(श्री.—शास्त्री श्री कान्त, नारायणपुरीय)
मानव उठ जीवन ज्योति जगा।
तू सत्यं शिवं सुन्दरं है, तू है अविनाशी अजर अमर ।
तू अविचल, अलख निरंजन है, अमृतमय है तेरा निर्भर॥
फिर आज भटक किस ओर पड़ा, सुध भूल गया कैसे अपनी।
सुनसान मलीन अंधेरा सा, क्यों पड़ा हुआ है तेरा घर॥
अज्ञानमयी दुर्बुद्धि भगा।
मानव उठ जीवन ज्योति जगा॥
चल जगती तल पर सोच समझ, मैला मत कर लेना अंचल।
पग थाह-थाह कर चलना रे, इस जग में आगे है दल-दल॥
असिकी धारा पर चलना है, मत इधर उधर को दृष्टि उठा—
अपनी पीड़ा को पी जाना, बह जाय न नयनों में से जल॥
पहचान विराना और सगा।
मानव उठ जीवन ज्योति जगा॥
इस चोर ठगों की नगरी में मत गाँठ कटा जाना प्यारे।
ऐसे कागज के किले न रच, जो फूंक लगे विनशें सारे॥
‘बड़े भाग मानुष तन पावा’ फिर भी सूझ रही शैतानी—
सँभल, गिरा जाता है मूरख, जीती बाजी को मत हारे॥
खेकर, यह नौका पार लगा।
मानव उठ जीवन ज्योति जगा॥
मनुष्य वास्तव में अकेला है। अकेला ही आया है और अकेला ही जायगा। इच्छा करके वह अकेला बहुत हो जाता है। एकोऽतं बहुस्याम। एकान्त मय इसका जीवन है। जीवन में जो सुख दुख प्राप्त होते हैं वह अकेले को ही होते हैं कोई दूसरा उसमें भागीदार नहीं होता। जिस समय हम रोगी होते हैं किसी पीड़ा से व्यथित होते हैं क्या उस समय का कष्ट कोई बाँट लेता है? कोई प्रेमी बिछुड़ गया है, किसी के द्वारा सताये जा रहे हैं, अपनी वस्तुएं नष्ट हो गई हैं, परिस्थितियों में उलझ गये हैं उस समय जो घोर मानसिक वेदना होती है उसका अनुभव अपने को ही करना पड़ता है दूसरे लोगों की सहानुभूति और कभी-2 सहायता भी मिल जाती है पर वह बाह्य उपचार मात्र है। किसी भौतिक अभाव का कष्ट हुआ और बाहर की मदद मिल गई तब तो दूसरी बात है अन्यथा उन दैवी विपत्तियों में जिनमें मनुष्य का कुछ वश नहीं चलता, मनुष्य को एकाँत कष्ट ही भोगना पड़ता है। सुख भी एकान्त ही मिलता है। मैं मिठाई खा रहा हूँ, मैं ऐश्वर्य भोग रहा हूँ, मैं सम्पत्तिशाली हूँ, इसमें तुम्हारी क्या समझ? मैं विद्वान हूँ इसका फल तुम्हें किस प्रकार मिल सकता है? परस्पर सहयोग और दान, त्याग दूसरी बात है। इससे धर्म के अनुसार किसी को भिक्षा दी जा सकती है किन्तु वास्तविक सुख उसी को होता है जिसके पास साधन एकत्रित हैं।
मनुष्य का सारा धर्म कर्म एकान्त मय है। उसे अपनी परिस्थितियों पर स्वयं विचार करना पड़ता है अपने लाभ हानि का निर्णय स्वयं करना पड़ता है अपने उत्थान पतन के साधन स्वयं उपलब्ध करने पड़ते हैं। इस संघर्षमय दुनिया में जो अपने पाँवों पर खड़ा होकर अपने बलबूते पर चलता है वह कुछ चल लेता है बढ़ जाता है और अपना स्थान प्राप्त करता है। किन्तु जो दूसरों के कन्धे पर अवलंबित है, दूसरों की सहायता पर आश्रित है, वह भिक्षुक की तरह कुछ प्राप्त करलें तो सही अन्यथा निर्जीव पुतले या बुद्धि रहित कीड़े मकोड़ों की तरह ज्यों त्यों करके अपनी साँसें पूरी करते हैं, मनुष्य के वास्तविक सुख-दुख, हानि, लाभ, उन्नति पतन, बन्ध, मोक्ष का जहाँ तक संबंध है वह सब एकान्त के साथ जुड़ा हुआ है। खेलने की वस्तुओं के साथ मोह बन्धन में बंधकर वह खुद खिलौना बन गया है। वस्त्रों और औजारों पर मोहित होकर उसने अपने की वही समझ लिया है परन्तु वास्तव में वह ऐसा है नहीं। रुपया, पैसा, जायदाद, स्त्री, कुटुम्ब आदि हमें अपने दिखाई देते हैं पर वास्तव में हैं नहीं। यह सब चीजें शरीर की सुख सामग्री हैं, शरीर छूटते ही इनसे सारा संबंध क्षण मात्र में छूट जाता है फिर कोई किसी का नहीं रहता। हर एक वस्तु का अपना स्थान है और अपने कार्यक्रम के अनुसार व्यावहारित होती रहती है। वह न तो किसी को ग्रहण करती है और न किसी को छोड़ती है। भ्रमवश मनुष्य अपना मान कर उनमें तन्मय होता है। धातुओं के टुकड़े किसी आदमी के पेट में नहीं धँस सकते और न शरीर में चिपट सकते हैं। वे एक के हाथ में से दूसरे के हाथ में घूमते हैं और अन्त में घिस गल कर इसी भूमि में मिल जाते हैं जिससे उत्पन्न हुए थे। इसी प्रकार ईंट, पत्थर लोहा, लकड़ी, पशु, कुटुम्बी, मित्र आदि की बात है। सब अपनी निश्चित धुरी पर घूम रहे हैं, अपने कार्यक्रमों को पूरा कर रहे हैं। उनके जीवन का कुछ भाग हमारे जीवन के साथ संबंधित हो जाता है तो हम समझते हैं कि वे हमारे और हम उनके हो गये पर वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है। सूर्य की धूप और चन्द्रमा की चाँदनी में बैठकर उन्हें हम अपना बताते हैं। चार खेतों को जोत कर किसान उन पर अपना आधिपत्य जमाता है। दार्शनिक विज्ञानी इन मूर्खों से कहता है। बच्चों तुम भूल रहे हो यह सम्पूर्ण वस्तुएं एक महान लाभ पर अवलंबित हैं और अपना जीवन क्रम पूरा कर रही है। तुमसे उनका केवल उतना ही संबंध है जितना कि उनसे संबंध रखते हो। असल में वे सब स्वतंत्र हैं। और तुम स्वतंत्र। हर चीज अकेली है इसलिये “तुम भी अकेले, बिल्कुल अकेले हो।”
पाठक विश्वास करें, कुछ भ्रम हो तो उसे उठा दें, इन पंक्तियों में मैं उन सब तर्कों का समाधान नहीं कर सकता। परन्तु मैं विश्वास दिलाता हूँ कि तुम्हें सच्ची बात बता रहा हूँ। तुम अकेले हो, बिल्कुल अकेले। न तो कोई तुम्हारा है और न तुम किसी के। हाँ, लौकिक धर्म के अनुसार साँसारिक और कर्तव्य कर्म हैं जो तुम्हें शरीर रखने पर पालने पड़ेंगे उनसे छुटकारा नहीं हो सकता। कर्म किये बिना शरीर नहीं रह सकता यह उसका धर्म है। परन्तु है, इक्के के घोड़े! वह सब वस्तुएं तेरी नहीं है, जिन्हें तू सारे दिन ढोता है तू अकेला है। वे सवारियाँ तेरी कोई नहीं हैं जिन्हें अपने ऊपर बिठाकर तू सरपट तेजी से दौड़ रहा था।
उपरोक्त पंक्तियों से कोई भ्रम में पड़े। संन्यास या निवृत्त का वह पाठ हम किसी को नहीं पढ़ा रहे हैं जिसके अनुसार लोग कपड़े फाड़कर भिखारी बन जाते हैं और कायरों की भांति लड़ाई से डरकर जंगलों में अपनी जान बचाना चाहते हैं। कर्म योग किसी से कम नहीं है। हम अपने कर्तव्यों का ठीक तरह से पालन करते हुए पक्के संन्यासी बने रहे सकते हैं। यहाँ तो हमारा अभिप्राय यह है कि तुम अपनी वास्तविक स्थिति का अनुभव करते रहो। यदि इसे पकड़े रहोगे तो तुम इतने नहीं पाओगे और एक दिन सही रास्ते पर जा पहुँचोगे।
अपने साधकों को हमारी शिक्षा है कि वे नित्य कुछ दिन एकान्त सेवन करें। इसके लिये यह जरूरी नहीं है कि वे किसी जंगल, नदी या पर्वत पर ही जावें। अपने आसपास ही कोई प्रशान्त स्थित चुन लो। कुछ भी सुविधा न हो तो अपने कमरे के सब किवाड़ बन्द करे अकेले बैठो। यह भी न हो सके तो सारे गुल से रहित स्थान में बैठकर आँखें बन्द करली या चारपाई पर लेटकर हलके कपड़े से अपने को ढक लो। और शान्त चित्त होकर मन ही मन जप करो—मैं अकेला हूँ’—मैं अकेला हूँ। अपने मन को यह अच्छी तरह अनुभव करने दो कि मैं एक स्वतंत्र, बन्धु और अविनाशी सत्ता हूँ। मेरा कोई नहीं और न में किसी का हूँ। आधे घण्टे तक अपना सारा ध्यान इसी क्रिया पर एकत्रित करो। अपने को बिलकुल अकेला अनुभव करो। अभ्यास के कुछ दिनों बाद एकान्त में ऐसी भावना करो । ‘मैं मर गया हूँ।’ मेरा शरीर और दूसरी संपूर्ण वस्तुएं मुझसे दूर पड़ी हुई हैं।
उपरोक्त छोटे से साधन को हमारे प्राणप्रिय अनुयायी आज से ही आरम्भ करें। वे यह न पूछे कि इससे क्या लाभ होगा? मैं आज बता भी नहीं रहा हूँ कि इससे किस प्रकार क्या हो जायगा। किन्तु शपथ पूर्वक कहता हूँ कि जो सच्चे आत्मज्ञान की ओर बढ़ जायगा, साँसारिक चोर, पाप, दुष्ट दुष्कर्म, बुरी आदतें, नीच वासनायें, और नरक की ओर घसीट ले जाने वाली कुटिलताओं से उसे छुटकारा मिल जायगा। हम पापमयी पूतनाओं को छोड़ने के लिए साधक अनेक प्रयत्न करते हैं पर वे छाया की भाँति पीछे पीछे दौड़ती रहती है पीछा नहीं छोड़तीं। यह साधन उस झूठे ममत्व को ही छुड़ा देगा जिसकी सहचरी में पाप वृत्तियां होती हैं।
अपने को अकेला अनुभव करो। नित्य अभ्यास करो। शरीर को निश्चेष्ट पड़ा रहने दो। मन को पूरी योग्यता, तर्क, बुद्धि के साथ यह समझा दो कि मैं अकेला हूँ। केवल बुद्धिमान सोच लेना ही पर्याप्त न होगा किन्तु यह भावना गहरी-गहरी-गहरी मन के ऊपर अंकित हो जानी चाहिये। अभ्यास इतना बढ़ जाना चाहिए कि जब अपने बारे में सोचो, तो सोचो कि ‘मैं अकेला हूँ।’ हर घड़ी अपने को संसार की समस्त वस्तुओं से—कमल पत्र ऊपर उठा हुआ समझो।
मैं कहता हूँ कि यह साधन तुम्हें मनुष्य से देवता बना देने में पूरी तरह समर्थ है।
जो चीजें खुद नष्ट होने वाली हों उनमें मन लगाकर तुम सुख नहीं पा सकते। वास्तविक सुख उसमें मिल सकता है जो स्थायी, नित्य और अविनाशी है।
जिन लोगों ने नेकी और सचाई का मार्ग छोड़ दिया है, उन्हें अपनी रक्षा करने की चिन्ता करनी चाहिए किन्तु जो सदा भलाई में रत रहते हैं उन्हें अपनी रक्षा की कोई जरूरत नहीं है।
(एक भक्त)
इस समय आसुरी संपदा बढ़ रही है। भगवान की प्रतिज्ञा है कि वे पाप का नाश करते हैं। मनुष्य आसुरी संपदा के बल से रावण जैसी शक्ति प्राप्त करना चाहता है। पर वह नहीं जानता कि ईश्वर क्या चाहता है।
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ईश्वर नहीं चाहता कि आदमी शैतानी ताकत के बल पर असुरों जैसा अभिमानी बने। उस महाशक्ति की इच्छा है दुनिया में सत्य, प्रेम और पवित्रता का साम्राज्य रहे। बीसवीं शताब्दी का वैज्ञानिक मनुष्य आसुरी संपदा के अभिमान में डूब गया है फलतः उसके कदम नाश की ओर उठते हुए चले जा रहे हैं।
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इन दिनों पाप का विकास और पुण्य का ह्रास हुआ है। अनुमान है कि पाप का परिणाम तीन चौथाई और पुण्य एक चौथाई चल रहा है। इसीलिए ईश्वरीय प्रेरणा से युद्ध, रोग, प्राकृतिक कोप आदि चल रहे हैं। हो सकता है कि पाप के अनुमान से ही जनसंहार होकर रहे।
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जिन्हें अपनी रक्षा की चिन्ता है, जो इस भयंकर विपत्ति में से अपना त्राण चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि नास्तिकता को त्यागकर आस्तिक बनें और आसुरी जीवन को दैवी जीवन में परिणित करें।
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आसुरी अहंकार समस्त दोषों की जड़ है। जिन्हें दोषों से बचने की इच्छा है, जो दारुण दुखों से त्राण पाने के लिए उत्सुक हैं उन्हें चाहिये कि मिथ्या अहंकार को त्यागकर परमात्मा की शरण लें।
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जो ईश्वर की शरण को प्राप्त हुआ है उसका हृदय स्वच्छ काँच के फानूस के भीतर जलने वाली बत्ती के समान है उसके भीतर और बाहर चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश है।
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ईश्वर भक्ति में लीन होने के बाद मनुष्य साँसारिक वस्तुओं को भूल जाता है । उसे सभी चीजें ईश्वरमय दिखाई देने लगती हैं। वह विषयों की ओर से गूँगा, बहरा और अन्धा हो जाता है। ईश्वर के अतिरिक्त उससे न कुछ कहा जाता है, न सुना जाता है और न देखा जाता है।
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कैसे जाना जाय कि ईश्वर मुझसे प्रसन्न है परमात्मा की जिस पर विशेष कृपा होती है उसे सूर्य जैसी उदारता, पृथ्वी जैसी सहनशीलता और नदी जैसी दानशीलता मिलती है।
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जब तक मनुष्य अपने को कर्ता मानता है तब तक उसे अपने साज संभाल की बड़ी चिन्ता करनी पड़ती है जब वह अपने को प्रभु के ऊपर छोड़ देता है तब वह निश्चिन्त हो जाता है। क्योंकि वह जानता है कि सर्व त्यागी भक्त का योगक्षेम भगवान के जिम्मे है।
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भगवद् भक्तों की निन्दा मत करो । प्रभु अपनी निन्दा सहन कर सकते हैं किन्तु भक्त की नहीं ।
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ईश्वर प्राप्ति की इच्छा रखने वाले साधक सद्गुरु के सम्मुख उपस्थित हों। उनकी कृपा से ही नेत्रों को वह ज्ञानार्जन प्राप्त होता है जिसके द्वारा दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है और ईश्वर का स्वरूप दृष्टिगोचर होता है।
(महात्मा गाँधी)
अपरिग्रह का सम्बन्ध अस्तेय से है। जो चीज मूल में चोरी की नहीं है, पर अनावश्यक है, उसका संग्रह करने से वह चोरी की चीज के समान हो जाती है। परिग्रह मतलब संचय या इकठ्ठा करना है। सत्य-शोधक अहिंसक परिग्रह नहीं कर सकता। परमात्मा परिग्रह नहीं करता, वह अपने लिए ‘आवश्यक’ वस्तु रोज-रोज पैदा करता है। इसलिए यदि हम उस पर विश्वास रक्खें तो जानेंगे कि वह हमें हमारी जरूरत की चीजें रोज-रोज देता है और देगा। औलिया भक्तों का यही अनुभव है। प्रति दिन की आवश्यकता के अनुसार ही प्रति दिन पैदा करने के ईश्वरीय नियम को हम जानते नहीं, अथवा जानते हुए भी पालते नहीं, इससे जगत् में विषमता और तज्जन्य दुःखों का अनुभव करते हैं। धनवान् के घर, उसके लिए अनावश्यक अनेक चीजें भरी रहती हैं, मारी-मारी फिरती हैं, बिगड़ जाती हैं। जब कि उन्हीं चीजों के अभाव में करोड़ों दर-दर भटकते हैं, भूखों मरते हैं और जाड़े से ठिठुरते हैं। यदि सब अपनी आवश्यकतानुसार ही संग्रह करें तो किसी को तंगी न हो, और सब सन्तोष से रहें। आज तो दोनों तंगी का अनुभव करते है। करोड़पति अरबपति होने की कोशिश करता है, तो भी उसे सन्तोष नहीं रहता। कंगाल करोड़पति बनना चाहता है। कंगाल को पेटभर मिल जाने से ही सन्तोष होता नहीं पाया जाता। परन्तु कंगाल को पेटभर पाने का हक है और समाज का धर्म है कि वह उसे उतना प्राप्त करा दे। अतः उसके और अपने सन्तोष के खातिर पहले धनाढ्य को पहल करनी चाहिए। वह अपना अत्यन्त परिग्रह छोड़े तो कंगाल को पेट भर सहज ही मिलने लगे, और दोनों पक्ष सन्तोष का सबक सीखें । आदर्श आत्यन्तिक अपरिग्रह तो उसी का होता है, जो मन ओर कर्म से दिगम्बर हो। अर्थात् वह पक्षी की तरह ग्रहहीन अन्नहीन और वस्त्रहीन रहकर विचरण करे। अन्न को उसे रोज आवश्यकता होगी, और भगवान् रोज उसे देंगे। पर इस अवधूत स्थिति को तो विरले ही पा सकते हैं। हम तो समाज कोटि के सत्याग्रही ठहरे, जिज्ञासु ठहरे। हम आदर्श को ध्यान में रखकर नित्य अपने परिग्रह की जाँच करते रहें और जैसे बने वैसे उसे घटाते रहें। सच्ची संस्कृति—सुधार और सभ्यता का लक्षण परिग्रह की वृद्धि नहीं, बल्कि विचार और इच्छापूर्वक उसकी कमी है। जैसे-जैसे परिग्रह कम करते हैं, वैसे-वैसे सच्चा सुख और सच्चा सन्तोष बढ़ता है। सेवा-क्षमता बढ़ती है। इस दृष्टि से विचार करते और तदनुसार बर्तते हुए हम देखेंगे कि हम आश्रम में बहुतेरा ऐसा संग्रह करते हैं, जिसकी आवश्यकता सिद्ध नहीं कर सकते। फलतः ऐसे अनावश्यक परिग्रह से हम पड़ौसी को चोरी करने के लिए ललचाते हैं। पर अभ्यास द्वारा आदमी अपनी आवश्यकताओं को कम कर सकता है। और जैसे-जैसे कम करता जाता है वैसे-वैसे वह सुखी और सब तरह आरोग्यवान् बनता है। केवल सत्य की—आत्मा की दृष्टि से विचारें तो शरीर भी परिग्रह है। भोगेच्छा के कारण हमने शरीर का आवरण खड़ा किया है, और उसे टिकाए रखते हैं। भोगेच्छा यदि अत्यंत क्षीण हो जाय तो शरीर की आवश्यकता दूर हो, अर्थात् मनुष्य को नया शरीर धारण करने की जरूरत न रहे। आत्मा सर्वव्यापक है; वह शरीर रूपी पिंजड़े में क्यों बन्द रहे? इस पिंजड़े को कायम रखने के लिए अनर्थ क्यों करे। दूसरों की हत्या क्यों करे? इस विचार श्रेणी द्वारा हम आत्यन्तिक त्याग को पहुँचते हैं। और जब तक शरीर है, तब तक उसका उपयोग सेवा के लिए करना सीखते हैं। और सो भी इस हद तक कि फिर सेवा ही उसकी सच्ची खुराक बन जाती है। तब मनुष्य खाना, पीना, सोना, बैठना, जागना, सब कुछ सेवा के लिए ही करता है। इससे पैदा होने वाला सुख सच्चा सुख है और इस तरह आवरण करने वाला मनुष्य अन्त में सत्य के दर्शन करता है। इस दृष्टि से हम सब, अपने परिग्रह का विचार कर लें। यहाँ यह याद रहे कि वस्तु की भाँति ही विचार का भी परिग्रह न होना चाहिए। जो मनुष्य अपने दिमाग में निरर्थक ज्ञान ठूँसे रखता है, वह परिग्रही है। ‘जो विचार हमें ईश्वर से विमुख रखते हैं, या ईश्वर को ओर नहीं ले जाते, वे सब परिग्रह में शुमार होते हैं और इसलिये त्याज्य हैं। तेरहवें अध्याय में भगवान् ने ज्ञान की ऐसी ही व्याख्या की है; इस सिलसिले में उसका विचार कर लेना चाहिए। अमानिज आदि को गिनाकर भगवान् ने कहा है कि इनके अतिरिक्त जो कुछ है, वह सब अज्ञान है। यदि यह बदन सच्चा हो, और यह सच तो है ही, तो आज जो बहुतेरा ज्ञान के नाम से संग्रह करते हैं, वह अज्ञान ही है, और इसलिये उससे लाभ के बदले हानि होती है। दिमाग फिर जाता है और अन्त में खाली हो जाता है। असन्तोष बढ़ता है और अनर्थों की वृद्धि होती है। इस पर से कोई उद्यमहीनता को फलित न करे। हमारा प्रत्येक क्षण प्रवृतिमय होना चाहिए। परन्तु वह प्रवृत्ति सात्विक हो, सत्य की ओर ले जाने वाली हो। जिसने सेवा धर्म को स्वीकार किया है, वह एक क्षण भी कर्महीन नहीं रह सकता। यहाँ तो सारासार का विवेक सीखना है। सेवा परायण को यह विवेक सहज प्राप्त है।
माता जिस प्रकार अपने स्नेह सर्वस्व पुत्र को अपना जीवन खर्च करके पालती है। उसी प्रकार हम समस्त प्राणियों के प्रति असीम प्रेम रखें।
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दुर्जेय तृष्णा पर जो काबू कर लेता है उसके शोक इस प्रकार झड़ जाते हैं जैसे कमल के पत्ते पर से जल की बूँदें।
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जो मनुष्य सदा अपने को धिक्कारता रहता है और अपने स्वभाव की निन्दा करता है वह अपने आत्मगौरव को भी खो बैठता है।
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जीत उनकी है जो नम्र हैं, जो झुकते हैं। जीत उनकी है जो सेवक बनते हैं और विरोधी को क्षमा कर देते हैं। जीत उनकी है जो शान्त रहते हैं और दूसरों का भला चाहते हैं।
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हार उनकी है जो अभिमानी हैं, जो मालिक बनना चाहते हैं, जो माफ नहीं करते, जो बदला चाहते हैं और जो दूसरों का बुरा चाहते हैं।
ईश्वर की सच्ची पूजा
(पं. शिवदत्त शास्त्री, जैतापुर)
यो माँ पश्यति सर्वत्र सर्वंच मयि पश्यति।
तस्याऽहं न प्रणस्यामि सच में न प्रणश्यति॥ 30॥
सर्व भूत स्थितं यो माँ भजत्येक मास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स यागी मयि वर्तते॥ 31॥
-गीता अध्याय 6
भगवान कहते हैं कि पुरुष संपूर्ण भूतों में मुझ आत्म रूप ईश्वर को ही व्यापक देखता है और संपूर्ण भूतों प्राणियों को मेरे भीतर देखता है। उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता। 30
जो पुरुष एकीभाव में स्थित हुआ संपूर्ण भूतों में आत्मा रूप से स्थित मुझ ईश्वर को भजता है वह योगी सब प्रकार से बर्तता हुआ भी मेरे में ही बर्तता है ॥ 31॥
उपरोक्त श्लोकों में ईश्वर का स्वरूप और उसके पूजन की सच्ची विधि बड़ी सुन्दरता से बता दी गई है। इसमें ईश्वर का स्थान भी स्पष्ट कर दिया गया है। ईश्वर कहाँ है? यह जानने के लिए लोग चिंतित रहते हैं। नदी, वन, पर्वत, तीर्थ, क्षेत्र, मंदिर, मस्जिद आदि स्थानों में ईश्वर को प्राप्त करने के लिये लोग कठिन परिश्रम करते हैं और उन्हीं स्थानों को ईश्वर का निवास गृह या प्रिय भूमि मानकर भटकते हैं। समय और शक्ति व्यय करके भी जब वे खाली हाथ लौटते हैं और वापिस आने पर भी ईश्वर दर्शन जैसी कोई अनुभूति उन्हें नहीं मिलती तो उन्हें बड़ी निराशा होती है। असल में वे स्थान ईश्वर के निवास स्थान हैं नहीं। क्योंकि वह एकदेशी नहीं है। जो सर्वत्र व्याप्त है वह एक स्थान पर कैसे बंधा रहा। फिर सर्वव्यापी वस्तुएं भी किसी उचित साधन द्वारा ही जानी जा सकती। अग्नि तत्व समस्त विश्व में व्याप्त है पर यदि उसे आप अपने निकट करना चाहते हैं तो उन वस्तुओं को उपयोग में लाना पड़ेगा जो उसे शीघ्रता से प्रकट कर सकती हैं। दियासलाई में लगे हुए मसाले अग्नि तत्व से अधिक निकट हैं इसलिये उनके घिसते ही आग प्रकट हो जाती है। चीड़ की तीलियाँ जलने के अधिक क्षमता रखती हैं और फास्फोरस गंधक आदि के घिसने से जो चिनगारी प्रकट हुई थी उसे तुरन्त ग्रहण कर लेती हैं। किन्तु यदि कोई व्यक्ति दो ईंटों को घिसकर अग्नि प्रकट करना चाहे तो क्या वह सफल हो सकेगा?
ईश्वर सर्व व्यापी ‘अणोरणींयम्’ अणुओं से अणु बहुत सूक्ष्म तथा इतना गंभीर है कि ब्रह्मादि देवता भी नेति नेति कहते हैं। उसमें थाह ले सकने में कोई भी अब तक समर्थ नहीं हुआ। उस सच्चिदानन्द घन परमात्मा का निकट समीप स्थान यदि कोई हो सकता है तो अपना अन्तर ही हो सकता है। साँसारिक पदार्थों में अंतर से भी अधिक चेतना और सूक्ष्म पदार्थ और कोई नहीं है। ईंट पत्थरों में ईश्वर की कल्पना करके उसमें अपनी भावना का प्रतिबिंब उपजाना जितना कठिन है उतना आत्मा में ईश्वर की झाँकी कर लेना मुश्किल नहीं है। इसलिए हमारे लिये सब से निकट और सबसे सुगम ईश्वर का स्थान अपने ही अंदर है। भगवान इसी स्थान पर पूजा करने का आदेश देते हैं।
अब प्रश्न होता है कि वह कैसा है? किस रूप से उसकी पूजा की जाय? इसका समाधान भी उपरोक्त श्लोकों में कर दिया गया है। वह सर्वज्ञ है। सब उसी के रूप हैं। आत्मरूप में सब में व्यापक हैं। संपूर्ण भूत उसी के भीतर हैं। यही उसका स्वरूप है जो कुछ है परमात्मा का है। सब उसी से ओतप्रोत हैं। संसार में जो भी द्रव्य अदृश्य पदार्थ हैं, सब ईश्वर का ही स्वरूप हैं। “ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किंचित् जगत्योजगत्।” जो कुछ भी इस संसार में है वह सब ईश्वरमय है। बस, यही ईश्वर का रूप है। इस रूप को देख कर आत्मा संतुष्ट हो जाती है और उसकी प्यास बुझ जाती है। जो आनन्द उसे काशी कावा में नहीं पाया था वह इस झाँकी में आता है। इस प्रकार ईश्वर का दर्शन करता हुआ पथिक कहता है—
लाली मेरे लाल की, जित देखो तित लाल।
लाली देखने को चली, भी हो गई लाल॥
ईश्वर को सर्वत्र देखता हुआ स्थित प्रज्ञ खुद अलग खड़ा नहीं रह सकता। लाल की लाली को देखकर वह अपने को भी लाल बना देता है। चला था ईश्वर का दर्शन करने, ईश्वर की पूजा करके हो गया वह खुद ईश्वर। इस नमक के मील में जो घुसा वह गल गया और वह अपनी हस्ती खो बैठा। दूध से गले मिलने के लिये जो पानी गया वह फिर लौटकर नहीं आया । जब तक पानी का दूध से मिलना नहीं हुआ तभी तक वह दूध दूध चिल्लाता है जब वह उससे मिलने लगा तो फिर दर्शन की इच्छा, पूजा का स्थान, भजन का विधान जानना नहीं चाहता, सर्वत्र ईश्वर है। संसार के संपूर्ण पदार्थ ईश्वर स्वरूप हैं। यह कितनी उच्च भावना है कितना बड़ा तत्व दर्शन है। ऐसा तत्वदर्शी साक्षात् ईश्वर है। अपने अणु अणु में से एक ही आवाज सुनता है ‘सोऽहं’ वह मैं हूँ। आत्मा और परमात्मा में उसे कुछ भी भेद नहीं मालूम पड़ता। अपने चारों ओर वह ईश्वर ही ईश्वर देखता है।
ऐसा भक्त ढोंगी नहीं हो सकता। ढोंग दिखायेगा किसे? ईश्वर को ?? ऐसा भक्त दुराचारी नहीं हो सकता। हिंसा, दुराचार, असत्य, द्वेष, छल, कपट किससे करेगा? ईश्वर से?? ऐसा भक्त कामनायें नहीं कर सकता। उसे अपने आत्मा के लिए अब किस चीज की इच्छा है? क्या वह भलाई के लड्डू खाने और ‘नन्ही जान, की ठुमरी सुनने की दरख्वास्त ईश्वर के दरबार में पेश करेगा? ऐसा भक्त वासनाओं का गुलाम नहीं रह सकता, ऐसा भक्त काम क्रोधादि विकारों द्वारा शासित नहीं किया जा सकता, ऐसा भक्त दुख शोकादि द्वन्द्वों का अनुभव करता हुआ नहीं पाया जा सकता। गीताकार ने स्थिति प्रज्ञ और समाधिस्थ के जो लक्षण बताये हैं वे स्वयमेव उसमें आ जाते हैं। जीवन की मूलधारा का प्रवाह बदलते ही उसके मार्ग के दृश्य भी बदल जाते हैं। स्वार्थ और अज्ञान के पथ में जो नीच स्वभावों के दृश्य मिलते हैं वह उस उच्च पथ पर कदम बढ़ाते ही पीछे रह जाते हैं। न तो किसी पर क्रोध आता है और न अपना मतलब गाँठने की घात लगानी पड़ती है। समदर्शी भक्त ईश्वर तुल्य हो जाता है और तब उसे संसार के ठीक प्रकार चलाने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ग्रहण करना पड़ता है। भारत के वायसराय वही कार्य करते हैं जो संसार की इच्छा और आज्ञा होती है। भक्त ईश्वर का वाय-राय है उसकी तमाम शक्ति अपने सम्राट की इच्छा के लिये समर्पित हो जाती है।
ईश्वर को सर्वत्र देखना ही उसकी सच्ची पूजा है। ऐसा पुजारी संसार में चाहे जो भी कार्य कर रहा हो असल में ईश्वर की ही पूजा कर रहा होता है। उसका खाना, सोना, चलना, बैठना भी ईश्वर पूजा ही है। ऐसे भक्त से दूर रहना और उससे न मिलना ईश्वर की शक्ति से बाहर की बात है। वह जब स्वयं ईश्वर रूप है तो उसे भुला कौन सकेगा? वह प्रतिज्ञा बुद्ध है—’तस्याहं डडडडड ‘ उससे मैं अलग नहीं होता।
(आचार्य टी. एन. अप्पा, बंगलोर)
गत अंक में यह बताने का प्रयत्न किया गया था कि संसार के कोने कोने में मजहबों के जो जाल बिछे हुए हैं वह वास्तव में धर्म नहीं हैं। मजहबों को धर्म के नाम से पुकारना भूल है। यद्यपि उनकी आधार शिला धर्म के ही किसी टुकड़े पर रखी हुई होती है। परन्तु वे धर्म स्वरूप नहीं हैं। मजहबों की आलोचना द्वारा धर्म की बुराई करना नहीं है। चाहे कोई नास्तिक से नास्तिक हो, प्रकृतिवादी हो, ईश्वर को न मानता हो, पूजा पाठ न करता हो, धर्म-आडंबरों को कोसता हो फिर भी वह अधार्मिक नहीं हो सकता। मनुष्य धार्मिक है। वह धर्म का पालन करता है। उसकी स्वाभाविक रुचि धर्म की ओर होती है। समाज की सारी व्यवस्था धर्म के ऊपर टिकी हुई है उसके भंग होने से तत्क्षण उपद्रव मंच हो जाता है। धर्म द्रोही को कठोर राजदंड देने की व्यवस्था भी सर्वत्र प्रचलित है।
धर्म से हमारा अभिप्राय सदाचार, शुद्ध आचरण और उच्च निस्वार्थ एवं प्रेममयी याचनाओं से है। खुद कष्ट सहकर भी दूसरों को सुख देना हमारी दृष्टि में धर्म है। दूसरे शब्दों में किसी के अधिकारों में बाधा न पहुँचाना धर्म है। जिनके मन में दूसरों की भलाई और सहानुभूति के विचार आते रहते हैं वह पूरा और पक्का धार्मिक है। भले ही वह तिलक न लगाता है। भले ही उसने दाढ़ी न बढ़ाई जो शिक्षा ग्रहण करने वाले और सबमें भलाई तलाश करने वालों के लिए हर एक मजहब में अच्छाई मिल सकती है। बुरी बात को भी अच्छी नजर से देखा जाय तो उससे अच्छाई ही प्रतीत होगी। परन्तु न्याय, दृष्टि और परीक्षण के तौर से देखने पर उनमें कुछ ऐसे दोष दिखाई देते हैं जो मनुष्य से अलग करते हैं। कोई दबी जबान से कहता है तो कोई कड़ुवे शब्दों में कहते सब मजहब यही हैं कि दूर से मजहब वालों को नीच समझो, घृणा करो और उन्हें सताओ। कम से कम उनके प्रचारक तो अवश्य ही ऐसा कहते हैं।
मजहबों के नाम पर अब तक कितना रक्तपात संसार में हुआ है। कितने जुल्म और अत्याचार हुए हैं वह किसी से छिपा हुआ नहीं है। सर गवर्नर फोर्ट का कथन है कि ‘मजहबों ने मनुष्य को सिखाया है कि वे दूसरों से घृणा करें, विरोधियों पर जुल्म और अपने परिपंथी का पक्षपात करने से ईश्वर खुश होता है और स्वर्ग की नियामतें दे देता है। इस अंध विश्वास पर यकीन करने से दुनिया में फूट फैली और लोग एक दूसरे का सिर तोड़ने की हैवानी आदत पर लौट आये। इस प्रकार मजहब मनुष्य को आगे नहीं बढ़ा सके वरन् पीछे लौटा लाये।” अमेरिका के एक स्वतन्त्र विचारक पादरी एम॰ रेनाल्ड कहते हैं कि—’मजहबों की यह आवाज कि हमें ग्रहण कर लोगे तो तुम्हारे सारे गुनाह माफ कर दिये जायेंगे, बहुत खतरनाक है। इसने अफीम का सा नशा पैदा किया है और लोगों को समझने सोचने की शक्ति को छीन लिया है। वह एक प्रकार का झूठा लालच है जिसे दिखाकर आदमी को पथभ्रष्ट करने की कोशिश की जाती है।”
सब मजहबों में ऐसा विश्वास है कि अमुक धार्मिक उपादान को पूरा करने से इच्छित फल, सुख, स्वर्ग या मुक्ति मिल जायगी। हिन्दू लोग गंगा स्नान करने, तीर्थ यात्रा करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाने और बहुत सा पुण्य मिलने की बात पर विश्वास करते हैं। क्रूस को हाथ लेकर बपस्मा पढ़ता हुआ ईसाई विश्वास करता है कि मेरे पापों की गठरी प्रभु ईश के सिर पर गिर पड़ी। इसी प्रकार की बातें बौद्ध, जैन, इस्लाम आदि मजहबों में हैं। इन बातों की दो ही प्रतिक्रिया होती हैं या तो इस नशीले प्रचार से मोहित होकर अर्द्ध-निद्रित अवस्था में मनुष्य गिर पड़ता है और तर्क बुद्धि को दूर रखकर विश्वास कर लेता है या फिर इसके विरुद्ध बगावत करने को खड़ा हो जाता है। कुछ चालाक आदमी अपना स्वार्थ साधन करने के लिए एक तीसरी ही तरकीब निकाल लेते हैं वे भीतर ही भीतर तो मजहबी धर्म के घोर अविश्वासी होते हैं किन्तु बाहर से पक्के धार्मिक होने का ढोंग बनाकर अपना मतलब गाँठते हैं। ऐसे धूर्त धर्माचार्य आपको चाहे जहाँ पर्याप्त संख्या में मिल सकते हैं जो खुद तो बुरे से बुरे काम करते हैं पर दूसरों को उपदेश देते हैं। यदि वह धार्मिक विधान इतने ही उपयोगी हैं तो वे स्वयं उनका पूरी तरह पालन क्यों नहीं करते?
दार्शनिक आस्टन का मत है कि “इस शताब्दी में मजहबों का खोखलापन दुनिया के सामने अच्छी तरह प्रकट हो गया है। अब हर आदमी इस बात पर अविश्वास करने लगा है कि किसी मजहब को ग्रहण करने मात्र से कोई आध्यात्मिक लाभ हो सकता है। मजहबी बुराइयों को लोग समझने लगे हैं विश्व बंधुत्व की भावना फैलाये बिना संसार में शान्ति नहीं हो सकती और विश्व प्रेम का प्रसार मजहबी गुलामी से छुये बिना नहीं हो सकता।” प्रसिद्ध तत्वेत्ता वेल्स कहते हैं कि निकट भविष्य में एक महान धार्मिक क्रान्ति होने वाली है जिसमें लोग उन बहकाने वालों से लड़ेंगे जिन्होंने धर्म के नाम पर अपना मतलब गाँठने और जनता को गुमराह करने का पेशा अख़्तियार कर रखा है। सराये अब एक ऐसे मजहब की तलाश कर रहा है जिसके नीचे बिना किसी भेदभाव के लोग आपस में भाई की तरह मिलजुल सकें और आध्यात्मिक शान्ति उपलब्ध कर सकें।
प्रो. चार्ल्स इजयट का विश्वास है कि ज्यों ज्यों ज्ञान का प्रकाश बढ़ता जायगा त्यों त्यों अन्ध विश्वास उठता जायेगा। संसार का आगामी धर्म देवताओं के सामने नाक रगड़ने, पत्थरों के पूजने में शक्ति व्यर्थ करने, पशुओं की कुरबानी करने, थोड़े से पैसे खर्च करके स्वर्ग खरीदने का नहीं होगा। दुनिया एक ऐसे धर्म के नीचे संगठित होगी जिसमें सदाचार और त्याग तपस्या को प्रथम स्थान दिया जायगा और देश भक्त, त्यागी, पवित्र सिद्धान्तों के प्रचारक सत्य मार्ग के शिक्षक ही धर्माचारी का पद ग्रहण कर सकेंगे। धार्मिक व्यक्ति चंद मिनट पूजा पत्री करके ही अपना कर्तव्य समाप्त नहीं कर चुकेंगे वरन् प्रेम और सत्य का प्रचार करना जीवन का एक मात्र लक्ष्य बनायेंगे। सच्चा धर्मानुष्ठान वह समझा जायेगा जिसमें अधिक से अधिक निस्वार्थ भावना के साथ लोक कल्याण के लिए उच्च से उच्च त्याग किया गया होगा।
ऐसा सार्वभौम धर्म शास्त्रों में मौजूद है। भगवान मनु ने आज से हजारों वर्ष पूर्व उसकी आवश्यकता अनुभव की थी और दश लक्षणों के साथ उसे दुनिया के सामने प्रकट किया था तब उसे इस कान से सुनकर उस कान निकाल दिया गया था, पर अब दुनिया मजहबों के जाल से सहस्रों वर्षों तड़पने के बाद अपनी भूल समझी है। आज वह फिर उसी आदि धर्म की महत्ता को समझने और उसी की छाया में सुख शान्ति प्राप्त करने के लिए आतुर हो रही है।
जो शुद्ध पवित्र और निर्दोष पुरुष को दोष लगाता है उस मूर्ख को उसका पाप लौटकर लगता है। जैसे वायु के रुख फेंकी हुई धूलि अपने ही ऊपर आ पड़ती है।
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जिस प्रकार बिना पतवार की नाव लहरों पर इधर-उधर उछला करती है उसी प्रकार ध्येय रहित तथा कर्तव्य से उदासीन मनुष्य अनेक प्रलोभनों से टकराता रहता है।
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पाप से घृणा करो। असंयम से द्वेष करो। दुष्ट आचरणों से बैर करो। नास्तिकता का विनाश करो। जिनमें से दोष हो उनसे अलग रहो। परन्तु आत्मा की दृष्टि से उनसे घृणा न करो।
(पं. शिवनारायण शर्मा हैडमास्टर वि. घ. व. पाठशाला आगरा)
तुम ब्राह्मण हो, अर्थात् परोपकारी, जितेन्द्रिय, विलास शून्य विद्वान् हो किन्तु यदि अकेले ब्राह्मण रहे और अन्य लोग यदि शूद्र धर्मी अर्थात् निरक्षर, अधार्मिक रह गये तो शूद्रों के संसर्ग से तुम्हारा ब्राह्मणत्व भी क्या निर्बाध रह सकता है? अहंभाव के विस्तार बिना किसी तरह बचाव नहीं। तर्क स्थल में स्वीकार किया कि—शास्त्र में शूद्र को वेद पढ़ाने की आज्ञा नहीं है। ठीक तो है, जो शूद्र निरक्षर है वह वेद पढ़ेगा किस तरह? जो ‘क’ ‘ख’ नहीं जानता वह ऋषि-हृदय-प्रसूत उच्चभाव पर किस तरह अधिकार करेगा? किन्तु शूद्र को भी तो उन्नत करना होगा। संसार में जो चोर डाकू मिथ्यावादी मूर्ख हैं उन्हें क्या सदा उसी अवस्था में बनाये रहोगे? नहीं, उनको भी उन्नति करने की चेष्टा करनी होगी। जब शुद्र ने लिखना पढ़ना आरम्भ कर दिया, आहार विहारादि में सात्विक भाव रखना आरम्भ कर दिया तब फिर शूद्रत्व कहाँ रहा? फिर उसे वेद तत्व क्यों न सिखाइयेगा? अति नीच और अति महत् व्यक्ति के जीवन के परिणाम का आदर्श एक ही ब्रह्मदर्शन या मोक्ष प्राप्ति है उससे कोई वञ्चित न होगा। उच्चाधिकारियों को नीचे के अधिकारियों को उन्नत पथ पर ले जाना होगा। अन्यथा उनको सदा ही अज्ञान अन्धकार में रखकर मोक्ष से वञ्चित करना होगा। तुम समाज में जिनको ब्राह्मण कहते हो, अच्छी तरह निगाह फैलाकर देखोगे तो उनमें अनेक शूद्र मिलेंगे और जिनको शूद्र कहोगे उनमें भी अनेक ब्राह्मण पावेंगे। तुम ब्राह्मण नामधारी शूद्रों को तो वेद धर्म सिखाना चाहते हो, यह तो घोर अविद्या जनित कार्य है। ब्राह्मण शूद्र दोनों ही पारिभाषिक शब्द मात्र हैं, नहीं तो इन दोनों बातों में और कुछ नहीं है अमुक गुण रहने से ब्राह्मण होता है और अमुक गुणों के रहने से शूद्र कहा जाता है इतनी ही भेद है। तुम केवल शब्दालंकार पर झगड़ा करते हो वस्तु की जड़ में नहीं जाते। शब्द वस्तु का परिचायक है। एक लोहे के टुकड़े को तुम कितने ही जोर से सोना क्यों न कहो तो क्या वह कभी सोना हो सकता है? और यथार्थ सोने को यदि तुम राजा के हुक्म से भी लोहा कहकर उठाना चाहो तो भी उसका सुवर्णत्व किसी तरह न जायगा। यथार्थ ब्राह्मण को तुम शूद्र कहो चाहे कुछ कहो परन्तु वह रहेगा ब्राह्मण ही, और यथार्थ शूद्र को तुम कितना ही ब्राह्मण कहकर प्रणिपात करो परन्तु उसका शूद्रत्व तो जाज्वल्यमान रहेगा ही परन्तु यथार्थ ब्राह्मण कभी यथार्थ शूद्र से घृणा न करें वे उनको शनैः-शनैः उच्च प्रदेश में ले जावें और उनके अधिकारानुसार उन्हें शिक्षा दें। शिक्षा देने से क्रमशः अधिकार बढ़ते बढ़ते वे भी तुम्हारी व्यवस्था प्राप्त कर सकेंगे। आर्य-शास्त्र के अधिकार तत्व का यही तात्पर्य है। शूद्र को वेद न पढ़ावे यह आदेश अधिकार के तत्वज्ञ अध्यापक के लिए बिलकुल अनावश्यक है। शूद्र प्रथम तो वेद पढ़ना ही न चाहेगा। वह वेद को समझे क्या? यदि तुम समझाने की चेष्टा भी करो तो न समझेगा। यदि कहो कि शिशु को युद्ध में मत जाने दो, यह भी ठीक वैसा ही आदेश होगा जैसा कि “शूद्र को वेद मत पढ़ाओ” किन्तु शिशु क्या फिर बड़ा न होगा? वह जब युद्ध के उपयुक्त हो जाय तब उसे युद्ध में क्यों न जाने दिया जाय? क्या उसे फिर सदा शिशु ही बनाये रहोगे इस कारण उसे युद्ध में न जाने दोगे, ऐसा आदर्श अनावश्यक है। संसार में जो उत्कृष्ट हो क्या उसी की वृद्धि करना आवश्यक है और जो अपकृष्ट है उसका ह्रास करना आवश्यक है? नहीं, क्रमशः निम्न उपाधिस्थ ‘मैं को उत्तम करना होगा और उपाधिस्थ हम को निरुपाधिक परब्रह्म का मैं करना होगा। यह मैं वा अहंभाव का संकोच ही जगत के मंगल और अमंगल का कारण है।
संसार में जो कुछ झगड़ा फिसाद देखेंगे, उसका कारण अनुसंधान करने पर देखेंगे कि उसके मूल में अहंभाव का संकोच है क्या पारिवारिक, क्या राजनैतिक क्या सामाजिक सब प्रकार की अशान्ति का कारण अहंभाव का संकोच है। राम श्याम दो सहोदर भाई हैं, किन्तु राम श्याम का सुख नहीं देखना चाहता। और श्याम राम का मुँह नहीं देखना चाहता। व्यवहार देखने से कोई नहीं कह सकेगा कि वे दोनों भाई हैं कि न्यौला और सर्प का सा व्यवहार है। परस्पर आपदविपद में रक्षा करना तो दूर रहा देवासुर की भाँति आपस की संहार चेष्टा ही दिन गत अन्तःकरण में जागरुक है। एक के सुख से दूसरा दुःखित और उसके दुख से सुखी है। राम बड़ा है पैतृक सम्पत्ति के कुछ अंश से श्याम को वञ्चित करना ही विवाद का मूल है। राम ने श्याम को ‘मैं’ के बाहर करके अहंभाव को कुछ संकुचित कर डाला और सर्वस्व आप ही हजम कर लिया है। श्याम भी अपने ‘मैं’ को छोड़ और कोई ‘मैं’ नहीं जानता। राम के ‘मैं’ का सब धन हुआ, जिसका मैं वञ्चित रहा, अतएव उसका संकीर्ण ‘मैं’ अत्यन्त क्षुब्ध हुआ प्रत्येक दशा के लोगों में ऐसे राम-श्याम देखे जाते हैं। जो समाज में गन्यमान्य, धनी विद्वान धार्मिक कहे जाते हैं, जो महाशय देश में महात्मा नाम से विख्यात हैं। जीवनी लेखक जिनका चरित समाज के अनुन्नत व्यक्तियों के आदर्श स्वरूप करना चाहते हैं, उनमें भी राम श्याम हैं। पक्षान्तर में निरक्षर अज्ञानी, निर्धन नगण्य व्यक्तियों में भी राम श्याम मिलेंगे। जमींदार राम श्याम शायद जमींदारी लेकर एक दूसरे के नाश के लिए तैयार है और किसान राम खेत की हाथरस प्रेड़केडडडडडड लिये लाठी चलाते हैं। समाज का कृत्रिम उच्च आदमी परित्याग कर जमींदार राम-श्याम भी किसानों से कुछ कम नहीं है। वृक्ष के ऊपर जैसे दो चीलें एक टुकड़ा माँस के लिये विवाद करती हैं, राम श्याम क्या उनसे अच्छे हैं? मनुष्य राम, श्याम का केवल आकार मनुष्यों का सा है और चील राम, श्याम का आकार पक्षी का है। दोनों में सिर्फ आकार का अंतर है, प्रकृति गत भेद कहाँ? सुन्दर वन में बाघ बलवान है हिंसक है वह अपना उदर पूर्ण करने के लिये सैंकड़ों दुर्बल प्राणियों का संहार करता—ज्ञान चक्षु खोल कर देखिये कि आपके समाज में भी सैकड़ों बाघ हैं। सुन्दरवन के बाघ कभी कभी पहली झपट में ही शिकार के प्राणी को खा लेते हैं, किन्तु आपके शिकारी भाई रूपी बाघ धीरे-धीरे शिकार का विनाश साधन कर अधिकतर निर्दयता का परिचय देते हैं। भेद यह है कि उनकी आकृति एक नहीं परन्तु प्रकृति में कुछ भेद नहीं। फिर यदि सूक्ष्म दृष्टि रहते देख सकोगे कि व्याध प्रकृति मनुष्य ने यथार्थ में क्या बुरा आकार धारण किया है। किन्तु यह सूक्ष्म दृष्टि साधना योगविज्ञान सापेक्ष है। अस्तु शृंगाल कुक्कुट सिंह व्याघ्र वागवास आदि इतर प्राणियों की तरह हम भी अहंभाव में व्यस्त हैं। अपनी अपनी इन्द्रिय लालसा पूरी होना यथेष्ट समझते हैं। अब कहिये, यदि अन्य प्राणियों की भाँति मनुष्य भी एक टुकड़ा माँस ही जीवन का चरम उद्देश्य मानलें तो फिर मनुष्य कहाँ रहे? वस्तुतः दिव्य नेत्रों द्वारा देखने से समाज जिनको मनुष्य कहता है उनमें बहुत थोड़े मनुष्य मिलेंगे और जिनको आप कुत्ते और सियार समझकर दुर दुराते हैं, जिनकी छाया पड़ जाने पर भी स्नान करके पवित्र होते हैं शायद वन में भी अनेक यथार्थ मनुष्य पावेंगे। यह जमाने की खूबी है कि जो वास्तव में मनुष्य है उन्हें प्रायः पद दलित किया जाता है और कुत्ते गीदड़ों के पैरों पर लोटते हैं। सर्प को रज्जु जानकर निर्भय हैं और रज्जु को सर्प समझकर डर के मारे काँपते हैं। अविद्या जनित अज्ञान ने तुम्हारा हृदय आच्छन्न कर लिया है। ज्ञान रहित होकर आप वस्तु को वस्तु और अवस्तु को वस्तु समझ रहे हैं। इन्द्रिय चरितार्थता ही जीवन का प्रधान कार्य समझ लिया है और जिनमें अहंबोध का संकोच अधिक है उनको ही आप प्रधान मानते हैं। यह अहंभाव का संकोच ही संसार की अशान्ति का मूल है। इसी संकोच के कारण मनुष्य पशु रूप में परिणत हो रहे हैं। अहंभाव का संकोच छोड़ दीजिये, आप देवता बनिये और दूसरों को देवता बनाने की चेष्टा करो, तो सर्वत्र ही शान्ति दीख पड़ेगा। तात्पर्य यह है कि अहंभाव के प्रसार बिना शान्ति कभी पास नहीं रह सकती।
किसी समाज का कोई मनुष्य दूसरों को पृथक न समझे तो जिस तरह वह समाज देव समाज में परिणत हो जाता है उसी तरह कोई देश दूसरे देश को अपने से पृथक न समझे तो समस्त पृथ्वी पर स्वर्ग राज्य हो जाय। अहंभाव के संकोच के कारण ही एक देश दूसरे देश के साथ विपरीत व्यवहार करता है। उपयुक्त भारतवासी जो हमारे देश में उच्च पद पर नियुक्त नहीं हुए हैं वह भी इंग्लैंड के अहंभाव के संकोच के कारण हैं। मद्रास नेशनल कांग्रेस के प्रेसीडेन्ट देव साहब ने कहा था कि ‘सारी पृथ्वी हमारा स्वदेश है और सब मनुष्य हमारे स्वदेश वासी हैं।’
अयंनिज परोवेत्ति गणना लघु चेतसाम्।
उदार चरितानाँ तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
(हितोपदेश)
यदि इंग्लैंड के अधिकाँश लोगों में अहंभाव का ऐसा प्रसार रहता तो भारत की यह दुर्दशा न होती। व्यक्ति विशेष की भाँति देश विदेश को भी अहंभाव के संकोच के कारण परिणाम में विषमय फल अवश्य ही भोगना पड़ेगा। विधाता के राज्य में अहंभाव का संकोच कर कोई भी कुशलपूर्वक नहीं रह सकता, यह यथार्थ सत्य है। अहंभाव के संकोच के कारण ही इस संसार में सर्वत्र अशान्ति है, इसके हजारों उदाहरण बुद्धिमान पाठक स्वयं संग्रह कर सकते हैं। अधिक क्या कहा जाय कि ऐसे दो चार नर केसरी हर जगह मिल सकेंगे और नाम न लेने पर भी वे अपने आप रामायण की उस चौपाई का अर्थ विचारने लगेंगे—”दीन्ह मोहि सिख नीक गुसाईं। लागत अगम अपति कदराइ॥ जिनके रहीं भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥”
निःस्वार्थ भाव से सबके साथ प्रेम करो अपने प्रेम बल से दूसरों के चरित्र को सुधारो उन्हें ऊँचा उठाओ। तुम्हारे आचरण आदर्श होते ही तुम अपने स्वार्थहीन प्रेम के बल से गिरे हुए व्यक्ति को ऊँचा उठा सकोगे। याद रखो, शुद्ध आचरण युक्त निःस्वार्थ प्रेम में बड़ा बल होता है।
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जो ब्रह्मचारी नहीं रहें, जिन्होंने कुछ कमाया नहीं जिन्होंने कुछ सीखा नहीं, वे अपने अन्तिम क्षणों में टूटे हुए मनुष्य के समान अपने अतीत को याद कर कर के आँसू बहाते रहते हैं।
(श्री. रामनिवास शर्मा, अम्बाह)
हम चाहते हैं कि अपने जीवन को महान् बना सकें। महापुरुषों के जीवन चरित्र पढ़कर सब का जी ललचाता है और भीतर एक इच्छा उठती है कि हमें भी ऐसे ही महत्व प्राप्त हुए होते। क्योंकि जीवन का सच्चा लाभ आराम की जिन्दगी बिताने में नहीं, बल्कि महान बनने में है। उन्नतिशील महापुरुषों के जीवन पर बारीक दृष्टि डालने से उन्हें उठाने वाला एक ही मन्त्र मालूम पड़ता है। वह है—”सादा जीवन, उच्च विचार।”
संसार के पूजनीय महापुरुषों ने इन्हीं दो सिद्धान्तों को अपने जीवन में पूरी तरह उतारा होता है। इसी ध्रुव तारे के सहारे वे निश्चित कार्य से सफलता की ओर चले गए होते हैं। लोग विभिन्न प्रकार के ऐसे नियमोपनियम तलाशते रहते हैं जिनके सहारे वे उच्च बन सकें उन्हें चाहिए कि सारा जीवन उच्च विचार के महामन्त्र को अपनावें।
संसार के प्रमुख दार्शनिकों का मत है कि जीव की स्वाभाविक इच्छा और अभिलाषा सात्विक उन्नति की है। भौतिक सुविधाओं को लोग इकट्ठा करते हैं, इन्द्रियों के विषय भोगते हैं पर बारीक दृष्टि से देखने पर पता चलता है कि यह सब कार्य भी आत्मिक तृप्ति के लिए किए होते हैं। यह दूसरी बात है कि धुँधली दृष्टि होने के कारण लोग नकल की ही असल समझ बैठें। आपने बड़े परिश्रम से धन इकट्ठा किया है किन्तु विवाह में उसे बड़ी उदारता के साथ खर्च कर देते हैं। उस दिन एक पैसे के लिए प्राण दिए जाते थे आज आप अशर्फियां क्यों लूटा रहे हैं? इसलिए कि आज आप धन संचित रखने की अपेक्षा उसे खर्च कर डालने में अधिक सुख का अनुभव करते हैं डाकू जिस धन को जान हथेली पर रख कर लाया था, उसे मदिरा पीने में इस तरह क्या उड़ा रहा है? इसलिए कि वह मदिरा पीने के आनन्द को धन जोड़ने की अपेक्षा अधिक महत्व देता है? बीमारी में, धर्म कार्यों में, या अन्य बातों में काफी पैसा खर्च हो जाता है किन्तु वह कुछ भी रंज नहीं करता। यही पैसा यदि चोरी में चला गया होता तो उसे बड़ा दुख होता। इन उदाहरणों में आप देखते हैं कि जिनका अमूल्य जीवन धन संचय की चाह में खर्च हुआ जा रहा है वे अपने उस जीवन रस को भी एक समय बड़ी लापरवाही के साथ उड़ा देते हैं। ऐसा इस लिए होता है कि उन खर्चीले कामों में आदमी अधिक आनन्द का अनुभव करता है। स्पष्ट है कि कंजूस से कंजूस भी पैसों से प्रेम नहीं करता। उनके संचय होने वाली आत्म तृप्ति का मजा लेता है। इससे अधिक आत्म तृप्ति दूसरे काम में हुई तो उसे छोड़कर उसे कर लेता है। एक कंजूस ने तीस वर्ष का कड़ा परिश्रम करके चार हजार रुपये कमाये थे। कुल रुपये खर्च करके शादी कर लेने का प्रस्ताव उसके सम्मुख आया तो तमाम रुपया उसने दे डाला और विवाह कर लिया। जो आदमी रोटी के साथ दाल भी नहीं खाता था कपड़े न पहनकर नंगे बदन घूमता था वह अपनी उस प्राण प्रिय संपत्ति को तुरंत ही त्यागने के लिए तैयार हो गया। इसका अर्थ यह है कि धन संचय उद्देश्य नहीं है, आत्मतृप्ति का भूला भटका साधन है। यही बात इन्द्रिय भोगों के बारे में है। अच्छे भोग के लिए खराब भोग को त्याग देते हैं। पूरी छोड़कर मिठाई खाने, फूल छोड़कर इत्र सूँघने, रास रसिया छोड़कर सरकस थियेटर देखने के लिए हम तैयार हो जाते हैं। नाच देखने में मस्त हैं किन्तु कोई आकर ये कहे कि चलो अभी तुम्हें बहुत सा धन मिलेगा तो क्षणभर में नाच से विरक्ति हो जायगी और धन प्राप्ति के लिए चल देंगे। तात्पर्य यह है कि भौतिक वस्तुओं के संग्रह अथवा इन्द्रियों के भोगों में मनुष्य लिप्त नहीं है। आत्मतृप्ति की आराधना के लिए ही उसके सारे प्रयत्न होते हैं।
यह आत्म तृप्ति बाहरी, स्थूल वस्तुओं में नहीं है। परन्तु भ्रमवश हम उन्हीं में समझते हैं। मिठाई खाने में यदि तृप्ति है, स्त्री संभोग में यदि तृप्ति है तो वह बीमार हो जाने पर क्यों बुरी लगती है? वास्तव में आत्मा दैवी गुणों से सम्पन्न है और उसे अपने अनुकूल वस्तुएं प्राप्त होने पर ही वास्तविक शान्ति और तृप्ति उपलब्ध होती है। यह अनुकूल विचार, अनुकूल वस्तुएं अनुकूल ज्ञान वह है जो उस आध्यात्मिक जगत में प्राप्त होता है। उसकी प्राप्ति उच्च विचारों द्वारा ही हो सकती है।
कहावत है कि जैसे विचार करेंगे वैसे हो जायेंगे। दुनिया में विचार बल मुख्य माना गया है। संकल्प से सिद्ध होती है। आप उच्च कार्य करना चाहते हैं, उच्च बनना चाहते हैं, उच्च पद को प्राप्त करना चाहते हैं तो उच्च विचार कीजिए। हर समय ऊँचे दृष्टि कोण से वस्तुओं को देखिए और उनका स्वरूप निर्णय कीजिए। हीन विचार आदमी को नीच बना देते हैं उसके कार्य भी नीच ही होने लगते हैं। जो आदमी स्वार्थ की भावना से विचार करता है उसे तुच्छ वस्तुएँ नजर आवेंगी और उन्हीं में उलझा रहेगा। जिसे सुदूर स्थान को देखना है, नक्षत्रों का ज्ञान करना है उसे एक अच्छी दूरबीन जरूर रखनी पड़ेगी इसके बिना सफलता मिलना मुश्किल है। महान पुरुष बनने के लिए जिन गुणों की, जिस योग्यता की, जिस चेतना की आवश्यकता है वह उच्च विचारों के बिना नहीं आ सकती है। मनुष्य शरीर के हाड़माँस की कोई कीमत नहीं है। करोड़ों मनुष्य खाते खेलते और मरते रहते हैं। महत्व केवल विचारों का है। सुन्दर विचारों के ग्रहण करने के लिए आप महात्माओं के पास जंगलों में पहुँचते हैं। तत्व ज्ञानियों के पास साँसारिक वस्तुएं नहीं होती विचारों का अमृतपान करने के लिए ही दुनिया उन्हें घेरे रहती है। नेताओं के पास विचार ही तो होते हैं जिनके कारण असंख्य जनता उन पर अपना सर्वस्व चढ़ा देती है। विचार ही आदमी को उच्च बनाते हैं और वे ही वास्तविक उद्देश्य तक ले पहुँचते हैं।
इसलिए आपके दृष्टिकोण ऊंचा रहना चाहिए। हर बात पर निस्वार्थ, निष्पक्ष और उदारतापूर्वक विचार कीजिए। इसी ध्रुव तारे के आधार पर आप महान पुरुषों के महान पथ पर चले जायेंगे। परिस्थितिओं के कारण कुछ लोग ख्याति के विशेष अवसर पाते हैं, आपको ऐसे अवसर भले ही प्राप्त न हों पर वह गुणों को अपने अन्दर भर लेंगे जो मनुष्य को देवता बनाते हैं और उसे विकास के सर्वोच्च स्थान तक पहुँचा देते हैं।
उच्च विचार सादा जीवन में ही रह सकते हैं। तड़क भड़क वाले बनावटी जीवन में इतनी कृत्रिमताएं और अस्वाभाविकताएं घुस पड़ती हैं कि आदमी के लिए इस आडम्बर को संभाल रखना कठिन हो जाता है। बनावटी जीवन असत्य है। ऐसा असत्य जिसमें आदमी खुद भ्रम में पड़ जाते हैं और दूसरों को भ्रम में डाल देते हैं। उस भ्रम की रक्षा भी उन्हें करनी पड़ती है। इस सच का एक ऐसा विषय बन जाता है जो मस्तिष्क को बड़ी अशाँति में डाल देता है। दूसरे बनावटी जीवन के कारण झूठे अभिमान तथा ऐसे स्वभाव की उत्पत्ति होती है जिसके कारण बुरी बाते की ओर झुक पड़ने का भय रहता है। एक दार्शनिक का कथन है कि जितना ही तड़क भड़क को ग्रहण किया जा रहा है दुनिया उतनी ही लक्ष्य से दूर और दुखों के समीप पहुँच रही है।
सादा जीवन अल्प व्यय-साध्य है। उसके चलाने के लिए किसी विशेष कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता। सादगी में सौंदर्य होता है और वह शरीर की नहीं मन को भी सुन्दर बना देता है। सुन्दर शरीर और शान्त मन ही उच्च विचार कर सकता है। इसलिए इन दोनों का आपस में घना संबंध है। यदि आप महान बनना चाहते हैं, जीवन का फल प्राप्त करना चाहते हैं तो “सादा जीवन उच्च विचार” के सिद्धान्त को अपनाइये।
चाहे कितना ही ऊंचा आसन हो चाहे कितना ही आदर का पल हो सोने से लदा गधा वहाँ से भी उठकर चल देगा।
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यह संसार मृत्यु द्वारा आहुत और निष्प्राण किया जा रहा है और बुढ़ापे द्वारा आवृत किया जा रहा है। दिन रात आयु कम हो रही है। अभागे आदमी! इन सब बातों को जान करके भी तू क्यों नहीं जानता?
(लेखक—ठाकुर रामसुमेरसिंह, बी. ए., अमेठी)
गीता एक अपूर्व रत्नाकर है, इर रत्नाकर में गोता लगाकर बहुत से गोताखोर अनेक प्रकार के बहुमूल्य रत्नों को निकालते हैं और निकाल रहे हैं। शंकर, रामानुज, मध्व, निम्बार्क, वल्लभ आदि आचार्यगण इस रत्नाकर में गोता लगाने वाले बड़े-बड़े गोताखोर हुए हैं। उन्हें भिन्न-भिन्न रूप के अनेक सिद्धान्त रत्नों को गीता रूपी रत्नाकर से बड़े परिश्रम पूर्वक निकाला है। वे सब बहुमूल्य रत्न आज भी भारत के बाजार में बिकते हैं और मुमुक्षु, लोग उन्हें अपनी अपनी रुचि के अनुसार खरीदते हैं।
गीता एक अपूर्व रत्न है, जिसे जगत् के एक अपूर्व कारीगर ने ऐसे विचित्र ढंग से तराशा है कि उसके प्रत्येक अवयव से एक ‘अखण्ड-ज्योति’ जगमगा रही है। इस ज्योति ने सूर्य की ज्योति को भी मात कर दिया है, क्योंकि सूर्य की ज्योति तो इस संसार को ही प्रकाशित करती है परन्तु यह ज्योति ब्रह्मलोक तक प्रकाश करती है, जिसके सहारे से मुमुक्षा लोग अहरहः ब्रह्मलोक गमन करते हैं।
गीता त्रिवेणी संगम है। इसमें ज्ञानगंगा, कर्म यमुना और उपासना सरस्वती की विमल धारायें आकर एकत्रित हुई हैं। भला, इसमें स्नान करने वालों को गर्भवास कैसे हो? जो इस अष्टादश तरंगयुक्त त्रिवेणी में नित्य स्नान करता है वह ‘ज्ञान सिद्धि सलभते ततोयाति परमं पदम्’ के अनुसार जीवितावस्था में ही ज्ञानसिद्धि को प्राप्ति होकर जीवन मुक्ति हो परम पद को प्राप्त कर लेता है।
गीता एक पवित्र एवं निर्मल जज-प्रपात (झरना) है इस झरने की उत्पत्ति-स्थान असीम, गम्भीर और स्थिर उपनिषद् रूपी एक झील है। साधारण झरने के जल से इस झरने के जल में विशेषता यह है कि जो इसका जल एक बार पी लेता है उसकी पिपासा सदैव के लिए शान्त हो जाती है।
गीता एक ‘अखण्ड-ज्योति’ बाला प्रज्वलित प्रदीप है, यह प्रदीप भारत-मन्दिर में प्रज्वलित हुआ है, किन्तु प्रकाश समस्त जगत में करता है।
गीता एक परिष्कृत, स्वच्छ, बहुमूल्य दर्पण है। मनुष्यमात्र इस दर्पण में अपने यथार्थ स्वरूप को देख तथा समझ सकता है।
गीता मोक्ष-मंदिर की एक अपूर्व कुँजी है। कलियुग के लोगों को साधन रहित जानकर भगवान कृष्ण चन्द्र जी ने इस कुँजी को द्वापर-युग के शेष भाग में पहले पहल अर्जुन को दिया था। इसके द्वारा अर्जुन तो स्वयं मोक्ष मन्दिर से पहुँच ही गए उनके पीछे भी अनेक मुमुक्षु उसी कुँजी को लेकर इस भवसागर से पार उतर गए।
गीता संजीवनी बूटी है। जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में मोह के वशीभूत होकर कृष्ण सखा अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ होकर मृत प्रायः अवस्था को प्राप्त हुए थे, जब भगवान कृष्णचन्द्र ने गीता रूपी संजीवनी बूटी के अमृतमय रस को पिलाकर अर्जुन को अपने कर्तव्य का प्रबोध कराया था।
गीता अमृत तुल्य एवं पुष्टि कारक मधुर गोरस है, यह गोरस उपनिषद् रूपी कामधेनु के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चार स्तनों से निकाला गया है। दूध निकालने वाले गोपाल नन्दन भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी हैं। वत्स (बछड़ा) कृष्ण सखा अर्जुन है। अर्जुन ने इसका थोड़ा सा ही रस पिया था और कृत कृत्य हो गए। वह अविकृत गोरस अभी भी पृथ्वी पर विद्यमान है और सुधी समुदाय अहर्निश उसी रस को पीकर मस्त हो रहे हैं।
गीता एक मधुर, मनोहर, सुदृढ़ एवं भव्य अट्टालिका है। अग्रहायण शुष्क एकादशी के शुभ मुहूर्त के अवसर पर धर्म क्षेत्र रूपी कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि में विश्वनियन्ता भगवान श्री कृष्ण चन्द्र जी ने पुरुष श्रेष्ठ अर्जुन के द्वारा इसकी नींव डलवाई और स्वयं उत्तम चातुर्य के साथ इसकी अपूर्व रचना की। इस अट्टालिका की तीन मंजिल हैं। नीचे की मंजिल का नाम कर्म खण्ड बीच की मंजिल का नाम उपासना खंड और सर्वोपरि मंजिल का नाम ज्ञानखण्ड है। ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा, शम, दम आदि अनेक विचित्र खम्भे इसमें लगे हुए हैं, जिनका दृश्य अपूर्व ही है। इस अट्टालिका के बहुत से शिखर भी हों, जिनमें रचयिता के आदेश लिखे गए हैं, उनमें से एक ऐसा है-
सर्व धर्मान्परित्यज्य माम्मेंक शरणं व्रज।
अहंत्वाँ सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
इस अट्टालिका में इसके रचयिता स्वयं निवास करते हैं और यहाँ रहकर तीनों लोकों का पालन करते हैं।
गीता श्रयो हं तिष्ठामि, गीता में चोत्तमम् ग्रहम्।
गीता ज्ञानमुपाश्रित्य त्रींल्लोकान् पालयाम्यहम् ॥
गीता कल्पतरु है। इसका मूल वेद रूपी सरस दृढ़ भूमि में स्थित है। इसके कर्म, उपासना और ज्ञान काण्ड नामक तीन काण्ड इसमें यज्ञ, दान, तप, योग आदि अनेक शाखा प्रशाखाएं हैं और शान्ति, दान्ति उपरति आदि अनेक पत्र हैं। यह वृक्ष सदैव चार ही फल देता है जिनका नाम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष है, और चार प्रकार का भक्त आर्त जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी उन चारों फलों का सेवन करते हैं।
गीता ब्रह्म विद्या है- “गीता से परमा विद्या ब्रह्म रूपान संशयः” यह ब्रह्मविद्या भगवान् पद्मनाभ के श्री मुख-कमल से निकली है, अतएव पादनिः सृत सवित्र गंगा से भी अधिक पवित्र है इसका दूसरा नाम ज्ञान गंगा भी है। इसमें जो सतत गोता लगाता रहता है उसकी सम्पूर्ण अविद्या नष्ट हो जाती है और वह दिव्य स्वरूप को प्राप्त होकर अक्षय, अमर बन जाता है।
गीता भगवान् का हृदय है। गीता में हृदय पार्थ!’ भगवान् के हृदय में अनन्त ज्ञान का भण्डार है। अतएव गीता में भी वही है। जो गीता की सेवा करेगा वह अनन्त ज्ञान का भागी बनेगा। भगवान् के हृदय में कौस्तुभ, मणि, बनमाला, भृगु, लान्छन और लक्ष्मी जी आदि चार वस्तु हैं। जो गीता रूप भगवान के हृदय को अपने हृदय में धारण करेगा उसकी भी वे चारों वस्तुएं मिल जाएंगी। अज्ञानाघ्नान्त निवारक ज्ञान रूपी कौस्तुभ मणि मिल जाएगी। दूसरी चारों और सौरभ विस्तार करने वाली कीर्ति रूप बनमाला मिल जायेगी। तीसरी इहलौकिक धन सम्पत्ति रूप लक्ष्मी मिल जाएगी और चौथी भृगुलोछन रूप क्षमा आदि गुणों की प्राप्ति होगी।
गीता एक अपूर्व ग्रन्थ है, इसमें दिव्य अमर-संदेश है, सर्वश्रेष्ठ उपदेश है! यह उपदेश सर्व जाति, वर्ण, आश्रम, सम्प्रदायों के लिए समान भाव से उपयोगी है मानव जाति का सनातन धर्मोपदेश है, सार्वभौम संदेश है। इसके वक्ता जगत् गुरु भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी हैं, इसका श्रोता सत्वगुणी मानव जाति है, और श्रवण का फल अमरत्व की प्राप्ति है।
संक्षेपतः गीता इस जगत् का अमर फल है। असार संसार का सार है, संसार सागर का आलोक—स्तम्भ (Light house) है। मानव जीवन का पथ-प्रदर्शक है। शास्त्र-सागर का मथितार्थ है, उपनिषदों का सार है, वेदों का तत्व है, सनातन तत्वों का अवभासक है, एक अपूर्व ग्रन्थ रत्न है, इसके सदृश ग्रन्थ संसार में न हुआ और न होगा। चाहे किसी, देश किसी भाषा, किसी जाति, किसी सम्प्रदाय या किसी मत का मानने वाला विद्वान हो, मुक्तकण्ठ से गीता की प्रशंसा करता है। अतएव गीता अपने ढंग का निराला ग्रन्थ है। गीता गीता ही है।
गीता का तत्व हम नहीं जानते—
कृष्णों जानाति वै सम्यक कि ञ्चत्कुन्ती सुतः फलम्।
व्यासो वा व्यास पुत्रो वा याज्ञवल्को ऽथ मैथिलः॥
श्रीकृष्ण गीता को सम्यक् जानते है। अर्जुन कुछ फल जानते हैं व्यासजी, व्यासजी के पुत्र शुकदेवजी, योगी, याज्ञवल्क्य और राजा जनक भी कुछ-कुछ जानते थे।
तब हमारे लिये क्या कर्तव्य है—
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्र विस्तरैः।
गीता का अध्ययन ही सर्वथा कर्तव्य है। अन्य शास्त्रों के विस्तार की क्या आवश्यकता है?
जो मनुष्य ईश्वर और उसके अद्वितीय अविचल सम्राट पद को नहीं मानता उसकी आकाँक्षा कभी तृप्त नहीं हो सकती।
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मनुष्य अपनी दुर्बलता से भली भाँति परिचित रहता है। परन्तु उस अपने दल से भी परिचित होना चाहिये।
(श्री.—भुक्तभोगी)
तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना।
अमानिनो मानदेन कीर्तनीयो सदाहरिः॥
तृण से भी अपने को तुच्छ मानकर, वृक्ष की भाँति सहनशील होकर, सम्मान की इच्छा को त्यागकर और दूसरों को सम्मान देते हुये सर्वदा श्रीहरि का कीर्तन करना चाहिये। श्री गौराँग महाप्रभु के इस वाक्य को केवल कीर्तन मात्र के लिये नहीं, प्रत्येक आध्यात्मिक पथ के पथिक के लिये समझना चाहिये। अन्तर्मुख कोई हो नहीं सकता, जब तक कि वह उपरोक्त गुणों से युक्त होकर द्वन्द्व और यशेच्छा पर विजय न प्राप्त करले। साधक को अपना व्यवहार और वेश सब इस बात को दृष्टि में रखते हुए चुनना चाहिये।
मैं किसी वेश की निन्दा नहीं करना चाहता। कण्ठी, तिलक या दूसरे साधुता के चिन्हों की महत्ता पर मेरा कोई आक्षेप नहीं। शास्त्रों में उनकी जो महिमा बतलाई गई है, वह ठीक ही है। लेकिन वह बात भी सर्वमान्य है कि वेश साधन की अपेक्षा रखता है। बिना वेष के भी साधन करके पूर्णता को प्राप्त करने में कोई बाधा नहीं और वेश लेकर भी साधन न करने से पतन हो सकता है।
कोई समय होगा जब साधु का वेश नम्रता और संयम का कारण रहा होगा। आज अवस्था ठीक इसके विपरीत है। आज यदि वेश से कोई लाभ हो सकता है तो यही कि लोकलाज का भय पतन से बचाये रहेगा। लोगों में बदनामी के भय से अथवा सम्मान की इच्छा से कुछ राम नाम जप होता रहेगा। यह लाभ साधक के लिये नहीं है। यह तो अत्यन्त बहिर्मुख के लिये है। जो स्वयं साधन करना चाहता है, वह करेगा ही। दूसरों को दिखाने की उसे आवश्यकता नहीं। पतन से कुछ सीमा तक वेश रक्षा कर सकता है, परन्तु पतनोन्मुख के लिये वहाँ भी सब कुछ है। मैं तो कहूँगा कि वर्तमान समय में वेश की जो दशा है, उसमें पतन की सामग्री साधारण अवस्था से कहीं अधिक है।
कोई विशेष अन्तर नहीं था। केवल केश बड़े बड़े थे। उनकी जटायें नहीं बनी थी, लेकिन उनमें तेल भी नहीं पड़ता था। धोती के स्थान पर कभी लुँगी और कभी धोती ही। सिले हुए वस्त्र नहीं पहनता था। चद्दर तथा सर्दियों में कम्बल ओढ़े रहता था न कोई कण्ठी थी और न तिलक। फिर भी बढ़े हुये रूखे बाल और चद्दर दूसरों को बताने के लिये पर्याप्त थे कि यह साधु है।
संसार में तो भेड़िया धसान है। लोग पैर छूने लगे, प्रणाम करने लगे। अपने मन ने भी कहा ‘हम साधु हैं।’ कहीं जाते तो आगे आसन मिलता। ब्राह्मण साधुओं को प्रणाम करना छूटने लगा। प्रणाम करने पर वे भी प्रणाम नहीं करते तो मन में बुरा लगता। कोई आगे बैठता तो मन में आता कि ‘मैं भी तो साधु हूँ’ फिर इसी का विशेष आदर क्यों हो!’ भगवान की कृपा थी कि भण्डारे उड़ाने और पैर पुजवाने से अपने को सदा घृणा रही।
एक तीर्थ में घूम रहा था। कुछ गुजराती सामने से आ रहे थे। मेरे साथ एक सज्जन थे जो मुझसे कहीं अधिक साधन भजन करते हैं। वे पहिने थे कुर्ता और यहाँ थी जटा। गुजरातियों ने हाथ जोड़कर प्रणाम करते जाने का ताँता लगाया। वे थे भी बीस के लगभग। मेरे साथी हँस रहे थे। उन्होंने सम्भवतः कहा भी कि ‘ वेश का सम्मान तो होना ही चाहिये।’ ऐसी घटनायें कई बार हो चुकी हैं। मैं था भी कच्चा साधु। इन प्रमाणों को पचा नहीं पाता था। बराबर हृदय में संकल्प विकल्प उठते रहते थे। वेश मेरे लिये आडम्बर के अतिरिक्त और कुछ नहीं जान पड़ता था। इस दिन कुछ अधिक उत्तेजना मिली।
मैं सोचने लगा— वेश महत्ता का सूचक है। तुममें कोई भी विशेषता तो है नहीं। साधारण वेश में थे तो यह भाव था कि तुम गृहस्थ हो और साधु तुम्हारे पूज्य हैं। साधु और ब्राह्मणों के प्रति आदरभाव था। अब बाल बढ़ाकर साधु बन गये। दूसरों से सम्मानित होने लगे। स्वयं साधु बन गए तो साधु वर्ग के प्रति आदर कैसे हो? इसमें हुआ क्या? अहंकार बढ़ गया। साधन में अथवा प्रभु के प्रेम में बालों ने कोई सहायता नहीं दी।
‘आये थे हरि भजन को,
ओटन लगे कपास।’
सौभाग्य से किसी से न तो कण्ठी बंधवाई थी और न मूँड़ मुड़ाया था। कान फुकबाने की बात कभी सामने नहीं आई थी। अतएव कोई शास्त्रीय नियमों संबंधी या लौकिक मर्यादा के तोड़ने संबंधी अड़चन नहीं थी वेश को बदल देने में। चार पैसे में नाई ने केशों से छुट्टी दे दी और खद्दर की कमीज बनवाकर मैंने अपनी साधुता से छुटकारा पाया एक पैसे की गेरू के बिना जो साधुता कमीज छोड़ देने से मिली थी, उससे मुक्ति पाने में मेरे सवा रुपये लगे।
अब कोई प्रणाम क्यों करेगा ? जूता, कमीज, स्वीटर प्रभृति ने अब उस अहंकार को भी भगा दिया है। साधुओं को प्रणाम करने की इच्छा होती है। सार्वजनिक समूह में उनसे आगे या उनके बराबर बैठा जा ही नहीं सकता। उनका आदर होते देख कोई ईर्ष्या मन में नहीं होती। भजन पूजन तो पहिले भी नाममात्र का होता था और वैसा ही अब भी होता है।
इस अपने ही दृष्टान्त का तात्पर्य यह नहीं है कि साधक त्याग को छोड़कर संग्रही और विलासी बन जावें। सीधी बात तो यह है कि जो साधक है, जिसमें साधन करने की इच्छा है, वह किसी भी वेश में विलासी और संग्रही नहीं बन सकता। जो साधन न करके भोग चाहता है, वेश उसको संग्रह में बाधा नहीं देता। साधक के लिये कोई साधुवेश आवश्यक नहीं है। वह वेश के कारण सम्मानित होने लगेगा और यह उसके अहंकार को बढ़ाने का कारण हो सकता है। वेश के साथ साधन होने पर अत्यधिक सम्मान प्राप्त होना स्वभाविक है। यदि वह वेश कोई न रखे और सादे कुरते धोती में रहकर घर पर या कही बाहर भी साधन करे तो बहुत कुछ अंशों में वह अहंकार एवं यशेच्छा से बचा रहेगा।
जिन लोगों की कंठी और तिलक में श्रद्धा है, वे प्रशंसनीय हैं घर रहकर भी वे उन्हें धारण कर सकते हैं। बहुत से गृहस्थ कंठी तिलक धारण करते ही हैं। तात्पर्य इतना ही है कि साधक को कोई ऐसा वेश नहीं बनाना चाहिए जिससे वह पूजित होने लगे। उसे उपदेशक बनने से भी बचना चाहिए। यह भी पूजित होने का प्रधान साधन है।
जो किसी सम्प्रदाय में दीक्षित होकर वेश स्वीकार कर चुके हैं, उन के लिए उसका त्याग उचित नहीं। ऐसा करना शास्त्र तथा लोक मर्यादा दोनों के विरुद्ध है। उन्हें सच्चे साधु होने का प्राणपण से प्रयत्न करना चाहिये। भण्डारों और चेलों से बचना चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो अपने साधन को गुप्त रखना चाहिए और सम्प्रदायों तथा मण्डलियों के संसर्ग से दूर एकान्त सेवन करना चाहिए। वेश केवल महापुरुषों का सूचक हो सकता है, वह किसी को महापुरुष बना नहीं सकता। अतः प्रथम तो वेश धारण ही अपनी योग्यता देखकर करना ठीक है और यदि धारण कर ही लिया तो उसका निर्वाह भी करना चाहिए।
(श्रीमती करुणा द्विवेदी, विशारद, पराँची)
अपाहिज पुरुष दुनिया के एक कोने में पड़ा सिसक रहा था। न तो उसमें ज्ञान था और न गति। न वह परख जानता था और न प्रेम को पहचानता था। तब इस मकोड़े को मातृ शक्ति ने अपनी गोद में उठाया। अपने स्तन में से जीवन रस पिलाकर, पाल पोस कर बड़ा किया, छाती से लगाकर इसे प्रेम सिखाया। अपने एक माँस से इसका पिंड बनाकर वह दिव्य गुण धारण कराये जिनके बल पर यह हैवान, इन्सान कहला सकने योग्य बना। साँसारिक संघर्ष की भट्टी में जब यह जला जा रहा था, कठिनाइयों के चट्टानों से टकराकर जब यह घायल होकर चिल्ला रहा था, मातृ शक्ति को इस पर दया आई और अपने आँचल में छिपाकर शान्ति और शीलता प्रदान की।
जब तक यह रक्त माँस का लोथड़ा मात्र था बिलकुल पंगु और अशक्त था उस समय तक वह मातृ शक्ति के आश्रित था, उसी की दया पर जीवन धारण किये हुए था। स्तन चोखने के लिए, टुकड़ा खाने के लिए, पानी पीने के लिए, मल मूत्रों से सने हुए अपने शरीर को शुद्ध कराने के लिए सब प्रकार की सहायता पाने के लिए माता का भिखारी था। रोकर आँखों से आँसू टपकाकर अपनी दीनता प्रकट करता हुआ माता से याचना करता था कि माँ! मैं सर्वथा अपाहिज हूँ, मुझे जीवित रखना तेरी ही कृपा पर निर्भर है। मातृ शक्ति को इस अपाहिज पर दया आई और अपना रक्त चुसवा कर इसे समर्थ बना दिया।
जब यह कुछ कुछ समझने लगा था, कुछ कुछ बढ़ने लगा था किसी की सहायता और सहयोग चाहता था तो बहिन ने इसे कंधे पर उठाया और खेलने के सारे सामान जुटा दिये। उन्नति और शिक्षा के वह सब साधन सुलभ कर दिये जिन्हें वह दूसरी जगह नहीं पा सकता था। उसने इसे खिलाया, हँसाया, नहलाया और सिखाया कि समाज में किस प्रकार रहा जाता है।
जब पुरुष जवान हुआ । अंग अंग में से यौवन फूटा। आशा और उत्साह से भरा हुआ यह अल्हड़ अपने में किसी कमी का अनुभव कर रहा था। बिना उस चीज के अपनी जीवन यात्रा, वंश परम्परा और सुख सौभाग्य खतरे में देख रहा था तब मातृ शक्ति ने पत्नी के रूप में अपने प्राण उसे अर्पण किये, अपना प्राणनाथ बनाया। अपने अन्दर वह सब गुण धारण कर लिए जिनके बिना वह बड़ी बेचैनी अनुभव कर रहा था और तड़प कर पाँव पीट रहा था।
मातृशक्ति ने इस प्रकार पुरुष को पुरुष बन सकने योग्य बनाया। उसके खोखले शरीर में अपने प्राण फूँक कर एक सजीव पुतला बनाया। कार्यशील, क्रिया कुशल, ज्ञान शील, विचारवान, चतुर शिक्षित!
आज वही पुरुष अपनी मर्यादा को भूल गया है। अभिमान की मदिरा पीकर मदोन्मत्त हो गया है। अधिकार और शक्ति के नशे ने उसे पागल बना दिया है। उसने अपनी असलियत को बिल्कुल भुला दिया है। उस दिन का अपाहिज आज का शासक है। कल जिसके अंचल की छाया प्राप्त करने के लिए वह भूमि पर लोटा लोटा फिरता था। कल जिसका स्तन पान किये बिना जिसका जीवन अशक्य था, आज वही पुरुष स्त्री को अपनी दासी बताता है, पैर की जूती घोषित करता है। अपनी संपत्ति सिद्ध करता है। कहता है यह मेरी दासी है, रमणी है, मेरी भोग्य सामग्री है। आज वह समर्थ हुआ है तो अपनी जननी पर भी वश आजमाना चाहता है। प्रत्युत्तर की बात तो दूर आज तो वह पाजीपन पर उतर आया है। कृतज्ञता को ठुकरा कर कृतघ्नता का बाना पहिन लिया है।
पुरुष ने अपनी मातृजाति को आज विलास की सामग्री बना लिया है। जिस तरह मजे के लिए सिगरेट का उपयोग किया जाता है वैसा ही उपयोग स्त्रियों का होता है। भलमनसाहत का तकाजा है कि स्त्री को देखते ही पुरुष नत हो जाय अपने रोम रोम पर लदे हुये असंख्य अहसानों का स्मरण करे और उसके चरण चूमकर अपने को धन्य माने। गौ माता का स्मरण मात्र जिस प्रकार मन में एक श्रद्धा और कृतज्ञता की भावना पैदा करता है वैसा ही स्मरण मातृजाति का स्मरण आते ही पुरुष के मन में उठना चाहिए। मगर आज तो इससे विपरीत हो रहा है।
जब मैं दीवारों पर चिपके हुये पोस्टरों, सिनेमा की फिल्मों, बाजार में बिकने वाली तस्वीरों, मासिक पत्रिकाओं में छपने वाले चित्रों, नृत्य ग्रहों में नारी का अर्धनग्न स्वरूप उपस्थित किया जाता देखती हूँ तो मेरी आंखें क्रोध से जल उठती हैं। पुरुष ने हमारा यही सम्मान करना सीखा? हमारा स्वरूप उसने यही समझा है जिसे देखकर वह प्रसन्न होता है और अपने ग्राहकों को आकर्षित करता।
मैं यह देखकर सिहर उठती हूँ कि पुरुष इतना नीच होता चला जा रहा है। अपनी पूजनीय मातृजाति का नग्न सौंदर्य देखने में उसे मजा आता है। यह तो ठीक वैसा ही है जैसे अपनी सगी माता, बहिन या पत्नी को अर्धनग्न अवस्था में बाजार में इसलिए फिराया जाय कि लोग उनकी ओर नीच वासनाओं से देखें और अपना मनोरंजन करें। सभ्यताभिमानी कहते हैं कि मनुष्य में दैवी गुणों की वृद्धि हो रही है, उसका विकास हो रहा है, वह अधिक उदार और कृतज्ञ बनता जाता है परन्तु स्त्रियों के नग्न चित्र देखने की इस विकट प्यास को देखकर मुझे अनुभव होता है कि पुरुष अभी हैवानियत से आगे नहीं बढ़ सके हैं।
मैं पूछती हूँ आपके कमरों में, दुकानदारों की दुकानों पर, दफ्तरों में, विनोद ग्रहों में पुस्तकों के मुख पृष्ठों पर, पत्रिकाओं के पन्नों में, दवाओं के विज्ञापनों में दूषित भाव भंगी रखने वाले स्त्रियों के अर्धनग्न चित्र किस लिए टंगे हुये हैं? इनका उद्देश्य क्या है? इन से किस मतलब को पूरा किया जाता है? अपने को सुधारक, नेता और कलाकार कहने वाले अपने पिता भाई और पुत्रों से मैं बड़े कड़े शब्दों में पूछती हूँ कि यह कैसी कला है? इससे जाति का क्या हित होने वाला है? वे इस विषय में उदासीन रहकर अपनी अर्ध स्वीकृति क्यों प्रकट करते हैं?
जन साधारण की यह दुष्प्रवृत्ति दिन दिन बढ़ती जा रही है। जनता का सर्वप्रिय मनोरंजन सिनेमा इस बात का साक्षी है कि अर्धनग्न और नीच वृत्तियों को उकसाने वाले फिल्म ही अधिकाँश बनते हैं। पिता और पुत्र, भाई और बहिन, इन मित्रों को क्या साथ-साथ बैठकर देख सकते हैं? उन पर पूरी समालोचना कर सकते हैं? यदि नहीं तो इस कुरुचि पूर्ण विचारधारा को क्यों बढ़ने दिया जाता है? समाज के पिता इस ओर क्यों चुप्पी साधे हुये हैं?
यदि पुरुष सचमुच इंसानियत की ओर बढ़ रहे है, यदि उन्हें मातृजाति के उपकारों का स्मरण है, तो उन्हें उचित है कि नग्न चित्रों को न देखें। जहाँ देखें वहाँ विरोध करें और जन साधारण में इस बात का प्रचार करें कि स्त्रियाँ हमारी मातृशक्ति की पूजनीय प्रतिनिधि हैं। उनका अपमान मत करो। पुरुषों, पिताओं, भाइयों, पुत्रों ! मैं कहती हूँ कि तुम हमारा अपमान मत करो। हमारे और अपने सम्बन्धों की वास्तविकता पर विचार करो !
(श्री. बसन्तसिंह भृंग)
अरे! पथिक अविराम चलाचल, पथ में है विश्राम कहाँ?
कौन किसी का संगी होता, पल भर का सामान यहाँ॥
धूथ इन्द्रियों के ठग भारी तुझको आलस में पाकर।
तीन गुणों का जाल गूंथ कर तुझे फंसावेंगे आकर॥
रूप नर्त की नृत्य दिखा कर देती है प्रति पल झाँसा।
इस पथ पर चलने वालों को सदा कुटिलता से फाँसा॥
वहीं औट ले तरु कुँजों की बैठा कुटिल काम कामी।
थोड़ी सी भी भूल हुई तो पतन, पाप, दुख, बदनामी॥
चेत! चेते! अब चेत! अचेते, कहाँ चेतना को खोया।
देर नहीं है संध्या में अब तू पथ में पड़कर सोया॥
चली मोह की दुर्गम आँधी, प्रबल थपेड़े मार रही।
बड़े बड़े धीरज वालों की बुद्धि यहाँ पर हार रही॥
पथिक चला चल, चल चल आगे, थोड़ा समय अभी बाकी।
मदिरालय को ओर न ललचा, बहका लेवेगा साकी॥
(प्रो. धीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती बी. एस. सी.)
पिछले पाँच अंकों में मैस्मरेजम विद्या की अच्छी तरह जानकारी प्राप्त कर लेने के बाद अब साधक इस योग्य हो गये होंगे कि वे इस विद्या की ओर कदम बढ़ाने का कार्य आरंभ करें। जो सज्जन इस विद्या का अभ्यास शुरू करना चाहते हैं उन्हें उचित है कि सबसे पहले यह जाँच करें कि हम साधन की योग्यता रखते हैं या नहीं। अभ्यासी के लिये आवश्यक है कि वह (1) बीस वर्ष कम और पैंतालीस वर्ष से अधिक न हो (2) बीमार न हो (3) किसी मानसिक दुख में ग्रसित न हो (4) स्वभाव आलस्य रहित और परिश्रमी हो (5) आर्थिक चिंता से व्याकुल न हो (6) मादक द्रव्य या अन्य व्यसनों का गुलाम न हो (7) आत्म विश्वासी और आशावादी हो (8) दृढ़ निश्चयी और धैर्य धारण करने वाला हो (9) आँखों में कोई रोग, न हो (9) मन रोग द्वेष और नीच वासनाओं से भरा हुआ न हो (10) इस विद्या पर पूर्ण विश्वास और सीखने की दृढ़ इच्छा हो। यदि यह योग्यताएं साधक में न हों तो उन्हें ठहरना चाहिए और समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। जब तक यह गुण अपने में न आ जायं प्रतिदिन ऐसी अभ्यास करना चाहिये जिससे मन में दृढ़ इच्छा उत्पन्न हो जाय और सारे शारीरिक और मानसिक दुर्गुण दूर हो जायें।
दृढ़ निश्चयपूर्वक जब मैस्मरेजम को सीखना तय कर लिया जाय तो सबसे प्रथम अपना आहार विहार ठीक करने की व्यवस्था करनी चाहिए। गरम उत्तेजक अधिक मसाले पड़ी हुई, बासी गरिष्ठ वस्तुओं को त्याग कर सादा और हलका भोजन अपनाना चाहिए। घी, दूध, फल, मेवे आदि का व्यवहार बढ़ा देना चाहिए। ठीक समय पर नियत मात्रा में भूख जगाने पर और खूब चबाकर खाया हुआ साधारण भोजन, अव्यवस्थित रूप से खाये हुए बहुमूल्य भोजन की अपेक्षा अधिक लाभ प्रद होता है। रात को खेल तमाशा देखते हुए जागते रहना और दिन में सोना निषिद्ध है। अभ्यास के दिनों में ब्रह्मचर्य के साथ रहना चाहिए। पूर्ण ब्रह्मचर्य न बन पड़े तो भी जहाँ तक हो सके कम से कम वीर्य गिराया जाय। चिन्ता, क्रोध, रोष, कलह आदि से दूर रहकर मानसिक स्थिति को ठीक बनाये रहना चाहिए।
योगाभ्यास में सफलता कुछ देर से मिलती है इसलिए दृढ़तापूर्वक अधिक दिनों तक अभ्यास करने के लिए पहले से ही तैयार रहना चाहिए। कुछ लोगों की मानसिक स्थिति ऐसी होती है जिससे उन्हें सफलता बहुत जल्दी मिलने लगती है। परन्तु सबके लिए ऐसी बात नहीं है। जैसे शरीर को मजबूत बलवान बनाने के लिए निरन्तर अभ्यास और सावधानी की जरूरत होती है वैसे ही मन को बलवान बनाने के लिए भी बहुत दिनों तक साधन करने रहने की आवश्यकता होती है। एक दो महीने में ही सफलता न मिले तो साधन छोड़ना न चाहिए वरन् प्रयत्न जारी रखना चाहिए।
मैस्मरेजम विद्या का प्रमुख साधन नेत्र हैं। नेत्रों द्वारा ही एक मनुष्य का प्रभाव दूसरे पर पड़ता है। यह बिजली के जलते हुए बल्ब हैं जो दूसरों पर तुरन्त ही अपना असर डालते हैं। इसलिए अभ्यासी को अपनी नेत्र शक्ति बढ़ानी चाहिए। भारतीय योगशास्त्रों में त्राटक का बड़ा महत्व है। पश्चिमी डाक्टरों ने नेत्र शक्ति बढ़ाने के लिए त्राटक को ही उपयुक्त समझा है। इसलिये सर्वप्रथम साधक को त्राटक का अभ्यास करना पड़ता है आगे इसी अभ्यास पर कुछ प्रकाश डाला जाता है। ब्राटक की कई विधियाँ नीचे लिखी जाती हैं साधक इनमें से जिसको अपने अनुकूल और सुलभ समझें, उसे ही आरम्भ कर दें।
एक हाथ लंबा एक हाथ चौड़ा एक चोकोर कागज या पट्ठा लेकर उसके बीच में रुपये के बराबर एक काला गोल निशान बनाओ। स्याही एक सी कहीं कम ज्यादा न हो। इसके बीच में सरसों के बराबर सफेद निशान छोड़ दो और उस सफेदी में पीला रंग भर दो। इस कागज को किसी दीवार पर टाँग दो और तुम उससे चार फीट दूरी पर इस प्रकार बैठो कि वह काला गोला तुम्हारी आँखों के बिलकुल सामने सीध में रहे। यह साधना का कमरा ऐसा होना चाहिए जिसमें न अधिक प्रकाश रहे न अन्धेरा न अधिक सर्दी हो न गर्मी। पाल्थी मारकर मेरुदण्ड को सीधा रखते हुये बैठो और काले गोले के बीच में जो पीला निशान है उस पर दृष्टि जमा लो। चित्त की सारी भावनाएं एकत्रित करके उस बिन्दु को इस प्रकार घूरो मानो तुम अपनी सारी शक्ति नेत्रों द्वारा उस में प्रवेश कर देना चाहते हो? ऐसा सोचते रहो कि मरी तीक्ष्ण दृष्टि से इस बिन्दु में छेद हुआ जा रहा है। कुछ देर इस प्रकार देखने से आँखों में दर्द होने लगा और पानी बहने लगेगा तथा अभ्यास को बन्द कर दो।
अभ्यास के लिए प्रातः काल का समय ठीक है। नित्य कर्म से निवृत्त होकर नियत स्थान पर बैठना चाहिए और चित्त को एकाग्र करके साधन आरम्भ करना चाहिए। पहले दिन देखो कि कितनी देर में आंखें थक जाती हैं और पानी आ जाता है पहले दिन जितनी देर अभ्यास किया है प्रतिदिन उसमें एक या आधा मिनट बढ़ाते जाओ। इस प्रकार दृष्टि को स्थिर करने पर तुम देखोगे कि उस काले गोले में तरह तरह की आकृतियाँ पैदा होती हैं। कभी वह सफेद रंग का हो जायेगा तो कभी सुनहरा। कभी छोटा मालूम पड़ेगा तो कभी बड़ा। कभी चिनगारियाँ सी उड़ती दिखाई देंगी तो कभी बादल से छाये हुए प्रतीत होंगे। इस प्रकार वह गोला अपनी आकृति बदलता रहेगा। किन्तु जैसे-2 दृष्टि स्थिर होना शुरू होगी वैसे ही वैसे यह गोला भी स्थिर होता जायगा और उसमें दीखने वाली विभिन्न आकृतियाँ बन्द हो जायेगा। और बहुत देर देखते रहने पर भी गोला ज्यों का त्यों बना रहेगा।
त्राटक करने का चित्र और भी कई प्रकार से बनाया जाता है। एक एक फुट लंबे चौड़े चौकोर दर्पण के बीचों बीच चाँदी की चवन्नी भर काले रंग के कागज का गोल टुकड़ा काटकर चिपका दिया जाता है। उस कागज के मध्य में सरसों के बराबर एक पीला बिन्दु बनाते हैं। इस अभ्यास को एक मिनट से शुरू करते हैं और प्रतिदिन एक एक मिनट बढ़ाते जाते हैं। जब इस तरह दृष्टि स्थिर हो जाती है तब और भी आगे का अभ्यास शुरू किया जाता है। दर्पण पर चिपके हुए कागज को छुड़ा देते हैं और उस में अपना मुँह देखते हुए अपनी बाईं आँख की पुतली पर दृष्टि जमा लेते हैं। और उस पुतली में बड़े ध्यानपूर्वक अपना प्रतिबिम्ब देखते हैं।
तीसरी विधि मोमबत्ती या दीपक की ज्योति पर दृष्टि जमाने की है। दीपक घृत का या शुद्ध सरसों के तेल का होना चाहिए। मोमबत्ती की रोशनी बहुत ठण्डी समझी जाती है।
चौथी विधि प्रातःकाल के सूर्य पर दृष्टि जमाने की और पांचवीं चन्द्रमा पर त्राटक करने की है। इनमें से इच्छानुसार चाहे जिसे किया जा सकता है पर हम अपने अनुयायियों को यही सलाह देंगे कि इन सब विधियों के अनुसार क्रमशः त्राटक करें और सब त्राटकों पर दृष्टि स्थिर हो जाय तो अपने को सफल हुआ समझें।
अभ्यास पर से जब उठो तो गुलाब जल से आँखें धो डालो। आँख धोने के लिए एक काँच की प्याली चार पाँच पैसे की बाजार से मिलती है उसमें गुलाब जल भर कर आँखों से लगाना चाहिए और उस पानी में आँख खोल कर उन्हें स्नान कराना चाहिए जिससे उनकी उष्णता शान्त हो जाय और शीतलता प्राप्त हो। अभ्यास से उठने के बाद कोई पौष्टिक शीतल वस्तु खा लेना भी आवश्यक है। दूध या दही की लस्सी, मक्खन, मिश्री, फल, शरबत आदि कुछ सेवन कर लेने से शरीर की बढ़ी हुई गर्मी भी शान्त हो जाती है।
बड़े लोगों की जीवनी से लाभ उठाना एक ही जीवन में दो जीवनों का आनन्द लूटने के बराबर है।
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यदि तुम्हें महान पूर्व पुरुषों की भाँति कर्म करने का अवसर न मिले तब भी कम से कम अपने विचार तो उनकी भाँति रखने चाहिये और उनकी आत्मा के महत्व का अनुसरण करना चाहिए।
(ले.—श्री. प्रबोध चन्द गौतम, साहित्य रत्न, कुर्ग)
पिछले अंक में पुनर्जन्म के कुछ उदाहरण दिये गये थे। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। हर जगह कुछ दिनों बाद ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं। परन्तु लोग उसकी उपेक्षा करते हैं। पूना में एक गरीब घराने का बालक अपने पूर्व जन्म संबंधी कुछ बातें बता रहा था। वहाँ के शिक्षित लोगों का ध्यान मैंने आकर्षित किया तो उन्होंने कहा कि जीवित रहने के लिए जो काम करने हैं उन्हीं के लिए हमारे पास समय नहीं है तो पूर्व और पश्चात जन्मों के बारे में जानकर क्या करना है। प्रायः ऐसी ही भावना हमारे समाज की है। इसे मूर्खता कहा जाय या दीर्घसूत्रता? भविष्य की चिन्ता न करने से बढ़कर और क्या अज्ञान हो सकता है। बच्चों का विवाह करना है, मकान बनवाना है, बुढ़ापे के लिए धन जोड़ना है, आदि चिन्ताएं तो हम करते हैं पर मरणोत्तर जीवन की कुछ भी तैयारी नहीं करते। यहाँ तक कि इस बात की शोध भी अच्छी तरह नहीं की जाती कि मरने के बाद हमारा क्या होता है।
यह उपेक्षा मानव बुद्धि पर बट्टा लगाने वाली है। जिस प्रकार हम अपने भविष्य के सारे प्रोग्राम बनाते हैं और उनकी जानकारी प्राप्त करते हैं उसी प्रकार उस जीवन के बारे में भी दिलचस्पी लेनी चाहिए जो एक दिन निश्चयपूर्वक मिलने वाला है। यदि उस जीवन के बारे में बिलकुल अनजान रह जायगा तो उसे पशु की भाँति कष्ट उठाना पड़ेगा जो जंगल में से पकड़ कर तुरन्त ही खूँटे से बाँधा गया है। अजनबी पन के कारण कैसी विषम परिस्थिति का सामना करना पड़ता है, इसे मुक्त भोगी ही जानता है।
मरने के पश्चात पुनर्जन्म होता है। जिन्होंने अपनी आत्मा का उत्थान करके उसे मुक्त बना लिया है उनकी बात को छोड़कर शेष सभी साधारण प्राणी जन्म मरण के चक्र में घूमते हैं। मनुष्य मरने के बाद मनुष्य जाति में ही जन्म लेता है यह पिछले अंकों में समझाया जा चुका। आत्मा जितना विकास की प्राप्ति हो चुका उससे पीछे नहीं हट सकता। शरीर जितना बड़ा हो गया उससे छोटा नहीं हो सकता। बुरे कर्मों के फल इस योनि में भी मिलते हैं। पशु योनि की अपेक्षा तो सच्ची दण्ड योनि मनुष्य शरीर ही है क्योंकि जितनी वेदनाएं इसमें हैं अन्य किसी में नहीं। पूर्व जन्म की स्मृति के जितने भी उदाहरण मिलते हैं वे प्रायः सब के सब यही साक्षी देते हैं कि मनुष्य का पुनर्जन्म नर देह में ही होता है।
अभी कुछ ही दिन की बात है हमारे कुर्ग में एक ऐसा ही प्रत्यक्ष प्रमाण लोगों ने देखा था बड़े बाजार के आखरी कोने पर राजपूतों की एक गली है। उसमें तेरहवाँ मकान बुल्ली राजपूत का है। इसका एक छोटा चार वर्षीय बालक रामनगर जाने की धुन लगाये हुये था। बार-बार घरवालों से कहता था मुझे मेरे घर रामनगर पहुँचा दो। मैं रहा हूँ। मेरी स्त्री मेरे बिना चिन्तित होगी। बहुत दिनों तक उसकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। जब लड़के द्वारा अपनी बात बार-बार दुहराई जाती रही तो चर्चा बस्ती में फैली। मुझे भी मालूम हुआ। तब हम सब लोग जिनमें एक वकील, दो अध्यापक, एक पोस्ट मास्टर तथा कई प्रतिष्ठित व्यक्ति थे लड़के को लेकर रामनगर पहुँचे। वहाँ हमारे बहुत से परिचित व्यक्ति थे, उन में से कई को बुला लिया गया और उनके साथ मछवाह टोला पहुंचे। यहाँ पहुँचते ही उस चार वर्षीय बालक ने कहा अब मुझे अपने मकान का रास्ता अच्छी तरह मालूम है आप लोग पीछे-2 चले आइये। हम लोग पीछे लड़का आगे था। बालक सीधा दौड़ता हुआ रामधन कहार के घर में घुस गया। वहाँ मृत रामधन की स्त्री और उसके दो छोटे बालक बैठे हुए थे। लड़का बिना झिझके उनके पास चला गया और दोनों लड़कों का नाम ले लेकर पुकारा। स्त्री से पूछा तुम्हें मेरी याद तो नहीं आती? कोई कष्ट तो नहीं है? मरते समय मेरी जबान बन्द हो गई थी इसलिए तुम से कुछ कह न सका था। मेरी सोने की बालियाँ घर के इस कोने में एक हाथ गहरी गढ़ी हुई है उन्हें खोदकर निकाल लो। लोगों ने वह जगह खोदी तो पीतल की छोटी सी डिब्बी में उसी जगह सोने की बालियाँ रखी हुई मिलीं। पड़ोस में रामजी भड़भूजे की दुकान थी। लड़के ने भीड़ में खड़े हुए रामजी को पहचाना और कहा तुम्हारे तेरह आने पैसे मेरे ऊपर कर्जा हैं सो मैं तुम्हें दूँगा। उसने अपने वर्तमान पिता बुल्ली से कहा चाचा इनके तेरह आने पैसे चुकादो। बेचारे बुल्ली के पास कुछ नहीं था इसलिए हम लोगों ने उसके पैसे चुकाये। परीक्षा के तौर पर वहाँ उपस्थित लोगों की भीड़ ने उससे तरह तरह के प्रश्न किये जिनके उसने यथाविधि सबके उत्तर ठीक दिये। कभी-कभी बालक भूल भी जाता था और किसी के संबंध की सारी बातों को किसी के साथ जोड़ देता था। परन्तु वह घटनाएं शत प्रतिशत ठीक होती थी। भूल केवल घटना और उसके संबंधित व्यक्ति को जोड़ने में होती थी। फिर भी अस्सी सैकड़ा उसकी बातें निर्विवाद और बिलकुल सच थीं। एक हजार आदमियों की उपस्थित भीड़ में से उसने करीब दो सौ को पहिचाना और उनके नाम तथा थोड़े बहुत परिचय बताये। इन परिचयों में तीन चार ही गलत थे। हम लोग दो रोज तक रामनगर रहे और बालक के कथन की पूरी तरह परीक्षा करते रहे। अन्त में हर किसी को यह विश्वास कर लेना पड़ा कि यह लड़का पूर्वजन्म का रामधन कहार ही है। दुख की बात है कि वह बालक इस वर्ष स्वर्गवास कर गया।
उपरोक्त घटना का बारीकी के साथ निरीक्षण करने पर कुछ बातों पर अच्छा प्रकाश पड़ता है एक तो यह कि जितने भी पुनर्जन्म संबंधी परिचय मिलते हैं वे प्रायः बहुत दूर के नहीं होते। जहाँ तक हो सकता है पूर्वजन्म के स्थान के करीब में ही जन्म लेता है क्योंकि मृत आत्मा प्रायः उसी वातावरण को पसंद करती है और इधर उधर से चक्कर काटकर प्रायः अपने परिचित क्षेत्र या उसके निकटवर्ती स्थान में ही रहना चाहती है। दूसरी बात यह कि विचारधारा और सोसायटी भी उसे पूर्वजन्म जैसी ही ठीक प्रतीत होती है। रामधन कहार और बुली राजपूत के परिवार की आर्थिक, सामाजिक और रहन सहन संबंधी व्यवस्था प्रायः एक सी ही थी। यह भी देखने में आया है कि साधारणतः लिंग का परिवर्तन भी नहीं होता। स्त्री और पुरुष पुनर्जन्म में भी प्रायः अपने जैसे लिंग ही धारण करते हैं; किसी गड़बड़ी के कारण यदि परिवर्तन हो जाता है तो उस निकट वाले जन्म में भी वह आपके पूर्वजन्म के लिंग के स्वभावों को पूरी तरह भुला नहीं पाता। स्त्री स्वभाव के पुरुष और पुरुष स्वभाव की स्त्रियाँ हमें कभी कभी दिखाई देती हैं। हो सकता है कि पूर्वजन्म में उनका लिंग इस जन्म के विपरीत रहा हो।
(ले.—श्री. हकीम ज्ञानसिंह जी वैद्य, आगरा)
शरीर शुद्धि के लिए ही नहीं, उसे स्वस्थ और जीवित रखने के लिए भी जल की अनिवार्य आवश्यकता है। साँस, मल, मूत्र, पसीना आदि के द्वारा बड़ी तादाद में पानी खर्च होता है उसे पूरा करने के लिए प्यास लगती है। यदि उचित मात्रा में जल शरीर के अन्दर न पहुँचाया जाय तो निस्संदेह उसकी सारी व्यवस्था बिगड़ जायगी।
हमें घरों में सफाई करने के लिए पानी की बहुत सख्त जरूरत होती है। फर्श धोने, नालियाँ साफ करने के लिए, शौच जाने के लिए, कुल्ला करने के लिए, मुँह-हाथ धोने के लिए बिना पानी के काम नहीं चल सकता। बाहर-बाहर ही लीपा पोती करने से यह काम नहीं चल जाता अपितु भीतरी अंगों की भी शुद्धि जल से ही होती है। हिन्दू धर्म शास्त्र जल द्वारा शरीर की आन्तरिक शुद्धि करने के विधान से भरे पड़े हैं। कई व्रतों में केवल जल पीकर ही रहा जाता है। संस्कारों और धार्मिक कृत्यों में से कोई ऐसा नहीं है जिसका आरंभ आचमन किये बिना आरंभ होता है। गंगाजल पीकर तो लोग सब पापों से छूटकर स्वर्ग प्राप्त कर लेने पर विश्वास करते हैं। हठ योगों, जल को गुदा द्वारा पेट में और शिश्न द्वारा मूत्राशय में जल चढ़ा कर उदर की शुद्धि करते हैं। आयुर्वेद शास्त्र वस्ति कर्म द्वारा ऐसा ही शोधन करते हैं। डाक्टरों ने जल द्वारा शरीर की आन्तरिक शुद्धि के सिद्धान्त को स्वीकार करते हुए ‘एनेमा’ यंत्र बनाया है जिसका प्रयोग संसार भर में साधारण जनता द्वारा होता है।
नाली में पानी डालकर जिस तरह उसकी सफाई की जाती है वह बात शारीरिक अवयवों की हो सकती है। आँतों में यदि मल की गाठें अटक गई हैं तो पेट में पिचकारी द्वारा पानी चढ़ाकर उन्हें निकाल देना सुलभ और उचित इलाज है। आयुर्वेद ने तो पानी को अजीर्ण की औषधि बताया है (अजीर्णे भैषजंबारि) शरीर शास्त्र के पंडित विभिन्न विधियों द्वारा जल से रोग मुक्ति का विधान करते हैं। डॉक्टर लुईकूने ने तो जल चिकित्सा का एक स्वतन्त्र शास्त्र ही बना दिया है।
इस लेख में हमें उषा पान के संबंध में कुछ चर्चा करते हुए उसी सचाई पर प्रकाश डालना है। इसके दो प्रकार हैं। एक तो मुँह द्वारा पीने का और दूसरा नासिका द्वारा जल पीने का विधान है। प्रातः काल सोकर उठने से आध घंटे पूर्व शीतल जल का एक गिलास पी लेना ही उषा पान है।
संध्या समय के भोजन की लोग ठीक प्रकार व्यवस्था नहीं कर पाते। अक्सर ऐसा होता है कि भोजन करके थोड़ी ही देर सोने को चले जाते हैं। भोजन पचने में जितना समय मिलना चाहिए उतना नहीं मिलता। फलस्वरूप भोजन पेट में पड़ा रहता है। यदि गरिष्ठ या सूखी वस्तुएं खाई हैं तब तो और भी कठिनाई होती है। सोते समय पाचन क्रिया होती तो हैं पर उतनी अच्छी तरह नहीं जैसी कि जाग्रत अवस्था में। इसी अव्यवस्था से अधिकाँश लोगों को कब्ज की शिकायत रहने लगती है। जब वे सोकर उठते है तो पेट भारी रहता है। भोजन बिना पचा पेट में पड़ा रहता है या पच गया तो आगे नहीं खिसकता। ऐसे लोग कम मिलेंगे जिन्हें भूख कड़ाके की लगती हो और दस्त भी साफ होता है। अपच के कारण कुछ और भी हो सकते हैं, हमारा कहना तो इतना ही है कि वह बहुत से लोगों को बना रहता है।
उषापान कब्ज रोग की प्राकृतिक और प्राचीन यौगिक जल चिकित्सा है। देखा जाता है कि रात को पाचन क्रिया में शिथिलता आ जाने के कारण पेट में पड़ा हुआ अन्न कुछ विकृत होकर विषैला हो जाता है। यह विष उष्णता और दाह उत्पन्न करता है और अपना प्रभाव ऊर्ध्व नालियों द्वारा मुख, नासिका एवं मस्तिष्क तक भेजता है। प्रातः काल उठने पर साधारणतः इतनी फुर्ती और सजीवता होनी चाहिए कि आदमी अपने को सब कार्यों के योग्य नवीन बल धारण किए हुए अनुभव करे। इसके विपरीत सोकर उठते समय जिनके मुँह का स्वाद खराब हो जाता है, होठ सूखे रहते हैं, सिर में भारीपन प्रतीत होता है, नथुनों में खुरट जम जाते हैं, पेट में जलन होती है, एवं प्यास लगती है समझना चाहिए इनको रात को भोजन हजम नहीं हुआ है। भोजन का ठीक पाचन हो जाने पर उठते ही जोर से टट्टी लगती है और तत्पश्चात् कड़ाके की भूख लगनी चाहिए।
जिसका पाचन नहीं हुआ है वह भोजन आमाशय में पड़ा रहता है। इसे अजीर्ण कहते हैं; पच जाने पर आँतों में होकर आगे चलने का कार्य नहीं होता उसे मलावरोध कहते हैं। इनमें से कोई ऐसा या दोनों का आक्रमण शरीर पर जारी रहता है, और इन्हीं दोनों के अँचल में छिपे हुए और अनेक रोगों के कीटाणु पलते रहते हैं। बदहजमी के होते हुए नवीन रक्त और बल वीर्य के प्राप्ति तो ही ही कैसे सकती है?
अपच से पैदा होने, अजीर्ण और मलावरोध और विष उत्पादन तीनों ही बाधा को उषापान हटा देने की सामर्थ्य रखता है। प्रातः काल उठने से आध घंटे पूर्व पिया हुआ शीतल जल पेट में जाते ही अपनी क्रिया आरम्भ कर देता है। शुष्क भोजन में जल का मिश्रण होते ही वह पतला हो जाता है। आमाशय ठोस भोजन को पचाने में अशक्त था वह द्रव रूप हो जाने पर आसानी से पचा लेता हैं। रस बनाने वाली नालियाँ खुलने का कार्य आरम्भ कर देती है। जिससे पाचन कार्य बहुत सुगम हो जाता है। इस बात को सब जानते हैं कि गाढ़ी वस्तु की अपेक्षा पतली जल्दी बहने लगती है। नाली में रुकी हुई कीचड़ पानी पड़ते ही आगे को खिसक जाती है। इसी तरह पानी की सहायता से भोजन आंतों में होता हुआ मल मार्ग तक पहुँच जाता है और दस्त साफ हो जाता है। अजीर्ण के कारण जो विष उत्पन्न हुए थे और जिनके द्वारा मुख, मस्तिष्क आदि में विकास पैदा किये गए थे वह भी शान्त हो जाता है। गरमी शान्त करने के लिए पानी का प्रयोग होता है, लोहे के गरम तवे पर पानी डाल दिया जाय तो वह थोड़ी ही देर में शान्त हो जायगा। जिन्होंने उषापान किया है उन लोगों के अनुभव द्वारा यह बात सिद्ध हो चुकी है कि कुछ दिन पहले जिस प्रकार मुँह में कडुआपन, सिर में भारीपन, प्यास, पेट में जलन आदि शिकायतें होती थीं अब नहीं होतीं।
शारीरिक अन्य विकारों की वजह से प्रातः काल जो उष्णता छाई रहती है उषापान उनके लिए अमृत तुल्य है। एक भुक्त भोगी का कहना है “मुझे पिछले कई वर्षों से गर्मी की बड़ी शिकायत थी प्रातः काल जब कि अन्य साथी तरोताजा उठते थे मैं ऐसी देह लिए हुए होता था जिसमें भारीपन और जलन का दौरा होता था। स्नान, शरबत पान, या ऐसा ही कुछ ठंडा उपचार जब तक नहीं कर लेता था तब तक ऐसा प्रतीत होता रहता था कि मैं हल्के ज्वर से पीड़ित हूँ। जब से मैंने ऊषापान किया है तब से सारी शिकायतें जाती रही हैं। पेट की सफाई के साथ अब मैं ताजगी और ठंडक भी अनुभव करने लगा हूँ।
अखंड ज्योति के पाठक ऊषापान की परीक्षा करेंगे तो उन्हें प्रसन्नता हुए बिना नहीं रहेगी। उषा पान किस प्रकार करना चाहिए इसकी पूरी विधि अगले अंक में दी जायगी।
यदि तुम्हें महान पूर्व पुरुषों की भाँति कर्म करने का अवसर न मिले तब भी कम से कम अपने विचार तो उनकी भाँति रखने चाहिये और उनकी आत्मा के महत्व का अनुसरण करना चाहिए।
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जो मनुष्य ईश्वर और उसके अद्वितीय अविचल सम्राट पद को नहीं मानता, उसकी आकाँक्षा कभी कम नहीं हो सकती।
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मनुष्य अपनी दुर्बलता से भली भाँति परिचित रहता है। परन्तु उसे अपने बल से भी परिचित होना चाहिए।
(ले.—श्री. नारायणप्रसादजी तिवारी, कान्हीबाड़ा)
यह लिखा जा चुका है कि स्वर योग के अंतर्गत ज्योतिष ज्ञान भी है अतएव अब मैं सूक्ष्म रूप से इस विषय पर लिखता हूँ।
प्रायः लोग अपने भविष्य का विचार करने इधर उधर भटकते हैं और कभी-2 धोखेबाज़ों के चंगुल में फँसकर व्यर्थ धनहानि करते हैं उनसे प्रार्थना है कि इस विज्ञान द्वारा कुछ अनुभव प्राप्त करें।
भविष्य विचार करते समय मुख्यतः निम्न चार बातों का ध्यान रखना चाहिये-
प्रश्नकर्त्ता का स्थान
श्वाँस पूरक है अथवा रोचक
प्रश्नकर्त्ता के नाम या प्रश्न के शब्द
तत्व :—
अब इसमें से प्रत्येक बातों पर पृथक विचार किया जाती है।
1. जब कि प्रश्न विचारने वाले का इड़ा स्वर चलित हो और प्रश्न कर्त्ता ऊपर, सामने या बाईं ओर से प्रश्न करे अथवा प्रश्न विचारक के सूर्य स्वर में प्रश्न कर्त्ता नीचे, पीछे अथवा दाहिनी ओर से प्रश्न करे तो कार्य की सफलता है, इसके विपरीत हो तो असफलता समझना चाहिये।
2. विचारक के पूरक में प्रश्न करना शुभ है तथा रेचक में अशुभ—अर्थात् जिस समय प्रश्न कर्त्ता प्रश्न करें और विचारक श्वास भीतर खींचता हो तो शुभ और बाहर छोड़ता हो तो अशुभ।
3. शब्द गणना इस विषय पर मतभेद है। किसी का मत है कि प्रश्न कर्त्ता के नाम के शब्द गिने जावें और किसी का विचार है कि प्रश्न के शब्द गिने जावें, यदि चन्द्र स्वर चलता हो शब्दों की गणना सम हो अथवा सूर्य चलता हो और शब्दों की गणना विषम हो तो कार्य में सफलता होगी, इसके विपरीत हो तो अशुभ समझियेगा।
4. यह लिखा जा चुका है कि तत्व इस प्रयोग में कठिन विषय है जिसे तत्व पहचान का पूर्ण अभ्यास न हो उसके लिये एक दूसरा सरल प्रयोग लिखा जाता है जो इस प्रकार है—
प्रश्न विचारक श्वास लेकर कुम्भक (रुकी हुई श्वाँस) से एक पुष्य ऊपर फेंके, यदि पुष्प चलित स्वर की ओर गिरे तो प्रश्न की सफलता समझो और यदि अचलित स्वर की ओर गिरे तो असफलता समझना चाहिये।
यदि योगी स्वतः अपने विषय में प्रश्न करना चाहे तो उसे स्वतः न विचारकर दूसरे से प्रयोग कराना चाहिये और उसे उपरोक्त बातों का ध्यान रखने समझा देना चाहिये—साथ ही इस बात पर विशेष ध्यान रखा जावे कि प्रश्न करने के बाद ही तत्व के विषय में विचार करने के लिये पुष्प दे देना चाहिये-
जहाँ तक हो प्रश्न कर्त्ता को चाहिये कि प्रश्न विचारक के पास कोई पुष्प अथवा रक्त वर्ण कागज लाना चाहिये जिससे उसके आते ही स्वर योगी यह समझले कि आगन्तुक प्रश्न कर्त्ता है और स्वर आदि के विषय में सतर्क हो जावें, प्रश्न कर्त्ता के प्रश्न को ठीक उन्हीं शब्दों में लिख देना चाहिये ताकि शब्द गणना में भूल न हो।
यदि कोई पुत्र तथा कन्या जन्म विषय का प्रश्न पूछे और उस समय सूर्य स्वर चलता हो तो पुत्र तथा चन्द्र स्वर चलता हो तो कन्या सुषुम्ना हो तो नपुँसक या अंग हानि संतान होना समझो। जल तत्व हो तो पुत्र, पृथ्वी या वायु तत्व हो तो कन्या, तेज तत्व हो तो गर्भ हानि समझो—आकाश तत्व हो तो बालक नपुँसक या अंग हीन होगा—
उपरोक्त चार प्रकार के प्रश्न विचार किया जाता है इन चार बातों में से अधिक बातें शुभ हैं या अशुभ उसी प्रकार प्रश्न फल कहना चाहिये—कभी कभी यह भी हो सकता है कि चार बातों में से दो बातों से शुभ तथा दो से अशुभ फल प्रतीत हो सकता है ऐसी दशा में निम्न बात का भी विचार करना चाहिये—
प्रश्न कर्त्ता प्रश्न पूछने के समय यदि पूर्व तथा उत्तराभिमुख होवे और चन्द्र स्वर चलता हो अथवा दक्षिण या पश्चिम की ओर उसका मुख हो और सूर्य स्वर चलता हो तो शुभ समझो अन्यथा अशुभ—रोग विषयक प्रश्न—यदि चलित स्वर की ओर से प्रश्न किया जावे तो रोग कैसा ही असाध्य हो लाभ होगा—चलित स्वर की ओर से कर्कश स्वर में प्रश्न किया जावे तो लाभ अवश्य होगा किन्तु कष्ट के साथ।
प्रश्न कर्त्ता की दृष्टि प्रश्न करते समय यदि किसी जीवित प्राणी पर हो तो रोगी को अवश्य लाभ होगा प्रश्न करते समय यदि प्रश्न विचारक की श्वाँस पूरक हो तो शुभ और रेचक हो तो अशुभ समझो यदि प्रश्न अचलित स्वर की ओर से किया जावे और प्रश्न शब्दों की संख्या विषम हो अथवा सुषुम्ना नाड़ी में प्रश्न हो तो रोग घातक है।
प्रश्न कर्त्ता यदि पहले अचलित स्वर से प्रश्न करे और फिर चलित स्वर की ओर आ बैठे तो रोगी को कष्ट होकर लाभ होगा—प्रश्न कर्त्ता नीचे खड़ा होकर यदि नम्र वचन से प्रश्न करे तो रोगी को लाभदायक ऊपर की और से भयानक शब्दों का उच्चारण करे तो रोगी को घातक है प्रश्न विचारक का प्राण वायु चन्द्र स्थान में हो और प्रश्न कर्त्ता का प्राण वायु सूर्य स्थान में हो तो सैंकड़ों वैद्यों का उपचार भी रोगी के लिये निरर्थक है काल ज्ञानः—जिसकी श्वाँस वायु दिन रात एक ही स्वर में बहती हो उसकी तीन वर्ष से अधिक आयु न समझना चाहिये। जिसकी दो दिन रात बराबर सूर्य नाड़ी चले उसकी आयु दो वर्ष की समझो यदि एक ही स्वर तीन दिन रात बराबर चले तो उसकी आयु एक वर्ष की समझो, यदि दिन में लगातार सूर्य तथा रात्रि में चन्द्र चले तो 6 मास में मृत्यु भय है।
यदि वर्ष, मास, अथवा पक्ष के आरंभ में ही 25 दिन तक लगातार सूर्य स्वर चले तो दूसरा मास देखना भी उसके लिये शंका का विषय है।
जिसे अपनी जीभ का छोर, नाक या भौं नहीं दिखती उसकी मृत्यु निकट समझो।
मैथुन करते समय आदि में, मध्य में और अंत में जिस मनुष्य को हिचकी लगती है उसका मरण निकट समझना।
जिस मनुष्य की बीच की तीन अंगुली टेढ़ी न होवे और बिना रोग कण्ठ सूखता हो उसका काल निकट है। घी, तेल या पानी में जिसे अपना प्रतिबिम्ब देखते समय शिर न दिखे एक मास में उसकी मृत्यु समझो, हाथ से कान के छिद्र बन्द करने पर जिसे एक प्रकार की आवाज हो जाती है, नहीं सुनाई दे उसके शिर पर काल समझो!
वैसे तो मौत के लक्षण जानने के लिए और भी इस प्रकार की कई बातें हैं, किन्तु विशेष आजमाई हुई दो तीन बातें लिख इस प्रकरण को बन्द कर दूसरा प्रकरण लिखूँगा—
काँसे की थाली में पानी भरकर उसमें सूर्य की छाया दिखावे यदि छाया दक्षिण दिशा में कटी हुई दिखे तो छः महीने में, पश्चिम में कटी दिखे तो तीन महीने में, उत्तर में कटी दिखे तो दो महीने में, पूर्व में कटी दिखे तो एक महीने में, और उसमें यदि छिद्र दिखे तो दस दिन में धुएं से ढंकी हुई छाया दिखे तो उसी दिन मृत्यु का प्रमाण ऋषि वाक्य हैं।
यह प्राकृतिक नियम है कि दाहिने हाथ की मुट्ठी बाँध कर नाक के बराबर भौं के ऊपर माथे पर रखें और नाक के सामने कलाई करे तो दृष्टि करे तो हाथ बहुत पतला दिखता है किन्तु यदि हाथ से मुट्ठी पृथक दिखे तो छः मास के अन्दर मृत्यु निश्चय जानो।
वर्ष फल—वर्ष फल जानने की सुगम विधि यह है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को प्रभात के समय चन्द्र स्वर के साथ पृथ्वी, जल या वायुतत्त्व हो तो शुभदायक है अग्नि या आकाश तत्व हो तो भयदायक है।
क्रमश—
जो कुछ सीखना है जवानी में सीख लो। मौज उड़ाने का अवसर तो उसके पश्चात भी आ सकता है। आराम मुर्दों के लिए है और काम जीवितों के लिए।
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ईसा ने अपने शिष्यों से कहा था स्वर्ग का राज तुम्हारे अन्दर है। इसी प्रकार भारत का राजनैतिक स्वराज्य हमारे अन्दर है। हमीं उस स्वराज्य की स्थापना कर सकते हैं।
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जीवनोद्देश्य की खोज ही सबसे बड़ा सौभाग्य है। उसे बाहर ढूंढ़ने की अपेक्षा अपने हृदय में तलाश करना चाहिए।
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जीवन का नियम यही है कि उचित को ग्रहण और अनुचित का त्याग करो। मन, वचन और क्रिया में सत्य का आश्रय ही दुनिया की अनमोल निधि और जीवन का सर्वोपरि नियम है।
(श्री.-प. कालूराम शर्मा)
शरीर शास्त्र के पंडित जानते हैं कि मनुष्य की मानसिक वृत्तियों आदतों के अनुसार उसके शरीर की बनावट भी हो जाती है। किसी आदत के दृढ़ होने पर उसको लक्षण शरीर पर स्पष्ट प्रतीत होने लगते हैं। इन लक्षणों द्वारा मनुष्य का स्वभाव जाना जा सकता है। इस लेख में उसी पर प्रकाश डाला जा रहा है। आशा है पाठक कि इससे लाभ उठावेंगे।
मस्तक के लक्षण
1. जिस मनुष्य का मस्तक ऊँचा तथा चौड़ा है वह राजा के समान ऐश्वर्य भोगता है।
2. जिसका माथा चौड़ा हो और उस पर शंख चिन्ह हो वह व्यक्ति निर्धन वंश में जन्म लेकर भी विद्वान और यशस्वी होगा।
3. जिसके माथे पर धनुष या श्रीवत्स के चिन्ह हों वह पराक्रमी और बड़ा प्रतापी होगा।
4. जिसका माथा कम चौड़ा हो एवं उसका डडडड का सा चिन्ह हो तो वह धर्माचार्य के रूप में लोगों को ठगने वाला और पाप वृत्तियों में रत रहने वाला होगा।
5. जिसका मस्तक छोटा हो वह साधारण डडडड परन्तु उदार और धर्म प्रेमी होता है।
6. जिसका मस्तक ऊँचा नीचा टेढ़ा मेढ़ा उभरा हुआ होता है वह दुर्बुद्धि, पाप कर्मों वाला होता है।
7. जिसके मस्तक पर ऊँची ऊँची रेखाएं और डडडड की पंखड़ियों की तरह नसें चमकें वह बहुत धनवान होता है।
8. जिसके मस्तक पर पूरी तीन रेखाएं स्पष्ट दिखाई दें वह दीर्घ जीवी और सदाचारी होता है।
9. जिसके मस्तक पर चार रेखाएँ स्पष्ट दिखाई दें वह सौ वर्ष की आयु का उपभोग करता है।
10. जिसका मस्तक नीचा, बीच में गड्ढेदार और बेढंगी नसों से भरा हुआ हो वह दुष्ट कर्मों में रत और जेल आदि राज दंडों को भोगता है।
11. जिसके मस्तक पर सीधी एक रेखा बालों की जड़ तक चली गई हो वह सुख और यश के साथ 80 वर्ष तक जीवित रहता है।
12. जिसकी भृकुटी के ऊपर मस्तक पर चन्द्रमा के समान रेखाएं प्रतीत हों वह 120 वर्ष जीता है।
13. जिसके मस्तक पर पूरी पाँच रेखाएं हों वह धनवान और सौ वर्ष की आयु वाला होता है।
14. जिसके मस्तक पर एक रेखा स्पष्ट और ठीक तरह से देख पड़े वह 90 वर्ष जीवित रहता है।
15. जिसके मस्तक पर खंडित तीन चार रेखाएं हों वह बुद्धिमान होते हुए भी विश्वासघाती, कपटी, चिंतित लम्पट और अल्पायु होता है।
16. जिसके मस्तक के बाएं भाग में टेढ़ी मेढ़ी और छोटी छोटी रेखाएं हों वह जवानी आने से पूर्व ही मर जाता है।
17. जिसके माथे पर एक भी रेखा न हो वह 90 वर्ष जीता है।
18. जिसके मस्तक पर 6, 10 या 11 रेखाएं अधूरी हों तो वह 40 वर्ष की आयु में मर जाता है।
19. जिसके मस्तक पर भृकुटी के पास टेढ़ी मेढ़ी किन्तु पूरी एक रेखा बने तो वह 30 वर्ष जीवित रहेगा।
20. जिसके मस्तक पर भृकुटी के पास केवल एक रेखा बने किन्तु भृकुटियों के बाल आपस में मिले हुए न हों तो वह राजा या राजा के समान ऐश्वर्यमान होगा।
21. मस्तक सकोड़ने पर भी जिसके ललाट पर सलवटें न पड़ें वह बहुत ही थोड़ी आयु तक जीवित रहता है।
22. जिसके मस्तक पर पूरा रामानंदी तिलक का चिन्ह हो वह बड़ा होनहार, पुरुषार्थी, धनी, विद्वान यशस्वी और 50-60 वर्ष की आयु भोगने वाला होता है।
23. जिसका मस्तक का रामानन्दी तिलक दूर से ही दिखाई पड़े, भृकुटियों से लेकर बालों की जड़ तक चला गया हो उस तिलक के बीच की रेखा कुछ टूटी सी हो तो वह 13 मास या 13 वर्ष के अन्दर मर जाता है। यदि इस आयु को पार कर गया तो किसी राजा का मंत्री होगा।
24. ललाट सकोड़ने पर जिसके मस्तक पर तिरछी तीन रेखाएं पड़ें वह गायक, चार पड़ें पर धनी, पाँच पड़ें वह विद्वान और छै पड़ें वह निर्धन होता है।
25. जिसका माथा कम चौड़ा किन्तु अधिक ऊँचा हो वह विद्वान किन्तु धनहीन होता है।
भृकुटी (भौंह) के लक्षण
1. जिसकी भौहें हलकी काली, मोटी, छोटी और खुरदरी हों वह दुराचारी और दरिद्री होता है।
2. जिसकी भौहें खुली हुई, गहरी, काली, चिकनी नरम और छोटी हों वह धनी, सदाचारी और विद्वान है।
3. जिसकी भौहें उखड़ी हुई सी, छिर छिरी, खंडित छोटे सिरे वाली हों, वह व्यक्ति जन्म भर दुखी रहेगा।
4. जिसकी भौहें नाक की हड्डी के पास से निकल कर दौज के चन्द्रमा के समान झुकी हुई हों, बड़ी-चौड़ी तथा काली हों वह पुरुष अवश्य ही धनवान होगा।
5. जिस पुरुष की भौहें बीच में अधिक झुकी हुई हों, वह दुराचारी और नीच विचारों वाला होगा।
6. जिसकी भौहें सदैव नीचे को ही गिरी सी रहें और चिपटी से रहें, वह निर्धन, दुखी और सन्तान से रहित होगा।
7. जिसकी भौहें ऊँची नीची हों वह दरिद्री रहेगा।
8. जिसकी भौहें बहुत ऊँची और धनुषाकार हों वह सुखी रहेगा।
अपने कष्ट मिटाने में हमारी सेवा स्वीकार कीजिए
‘आनन्द प्रतिष्ठान, तन्त्र विद्या की उपासना का एक केन्द्र है। इसके साधक तन्त्र विज्ञान की दुरूह क्रियाएं करके जो शक्ति प्राप्त करते हैं, उसे जनहित में बाँट देते हैं। अब यह निश्चित हो चुका है कि योरोप के डॉक्टर मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म, मैगनेटिज्म, मनो विज्ञान आदि के द्वारा लोगों पर जितना असर डालते हैं तन्त्र विज्ञान द्वारा उन सब से कई गुना असर लोगों पर डाला जा सकता है क्योंकि मैस्मरेजम आदि के जो सिद्धान्त हैं वह सब तो तन्त्र विद्या के भीतर हैं ही, वरन् उससे भी बहुत अधिक बातें उसमें हैं।
मैस्मरेजम आदि की शक्ति स्थूल होने के कारण केवल इतनी ही होती है कि सामने बैठे हुए आदमी पर तात्कालिक असर डाला जा सके। तंत्र-विद्या इससे कहीं सूक्ष्म है। इसकी गूढ़ क्रियाओं द्वारा उत्पन्न किये सूक्ष्म कंपन इतने शक्तिशाली होते हैं कि हजारों मील बैठे हुए आदमी पर भी उतना ही असर डालते हैं जितना पास बैठे हुए पर। उन मंत्रों का प्रभाव क्षणभर खेल दिखाकर ही समाप्त नहीं हो जाता वरन् जिसके ऊपर उपचार किया जाता है उसके गुप्त मन में इतना गहरा उतर जाता है कि साधक में शारीरिक तथा मानसिक विचित्र परिवर्तन हो जाते है।
‘आनन्द प्रतिष्ठान, ने अपना एक ऐसा कार्यक्रम बना रखा है कि कठिन साधना द्वारा प्राप्त शक्ति को पीड़ितों की सेवा में लगाया जाय और इसके बदले किसी गरीब अमीर से पाई पैसा का कोई ठहराव न किया जाय। अर्थात् लोगों के कष्टों को दूर करने का उपचार बिल्कुल मुफ्त किया जाय। लाभ होने पर बिना माँगे कोई कुछ दे दे तो संतोषपूर्वक उसी से साधक जीवन निर्वाह करें।
तन्त्र विद्या द्वारा कठिन से कठिन शारीरिक रोग, मानसिक रोग, बुरी आदतें, संतान संबंधी चिन्ता, गृह कलह, बुरे दिन, अनिष्ट की आशंका, भूत बाधा, अशान्ति आदि का आसानी से उपचार हो सकता है। जिन लोगों को कोई ऐसा रोग है जिससे जिन्दगी को खतरा है उनका हम उपचार करते हैं (अब शारीरिक रोगियों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि उपचारक कठिन परिश्रम के कारण स्वयं बीमार पड़ने लगे हैं। इसलिए शारीरिक रोगों की चिकित्सा के लिए यह नियम बना दिया गया है कि केवल वे ही रोगी पत्र व्यवहार करें जिन्हें जीवन का खतरा है। साधारण छोटे मोटे रोगों के लिए अपने यहाँ के चिकित्सकों से ही इलाज करा लेना चाहिए। हाँ मानसिक रोगों की उपचार व्यवस्था पूर्ववत् ही चालू है।) स्मरण शक्ति की कमी, सिर में भारीपन, उद्विग्नता, चिन्ता, उदासी, निराशा निरुत्साह, भय, हीनता की भावना, बुरे कामों की प्रवृत्ति, क्रोध, बुरी आदतें, चिड़चिड़ापन, नींद की कमी आदि मानसिक रोगों के लिए तंत्रोपचार रामबाण है। कुटुम्ब, मित्र या पत्नी से झगड़ा रहता है, संतान नहीं होती, होकर मर जाती है या लड़कियाँ ही लड़कियाँ होती हैं, किसी शत्रु द्वारा अपना अनिष्ट होने के आशंका है, भूत प्रेतादि के उपद्रव होते हैं तो भी इस विद्या द्वारा आश्चर्यजनक लाभ उठाया जा सकता है। एक बात हम स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तंभन आदि पाप-पूर्ण क्रियाएं किसी के पक्ष विपक्ष में किसी दशा में नहीं करते इसके लिए कोई सज्जन लिखा पढ़ी न करें। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि तेजी मन्दी का भाव, दड़ा, सट्टा, फ्यूचर, गड़ा, धन, चोरी का माल, भविष्य, हस्तरेखा, जन्मपत्र, आदि भी हम नहीं बताते इसलिए कोई महानुभव इनके कामों के लिए भी पूछने ताछने का कष्ट न उठावें।
एक और बात भी समझ रखनी चाहिये कि हमारा उद्देश्य शारीरिक, मानसिक तथा बाहरी कष्टों से अपने भाई बहिनों को बचाने का प्रयत्न करने मात्र का है। और इसके लिए मनोविज्ञान के डाक्टरों के मत से विशुद्ध वैज्ञानिक आध्यात्मिक क्रियाओं का ही उपयोग करते हैं। किसी अन्ध विश्वास, ढोंग, भ्रमजाल के फैलाने का हमारा कोई मन्तव्य नहीं है। स्पष्ट है कि जब हम किसी से कोई ठहराव नहीं करते, फीस नहीं माँगते, रुपये नहीं ऐंठते तो क्यों किसी को धोखे में डालेंगे। और क्यों ढोंग फैलावेंगे।
जिन्हें इस विज्ञान पर विश्वास हो, या कम से कम जितने दिनों इस विज्ञान से लाभ उठावें उतने ही दिन तक परीक्षा के तौर पर जो विश्वास रख सकें वे निःसंकोच बन्द लिफाफे में अपना पूरा विवरण लिख भेजें, हम तुरंत ही उपचार सामग्री भेजेंगे इसके बदले में किसी प्रकार की कीमत नहीं लेंगे। उपचार आरंभ करते समय हमें रोगी की चार चीजों की जरूरत पड़ती है। (1) रोग का कारण, वर्तमान स्थिति और रोगी का वर्तमान समय का पूरा परिचय (2) रोगी फोटो (यह पाँच वर्ष से अधिक पुराना न हो) (3) रोगी के शिखा स्थान (चोटी) के 11 बाल (4) सफेद स्याही सोख व्लाटिग पेपर) पर पटकाया हुआ रोगी के बाँए अंगूठे में से एक बूँद खून। यह चारों चीजें पास होने पर पूरी तरह उपचार आरंभ हो सकता है, यदि फोटो तैयार न हो तो वह पीछे भेजा जा सकता है। यदि रोगी छोटा बालक हो या बहुत डरपोक हो तो खून से भी छुट्टी दी जा सकती है। पर सफलता में जरा देर लग जाती है।
आध्यात्म विद्या की शिक्षा देने की भी व्यवस्था की गई है। जो सज्जन अपनी आध्यात्मिक उन्नति करना चाहते हैं दूसरों की चिकित्सा करने की शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं, अलौकिक और गुप्त बातों को जानने की योग्यता प्राप्त करना चाहते हैं, वे निष्कपट भाव से बिलकुल मुफ्त शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। किन्तु उन्हें यह प्रतिज्ञा अवश्य करनी पड़ेगी कि वे इस विद्या का उपयोग परोपकार के लिए ही करेंगे। अपनी नीच वासनाओं की पूर्ति या अपना अनुचित स्वार्थ साधन करने के लिए इस विद्या का उपयोग करने वाले लोगों को हमारे द्वारा किसी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने की आशा न करनी चाहिए।
यह पहले ही कहा जा चुका है कि किसी भी उपचार के लिए न तो फीस माँगी जाती है और न ठहराई जाती है न पीछे कोई झगड़ा किया जाता है। कुछ देने न देने से रोगी बिलकुल स्वतन्त्र है। बहु मूल्य रामबाण दवाएँ, रसायनें जड़ी बूटियां, साधना यंत्र, कवच, रक्षा विधान आदि सब चीजें अपने पैकिट से बिलकुल मुफ्त भेजते हैं। पर डाक खर्च का भी खर्च उठाने में हम अभी असमर्थ है। इसके लिए रोगी को अपनी ही व्यवस्था करनी पड़ेगी। पत्र के साथ एक आने का टिकट जरूर भेजना चाहिए अन्यथा उत्तर न दिया जा सकेगा।
विज्ञान-सम्मत तन्त्र विद्या के अपूर्व लाभों को उठाने से आप वंचित न रहिये। हमसे अपनी कुछ सेवा लीजिये तो सही, शायद ईश्वर इसी बहाने आपका कुछ भला करने की सोच रहा हो।
पत्र व्यवहार का पता—
‘आनन्द प्रतिष्ठान, फ्रीगंज, आगरा।
(श्री. रज्जनलालजी प्रधान, एम. ए.)
प्राची शुभ भेष भरे, रोली का कैसा सुन्दर थाल सजा।
पट खोल आज रूपसि देवी, अभिषेक कर रही है नभ का॥
च्युँ-च्युँ, म्युँ-म्युँ, कलरख पंछी, रुन-झुन रुन-झुन स्वर नर्तन का।
यह चंचल चंचल मंद पवन, स्पर्श विचंचल-अंचल का॥
मन-रंजन नींद-विभंजन का, गाती ऊषा अनुराग राग।
रवि लाया है संदेश नया, उठ जाग! जाग!! जग जाग! जाग!
अभिषेक समाप्त हुआ नभ का, अब बिखर पड़ी रोली भूपर।
जगमग जगमग जग उठी ज्योति, अरुणिम अरुणिम नीचे ऊपर॥
सत रंग बिरंगी रंग थली, जल पुत्र खिले जल के ऊपर।
जग जीवन का संचार हुआ, स्वर्णिम स्वर्णिम किरणें छूकर॥
तमचुर ने फूँका सुमुख शंख, रण जाग। रण जाग॥ जाग! जाग!!
रवि लाया है संदेश नया, उठ जाग! जाग!! जग जाग! जाग!!
यह विश्व हमारा गेह बने, शुभ देश बने प्राची आली।
प्रस्फुटित किरण के होते ही, जगती में छिटके नभ लाली॥
अमृत बरसे इस भूतल पर, पल्लवित खिले डाली डाली।
अपने उपवल की हरियाली को देख देख विहंसे माली॥
अलि सुन्दर अदय होय, शशि सा जननी का नव सुहाग!
रवि लाया है संदेश नया, उठ जाग! जाग!! जग जाग! जाग!!
तम, निशा, निशाचर जायं भाग, दुति हीन शीघ्र हों कपट चंद।
रवि के प्रकाश से क्षीण होय, जग के दीपक सब मंद मंद॥
कट जाय रश्मि को छूते ही, तामस रजनी का अलक फंद।
गा उठें एक स्वर में विहंग, विरुदावलियों के धवल छंद॥
खुल खुल जावें जग नेत्र बंद, उठ त्याग! त्याग!! भय त्याग! त्याग!!
रवि लाया है सन्देश नया, उठ जाग! जाग!! जग जाग! जाग!!
*समाप्त*