये अपना कुछ भी न रखूँगा। अथवा समग्र विश्व ही अपना करूंगा। दिव्य चक्षु सम्पन्न परमर्षियों ने यह सब जानकर ही हमारी इस वयप्य में अरण्याश्रय की व्यवस्था की थी कि गृहस्थ जब त्वचा की शिथिलता, केशों की सफेदी और पुत्र का पुत्र (नाती) देख ले, तब अरण्य का आश्रय करे। (मनु)

वानप्रस्थाश्रम लेने पर बन में “अपना” कुछ नहीं कह सकेंगे, विषय सम्पत्ति सब त्याग देंगे। स्त्री-पुत्र आत्मीज-स्वजन सबके साथ पार्थिक सम्बन्ध त्याग करें। उस समय अपनी भार्या यदि वानप्रस्थ आश्रम के संन्यास में सहधर्मिणी होना चाहे तो उसे भी साथ ले जा सकते हैं। वे जनपद का विलास त्यागकर एकान्त निर्जन में वास करें। सर्वदा विश्व की मंगल चिंता में लीन रहे सब भूतों में समदर्शी हों। उपनिषदादि आध्यात्मिक ग्रन्थों का पठन श्रवण करते रहें और परमब्रह्म की परम चिन्ता में मग्न रहें। जीवन के तृतीयाँश में इस तरह देह मन इत्यादि संयत रखकर सब भूतों में हिंसा विवर्जित होकर ज्ञानलोचन और ज्ञान वितरण द्वारा जगत का मंगल साधन कर बनी (लोकाकय के निकट) होने पर भी किसी निर्दिष्ट एकान्त स्थान में जीवन यापन करें फिर जीवन के चतुर्थांश में संन्यास व भिक्षु आश्रम ग्रहण करें।


Quotation

जिस प्रकार पहले सूर्योदय और फिर मध्याह्न होता है। उसी प्रकार पहले विश्वास और पीछे ज्ञान होता है। विश्वास के बिना कोई मनुष्य साहसी और शक्तिशाली नहीं हो सकता।

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“दूसरे भले ही न समझें पर हम तो इस कलह से दूर ही रहेंगे” जो ऐसा समझते हैं उनका द्वेष और कलह शान्त हो जाता है।

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दूसरों से अपनी निंदा सुनकर उद्विग्न मत होओ क्योंकि किसी की निन्दा से कोई हीन नहीं हो जाता। संसार में एक भी ऐसा महापुरुष न मिलेगा जिसके निन्दक न हों।

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सदा भूत और भविष्य के चिन्तन में लगे रहने वाले व्यक्ति एक प्रकार के शेखचिल्ली हैं। बुद्धिमान वह है जो भूत के अनुभव और भविष्य की आज्ञा के आधार पर वर्तमान का निर्माण करता है।


पर्दे और झंडे की लड़ाई

(महात्मा शेखसादी के गुलिस्ताँ से अनुवादित)

बगदाद शहर के राजा के यहाँ एक कीमती कपड़े का थान पहुंचा। राजा ने उसे बहुत पसन्द किया और उसमें से आधे कपड़े का डयोढ़ि यों पर टाँगने का पर्दा और आधे का झण्डा बनवा दिया।

दानों को अपना-अपना काम करते बहुत दिन हो गये। एक दिन संयोगवश दोनों एक ही स्थान पर फिर एकत्रित हो गये। किसी सिपाही ने बाँस में लगे हुए उस झंडे को डयोढ़ी के दरवाजे के पास ही ला रखा था।

बहुत दिनों बाद आपस में मिलने पर उन्हें बड़ी खुशी हुई और आपस में कुशल समाचार पूछने लगे।

पर्दे के पूछने पर झंडे ने कहा-भाई क्या कहूँ? मुझे थोड़ी देर के लिये भी चैन नहीं मिलता। वक्त बे वक्त सदा ही चलता रहता हूँ। रास्ते की धूल उड़-उड़ कर मुझ पर पड़ती है और थकावट से बेचैन रहता हूँ। किन्तु तुम्हारा भाग्य धन्य है जो राज दरबार के द्वार पर आनन्द के साथ रहते हो और किसी प्रकार का कष्ट न उठाकर शान्ति की जिंदगी बिताते हो।

हम तुम एक ही जगह पैदा हुये हैं और एक ही राजा के काम आते हैं परन्तु तुम आराम की और मैं मुसीबत की जिन्दगी काटता हूँ। इसका क्या कारण है? क्या तुम बता सकते हो?

पर्दे ने उत्तर दिया- मैं चौखट पर शिर रखता हूँ। और तुम आकाश में शिर उठाते हो।

नम्र होकर चलने वाले, दुनिया के सामने विनय के साथ गरदन झुकाने वाले, शान्ति और संतोष का जीवन बिताते हैं, उच्च स्थान पर सम्मान पाते हैं, किन्तु जिनका शिर घमंड से आकाश में उड़ता है उन पर धूल पड़ती है और थक कर शिर पटकते रहते हैं।


पुनर्जन्म की प्रत्यक्ष घटना

(ले. श्री पं. भोजराजजी शुक्ल, ऐत्मादपुर, आगरा)

गीता कहती है कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे नये वस्त्रों को ग्रहण करता है वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होता है। परन्तु अविश्वासी लोगों को पुनर्जन्म पर विश्वास कराने के लिये मैं स्वयं देखी हुई घटना का उल्लेख करता हूँ।

मैने सुना मेरे यहाँ से दो मील के अन्तर पर मोहम्मदाबाद गाँव में लोधा जाति के मनुष्य के यहाँ एक कन्या अपने पिछले जन्म का हाल कहती है, जब लकड़ी 6 वर्ष की हुई तब एक दिन अपने माता−पिता से कहने लगी कि मैं तुम्हारे यहाँ की कच्ची रसोई नहीं खाया करूंगी, मेरे लिये पक्की रसोई बना दिया करो। इस पर उसके माता-पिता ने पूछा तू कच्ची रसोई क्यों नहीं खाना चाहती? उस लड़की ने उत्तर दिया कि मैं जाति की ब्राह्मणी हूँ तुम्हारे हाथ की रोटी नहीं खा सकती, उसके माता-पिता ने कहा तू कहाँ की ब्राह्मणी है अपना पूरा पता बतला? इस पर उसने उत्तर दिया कि मैं शहर आगरे के मुहल्ला जीन की मण्डी की रहने वाली ब्राह्मणी हूँ मेरे लड़के का नाम तेजसिंह है जो कि मील में नौकर है। इस बात को सुनकर लड़की का पिता लड़की को लेकर और भी चार मनुष्यों के साथ रेलगाड़ी से आगरे गया। ट्रेन से आगरा सिटी स्टेशन पर उतर कर लड़की से कहा गया कि तू आगे-आगे जीन की मण्डी को चल हम सब तेरे पीछे-पीछे चलेंगे लड़की जीन की मण्डी को चल दी वहाँ पहुंचकर दो चार घरों को देखने के बाद एक घर के सामने नींव का वृक्ष देखकर उस घर में चली गई अन्दर जाकर अपनी पुत्र वधू का हाथ पकड़कर बोली कि ‘बहू तू अच्छी तरह है मैं तेरी सास हूँ’ तेजसिंह की स्त्री उस लड़की से बात चीत करने लगी। इधर उस लड़की के पिता ने मील से तेजसिंह को बुलाया। तेजसिंह के साथ 10 से 15 आदमी और भी इस आश्चर्यान्वित घटना देखने को चले आये। लड़की के पिता ने तेजसिंह को उन आदमियों के बीच में खड़ी करके लड़की को मकान के अन्दर से बुलवा कर लड़की से कहा कि तू अपने बेटे को पहिचान। लड़की ने पहले तो गौर से उन सब आदमियों को देखा फिर झट उसने तेजसिंह का हाथ पकड़कर कहा कि यह मेरा बेटा तेजसिंह है। इस पर तेजसिंह बोला कि तू कोई गुप्त बता बतला जिससे मैं विश्वास कर लूँ कि तू मेरी माँ है? लड़की बोली कि घर के अमुक स्थान में एक लोटे में चाँदी की हमेल और 40) रु0 जमीन में गढ़े हैं तू उखाड़ ला। तेजसिंह घर में गया थोड़ी देर उस लोटे को उखाड़ कर ले आया सचमुच उस लोटे में हमेल तथा 40)रु0 थे। तेजसिंह ने उस लड़की से कहा कि तू इस हमेल को अपने पहनने के लिये ले जा, लड़की ने उत्तर दिया कि मैं क्या करूंगी तुम्हीं अपने पास रखो यह सब चरित्र देखकर लड़की का पिता लड़की को लेकर अपने मकान को चला आया, तबसे उस लड़की को वह पक्की रसोई खिलाने लगा। यह सब बातें सुन कर मेरी इच्छा हुई कि मोहम्मदाबाद जाकर इस घटना की जाँच करनी चाहिये।

अतएव एक दिन शाम को मैं चल दिया तथा और भी प्रतिष्ठित लोग चले। स्थानीय डॉक्टर सहित कम्पाउंडर साहब, हैडमास्टर साहब मिडिल स्कूल, सब रजिस्ट्रार साहब एक वकील साहब कई महाशय भी मोहम्मदाबाद पहुँचकर एक वैश्य महाशय के मकान पर उस लड़की को बुलाया गया वह अपने पिता के साथ आई उसका पिता तो जमीन पर बैठ गया, परन्तु वह लड़की मेरे पास जो एक खाली मूढ़ा था उस मूढे पर जाकर बैठ गई। मुझे तभी प्रतीत हो गया कि इस लड़की के अंतःकरण में ब्राह्मण शरीर के संस्कार मौजूद है लड़की से मैंने कहा कि बेटी! तुम अपने पिछले जन्म का सच्चा-सच्चा हाल मुझसे कहो उस लड़की ने पिछली लिखी हुई कुल बाते मुझे सुनाई मैंने फिर प्रश्न किया कि तुम किस बीमारी में अपने घर के किस स्थान में मरी थी उसने उत्तर दिया कि मैं ज्वर से घर के उस कोने में मरी थी जिसमें श्री देवी जी की मूर्ति स्थापित है फिर मैंने और भी निश्चय करने के लिये उस लड़की से यह प्रश्न किया कि तुम्हारे पति का क्या नाम है उसने नाम लेने में संकोच किया, इस पर मैंने उससे कहा कि नाम बताने में कुछ हर्ज नहीं तुम ब्राह्मणी शरीर में अब नहीं हो, लोधा जाति के शरीर में कन्या रूप में हो उस लड़की ने धीमे-धीमे स्वर से अपने पति का नाम प्रेमसिंह बतला दिया। अब मैंने उससे यह बनावटी प्रश्न किया कि मैं भी जीन की मण्डी में रहता हूँ तुम्हारा घर मेरे पड़ौस में है, मैं अक्सर तुम्हारे पति प्रेमसिंह के पास जाया करता था मेरा उनका प्रेम था तुम मकान से मेरे लिये पान लगा कर भेजा करती थी, क्या तुमको याद है? इस पर उस लड़की ने साफ-साफ कह दिया कि बाबा! मैंने तुमको कभी भी अपने मकान पर नहीं देखा। मैंने तो आज ही आपको देखा है इस प्रश्न से सब लोगों को लड़की की बातों पर और भी विश्वास हो गया। लड़की ने सबके सामने अपने आप मुझसे यह भी कहा कि मेरे पिता मेरा विवाह न करें मैं इनके यहाँ कुछ ही वर्ष और जिन्दा रहकर जैनी वैश्य के यहाँ जन्म लूँगी इसके पश्चात डॉक्टर साहब ने उस लड़की के सिर और मस्तिष्क की परीक्षा की कोई विशेष बात नहीं पाई गई, मैंने उस लड़की के पिता से कहा कि तुम्हारे धन्य भाग है कि तुम्हारे यहाँ देवी जी की उपासक ब्राह्मणी ने जन्म लिया है तुम इसको पक्की ही रसोई खिलाना इसको दुःख मत देना इसी से तुम फलो फूलोगे कभी तंग नहीं रहोगे। लड़की अभी तक मोहम्मदाबाद में मौजूद है जो चाहे परिक्षा कर सकते है।

पाप और पारा कोई पचा नहीं सकता। यदि पारा खाया जायगा तो वह किसी न किसी दिन शरीर में से फूट कर निकल आवेगा। पाप का भी ऐसा ही परिणाम होता है।


Quotation

चरित्र मनुष्य की निजी सम्पत्ति है। उसके सामने ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ भी तुच्छ हैं। यह ज्ञान वैराग्य और भक्ति से भी परे है। संसार के सब सद्गुण एक ओर और चरित्र दूसरी ओर रख कर तोला जाय तो चरित्र का ही पलड़ा भारी रहेगा। चरित्र ही गुणों की जन्म भूमि है।

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पाप और बुराई से वैसे ही घृणा करो जैसे किसी भारी दुर्गन्ध से करते हो और भलाई से ऐसा ही प्रेम करो जैसे कि किसी सुन्दर वस्तु से करते हो।


आत्मज्ञान से परमशाँति

(ले.-श्री ब्रह्मर्षि समाधिनाथ रामबहाल जी महाराज)

“करोतु भुवने राज्य विशत्वाग्भोदमम्ववा।

नात्मलाभाद्दते जन्तु विश्रान्तिमधिगच्छति॥” चाहे त्रिभुवन का राज्य मिल जाय, चाहे मेघ या जल के भीतर कोई प्रवेश कर ले, आत्म ज्ञान की प्राप्ति के बिना किसी को भी शान्ति नहीं मिलती। जो अपना कल्याण करना चाहता हो उसको चाहिये कि आत्म-ज्ञान के लिये प्रयत्न करे क्योंकि सब दुखों का नाश आत्मानुभव से होता है। यदि परम आत्मा का ज्ञान हो जाय तो सारे दुख का प्रवाह इस प्रकार नष्ट हो जायगा जिस प्रकार विष का प्रवाह खतम होते ही पियूचि का रोग शान्त हो जाता है। चित्त की शुद्धि से ही आत्मज्ञान होता है। सबसे पहली बात जो साधक को करनी चाहिये वह है मन की शुद्धि। क्योंकि बिना चित्त के शुद्ध हुए उसमें आत्मा का प्रकाश नहीं होता। मन शुद्ध हुए बिना न शास्त्र ही समझ में आते हैं और न गुरु के वाक्य, आत्मानुभव होना तो दूर रहा। इसलिये कहा है- “पूर्व राघव शास्त्रेण वैराग्येण परेणच।” तथा “सज्जन संगेन नीयताँ पुण्यताँ मनः।” सबसे पहले शास्त्रों के श्रवण से सज्जनों के सत्संग से और परम वैराग्य से मन को पवित्र करो। वैराग्य शास्त्र और उदारता आदि गुणरूपी यत्न से आपत्तियों को मिटाने के लिये आप ही मन को शुद्ध बनाना चाहिए।

शास्त्राध्ययन सज्जनों के संग और शुत कर्मों के करने से जिनके पाप दूर हो गये हैं उनकी बुद्धि दीपक के समान चमकने वाली होकर सार वस्तु को जानने के योग्य हो जाती है। जब भोगों की वासनाएं त्यागकर देने पर इन्द्रियों की कुत्सित वृत्तियों के रुक जाने पर मन शान्त हो जाता है तब ही गुरु की शुद्धि वाणी मन में प्रवेश करती है, जैसे कि केसर के जल के छींटे श्वेत और धुले हुए रेशम पर ही लगते हैं। जब मन से वासना रूपी मल दूर हो गया तभी कमल दण्ड से तीर के समान गुरु वाक्य हृदय में प्रवेश करते हैं।


मैस्मरेजम की उच्च कक्षा

(प्रो. धीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती, बी. एस. सी.)

गत एक वर्ष से अखंड ज्योति के पाठको को मैस्मरेजम और प्राण विद्या की थोड़ी बहुत जानकारी लगातार हर अंक में कराता रहा हूँ। अब तक बताये गये अभ्यासों के अनुसार साधक अपने अन्दर आत्म विद्युत को जागृत कर सकते हैं और उसके द्वारा दूसरों की शारीरिक तथा मानसिक सेवा एवं अपनी मानसिक उन्नति कर सकते हैं। वह शक्ति रोग निवारण के लिए अद्भुत है। कितने ही भयंकर रोगों को इस शक्ति की सहायता से अपने तथा दूसरों के द्वारा अच्छा होता देखा है।

दूसरों को प्रभावित करना प्राण विद्या का कुछ ऊंचा दर्जा है। तन्त्र शास्त्रों में वशीकरण (किसी को अपने काबू में कर लेना उससे इच्छानुसार काम लेना) स्तम्भन (जड़वत् बना देना) मोहन (मोहित कर लेना) उच्चाटन (किसी स्थान पर से उखाड़ देना) पीड़न (बीमार कर देना या अन्य कष्ट देना) भ्रामन (भ्रम में डाल देना, पागल कर देना) मारण (प्राण ले लेना) आदि जिन क्रियाओं का वर्णन है उनकी क्रिया परकाया प्रवेश विधि से होती हैं। सिद्ध अपनी आत्मशक्ति को इतनी संतुलित कर लेता है कि उसके दूसरों के शरीर में चाहे जितनी मात्रा में प्रविष्ट कर दिया जाय। इस प्रकार का प्रेषण दूसरे व्यक्ति के शरीर और मन पर काबू पा लेता है जिसके आधार पर उसे भ्रान्त, मोहित तथा मृतक तक बनाया जा सकता है।

तन्वों में नीच और पापपूर्ण विधियाँ ही हों सो बात नहीं है। मूल शक्ति में कुछ दोष नहीं है। अच्छाई या बुराई तो उसके प्रयोग में है। सुई को कपड़े सीने के काम में लिया जाय तो सुन्दर वस्त्र बन सकते हैं किन्तु यदि उसे किसी की आंखों में घुसेड़ दिया जाय तो उसे अन्धा बनाया जा सकता है। इसमें शक्ति का कोई दोष नहीं। प्राण शक्ति जहाँ शाप का बल रखती है वहाँ वरदान की ताकत भी उसके अन्दर है। हमारे प्राचीन पुराण इतिहास ऐसी साक्षियों से भरे पड़े हैं। जो प्रमाणित करती हैं कि ऋषियों-उच्च आत्माओं की आन्तरिक आशीर्वादों से अद्भुत और अलौकिक कार्य भी हुये हैं। एक क्षण पूर्व जो व्यक्ति साधारण काम भी नहीं कर सकता था दूसरे ही क्षण वह कई गुना बलवान हो गया और जिन कार्यों में सफलता प्राप्त करके उसके लिये असंभव था उस कार्य को उसने पूरा कर डाला इस प्रकार के अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं।

बात यह है कि बलवान आत्मशक्ति वाले महापुरुष अपना प्राण बल कुछ अधिक मात्रा में पराई काया में प्रवेश कर देते हैं। बहुत ऊंचे आदमी तो भगवान शंकराचार्य की तरह अपनी शरीर को पूर्णता छोड़कर दूसरे मृतक शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। पर यह बहुत ही ऊंची चीज है। पाठकों से इतने ऊंचे उठ जाने की अभी हमें आशा नहीं है और न स्वयं हमारी ही वहाँ तक गति है।

साधारण अभ्यासी इतना कर सकते हैं कि दूसरों के शरीर में अपना प्राण प्रवेश करके उसके बुरे विचारों, दूषित आदतों, रोगों, या कमजोरियों को दूर करें। क्योंकि यह सब विजातीय और अप्राकृतिक होने के कारण बहुत ही निर्बल और सुगमता से दूर होने वाले होते हैं। सत्य विचारों में दोषी विचारों की अपेक्षा हजारों गुनी दृढ़ता होती हैं इसलिए उन्हें कोई आसानी से नहीं डिगा सकता।

तुम कुछ दिनों के प्रयोग के बाद किन्हीं व्यक्तियों की कुटेवें छुड़ा सकते हो किन्तु किसी सती साध्वी स्त्री को सत्य से डिगाना चाहो, ईश्वर भक्ति एवं ईमानदारी आदि सद्गुणों से किसी को वंचित करना चाहो तो यह कार्य नहीं हो सकेगा। कुदरत की प्रबल शक्तियाँ तुम्हारे पाप पूर्व कार्य को अपनी टक्करों से कुचल डालेगी। इसलिए अखंड ज्योति के पाठको को हम प्राण विद्या द्वारा परकाया प्रवेश की एक नियत सीमा तक ही जाने देना चाहते हैं। दूसरों की बीमारियों को दूर किया जा सके, स्वयं निरोग रहा जा सके, बालकों या स्त्रियों पर शुभ संस्कार डाले जा सकें, लोगों के भ्रम या मानसिक दुर्बलता दूर की जा सके। कुटेवें छुड़ा जा सके, उच्च गुणों की ओर उत्साहित किया जा सके, बस इतनी सीमा साधारण अभ्यासियों के लिये काफी है। यह प्राण प्रवेश दूसरों को निद्रित करके, सजग अवस्था में, पास रहते हुए, दूर रहकर, सोते समय व अन्य सब परिस्थितियों में हो सकता है।

यह दुरूह और गुप्त विज्ञान हर किसी से कहने का नहीं है। जो अधिकारी हो वही इस विद्या से लाभ उठाएं इसलिये हमने निश्चय किया है कि आगे का विषय अखंड ज्योति में न छापा जाय और वह पुस्तक के रूप में अलग से प्रकाशित कर दिया जाय। पाठको को यह जानकर प्रसन्न होना चाहियें कि हमारी सलाह से अखंड ज्योति संपादक ने इस गुप्त विषय को हम लोगों के बीस वर्ष के अनुभव के आधार पर ‘प्राण चिकित्साविज्ञान’ और ‘परकाया-प्रवेश’ नामक पुस्तकों की रचना कर दी है। जो चाहें उनसे लाभ उठा सकते हैं।


Quotation

जो पाप प्रकट हो जाते हैं वे बदनामी देकर नष्ट हो जाते हैं। इसलिये हिम्मत करके अपने पापों को प्रकट कर दो और बदनामी को सिर चढ़ाकर सुखी हो जाओ।

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जो अपने अच्छे कामों के बदले में धन्यवाद वाहवाही अथवा किसी और फल की चाह करता है वह बड़ा अभागा है। क्योंकि बहुमूल्य सत्कर्मों को थोड़ी कीमत पर बेचना चाहता है।

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लोगों को रुला कर जो सम्पत्ति इकट्ठी की जाती है वह आर्तस्वर से रोने की आवाज के साथ ही विदा हो जाती है। पर जो धर्म द्वारा संचित होती है वह बीच में किसी कारणवश क्षीण हो जाने पर भी अन्त में, खूब फलती-फूलती है।


देवत्व का उदय

(ले. डा. शिवरतनलालजी त्रिपाठी, गोला गोकरननाथ)

जब तुम्हें ‘मनुष्य’ कहकर संबोधन किया जाता है या आदर के साथ उच्च आसन पर बिठाया जाता है तब तुम्हें सोचना चाहिए कि यह व्यवहार किसके प्रति हो रहा है? यह व्यवहार हाड़ माँस और मल मूत्रों की दुर्गन्ध भरी गठरी के लिये नहीं किया जाता है। वह वस्तु आत्मा है जिसका आदर किया जाता है, जिसके प्रति प्रकट किया जाता है, जिसके आगे शिर झुकाया जाता है।

अभागा आदमी इस गंदी गठरी को ‘मैं’ समझ बैठता है। जब उसमें से बदबू उठती है तो अपनी बदकिस्मती समझता है और शिर धुनकर रोता है। जब कहीं से कोई तर झोंका आ जाता है तो खुश होता है और अपनी गठरी को और उस पर चिपकी हुई रंग बिरंगी धज्जियों को देखकर फूल उठता है। कभी-कभी तो वह अपनी इन्हीं चीजों पर अभिमान में भी डूब जाता है।

किन्तु जानने वाला जानता है कि इन्द्रियजन्य इच्छाएं और उनकी पूर्ति वैसी ही है। जैसी किसी नाले के पानी की में उठने और विलीन होने वाली छोटी छोटी लहरें। यह काम नासमझ लड़कों को शोभा देता है कि उठने वाली हर लहर के साथ उछलें और उसके समाप्त होते ही हाथ मल-मल कर पछताएं। समझदार आदमी उसे कह सकते है जो पानी पर उठने वाली लहरों के क्षण में पैदा होने और क्षण में विलीन होने की बात जानता है। वह पानी और लहरों की हर एक क्रिया को देखता है और हर नई स्थिति में नया आनन्द प्राप्त करता है। जब तुम अपने स्वरूप को सचमुच समझ जाओगे अपने को सचमुच शरीर से ऊंचा अनुभव करने लगोगे तो देखोगे कि अपने आप तुम्हारे अन्दर एक देवत्व का उदय हो रहा हो और तुम पूर्ण परमात्मा से मिलने के लिये बड़ी तेजी से सरपट दौड़े जा रहे हो।


कीलित मन्त्रों का उत्कीलन

(श्री. रामभरोसे पाठक अध्यापक, नदीगाँव)

एक समय था कि सर्वत्र तांत्रिकों का प्रचण्ड आधिपत्य था, मन्त्र की शक्ति से सर्वसाधारण अपरिचित नहीं थे वरन् उसमें श्रद्धा तथा भक्ति का झुकाव था। डमरा वा तन्त्र का भी बोलबाला था परन्तु समयानुकूल सभी बदल गये। मन्त्र संसार में आज जो दुर्गा सप्तशती का स्थान है तथा इसका प्रभाव है वह सर्व साधारण में गोप्य नहीं है परन्तु वर्तमान समय में कुछ उतावली जिज्ञासुओं ने सर्वसाधारण की यह धारण करा दी है कि सप्तशती के मन्त्र कीलित है एतदर्थ उनका स्फुरण नहीं हो सकता। हाँ! यदि कोई उन्हें सविधि उस कीलन से मुक्त कर दे अर्थात् उत्कीलन हो जाय तो वह मन्त्र आज भी फलप्रद हैं और तात्कालिक फल के देने वाले हैं।

किसी जिज्ञासु को इन मन्त्रों का स्फुरण क्यों नहीं हुआ, यह तो वही जाने परन्तु उनका कहना है कि वे कीलित हैं इससे फलित नहीं होते। और इस का समाधान वे यहाँ से करते हैं कि ‘कीलक’ ‘जो दुर्गा सप्तशती में एक अध्याय है’ में एक मन्त्र हैं। ‘इत्थं रूपेण कीलेन महादेवेन कीलतम्’ उनका कहना है कि श्री महादेव जी ने मन्त्र कील दिये हैं तो क्या महादेव जी को इन मंत्रों का स्फुरण स्वीकार न था कि संसार में प्राणिमात्र का इनसे भी कुछ काम सरे? तथा फिर वह उत्कीलन कहाँ है जिससे वह मन्त्र उससे मुक्त हों।

योगेश्वर श्री शंकर भगवान् आशुतोष हैं सब पर कृपा करते हैं उन्हें संसार के प्राणियों की दशा ज्ञात है वे मृत्युलोक के प्राणियों की दशा से अनभिज्ञ नहीं है एतदर्थ जहाँ ‘महादेवेन कीलितम्’ है उसी के पहिले भगवान ने स्पष्ट कहा है ‘ददाति प्रति गृहृाति’ अर्थात् दो और लो। परस्पर व्यवहार है उनका स्पष्ट कथन है कि श्री जगदम्बा माता के अर्पण करो फिर उन्हीं से लो, यह अर्पण करना क्या है? बस यही कि पहिले कुछ निःस्वार्थ हो कर तो करो कि केवल हाथ फैला कर लेने को ही उत्सुक हो , भजन, पाठ, पूजन, अर्चन, वन्दन, अनुष्ठान इत्यादि सभी कुछ, पहिले निःस्वार्थ भाव से राग रहित हो कर, निष्काम हो कर करो कुछ दिन इसी प्रकार अभ्यास करो तदुपरान्त भगवान योगीश्वर कृष्णा के गीतोक्त कथानुसार जो मुझे जैसे भजता है वैसे ही मैं उसे फल देता हूँ एवं उसकी मनोभावनाएं पूर्ण करता हूँ के कथानुसार आपकी मनोकामनाएं पूर्ण होती चलेगी? इस प्रकार नहीं होगी कि कुछ किया तो है ही नहीं (अर्पण नहीं किया) कि लगे माँगने-हमें धन दो हमें पुत्र दो अमुक मनुष्य की अमुक मनोभिलाषा पूरी हो?

कीलित मन्त्रों का उत्कीलन इतना ही है कि ‘परस्पर दो और लो’ मन्त्रों का स्पष्ट उच्चारण एवं शुद्ध भाव होना अत्यन्त अनिवार्य है अन्यथा विफल हो जाना सम्भव है।


Quotation

साँसारिक भोगों को प्राप्त कर जो उन्हें लेता ही नहीं वह पूरा मनुष्य है। जो लेता है परन्तु लेकर सच्चे पात्रों को दे देता है, वह भी सच्चा है वर वह मनुष्य नष्ट होने वाला है जो लेता है पर देता कुछ नहीं।

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सोने से पहले तीन बातों का हिसाब कर लो तब सोओ। पहले यह सोचो कि आज के दिन कोई पाप तो हमसे नहीं हुआ। दूसरा यह कि कोई उत्तम कार्य हमने किया या नहीं। तीसरी बात यह कि कोई काम करने योग्य हमसे छूट गया या नहीं।

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जैसे जलते हुए पेड़ पर पक्षी नहीं रहते वैसे ही जिस अन्तःकरण में संसार के भोगों की आग सदा जलती रहती है उसमें सत्य, सहानुभूति, और प्रेम नहीं टिकते।


वीर्य रक्षा के उपाय

(पं. राजेन्द्र प्रसाद जैन, हि.सा. विशारद, अनर्दपुर)

मनुष्य जीवन की सार्थकता उसके स्वस्थ और सुदृढ़ होने में है। उत्तम स्वास्थ्य के लिये वीर्य रक्षा आवश्यक है। स्वास्थ्य लाभ, बल बुद्धि का विकास, योगाभ्यास, विद्या पढ़ना, शारीरिक परिश्रम इनमें से वीर्य रक्षा के बिना कोई भी काम ठीक तरह से नहीं हो सकता। उत्साह, बल, स्फूर्ति और निरोगता यह सब बातें वीर्य रक्षा पर ही अवलंबित हैं।

आज कल बहुत से नवयुवक बुरी संगति और बुरे विचारों में पढ़कर वीर्य नष्ट करने लगते हैं अन्त में उन्हें प्रमेह स्वप्नदोष आदि रोग घेर लेते हैं। बहुत सी दवादारु करने पर भी उन्हें विशेष लाभ नहीं होता। इसी प्रकार कुछ नवयुवक इन्द्रिय वेग को रोक सकने में अपने को असमर्थ सा पाते हैं। कितने ही लोग ऐसे हैं जो ब्रह्मचर्य पालन करने की इच्छा रखते हुए भी अपने को काबू में नहीं रख सकते और भ्रष्ट हो जाते हैं।

नीचे कुछ ऐसे बताये जाते हैं जिनका यदि ठीक तौर में पालन किया जाय तो वीर्य रक्षा बड़ी आसानी से हो सकती है। जिन्हें स्वप्नदोष तथा अन्य प्रकार से धातु पात होने का रोग लग गया है, वे भी अच्छे हो सकते हैं।

नियम

(1) भोजन, सात्विक करना चाहिये। मिर्च मसाले, खटाई, अधिक मीठा, गरम चीजें, मद्य माँस आदि त्याग देना चाहिये। नियत समय पर, भूख से कुछ कम मात्रा में ताजा, सादा और सात्विक भोजन खूब चबा-चबा कर खाना चाहिए।

(2) रात को जल्दी सोना और सबेरे जल्दी उठना चाहिये। सूर्योदय से कम से कम एक घंटा पहले उठना आवश्यक है।

(3) पेशाब करके तथा हाथ पैर धोकर कुल्ला करके ईश्वर का चिन्तन करते हुए सोना उचित है।

(4) पति पत्नी को छोड़कर और कोई वयस्क स्त्री पुरुष अकेले बैठकर बातचीत न करें।

(5) जहाँ तक हो सके सदाचारी, ईश्वर भक्त, शुभ कार्य करने वाले तथा उत्तम विचार वाले पुरुषों का सत्संग करना चाहिये। बुरे लोगों की संगति में कदापि न रहें।

(6) प्रातःकाल स्वच्छ वायु में नित्य कई मील पैदल घूमने जाना चाहिये।

(7) मन को हमेशा किसी काम में लगाये रहना चाहिये। बेकार बैठे रहना, आलस्य या प्रमाद में पड़े रहना अनुचित है।

(8) उत्तम कोटि की शिक्षा देने वाली पुस्तकों का ही स्वाध्याय करना चाहिये। कामोत्तेजक या अश्लील पुस्तकों, चित्रों को पास भी नहीं आने देना चाहिये।

(9) मल या मूत्र त्यागने के उपरान्त इन्द्रियों को शीतल जल से धोना चाहिये। स्नान भी जहाँ तक हो सके ठंडे पानी से ही करना चाहिये।

(10) कुछ न कुछ शारीरिक परिश्रम अवश्य करना चाहिये। हो सके तो नियमित रूप से व्यायाम, आसन, प्राणायाम आदि का अभ्यास करना चाहिये।

(11) संसार की नश्वरता का बार-बार चिन्तन करना चाहिये और अपनी मृत्यु को भूलना न चाहिये।

(12) स्त्री को पुरुषों के शरीर में और पुरुषों को स्त्री के शरीर में मलीनता की भावना करनी चाहिये। मन में कल्पना करके शरीर के रक्त, माँस, हड्डी, मल, मूत्र आदि अपवित्र वस्तुओं का स्वरूप देखना चाहिये और जिस स्त्री या पुरुष की ओर मन जाता हो उसके शरीर को घृणित मल मूत्र के पिण्ड रूप में देखना चाहिये।

(13) महीने में कम से कम दो दिन उपवास करना चाहिये। इसके लिये अमावस्या पूर्णमासी या दोनों एकादशी अधिक उपयुक्त हैं।

(14) वीर पुरुषों, ब्रह्मचारियों और कामवासना से दूर रहने वाले लोगों के चरित्रों का मनन करना चाहिये।

(15) जब इन्द्रियों का वेग प्रबल हो रहा हो तो किसी काम में लग जाना चाहिये। या अपने को इष्टदेव, गुरु, माता, पिता आदि पूज्य जनों के सम्मुख खड़े होने की भावना करनी चाहिये।

(16) नियमपूर्वक रोज कुछ समय ईश्वर का भजन अवश्य करना चाहिये।

इन नियमों का पालन करने से वे दुष्ट वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, जिनके कारण अनावश्यक कामोत्तेजना होती हैं। धीरे धीरे हृदय पवित्र होने लगता है और शुभ कर्मों की इच्छा उत्पन्न होती है साथ ही कामवासना के नीच विचार अपने आप दूर होने लगते हैं। इससे वीर्य रक्षा करना सुगम हो जाता है।


आगे के लिये बचाओ।

(इंजील के आधार पर)

एक धनवान मनुष्य था। उसे सब प्रकार के सुख, ऐश्वर्य प्राप्त थे। मखमली वस्त्र और सोने के जेवरों से उसकी देह सजी रहती थी। सारे दिन शौक मौज करने के अतिरिक्त उसके पास और कोई काम न था।

इलियाजर नामक एक कंगाल उसी धनवान का पड़ौसी था। वृद्धावस्था और बीमारी के कारण बेचारा कुछ कर नहीं सकता था इसलिए अपने धनवान पड़ौसी के द्वार पर जाता और उसकी मेज के नीचे भोजन के जो किनके गिर पड़ते उन्हें बीन-बीन कर पेट में डाल लेता। धनी के पास किसी बात की कमी न थी पर उसने कंगाल की हालत पर न तो कभी तरस खाया और न उसकी कुछ मदद की।

इलियाजर धर्मात्मा था। गरीब और अशक्त होने के कारण वह किसी की कुछ सेवा नहीं कर सकता था इससे उसे बड़ा दुख होता। उसके पाँवों में घाव हो गये थे। जब कभी वह कुत्तों को देखता तो उन्हें प्यार से बुलाता और अपने घाव उनके चाटने के लिये खोल देता। अपना थोड़ा सा रक्त माँस कुत्तों को दान करके वह अपने दुख को हलका कर लेता और अपने कष्टों के लिये प्रभु को धन्यवाद देता जिनके कारण वह ईश्वर को हर घड़ी याद करता रहता है।

समय आने पर इलियाजर मरा। थोड़े ही दिन बाद उस धनी को भी मरना पड़ा प्रेत लोक में दोनों ही पहुँचे। धनी को घोर पीड़ाओं से भरे नरक में रखा गया वहाँ वह असहनीय पीड़ायें सहने लगा। ममन्तिक कष्टों से वह तड़प रहा था कि उसकी निगाह दूसरी ओर गई। उसने देखा कि स्वर्ग के देवता इब्राहीम की गोद में इलियाजर बैठा हुआ है और विपुल ऐश्वर्यों का उपभोग कर रहा है।

धनी का गला भर आया। उसने चीखकर इब्राहीम से कहा-हे पिता! दया कर इलियाजर को मेरे पास भेजिये ताकि वह मेरे जलते हुये गले में कुछ पानी की बूँदें डाल दे मैं प्यास के मारे मरा जा रहा हूँ।

इब्राहीम ने कहा-पुत्र! प्रभु का न्याय बड़ा कठोर है उसमें पक्षपात को स्थान नहीं है। तू जीते जी अपनी सम्पत्ति पा चुका। अब अधिक तुझे कैसे मिल सकता है? काश, तूने उस समय बचा कर कुछ इस समय के लिये संचित किया होता तो आज इस तरह यहाँ न तड़पता।


महाबन्ध मुद्रा

(लेखक-श्री. उमेशचन्द्र जी, श्रीराम तीर्थ योगाश्रम)

244 सेन्डहर्स्ट रोड, बम्बई 4

जब साधक योग के अन्तरंग साधन में प्रविष्ट होता है, तय उसे अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होने लगते हैं, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि इन चारों को योग के अंतरंग साधन कहते हैं, प्रत्याहार और धारणादि के अभ्यास काल में कुँडलिनी शक्ति जाग्रत करनी पड़ती हैं, कुण्डलिनी शक्ति के उत्थान के समय में और होने के पश्चात् साधक की बुद्धि अत्यन्त तीव्र हो जाती है, शरीर अत्यन्त तेजोमय बनता है, कुण्डलिनी उत्थान के लिये खेचरी मुद्रा, महामुद्रा, महाबन्ध मुद्रा, महावेद मुद्रा, विपरीत करणी मुद्रा, ताडन मुद्रा, परिधान युक्ति, परिचालन मुद्रा और शक्ति चालन मुद्रा आदि उत्कृष्ट अनेक मुद्राओं का अभ्यास करना पड़ता है। आगे एक ऐसी मुद्रा का उल्लेख किया जाता है।

महाबन्ध मुद्रा करने की रीति

प्रथम बाँया पैर शिवनी (अंडकोष और गुदा का मध्य स्थान) में और दाहिने पैर की एड़ी को बाँये पैर की जंघा के मूल (स्वाधिष्ठान कमल के बाजू) में रखें। बाँई हथेली और दाहिनी हथेली को दाहिने पैर के घुटने पर रखें, कमर पीछे रीढ़ और शिर सीधा रखें, छाती को जरा आगे की तरफ झुका कर रखें, आँखें बन्द रखें, शरीर को साधारण कड़क रखें, फिर दोनों नासिका संघर्षण (एक बार श्वास को फेफड़े में भरना और तुरन्त ही खाली कर देना उसे एक घर्षण कहते हैं) कर के बाँई नासिका से पूरक करें (श्वास भीतर लेना) कुँभक के समय दोनों हाथों से दाहिने पैर के घुटने को पकड़े रहें, जालंधर बंध (दाढ़ी को कंठ कूप में लगाना) रखें। मूल बंध (गुदा को संकोचना) रखें, और यथाशक्ति कुंभक करने के पश्चात् दाहिनी नासिका से शनैः 2 रेचक करे, रेचक के समय में उड्डियान बंध (पेट को अंदर) पीठ की तरफ ले जाना करें कुम्भक समय में उत्कृष्ट भावना करे। जैसे कि- मैं आज से उन्नति मार्ग पर चढ़ रहा हूँ “मेरे शरीर में जो दुर्बलता, अपवित्रता न्यूनता रूपी दोष हैं वह आज से और इसी क्षण से दूर हो रहा है मैं इस दुनिया में आज से शुभ कार्यों में ही जुट गया “सर्व दिशा, सर्व देवता, सर्व प्राणी एवं चराचर वस्तु में से आनन्द ही आनन्द ही लूट रहा हूँ, देख रहा हूँ, सुन रहा हूँ, और उसी में तल्लीन तदाकार हो रहा हूँ” आज से मेरा मन अत्यन्त शुभ स्फटिक मणि के समान परम पवित्र हो रहा है।

जिसे मोक्ष का ही पथिक बनना हो, “तो मेरा पंचप्राण एकत्र हो रहा है” ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र गणपति आदि सर्व देवता मूलाधार चक्र स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्ध चक्र और ब्रह्म रंध्र में अत्यन्त संतप्त हो रहे हैं “स्वाधिष्ठान चक्र में अनेक काल से कर्माशय कोष को वैघृत(वेष्टित) कर गाढ़ी निद्रा में सोई हुई कुण्डलिनी उत्थान होने की तैयारी कर रही है” मूलाधार चक्र से लेकर ब्रह्म रंध्र तक का रास्ता खुल रहा है “सुषुम्ना नाड़ी अत्यन्त शुद्ध होकर प्राण को उर्ध्वगति को ले जाने की तैयारी कर रही है” “सारे शरीर की नाड़ियाँ शुद्ध हो रही हैं” आदि विचार प्रवाह को चालू रखें।

उपरोक्त विधि के अनुसार बायें पैर बाजू से एक वार पूरक, कुँभक, और रेचक होने पर तुरन्त ही पैर को बदली करें। अर्थात् दाहिने पैर को सिवानी में रख और बाँये पैर को दाहिने की जंघा मूल में (उसकी बाजू में रखें) इस समय दाहिनी नासिका में पूरक करे, यथाशक्ति कुम्भक के पश्चात बाँया नासा रंध्र से शनैः 2 रेचक करे। इसी प्रकार एक बार बायीं बाजू और तुरन्त ही दूसरी बार दाहिनी बाजू पाँच-पाँच घर्षणा तथा पूरक कुम्भक और रेचक करें तब एक महाबंध मुद्रा सम्पूर्ण हुई समझना मुद्रा के समय में उत्कृष्ट भावनायें अवश्य करें, और तीन बंध ही नियमित रूप से करें।

पूरक, कुम्भक, रेचक का समय का जिस व्यक्ति को मुद्रा के विषय में अनभिज्ञ हों वे व्यक्ति अनुलोम विलोम प्राणायाम का अभ्यास करें, क्योंकि फेफड़े को एकदम अधिक प्रणाम में परिश्रम नहीं होना चाहिये यद्यपि जिसको बिना प्राणायाम सीखे मुद्रा का अभ्यास करना हो तो वह स्त्री पुरुष मुद्रा के अभ्यास काल में घर्षण खूब जोर से नहीं करें किन्तु सामान्य रूप से करें। एक मात्रा:- एक सेकेंड समझना। भूतकाल में योगाभ्यास नहीं किये हुये स्त्री पुरुष प्रथम थोड़े दिन तक चार मात्रा रेचक करे जैसा-जैसा फेफड़े में विकास इन्द्रिय स्वाधीन, प्राण काबू में मन निरोध, बुद्धि स्थिर, अहंकार शमन तथा चित्त शाँत बनता जाय वैसे 2 मात्रा की संख्या को बढ़ाते जाय सामान्य तथा व्यवहार में कुशलता मिलाने के लिये इच्छा रखने वाले स्त्री पुरुष 16 मात्रा पूरक 34 कुम्भक और 32 मात्रा रेचक करें। मुमुक्षु वर्ग (मोक्ष गामी) होए तो 34 से अधिक मात्रा कुम्भक कर सकते हैं किन्तु कम से कम 16 मात्रा पूरक और 32 मात्रा तक रेचक होना आवश्यक है।

मुद्रा का प्रमाण

4 दिन तक दो बार 4 से 12 दिन 4 बार 12 से 20 दिन तक 4 बार 20 से 30 दिन तक बार 30 दिन के पश्चात् यथाशक्ति 6 से 12 बार नित्य नियम पूर्वक करता रहे इस मुद्रा को 12 वर्ष से 100 वर्ष तक स्त्री पुरुष कर सकते हैं।

इससे लाभ

इस मुद्रा के अल्प समय के अभ्यास से शरीर में एक प्रकार का आनन्द मालूम होता है मन की खराब वृत्तियाँ नष्ट होती हैं, खराब व्यसनों से मुक्त होने के लिये मुद्रा एक अमूल्य साधन है, मुमुक्षुओं के शरीर की नाड़ियां शुद्ध हो जाती हैं, प्राण, अपान, समान, उदान, और व्यान वायु एक होकर सुशुम्ना नाड़ी में प्रवेश करने लगती है, उदान वायु समान वायु में, समान वायु व्यान वायु में, व्यान वायु अपान वायु में अपान वायु प्राणचक्र में लय होती है, उस समय अनहद आनन्द मालूम होगा, मन में असीम सुख का भरन होता है एवं आत्मानंद की प्राप्ति होती है।


तत्व दर्शियों से जिज्ञासा

पं0 श्री कान्त जी एक होनहार और भावुक जिज्ञासु हैं। उनके जैसी शंकाएं अन्य जिज्ञासुओं के हृदय में भी उठती होंगी। इसलिये विद्वानों से प्रार्थना है कि वे इन शंकाओं का संक्षिप्त और सारगर्भित उत्तर देने की कृपा करें।

-संपादक

“ईश्वर मुक्त है या अमुक्त? यदि मुक्त है तो फिर सृष्टि की इच्छा क्यों करता है? यदि अमुक्त है तो फिर पूज्य कैसा? यदि मुक्ता-मुक्त है तब तो वह अलौकिक एवं वर्णनातीत हुआ अतः उसके दर्शन के लिए हरिभजन करना क्योंकर उपयुक्त है? कर्म फल अटल है ऐसी अवस्था में हरिभजन हमारे भाग्य चक्र को कैसे बदल सकते हैं? शंका तो यह है कि ईश्वर अपने शक्ति बल से ऐसा करता है तब तो वह राग द्वेष मुक्त नहीं कहा जा सकता। अनन्तः हरिभजन की सार्वजनिक अथवा सार्वभौम प्रणाली क्या है? सबसे आश्चर्य तो यह है कि ईश्वर, चोर की चोरी करने की प्रेरणा कर सज्जनों को जागे रहने का आदेश देता है। अन्त में वह चोर को पकड़वाकर आप वे दाग से बच जाता है और कर्म फल उसे भुगतना पड़ता है। यहाँ कहाँ का न्याय है? यह विचार-धारा हमारे लघु जीवन स्त्रोत में बहुत दिनों से बहती आ रही है। यद्यपि आस्तिकता की बाँध से कभी-कभी दिशा बदल जाती है पर तुरन्त ही मौका पाकर उसे जर्जर कर पूर्व रूप धारण करती है। आशा है कि ‘ज्योति’ के उद्भट विद्वान इसके लिए अगस्त्य होंगे। इससे हम उनके चिर कृतज्ञ रहेंगे


Quotation

हम साधारण सी विपत्ति को देखकर धैर्य छोड़ देते हैं और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। उस समय हमें स्मरण करना चाहिये दूसरे लोग जो इससे भी हजारों गुनी विपत्तियों में पड़े हैं और उन्हें सह रहे हैं। इस विपत्ति के समय में भी जो सुविधाएं हमें प्राप्त हैं उनके लिये ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिये क्योंकि दूसरे असंख्य मनुष्य उनसे भी वंचित हैं।

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जो सोचता है कि “मैं जीव हूँ” वह जीव है और जो सोचता है कि “मैं शिव हूँ” वह शिव है।

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जो आदमी दूसरों से घृणा करता है समझ लो कि वह ईश्वर से उतनी दूर है।

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जीवन तो वही है जो अनेकों को प्रकाश दे और प्रकाश उसी का नाम है जिसकी चमक से अनेकों के हृदय में आशा जाग उठे।


मन को वश में करने का उपाय

(ले.-श्री पं. शिवनारायण जी, गौड़, लश्कर)

किसी एकान्त स्थान में जहाँ किसी प्रकार की आवाज या अन्य किसी प्रकार की मन को विचलित करने वाली चीज न हो, जाकर बैठो। पर केवल एकान्त ही पर्याप्त नहीं। मन भी सब प्रकार के विचारों से शून्य हो। जब यह निश्चय कर लो कि आन्तरिक और बाह्य दोनों प्रकार की निस्तब्धता है तो आगे का अभ्यास करो।

कोई भी पुस्तक जो पसन्द हो उठा लो। यह न सोचो कि पुस्तक कैसी है। यहाँ हमें विषय से प्रयोजन नहीं, क्रिया और चित्त रंजन ही हमारा ध्येय है। हमें यहाँ न तो अध्ययन करना है और न चरित्र सुधार, चाहे ये अन्य स्थानों पर आवश्यक हों। हमें तो यहाँ मन के पीछे चलना है। जब पुस्तक तुम्हारी रुचि की होगी तो यह निश्चय है कि तुम्हारा ध्यान उसमें खूब लगेगा। पर तुम इससे भी एक कदम आग बढ़ो। मन को उसमें इतना तल्लीन कर दो कि न तो तुम्हें अपना ही कुछ ध्यान हो और न तुम्हें यह भान हो कि तुम कुछ पढ़ रहे हो। सर्वप्रथम यह अभ्यास दो मिनट का भी हो सकता है, पर जैसे-2 तुम्हें सफलता मिलती जाय वैसे ही वैसे इसे बढ़ाते जाओ। कुछ दिनों के अभ्यास से तुम्हें पूर्णता प्राप्त होगी। और तुम बिना किसी रुकावट के यह काम सरलता पूर्वक करने लगोगे।

जब यह स्थिति हो जाय तो अभ्यास की दूसरी सीढ़ी पर पदार्पण करो। अब तक तो यदि कोई बाह्य कारण उपस्थित न हो तो तुम्हारा ध्यान भंग नहीं होता था, पर इतने पर ही बस नहीं। अब बाहरी बाधाओं का भी सामना करो। अब अभ्यास ऐसे स्थान में करो जहाँ दो व्यक्ति बातें कर रहे हों या जहाँ थोड़ी-थोड़ी ध्यान भंग करने वाली ध्वनि निकल रही हो। तुम्हारा अभ्यास तो यहाँ भी वही है, केवल स्थान और परिस्थिति में अन्तर है। पहले एकान्त था अतएव निस्तब्धता थी आगे शब्दों का सामना है। यहाँ भी तुम्हें क्रमशः अभ्यास बढ़ाते जाना चाहिये। जब तुम्हें इतना अभ्यास हो जाय कि बात करने वालों का तुम्हें इतना अभ्यास हो जाय कि बात करने वालों का तुम्हारे लिये वन रुदन मात्र रह जाए तो जानो कि इस श्रेणी में भी तुम उत्तीर्ण हो गये।

अब तुम अभ्यास की तीसरी और अंतिम श्रेणी में पहुँच गये। यह द्वितीयावस्था का परिवर्द्धित रूप है। दूसरी और तीसरी श्रेणी में कोई विशेष भेद नहीं है। अन्तर केवल यही है कि द्वितीय अवस्था में शब्द मामूली होता है, परन्तु तीसरी दशा में ध्वनि की अधिकता होती है तीसरे अभ्यास के लिये उपयुक्त स्थान ये हैं-मेला, हाट, कुँजड़ों ओर मालिनों का बाजार, अस्पताल का अहाता, मन्दिर या गंगा यमुना का तट। इन स्थानों पर शब्द जोर का और कई तरह का मिला हुआ होता है जिससे चित्त की एकाग्रता में बाधों की बहुत सम्भावना है। यहाँ भी वही अभ्यास प्रारम्भ करो। सम्भव है तुम्हें कोई अड़चन मालूम हो, पर अभ्यास को छोड़ो नहीं। थोड़े दिन के अभ्यास से तुम्हें एकाग्रता होने लगेगी। इस अभ्यास को भी पहले की तरह धीरे-धीरे बढ़ाओं। जब यहाँ भी पूर्ण एकाग्रता होने लगे तो समझ लो तुम अपने अभ्यास की सफलता प्राप्त करते जा रहे हो। यही अवस्था तुम्हारी तपस्या का-अभ्यास का-बोधिवृक्ष है। यहीं तुम्हारी विजय-पताका फहराएगी और यही तुम्हारी सफलता का कीर्ति-स्तम्भ है।


Quotation

धन की प्यास जल की प्यास से कहीं बढ़कर दुःखदायिनी है। जल की प्यास तो जल मिल जाने पर शान्त हो जाती है परन्तु धन की तृष्णा धन के मिलने पर और भी बढ़ती है।

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कहने की अपेक्षा लोग करते कम हैं। श्रेष्ठ वह है जो कहता कम और करता ज्यादा है।


स्वस्तिक

(लेखक-विद्याभूषण पं. मोहन शर्मा, विशारद)

पूर्व सम्पादक ‘मोहिनी’

धर्म प्राण भारतवर्ष के धार्मिक इतिवृत्त में जिस भाँति वेदान्त ज्ञान को प्रधानता दी गई है और जिसकी गम्भीरता तथा सत्यता को प्रकारान्तर से समस्त भूमण्डल के तत्वज्ञानियों ने उन्मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया है। उसी भाँति एतद्देशीय धार्मिक चिन्हों में ‘स्वस्तिक’ " की प्राचीनता, समीचीनता और उपादेयता आदि सर्वतोभावेन अपरिहार्य है और इसका पृथ्वी के सुदूर देशों तक में धार्मिक कार्यों से लेकर राष्ट्रीय कार्यों तक के लिये मंगल भावना की पवित्रता के नाम पर विविध रूप से प्रयोग अथवा व्यवहार होता हुआ देखा जाता है। जीवन विज्ञान का प्रकृत रूप से प्रबोध कराने वाले वेदादि ग्रन्थों में जहाँ चक्र रूपी धार्मिक चिन्ह का उल्लेख हुआ है, वहाँ स्वस्तिक का पूर्ण भावार्थ उससे हम लेते हैं। स्वस्तिक ‘ॐ’ अथवा ‘0’ शून्य का ही दूसरा स्वरूप है। शून्य से उत्पत्ति होकर शून्य में ही सृष्टि का लय होता है। श्वक्द्गह्ब्ह्लद्धद्बठ्ठद्द ष्ड्डद्वद्गह्य ह्लश भ्द्गह्श. की थ्योरी इसी माँगलिक चिन्ह ‘स्वस्तिक’ में सन्निहित है। ॐ’ के और ‘शून्य’ के इस दूसरे स्वरूप को केवल पवित्र और कल्याणकारी ही नहीं माना गया अपितु समग्र संसार का प्राकृतिक सुख और शान्ति इसी एक चिन्ह में केन्द्रित है। उनकी सत्ता इसी स्वस्तिक में समाई है। ऐसा आर्य ग्रन्थों और सद्गुरु के अनमोल, सुनहरी वचनों से प्रमाणित है।

विश्व की प्रत्येक सभ्य और प्राचीन जाति के अपने अपने अलग धार्मिक या राष्ट्रीय चिन्ह मिलते हैं। इन पवित्र धार्मिक चिन्हों (Religious Inscriptions) और संसार प्रसिद्ध भाषाओं की लिपिओं (Scripts) के इतिहास को उलटने से हम मानव मस्तिष्क की अनुसन्धानमयी सूझों और विकासोन्मुख बुद्धि के अपूर्व चमत्कारों को समझने का बल प्राप्त करते हैं। पृथ्वी की अन्य सभ्य जातियाँ प्रश्न गौण रखकर तब की आर्य और अब की हिन्दू जाति के प्रचलित धार्मिक चिन्हों और विविध जन्मों पर ही हम विवेक की दृष्टि से सोचने बैठें तो यह विषय, एक अबूझ पहेली जैसा ही जान पड़ेगा। क्योंकि इन चिन्हों का देश में प्रचार और व्यवहार जारी रहने पर भी काल और अवस्था के भेदानुसार इनका महत्व और यथार्थता जन साधारण के ज्ञान के क्षेत्र से कोसों दूर जा छिपे हैं। इस विषय में विरोधियों के तर्क और युक्तियों को विफल सिद्ध करने वाली कोई पुस्तक भी सुप्राय नहीं है, जिसमें इनका साँगोपाँग वर्णन दिया गया हो। कई वर्ष पूर्व हिंदी भाषा में धार्मिक पवित्र चिन्हों पर एक हस्तलिखित पुस्तक जिसमें संशोधन और सुधार की गुंजाइश थी, श्री पं. ईशनारायण जोशी, हस्तरेखा विशारद के संग्रहालय में मैंने देखी थी। वह किन्हीं अबाध्य कारणों से अब तक प्रकाशित नहीं हो सकी। सम्भवतः देश के अन्य किसी विद्वान ने भी इस ओर मनोयोग दिया हो, पर जहाँ तक मुझे पता है इस ढंग की कोई भी पुस्तक देश के किसी भी उन्नत भाषा साहित्य में अद्यावधि प्रकाशित नहीं हुये। चिन्ह और लिपिशास्त्र के विद्वानों की प्रतिभा का सुन्दर उपयोग होने के लिये यह क्षेत्र आज भी खाली पड़ा है।

वेदादि ग्रन्थों के अतिरिक्त पुराण ग्रन्थों को टटोलने पर गणेश पुराण में स्वस्तिक का कई स्थलों पर स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है। गणेश पुराण के मतानुसार भी स्वस्तिक ‘ॐ’ का ही प्रतिरूप सिद्ध है। कल्याण, शुभ, लाभ और मंगल का जो भाव है, उसी का नाम स्वस्तिक है। गणेश पुराण में उल्लेख है कि स्वस्तिक, गणपति, गजानन(!) का स्वरूप है। माँगलिक कार्यों में इसकी प्रतिष्ठा अनिवार्यतः आवश्यक है। अतः इसे नियमानुसार प्रतिष्ठित न किया जाय और आरम्भ में न बनाया जाय तो कार्य की सिद्धि नहीं होती, ऐसा भाव एतद्देशीय हिन्दू जाति में स्मरणातीत काल से ही दृढ़ीभूत अवस्था में पाया जा रहा है।

समुद्र मन्थन की जग प्रसिद्ध दैवी घटना के समय भयंकर कालकूट की उत्पत्ति होने पर समग्र पृथ्वी के जीव कण्ठ गत प्राण हो चुके थे। तब जगतजननी महामाया पार्वती ने संसार को इस महान् दुख से निष्कृति दिलाने के निमित्त अपने शरणायन्न देव और दनुजों को उपदेश दिया कि हे देव! और दैत्य तुमने ‘स्वस्तिक’ रूपी गणध्यक्ष गणपति की पूजा−अर्चा नहीं की, इसी कारण पृथ्वी में यह संहार का दुदृश्य उपस्थित हुआ है। तब दैव और दनुजों ने ‘स्वस्तिक’ प्रथम गणपति का स्वरूप बनाकर लिखा और तब महामाया पार्वती के स्नेहानुरोध तथा प्रार्थना करने पर त्रिशूलपाणि, त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर महादेव क्षण में कालकूट का पान कर गये। तभी से मृत्युँजय! भगवान् शंकर का कालकूट नाम पड़ा। कहने का तात्पर्य यह कि समुद्र मन्थन की घटना के पीछे भी ‘स्वस्तिक’ का अपना सुनहला इतिहास छिपा है। संसार के उस महान दैवी संकट में स्वस्तिक की उपयोगिता दुख निवारणार्थ किस रूप में कारणभूत हुये, यह इस घटना से स्पष्ट प्रगट है।

धन लाभ, विजय प्राप्ति, सुख और कीर्ति की उपलब्धि तथा परलौकिक सुगति के प्रीत्यर्थ भी भारत की विभिन्न जातियों में लोग स्वस्तिक की मर्यादा मानने और पालने के अभ्यासी हैं। भारतवर्षीय वणिक समाज में स्वस्तिक का स्थान और प्रयोजनीयता और भी महत्वपूर्ण है। उनके गृह, द्वार तिजोरियाँ, बही-खाते आदि लक्ष्मी और सिद्धि की प्रसन्नता प्राप्त करने के उद्देश्य से सिन्दूर रंजित स्वस्तिक द्वारा सदैव अभिषिक्त रहते हैं। दीपोत्सव पर लक्ष्मी पूजा में स्वस्तिक को जिस भाँति प्रधानता दी जाती है वह किसी से अप्रकट नहीं है। इस प्रकार भारतीयों की धार्मिक दृष्टि में ‘स्वस्तिक’ कल्याण का प्रदाता, मोक्ष का दाता और अष्ट-सिद्धि नवनिद्धि की प्रकृत वृष्टि करने वाला सिद्ध है। दूसरे शब्दों में “स्वस्तिक” स्वमेव स्वस्ति और मंगल का स्वरूप है। जीवन के द्वंद्व-द्वेष, कलह, विघ्न, कठिनाइयाँ इससे कट जाती हैं। उनके अग्रिम परिहार का एकमात्र धार्मिक उपाय, शुभ और माँगलिक कार्यों में स्वस्तिक का विधिवत् प्रयोग होना है। पहिले की आर्य और अब की हिन्दु जाति सदैव काल से पुण्यानुष्ठान आदि में स्वस्तिक को मान्यता देती आई है, आज भी दे रही है और भविष्य में भी इसी भाँति प्रतिष्ठा और मान्य देती जायेगी।

चर्खा जिसे मैं अपनी भाषा में चक्र भगवान ही कहूँगा, हिन्दुओं का एक प्राचीनतम अस्त्र है। यद्यपि विश्ववंद्य महात्मा गाँधी के सदुपदेश से हिंदू जाति का ध्यान अब पुनः चर्खे के प्रति आकृष्ट हुआ है परन्तु प्राचीनकाल में यह चर्खा इस देश की राष्ट्रीय ही नहीं अपितु महान धार्मिक निधि के रूप में परिगणित होता था। सुप्रसिद्ध ग्रन्थ वृतराज में उल्लेख आया है कि इस देश की स्त्रियों के पक्ष में सिंही की संक्रान्त के दिन चर्खे का वृत्त रखना और पुरोहित से चर्खे की कथा सुनना विधेय था। हिन्दु स्त्रियाँ आज के दिन चर्खे को धो पोंछकर उसमें सिन्दूर रंजित स्वस्तिक अंकित करती थीं यह वृत और त्यौहार काल और अवस्था के भेदानुसार अब हिन्दु समाज से लुप्त प्रायः हो गया है। अब कहीं भी हिन्दु रमणियाँ चर्खे का वृत देखकर उसमें स्वस्तिक की प्रतिष्ठा करती हुई नहीं देखी जातीं। अस्तु,

इस अवनीतल पर भारतवर्ष ही एक ऐसा देश है, जहाँ हिन्दुओं के मन्दिर, जैनियों के देवालय, चैत्यालय, बौद्धों के उपासना गृह, यहूदियों के सिनोगोंग, पारसियों के अग्नि मन्दिर, मुसलमानों की मस्जिदें और ईसाइयों के गिरजे एक साथ मिलते हैं, यदि विवेकपूर्वक सूक्ष्म दृष्टि से विचार करें तो आर्यों के इस पवित्रतम धार्मिक चिन्ह स्वस्तिक को किसी न किसी रूप में इन मन्दिरों ओर इबादतगाहों के लिए, धर्मकार्यों के लिये सबने ही माना है। पारसी लोग आतिशपरस्त अर्थात् अग्नि पूजक कहलाते हैं इनमें धरित्री के क्रोड़ पर भाँति-2 के धार्मिक चिन्ह लिखने की आर्यों जैसी ही प्रथा प्रचलित है।

कविता-कुंज


सफल जीवन (कविता)

(श्री. शशि)

जीवन सफल वही होता है।

उछल-उछल जो सर्वनाश की टक्कर पर टक्कर सहता है।

नंगी खड्ग धार की अपने सीने पर चोटें सहता है॥

चाह नहीं, परवाह नहीं, कुछ आह नहीं, जिसके अंतर में।

चाहे आफत, महा प्रलय के, सौ तूफान उठें क्षण भर में॥

टुकड़े हों बोटी बोटी के, रोटी के पड़ जायें लाले।

कभी न लौटे निज मंजिल से और न भिक्षा-पात्र संभाले॥

किसी देश द्रोही के आगे, अपना मस्तक जो न झुकाये।

किसी खून के प्यासे को जो कभी न अपना खून पिलाये॥

देख!देख!! गढ्ढे का पानी सावन का बादल होता है।

जीवन सफल वही होता है॥

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अपने आधार पर (कविता)

(श्री. शिवनारायणजी गौड़, लश्कर)

लूँ आधार कहाँ तक तेरा, कब तक का तू है साथी?

बनी जहाँ तक तब तक का तू, बिगढ़ गई क्या बन आती?

उठने दे मुझको पाँवों पर निज बल का अभिमान रहे।

बनने दे ऐसा पत्थर जो अविचल प्रवल प्रहार सहे॥

निज बल पर ही लड़ने वाले, विजित हुआ करते रण में।

इसी सत्य का अमर गीत गंजादे मेरे कण-कण में॥

मैं न बाल हूँ, वृद्ध नहीं हूँ, भिक्षुक नहीं, अपाहिज, हीन।

मुझे न वाँछित तेरा आश्रय, खड़ा नहीं होकर मैं दीन॥

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मेरा बोझ न लादो मुझको चलने दो अपने पथ में।

मुझ पर कृपा दिखाने वाले, बैठ चलो मेरे रथ में॥

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प्रभु से (कविता)

(श्री विश्वम्भरदयाल अग्रवाल, ‘विश्व’ बरेली)

प्रभो पड़ी है नाव भंवर में आकर पार लगा दो।

प्रबल पवन के झोंके आते, इनका वेग मिटाओ॥

उड़ता फिरता हूँ तृण जैसा आश्रय प्राप्त न होता।

भव सागर की पीड़ाओं से व्याकुल होता, रोता॥

गज के फन्द छुड़ाने वाले! मेरे प्राण बचाओ।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, प्रेम पियूष पिलाओ॥

गणिका, गीध, अजामिल, तारे, तुझको पार लगाना।

शिला अहिल्या की उद्धारी, मुझे भूल मत जाना॥

चरण शरण में पड़ा हुआ हूँ, नाथ न ठुकरा देना।

दीन बन्धु! डूबा जाता हूँ, मेरी भी सुधि लेना॥

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जीवन-मेला (कविता)

(मास्टर उमादत्त सारस्वत, बिसवा (सीतापुर)

जीवन-मेला दो दिन का है, यहाँ किसी का रहना क्या।

क्षण-भर में मैदान साफ है, दुख-सुख का फिर कहना क्या।

तरह-तरह के रूप लिये जो बैठे मानव इधर-उधर।

कह सकता है कहो कौन, कब चला जायगा कहाँ, किधर?

‘गिरह-कटों’ से होशियार रह, साफ निकल जा बचकर तू।

‘घोर उमस है, अमित भीड़ है’ हो न विकल जा बचकर तू

लगी दुकानें देखभाल ले माल कहाँ का सच्चा है।

समझ बूझ कर दाम लगाना, काम यहाँ का कच्चा है।

ध्रुव-निश्चित, है यह परदेशी यहाँ न रहने पायेंगे।

एक-एक कर आये थे जो, एक-एक कर जायेंगे॥

पल भर के इस मेले में क्यों ऐंठा-ऐंठा फिरता रे।

दौड़ा-दौड़ा घूम व्यर्थ मत, मन में ला सुस्थिरता रे


साधकों का पृष्ठ

जो साधक हमारी बताई हुई विधियों से अभ्यास कर रहे हैं। अपने अनुभव प्रकाश नार्थ भेजते रहें। जिससे दूसरे लोग भी लाभ उठा सकें।

(1)

गत मास आपकी भेजी हुई ‘मैं क्या हूँ’ पुस्तक हस्तगत हुई। पढ़कर अति सन्तुष्ट हुए। निराशा रूपी जीवन में आशा का संचार हुआ। नेत्रहीन मनुष्य जिस प्रकार नेत्र पाकर आनन्दित होता है ठीक उसी प्रकार इस पुस्तक को पाकर मैं अपने जीवन को सुखी अनुभव करने लगा हूँ। आप हमारे सच्चे पथ प्रदर्शक मित्र हैं। आपके बताये हुए अभ्यास पर चल रहा हूँ। इस थोड़े से समय में ही मुझे आश्चर्यजनक लाभ हुआ। जब से अभ्यास आरम्भ किया है तब से अपनी भूलें बहुत बुरी प्रतीत हो रहीं हैं। मेरी अन्तरात्मा कहती है कि इन बुरी आदतों को छोड़ो। ज्ञात होता है कि शीघ्र ही मेरी जिन्दगी में नया परिवर्तन होने वाला है।

-त्रिलोकनाथ शुल्क, नगर पारकर।

(2)

यह गांव शहर से बहुत दूर है। अशिक्षित और गरीब लोगों की आबादी 85 फीसदी है। शेष 5 फीसदी मध्यम श्रेणी के हैं। यहां कोई वैद्य, हकीम न था। बीमार पड़ने पर सात मील दूर के कस्बे से दवा लानी पड़ती थी। मैं थोड़ा सा पढ़ा हूँ पर आपकी ‘सूर्य चिकित्सा’ पुस्तक को अच्छी तरह समझ लिया है और उसी के अनुसार बीमारों का इलाज शुरू कर दिया है पास के चार-पांच गांव के बीमार मुझसे ही दवा लेने आते हैं। 80 फीसदी का दुख दूर हो जाता है।

-भीनजी कामदार, मोरी वाड़ा।

(3)

इस महीने मैंने मस्तिष्क सम्बन्धी खराबियों के बीमारों को हाथ में लिया है। प्राण चिकित्सा विधि से इनका उपचार कर रहा हूं। एक औरत के सिर पर रोज भूत चढ़ता है। दो पागल ऐसे हैं जो जंजीरों से बंधे रहते हैं खोलते ही लोगों को मारते हैं। एक नवयुवक रात को सोते-सोते एकदम डर जाता है और घिग्घी बांधकर रोने लगता है। तीन और भी ऐसे ही हैं। इस प्रकार मस्तिष्क सम्बन्धी रोगियों पर उपचार चालू हैं। आज पन्द्रहवाँ दिन है। सभी बीमारों को आधे से अधिक फायदा है। उम्मीद है कि एक को छोड़कर शेष इसी महीने अच्छे हो जायेंगे। इस अद्भुत चिकित्सा प्रणाली को आश्चर्य की तरह देखने के लिये लोग दूर दूर से रोज आते रहते हैं।

-रणवीरसिंह सोलंकी, बदलपुर।

(4)

पिछले पाँच महीनों से प्राण चिकित्सा के तरीके से केवल बच्चों का इलाज कर रही हूँ। सारे कस्बे की स्त्रियाँ मुझसे सेवा लेती हैं। किसी से कुछ न माँगने पर भी अच्छी आमदनी हो जाती है। इस नये विज्ञान की सफलता देखकर यहाँ के वैद्य लोग मन ही मन बहुत कुढ़ते है उन्होंने अफवाह फैलाई थी कि मैं ‘डायन’ हूँ और मौका पाते ही बच्चों को खा जाऊँगी। इस प्रकार की नीचता पूर्ण अफवाहें फैलाने का जिन्होंने प्रयत्न किया था वे स्वयं जनता की निगाह में घृणा के पात्र बन गये हैं। अपनी सच्चाई और ईमानदारी दर्पण की तरह स्वच्छ होने के कारण सर्वत्र आदर पाती हूँ।

सावित्री देवी, अमीगाँव।

(5)

मैस्मरेजम का अभ्यास बढ़ रहा है। चार पाँच मिनट में पात्र को नींद आ जाती है। चौबीस आदमियों पर आज़माइश की थी जिनमें से बीस निद्रित हो गये। हिप्नोटिज्म के तरीके से निद्रित करने की विधि कच्ची है इसमें पात्र को थोड़ी सी झपकी आती है। मैस्मरेजम की नींद इतनी गहरी होती है कि एक पात्र के कान पर ढोल बजाया गया तो भी वह न जगा। अब आप परकाया प्रवेश का आगे का अभ्यास बताने की कृपा करें।

-हरगोविंद शिवड़े, कराची।


आत्म-चित्र (कविता)

(रचयिता-श्री मोहनलाल गुप्त)

मुझमें दुख का संसार बसा करता है,

माया में मन लाचार फँसा करता है,

हूँ चढ़ा रहा नित अश्रुमाल मैं जिस पर-

वह भी मुझसे हर बार हँसा करता है

बरबस प्यार किया करता हूँ,

पर न अधिकार किया करता हूँ

> विष भी प्रेम सहित जो देता-

नहीं इन्कार किया करता हूँ।

भूलों पर भी मैं भूल किया करता हूँ

आघातों पर मैं धूल दिया करता हूँ

मेरे पथ में जो शूल निरन्तर बोते-

उनको भी मैं मृदु फूल दिया करता हूँ।

मैं सबको जग में आस दिया करता हूँ।

पर अपना ही विश्वास किया करता हूँ

मेरे उपवन जो लूट दे रहे पतझड़-

मैं उनको भी मधुमास दिया करता हूँ।

विपदाओं को मैं स्वयं चरा करता हूँ,

तूफानों में घर स्वयं खड़ा करता हूँ,

है नहीं विजय कर हर्ष, पराजय का दुख-

बाधाओं से मैं नित्य लड़ा करता हूँ।

दिल से मैं जिसका मान लिया करता हूँ

रह रह उसका ही ध्यान किया करता हूँ

वसुधा की विपुल विभूतियाँ ही हैं भाती-

उस पर ही जीवन दान किया करता हूँ।

असह्य वेदना भार लिये फिरता हूँ,

उस में अगणित उद्गार लिये फिरता हूँ

घन-स्वाति-बूँद पाने की अभिलाषा में-

चातक सी विकल पुकार लिए फिरता हूँ,

रह मौन, सभी कुछ झेल लिया करता हूँ,

अंगारों से भी खेल लिया करता हूँ,

जो समझ मुझे भू,दूर व्योम से रहते-

मैं उनसे भी मिल मेल किया करता हूँ।

जग में सबकी पहचान किया करता हूँ,

दे सुधा स्वयं विषपान किया करता हूँ

अभिशापों को वरदान भाग्य का कहकर-

रोदन में भी मुस्कान किया करता हूँ।

*समाप्त*


विपत्ति और घबराहट

(ले.-श्री मंगचन्द भंडारी ‘मंगद’, देवास)

एक राजा अपने कुछ सेवकों को साथ लेकर कहीं दूर देश को जा रहा था। रास्ते में कुछ यात्रा समुद्र की थी इसलिए जहाज में बैठकर चलने का प्रबन्ध किया। राजा अपने सेवकों समेत जहाज में सवार हुआ। मल्लाहों ने लंगर खोल दिया।

जहाज जब कुछ दूर आगे चला तो लहरों के थपेड़ों के साथ टकरा कर वह हिलने लगा। सब लोग कई बार यात्रा कर चुके थे इसलिए कोई व्यक्ति इस हिलने डुलने से घबराया नहीं किन्तु एक सेवक जो बिल्कुल नया था। चारों ओर पानी ही पानी और बीच में डगमगाता हुआ जहाज देखकर बुरी तरह घबराने लगा। उसकी सारी देह काँप रही थी। मुँह से घिग्घी बंध रही थी नसों का लोहू पानी हुआ जा रहा था।

उसके साथी अन्य सेवकों ने समझाया, राजा ने ढांढस बंधाया। उसे बार-बार समझाया जा रहा था कि ‘यह विपत्ति देखने में ही बड़ी मालूम देती है वास्तव में तो प्रकृति की साधारण सी हलचल है। हम लोगों को इनसे डरना नहीं चाहिये और धैर्यपूर्वक अच्छा अवसर आने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।’ लेकिन इस समझाने बुझाने का उस पर कुछ असर नहीं हुआ। उसका डर और घबराहट बढ़ रहे थे धैर्य छोड़ कर वह घिग्घी बाँधकर रोने लगा।

यात्रा करने वालों में से एक सेवक बहुत बुद्धिमान था। उसने राजा से कहा-महाराज आज्ञा दें तो मैं इनका डर दूर कर सकता हूँ। राजा ने आज्ञा दे दी।

वह उठा और उस बहुत डरने वाले यात्री को उठाकर समुद्र में फेंक दिया। जब तीन चार गोते लग गये तो उसे पानी में से निकाल लिया गया। और जहाज के एक कोने पर बिठा दिया गया। अब न तो वह रो रहा था और न डर रहा था।

राजा ने उस बुद्धिमान सेवक से पूछा इसमें क्या रहस्य है कि तुमने इसे पानी में पटक दिया और अब यह निकला है तो बिलकुल नहीं डर रहा है?

उस सेवक ने हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक कहा- श्रीमान! इससे पहले इसने डूबने का कष्ट नहीं देखा और न यह जहाज का महत्व जानता था। अब इसने वह जानकारी प्राप्त कर ली है तो घबराना छोड़ दिया है।