VigyapanSuchana

अध्यात्म विद्या प्रेमियों से प्रार्थना

ऐसा निश्चय किया गया है कि ‘अखण्डज्योति’ में आगामी अंक से अध्यात्म विद्याप्रेमियों के चित्र भी हर अंक में दिए जाया करें। इसलिए अध्यात्म विद्याप्रेमी, सदाचारी ईश्वरभक्त और लोकसेवी भाई-बहनों से प्रार्थना है कि वे अपने संक्षिप्त परिचय भेजने की कृपा करें। परिचय पाकर अपनी आवश्यकतानुसार उन सज्जनों से हम चित्र मँगवा लेंगे और पत्र में संक्षिप्त परिचय के साथ प्रकाशित करेंगे।

‘अखण्डज्योति’ के पाठकों से भी प्रार्थना है कि उक्त प्रकार के किन्हीं आध्यात्म विद्याप्रेमी भाई-बहिनों को जानते हों तो उनका पता और परिचय हमारे पास लिख भेजें, जिससे हम स्वयं उनसे फोटो की याचना कर लें। आशा है कि इस विषय में पाठक हमारी सहायता करेंगे।

— संपादक


धर्म का सच्चा स्वरूप

(ले. डा. रवीन्द्रनाथ टैगोर)

मैं कोई नवीन बात कहने, किसी गूढ़ तथ्य पर प्रकाश डालने के लिए आपके सामने नहीं उपस्थित हुआ हूँ। मैं कवि हूँ, मुझे जगत और जीवन से अपार प्रेम है। प्रेम एक ऐसी चीज है जो मनुष्य को न केवल अंतर्दृष्टि प्रदान करती है बल्कि मानव समाज की मूक भावनाओं के प्रति हमारे हृदय में अनुराग भी उत्पन्न करती हैं। सौभाग्य से मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो नाना प्रकार के आमोद प्रमोदों में फंसकर जीवन की स्वच्छन्दता और अनेक रूपता को बिल्कुल भूल जाते हैं। हमारी आध्यात्मिक उन्नति का अनुमान इसी बात से लग जाता है कि हमारी आन्तरिक भावनाएं कितनी उच्च अथवा उदार हैं। जीवन के सुखमय बनाने वाले उपादानों से घिरे रहने पर भी, शान्ति नहीं मिलती, हमें स्वातंत्र्य भावना के, मुक्ति के, दर्शन नहीं होते। आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की अपरिमित भूख अत्यन्त प्राचीन काल से मानव-मन की एक विशेषता रही है। अत्यन्त प्राचीन काल से मानव मन की जिज्ञासा शक्ति अज्ञात के प्रति, लीन रही हैं। इसी चिरन्तन सत्य की खोज में मनुष्य समाज युग-युगान्तरों से संलग्न है फिर भी उसे सफलता प्राप्त नहीं हुई।

समस्त प्रकृति अनन्त की ओर तेजी से दौड़ रही है। पशु-पक्षियों तक में अनन्त के प्रति यही अनुराग की भावना व्याप्त है। चर जगत के प्राणी मात्र अपने विकसित रूप में, सन्तान के रूप में अनन्त काल तक संसार में अपनी सत्ता बनाए रखने के इच्छुक होते हैं। किंतु चूँकि मनुष्य विचार शक्ति सम्पन्न प्राणी है अतः वह येन केन प्रकारेण जीवन यापन से ही सन्तोष नहीं कर सकता, जीवन को अधिक से अधिक शान्त और विवेकपूर्ण बनाने में ही उसकी आकाँक्षाएं निहित हैं। इन्हीं आकाँक्षाओं को क्रियात्मक रूप प्रदान करने में कितने ही महात्माओं ने अपनी आहुतियाँ दे दी हैं। उन्होंने सत्य सिद्धान्तों की खोज की, जीवन का एक आदर्श बनाया और अपने अनुगामियों को बताया कि अमुक मार्ग का अनुकरण करने से ही हमें आन्तरिक शान्ति प्राप्त हो सकती है। विभिन्न महात्माओं के विभिन्न मार्ग ही संसार में विभिन्न धर्मों के नाम से प्रख्यात हैं। संसार के सभी सभ्य देशों में महात्माओं ने शान्ति, सौंदर्य और मानव चरित्रगत नैतिकता के महत्व को घोषित किया और इन्हीं तथ्यों की सम्यक् उपलब्धि में जीवन की सार्थकता सिद्ध की।

प्रत्येक धर्म अपनी प्रारम्भिक दशा में पूज्यतम भावनाओं से मण्डित होता है किन्तु आगे चलकर उसकी प्रगतिशील स्फूर्ति वैसी नहीं रह जाती, उसमें धर्मान्धता का समावेश होने लगता है। उस समय उसके आध्यात्मिक विवेक पर परदा पड़ जाता है, उसके सिद्धान्त खोखले हो जाते हैं और मनुष्य के बीच के ऐक्य सूत्र को खंडित करने में ही सहायता करते हैं। धार्मिक कट्टरता हमारी सर्वतोमुखी उन्नति को बिल्कुल रोक देती है और हम जीवन की होड़ में बिल्कुल पिछड़ जाते हैं। ऐसी दशा उपस्थित होने पर सभ्य जगत की उन्नति शील संस्थाएं देश और समाज को धर्म के इस गोरखधन्धे से बड़ी मुश्किल में मुक्ति कर पाती हैं।

किसी सम्प्रदाय में जन्म लेकर अथवा उसके अनुयायी होकर हम समझ लेते हैं कि हमने ईश्वर को प्राप्त कर लिया। हम यह सोचकर अपने मन को साँत्वना दे लेते हैं कि हमारे ईश्वर की निजी विशेषताएं हैं, हमें अब उसके विषय में विशेष चिन्तन की जरूरत ही क्या? ईश्वर के विषय में उक्त धारणाएं रख कर हम समय समय पर विरोधियों के सिर तोड़ने को तैयार हो जाते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि वही धर्म जिसकी उद्भावना बड़े ही उदात्त विचारों के बीच हुई थी और जो मानव जाति की आध्यात्मिक मुक्ति के उच्च सिद्धान्त को लेकर अग्रसर हुआ था, मानव समाज की स्वातंत्र्य-मूलक भावनाओं के लिए कितना घातक सिद्ध होता है, उन्हें कैसे कड़े बन्धनों में जकड़ देता है। पण्डित, पाधाओं, मुल्लाओं और पादरियों के कठोर शासन के अंतर्गत धर्म की ऐसी छीछालेदर होती हैं, उसका स्वरूप इतना विकृत हो जाता है कि देश और समाज को स्वच्छन्द वायु का स्पर्श तक नहीं होने पाता, उसमें मंगलमयी और उदार भावनाओं का उदय हो भी तो कैसे?

यदि सचमुच आप सत्य के पुजारी हैं तो मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि आप पूर्ण-सत्य को खोजने की चेष्टा करिये, रूढ़ियों के मजबूत जालों में फँसे हुए गोल मोल किन्तु छूँछे धार्मिक प्रतीकों के फेर में पड़ कर अपनी बुद्धि के दिवालियेपन का परिचय आपको न देना चाहिये।

मेरा उद्देश्य समस्त मानव समाज के लिए पूजा के एक सामान्य आदर्श की प्रतिष्ठापना का नहीं है। अक्सर साम्प्रदायिकता के नाम पर मानव समाज के बीच छोटी छोटी बातों को लेकर जो बड़े बड़े उपद्रव उठ खड़े होते हैं उन्हें देख कर यही कहना पड़ता है कि जन समाज धर्म के स्वरूप को अब तक पहचान नहीं सका। “धर्म”, काव्य की तरह कोई भावना मात्र नहीं है, वह अभिव्यक्ति है।

जब कोई धर्म काफी उन्नतावस्था को प्राप्त हो जाता है और उसकी आकाँक्षाएं इतनी व्यापक हो जाती हैं कि समस्त मानव समाज पर अपनी धाक जमाना चाहता है, उस समय वह अपने उच्च आसन से गिर जाता है। उसमें अत्याचार की भावनाएं व्याप्त हो जाती हैं और उसका स्वरूप साम्राज्यवाद से मिलता जुलता हो जाता हैं।

मानव समाज की मूल वृत्तियों में ही धर्म का सत्य-स्वरूप निहित है। मेरा मतलब इसी उपेक्षित सत्य की ओर आपका ध्यान आकर्षित करने का है।

मैं श्री रामकृष्ण परमहंस को बड़ी श्रद्धा को दृष्टि से देखता हूँ क्योंकि उन्होंने एक ऐसे युग में सत्य के स्वरूप को पहचान कर हमारी आध्यात्मिक परम्परा पर प्रकाश डाला था जब देश में घोर अज्ञानान्धकार का एकान्त राज्य था। उनके विस्तृत विवेक ने साधना के विरोधी मार्गों का सम्मिलन कराया, और उनके सरल व्यक्तित्व ने पण्डित पाधाओं की अहंमन्यता पर सदा के लिए एक स्थायी प्रभाव डाला था।

विवेक बुद्धि से काम लेने पर आपको ज्ञात होगा कि समस्त चराचर प्रकृति ईश्वर की ही व्यक्त सत्ता का प्रकाश है। जगत के नाना दृश्यों और व्यापारों में हम उसी एक चिरंतित शक्ति के विभिन्न स्वरूपों के दर्शन करते हैं।

अपने निजी धर्म को आवश्यकता से अधिक महत्व देने के उसे सर्व श्रेष्ठ धर्म समझने के हम आदी हो गये है। इसके मानी होते हैं कि परमात्मा की सर्व जन हितकारिता पर हमें विश्वास नहीं, दूसरे शब्दों में हम ईश्वर की न्यायशीलता पर अभियोग लगाते हैं और उसे पक्षपाती ठहराते है।


मौन एक दैवी रेडियो है।

(ले.-श्री. महादेव देसाई)

उस दिन जब श्री शरत् चन्द्र बोस यहाँ आये तब मैंने उनसे पूछा, क्या आप सेगाँव गये थे? उन्होंने बतलाया कि हाँ, गया था और गाँधी जी से देर तक बात चीत भी की थी, लेकिन गाँधी जी ने अखबारी रैपर के एक टुकड़े पर यह लिखने के सिवा और कुछ नहीं कहा कि “परिवार के सब लोगों को मेरा प्रेम पहुँचा देना।” इसके बाद उन्होंने बतलाया कि “मैंने महात्मा जी से पूछा कि क्या दिल्ली में भी वे अपना मौन जारी रखेंगे। इस पर उन्होंने हाँ का संकेत किया। क्या यह अचरज की बात नहीं है?”

मौन जारी रहेगा या नहीं, यह तो मुझे मालूम नहीं, लेकिन यह मुझे इत्मीनान है कि मौन को अनिश्चित काल तक जारी रखने की उन्हें बड़ी ख्वाहिश है। इस मौन के दर्म्यान कई बार उन्होंने लिखा है कि “ईश्वर की यह कितनी अनुकम्पा हैं कि मैं मौन हूँ!” यह तो निस्सन्देह है कि मौन से उन्हें अपार आनन्द मिला है और बहुत सी बातों से से बच गये हैं, जो शायद क्रोधवेश से उनके मुँह से निकल जाती।

जब इस बात का ख्याल आता है तब यह महसूस किये बिना नहीं रहा जाता कि हम बकवासी लोग अगर मौन के गुण को समझ जायें तो दुनिया का लगभग आधा दुःख तो दूर हो ही जायगा। आधुनिक सभ्यता के फेर में पड़ने से पहले दिन-रात के चौबीस घंटों में से कम से कम 6 से 8 घन्टे तो हम खामोश रहते ही थे। लेकिन इस आधुनिक सभ्यता ने हमें रात को दिन में और निस्तब्धता को हल्ले गुल्ले में तब्दील करना सिखला दिया है। रोज के अपने काम-काज के बीच अगर हम कुछ घंटे ध्यान में भी लगायें और अपने मन को मौन द्वारा ईश्वर की आवाज सुनने के लिये तैयार करें तो क्या ही अच्छा हो! वह तो ऐसा दैवी रेडियो है जो हमेशा गाता रहता है। जरूरत सिर्फ यह है कि हम उसे सुनने के लिये तैयार हों। लेकिन यह तब तक सम्भव नहीं जब तक मौनावलम्बन-द्वारा शान्ति के साथ उसे न सुना जाय।

-हरिजन से


धर्म और विज्ञान

(पं. जवाहरलालजी नेहरू)

आज जब विज्ञान ने अपने पर सारी दुनिया के ऊपर फैला लिये हैं, और प्रत्येक बात को अपने नीचे छुपा लिया है, धर्म और विज्ञान की जद्दोजहद हकीकत नहीं मालूम होती है, क्योंकि कल तक जिसे ठोस भद्दा जड़ पदार्थ (मैटर) समझा जाता था, वह आज इतना सूक्ष्म है कि वायु से भी सूक्ष्म।

हो सकता है कि इस “ब्रह्माण्ड” में हम धूल के एक छोटे से कण ही हों। लेकिन इस धूलि कण में भी वह चीज है, जिसमें इंसान का दिमाग और रूह है। सदियों से यह बढ़ता रहा है, और इस पृथ्वी का मालिक बन बैठा है और इसने आकाश की बिजली तक से शक्ति पाई है। विज्ञान ने ब्रह्माण्ड के रहस्य को हमारे सामने खोलकर रख दिया और प्रकृति की चंचलता को भी अपने काम में लगाया है। पृथ्वी और आकाश से भी अधिक महत्वपूर्ण है आदमी का दिमाग और रूह, जो दिन दूनी और रात चौगुनी शक्तिशाली होता जाता है और नित नई दुनिया विजय करने की तलाश में रहता है।

सच्चा वैज्ञानिक वह ‘योगी’ है जिसे जीवन का मोह नहीं जो अपने कर्म का फल नहीं चाहता बल्कि सत्य की खोज में कहीं तक भी जाने को तैयार रहता है किसी एक जगह ऐसा लंगर डालकर बैठ रहता कि वहाँ से हिल ही न सके।

-नवयुग से


मनुष्य का मनोबल

(लेखक-स्वर्गीय श्री स्वामी विवेकानंद जी)

(इंग्लैण्ड में दिए हुए एक भाषण का साराँश)

संसार के इतिहास का निरीक्षण करने से उसमें सब देश और जातियों में प्राप्त होने वाली आश्चर्य कारक बातें मिलेंगी। उन आश्चर्य कारक बातों पर सब देशों के श्रद्धालुओं का विश्वास रहा है। यहाँ सुनी हुई बातों की अपेक्षा मैं अपनी आँखों देखी हुई बातों का ही उल्लेख करूंगा!

एक बार मैंने सुना कि भारत के अमुक शहर में एक महात्मा आये हुए हैं जो मन की बात और भविष्य बताते हैं। मैं कुछ मित्रों सहित उनके पास गया। हम लोगों ने अपने प्रश्न अपनी डायरी में लिख रखे थे। वहाँ पहुँचते ही उन महात्मा ने सारे प्रश्नों को बता दिया और उनके संबन्ध में भविष्य वाणी भी की। इसके बाद उन्होंने कागज के छोटे छोटे टुकड़ों पर कुछ लिख कर हम लोगों को दिया और उन्हें जेबों में रख लेने का आदेश दिया। इधर उधर की बातें होने के कुछ देर बाद उन्होंने कहा आप लोग चाहे जिस भाषा का वाक्य मन में चिन्तन करें मैं उसको बतला दूँगा। हमें मालूम था कि वे संस्कृत अरबी जर्मन आदि भाषाएं नहीं जानते। इसलिए हम लोगों ने प्रथम संस्कृत अरबी और जर्मन भाषा के वाक्य मन में लिये। कुछ देर इधर उधर की बातें होने के बाद उन्होंने कहा कि घंटे भर पहले जो कागज के टुकड़े मैंने आप लोगों को दिये थे उन्हें जेबों से निकाल कर पढ़िये। हमने निकाल कर पढ़ा तो अक्षरशः वही वाक्य लिखे मिले जो हमने मन में सोचे थे। इस पर हमें बड़ा आश्चर्य हुआ। हमें संदेह हुआ कि शायद इनने कोई चालाकी की हो, इस पर हमने फिर जाँच की पर उनके चमत्कार सच्चे ही साबित हुए।

इसी प्रकार के एक चमत्कार करने वाले महात्मा से मिलने मैं हैदराबाद गया। भेंट के बाद एक दिन वे आकर हमारी कोठरी में बैठ गये। वे केवल एक धोती पहने हुए थे जिससे यह संदेह भी व्यर्थ था कि कोई चीज कहीं छिपी होगी। उन्होंने कहा कहिये कौन सी वस्तु ला दूँ? हम लोगों ने विभिन्न देशों में पैदा होने वाले फल माँगे। देखते ही देखते उसी तरह के फलों का उन्होंने ढेर लगा दिया। तोले जाते तो वे फल उन सज्जन के शरीर से चौगुने होते। इन सुस्वादु फलों को सबने खाया। अन्त में उन्होंने ओस की बूँदें पड़े हुए बहुत से गुलाब के फूल हमें दिये।

ऐसी चमत्कारिक बातें हमारे देश की तरह आपके यहाँ भी होती होंगी कुछ बातें नकली भी की जाती हैं पर नकल भी असल की ही होती हैं। यह बातें अविश्वसनीय नहीं होतीं केवल हम उन बातों के असली रहस्य से अनभिज्ञ होते हैं। प्राचीन काल में भारत में ऐसे चमत्कार हजारों होते थे पर अब उतने दिखाई नहीं देते। यह एक मानी हुई बात है कि जिस देश की जन संख्या बढ़ जाती है वहाँ का आध्यात्मिक बल घट जाता है। प्राचीन काल में जब भारत की जनसंख्या कम थी तब वहाँ के निवासियों ने आध्यात्मिक तत्त्व की महत्वपूर्ण खोज करके इस विषय का सर्वांग पूर्ण शास्त्र बनाया था। भारतीय जानते थे कि यह सब चमत्कार प्रकृति के नियमों के अनुकूल ही होते हैं। जो बात हमेशा नहीं दिखाई पड़ती उसे ही चमत्कार कहते हैं। आज जो बातें हमारे दैनिक जीवन में होती हैं एक समय वह भी चमत्कार ही मालूम पड़ती थीं। कुछ लोगों में जन्म से ही आत्म शक्ति विशेष रूप से होती है। अब भी भारत में असंख्य लोग इस शास्त्र का अभ्यास करते हैं।

प्रत्येक मनुष्य का मन, विश्वव्यापी एक ही महामन का अंश है। इसलिए एक मनुष्य के मन का दूसरे के मन से नित्य संबंध है। इसी कारण कहीं एक कोने पर बैठा हुआ आदमी सारे संसार के मनों से संबंध स्थापित कर सकता है। विभिन्न लोगों के मन, विश्वव्यापी महा मन समुद्र की तरंगें हैं उनका आपस में एक दूसरे से सम्बन्धित होना स्वाभाविक ही है।

एक समय एक स्थान पर बैठा हुआ मनुष्य जब विचार करता है, दूसरे समय दूसरे स्थान का दूसरा मनुष्य भी वही विचार करता पाया जाता है। इसका क्या कारण हैं? यह विचार संक्रमण का चमत्कार है। दूसरों के पास अपने विचारों को पहुँचाने और दूसरे के भेजे हुए विचार ग्रहण करने की क्रिया का अन्यास करने से यह सुलभ हो जाती है। जब साधक का अभ्यास बढ़ जाता है तब वह चाहे जितनी दूर अपने विचार पहुँचा सकता है क्योंकि मन की गति अत्यन्त सूक्ष्म है। उसके मार्ग में कोई रुकावट नहीं डाल सकता। मन का संयम योग क्रिया की जड़ है उसके द्वारा हर काम हो सकता है।

मैं व्याख्यान दे रहा हूँ आप सुन रहे हैं, यह भी विचार संक्रमण ही हो रहा है। मैं अपने जड़ विचारों को शब्द के रूप से प्रकट करता हूँ। शब्द आकाश में मिलकर कम्पनों के साथ ध्वनि के रूप में आपके कानों में घुस जाते हैं आप उन्हें कान के भीतरी पर्दे में ग्रहण करके अपने मस्तिष्क में भेजते हैं मस्तिष्क में पहुँच कर वे पुनः अपना पुराना रूप धारण करते हैं तब जाकर आपको उन शब्दों के अर्थ का ज्ञान होता है। मैं अपने विचारों को आप के पास पहुँचा रहा हूँ। इस कार्य में स्वयमेव दो क्रियाएं हो रही हैं। मेरे विचार सूक्ष्म कम्पन का रूप धारण करके फैल रहे हैं और आप लोगों के मस्तिष्कों में प्रवेश करके वे पुनः अपने असली रूप में प्रकट हो रहे हैं। यदि योग शास्त्र के अभ्यास से अपने विचारों को आपके पास पहुँचाना चाहूँ तो कोई बाहरी क्रिया करने की जरूरत न पड़ेगी। मैं अनायास ही अपने सब विचार आपके पास पहुँचा सकूँगा।

संसार का हर पदार्थ हमारे ऊपर अपना अधिकार जमाने का प्रयत्न करता है। हम अपनी चालाक शक्ति के आधे भाग से अपनी रक्षा करते हैं और आधे से संसार के अन्य पदार्थों पर अधिकार करने की कोशिश करते हैं। हमारे स्वभाव, मन, शरीर, भावनाएं बाह्य जगत पर अधिकार जमा रहे हैं। मान लीजिए कोई विद्वान व्यक्ति आप से मिलने आता हैं वह घन्टे दो घन्टे आपसे बात करता हैं। उसकी वाणी मीठी और विचारावली सुन्दर है तो भी आप उसकी बातों से प्रभावित नहीं होते और उसके चले जाने के बाद पहली दशा में आ जाते हैं। फिर कोई व्यक्ति आता है जिसकी वाणी अशुद्ध है और बात चीत भी थोड़ी देर होती है पर आप पर उस विद्वान की अपेक्षा इस व्यक्ति का बहुत असर पड़ता है। इस प्रकार के अनुभव आपको प्रतिदिन होते हैं। इसका क्या कारण है? कारण यह है कि जिस व्यक्ति का अधिक प्रभाव पड़ता है उसमें कुछ विशेष तेज या चुम्बकत्व होता है जिसका प्रभाव दूसरों पर पड़े बिना नहीं रहता। भाषा और विचार तो साधारण उपकरण मात्र हैं। इनसे व्यक्ति की आकर्षणशक्ति को कुछ सहायता मिल जाती है। आदमी को यश अपयश प्राप्त होना भी इसी तेज पर निर्भर है। एक ही प्रकार के उद्योग में एक व्यक्ति को लाभ होता है और दूसरे को हानि। इसका कारण भी व्यक्ति का विशेष तेज है। योगशास्त्र कहता है कि इस आध्यात्म शक्ति के विशेष तेज को हर एक व्यक्ति सम्पादन कर सकता है।

प्राचीन महापुरुषों के चरित्रों पर विचार कीजिए उनको इतना यश अपनी कृतियों के कारण नहीं वरन् व्यक्तिगत तेज के कारण प्राप्त हुआ है। अनेक त्यागी और धुरंधर विद्वान जिनकी योग्यता के सामने आज हमें सिर झुकाना पड़ता है उनके जीवन काल में उन्हें बहुत कम आदर प्राप्त हुआ था। सर्व साधारण पर प्रभाव डालने में बुद्धि एक तिहाई और प्रतिभा दो तिहाई काम करती है। प्रतिभा मुख्य और कृति गौण होती हैं क्योंकि जहाँ प्रतिभा है वहाँ कार्य तो अपने आप होता रहेगा। अन्ततः संसार में कृति का महत्व नहीं किंतु व्यक्ति का है। प्रतिभावान् व्यक्तियों को जादूगर और चलते फिरते विद्युतोत्पादक यंत्र समझना चाहिए वे जहाँ जाएंगे विजय प्राप्त करेंगे। जिस कार्य में हाथ डालेंगे उसी में सफलता पायेंगे। क्यों कि अपनी विद्युत शक्ति से सब जगह चेतना उत्पन्न कर देना उनके लिये कुछ भी कठिन नहीं है।

अभी तक कही हुई बातें अमुक नियम से होती हैं यद्यपि मैं यह नहीं बता सकता, तो भी यह बातें कपोल कल्पित नहीं हैं। क्योंकि व्यवहार में उनका अस्तित्व हम सदैव देखते रहते हैं। जड़ शास्त्रों के नियमों की भाँति इसका कोई नियम निर्धारित नहीं किया जा सकता। मनुष्य में दिखाई देने वाला आत्म तेज, देहान्त होने के बाद भी जीवित रहता है। कृतियों को देख कर उनके तेज की हम एक धुँधली कल्पना कर सकते हैं बड़े बड़े ग्रंथ निर्माता और महात्माओं की तुलना करके देखिये। विद्वतापूर्ण ग्रन्थों से कोई गहरा असर नहीं पड़ता पर महात्माओं की कृति देख कर आप विह्वल हो जाते हैं। महात्माओं के जितना विद्वानों से हमें प्रेम नहीं होता। बुद्धि एक इन्द्रिय और मानवी हृदय की एक बनावट चीज हैं वह अनुकूल परिस्थिति में प्रकाश देती और प्रतिकूल परिस्थिति में नष्ट हो जाती है। महात्माओं का तो हृदय प्रकाशवान होता है एक जलती हुई मशाल से जैसे हजारों दीपक जलाये जा सकते हैं उसी प्रकार महात्माओं के प्रकाश-मय हृदय से सम्बन्ध करने पर करोड़ों लोगों का उद्धार हो जाता है। मनुष्य में विशेषता उत्पन्न करने वाले नियम योग शास्त्र ने ढूँढ़ निकाले हैं वे सब समय देश तथा पात्रों के अनुकूल हैं। धनी, दरिद्र, ग्रही, संन्यासी, परिश्रमी, आराम तलब, सब कोई अपनी विशेषता, अपने स्वरूप और अपने मनोबल को दृढ़ कर सकते हैं!

आत्म तेज बढ़ाने के लिए मन का संयम करना जरूरी है। अक्सर लोगों को यह शिकायत रहती है कि अपने विचार और कार्यों पर हमारा अधिकार नहीं चलता। यदि विचारों के उठते ही हम उनका नियमन कर सकें, स्थूल कार्यों की सूक्ष्म शक्ति को अपने आधीन बनाये रहें तो यह सम्भव नहीं कि मन काबू में न रहे। जब हम अपने मन पर पूरा अधिकार कर लेंगे तो दूसरों के मनों पर अधिकार जमाना भी कठिन न रह जायगा क्योंकि सब मन एक ही विश्व व्यापी मन के अंश हैं। मन का संयम सब से बड़ी विद्या है। संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं जो इसके द्वारा सिद्ध न हो। मनोनिग्रह से शरीर सम्बन्धी बड़े बड़े दुःख तिनके जैसे प्रतीत होंगे। मानसिक दुखों को मनोनिग्रही व्यक्ति के पास आने का साहस न होगा अपयश तो उसका नाम सुनकर भागता फिरेगा। सब धर्मों ने भीतरी बाहरी पवित्रता तथा नीति का उपदेश इसलिये दिया है कि पवित्रता और नीतिमत्ता से मनुष्य अपने मन को वश में कर सकता है और मनोनिग्रह ही सब सुखों का मूल है। यह बात निश्चित हो चुकी है कि संसार की हर एक वस्तु एक ही लक्ष की ओर जा रही है और वह लक्ष है-पूर्णता। सारा संसार एक दिन पूर्णता को प्राप्त होगा परन्तु उसे यदि कोई सहायक मिल जाय तो वह अपना रास्ता जल्द तय करेगा। साधु महात्मा और सद्गुरु हमें अपने लक्ष की ओर शीघ्र पहुँचाने वाले सहायक हैं। मन का अभ्यास कर उसमें गोचर होने वाली शक्ति का विचार करने से पूर्णता प्राप्त होती है, इस बात को त्रिकालदर्शी लोगों ने सिद्ध कर दिया है। उनका कथन है कि जो काम तुम स्वयं कर सकते हो उसे प्रकृति के भरोसे छोड़ कर लोगों के हाथ के खिलौने क्यों बन रहे हो? उठो अपना रास्ता सुधारो और एक ही छलाँग में संसार को पार कर दो।

निस्सन्देह मनुष्य जाति के सुख, ज्ञान और बल की वृद्धि हो रही है पर यह वृद्धि कितनी हुई है इसका अन्दाज लगाने का कोई पैमाना हमारे पास नहीं है। हमें अपनी आँखों के आस पास की वस्तुओं के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं दीख पड़ता। परन्तु मैंने एक ऐसा मनुष्य देखा है जो एक कोठरी में बैठकर दूसरी कोठरी का सब हाल बताता हैं। आप इस बात पर शायद विश्वास न करेंगे परन्तु वह मनुष्य केवल तीन सप्ताह में आप लोगों में से जो सीखना चाहें उन्हें उक्त विद्या सिखा सकता है। दूसरों के मन की बात जानने की कला पाँच मिनट में आ सकती है परन्तु दृढ़ चित्त से अभ्यास करना चाहिये। जो मनुष्य अपने मन पर अधिकार कर चुका है उसके लिये दूसरों के मन की बात जानना असम्भव नहीं है वह घर बैठे संसार भर की बातें जान सकता है। यदि आप इस विद्या को नहीं जानते तो इसे मिथ्या कहने का भी आपको अधिकार नहीं है सब शास्त्रों के आविष्कर्ता यदि आप जैसे मिथ्यावादी होते तो आज किसी शास्त्र का अस्तित्व सिद्ध न होता। हर रोज जिन बातों का अनुभव होता है उन्हें एकत्रित कर, उनका विभाग कर, उनमें से सत्य सिद्धान्त ढूँढ़ निकालना ही किसी खास शास्त्र का आविष्कार करना है, इसी तरह से आज तक सब शास्त्र बने हैं। अज्ञात वस्तु को झूठ कहने से उसका सत्य स्वरूप आपसे सदा ही छिपा रहेगा। हिन्दू लोग किसी वस्तु की झूठी नहीं कहते। हर वस्तु का सूक्ष्म निरीक्षण करने की उन्हें आदत है।

भारत का इतिहास देखने से आपको ज्ञात होगा कि भौतिक शास्त्रों का पता लगाने के पश्चात् आर्य लोग मानवी मनोबल का पता लगाने में इतने गढ़ गये थे कि उन्हें भौतिक शास्त्रों की आधुनिक रीति से उन्नति करने का ध्यान भी न रहा। उनको विश्वास हो गया था कि मानस शास्त्र सिद्ध हो जाने पर हमारी सब आकांक्षाएं पूर्ण होंगी। मनोबल से हम जो चाहेंगे कर सकेंगे। मंत्र, तंत्र, जादू, टोना आदि के भी सिद्धान्त बाँध कर उन्होंने एक शास्त्र बना डाला और भौतिक शास्त्रों की तरह मानस शास्त्र के नियम बना कर उसका वे अभ्यास करने लगे। योगी लोगों के अनेक पंथ निर्माण हुए। कोई खास रंग के कपड़े पहन उसी रंग से पुते हुए घर में रहकर ओर खास रंगों के पदार्थों को भक्षण कर भिन्न-भिन्न प्रकाश किरणों का अभ्यास करने लगे। कोई कानों को बन्द कर ध्वनि सुनने और पुनः कान खोलकर पहले सुनी हुई ध्वनि का अभ्यास करने लगे। कोई भिन्न-भिन्न गन्धों का अभ्यास करने लगे। इसी तरह नाना पंथों से ज्ञानेन्द्रियों द्वारा मानस शास्त्र का अभ्यास कर अन्त में उन्होंने उस शास्त्र को सर्वांगपूर्ण बना डाला। संसार की सब वस्तुओं के मूल रूप का पता लग जाने से उन्हें विलक्षण सामर्थ्य प्राप्त हुई। किसी ने मृत्यु को जीत लिया, कोई आकाश में उड़ने लगा और कोई मुर्दे जिलाने लगा। उस समय के हिन्दुओं ने जान लिया था कि सब प्रकार के सामर्थ्यों का अधिष्ठान जीवात्मा में है। अभी भी हिन्दुओं का आध्यात्म बल बिलकुल नष्ट नहीं हुआ है। कुछ कदन पूर्व एक पाश्चात्य विद्वान ने अपने मित्र की एक आँखों देखी घटना मुझसे कही थी। वे कुछ वर्ष पूर्व लंका के गवर्नर थे, वही उन्होंने यह घटना देखी। घटना यह थी कि कुछ हिन्दुओं ने बहुत सी लकड़ियों का एक टीला बना कर उस पर बारह वर्ष की एक कन्या को बिठाया। और लड़की के नीचे से एक- एक करके सब लकड़ियाँ निकाल ली। लड़की ऊपर टंगी रही। गवर्नर महोदय को सन्देह हुआ कि शायद कोई अदृश्य वस्तु लड़की को उठाए हुए है इसलिए उन्होंने अपनी तलवार लड़की के नीचे से घुमाई, पर कहीं कुछ न था। इस प्रकार की शक्ति बहुत से हिन्दुओं को प्राप्त हैं और इसी अभ्यास में सैकड़ों वर्ष बिता देने के कारण वहाँ भौतिक शास्त्रों का लोप हो गया। तब वे निकम्मे ठहराये गये। आज हिन्दुओं के पास बाहरी चमक न होने पर भी उनके हृदय सूर्य किरणों के समान चमक रहे हैं।

मुझे कुछ लोगों ने कहा कि आप मानस शास्त्र की केवल उत्पत्ति बताते हैं, पर अभ्यास के मार्ग की चर्चा नहीं करते। मेरा कथन हैं कि यह शस्त्र दाल रोटी का कौर तो है नहीं, जो उठाया मुँह में रख लिया। आप जड़ शास्त्रों का अभ्यास करते हैं, वह कठिन नहीं है क्योंकि जिन वस्तुओं की छानबीन करते हैं वे जड़ हैं। उदाहरणार्थ इस कुरसी को आपको चूर करना हो तो कुरसी आप से लड़ने नहीं आवेगी। यह बात मन की नहीं है मन पर अधिकार करना सहज नहीं हैं। उसका आकलन करने के लिए दिन रात परिश्रम करने होंगे। मैं बड़ा भारी योगी नहीं हूँ परन्तु उसकी रूपरेखा जानने में ही मुझे तीस वर्ष बिताने पड़े हैं।

(स्वामी विवेकानन्द की जीवनी और व्याख्यान से)


शीर्षासन का महत्व

(ले.-श्रीमती गंगा देवी अस्थाना, प्रधानाध्यापिका गर्ल्स स्कूल)

आसनों का महत्व साधारण व्यायाम से बहुत अधिक है। तभी तो योग के आठ अंगों में उन्हें स्थान दिया गया है। यदि उनमें विशेषता न होती तो कोई भी व्यायाम योग का अंग बन जाता। कारण यह है कि निर्बल शरीर वाले, बुद्धि जीवी, रोगी, बालक, स्त्रियाँ, बुड्ढे सभी के लिए आसनों का व्यायाम ऐसा है जो बिना किसी प्रकार की अनावश्यक शक्ति हरण किये शरीर के मन्द हुए कल पुर्जों को आसानी से चला देता है। साधारण व्यायाम में यह बात नहीं है। डंड बैठक करने के बाद आदमी थक जाता है और सुस्ती आती है किन्तु आसनों के बाद प्रफुल्लता और फुर्ती का उदय होता है।

मेरे अनुभव में जितने आसन आये हैं उनमें दिमागी काम करने वालों के लिए शीर्षासन सब से श्रेष्ठ है। योग शास्त्रों में इसकी बड़ी महिमा बताई गई है और इसे आसनों का राजा कहा गया है। अपने और दूसरों के अनुभव के आधार पर मैं भी इसकी श्रेष्ठता स्वीकार करती हूँ। किन्तु बीस वर्ष से कम उम्र वालों, प्रसूता, गर्भवती और रजस्वला स्त्रियों को मैं इसकी सलाह नहीं दे सकती क्योंकि उन्हें तो इससे उलटी हानि पहुँच सकती है।

आरम्भ में शीर्षासन की साधना कठिन है। बिना किसी सहारे के एक दम सिर नीचे को और पैर ऊपर को करके कुछ देर खड़े रहने का अभ्यास नहीं हो सकता। इसलिए दीवार या दूसरे साथी की सहायता लेनी चाहिए। शीर्षासन करते समय कोई गुदगुदा बिछौना बिछा लेना चाहिए। और दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में मिला कर उन्हें सिर के पीछे के भाग में लगा कर उल्टा होने की कोशिश करनी चाहिए। हाथों पर सिर रखने की जरूरत नहीं है। आसानी के लिहाज से एक चौकोर छोटा तकिया सिर के नीचे रखा जा सकता है। गरदन को बिल्कुल सीधा रखना चाहिए उसे टेड़ी−मेड़ी करने या इधर उधर हिलाने से गरदन में मोच वगैरह आने का अन्देशा रहता है।

दीवार का सहारा लेना ठीक है। यह जरूरी नहीं कि शरीर बिल्कुल सीधी लाइन में ही उल्टा हो। पहले पहल तिरछा रख कर काम चलाया जा सकता है। सिर दीवार से एक, डेढ़ फुट अलग रहे और पाँव ऊपर जा कर दीवार से सट जाएं, धीरे धीरे सिर को दीवार के पास लाने का अभ्यास करना चाहिए। कुछ दिनों में बिल्कुल सीधी तरह उल्टे होने का अभ्यास हो जायगा और फिर बिना सहारे भी उल्टा हुआ जा सकेगा। शुरू के चार पाँच दिन पन्द्रह सेकिण्ड ही उल्टा होना चाहिए और फिर प्रति दिन दो-तीन सेकिंड के हिसाब से क्रम बढ़ाना चाहिए। साल दो साल के अभ्यास के बाद जब पूरी तरह साधन होने लगे तब स्त्रियों को पन्द्रह-बीस मिनट और पुरुषों को आधा घण्टा यह आसन करना काफी होगा। इस आसन को करते समय साँस नाक द्वारा शान्ति पूर्वक लेनी चाहिए।

खून पतली चीज है और पतली चीजों का स्वभाव होता है कि वे नीचे को बहें। जब शीर्षासन किया जाता है तो खून की गति नीचे की ओर अर्थात् मस्तिष्क की ओर अधिक हो जाती है। जिस प्रकार काफी पानी मिलने से सूखे हुए पौधे भी हरे हो जाते हैं इसी प्रकार काफी रक्त मिलने से मस्तिष्क के जीवन कोष तरोताजा हो जाते हैं और उनकी शक्ति बढ़ती है। निर्बल मानसिक शक्तियाँ सबल होती हैं और स्मरण शक्ति, कल्पना शक्ति, तर्क शक्ति आदि शक्तियाँ जाग उठती हैं। सब प्रकार की दिमागी कमजोरी दूर होती है।

अभ्यास के आरम्भ में कुछ साधकों को खुश्की बढ़ जाने की शिकायत हो जाती है। इसके लिए घी दूध खूब खाना चाहिए और कानों में तेल डालना चाहिए। मैं पिछले सात साल से नित्य प्रातः काल शीर्षासन करती हूँ अपना खोया हुआ स्वास्थ्य इसी के द्वारा मैंने पुनः प्राप्त कर लिया है। इस पैंतालीस वर्ष की उम्र में भी मेरे सिर के सब बाल काले बने हुए हैं और पायोरिया की शिकायत से बिलकुल छुटकारा मिल गया है।


तन्त्र विज्ञान की दुर्गति

तन्त्र विज्ञान की दुर्गति

(ले. महन्त श्री गजानन जी आचार्य)

अखण्ड ज्योति के सम्पादक जी ने मुझसे तन्त्र विज्ञान सम्बन्धी एक लेख मांगा है। हर्ष की बात है कि एक पत्र तो ऐसा निकला जो इस महाविज्ञान की चर्चा में अपने कुछ पृष्ठ दिया करेगा। नई सभ्यता के चकाचौंध में हम अपने यहाँ के उत्तमोत्तम विज्ञानों को झूठा समझने लगे हैं। पराई पत्तल का भात मीठा लगने वाली बात चरितार्थ हो रही है। लोग योग शास्त्र को ढोंग मानते थे, पर जब पश्चिमी लोगों ने मैस्मरेजम की एक सीप ढूँढ़ ली तब लोगों ने उसे सत्य समझा। टोना, टोटका, मूर्खता के द्योतक समझे जाते थे, पर जब मनोविज्ञान के डाक्टरों ने टोने, टोटकों का महत्त्व बताया तब लोगों की आँखें खुली। तन्त्र विद्या के बारे में भी यही बात है। अमेरिका के प्रसिद्ध पत्र न्यूयार्क मेल में मिसेज स्टेट्सन के उन रोमांचकारी तान्त्रिक पुरश्चरणों के समाचार छपे, जिनके कारण कई लोगों के प्राणों पर आ बनी थी। तब लोगों को विश्वास हुआ कि तन्त्र विज्ञान वास्तव में प्रकृति में छिपी पड़ी असंख्य महाविद्याओं में से एक है और उसका बिजली जैसा असर लोगों पर होता है।

तान्त्रिक लोग स्वयं कठोर साधना करते हैं जिसके द्वारा वे ऐसी अपूर्व शक्ति अपने अन्दर जागृत कर लेते हैं जिसके द्वारा दूसरों का भला बुरा भी आसानी से हो सकता है। उनकी अनुष्ठान, पुरश्चरण, जप, मुद्रा आदि क्रियाओं के द्वारा एक प्रकार के सूक्ष्म कम्पन उत्पन्न होते हैं चूंकि यह निश्चित उद्देश्य के साथ किसी खास काम के लिये उत्पन्न किये जाते है, इसलिए उनका प्रवाह एक ही दिशा में होता है और जैसे आतिशी शीशे द्वारा एकत्र की हुई सूर्य की किरणें एक स्थान पर केन्द्रित होकर अग्नि समान बन जाती हैं वहाँ बात इन कम्पनों की होती है। मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तम्भन आदि सब कुछ तन्त्र विद्या द्वारा होता रहा है और हो सकता है। फिर भी अविश्वासी लोग अपनी हठ पर दृढ़ रह सकते हैं। पृथ्वी गोल और भ्रमणशील है। पर सांप के फन पर तवे की तरह रखी हुई है ये समझने वाले अपनी राय रखने में स्वतन्त्र हैं।

प्राचीन काल में गोरखनाथ, मछन्द्रनाथ, नागार्जुन आदि अनेक तान्त्रिक और सिद्ध हुये हैं। एक जमाना था कि इस विद्या का सर्वत्र बोलबाला था और लोग इसके द्वारा पूरा- पूरा लाभ उठाते थे। किन्तु समय ने पलटा खाया, जो चढ़ता है वह गिरता भी है। तन्त्र विद्या कुपात्रों के हाथ में चली गई और उसका उपयोग लालची, स्वार्थ एवं इन्द्रिय लोलुपता के लिये होने लगा। ईश्वर ने ऐसा विधान बना रखा है कि अन्यायी और पर पीड़ा कालान्तर में स्वयंमेव नष्ट हो जाते हैं। तदनुसार जब तान्त्रिकों ने रावण जैसा रवैया धारण कर लिया तो जनता में उसके विरुद्ध आतंक और भय छा गया। लोग उनके अत्याचारों से पीड़ित होकर त्राहि- त्राहि करने लगे। ईश्वर को यह मंजूर न था, उसने तान्त्रिकों को विनाश के मुख में धकेल दिया। तन्त्र विद्या के महाशास्त्र हम्मामों को गरम करने के काम आये।

तब भी जो टूटी फूटी विद्या बच रही थी वह गुरु परम्परा के अनुसार अपने उल्टे सीधे रूप में अपनी उपयोगिता के कारण प्रचार पाती रही। अब भी कोई गली, मुहल्ला, गाँव, शहर ऐसा नहीं है जहाँ काना, कुबड़ा तान्त्रिक न रहता हो। झाड़, फूँक, गण्डा, ताबीज उसी विद्या के लँगड़े रूप हैं। इनसे भी लाभ होता है। यदि लाभ न होता तो बिलकुल झूठे अन्ध विश्वास को इतने दिनों तक कोई जीवित नहीं रख सकता था। वह कब का मर गया होता।

आज तन्त्र विद्या बड़े विकृत रूप में इस प्रकार जनता के सामने उपस्थित होता है कि उसका रूप ढोंग की ठगी से मिलता जुलता हो जाता है। इसीलिये समझदार लोग उसे दुरदुराते है। कोई भी अच्छी चीज यदि अशिक्षित लोगों तक सीमित रहे, तो उसकी दुर्गति होना अवश्यम्भावी है। तन्त्र विद्या की दुर्गति का भी यही कारण है। यदि इस विषय के विद्वान इस विज्ञान पर प्रकाश डाले तो जन हित का एक बड़ा साधन लोगों को प्राप्त हो सकता है। यदि अखण्ड ज्योति सम्पादक ने मुझे अवसर दिया तो अपने क्षुद्र अनुभव के आधार पर पाठकों को प्रेषित करता रहूँगा।

ओम शान्ति।

*समाप्त*


अखण्ड ज्योति क्यों?

अखण्ड ज्योति क्यों?

आज हम लोग ऐसी कंटकाकीर्ण झाड़ियों में भटक पड़े हैं जहाँ तरह- तरह के दुखों से आक्लिन्त बन जाना पड़ा है। गरीबी और गुलामी रूपी डायनें पीछे पड़ गई हैं। अज्ञान का अन्धकार छाया हुआ है। चिन्ता और अशान्ति की दुधारी तलवारें हमारी गरदन पर चल रही हैं। फलस्वरूप आज के मनुष्य का शरीर एवं मन रुग्ण और जर्जरित हो गया है। भले ही किसी के शरीर में कुछ बल प्रतीत होता हो, कुछ फूला और मोटा दीखता हो पर उसमें स्फूर्ति, छरहरापन और निरोगता कहाँ है? भले ही किसी के पास घोड़ा, गाड़ी, मोटर, रुपया, महल, स्त्री, पुत्र, मित्र, सेवक आदि हों, पर सुख और संतोष कहाँ है? हमारी बुद्धि व्यभिचारिणी हो गई है। पैसे के बल पर अच्छे से अच्छे दिमाग को खरीद कर बुरे से बुरे काम में लगाया जा सकता है। स्वार्थ के लिए पुण्य और पाप में कोई भेद नहीं किया जाता। तृष्णा इतनी बढ़ गई है कि हम जीभ निकाल कर हाँफते हुए हाय प्यास, हाय प्यास चिल्ला रहे हैं। यह अतृप्त प्यास दावानल की तरह चारों ओर धधक रही है। मनुष्य इस तृष्णा नल में जला जा रहा है। चारों ओर जल दुर्भिक्ष पीड़ितों की तरह शुष्क- तालु मनुष्य मारे- मारे फिर रहे हैं। हाहाकार इतना बढ़ गया है कि भाई- भाई की देह में मुँह गड़ाकर उसकी धमनियों में से रक्त चूस रहा है। किसान, मजूर, स्त्रियाँ, अशिक्षित, असहाय, इस चर्वण की चर्खी में पड़े हुए करुण स्वर से चिल्ला रहे हैं। पर क्या यह प्यास तृप्त होती है? नहीं, वह दिन-दिन बढ़ती ही जाती है। महायुद्धों का राक्षस असंख्य निरपराध प्राणियों को क्यों खाये जाता है? बम और गैस की मार से चारों ओर क्रन्दन क्यों मचा हुआ है? सबल निर्बलों को क्यों पीट रहे हैं? मानव अपनी अतृप्त प्यास को बुझाने के लिए यह नरमेध रच रहा है। पर ज्यों- ज्यों आहुतियाँ पड़ती जाती हैं, यह तृषा अधिकाधिक वेग से उग्र रूप धारण करती जाती है। भगवान का पुण्य लीला उद्यान अब मरघट बन कर धू धू जल रहा है। नवीन सभ्यता ने हमारी प्यास बढ़ाई है यह कहाँ पहुँच कर शान्त होगी, कोई नहीं जानता।

आइये, विचार करें कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों मनुष्य की प्यास इतनी अधिक है कि उसे भेड़िया बनना पड़े। दाल, रोटी और कपड़ों का खर्च आदमी आसानी से पैदा कर सकता है। ईश्वर ने भूमि में उर्वरा शक्ति देकर दुधारू पशुओं से हमारा निकट सम्बन्ध बनाकर हमारी दैनिक और सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के सभी उपकरण जुटा कर जीवन निर्वाह की समस्या इतनी आसान कर दी है कि हम सरलता पूर्वक जीवित रह सकते है और मानवता की उपासना कर सकते हैं। भ्रातृ भाव, करुणा, प्रेम, उदारता, परोपकार, दया, न्याय प्रियता, सत्यनिष्ठा, सदाचार प्रभृति दिव्य गुण ही मानवता के प्रतीक है अन्यथा भेड़िया और मनुष्य में क्या अन्तर रह जाता है?

मानवता की उपासना हमारा कर्तव्य पथ राज मार्ग है। इसी पर चल कर हम सुख, शान्ति और सन्तोष की सांस ले सकते हैं। मानवता ही वह अमृत है, जिसे पीकर प्यास बुझती है। शैतान की उपासना से हमने तृष्णा का अभिशाप प्राप्त किया है। वह मानवता की पूजा से ही शान्त होगा। कंकरीली झाड़ियों से निकलकर आदमी जब तक अपने राजमार्ग पर न आवेगा, तब तक वह भेड़िया ही बना रहेगा और जीभ निकाल कर हाय प्यास, हाय प्यास चिल्लाता रहेगा।

योगशास्त्र, अध्यात्म विद्या और कुछ नहीं, केवल मनुष्यता के राजमार्ग की चहार दीवारी है। योग के आठ अंगों में से यम- नियम, सदाचार और पवित्रता के सूचक हैं। आसन, प्राणायाम, शारीरिक स्वास्थ्य का विधान है। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, मन और बुद्धि का व्यभिचार दूर करने के लिए हैं। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि शरीर और मन को स्वस्थ और पवित्र रखना ही अध्यात्म विद्या है। इस विद्या के अन्तर्गत जितनी क्रियाऐं हैं उनमें से अधिकांश चित्त को एकाग्र करने की विधियाँ हैं। एकाग्रता से ही वह दिव्य शक्ति उत्पन्न होती है, जिनसे मनुष्य देवता बना करता है।

इस राजपथ पर चलते- चलते जहाँ हम पहुँचते हैं वह अनन्त आनन्द शास्वत शान्ति समाधि है। योग के साधनों की विभिन्नता कोई वास्तविक विभिन्नता नहीं है। मनुष्य के रुचि वैचित्र्य को ध्यान में रखकर आचार्यों ने उनको कई रूपों में हमारे सामने रख दिया है कि उसमें से अपनी रुचि के अनुसार चीज चुन सकें।

आज तक जितने भी मानवता के महान आचार्य हुए हैं, उनने एक स्वर से चिल्ला- चिल्लाकर कहा है। असली आनन्द सुख, सन्तोष और शान्ति मनुष्यता की उपासना में है। इस समय जितनी गुत्थियाँ दुनियाँ के सामने हैं, उनकी जड़ में एक ही कारण है- मनुष्यता का अभाव। राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, साम्प्रदायिक, आर्थिक, शारीरिक, कौटुम्बिक, मानसिक जितनी भी उलझनें हैं, उनका पूरी तरह तब तक निराकरण नहीं हो सकता जब तक हमारे आचरण पवित्र न हो, जब तक हम सच्चे नागरिक न बनें। सच्चा योगी बनाने का एक ही मार्ग हो सकता है और वह है सदाचार। सदाचार और अध्यात्म विद्या को एक ही चीज के दो पहलू कहना चाहिए।

अखण्ड ज्योति इसी अध्यात्म विद्या की चर्चा करने को अवतीर्ण हुई है। इस पत्र में तन्त्र शास्त्र मैस्मरेजम, प्रेतवाद, मनोविज्ञान आदि की चर्चा में कुछ विलक्षणता और अटपटापन देखकर किसी को न तो भ्रम में पड़ना चाहिए और न आश्चर्य करना चाहिए। यह सब मनोविज्ञान और अध्यात्म विद्या द्वारा सामयिक रोगों की चिकित्सा विधि मात्र है। यह रोते हुए बच्चों को खिलौने देना हैं। इसमें अन्ध- विश्वास या भ्रम जाल को तनिक भी स्थान नहीं, यह विशुद्ध वैज्ञानिक मानसिक क्रियाऐं हैं जिनका विस्तृत विवेचन अगले अंकों में पढ़कर पाठक भली प्रकार समझ सकेंगे।

‘वादे वादे जायते तत्व बोधः’ वाद-विवाद में भी किसी दिन तत्व का बोध हो जायेगा। ज्ञान चर्चा के उद्यान में मनुष्य का विकाश ही होता है। सत्संग में अनेक बातें सामने आती हैं उनमें कुछ अनुपयोगी और भ्रमपूर्ण भी होती है, पर अन्त में सत्य पक्ष का निर्णय हो जाता है और भ्रान्ति मिट जाती है। तब अध्यात्म विद्या की चर्चा करते करते एक दिन हम सब क्या सत्य तत्व को प्राप्त नहीं कर सकेंगे?

जनता जनार्दन के सामने ‘अखण्ड ज्योति’ लेकर उपस्थित होते हुए मुझे अपनी अयोग्यता का संकोच अवश्य है। पर जिस सदुद्देश्य से इसका प्रकाशन हो रहा है वह लोक हितकारी होगा, ऐसा मुझे विश्वास है और इसी विश्वास के आधार पर एक आशा और उत्साह की लहर आज मुझमें दौड़ रही है।

अगला अंक

हमने ‘अखण्ड ज्योति’ को ठीक समय पर निकालने का निश्चित प्रबन्ध कर लिया है। वह बिना एक दिन के भी अन्तर के सदैव अपनी तारीख पर निकल जाया करेगी। किन्तु आगामी अंक में सम्भवतः कुछ देर हो जाय। कारण यह है कि पोस्ट ऑफिस वाले रजिस्टर नम्बर देने में बहुत देर लगा लेते हैं। जिन पत्रों के आरम्भ से ही सैकड़ों ग्राहक हों उनके लिये भी ग्राहकों के बारे में खोज बीन होती हैं और इस कार्य में कभी कभी तो वे महीनों लगा देते हैं। ‘अखण्ड ज्योति’ के प्रथम मास से ही इतने ग्राहक हैं, जो डाकखाने की निश्चित संख्या से कई गुने होते हैं। फिर भी रजिस्टर नम्बर मिलने में देर न लगने की आशा नहीं है। सम्भव है वे इस कार्य में एक महीना से भी अधिक समय लगा लें।

हम अगला अंक भी निश्चित तिथि पर ही छपाकर तैयार रख लेंगे और रजिस्टर नम्बर आते ही पाठकों की सेवा में भेजेंगे। बिना नम्बर आये पत्र भेजने में तिगुना पोस्टेज लगेगा, इसलिए अगले अंक के लिये पूरी फरवरी प्रतीक्षा करनी चाहिए। यदि फिर भी नम्बर न आया तो २८ फरवरी को तिगुना पोस्टेज लगाकर भी ‘ज्योति’ अवश्य भेज देंगे।


कर्त्तव्य की पुकार

कर्त्तव्य की पुकार

(ले. महात्मा गाँधी)

इस प्रकार के विचार मनुष्य को हिला डालते हैं और आश्चर्य में डाल देते हैं कि ‘‘मैं जवाबदार हूँ ’’ ‘‘यह मेरा कर्त्तव्य है’’ हमारे कामों में इस प्रकार की गुप्त आवाज सदा आती रहती है कि ‘‘हे मानव, यह कार्य तेरा है, तुझे स्वयं जय अथवा पराजय प्राप्त करना है, तेरे जैसा तू ही है, क्योंकि प्रकृति ने एक सरीखी दो वस्तुऐं कही नहीं बनाई। तेरा जो कर्तव्य है उसे तू ही नहीं करेगा तो संसार के हिसाब के आँकड़े में यह भूल सदा ही होती रहेगी।’’

आप सवाल करेंगे कि कौन सा कार्य मेरे करने के लिये है? कोई यह कह कर निश्चिन्त बैठा रहेगा कि मैं परमात्मा की ज्योति हूँ। दूसरा कहेगा, अपने पड़ोसी के साथ सहानुभूति रखनी चाहिए और उसके साथ भाई जैसा व्यवहार करना चाहिए। तीसरा कहेगा माता- पिता की सेवा करनी चाहिए, स्त्री, बाल- बच्चों की सँभाल रखनी चाहिए और भाई- बहिन तथा मित्रों के साथ बराबर का व्यवहार करना चाहिए, परन्तु इन सब गुणों में मेरे संपूर्ण गुणों का श्रेष्ठ भाग यह है कि मुझे स्वयं अपने लिए इसी प्रकार का आचरण करना चाहिए। जब तक मैं स्वयं अपने को न पहचान लूं, तब तक दूसरा कैसे पहचाना जा सकता है? और जिसे मैं पहचानता ही नहीं उसके लिए सम्मान कैसे व्यक्त किया जा सकता है? कुछ लोग यह कहते है कि मनुष्य को दूसरों के साथ व्यवहार करते समय ठीक तरह बर्ताव करना चाहिए। परन्तु जब तक हमें किसी के साथ काम नहीं पड़ता, तब तक हम अपनी इच्छा के अनुसार जैसा हमें अच्छा लगे वैसा बर्ताव कर सकते हैं। जो लोग ऐसा कहते हैं, उनका यह कहना बिना समझे बुझे है। क्योंकि दुनियाँ में रह कर कोई भी मनुष्य दूसरे को हानि पहुँचाये बिना स्वच्छन्दता के साथ बर्ताव नहीं कर सकता।

अब हमें देखना चाहिए कि हमारा अपने आपके प्रति क्या कर्तव्य है? बात यह है कि हमारे एकान्त के बर्ताव की हमारे सिवा किसी दूसरे को खबर नहीं होती। उस बर्ताव का असर हम पर होता है, और इसलिए हम उसके जवाबदार हैं। इतना ही नहीं किन्तु उससे दूसरों के ऊपर भी असर होता है, उसके लिए भी हमीं जवाबदार हैं। अतएव प्रत्येक मनुष्य को अपने जोश के ऊपर दबाव रखना चाहिए और सदा अपने शरीर और मन को स्वच्छ रखना चाहिए। एक महापुरुष कहता है कि ‘प्रत्येक मनुष्य की निजी चाल ढाल मुझे बतलाई जाय, तो मैं देखकर तुरंत ही कह दूँगा कि वह मनुष्य कैसा है, और कैसा होगा।’ ऐसी ही और भी कई बातें हैं जिसके कारण हमें अपनी इच्छाओं पर अंकुश रखने की आवश्यकता है। हमें शराब न पीनी चाहिए, जुआ न खेलना चाहिए, व्यभिचार न करना चाहिए आदि। अन्यथा इन बातों का परिणाम यह होगा कि हम शक्ति हीन होकर अपनी इज्जत व आबरू खो बैठेंगे। जो मनुष्य विषयों से दूर रहकर अपने शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा की रखवाली, देख- रेख नहीं करता वह बाहर के दूसरे कामों में शोभा नहीं पा सकता। सफलता लाभ नहीं कर सकता।

इस प्रकार विचार करता हुआ मनुष्य अपनी अन्तरंग की वृत्तियों को साफ, निर्मल, पवित्र रखकर विशेष विचार करता है कि इन वृत्तियों का उपयोग किस रूप में करना चाहिए? जीवन का कुछ ध्येय अवश्य होना चाहिए। यदि जीवन के कर्तव्य की शोध करके उस ओर हम प्रयत्न न करें तो बिना पतवार के जहाज की तरह हम अथाह समुद्र में गोते ही खाते रहेंगे। सबसे श्रेष्ठ कर्तव्य यह है कि हम मनुष्य जाति की सेवा करें और उसकी स्थिति को सुधारने में भाग लें। इसमें ईश्वर की सच्ची भक्ति भी आ जाती है। जो मनुष्य ईश्वर के कामों को करता है वही सच्चा ईश्वरीय मनुष्य है। वैसे ईश्वर का नाम लेने वाले ढोंगी, धूर्त तो हजारों फिरा करते हैं। तोता ईश्वर का नाम लेना सीख लेता है, परन्तु इससे उसे कोई ईश्वरीय नहीं कहता। मनुष्य जाति को अच्छी स्थिति में लाने का नियम सब लोग पाल सकते हैं। व्यापारी लोग इस पद्धति पर व्यापार कर सकते हैं। वकील लोग ऐसी पद्धति रखकर अपनी वकालतें कर सकते हैं। इस प्रकार के नियम कायम करने वाला मनुष्य कभी नीति धर्म से च्युत नहीं होता, क्योंकि उससे च्युत होकर चलने पर मानव जाति को उन्नति के सोपान पर चढ़ने की धारणा पूरी नहीं पड़ सकती।

इन बातों का सार यह है कि जो मनुष्य स्वयं शुद्ध है, किसी से द्वेष नहीं करता, किसी के साथ खोटा लाभ नहीं उठाता और सदा मन को पवित्र रखकर आचरण करता है वही मनुष्य धर्मात्मा है, वही धनवान है। ऐसे ही लोगों से मनुष्य जाति की सेवा हो सकती है। जिस दिया सलाई में आग न हो, वह दूसरी लकड़ियों को कैसे सुलगा सकती है? जो मनुष्य स्वयं नीति का पालन नहीं करता, वह दूसरों को क्या सिखा सकता है? जो स्वयं डूब रहा है, वह दूसरे को कैसे निकाल सकता है? नीति का आचरण करने वाला मनुष्य यह सवाल कभी नहीं उठाता कि दुनियाँ की सेवा किस तरह करनी चाहिए? क्योंकि यह सवाल उसे पैदा ही नहीं होता। मेथ्यु आरनल्ड कहते है ‘‘एक समय था जब मैं अपने मित्र के लिए आरोग्य, विजय और कीर्ति की इच्छा करता था, परन्तु अब वैसी इच्छा नहीं करता। कारण यह है कि इन बातों के होने या न होने पर मेरे मित्र के सुख दुख का आधार नहीं है। इसलिए अब मैं सदा यह इच्छा करता रहता हूँ कि उसकी नीति हमेशा अचल रहे, वह अपने नीति पथ से कभी विचलित न हो’’ एमरसन कहते है ‘‘अच्छे मनुष्यों का दुख भी उनके लिए सुख है और बुरे मनुष्यों का धन और उनकी कीर्ति भी उनके लिए तथा संसार के लिए दुःख रूप है।’’


अमर- ज्योति (कविता)

अमर- ज्योति

रचयिता- श्री पुरुषोत्तमदास विजय

जल रही विश्व में अमर ज्योति,

छा रहा गगन तल में प्रकाश।मेरे मानव। तू उज्ज्वल बन,

मत हो निराश, मत हो उदास।।

खिल रही कली, हँस रहे फूल,जग में छाया भ्रमरित बसन्त।

विहँसो, विकसों, मानव के तरू,

उमड़ा नव जीवन दिग्दिगन्त।

प्राची के उज्ज्वल आँगन से,

छुट रहे ज्ञान के सतत् तीर।आलस विमूढ़ता तज मानव,

पहिचान कर्म- पथ की लकीर।।

मैं चला कुचल कर काँटों को,

कब रोक सका है मुझे काल।

मैं विश्व भाल पर छोड़ चला,

अपने ज्योतित पद चिन्ह लाल।।

इस जीवन में सुख ही सुख है,

मानव। तुम भूलों रोग शोक।

जय जय उस अमर ज्योति की जय,

हम लावे भू पर अमर लोक।।

अखण्ड ज्योति

सुधा बीज बोने से पहले, काल कूट पीना होगा।

पहिन मौत का मुकुट, विश्व हित मानव को जीना होगा।।


देवताओं और राक्षसों में अन्तर

देवताओं और राक्षसों में अन्तर

(ले. श्री गोविन्दराम जी महता एम.ए.)

किसी आदमी ने सर वाल्टर स्काट से कहा ‘दुनियाँ में सब से अधिक आदर विद्या का होता है।’ इस पर सर स्काट ने उत्तर दिया ‘भगवान ऐसा न करें, अन्यथा दुनियाँ की बड़ी दुर्गति होगी। मैंने अनेक पुस्तकें पढ़ी हैं और विद्वानों से मिला हूँ और यह बात निश्चय पूर्वक कह सकता हूँ कि विद्वानों की अपेक्षा गरीबों में मैंने सच्चाई, ईमानदारी, उदारता और न्याय निष्ठा अधिक देखी है।’

विद्या एक प्रकार का मुलम्मा है। उसे जिस चीज पर चढ़ा दिया जाय वही चमकने लगती है। सदाचार वह सुवर्ण है जो कभी काला नहीं पड़ता। कीचड़ में पड़ा हुआ सोना, सोना ही है। लोहे पर सुनहरी मुलम्मा कर दिया जाय तो चमकेगा तो सही, पर आँच लगने पर काला हो जायेगा। सोने पर मुलम्मा चढ़वा लिया जाय तो वह और भी अधिक चमकेगा।

विद्या शक्ति है। उसका उचित या अनुचित चाहे जैसा प्रयोग कर सकते हैं। चाकू फल काटने के लिए है, पर यदि उससे किसी की गरदन काटी जाय तो मामूली लकड़ी की अपेक्षा वह अच्छी तरह काम करेगा। अपढ़ और गँवार चोर मौका मिलने पर अपना काम बना सकता है। पर यदि एक एम. ए. पास ग्रेजुएट चोरी की तरकीबें निकालना चाहे तो वह आश्चर्यजनक तरीके निकाल सकता है। कुछ दिन हुए कलकत्ता में एक मुनीम पकड़ा गया था। वह हिसाब के कागजों में पाँच साल से विचित्र चालाकी के साथ इन्द्रराज करता रहा और सबकी आँखों में धूल झोंक कर लाखों रुपया गबन कर गया। औरत बेचने के व्यापार में दुनियाँ के हजारों सुशिक्षित लोगों का हाथ है और वे मालामाल बन रहे हैं। ठगी, जुआ, शराब, व्यभिचार, लूट, चोरी, जालसाजी, खून आदि एक भी कुकर्म ऐसा नहीं है जिसमें विद्वानों का प्रमुख हाथ न हो। केवल विद्या और शक्ति के बल से मनुष्य मनुष्य नहीं बन सकता। सच्चाई, ईमानदारी और उदारता मनुष्य के गुण हैं। बिना इनके मनुष्य और पशु में कोई अन्तर नहीं। विद्या और बहादुरी तो राक्षसों और देवताओं में प्रायः समान ही होती है। अन्तर एक सदाचार और न्याय परायणता का है। देवता उन शक्तियों को दूसरों की भलाई में लगाते हैं, राक्षस इनका उपयोग स्वार्थ और पर- पीड़न में करते हैं। रावण की विद्या, बुद्धि, शक्ति, चातुरी, कार्य- परायणता, मनोबल कम नहीं थे। वह अपने गुणों के कारण महा प्रतापी बना, पर उसने शक्ति का उपयोग बुरी तरह किया, स्वार्थ और दुर्गुणों को अपना साथी बनाया। अब राम को लीजिए, नीति निष्ठा और धर्म बुद्धि को छोड़कर अन्य बातों में शायद वे रावण से बढ़कर नहीं थे, पर उनकी विजय जिस कारण से हुई वह सत्याचार था। राम का पक्ष न्याय का देखकर वानरों की सेना निस्वार्थ भाव से उनके साथ हो गई और रावण का बुद्धिमान भाई भी विमुख हो गया। नेपोलियन और सिकन्दर ने लाखों आदमियों का खून बहाया। औरंगजेब ने राज्य के लिए अपने भाइयों का कत्ल करवाया, पिता को कैद में डाला, हिरण्यकश्यप, कंस, वेणु, जरासन्ध अपनी ताकत आजमाई कर गये, उन्होंने दुनियाँ को थर्रा दिया, लोगों पर भय का आतंक जमाया। परन्तु तब और अब वे लोगों के हृदयों में कितने घुस पाये? उनका नाम एक आतंक के साथ हम लेते हैं और यह आकाश उनकी मूर्खता पर एक हलकी हँसी हँस देता है। इसके विपरीत गौतम बुद्ध, भगवान महावीर, कृष्ण, भर्तृहरि, व्यास, वाल्मीकि, नानक, ईसा, मुहम्मद को देखिये, विद्या के साथ सदाचार भी उनके पास था। उन्होंने अपनी शक्तियों का व्यय परोपकार में किया, ज्ञान का प्रकाश फैलाने में अपने को खपाया। आज भी उनके प्रकाश के नीचे हम अपना मार्ग ढूँढ़ लेते हैं। दुनियाँ इनके ऋण से दबी हुई खड़ी है।

सर स्काट ने ठीक ही कहा था कि ‘दुनियाँ यदि विद्या की पूजा करने लगी तो उसकी बड़ी दुर्भिक्ष होगी।’ विद्या से लोग डरते तो हैं, पर उसकी पूजा नहीं होती। विद्वानों को देखकर हमें आश्चर्य और कौतूहल होता है उनके कार्य से प्रसन्नता प्राप्त होती है। पर सदाचारी को देखकर जो श्रद्धा और भक्ति उत्पन्न होती है, वह क्या विद्वान को देखकर हो सकती है? नरसी मेहता, सुदामा, शबरी, विदुर, केवट, सूरदास आदि के चरित्रों के सामने बड़े- बड़े तख्त नशीन नाचीज हैं। सूरदास और तुलसी के सामने टकापन्थी लाखों कवि तुच्छ हैं। यवन राजा गुरु गोविन्दसिंह के नन्हे- नन्हे पुत्रों को अपने विद्याबल से नहीं झुका सका, किन्तु आततायी अशोक भगवान बुद्ध की शरण में दौड़ पड़ा। भर्तृहरि और मीराबाई ने राज सिंहासनों को ठुकरा दिया।

दुनियाँ समझदार है, उसे अपनी दुर्गति नहीं करानी है। विद्या शक्ति के ऊपर उसने विश्वास नहीं किया है। उसने चरित्रवानों के सामने ही श्रद्धा से अपना मस्तक झुकाया है और जब तक वह रहेगी, झुकाती रहेगी। अरबों-खरबों प्रतिभावान, अद्भुत बलशाली, तान्त्रिक, तार्किक, सिद्ध, साहसी और पराक्रमी इस दुनियाँ में हो चुके हैं। कहते है कि अब तक बहत्तर सौ काने (एक आँख के) राजा हो चुके हैं दोनों आँख वालों की तो शुमार की क्या हैं। पर दुनियाँ विद्वानों से अधिक विद्वान हैं। उसने विस्मृति के एक कोने में उन सबको ले जाकर पटक दिया है। उनके किसी को नाम भी याद नहीं, कोई टके सेर नहीं पूछता। सदाचारी और धर्म नैष्ठिकों को सदा शिर आँखों पर रखा जाता रहा हैं। प्रहलाद, हरिश्चन्द्र, युधिष्ठिर, शिव, दधीचि आदि को दुनियाँ भूल नहीं सकती।

सदाचार ही वह तत्व है, जिसे पाकर मनुष्य देवता बन जाता है और जिसे खोकर वह राक्षस कहलाता है। लोगों का खयाल है कि सदाचारी निर्धन रहते हैं और दुःख उठाते हैं यह दूर से देखने की बात है, पास जाकर देखने से कुछ और बात नजर आती है। जंगलों में मंगल करने वाले साधु क्या राजाओं से कम सुखी होते हैं? तृष्णा के मारे जब लोग हाय-हाय चिल्लाते हैं, तब सदाचारी संतोष की साँस लेता है और ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ अपनी रूखी रोटी को बड़े प्रेम से खाता है। तत्त्वज्ञानी एपिक्टेट्स ने एक धनी वकील की बात का उत्तर देते हुए कहा कि सच्ची बात तो यह है कि तुम मुझसे गरीब हो। तुम चिन्ता में डूबे हुए हो, मैं निर्द्वन्द्व हूँ। तुम्हारी सम्पत्ति से मुझे अपनी अधिक मालूम पड़ती है। क्योंकि तुम असंतुष्ट हो और मैं संतुष्ट रहता हूँ। भर्तृहरि ने कहा कि बड़ी तृष्णा वाला ही दरिद्र है।

हमारा तात्पर्य यह नहीं कि सदाचार दरिद्र बनाने वाला है। सदाचार तो वह पारस पत्थर है, जिसे जो छूता है वही सोना हो जाता है। अच्छे आचरण वाले, मुस्तैदी से काम करने वाले और अपनी जिम्मेदारी को समझने वाले ही आदर और उन्नति की ओर बढ़ते हैं। बुरे आचरण वाले अपनी कलई कुछ दिन भले ही चमका लें, पर एक दिन उनका नाश निश्चित है। जितने बड़े काम हुए हैं, उन सब की नींव में सदाचार, सद्व्यवहार और उदारता है। संभव है जुल्म के बल पर किसी ने महल खड़े कर लिये हों, पर वह कितने दिन ठहरते हैं? प्रकृति ने उन्हें एक दिन समूल नाश करने के लिए बढ़ाया होता है। एक महापुरुष का कथन है कि समाज का नेतृत्व सदैव सदाचारियों के हाथ में रहेगा। दुराचारियों के हाथ में कोई भी सत्ता ठहर नहीं सकती। सदाचारी गुलाब का फूल, चन्दन और स्वर्ण है। वह चाहे जैसी स्थिति में हो, लोगों की नजर में आदर का पात्र रहेगा। यह स्पष्ट है कि बल, विद्या देवता और राक्षस समान हैं अन्तर केवल सदाचार का है। अगर सच्चा धन दुनियाँ में कुछ है तो सदाचार, सद्विचार ही है।


परिचय (कविता)

परिचय (कविता)

परिचय (कविता) (ले. श्री मैथली शरण गुप्त)

बार बार तू आया,

पर मैंने पहचान न पाया।

हिम कम्पित कृश पाणि पसारे,

आया जब तू मेरे द्वारे,

लौट गया जो धक्का खाया। बार बार तू.।

दीन दृगों से निकल पड़ा तू,

बड़ा सरस था, बिकल बड़ा तू,

पर मैं कौतुक से मुसकाया। बार बार तू.

गलित अंग, दुर्गन्ध सना तू,

आया व्याकुल व्यथित बना तू,

हट कर मैंने तुझे हटाया। बार बार तू.

आर्त गिरा कानों में छाई,

वह थी तेरी आहट लाई,

पर मैं उस पर ध्यान न लाया। बार बार तू.

पीड़ित के निःश्वास अरे रे,

मैं क्या जानूं कर थे तेरे,

मुझ पर था कितना मद छाया। बार बार तू.

अब जो पहचानूं मैं तुमको,

तो तू भूल गया है मुझको,

मैं हूँ जिसने तुझे भुलाया,

बार बार तू आया।

(माधुरी से)


Quotation

मन की वह शान्ति जो विघ्र बाधाओं के समय भंग नहीं होती और दूसरों द्वारा अपने ऊपर दोषारोपण करते समय जिसमें कोई विकार नहीं आता, वह उच्च आत्मिक बल से प्राप्त होती है।


मानसिक शक्तियाँ बढ़ाने के १५ नियम

मानसिक शक्तियाँ बढ़ाने के १५ नियम

ले. श्री गिरराज किशोर सिंह जी विशारद

मैं क्षुद्र हूँ, मेरी शक्ति नगण्य है, मुझे दुःख घेरे हुए हैं, मेरे भाग्य में दुःख ही बदा है। ईश्वर ने मुझे अभागा पैदा किया है, जो होना होगा हो जायेगा, मुझसे कुछ नहीं होगा, असफलता हुई तो कहीं का नहीं रहूँगा आदि विचार करते- करते मनुष्य की इच्छा शक्ति अर्द्ध मूर्च्छित हो जाती है और संशय उस पर ऐसा काबू कर लेते हैं कि साधारण काम करते हुए भी मन संकल्प विकल्पों से भरा रहता है और असफलता की आशंका मूर्तिवत सामने खड़ी रहती है। निरुद्योगी, परमुखाक्षेपी और आसान जिन्दगी बसर करने वाले लोगों की इच्छा शक्ति एक प्रकार से निकम्मी हो जाती है। अज्ञान वश जो व्यक्ति कुछ दिनों तक ऐसे विचारों के पंजे में फँस जाता है फिर उनसे छूटना बहुत मुश्किल मालूम देता है। वास्तविकता का पता लगने पर वह सोचता है। व्यर्थ ही इन बुरे विचारों में मैंने अपना समय गँवाया और अपने को अवनति के गड्ढे में धकेला। वह इन बुरे विचारों से छूटना चाहता है, पर ऐसी आदत पड़ गई है कि गाड़ी आगे बढ़ती नहीं। जरा हिम्मत बाँधी, उत्साह आया किन्तु थोड़ी ही देर बाद विचार न जाने कहाँ चले गये। और पुनः निराशा ने आ दबोचा। ऐसे व्यक्ति किसी काम को पूरा नहीं कर पाते। या तो वे किसी काम को करते ही नहीं, करते हैं तो अधूरा छोड़ देते हैं। अनेक अधूरे और असफल कार्य उनके जीवन में यों ही पड़े रहते हैं।

ऐसे लोगों की इच्छा शक्ति बहुत निर्बल होती है। लगन और दृढ़ता के अभाव में किसी कार्य पर चित्त नहीं लगता। मस्तिष्क की कमजोरी के कारण निराशा और उदासीनता छा जाती है। विचार शक्ति, तुलनात्मक शक्ति, कल्पना शक्ति, इच्छाशक्ति, प्रमृति शक्तियों की कमजोरी या निश्चित परिणाम असफलता है। एक ही समय में एक ही प्रकार का व्यापार करने वाले दो व्यक्तियों में से एक को लाभ होता है एक को हानि। एक के पास नित्य सैकड़ों ग्राहक आते हैं किन्तु उसका पड़ौसी दुकानदार मक्खियाँ मारता रहता है। ऐसा क्यों होता है? दोनों के पास जाने से आपको पता चलेगा कि एक का चेहरा सदा हँसता हुँआ रहता है, आत्मशक्ति का दृढ़ विश्वास उसके चेहरे पर झलकता रहता है। दूसरा निराशा और उदासी से भरे हुए मुँह को लटकाये हुए रहता है। यह मानसिक शक्तियों के सबल और निर्बल होने का परिणाम है।

सब लोग इच्छित रहते हैं कि हमारी मानसिक शक्तियाँ बलवान हों किन्तु वे मानसिक शक्तियों को बढ़ाने के नियमों से परिचित न होने के कारण मन के लड्डू खाया करते हैं। सफलता लाभ नहीं कर पाते। यदि वे उन साधारण नियमों को जान पावे और विश्वास पूर्वक लाभ उठावें तो वे भी अपनी इच्छाशक्ति को दृढ़ बना सकते हैं और उसके आधार पर सफलता लाभ कर सकते हैं। नीचे कुछ ऐसे ही नियम बताये जाते हैं।

1. सूर्योदय से डेढ़ दो घंटे पूर्व उठो और शौचादि से निवृत्त होकर शुद्ध वायु में टहलने जाओ।

2. पेट में कब्ज न होने दो। हलका और सादा भोजन खूब चबा- चबा कर खाओ।

3. प्रातः शौच जाने से आधा घंटा पूर्व आधा सेर पानी पीओ

4. नित्य गहरी साँस लेने की क्रिया या प्राणायाम करों

5. मन को एकाग्र रखो। व्यर्थ बातों का सोच विचार मत करो। एक समय में एक ही विषय के ऊपर विचार करो। उसी में पूरी शक्ति लगाओ। यदि मन उचट कर कहीं दूसरी जगह जाना चाहे तो उसे रोक कर उसी काम में लगाओ

6. किसी काम को करने से पूर्व खूब सोच विचार लो। जब किसी काम को आरम्भ कर दो तो फिर उसमें किसी प्रकार का भय न करो। उस काम को पूरा करने का दृढ़ निश्चय कर लो और उसी के सम्बन्ध में सोच विचार करो।

7. अपनी शक्ति पर विश्वास रखो, अपने को नाचीज मत समझो। बुरे कामों से घृणा करो। सच्चाई, ईमानदारी और दूसरे के साथ सहानुभूति की भावना कभी मत छोड़ो।

8. नित्य एकान्त में बैठकर ऐसी कल्पना करो कि मेरा मनोबल दिन प्रतिदिन दृढ़ होता जा रहा है।

9. निराश कभी मत होओ। ऐसा विश्वास रखो कि ईश्वर मेरे लिए हितकारक परिस्थिति अवश्य पैदा करेगा।

10. किसी के लिए बुरा मत सोचो। ईर्ष्या, द्वेष को पास मत फटकने दो।

11. हर समय उद्योग में लगे रहो। समय बेकार मत जाने दो।

12. व्यर्थ काम मत करो। कुछ लोगों को चारपाई पर बैठकर पैर हिलाने की, जमीन खोदने की या शरीर को व्यर्थ हिलाने चलाने की आदत होती है यह ठीक नहीं। सदैव शान्त रहो। एक ही काम में शरीर की शक्ति लगाओ।

13. नित्य ऐसी कल्पना करते रहो कि मेरे मस्तिष्क के परिमाण सूक्ष्मतर होते जा रहे हैं और मानसिक शक्तियाँ बढ़ रही है।

14. विचारवान सज्जनों के साथ रहो और सुविचार युक्त पुस्तकें पढ़ो। अपने दुर्गुणों को तलाश करो और उनका परित्याग करो।

15. सदा मुँह पर मुस्कराहट बनाये रखो, दिन में एक बार खूब जी खोलकर हँसो।

देखने में यह नियम साधारण प्रतीत होते हैं। पर इनकी महत्ता बहुत अधिक है। चित्त जगह- जगह भटकने की अपेक्षा जब एक जगह स्थिर होता है, तो उसकी शक्ति सैकड़ों गुनी बढ़ जाती है और उसके बल से सारी मानसिक शक्तियाँ जग पड़ती हैं। आतिशी शीशे को साधारणतः धूप में रख दो तो कोई खास असर न होगा, किन्तु उसके द्वारा यदि सूर्य की किरणों को किसी एक बिन्दु पर एकत्रित करो तो आग पैदा हो जायेगी। बारूद को खुली जगह में रखकर आग लगा दो तो भक से जल जायेगी। कोई खास कार्य उसके द्वारा न होगा, किन्तु उसी को बन्दूक में भरकर एक ही दिशा में उसका प्रवाह जारी कर दिया जाय तो गोली को बहुत दूर तक फेंकने की शक्ति उसमें हो जाती है। मन जब तक संयमित नहीं है तब तक वह इधर- उधर उछलता रहता। ताँगे का घोड़ा जब इधर- उधर उछल कूदता है, तब तक रास्ता तय करने में बड़ी कठिनाई पड़ती है किन्तु जब वह चुपचाप ठीक प्रकार सरपट दौड़ने लगता है तो जरा सी देर में निश्चित स्थान पर पहुँचा देता है। मन की स्थिरता, प्रसन्नता, दृढ़ता और ईमानदारी यह सद्गुणों की खान, विकास के साधन और सफलता की सीढ़ियाँ हैं। इन चारों के आते ही सब प्रकार की मानसिक शक्तियाँ जाग्रत हो जाती हैं। गूँगे, वाचाल और पंगे पहाड़ पर चढ़ने वाले हो जाते हैं। पर यह भी ध्यान रखना चाहिए अच्छे विचार अच्छे शरीर में ही रहते हैं, इसलिए शरीर को स्वस्थ रखना भी आवश्यक है। इन्हीं पाँच नियमों के आधार पर उक्त पन्द्रह नियम बने हैं। पाठक चाहे जब आजमा कर देख लें लाभ उन्हें अवश्य होगा।


एक सरल प्राणायाम

एक सरल प्राणायाम

ले. डॉ. गोविन्द प्रसाद जी कौशिक एच. एम. डी.

योग के आठ अंगों में प्राणायाम का प्रमुख स्थान है। योगाचार्य जानते थे कि बिना शरीर को स्वस्थ रखे कोई भी साधना ठीक प्रकार नहीं हो सकती। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए स्वच्छ वायु, स्वच्छ भोजन और स्वच्छ जल का विधान है। वायु का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि बिना भोजन और जल के कुछ समय तक जीवन टिक सकता है किन्तु वायु के अभाव में क्षण भर भी जीवित रहना कठिन है। अशुद्ध अन्न जल से जितनी हानि होती है अशुद्ध वायु से उससे कहीं अधिक हानि होती है। रोगी आँतों वाला जितने दिन जी सकता है उतने दिन रोगी फेफड़े वाला व्यक्ति नहीं जी सकता। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए फेफड़े को स्वस्थ रखना आवश्यक समझा गया है और उसके लिए प्राणायाम नामक व्यायाम क्रियाओं का आविष्कार किया गया है।

अनेक प्रकार के प्राणायामों पर समयानुसार अगले अंकों में प्रकाश डालने का प्रयत्न करूँगा। इस अंक में तो प्राणायाम की अत्यंत ही सुगम क्रियाओं का उल्लेख करना है जिन्हें बहुधन्धी और कामकाजी आदमी भी बिना किसी कठिनाई के आसानी के साथ हर दशा में कर सके।

हमारे फेफड़े छाती के दोनों ओर मधु मक्खियों के छत्ते के समान फैले हुए हैं। यह अनेक कोष्ठ प्रकोष्ठों में विभाजित हैं और वायु को ग्रहण करना व छोड़ना इनका प्रमुख कार्य है। जिस प्रकार धोंकनी की खाल के चलाने से उसके छेद में हो कर हवा निकलती है, उसी प्रकार फेफड़े की क्रिया द्वारा नाक से साँस आती जाती है। रक्त की शुद्धि वायु द्वारा होती है, इसलिए फेफड़ों की अशुद्धता रक्त की अशुद्धता का कारण बन जाती है।

साधारण तौर से साँस लेते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि वायु शुद्ध और स्वच्छ हो। सील से भरी हुई, सड़ी हुई, बदबूदार, धूलि मिश्रित, धुआँ भरी हुई, गन्दी वायु में साँस लेना बीमारी को निमंत्रण देना है। इसलिए हमारे रहने के घर और काम करने के स्थान ऐसे होने चाहिए जहाँ शुद्ध वायु मिल सके। पौधों की हरियाली के पास रहने का यही तात्पर्य है कि उनके द्वारा छोड़ी हुई प्राणप्रद वायु को ग्रहण करें। यह बात निर्विवाद हो चुकी है कि पौधे गंदी हवा को खींचते और शुद्ध वायु को छोड़ते हैं।

धूम्रपान फेफड़ों के लिए विष का काम करता है। सिगरेट, बीड़ी, तम्बाकू, सुलफा, गाँजा, अफीम आदि का धुआँ फेफड़ों में जाकर विष उत्पन्न करता है, जिससे वे कमजोर होकर निकम्मे हो जाते हैं और रोगों के प्रवेश करने का मार्ग आसान हो जाता है।

गहरी साँस लेना फेफड़ों का अच्छा व्यायाम है। दिन भर कठोर काम करने वाले जिनकी साँस कुछ तेज चलती है, अपने फेफड़ों को स्वस्थ और सबल बनाये रहते हैं। किन्तु जिनका कार्यक्रम कुर्सी, मेज या गद्दी तकियों पर काम करने का है उनकी साँस उथली चलती है। शरीर को कष्ट न देने वाले ऐसे लोग जिन्हें आराम से पड़े रहना पसंद है, उनकी साँस गहरी कैसे हो सकती है? हलकी साँस लेने से फेफड़े का थोड़ा सा भाग ही काम में आता है शेष भाग निकम्मा और बेकार पड़ा रहता है। उस निकम्मे भाग में पानी बढ़ जाना, सूजन हो जाना, गाठें पड़ जाना, फैल जाना, जख्म हो जाना, अकड़ जाना आदि कई प्रकार के रोग हो जाते हैं। क्षय और दमा के कीटाणु इन बेकार जगहों में ही घुस बैठते है और धीरे- धीरे पनप कर अपना कब्जा जमा देते हैं। अधूरे फेफड़ों में होकर छनी हुई हवा पूरी तरह शुद्ध नहीं हो पाती और यह सब जानते हैं कि अशुद्ध वायु के संसर्ग से रक्त भी अशुद्ध हो जाता है। गहरी सांस लेना इन सब रोगों की जड़ को न जमने देना और फेफड़ों को बलवान बनाना है।

गहरी सांस लेने का अभ्यास डालना बहुत हितकर है। प्रातः काल स्वच्छ और हरियाली युक्त स्थानों में वायु सेवन के लिए जाना फेफड़ों का अच्छा व्यायाम है। सूर्योदय से पूर्व टहलने के लिए चल पड़ना चाहिए और कम से कम दो मील जाकर लौटना चाहिए। कमर झुकाकर मुर्दे की तरह पांव रखते हुए किसी प्रकार इस बेगार को भुगते देने से कुछ लाभ नहीं होगा। कमर को सीधी करके, छाती को सीधी तनी हुई रखकर घंटे में कम से कम चार, पाँच मील की चाल से चलना चाहिए। दोनों हाथों को चलाने के साथ आगे पीछे खूब झुलाते जाना चाहिए जिससे छाती, फेफड़े और स्नायु जाल की कसरत होती चले। चलने की गति एक सी रखना उचित है। दो फर्लांग तेज चले, दो फर्लांग बिलकुल धीमें पड़् गये यह ठीक नहीं। समय या स्थानाभाव के कारण अधिक दूर टहलना न हो सके, तो कुछ अधिक तेज चाल से सरपट चलना चाहिए। इसे दौड़ना कह सकते हैं पर बेतहाशा इस प्रकार दौड़ना जिससे दम फूल जाय लाभप्रद न होगा। आठ मिनट प्रति मील की गति से तेज सरपट चाल का दौड़ना ही पर्याप्त है। जब साँस तेज चलने लगे और शरीर पर पसीना आ जाय तो दौड़ना बन्द कर देना चाहिए। दौड़ते समय मुट्ठी बाँधकर हाथों को छाती के सामने रखा जाता है।

हमेशा साँस नाक से लेनी चाहिये ।। नाक के बाल द्वारा हवा छनती है और गर्द गुबार नाक के बालों में लग जाता है जब वह आगे चलती है। श्वासनली में होकर फेफड़ों तक जाते- जाते हवा का तापमान ठीक हो जाता है, किन्तु मुँह से साँस लेने पर वह सीधी और बिना छनी हुई फेफड़ों में पहुँचती है और जैसी भी वह सर्द गर्म होती है वैसी ही जा घुसती है। इस सदी गर्मी के असर से फेफड़ों को हानि पहुँचती हैं। टहलने या दौड़ने के समय तो मुँह से साँस लेना और भी बुरा है, क्योंकि साँस की तेजी के कारण वायु फेफड़े में बहुत जल्द आती जाती है, ऐसी दशा में तो तापमान ठीक रखने के लिये बिलकुल ही थोड़ा समय मिलता है। मुँह से साँस लेने वालों को अक्सर जुकाम, छाती का दर्द, खाँसी आदि रोग आ घेरते हैं। जल्दी- जल्दी टहलते समय बातचीत करना भी वर्जित है।

अब एक साधारण प्राणायाम बताते हैं। प्रातःकाल समतल भूमि पर कुछ बिछाकर पालती मारकर बैठ जाइये, हाथों को गोद में रख लीजिये और कमर, छाती, गर्दन तथा शिर को लाठी की तरह एक सीध में कर लीजिये, कोई भाग आगे पीछे की ओर झुका हुआ न रहे। अब नाक द्वारा जोर- जोर से और जल्दी- जल्दी साँस लेना आरम्भ कीजिए। यह श्वाँस- क्रिया उथली न हो, वरन् इतनी गहरी हो कि सारे फेफड़े में पहुँच जाय। इस बात को ध्यान में रख कर तब जल्दी करने का अभ्यास बढ़ाना चाहिए। आरम्भ में अधिक जल्दी न कर सके तो कोई हर्ज नहीं, पर साँस पूरी लेनी चाहिये। अधिक जल्दी की धुन में उथली साँसें लेना ठीक नहीं। यह श्वाँस क्रिया तब तक करनी चाहिये, जब तक साँस की गति खुद तेज न हो जाय। पहले दिन गिन लेना चाहिये कि कितनी साँसों में दम फूलता है। इसके बाद प्रतिदिन पाँच- पाँच साँसें बढ़ाते जाना चाहिये। साधारणतः एक सौ साँसें लेना काफी है। अभ्यास बढ़ने पर अधिक भी बढ़ा सकते हैं। बैठने की ठीक- ठीक सुविधा न हो तो सीधे खड़े होकर भी इस क्रिया को कर सकते हैं। कर चुकने के बाद कुछ मिनट धीरे- धीरे टहलना चाहिये। किसी दूसरे कार्य को तब आरम्भ किया जाय जब साँस की गति स्वाभाविक हो जाय। अनुभव करने पर फेफड़ों के लिये यह सरल प्राणायाम बहुत लाभप्रद सिद्ध हुआ है।


जीवित मनुष्य की प्रेतात्मा

जीवित मनुष्य की प्रेतात्मा

भूतों की आश्चर्यजनक कहानियाँ तो सम्भवतः बहुतों ने सुनी होगी, परन्तु किसी जीवित मनुष्य की प्रेतात्मा के करिश्मे शायद ही किसी ने सुने हो। केप टाउन नगर के एक्स्टन सड़क पर एक छोटे से घर में अभी हाल में एक ऐसी ही घटना घटी। श्रीमती स्मट्स जो विधवा है और इस घर में रहती है, उनका कहना है कि उस घर में भूतों का वास है। अनेक उत्पात उस घर में नित्य होते हैं। लगभग २० आदमियों से उनके अनुभव के विषय में पूछा गया पर सबके कथन से भूतों की लीला पर विश्वास करने का ही मसाला मिलता है।

एक रिपोर्टर के भेंट करने पर पड़ोस में रहने वाली मिसेज स्ट्राँग ने कहा- मैंने सुना है कि सामने के कमरे के कपड़े इधर उधर फेंक दिये जाते है। मैं इस पर विश्वास कैसे करती? अतएव मैं स्वयं कमरे में गई और सब सामान ठीक से रख कर जैसे ही भोजन के कमरे में पहुँची वैसे ही मुझे कुछ खड़बड़ाहट सुनाई दी। मैं फिर कमरे की ओर आई। कमरा खाली था, पर तकिये का गिलाफ फटा था, बिस्तरा लपेट कर एक तरफ फेंक दिया गया था। मैंने कमरे को खूब अच्छी तरह देखा और सब सामान फिर ठीक करके कमरे को बन्द कर दिया और खिड़की से देखने लगी। मैंने देखा कि बिस्तरा हिला। बिस्तरे का एक बंडल बन कर छत की ओर उठा और फिर गिर पड़ा। तकिया गिलाफ से बाहर निकल आया। और गिलाफ को कोई चीर- चीर कर फेंक रहा था। शांत होने पर मैं फिर कमरे में गई पर कमरा खाली था। मैंने कई बार ऐसा करके परीक्षा ली। शाम को रसोई घर में कुछ खड़बड़ सुनाई दी। हम लोग वहाँ गये। कई सामान इधर- उधर फेंके दिखलाई पड़े। और हमारे सामने भी एक चायदानी आलमारी से अपने आप उठी और नीचे गिर कर टूट गई। एक बार तो बीस आदमियों के देखते हुए सोने के कमरे में उसी प्रकार की घटना घटी।

डमस्टर स्ट्रांग ने बताया कि आठ बजे मैं श्रीमती स्मट्स की लड़की जरट्रूड के पास बैठा था। सहसा जरट्रूड चिल्लाई 'भूत' 'भूत'। दरवाजे की ओर दृष्टि पड़ी तो मैंने देखा कि एक यूरोपियन स्त्री खड़ी है पर मुझे उसका मुख न दिखाई दिया। जैसे मैं उठ कर जाने लगा, वह अदृश्य हो गई।

दूसरे पड़ौसी मि. वान रेन्सवार्ड का कहना है कि ''मैंने सोने के कमरे की बिजली जला कर चारों ओर देखा। मुझे सफेद बालों वाली एक स्त्री सफेद कपड़े पहने दिखाई दी। मैं उसकी ओर चला पर वह गायब हो गई।''

इस कुटुम्ब के एक घनिष्ट मित्र मि. वेजरथ ने सब से आश्चर्य पूर्ण कहानी बताई। उसका कहना है कि- रविवार को एक और दो बजे के बीच मेरी बहन सोने वाले कमरे में श्रीमती स्मट्स की एक लड़की के साथ लेटी हुई थी। सहसा मैंने उसके चिल्लाने की आवाज सुनी और उधर ही दौड़ गया। मुझे देख कर मेरी बहन ने कहा- वह है भूत। मैंने खिड़की की ओर देखा। वह चमकीली प्रतीत होती थी। परन्तु सबसे आश्चर्य की बात तो यह थी कि मैं उसे पहचानता था। वह अभी जीवित है।

मि. बेजरथ का अनुमान है कि इन सब उत्पातों की जड़ वे ही है। क्योंकि वह प्रेतात्मा उनके सम्बन्धी स्त्री की है, जिसने उन्हें एक बार शाप दिया था। उसका सब कुछ नष्ट हो गया, इससे श्रीमती स्मट्स ने उन्हें अपने यहाँ रख लिया। उनके जाने के पहले ऐसी घटना कभी नहीं घटी थी। जब मि. बेजरथ ने अपना बचा खुचा समान भी बेच डाला तब से ऐसी कोई घटना भी नहीं घटी।

अभ्युदय


चिता पर से (kavita)

चिता पर से (कविता)

ले. श्री दरबारीलाल जी सत्यभक्त ज्वालाओं का जाल बिछा है, है पर शान्ति निकेतन।

जलती हैं चिन्तायें सारी, शान्त यहाँ है तन, मन।। अब न मित्र का मोह यहाँ है, है न शत्रु का भी भय।

हूँ न किसी पर सदय हृदय, अब हूँ न किसी पर निर्दय।। जीवन में क्षण भर भी ऐसी, नींद नहीं ले पाया।

सोता था मैं नचता था मन, माया में भर पाया।। इसका लेना उसका देना, यह मेरा वह तेरा।

करता था पर रहा न कुछ अब, लगा चिता पर डेरा।। फूलों की शय्या पर साया, धन जाड़ा दिल तोड़ा।

भूला रहा काठ की शय्या, चार जनां का घोड़ा।। इस हराया, उस हराया, बना रहा अभिमानी।

पर यह जीवन हार रहा था, साधी बात न जानी।। इसका लूटा, उसका खाया, अति लालच के मार।

लेकिन हाथ न कुछ भी आया, जाता हाथ पसार।। मानव का कर्त्तव्य भुलाया यों ही दिवस बिताये।

बहती थी गंगा पर मैन, हाथ नहीं धो पाये।। खला भद्द खेल, खेलका, मजा न कुछ भी आया।

सूत्रधार यमराज अचानक, आया खल मिटाया।। चला साथ पर चला न कुछ भी, साथ न था कुछ लाया।

उस मिट्टी में ही जाता हूँ, जिस मिट्टी से आया।। सत्य सन्देश से


शंका डायन मनसा भूत

शंका डायन मनसा भूत

ले. श्री शिवरतन लाल जी ओझा

इस छोटे से लेख में मैं यह सिद्ध करने नहीं चला कि मरने के बाद कोई प्रेत योनि नहीं होती। इस बारे में विस्तृत विवेचन किसी अगले अंक में करूँगा। इस लेख में मुझे यह कहना है कि वास्तविक भूतों के अतिरिक्त मानसिक भूत भी होते हैं। यदि यह कहा जाय तो अनुचित न होगा कि वास्तविक भूतों की अपेक्षा मानसिक भूत अधिक दुष्ट एवं भयानक होते हैं। उनसे पीछा छुड़ाना कठिन है क्योंकि यह कोई बाहर की चीज तो होती नहीं। मन के साथ आशंका रहती है इसलिये छाया की भाँति भय का भूत भी हर समय पीछे ही पीछे फिरता है।

यह एक पुरानी कहावत है कि शंका डायन, मनसा भूत सचमुच ही जब मन में किसी बात के ऊपर शंका, सन्देह, चिन्ता, भय उत्पन्न हो जाता है तो एक प्रकार की डायन साथ हो लेती है। सब जानते हैं कि चिन्ता, चिता की छोटी बहिन है किन्तु शंका चिन्ता की बड़ी बहिन है। जिसे यह डर लग जाता है कि मेरे पीछे भूत पड़ा हुआ है, उसके लिए घड़ा भी भूत बन जाता है। भूतों के उत्पन्न होने का स्थान मन है। मन में भूतों की कल्पना उठी कि पेट में चूहे लोटे। शाम को भूतों की कहानी सुनी कि रात को स्वप्न में मसान छाती पर चढ़ा। भ्रमवश रस्सी को सर्प समझने का उदाहरण वेदान्ती बार- बार दोहराते हैं। अशिक्षित जातियों में भूत प्रेतों पर अधिक विश्वास होता है, उन पर आये दिन जिन्न सवार रहते हैं। जो उन्हें नहीं मानते उनसे वे भी डरते हैं। डरपोक आदमियों के मन में यह विश्वास जमा रहता है कि अमुक घर, पेड़, मरघट, तालाब पर भूतों का डेरा है। वे उन स्थानों में रात बिरात अकेले नहीं जा सकते। यदि जावें तो समझते है कि सचमुच भूत उन्हें दिखाई दें और वे बीमार पड़ जाय। किन्तु ऐसे भी किसान आदि होते हैं जो उन्हीं कठिन भुतही जगहों में अँधेरी रातों में रहते हैं उनका कोई कुछ नहीं बिगड़ता।

मेरे एक मित्र अपनी आँखों देखी घटना सुनाते थे, वे कहते थे अमुक गाँव में दो आदमियों ने आपस में शर्त बदी। एक ने कहा यदि तू अमुक मरघट में रात को बारह बजे एक कील गाड़ आवे तो तुझे अपनी भैंस दे दूं। उस स्थान के बारे में प्रसिद्ध था कि वहाँ बड़े भूत रहते हैं। दूसरा आदमी तैयार हो गया। वह नियत समय पर कील गाड़ने गया। रास्ते में उसके मन में डर पैदा होने लगा। जैसे तैसे वहाँ पहुँचा और कील गाड़ने लगा। रात अंधेरी थी। जल्दी में उसने अपनी धोती के एक कोने सहित मसान में कील गाड़ दी। जब उठने लगा तो धोती खिंचने लगी। बिना कुछ देखे भाले उसने विश्वास कर लिया कि मुझे भूत ने पकड़ लिया। वह भागा तो धोती और खिंची। आखिर धोती खुल गई और वह चीखता, चिल्लाता, नंग- धड़ंग घर भागा। घर तक पहुँचते- पहुँचते डर के मारे वह मर गया। बाद को लोगों ने जाकर देखा तो पता चला कि धोती में कील गड़ जाने से उसे भ्रम हुआ। वह भय का भूत बन गया और उसकी जान ले ली। इससे मिलती जुलती छोटी- बड़ी घटनायें सब जगह होती रहती हैं और उससे लोग दुख उठाते हैं।

मैं यह नहीं कहता कि भूत होते ही नहीं। वे होते हैं अवश्य और लोगों को समयानुसार हानि लाभ भी पहुँचाते हैं परन्तु भूतों के आक्रमण की जितनी घटनायें होती हैं। उनमें से अधिकांश में शंका डायन और मनसा भूत का हाथ होता है। यदि लोग निर्भय बनें और मिथ्या भ्रम को मन में से निकाल दें तो एक भारी मानसिक कष्ट दूर हो जाय।

मनुष्य समाज में उपस्थित इस समस्या की उपेक्षा करना भूल होगी, क्योंकि भय का भूत इतना भयंकर होता है कि अनेक व्यक्तियों की जिन्दगी खराब हो गई और अनेक पागल बन गये तथा मृत्यु के मुख में चले गये। कभी- कभी सचमुच ही कुछ दुष्ट प्रेतात्मायें मनुष्य के पीछे पड़ जाती हैं और ऐसी आश्चर्यजनक करतूतें दिखाती हैं कि रोगी के पास रहने वालों को भी भय लगता है और वे भी बीमार पड़ जाते हैं। शंका डायन मनसा भूत तथा सचमुच की दुष्ट प्रेतात्माओं से हम किस प्रकार बच सकते हैं और यदि पीड़ित हैं तो किस प्रकार छुटकारा पा सकते हैं इसके सम्बन्ध में यदि जानकार लोग कुछ प्रकाश डालें तो जनता का बड़ा उपकार हो सकता है।


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बर्तन के पानी में काला रंग डाल देने पर हम उसमें अपना प्रतिबिम्ब ठीक- ठीक नहीं देख सकते। इसी प्रकार जिसका चित्त विकारों से मैला हो रहा है वह अपने हित अनहित का ज्ञान नहीं रखता।

***** सदाचार युक्त और ज्ञानपूर्वक एक दिन जीना, सौ वर्ष दुराचार पूर्ण और अव्यवस्थित जीने से कहीं अच्छा है।

***** किसी की निन्दा मत करो। याद रखो इससे तुम्हारी जबान गन्दी होगी, तुम्हारी वासना मलिन होगी। जिसकी निन्दा करते हो उससे बैर होने की सम्भावना रहेगी और चित्त में कुसंस्कारों के चित्र अंकित होंगे।

*****अहा। उसे कैसा विश्राम और शान्ति उपलब्ध है जो मिथ्या चिन्ता से मुक्त रह कर सदा ईश्वर और आत्मोद्धार का चिन्तन करता है।

*****मनुष्य तभी दुःख में ग्रसित होता है, जब उसके आन्तरिक विचारों और बाह्य परिस्थितियों में मेल नहीं होता।


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किसी मनुष्य की शुद्धता का आप्त पुरुषों में विश्वास से बढ़कर कोई प्रमाण नहीं है।


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किसी मनुष्य की शुद्धता का आप्त पुरुषों में विश्वास से बढ़कर कोई प्रमाण नहीं है।


विचारों का स्वास्थ्य पर प्रभाव

विचारों का स्वास्थ्य पर प्रभाव

ले. श्री दत्तात्रेयए रमाशंकर पराजपे न्याय तीर्थ

ईश्वर ने मनुष्य के मस्तिष्क का निर्माण इस प्रकार किया है कि उसमें उत्तम विचार रहें। बुरे विचार विजातीय हैं। वे मनुष्य के ऊपर सवार हो जाते हैं तो एक प्रकार के उसके स्वाभाविक तत्व का हरण कर लेते हैं। सती स्त्रियाँ दुराचारियों के बंधनों में पड़कर जिस प्रकार कष्ट पाती हैं और दिन दिन दुर्बल होती जाती हैं, वही दशा हमारे शरीर की होती है। बुरे विचार अपने साथ चिन्ता, भय, क्रोध, कलह आदि लाते हैं और यह ऐसी अग्नियाँ हैं जो थोड़े ही दिनों में सार भाग जलाकर आदमी को खोखला कर देती हैं। इस सम्बन्ध में कुछ प्रसिद्ध शरीर शास्त्रियों की सम्पत्तियाँ नीचे दी जाती हैं।

डॉ. आल्स्टन लिखते हैं- भय, उदासी, ईर्ष्या, घृणा, निराशा, अविश्वास आदि मानसिक विकार शरीर की स्वाभाविक क्रियाओं को मंद करके खून को सुखा देते हैं।

डॉ. वेन लिखते हैं- संताप और मनोव्यथा के कारण कई लोगों की मृत्यु हो गई और अनेकों का मस्तिष्क खराब हो गया। इस प्रकार का परिणाम स्वाभाविक ही है।

डारबिन साहब कहते हैं- चिरकालीन चिन्ता से रक्त की गति धीमी हो जाती है और चेहरे पर पीलापन, मांस पेशियों में शुष्कता आ जाती है। पलकें झूल पड़ती है, छाती बैठ जाती है, गरदन झुक जाती है एवं होट, शिर, जबड़ा आदि गिर जाते हैं। हँसते आदमी पर घोर उदासी छा जाती है।

मनोविज्ञान शास्त्री अलफम मेरियन कहते हैं- क्षोभ के कारण कई व्यक्ति अचानक मर गये। मानसिक क्षुब्धता शरीर पर ऐसे अनिष्ट कर परिणाम उपस्थित कर सकती है, जिससे वह मुर्दा कहा जा सके।

सर रिचार्डसन का अनुभव है कि- मानसिक कष्ट से होने वाला प्रमेह ठीक शारीरिक कारणों से होने वाले प्रमेह के समान होता है।

सर जार्ज पैगोट बताते हैं कि- असंख्य रोगियों को देखने के बाद मुझे यह पक्का विश्वास हो गया है कि फोड़े होने का प्रमुख कारण चिरकालीन चिन्ता होती है।

डॉ. मुर्चीसन का एक कथन है कि- कई रोगियों की जाँच करने पर यह स्पष्ट हो गया है कि जिगर के फोड़े का कारण पुरानी चिन्ता या मानसिक दुख होता है।

डॉ. मैडरले बताते हैं- निश्चय ही मानसिक क्षोभ के कारण शरीर की वृद्धि में रुकावट पड़ती है और धमनियाँ अपना काम ठीक प्रकार करने से इन्कार कर देती हैं।

डॉ. पमर गेट्स का दावा है कि- क्रोध, निराशा और क्षोभ शरीर में भयंकर विष उत्पन्न करते हैं, जिनसे भारी हानि होती है।

डॉ. तकेने का कथन है कि- लकवा, हैजा, यकृत रोग, बालों का जल्दी सफेद होना, गंजापन, रक्त की कमी, गर्भपात, मूत्ररोग, चर्मरोग, फोड़े, पसीने की अधिकता, दंत जल्दी गिरना आदि रोगों की जड़ में भय या सन्ताप छिपा होता है। हैजा या प्लेग से मरने वालों में बीमारी से मरने की अपेक्षा भय से मरने वालों की संख्या अधिक होती है।

इन महत्त्वपूर्ण सम्मतियों पर ध्यान देने से यह स्पष्ट हो जाता है कि मन में बुरे विचार लाने से शरीर का बड़ा अनिष्ट होता है। स्वस्थ रहने की इच्छा करने वालों को चाहिये कि सदैव प्रसन्न रहें। और बुरे विचारों को अपने पास भी न फटकने दें।


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अशान्त मनुष्य को अज्ञानी कहना चाहिए क्योंकि वह स्वार्थ में अन्धा होकर अँधेरे में भटक रहा है। शान्त पुरुष सब प्रकार की परिस्थितियों में अपने लिए आनन्द ढूँढ़ निकालते हैं।

***** हमें दुनियाँ में जितने दुःख और पाप दिखाई देते हैं उनका मूल कारण अज्ञान है। यह समझकर विचारवान पुरुष पापियों और पीड़ितों से घृणा न करके उन्हें दया की दृष्टि से देखता है।


मैस्मरेजम क्या है?

मैस्मरेजम क्या है?

(प्रो. धीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती बी. एस. सी.)

मनुष्य शरीर हाड़ मांस का चलता फिरत पुतला मात्र नहीं है। ऐसी सुन्दर और चैतन्य मशीन अपने आप नहीं चलती। जब साधारण यंत्रों को चलाने के लिए काफी शक्ति लगती है तो क्या चैतन्य यंत्र अपने आप चलता रहता होगा? वैज्ञानिक हमें बताते हैं कि मनुष्य के शारीरिक और मानसिक कार्यों को चलाने में इतनी विद्युत शक्ति खर्च होती है जितनी से चार बड़े- बड़े मिल चल सकते हैं। मनुष्य की तमाम शक्तियों से सम्पन्न एक कृत्रिम मनुष्य बनाया जाय तो उसके संचालन में एक बिजली घर की पूरी ताकत लग जायेगी। हमारे शरीर में असंख्य कलपुर्जे ही नहीं वरन् उसमें अपना बिजली घर भी होता है। मृत्यु क्या है? उस बिजलीघर का फेल होना है। शरीर के तमाम कलपुर्जे बदस्तूर बने रहते हैं कोई कहीं से टूटता फूटता नहीं केवल विद्युत धारा बन्द हो जाती है।

हमारे शरीर की बिजली का क्षेत्र केवल अपने कल पुर्जे को चलाने तक ही सीमित नहीं है। वरन् वह बाहर की चीजों पर प्रभाव डालने और उनके असर को ग्रहण करने का कार्य भी करती है। एक वैज्ञानिक ने अपने गहरे अनुभव के बात बताया है कि हमारी बिजली का एक तिहाई भाग कल पुर्जों को चलाने में खर्च होता है। एक तिहाई से बाहरी चीजों के प्रभाव में से आवश्यकीय ग्रहण करने और अनावश्यक को धकेलने का कार्य होता है। शेष एक तिहाई बिजली संसार की दूसरी चीजों पर अपना असर डालती है। इन तीन भागों में से भी प्रत्येक तिहाई की शक्ति असंख्य मार्गों द्वारा खर्च होती रहती है। या यो कहना चाहिए कि उस पावर हाउस में असंख्य तार लगे हुए हैं और वे भिन्न भिन्न दिशा में विभिन्न कार्य करते रहते हैं। मानव शरीर की विद्युत का अन्वेषण करने वाले कहते हैं कि हाल के जन्में बालक की भी तमाम बिजली एकत्रित कर ली जाय तो उससे डाक गाड़ी का एक इंजन चल सकता है। बड़े होने पर यह शक्ति बढ़ती है। और जो व्यक्ति इसे बढ़ाने की कोशिश करते हैं उन्हें तो और भी अधिक मिल जाता है।

इस विद्युत शक्ति का अनुभव वैज्ञानिक ही करते हों सो बात नहीं है। अपने दैनिक जीवन में अनेक घटनाऐं हम देखते हैं। उसके द्वारा होने वाले हानि लाभों को भी जानते हैं। बचने के उपायों को भी जानते और उपयोग में लाते हैं। पर अभी तक उस पर वैज्ञानिक प्रकाश नहीं पड़ा है, इसलिए अपनी उन दैनिक कृतियों को या तो ढर्रे में पड़ जाने के कारण याद नहीं करते या अन्ध विश्वास समझ कर उपेक्षा कर देते हैं। परन्तु नियम और सिद्धान्त इस बात की प्रतीक्षा नहीं करते कि आप उन्हें जानते हैं या नहीं, आप उसके नफा नुकसान से परिचित हैं या नहीं। बिजली की शक्ति सम्पन्न तार को छूते ही आपकी मृत्यु हो जायेगी भले ही आपको पहले से उसका पता न हो। पृथ्वी की आकर्षण शक्ति का पता पहले पहल सर आइजक न्यूटन ने लगाया था, पर क्या वह शक्ति पहले से काम नहीं कर रही थी?

मनुष्य जब से कुछ समझदार हुआ तभी से उसकी प्राकृतिक बुद्धि ने उस अदृश्य शक्ति के अच्छे प्रभाव को ग्रहण करने और बुरे प्रभाव से बचने का उपाय ढूँढ़ निकाला। पृथ्वी द्वारा शरीर की बिजली खींची जाती है इसलिए प्रकृति ने गाय, भैंस, घोड़ों के पैरों में निर्जीव ठोस और रोकने वाले आवरण पैदा कर दिये। खुर एक खड़ाऊँ हैं जिनके द्वारा पशु शरीर और पृथ्वी की बिजलियों के बीच में दीवार खड़ी होती है। मनुष्य ने अपनी शक्ति खिंचती देखी तो खड़ाऊ और जूतों का आविष्कार किया। संसार व्यापी विद्युत के अन्य अनिष्ट कर प्रभावों से बचने के लिए पशुओं की खाल को उपयोग में लाना, रेशम के वस्त्र पहनना तथा कांसे के बर्तन में भोजन करना सीखा। हाथ में लकड़ी की लाठी या छड़ी हम क्यों धारण करते हैं? इसलिए कि बाह्य विद्युत के अनिष्ट कर प्रभाव से बचे रहें। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि मनुष्येत्तर प्राणियों ने ऐसा क्यों नहीं किया? प्रकृति को अपने उन मूक पुत्रों की पहले से ही चिन्ता थी। मनुष्य बुद्धिजीवी है अपनी रक्षा खुद कर लेगा यह सोचकर उसने उसके साथ कुछ कंजूसी की है, पर अन्य प्राणियों को इफरात के साथ मुक्त हस्त होकर दिया है। उनकी शक्ति मनुष्य के मुकाबले बहुत अधिक हैं, इसलिए वह स्वयमेव बाह्य प्रभावों से लाभ प्राप्त करते हैं और हानि से बचे रहते हैं।

भारत के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी और वैज्ञानिक श्री हंसराज वायरलेस ने बेतार के तार का एक यंत्र बनाने में छिपकलियों के शरीर की बिजली से काफी काम लिया था। अन्य पशु पक्षी अपनी विद्युत शक्ति से नित्य आश्चर्य जनक काम लेते हैं। खद्योत अपनी बिजली को चमका कर कैसा सुन्दर प्रकाश करता रहता है। एक प्रकार की मछली छोटे जल जन्तुओं का शिकार करते समय अपनी बिजली का ऐसा झटका देती है कि वह बेहोश हो जाते हैं। बड़े अजगर सर्पों की विद्युत से छोटी चिड़िया और मेंढक मूर्तिवत अचल हो जाते हैं। भेड़िये को देखते ही भेड़ का भागना तो दूर मुँह से आवाज तक निकलना बन्द हो जाता है। बिल्ली, शेर, बाघ आदि भी अपनी इस शक्ति से काम लेते हैं।

मनुष्यों में यह शक्ति पर्याप्त मात्रा में होती है। उसमें आकर्षण और विकर्षण दोनों ही धारायें विद्यमान रहती हैं। क्रोधित और रोष में भरे हुए व्यक्ति को सामने देखकर हमारे पाँव कापने लगते हैं और एक सुन्दर स्त्री को देखने के लिए बरबस आकर्षित हो जाते हैं। यह क्या है? यह उन्हीं आकर्षण- विकर्षण शक्तियों का प्रभाव है। वेश्याओं के यहाँ बदनामी, धन व्यय और स्वास्थ्य नाश होते हुए भी क्यों जाते हैं। अपनी स्त्री मिलने को क्यों उद्विग्न रहती हैं? सुन्दर बच्चों को खिलाने को मन क्यों ललचाता है? विरोधी विचार रखते हुए भी किसी के सामने जाकर पानी पानी क्यों हो जाते हैं? मित्रों पर सर्वस्व निछावर क्यों कर देते हैं? स्त्रियाँ पति पर प्राण क्यों देती हैं? किसी के बहकावे में लोग क्यों आ जाते हैं? यह सब आकर्षण शक्ति धारा का खेल है। जालिमों को देखकर क्यों डर लगता है? किसी प्रभावशाली व्यक्ति के सामने जाकर ठीक प्रकार बात क्यों नहीं कही जाती? दीवान दरोगा से बात करने में दम क्यों फूलता है? क्रोधी लोगों के पास से जल्द चले जाने को जी क्यों चाहता है? यह विकर्षण शक्ति धारा का असर है।

यह तो हुआ दैनिक जीवन में स्वाभाविक शक्ति का स्वयमेव होने वाला प्रभाव। विशेष अवसरों पर विशेष शक्ति द्वारा जान बूझकर डाला गया असर इससे भिन्न और बहुत अधिक शक्तिशाली होता है। यह पहले कहा जा चुका है कि हमारे अपने बिजली घर की शक्ति असंख्य अलग अलग तारों में होकर बह रही है। यदि दो चार तारों में चलने वाला प्रवाह एक ही तार में चालू कर दिया जाय तो वह पहले की अपेक्षा कही अधिक शक्ति सम्पन्न हो जाता है। और यदि दस- बीस, पचास चालीस तारों की शक्ति एकत्रित कर ली जाय तो और अधिक बल होगा। तात्पर्य यह है मनुष्य की विशृंखलित शक्तियों का यदि एकत्रीकरण हो जाय तो वह अत्यधिक प्रभावशाली हो सकता है और उससे आश्चर्य जनक एवं अलौकिक कार्य किये जा सकते हैं। मैस्मरेजम विज्ञान का स्त्रोत यही आत्म विद्युत है। इस विद्युत के कुछ तारों को इकट्ठे करके एक काम पर लगा देते हैं तब उसके द्वारा होने वाला कार्य अधिक वेग से होने लगता है। पन्द्रह वोल्ट पावर की बत्ती जितना प्रकाश देती है। पचास वोल्ट की बत्ती उससे बहुत अधिक करती है। अधिक प्रवाह छोड़ते ही पंखा अधिक वेग से घूमने लगता है। मनुष्यों का एक दूसरे पर स्वाभाविक और साधारण शक्ति से जो असर पड़ता है, उसे ही विशेष कर देने पर कुछ अधिक कार्य होता है। रोजमर्रा जो बात नहीं देखी जाती वही बात यदि कभी अचानक दीखने लगे तो हमें आश्चर्य होता है। मैस्मरेजम के चमत्कार देखकर आश्चर्य करने का भी यही कारण है।


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लोग नेक बनने की अपेक्षा विद्वान बनने का प्रयत्न अधिक करते हैं, फलस्वरूप वे भ्रम में पड़ जाते हैं।

दुनियाँ में कालापन बहुत है, पर वह सफेदी से अधिक नहीं है। यदि ऐसा न होता तो यह दुनियाँ रहने के सर्वथा अयोग्य होती।

धर्म जीवन की आशा है, आत्म रक्षा का अवलम्बन है, उसी के द्वारा दूषित वृत्तियों से मुक्ति होती है।

जो उपकार जताने का इच्छुक है, वह द्वार खटखटाता है। जिसमें प्रेम है, उसके लिये द्वार खुला है।

जो दूसरों को दिये बिना खुद लेना चाहता है वह पाता तो कुछ नहीं, खोता बहुत है।


अनन्त शक्ति का मूल स्त्रोत

अनन्त शक्ति का मूल स्त्रोत

ले. ठाकुर रामसिंह जी चौहान

लोग सदैव किसी ऐसी शक्ति की तलाश में रहते हैं जिसके द्वारा सफलता प्राप्त कर सकें और अपनी कठिनाइयों को आसानी से हल कर सकें। इसकी ढ़ूँढ़ खोज में चाहे वर्षों लगा दीजिए, पर यह बात बाहर कहीं नहीं मिलेगी। यह हमारे अन्दर विद्यमान शक्ति को अपने अन्दर रखते हुए भी हम दुख और शोकों से खिन्न हो रहे हैं। दुख और विपत्ति मनुष्य के भाग्य में नहीं लिखी है।वास्तव में हमने इन चीजों को अपने आप पैदा किया है और मन की आकर्षण शक्ति द्वारा उन्हें खींच कर अपने से बाँध लिया है। मन के कषाय लाल मिर्चों के समान हैं, बुरी आदतों में ज्यों- ज्यों हम लीन होते जाते हैं, त्यों- त्यों दुखों की वृद्धि होती जाती है। लाल मिर्चों को शरीर पर जितना मलेंगे उतनी ही जलन बढ़ती जायेगी। भय और घबराहट के साथ काम करने और अपने को अभागा एवं दीन समझने वालों के सामने सदैव असफलता और दरिद्रता ही खड़ी रहेगी।

पहाड़ से गिरते हुए छोटे झरने को देखिये, अनन्त काल से वह इसी प्रकार बह रहा है। किसी को यह पता भी नहीं है कि इसकी जलधारा में कोई शक्ति भरी हुई है। कोई बुद्धिमान मनुष्य वहाँ आता है और लोगों की दृष्टि में व्यर्थ बहने वाले उस झरने की शक्ति के रहस्य को समझ कर उससे लाभ उठाने की सोचता है। वह प्रयत्न करके जल धारा से चलने वाले पहिये वहाँ लगवाता है और आवश्यकीय यंत्र वहाँ बिठाता है। अब यह व्यर्थ कहलाने वाला झरना एक बड़ी भारी शक्ति का केन्द्र दिखाई देने लगता है। उस शक्ति से बिजली पैदा होती है और फिर सैकड़ों यंत्र चलते हैं जिनके जरिये वह बुद्धिमान मनुष्य अपने पड़ौसियों को पर्याप्त लाभ पहुँचता हुआ खुद धन और यश उपार्जित करता है।

मनुष्य का शरीर भी उसी प्रकार का शक्ति केन्द्र है, पर वह जीवन रूपी पहाड़ी से गिरकर यों ही व्यर्थ बहता रहता है। वह झरना मानों अपने दुर्भाग्य पर रोता हुआ हमारी ओर संतृप्त नेत्रों से देखता हुआ यह कह रहा है कि मेरा यौवन नष्ट हुआ जा रहा है, मुझसे कुछ काम लेना है तो ले लो।

पारस पत्थर कोई बाहरी चीज नहीं है। वह हमारे हृदय में छिपी हुई आत्मशक्ति है। उसी को छूने से लोहा सुवर्ण और मनुष्य देवता हो जाता है। पर कितने मनुष्य हैं जो उसे छूते हैं? संत कबीर ने जीवन भर यही रोना रोया कि लोग हीरे को फेंककर काँच बटोरने को क्यों पागल हो रहे हैं? ईश्वर ने अपने परिपूर्ण और अक्षय खजाने की ताली हमारी जेब में रख दी है। हमी अज्ञानी बालक का उदाहरण बन रहे हैं, और दर- दर भीख मांगते फिर रहे हैं, किन्तु यह नहीं समझते कि अतुल सम्पत्ति के खजाने की ताली हमारी जेब में रखी हुई है। उसे खोलकर हम राजाओं जैसा ऐश्वर्य प्राप्त कर सकते हैं। मनुष्य की आत्मशक्ति की महत्ता अतुलनीय है। झरना बिजली और पारस पत्थर जड़ है। पर हम चैतन्य और आनन्द स्वरूप है। शक्ति का भण्डार, ईश्वर का अंश होने के कारण मनुष्य में वह सब महा शक्तियाँ और चमत्कार निहित हैं, जो प्रकृति में कहीं भी गुप्त और प्रकट रूप से विद्यमान है। उस शक्ति की उन्नति होने पर क्या हो सकता है? इसकी तो कल्पना भी करना कठिन है। मनुष्य ईश्वर का पुत्र वह अपने पिता की सारी सम्पत्ति को प्राप्त कर सकता है, खुद ईश्वर बन सकता है।

हमने आम शक्ति की स्वयं उपेक्षा की हैं, उसका जानबूझ कर कोई खस उपयोग नहीं करते हैं, फिर भी अनजान में उसके द्वारा जो कार्य होते हैं क्या वे कम आश्चर्य जनक हैं? दैनिक जीवन में दृढ़ इच्छा करते ही हमारी आकांक्षाऐं पूरी हो जाती हैं। इच्छा कर लीजिए कि आज रात को हमें सिनेमा जाना है। आपको उस लिए किसी न किसी प्रकार पैसा और फुरसत मिल जायेगी। दिल्ली जाना जरूरी समझ लीजिये कि आप अविलम्ब दिल्ली पहुँचेंगे। निश्चय कर लीजिये कि आज रात को हमें दो बजे उठ बैठना है ठीक समय पर आपकी आँख खुल जायेगी।

जितने सुन्दर पदार्थ हमें दृश्यमान होते हैं, पहले वे किसी के विचार में बीज रूप से आये होंगे। शाहजहाँ ने सोचा कि ऐसा बड़ा ताज महल बनाना चाहिए, कुछ ही दिनों में ताज महल बन कर सामने आ गया। स्टीफन्सन के दिमाग की पटरी पर चलने वाली रेल आज लोहे की पटरियों पर दौड़ रही है। दूर की बात जाने दीजिए अपने घर की चीजों पर नजर डालिए। कुर्सी, मेज, दवात, कागज, कपड़े चारपाई, लालटेन, सन्दूक, बर्तन यह सब किस प्रकार बन गये? इसके बनाने वालों ने इच्छा की होगी कि हम ऐसी चीज बनावे, फलस्वरूप वह बन गई। आपने चाहा कि यह हमें मिल जाय फलस्वरूप ऐसी सुविधाऐं मिल गई, जिनसे यह सब आपके सामने आ गई। बढ़ई यदि आपकी मेज़ वाली लकड़ी से अलमारी बनाना चाहता तो वह बना सकता था, और आप यदि छोटी सन्दूकची से काम चलाना चाहते हैं तो चला सकते थे। तब यह मेज़ आपके घर में न आई होती। हमारी आत्म शक्ति कल्पवृक्ष है। उससे मिट्टी के खिलौने और गुड़िया हम मांगते हैं, फलतः वह हमें नित्य मिल जाती है जिस दिन महल और खजाना माँगेंगे उस दिन वह भी मिल जायेगा।

जीवन की बुरी दशा, भय, दुख, निर्धनता तथा दुर्बलता हमारे लगातार विचारों के फल हैं। यदि कोई वास्तविक बाहरी दुख आ भी जाय तो उसे आसानी से हँसकर टाला जा सकता है। योगेश्वर शंकर ने कालकूट विष को हँस कर पी जिया और अपने गले से नीचे भी नहीं उतरने दिया। रोम- रोम बाणों से छिदा हुआ होने पर भी पितामह भीष्म बिना दुख माने बहुत दिनों तक शर- शय्या पर पड़े रहे और गहन धर्म शास्त्र की विवेचना करते रहे। हम तो झूठ भयों से डर- डर कर मरे जा रहें हैं। रात को चूहे भेड़िये दिखाई देते हैं, बिल्ली बाघ नजर आती है, हौवा यमराज का भाई बन जाता है। रस्सी साँप बन कर काट खाने को दौड़ पड़ती है।

ईश्वर के पुत्रों, अपने को भूलों मत। तुम सत् चित आनन्द स्वरूप हो। अनन्त ऐश्वर्य के तुम अधिकारी हो। सफलता तुम्हारे लिये बनाई गई है। अपनी जेब को ढ़ूँढ़ों और पारस पत्थर को निकालो। जरा निकालो तो सही, यह काला कलूटा लोहा तेजमय सुवर्ण हो जायेगा। अपने हाथों को उठाने की आज्ञा तो दो सामने की थाली में रखा हुआ षट् रस भोजन तुम्हारे मुँह में होगा।


जहाँ चाह, वहाँ राह

(ले.-श्री दयासिन्धु जी पाण्डेय शास्त्री)

जिस प्रकार राजा के हाथ में सत्ता होती है जिस प्रकार इंजन की ताकत से अन्य यंत्र चलते हैं। उसी प्रकार हमारे मस्तिष्क की शक्ति-मनोबल-से सारे शरीर का कार्य संचालन होता। मस्तिष्क के पिछले भाग में रहने वाले अंतर्मन के बल से हृदय, फुफ्फुस, आमाशय, आँतें आदि अवयव दिन−रात अपने काम में लगे रहते हैं और उस गति विधि का हमें प्रत्यक्षतः भान भी नहीं हो पाता। आगे का मस्तिष्क-बाह्ममन-सोच विचार करने का काम करता है। शरीर के सब अंग उसका कहना भी मानते हैं। ज्यों ही मन में आया कि सामने पड़ी हुई पुस्तक को उठावें त्यों ही हाथ आगे बढ़ जाता है और पुस्तक को पकड़ कर उठा लेता है। मन में जैसे विचार होते हैं शरीर में उसके लक्षण साफ प्रकट होने लगते हैं। एक मनोविज्ञान शास्त्री का कहना है कि किसी आदमी की निजी चाल ढाल और रूप रेखा मुझे बताओ मैं तुम्हें बता दूँगा कि वह क्या सोचता रहता है।

निस्सन्देह हमारी आकृति मन की छाया मात्र है। विचारों का प्रतिबिम्ब स्पष्ट रूप से चेहरे पर झलकता है। भयभीत होने पर मुँह पीला पड़ जाता है, क्रोध आने पर आँखें लाल हो जाती हैं, स्वप्न से कामेच्छा होने पर स्वप्न दोष हो जाता है, स्वप्न में डर लगने या झगड़ा होने पर मुँह से शब्द निकल पड़ते हैं और हाथ पाँव पटकते हैं, कोई उत्साह होने पर शक्ति से अधिक काम करने पर भी थकान नहीं व्यापती, ब्याह शादी में बिना थके चौगुना काम कर लेते हैं, कोई उत्तेजनात्मक बात सुनकर रोग शैया पर से भी उठ खड़े होते हैं। यह मन की शक्ति है। स्वस्थ आदमी दुख का धक्का लगते ही बीमारों जैसा अशक्त हो जाता है। अपने को बीमार समझने वाले लोग सचमुच बीमार पड़ जाते हैं। एक बार एक स्कूल के विद्यार्थियों ने सोचा कि कोई ऐसा उपाय करें जिससे दो−चार दिन की छुट्टी मिले। उन्होंने इसके लिए एक उपाय सोच कर निश्चित कर लिया। अध्यापक ज्यों ही स्कूल में आये त्यों ही एक लड़के ने कहा ‘मास्टर साहब, आपका चेहरा बहुत उतरा हुआ है। क्या कुछ बीमार हैं, मास्टर साहब को आश्चर्य हुआ कि मैं घर से अच्छा खासा आया हूँ यहाँ क्या बात हुई। इतने में दूसरे लड़के ने कहा बुखार चढ़ने की तरह आपकी साँस तेज चल रही है। तीसरे ने उनका शरीर छूकर बहुत गरम बतलाया। चौथे ने दर्पण लाकर सामने रख दिया कि देखिये आपके चेहरे का कैसा हाल हो गया है। अन्य लड़कों ने भी उनके बीमार होने का समर्थन किया अब तो मास्टर साहब के मन में पक्का विश्वास हो गया कि मैं अवश्य बीमार हूँ। कुछ ही देर में सचमुच उन्हें बुखार चढ़ आया और वे स्कूल की छुट्टी करके घर चले गये।

गाँवों की कहावत है कि ‘जहाँ चाह वहाँ राह’ जो जैसा होना चाहता है वैसा बन जाता हैं। महा पुरुषों के जीवन चरित्रों पर नजर डालिये। क्या परिस्थितियों ने ही उन्हें ऊंचा उठा दिया था? नहीं, जिसने अपने को जैसा बनाना चाहा वह वैसा बन गया। अर्जुन, रावण, राम, कृष्ण, हनुमान, अभिमन्यु, प्रताप, शिवाजी, प्रभृति महापुरुषों में यदि दृढ़ मनोबल न होता तो क्या वे इतने बड़े कार्य कर पाते? आज के महान तानाशाह जिनके डर से दुनिया में खलबली मच रही है, ‘हिटलर’ और ‘मुसोलिनी’ उस दिन अपने बहुत ही गरीब पिताओं के घरों में पैदा हुए थे और अपनी आधी उम्र तक इतना पैसा नहीं कमा पाये थे कि अच्छी तरह अपना खर्च चला लें। नैपोलियन बोनापार्ट एक गरीब के घर में पैदा हुआ था पर उसने वह कर दिखाया जिसे अरबों खरबों की गिनती रखने वाले और उसकी अपेक्षा चौगुना शारीरिक बल रखने वाले नहीं कर सकते महा प्रभु ईशा ने अपने मार्ग में आये हुए पहाड़ से कहा ‘हट जाओ’ वह सचमुच हट गया।

जो कुछ आश्चर्य जनक चीजें हमें दुनिया में दिखाई देती हैं वह मनोबल के ही चमत्कार हैं। मनोबल ही सब प्रकार की सफलता और उन्नति का राज मार्ग है। यह पहले बताया जा चुका हैं कि शरीर शीशे की तरह हैं जो नम के सांचे में तुरन्त ढल जाता है। इच्छा करने पर बाहर की चीजें भी अनुकूल हो जाती हैं। जब आपके मन में उपन्यास पढ़ने की इच्छा होती है तो उपन्यास प्राप्त होते हैं और जब धर्म ग्रन्थों के पढ़ने की लगन लग जाती है तब कहीं न कहीं से धर्म ग्रन्थ भी मिल जाते हैं। कहते हैं कि साँप मारने वाले को साँप अधिक मिलते हैं। चोर को कुतिया मिल रहती है। साधुओं के पास साधुओं और चोरों के पास चोरों का जमघट रहता है। सोने चाँदी आदि धातुओं की बड़ी बड़ी खानें किस प्रकार बनती हैं इसके संबंध में अन्वेषकों का कहना है कि धातुओं के परमाणु सर्वत्र व्याप्त हैं। एक जगह कुछ अधिक परमाणु हुए तो वे अपनी प्रकृति दत्त आकर्षण शक्ति से अपनी जाति के अन्य परमाणुओं को अपनी ओर खींचते हैं। वे जितने अधिक होते जाते हैं उतनी ही उनकी आकर्षण शक्ति बढ़ती जाती है और खान की परमाणु वृद्धि तीव्र जाति से होने लगती है। यही बात हमारी परिस्थितियों के संबंध में है। जिस चीज की हम इच्छा करते हैं उसे प्राप्त करने के अनुकूल सुविधाएं अपने आप हमारी तरफ खिंच आती हैं। चाह होते ही राह दिखाई पड़ने लगती है।

आप पूछेंगे कि कौन आदमी ऐसा है जो धन आरोग्य ऐश्वर्य और यश न चाहता हो फिर सब को वह चीजें प्राप्त क्यों नहीं होतीं? उत्तर यह है कि उनकी चाह ढ़ुल-मुल, कच्ची, संशय युक्त और स्वप्न समान होती है अभी मकान प्राप्त होने का स्वप्न देख रहे हैं तो अभी स्त्री सुख का, अभी राजा बना चाहते हैं तो अभी योगी। ऐसे आदमी को न तो मकान मिलता है न स्त्री। वे न राजा बन पाते हैं न योगी। यह इच्छाशक्ति नहीं यह तो शेखचिल्ली पन है जो अभी मुर्गियाँ खरीद रहा था और अभी शादी करने लगा।

मनोबल या इच्छाशक्ति वह हैं जब एक ही बात पर सारे विचार केन्द्री भूत हो जाएं उसी को प्राप्त करने की सच्ची लगन लग जाय। सन्देह कच्चापन या संकल्प विकल्प इसमें न होने चाहिए। गीता कहती है कि ‘संशयात्मा विनश्यति’ अर्थात् संशय करने वाला नष्ट हो जाता है। पहले किसी काम के हानि लाभ को खूब सोच समझ लिया जाय जब कार्य उचित प्रतीत हो तब उसमें हाथ डालना चाहिये किन्तु किसी काम को करते समय ऐसे संकल्प विकल्प न करते रहना चाहिए कि ‘जाने यह कार्य पूरा होगा या नहीं मुझे सफलता मिलेगी या नहीं, सफलता देने वाला कि निश्चय वह है। जिसकी शक्ति को पहिचान कर नेपोलियन ने कहा था कि ‘असंभव शब्द मूर्खों के कोष में हैं।’ दृढ़ मनोबल और निश्चयात्मक इच्छा शक्ति ही सच्ची चाह है ऐसी चाह के पीछे राह छाया की भाँति दौड़ी फिरती है।


बच्चों को नजर कैसे लगती है?

बच्चों को नजर कैसे लगती है?

ले. श्री इन्द्रदत्त विद्यादत्त, भावलेकर

यह मानी हुई बात है कि मनुष्य के शरीर में एक ऐसी बिजली रहती है जिसका दूसरों पर प्रभाव पड़ता है। साथ रहने पर हर व्यक्ति एक दूसरे से प्रभावित होता है। विद्वानों ने सत्संग की महिमा और कुसंग की बुराई में बहुत कुछ लिखा है, क्योंकि वे जानते थे कि साथ रहने पर प्रभाव अवश्य पड़ेगा। शक्ति का नियम है कि वह जहाँ अधिक होती है वहाँ से उस स्थान को शीघ्रता पूर्वक जाना चाहती है जहाँ उसका अभाव या कमी हो। एक भरे हुए तालाब और एक खाली तालाब के बीच में ऐसा रास्ता बना दिया जाय जिससे एक का पानी दूसरे में जा सके, तो भरे हुए तालाब का पानी तब तक तेजी के साथ खाली तालाब की ओर दौड़ता रहेगा जब तक दोनों की सतह बराबर न हो जाय। यही बात मनुष्य शरीर की बिजली के सम्बन्ध में कही जा सकती है। बलवान व्यक्ति में से निकल कर वह निर्बल में प्रवेश करना चाहती है। हम नित्य देखते हैं कि शारीरिक या मानसिक बल रखने वाले ही दूसरे पर अपना असर डालने में समर्थ होते हैं। निर्बल तो उन्हीं पर असर डाल सकते हैं जो उनसे भी निर्बल हो।

उपरोक्त नियम के अनुसार बड़े आदमियों का बालकों पर असर पड़ता हैं। यह असर कभी तो हितकर होता है कभी अहितकर। बालकों को नजर लगना मानवीय विद्युत का अहितकर प्रभाव है। नजर लगने की बात को अन्ध विश्वास कह कर हँसी में उड़ाना मूर्खता है। जब दो शक्तिशाली आदमी आपस की विद्युत से बीमार होकर मरणासन्न स्थिति तक पहुँच जाते हैं, तो बालकों पर असर हो जाने में आश्चर्य की कौन सी बात है? मैस्मरेजम और हिप्रोटेजम विद्या के विशारदों ने यह सिद्ध कर दिया है कि दूसरों पर प्रभाव डालने या प्रभाव ग्रहण करने का मार्ग नेत्र हैं। वे लोग दृष्टिपात करके ही दूसरों को गहरी निन्द्रा में ले जाते हैं और अपने प्रयोग करते हैं। आदमी जब एकाग्र होकर या अधिक आकर्षित होकर किसी की ओर देखता है तो उसकी दृष्टि प्रभावशाली हो जाती है। लालायित होकर देखने पर भी ऐसा ही प्रभाव होता है। कोई बच्चा अधिक हँसता खेलता है, प्यारी- प्यारी बातें करता है तो लोगों का ध्यान उनकी ओर अधिक आकर्षित होता है। यदि उस समय अधिक ध्यान पूर्वक उन्हें खिलावें या प्रशंसा करे तो बच्चों को नजर लग जाती है। मुग्ध होकर अधिक ध्यानपूर्वक उनकी ओर दृष्टिपात किया जाय तो भी नजर का असर हो जाता है। कुछ लोगों में स्वभावतः एक खास प्रकार की बेधक दृष्टि हो जाती है, जिससे साधारणतः भी यदि वे किसी बच्चे की ओर देखें तो असर हो जाता है। ऐसे लोग जिनके बाल बच्चे नहीं होते और बच्चों के लिए तरसते रहते हैं, वे जब दूसरों के बच्चों को हसरत भरी निगाह से देखते है तब यह असर अधिक होता है, क्योंकि लालायित होकर देखने से दूसरी चीजों का अपनी तरफ आकर्षण होता है। पति जब परदेशों को जाते हैं और स्त्री लालायित होकर उसकी ओर देखती है तो रास्ते भर उनका चित्त बेचैन बना रहता है। कभी- कभी तो उन्हें वापिस तक लौटना पड़ता है या एक दिन ठहर जाना पड़ता है। इसलिए प्राचीन काल में क्षत्राणियाँ पतियों को युद्ध में भेजते हुए प्रोत्साहन देकर तिलक लगा कर भेजती थी, वे जानती थी कि यदि हम आकर्षण विद्युत इनकी ओर फेकेंगी तो वे पीछे की ओर खिंचे रहेंगे, युद्ध से लौट आवेंगे या असफल रहेंगे। इसी प्रकार बड़े आदमी जब लालायित होकर बच्चों की ओर देखते हैं तो उन बच्चों की शक्ति खिंचती है और वे उसके झटके को बर्दास्त न करके बीमार पड़ जाते हैं। बिना किसी पूर्व रूप के जब अचानक बच्चा बीमार पड़ जाता है तब समझा जाता है कि उसे नजर लग गई।

हमारे यहाँ की स्त्रियों को इसकी जानकारी बहुत पहले से हैं। नजर से बचाने और लग जाने पर उपचार की क्रिया से भी वे परिचित हैं। ताँबे का ताबीज, शेर का नाखून, मूंगा, नीलकण्ठ का पर आदि चीजें गले या हाथ में पहनाई जाती है। यह चीजें बाहरी बिजली के अपने में ग्रहण करके या उसके प्रभाव को रोककर बच्चों पर असर नहीं होने देती। गरम लोहे का टुकड़ा पानी या दूध में बुझाने से भी वह जल या दूध उस असर को दूर करने वाला हो जाता है। कहते हैं कि आकाश की बिजली अक्सर काले साँप, काले आदमी, काले जानवर आदि काली चीजों पर पड़ती है। काले कपड़े जाड़े के दिनों में इसलिए पहने जाते हैं कि गर्मी की बिजली को अधिक इकट्ठी करके अपने अन्दर रख लें और अधिक गरम रहें। इसी नियम के आधार पर नजर से बचाने के लिये काली चीजों का उपयोग होता है। मस्तक पर काला टीका लगाया जाता है। हाथ या गले में काला डोरा बाँधा जाता है। काली बकरी का दूध पिलाया जाता है। काली भस्म चटाई जाती है। जिस प्रकार बड़े- बड़े मकानों के गुम्बजों की चोटी पर एक लोहे की छड़ इसलिए लगाई जाती है कि वह स्वयं बिजली का असर ग्रहण करके पृथ्वी में भेज दे और मकान को नुकसान न पहुँचने दे, उसी प्रकार यह काला टीका, डोरा आदि नजर के असर को अपने में ग्रहण कर लेता है और बच्चे को नुकसान नहीं पहुँचने देता।


Quotation

लोग डरते तो हैं अपने आप से और कहते हैं हम दूसरों से डरते हैं। यह एक मानसिक रोग है और शास्त्र के अज्ञान का परिणाम है।

हम न एक दूसरे को धोखा दें, न एक दूसरे का अपमान करें और न खिज या द्वेष बुद्धि से एक दूसरे को दुःख देने की नीयत रखें।

पाप का प्रायश्चित पश्चाताप है। पश्चाताप का अर्थ है पाप की पुनरावृत्ति न करना।


अचूक वशीकरण मन्त्र

अचूक वशीकरण मन्त्र

(ले. श्री विनोद शंकर जी विद्यालंकार)

एक कवि का कथन है वशीकरण इक मन्त्र है, तज दे वचन कठोर। वास्तव में प्रिय भाषण की ऐसी ही शक्ति है इससे पराये अपने हो जाते हैं। सर्वत्र मित्र ही मित्र दृष्टिगोचर होते हैं, शत्रु कोई दिखाई नही पड़ता। बड़े- बड़े कठिन कार्य मधुर भाषण के द्वारा आसानी से सिद्ध हो जाते हैं। मधुर वाणी एक दैवी वरदान है, मोहनास्त्रों में इसे शिरोमणि कह सकते हैं।

कई प्रकार के प्रिय भाषी हमें दुनियाँ में दिखाई पड़ते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जिनका हृदय तो दूषित और कठोर होता है, किन्तु लोगों को धोखा देने के लिये मीठी- मीठी बातें बनाते हैं। एक ही लोगों पर बोलहिं मधुर वचन जिमि मोरा। खांहि महा अहि हृदय कठोरा।। वाली चौपाई लागू होती है। पर ऐसी वार्ता का भेद तुरन्त ही खुल जाता है। बनावटी चीज में कुछ ऐसी अस्वाभाविकता और मिलावट होती है कि झूंठ और संदेह उसमें से टपकता है। स्वार्थ और दम्भ की गन्ध उन बातों में से उड़ती रहती है। किसी को इन चिकनी चुपड़ी बातों से कुछ समय के लिये धोखा भले ही हो जाय, पर स्थायी असर नहीं हो सकता। प्रिय भाषण की जड़ में प्रेम और सत्य होना चाहिए। इसी के बल पर वाणी में ओज आता है जिसका दूसरों पर असर पड़ता हैं। प्रेम से सद्भावना की उत्पत्ति होती है और सद्भावना में वह जादू है कि रूखा और सीधी सादी भाषा में कहे हुए शब्द भी बड़ी- बड़ी लच्छेदार बातों से अधिक मूल्यवान साबित होते हैं। मिलनसार सद्भावना का दूसरा रूप है। सद्भावना युक्त वाणी शत्रुओं के घर में भी अपना स्थान बना देती है।

यह बात अच्छी तरह समझ रखने की है कि खुशामद, चापलूसी, हाँ में हाँ मिलाना प्रिय भाषण नहीं हैं। खरी और हितकर बात जो मीठी भाषा में कही जाय वही सत्य भाषण है। जो यह कहते है कि सच्ची बात कड़वी होती है वे भ्रम में हैं। सच्चाई के चारों ओर अमृत ही अमृत भरा हुआ है फिर उसमें कड़वापन कहाँ से आ सकता है? जो कड़वा बोलता है उसके मन में दूसरों के प्रति पराया पन और क्रोध होता है। जब कोई प्रेमिका अपने प्रेमी के साथ अभिन्न हृदय होकर बातचीत करती है, तब चाहे वह प्रेमी को उसके दोष ही बता रही हो उसकी वाणी में कड़वापन नहीं हो सकता। यदि कोई शब्द कड़वा भी मुँह से निकल जाता है तो उसका कोई खराब असर नहीं होता। फिर सत्य और प्रेम से सनी हुई वाणी कडुई कैसे हो सकती है? अपने काने पिता को क्या आप काना कह कर पुकारेंगे? जिसके प्रति हमारे मन में श्रद्धा होती है उनसे दुर्वचन नहीं कहते। अपने पूज्य सम्बन्धी से जिनके प्रति हम आदर रखते हैं, कोई कड़ुवी बात कहते हुए भी मीठी भाषा का प्रयोग करते हैं। यदि हमारे विचार प्रेम युक्त हैं, तो दूसरों के साथ भी यही बात होनी चाहिए। किसी के नाम को भद्दी तरह से लेकर या तू जैसे अपमान जनक संबोधन से पुकारने में पराया पन और घमंड टपकता है। इस प्रकार के संबोधन असत्य नहीं समझे जाते पर पराया पन और घमंड क्या सत्य की शाखा है। जहाँ सत्य होगा वहाँ यह दुर्गुण नहीं पहुँच सकते। वाणी में हलकापन, ओछापन, चिड़चिड़ापन, पराया पन यह सब असत्य और अप्रेम का परिणाम है। इन दुर्गुणों युक्त वाणी में खटाई और कषाय होता है जिससे दूसरे का हृदय दुग्ध फट जाता है।

आपको कुछ सत्यनिष्ठ मृदु भाषियों के साथ रहने का कभी न कभी थोड़ा बहुत अवसर अवश्य प्राप्त हुआ होगा। उनकी बातचीत में कैसा आनन्द आता है, यही इच्छा होती है कि इन्हीं के पास बैठे रहे और बातें सुनते रहे। लोग खानपान की सुधि बुधि भूल कर उनका वचनामृत पान करते हैं। उनका एक एक शब्द हृदय के अन्तर में घुल जाता है। जिन बातों को हम हर किसी के मुँह सुनते हैं और छपे हुये कागजों में पढ़ते हैं, उन्हीं बातों को यदि कोई महापुरुष कहता है तो अपूर्व असर होता है। इसका एक ही कारण है सद्भावना। सद्भावना वाणी द्वारा जब झलकती है तब अचूक वशीकरण मन्त्र का काम करती है। सम्राट अशोक और भर्तृहरि राज सिंहासन छोड़कर भिखारी क्यों बन गये थे? गुरुओं की सद्भावना पूर्ण वाणी उनके अन्तर में इतनी गहरी उतर गई थी कि वे अन्य सुख साधनों को व्यर्थ समझने लगे थे। प्रेम में आकर्षण की अलौकिक शक्ति है। जिसके पास यह शक्ति आई उसके सब अपने हो जाते हैं। न तो कोई उससे घृणा करता है और न द्वेष। जंगलों में तपस्या करने वाले महात्माओं के पास सिंहादि हिंसक जानवर बैठे रहते हैं और उन्हें कोई हानि नहीं पहुँचाते। प्रेमियों के दरबार में जाकर गाय और शेर एक घाट पानी पीते हैं। छोटा बालक जो किसी से विशेष पहचान नहीं रखता, आँखों को देखकर मनुष्य की भावना ताड़ जाता है। जिसमें उसे प्रेम दिखाई देता है उसकी तरफ जाता है, जिस तरफ उपेक्षा या निरादर देखता है, कदम भी नहीं रखता। ठगों को देखिये वे केवल सद्भावना और प्रेम की नकल बनाते हैं और लोगों को बहकाकर अपने पंजे में फँसा लेते हैं। जब नकल में इतना असर है तो असल की तो बात ही अलग है।

मीठी बोली केवल भाषा में गति कर लेने और कूटनीति को जान लेने से नहीं आ सकती है। इनकी सहायता से आदमी हाथ पाँव फेंकता है पर थक जाता है। उसका मन डरता रहता है कि कहीं कोई ताड़ न ले, इसलिये बार- बार यह सिद्ध करने की चेष्टा करता है कि मैं सच बोल रहा हूँ। उसकी बातें और व्यवहार एक दूसरे से मेल नहीं खाते। यद्यपि वह यही समझता रहता है कि मैं सबको चकमा देकर लोगों को मूर्ख बना रहा हूँ, पर असल में वह खुद ही धोखा खाता है। असली रूप प्रकट होने में देर नहीं लगती और तब वह लोगों की निगाहों में बहुत ही गिर जाता है। कपट व्यवहार और झूठी बातों की सहायता से दूसरों पर असर डालने का जितना प्रयत्न किया जाता है यदि उतना ही या उससे भी कम श्रम करने, अपने को ईमानदार बनाने में किया जाय तो अधिक सफलता मिल सकती है। कुछ लोगों को बात का बतंगड़ बनाने की और व्यर्थ कतरनी की तरह जबान चलाते रहने की आदत होती है। यह वाणी का असंयम और दुराचार है जिससे असत्य भाषण की आदत पड़ जाती है।

सत्य भाषण, हितकर भाषण, प्रिय भाषण वाणी की सिद्धियाँ हैं, यह आत्म संयम, स्वार्थ त्याग और प्रेम भावना से आती है। जिसका सब लोगों में आत्मभाव हो गया उसने वशीकरण मन्त्र की साधना पूरी कर ली। मनुष्य नहीं पशु पक्षी और देवता भी उसके वश में हैं। पर्वत उसे रास्ता देंगे और कटीली झाड़ियाँ उस पर छाया करेंगी। व्याघ्र और सर्पादि उसके मित्र होंगे एवं उसे सर्वत्र प्रेम का सागर लहराता नजर आवेगा।


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प्राण प्रत्यावर्तन अर्थात् प्राण चेतना का आदान प्रदान । यह आदान-प्रदान किसके साथ ? इसका उत्तर यही हो सकता है-लघु का महान के साथ-आत्मा का परमात्मा के साथ-प्राण का महाप्राण के साथ ।

आत्मा वस्तुतः महान परमात्मा का एक छोटा घटक है। बीज रूप से उसमें वे समस्त संभावनाएँ और क्षमताएं विद्यमान हैं जो उसकी मूल सत्ता में हैं। वृक्ष की समस्त विशेषताएं बीज में भरी रहती हैं-छोटे से दाने के अन्दर पूरे पेड़ का स्वरूप और क्रिया-कलाप अन्तहित रहता है । अवसर पाते ही यह बीज विकासोन्मुख होता है और उसकी विभूतियाँ अव्यक्त से व्यक्त होती हैं। यों देखने में बीज की सत्ता और वृक्ष की स्वरूप सत्ता एक दूसरे से सर्वथा भिन्न स्तर की मालूम पड़ती हैं । बीज का मूल्य कानी कौड़ी और पेड़ की कीमत मुहर, अशर्फी होती है, अन्तर स्पष्ट है। पर कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षण ऐसे भी आते हैं जब बीज. के भीतर एक विचित्र हलचल उत्पन्न होती है वह अपना दाने जैसा अकिंचन स्वरूप खोता है और गल बदल कर अंकुर-फिर पौधा फिर वृक्ष बनने के लिए विचित्र प्रकार के क्रिया-कलाप अपनाता है। यह परिवर्तन का काल थोड़ा ही होता है। बीज को डालने और अंकुर का रूप धारण करने की काया-कल्प जैसी प्रक्रिया कुछ ही दिनों की होती है । इसके बाद बीज की सत्ता समाप्त हो जाती है और वृक्ष का अस्तित्व अपने ढङ्ग से काम करने लगता है । इसी हलचल भरी उथल-पुथल को प्रत्यावर्तन कह सकते हैं।

प्राण उस इकाई का नाम है जो मनुष्य के काय कलेवर के अन्तर्गत काम करती है और चेतना की किया का रूप धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करती है । जीव सत्ता चेतना युक्त है उसमें प्रेरणाओं का आलोक ज्योतिर्मय है। मस्तिष्क सहित शरीर काय कलेवर की संरचना इस प्रकार हुई है कि वह निर्धारित क्रिया कलापों को कुशलता पूर्वक सम्पन्न कर सके । दोनों के संयोग से ही जीवन यात्रा चलती है । जीव की आकांक्षा और शरीर की क्रियाशीलता का समन्वय ही जीवन की विभिन्न हलचलों के रूप में दृष्टिगोचर होता है। जीव चेतना और शरीर जड़। दोनों का सम्मिश्रण जिस स्तर पर-जिस केन्द्र विन्दु पर होता है उसे 'प्राण' कहते हैं। और भी स्पष्ट करें तो चेतना और क्रिया की सम्मिश्रित स्थिति को जड़ और चेतन के मिलन केन्द्र को प्राण तत्व कह सकते हैं। मोटे रूप से जीवधारी की भौतिक सत्ता को प्राण रूप में ही देखा जाता और समझा जा सकता है । सरल विश्लेषण की दृष्टि से जीवन तत्व का दूसरा नाम प्राण भी दिया जा सकता है। इसी सत्ता की प्रधनता देखते हुए जीवधारी को 'प्राणी' कहते हैं। प्राण जब अपना काम बन्द कर देता है तो जीव तथा शरीर की सत्ताएँ यथावत् विद्यमान रहते हुए भी मृत्यु हो जाती है और कहा जाता है प्राण निकल गये।

व्यक्ति के भीतर जो लघु एवं असीम प्राण है वह समष्टि में समाये हुए असीम महाप्राण का एक लघु अंश है जैसा कि परमात्मा का एक घटक आत्मा । विन्दु वस्तुतः सिन्धु का ही एक घटक है। बादल समुद्र से जल लाकर भूमि पर बरसाते हैं। जमीन पर गिरते ही वह इस उधेड़ बुन में लग जाते हैं कि किस प्रकार वह सिन्धु तक पहुँचे । भूमिगत तुच्छ नलिकाओं में होती हुई-नदी सरोवरों को पार करती हुई वह अन्ततः इस प्रयास में सफल हो ही जाती है कि समुद्र में अपनी सत्ता मिलाकर असीम और अनन्त स्तर के आनन्द का उपभोग करे । जीव की स्थिति भी यही है, वह ब्रह्म का एक घटक है । तुच्छता एवं ससीमता में बेचनी रहना स्वाभाविक है समस्त संभावों और असन्तोषों का समाधान असीमता की स्थिति आने पर ही मिल सकता है। इसी प्रयास में जीवधारी लगा रहता है पर सही मार्ग मिलने से भटकाव


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प्राण प्रत्यावर्तन अर्थात् प्राण चेतना का आदान प्रदान । यह आदान-प्रदान किसके साथ ? इसका उत्तर यही हो सकता है-लघु का महान के साथ-आत्मा का परमात्मा के साथप्राण का महाप्राण के साथ ।

आत्मा वस्तुतः महान परमात्मा का एक छोटा घटक है। बीज रूप से उसमें वे समस्त संभावनाएँ और क्षमताएं विद्यमान हैं जो उसकी मूल सत्ता में हैं। वृक्ष की समस्त विशेषताएं' बीज में भरी रहती हैं-छोटे से दाने के अन्दर पूरे पेड़ का स्वरूप और क्रिया-कलाप अन्तहित रहता है । अवसर पाते ही यह बीज विकासोन्मुख होता है और उसकी विभूतियाँ अव्यक्त से व्यक्त होती हैं। यों देखने में बीज की सत्ता और वृक्ष की स्वरूप सत्ता एक दूसरे से सर्वथा भिन्न स्तर की मालूम पड़ती हैं। बीज का मूल्य कानी कौड़ी और पेड़ की कीमत मुहर, अशर्फी होती है, अन्तर स्पष्ट है। पर कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षण ऐसे भी आते हैं जब बीज. के भीतर एक विचित्र हलचल उत्पन्न होती है वह अपना दाने जैसा अकिंचन स्वरूप खोता है और गल बदल कर अंकुर-फिर पौधा फिर वृक्ष बनने के लिए विचित्र प्रकार के क्रिया-कलाप अपनाता है । यह परिवर्तन का काल थोड़ा ही होता है । बीज को डालने और अंकुर का रूप धारण करने की काया-कल्प जैसी प्रक्रिया कुछ ही दिनों की होती है। इसके बाद बीज की सत्ता समाप्त हो जाती है और वृक्ष का अस्तित्व अपने ढङ्ग से काम करने लगता है । इसी हलचल भरी उथल-पुथल को प्रत्यावर्तन कह सकते हैं।

प्राण उस इकाई का नाम है जो मनुष्य के काय कलेवर के अन्तर्गत काम करती है और चेतना की किया का रूप धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करती है । जीव सत्ता चेतना युक्त है उसमें प्रेरणाओं का आलोक ज्योतिर्मय है। मस्तिष्क सहित शरीर काय कलेवर की संरचना इस प्रकार हुई है कि वह निर्धारित क्रिया कलापों को कुशलता पूर्वक सम्पन्न कर सके । दोनों के संयोग से ही जीवन यात्रा चलती है। जीव की आकांक्षा और शरीर की क्रियाशीलता का समन्वय ही जीवन की विभिन्न हलचलों के रूप में दृष्टिगोचर होता है। जीव चेतना और शरीर जड़। दोनों का सम्मिश्रण जिस स्तर पर-जिस केन्द्र विन्दु पर होता है उसे 'प्राण' कहते हैं।

और भी स्पष्ट करें तो चेतना और क्रिया की सम्मिश्रित स्थिति को जड़ और चेतन के मिलन केन्द्र को प्राण तत्व कह सकते हैं। मोटे रूप से जीवधारी की भौतिक सत्ता को प्राण रूप में ही देखा जाता और समझा जा सकता है । सरल विश्लेषण की दृष्टि से जीवन तत्व का दूसरा नाम प्राण भी दिया जा सकता है। इसी सत्ता की प्रधनता देखते हुए जीवधारी को 'प्राणी' कहते हैं। प्राण जब अपना काम बन्द कर देता है तो जीव तथा शरीर की सत्ताए यथावत् विद्यमान रहते हुए भी मृत्यु हो जाती है और कहा जाता है प्राण निकल गये।

व्यक्ति के भीतर जो लघु एवं असीम प्राण है वह समष्टि में समाये हुए असीम महाप्राण का एक लघु अंश है जैसा कि परमात्मा का एक घटक आत्मा । विन्दु वस्तुतः सिन्धु का ही एक घटक है। बादल समुद्र से जल लाकर भूमि पर बरसाते हैं। जमीन पर गिरते ही वह इस उधेड़ बुन में लग जाते हैं कि किस प्रकार वह सिन्धु तक पहुंचे । भूमिगत तुच्छ नलिकाओं में होती हुई नदी सरोवरों को पार करती हुई वह अन्ततः इस प्रयास में सफल हो ही जाती है कि समुद्र में अपनी सत्ता मिलाकर असीम और अनन्त स्तर के आनन्द का उपभोग करे। जीव की स्थिति भी यही है, वह ब्रह्म का एक घटक है। तुच्छता एवं ससीमता में बेचनी रहना स्वाभाविक है समस्त संभावों और असन्तोषों का समाधान असीमता की स्थिति आने पर ही मिल सकता है। इसी प्रयास में जीवधारी लगा रहता है पर सही मार्ग मिलने से भटकाव की स्थिति उलझन भरी भूल-भुलैयों में धुमाती है।

प्राण प्रत्यावर्तन का तात्पर्य है-काय कलेवर में काम करने वाली ससीम प्राणसत्ता का अनन्त असीम में संव्यास महाप्राण को महत्ता के साथ आदान-प्रदान । लघु का महान में समापन और महान का लघु पर आधि पत्य । महाप्राण को दूसरे शब्दों में अति मानुष्य या भतीन्द्रिय आलोक कह सकते हैं । लघु प्राण जव महाप्राण की सता में अपना समर्पण करता है तो स्वभावतः महा प्राण को उस रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए अपना कदम बढ़ाना पड़ता है। जीव जिस कदर परमेश्वर में घुलता है उसी अनुपात से ईश्वर का आलोक जीवधारी में जग मगाने लगता है । इसलिए पूर्णता की प्राप्ति और ईश्वर की उपलब्धि दोनों को एक ही तथ्य के दो पहलू माना जाता है । जितने अंश में हम अपनी स्वार्थ सङ्कीर्णता का परित्याग करते हैं ठीक उसी अनुपात में महान की महत्ता का आच्छादन हमें घेर लेता है।

आत्मा और परमात्मा के बीच का सम्बन्ध सूत्र भावनात्मक चुम्बकत्व के आधार पर जुड़ता है । दो घेतनाओं के बीच की कड़ी यही है। हम उत्कृष्टतम भावनाओं को अपने अन्तःकरण में स्थान देकर ही पर मात्मसत्ता को अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं और उसके साथ आबद्ध हो सकते हैं। आमतौर से हमारा भावना स्तर मृत न सही तो मूछि स्थिति में ही पड़ा ' रहता है। पेट और प्रजनन-वासना और तृष्णा लोभ और मोह-स्वार्थ और अहङ्कार की सड़ी कीचड़ से एक कदम आगे अपना चिन्तन और कर्तृत्व बढ़ता ही नहीं। ऐसी दशा में अन्तःकरण को पोषण मिल ही नहीं पाता और वह भूख-प्यास से संत्रस्त मृत प्रायः स्थिति में ही पड़ा रहता है। शरीर की बुद्धि की-सम्पति की सत्ता की दृष्टि से कितने ही व्यक्ति बहुत बढ़े-चढ़े एवं सफल श्रेयाधिकारी पाये जाते हैं। भावना की दृष्टि से जिनमें अभीष्ट कोमलता जीवन्त रह रही हो ऐसे कोई विरले ही दीखते हैं। यंत्रवत जीवन जीने वालों को इसकी कुछ आवश्यकता प्रतीत नहीं होती । शरीरगत. सुदृढ़ता और बुद्धिगत कुशलता से ही उन्हें सांसारिक सुविधायें मिल जाती हैं। उत्कृष्टता, आनन्द का न उन्हें अनुभव होता है और न उस तरह के वातावरण का प्रोत्साहन मिलता है ऐसी दशा में भाव भूमिका का मृत प्रायः स्थिति में पड़ा रहना स्वाभाविक है।

कहना न होगा कि परमात्मा असीम शक्ति शान्ति का केन्द्र है उसके साथ सम्बद्ध होकर हम समस्त सीमाओं को लाँघ कर असीम और समस्त अभावों को परास्त कर अनन्त वैभववान बन सकते हैं । ऋषि और देवदूत वस्तुतः इसी स्तर के होते हैं । जन्म जात रूप से वे भी अन्य सब की भौति सामान्य ही होते हैं पर भावना को विकसित करके अपनी क्षुद्रता को असीम में जोड़ देते हैं । जुड़ी हुई दो वस्तु एक ही हो जाती हैं। ईश्वर के साथ जुड़ा हुआ जीव-महाप्राण के साथ जुड़ा हुआ प्राण लगभग एक ही समतुल्य हो जाते हैं। आत्मिक विकास की दिशा में बढ़ते हुए जीव सत्ता सिद्धियों और विभूतियों की दिव्य सम्पदाओं से लद जाती है।

विवेक सङ्गत और शास्त्र सम्मत सांधना पद्धतियाँ एक ही प्रयोजन पूरा करती हैं कि अन्तःकरण की प्रसुप्त उच्च भावनाओं को जगायें। उन्हें दिशा दें और इतना आत्मबल उत्पन्न करें जिसके सहारे लोभ और मोह के बन्धनों को तोड़ते हुए मनुष्य उत्कृष्ट चिन्तन को हृदयङ्गम और आदर्श कर्तृत्व को क्रियान्वित करने के लिए आन्तरिक और वाह्य अवरोधों को तोड़ता हुआ कटिबद्ध हो सके। उपासना के अनेकों विधि विधान प्रचलित हैं पर उनका एक मात्र उद्देश्य यही है। कर्मकाण्डों, साधना उपक्रमों की बाल पोथी के साथ भावनात्मक उत्कर्ष की उचस्तरीय शिक्षा व्यवस्था की जाती है। सीड़ियों के सहारे ऊपर चढ़ते हैं केवल मुंगदरों के सहारे पहलवान बनते हैं पुस्तकों के सहारे विद्या प्राप्त करते हैं ठीक इसी प्रकार साधना विधानों के सहारे भावनात्मक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा किया जाता है। जिन साधनाओं में भावोत्कर्ष का तथ्य अछुता छोड़ दिया जाता है और शारीरिक क्रिया कलाप अथवा वस्तुओं का हेरफेर भर जुड़ा रहता है वे प्रायः बाल क्रीड़ा बन कर ही रह जाती हैं उनसे कोई महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।

प्राण का महाप्राण के साथ आदान-प्रदान सम्भव हो सके, आत्मा और परमात्म के परस्पर मिलन की अनुभूति होने लगे; यही है प्रत्यावर्तन प्रक्रिया जिसकी व्यवस्था इन दिनों शान्ति कुन्ज हरिद्वार में चल रही है और उपयुक्त साधकों को क्रमशः थोड़ी-थोड़ी संख्या में बुलाया जा रहा है । यह प्रत्यावर्तन साधना क्रम यदि सही रीति से सम्पन्न हो सके तो तत्काल उसका प्रतिफल देखा जा सकता है। जीवन का जो कुछ भी भला बुरा स्वरूप है वह मनुष्य के चिन्तन और कर्तृत्व की प्रतिक्रिया मात्र है । उत्थान और पतन की अन्तःस्थिति का प्रतिबिम्ब मात्र कहना चाहिए । विक्षोभ और उल्लास का तात्विक विवेचन किया जाय तो उन्हें चेतना के श्वासोच्छास भर कह सकते हैं और आन्तरिक स्तर में हेरफेर सम्भव हो सके तो परिस्थितियों के बदलने में एक क्षण भर की भी देर नहीं लगती। इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं कि मनुष्य की अन्तःनिष्ठा एवं आकांक्षा प्रवाह में परिवर्तन हुआ तो वाह्य जीवन का सारा ढाँचा ही उलट गया। भीतरी परिवर्तन का वाह्य जीवन पर परिवर्तन प्रभाव देखने को न मिले ऐसा हो ही नहीं सकता आज का दुखी कल सुखी बन सकता है आज का पतित कल प्रातः स्मरणीय और अभिवंदनीय बन सकता है, आज का उलझन भरा व्यक्ति कल समुन्नत और सन्तोष जनक स्थिति का आनन्द ले सकता है। यह परिवर्तन सांसा रिक घटनाक्रम के हेर फेर से नहीं हो सकता जैसा कि आमलोग समझते हैं। इसके लिए एकमात्र अन्तःचेतना के स्तर में ही उलट पुलट होनी चाहिए।

शास्त्रीय साधनायें इसी प्रयोजन को पूरा करती हैं। देखने में उनमें भी तपश्चर्या, योग साधना, एवं विधि विधानों का ही वाह्य कलेवर गठित होता है पर उनके साथ-साथ भावोत्कर्ष को ध्यान धारणा अत्यन्त सघन रूप में जुड़ी रखी जाती है और यह प्रयत्न किया जाता है कि प्रत्येक साधना विधान की लकीर पीटने के लिए नहीं शारीरिक हलचल मात्र के रूप में नहीं वरन् भाव भरी मनःस्थिति में सम्पन्न किया जाय।

प्राण प्रत्यावर्तन सत्रों में यों छ घन्टे तथा दस प्रकार के विभिन्न साधना विधान सम्पन्न करने पड़ते हैं पर उनके साथ-साथ यह तथ्य भली प्रकार हृदयङ्गम करा दिया जाता है कि क्रियाकृत्य को ही सब कुछ न मान बैठे उसके भीतर गहराई तक प्रवेश कर और जिस साधना के साथ जो भावना जुड़ी हुई है उसे आत्मसात् करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करें। प्रयल इतना गहरा होना चाहिए कि क्रिया-प्रक्रिया अनुभूति के रूप में परिणित, प्रति विम्बित होने लगे। इस प्रकार भावोत्कर्ष का प्रयोजन सरलता पूर्वक सम्पन्न होता चला जाता है । इस अन्त: स्फुरण को व्यावहारिक जीवन में किस प्रकार उतारा जा सकता और पिछले ढरें को बदलकर उपलब्ध आलोक के आधार पर किस प्रकार किस दिशा में क्या परिवर्तन किया जा सकता है तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं तो आध्यात्मिक जीवन का एक स्पष्ट ढाँचा सामने आ खड़ा होता है। कहना न होगा कि इस परिष्कृत प्रक्रिया में जब जिस क्षण भी प्राण प्रतिष्ठा होती है उसी क्षण मनुष्य की क्षुद्रता महानता में परिणत हुई दीखने लगती है। इस स्थिति में वह अपने लिए और दूसरों के लिए एक अनुपम वरदान बनकर सामने आता है। उसकी पिछली उलझन भरी जीवन चर्या और नवोदित प्रगतिशीलता की जब तुलना की जाती है, तो यह स्पष्ट अनुभव होता है कि वस्तुतः । व्यक्तित्व में भारी हेर फेर हुआ है और प्राण प्रत्यावर्तन ने एक तथ्यपूर्ण यथार्थता का रूप धारण किया है । लघु। से महान बनने के उपरान्त गुण कर्म स्वभाव में और तदनुरूप परिस्थितियों में जो अन्तर होना चाहिए वह जब प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होगा तो यह सन्देह करने का कोई कारण न रह जायगा कि साधना में सिद्धि न जाने मिलती। है या नहीं।


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प्राण प्रत्यावर्तन अर्थात् प्राण चेतना का आदानप्रदान । यह आदान-प्रदान किसके साथ ? इसका उत्तर यही हो सकता है-लघु का महान के साथ-आत्मा का परमात्मा के साथ-प्राण का महाप्राण के साथ ।

आत्मा वस्तुतः महान परमात्मा का एक छोटा घटक है। बीज रूप से उसमें वे समस्त संभावनाएं और क्षमताएं विद्यमान हैं जो उसकी मूल सत्ता में हैं। वृक्ष की समस्त विशेषताएं बीज में भरी रहती हैं-छोटे से दाने के अन्दर पूरे पेड़ का स्वरूप और क्रिया-कलाप अन्तहित रहता है । अवसर पाते ही यह बीज विकासोन्मुख होता है और उसकी विभूतियाँ अव्यक्त से व्यक्त होती हैं। यों देखने में बीज की सत्ता और वृक्ष की स्वरूप सत्ता एक दूसरे से सर्वथा भिन्न स्तर की मालूम पड़ती हैं। बीज का मूल्य कानी कौड़ी और पेड़ की कीमत मुहर, अशर्फी होती है, अन्तर स्पष्ट है। पर कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षण ऐसे भी आते हैं जब बीज. के भीतर एक विचित्र हलचल उत्पन्न होती है वह अपना दाने जैसा अकिंचन स्वरूप खोता है और गल बदल कर अंकुर-फिर पौधा फिर वृक्ष बनने के लिए विचित्र प्रकार के क्रिया-कलाप अपनाता है । यह परिवर्तन का काल थोड़ा ही होता है । बीज को डालने और अंकुर का रूप धारण करने की काया-कल्प जैसी प्रक्रिया कुछ ही दिनों की होती है । इसके बाद बीज की सत्ता समाप्त हो जाती है और वृक्ष का अस्तित्व अपने ढङ्ग से काम करने लगता है। इसी हलचल भरी उथल-पुथल को प्रत्यावर्तन कह सकते हैं ।

प्राण उस इकाई का नाम है जो मनुष्य के काय कलेवर के अन्तर्गत काम करती है और चेतना की किया का रूप धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करती है । जीव सता चेतना युक्त है उसमें प्रेरणाओं का आलोक ज्योतिर्मय है। मस्तिष्क सहित शरीर काय कलेवर की संरचना इस प्रकार हुई है कि वह निर्धारित


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