ईमानदारी का आर्थिक पहलू

(ले. श्री राजवैद्य सत्यपाल गुप्त, एटा)

ऐसे आदमियों की कमी नहीं जिन्हें होशियार , बुद्धिमान, चालाक, वाक पटु, हाजिर जवाब, मिलनसार या कमाऊ पूत कहा जा सके, पर ऐसे आदमियों को चिराग लेकर ढूंढ़ना पड़ेगा, जिन्हें ईमानदार कहा जा सके। लोग समझते हैं कि वाक पटु और चालाक होना अच्छा है, इससे धन कमाया जाता है और लोग प्रशंसा करते हैं। वे धन कमाकर सुख प्राप्त करना चाहते हैं और समाज में अग्रणी कहलाना चाहते हैं। परन्तु अपने अमूल्य जीवन की महत्वपूर्ण घड़ियाँ व्यतीत करने के बाद-अपने कार्य का फल प्रत्यक्ष देख लेने के बाद- उन्हें अनुभव होता है कि असल में वे भ्रम में थे। चालाकी से कितनों ने धन कमाया है? सयाने कौओं ने कितनी नियामतें चखी हैं। आज इसे ठगा तो कल उसे ठगा। जिसे एक बार ठग लिया जीवन भर को उसका दरवाजा बन्द हो गया। फिर वहाँ दुबारा दाल नहीं गल सकती। काठ की हाँडी में इतनी दम नहीं होती कि वह दुबारा भी चढ़ सके। यह मार्ग धन कमाने का और उन्नति करने का नहीं है। ऐसे दुकानदार, जिनके यहाँ से एक बार चीज खरीद कर पछताना पड़ता है कितने स्थायी ग्राहक बना सकते हैं ? एक बार जो भूल से उधर फँस गया दुबारा फिर उलट कर नहीं आवेगा। फिर भला वे धन पति किस किस प्रकार हो सकते हैं ? यश के बारे में भी उनकी जो आशा थी वह भी निर्मूल सिद्ध होती है। खुशामदी, स्वार्थी लोग अपना काम निकालने की गरज से मुँह पर तारीफ भले ही करें या विचित्र आचरण को देखकर कौतूहल वश कोई वाह-वाह भले करे, पर पीठ पीछे सब जगह उनकी कड़ी आलोचना होती है। यदि कोई बड़ी संपत्ति नहीं कमा पाये तब तो साधारण लोग भी मुँह पर ही उनकी कटु आलोचना कर डालते हैं और पीछे गालियाँ देते हैं। सब के मन में ऐसे लोगों के प्रति घृणा के भाव भरे रहते हैं।

यदि इन चालाक व्यक्तियों में से कोई धनी बन गया तो भी वह न तो समाज का अग्रणी बन सकता है और न यश ही कमा सकता है। सेठ लक्ष्मीचंद के पास बीस लाख रुपये की पूँजी है पर उनका आदर सुदामा पंडित के बराबर नहीं होता। सेठ जी के यहाँ मोटर है, कोठी है, नौकर चाकर हैं, हथियार हैं, जेवर हैं, खजाना है पर पड़ौसियों को इससे क्या? सुदामा पंडित एक प्याऊ में छै रुपया महीना पर पानी पिलाने की मजदूरी करता है, काम से आते ही पड़ौसियों के दुख दर्द में शामिल होता है। ऐसे लोग जिनका कोई नहीं है, बीमारी के वक्त रात भर उसे अपने पास बैठा पाते हैं, मुहल्ले की कई अनाथ विधवाएं हैं जिनके कातने के लिए रुई और पीसने को अनाज दूसरे लोगों के यहाँ से वह ला देता है और काम पूरा होने पर बाजार से उनकी मजदूरी लाकर उन्हें दे देता है, महीने में कई भूखे प्यासे अतिथि उसकी रोटी में से हिस्सा बाँटते हैं और उसकी झोंपड़ी में पड़े हुए पुआल पर लेट कर रात काटते हैं। भले ही सुदामा पंडित गरीब है पर उसका दिल सेठ लक्ष्मीचंद से ज्यादा अमीर है। उसे सेठ जी से अधिक यश प्राप्त है। बेटों की फिजूल खर्ची, स्त्री के दुराचार, नौकरों की चोरी, मित्रों की दगा-बाजी, व्यापार में घाटे होने की बात सोचते सोचते सेठ जी को सारी रात नींद नहीं आती पर वह गरीब चक्रवर्ती राजा की तरह सुख की निद्रा में सोता है।

इस बेईमानी के पैसे को भी यहीं छोड़ कर खाली हाथ कर जाना पड़ेगा यह सोचकर चित्त उद्विग्न हो उठता है। सिकन्दर महान जब मरने लगा तो उसने अपनी सारी दौलत का आँखों के सामने ढेर लगवाया, पर वह एक हसरत भरी निगाह डालने के अतिरिक्त साथ कुछ न ले जा सका-एक पाई भी उसके साथ न गई। सेठ जी अपने जीवन की बहुमूल्य घड़ियों पर, कोठी खजाने पर, धर्म अधर्म पर जब एक विहंगम दृष्टि डालते हैं तो उनकी छाती पर साँप लोटने लगता है। और सुदामा पंडित-उसके मन में आनन्द की गंगा बहती रहती है। अपने अकिंचन जीवन का मैं कैसा सदुपयोग कर लेता हूँ, मुझसे दूसरों की भी कुछ सेवा बन पड़ती है यह सोचते सोचते उसकी छाती फूल उठती है। हर क्षण एक दैवी आनन्द उसके हृदय में छाया रहता है। छै रुपये महीने कमाने वाले इस गरीब के पास जितना सुख, स्वास्थ्य और आनन्द है उतना सेठ जी अपनी सारी सम्पत्ति के मोल में भी नहीं खरीद सकते।

अब दुनिया बहुत चालाक हो गई है। उसकी तेज निगाह से आपकी चालाकी बहुत दिन छिपी नहीं रह सकती, एक दिन कलई खुलेगी और आपका बालू का महल गिर पड़ेगा। सुख और शान्ति, बेईमानी का काम आरंभ करते ही गायब हो जाएगी। हर क्षण यह चिन्ता लगी रहेगी, कहीं मेरी कलई न खुल जाय। कोई किसी के बारे में बात करेगा पर आपको यही मालूम पड़ेगा कि मेरे ऊपर तानाकशी की जा रही है। जरा सा खटका होते ही मन का चोर आँखों के सामने राक्षस बन कर आ खड़ा होगा। दुराचारी लोगों के पाँव काँपते रहते हैं और ऐसा मालूम पड़ता रहता है कि यह पेड़, पत्थर, दीवारें, पशु पक्षी मुझे चिढ़ा रहे हैं और मेरी सब गुप्त बात जान गये हैं। ऐसी जिन्दगी भी कोई जिन्दगी है? जिसमें हर घड़ी आशंका, दुराव, धड़कन, चिन्ता और जलन हो। वह जीवन प्रेत जीवन है। दुराचार के साथ साथ यह सब विघ्न आते हैं और मनुष्य की हँसती खेलती जिन्दगी को कड़ुवी और भार स्वरूप बना देते हैं।

आर्थिक दृष्टि कोण से देखिये तब भी ईमानदारी का महत्व कम नहीं है देखा जाता है कि कोई व्यापारी किसी के चालू कारबार को मोल लेता है तो ऊँची रकम देकर उसके नाम को भी खरीद लेता है। क्योंकि उस नाम की ईमानदारी ने लोगों के दिलों में स्थान प्राप्त कर लिया है जिससे आकर्षित होकर ग्राहक बहुत अधिक तादाद में उस से चीज खरीदने आते हैं। अमेरिका को एक प्रसिद्ध धन कुबेर का कथन है कि ‘हमारे कारोबार ने इतनी उन्नति, खरे व्यवहार के कारण की है। हमने खराब माल देकर और अधिक कीमत वसूल कर के आज तक किसी ग्राहक को नाराज नहीं किया।’ एक दूसरे पर कारखाने दार का कहना है कि ‘कम मुनाफा अच्छा माल और सद्व्यवहार ही वह गुप्त सिद्धान्त है जिन्हें अपना कर हमारा छोटा सा कारखाना इतना बड़ा हो गया है।’ बाजार का विश्वास, जिसके बल पर माल उधार मिल जाता है क्या बिना ईमानदारी के प्राप्त हो सकता है? थोड़े समय में अधिक लाभ की हविस से बेईमानी का व्यवहार करने वाला उस मूर्ख का भाई है जिसने एक साथ मालामाल हो जाने के लोभ में रोज एक सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी का पेट चीर डाला था।

आप कोई कारोबार कर रहे हैं जिसमें ग्राहकों को धोखा देना पड़ता है, आप कोई ऐसी नौकरी कर रहे हैं जिसमें ग्राहकों को ठगने में अपना तन, मन लगाना पड़ता है तो आप आज ही उस काम को छोड़ दीजिए। यदि आत्मा की आवाज को कुचल कर ही आप रोटी कमाते हैं तो भूखों मर जाइये। आत्मा का माँस काट काट कर शरीर को खिलावेंगे तो वह भूखों मर जाने से महंगा पड़ेगा। रेशमी कपड़े मत पहनिये गाढ़े का टुकड़ा लपेट लीजिए, षटरस भोजन मत कीजिए रूखी रोटी खाकर पानी पीजिए; आलीशान कोठी में मत रहिए एक झोंपड़ी में गुजर कर लीजिए; पर अधर्म का पैसा मत लीजिए। सत्कर्म में भी यदि उतना ही श्रम किया जाए तो कुछ ज्यादा नुकसान न रहेगा पर यदि नुकसान रहे तो भी बिल्कुल मुक्त मिलने वाले बेईमानी के पैसे से वह लाख दर्जे अच्छा है।

क्या आप धनवानों जैसी अशान्ति जिन्दगी-मय जिन्दगी जीना पसंद करते हैं? क्या आपको अधर्मोपार्जित धन लेकर ऐश आराम करने की इच्छा है? यदि हाँ, तो मैं कहता हूँ आप भारी धोखे में हैं, यह अनुभव बड़ा महँगा पड़ेगा जिस प्रकार सोने की छुरी से भी आप अपना हाथ कटवाना पसंद नहीं करते उसी प्रकार उसे चाँदी के टुकड़ों को जो जिन्दगी का सारा मजा लूट लें, लेना पसंद न करना चाहिए। आप ईमानदार रहिये, अपने चरित्र की रक्षा कीजिए, लालच के वशीभूत होकर कुमार्ग में पैर मत दीजिए। ईमानदारी की सुदृढ़ शिला पर खड़े होकर लौह पुरुष की भांति निश्चिंत मन से यही विचार करते रहिए मुझे सच्चा आनन्द प्राप्त करना है, मुझे आत्मा और पर-आत्मा के सामने जवाब देना है, ऐसी भावना के साथ साथ आपकी आत्मा में एक दिव्य प्रकाश प्रादुर्भूत होगा, जिसके नीचे बैठकर आप अपने अन्दर छिपे हुए देवत्व की झाँकी कर सकेंगे और परम संतोष तथा शान्ति उपलब्ध कर सकेंगे।


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ब्राह्मण कौन है? जो निष्पाप है, निर्मल है, निरभिमान है, संयमी है, विद्वान् है, ब्रह्मवादी है, धर्मप्राण है, वही ब्राह्मण है।


हमेशा हँसते रहिए।

(ले.-श्री हनुमतप्रसाद जी ‘कुसुम’, सीकर)

आप अपने जीवन को उच्च और पवित्र बनाना चाहते हैं तो प्रसन्नता को अपनाइये। सुन्दर तस्वीर के आस पास जिस प्रकार छोटे बच्चे ललचाते फिरते हैं उसी प्रकार प्रसन्नता के आस पास अन्य छोटे बड़े सद्गुण सदा आ जाते हैं। प्रसन्नता वह सुगंधित फल है जिसके आस पास सफलता और सद्गुणों की मक्खियाँ सदा भिन-भिनाती रहती हैं।

जिस व्यक्ति के चेहरे पर मुसकराहट नाचती रहती है, उसके मन में ईर्ष्या, द्वेष, चिन्ता और कुढ़न को स्थान नहीं मिल सकता। यह दोष उन्हीं स्थानों में अपना घर बनाते हैं, जहाँ उन्हें सम्मान के साथ रखा जाता है। आपका किसी आदमी से झगड़ा हो जाता है और उसके प्रति द्वेषभाव मन में आते हैं। अगले दिन वह रास्ते में मिलता है और आप खिलखिलाकर हँसते हुए उससे हाथ मिलाते हैं। बस, सारा बैर-भाव बात की बात में मिट गया। यदि आपके स्वभाव में प्रसन्नता शामिल न होगी तो निश्चय ही द्वेष भावना मन के भीतर डेरा डालकर बैठ जाती और धीरे धीरे बढ़ती रहती। विरोधी को आप जो नुकसान पहुँचाते उससे कई गुना नुकसान अपना हो गया होता। बुरे भाव की आग ने मन और शरीर के इतने पोषक तत्व जला दिए होते जिनकी हानि साधारण हानि नहीं कही जा सकती। विरोधी के मन में भी वैसे ही भाव जमे रहते तो वह स्वतः हानि उठाता हुआ कभी आपको भी हानि पहुँचा सकता था। प्रसन्नता ही वह शीतल जल था जिसने आपके भी आपके विरोधी के मनों के विकारों को धोकर साफ कर दिया।

प्रसन्न मुख रहने वाले सब को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। हँसते हुए बच्चे हमें कितने प्यारे लगते हैं उनके साथ खेलने में स्वर्ग का आनंद आता है। मुसकराता चहरा एक वशीकरण मंत्र है। वह कहीं भी हो, किसी भी परिस्थिति में हो, अपनी खुशी का कारण निकाल लेता है। यदि दुख की स्थिति में है तो दुख उसके लिए तिनका हो जाता है और सुख में है तो अपने आनंद को हजारों गुना बढ़ा लेता है। विचारकों ने प्रसन्नता को इसलिए सर्वश्रेष्ठ गुण बताया है कि इससे न केवल अपने को ही आनंद मिलता है अपितु साथियों पर भी अमृत बरसता है। देखा गया है कि इस गुण से सम्पन्न व्यक्तियों की उपस्थिति से दूसरों के रोग-शोक आधे रह जाते हैं।

सब लोग अपनी कार्य शक्ति बढ़ाने के और सफलता दायक साधनों की तलाश में रहते हैं पर प्रसन्नता से बढ़ कर उन्हें और कोई अधिक उपयोगी चीज नहीं मिल सकती। थकान मिटाने के लिए लोग विभिन्न प्रकार के खर्चीले मनो विनोदों और कीमती दवाओं को ढूंढ़ते हैं। क्या ही अच्छा होता यदि उन्होंने प्रसन्नता का महत्व समझा होता। थकान है क्या? असल में थकान का मनोवैज्ञानिक अर्थ है किसी काम पर से मन उचट जाना। वैसे हमारे शरीर और मन का संगठन इस प्रकार का है कि उसमें थकने की कोई गुंजाइश ही नहीं। तब हम आराम करते हैं या सो रहे होते हैं। तब भी शरीर और मन कुछ न कुछ काम कर रहे होते हैं, दिल, फेफड़े, आमाशय, जिगर आँतें, मस्तिष्क कब अपना काम बन्द करते हैं ? हाथ पैर निश्चेष्ट होकर होकर पड़े नहीं रहते। आराम के समय भी हाथ पैर इधर उधर चलते रहते हैं। मन में स्वप्न आदि क्रियायें होती रहती हैं। देखा जाता है कि मजदूर आठ घंटे मिल का काम करके जब लौटता है तो थक जाता है। पर वह सोता सिर्फ छः घंटे ही है। मिल के आठ घंटे और सोने के छः घंटे छोड़ कर शेष 10 घंटे वह क्या करना है? इस समय में भी वह काम ही करता है। भोजन करता है, किताब पढ़ता है, ताश खेलता है, कपड़ा धोता है, क्या यह काम नहीं है? उन्हें करने में क्यों नहीं थकता? मजदूर से पूछा जाय कि ‘भाई, थके होने पर भी तुम दस घंटे अतिरिक्त काम किस प्रकार कर लेते हो, तो यही उत्तर देगा कि, और मैं कुछ काम नहीं करता। बाकी समय तो अपनी खुशी के कामों में-मन बहलाव में लगाता हूँ।’ सचमुच उसे यह भान ही नहीं होता कि उसे प्रतिदिन 18 घंटे हलका भारी परिश्रम करना पड़ता है। थकान का एक ही कारण है-काम को भार समझना। खुशी खुशी तो लोग बहुत काम कर डालते हैं। जब हमारे घर में ब्याह शादी होती है तो रात दिन जुट कर काम करते हैं। हिसाब लगाया जाय तो मालूम पड़ेगा कि एक आदमी प्रायः तीन आदमियों की बराबर उन दिनों काम कर लेता है और थकान बिल्कुल भी नहीं आती। डाक्टरों ने हिसाब लगाकर बताया है कि पड़े रहने पर जितनी शक्ति खर्च होती है काम करते रहने पर उसकी सवाई ताकत खर्च होती है। दस घंटे पड़े रहने में उतनी शक्ति व्यय होगी जितनी आठ घंटा काम करने में, क्यों कि पड़े रहने पर भी शरीर और मन को काम करना पड़ता है।

इन सब बातों पर दृष्टि पात करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रसन्नता, कार्यशक्ति को बढ़ाती है। प्रसन्नता पूर्वक काम करने वालों को अपना कार्य, भार नहीं मालूम पड़ता बल्कि एक मनोरंजन का साधन बन जाता है। मनोरंजन में थकान कहाँ? और थकान न आना ही श्रेष्ठ कार्य शक्ति है। तात्पर्य यह है कि प्रसन्नता सर्वोत्तम टानिक औषधि है। एक बार खिलखिलाकर हँस लेने पर जितनी स्फूर्ति आती है उतनी एक प्याला पीने से नहीं आ सकती। हँसमुख लोगों के पास कुछ दिन रहकर देखिये वे बहुत अधिक कार्य करते हुए मिलेंगे। उन्हें इस बात की याद भी नहीं आती कि हमें काम करना पड़ रहा है और ढेरों काम कर जाते हैं, जब कि एक रोनी सूरत-महाशय जरा सा काम करने पर ‘हाय, काम के मारे मरा’ ‘हाय काम के मारे मरा’ कहकर रोया करते हैं।

कोई भी साँसारिक काम ऐसा नहीं है जिसमें दूसरों के साथ व्यवहार न करना पड़े। सफलता और असफलता का परिणाम बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि लोग आपका आदर करें, आप से प्रेम करें, आपकी बात का विश्वास करें और आपके व्यक्तित्व को ऊंचा समझें। यह चारों ही बातें प्रसन्नता से सम्बन्धित हैं। हँसता चेहरा लेकर किसी आदमी के पास जाइए, वह आपकी बात सुनेगा आपको उचित परामर्श देगा और आपकी मदद करेगा। पैसा खर्च करके जो काम सुगमता से नहीं हो सकते वह हँसते चेहरे से हो जाते हैं। आप दुकानदार, वकील, अध्यापक, वैद्य, व्यापारी, मजदूर, फैक्टरी-मालिक, पुरोहित, भिखारी कोई भी हैं, हँसते रहिए। आपके आसपास ग्राहकों की भीड़ लगी रहेगी। ऊंची योग्यता धन और चतुराई होते हुए भी लोग तरक्की नहीं कर सके पर प्रसन्न मुख लोगों ने पहाड़ों पर अपने लिए जगह बनाली।

एक महापुरुष का कथन है कि ‘खुदा ने कामयाबी की नियामत खुश मिज़ाज लोगों के लिए बनाई और बदकिस्मती का तराना गाने वालों को लानत बख्शी।’ बात ठीक सी है, आप अपनी गरीबी, दुर्भाग्य, घर वालों की शिकायत, घाटा, अपमान, दुख की कहानी लेकर लोगों के सामने जाइए; बहुत हुआ तो कोई चार शब्द आपको सहानुभूति के कह देगा। वरना हर तरफ लानत बरसेगी। दुनिया में किसी को इतनी फुरसत नहीं है कि आपका रोना सुने और अपने को रंजीदा बनावे। खुद हँसिए तो लोग आपके साथ हँसेंगे, रोइए तो दुत्कार कर अलग कर देंगे। इसलिए जरूरत नहीं कि आप हर वक्त अपनी बदकिस्मती के गीत गावें, यदि सचमुच कोई मुसीबत आप पर है तब भी हँसते रहिए। जगहँसाई से बचे रहेंगे और अपने दुख को हल्का कर लेंगे। प्रसन्नता एक कला है, एक अमर सौंदर्य है। आप कुरूप हैं, कोई हर्ज नहीं जरा मुस्कराइए तो सही, आपके मुँह से फूल बरसने लगेंगे।


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जो मनुष्य बदला लेना चाहता है वह अपने घाव को ताजा बनाये रखने की फिक्र करता है। जो बदला लेना नहीं चाहता, उसका घाव तुरन्त भर जाता है।

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दूसरों का सौभाग्य देखकर ईर्ष्या न करो। क्योंकि ऐसे अनेक व्यक्ति होंगे जो तुम्हारी श्रेणी में न पहुँचने के लिए भी दुःखी होंगे।

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जीवन तो वही है जो अनेकों को प्रकाश दे। प्रकाश उसी का नाम है, जिसकी चमक से अनेकों में आशा भर उठे।

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यदि तुम सफलता चाहते हो तो अध्यवसाय को अपना मित्र, अनुभव को अपना सलाहकार, सावधानी को भाई, और आशा को अपना अभिभावक बनाओ।


उठो, हिम्मत करो!

(ले.-श्री. स्वामी सत्यदेव जी परिव्राजक)

जीवन शोक करने के लिए नहीं है। यह जिन्दगी करने के वास्ते है। अपने रास्ते में पड़ी हुई रुकावटें देखकर घबरा मत जाओ। ये रुकावटें आपकी हित चिन्तक हैं। ये जीवन को उन्नत करने के साधन हैं।

इस संसार में प्रत्येक आत्मा का कोई न कोई ड़ड़ड़ड़ है। सर्वज्ञ कर्ता ने कोई वस्तु निरर्थक उत्पन्न नहीं की है। महान यंत्र का प्रत्येक पुर्जा किसी अभिप्राय की ड़ड़ड़ड़ लिए है। सोचो, वह अभिप्राय कौन सा है?

यदि आपने उस अभिप्राय को जान लिया। उसको सिद्धि के हेतु आपको बड़ी बड़ी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, तो भी विश्वास करो कि कठिनाइयों को दूर करने के साधन भी वहीं मौजूद हैं। साधनों को जानना, उनका ठीक ठीक प्रयोग करना, उसी अनुसार कार्य सिद्ध करना, यही सच्चा जीवन है, आपने ऐसा किया है?

यदि ऐसा किया होता तो कभी भी यह उदासीनता न आती। उदासीनता का आ द्योतक जाना ही इस बात का है कि आपने अपने जीवनोद्देश्य को नहीं समझा और हिम्मत हारे बैठे हैं। संसार आपको दुख मय बोध होता है। सब भाई बन्धु मित्र, आपको अपने शत्रु जान पड़ते हैं। आप जिधर दृष्टि उठाते हैं कष्ट ही कष्ट दीखते हैं। निराशा आपको आत्मघात करने के लिए कहती है क्या इससे आपके दुखों का अन्त हो जायगा?

कभी नहीं, हरगिज नहीं। आप एक जगह से भाग दूसरी जगह जाना चाहते हैं लेकिन जहाँ आप जायेंगे, संकल्प विकल्पों का चिट्ठा साथ ले जायेंगे। वह पीछा नहीं छोड़ेगा। आप जहाँ जायेंगे, वहीं यह भूत साथ जायगा। यदि स्वर्ग में आप पहुँच जायें तो वह नरक दिखाई देगा। आप इस भूत को पीछे नहीं छोड़ सकते। इस भूत को यहीं मार कर भगाना ठीक है। इस निराशा के जाल को यहीं काट सकते हैं। उदासीनता छोड़ कर ऊपर दृष्टि डालिये। अपनी आत्मा को इन लताओं से विमुक्त कीजिये ईश्वर ने यह जीवन काम करने के लिए दिया है। इस जीवन का कोई खास उद्देश्य है। उस उद्देश्य को जानिये। अपनी शक्तियों की पड़ताल कीजिये और उनका ठीक ठीक उपयोग करना सीखिये।

स्मरण रखिये, रुकावटें और कठिनाइयाँ आपकी हित चिन्तक हैं। वे आपकी शक्तियों का ठीक ठीक उपयोग सिखाने के लिए हैं, वे मार्ग के कंटक हटाने के लिए हैं। वे आपके जीवन को आनंद मय बनाने के लिए हैं। जिन के रास्ते में रुकावटें नहीं पड़ीं वे जीवन का आनन्द ही नहीं जानते। उनको जिन्दगी का स्वाद ही नहीं आया जीवन का रस उन्होंने ही चखा है, जिनके रास्ते में बड़ी बड़ी कठिनाइयाँ पड़ी हैं। वे ही महान आत्मा कहलाये हैं, उन्हीं के जीवन, जीवन कहला सकते हैं।

उठो ! उदासीनता त्यागो। प्रभु की ओर देखो। वे जीवन के पुंज हैं। उन्होंने आपको इस संसार में निरर्थक नहीं भेजा। उन्होंने जो श्रम आपके ऊपर किया है, उसको सार्थक करना आपका काम है। यह संसार तभी तक दुःखमय दीखता है जब तक कि हम इसमें अपना जीवन होम नहीं करते। बलिदान हुए बीज पर ही वृक्ष का उद्भव होता है। फूल फल उसके जीवन की सार्थकता सिद्ध करते हैं।

सदा प्रसन्न रहो। मुसीबतों का खिले चेहरे से सामना करो। “आत्मा सब से बलवान है” इस सच्चाई पर दृढ़ विश्वास रखो। यह विश्वास “ईश्वरीय विश्वास” है। इस विश्वास द्वारा आप सब कठिनाइयों पर विजय पा सकते हैं। कोई कायरता आपके सामने ठहर नहीं सकती। इसी से आपके बल की वृद्धि होगी। यह आपकी आन्तरिक शक्तियों का विकास करेगा।

अतएव निर्भय होकर अपने जीवनोद्देश्य पर डट जाओ किसी से भय मत करो क्योंकि भय आपके जीवन रूपी लकड़ी को घुन लगाता है और अन्दर ही अन्दर से खा डालता है। भय को निकट मत आने दो। यह बड़ा दुष्ट है। इस के वश में पड़ा हुआ मनुष्य निकम्मा हो जाता है। यह मनुष्य को नीच बना देता है। उसके मनुष्यत्व को नष्ट कर डालता है। जो आपको भय दिखाता है, समझो वह बड़ा स्वार्थी है। उसका अपना आत्मा निर्बलताओं से भरा हुआ है। उससे कभी मत डरो।

यह संसार आनन्द से पूर्ण है। उस आनन्द से वहीं आत्माएं लाभ उठा सकती हैं, जिन्होंने जीवनोद्देश्य को समझ कर उसकी सिद्धि पर कमर बाँधी है। भीरु, कायर मनुष्य अपना शत्रु आप ही है। वह कठिनाइयों से भागना चाहता है पर भाग नहीं सकता। रोता है, चिल्लाता है, उससे उसका दुख और भी बढ़ता है। उसका जीवन कंटकमय हो जाता है। वह जहाँ जाता है, अपने दुख की गठरी साथ ले जाता है।

इसलिए दुखों तथा कठिनाइयों का मर्द बन कर सामना करो। इनसे हरगिज मत डरो। ईश्वर पर सच्चा विश्वास रखकर अपने कर्तव्य पर आरुढ़ हो जाओ और अपने दूसरे निर्बल भाइयों को दृढ़ता पूर्वक यह महामंत्र सिखलाओ "ढ्ढ ख्द्बद्यद्य द्धद्बठ्ठस्र ड्ड ख्ड्डब् शह् द्वड्डद्मद्ग शठ्ठद्ग" अर्थात्-जब आपको किसी काम के करने में बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़े और कोई रास्ता दिखलाई न दे तो उस समय आपके अन्दर से ही यह आवाज आनी चाहिए “मैं रास्ता पा लूँगा या नया बना लूँगा” ऐसे हिम्मती लोगों के लिए दुनिया में कोई काम असंभव नहीं है।

अपनी विजयों से उन्नत महावीर नेपोलियन बोनापार्ट जब इटली जीतने के लिए एपल्स के दुर्गम पर्वतों को पार करने गया तो उसके आगे चलने वाले सेनानायकों ने मार्ग को असंभव बतलाया। उस महा पराक्रमी नेपोलियन ने हँसते हुए कहा “असंभव शब्द मेरे कोष में नहीं है।” उसी कठिन कथन के अनुसार उसने रास्ता तैयार कर लिया और उसी मार्ग से अपनी बड़ी सेना और तोपों के साथ इटली पर आक्रमण किया। यह है साहसी लोगों का मार्ग। भीरु और कायर बाधाएं देखकर मैदान छोड़ जाते हैं। अतएव इस संसार में सिपाही बन कर बाधाओं का मुकाबला कीजिए और कभी भी हिम्मत न हारिये, चरित्र गठन का यह एक सर्व श्रेष्ठ गुण है।

भाई सुनो मन लगाकर बात मेरी,

चाहे बने सफलता बिन दाम चेरी।

लो मंत्र मोहन जपो “विजयी बनेंगे”!

आवें अनेक विपदा तब भी लड़ेंगे॥

-ज्ञान के उद्यान में


सर्वोत्तम तीर्थ

(ले.-श्री तुलसीराम शर्मा, हाथरस)

(महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 108 से)

युधिष्ठिर उवाच-

यद्वरं सर्वतीर्थानाँ तन्मेब्रूहि पितामह।

यत्रचैवपरं शौचं तन्मेव्याख्यातु मर्हसि॥1॥

युधिष्ठिर ने पूछा- हे पितामह! जो तीर्थ सब से उत्तम हो और जहाँ परम पवित्रता प्राप्त हो सके उसका मुझसे वर्णन कीजिए।

भीष्म उवाच-

सर्वाणिखलु तीर्थानि गुणवन्ति मनीषिणः।

यत्तुतीर्थं च शौचं च तन्मे श्रृणुसमाहितः॥ 2॥

विद्वान पुरुषों को सब तीर्थ गुण देते हैं। परन्तु इनमें भी जो तीर्थ अधिक पवित्र करने वाला है उसको तू सावधान होकर सुन।

अगाधे विमले शुद्धे सत्यतोये धृतिह्रदे।

स्नातव्यं मानसेतीर्थे सत्त्वमालंव्य शाश्वतम्॥3॥

निरन्तर रहने वाले सत्य का सहारा लेकर अगाध, निर्मल शुद्ध, सत्य रूपी जल से भरे हुए धैर्य रूप झरने वाले मानस तीर्थ में स्नान करना चाहिए।

तीर्थशौचमनर्थित्वमार्जवं सत्यमार्दवम्।

अहिंसा सर्वभूतानामानृंशंस्यं दमः शमः ॥ 4॥

अयाचकता (माँगने की आदत न होना) सरलता, (मन, वाणी शरीर का एक व्यवहार) सत्य बोलना, कोमलता, हिंसा न करना, दया, दम (इन्द्रियनिग्रह) और शम (मन की शान्ति) ये पवित्र करने वाले तीर्थ हैं।

निर्ममा निरहंकारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः।

शुचयस्तीर्थभूतास्ते ये भैक्ष्यमुपभुँजते॥ 5॥

ममता और अहंकार से रहित, सुख दुख मान अपमान हानि लाभ में एक, परिग्रह (संग्रह) रहित तथा भिक्षावृत्ति से आजीविका करने वाले पुरुष पवित्र और तीर्थ रूप माने जाते हैं।

तत्त्ववित्त्वनहंबुद्धिस्तीर्थप्रवरमुच्यते।

शौचलक्षणमेतत्ते सर्वत्रैवान्ववेक्षतः॥ 6॥

तत्त्ववेत्ता और अहंकार रहित पुरुष उत्तम तीर्थ कहलाते हैं तीर्थ का अवलोकन करने वाले तुझसे यह तीर्थ का लक्षण कहा।

रजस्तमःसत्वमथो येषाँ निर्धोतमात्मनः।

शौचाशौचसमायुक्ताः स्वकार्यपरिमागिणः॥ 7॥

जिनका मन सत्व, रज और तम से रहित है अतएव जो बाहरी पवित्रता और अपवित्रता से संयुक्त रहते हैं अर्थात् बाहरी पवित्रता और अपवित्रता पर ध्यान नहीं देते हैं अपने ब्रह्मविचार रूपी कार्य का विचार किया करते हैं।

सर्वत्यागेष्वभिरताः सर्वज्ञाः समदर्शिनः।

शौचेन वृत्त्शौचार्थास्ते तीर्थाः शुचयश्चे ये॥ 8॥

सब प्रकार का त्याग करने में प्रसन्न रहते हैं सर्वज्ञ होते हैं सम दृष्टि रखते हैं शुद्ध आचरण और शुद्ध रहते हैं वे पुरुष तीर्थरूप कहलाते हैं।

नोदक क्लिन्न गात्रस्तु स्नात इत्यभिधीयते।

स स्नातो यो दमस्नातःस बाह्मम्भ्यन्तरः शुचिः॥ 9॥

जिसका गात्र जल से भीगा है उसने वास्तविक स्नान नहीं किया है जिसने दम से (इन्द्रियनिग्रह से) स्नान किया है उसको बाहर भीतर से स्नान किया हुआ जानो।

अतीतेष्वनपेक्षा ये प्राप्तेष्वर्थेषु निर्ममाः।

शौचमेव परं तेषाँयेषाँ नोत्पद्यते स्पृहा॥ 10॥

जो पुरुष विगत कार्यों की अपेक्षा नहीं रखते हैं और जो अपने पास के पदार्थों पर ममता नहीं रखते हैं, तथा जो इच्छा रहित हैं उन्होंने ही उत्तम तीर्थों में स्नान किया है।

वृत्तशौचं मनःशौचं तीर्थशौचमतः परम्।

ज्ञानोत्पन्न च यत्छौचं तच्छौचं परमं स्मृतम्॥ 11॥

सदाचार शुद्धि, मन की शुद्धि तथा तीर्थ शुद्धि इस प्रकार तीन प्रकार की शुद्धि कही हैं इनमें ज्ञान से जो शुद्धि होती है उसको उत्तम शुद्धि समझना चाहिए।


सफलता का रहस्य

(ले. श्री. नारायणप्रसाद तिवारी, कान्हीवाड़ा)

ऐसे अनेक व्यक्ति देखने में आते हैं जो सब प्रकार के साधन उपलब्ध होते हुये भी किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर पाते। जिनकी आर्थिक दशा अच्छी है, विद्या-उपार्जन के साधन प्राप्त हैं, अन्य प्रकार के सहयोग का भी अभाव नहीं है, वे लोग भी जब मुर्दे की तरह एक ही स्थान पर अचल पड़े रहते हैं तब यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि क्यों यह उन्नति नहीं कर पाते। वे स्वयं भी यह सोचते हैं कि जब हमसे सब दृष्टियों में छोटे लोग तरक्की करके बड़े स्थानों में पहुँच गये तो हमें सफलता क्यों नहीं मिलती? वे यथासाध्य प्रयत्न जारी रखते हैं, ईश्वर और धर्म पर विश्वास रखते हैं, मन ही मन देवताओं की मनौती मनाते हैं, परन्तु फल कुछ नहीं होता। निराशा और असफलता के ही बार बार दर्शन करने पड़ते हैं।

सम्भव है ऐसे लोग किसी को सताते न हों, किसी की बुराई न करते हों, किसी के साथ विश्वासघात न करते हों, किसी के साथ अन्याय न करते हों, पर विचार पूर्वक देखने से पता चलता है कि वे अपने साथ बुराई, विश्वासघात और अन्याय अवश्य करते हैं।

अमेरिका के धनपतियों का सिद्धान्त है कि ‘कम से कम खर्च में अधिक काम निकाला जाय’ यह सिद्धान्त केवल रुपया कमाने या कारखाने चलाने के लिए ही नहीं अपितु दैनिक जीवन यात्रा के लिए भी आवश्यक है। हम छोटे काम में अधिक शक्ति खर्च कर देते हैं, परिणामतः अधिक पूँजी में थोड़ा काम होता है। भला ऐसा कारखाना किस प्रकार मुनाफे पर चल सकता है जो लोहे की एक कील बनाने में एक रुपया खर्च कर दे! जो पाव भर दाल उबालने में पाँच सेर लकड़ियाँ जलाता है उसकी रसोई कैसे सस्ती पड़ सकती है। जिन साधन सम्पन्न लोगों को अक्सर असफलता का सामना करना पड़ता है उनको इसी अपव्यय का शिकार पाया जाता है।

जिस कार्य में जितनी शक्ति व्यय करनी है उसमें उतनी ही या उतनी से कम व्यय करनी चाहिए तभी तो लाभ होगा। बहुत से लोग छड़ी को इस तरह लेकर चलते हैं मानो भरी हुई बन्दूक ले जा रहे हों, शौच बैठने में इतना जोर लगाते हैं मानों रस्सा खींच रहे हों। साधारण बात चीत करने में इतने जोर से बोलते हैं मानो किसी से लड़ रहे हों, यह शक्ति का अनावश्यक ह्रास करना है। कुछ लोगों को छोटी बातों पर बहुत सोचने की आदत होती है, कोट में काले बटन लगवाये जायँ या नीले? यह एक समस्या बन जाती है। ताश खेलने में बाजी हार गये तो घण्टों तबियत उदास बनी रहेगी। कई लोग व्यर्थ की बातें सोचते रहते हैं। आप मिठाई की दुकान करते हैं और यह सोचने में लगे रहते हैं कि आराजी एक्ट से जमींदार को कितना नफा नुकसान होगा तो यह उपयोगी नहीं हो सकता। आपके कारखाने में पचास आदमी काम करते हैं उनके काम काज पर ध्यान रखने की अपेक्षा नाली की मरम्मत करने वाले मजदूर के साथ समय खर्च कर रहे हैं तो यह बुद्धिमत्ता न होगी। आप मकान में खुद झाड़ू लगाकर एक रुपये महीने की बचत करें और उतने समय के लिए बच्चों को पढ़ाने के लिए दस रुपए महीने का मास्टर बुलावें तो यह बचत नहीं नुकसान है।

व्यर्थ की गप्पे हाँकने, घण्टों ताश खेलते रहने, दूसरों की अकारण निन्दा स्तुति में लगे रहने, नशेबाजों की आदत डाल लेने, शेखचिल्ली के से मनसुए बाँधते रहने में संचित शक्ति का उपयोगी भाग फिजूल चला जाता है और आवश्यक कार्यों के लिए आवश्यक पूँजी निबट जाती है। जो घर में दो घन्टे लड़कर आया है वह कैसे एक सुन्दर कविता कर लेगा, जिसने रातभर नाटक देखा है वह दफ्तर में जा कर किस प्रकार ठीक ठीक काम कर सकेगा। देखा जाता है कि योग्यता होते हुए भी कई आदमी ठीक प्रकार अपना काम नहीं कर पाते उनके काम अधूरे, बेढंगे और गलतियों से भरे हुए होते हैं। समझना चाहिए कि इन्होंने दूसरे काम में अपनी शक्ति खर्च कर दी है और यहाँ बालू के किले बना रहे हैं। उठती जवानी के नवयुवकों में जब सुस्ती, काहिली, उदासी, पीलापन, दुर्बलता दिखाई पड़े तो यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि इन्होंने अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर डाला है और आवश्यक कार्य करने में दिवालिए बन गए हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि खान से निकल कर इंजन तक जाते जाते कोयले की 99 प्रतिशत शक्ति नष्ट हो जाती है और एक प्रतिशत ही काम में आती है। यही बात असफलता के शिकार हुए लोगों में देखी जाती है। वे अपनी ताकत को न तो संचय ही करते हैं और न उसका ठीक उपयोग। यदि आप कपड़े के व्यापारी हैं तो इसी व्यवसाय की बारीकियों पर विचार करना चाहिए और इसकी वर्तमान तथा भावी स्थिति का चिन्तन करना चाहिए। यदि आप किसी दफ्तर में क्लर्क हैं तो क्या जरूरत है कि आप अपना काम हर्ज करके रेलवे कम्पनी के हानि लाभों की समालोचना करें। आपकी उन्नति का मार्ग तो यही हो सकता है कि जिस कार्य में लगे हुए हैं उसकी और उससे सम्बन्धित अन्य बातों की जानकारी प्राप्त करें एवं दूसरों के मुकाबले में अपने को अधिक उपयोगी सिद्ध करें।

एक समय में एक काम कीजिए, जब जो कार्य करना हो उसमें पूरी शक्ति लगा दीजिए। मनोयोग के साथ काम करने से शरीर और मन की सारी शक्तियाँ एक स्थान पर केन्द्रित हो जाती हैं और तब उस विषय के गुप्त रहस्य प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने लगते हैं। सफलता इन्हीं रहस्यों में छिपी रहती है। जिन छोटे लोगों ने बड़े काम किए हैं उन्होंने जाने अनजाने में इसी नियम को अपना सहायक बनाया है कि ‘शक्ति को ठीक काम में लगाया जाय एक ही ओर झुकाव होने और शक्ति को अनावश्यक नष्ट न होने देने का ध्यान रखने से कम खर्च में ज्यादा काम होने वाला सिद्धान्त पूरा हो जाता है और उन्नति होने में देर नहीं लगती।

बूँद-बूँद इकट्ठा करने से घड़ा भर जाता है। रत्ती रत्ती इकट्ठा कर के मधुमक्खियाँ छत्ते में सेरों शहद जमा कर लेती है। निरंतर एक ही दिशा में थोड़ा थोड़ा भी प्रयत्न करते रहने पर बहुत संग्रह हो सकता है। व्यर्थ की बातों से दूर रहिए। भूतकाल की दुखदायी घटनाओं की बार-बार मत याद कीजिए। सुनहले भविष्य की ओर टकटकी लगाये रहिए। शक्ति को संचय कीजिए, अपने निश्चित लक्ष की ओर उत्साह के साथ बढ़िये, उसी में पूरी ताकत खर्च कर दीजिए। आप का छोटा काम भी इतना सुन्दर होगा कि बड़ों से अधिक महत्व रखेगा। सफलता आपको नवीन उत्साह प्रदान करेगी जिससे प्रेरित होकर आप महानतम कार्यों को आसानी से कर सकेंगे।


क्रोध या भयंकर विषधर?

(ले.-डा. पूनमचन्द्र खत्री, बीकानेर)

क्रोध एक प्रकार का मानसिक रोग है। जिस प्रकार जल अग्नि आदि से मिश्रित वायु की उत्तेजना पाकर मृगी के दौरे आ जाते हैं उसी प्रकार जरा सी भी प्रतिकूल परिस्थिति सामने आते ही क्रोध का दौरा आ जाता है। खाँसी की बीमारी जिसे हो उसके समीप सूखी तम्बाकू का चूरा उड़ा दिया जाय तो बेचारे का बुरा हाल हो जायगा। यदि यह चीजें न उड़ाई जातीं तो सम्भव था कि कुछ देर खाँसी का बीमार चैन से बैठा रहता, पर परिस्थिति अनुकूल पाते ही दौरा अवश्य हो जाता।

जिन लोगों को बार बार असफलता मिलती है, बार-बार अपमान सहना पड़ता है और बार बार मनोवांछाएं अधूरी छोड़नी पड़ती हैं उनके गुप्त मन में एक प्रकार का आघात पहुँचता है और एक प्रकार का मानसिक जख्म हो जाता है। इस आघात की चोट मस्तिष्क की श्वेत बालुका पर पहुँचती है और उनमें एक विशेष तरह की गर्मी पैदा हो जाती है। जिस प्रकार बिजली बहाने वाले तार जब आपस में लड़ जाते हैं तो एक सनसनाहट पैदा हो जाती है और चिनगारियाँ सी उड़ने लगती हैं उसी प्रकार मस्तिष्क की वह उष्ण श्वेत बालुका जरा सी बाहरी कारण मिलते ही झनझना जाती है और शरीर के ज्ञान जंतु उत्तेजित हो उठते हैं। यह उत्तेजना रक्त के दौरे को अत्यन्त तीव्र करती हुई इतनी बढ़ जाती है कि मस्तिष्क के शासन सूत्र अपना कार्य भार संभाले रहने में असमर्थ हो जाते हैं। राजा की गरदन पर एक साथ दस दस सिपाही चढ़ बैठें तो वह उस वक्त कुछ नहीं कर सकता उसे झुकना ही पड़ता है। यही दशा मस्तिष्क की हो जाती है। रक्त की गति और गर्मी की असाधारण वृद्धि के कारण मन के हाथ पाँव फूल जाते हैं, और शरीर जो चाहता है करता रहता है।

क्रोध की दशा में लोग असभ्य गाली बकना, मारपीट करना और कभी कभी तो हत्या जैसे कुकर्म कर डालते हैं। कहते हैं कि क्रोध में आदमी अंधा हो जाता है। गीता कहती है ‘क्रोधात् भवति संमोह, संमोहात् स्मृति विश्राम स्मृति भ्रंशाद्बुद्धिनाशो, बुद्धि नाशात् प्रणाष्यति”॥ अर्थात् क्रोध से क्रमशः संमोह, स्मृति विश्राम, बुद्धिनाश और सर्वनाश होते हैं। क्रोध में किये हुए अनुचित कार्यों के लिए पीछे पछताते और शर्मिंदा होते हैं। बुद्धिमान लोग क्रोध में कहे हुए वाक्यों को यह समझ कर क्षमा कर देते हैं कि उस समय उसका शरीर काबू से बाहर था। जैसे सन्निपात ग्रस्त रोगी यदि कोई अनुचित बात कह देता है या अनुचित कार्य कर बैठता है तो उस पर ध्यान नहीं दिया जाता वैसे ही विचारशील लोग क्रोध में कहे गये वाक्यों को भी समझते हैं।

दुर्बल और अशक्त, अविवेकी और हीनता की भावना रखने वाले लोगों को गुस्सा जल्दी आता है। क्रोध जब तक दूसरे पर ही आता है तब तक वह उग्र नहीं होता। उसका विकट रूप तब होता है जब अपने ऊपर गुस्सा भी उसमें शामिल होता है। बच्चों पर या अपने से कमजोर आदमी पर जो गुस्सा आता है वह हलका होता है क्योंकि मन यह महसूस करता है कि इसे अभी मजा चखा सकता हूँ लेकिन जब आदमी यह महसूस करता है कि मेरी शक्ति इतनी नहीं है कि इससे बात की बात में बदला ले सकूँ तब उसे अपने ऊपर भी क्रोध आता है। अपने ऊपर और दूसरों के ऊपर किया हुआ क्रोध जब एकत्रित होता है तो एक-एक मिलकर ग्यारह का काम देते हैं। अपने ऊपर क्रोध आने वाली बात अत्यंत सूक्ष्म है यह इतने गुप्त प्रकार से होती है कि क्रोधी स्वयं भी उसको जान नहीं पाते। क्रोध का ही दूसरा पहलू कायरता है। स्वाभिमान पर चोट पड़ने से गुप्त मन पर जो प्रतिक्रिया होती है उसमें दोनों बातें हो सकती हैं या तो वह भड़क उठे या दब जाय। यह भड़क उठने की प्रतिक्रिया हुई तब तो कोधा का विकार उत्पन्न हो जाता है। यदि दबने की प्रतिक्रिया हुई तो कायरता, पस्त हिम्मती और निराशा आ जाती है। क्रोध चूँकि गरम चीज है इसलिए लोगों को अधिक दिखाई पड़ती है परंतु कायरता ठंडी होती है इसलिए उसके शिकार हुए असंख्य लोगों का पता किसी को नहीं लग पाता। अपने ऊपर ज्यादती होने पर क्रोध आवे ऐसे लोगों की अपेक्षा ऐसे लोग आपको अधिक मिलेंगे जो उस ज्यादती से डर जायँ और उलटी खुशामद कर के जान की खैर मनावें। इस स्थल पर कायरता वाले पहलू पर प्रकाश न डाल कर क्रोध के बारे में ही पाठकों को कुछ बताना था इसलिए उसी का उल्लेख किया जाता है।

क्रोध का मानसिक रोग किसी कठिन शारीरिक रोग से कम नहीं है। दमा, यकृत-वृद्धि, गठिया आदि रोग जिस प्रकार आदमी को घुला घुला कर मार डालते हैं उसी प्रकार क्रोध का कार्य होता है। कुछ ही दिनों में क्रोधी के रक्त में कई प्रकार के विष उत्पन्न हो जाते हैं जिनकी तीक्ष्णता से धड़ के भीतरी अवयव गलने लगते हैं। गुस्से के समय खून में एक प्रकार की विषैली शकर बहुत बढ़ जाती है। न्यूयार्क के वैज्ञानिकों ने परीक्षण करने के लिए गुस्से में भरे हुए मनुष्य का कुछ बूँद खून लेकर पिचकारी द्वारा खरगोश के शरीर में पहुँचाया। नतीजा यह हुआ कि बाईस मिनट के बाद खरगोश आदमियों को काट के दौड़ने लगा, पैंतीसवें मिनट पर उसने अपने को काटना शुरू कर दिया और एक घंटे के अन्दर पैर पटक पटक कर मर गया। यह विषैली शकर खून को बहुत अशुद्ध कर देती है अशुद्धता के कारण चेहरा और सारा शरीर पीला पड़ जाता है, पाचन शक्ति बिगड़ जाती है। दिल की धड़कन बढ़ जाती है, नसें खिंचती हैं, एवं गर्मी, खुश्की का प्रकोप रहने लगता है। सिर का भारीपन, आँखों तले अंधेरा छाना, कमर में दर्द, जरा सा काम करते ही हांफने लगना, पेशाब पीला होना, यह क्रोध जन्य उपद्रव हैं। अन्य अनेक प्रकार की व्याधियाँ उसके पीछे पड़ जाती हैं। एक अच्छी होती है तो दूसरी उठ खड़ी होती है और दिन-दिन क्षीण होकर मनुष्य अल्पकाल में ही काल के गाल में चला जाता है।

डॉक्टर अरोली और केनन के अनेक परीक्षणों के बाद यह घोषित कर दिया गया है कि क्रोध के कारण अनिवार्यतः उत्पन्न होने वाली रक्त की विषैली शर्करा हाजमा बिगाड़ने के लिए सब से अधिक भयानक है। आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी के स्वास्थ्य निरीक्षक डॉ0 हेमनवर्ड ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि “इस वर्ष परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों में अधिकाँश चिड़चिड़े मिज़ाज के थे।” पागलखानों की रिपोर्ट बताती है कि “क्रोध से उत्पन्न होने वाले मस्तिष्क रोगों ने अनेकों को पागल बना दिया। डॉक्टर जे0 एस्टर का कथन है कि “पन्द्रह मिनट क्रोध करने इसमें शरीर की इतनी शक्ति खर्च हो जाती है जितनी से आदमी साढ़े नौ घण्टे परिश्रम कर सकता है। बाइबिल कहती है ‘‘क्रोध को लेकर सोना अपनी बगल में जहरीले सांप को लेकर सोना है।’’ सचमुच क्रोध की भयंकरता सब दृष्टियों से बहुत अधिक है।

इस महाव्याधि का शरीर और मन पर जो दूषित असर होता है वह जीवन को पूरी तरह असफल बना देता है। अशान्ति, आशंका और आवेश उसे घेरे रहते हैं। पास पड़ोसियों की दृष्टि में वह घृणा का पात्र बन जाता है। गृह कलह छिड़ा रहता है। काम काज और रोजगार में ग्राहक असन्तुष्ट रहते हैं और यदि कही नौकर है तो मालिक अप्रसन्न होता है। एक दिन ऐसी परिस्थिति हो जाती है कि सर्वत्र उसे हानि और असफलता का ही सामना करना पड़ता है एवं जीवन भार प्रतीत होता है। प्रसिद्ध दार्शनिक सेनाका कहते हैं- ‘‘क्रोध शराब की तरह मनुष्य को विचार शून्य तथा दुर्बल एवं लकवे की तरह शक्तिहीन कर देता है। दुर्भाग्य की तरह जिसके पीछे यह पड़ता है उसका सर्वनाश करके ही छोड़ता है।’’

क्रोध की महाव्याधि यदि पीछे पड़ गई है तो उससे छुटकारा पाने का प्रयत्न करना चाहिए यह कैसे मिल सकता है यह जानने के लिए पाठक अगले अंक की प्रतीक्षा करें।


एक अद्भुत घटना

(ले. श्री संतराम बी.ए.)

मेरा जन्म एक बहुत ही छोटे से गाँव में हुआ है। यह गाँव इतना छोटा है कि उसकी जनसंख्या, बच्चे बूढ़े और स्त्री-पुरुष सब मिला कर, तीन सौ से अधिक न होगी। यह होशियारपुर से ढाई मील पूर्व की ओर और बहुत पुराना है, इसलिए इसका नाम ही पुरानी बस्ती है। इसमें खंडहर ही खंडहर पड़े हैं। किसी समय यह पहाड़ी राजों को रोकने के लिए मुसलमान पठानों की छावनी थी इसके चारों ओर कब्रें ही कब्रें हैं। तीन ओर पहाड़ी नाला बहता है। आज से कोई सत्तर वर्ष पूर्व इसके इर्द गिर्द एक बड़ा वन था। अंग्रेजी सरकार ने इसे कटवा डाला है। अब वहाँ नंदन-वन नाम का एक छोटा सा गाँव बस गया है।

जब मैं छोटा सा था, तो अपने यहाँ के किसानों विशेष कर उनकी स्त्रियों से सुना करता था कि अमुक जामुन के पुराने वृक्ष पर चुड़ैल रहा करती थी, अमुक फकीर ने अपने ‘कलाम’ के जोर से भूत और चुड़ैलों को वशीभूत करके एक कूजे में बन्द कर दिया था; और तीन चुड़ैलें नाले के अमुक स्थान में गड़ी पड़ी हैं ताकि वे गाँव में न आ जायँ। एक आदमी तो मेरे बड़े भाई के पास आकर आँखों देखी बात भी सुनाया करते थे। कहते थे कि कल बृहस्पतिवार था। रात सुनसान थी। मैंने अमुक कब्रिस्तान में भूतों और चुड़ैलों की एक बारात निकलती देखी थी। उसके साथ मशालें थीं; बाजे बज रहे थे; चुड़ैलें नाच रहीं थीं। चुड़ैलों के पैर पीछे की ओर मुड़े हुए थे, स्तन, कंधों पर से पीठ की ओर लटक रहे थे और केश बिखरे हुए थे, इत्यादि। मेरे भाई उनसे कहते थे चौधरी जी, यदि यह अद्भुत बारात आप हमें भी कभी दिखावें, तो हम सच मानें। चौधरी जी अगले ही बृहस्पतिवार को दिखाने का वचन देते थे। परन्तु आज तक वह कभी दिखा नहीं सके। नवी गड़रिये ने अनेक बार मुझे भूतों और चुड़ैलों के आँखों देखे वृत्तांत सुनाये, और रात को दिखाने की प्रतिज्ञा भी की। परन्तु अन्त को वह कह देता था कि आपका इनमें विश्वास नहीं, इसलिये आपको नहीं दिखलाये जा सकते।

मैं जब बच्चा था, तब इन भूत बेतालों की बातें सुनकर बहुत डरा करता था। परन्तु बड़ा होकर जब स्कूल में पढ़ने लगा, तो मेरा वह डर विस्मय और आश्चर्य में बदल गया फिर जब कॉलेज में पदार्थ विज्ञान की शिक्षा पाई, विद्वानों का सत्संग किया तो इस आश्चर्य ने मनोरंजन का रूप धारण कर लिया। गाँव के लोगों से भूतों की बात सुनने में मुझे उपन्यास का सार मजा मिलने लगा। पर मन ही मन मैं उन लोगों के मूढ़ विश्वास पर हँसता था। कारण, सत्यार्थ प्रकाश आदि सद्ग्रन्थों के पाठ और भौतिक विज्ञान की शिक्षा से मुझे यह निश्चय हो गया था कि भूत प्रेत आदि का अस्तित्व ही नहीं है। ये अज्ञानी लोगों के निर्बल मन की कल्पना या सृष्टि मात्र हैं। अनेक बार मुझे अकेले होशियार पुर से घर आना पड़ता था रास्ते में पहाड़ी, नाला और कब्रिस्तान पड़ता था। जब मैं वहाँ से गुजरता था, तो भूत प्रेत आदि को मूढ़ लोगों की कल्पना मात्र समझने पर भी स्वतः मेरे मन में भय सा होने लगता था। पर मेरे मन में यह दृढ़ विश्वास था, और अब भी है कि पहले तो भूत प्रेत आदि कोई अमूर्त प्राणी है ही नहीं, क्योंकि श्री भगवद् गीता के अनुसार दूसरा चोला तैयार होने पर ही आत्मा अपने पहले शरीर को छोड़ती है। किन्तु भूत प्रेत के रूप में घूमने के लिए उसके पास कोई शरीर होनी चाहिए, जिससे दुबारा मर कर उसे दूसरी योनि में जाना पड़ेगा। दूसरे यदि कोई ऐसे प्राणी हों भी तो वे निरपराध मनुष्यों का कुछ अनिष्ट नहीं कर सकते। यदि वे अनिष्ट करना भी चाहें तो भगवती गायत्री के जप का कवच उनके आक्रमण को विफल कर सकता है। इसलिए मैं गायत्री का जप शुरू कर देता था। इससे डर बिलकुल जाता रहता था। उस डर को मैं अपने मन की निर्बलता समझता था। मुझे किसी भूत प्रेत के कभी दर्शन नहीं हुए थे।

ऊपर की सब बातें आगे लिखी जाने वाली आश्चर्य जनक घटना की भूमिका मात्र हैं। इस भूमिका के बिना उस घटना का वास्तविक स्वरूप समझ में नहीं आ सकता। अब वह घटना सुनिये।

पुरानी बस्ती से कोई पौन मील के अन्तर पर, पश्चिम की ओर नाले के पार हमारा एक बड़ा सा बाग है। उसके चारों ओर दूर दूर तक गोचर भूमि है। उसमें सरकंडे और कास के बड़े बड़े असंख्य झुण्ड हैं। बसंत में नई घास उगने लगती है, और वर्षाकाल में यह सारी भूमि एक घना बाग बन जाती है। बाँस के फूलने पर वहाँ का दृश्य बड़ा ही रमणीय हो जाता है। चारों ओर विस्तृत निर्जन मैदान में हवा से उन झुँडों के विकंपित होने पर जो गंभीर मर मर ध्वनि निकलती है, वह अन्तरात्मा के अंतस्थल में पहुँचकर, अन्धकारमयी रजनी में भय और विस्मय दोनों उत्पन्न करती है। बाग के एक कोने पर एक छोटी सी कुटिया है। वहाँ कभी एक साधु रहा करता था। परन्तु जिन दिनों की बात मैं करता हूँ, उन दिनों वहाँ कोई साधु न था। उन दिनों एप्रिल मास था। मेरा भतीजा बीमार था। उसे वह कुटिया बहुत पसंद थी। इसलिए वह दिन रात वहीं रहता था। उसके साथ रात को मैं भी वहीं सोता था।

एक दिन-तिथि मुझे याद नहीं रही-सायंकाल का भोजन गाँव में कर के मैं रोगी के लिए एक लोटे में दूध लेकर कुटी को चला। उस समय आकाश में काली घटाएं छाई हुई थीं। हवा बड़े जोरों से चल रही थी। कृष्ण पक्ष की काली रात मेघों के कारण और भी काली हो रही थी। मैं दूध लेकर गाँव से बाहर हुआ ही था कि बूँदा बाँदी होने लगी। वायु की प्रचंडता भी बढ़ने लगी। घने अंधकार में हाथ मारा न सूझता था, रास्ता दिखाई न देता था। उस हवा के थपेड़े और भी गजब ढ़ा रहे थे। मैं पथ भ्रष्ट होकर एक स्थान पर ठहर गया परन्तु बूँदा बाँदी में ठहरना भी कुछ सुख दायक न था। मैं सोच रहा था कि क्या करूं? आगे चलूँ या पीछे लौट जाऊँ ? इतने में कुछ दूर पर मुझे आग की लपट दिख पड़ी। कुछ ही देर में उस आग की शिखाएं बढ़ कर वृक्ष के बराबर ऊँची हो गईं। वे वायु के भँवर के सदृश चक्राकार घूम रही थीं। मैं उस ज्योर्तिमय भंवर की ओर चला। उस समय मेरे मन में नाना प्रकार के विचार उठ रहे थे। बुद्धि भूत प्रेत के अस्तित्व को मानने के लिए तैयार न थी। परन्तु कब्रिस्तान समीप था, इसलिए बचपन के संस्कार जाग्रत् होकर ग्राम वासियों की बातों को सत्य मानने के लिए विवश कर दिये। यह भी सुन रखा था कि दूध लेकर बेतालों की भूमि में जाना अच्छा नहीं होता। मेरे पास इस समय दूध भी था। अंत को मैं गायत्री का कवच धारण कर बेधड़क हो, इस उद्देश्य से उस अद्भुत ज्योति की ओर बढ़ा कि आज भूतों और चुड़ैलों की सचाई की परीक्षा कर के छोड़ूंगा। भाग कर अब प्राण बचाना कठिन है। परन्तु ज्यों ही मैं उस ज्योति स्वरूप के निकट पहुँचा, वह घूमता-घूमता आगे चल दिया। मैंने भी उसका पीछा किया। अब की जब मैं उसमें प्रवेश करने ही को था कि वह बिलकुल गायब हो गया। कुछ देर तक मैं चकित स्तंभित खड़ा रहा। मुझे अब तक यह भी न मालूम होता था कि मैं इस समय कहाँ हूँ। सहसा कुछ दूर पर वही ज्योति फिर प्रकट हुई। मैं फिर उसके पास जाने का प्रयत्न करने लगा। मुझे ऐसा दिखाई पड़ा कि पृथ्वी में से धधक-धधक कर आग की शिखायें निकल रही हैं। पर ज्यों−ही मैं उनके पास पहुँचा, वह ज्योतिर्मय भंवर फिर आगे चल दिया। कुछ दूर तक मैंने उसका अनुगमन किया। परन्तु वह फिर अंतर्ध्यान हो गया। और दुबारा देख न पड़ा।

अब मैं अपने बाग में जाने का प्रयत्न करने लगा। मगर उस तमोराशि में कुछ भी न सूझता था। अंत को, बड़ी कठिनाई से एक बाग में एक दीपक टिमटिमाता दिखाई दिया मैं उसे ही लक्ष्य कर के चल पड़ा। वहाँ पहुँचने पर जान पड़ा कि मैं अपने बाग से बहुत दूर आगे निकल आया हूँ। माली की सहायता से लौट कर मैं अपने बाग में पहुँचा और कुटी में जाकर रोगी को दूध पिलाया।

वह ज्योति क्या थी, इसका मैं अभी तक कुछ भी निश्चय नहीं कर सका। इंग्लैंड में ‘बुकमेन’ नाम की एक मासिक पत्रिका निकलती है। सन् 1923 के क्रिसमस वाले विशेषाँक में बेतालों परियों और स्वप्नों के विषय में बहुत से विचारकों की सम्पत्तियों का संग्रह प्रकाशित हुआ है। विज्ञानाचार्य सर ऑल्विवर लॉज ने भूत बेतालों के विषय में जो सम्मति लिखी है, उसी को मैं यहाँ उद्धृत कर के लेख समाप्त करता हूँ। पाठकों को उनकी सम्मति पढ़ कर उपर्युक्त घटना का विवेचन करने में सुभीता होगा---

आचार्य लॉज लिखते हैं--

‘भूतों की कहानियों का गढ़ना परिकथा (द्धद्बष्ह्लद्बशठ्ठ) का एक अपेक्षा कृत सुकर रूप है। जब तक ऐसी बातों के लिए कोई आधार नहीं प्रतीत हुआ था, तब तक परिकथा का यह प्रकार निरुपद्रव और संभवतः कौतुकमय था। परन्तु अब हमें ऐसी अनेक अद्भुत घटनाओं के घटित होने का ज्ञान है, जिनका कोई समाधान नहीं हो सकता। उनके अन्वेषण और सचाई को छान कर भूल से अलग करने के लिए भारी प्रयत्न किया जा रहा है। इसलिए काल्पनिक क्षोभ कारी घटनाओं के गढ़ने की अब आवश्यकता नहीं है। इससे जो लोग साक्षी के विषय में शंका शील नहीं हैं उनके गड़बड़ में पड़ जाने का डर है। “

“जिस बात में वस्तुतः जनता की रुचि है, वह लोकोत्तर अनुभवों में अन्तर्निहित सत्य की मात्रा और उसमें लिपटे हुए अर्थ हैं। निर्दोष परिणामों पर पहुँचने के लिए प्रयत्न निरंतर पक्षपात रहित अध्ययन का प्रयोजन है, कल्पनात्मक वृत्तान्तों को गढ़ना इस काम के लिए निष्फल है। इसकी जनता को वास्तव में आवश्यकता नहीं।”

“सत्य घटनाओं के पूर्ण सूत्र निकालने के लिए समय अभी पूरी तरह से परिपक्व नहीं हुआ। परन्तु जब वह समय आवेगा, तो मुझे विश्वास है कि सचाई परिकथा से अधिक अद्भुत मालूम होगी, और कल्पना कदाचित, बाह्य रूप से ही नहीं बल्कि गंभीरता पूर्वक भी सत्यता से नीचे गिर पड़ेगी।

- माधुरी से


Quotation

अपने हृदय को आवाज की सुनी। वही परमात्मा की आवाज है और वही महामंगलकारिणी है। यह आवाज सबके हृदय में है, परन्तु सुन कर के भी उसके अनुसार चलना न चलना अपना काम है। ध्यान दो कोई बुरा काम करने को नीयत करने पर हमारा हृदय खुद बोल उठता है। यही ईश्वर का नक्कारा है।


प्राणायाम की सुगम क्रिया

(ले.-डा. गोविन्द प्रसाद कौशिक, राधा कुण्ड)

गत अंक में बता चुका हूँ कि प्राणायाम और स्वास्थ्य का कितना गहरा संबंध है। अखंड ज्योति के पाठकों से मुझे इतनी आशा तो करनी ही चाहिए कि वे इस मोटी बात को जरूर जानते और मानते होंगे जो बात शरीर को उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करने वाली होगी वह मन को लाभ अवश्य पहुंचायेगी। क्या प्राणायाम का लाभ केवल शरीर-रक्षा तक ही सीमित है? नहीं! उसके लाभ अगणित हैं और मन के ऊपर उसका विशेष प्रभाव पड़ता है। आन्तरिक शुद्धि के लिए योगी लोग प्राणायाम को अपूर्व अस्त्र मानते हैं। महर्षि पातंजलि ने योग दर्शन में कहा है-”किंच धारण सुच योग्यता मनस।” 2। 53 अर्थात् प्राणायाम से मन की एकाग्रता और सूक्ष्मता होती है। चंचल मन को वश में करने के लिए प्राणायाम का हथियार बहुत उपयुक्त सिद्ध होता है। वे और भी कहते हैं “ततः क्षीयतेप्रकाशावरणम्” 2। 52 अर्थात् प्राणायाम से अन्धकार का आवरण क्षीण होता है। हृदय में अज्ञान और कुविचारों के कारण एक प्रकार का अन्धकार हो जाता है। कर्तव्य-पथ सूझ नहीं पड़ता और प्रकाश के अभाव में सद्वृत्तियों का विकास नहीं होता। इस आवरण को हटाने की प्राणायाम के प्रकाश में सामर्थ्य है। मन का संयम होने और अन्धकार मिट जाने पर मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल एवं संस्कृत हो जाता है और उसकी गति ऊर्ध्व धर्म की ओर प्रेरित होती है। भगवान मनु कहते हैं-दह्यन्ते ध्यायमानानाँ धातूनाँ हि यथा मलाः। तथेन्द्रियाणाँ दह्यन्ते दोषाः प्राणास्य निग्रहात्॥ (मनुस्मृति 6। 71) अर्थात् तपाने से जैसे धातुओं के मल नष्ट हो जाते हैं वैसे ही प्राणायाम से इन्द्रियों के दोष जल जाते हैं। दोष रहित निर्मल इन्द्रियाँ आत्मा की कितनी श्रेष्ठ मित्र हो सकती हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं। संयमी मन से आप अपने पेशे में आशातीत उन्नति कर सकते हैं सब प्रकार की साँसारिक और मानसिक सिद्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं। निर्मल इन्द्रियों से स्वस्थ दीर्घ जीवन प्राप्त होता है कार्य क्षमता और उपार्जन शक्ति बढ़ती है। एक शब्द में यों कह सकते हैं कि आनन्द प्राप्त करने के यह दोनों सर्वश्रेष्ठ साधन प्राणायाम के द्वारा उपलब्ध हो जाते हैं।

प्राणायाम की उच्चकोटि की उपासना के अभ्यास से आश्चर्य जनक सिद्धियां मिलती हैं। ऊँची अवस्था में जाकर प्राणों का इतना संयम हो जाता है कि महात्मा लोग प्राणों की गति अपनी इच्छानुसार मृत्यु को वश में कर लेते हैं और वे जब तक चाहते हैं एक ही शरीर को धारण किये रहते हैं। वर्षों की समाधि लगा जाना प्राणों का संयम नहीं तो और क्या है?

इस स्थल पर प्राणायाम की उन कठिन और उच्चकोटि की साधनाओं का वर्णन करना उचित न होगा जिनको योगी लोग ही अपने कार्यक्रम में सम्मिलित कर सकते हैं। यहाँ कुछ ऐसी साधारण प्राणायाम क्रियाओं का बताना अधिक उपयोगी होगा जिन्हें साधारण काम काजी लोग अपने दैनिक कार्यक्रम में शामिल कर सकें और यदि कोई छोटी-मोटी भूल हो जाय तो किसी खतरे का सामना न करना पड़े।

प्राणायाम का अभ्यास करने के लिए प्रातः काल का समय बहुत अच्छा है। नित्यकर्म से निवृत्त होकर खुली और शुद्ध वायु में अभ्यास के लिये जाना चाहिए। चौकी पर बैठना ठीक है पर यदि जमीन पर बैठना पड़े तो आसन अवश्य बिछा लेना चाहिए। क्योंकि यद्यपि निर्बलों को पृथ्वी से कुछ बल मिलता है तथापि प्राण आकर्षण करने की क्रियाओं द्वारा शरीर में जो विशेष प्राण का संचय होता है वह पृथ्वी की आकर्षण शक्ति द्वारा खिंच जाता है और अभ्यासी वास्तविक लाभ से वंचित रह जाता है। एक ही आसन लगाकर बैठना चाहिए। पद्मासन अच्छा आसन है पर यदि उससे बैठने में कठिनाई होती है तो साधारण रीति से पाल्ती मार कर बैठ सकते हैं। रीढ़ की हड्डी बिलकुल सीधी रहे। झुके हुए कंधे फेफड़ों पर दबाव डालते हैं जिससे छाती में पूरी हवा नहीं भर पाती। हाथों को जहाँ तहाँ पटकने की अपेक्षा दोनों घुटनों पर रख लेना सुविधाजनक होता है।

उपरोक्त विधि से ठीक प्रकार बैठ कर पाँच मिनट चित्त को बिलकुल शान्त करना चाहिए मन में जो भी भले बुरे विचार हों उन सबको हटाकर चित्त को बिलकुल शान्त और शून्य करना चाहिए। अब प्राणायाम की क्रिया करने का ठीक समय है।

धीरे धीरे नासिका के मार्ग से साँस बाहर निकालिए जब पूरी तरह हवा बाहर निकल जाय तब उसे बाहर ही रोक दीजिए अर्थात् कुछ देर बिना हवा के बने रहिए फिर धीरे धीरे साँस भीतर खींचिये। यह प्राणायाम का आधा भाग हुआ। योग शास्त्र के शब्दों में हवा बाहर निकालने को ‘रेचक’ बाहर रोके रहने को ‘बाह्यकुँभक’ और भीतर खींचने को ‘पूरक’ कहते हैं। अभी आधा प्राणायाम आपको और करना है। पूरक द्वारा जब पूरी हवा भीतर खींच चुकें तो उसे भीतर रोक दीजिए इसे ‘अभ्यान्तर कुँभक’ कहा जाता है। अब फिर हवा को बाहर निकाल दीजिए यह पूरा प्राणायाम हो गया। कुछ देर बिना हवा के रहना फिर धीरे-धीरे खींचना, भीतर रोके रहना और अंत में उसे निकाल देना यह चार क्रियायें करने पर एक प्राणायाम होते हैं। ऐसे कई प्राणायाम एक बार में करने चाहिएं।

इन क्रियाओं को करते समय जल्दी करने की जरूरत नहीं है। धीरे धीरे अभ्यास करना अच्छा है। हवा को इतनी देर तक बाहर निकाले रहना या भीतर रोके रहना ठीक न होगा जिससे जी घबराने लगे। हर क्रिया के समय में वृद्धि होना अच्छा है पर जबरदस्ती का अभ्यास लाभप्रद न होगा। धीरे धीरे निरंतर के प्रयत्न से साँस को रोके रहने, बाहर छोड़े रहने, खींचने और निकालने के समय में अपने आप वृद्धि होती है। यही अभ्यास लाभ दायक है। आरंभ में दस बार प्राणायाम करना काफी है फिर एक एक प्रति दिन बढ़ाया जा सकता है।

हिन्दू धर्म के विभिन्न संप्रदायों की विभिन्न पुस्तकों में प्राणायाम के समय अलग अलग मंत्र जपने का विधान है। इन मंत्रों का उद्देश्य प्रायः एक ही है। उनके निर्माताओं की इच्छा है कि साधक ऐसी भावना करे कि प्राणायाम या उसके मंत्र द्वारा मुझमें विशेष शक्ति का समावेश हो रहा है। आप को यदि कोई मंत्र याद नहीं है तो कोई प्हर्ज नहीं, आप वायु खींचते समय भावना कीजिए कि मैं प्रकृति को पोषक तत्वों को सांस के साथ खींच रहा हूँ। भीतर रोके रहने के समय में चिन्तन कीजिए कि खींचे हुए तत्व मेरे अंग प्रत्यंग में व्याप्त हो रहे हैं। वायु निकालते समय कल्पना कीजिए कि अपने अंदर के तमाम शारीरिक और मानसिक कषायों को बाहर फेंक रहा हूँ। हवा को बाहर रोकते समय सोचिये मेरे सब विकार बाहर चले गये हैं और मैंने अपने अन्दर का दरवाजा बन्द करके उनका फिर से भीतर प्रवेश कर सकना असंभव कर दिया है। इस प्रकार की सुदृढ़ भावना किसी भी मन्त्र से कम उपयोगी साबित नहीं होती। मन्त्र या भावना का जप मन ही मन होना चाहिये। होट या जबान हिलाने की जरूरत नहीं। आप निर्भय होकर इस सरल प्राणायाम का अभ्यास आरम्भ कर सकते हैं। कुछ ही दिनों में आपको अद्भुत लाभ दिखाई पड़ने लगेगा।

*समाप्त*


भगवत् (kavita)

ले॰ श्री भगवत्स्वरुप जैन (भगवत्)

दौर्बल्य निशा अब दूर हटो,

जागा है मन में बल विहान।

होने अब लगा दृष्टि गत है,

जगमग भविष्य का भासमान।।१।।

आओ, निशंक होकर खेलो,

अभिमन्युवीर के रण कौशल।

बतला मैं सकूँ विश्व भर को,

किस को कहते हैं पौरुष बल।।

है मातृभूमि पर आत्म त्याग,

कर देगा कितना सुलभ कठिन?

यह शुभार्दश, जो हो न सके,

दुनियाँ की आँखों से ओझल।।२।।

घुल मिल जाओ तुम प्राणों में,

ऐ धर्मराज के अटल सत्य।

कर सकूँ सफल नर काया का,

पालन कर आवश्यक सुकृत्य।।

विश्वोपकार में लगे हृदय,

हो लघुता का मन से विनाश-

स्थापित जो हो सके भव्य,

निष्कपट प्रेम का आधिपत्य।।३।।


अखण्ड ज्योति परिवार

तात तुम्हारा अन्तर चूमूँ, हृदय लगाऊँ आओ।

मेरी पीड़ा उमड़ी, तुम भी चुल्लू भर पी जाओ।।

पाठक आओ। आज हृदय खोलकर अपनी कुछ कह सुन लें। हमारा आपका सम्बन्ध मामूली दुकानदार और बाजारी ग्राहक का नहीं। हम कागज छाप कर बेचने वाले और आप वक्त काटने के लिए अखबार मोंल लेने वाले नहीं है। हम आप एक महान पथ के पथिक के रूप में अपना सम्बन्ध स्थापित करते हैं। अखण्ड ज्योति हम लोगों के विचारों, अनुभवों और जिज्ञासाओं को एक दूसरे के पास पहुँचाने वाली सन्देश वाहिका सेविका है। हम लोग अपनी एक छोटी दुनियाँ अलग बसाते हैं, हम आना एक परिवार अलग कायम करते हैं। हो सकता है कि आप सेठ, साहूकार, राजा, धनी, विद्वान, बलवान, शक्तिशाली, अधिकारी, उच्च पद प्राप्त, सौभाग्यशाली अथवा दीन, दरिद्र, अशिक्षित, रोगी, निर्बल, दुखी, शक्तिहीन, पीड़ित, चिन्तित और साधन हीन हों। पुरुष अथवा स्त्री, बालक अथवा बालिका का रूप धारण किये हों, पर यह सब भेद भाव बाहरी है। यह सब बाहरी आवरण मात्र हैं। मान लीजिए कि सब प्रकार की बाहरी स्थितियाँ एक प्रकार के कपड़े हैं। क्षण भर के लिए अपने इन सब कपड़ों को उतार कर बाहर रख दीजिए और बिल्कुल नंगे होकर मेरी कुटी में चले आइये। अब हम सब एक समान हैं। न तो हममें से कोई राजा है और न रंक, न कोई विद्वान है न कोई अशिक्षित, न कोई सशक्त है न कोई रोगी, स्त्री पुरुष का भेद और आयु का भेद भी हम लोगों के बीच नहीं है। सब उस एक अखण्ड अमर और आदि अन्त रहित, सच्चिदानन्द महान तत्व के अंश हैं, जिसे राम, रहीम या चाहे जिस नाम से पुकारा जा सकता है। ‘‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’’ हम शरीर धारी जीव मनुष्य उसी महासूर्य की किरणें हैं, उसी एक अखण्ड ज्योति की प्रकाश रश्मियाँ हैं। हम सब केवल भाई, सहोदर, साथी और मित्र ही नहीं वरन् इससे भी कुछ अधिक हैं। सूर्य की एक किरण से दूसरी का जो सम्बन्ध है, रूपये की एक पीठ से दूसरी का जो सम्बन्ध है, शरीर के एक अंग से दूसरे का जो सम्बन्ध है वही सम्बन्ध हम लोगों के बीच में हैं। दो बर्तनों में भरे हुए वायु के अंश, क्या एक दूसरे से अलग हैं? क्या उनके बीच कोई अलग सम्बन्ध स्थापित करने की जरूरत पड़ेगी? नहीं, वह एक ही हैं। स्थूल बुद्धि से अलग दिखाई देते हैं पर वास्तविकता ऐसी नहीं है। आप हमसे बहुत दूर स्थान पर बैठे हुए हैं, हमसे भिन्न स्थिति में हैं परन्तु हम आप एक हैं, आत्मीय हैं, अभिन्न हैं। इस पृथ्वी के विकास और विनाश में असंख्य युग लगेंगे ऐसी असंख्य असंख्य पृथ्वियों का विकास विनाश हुआ और होने वाला हैं। अब जरा लम्बी दृष्टि पसार का भूत और भविष्य के जीवन काल को देखिए। उसमें इतने युगों का समय निहित है जिसकी गणना ही यदि जीवन भर की जाय तो हो नहीं सकती। फिर हम आदि अंत हीन जीवों के इस छोटे जीवन का समय तो उसे देखते हुए इतना है जितना समस्त पृथ्वी के मुकाबले में धूलि का नन्हा सा परमाणु। इतने छोटे जीवन की परिस्थिति भिन्नता के कारण ही क्या हम एक दूसरे से अलग हो सकते हैं? नहीं। हम सब एक हैं। जीवन के चंचल और क्षण भंगुर आवरण हमारे आपके बीच में किसी प्रकार की खाई पैदा नहीं कर सकते।

इसलिए हे अभिन्न, हम आप आपस में पूर्ण एैक्य का अनुभव करते हुए एक नई दुनियाँ बसाते हैं, एक नया परिवार बनाते हैं। नई दुनियाँ क्यों? नया परिवार क्यों? जब हम सब सनातन और शाश्वत है तो नयापन क्यों? यह प्रश्न स्वाभाविक हैं, परन्तु जरा गंभीरता से विचार करने पर इनका समाधान हो जाता है। नयापन तब आता है या लाया जाता है जब प्राचीनता में कुछ दोष आ जाता है। निर्दोष प्राचीनता में कोई नवीनता लाई ही नहीं जा सकती। आज हमारी प्राचीनता कुछ सदोष हो गई है। हम लोग जिस स्थिति में है वह दुखदायी हो गई है। हमारी आत्मा आनन्दमय है, स्वभावतः हमें आनन्द मिलना चाहिए। आनन्द के लिए हमारा जन्म हुआ है, हमारे चारों ओर आनन्द का महा समुद्र लहलहा रहा है, परन्तु सदोष प्राचीनता के आवरण ने मुँह पर ऐसी पट्टी बाँध दी है कि सामने रखे हुए अमृत को चख नहीं पाते और भूख के मारे त्राहि- त्राहि चिल्ला रहे हैं। जो घोड़े हमें चढ़ने को मिले थे वे हमारे ऊपर सवार हो गये हैं? नौकरों ने बादशाहत अख्तियार कर ली है। हथियारों ने हमें अपना चौकीदार बना लिया है। मनोविनोद की शतरंज के सिपाही, प्यादे, घोड़े, ऊँट एक फौज बना कर लड़ने के लिए सामने आ खड़े हुए हैं। और हम इन परिस्थितियों को देख कर अज्ञानी बालक की तरह सकपका गये हैं तथा अपने को भेड़ियों के सुपुर्द कर दिया है। फलस्वरुप आनन्द से वंचित हो गये हैं और चारों ओर दुख ही दुख दिखाई पड़ता है। यही प्राचीनता का दोष है। वर्तमान परिस्थितियों ने हमारी दृष्टि ऐसी बहिर्मुखी बना दी है कि अपनापन बिलकुल भूल गये हैं। बिल्ली को देखकर हँसते है और ऊँट को देखकर रो पड़ते हैं। पुत्र, धन, यश प्राप्त हुए तो उछलते हैं, नष्ट हुए तो रोकर घर भर देते हैं। किसी ने कुछ हानि पहुँचाई तो बदले की भावना से हृदय में भट्टी जल उठती है। ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, ममता, मद, मत्सर, लोभ रूपी नटों हाथ में पड़कर कठ पुतली की तरह हम नाचा करते हैं और थकान एवं दुख से छटपटा रहे हैं। मान लिया कि आप भाग्यशाली हैं आपके पास जर, जोरू, जमीन है, पर जब सन्तोष नहीं तो आप किस प्रकार अपने को भिखारी से अधिक मानते हैं? सदोष प्राचीनता से हमारा तात्पर्य इसी भूतकाल से लिपटी हुई विकार और अविवेकपूर्ण स्थिति से है। इसी प्रचीनता से छुटकारा पाने के लिए हम नई दुनियाँ, नया परिवार बनाते हैं। अब हम दुखों की कटीली झाड़ियों में भटकते हुए आजिज आ गये हैं, शान्ति के उद्यान में विश्राम करने की इच्छा करते हैं। इस शान्ति मन्दिर की टोह में चलते हुये जो साथी हमें मिल जाते हैं वे ही हमारे परिवारी हैं। अखण्ड ज्योति परिवार उन जिज्ञासु, ज्ञान पिपासु और आनन्द खोजी पथिकों का जखीरा बनना चाहता है। इस जखीरे के सब रास्तागीर, जितना जिससे बन पड़ेगा आनन्द मार्ग, ईश्वर, भक्ति पथ और सदाचार की राह पर चलते हुए सच्चा शान्ति ढ़ूँढ़ने का प्रयत्न करेंगे। सब साथी एक दूसरे को अपना अनुभव बताने और सहयोग देने को तत्पर रहेंगे।

तब क्या यह कोई संस्था है? नहीं। विलायती प्रजातन्त्र की नकल करके जिस प्रकार की संस्थायें आजकल बन रही हैं ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ हरगिज उस तरह की कोई संस्था नहीं है। हमारे कुटुम्ब में दस आदमी हैं वे सब एक दूसरे के हित को अपना हित समझते हुये सम्मिलित स्वार्थ होकर रहते हैं, यदि यह कुटुम्ब संस्था है तो अखण्ड ज्योति परिवार भी संस्था हो सकती है।

हमें परवाह नहीं कि आपकी उदरपूर्ण कैसे होती है। हमें परवाह नहीं कि आप धनी हैं या निधन। जो कुछ आप हैं रहिये। अधिक धन है तो उसे सत्कर्मों में लगाइये, निर्धन हैं तो परिश्रम करके अधिक कमाइये। हमारी चिंता केवल एक है वह यह कि आप अनन्त आनन्द से वंचित न रहें, आपका हृदय विकारों की भट्टी न बना रहे। धन, दौलत, जमीन, जायदाद, पुत्र, स्त्री, सुन्दरता के भण्डार हमारे पास नहीं हैं यह चीजें हम आपको नहीं दे सकते, पर आप चाहें तो उस खजाने को उंगली के इशारे से बता सकते हैं जिसे पाकर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। यह खजाना आपके अपने अन्दर हैं। अन्तर्मुख हूजिये, अपने गरेबां में मुँह डालिये, आत्म निरीक्षण कीजिए। एकान्त में बैठकर अपने को सब से अलग एकाकी अनुभव कीजिये और खयाल कीजिए कि शरीर रूपी कपड़े को उतार कर अलग रख दिया है। अब एक कुशल डाक्टर की भाँति अपने सूक्ष्म शरीर का परीक्षण कीजिए, अच्छी तरह तलाश कीजिए कि इसमें कौन- कौन शैतान के दूत छिपे बैठे हैं। उनका रूप भली प्रकार परखिए और सोचिए कि असल में आप हैं क्या? और किस प्रकार क्या बन गये हैं?

कुछ समय तक लगातार अन्तर्मुख होने के बाद आप की पीड़ा मेरी तरह उमड़ पड़ेगी तब आप अखण्ड ज्योति परिवार के सच्चे सदस्य होंगे। ऐसे सदस्यों की आत्मा को चूमता हुआ उनके हृदय से लग जाने के लिए मैं व्याकुल हो रहा हूँ।


अहिंसा

ले. महात्मा गाँधी

सत्य का, अहिंसा का मार्ग सीधा है, संकड़ा भी है। तलवार की धार पर चलने के समान है। नट लोग जिस रस्सी पर एक निगाह रख कर चल सकते हैं, सत्य और अहिंसा की रस्सी उससे भी पतली है। जरा भी असावधानी हुई कि नीचे गिरे। प्रति पल साधना करने से ही उसके दर्शन हो सकते हैं।लेकिन सत्य के संपूर्ण दर्शन तो देह द्वारा हो नहीं सकते असम्भव हैं। उसकी तो केवल कल्पना ही की जा सकती है, क्षण भंगुर देह द्वारा शाश्वत धर्म का साक्षात्कार होना संभव नहीं। इसलिए आखिर श्रद्धा का उपयोग तो करना ही होता है।

इसी से जिज्ञासु को अहिंसा मिली। मेरे रास्ते में जो मुसीबतें आवें, उन्हें मैं सहूँ या उनके लिए जिनका नाश करना पड़े उनका नाश करता जाऊँ और अपना रास्ता तय करू? जिज्ञासु के सामने यह सवाल खड़ा हुआ। उसने देखा कि अगर नाश करता चलता है तो वह बाहर नहीं पर अन्तर में हैं, इसलिए जैसे- जैसे नाश करता जाता है वैसे- वैसे पिछड़ता जाता है। सत्य से दूर हटता जाता है।

चोर हमें सताये हैं। उनसे बचने के लिए हम उन्हें मारते हैं। उस वक्त भाग गये पर दूसरी जगह जाकर छापा मारा। यह दूसरी जगह भी हमारी है, यों हम एक अंधेरी गली से जाकर टकराये। चोरों का उपद्रव बढ़ता गया। क्योंकि उन्होंने तो चोरी को कर्तव्य माना है। हम देख चुके है कि इससे अच्छा यह है कि चोर का उपद्रव सह लिया जाय। ऐसा करने से चोर में समझ आवेगी। इतना सहन करने से हम देखेंगे कि चोर हमसे जुदा नहीं है, हमारे मन तो सब हमारे सगे हैं, रिश्तेदार हैं, मित्र हैं। उन्हें सजा नहीं की जा सकती। लेकिन अकेला उपद्रव सहते जाना भी बस नहीं होगा, इससे कायरता पैदा हो सकती है। इससे हमने अपना एक दूसरा विशेष धर्म समझा। चोर यदि हमारे भाई बन्द हैं तो हमें उनमें वैसी भावना पैदा करनी चाहिए। अर्थात उन्हें अपनाने के लिए उपाय सोचने की तकलीफ उठानी चाहिए। यह अहिंसा का मार्ग है। इससे उत्तरोत्तर दुख ही उठाना पड़ता है। अखण्ड धैर्य धारण करना सीखना पड़ता है। और यदि ऐसा हुआ तो आखिर चोर साहूकार बनता है, हमें सत्य के अधिक स्पष्ट दर्शन होते हैं। इस तरह हम जगत को मित्र बनाना सीखते हैं। ईश्वर की, सत्य की महिमा अधिकाधिक जान पड़ती है। संकट सहते हुए भी शान्ति और सुख की वृद्धि होती है। हमारा साहस हिम्मत बढ़ती है। हम शाश्वत अशाश्वत के भेद को अधिक समझने लगते हैं। कर्तव्य अकर्तव्य का विचार करना सीखते हैं। अभिमान दूर होता है। नम्रता बढ़ती है। अपरिग्रह सहज ही कम होता है और देह के अन्दर भरा हुआ मैल रोज कम होता जाता है।

आज हम जिस स्थूल वस्तु को देखते हैं वही यह अहिंसा नही है। किसी को कभी न मारना तो है ही, कुविचार मात्र हिंसा है। उतावलापन, जल्दीपन हिंसा है। किसी का बुरा चाहना हिंसा है। जिसकी दुनियाँ को जरूरत है उस पर कब्जा रखना भी हिंसा है। लेकिन यों तो हम जो खाते हैं उसकी भी दुनियाँ को जरूरत है। जहाँ खड़े हैं वहाँ सैकड़ों सूक्ष्म जीव पड़े होते हैं, वे घबराते हैं। वह जगह उनकी है। तो क्या आत्म हत्या कर लें? यह भी ठीक नहीं। विचार में देह की सब तरह की लाग- लपट को छोड़ने से आखिर देह हमें छोड़ देगी। यह अमूर्छित स्वरूप ही सत्य नारायण है, इस प्रकार के दर्शन अधीर अधीर होने से नहीं हो सकते। देह हमाराी नहीं है, यों समझ कर हमें मिली हुई थाती धरोहर के रूप में हम उसका उपयोग कर सकें सो करके अपना रास्ता तय करते जाय।

मुझे लिखना तो था सरल पर लिख गया कठिन। तो भी जिसने अहिंसा का थोड़ा भी विचार किया होगा उसे यह समझने में मुश्किल न आनी चाहिए।

इतना सब समझ ले कि अहिंसा के बिना सत्य की खोज असम्भव है। अहिंसा और सत्य इतने ही ओत- प्रोत हैं, जितनी सिक्के के दोनों बाजू या चिकनी चकरी के दोनों पहलु, उनमें कौन उलटा है और कौन सीधा है। तो भी अहिंसा को हम साधन मानें, सत्य को साध्य। साधन हमारे हाथ की बात है इसी से अहिंसा परम धर्म कही गई और सत्य परमेश्वर हुआ। साधना की फिक्र करते रहेंगे तो साध्य के दर्शन किसी न किसी दिन तो कर ही लेंगे। इतना निश्चय किया कि बेड़ा पार हुआ। हमारे मार्ग में चाहे जो संकट आवें, बाह्य दृष्टि से देखने में हमारी चाहे जितनी हार होती दिखाई पड़े तथापि विश्वास को न डिगाते हुए हम एक ही मन्त्र जपे, जो सत्य है वही परमेश्वर है, इसके साक्षात्कार का एक ही मार्ग, एक ही साधन, अहिंसा है, उसे कभी न छोड़ूँगा। जिस सत्य रूप परमेश्वर के नाम यह प्रतिज्ञा की है, उसका पालन करने का वह बल दे।

सप्त महाव्रत से


Quotation

जो सुमार्ग से भटके हुए हैं, उन्हें प्यार से समझा कर राह पर लाओ। दुर्जनों के सुधार के लिए भी कोमल बात, कठोर लात से उपयोगी है।

*****क्षण भंगुर वस्तुऐं तुम्हें क्या सुख दे सकती हैं, जो स्वयं मरने जा रहा है वह तुम्हें क्या जिलावेगा। वास्तविक सुख देने वाली वस्तुऐं वह हैं जो स्वयं स्थायी और अमर हैं।

***** मनुष्य का महत्त्व उसकी ताकत, विद्या, बुद्धि या लक्ष्मी में नहीं वरन् उसका बड़प्पन ईमानदारी और परोपकार में निहित है।


चंचल मन और उसका संयम

(ले. ठा. रामसिंह जी चौहान, आँवलखेड़ा)

भगवान शंकराचार्य कहते हैं- जितं जगत् केन, मनोहि येन। अर्थात् मन को किसने जीता? उत्तर- जिसने मन को जीता। मन को जीतने का इतना महत्त्व इसलिये दिया गया हैकि बिना इसके हमारे दैनिक जीवन के छोटे मोटे काम भी पूरे नहीं हो सकते। फिर अध्यात्म पथ पर चलना तो हो ही कैसे सकता है। शास्त्रों ने एक स्वर से कहा है- असंयतात्मना योगो दुष्प्राप्यइति मे मतिः। मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः। येागश्चित्त वृत्ति निरोधः ।। सबका तात्पर्य एक ही है- मन का संयम किये बिना, चित्त वृत्तियाँ रोके बिना, विचारों को एक स्थान पर केन्द्रित किये बिना, कुछ नहीं हो सकता। मन की आज्ञानुसार शरीर काम करता है। यदि मन क्षण में यहाँ, क्षण में वहाँ भटकता फिरे और तरह तरह की इच्छाऐं करता रहे तो शारीरिक शक्तियों को भी क्षण- क्षण में अपना व्यापार बदलना पड़ेगा। जो घोड़ा पचास कदम पूर्व को और साठ कदम पश्चिम को चले, बीस छलाँग दक्खिन को मारे और पन्द्रह कदम उत्तर को लौट पड़े, वह दिन भर में कितनी दूर चल लेगा? निश्चय ही वह बेकार अपनी शक्ति को गवाँता रहेगा और किसी उत्तम स्थान पर पहुँचना तो दूर, सम्भव है पहली जगह में भी न पहुँचे। यही बात निरुद्देश्य और अस्थिर मन की है। मन की उपमा उन विषों से दी जा सकती है जो अशुद्ध और मलीन हो तो प्राणघात कर सकते हैं किन्तु शास्त्रीय विधि से शोधन कर देने पर रसायन बन कर अमृत तुल्य गुणकारी सिद्ध होते हैं।

गीता में कहा है आत्मैव आत्मनों मित्रः आत्मच रिपुरात्मनः। आत्मा ही आत्मा मित्र और आत्मा ही आत्मा का शत्रु है। बाहरी शत्रु हजार प्रयत्न करने पर भी इतनी हानि नहीं पहुँचा सकते, जितना छुट्टल मन बात की बात में पहुँचाता है। पेट में भूख नहीं है पर मन महाशय ललचाये कि चलों मिठाई या चाट उड़ावें। दुकान पर पहुँचे और अनाप शनाप पेट में ठूँसा, थोड़ी ही देर में पेट में दर्द होने लगा, बीमार पड़ गये, दस्त चलने लगे। चिकित्सा में काफी धन खर्च करना पड़ा, जितने दिन चारपाई पर पड़े रहे उतने दिन की आमदनी मारी गई, स्वयं कष्ट उठाया, घरवाले परेशान हुए और इस भागदौड़ में एक दो बने बनाये काम बिगड़ गये। हिसाब लगाने पर मालूम पड़ेगा कि मन ने जरा सा फुसला कर कितनी हानि पहुँचाई। इतनी हानि बाहरी शत्रु आसानी से नहीं पहुँचा सकते थे। मन ललचाता है और हम व्यभिचार, चोरी, जुआ की ओर झुक जाते हैं। पैसा पास नहीं हैं, पर चमकीला ठाट- बाट बनाने, सिनेमा सरकस देखते, चुरट पीने की मन में इच्छायें उठती हैं, शरीर इन्द्रियाँ और बुद्धि उसके साधन जुटाने के लिए पिल पड़ती हैं, पैसा प्राप्त किया जाता है। वह किस प्रकार प्राप्त किया? इस कहानी के पीछे बड़ी- बड़ी वीभत्स कथायें छिपी होती हैं। आये दिन हम अखबारों में पढ़ते हैं अमुक स्थान पर एक छोटे बालक का जेवर के लिए गला घोंट कर किसी ने कुए में पटक दिया, अमुक स्थान पर डाकुओं ने छिपा हुआ धन पाने कि लिए स्त्री बच्चों की भी हत्या कर डाली, अमुक रास्तागीर कत्ल किया हुआ पाया गया उसका माल आसबाब गायब था, अमुक व्यक्ति का धन हड़पने के लिए उसके भाई ने विष खिला दिया यह निर्मम घटनायें हैं। चोरी आदि छोटे- छोटे ऐसे वाकयात हर जगह प्रतिदिन होते हैं जिस में एक गरीब अपनी गाढ़ी कमाई के पैसे गवाँ कर पेट पकड़कर बैठ रहा है और बदमाश जरा सी देर में उसका सब कुछ उड़ा ले गये। अब तो सभ्यता और विद्या का मुलम्मा चढ़ी हुई ठगी सरेआम बाजार में उपस्थित होती है और सोना बता कर बिजनेस के नाम पर बेची जाती है। यह पैसे के लोभ की बात हुई। अब दूसरी तरफ आइए, काम वासना के लिए मन महाशय की इच्छा हुई। यदि विवाहित हैं तो मर्यादा को तोड़ा और अविवाहित है तो अप्राकृतिक मैथुन, एवं व्यभिचार की ओर चल पड़े। स्त्री क्रय- विक्रय, वेश्या वृत्ति, अपहरण, बलात्कार, भ्रूणहत्या, कत्ल, आत्महत्या आदि के जो दर्दनाक समाचार प्रतिदिन सामने आते हैं वे बताते हैं कि मन की अनुुचित कामेच्छा जन समाज में एक मौन करुण क्रन्दन उत्पन्न किये हुये है। किसी औषधालय में जा बैठिये और गिनते रहिये कि किस रोग के कितने रोगी आते हैं। आपको पता चलेगा कि उनमें आधी से अधिक संख्या प्रमेह, स्वप्रदोष, नपुंसकता, सुजाक, आतिशक, प्रदर आदि रोगियों की है। हमारे अशिक्षित देश में साहस और ज्ञान की कमी के कारण जो असंख्य लोग अपने इस प्रकार के रोगों को छिपाए पड़े रहते हैं उनकी ओर भी यदि दृष्टिपात किया जाय तो देश का खोखला स्वास्थ्य, मरघट की सी भयंकरता लेकर सामने आ खड़ा होता है।

इन पंक्तियों में काम वासना, रस और लोभ जन्य अहित पर कुछ प्रकाश डाला गया है। दस इन्द्रियों और अनेक वासनाओं में भटक कर मन हमारी जो जो दुर्गतियाँ करता हैं उन पर कुछ क्षण गंभीरता पूर्वक विचार करते ही यह निश्चय हो जाता है कि असंयत मन हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है। वह शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, पारलौकिक सब प्रकार की हानियाँ पहुँचाता है और मनुष्य को पशु बना देता है। दीर्घ जीवन छीन कर अल्पायु, स्वास्थ्य और सौन्दर्य को छीन कर रोग, आनन्द छीन कर दुख एवं इंसानियत छीनकर हैवानियत वह हमें दे देता है। जेल खाने, पागलखाने, कोढ़ीखाने, सफाखाने में जाकर वहाँ बँधे हुए मनुष्यों, ईश्वर के अमर पुत्रों को देखिये, उनके पिछले जीवनों, इतिहासों और वहाँ तक पहुँचने के कारणों का अध्ययन कीजिए आपकी आँखों में से आँसू छलक पड़ेंगे। ईश्वर के अंश, सच्चिदानन्द स्वरूप मनुष्य को इस नरक में जलाने के लिए किसने झोंक दिया है? प्रतिध्वनि कहेगी- असंयमी मन ने।

यदि मन असंयमी न हो, बहुत उछल कूद न करे किन्तु संयमी भी न हो अर्थात बीच की दशा में हो तो वह अधिक हानि तो नहीं करता पर बेकार सी चीज, भार स्वरूप हो जाता है। यह अमूल्य खजाना एक प्रकार से निराशा से घिरे हूए, अनुत्साही समाज के लिये अनुपयोगी और बोझा ही सिद्ध हो सकते हैं। ऐसे मन को लेकर कोई बड़ा काम नहीं हो सकता। विद्योपार्जन, धन संचय, धर्म संग्रह, आत्मिक विकाश, महत्वपूर्ण कोई काम उससे नहीं बन पड़ता। ऐसा मन उस फटे पुराने ढोल की तरह होता है जो बहुत पीटने पर कुछ बजता है और छोड़ते ही शान्त हो जाता है। इसके विपरीत संयमी मन उस झाड़ी की भाँति है जो एक बार चाबी देने पर बहुत समय तक ठीक गति से चलती रहती है। आलसी मन वाले की सब प्रकार की उन्नति रूक जाती है। दुनियाँ के साधन अपने आप किसी के पास नहीं आते वरन् वे तलाश करने पड़ते हैं। कुएँ में से निकल कर पानी की धार हमारे मुँह में नहीं घुस जाती वरन् हमें उसे परिश्रम पूर्वक निकालना पड़ता है और हाथ तथा मुँह को कष्ट देकर पीना पड़ता है। संसार में सब प्रकार की सफलता, आनन्द और ऐश्वर्य के पहाड़ खड़े हुये हैं यदि उन तक जाने का कष्ट गवारा नहीं करना चाहते तो विश्वास रखिये वे भी आपकी खिदमत में दौड़कर हाजिर नहीं होंगे। जिन खोजा तिन पाइयों आपका मन उत्साही, परिश्रमी और संयमी नहीं है तो दीप मलूका के अजगर और पक्षी की तरह बैठे रहेंगे। दाता राम कुछ भी भीख डाल दे तो पेट भर लीजिए अन्यथा भाग्य को कोसते रहिए।

संयमी मन मनुष्य की अमूल्य शक्ति है। वह कुबेर का खजाना, पारस पत्थर और कल्पवृक्ष है। जो चाहिए इसके द्वारा आपको मिल जायेगा। पिछले अंक में यह बता चुका हूँ कि मनुष्य अनन्त शक्तियों का भण्डार है। उन शक्तियों का यदि एकीकरण न किया जाय तो वे बिखरी पड़ी रहेंगी और किसी का कुछ हित न हो सकेगा। एकाग्रता से ही वह दिव्यशक्ति उत्पन्न होती है जिससे आदमी कुछ का कुछ हो जाता है। पेट भरने लायक भोजन भी जिन्हें बचपन में नहीं मिलता था, आधी उम्र तक अपनी जरूरतें पूरी करने की सामग्री तक जो नहीं जुटा सके, उन हिटलर और मुसोलिनी को देखिये, ईशा, मुहम्मद, गांधी पर दृष्टिपात कीजिए। जितने महान कार्य आज आपको दीख पड़ते हैं उनको पूरा करने वालों के जीवन पर नजर डालिए। सर्वत्र एक ही आधार मिलेगा। मन का संयम, चित्त की एकाग्रता। दत्त चित्त होकर जिसने जो काम किया उसने उसमें सफलता पाई। बीता इसीलिए चिल्लाती है कि सच्चा मित्र संयमी मन है। उसी की मदद से सब काम हो सकते हैं। शंकराचार्य इसीलिए संसार जीतने की अपेक्षा मन को जीतने का अधिक महत्त्व बताते हैं। पातञ्जलि चित्त वृत्तियों के निरोध को ही योग बताते हैं। यही वह वरदान है जिससे आदमी धन्य हो जाता है।

लेख बढ़ गया है। इसलिए इन पंक्तियों को यही समाप्त करता हूँ। आगामी अंक में मन का संयम करने के सरल और अनुभूत प्रयोग पाठकों के सामने रखूँगा।


स्मरण शक्ति और उसका विकास

(ले. श्री गिरराज किशोर जी विशारद, चिरहौली)

विभिन्न प्रकार की मानसिक शक्तियों में स्मरण शक्ति का स्थान बड़ा महत्त्वपूर्ण है। बिना इस शक्ति के जीवन में कोई उन्नति करना तो दूर साधारण दैनिक कार्यक्रम भी नहीं चलाया जा सकता। यदि पिछला सब अनुभव और ज्ञान विस्मरण हो जाय तो मनुष्य नवजात शिशु के समान हो जाय। हमारा महत्व पिछली जानकारी के आधार पर है। जो जितना अधिक जानता ह वह उतना ही बड़ा महापुरुष है। श्रेष्ठ अध्यापक, वकील या डाक्टर वही कहा जा सकता है जिसे अपने विषय का ज्ञान तुरन्त स्मरण हो आवे। अध्यापक अगर अपने पाठ्य विषयों को मस्तिष्क में धारण न किये हुए हो तो उसकी क्या उपयोगिता रहेगी? वकील को यदि कानून की धाराऐं याद नहीं, उनकी मंशा और परिभाषा भूल गया हो तो उसे कौन टके सेर पूछेगा? डाक्टर को यदि रोगों का निदान और चिकित्सा विस्मरण हो गया हो तो उसमें और एक घसहेरे में कोई फर्क नहीं रह जाता। जितने भी व्यापार हैं उन सब में कामयाबी और उन्नति तभी होती है जब उनके संचालक की स्मरण शक्ति ठीक होती है, अवसर आते ही मौके के उपयुक्त बात तुरन्त सूझ आती है।

किसी अवसर के आने पर उसका ठीक हल हम यों ही अचानक नहीं सोच लेते। देखने में ऐसा प्रतीत होता है कि फल खरीदते समय हम दूकानदार से दो मिनट में सौदा कर लेते हैं पर इस दो मिनट में स्मरण शक्ति द्वारा अनेक सूक्ष्म कार्य हो जाते हैं। फल अच्छे हैं या खराब? कल ऐसे फल किस भाव लिये थे? आज बाजार में यह फल मँहगे हैं या सस्ते? हमारे लिए कितने फल पर्याप्त होंगे? इन बातों के सम्बन्ध में अब से कुछ पूर्व समय से लेकर कई दिन और पिछले बहुत समय का स्मरण हो आता है। उस दिन फटे हुए फलों का गूदा बहुत सड़ा निकलता था। परसों आठ आना सेर अंगूर खरीदा था, पिछले दशहरे को तरबूज की बिक्री अधिक थी और वह मँहगा था। पिछले हफते दो सेर सेब ले गया था उनसे ठीक काम चल गया था, आदि पिछली बातें एक क्षण भर में मस्तिष्क में घूम जाती हैं और आज की परिस्थिति, अपनी आवश्यकता आदि का अनुभव होता है। इन दो मिनटों की सूक्ष्म क्रियाओं का यदि विशेषण किया जाय तो पता लगेगा कि कम से कम पचास बातें इस सम्बन्ध की मस्तिष्क न सोची तब सौदा पक्का किया। यदि स्मरण शक्ति न होती या कम होती तो निश्चय ही खराब और मँहगे फल लेने पड़ते। हिसाब लगाने की विधि ठीक याद न आती तो सब नौ आने के जगह सवा तेरह आने दे आते। तात्पर्य यह है कि बुद्धि की कुशाग्रता, स्मरण शक्ति के तीक्ष्ण होने पर निर्भर करती है। और बुद्धि की कुशाग्रता ही मनुष्य के स्थान को ऊँचा बढ़ाने वाली है यदि यह न होती तो पापी पुण्यात्मा का भेद ही न रहता। सब धान बाईस पसेरी हो जाते और सब भेड़े एक ही लाठी से हाँकी जाती।

यो तो कुछ न कुछ स्मरण शक्ति मनुष्य मात्र में है पर किसी में उसकी अधिकता और किसी में न्यूनता पाई जाती है। प्रथम श्रेणी में पास होने वाले और हर साल फेल होते जाने वाले छात्रों में यह भेद स्पष्ट दिखाई पड़ता है। पहला छात्र एक बार किताब पढ़ कर ही उसे याद कर लेता है तो दूसरा बार बार पढ़ने पर भी स्मरण नहीं रख पाता। छोटे और बड़े वकीलों में यही भेद होता है। एक को अपने पेशे की सारी बातें अवसर के अनुरूप स्मरण हो आती हैं किन्तु दूसरा बैठा सोचता रहता है कि मुझे क्या करना चाहिए। वह किताबों के पन्ने उलटता है, ढ़ूँढ़ता है पर वह विषय किताब में भी दिखाई नहीं देता। ऐसे लोग अपने आप पर झुँझलाते रहते हैं और अपने दुर्भाग्य पर रोया करते हैं। कई लोगों को अपने अन्दर की यह कमी दिखाई नहीं पड़ती और बहर की परिस्थितियों पर दोष थोपा करते हैं। शनिश्चर की दशा है, मंगल आठवें में हैं, देवता का प्रकोप है, अमुक व्यक्ति मेरे काम में बाधक बनता है, अमुक ने मेरे साथ बेइन्साफी की, आदि शिकायतें करीब- करीब ऐसी ही होती हैं। अपनी कमी को दूसरों पर लादने और झूठा आत्म सन्तोष करने के लिए ऐसे ही वाक्य गढ़े जाते हैं।

स्मरण शक्ति की कमी एक मानसिक बीमारी है। जिस प्रकार आँख से धुँधला दिखाई देना एक रोग है उसी प्रकार पिछली बातों की याद न उठना भी है। प्रतिदिन जो कुछ ज्ञान होता है उसकी रेखायें मस्तिष्क पटल पर अंकित होती रहती हैं। अनेक विषयों की ऐसी असंख्य रेखायें प्रतिदिन खिंचती चली जाती हैं। यहाँ यह आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि इतनी अगणित रेखाऐं कहाँ तक होती जाती होंगी और जब सारा पटल भर जाता होगा तो कहाँ जाती होगी। इस प्रश्र का विस्तृत उत्तर देने के लिए मस्तिष्क रचना और उसकी कार्य शक्ति पर प्रकाश डालने के लिए फिर किसी दिन पाठकों के समक्ष उपस्थित होंगे। लेख के कलेवर का ध्यान रखते हुए यहाँ इतना ही कह देना पर्याप्त होगा कि मस्तिष्क में असंख्य सूक्ष्म परमाणु हैं और उनमें से प्रत्येक पर असंख्य रेखाऐं अंकित हो सकती हैं। जिनके मस्तिष्क के कोष अधिक सजीव और चैतन्य होते हैं उनकी रेखाऐं अधिक स्पष्ट और गहरी होती हैं। भरी मोटे और शुष्क कोषों पर यह रेखाऐं उथली और अस्पष्ट अंकित होती हैं। गीली मिट्टी पर एक लकीर खींच दी जाय तो वह वैसी ही बनी रहेगी किन्तु गुदगुदी रबड़ पर खींची जाय तो कुछ ही देर में दबी हुई रबर फिर ऊपर उभर आवेगी और रेखा को बहुत धुँधली कर देगी। यहाँ यह कह देना भी आवश्यक है कि ये रेखाऐं किसी के भी मस्तिष्क में पूरे तौर से नहीं मिटती। वे धुँधली होकर अचेतन अवस्था में पड़ी रहती हैं और जब तक उनके जगाने में अत्यन्त परिश्रम न किया जाय तब तक प्रायः उसी गुप्त दशा में पड़ी रहती हैं। मन की इच्छानुसार मस्तिष्क के ज्ञान तन्तु झंकृत होकर उस विषय की रेखाओं के पास चेतना ले जाते हैं और उन रेखाओं को उत्तेजित करके कार्यशील बनाते हैं। पर यदि यह ज्ञानतन्तु निर्बल या रोगी हुए तो अपना कार्य पूरा करने में असफल रहते हैं, फलस्वरूप चेतना निश्चित स्थान तक नहीं पहुँचती और काम अधूरा ही छूट जाता है। ग्रामोफोन पर चढ़े हुए अच्छे रिकार्ड को भी टूटी सुई ठीक नहीं बजा सकती उसी प्रकार अच्छी रेखाओं को भी मस्तिष्क के निर्बल ज्ञान तन्तु ठीक प्रकार कार्यशील नहीं बना पाते।

मोटे तौर पर यह जान लेना कठिन है कि मस्तिष्क किस सूक्ष्म क्रिया में कितनी खराबी पैदा हो गई है। यह काम तो लाखों रुपयों में मिलने वाले वैज्ञानिक यन्त्रों या अत्यन्त उच्च कोटि की दिव्य दृष्टि से ही जानी जा सकती है। पेट के किस भाग में क्या और कितनी खराबी है, यह बात हम लोग नहीं जान सकते, पर इतना स्वयं सत्य ज्ञान सबकों प्राप्त है कि कड़ी भूख लगने पर सुपाच्य पदार्थ भली भाँति चबाकर खाने से पेट ठीक रहता है और छोटी मोटी बीमारियाँ स्वयं चली जाती हैं। पेट में कुछ भी गड़बड़ हो गरम पानी की बोतल फेरना या मिट्टी की पुल्टस बाँधना लाभकर सिद्ध होगा। वहाँ पाठकों को किसी मस्तिष्क सम्बन्धी गहन अनुसंंधान के लिएस नहीं घसीटा जा रहा है वरन् कुछ ऐसे सुलभ उपाय सम्मुख रखे जा रहे हैं जो स्मरण शक्ति को बढ़ाने के लिए लाभप्रद साबित हो चुके हैं। इन क्रियाओं द्वारा मस्तिष्क के सूक्ष्म कण और ज्ञान तन्तु दोनों की ही कसरत होती है और जिस भाग में भी खराबी होती है ठीक हो जाती है। सर्वांगासन का अभ्यास करने वाला यदि यह न जान सके कि मेरी आतें खराब थी या आमाशय, तो कोई हर्ज नहीं। उस आसन के करने से पेट की सारी तकलीफें जब दूर हो जाती हैं तब वह यही कहता है मुझे आम खाने है, पेड़ गिनने से क्या मतलब। हमारे अनुभूत उपाय ऐसे ही आम खिलाने के साधन हैं। रूकी हुई नाली में बाँस डालकर सफाई करा देना काम चलाने के लिए काफी है, उसमें मिट्टी जमा हो गई थी या तिनके? इसकी विवेचना के लिए अवकाश न हो तो न सही।

अभ्यास नं. १

ताशों के उपयोग से स्मरण शक्ति बढ़ाने का अभ्यास किया जा सकता है। पहले दिन बूँदों वाले एक ही रंग के पाँच ताश लीजिए। और पाँच बार यह देख लीजिए कि वे कौन कौन से हैं। अब उनमें से बिना देखे एक उलट कर नीचे रख दीजिए। फिर देखिये कि कौन सा ताश नहीं है। यदि ठीक बता सकें तो फिर दूसरे पाँच ताश लीजिए और उन्हें चार बार देखिये, एक को बिना देखे उलट कर रख दीजिए अब देखिये कि जा ताश निकाल दिया गया है से ठीक बता सकते हैं या नहीं। ठीक बता दिया हो तो फिर अन्य और पाँच लेकर तीन बार ही देखिये। इसके बाद और लेकर दो बार, तदुपरान्त एक बार देखकर छिपाया हुआ ताश बताने का अभ्यास कीजिये। जितनी कम बार देखने पर आम भूलते हो, उसी संख्या पर ठहर कर अभ्यास बढ़ाईये। जैसे आप दो बार पाँच ताशों को देखकर छिपे हुए एक पत्ते को बताने में भूल करते हैं और तीन बार देख कर ठीक बता देते हैं तो दो बार का क्रम ही जारी रखिये। जब दो बार का अभ्यास ठीक हो जाय तो एक बार का अभ्यास आरंभ कीजिए। पाँच ताशों को एक बार देखकर छिपा हुआ पत्ता बता देने का अभ्यास पूरा हो जाय तो छै ताश लेकर एक बार देखने का क्रम चलाइये। फिर सात, फिर आठ, फिर नौ। इसी प्रकार पूरे बावन पत्तों तक का अभ्यास ले जाने की कोशिश करते रहिए।

इस क्रिया द्वारा मस्तिष्क के सूक्ष्म कणों और ज्ञान तन्तुओं पर काफी जोर पड़ता है और उनका अच्छा व्यायाम होता है। खेल मनोरंजक है और कोई परीक्षक साथी न हो तो अकेले भी हो सकता है। आरम्भ में आधा घंटा समय इसके लिए काफी है। मस्तिष्क निर्बल हो तो कम समय ही करना चाहिए। अन्त में एक घंटे तक अभ्यास करना पर्याप्त है। बीच- बीच में थकावट आने पर ठहरा जा सकता है। आरम्भ में ही अधिक समय तक अभ्यास करना ठीक नहीं क्योंकि बहुत अधिक कसरत कराने पर मस्तिष्क बहुत थक जाता है और शिर में दर्द होने लगता है।

(अन्य अभ्यास क्रमशः दिये जायेंगे)


वैभव (kavita)

(रचयिता- श्री कपिलेश्वर शरणजी)

चपला सा चंचल वैभव क्षण भर कुरता झिलमिल रे।

यह सुधा नहीं है विष है, कुछ सोच समझ का पी रे।

सपने हैं सोने के दिन, चांदी की मधुमय रातें।

क्षण- भर की जल बूँदों सी सब पल- भर की बातें।

है क्षणिक विश्व का वैभव, यह हास रास दो दिन का।

सागर का ओर नहीं है, जीवन है टूटा तिनका।

रंथी पर हाथ पसारे, कहता था वीर सिकन्दर-

खाली हाथों जाता हूँ इतना वैभव भी रखकर।

यह ताज खड़ा कहता है- सोती मिट्टी में रानी।

सब डूब यहीं जायेंगे, है अतल समय का पानी।

है कहाँ चमकता चमचम मुगलों का प्यारा वैभव?

किस परदे में सोया है, वैशाली का वह गौरव?

यह दुनियाँ सागर है रे, क्षण- क्षण पर दुख की लहरें।

वैभव कागज की डोंगी, फिर कैसे जल पर ठहरे?


बालकों पर नजर का असर

(ले. श्री. गंगा दत्त शास्त्री, जामनगर)

बच्चों को नजर लगने के बारे में जितना अधिक और गहरा अन्वेषण किया जाता है, उतना ही सत्य अधिक स्पष्ट होता जाता है। हम नहीं चाहते है कि हँसते खेलते बच्चों को नजर लगने के भय से घरों में छिपा कर रखा जाय और उन्हें लोगों के सामने अपनी अमृतमयी तोतली वाणी बोलने से रोका जाय। बच्चे जीते जागते बहुमूल्य खिलौने हैं जिनके साथ खेलने की सब कोई इच्छा करते हैं। फिर इस स्वर्गीय सम्मेलन में यह खाई उपस्थित करना किसी प्रकार उचित न होगा। यदि इस भय से मनुष्य के सात्विक आनन्द को रोका जाय तो यह परमात्मा की पवित्र सृष्टि में अंगारे बोना होगा। परन्तु अपने मनोरंजन के लिए बच्चों की हत्या कर डालना भी न्याय संगत न ठहराया जायेगा।

इसमें चौकने की, बड़बड़ाने की या हमें भ्रम प्रचारक कहने की जरूरत नहीं है। कड़ुई सच्चाई की ओर से आँख बन्द कर लेना ठीक नहीं। फूल में कांटे हर जगह हैं। सुगंधि के लालच में फूलों के कांटे और विषैले जन्तुओं से बेखबर न रहना चाहिये। भोजन कितना आनन्द दायक है, पर हानि कारक चीजें खतरा भी उपस्थित करती हैं, मैथुन, धन संचय, ऐश आराम, इन्द्रियों के भाग विलास कितने मधुर होते हैं उनकी उपलब्धि में ही हम लोग प्रायः सारा जीवन लगा देते हैं परन्तु क्या उनके खते कम हैं। हर सावधानी के साथ किसी आनन्द में लिप्त हुए तो तक्षक फन मारे बिना नहीं रह सकता।

खतरा इस कड़ुई सच्चाई को प्रकट करने में नहीं वरन छिपाये रहने में है। यदि वास्तविक बात सर्व साधारण पर प्रकट हो जाय और उससे होने वाले हानि लाभ को लोग समझ जाय तो खतरा बहुत कम हो सकता है। इस सम्बन्ध में यह एक गुप्त बात ध्यान रखने की हैै कि साधारण रीति से बच्चों के साथ हँसते खेलते रहिये कुछ हर्ज न होगा। नजर उन्हें तभी लगेगी जब आप हसरत भरी निगाह से देखेंगे। इस प्रकार की दृष्टि के अन्तर्गत ऐसी भावनाऐं होती है कि ‘‘काश यह बच्चा हमें मिला होता। मैं इसे पाकर कितना प्रसन्न होऊँगा। इसकी सुन्दरता कितनी मनो मुग्धकारी है। भगवान ने ऐसा बच्चा मुझे नहीं दिया। ऐसा बच्चा किसी प्रकार मुझे मिल जाय।’’ यह बातें आदमी जबान से नहीं कहता और जान बूझकर या सोचता भी नहीं, पर उसके मन में भीतर ही भीतर ऐसी गुप्त इच्छा उठती है। कभी कभी तो यह इच्छा इतनी सूक्ष्म होती है कि सोचने वाला यह समझ भी नहीं सकता कि मैंने ऐसी भावना की थी। इस ललचाई नजर में एक ऐसा आकर्षण होता है कि बच्चे की बिजली खिंच जाती है और वह इस धक्के को बर्दास्त न कर सका तो बीमार हो जाता है। अजगर अपनी दृष्टि में ऐसा ही आकर्षण करके पक्षियों को अपनी ओर खींच लेता है और उन्हें खा जाता है। भेड़िये की दृष्टि से भेड़, और बिल्ली की दृष्टि से कबूतर इतने अशक्त हो जाते हैं कि वे भाग तक नहीं सकते। यह आकर्षण शक्ति उनकी अधिक तीव्र होती है जिनके मन में वर्षों से बच्चे प्राप्त करने की लालसा लगी होती है। चिरकालीन लालसा धीरे धीरे अपना पोषण करती रहती है और कुछ दिनों बाद बहुत बलवान हो जाती है। ऐसे लोगों का झटका बच्चों को लात लगने से भी गहरा लगता है। साधु सन्यासी या जिन्हें बच्चों को कोई चाह नहीं होती उनकी नजर नहीं लगती। बहुत से लोग अपने कई- कई बच्चे होने पर भी सन्तुष्ट नहीं होते और दूसरों के सुन्दर बच्चों को देखकर मन में ललचाते रहते हैं उनकी भी नजर लग सकती है।

बच्चों का अनिष्ट न चाहने वालों को उन्हें खिलाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनके साथ सात्विक रीति से हँसा खेला जाय। विशेष ममता न जोड़ी जाय। खिलाते समय तो खस तौर से यह ध्यान रखना चाहिए कि उनमें ममता के आकर्षक विचार न रखे जाय। ईश्वर का निर्विकार पुत्र, प्रकृति का सुन्दर पुष्प, कर्तव्य का स्मरण दिलाने वाला सुनहरा चित्र एवं जीवित खिलौना ही उन्हें समझना चाहिए। उन्हें बार बार छाती से लगाने की, चूमने की, मेरा मुन्ना, मेरा प्राण, मेरा जीवन सहारा आदि कहने की हरकतें न करनी चाहिए। यह खतरनाक आदतें है।

बच्चों को साफ सुथरा तो रखा जाय पर ऐसे तड़क भड़क के कपड़े और जेवर न पहिनाये जाय जिससे रास्ता चलते लोगों का ध्यान उनकी ओर खिंचे। जब बच्चे बढ़ने लगते हैं तो बड़ों के कामों की और बातों की नकल करना सीखते हैं। बच्चों की यह नकल बहुत प्यारी लगती है और संरक्षक उन बातों को बाहर के लोगों के सामने कहते हैं, यह भी कोई लाभप्रद बात नहीं है। बच्चे ने कोई गीत याद कर लिया है या थोड़ा नाचना सीख लिया है किन्तु वह दूसरे के सामने उसे दिखाने में झिझकता है तो उससे यह जिद न करनी चाहिये कि वह दूसरे लोगों को दिखावे ही। इससे बच्चे के मन पर एक बोझ पड़ता है और उसके स्वास्थ्य को हानि पहुँचती है।

सुरक्षा के कुछ अन्य नियम भी है। आकाश की बिजली जब जोरों से कड़कती है तो शरीर की बिजली का भी ह्रास होता है। उस समय मातायें बालकों को घरों में ले जाती है। मेलों में जहाँ भारी भीड़ रहती है मुँडन संस्कार से पूर्व नहीं ले जाती। एक दो महीने का आयु का होने तक बालकों को सब लोगों के सामने नहीं लाया जाता। हाथ- पांव में चाँदी आदि धातुओं के कड़े पहिनाये जाते हैं। यह बाह्य विद्युत से रक्षा करने के उपाय हैं। गर्भ काल के नौ मास पूरे होने से पूर्व ही जिन बच्चों का जन्म हो जाता है उनकी और भी अधिक सुरक्षा करनी पड़ती है, क्योंकि गर्भ के सातवें, आठवें मास में बच्चे के अंग तो पूरे बन जाते है पर उसमें विद्युत का उचित मात्रा में समावेश नहीं हो पाता। सातवे मास में इतनी कम बिजली होती है कि उस पर कोई अधिक आघात नहीं पहुँचता इसलिए सातवें मास में पैंदा हुए बच्चे अक्सर जीते हैं। ऐसे बच्चे माता की बिजली से अपना काम चलाते हैं किन्तु आठ मास के बच्चे में बहुत कुछ अपनी बिजली होती है। इसलिए बाहरी विद्युत के धक्के उसे झंझोड़ डालते हैं और वह बेचारा अक्सर इस दुनियाँ से कूँच कर जाता है। माताऐं इन अधूरे बच्चों को बाहर के लोगों की दृष्टि से बचाती हैं। यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि माता पिता की नजर नहीं लगती। क्योंकि उन्हीं की शक्ति से तो वह उत्पन्न हुआ है वह एक प्रकार से माता पिता के रक्त माँस का ही तो टुकड़ा है। जिस प्रकार अपनी बढ़ी हुई शक्ति अपने शरीर को हानि नहीं वरन् लाभ पहुँचाती है उसी प्रकार माता पिता की बिजली भी बच्चों को हानि नहीं पहुँचा सकती। हर हालत में एक बात ध्यान रखना चाहिये कि जब तक बच्चा एक वर्ष का न हो जाय तब तक बाहर के आदमियों के हाथ में उसे न देना चाहिए और किसी को उसे चूमने न देना चाहिए।


क्या यज्ञ घाटे का सौदा हैं?

ले. श्री अनिरुद्ध मिश्र, साहित्याचार्य, तेघड़ा

हिन्दू धर्म शास्त्रों में यज्ञ की महिमा अनन्त है। जितने भी धार्मिक कृत्य हैं। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त जितने भी संस्कार होते हैं, हर्ष शोक के जो भी अवसर आते हैं वे सब यज्ञ मूलक हैं। वेदों में यज्ञ के विषय का जितना वर्णन है उतना किसी अन्य विषय का नहीं है। क्या यह सब अन्ध विश्वास पूर्ण और अवैज्ञानिक है? आइये, आज इसी पर विचार करें।

हमारे ऋषि दृष्टा थे। वे प्रत्येक विषय में छिपे हुए सर्व प्रकार के तत्वों को भली प्रकार जानते थे। धर्म और कर्मकाण्ड की रचना उन्होंने ऐसे गहन वैज्ञानिक अन्वेषण के आधार पर की है कि उसमें भ्रम और अन्ध विश्वास के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। यज्ञ की उपयोगिता को हमारे पूर्वज प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह स्वीकार करते थे। उससे किसी का कुछ मतभेद न था। जब कभी आपस में विचार विमर्श होता था तो वह उसके सूचक विषयों पर ही होता था। परन्तु आज तो हम उसकी साधारण उपयोगिता पर से भी विश्वास गवाँते जा रहे बाबू लोग झट यह कह बैठते हैं कि यह सब वाहियाद है। यज्ञ करने से कुछ लाभ नहीं। यदि इतनी सामग्री पेट में खाई जाय तो कुछ गुण भी करे, कीमती चीजें आग में जला डालना बेवकूफी है। ऐसे बाबूओं को किसी शास्त्र के प्रमाण देकर या तर्क के आधार पर समझाने से काम नहीं चलता, उनके लिए तो विलायती डाक्टरों के प्रमाण ही वेदवाक्य हो सकते हैं। इसलिए इस लेख में वैज्ञानिक अन्वेषण के आधार पर यज्ञ की जो उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है उसी का उल्लेख करने का प्रयत्न किया जायेगा।

स्वास्थ्य को अच्छा बनाने क लिए डाक्टर लोग शुद्ध वायु सेवन की सलाह देते हैं। वायु परिवर्तन के लिए लोग पहाड़ आदि पर जाते हैं क्योंकि वहाँ की वायु उत्तम होती हैं। उत्तम वायु में केवल आक्सीजन ही नहीं है वरन् उसका वह सूक्ष्म भाग हैं जिसे ओजोन कहते हैं। इस अत्यन्त प्राणप्रद वायु का साधारण हवा में यह पच्चीस लाखवाँ भाग भी मिला हो तो भी वह अपनी मनोहर सुगन्धि से आदमी का चित्त प्रफुल्लित कर देती है। पर्वत आदि स्थानों में जहाँ इस अत्यन्त प्राणप्रद वायु की अधिकता होती है वही स्थान वायु सेवन के लिए उत्तम समझे जाते हैं। यह प्रसिद्ध है कि दूषित वायु से सिर्फ स्वास्थ्य की वृद्धि ही होती है वरन् क्षयी आदि कठिन रोग भी दूर हो जाते हैं। यज्ञ के द्वारा उसी ओजोन तत्व की अधिकता से उत्पत्ति होती है। उत्तमोत्तम पौष्टिक और रसायन पदार्थों का अग्रि द्वारा जो रूपान्तर होता है उसमें ओजोन की अधिकता पाई जाती है। जो लाभ पहाड़ों पर जाकर वायु सेवन से होता है वह यज्ञ द्वारा शुद्ध हुई वायु द्वारा भी हो सकता है। भयंकर रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है।

विज्ञान का सिद्धान्त है कि कोई भी पदार्थ नष्ट नहीं होता केवल उसका रूपान्तर हो जाता है। अग्रि में जलाने से पौष्टिक सामग्री का नाश नहीं होता वरन् श्वांस द्वारा सूक्ष्मतर होकर वायु में मिलती है और पुनः श्वांस द्वारा शरीर में प्रवेश करके बल वृद्धि करती है। जितना लाभ इस क्रिया से होता है उतना लाभ उन वस्तुओं को खाने से नहीं हो सकता। बादाम को घिस कर खाना साधारण तौर से पीस कर खाने की अपेक्षा अधिक लाभकर होता है। सूखी दवाओं से प्रवाही अधिक गुण कारक समझी जाती है। इसका कारण यह है कि किसी वस्तु के जितने अधिक सूक्ष्म परमाणु किये जायेंगे उतनी ही उनकी गुप्त शक्ति उभरेगी और सूक्ष्म होने के कारण बड़ी सरलता पूर्वक शरीर में प्रवेश करके रक्त वीर्य आदि में मिल जायेंगे। यज्ञ द्वारा उन रसायन औषधियों का इसी प्रकार का सूक्ष्मीकरण होता है। उतनी थोड़ी सी सामग्री का सार भाग खाने से एक आदमी को जितनी पुष्टि होती है उससे कई गुनी पुष्टि यज्ञ द्वारा असंख्य आदमियों की हो जाती है, इस प्रकार यह घाटे का सौदा नहीं रहता।

आग जलाने के महत्त्व को भी डाक्टर लोग एक मत से स्वीकार करते हैं। आजकल जब प्लेग, हैजा आदि महामारियाँ फैलती हैं तब सरकारी मेडीकल अफसर घरों में धुँआ करवाते हैं और आग जलवाते हैं। योरोप में अंगीठियों (फायर स्टोव) इस कार्य के लिए उपयोग में लाते हैं। पारसी और यहूदी धर्म में अग्रि जलाने की बड़ी महिमा है। स्काटलेण्ड, आयरलेण्ड, अमेरिका आदि कई देशों में अग्रि पूजन धर्म में सम्मिलित है। प्रसिद्ध तत्ववेत्ता लश्यकी ने अपनी पुस्तक में अग्रि जलाने का महत्त्व के विस्तृत विवेचन किया है। अग्रि द्वारा दूषित कीटाणु जल जाने, सील और नमी नष्ट होने की बात सब जानते हैं। उस स्थान में भरी हुई वायु गरम होकर हलकी हो जाती है इसलिए उसका ऊपर को उड़ जाना स्वाभाविक ही है। दूषित हवा के गरम होकर उड़ते ही नई शुद्ध हवा उस स्थान पर आ जाती है। वायु शोधन का इससे उत्तम और सस्ता उपाय दूसरा कोई नहीं है।

प्रसूति गृह में आग जलाने, चौके में बैठकर भोजन करने, जिस घर में किसी की मृत्यु हुई हो उसमें तेरह दिन तक आग जलाने आदि की रिवाजें इसी विज्ञान पर आधारित है। धुँआ देकर अनेक रोगों का इलाज किया जाता है। डाढ़ के दर्द, बवासीर, उपदंश, फोड़ों की खुजली, भूत बाधा आदि रोगों में तो विभिन्न औषधियों का धुँआ देकर बड़ी उत्तम चिकित्सा की जाती है। उपरोक्त बातों पर ध्यान देने और उनके द्वारा होने वाले लाभों का विचार करने के बाद यह मानना पड़ता है कि अग्रि प्रज्वलन और उसमें उत्तम पदार्थ जलाना अनुपयोगी और व्यर्थ नहीं है।

जिन्हें फिर भी यज्ञ के महत्व पर अविश्वास हो, वे परीक्षा के तौर पर कुछ दिन नियमित रूप से यज्ञ करके देखें। आरम्भ में अपने परिवार के वर्तमान स्वास्थ्य की दृष्टियों से लेखा कर लें और एक मास नित्य हवन करे। बाद अपने पास रहने वाले लोगों का फिर स्वास्थ्य परीक्षण करें। उनको आश्चर्य जनक लाभ हुआ प्रतीत होगा।


मैस्मरेजम का गुप्त तत्व

ले. प्रो. धीरेन्द्र नाथ चक्रवर्ती बी.एस.सी.

गत अंक में बता चुका हूँ कि मैस्मरेजम क्या है? पाठक समझ गये होंगे कि मैस्मरेजम कोई टोना, टोटका, ठगी, अन्ध विश्वास या धोके बाजी चीज नहीं है। यह शरीर शास्त्र और मनोविज्ञान की विशुद्ध वैज्ञानिक पद्धति पर निर्भर है। जिस पत्थर को सहज स्वभाव हम नहीं उठा सकते उसे विशेष परिश्रम और क्रियाओं की सहायता से उठा लेते हैं। साधारण तरीके से किसी में हाथ का धक्का मार दिया जाय तो कोई ज्यादा चोट न लगेगी किन्तु हाथ को घूँसे की शक्ल में बना कर और पूरे जोर सी खींचकर किसी के मर्म स्थान में मारें तो उसे गहरी चोट पहुँचेगी और तिलमिला उठेगा। मानसिक शक्तियों के विशेष तैयारी के साथ किये हुए आघात की शारीरिक आघात से अधिक गहरी आर स्थायी चोट पहुँचती है। यह बात स्वयं सिद्ध है कि शरीर की अपेक्षा प्राण की शक्ति हजारों गुनी है। यह कहने में भी कोई हर्ज नहीं कि शरीर की शक्ति प्राण शक्ति की ही छाया है। प्राण निकल जाने पर शरीर एक तिनका भी नहीं उठा सकता, पागल हो जाने पर छोटे छोटे दैनिक काम भी अच्छी तरह नहीं होते। डरपोक और कायर मनुष्य चाहे वे शरीर से कितने ही बलवान क्यों न हो, कोई बहादुरी का काम नहीं कर पाते। यह सब बातें बताती है कि आश्चर्य जनक शारीरिक शक्ति अनन्त मानसिक शक्ति की ही प्रतिच्छाया है। फिर इस महान शक्ति का आघात क्या शारीरिक बल से भी कम होगा? हाथी को चलाने का काम महावत का शरीर नहीं, मन करता है। इस कार्य को मनुष्य से अधिक बल रखने वाले अन्य जीव नहीं कर सकते।

मित्र विछोह में लोगों की बुरी दशा हो जाती है। मित्रों में से एक बिछुड़ जाने पर दूसरा आत्महत्या तक कर लेता है। आर्थिक या अन्य प्रकार की भारी क्षति हो जाने पर आदमी बड़े दुख में ग्रस्त हो जाता है। उन दिनों उसके शरीर की दयनीय दुर्दशा हो जाती हैं। कड़वी बात मन में स्थिर बनी है और उसका घाव मन में वर्षों रहा आता है। इन बातों का आप क्या अर्थ लगाते हैं? बुरी बात कह देने, मित्र विछोह हो जाने, आर्थिक हानि हो जाने से शरीर पर क्या चोट लगी, जिससे वह इतना दुर्बल हो गया। मानों महीनों से बीमार हो? बीमार आदमी जब खुशी की बात सुनता है तो उछलने लगता है और उसका रोग न जानने कहाँ चला जाता है। सन् १८९० में पैरिस नगर के जीन अस्पताल में भयंकर आग लगी थी। अग्रिकाण्ड का समाचार सुनकर बिस्तरों पर पड़ हुए रोगी उठ- उठ कर भागे। दूसरे दिन बाहर निकले हुए रोगियों में ऐसे पैंतालीस बीमार पाये गये जो मौत की घड़ियाँ गिन रहे थे और जिनमें चारपाई से नीचे पैर रखने की भी शक्ति न थी। डाक्टरों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि वे लोग किस प्रकार इतनी तेजी से तीन फर्लांग दौड़ सके। यही मनोबल है। जब आदमी किसी एक काम को ही आवश्यक समझकर उस पर विशेष विचार करता है तो उसका सम्पूर्ण बल एक तरफ इकट्ठा हो जाता है।

इस व्यक्तिगत विद्युत का दूसरों पर अच्छा और बुरा दोनों तरह का भारी परिमाण में असर होता है। योरोप के एक शहर में एक व्यक्ति को मृत्यु दण्ड दिया गया। डाक्टरों ने अपने प्रयोग द्वारा वध करने के लिए अदालत से उसे माँग लिया। अपराधी को डाक्टरों ने एक मेज पर लिटाया और उसका शरीर इस प्रकार बांध दिया कि वह हिल डुल न सके तथा यह न जान सके कि कहाँ क्या हो रहा है। उसकी आँखों से पट्टी बाँध दी गई। उसकी गरदन के पास जरा सी पिन चुभाई गई जिससे सिर्फ एक बूँद खून निकला। सुई वाले स्थान पर एक रबड़ की नली द्वारा पानी बहाया गया और नीचे एक टब रख दिया गया जिसमें नली वाला पानी टपकता रहे। अब पानी टपकना शुरु हुआ। रोगी को बराबर विश्वास दिलाया जाता रहा कि तुम्हारा खून टपक रहा है। थोड़ी- थोड़ी देर बाद उसके शरीर की परीक्षा करके झूठ- मूठ यह कहा जाता रहा कि अब तुम्हारा मृत्यु काल निकट है। अपराधी को यह विश्वास हो गया कि अब मेरा रक्त बहुत निकल चुका है और कुछ ही क्षण में मरने वाला हूँ। कुछ देर में ही उसके हृदय की गति बन्द हो गई और वह मर गया। इसी प्रकार गत वर्ष कलकत्ते के अस्पताल में एक रोगी जहर खाने के कारण मरा। जिस शीशी में से उसने दवा खाई थी उस पर जहर लिखा हुआ था। उसे विश्वास हो गया कि मैंने जहर खा लिया है। अस्पताल जाते जाते वह मर गया। मृत शरीर की परीक्षा करने पर उसमें रत्ती भर भी जहर न मिला। जिस दवा को जहर समझा गया था वह कुनेन निकली। बेचारा रोगी संदेह के कारण ही मर गया। साँपों के बारे में अनुसंधान करने वाली सरकारी कमेटी की रिपोर्ट है कि साँप के जहर से जितने आदमी मरते हैं उससे तिगुने आदमी भय के कारण मर जाते हैं। हैजा और प्लेग द्वारा मरे हुए व्यक्तियों में अधिकांश भय से मरने वाले होते हैं। तात्पर्य यह है कि विश्वास की दृढ़ता में मृत्यु उपस्थित कर देने तक की भयंकरता और असंभव शब्द को मूर्खों के उपयुक्त सिद्ध करने वाली शुभ शक्ति है।

मन के द्वारा अपना कितना हानि लाभ होता है यह हम लाग रोज मर्रा के कामों में देखते हैं। सरकस में पतले तारों पर नाचने वाले और शरीर को गेंद की तरह काम में लाने वाले नट नटी यही कहते है कि हमने कोई जादू नहीं सीखा। केवल मन को एकाग्र करने का अभ्यास किया है। जिस समय लोग तमाशा देख रहे होते हैं उस समय हमारी निगाह और सारी विचार शक्ति तार पर एकत्रित होती है। पाण्डवों के धनुर्विद्या शिक्षक ने एक दिन अपने शिष्यों की परीक्षा ली और एक चिड़िया को तीर मारने के लिए कहा। पहला शिष्य आया। गुरु ने पूछा- तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है? उसने उत्तर दिया पेड़, टहनियाँ, चिड़िया आदि सब चीजें दिखाई दे रही हैं। गुरु ने उसे बिठा दिया और कहा तुम लक्ष्यवेध नहीं कर सकते, बैठ जाओं। इसी प्रकार दूसरे शिष्य से पूछा उसने कहा मैं चिड़िया और पेड़ की टहनी को देखता हूँ उसे भी बिठा दिया गया। तीसरे ने कहा मैं चिड़िया को देखता हूँ उसे भी लक्ष्यवेध की आज्ञा न मिली। अंतिम शिष्य ने कहा मैं केवल चिड़िया की गरदन देखता हूँ। उसे लक्ष वेधने की इजाजत मिली और उसने सचमुच ठीक निशाना मार दिया। नैपोलियन बोनापार्ट के चार हाथ नहीं थे जिस ताकत के बूते पर वह असंभव शब्द को मूर्खों के कोष में बताता था, वह मनोबल था।

इस मनोबल का गुप्त प्रकट रूप से दूसरों पर भी असर पड़ता है। जब हम लोग भले आदमियों के साथ रहते हैं तो भलमनसाहत आती है और दस दिन गुण्डों के साथ रह कर पक्के बदमाश बन जाते हैं। कहावत है कि गंगा गये तो गंगादास, जमना गये तो जमनादास। इस कहावत में यद्यपि ढील मिल स्वभाव वालों का मजाक उड़ाया गया है पर वास्तव में यह बात बिलकुल स्वाभाविक है। पिता के सामने हम पितृभक्त बनते हैं तो पत्नी के सामने पत्नीभक्त। दूसरों का जो प्रभाव हमारे ऊपर पड़ता है उसके सामने झुकना पड़ता है और उनके से विचार जबरदस्ती बनाने पड़ते हैं। अन्तर केवल निर्बल और सबल भावना का है। जिसका विश्वास दृढ़ होगा वह दूसरे को प्रभावित करेगा। गुरु शिष्य को, पिता पुत्र को, पति पत्नी को प्रभावित करता है पर शिष्य, पुत्र आदि का गुरुजनों पर उतना असर नहीं होता। यहाँ यह न समझना चाहिये कि अधिक आयु, धन, विद्या या बल वाला अपने से छोटे लोगों को ही प्रभावित कर सकता है, वरन यह बात भावना की दृढ़ता पर निर्भर है। छोटी उम्र के राजा से बड़ी उम्र के सरदार भी डरते हैं, दरोगा जी को देखकर सेठजी घबराते हैं। मौके की बात कहने वाला लड़का विद्वानों को हरा देता है। एक कमाण्डर की उपस्थिति हजारों सिपाहियों में उत्साह भर देती है। एक नेता के कहने पर असंख्य जनता अपने प्राण होम देती है। यही तो आत्म शक्ति है। आज तानाशाहों का एक वाक्य संसार में खलबली मचा देता है, यही व्यक्तिगत विद्युत है।

एकाग्रता और दृढ़ विश्वास एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। नाम दो हैं पर असल में एक के साथ ही दूसरा हो सकता है। ढील मिल स्वभाव वाले न तो किसी चीज पर अपना चित्त स्थिर कर सकते हैं और न दृढ़ विश्वास धारण कर सकते हैं। मैस्मरेजम करने वाले सिद्ध को पूर्ण एकाग्रता का अभ्यास होना चाहिये। वह अपनी सारी मानसिक शक्तियों को एकत्रित करके दूसरों के शरीर में अधिक मात्रा में प्रवेश करना जानता हो और जिस पर प्रयोग किया जाय, साधक में दृढ़ विश्वास हो। बस यही पूर्ण मैस्मरेजम है। इसमें जिनका जितना अधिक अभ्यास होगा वह उतनी ही अधिक सफलता प्राप्त कर सकेगा। शरीर द्वारा हम दूसरों का और अपना जितना भला बुरा कर सकते हैं उससे कहीं अधिक मानसिक बल मैस्मरेजम द्वारा हो सकता है। यदि शारीरिक बल संचय करन आवश्यक है तो मनोबल को बढ़ाना, मैस्मरेजम का अभ्यास करना भी फिजूल नहीं हो सकता।


मरने के बाद हमारा क्या होता है?

ले. श्री प्रबोधचन्द्र गौतम साहित्य रत्न, कुर्ग

मरने के बाद हमारा क्या होता है? इस प्रश्र का उत्तर विभिन्न धर्मों की पुस्तकें विभिन्न उत्तर देती हैं। स्वर्ग नरक का वर्णन अपने- अपने मतानुसार सब धर्माचार्यों ने किया है। इस लेख में किसी धर्म के अनुसार मृत्यु के उपरान्त होने वाली दशा का वर्णन करके उन वैज्ञानिकों के अनुभवों का उल्लेख करेंगे जिन्होंने इस सम्बन्ध में गहरी खोज की है और इसी अन्वेषण में जीवन खपा दिये हैं।

इस बात में सब वैज्ञानिक एक मत हैं कि दुनियाँ के किसी भी पदार्थ का नाश नहीं होता। समय चक्र उनका रूपान्तर करता रहता है। किसी वस्तु को नष्ट कर दिया जाय तो उसके पूर्व रूप की ही टूट- फूट होती है, वे मूल तत्व जिनके इकट्ठे होने के कारण उसका निर्माण हुआ था, केवल अपनी शकल बदल लेते हैं। जब शरीर में से प्राण निकल जाता है तो शरीर के सारे अंग अपना काम छोड़ देते हैं, भीतर की मशीन बन्द हो जाती है। अब इस मृत शरीर का रूपान्तर होना आरम्भ होता है। लोग मुर्दें को जला देते हैं, जल में प्रवाहित कर देते हैं या गाड़ देते हैं। जला देने पर शरीर के रासायनिक पदार्थ कुछ तो वायु में मिल जाते हैं, कुछ भस्म में रह जाते हैं। गाड़ देने या जला देने पर वह जीव जन्तुओं का भोजन बन जाता है और उनके शरीर में शामिल हो जाता है। पड़ा रहा तो सड़- गल कर भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाता हुआ घास पात के रूप में प्रकट होता है। निदान शरीर के तत्त्व इस एक संरचना को तोड़कर अलग- अलग बिखर जाते हैं और फिर किसी शृंखला में जुड़कर नई शक्ल बनाता है। पुरानी शृंखला टूटने और नई बनने का यह क्रम अनादि काल से चला आ रहा है और अनन्त काल तक चलता रहेगा, पर उस बेचारे पंछी का क्या होता है?

कुछ वैज्ञानिकों का मन है कि जीवात्मा कोई चीज नहीं। पंचतत्व के बने हुए शरीर की जो क्रिया है उसका एकत्रीकरण ही जीव के रूप में दिखाई देता है। वह वास्तव में कुछ नहीं। पंच भूतों के विशृंखलित होते ही प्राण भी नष्ट हो जाते हैं। वे कहते हैं कि जब हमारे यन्त्रों से जीवित और मृत मनुष्य के प्राण का अनुभव नहीं होता तो वह हो ही नहीं सकता। इन वैज्ञानिकों का मत उपहासास्पद है।

अभी वैज्ञानिकों के यन्त्रों ने प्रकृति का सम्पूर्ण रहस्य नहीं खोज डाला है। जिन विद्वानों ने उस महातत्व की झांकी की है उन्होंने यह कहा है कि हम लोगों का सम्पूर्ण ज्ञान अभी रज कण के बराबर भी नहीं है। ऐसे अधूरे ज्ञान के आधार पर बने हुए सिद्धान्त और यन्त्र यदि उस अखण्ड ज्योति को नहीं जानते तो इससे उसकी असिद्धि नहीं होती। वह जीव जो इतनी आशाऐं करता है, आत्म चिन्तन में इतना लीन रहता है, सोते समय न जाने कहाँ कहाँ घूम आता है, गहन समस्याओं के हल करने में शरीर की सुध- बुध भूल जाता है, अभ्यास द्वारा शरीर की स्वाभाविक क्रियाओं में आश्चर्य जनक घट- बढ़ कर लेता है क्या वह शारीरिक क्रियाओं की स्फुरण मात्र है? मैस्मरेजम, योगशास्त्र, तन्त्र विज्ञान द्वारा जो अद्भुत चमत्कार देखने में आते हैं, भूत प्रेतों के कभी- कभी दर्शन होते हैं, कुछ लोग अपने पूर्व जन्म की कथा सप्रमाण बताते हैं, किन्हीं- किन्हीं बालकों में जन्म जात अद्भुत प्रतिभा होती है यह बातें क्या जीव के अभाव में भी हो सकती हैं? हमारा अन्तःकरण इसे स्वीकार नहीं करता। पूर्वजों के स्मारक बनाने, उनकी कीर्ति को अमर रखने, मृतक के साथ सहानुभूति प्रकट करने की प्रथा बुद्धि विरुद्ध नहीं है। अनादि काल से मनुष्य जीव का अस्तित्व मानता आ रहा है, उसका खण्डन केवल यह कहकर नहीं किया जा सकता है कि वैज्ञानिक यन्त्र से अभी सिद्ध नहीं कर पाये हैं।

सब देशों के अधिकांश आध्यात्म विद्या के अन्वेषक जीव के अस्तित्व को मानते हैं। और वे सूक्ष्म शरीर की सत्ता को भी स्वीकार करते हैं। जिस प्रकार हमारा यह स्थूल शरीर है उसी प्रकार का एक सूक्ष्म शरीर का अनुभव किया जा सकता है। स्वप्र की अवस्था में हमें यही भान होता है कि शरीर सहित काम कर रहे हैं, मरने से कुछ समय पूर्व कुछ लोग यह बता देते हैं कि अब मैं मर जाऊँगा। कहते हैं कि मृत्यु से पूर्व शक्ति निकल जाती है। असल में सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर का सम्बन्ध अधिकांश टूट चुका होता है तब जीव स्वयं अनुभव करता है कि सब बातें मुझमें बदस्तूर हैं, कोई भारी कष्ट भी नहीं है पर एक महत्वपूर्ण चीज से मैं रहित हो गया हूँ। जिस चीज के बिना शरीर छूँछ जैसा लगता है वही सूक्ष्म शरीर है। योगी महात्मा अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर यह बता देते हैं कि अमुक व्यक्ति इतने समय बाद मर जायेगा। वे यही जान लेते हैं कि स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर का सम्बन्ध कितना कमजोर है और उसके पूर्ण रूप से टूटने में कितना समय लगेगा। शरीर के पुर्जों के निकम्मे हो जाने पर भयंकर व्याधि से पिस जाने पर या दुर्घटना द्वारा असामयिक मृत्यु होने पर जीवात्मा स्थूल शरीर से अलग हो जाता है, फिर भी वह स्थूल शरीर की ही भाँति सूक्ष्म शरीर धारण किये रहता है। यद्यपि इस शरीर पर भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी तथा मल मूत्र त्याग आदि का असर नहीं होता पर मोटी मोटी शारीरिक आदतों को छोड़कर शेष मनोविकार प्रायः ज्यों के त्यों बने रहते हैं।

कठिन काम करने के बाद जिस प्रकार हम थक कर सो जाते हैं उसी प्रकार जीव अपनी थकान उतारने और नवीन विकास की तैयारी के लिए अर्ध चेतनावस्था में पड़ जाते हैं और बहुत काल तक अपना क्रमिक विकास करने के लिए उसी दशा में पड़े रहते हैं। नीच श्रेणी के अल्प बुद्धि वाले अविकसित जीव नीचे लोकों में छोटी भूमिकाओं में रहते हैं। यह लोक ऐसे ही जीवों से भरा रहता है। विकसित जीव ऊँची कक्षाओं में चले जाते हैं। जिनके आत्मा अत्यन्त उच्च और उज्ज्वल हो गए होते हैं वे सर्वोच्च कक्षाओं में पहुंचकर विश्राम करते हैं।

जीवों की योग्यता के अनुसार उन्हें कई लोकों में जाना पड़ता है। ऐसे लोकों में कई- कई विभाग होते हैं। यहाँ यह समझना भूल होगी के जीवों के रहने के लिए स्थूल चीजों के बने हुए इसी प्रकार के मकान, बैठक, पेड़ ऋतु, जंगल आदि होंगे जैसे इस पृथ्वी पर हैं। उन लोकों में सुख दुख की सूक्ष्म सामग्री रहती है। जिसका वे उपयोग करते है। हैजे के स्थान में सूक्ष्म रोग कीट वायु घूमते रहते हैं और गन्दगी के वातावरण में फलते फूलते एवं फिनायल आदि की तीक्ष्ण गन्ध से मर जाते हैं। रोग कीटों की यह पोषक और मारक क्रिया सूक्ष्म हैं। उसके लिए यह आवश्यक नहीं कि मनुष्य को मारने के लिये जैसी लम्बी छुरी की जरूरत होती है वैसी ही रोग कीटों को मारने के लिए फिनायल की गन्ध के पास भी हों। वहाँ भी भरण पोषण या सुख दुख की एक सूक्ष्म प्रक्रिया चलती है। नीचे के लोकों की अपेक्षा ऊँचे लोगों में ऐसा वातावरण अधिक होता है, जिनमें जीव पूर्ण विश्राम कर सके, और उत्तम आनन्द का अनुभव कर सके। ऊँचे लोकों के जीव स्वेच्छानुसार नीचे की कक्षाओं में तथा पृथ्वी पर आ सकते हैं, पर नीची कक्षाओं के ऊपर के लोकों की ओर उड़ने की शक्ति नहीं रखते।

मरने के बाद कुछ समय तक सूक्ष्म शरीर ज्यों का त्यों बना रहता है। आरम्भ के दिनों में तो साधारण श्रेणी के जीवों को यह भी पता नहीं चलता कि वे मर गये हैं और उनका क्या हो गया है। वे बहुत दिनों तब अपने घर के सगे सम्बन्धियों के आस पास मंडराते रहते हैं। उच्च जीवों का शीघ्र और नीच जीवों का देर में यह सूक्ष्म शरीर भी मर जाता है। जिस प्रकार साँप केंचुली को छोड़ देता है उसी प्रकार जीव कालान्तर में सूक्ष्म शरीर को भी छोड़ देता है।

सांसारिक लोगों से भी जीव प्रभावित होते है। जिन्होंने अपने जीवन काल में अपने आत्मा को महान बना लिया है वे अपना कर्तव्य समझकर ही सांसारिक लोगों की कुछ सात्विक मदद करने को कभी कभी आते हैं किन्तु छोटी श्रेणी के लोग सांसारिक लोगों पर अपना राग द्वेष प्रकट करने के लिये अधिक उत्सुक रहते हैं। अपने जीवन काल के मित्र शत्रुओं के सुख दुख में वे दुखी भी होते हैं और उनके कार्य में सहायता या शक्ति देते के लिये प्रयत्न करते हैं। ऐसे जीव अपनी विश्रामदायी अर्धनिद्रा में से बार बार जाग पड़ते हैं और अतिशीघ्र ही अपने इच्छित लोगों के समीप किसी के मोह बन्धन में बंधकर जन्म धारण कर लेत हैं या अपने ही शरीर को अधिक दृढ़ बनाकर पृथ्वी के ही किसी विशेष स्थान में आ ठहरते हैं। यह बात प्रत्यक्ष हो चुकी है कि कुछ जीव अपने सूक्ष्म शरीर को लिए हुए शताधिक दिनों अपने इष्ट मित्रों के आस पास के स्थानों में डेरा डाले पड़े रहते हैं और अपनी उपस्थिति का परिचय किसी न किसी रूप में अपने सम्बन्धियों को देते रहते हैं।

आत्मघात या दुर्घटनाओं से मरा हुआ जीव यदि साधारण श्रेणी का है तो उसकी बड़ी विचित्र दशा होती है। अचानक शरीर छूट जाने के कारण और मृत्यु समय में भारी कष्ट होने के कारण उसकी दशा बहुत अस्वाभाविक होती है वह आधे कटे हुए बकरे की तरह चारों ओर फड़फड़ाता फिरता है और जीव लोक में एक कुहराम खड़ा कर देता है। अपने पूर्व सम्बन्धियों के पास दौड़ा जाता है और फिर उलट कर इधर उधर भटकता है। पृथ्वी और जीव लोक में इनके द्वारा कोई भयंकर उत्पात भी किए जाते रहते हैं।


धीरे-धीरे

अखण्ड ज्योति के प्रथम अंक को देखकर कई पाठकों ने शिकायत के पत्र भेजे हैं कि इसमें मैस्मरेजम, तन्त्र संतान, योग क्रियाओं का बहुत थोड़ा बयान है। अपने उन स्नेही बन्धुओं से एक प्रार्थना हमें करनी है कि जल्दी न करें। धीरे- धीरे और थोड़ा- थोड़ा ही वे ग्रहण करे मनन करते जाय और उसे अभ्यास में लाते जाय। एक साथ उच्च कक्षा की चर्चा आरम्भ कर देना अनुचित और निष्फल होगा। हम उन अत्यन्त गुह्य और आश्चर्यजनक एवं सरल और सत्य साधनों को पाठकों के समक्ष उपस्थित करेंगे। पर एकदम उछलना ठीक न होगा। धीरे- धीरे चलिए, आपकी सब इच्छित चीजें क्रमशः मिलेगी। स्कूल में भी तो आपने क्रमशः ही कक्षाऐं पास की थी।


अध्यात्म विद्या प्रेमियों से प्रार्थना

ऐसा निश्चय किया गया है कि "अखण्ड ज्योति" में आगामी अंक से अध्यात्म विद्या प्रेमियों के चित्र भी हर अंक में दिये जाया करें। इसलिये आध्यात्म विद्या प्रेमी, सदाचारी, ईश्वरभक्त और लोकसेवी भाई बहनों से प्रार्थना है कि वे अपने संक्षिप्त परिचय भेजने की कृपा करें। परिचय पाकर अपनी आवश्यकतानुसार उन सज्जनों से हम चित्र मंगवा लेंगे और पत्र में संक्षिप्त परिचय के साथ प्रकाशित करेंगे।

"अखण्ड ज्योति" के पाठकों से भी प्रार्थना है कि उक्त प्रकार के किन्हीं अध्यात्म विद्या प्रेमी भाई बहिनों को जानते हों तो उनका पता और परिचय हमारे पास लिख भेजें, जिससे हम स्वयं उनसे फोटो की याचना कर लें। आशा है कि इस विषय में पाठक हमारी सहायता करेंगे।