ऐसी होली जले ज्ञान की ज्योति जगत में भर दे।
कलुषित कल्मष जलें, नाश पापों तापों का कर दे॥
अखण्ड ज्योति का यह अंक जिस दिन पाठकों के हाथ में पहुँचेगा, प्रायः उसके दूसरे दिन होलिका दहन का त्योहार होगा। गरीब अमीर सभी अपनी स्थिति के अनुसार होली मनाने की तैयारी कर रहे होंगे। पकवान, मिष्ठान, बनाने की तैयारियाँ हो रही होंगी, नये कपड़े बन रहे होंगे, बच्चे होलिका दहन का तमाशा देखने और धूलि उड़ाने के लिए उस समय की घड़ियां गिन रहे होंगे। रंग खेलने के लिए, मुँह से गुलाल मलने के लिए मित्रगण, प्रेमी प्रेमिकाएं व्याकुल हो रहे होंगे। व्यापारी इस अवसर पर अधिक बिक्री होने की आशा से दुकानें सजा रहे होंगे, मजदूर लोग, उस दिन काम न करना पड़ेगा यह सोच कर प्रसन्न हो रहे होंगे, हंसते खेलते बालकों को देखकर माता पिता उत्फुल्ल हो रहे होंगे। जगह-जगह गाने बजाने का ठाठ जमा होगा। लोगों की इस प्रसन्नता को देखकर प्रकृति चुप न बैठेगी। बसंत महाराज अपना वैभव इस पीड़ित दुनिया के ऊपर बखेर रहे होंगे। नन्हे-नन्हे पौधों से लेकर विशाल वृक्षों तक सब हरियाली से भरपूर होंगे। अपने फूलों की सुरभी दशों दिशाओं में उड़ाकर आनन्द का झरना बहा रहे होंगे। अखंड ज्योति के पाठक क्या इस उत्सव से अलग होंगे? नहीं। वे भी इस हंसी खुशी में भाग ले रहे होंगे उसकी प्रसन्नता में भाग लेता हुआ मैं भी आनन्दित हो रहा हूँ और अपनी शुभकामना की लहरें उन तक भेजने का प्रयत्न कर रहा हूँ।
होलिकोत्सव का यह त्योहार उस प्यास की एक धुँधली तस्वीर है जिसकी इच्छा आदमी को हर समय बनी रहती है। मौज! आनंद! खुशी! प्रसन्नता! हर्ष! सुख! सौभाग्य! कितने सुन्दर शब्द हैं इनका चिन्तन करते ही नसों एक बिजली सी दौड़ जाती है। आदमी युगों से आनन्द की खोज कर रहा है उसका अन्तिम लक्ष्य ही अखण्ड आनन्द है। यह राजहंस मोतियों की तलाश में जगह-जगह भटकता फिरता है। विभिन्न प्रकार के पत्तों पर पड़ी हुई ओस की बूँदें उसे मोती दीखती हैं, उन्हें लेने के लिए बड़े प्रयत्न के साथ वहाँ तक पहुँचता है, पर चोंच खोलते ही यह गिर पड़ती हैं और राजहंस अतृप्त का अतृप्त ही बना रहता है। एक पौधे को छोड़ कर दूसरे पर दूसरे को छोड़ कर तीसरे पर और तीसरे को छोड़ कर चौथे पर जाता है पर संतोष कहीं नहीं मिलता। वह भ्रमपूर्ण स्थिति में पड़ा हुआ है। जिन्हें वह मोती समझता है असल में ओस की वे बूँदें मोती हैं नहीं। वह तो मोतियों की एक झूठी तस्वीर मात्र हैं। तस्वीरों से आदमी टकरा रहा है। दर्पण की छाया को अपनी कार्य संचालक बनाना चाहता है। इस प्रयत्न में उसने असंख्य युगों का समय लगाया है। परन्तु तृप्ति अब तक नहीं मिल पाई है। मनोवाँछा अब तक पूरी नहीं हो सकी है।
आनंद की खोज में भटकता हुआ इंसान,दरवाजे दरवाजे पर टकराता फिरता है। बहुत सा रुपया जमा करें, उत्तम स्वास्थ्य रहे, रमणियों से भोग करें, सुस्वादु भोजन करें, सुन्दर वस्त्र पहनें, बढ़िया मकान और सवारियाँ हों, नौकर चाकर हों, पुत्र, पुत्रियों, वधुओं से घर भरा हो, उच्च अधिकार प्राप्त हो, समाज में प्रतिष्ठा हो, कीर्ति हो, यह चीजें आदमी प्राप्त करता है। जिन्हें यह चीजें उपलब्ध नहीं होतीं वे प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। जिनके पास हैं वे उससे भी अधिक लेने का प्रयत्न करते हैं। कितनी ही मात्रा में यह चीजें मिल जाएं पर पर्याप्त नहीं समझी जातीं जिससे पूछिये यही कहेगा ‘मुझे अभी और चाहिये।’ इसका एक कारण है, स्थूल बुद्धि तो समझ भी लेती है कि काम चलाने के लिये इतना काफी है, पर सूक्ष्म बुद्धि भीतर ही भीतर सोचती है यह चीजें अस्थिर हैं किसी भी क्षण इनमें से कोई भी चीज कितनी ही मात्रा में बिना पूर्व सूचना के नष्ट हो सकती है। इसलिये ज्यादा संचय करो ताकि नष्ट होने पर भी कुछ बचा रहे। यही नष्ट होने की आशंका अधिक संचय के लिए प्रेरित करती रहती है। फिर भी नाशवान चीजों का नाश होता ही है। यौवन ठहर नहीं सकता, लक्ष्मी किसी की दासी नहीं है, मकान, सवारी,घोड़े ,कपड़े भी स्थायी नहीं, भोजन और मैथुन का आनन्द कुछ क्षण ही मिल सकता है। हर घड़ी उसकी प्राप्ति होती रहना असंभव है। जिनकी आज कीर्ति छाई हुई है कल ही उनके माथे पर ऐसा काला टीका लग सकता है कि कहीं मुँह दिखाने को भी जगह न मिले। सारे आनंदों को भोगने के मूल साधन शरीर का भी तो कुछ ठिकाना नहीं। आज ही बीमार पड़ सकते हैं, कल अपाहिज होकर इस बात के मुहताज बन सकते हैं कि कोई मुँह में ग्रास रख दे तो खालें और कंधे पर उठा कर ले जाय तो टट्टी हो आवें।
इन सब तस्वीरों में आनन्द की खोज करते करते चिरकाल बीत गया पर राजहंस को ओस ही मिली। मोती? उसकी तो खोज ही नहीं की। मानसरोवर की ओर तो मुँह ही नहीं किया। लम्बी उड़ान भरने की तो हिम्मत ही नहीं बाँधी। परों को फड़-फड़ाया, परन्तु फिर मटर के खेत में मोतियों का खजाना दिखाई पड़ गया। मन ने कहा, “जरा इसे और देख लें। आँखों से न दीख पड़ने वाली मानसरोवर में मोती मिल ही जायेंगे इसी की क्या गारंटी है।” फिर ओस चाटी और फिर फड़-फड़ाया। फिर वही, यहीं पहिया चलता रहता है।
आप अपने जीवन में कितनी होलियाँ मना चुके, कितने दिवालियाँ बिता चुके, सावन, सनुने, दौज, दशहरे अबतक कितने बिता दिये, जरा उँगलियों पर गिन कर बताइये तो कितनी बार आपने धूम-धाम से तैयारियाँ की और कितनी बार आनन्द सामग्री को विसर्जित किया। आपने उनमें खोजा, कुछ क्षण पाया भी, परन्तु ओस की बूँदें ठहरीं कब? वे दूसरे ही क्षण जमीन पर गिर पड़ीं और धूलि में समा गईं। इस बार की होली भी ऐसी ही होनी है। चैत बदी प्रतिपदा, दौज, तीज के बाद त्योहार की एक धुँधली सी स्मृति रह जायगी। और चौथ, पाँचें को ही कोई कष्ट आ गया तो भूल जायेंगे कि इसी सप्ताह हमने किसी त्योहार का आनंद भी उठाया था। ऐसे अस्थिर आनंद पर मेरी बधाई कुछ ज्यादा उपयुक्त न होती पर यह छाया दर्शन भी कोई दुख की बात नहीं है।
मैं चाहता हूँ कि आप इस होली पर खूब आनंद मनायें और साथ ही यह भी चिन्तन करें कि जिसकी यह छाया है उस अखण्ड आनन्द को मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरी युग-युग की प्यास कैसे बुझ सकती है? इस अँधेरे में कहाँ से प्रकाश पा सकता हूँ जिससे अपना स्वरूप और लक्ष्य की ओर बढ़ने का मार्ग भली प्रकार देख सकूँ ? सच्चे अमृत को मैं कैसे और कहाँ से प्राप्त कर सकता हूँ ?
आइये, उस अखण्ड आनन्द को प्राप्त करने के लिए हृदयों में होली जलावें। सच्चे ज्ञान की ऐसी उज्ज्वल ज्वाला हमारे अन्तरों में जल उठे जिसकी लपटें आकाश तक पहुँच। अन्तर के कपट खुल जावें और उस दीप्त प्रकाश में अपना स्वरूप परख सकें। दूसरे पड़ोसी भी उस प्रकाश का लाभ प्राप्त करें। चिरकाल के जमा हुए झाड़ झंखाड़ इस होलिका की ज्वाला में जल जावें। विकारों के राक्षस जो अँधेरी कोठरी में छिपे बैठे हैं और हमें भीतर ही भीतर खोंट खोंप कर खा रहे हैं इसी होलिका में भस्म हो जावें। अपने सब पाप तापों को जला कर हम लोग शुद्ध स्वर्ण की तरह चमकने लगें। उसी निर्मल शरीर से वास्तविक आनन्द प्राप्त किया जा सकेगा।
अखण्ड-ज्योति परिवार के हृदयों में ईश्वर ऐसी ही होली जला दें। यही आज मेरी प्रार्थना है।
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आध्यात्म विद्या प्रेमियों से प्रार्थना
ऐसा निश्चय किया गया है कि ‘अखण्डज्योति’ में आध्यात्म विद्या प्रेमियों के चित्र भी हर अंक में दिये जाया करें। इसलिये आध्यात्म विद्या प्रेमी, सदाचारी, ईश्वर भक्त और लोक-सेवी भाई बहिनों से प्रार्थना है कि वे आप के संक्षिप्त परिचय भेजने की कृपा करें। परिचय पाकर अपनी आवश्यकतानुसार उन सज्जनों से हम चित्र मंगवा लेंगे और पत्र में संक्षिप्त परिचय के साथ प्रकाशित करेंगे।
‘अखंडज्योति’ के पाठकों से भी प्रार्थना है कि उक्त प्रकार के किन्हीं आध्यात्म विद्या प्रेमी भाई बहिनों को जानते हों तो उनका पता और परिचय हमारे पास लिख भेजें, जिससे हम स्वयं उनसे फोटो की याचना कर लें। आशा है कि इस विषय में पाठक हमारी सहायता करेंगे।
-संपादक
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(महात्मा गाँधी)
सत्य शब्द का मूल सत् है। सत् के मानी है होना, सत्य अर्थात् होने का भाव। सिवा सत्य के और किसी चीज की हस्ती ही नहीं है। इसीलिये परमेश्वर का सच्चा नाम सत् अर्थात् सत्य है। चुनाँचे, परमेश्वर सत्य है, कहने के बदले सत्य ही परमेश्वर है यह कहना ज्यादा मौजूँ है। राज चलाने वाले के बिना, सरदार के बिना, हमारा काम नहीं चलता, इसी से परमेश्वर नाम ज्यादा प्रचलित है और रहेगा। पर विचार करने से तो सत्य ही सच्चा नाम मालूम होता है और यही पूर्ण अर्थ का सूचक भी है।
जहाँ सत्य है वहाँ ज्ञान-शुद्ध ज्ञान है ही। जहाँ सत्य नहीं वहाँ शुद्ध ज्ञान हो नहीं सकता, इसीलिए ईश्वर नाम के साथ चित्-ज्ञान शब्द जोड़ा गया है। जहाँ सत्य ज्ञान है वहाँ आनन्द ही हो सकता है, शोक हो ही नहीं सकता और चूँकि सत्य शाश्वत है इसलिये आनन्द भी शाश्वत होता है। इसी कारण हम ईश्वर को सच्चिदानन्द के नाम से भी पहचानते हैं।
इस सत्य की आराधना के लिये ही हमारी हस्ती हो और इसी के लिये हमारी हर एक प्रवृत्ति हो। इसी के लिये हम हर बार श्वासोच्छ्वास लें। ऐसा करना सीख जाने पर हमें बाकी नियम सहज ही हाथ लगेंगे और उनका पालन भी आसान हो जायगा। बगैर सत्य के किसी भी नियम का शुद्ध पालन अशक्य है।
आमतौर पर सत्य के मानी हम सच बोलना ही समझते हैं। लेकिन हमने तो सत्य शब्द का विशाल अर्थ में प्रयोग किया है। विचार में, वाणी में और आचार में सत्य-ही-सत्य हो। इस सत्य को सम्पूर्णतया समझने वाले को दुनिया में दूसरा कुछ भी जानना नहीं रहता, क्योंकि सारा ज्ञान इसमें समाया है, इसे हम ऊपर देख चुके हैं। इसमें जो न समा सके वह सत्य नहीं है, ज्ञान नहीं है, तो फिर उससे सच्चा आनन्द तो मिल ही कैसे सकता है? यदि हम इस कसौटी का प्रयोग करना सीख जाएं तो तुरन्त ही हमें पता चलने लगे कि कौन सी प्रवृत्ति करने योग्य है और कौन सी त्याज्य; क्या देखने योग्य है, क्या नहीं; क्या पढ़ने योग्य है, क्या नहीं।
लेकिन यह सत्य जो पारस मणि रूप है, कामधेनु रूप है, कैसे मिले? इसका जवाब भगवान ने दिया है, अभ्यास से और वैराग्य से। सत्य की ही लगन अभ्यास है और उसके बिना दूसरी तमाम चीजों के लिये आत्यन्तिक उदासीनता वैराग्य है। यह होते हुए भी हम देखा करेंगे कि एक का सत्य दूसरे का असत्य है। इससे घबराने की कोई जरूरत नहीं। जहाँ शुद्ध प्रयत्न है वहाँ भिन्न मालूम होने वाले सब सत्य एक ही पेड़ के असंख्य भिन्न दीख पड़ने वाले पत्तों के समान हैं। परमेश्वर भी कहाँ हर आदमी को भिन्न नहीं मालूम होता? तो भी हम यह जानते हैं कि वह एक ही है। लेकिन सत्य ही परमेश्वर का नाम है इसलिये जिसे जो सत्य लगे वैसा वह बरते तो उसमें दोष नहीं, यही नहीं, बल्कि वही कर्तव्य है। यदि ऐसा करने में गलती होगी तो वह भी सुधर जायेगी। क्योंकि सत्य की शोध के पीछे तपश्चर्या होती है यानी स्वयं दुःख सहन करना होता है, उसके लिये मरना भी पड़ता है, इसलिये उसमें स्वार्थ की तो गन्ध तक नहीं होती। ऐसी निःस्वार्थ शोध करते हुए आज तक कोई ऐसा न हुआ जो आखिर तक गलत रास्ते गया हो। रास्ता भूलते ही ठोकर लगती है और फिर वह सीधे रास्ते पर चलने लगता है। इसीलिये सत्य की आराधना भक्ति है और भक्ति तो ‘सिर का सौदा है’,अथवा वह हरि का मार्ग है अतः उसमें कायरता की गुंजाइश नहीं। उसमें हार जैसा कुछ है ही नहीं। वह तो ‘मर कर जीने का मन्त्र है।’
इस सिलसिले में हरिश्चन्द्र, प्रह्लाद, रामचन्द्र, इमाम हसन, हुसेन, ईसाई सन्त वगैरा के चरित्रों का विचार कर लेना चाहिये और सब बालक, बड़े, स्त्री पुरुष को चलते बोलते, खाते-पीते, खेलते, मतलब हर काम करते हुए सत्य की रट लगाये रहनी चाहिये। ऐसा करते-करते वे निर्दोष नींद लेने लग जायँ तो क्या ही अच्छा हो ? यह सत्य रूपी परमेश्वर मेरे लिये तो रत्नचिन्तामणि साबित हुआ है। हम सब के लिये हो।
सप्त महाव्रत
(ले.-श्री व्यंकटलाल पुरोहित, खिलचीपुर)
ईश्वर को मानने और न मानने वाले आदमियों में ऐसी एक बड़ी संख्या मिलेगी जो ईश्वर अमुक स्थान पर है अमुक स्थान पर नहीं इसी प्रश्न को लेकर एक बड़ा मत-भेद उपस्थित है और अपने अपने पक्ष का समर्थन कर के लोगों को भ्रम में डालते हैं। खुदा सातवें आसमान पर रहता है और भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषजी की शैय्या पर विराजमान हैं यदि कोई इन बातों को मानने से इनकार करता है तो उसे धर्म द्रोही या नास्तिक नहीं कहा जा सकता। ईश्वर के संबंध में उपरोक्त प्रकार के वर्णन जिन धर्म शास्त्रों में आये हैं वहाँ अलंकारिक भाषा का प्रयोग हुआ समझना चाहिए अन्यथा ईश्वर भी एक व्यक्ति विशेष ही रह जायगा और उसमें सत् चित् आनन्द का अभाव मानना पड़ेगा। वह ऊपर क्षीर सागर में रहता है तो क्षीर सागर में किसकी सत्ता है ? सातवें आसमान पर है तो बाकी छह आसमानों पर किसका नियंत्रण है? यही बात तीर्थ आदि के सम्बंध में है । वे स्थान धर्म लाभ के लिए उपयुक्त और सुविधाजनक हो सकते हैं। पर यदि किसी स्थान विशेष पर ही ईश्वर का प्रेम या ममता हो तो उस पर विकारी होने का दोष लग जायगा।
ईश्वर के स्थान, गुण, भक्तवत्सलता आदि के कितने ही विचित्र वर्णन मिलते हैं। असल में वह भक्तों की प्रेम विभोर दशा की भावुकता सब कल्पनाएँ हैं। ईश्वर सम्बंधी किसी धारणा को खंडन करके वैसी भावना रखने वाले भक्तों के कोमल हृदयों को चोट पहुँचाने का हमारा मन्तव्य नहीं है। हम तो यहाँ केवल उसी एक बात का प्रतिपादन कर रहे हैं जिसे किसी न किसी रूप में अन्ततोगत्वा सब लोग मानते हैं। ईश्वर हमारे अपने अन्दर है सब लोग जानते हैं और मानते हैं कि जीव ईश्वर का ही अंश है। विकारों का आवरण मकड़ी के जाले की भाँति जीव के वारों ओर इस प्रकार तन गया है कि वह आत्म स्वरूप को पहचान नहीं पाता। उसकी समझ में ही नहीं आता कि वास्तव में वह है क्या? गूलर के फल में रहने वाले जन्तु के मन की कल्पना कीजिए। क्या यह आत्मस्वरूप को जानता होगा? फल के आवरण ने जब तक उसे दुनिया से अलग कर रखा है तब तक वह छोटा कीड़ा अपने को हाथी समझ सकता है, ब्रह्माण्डों का राजा समझ सकता है, रजकण समझ सकता है या चाहे जो समझ सकता है। उसे आत्मस्वरूप की जानकारी तभी होगी जब वह बाहरी दुनिया के बारे में अधिक जानकारी रखे। जीव भी अपने बारे में विभिन्न कल्पनाएं करता है। कोई अपने को धोबी समझता है तो कोई ब्राह्मण कोई कलक्टर है तो कोई पटवारी, कोई एम.ए. है तो कोई निरक्षण कोई ईसाई है तो कोई हिन्दू, यह सभी जानकारियाँ भ्रमपूर्ण हैं। जीव जानता है कि अपने सम्बंध में मुझे यह जो जानकारी है वह पूर्ण और निर्भ्रांत नहीं है, इसलिए शान्ति उपलब्ध नहीं कर पाता। हरदम उसे वही जिज्ञासा सताती रहती है कि ‘मैं हूँ क्या?’ दुनिया के बंधन हमें भुलाते हैं, माया बहकाती है कि अरे क्या रखा है इस व्यर्थ की बातों में, काम काज की फिक्र करो, इस सोच विचार में कुछ होना जाना नहीं है। साँसारिक बंधन एक प्याला पिला कर चुपके से कहते हैं मस्त पड़े रहो यार,क्यों ढूंढ़ खोज में पड़े हो। इन सब भुलावों, बहावों के बीच हमारा व्यापारी मन भूल भी जाता है, पर सत् चित् स्वरूप अन्तरात्मा को आनन्द नहीं मिलता वह आनन्द की प्यास भटकती है। व्यापारी मन यद्यपि खिलौनों पर रीझ रहा है और अन्तरात्मा की पुकार को नहीं सुनता परन्तु फिर भी दुर्दमनीय लालसा किसी प्रकार शान्त नहीं होती, बारहसिंगा कस्तूरी की गंध पाता है और उसे प्राप्त करने के लिए बिना विश्राम लिये दिन रात चारों ओर दौड़ता फिरता रहता है। यही बात हमारी अपनी है। उस ईश्वरीय आनन्द की तलाश में मन भटकता है। चारों ओर चौकड़ी भरता है। क्षण भर के लिए भी विश्राम नहीं लेता। सब तरह की मनोहर चीजें दिखाई पड़ती है पर उसे अपनी इच्छित वस्तु दिखाई ही नहीं पड़ती ।
मन बड़ा चंचल है। क्षण भर भी एक चीज पर नहीं टिकता। अभी यहाँ की सोच रहा है तो अभी वहाँ का विचार करने लगा। अभी कविता करने में लाभ हुआ था, तो अभी हजामत बनाने को याद आ गई। वही चित्त की छलाँगें हैं। बारहसिंगे को कहीं चैन नहीं। हर घड़ी ढूंढ़ खोज, ढूंढ़ खोज। चित्त की यह चंचलता आत्मस्वरूप को देखने के लिये है। जिसने आत्मस्वरूप को देख लिया उसे आनन्द की उपलब्धि हो गई। जिसने अपने को पहचान लिया उसने ईश्वर को पकड़ लिया। ईश्वर अपनी आत्मा में समाया हुआ है। इससे निकट और इससे सरलता के साथ उसे कहीं अन्यत्र नहीं पा सकते। ईश्वर दर्शन का निकटतम और निरापद स्थान अपने ही अन्दर है।
अपने अन्दर हम उसे खोजें तो वह अवश्य मिलेगा। यह कोई कल्पना या भुलावा नहीं है। ध्यान दीजिए, पहचानने की कोशिश कीजिए आपको अपने अन्दर हंसता खेलता बात चीत करता रोता गाता ईश्वर दिखलाई पड़ेगा। वह हर मामले में बिना पूछे अपनी सलाह देता है, कोई काम करते ही उसकी भलाई बुराई बताता है और काम पूरा होने पर कहता है कि मैं इससे प्रसन्न हूँ या अप्रसन्न, जब वह हमारे ऊपर अपना स्नेह और रोष प्रकट करता है तब भी हमें स्पष्ट दिखाई दे सकता है। यह दर्शन करने के लिए अपनी आँखों पर बंधी हुई पट्टी को खोलनी पड़ेगी,अपनी निगाह का धुँधलापन हटाना पड़ेगा ईश्वर की आवाज सुनने और उसके स्वरूप का दर्शन करने के लिए किसी विशेष साधन की जरूरत नहीं केवल अपने अन्दर तीक्ष्ण दृष्टि फेंकने की जरूरत है। जिसने ईश्वर दर्शन के मार्ग पर अग्रसर होने का निश्चय किया उसे पग-पग पर उस सच्चिदानन्द की झाँकी अधिक स्पष्ट होती गयी।
जब चोरी करने जाया जाता है तब अन्दर से आवाज आती है यह बुरा काम है, मत करो, इसे मत करो। अब चोरी का विचार मन में आता है उसी क्षण से ईश्वर चिल्लाता है ‘यह पाप है’ जब चोरी के लिए कदम बढ़ाते हैं तो अन्तर में बैठा हुआ वह न्यायाधीश कुहराम मचाता है कि अरे भाई मान अब भी मान यह कुहराम इतना तीव्र होता है कि शरीर की सारी दीवारें गूँजने लगती हैं। दिल धड़कता है, पैर काँपते हैं। पर हम उस पर ध्यान न देकर मदोन्मत्त होकर उसी दुष्कर्म में प्रवृत्त हो जाते हैं। चोरी कर चुकने के बाद ईश्वर धिक्कारता रहता है ‘दुष्ट तूने बुरा किया’ बहुत देर तक यही आवाज आती रहती है। जैसे अदालत के सामने खड़ा हुआ अपराधी काँपता रहता है उसी प्रकार मन डर के मारे थर-थराता रहता है और बेचैनी छाई रहती है। यही ईश्वर की आवाज है। पर क्या हम उसे सुनने को तैयार रहते हैं? क्षण क्षण पर हम उसे कुचलते रहते हैं। उससे बचने के लिये कानों में रुई लगाते हैं। अक्सर चोर, डाकू दुराचारी, लम्पट अपना पा कर्म करने से पूर्व शराब, चरस आदि मादक दृव्य पीकर मदहोश हो जाते हैं ताकि वे ईश्वर की आवाज न सुन सकें और अपना काम बिना डरे झिझके कर सकें।
जब कोई शुभ कार्य हम से बन पड़ता है। निस्वार्थ भाव से किसी की सेवा सहायता करते हैं, दान देते हैं, परोपकार करते हैं तो एक प्रकार का विशेष संतोष और आनन्द सा हृदय के अन्दर मालूम पड़ता है। यही ईश्वर की तुष्टि है। मानो ईश्वर हमारी पीठ ठोंकता हुआ शाबाशी दे रहा है। हर काम के करने में हर समय हमारे भीतर से ईश्वरीय सन्देश मिलता है। जब रास्ते पर से भटकते हैं तो चेतावनी मिलती है। सच्चे मित्र की तरह वह सदैव हमारे पास रहता है और पथ प्रदर्शक का काम करता है।
इसे जिसने पहिचाना वह अमर हो गया। जिसने उस परम पिता का दर्शन कर लिया वह निर्मल हो गया जिसमें उस महार्णव में अपने को नमक की डेली की तरह घुला दिया वह मुक्त हो गया कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है। तीर्थ, वन, पर्वत, नदी, गुफा, एकान्त, मन्दिर, मस्जिद इनमें ईश्वर नहीं है। बड़े अनुष्ठान, पूजा,व्रत, यज्ञ, तप करने से भी उसकी प्राप्ति नहीं होती यदि आप ईश्वर को ढूंढ़ना चाहते हैं, उसका पता पाना चाहते हैं तो अपने अन्दर ढूंढ़ये। देखिये वह आपको गोदी में लेने के लिये कब से भुजा पसारे खड़ा है। भटकिये मत, सीधे चले जाइये और उसके चरणों में अपना सर्वस्व समर्पण कर दीजिए।
ईश्वर हमारे अन्दर है। इस सत्य पर तुम जितना ही ध्यान दोगे और विश्वास करोगे उतने ही तुम्हारे शरीर के कण 2 में यही भाव भर जावेंगे और तुम्हारे अन्दर से भय के विचार विदा हो जायेंगे। तुम्हारी अप्रसन्नता प्रसन्नता में परिणित हो जायेगी और तुम उस महान शक्तिमान के निकटतर होते जाओगे।
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प्रार्थना करने से जी न चुराओ, ईश्वर में अविश्वास न रखो। किसी बात को बिना जाने उसे फिजूल मत मानों, ईश्वर तुम्हारी प्रार्थना को अवश्य सुनेगा और तुम्हारे हृदय के भावों के अनुसार तुम में गति प्रदान करेगा। यह गति तुमको कल्याण-मार्ग पर अग्रसर कर देगी और तुम्हारा भविष्य समुज्ज्वल हो जायेगा।
(रचयिता श्री. जिज्ञासु)
(1)
वह जीवन ज्योति जगायेंगे।
करदे प्रदीप्त दिग् मण्डल को,
जिसकी उज्ज्वल प्रकाश रेखा
भूले भटकों को मार्ग मिले,
वे ढूंढ़ सकें पथ का लेखा॥
अज्ञान विनाश हुआ मेरा,
अँधियारी सारी दूर हुई
सहसा यह बोल उठे जिसने,
उस ज्योतित रेखा को देखा॥
तम तोम न रहने पायेंगे
वह जीवन ज्योति जगायेंगे
(2)
जिसका प्रकाश पाकर विकसें,
रोती मुरझाती सी कलियाँ।
जिस खण्डहर में उल्लू बोले,
उसमें विहँसे दीपावलियाँ॥
युग युग के बन्द कपाट खुलें,
पथ के कण्टक सब हटजायें।
सड़कें निर्धूलि निरापद हों,
आवाहन करती हों गलियाँ॥
शत शत रवि शीश झुकायेंगे।
वह जीवन ज्योति जगायेंगे॥
(3)
दुख जिनकी वाणी से झरता,
चिल्लाती है जिनकी पीड़ा॥
मरघट जिनका मन मानस है,
बन रही चिता जिनकी क्रीड़ा॥
करुणा से कंठ रुँधा जिनका,
आँखों के प्याले छलक रहे-
वे खिल खिल हँसते फिरें,
लगें करने आनंदमयी क्रीड़ा॥
ऐसा अमृत बरसायेंगे
वह जीवन ज्योति जगायेंगे
(4)
पल पल पर जो मरते जीते,
क्षण क्षण में जो रोते गाते।
छट पटा रहा जिनका कण कण,
पर गरल पान करते जाते॥
ये मद्यप पीछे को लौटें,
ऐसी एक दिव्य प्रभा देखें-
नर में नारायण देख सकें,
आँखें जिसको पाते पाते॥
इस भू को स्वर्ग बनायेंगे।
वह जीवन ज्योति जगायेंगे॥
(प्रणेता श्री रज्जनलाल प्रधान एम.ए. मन्दसोर)
तुम अपरिचित साथ हो पर ।
आज युग युग से तुम्हारा,
ढूँढ़ते हैं लोग परिचय।
मोहने को आपके हित,
हो रहे हैं नित्य अभिनय॥
दूर साधक क्यों समझते, दूर से ही पास होकर।
तुम अपरिचित साथ हो पर ॥
मधुर परिचय हीन परिचय,
अखिल जिसमें विश्व है लय।
आज तक परिचय प्रयत्नों,
ने है दिखलाई प्रलय क्षय।
आज परिचय के अनेकों,मार्ग यद्यपि एक होकर।
तुम अपरिचित साथ हो पर ॥
तुम कहीं भी हो भले ही,
जान कर भी हम न जाने।
आपको ही सत्य सुन्दर,
नित्य सारा विश्व माने।
कौन सा अज्ञान में भय, जबकि सर पर तेरे दो कर।
तुम अपरिचित साथ हो पर ॥
(ले. -श्री. एवजसिंह वर्मा, आगरा)
मनुष्य जीवन के लिए त्याग अनिवार्य है बिना कुछ दिये दूसरी चीज नहीं मिल सकती। जो लेना चाहता है उसे देना अवश्य पड़ेगा। संसार के सभी तत्वों का निर्माण ‘पहले दो तब मिलेगा’ के सिद्धान्त पर टिका हुआ है।
शौच जाकर जब पेट खाली कर देते हैं तब भूख लगती है और सुन्दर भोजन मिलता है। कोई आदमी मल का त्याग न करना चाहे तो भोजन मिलना तो दूर उल्टे पेट में बीमारियाँ हो जावेंगी। पीछे की जमीन को त्याग कर उस पर से पैर उठा कर ही तो आगे कदम बढ़ाया जाता है। अपने पाँव के नीचे की भूमि पर कोई अपना अधिकार जमाकर बैठ जाय और उसे छोड़ना न चाहे तो वह उस स्थान पर बैठा तो रहेगा पर आगे नहीं बढ़ सकेगा और नई भूमि उसे नहीं मिलेगी। फेफड़ों में भरी हुई हवा को जो नहीं छोड़ना चाहता वह नई हवा प्राप्त नहीं कर सकेगा और मर जायगा।
आपके पास पानी से भरा हुआ एक प्याला है। कोई आपको दूध देना चाहता है पर उस प्याले में जरा भी जगह नहीं है जब तक आप उस प्याले के पानी का त्याग न करें तब तक दूध प्राप्त नहीं कर सकते। बाजार में कोई चीज लेने जाइये दुकानदार पहले पैसे माँगेगा तब कोई चीज मिलेगी। दुनिया के बाजार का यह अटूट नियम है कि पहले दो तब मिलेगा। जो मुफ्त में कोई चीज प्राप्त करने की इच्छा करता है वह प्रकृति के नियमों की उपेक्षा करता है। संयोगवश किसी को मुफ्त की कोई चीज़ मिल भी गई तो वह ठहर नहीं सकती। जैसी आई थी वैसी ही चली जायगी।
यह दो चाकू देखिये इसमें से एक बहुत तेज और चमकता हुआ है। दूसरे की धार कुन्द है। पहला वजन में कम है लेकिन दूसरा भारी है। जो चाकू तेज है उसे लोग प्यार करते हैं उसकी उपयोगिता अधिक है वह सफल है,शूर है, प्रस्तुत है। जिस चीज पर लगाया जाए झाटकाट डालता है। इतना गुण उसने किस प्रकार प्राप्त किया है। उसने त्याग का महत्व जाना है, अपनेपन की ममता न कर के शाल के पत्थर के पास हंसता हुआ गया है और अपने अंग का कुछ भाग उस पर घिस डाला है। इसीलिए तो चमक रहा है, इसीलिये उसकी कार्य शक्ति में तीक्ष्णता है और इसीलिए वह उपयोगी समझा जा रहा है। अब दूसरे चाकू को देखिये वह अपना कुछ भी छोड़ना नहीं चाहता है। पत्थर पर अपने शरीर का कुछ भाग नष्ट करना व्यर्थ समझता है। वह कुछ देने की अपेक्षा लेना पसंद करता है। मोटा भी है और भारी भी हो गया है। यह ठीक है,पर उसने अपनी सारी कार्य शक्ति खो दी है। न तो वह चमकता ही है और न कुछ काट ही सकता है। किसी के काम न आने कारण घृणास्पद बना हुआ है। इतना ही नहीं, उसका संचय किया हुआ धन-जंग उसके लिये घातक सिद्ध हो रहा है और धीरे-धीरे चाकू के जीवन को नष्ट करने में लगा हुआ है।
चिकित्सक लोग रोगी की चिकित्सा करने में जुलाब, वमन, उपवास, फस्व, मस्य, स्वेदन आदि क्रियायें कराते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि शरीर में अनावश्यक संचय हो जाने के कारण बीमारी हुई है, इसका समाधान त्याग किये बिना नहीं हो सकता।
किन्तु आज हम इस त्याग का महत्व भूल गये हैं। रोज देखते हैं कि जीवन का प्रत्येक क्षण त्याग की महत्ता को स्वीकार करता है। बिना इसके कार्य चलना असंभव समझता है फिर भी हम उसे जीवन व्यवहार में नहीं उतारते। आदमी पर संचय का ऐसा भूत सवार हुआ है कि उसे और कुछ सूझ ही नहीं पड़ता। ‘लाओ जमा करो’ ‘लाओ जमा करो’ की पुकार सर्वत्र सुनाई देती है। दस के बाद पचास, पचास के बाद पाँच सौ, पाँच सौ के बाद चार हजार अन्ततः यह अतृप्त प्यास अत्यंत उग्र हो जाती है। शराब के नशे में चूर पागल की तरह आदमी “एक प्याला और” की रट लगाये रहता है। जितना वह अधिक पीता जाता है उतना ही और भी वह अधोगति को प्राप्त होता जाता है।
लोग यह भूल जाते हैं कि कुदरत आदमी के पास उतना ही रहने दे सकती है जितने की उसे जरूरत है। बाकी चीजें वह राजी से नहीं छोड़ता तो जबरदस्ती छीन ली जाती हैं। जबरदस्ती छीनने की तैयारी और धक्का मुक्की में जितना वक्त लगता है उतने ही देर कोई आदमी धनी दिखाई दे सकता है बाद को उसे स्वाभाविक स्थिति पर उतरना जरूरी है। हम सारे दिन भर पेट पानी पीते रहते हैं। पर प्रकृति अपनी तराजू पर तौलती है कि इसे कितना पानी चाहिये, जितना उसने जरूरत से ज्यादा पी लिया है उतना ही पेशाब और पसीने द्वारा वह निकाल लेती है। अमुक लालाजी करोड़ पति थे, सट्टे के व्यापार में भारी घाटा हुआ दिवाला निकल गया अब एक मामूली सी दुकान करते हैं। अमुक मालगुजार के पास दस गाँव की जमींदारी थी उनके लड़के ने ऐयाशी में सारी जायदाद फूँक दी। अमुक साहूकार देन-लेन का भारी कारोबार करते थे, घर में डाका पड़ा सब कुछ चला गया। अमुक बाबूजी ने नौकरी में दस हजार रुपया जमा किया था। लड़की के विवाह, पत्नी की बीमारी में सब खर्च हो गया। अमुक रायसाहब के पास पैसे की इफरात थी, तीन चार मुकदमे ऐसे लगे कि बेचारे बर्बाद हो गये। आप अपने पास-पड़ोस में ऐसी घटनाएं ढेरों पा सकेंगे। ऐसे उदाहरणों की एक मोटी मिसाल आपके आस पास ही तैयार हो सकती है। जिससे सिद्ध होता हो कि जरूरत से ज्यादा इकट्ठी हुई चीजें कुदरत द्वारा जबरदस्ती छीन ली गईं। अब तो साम्यवाद, समाजवाद, बोल्शविज्म आदि संगठित और जोरदार आन्दोलन दुनिया में चल रहे हैं जिनका उद्देश्य है कि जरूरत से ज्यादा इकट्ठी की हुई चीजों को जबरदस्ती और सरेआम छीन लिया जाय। कई देशों में तो यह आन्दोलन सफल भी हो चुके हैं।
दुनिया की शान्ति त्याग के ऊपर कायम है। दूसरों को देकर खाओगे तो तुम्हारी रोटी सुरक्षित रहेगी।
हिन्दू धर्म का प्रत्येक अंग इसी आदर्श से ओत-प्रोत है। पंच महायज्ञों का तात्पर्य यही है पहले अतिथि, अपने से कुछ आशा करने वाले, पशु पक्षियों को पहले खिलाओ तब खुद खाओ। गीता कहती है “ओ भुजेते तेर्त्वध पाप थे पचन्त्यात्म कारणात्” अर्थात् केवल खुद ही खाने वाला पाप खाता है। महापुरुषों का उपदेश सदैव त्याग करने का होता है। एक सज्जन को पिछले वर्ष तीन बार महात्मा गाँधी के पास जाने का सौभाग्य मिला। जब भी वे उनके पास गये तभी हरिजन सेवा के लिए कुछ देने को महात्मा जी ने हाथ पसारा। चिरकाल तक मैं इस बात पर विचार करता रहा कि यह महापुरुष अपने पास आने वालों से सदैव याचना ही क्यों करता है? मनन के बाद मेरी निश्चित धारणा हो गई है कि। त्याग से बढ़कर प्रत्यक्ष और तुरन्त फलदायी और कोई धर्म नहीं है त्याग की कसौटी आदमी के खोटे खरे रूप से दुनिया के सामने उपस्थित करती है। मन में जमे हुए कुसंस्कार और विकारों के बोझ को हलका करने के लिए त्याग से बढ़कर अन्य साधन हो नहीं सकता।
आप दुनिया से कुछ प्राप्त करना चाहते हैं अपने को महान बनाना चाहते हैं। विद्या बुद्धि संपादित करना चाहते हैं। कीर्ति चाहते हैं, और अक्षय आनन्द की तलाश में हैं। तो त्याग कीजिए। गाँठ में से कुछ खोलिए। यह चीजें बड़ी महंगी हैं। कोई नियामत लूट के माल की तरह मुफ्त नहीं मिलती। दीजिए आपके पास पैसा, रोटी, विद्या श्रद्धा, सदाचार, भक्ति, प्रेम, समय, शरीर जो कुछ हो मुक्त हस्त होकर दुनिया को दीजिए, बदले में आपको बहुत मिलेगा। गौतम बुद्ध ने राज सिंहासन का त्याग किया, गाँधी ने अपनी बैरिस्टरी छोड़ी उन्होंने जो छोड़ा था उससे अधिक पाया। विश्व कवि रवीन्द्र टैगोर अपनी एक कविता में कहते हैं।” उसने हाथ पसार कर मुझ से कुछ माँगा। मैंने अपनी झोली में से अन्न का एक छोटा दाना उसे दे दिया। शाम को मैंने देखा कि झोली में उतना ही छोटा एक सोने का दाना मौजूद था। मैं फूट-फूट कर रोया कि क्यों न मैंने अपना सर्वस्व दे डाला? जिससे मैं भिखारी से राजा बन जाता।”
हम त्रिविध दुखों से दुखी रहते हैं इनसे बचने के उपाय ढूंढ़ा करते हैं और निराश होते रहते हैं। क्या आपने सोचा कि ईश्वर की शरणागत होना हजार उपायों का एक उपाय है क्योंकि उसका धर्म ही प्रत्येक प्राणी के साथ भलाई करना है। इसलिए उसी की शरण में जाओ वही सच्चा शान्ति निकेतन है।
(ले.-श्री पं. हंसराज शास्त्री, लुधियाना)
वर्तमान समय के इस वैज्ञानिक युग में पाश्चात्य शिक्षा दीक्षित नवयुवकों के हृदय प्रदेश से धर्म भावना तो लुप्त प्रायः हो रही है वे धर्म को एक प्रकार का कृत्रिम या कल्पित पदार्थ मान रहे हैं। परन्तु वस्तु स्थिति इससे सर्वथा विपरीत है अर्थात् धर्म यह कोई कृत्रिम या कल्पित वस्तु नहीं किन्तु धर्म त्रैकालिक सनातन ध्रुव सत्य है, इसी प्रकार वह धर्म प्राकृतिक जड़वस्तु भी नहीं किन्तु अपने स्वरूप से आभासित होने वाला चैतन्य प्रकाश है, वर्तमान समय में हमारे नव शिक्षा दीक्षित नवयुवकों के सन्मुख धर्म का जो स्वरूप उपस्थित हो रहा है वह उसका वास्तविक स्वरूप नहीं, वह तो उसका अत्यन्त विकृत निकृष्ट स्वरूप है। क्या ही अच्छा होता यदि हमारे नवयुवक साम्प्रदायिकता के बीच में मलिन हुए इस धर्मतत्व की अवहेलना करने के स्थान में उसके निरमल स्वरूप की खोज के लिये प्रयत्न करते। परन्तु भारत का ऐसा सौभाग्य कहाँ ?
आज भारत वर्ष में जितने भी सम्प्रदाय, मत या पन्थ धर्म के नाम से प्रचलित हो रहे हैं उनमें धर्म तत्व का न्यूनाधिक रूप में कुछ न कुछ आभास तो है, परन्तु मानव समाज की विकट प्रकृति में प्रविष्ट होने वाले साम्प्रदायिक व्यामोह ने उनमें रहा-सहा धार्मिक अंश भी खो दिया है। जिस प्रकार आकाश से बरसने वाला सरस और स्वादिष्ट जल, धूलियुक्त पृथ्वी से मिश्रित होकर अपनी स्वभाव सिद्ध सरसता को खो बैठता है इसी प्रकार विभिन्न सम्प्रदायों में प्रतिबिंबित होने वाले धर्मत्व को भी साम्प्रदायिकता के अशुद्ध वातावरण ने अस्पृश्य एवं दूषित बना दिया है। किसी अमुक एक देशी विचार को सर्व सत्य मान कर उसके लिये दुराग्रह करना साम्प्रदायिकता कहलाती है तथा इसी का दूसरा नाम मतान्धता है। अतः इस मतान्धता और साम्प्रदायिकता के गन्दे संपर्क से धर्म रूप गंगोदक को सदा बचाये रखने का प्रत्येक धर्म पिपासु को प्रयत्न करना चाहिये।
यद्यपि सम्प्रदायों या पन्थों के विशाल मन्दिर की आधार-शिला धर्म तत्व की सुदृढ़ चट्टान पर ही स्थापित हुई है, और उनके प्रवाह का मूल स्रोत भी धर्मतत्व को ही कहा वा माना जा सकता है। तथापि ये सम्प्रदाय उत्पन्न होते हैं और विनष्ट हो जाते हैं। अर्थात् इनकी उत्पत्ति और विनाश का सिलसिला सदा जारी रहता है। इतिहास इस बात का साक्षी है, परन्तु धर्म इससे सदा विपरीत स्वभाव वाला है, वह अविनाशी अर्थात् उत्पत्ति और विनाश इन दोनों से परे है। इसके अतिरिक्त धर्म एक अथवा अभिन्न है। इसलिये उसमें समानता है और सम्प्रदायों में अनेकता अथवा विभिन्नता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है अतएव सम्प्रदायों में पारस्परिक संघर्ष की सदा ही संभावना बनी रहती है। और कभी-कभी तो यह संघर्ष इतना भयानक रूप धारण कर लेता है कि दावानल की तरह अपने उद्गम स्थान को भी समूल रूप से भस्मसात् कर देता है, वर्तमान समय के सत्य विघातक शास्त्रार्थ और घासलेटी साहित्य का पोषण इसी के सुचारु फल हैं। विपरीत इसके धर्म के साम्राज्य में इस संघर्ष को स्थान ही नहीं क्योंकि वह एक है अतएव उसमें शाँति है, प्रेम है और सम्वेदना है। धर्म आत्मस्पर्शी होता है और सम्प्रदाय कूप जीवी है! इसी प्रकार धर्म सर्वदेशी और सम्प्रदाय एकदेशी होते हैं। परन्तु इतना अन्तर होने पर भी इनको धर्म से सर्वथा पृथक नहीं किया जा सकता, धर्म से सर्वथा पृथक होने पर इनका अस्तित्व ही नहीं रहता। तात्पर्य कि जिस प्रकार घटे शराब आदि की मृतिका से और कटक कुण्डलादि की सुवर्ण से पृथक सत्ता केवल नाम मात्र के लिये है, अर्थात् सर्वथा अलग होकर वे अपने अस्तित्व को कायम नहीं रख सकते। इसी प्रकार सम्प्रदाय मत या पन्थ भी धर्म से सर्वथा पृथक होकर जीवित नहीं रह सकते।
भारत वर्ष में धर्म के नाम पर प्रचलित होने वाले जितने भी मतमतान्तर हैं वे सब धर्म रूप प्रकृति की ही विकृतियाँ हैं, धर्म रूप महान वृक्ष की ही शाखा प्रति शाखायें हैं, और संक्षेप में कहें तो ये सब विभिन्न रूप में धर्म के संकुचित रूप हैं। इसलिये धर्म इन अत्यन्त संकुचित और एक देशी रूपों को ही सम्पूर्ण रूप से धर्म मान लेने की किसी भी साक्षर को भूल न करनी चाहिये। ये तो धर्म के एक बहुत छोटे-छोटे स्वरूप हैं, हाँ! यदि इनको समन्वय दृष्टि-उदारदृष्टि से समन्वित किया जाय अथवा ये स्वयं ही एक दूसरे के सन्मुख होने की उदारता दिखलायें तब तो ये धर्म के पोषक और अभिवर्धक अवश्य हो सकते है।
धर्म का वास्तविक उद्देश्य, मानव जीवन (मनुष्यत्व) का पूर्णतम विकास है, मनुष्य के ऐहिक और पारलौकिक अभ्युदय का एक मात्र साधन धर्म को ही स्वीकार किया गया है। कितने पाश्चात्य शिक्षा दीक्षित विद्वान धर्म को कृत्रिम और कल्पित वस्तु मानते हुये कहते हैं कि धर्म की आवश्यकता उतने समय तक ही हैं जब तक कि यह मनुष्य अज्ञान दशा जंगली हालत से निकल कर सुधार दशा यानी सभ्यता को प्राप्त नहीं करता। इसलिये सभ्यता प्राप्त करने के बाद इसकी कोई आवश्यकता नहीं रहती अर्थात् विद्वानों के लिये यह धर्म निरर्थक ही हैं। परन्तु विचार करने पर उनके इस कथन में कोई सार प्रतीत नहीं होता, यदि धर्म मात्र को अज्ञान और कल्पना का ही परिणाम मानें तो ज्ञान की अभिवृद्धि के साथ-साथ उनका भी विनाश हो जाना चाहिये, किन्तु वस्तु स्थिति इसके विपरीत है, अर्थात् मनुष्य में जैसे जैसे ज्ञान की अभिवृद्धि होती है वैसे-वैसे उसकी धर्मवृत्ति अधिक तीव्र सतेज और गम्भीर होती जाती है। इसलिये धर्म यह कोई कृत्रिम या कल्पना प्रसूत पदार्थ नहीं किन्तु अखण्ड और अबाधित सत्य है तथा मानव समाज का कल्याण उसी पर अवलम्बित है।
धर्म यह वस्तु का स्वभाव है अथवा यूँ कहिये कि वस्तु का जो स्वभाव है वही उसका धर्म है, (परन्तु स्वभावो धर्मः)उसके बिना वस्तु का अस्तित्व ही नहीं रहता, अग्नि के उष्णता और प्रकाश ये दो स्वभाव हैं। और उनके बिना जैसे अग्नि का अस्तित्व स्थिर नहीं रह सकता (कारण कि ये दोनों उष्णता और प्रकाश उसके धर्म हैं) इसी प्रकार धर्म के बिना कोई भी पदार्थ अपने अस्तित्व को कायम नहीं रख सकता। आत्मा सत चित और आनन्द स्वरूप है क्योंकि सत चित और आनन्द उसके धर्म हैं। इससे सिद्ध हुआ कि धर्म के बिना धर्मों की कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। किंतु धर्म के द्वारा ही वह अपने अस्तित्व को स्थिर किये हुए है, अतः सम्पूर्ण विश्व को धारण करने वाला एक विशिष्ट तत्व है जो कि धर्म के नाम से विख्यात है। इसी वैज्ञानिक सत्य की ही दार्शनिक परिभाषा में सनातन तत्व या सनातनधर्म के नाम अविहित किया जा सकता है।
तब धर्म की, जीवन शुद्धि के लिए नैतिकता के लिए कितनी आवश्यकता है तथा विश्व की व्यवस्था में उसकी कितनी असाधारणता है इस बात का निर्णय तो धर्म का उद्देश्य समझ लेने पर ही हो जाता है। परन्तु फिर भी संक्षेप से यहाँ पर कुछ लिख देना आवश्यक सा प्रतीत होता है। मनुष्य को स्वाभाविक रूप से ज्ञान के प्रकाश की, कर्तव्य-भावना की और आत्मबल की आवश्यकता रहती है। इसके बिना मानव जीवन के वास्तविक उद्देश्य की सिद्धि नहीं हो सकती। इन तीनों की प्राप्ति का मुख्य साधन यदि कोई है तो वह धर्म ही है इसी प्रकार जीवन की नैतिकता के लिये अर्थात् जीवन को नीतिमय बनाने के लिये भी धर्म की ही नितान्त आवश्यकता है। उक्त कथन का अभिप्राय यह है कि जीवन को नीतिपूर्ण बनाने के लिये केवल नीति शास्त्र का ज्ञान मात्र ही पर्याप्त नहीं किंतु उसमें धार्मिकता भी अपेक्षित है, अन्यथा नीति का ज्ञान होते हुये भी प्रलोभनों के वश में आकर कभी 2 मनुष्य अनर्थ में भी प्रवृत्त हो जाता है ऐसी अवस्था में यदि मनुष्य के पास धर्म का बल न हो तो उसके पतन में देरी नहीं लगती अतः नैतिक भावना को स्थिर रखने तथा व्यवहार में उसका आदर्श स्थापित करने के लिए धर्म अथवा धार्मिकता की नितान्त आवश्यकता है तथा यहाँ पर केवल नीति और धर्म के अन्तर को भी समझ लेना आवश्यक है। नीति और धर्म में इतना अन्तर है कि नीति के पीछे भय, स्वार्थ तथा अन्य प्रलोभनों का भी कभी-कभी आधिपत्य होता है। परन्तु धर्म इनके संपर्क से सदा पृथक रहता हैं अर्थात् धर्म के साम्राज्य में इनका भय स्वार्थादि प्रलोभनों का कदापि स्थान नहीं है। अर्थात् जो नियम या कर्तव्य भय अथवा स्वार्थ मूलक हों वह नीति, और जिसमें भय अथवा स्वार्थ का अवकाश न हो किन्तु जिस नियम का केवल कर्तव्य बुद्धि से ही पालन किया जावे वह धर्म कहलाता है। इसी प्रकार मानव समाज में भ्रातृत्व और आत्मबन्धुत्व की भावना को तथा हृदय की विशालता को विकास में लाने के लिए भी धर्म के अतिरिक्त और कोई साधन नहीं है परन्तु हृदय की यह मधुर भावना बुद्धि का विषय नहीं वह तो अनुभवगम्य है। केवल पुस्तकों के पढ़ लेने और विज्ञान की कोरी चर्चा मात्र से भी इसकी उपलब्धि नहीं हो सकती, इस मधुर भावना की वीणा की झंकार तो धर्म के शाँत प्रदेश में ही सुनाई दे सकती हैं। जिसका मूर्तस्वरूप मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षादि भावनाओं तथा अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इन पाँच यर्मों में व्यक्त हो रहा हैं। इसके अतिरिक्त जीवन का अन्त अर्थात् इस देह के नाश होने पर अवशिष्ट रहे हुए आत्मा की उत्तरोत्तर उन्नति के लिए भी धर्म के सिवा अन्य कोई उपाय नहीं है। परलोक, अथवा उसके स्वरूप विषयक दार्शनिकों का मतभेद भले ही हो परन्तु देहावसान के अनन्तर चेतन रूप आत्मा की कोई न कोई अवस्था तो अवश्य माननी पड़ेगी और उस अवस्था की उत्तरोत्तर उन्नति भी अपेक्षित है तब एक मात्र धर्म के सिवा और किस मार्ग के द्वारा इसका होना सम्भव हो सकता है? अतः पारलौकिक अभ्युदय का एक मात्र साधन धर्म ही सिद्ध होता है। अतएव मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ और कहाँ जाऊंगा? तथा यह विश्व क्या है? इसका मूल कौन और कहाँ है? एवं उसके साथ मेरा कोई सम्बन्ध भी है या नहीं? यदि है तो क्या और कैसे? इत्यादि जटिल प्रश्नों का जैसा स्पष्ट और संतोषप्रद उत्तर हमको धर्म से प्राप्त हो सकता है कैसा शुष्क तर्क या कोरे विज्ञान से कभी प्राप्त नहीं हो सकता! अधिक तो क्या, हम क्या जीवित हैं? तथा दूसरों का भला हम क्यों करें, इससे हमको क्या लाभ? इत्यादि प्रश्नों का उत्तर भी आप को धर्म की पाठ्य पुस्तक से ही मिलेगा, विज्ञान में इतना दम नहीं कि वह इस क्यों? के सामने डटा रहे! साराँश कि जीव आत्मा जगत और परमात्मा आदि के स्वरूप निर्णय में जो स्पष्टता और उदारता पाठकों को सनातन धर्म तत्व में उपलब्ध होगी वह किसी मत या सम्प्रदाय अथवा पंथ में दृष्टिगोचर नहीं हो सकती। इसलिये धर्म का जो सनातन तत्व है वह कृत्रिम नहीं किन्तु अबाधित और ध्रुव वैज्ञानिक सत्य है।
अपने से छोटों को तत्काल दण्डित न करो जैसे परमात्मा तुम्हें दंडित नहीं करता। जब कि तुम उस
के हरे-भरे बाग रूपी संसार में कोलाहल मचा देते हों।
(ले0-कुँ0 उदयभानसिंह, राजपूत कालेज, आगरा)
कई आदमियों को ऐसी आदत होती है कि उनसे चुप बैठा ही नहीं जाता। हर वक्त वे कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं। कहते हैं कि ऐसे लोगों के मुँह में एक प्रकार की खुजली चलती रहती है। कोई काम की बात न हो तो भी व्यर्थ ही इधर उधर की गप्पे उन्हें हाँकनी। कुछ न कुछ कहते रहने से उन्हें काम। ऐसे लोगों में कुछ को मौका देख कर बात करने की आदत होती है। जैसे लोग देखे उनकी इच्छानुसार बात करनी शुरू कर दी, ऐसा प्रसंग आरंभ किया जिसे लोग पसंद करते हों, पर कुछ बिना टाइम गाड़ी छोड़ते हैं। कौन आदमी बैठे हुए है, वे किस बात में कितनी रुचि या अरुचि रखते हैं, किस के पास बात सुनने के लिए कितना समय है, इन सब बातों का विचार किये बिना ही, मन में जो आया कहने लगते हैं। मातम पुरसी के लिए आये हुए लोगों के बीच बैठ कर नींबू के आचार के गुण दोष बयान करने लगने में उन्हें कुछ भी झिझक नहीं लगती। वैद्य की दुकान पर दवा लेने गये हैं पर वहाँ इस बात पर बहस छेड़ रहे हैं कि मलमल का कुर्ता ठीक रहता है या मखमल का। अपने किसी खास काम के लिए कचहरी पर गए हैं किन्तु किसी अपने जैसे ही फालतू आदमी को समझा रहे हैं कि हरक्युलिस साइकल की अपेक्षा हम्बर ज्यादा टिकाऊ होती है।
अपने को वाकपटु कहने वाले बकवासी बात तो मौका देखकर करते हैं पर हाँकते दूने की हैं। वे जानते हैं कि बेकार की बातें सुनने के लिए किसी के पास वक्त नहीं है। और साधारण बातें ऐसी मजेदार नहीं हो सकतीं जिन्हें काम छोड़ कर कोई सुनने बैठे। पर उन्हें अपने मुँह की खुजली मिटानी है इसके लिए कोई साथी जरूर चाहिए। जब तक कोई सुनने वाला न हो तब तक किस से बात करें। इसलिए वे बात को बतंगड़ बनाकर मनोरंजन बनाते हैं। छोटी सी बात को ऐसा रूप देते हैं कि वह बड़ी महत्वपूर्ण या मनोरंजक जंचने लगती हैं। कई तो ऐसी बातें गढ़ते है कि जहाँ सुई नहीं होती वहाँ हल खड़ा कर देते हैं, तिल को ताड़ बना देना उनके बाएं हाथ का खेल हैं। घर से निकल कर चाहे पड़ौस का शहर नहीं देखा है पर बात विलायत की पूछ लीजिए। कही सुनी बतावें सो भी नहीं, हर बात में अपने को शामिल कर देंगे। मैंने उस साल दिल्ली में यह देखा। बम्बई के बाजार मुझे पसंद नहीं आये। रंगून के लिए जाने वाले जहाज अब तो अच्छे बन गये हैं पहले बहुत खराब थे। सैर करने और घूमने की बात कहते हों सो नहीं। हर मामले में अपनी टाँग अड़ाते हैं। राजनीति की बात भी कहेंगे और चिकित्सा शास्त्र की भी। अपने अधूरे ज्ञान को पूरा समझ कर उसी पर अभिमान भी करते हैं और समझते हैं कि हम जो कह रहे हैं पूर्ण ज्ञान के आधार पर कह रहे हैं। ऐसे वाचाल लोगों में अनेक प्रकार के घातक दुर्गुणों का समावेश हो जाता है। कभी-कभी तो बकवासी ऐसे नये दुर्गुण दे देती है, जिनसे आदमी का जीवन ही धूलि में मिल जाता है।
मैं एक ऐसे लड़के को जानता हूँ जिसे बकवासी ने शेखी खोरी विरासत में दी है। आरंभ में इस लड़के को ज्यादा बातें करने की आदत थी। बाद को उसे अपने बारे में कुछ भ्रम पूर्ण धारण हो गई। वह झूँठ-मूठ अपने को बड़ा आदमी समझने लगा और अपनी वास्तविक स्थिति को स्वयं कई गुनी समझने लगा, और दूसरों को भी वैसी ही बताने लगा। आजकल वह एक छोटा सा काम कर के किसी प्रकार अपना गुजारा चलाता है पर अपनी स्थिति को बिना पूछे कम से कम पचास गुनी कहता हैं। यह शेखी खोरी कई बार एक भयंकर पागलपन के रूप में लोगों के सामने आती हैं और उन्हें यह सोचने ही नहीं देती कि वे किस स्थिति में हैं। और इससे आगे पीछे किस प्रकार चल सकते हैं। जो अपनी स्थिति के बारे में ठीक समझते हैं वे भी अपनी मानसिक दशा के बारे में भ्रम में रहते हैं, समझते हैं कि मैंने लोगों को कैसा उल्लू बनाया। लोगों को चकमा देकर अपनी बातों पर कैसा विश्वास करवा लिया। किन्तु जैसा वह समझता है बात उस से उल्टी होती है। दूसरे लोग उसकी बातों को न तो झूठ समझते हैं और न सच। कहने के लच्छेदार ढंग से मनोरंजन करने के लिए उसकी बात सुनते हैं और जब विनोद के लिए वक्त नहीं रहता तो अधूरी बात को ही छोड़ कर चले जाते हैं। वास्तविकता और बनावट को पहचानने में उन्हीं लोगों को कठिनाई हो सकती है जो बिल्कुल बुद्धिहीन हैं जो थोड़ी सी भी समझ रखता है वह आसानी से ताड़ सकता है इस बात में कितनी अस्वाभाविकता है और कितना झूठ मिलाया गया है।
जब आदमी स्वयं भ्रम में रहने लगता है तो वह अपने सम्बन्ध की अन्य जानकारियों से भी वंचित हो जाता है। अपने को कुछ का कुछ समझने लगता है, ऐसी भ्रमपूर्ण स्थिति में पड़े रहने के कारण उसके मस्तिष्क की स्थिति भी कुछ विचित्र हो जाती है। अपनी और दूसरों की वास्तविक स्थिति का ज्ञान न होने की दशा में किसी प्रकार की सफलता प्राप्त करना असंभव नहीं तो कष्ट साध्य अवश्य है। बातूनी आदमी प्रायः ऐसे ही मानसिक झमेले के शिकार पाये जाते हैं।
अधिक बातें बनाने वाला हमेशा सच नहीं बोल सकता क्योंकि सच बातें इतनी ज्यादा होती ही नहीं कि आदमी हर समय उन्हें कहता ही रहे और वे समाप्त ही न हों। छाछ को जब बढ़ाया जाता हैं तो उसमें पानी मिलाना पड़ता है। बकवास में झूठ का होना स्वाभाविक ही है। इस प्रकार एक बुराई व्यर्थ सिर पर चढ़ती है। अपना कोई लाभ नहीं होता। इतनी देर की सिर खप्पी के बदले कुछ लाभ होता है सो बात भी नहीं है। चुप बैठे रहते तो वह तो लगता कि हम बेकार बैठे हुए है, समय का व्यर्थ गवाँ रहे है इसका कुछ सदुपयोग करें। गप्पे समय को व्यतीत कर देती हैं और उसे यह भी मालूम नहीं हो पाता कि मेरा कितना समय व्यर्थ चला गया।
कुछ लोग समझते हैं कि बातूनी होने के कारण दूसरों पर हम अपना असर डाल लेते हैं और वे हमें बहुत सुयोग्य चतुर एवं बुद्धिमान समझते हैं। परन्तु सही बात यह नहीं है। जिनका स्वभाव उदासीनता लिये हुए होता है वे तो ऐसे लोगों की मन ही मन उपेक्षा करते हैं, एक बला की तरह समझते हैं। और जिनका स्वभाव सतर्क होता है दूसरों के गुण दोषों की परख करके उसके संबंध में कोई निश्चित धारणा बनाते हैं वे ऐसे लोगों को घृणा करते हैं। ठीक भी है जो केवल झूठे मनोरंजन के लिए अपने को और दूसरों को भ्रम में डाले, अपना और दूसरों का कीमती समय बर्बाद करे और व्यर्थ का झूठ बोले उससे घृणा के अतिरिक्त और किया ही क्या जाय? यदि बातूनीपन के साथ-साथ झूठी आत्मप्रशंसा या अपने को बहुत बड़ा समझने की आदत है तब तो रोगी लाइलाज है। उसे संक्रामक रोगजन्तु समझ कर पास न बैठने देने में ही कल्याण है।
शक्ति का अपव्यय, बातूनीपन की सबसे बड़ी हानि है। हम नहीं समझ कि बात करने में हमारी कितनी ताकत खर्च होती है। शब्द के साथ शरीर की बिजली भी निकलती है। मस्तिष्क की सूक्ष्म शक्तियों को बातचीत के सिलसिले में पूरी तरह मशगूल रहना पड़ता है। कल्पना, स्मरण, चरित्र चित्र, घटना संतुलन, साथी का चित्र परीक्षण, घटना में मनोरंजन का पुट, आत्मश्लाघा, असत्य को छिपाने का प्रयत्न यह सब कार्य मस्तिष्क की विभिन्न शक्तियों को बड़ी तेजी, फुर्ती और मेहनत के साथ करने पड़ते हैं। इतने बड़े परिश्रम का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाय तो पता लगेगा कि इस कार्य में प्रचुर परिमाण में अपनी व्यक्तिगत विद्युत शक्ति नष्ट हुई है। उस समय प्रत्यक्षतः लोग यह नहीं समझ पाते कि उस अपव्यय से उनकी कुछ हानि हुई है पर बाद में यह हानि बड़ी दुखदायी होती है। जरूरी कामों के लिए उनके पास शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ बची नहीं रहतीं। जिसने अपने घड़े में छेद कर रखे हों उसे प्यास के समय बगलें ही झाँकनी पड़ेंगी। शरीर कमजोर हो गया है बुद्धि काम नहीं करती है, इन समस्याओं के पीछे यही अपव्यय छिपा होता है। निश्चय ही बकवास से जीवनी शक्ति घटती है और आदमी पूरी आयु प्राप्त न करके अधूरी आयु में ही मृत्यु का ग्रास बन जाता है।
इसीलिए मैं कहता हूँ। महाशय, ज्यादा बक बक मत कीजिए। उतनी बातें कहिए जितनी आपके लिए और दूसरों के लिए आवश्यक हैं। कम बोलने में आपके दोष छिपे रहेंगे। अपनी ताकत को जरूरी कामों के लिए संचित करते रहेंगे। सत्य, प्रिय और मधुर बोलिए, कम बोलिए, आप सानंद दीर्घ जीवन व्यतीत कर सकेंगे।
(ले0-डॉ0 पूनमचंद्र खत्री, बीकानेर)
गत अंक में बता चुका हूँ कि क्रोध भयंकर विषधर है। जिसने अपनी आस्तीन में इस साँप को पाल रखा है उसका सर्वनाश होना ही है। जो पेट के ऊपर तेज छुरे की धार बाँधे फिरता हो उसका ईश्वर ही रक्षक है एक प्राचीन नीतिकार का कहना है “जिसने क्रोध की अग्नि हृदय में प्रज्वलित कर रखी है उसे चिता से क्या प्रयोजन?” अर्थात् वह तो बिना चिता के ही जल जाता था। ऐसी महाव्याधि से दूर रहना ही कल्याणकारी है। जिन्हें क्रोध करने की बीमारी नहीं है उन्हें पहले से ही सावधान होकर इससे दूर रहना चाहिए और जो इसके चंगुल में फंस चुके हैं उन्हें पीछा छुड़ाने के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए।
क्रोध की जड़ अज्ञान है। आदमी जब अपनी और दूसरों की स्थिति के बारे में गलत धारणा कर लेता है तब उसे कुछ को कुछ दिखलाई पड़ने लगता है। बेटे ने आज्ञा नहीं मानी पिता को क्रोध आ गया। क्योंकि पिता समझता है कि बेटा मेरी संपत्ति है, मेरी जायदाद है, मेरा दास है, उसे मेरी आज्ञा माननी ही चाहिये। लेकिन क्रिया जब इसके उलटी होती है तो गुस्सा आता है, स्त्री ने आज बैंगन का साग न बना कर दाल बना ली आपको गुस्सा आ रहा है कि उसने ऐसा क्यों किया, मानो आप समझते हैं कि हर एक काम उसे आपकी आज्ञा से ही करना चाहिये। जिसे आप कुल का छोटा समझते हैं वह ऊँची कुर्सी पर बैठ जाता है तो आप आग बबूला हो जाते हैं। छोटा भाई आपसे बिना पूछे कोई दावत दे डालता है आप कुढ़ जाते हैं। कोई अजनबी ग्राहक आपकी दुकान पर आता है और किसी चीज के निश्चित भाव की अपेक्षा आधे दाम लगाता है आप उसे दस गालियाँ सुनाते हैं। आप वैष्णव हैं, कोई शैव होने की श्रेष्ठता बताता है आप उस पर बरस पड़ते हैं। किसी के विचार आपसे नहीं मिलते, वह मतभेद रखता है, बस आप उसे दुश्मन समझने लगे। जब यह भावना गुप्त रूप से मन में घर बना लेती है कि लोगों को मेरी इच्छानुसार चलना चाहिये तब क्रोध का बीजारोपण होता है। पिल्लों की लड़ालड़ा कर जैसे कटखने स्वभाव का बना दिया जाता है और चिढ़ाने से बच्चा जैसे जिद्दी बन जाता है उसी प्रकार ‘सब मेरे इच्छानुवर्ती हों’ की गुप्त भावना प्रतिकूल घटनाओं से टकरा कर बड़ी विकृत बन जाती है और मौके बे मौके उग्र रूप धारण कर के क्रोध की शकल में प्रकट होती है।
इस मूल को काटे बिना क्रोध को नष्ट करना असंभव है। हमें प्रतिदिन एकान्त में बैठ कर कुछ देर शान्तिपूर्वक अपनी वास्तविक स्थिति के बारे में सोचना चाहिये। हमें इतना अधिकार किसने दिया है कि अपने बिरानों को सब बात में अपनी इच्छानुसार चलावें? हम स्वयं भी उतना ही अधिकार रखते हैं जितना दूसरे, फिर जब आप दूसरों से प्रतिकूल विचार रखते हैं, तो दूसरों को वैसा अधिकार क्यों नहीं है? समझना चाहिये कि मैं स्वयं किसी से बढ़ा या किसी का स्वामी न होकर बराबर की स्थिति का हूँ। समाज का संचालन समझौते के आधार पर होता है। इसलिये जहाँ मतभेद होता है वहाँ काम चलाऊ समझौता कर लिया जाता है। यह कहना भूल होगी कि कुटुम्ब की जिम्मेदारी मुझ पर है इसलिये मैं अपनी इच्छानुसार सारे परिवार को न चलाऊं तो व्यवस्था न रहेगी। यदि मैं कुलपति हूँ तो मेरा उत्तरदायित्व इतना ही है कि आर्थिक नीति सदाचार, व्यवस्था और वर्तमान तथा भावी उन्नति के मार्ग से सब लोगों का परिचय रखूँ। हर बात में नियंत्रण नहीं हो सकता। आपके पोते को कबड्डी खेलने का शौक है आप उस पर दबाव डालते हैं कि नहीं फुटबाल ही खेलनी पड़ेगी यह तो साम्राज्यवाद हुआ, फिर तो आप तानाशाह ठहरे। सबको विचार स्वातंत्र्य का अधिकार है और हमारा कर्तव्य इतना ही है कि प्रेमपूर्वक उनको औचित्य से परिचित रखें और सद्भावनापूर्ण प्रयत्न करके दूसरों को मार्ग पर लावें। मन से जहाँ साम्राज्यवादी भावना मिटी कि क्रोध रूपी महायुद्ध अपने आप बंद हो जायेगा।
इसी तरह की एक और भी बात है। जब हम यह मानने लगते हैं कि जो कुछ हम जानते हैं वही ठीक है तब भी संघर्ष और क्रोध के अवसर आते हैं। पश्चिमीय वैज्ञानिक, जीवन भर किसी बात का अनुसंधान करते हैं। किसी मत को निश्चित करते हैं। किन्तु यदि उन्हें अपने मत में संदेह हुआ तो बिना बीस वर्ष के परिश्रम का खयाल किये तुरंत अपना मत बदल लेते हैं। ज्ञान का समुद्र अथाह और अलक्ष है जो यह कहता है कि मैं जो जान गया वही पूर्ण सत्य है वह अँधेरे में भटक रहा है। अपने में डेढ़ और सारी दुनिया में आधी अकल मानने वाले ऐसी मूर्खता में जकड़े हुए हैं जिसको उपहासास्पद न समझ कर दया का पात्र गिनना चाहिये। मूर्खता भी क्रोध का कारण बनती है। हम मानते हैं कि शरीर पाँच तत्वों का बना हुआ है कोई साबित करता है कि, पाँच तत्वों के अलावा अमुक अन्य तत्व भी इसमें शामिल हैं तो नाराज होने की कोई बात नहीं। उसकी बात ध्यानपूर्वक सुननी चाहिये और मनन करना चाहिये कि यह बात कहाँ तक ठीक है। गले न उतरे तो छोड़ देना चाहिये। पर यह न समझ लेना चाहिये कि जो हम जानते हैं उसके अलावा सब बातें झूठ हैं। अपने को ज्ञान पथ का पथिक जिज्ञासु समझते रहना भी क्रोध के एक बड़े द्वार को बन्द कर देना है।
अपने को अधिकारी और पूर्ण ज्ञानी न मानने के अतिरिक्त क्रोध की शान्ति के कुछ और भी उपाय हैं। प्रतिज्ञा कर लीजिये “अपने दुश्मन क्रोध को पास न फटकने दूँगा जब आवेगा तभी उसका प्रतिकार करूंगा।” हो सके तो इन शब्दों को लिखकर किसी ऐसे स्थान पर टाँग दीजिये जहाँ दिन भर निगाह पड़ती रहे। ऐसा करने से यह विचार दृढ़ हो जावेंगे कि क्रोध दुश्मन है और उसका प्रतिकार करना है। जब क्रोध आवे तो तुरंत अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण करना चाहिये और अपने गालों पर जोर-जोर से चपतें लगाना चाहिये कि प्रतिज्ञा क्यों तोड़ रहे हो। जो लोग चपतें न लगाना चाहें वे मौन धारण कर सकते हैं। गुस्सा आया कि चुप्पी साध ली। क्रोध का चुप्पी बढ़िया इलाज है। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी। क्रोध में सने हुए कटु वाक्य मुँह से न निकलेंगे तो किसी से झगड़ा न होगा। और तृष्णा रहित स्थान पर पड़ी हुई अग्नि की तरह कुछ देर में अपने आप शान्त हो जायेगा।
क्रोध के समय ठंडे पानी का एक गिलास पीना-आयुर्वेदीय चिकित्सा है। इससे मस्तिष्क और शरीर में बढ़ी हुई गर्मी शान्त हो जाती है। उस स्थान पर से उठ कर कहीं चले जाना या और काम में लग जाना भी अच्छा इलाज है। इससे मन की दशा बदल जाती है और चित्त का झुकाव दूसरी ओर हो जाता है। क्रोध आते ही गायत्री का जप करने लगना यह भी अनुभूत और परिक्षित प्रयोग है।
(ले0-श्री0 रामसिंह जी चौहान, आँवलखेड़ा)
मन की चंचलता कितनी तीव्र और दुर्दमनीय होती है यह विगत अंक में बताया जा चुका है। अस्थिर मन ऐसा बेलगाम घोड़ा है जो मनुष्य को कहीं भी ले जा कर पटक सकता है। बुरे से बुरे परिणाम सामने उपस्थिति कर सकता है जीवन संघर्ष को इतना कटु बना सकता है कि आदमी जिन्दगी को भार समझ कर ईश्वर से मृत्यु प्रदान करने की प्रार्थना करे। आदतों से मजबूर, बीमारी के बंधनों में जकड़े हुए और अपने ही कृत्यों से जिन्दगी को नरक तुल्य बनाये हुए लोगों को देख कर मन के असंयम की भयंकरता सहज ही स्मरण हो आती है।
मन के संयम, चित्त की एकाग्रता का सुन्दर रूप सफलता में दिखाई पड़ता है। जिन कामों में सफलता दिखाई पड़ती है, उनकी जड़ में मनोनिग्रह है। बिना पूरा ध्यान दिये कोई भी कार्य नहीं हो सकता। महान कार्यों की जड़ में एक मात्र दृढ़ लगन और चित्त की स्थिरता होती है। छोटे-मोटे कार्यों की पूर्णता भी पूरा मनोयोग चाहती है। हमारे प्रतिदिन के कार्यों को सफल और सरल बनाने के लिये ही मनोयोग की जरूरत हो सो बात नहीं, योग जैसे महान कार्य का संपादन भी मन के संयम के आधार पर ही होता। महर्षि पातंजलि ने तो चित्त वृत्तियों के निरोध को ही योग माना है। एक शब्द में यों कहा जा सकता है कि मन का संयम ही मनुष्य को देवता और ईश्वर बना सकता है।
यह मनोनिग्रह किस प्रकार किया जाय गीता में इस विषय का प्रतिपादन संक्षेप में और बड़े उत्तम ढंग से किया गया है। भगवान कृष्ण ने जब अर्जुन को मन के संयम का महत्व बताते हुए उसे करने को कहा तो अर्जुन को बड़ी कठिनाई मालूम हुई। उसने पूछा भगवान, मन तो वायु के समान चंचल है उसका संयम तो असंभव है। अर्जुन जैसी कठिनाई पाठकों के सामने भी उपस्थित हो सकती है। मन अभी यहाँ है तो अभी वहाँ पहुँचता है। क्षण में बंबई है तो क्षण में कलकत्ता। पलक मारते पृथ्वी भर को प्रदक्षिणा कर आता है। उस अत्यंत सूक्ष्म चेतना का निग्रह किस प्रकार हो सकता है? यह एक असंभव नहीं तो कठिन बात अवश्य है। ठीक भी है, जो जितनी मूल्यवान वस्तु है वह उतनी ही कठिनता से मिलती है। हीरा बहुमूल्य है, इसलिए बड़ी खोज के बाद मिलता है। प्रकृति की दुकान में हर चीज का उचित मूल्य है। उसी के अनुसार मन का निग्रह, कठिन साधना चाहता है। भगवान कृष्ण ने दो ही शब्दों में अनुभवगम्य ज्ञान देकर मनोनिग्रह का उपाय बता दिया है। ‘अभ्यासेनतु कौन्तेय बैराग्ये च प्रहृते।’ हे अर्जुन, वह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है। मन का संयम करने के लिये अभ्यास और वैराग्य से सुन्दर और कोई मार्ग नहीं हो सकता।
उपरोक्त दोनों ही उपाय आपस में संबद्ध हैं। दोनों एक दूसरे से बंधे हुए हैं, एक गाड़ी के दो पहिये हैं दोनों में से कौन सा प्रथम और कौन द्वितीय हो सकता है यह कहना कठिन है फिर भी पाठक वैराग्य को प्रथम मान सकते हैं।
मन है क्या? वास्तव में मन का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। आत्मा की तरह वह अमर नहीं है। इन्द्रियों की सम्मिलित स्फुरणा को मन कहा जा सकता है। कुछ लोग इसे छठी इंद्रिय मानते हैं। जो, हो’ मन है आत्मा का एक उपादान ही। एक विचार के रूप में इसे माना जा सकता है। यदि ऐसा न होता तो मन का निग्रह सर्वथा असंभव हुआ होता। जो आदमी एक वर्ष पहले चोर था अब वह धर्मात्मा कैसे बन गया। जिस आदमी में अनेक दुर्गुण भरे हुए थे आज वह निर्मल किस प्रकार हो गया। आत्मा ने मन को एक स्थान से खींच कर दूसरे कार्य में लगाया है। जब हम चाहते हैं कि व्यभिचार करेंगे तभी मन उसके लिये तरह-तरह के उपाय ढूंढ़ता है। जब चोरी करने की जी में होती है तभी चुराने की तरकीबें सूझ पड़ती हैं। जहाँ लगाम छोड़ी कि मन महाशय मुड़ गये। उछल कूद करते हैं जरूर, पर दो चाबुक लगाते ही ठीक भी हो जाते हैं। ऐसे आदमी ढेरों पड़े हुए हैं जो काम वासना के गुलाम हैं। उन्हें अपनी हविस पूरी किये बिना चैन नहीं पड़ता। पर असंख्य हिन्दु विधवाएं ऐसी मिलेंगी जिन्होंने पति विछोह के बाद स्वप्न में भी पर पुरुष का चिन्तन नहीं किया। अखण्ड ब्रह्मचारी पुरुषों का भी अभाव नहीं है। यहाँ यह स्पष्ट हो जाता है कि एक सी शारीरिक शक्ति रखने वाले दो व्यक्तियों में से एक संयमी और दूसरा असंयमी है तो उसका कारण दोनों की मत विभिन्नता ही है। मन स्वतंत्र रूप से कुछ नहीं कर सकता। हम जहाँ चाहते हैं उसे फेंकते हैं। लगाम ढीली छोड़ने पर वह हवा के साथ जरूर बह जाता है पर जहाँ सावधान हुए कि सिर झुकाते भी उसे देर नहीं लगती। मन का निग्रह दुष्कर इसलिये बताया गया है कि सूक्ष्म होने के कारण उसकी चाल बहुत तेज हो जाती है और फिर उसे रोकने के लिये उतना ही कठिन प्रयत्न करना पड़ता है। कुम्हार का चाक जब तेज रफ्तार पर घूम रहा होता है तो वह एक दम बन्द नहीं हो जाता वरन् रोकने के लिये कुछ प्रयत्न और समय की जरूरत होती है। साईकिल का पहिया जब पूरी तेजी से चल रहा हो और ब्रेक ठीक न हों तो साईकिल को रोकने में कुछ प्रयत्न करना पड़ेगा। समय लगेगा। सब से पहले उसे चलाने से वैराग्य धारण करना होगा। पाँव चलाने बन्द करने होंगे। कुम्हार तभी चाक को रोक सकेगा जब समय सर्वप्रथम उसे घुमाने से वैराग्य धारण करे और तत्पश्चात अभ्यास से हाथ का सहारा देकर या कोई और चीज लगा कर उसकी चाल को रोके। केवल वैराग्य से भी मन वश में हो सकता है। घुमाना छोड़ देने पर भी चाक रुक सकता है पर समय कुछ अधिक लगेगा। यदि साथ ही अभ्यास द्वारा रोक भी लगाई जाय तो काम आसानी से और जल्दी दूर हो सकता है।
वैराग्य का तात्पर्य सब ओर से उदासीन हो जाना नहीं है। सब ओर से उदासीन होने का अर्थ तो एक प्रकार से मृतक बन जाना होगा। जो कुछ चाहता नहीं जिसकी किसी कार्य में रुचि नहीं, वह कर भी कुछ न सकेगा। जैसे तैसे उदरपूर्ण कर लेगा और अजगर की तरह साँसें पूरी करता रहेगा। यह एक प्रकार की जड़ता है। ऐसे जड़ वैराग्य की शास्त्रों ने अवहेलना की है और नैतिक तथा सामाजिक दृष्टि से तो यह एक प्रकार का पाप है। फिर मन-संशय के लिये कैसा वैराग्य धारण करना चाहिये? गीता में ही इस प्रश्न का समाधान करते हुए भगवान कहते हैं-
“इन्द्रियार्थेषु वैराग्य मनहंकार एव च।”
अर्थात्-इन्द्रिय जन्य विषयों से और अहंकार से वैराग्य करना चाहिये। कुवासनाओं में भटक कर ही मन चंचल होता है। इन्द्रियजन्य भोग बड़े आकर्षक होते हैं। उनमें मन बार-बार दौड़ता है। इन भोगों से तृप्ति नहीं होती वरन् जैसे-जैसे उनका सेवन किया जाता है वैसे ही वैसे आकाँक्षा और प्रबल होती जाती है। तृष्णा पाकर यह अग्नि तीव्रता को ही धारण करती है। इन्द्री भोगों में लिप्त होकर आदमी अन्धा बन जाता है और वास्तविक उद्देश्य एवं कर्तव्य पथ को भूल कर पाप बटोरने लगता है। दुःखों की जड़ यही इन्द्रियों के भोग हैं। गत अंक में बता चुका हूँ कि इन भोगों में लिप्त होकर हम किस प्रकार नष्ट होते हैं कैसी नारकीय यातनायें सहते हैं और कैसे जघन्य कृत्य करते हैं।
इन्द्रियों के भोगों के बाद अहंकार का नम्बर आता है। घमंड, अभिमान, अहंकार, शैतान का रूप है।
असौ मया इदः शत्रु र्हनिक्ष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगो सिद्धोऽहंबलवान्सुखी॥
आढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिच्य इत्यज्ञान विमोहिताः॥
यह शत्रु मैंने मार डाला, औरों को भी मारूंगा, मैं ईश्वर हूँ, मैं। ऐश्वर्य भोगने वाला हूँ, मैं सिद्ध हूँ, मैं बलवान हूँ, मैं सुखी हूँ, बड़े कुटुम्ब वाला हूँ, मेरे समान दूसरा कौन है? इस प्रकार का अभिमान अहमन्यता राक्षसों जैसी है। मैं हूँ। यही तो बंधन और अज्ञान है। इन्द्रिय भोग यदि मीठी छुरी है तो अभिमान लतलपाता कुठार है। एक मदिरा है तो दूसरा धतूरा। एक को पीकर मोह निद्रा आती है तो दूसरे को लेकर पिशाच बन जाता है। दोनों एक दूसरे से भयंकर हैं। “काम एव क्रोध एव..............” काम और क्रोध दो ही तो महापापी है। इन्हें ही तो बैरी समझना है।
गीताकार का तात्पर्य इसी काम क्रोध से वैराग्य धारण करने का है। अहंकार और वासनाओं के ग्राहों से बचे बिना भव सागर कैसे पार किया जा सकता है? जब तक इन दोनों से मुँह न मोड़ा जाय तब तक लौकिक और पारलौकिक कोई भी उन्नति न हो सकेगी। कामी विषय लोद्धप और अभिमानी किसी महान कार्य का साधन करने में समर्थ नहीं हो सकते हैं। उन्हें अपनी भीतर जलन बुझाने से ही फुरसत नहीं फिर दूसरी तरफ कौन देखे? किसी महान अनुष्ठान का सरंजाम कौन जुटावे?
मन का संयम करने के लिये इसी वैराग्य की आवश्यकता है, जिससे कुविचारों का पहिया रुक जाय और चित्त शान्त होकर एक स्थान पर ठहर सके। बिना वैराग्य के मनो निग्रह के अन्य साधन ऐसे हैं जैसे मोटर को तेज चाल से चलाते हुए उसे रोकने के लिये रास्ते में कंकड़ पत्थर डालना। उन उथले प्रयत्नों से मोटर टूट सकती है पर रुक नहीं सकती। पानी की तेज धारा, उसका मूल स्रोत रोकने से ही बंद हो सकती है रास्ते में मिट्टी की मेंढ़ लगाने से नहीं।
जब हम अपने हृदय के कपाटों को दूसरों की भलाई करने के लिये खोल देते हैं तो हम स्वयं भले बन जाते हैं और हमारे भले आदमी होने को श्रीगणेश प्रारम्भ हो जाता है। हमारी उन्नति होती जाती है और हम उस महाशक्ति को पहचानने लगते हैं।
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यदि तुम ईश्वर की वाणी सुनना चाहते हो तो अवश्य सुनोगे तुम्हारे मार्ग के रोड़े तुम्हारा कुछ न बिगाड़ सकेंगे चाहे वे कितने ही भयंकर क्यों न हों।
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अपनी जीविका के लिये किसी प्राणी को दुख न पहुंचाओ। उसको भी दुनिया में जीने का अधिकार है। वह भी उसी प्रभु का प्यारा है जिसको तुम प्यार करते हो या जिसके द्वारा प्यार करवाना चाहते हो।
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हृदय में सुन्दर भाव भरने से सुन्दर हो जाओगे और कुरूप भावों से कुरूप हो जाओगे। तात्पर्य यह है कि जैसे सोचोगे वैसे बन जाओगे।
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सबको उच्च भाव से देखो न जाने किस में कैसी आत्मा है। शायद वह तुम्हारी परीक्षा कर रही हो तुम्हें अपनी परीक्षा में अनुत्तीर्ण न होना चाहिये।
(ले0-श्री गिरराज किशोर विशारद, चिरहौली)
(2)
स्मरण शक्ति का विकास, मनुष्य जीवन के विकास के लिये अत्यंत ही आवश्यक है। इस बात को सभी लोग स्वीकार करते हैं। गृही, विरक्त, बहुधंधी, बैरागी सब को पिछली बातें याद रखने की जरूरत पड़ती है। बहुत पढ़ने सुनने और अनुभव करने पर भी मूर्खता बनी रहती है इसका कारण स्मरण शक्ति की कमी है। हम सैकड़ों सद्ग्रन्थ पढ़ते हैं उनको पढ़ने और सुनने के काल में अपने ऊपर ज्ञान का पूरा असर होता है। उन क्षणों में साधारण लोगों की स्थिति भी महापुरुषों के समान होती है। जिस विषय की पुस्तक पढ़ रहे हैं उस विषय की काफी जानकारी उस समय हो जाती है। पर यह पढ़ना सुनना बंद करते ही सारा ज्ञान चला जाता है। दस पाँच दिन बाद तो कुछ भी याद नहीं रहता सिर्फ इतना ख्याल रहा आता है कि अमुक विषय की अमुक पुस्तक हमने पढ़ी थी। कोई एकाध बात अधिक आकर्षक हुई तो वह याद रह गई अन्यथा सब गायब। कुछ बरस बाद केवल इतना याद रहता है कि यह किताब हमने कभी पढ़ी थी। और भी अधिक समय बीतने पर इस बात को भी भूल जाते हैं। इस प्रकार असंख्य पुस्तकों में पढ़ा हुआ और अनेक महापुरुषों के मुख से सुना हुआ ज्ञान हमारी फटी जेब में से यों ही कहीं गिर पड़ता है और धूलि में मिल कर खो जाता है। यदि हम दस पाँच पुस्तकों के सत् ज्ञान को धारण किये रहें। एकाध महापुरुष के विचार भी याद बने रहें तो पूरे ज्ञानी और अनुभवी बने रह सकते हैं। किन्हीं उत्तम अवसरों पर हम जैसे प्रभावित हुये थे वैसी ही स्थिति का चित्र स्मरण रखे रहें तो जीवन को एक ही निश्चित पथ की ओर ले जा सकते हैं। यदि हमारी स्मरण शक्ति तीव्र हो तो बात की बात में पुराने अनुभवों को याद कर सकते हैं। पिछली विद्या का स्मरण करके अद्वितीय बने रह सकते हैं।
यहाँ यह न सोचना चाहिये कि ईश्वर ने याद भूल जाने का दुर्गुण देकर हमारे साथ अन्याय किया है। नहीं, उसने हमारे मस्तिष्क यंत्र और उसके भीतर की शक्तियों का निर्माण बड़ी बुद्धिमतापूर्वक किया है। यदि हमें पिछले दिनों की सारी बातें ज्यों की त्यों याद बनी रहें तो मस्तिष्क इतना भर जाय कि उसमें आगे की चीजें देखने और सुनने शक्ति ही न रहे। गत अंक में बताया जा चुका है कि पिछली बातें मस्तिष्क के परमाणुओं में भीतर धँसती जाती हैं और उनकी ऊपर की पीठ दूसरी बातों के लिये खाली होती जाती है। जिस प्रकार पानी की एक लहर आगे चलती जाती है और पीछे का स्थान दूसरी लहरों के लिये छोड़ती जाती है उसी प्रकार पूर्व ज्ञान की स्मृति भी सूक्ष्म परमाणुओं में भीतर धँसती जाती है।
मस्तिष्क एक प्रकार की कबाड़िए की दुकान है जिसमें तरह-तरह की टूटी-फूटी नई पुरानी चीजें अव्यवस्थित रीति से भरती चली जाती हैं। उस दुकान में कहीं टूटे पुर्जे पड़े हुए हैं तो कहीं चक्की चूल्हे, कहीं बटन पड़े हैं तो कही सुइयाँ, कहीं कुर्सियों के पाये पड़े हुए हैं तो कहीं हाकी की। इस प्रकार की अव्यवस्थित ढंग से खचाखच भरी हुई दुकान का मालिक भी यदि आलसी है, तो किसी चीज को ढूंढ़ निकालना सहज न होगा। दुकानदार उसमें से एक पेच ढूंढ़ना चाहे तो उसे दुकान का सारा सामान तितर-बितर करना पड़ेगा तब किसी अनिश्चित स्थान पर कोई पेच पड़ा मिल सकेगा। यही बात स्मरण के संबन्ध में हमारे मस्तिष्क की होती है। जो लोग स्थूल बुद्धि से यों ही लापरवाही के साथ चाहे जिस ज्ञान को चाहे जहाँ पटक देते हैं उनका संग्रह कूड़े की तरह होता है जिसे दूसरे ही क्षण खोज निकालना कठिन है। इसके विपरीत जो लोग व्यवस्थापूर्वक किसी चीज का स्थान नियत करके उसी स्थान पर सब किसी वस्तुओं को रखते हैं उनकी चीजें निगाह के सामने रहती हैं और यदि ओझल भी हो जाएं तो ढूंढ़ने में देर नहीं लगती उन बातों की याद जल्दी उठ आती है जो यह समझ कर मस्तिष्क में रखी जाती हैं कि इसकी फिर जरूरत पड़ेगी और तब तुरंत याद उठ आनी चाहिये। इसके विपरीत जिस चीज में कोई विशेष रुचि नहीं होती या ऐसा भाव नहीं होता कि इसका स्मरण रखना आवश्यक है वह सब चीजें याद नहीं रहती।
आप एक बगीचे में घूमने जाते हैं, सैकड़ों तरह के पौधों, बच्चों, बेलें, फूल, फल देखते हैं। बगीची छोड़ते ही कोई आपस पूछे कि बताइए कौन कौन से पेड़ आपने देखे आप यही कहेंगे ‘भाई, याद नहीं। फिर कोई प्रश्न करे अच्छा पेड़ तो बहुत से थे शायद इसलिये न याद रहे हों, फूल तो थोड़े ही पौधों पर होंगे, बताइये किन-किन फूलों को आपने देखा। आपको पूरी तरह यह भी याद न होगा। एक दो चीजों की यदि याद रही भी होगी तो उनकी जिनमें कुछ विशेष आकर्षण होगा। सीधी-साधी चीजों में से तो शायद ही कोई याद होगी। दूसरे दिन आप उसी बगीचे में जाते हैं और सोचते हैं कल के पूछने वाले को आज ठीक जवाब दूँगा और पेड़ों को ध्यान से देखते हैं फूलों को ठीक तरह पहचानते हैं, उनके नाम याद करते हैं और ध्यान देते जाते हैं कि यह सब बातें मुझे ध्यान रखनी हैं साथ ही डरते जाते हैं कि कहीं भूल न जाऊँ जिससे कल की तरह आज भी निरुत्तर होकर अपनी स्मरणशक्ति की स्थूलता का उपहास न कराना पड़े। अब आप बगीचे के बाहर आइये सारे बगीचे का चित्र मस्तिष्क में घूम रहा है पूछने वाला फिर पूछता है-बताइए साहब आज बगीचे में क्या देखा? आप तुरंत ही सब चीजें बता देते हैं। भूल पड़ती है तो केवल एक दो बात की। यह भी इसलिये कि इस प्रकार स्मरण को धारण करने का यह पहला अभ्यास था। अभ्यास कुछ पुराना होते ही-याद रखने की भावना दृढ़ होते ही वे बातें आपको तुरंत याद आने लगेंगी जिनके लिये अभ्यास किया था। अकबर किस सन् में पैदा हुआ था यह स्कूल के विद्यार्थियों को ठीक याद होता है पर उनसे पूछा जाय कि तुम्हारा छोटा भाई किस सन् में पैदा हुआ था तो उन्हें याद न होगा। क्या छोटे भाई की अपेक्षा अकबर अधिक घना संबंधी है? नहीं। अकबर की जन्म तिथि याद रखने की इसलिये कोशिश की गई है कि शायद यह बात परीक्षा में पूछी जाय। पर छोटे भाई के बारे में ऐसी कोई आशंका नहीं है इसलिये वह याद भी नहीं है। स्कूल में जोमेट्री हम में से सब ने पढ़ी होगी पर जिन्हें स्कूल के बाद उससे काम नहीं पड़ा उन्हें एक दो साध्यों को छोड़ कर शेष सब साध्यें भूल गई होंगी। पर कक्षा 1 में याद किये गये पहाड़े अभी तक याद होंगे क्योंकि उनके पीछे अनेक बार यह भावना की गई है कि यह हमें याद रखने हैं।
उपरोक्त पंक्तियों को पढ़ने के बाद पाठक समझ गये होंगे कि स्मरण शक्ति तभी ठीक काम करती है जब उसके पीछे याद रखने की इच्छा और प्रयत्न हो। जिन लोगों में यह शक्ति स्वभावतः अधिक हो उन्हें ईश्वर की इस कृपा के लिये धन्यवाद देना चाहिये और जिनमें कम है उन्हें बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिये।
अभ्यास नं0 2
गत अंक में स्मरण शक्ति बढ़ाने का एक अभ्यास ताश की बूँदों को याद रखने का बताया गया था। अब एक और अभ्यास बताया जाता है। कोई ऐसा एक रंगा चित्र लीजिये जिसमें अनेक चीजें दिखाई पड़ती हों। सीनरी के चित्र इस कार्य के लिये अच्छे बैठते हैं। इस चित्र को एक मिनट ध्यान से देखिए फिर एक कागज पर लिखिए कि उसमें क्या-क्या चीजें देखीं। बाद को अपने लिखे हुए कागज और चित्र का मुकाबला कर के देखिये कि आप क्या-क्या बातें लिखने में भूल गये हैं। अब दूसरा चित्र लीजिए और उसे देखिये तथा पूर्ववत उसमें देखी हुई चीजों को भी लिखिए तत्पश्चात परीक्षा कीजिए कि अब की बार क्या छोड़ गये। एक चित्र एक बार ही काम में लाना चाहिए। क्योंकि दूसरी बार तो कोई चीज छूट ही नहीं सकती। पहली बार जो भूल गये थे, मुकाबला करने में आपने जान लिया कि इसमें अमुक भूल थी। फिर दूसरी बार भूल रहने के लिये कोई चीज ही नहीं बचती। एक दिन में दो तीन चित्रों का अभ्यास काफी होगा। यह जरूरी नहीं है कि इतने चित्र खरीदें तभी काम चले। सचित्र पुस्तकों में अनेक चित्र होते हैं। ऐसी एक किताब से कई दिन का कम चल सकता है। कुछ देर के लिये मित्रों से सचित्र पुस्तकें माँगी जा सकती हैं, इस प्रकार बिना कुछ खर्च किये भी यह अभ्यास चलाया जा सकता है। एक मिनट का अभ्यास ठीक हो जाय तो फिर समय घटाना चाहिए 50 सेकेंड फिर 40 फिर 30 सेकेंड इस प्रकार एक दो सेकेंड देख कर ही चित्र का पूरा विवरण लिख देने तक का अभ्यास करना चाहिये। एक रंगे चित्र के बाद बहुरंगे चित्रों का अभ्यास है। इसमें दीखने वाली चीजों का स्वरूप और रंग दोनों लिखना चाहिये। यह दुहरा अभ्यास है इसलिए आरंभ काल में दो मिनट तक समय देखने के लिए लिया जा सकता है और क्रमशः घटाया जा सकता है। कुछ दिन लगातार इस चित्र दर्शन और लेखन के अभ्यास करने पर स्मरण शक्ति का काफी विकास हुआ मालुम पड़ने लगता है।
(ले-प्रो. धीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती, बी.एस.सी)
(3)
गत दो अंकों को पढ़ने के बाद पाठक समझ गये होंगे कि मैस्मरेजम किन सिद्धान्तों पर स्थित है। जो इस विद्या के जिज्ञासु हैं उन्हें अच्छी तरह यह समझ लेना चाहिये कि यह पूर्ण रूप से मनोवैज्ञानिक आधार पर टिकी हुई है। दूसरों पर असर डालने वाली जो व्यक्तिगत विद्युत आदमी में होती है उसी की नियमित रूप से अभ्यास करने पर अभिवृद्धि हो जाती है और इस विशेष बल द्वारा अपने को तथा दूसरों का हानि-लाभ पहुँचाया जाता है।
आज पाठकों को हमें यह बताना है कि इस विद्या के द्वारा क्या हो सकता है और क्या नहीं। पहले अपने संबंध में विचार करना चाहिये कि हम स्वयं इस विज्ञान के जरिये क्या हानि−लाभ उठा सकते हैं। यहाँ उस बात को फिर दुहराना पढ़ेगा कि आत्मशक्ति को बढ़ाये बिना कोई भी महान कार्य पूरा नहीं हो सकता और न जीवन ही सार्थक किया जा सकता है। क्योंकि सारी शारीरिक और मानसिक शक्तियों की मूल चेतना आत्म शक्ति से ही मिलती है। इच्छाशक्ति यदि निर्बल है तो पहलवान आदमी एक लड़के को भी परास्त करने में असमर्थ होगा। हट्टा-कट्टा आदमी दस कोस पैदल चलने में अपने को अशक्त पायेगा। दार्शनिक सुकरात से किसी ने पूछा-मुर्दा कौन है? उनने उत्तर दिया-जिसका मन मर गया। यहाँ मन से अभिप्राय इन्द्रिय-जन्य वासना से नहीं वरन् इच्छाशक्ति से है। यह आत्मशक्ति, विद्युत निर्माण के यंत्र है जिसके चलने पर मशीन के सारे कल पुर्जे चलने लगते हैं। चाहे वे टूटे फूटे ही क्यों न हों और उस यंत्र के बन्द या मन्द होते ही पुर्जों का काम शिथिल हो जाता है, चाहे वे बिलकुल नये ही क्यों न हों। अस्सी फीसदी नौजवानों के शरीर और मन का विश्लेषण कीजिये वे अनुत्साही और निराशा से भरे हुए मिलेंगे। शरीर की जाँच करने पर कोई छोटा-मोटा घुन लगा हुआ मिलेगा पर जवानी के नये खून को केवल उस छोटे से घुन के कारण अशक्त नहीं कहा जा सकता। फिर क्यों उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही हैं? क्यों किसी काम को करने की भीतर से स्फुरणा नहीं होती? क्यों हर वक्त निराशा और आशंका की भावनाओं से घिरा रहता है? उसमें आत्म शक्ति, आत्म विश्वास की कमी हो गई है। वह अपने बल को भूल गया है। हनुमान में समुद्र पार करने का बल था पर वे अपने बल को भूल गये थे। जामवन्त ने बताया कि भूलो मत, तुम में अनन्त बल है। जब उन्हें आत्म-शक्ति का स्मरण हुआ तो सहज ही समुद्र पार कर गये। सत्तर वर्ष के बुढऊ गाँधी को देखिये, अठारह-अठारह घंटे काम में जुटे रहते हैं। इतना श्रम करते हैं जितना अनेक युवक मिल कर भी नहीं कर सकते उनके जीर्ण क्षीण शरीर में इतनी ताकत कहाँ से आती है? उन्होंने आत्मशक्ति को बढ़ाया है। और उसी डायनेमो से इतनी बिजली मिलती रहती है कि नौजवानों की अपेक्षा कई गुना काम अपने जीर्ण शरीर से भी कर सकते हैं।
मैस्मरेजम इस आत्मशक्ति की वृद्धि करने का एक सरल और अनुभूत उपाय है। मैं यह नहीं कहता कि जिस प्रकार की त्राटक या अन्य शक्ति आकर्षण क्रियायें मैं जानता हूँ उससे अधिक हैं ही नहीं या आत्मशक्ति संपन्न महानुभावों ने उन्हीं क्रियाओं को करके आत्मशक्ति को जाग्रत किया है। उसके अगणित उपाय हो सकते हैं और बुद्धिपूर्वक नये निकाले जा सकते हैं। कुएं में से पानी निकालने के लिये पम्प लगाया जा सकता है, रहट चलाई जा सकती है, ढेंकी से काम हो सकता है, रस्सी में बाँध कर घड़ा खींचा जा सकता है और जंजीर में लोटा, कमंडल, ताम्र पात्र बाँध कर खींच सकते हैं। सब तरीकों से पानी प्राप्त किया जा सकता है पर क्रिया एक ही होगी। किसी न चूने वाले पात्र को कुएं में डुबा कर ऊपर खींचना। खींचने के उपायों को बदला जा सकता है पर सिद्धान्त में अन्तर नहीं हो सकता। यही बात आत्मशक्ति की उन्नति और मैस्मरेजम प्रणाली के संबंध में है।
बिखरी हुई शक्तियों का एकत्रीकरण ही शक्ति का कुँज हैं। एक स्वर से आज दुनिया चिल्ला रही है संगठन करो। संगठन ही शक्ति है हर प्लेटफार्म से यही पुकार आती है। संगठित हो जाओ। सर्वत्र संगठन की धूम है। हिन्दू सभा, मुसलिम लीग, जातीय संगठन, राष्ट्रीय काँग्रेस, युवक संगठन, विद्यार्थी संघ, महिला सम्मेलन, प्रजा परिजन, दलित सभा, पंडित-परिषद, का बोलबाला है। विचारधारा, व्यवसाय, धर्म, जाति, अधिकार, विद्या, स्वास्थ्य, आदि के आधार पर विभिन्न संगठन कायम हैं। और नित नये बनते जाते हैं। क्योंकि अब दुनिया जान गई है कि संसार में संघ- शक्ति एकत्रीकरण से बढ़कर कोई ताकत नहीं हो सकती। यही सर्वोपरि शक्ति है बिखर जाने, फूट पड़ने, टूट-फूट होने तथा प्रथक करण के दोष और एकता, मेल, इकट्ठे होने के गुण सर्वविदित हैं उनकी एक छोटी सी झाँकी करा देने का तात्पर्य इतना ही है कि मैस्मरेजम तत्त्व के जिज्ञासु यही भली-भाँति समझ जावें कि मानसिक शक्तियों के एकत्रीकरण द्वारा जो अद्भुत चमत्कार हो रहे हैं और उससे भी बढ़कर आगे होने वाले हैं उनका मूलभूत आधार वही महान सत्य है जिसके आगे दुनिया अब घुटने टेक कर बैठ गई है और उसके अनन्त शक्तिसम्पन्न चरणों में अपना मस्तक रगड़ रही है।
एकता- एकत्रीकरण शक्ति का सर्वोत्तम विधान है। आतिशी शीशे द्वारा सूर्य की किरणें एकत्रित होते और उनके द्वारा अग्नि उत्पन्न होते, आप सब लोगों ने देखी होगी। किसे पता है कि एक इंच के छोटे शीशे की परिधि में इतनी अग्नि घूम रही है जिसमें विश्व को भस्मीभूत करने की शक्ति है। साधारण काँच पर बिखरी हुई किरणों से हम इसे नहीं जान सकते। अपने पड़ोसियों को जब कीड़ों की तरह क्षुद्र जीव देखते हैं तब यही भ्रम होता है कि यह हाड़ माँस का पुतला तुच्छ है। इसकी शक्ति नगण्य है। किन्तु जिसने विवेकपूर्वक गवेषणा की है उसने देखा है कि यह ईश्वर का अमर पुत्र तुच्छ नहीं है। इसका बल अकूत हैं। आज का हिटलर चिल्लाता हैं ‘अज्ञानिया’ मुझे कल चपरासी, उद्रपूर्ण के लिए चिन्तित एक अनाथ बालक समझो। आदमी के अन्दर जो तत्व हैं उसे मैंने देख लिया है। मेरी शक्ति अतुलित है क्योंकि मैं अखंड शक्ति का पुत्र हूँ। दुनिया मेरी जान खाकर तिलमिला उठेगी। आज के तानाशाह कहते हैं हमें देखो हम राजघरानों में नहीं भुखमरों के घर में पैदा हुए हैं। पर हमने जान लिया है कि आदमी के अन्दर क्या है। उस दिन नेपोलियन नामक एक लड़का महान एल्पस पर्वत के निकट पहुँचा। यह अनन्त काल से रास्ता रोके पड़ा हुआ था। नेपोलियन ने दृढ़तापूर्वक कहा तुम्हें मेरे मार्ग में से हटना पड़ेगा, बेचारा एल्प आखिर जड़ पदार्थ था। चैतन्य तत्व की गर्मी कैसे सह सकता था। उसे हटना पड़ा और नेपोलियन के लिए मार्ग देना पड़ा। जिसके पास अपनी गिरह का पेट भरने लायक अन्न और तन ढकने लायक कपड़ा नहीं है। वह भिक्षुक गाँधी, चालीस करोड़ आदमियों के दिलों पर शासन करता है। दुनिया की मानवता ने अपने हृदय पुष्य उसके चरणों के नीचे बिछा दिये हैं। क्योंकि गाँधी ने जाना है कि आदमी उस सत्य महासागर का ही बिन्दु है।
यहाँ भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं है। मैं जानता हूँ कि आप यह पूछने वाले है कि क्यों साहब क्या यह सब लोग मैस्मरेजम करने वाले थे? इन्होंने यह सब काम मैस्मरेजम से कर डाले थे? इसके दोनों उत्तर हो सकते हैं। आप समझते हैं कि मैस्मरेजम वह तमाशा है जिसे बाजीगर गली कूचों में दिखाकर भीख माँगते हैं तो मैं कहूँगा कि हरगिज इससे उन महापुरुषों ने कोई मदद नहीं ली यदि आप समझते है कि आत्मशक्ति के विकास का नाम ही इन दिनों मैस्मरेजम चल पड़ा हैं और इन पंक्तियों का लेखक उसे इसी अर्थ में प्रयोग कर रहा है तो मैं कहूँगा हाँ जनाब हर एक महापुरुष ने इसी मैस्मरेजम को सीखा है इसी के सहारे हर कार्य में सफलता पाई है। जिसने आत्मतत्व को बढ़ाया है उसने अपनी बिखरी हुई ताकतों को इकठ्ठा किया है। आप भी अपना विकास करना चाहते हैं तो आप को भी यही करना पड़ेगा। सौभाग्य से कभी-कभी तीतर के हाथ बटेर पड़ जाती है। आलसियों को कभी गढ़ा खजाना मिल जाता है पर यह अपवाद है। अमुक चरवाहे को सोने का कंठा जंगल में पड़ा मिल गया था उससे यह नहीं कहा जा सकता कि हाँ एक पशु चराने वाले को जंगल में पड़ा सोने का कंठा मिलता है। हाँ यह बात निश्चयपूर्वक कही जा सकती है कि जो दिन भर मजदूरी करेगा उसे अन्न वस्त्र के लिए सुविधाएं मिलेंगी जो बोयेगा वह काटेगा। अपवाद इसमें भी हो सकते हैं किन्तु अपवादों के कारण कोई सुदृढ़ सिद्धान्त कट नहीं सकता।
आप मैस्मरेजम तत्व का अभ्यास करके अपनी आत्मशक्ति बढ़ा सकते हैं। इस बढ़ी हुई शक्ति के कितने लाभ हो सकते हैं यह गिनाया नहीं जा सकता। बिजली बचाने वाला जारेदार चालू यंत्र आपके पास हो तो उससे क्या क्या काम ले सकते हैं यह गिन लेना कठिन है। इतना ही कहा जा सकता है कि जितने प्रकार की मशीनें आपके पास हों उन सब को चलाया जा सकता है। इच्छानुसार उसे चाहे किसी भी काम में प्रयोग कर सकते है। यह एक आध्यात्मिक धन है। रुपया पैसा से हम जिस प्रकार अच्छी बुरी भौतिक चीजें मोल ले सकते हैं उसी प्रकार इस आत्मिक धन का भी उपयोग हो सकता है। शरीर को बलवान किया जा सकता है मन को सशक्त बनाया जा सकता है मस्तिष्क की अनेक गुप्त प्रकार की शक्तियों को बढ़ाया जा सकता है अपनी कार्य क्षमता बढ़ाई जा सकती है, गहन आत्म तत्व की खोज की जा सकती है, ईश्वर दर्शन किया जा सकता है। अनेक प्रकार की अलौकिक सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं। आत्म तेज और मनोबल इतना बढ़ाया जा सकता है जिसके बल पर सब प्रकार की सफलताएं स्वयमेव आकर्षित हो आवें। और तमाशा? तमाशा भी दिखाया जा सकता है। बाजीगरी भी की सकती है पर जो लोग इस चन्दन को चमड़ा काटने की सिल बनाने के लिए प्राप्त करना चाहते हों उनसे मैं नम्रतापूर्वक कहूँगा, महोदय, तमाशे एक से एक बढ़िया बनाये जा रहे हैं आप मनोरंजन के लिए कोई दूसरा साधन चुन लीजिए। इस सती साध्वी माता के समान पूजनीय शक्ति को वेश्या बना कर बाजार में नचाते मत ले जाइये।
यदि तुम चाहते हो कि संसार में शान्ति का अविकल राज्य स्थापित हो जावे तो तुम स्वयं शक्ति के मार्ग के पथिक बनो। शक्ति और प्रेम को शब्दों के साथ प्रदर्शित करो।
(ले.-श्री. नारायणप्रसाद तिवारी, कान्हीवाड़ा)
योग इतना गूढ़ तथा महत्व का विषय है कि मुझ जैसे पुरुष का लेखनी उठाना ही हास्यास्पद है, किन्तु मनुष्य अपने विचारों में स्वतन्त्र है। औचित्य तथा अनौचित्य पर सम्मति प्रगट करने के लिये संसार के सामने अपने विचार रखना भी प्रत्येक सत्यासत्य-निर्णय-प्रेमी का कर्तव्य है, यही धारण हृदय में धर का साहसपूर्वक आज उस अखण्ड ज्योति पर लिखने चला हूँ जिस ज्योति के प्रकाश में मनुष्य सदा सुख मार्ग पर चल सकता है।
योग के आद्य प्रवर्त्तक अवढ़रदानी शिवजी माने गये हैं। इसी से उन्हें योगीराज अथवा योगेश्वर भी कहा जाता है। केवल योग का उपदेश शिवजी के मुँह से सुनने के कारण ही जब कि व्यास पुत्र भी शुकदेवजी पक्षि योनि से उद्धार हो दूसरे जन्म में परम योगी बन गये तो योग साधक को सर्व सिद्धि मिलने में क्या आश्चर्य है। शिवजी ने स्वयं कहा है :-
विविच्य सर्व शास्त्राणि, विचार्य च पुनःपुनः।
इदमेकं सुनिष्पन्नं योग शास्त्रं परं मतम्॥
मैंने समस्त शास्त्रों की विवेचना कर उन शास्त्रों का पुनः पुनः विचार किया और मैं इसी निश्चय पर पहुँचा हूँ कि योग शास्त्र ही सर्वश्रेष्ठ शास्त्र हैं।
बिना योग के मनुष्य को ज्ञान भी नहीं होता “योग हीनं कथं ज्ञानम् मोक्षदं।” श्री शिवजी ने योग की बड़ाई करते हुए पार्वती जी से कहा है कि :-
ज्ञान निष्ठो विरक्तोऽपि धर्मज्ञोऽपि जितेन्द्रियः।
बिना योगेनदेवोऽपि न मुक्तिं लभते प्रिये॥
हे प्रिये, ज्ञानन्वान, संसार विरक्त, धर्मज्ञ, जितेन्द्रिय, या कोई देवता भी योग के बिना मुक्ति नहीं पा सकता।
घेरंड संहिता में कहा है :-
नास्ति माया समं पापं, नास्ति योगात्परं बलम्।
नास्ति ज्ञानात्परो बन्धुर्नाहकाँरात्परो रिपुः ॥
“माया से बढ़ कर पाप नहीं, योग से बढ़ कर बल नहीं, ज्ञान से बढ़ कर बन्धु नहीं और अहंकार से बढ़ कर शत्रु नहीं।”
योग शब्द की उत्पत्ति ‘युग’ धातु से ली जाती है और “योगश्चित वृत्ति निरोधः” चित्त की वृत्तियों को रोकने का नाम योग है, यह अर्थ किया जाता है। “सर्व चिन्ता परित्यागो निश्चिन्तो योग उच्यते” जब तक मनुष्य सब चिन्ता छोड़े रहता है तब तक उसके मन की उसी लयावस्था को योग कहते हैं- यह अर्थ भी योग शास्त्र में पाया जाता है।
योग का अर्थ ध्यान व समाधि भी है योग शब्द का अर्थ, जोतने, बोने, लगाने, मेल करने आदि अर्थों में भी हुआ है, उपनिषद् में इसका अर्थ घोड़ों को वश में करने में आया है फिर इसका अर्थ इन्द्रियों को वश में करने में हुआ।
योग ही सब से बड़ा बल है, इसी योग बल द्वारा भारतवर्ष जगद्गुरु था, ज्यों-ज्यों योग बल का ह्रास हुआ त्यों-त्यों दशा दयनीय होती गई। हाँ योगमार्ग दुस्तर मार्ग अवश्य है। “युरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत्कवयो वदन्ति।” किन्तु जहाँ काँटे हैं वहीं तो फूल होते हैं, यदि इस मार्ग में कष्ट हैं तो उतना आनन्द भी है, योग में क्या है? इसका उत्तर मैं तो यही दूँगा कि योग में क्या नहीं है?
भूत भविष्यत् ज्ञान, रोग मोचन, पूर्व जन्म का हाल जानना-दूसरे के मन की बात जानना, मैस्मेरिज्म, हिप्नोटिज्म, ऑकल्ट साइंस(Occult Soience) सब योग के अंतर्गत ही तो हैं, छोटे मोटे रूप में प्रत्येक मनुष्य प्रतिदिन किसी न किसी रूप में योगाभ्यास करता है, किन्तु वह अपने में इस छिपी हुई शक्ति का भास नहीं करता, जिस प्रकार लकड़ी में अग्नि, बीज में पौधा, गुप्त रूप से विद्यमान है उसी प्रकार हम में योग विद्युत है।
इस छोटे बच्चे को गोद में लेकर थपकियां देकर सुलाते हैं और जब तक वह गाढ़ी निद्रा में नहीं होता तब तक “अब सो गया, अब सो गया” बस इसी भाव पर लक्ष्य रहता है। झाड़-फूँक, मन्त्र, तन्त्र भी योग के सूक्ष्म रूप हैं। जिन रहस्यों को पाश्चात्य विद्वानों ने वैज्ञानिक आविष्कार के रूप में अब प्रगट किया है, भारत के योगियों के लिये यह क्षुद्र बात थी, बल्कि पाश्चात्य वैज्ञानिक अभी उस तह को पहुँच भी नहीं सके हैं जो योगियों के लिये बायें हाथ का खेल था। अपने शरीर को वायु समान हलका और हाथी के समान भारी बनाना बिना यंत्र हवा में उड़ना-और कहाँ तक कहा जावे मृत्यु भी जिन्होंने वशीभूत कर लिया था क्या ये आलौकिक चमत्कार वर्तमान युग में सभ्यता की डींग मारने वालों में हैं। साधना के अभ्यास से इन शक्तियों का आविर्भाव भी किया जा सकता है-एक विद्वान का कथन है।
रुड्डठ्ठ द्बह्य द्धद्बह्य शख्ठ्ठ ड्डह्ष्द्धद्बह्लद्गष्ह्ल ढ्ढद्ध ब्शह्व श्चह्वह्ल द्धशह्ह्लद्ध श्चह्शश्चद्गह् द्गद्धद्धशह्ह्लह्य ह्लश ष्ह्वद्यह्लद्बक्ड्डह्लद्ग ड्डठ्ठस्र श्चह्वह्ल द्बठ्ठह्लश द्वशह्लद्बशठ्ठ ह्लद्धद्ग श्चशख्द्गह् ह्लद्धड्डह्ल द्बह्य द्यड्डह्लद्गठ्ठह्ल ड्डठ्ठस्र द्बठ्ठड्ढशह्ठ्ठ द्बठ्ठ ब्शह्व ह्लद्धद्ग स्रशशह् ह्लश ह्यह्वष्ष्द्गह्यह्य द्बह्य ख्द्बह्लद्धद्बठ्ठ ब्शह्वह् ह्द्गड्डष्द्ध ड्डठ्ठस्र द्बह्ल द्बह्य द्धशह् ब्शह्व ह्लश ह्वठ्ठद्यशष्द्म द्बह्ल.
तात्कालिक फल दिखलाने वाली योग विद्या से बढ़ कर और कोई विद्या नहीं, मैंने स्वयं इसी योग विद्या के आधार पर रोगियों को संखिया, कुदला आदि विष तक हजम करते देखा है, योगी को अष्टसिद्धि प्राप्त करना आसान खेल है, श्रीकृष्णचन्द्र जी ने स्वतः इस योग विद्या की बढ़ाई श्रीमद्भगवद्गीता में की है जो पंचम वेद माना जाता है। यह सार्वभौमिक विद्या है और किसी जाति विशेष इस पर सत्वाधिकार नहीं कर सकती।
योग-बढ़ाई में बहुत कुछ कहा जा सकता है। कई शास्त्र केवल इसी विषय पर ऋषि बना चुके हैं अतएव उसके महत्व में अधिक कहना सूर्य को दीपक दिखाना है।
यदि तुम्हारे अन्दर ईश्वरीय शक्ति विद्यमान हैं तो यह जान लीजिये कि आपके अन्दर सर्व शक्तियाँ भरी हुई हैं और फिर दुष्कर से दुष्कर कठिनाइयों को सहज में पार कर सकते हैं।
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जैसे किसी नदी का पानी बहुत सी छोटी नहरों में बहने से वेगहीन हो जाता है। उसी तरह से तुम्हारी शक्ति भी कमजोर हो जायेगी। यदि तुम भिन्न-भिन्न कामों में उसे लगाओगे। इसलिये जिस काम को करो पूर्ण योग के साथ करो। तभी उसमें सफलता दिखलाई देगी।
(ले.-प्रो. प्रोफेसर डबल्यू. रेले, न्यूयार्क)
(खास अखण्ड ज्योति के लिए भेजे हुए अंग्रेजी लेख का अनुवाद)
इस लेख में मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि मूर्ति पूजा करनी चाहिए या नहीं। मूर्ति पूजा को जो पुण्य या पाप जैसा कुछ समझते हैं, समझने में स्वतन्त्र हैं। जिनका मूर्ति में विश्वास हो वे उसका पूजन करें, जिनको विश्वास न हो वे न करें। दोनों में क्या ठीक है यह विवेचना करने का इस समय अवकाश नहीं है आज तो मुझे यही बताना है कि मूर्ति पूजा की विधि वैज्ञानिक है या अवैज्ञानिक?
इस प्रश्न पर एक वैज्ञानिक की भाँति परीक्षात्मक दृष्टि से विचार करने पर मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि किसी चतुर पदार्थ विज्ञानवेत्ता ने स्वास्थ्य, प्रकृति, पदार्थ शब्द और विद्युत शास्त्र की पूरी जानकारी के साथ मूर्ति पूजा का सारा विधान ऐसे उपयुक्त ढंग से निर्माण किया है जो आदमी की शारीरिक और मानसिक उन्नति के लिए लाभप्रद हो सके।
मैं स्वयं ईसाई धर्मानुयायी होने के कारण मूर्ति पूजा के सारे विधान को अच्छी तरह नहीं जानता। सुना है कि हिन्दुस्तान में असंख्य देवी देवता हैं और एक एक की कई-कई आकृति की मूर्तियाँ हैं इस प्रकार हिन्दू धर्म के अंतर्गत अनेक संप्रदाय, उप संप्रदाय हैं और उन सब की मत विभिन्नता का असर मूर्ति पूजा के विधान पर भी पड़ा है, इसलिए कई लोग कई तरह से पूजा करते हैं। मैं उन बारीकियों और मतभेदों से भली प्रकार परिचित नहीं हूँ इसलिए गहराई में न जाकर उन मोटी बातों पर प्रकाश डालूँगा जो प्रायः सब प्रकार की पूजा में काम आती हैं।
शंख ध्वनि और घंटा घड़ियाल पूजा का प्रधान अंग हैं। शंकर, विष्णु गणेश, देवी, गुड़च (Gurhecl) से प्रोफेसर साहब का मतलब किस देवता से है यह हम नहीं समझ सके। संपा0) आदि किसी देवता की पूजा शंख और घड़ियाल बजाये बिना नहीं होती। सन् 1928 में वर्लिन यूनीवर्सिटी ने शंख ध्वनि का अनुसंधान कर के यह सिद्ध किया था कि शंख ध्वनि की शब्द लहरें बैक्टीरिया नामक संक्रामक रोग कीटों को मारने में उत्तम और सस्ती औषधि हैं। प्रति सैकिण्ड 27 घन फीट वायु शक्ति के जोर से बजाया हुआ शंख 1200 फीट दूरी तक के बैक्टेरिया जन्तुओं को मार डालता है और 2600 फीट तक के जन्तु इस ध्वनि के कारण मूर्छित हो जाते हैं। बैक्टीरिया के अतिरिक्त हैजा, गर्दन तोड़ बुखार, कंपजुरीं के कीड़े भी कुछ दूरी तक मरते हैं, ध्वनि विस्तारक स्थान के आस-पास का स्थान तो निःसंदेह निर्जन्तु हो जाता है। मृगी, मूर्च्छा, कंठमाया और कोढ़ के रोगियों के अन्दर शंख ध्वनि की जो प्रति किया होती है वह रोग नाशक कही जा सकती है। शिकागो मेयो अस्पताल के ख्यातिनामा डॉक्टर डी0 ब्राइ में तेरह बहरे लोगों की श्रवण शक्ति को शंख ध्वनि की मदद से सचेत किया था।
घड़ियाल का घंटा भी शंख से कुछ ही नीची श्रेणी का है। किन्हीं-किन्हीं स्थानों पर तो उसकी उपयोगिता शंख से भी अधिक है। घड़ियाल अकसर पीतल और काँसे के मिश्रण से बनी हुई होती है। इस पर चोट लगाने से एक प्रकार के कम्पन लिये हुए लहरें पैदा होती हैं। यह लहरें अद्भुत शक्ति सम्पन्न होती हैं। विद्युत मापक यंत्र का परीक्षण अब यह साबित कर चुका है कि उनमें तेरह से लेकर सैंतीस घोड़े तक की ताकत होती है। जिसमें ध्वनि प्रवाह लहर न निकल सके किसी ऐसे बन्द मकान के अन्दर यदि नौ मिनट तक घड़ियाल बजाई जाय तो निस्संदेह कोई दीवार फट जायगी। यह शब्द प्रवाह स्नायु रोगों के लिये बड़ा लाभप्रद होता है। काँसे के बर्तन के ध्वनि कम्पन विष नाशक और उत्तेजनादायक होते हैं। अफ्रीका निवासी और हिन्दू लोग काँसे का बर्तन बजा कर जहरीले साँप के काटे हुए रोगी को अच्छा करने की क्रिया प्राचीन काल से जानते चले आ रहे हैं। मास्को के सेनेटोरियम में काँसे की शब्द ध्वनि से तपैदिक रोग के बीमारों को स्वस्थ करने के सफल प्रयोग हो रहे हैं। निद्रित और अवसादित ज्ञान तन्तुओं को घड़ियाल एक स्फूर्ति प्रदान करती है। आप में सके अनेक बर्मिंघम के सन् 1916 वाले उस मुकदमें से परिचित होंगे जिसमें एक नास्तिक ने पड़ोस के गिरजाघर में बजने वाले घंटे से स्वास्थ्य- हानि होने का दावा अदालत में किया था। मुद्दई का कहना था कि घंटा ध्वनि से हमें शारीरिक क्षति पहुँचती है। अदालत ने तीन प्रमुख वैज्ञानिकों का एक बोर्ड कायम किया जो घंटा शब्द को द्वारा होने वाले असर की जाँच करे। बहुमूल्य यंत्रों द्वारा यह परीक्षण सात महीने होता रहा अन्त में वैज्ञानिक बोर्ड ने यही घोषित किया कि घंटा नाद से हानि तो दूर उल्टा लाभ होता है। कई शारीरिक कष्ट कटते हैं और मानसिक उत्कर्ष होता है। घंटा नाद के कम्पन मानसिक गतिविधि की दिशा एक ही ओर करके एक प्रकार की तन्द्रा और शान्ति प्रदान करते हैं। इस दृष्टि से पूजा की घंटा ध्वनि अनुपयोगी नहीं ठहराई जा सकती।
घृत और कपूर के दीपक, अगर या धूप की बत्ती जलाना एवं हवन आदि की क्रिया वायु शोधन के लिए बहुत ही उपयोगी है, गंदे घरों की सफाई के लिए कपूर गंधक आदि का तीक्ष्ण धुँआ भरना एक वैज्ञानिक प्रणाली है। पौष्टिक और सुगंधित वस्तुओं को जलाना तो दुहरा काम करता है। वायु की गरमी और विषैलेपन को जलाने के साथ-साथ ऑक्सीजन वायु में रहने वाले सूक्ष्म तत्व ओजोन का भी संमिश्रण करता है जो रक्त शुद्धि के लिये बहुत हो फायदे मन्द हैं और मस्तिष्क को ठंडक प्रदान करती है।
एक बात और भी मैंने सुनी है, वह यह कि पूजा में सब बर्तन ताँबे के होते हैं और हिन्दू उन्हें इतना पवित्र मानते हैं कि कोई उनसे मुँह लगा कर पानी नहीं पीता। शुरू में जब मुझे यह मालूम हुआ था कि ताँबे के बर्तन का प्रयोग इतनी अधिकता से होता है तब मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था क्योंकि यह मानी हुई बात है कि ताँबे का मिश्रण पानी को विषैला बनाता है। उसकी सूक्ष्म मात्रा तो लाभप्रद है परन्तु कुछ भी अधिकता होना बुरा है। खटाई नमक या मुँह का थूक ताँबे से मिलकर फौरन उसका अधिक भाग खुरच लेते हैं। यही कारण है कि ताँबे के बर्तन में कोई मनुष्य साग, दाल, चटनी या शोरबा रखकर न खायेगा। जिन गिलासों से मुँह की लार लगती है उनकी धातु स्वतः ही अधिक मात्रा में छूट जाती है जब मेरे एक मित्र ने यह बताया कि हिन्दू लोग अपनी धार्मिक भावना के अनुसार ताँबे के बर्तनों में रख कर कुछ भी नहीं खाते पीती मुँह लगा कर उसे झूठा नहीं करते। ताँबे के बर्तनों की पूजा में इतना ही प्रयोग होता है कि उनमें भरा हुआ जल रखा रहे और उसे अलग से इस प्रकार चरणोदक आदि के रूप में पिया जाय जिससे मुँह उस पात्र से न लगे। तब मुझे सन्तोष हुआ और समझा कि प्राचीन भारतीय तत्व वेत्ता जो विष में से अम्त निकालने के लिये प्रसिद्ध थे इस मौके पर भी चूके नहीं हैं। उन्होंने ताँबे के पात्र का पूजा में इस चतुराई के साथ समन्वय करके निश्चय ही अपनी सुदृढ़ वैज्ञानिकता का परिचय दिया है।
सूचना
इस लेख के विद्वान लेखक प्रोफेसर पी0 डबल्यू रेले हैं परन्तु प्रेस की गलती से “प्रो0 प्रोफेसर डबल्यू रेले छप गया है पाठक इस गलती को सुधार कर पढ़ें।
डर, ओस बिन्दु के समान है जो सूर्य की गर्मी तथा हवा से विलीन हो जाती है। इसी तरह से जब किसी का चित्त पूर्ण रूप से सत्य की ओर झुक जाता है तो उसका डर रूपी ओस बिन्दु वहीं विलीन हो जाता है और उसके स्थान पर शान्ति विराजती है।
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डर मनुष्य के हृदय में तभी पदार्पण करता है जब कि वह अपने को अकेला तथा असहाय अनुभव करता है या जब तक वह ईश्वर को सर्वव्यापक नहीं मानता। उसके ऊपर वही असर पड़ता है जैसा एक असहाय मनुष्य पर पड़ता है। यदि उसे यह भान हो जाए कि ईश्वर सबका सहायक है तो उसका भय तुरन्त दूर हो सकता है।
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यदि तुम अपने काम में सफलता चाहते हो या वैभव चाहते हो या अपना स्वास्थ्य अच्छा करना चाहते हो तो अपना विश्वास ईश्वर में रखो। वही तुम्हारे सब कामों का पथ प्रदर्शक हो सकता है।
(ले.-श्री. प्रबोधचन्द्र गौतम, साहित्य रत्न, कुर्ग)
अपघात, आत्म-हत्या, दुर्घटना या किसी के द्वारा वध किये जाने पर जीव और शरीर का अकस्मात सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है। यह आघात जीव को उद्विग्न कर देता है। स्वाभाविक मृत्यु छोटी मोटी बीमारी के कारण होती है। बीमारी के कारण धीरे-धीरे सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर का सम्बन्ध विच्छेद होने की क्रिया आरम्भ हो जाती है और कुछ दिनों में यह विच्छेद क्रिया पक जाती है। पक जाने पर कार्य सुगम हो जाता है। पक जाने पर फूल या फल स्वयमेव बिना किसी कठिनाई के टूट पड़ते हैं लेकिन यदि उन्हें कच्ची दशा में ही तोड़ा जाय तो टूटने की क्रिया कष्टप्रद होती है। दीमक ने जिस पौधे की जड़ खोखली कर दी है वह आसानी से एक ही झटके में उखड़ जाता है किन्तु हरा-भरा पौधा उखाड़ने में काफी बल प्रयोग होता है और उखड़ते समय जड़ें बड़े कष्ट के साथ टूटती हैं और वे खिंचते खिंचते जमीन में से मिट्टी आदि चीजों को साथ खींच ले जाती हैं। दुर्घटनापूर्ण आकस्मिक मृत्यु से भरा हुआ जीव शरीर में से उन भौतिक चीजों को भी साथ ले जाता हैं जिनकी स्वाभाविक मृत्यु में आवश्यकता नहीं होती।
साधारण मृत्यु से पूर्व जो रोग आरम्भ होता है वह शरीर और मन को पीड़ित करके एक प्रकार की मूर्च्छा में ले जाता है। कई लोग मरने से पूर्व तक सावधानी के साथ बातचीत करते रहते हैं पर इससे यह न समझना चाहिए कि उनकी संज्ञा स्वस्थ अवस्था जैसी ही है। पीड़ा की कमी और मनोबल बढ़ा होने के कारण ही उनकी बातें अधिक विक्षिप्त नहीं होतीं। थोड़ा सा फर्क तो तब भी आ जाता है। किन्तु बीमारी की दशा में या मृत्यु से पूर्व जितनी असावधानी होने की आशा की जाती है उससे कम होने पर लोग आश्चर्य करते है। और मृत्यु के उपरान्त तो उस साधारण सावधानी का धुँधला चित्र लोगों की आँखों में रह जाता है एवं थोड़ी असावधानी याद न रह कर यही स्मरण रह जाता है कि अमुक सज्जन मृत्यु से पूर्व सावधानीपूर्वक बातचीत करते रहे थे या बोलते चालते मरे थे। परन्तु असल में ऐसी बात नहीं होती। मृतक की अपनी स्थिति बदल जाती है। इसका थोड़ा सा अनुभव आपको कई बार हुआ होगा। आप को कभी न कभी तेज बुखार जरूर आया होगा उस समय की अपनी मनोदशा का स्मरण कीजिए। बुखार की तेजी होते हुए भी आपने कुटुम्बियों से बातचीत की होगी, उनके प्रश्नों का उत्तर दिया होगा। नौकरों को जरूरी काम काज बताया होगा किसी को सलाह मशवरा भी दिया होगा। बाहरी दृष्टि से देखा जाए तो आप स्वस्थ मालूम होते हैं क्योंकि सभी बात चीत ठीक तौर से और बुद्धिपूर्वक कर रहे हैं परन्तु सूक्ष्म दृष्टि से ऐसा प्रतीत नहीं होगा। बुखार की दशा में अपना मन भारी और उथल पुथल सा हो जाता है। अपनी स्थिति ऐसी मालूम पड़ती है मानो हमारा शरीर जड़ पदार्थ के समान और कुछ हल्का होकर ऊपर उड़ सा जाता है। दूसरे लोगों से जैसा राग द्वेष स्वस्थ अवस्था में होता है वैसा बीमारी की दशा में नहीं होता। यदि ज्वर का ही तीव्र प्रवाह होता है तो प्रेमिका को गले लगाने की इच्छा नहीं होती दुश्मन सामने आ जाय तो उतना क्रोध नहीं आता। नौकरों पर हुकूमत जताने को मन नहीं होता। यह साधारण ज्वर की मनोदशा के चित्र हैं। जिस बीमारी ने सूक्ष्म और स्थूल शरीरों के बंधनों को तोड़ डाला है उस बीमारी की दशा में तो मन और भी बदल जाता है। यही मन परिवर्तन एक प्रकार की मूर्छा है जिसमें मृत्यु कष्ट की भयं करता कम हो जाती है। यह एक तरह का प्राकृतिक क्लोरोफार्म है जिसके द्वारा आपरेशन का कष्ट पूरी तरह अनुभव नहीं हो पाता। मृत्यु के समय की बेहोशी ईश्वर ने इसलिए बनाई है कि जीव को मृत्यु कष्ट की भयंकर यातना ना भोगनी पड़े।
अपमृत्यु में उस क्लोरोफार्म का अभाव ही नहीं होता वरन् चीरने का चाकू कुँद और डॉक्टर अनाड़ी भी होता है। मोटर की टक्कर लगी आधी खोपड़ी टूट कर अलग गिर पड़ी, अस्पताल पहुँचाये गये। एक घंटे के अंदर-अंदर मर गये। निमोनिया की बेहोशी के बाद की मृत्यु और इस मृत्यु के कष्ट में क्या कुछ अंतर नहीं होगा? इस एक घंटे में शरीर का अणु-अणु तड़फड़ाता रहेगा और उस बेहोशी में अंग प्रत्यंग मूर्छित पड़े रहेंगे। ऐसा आकस्मिक आघात लगते ही असह्य पीड़ा होती है और जीव एकदम छटपटा जाता है। इस दुर्घटना पीड़ित मनुष्य की जब मृत्यु घोषित कर दी जाती है वास्तव में वह तब भी मरता नहीं। एक कत्ल किये हुए पशु और एक स्वयमेव मरे हुए पशु का माँस लीजिए, परीक्षा कीजिये तो दोनों में बड़ा अन्तर मिलेगा। एक का प्राण बिल्कुल निकल गया है। इसलिए माँस खराब हो गया, इसके विपरीत कत्ल किये हुए पशु का माँस खाने योग्य बना हुआ है गोश्तखोर, पशु-पक्षियों को मार-मार कर खाते हैं पर यदि मरे हुए का माँस दिया जाय तो घृणा प्रकट करेंगे। कारण यही है कि कत्ल किए हुए प्राणी का जीव अधिकाँश में स्थूल शरीर से चिपका रहता हैं। इस प्रकार दुर्घटना क्षारित जीव बहुत समय तक अधमरा पड़ा रहता है। कई डाक्टरों की शोध है कि आघात से मारा गया शरीर प्रायः पाँच रोज से लेकर ग्यारहवें दिन तक पूरी तरह से मर पाता है।
दुर्घटना पीड़ित की जब वे स्थूल क्रियायें बन्द हो गईं जिन्हें मोटे तौर से देखा जा सकता है तो उसे मृत करार दे दिया जाता है। मृत्यु की मोटी परिभाषा उन अवयवों की क्रिया बन्द हो जाना है जिनके बिना क्रिया शीलता नष्ट हो जाती है। जैसे हृदय की धड़कन बन्द हो जाना। इस मृत घोषित किये हुए व्यक्ति का कुछ प्राण तो शरीर में जकड़ा रहता है और कुछ बाहर मंडराता रहता है। बाहर वाला प्राण मृत्यु का कारण तलाश करता है। जिससे मृत्यु हुई थी उस चीज का बारीकी से परीक्षण करता है, अपने पूर्व इरादों और आरंभ किए हुए कार्यों को अधूरा देखता है। अपने को संबंधियों से अलग देखता है, अचानक मृत्यु का आभास पाता है और आधे प्राणों को अर्ध मृत शरीर में वेदना में डूबा अनुभव करता हैं तो अचानक आघात की भयभीत अवस्था में सब प्रकार का संयुक्त पीड़ाओं के भार से दवा हुआ और अत्यन्त उग्र रूप से छटपटाता है। इस समय की पीड़ा और उद्विग्नता बड़ी करुणाजनक होती है।
जब उसका खंडित शरीर नष्ट कर दिया जाता है तब एक ओर से फुरसत पाकर इस बात की पूरी जाँच करता है कि मेरी मृत्यु किस प्रकार हुई। यदि किसी जीवित प्राणी द्वारा वध किया गया है तब तो उसके क्रोध का पारावार नहीं रहता और सर्प की तरह फुसकारता हुआ उसकी ओर दौड़ता है। चूँकि उसकी भौतिक सामर्थ्य उस समय इतनी नहीं होती कि विरोधी से तुरन्त ही इच्छित बदला ले सके इसलिए अपनी अशक्तता का अनुभव करते हुए भी अपने इरादे को नहीं छोड़ता।
चूँकि एक निश्चित नियम के अनुसार उसे इस लोक को छोड़ कर दूसरे लोक में जाना पड़ता है। वह अनिच्छापूर्वक एक प्रकार की रस्सियों से बंधकर खिंचता घिसटता हुआ जाता तो है पर मनोभावनाएं तीव्र रूप से दूसरी ही ओर लगी रहती है। मृत्यु के उपरान्त विश्राम और क्रमिक विकास के लिए जो अर्ध चेतनावस्था मिलती है उसे छोड़ कर वह बारबार जागता है और आरम्भ के दिनों में अपने पूर्व कष्ट की अनुभूति ले लेकर पूर्ववत् छटपटाता है। उस अर्धनिद्रित लोक के लोगों को यह कुहराम बड़ा खेलता हैं। उसके निवासी अपने इस दुःखी नवागत भाई की सहायता के लिए आस-पास जमा होते हैं और अपनी मौन भाषा में संतोष धारण करने एवं शान्ति से रहने का उपदेश देते हैं। उनमें जो अधिक भले ओर उदार हैं वे अन्य प्रकार की सहायता भी देकर उसका दुःख घटाते हैं। उदारचेता पूर्व मित्र भी इस समय मद्द देते हैं। समय पाकर कुछ जीव तो शान्ति और संतोष धारण कर लेते हैं और अदृश्य नियमानुसार अपनी विश्राम निद्रा में जा पड़ते हैं।
परन्तु ऐसे उग्र स्वभाव वाले जिनके मन में प्रतिशोध की भयंकर ज्वाला जलती है आगे को नहीं बढ़ते वरन् पीछे को ही लौटते हैं। वध स्थल पर अपने निवास स्थान या घातक की भूमि के आस-पास मंडरा कर अपने रहने के लिए वे कोई स्थान चुनते हैं और वहीं बैठे रहते हैं। जैसे-जैसे यह अपने पूर्व स्वरूप, स्थूल शरीर की धारणा दृढ़ करते जाते हैं वैसे ही वैसे उनका सूक्ष्म शरीर दृढ़ होता जाता है। वे अपने शत्रुओं से बदला लेने और उन्हें ह्रास पहुँचाने का ही चिन्तन करते रहते हैं। अशक्ति हानि की दशा में अपने विरोधियों को मानसिक कष्ट पहुँचाते हैं। क्योंकि सूक्ष्म शरीर की गति सूक्ष्म शरीर तक ही है। अक्सर देखा गया है कि हत्यारों के मन सदा उद्विग्न बने रहे हैं उन्हें दुःस्वप्न आते हैं और सोते सोते चौंक पड़ते हैं। क्रोध और आशंका हर क्षण चित्त पर चढ़ी रहती है। इस बेचैनी में मृतात्माओं का बहुत कुछ हाथ होता है। जो मृतात्मा अधिक बलवान और प्रबुद्ध है वह अपनी शक्ति का बढ़ाने का अभ्यास भी करती रहती हैं। ऐसे प्रेत अपने प्रयत्न और स्वभाव के कारण पिशाच या वेताल हो जाते है। अपनी सशक्त और क्राधोन्मत्त दशा में यह बड़े- बड़े अनर्थ करते हैं यहाँ तक कि किसी का प्राण भी ले लेते हैं। प्रसन्न होकर किसी को लाभ पहुँचा देने की भी इनमें सामर्थ्य होती है।
-क्रमशः
पुस्तकालयों के लिए सहायता
श्री. रामगोपाल, वनवारीलाल, संभल जिला मुराद निवासी ने हमारे पास 5) इसलिए भेजे हैं कि जो पुस्तकालय पूरा मूल्य देकर अखण्ड ज्योति के ग्राहक बनने में असमर्थ हैं वे 1॥) की बजाय 1) में ही एक वर्ष तक पत्रिका प्राप्त कर सकें।
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-सम्पादक।
जो एक दूसरे को प्रेम करते हैं या प्रेम का व्यवहार करते हैं उनके अन्दर निःसंदेह प्रेम है। भक्त लोग कहते हैं कि ईश्वर प्रेममय है इसलिए जिसने दूसरों के साथ प्रेम करना सीख लिया उसने उस महान आत्मा (परमात्मा) को प्राप्त कर लिया।
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यदि तुम्हें किसी कार्य में कर्त्तव्य का ज्ञान नहीं है और तुम्हारी बुद्धि में भ्रम पैदा हो गया हैं तो प्राचीन महापुरुषों के पद चिन्हों पर चलो यही मार्ग ईश्वरीय मार्ग है। यह तुम्हें ईश्वर से मिला देगा।
(ले. मास्टर उमादत्त सारस्वत, कविरत्न, विसवाँ)
गिना न महि-आकाश जिन्होंने, तृणावत सागर जाना।
अखिल विश्व पाताल सभी को, हस्त आमलक माना।
जल थल नभ में कहीं किसी से कभी न थे जो हारे।
वह आज मरघट में कैसे सोते पाँव पसारे॥
वसुधा भर का वैभव जिसने दोनों हाथ समेटा।
सिवा दुग्ध सी मृदु-शैया पर, कभी न था जो लेटा॥
जिसका सुन्दर भवन देख कर सुरपुर था ललचाता।
आज वही देखो तो मरघट में है सोने जाता॥
बल विक्रम के आगे जिनके ठहर न सकती संस्कृति।
जिनकी सिंह गरज सुनते ही आई मुर्दों में जागृति॥
भृकुटि देख कर टेढ़ी जिनकी दिकपति थे गर्वा।
वही आज चढ़ कर कन्धों पर हैं मरघट का जाते॥
अमित रूप राशि लिये जो रूपवान थे नामी।
मरते जिन पर गर्व युक्त थे देश-देश के स्वामी॥
जिनके चारों तरफ लगे रहते थे हरदम मेले।
आज वही मरघट में कैसे सोते हाय! अकेले॥
(ले.-पं. शिवराज शर्मा, चाँपानेरी)
प्राणायाम की महत्ता शारीरिक और मानसिक दोनों दृष्टियों से अद्भुत है। अखण्ड ज्योति के पिछले दो अंकों में एक ख्यातिनामा डॉक्टर ने प्राणायाम द्वारा होने वाले लाभों को बताया है जिन लोगों ने क्रियात्मक रूप से प्राणायाम का अभ्यास किया है उन्होंने जाना है कि यह महाविज्ञान शरीर और मन को कितनी अलौकिक शक्ति प्रदान करता है। मोटे तौर से देखने में इतना ही मालूम पड़ता है कि साँस जल्दी-जल्दी और गहरी लेने तथा श्वास लेने की क्रिया में रोक थाम करने से जो कुछ होगा वह फेफड़ों तक सीमित रहेगा, हृदय पर कुछ असर पड़ेगा या रक्त संचार में कुछ परिवर्तन हो जायगा। यह कार्य साधारण व्यायाम या साँस की गति को बढ़ाकर किया जा सकता है। फिर प्राणायाम पर ही इतना जोर क्यों दिया जाता है?
अभी भारत के वह सुदिन नहीं आये हैं जब कि यहाँ के विज्ञानवादी अपने प्राचीन अमृतमय तत्वों की शोध में लग जावें और उस शोध के उपयुक्त यंत्रों को उपलब्ध कर सकें या निर्माण कर सकें। जब वह सुदिन आवेगा तब निश्चय ही प्राणायाम के संबंध में ऐसे आश्चर्यजनक लाभों की सिद्धि प्रमाणित की जा सकेगी जिससे वैज्ञानिक जगत में खलबली मच जाय। प्राणायाम द्वारा प्रत्यक्ष रूप से जो लाभ होते हैं उनका वैज्ञानिक दृष्टि से हम कोई निराकरण नहीं कर सकते परन्तु इतना कह सकते हैं कि इसके लाभ अपार हैं, जो चाहे आजमा कर देख ले। परीक्षा ही इसकी कसौटी हो सकती है।
अनुभवी महात्माओं का कहना है कि श्वास यंत्र फुफ्फुस तक की वायु सीमित नहीं है वह सम्पूर्ण शरीर में जाती है और लौटती है। रक्त के समान ही शरीर के प्रत्येक स्थान पर वायु का भी दौरा होता है। यदि ऐसा न होता तो शरीर लोहे के समान ठोस हो जाता और वायु संबंधी कोई रोग होता तो केवल फेफड़े में ही होता गुदा द्वारा जो अपान वायु निकलती है वह कहाँ से आती है? इसलिए प्राणायाम का लाभ केवल फेफड़ों तक ही सीमित न रह कर सारे शरीर से संबंधित है। प्राणायाम की विशिष्ट वैज्ञानिक क्रिया द्वारा संपूर्ण शरीर में वायु ऐसी तीक्ष्णतापूर्वक आती जाती है कि उसके मार्ग में पड़े हुए मल और रोग जन्तु काँप जाते हैं और वे जहाँ चिपके हुए हैं वहाँ से छूट कर रक्त प्रवाह के साथ बाहर निकल जाते हैं। इस प्रकार प्राणायाम की क्रिया संपूर्ण शरीर के मलों को बाहर निकाल कर सुन्दर स्वास्थ्य प्रदान करने में समर्थ होती है।
कई अंग जो वायु और रक्त का दौरा ठीक न होने के कारण रुग्ण और अशक्त हो जाते हैं प्राणायाम के अभ्यास से दूर होते देखे गये हैं। गठिया, अर्बुद, तिल्ली बढ़ना, शोध, दर्द, शरीर का टूटना या भड़कना यह रोग प्राणायाम द्वारा ठीक होने योग्य हैं। मस्तिष्क के अनेक रोग इससे दूर होते हैं। जिन्हें जुकाम बना रहता है और दवाएं करते थक गये हैं, आधाशीशी, मस्तक शूल, सिर का भारीपन, रहने की जिन्हें शिकायत है वे प्राणायाम की परीक्षा करके देखें, एक बार का परीक्षण उन्हें पर्याप्त विश्वास प्रदान कर सकेगा।
मस्तिष्क की शक्तियाँ प्राणायाम से बढ़ती है, याददाश्त की कमी, चिड़चिड़ापन, किसी बात को ठीक तरह से न सोच सकना, बुरी भावनाएं आती रहना, थोड़ी देर में ही मस्तिष्क का थक जाना, इस प्रकार की बीमारियों में प्राणायाम से आशातीत लाभ होता है। ऐसा अनुभव में आया है कि दिमाग की गर्मी और कमजोरी में यह विशिष्ट श्वास क्रिया कुछ ऐसा रासायनिक समन्वय करती है जिससे अतिरिक्त गर्मी निकल जाती है और शीतलता प्राप्त होती है। प्राणायाम के बाद प्रायः मस्तिष्क शान्त और शीतल हो जाता है।
अखंड ज्योति संपादक श्री0 शर्मा जी ने मुझे बताया था कि एक ऐसा व्यक्ति जिसकी स्मरणशक्ति बिल्कुल नष्ट हो गई थी और जिसे यह भी याद नहीं रहता था कि अभी घंटे भर पूर्व मैंने क्या किया था, प्राणायाम का अभ्यास कराने पर तीन महीने में ही अच्छा हो गया और उसकी स्मरणशक्ति बिल्कुल अच्छी हो गई। श्री0 शर्मा जी ने और भी अनेक विवरण मुझे बताये थे जिनके अनुसार उन्होंने विभिन्न प्रकार के प्राणायामों का अभ्यास कराके कठिन मानसिक रोगों से ग्रसित व्यक्तियों को अच्छा किया था।
आत्मचिन्तन करने वाले और आध्यात्म पथ पर अग्रसर होने वालों के लिए तो प्राणायाम मानो राजमार्ग ही है। चित्त का निग्रह मन की निरोधता प्राणायाम बिना होना कठिन है। षट् चक्रों का बेधन और कुण्डलिनी जागरण का आरंभ प्राणायाम सिद्ध के बाद होता है। धारणा और ध्यान की अवस्थिति का ठीक प्रकार से होना भी इसी साधन की सहायता पर अवलंबित होता है।
योग शास्त्र के आचार्यों ने योग साधना के आठ अंगों से प्राणायाम को चौथा स्थान देकर इसकी उपयोगिता का सम्मान किया है। आज के बाबू लोग इस महाक्रिया को ‘फेफड़ों की छोटी सी कसरत’ कह कर उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं उनके लिए अभी वैज्ञानिक यंत्रों द्वारा प्रमाणित उत्तर हमारे पास नहीं हैं परन्तु फिर भी पारस, पारस ही रहेगा जिसका जी आवे अपने लोहे को उससे छूकर देख लेने प्रत्यक्ष के लिए और प्रमाण क्या चाहिए।
मन अन्नमय है। जैसा हम भोजन खायेंगे वैसा ही अपने मन को बना लेंगे। इसीलिये भोजन के विषय में बहुत सावधान रहना चाहिए।
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आँखों से न देखने के कारण यह न कहो कि ईश्वर नहीं है। वह हर समय तुम्हारे पास है ईश्वर के वही काम है जो तुम्हें वैभव की ओर लेजा कर आनंदित कर देते हैं और तुम्हारी प्रत्येक ग्रंथि सुलझ जाती है। तुम उस ईश्वर को अपने साथ अनुभव करने लगेंगे तो फिर किसी पाप में नहीं लग सकते और उसी के सहारे काम करते-करते अपनी अमरता को प्राप्त कर लोगे।
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स्वप्नों को कोरा दिमागी काम न समझो ये तुम्हारे अच्छे या बुरे विचारों के सूचक हैं इनमें तुम्हारा भविष्य भरा हुआ है।
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इन मौनावस्था में बीते हुए विचारों का मनन किया करते हैं और अच्छे बुरे की पहचान भी होती रहती हैं क्योंकि जब बाहर से विचारों का आगमन बन्द हो जाता है।
(ले0-श्री जगन्नाथ प्रसाद शर्मा, नरायना)
राज योग और हठ योग से संबंधित सैंकड़ों प्रकार के आसन आजकल प्रचलित हैं। इनका अभ्यास करने और सिद्धि प्राप्त करने में काफी समय भी लग जाता है तब इनका लाभ प्रतीत होता है। कोई आसन किसी प्रकार की प्रकृति के व्यक्ति के लिए अनुपयुक्त भी हो सकता है और यदि ऐसे ही अनुपयुक्त आसन का चुनाव किसी ने अपने लिए कर लिया है तो वह हानिकारक ही होगा। शीर्षासन करके मस्तिष्क सम्बन्धी रोग मोल ले लेने वाले कई व्यक्ति देखे गये हैं। मेरा तात्पर्य यहाँ किसी आसन के मूल सिद्धान्त का विरोध करना नहीं है। वे सभी अपने अद्भुत गुण रखते हैं परन्तु उनका लाभ उसी दशा में होता है, जब अपनी प्रकृति और आसन के गुण दोष का विचार करते हुए आसन का चुनाव किया जाय।
मैं यहाँ एक अनुभूत और प्रत्येक फलदायक आसन का उल्लेख करता हूँ पाठक इसका उपयोग करके लाभ उठा सकते है।
शिथिलासन का अर्थ है जिसमें आदमी शिथिल हो जाय वह आसन। मन और शरीर को पूरी तरह से शिथिल कर देने पर शरीर को अपूर्व शान्ति मिलती है। जितना विश्राम कई घंटे की नींद में नहीं मिलता उतना कुछ मिनट के शिथिलासन में मिल जाता है। राबर्ट क्लाइव और नेपोलियन बोनापार्ट के संबंध में यह प्रसिद्ध है कि वे युद्ध क्षेत्र में बिना सोये हफ्तों बिता देते थे। आश्चर्य होता है कि इस प्रकार के व्यक्ति किस प्रकार अपने जीवन क्रम चला सकने में समर्थ होते हैं और स्वस्थ बने रहते हैं? उपरोक्त दानों उदाहरणों के प्रत्यक्षदर्शी साथियों ने अपनी पुस्तकों में इस विषय पर कुछ प्रकाश डाला है। नेपोलियन के एक मित्र का कहना है कि युद्ध के कार्य में दिन-रात व्यस्त रहते हुए भी नेपोलियन घोड़े की पीठ पर हो कुछ मिनट सो लेता था। एक अंग्रेज इतिहासकार का कहना है कि राबर्ट क्लाइव मार्च करते हुए घुड़सवारों की बन्दूकों का सहारा लेकर चलते चलते अपनी नींद पूरी कर लेता था। अकबर के बारे में कहा जाता है कि वह केवल तीन घंटे सोता था। कई योगी महात्मा बहुत दिनों तक बिना सोये अपना काम चलाते देखे जाते हैं। इन सब निद्राजितों को किसी न किसी प्रकार शिथिलासन का ही सहारा लेना पड़ता है।
आप एक आराम कुर्सी पर हाथ पैर पसार कर लेट जाइये। शरीर के सब अंग स्वेच्छापूर्वक इस प्रकार रखे गये होंगे कि किसी पर कुछ दबाव न पड़ रहा हो और उसी तरह अधिक देर रखे रहने पर कोई कष्ट न हो। इस कार्य के लिए मन्द प्रकाश का स्थान ठीक रहता है तेज प्रकाश, चित्त पर कुछ ऐसा प्रभाव डालता है कि मन को ठीक प्रकार स्थिर नहीं होने देता। कमरे के दरवाजे बन्द कर के मन्द प्रकाश किया जा सकता है। रात हो तो बत्ती को धुँधली कर देना चाहिए अब ऐसी भावना करनी चाहिए कि “मैं अपने शरीर और मन को बिल्कुल शिथिल कर रहा हूँ। संपूर्ण अंग निश्चेष्ट हुए जा रहे हैं। शरीर निर्जीव हो गया है। मन की सारी चिन्ता और शंकायें शान्त हो गई हैं। मैं एक अनन्त नील सागर के ऊपर बड़े आनन्दपूर्वक तैर रहा हूँ और चारों ओर व्याप्त शान्तिदायी नीली किरण को अपने में स्वयमेव प्रवेश करता हुई देख कर पूर्ण विश्राम और संतोष उपलब्ध कर रहा हूँ” इस भावना को दृढ़तापूर्वक करना चाहिए और साथ ही यह भी अनुभव करते जाना चाहिए कि भावना के अनुरूप शरीर और मन बिल्कुल शिथिल हो गये हैं।
यह अभ्यास नित्य आधे घंटे जारी रखा जा सकता है। एक दो सप्ताह के प्रयत्न से ही शिथिलासन सिद्ध हो जाता है। आरंभ के दिनों में शरीर पूरी तरह ढीला नहीं होता सूक्ष्म रूप से परीक्षण करने पर कुछ कुछ कड़ापन रहता है। किन्तु कुछ दिनों के बाद शिथिलता में सफलता मिल जाती है। उस समय शरीर इतना ढीला हो जाता है कि जो अंग किसी के सहारे नहीं रखे गए वे इधर उधर को लुढ़क पाते हैं। हाथ और सिर उसी प्रकार नीचे गिरने लगते हैं जैसे सोते हुए आदमी के। यह दशा जाग्रत निद्रा है, योगियों की भाषा में इसे अमृत तंद्रा या शिथिलासन कहा जाता है। काम काजी लोगों के लिए आध घण्टा ही काफी है। इससे अधिक काल का जिन्हें अभ्यास होने लगे समझना चाहिए कि अब इसकी गति समाधि की ओर हो गई है। कई गुरु समाधि का आरंभ शिथिलासन से ही कराते हैं।
गहन योग विषय की बात छोड़िये। साधारण काम-काजी लोगों के लिए यह आसन कई दृष्टियों से लाभदायक है। आधे घंटे की साधना में इतनी थकान उतर जाती है जितनी चार घण्टे की गहरी नींद में उतरती है। इससे नवीन चेतना और स्फूर्ति मिलती है एवं शरीर सतेज होकर फिर से कठिन कार्यों को करने योग्य हो जाता है।
जब आपका शरीर काम से थक गया हो, देह टूट रही हो मन हार गया हो, दिमाग ठीक काम न करता हो तो थोड़ी देर शिथिलासन में पड़ जाइये आप देखेंगे कि सारा श्रम चला गया हैं और नवीन चेतना प्राप्त हो गई है। इसका नित्य का अभ्यास, एक पौष्टिक भोजन की तरह बलदायक सिद्ध होता है। जिन्हें आराम कुर्सी न मिल सके वे मसनद के सहारे या अन्य किसी आराम देने वाले उपकरण के सहारे अभ्यास कर सकते हैं। पर यह उपकरण कोमल और सुखकर होना चाहिए।
मन के पास जितने विचार रह जाते है उन्हीं की उधेड़बुन शुरू हो जाती है-और हम मौन द्वारा बहुत कुछ ज्ञान तथा भला बुरा पहचान लेते हैं। इसलिये मौन रखना एक अच्छा गुण है।
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विष को खाकर कोई नहीं परखता उसे तो दूसरों के कथनानुसार ही मान लेते हैं कि इसमें भारक गुण विद्यमान है। इसी तरह अमृतमय पवनों को मानने में आना कानी न करो। क्योंकि इनको हजारों पुरुषों ने अपनाया है और आत्मोन्नति की है।
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आत्मिक सुन्दरता ही सच्ची सुन्दरता है यदि यह सुन्दरता नहीं है तो बाहरी सुन्दरता किस काम की। जो काम यह सुन्दरता कर सकती है वह शारीरिक सुन्दरता नहीं कर सकती। असली सुन्दरता तो आत्मिक सुन्दरता ही है जिसे प्राप्त करना प्रत्येक का ध्येय होना चाहिये।
(ले0-आचार्य आशुतोष मुखोपाध्यय, सिंहभूमि)
तंत्र विद्या और वाममार्ग आज मोटेतौर से समाज में बदनाम हो गये हैं। लोग समझते हैं कि वाम मार्ग मद्य, माँस और मैथुन प्रधान आसुर साधन है। तंत्र विद्या के बारे में मोटी कल्पना है कि इस के जानकार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण द्वारा अपना स्वार्थ साधन और दूसरों का नुकसान करते है। पर यह धारणा सर्वथा अज्ञानमूलक है। भगवान शंकर कहते है-”वैदिक स्तान्त्रिको मिश्र इति में त्रिविधो मखः।” अर्थात् वैदिक, तान्त्रिक और दोनों से मिला हुआ तीन प्रकार का मेरा यज्ञ है। वैदिक साहित्य का सूक्ष्म अध्ययन करने पर यही विदित होता है कि वैदिक और तान्त्रिक सिद्धान्तों में कोई मतभेद नहीं वरन् दोनों ही एक दूसरे से मिले हुए हैं। वेदोक्त योग शास्त्र और तन्त्र योग में बाह्य उपकरणों का ही भेद है, सैद्धान्तिक भेद नहीं। इसलिए तन्त्र विद्या को भयंकर समझना निरर्थक है।
कामी, लम्पट और स्वार्थी तन्त्र विद्या के अधिकारी नहीं है। उन्हें इसमें प्रवेश करने की आज्ञा नहीं हैं। जब ऐसे लोगों को वह विद्या प्राप्त ही न हो सकेगी तो उसका दुरुपयोग ही भयंकर है। सदुपयोग से तो लोक परलोक का लाभ ही हो सकता है। सुई कपड़े सीने के लिए है यदि कोई अनधिकारी उससे आँखें फोड़ने का काम लेने लगे तो इसमें सुई को दोष देना ठीक न होगा। बन्दूक डाकुओं के हाथ में पड़कर घातक बनती है सिपाही तो उसके द्वारा रक्षा ही करेगा। शास्त्रों ने तन्त्र विद्या को सीखने और सिखाने का अधिकारी केवल सदाचारी और लोक सेवी पुरुषों को ही बताया है।
तन्त्र शास्त्र के दो मार्ग हैं एक वाम मार्ग दूसरा दक्षिण मार्ग। आजकल आम तौर से वाम मार्ग को ही तंत्र माना जाता है। इस वाम मार्ग के अधिकार के बारे में स्पष्ट कर दिया गया हैं कि।
परद्रव्पेषु योऽधश्च-परस्त्रीषु नपुँसकः ।
तस्यैव ब्राह्मणास्यात्र वामे स्यादधि कारिता॥
-मेरु तंत्र
अर्थात्-पराया धन, पराई स्त्री और पराये अपवाद से दूर रहने वाला जितेन्द्रिय ब्राह्मण ही वाम मार्ग का अधिकारी होता है।
अयं सर्वोतमो धर्मः शिवोक्तः सर्व सिद्धिदः।
जितेन्द्रिय स्य सुलभो नान्यस्यानन्त जन्मलिः॥
-पुरश्चर्यार्णाव
अर्थात्- इस शिवजी के कहे हुए सर्वोत्तम और सब सिद्धियाँ देने वाले धर्म (वाम मार्ग) तो इन्द्रिय जीतने वाले योगी के लिए ही सुलभ हैं। अनेक जन्मों में भी लोलुप लोगों के लिए यह सुलभ नहीं होता।
तन्त्राणामतिगूढत्वाचद्भावोऽत्रति गोपितः।
ब्राह्मणो वेद शास्त्रार्थतत्ज्ञो बुद्धिमान् वशौ॥
गूढ़ सन्त्रार्थ भावस्य निर्मथ्योद्धरणे क्षमः।
वाम मार्गेऽधिकारीस्यादितरो दुःख भाग् भवेत्॥
-भावचूडामणि
अर्थात्-तन्त्रों के अतिगूढ़ होने के कारण उनका भाव भी अत्यन्त गुप्त है। इसलिए वेद शास्त्रों के अर्थ तत्व को जानने वाला जो बुद्धिमान और जितेन्द्रिय पुरुष गूढ़ तन्त्रार्थ के भाव का मंथन करके उद्धार करने में समर्थ हो वही वाम मार्ग का अधिकारी हो सकता है। उसके सिवा दूसरा दुःख का ही भागी होता है।
कुछ लोग वाम मार्ग का गलत अर्थ करते हैं। आम अर्थात् टेढ़ा उल्टा। वाम मार्ग अर्थात् टेढ़ा उल्टा मार्ग। यह ठीक नहीं। निरुक्त में वाम का अर्थ-सूचक शब्द प्रशस्य है। प्रशस्य का भावार्थ प्रज्ञावान् होता है। दुर्गाचार्य कहते हैं “य एव हि प्रसावास्य एव हि प्रशस्या भवन्ति।” इससे विदित है कि प्रज्ञावान योगी हुआ ‘वाम’ और उस योगी का जो मार्ग वह ‘वाम मार्ग।’
भगवान् शंकर ने स्पष्ट कर दिया है कि “वामो मार्गः परम गहनोः योगिनामप्यगम्यः।” अर्थात् वाम मार्ग अति कठिन है और योगियों के लिए भी अगम्य है। फिर क्या ऐसी गुह्य विद्या का दुराचारी और लम्पट प्राप्त कर सकते हैं? यदि कोई अनधिकारी इसे प्राप्त करके पाप कर्म करता है तो उसके लिए भगवान् शिव का शाप है कि “लोलुपो नरकं ब्रजेत्” अर्थात् लोलुप वाममार्गी नरक में गिरता है।।
(ले.-श्री. तुलसीराम शर्मा, हाथरस)
येपापानि शकुर्वन्ति मनोवाक् कर्म बुद्धिनिः।
तेतपन्ति महात्मानोन शरीरस्य शोषणम्॥ 99॥
(म॰ भा0 वन॰ अ॰ 207)
मन, वाणी और शरीर से जो पाप कर्म नहीं करते हैं वे महात्मा मानों तपस्या करते हैं शरीर का सुखाना तप नहीं मन वाणी शरीर के पाप कर्म मनुस्मृति में इस प्रकार लिखे हैं-
परद्रव्ये ध्वभिधानं मनसा बिष्ट चिन्तनम् ।
वितयामि विदेशच त्रिविधं कर्म मानसम॥ 5॥
दूसरे के द्रव्य को अन्याय से लेने की इच्छा करना, मन से किसी का अनिष्ट (वध आदि) चिन्तन करना, लोक परलोक कुछ नहीं सब डकोसिला है, ऐसा मन में निश्चय करना, ये तीन प्रकार के मानसिक पाप हैं॥ 5॥
पारुण्य मनृतं चैव पैशुन्य चापि सर्वशः।
अम्सबन्ध प्रलापश्चवाड् मयं स्याच्चतुंिवविधि॥ 6॥
रूखे वचन, मिथ्या भाषण, चुगलखोरी, और निध्प्रयो-जन की बातें, ये वाणी के पाप हैं।
अदत्ताना मुपादामं हिंसा चैवाविधानतः।
पर दारोपसेवा च शाररंत्रिविधं स्मृतम्॥ 7॥
(मनु0 अ॰ 12)
अन्याय से दूसरे का दृव्य लेना, अविधि की हिंसा, स्त्री गमन ये तीन प्रकार के शरीर के पाप हैं॥ 7॥
साराँश यह है कि मन वाणी शरीर के 10 प्रकार के पाप कर्म से जो बचा है वह तपस्वी है।
दक्षिर्ण भारते इयमेकैव विविधविषयोपवृहित्त संस्कृत भाषा मयी पाक्षिकी पत्रिका भारती सुप्रसिद्धपत्रिकाकारेरतिशयेन प्रशंसिता च। स ध्वपि दंशेषु सुप्रचारो स्वीयवस्तुप्रसिद्धये प्रासति पत्रप्रकाशनन व्यवहारणामतीव उपकारिणी। सः लया सरण्सया च सरण्या गीर्वाणवाणीप्रणायितः अंतरंगाणि संप्रीणयंती विभ्राजते। त्वरंताँ ग्राहक प्रसिद्धिपत्रप्रकटनाभिलाषिणाश्च। मूल्यं प्रेषणक वहितं सपादे रुप्यकद्वयम्।
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योग महाविद्या की शक्ति अनंत और अपार है। वह मनुष्य को ईश्वर तुल्य बना सकती है। प्राचीन काल में असंख्य योगियों को अनेक सिद्धियाँ प्राप्त थीं, हमारे ऋषि मुनि त्रिकालदर्शी थे और वे अपनी दिव्य दृष्टि से संसार भर की बातें अपने स्थान पर बैठे बैठे ही जान लेते थे। मोक्ष प्राप्त करना क्या है ? आत्म शक्ति की उन्नति करते करते उसे ईश्वर तुल्य बना देना है। उसी योग महाविद्या का एक छोटा सा भौतिक अंग तन्त्र शास्त्र है। इस तन्त्र विज्ञान की साधना अष्टाँग योग जितनी कठिन नहीं है किन्तु उससे लाभ भी सीमित ही होता है। मनोनिग्रह के बाद यह दूसरी मंजिल है। इससे आत्मशक्ति बढ़ाई जाती है और उसके द्वारा दूसरों को हानि लाभ पहुँचाया जा सकता है।
प्राचीन काल में गोरखनाथ, मछीन्द्रनाथ, नागार्जुन आदि उनके आचार्य इस विज्ञान के हो चुके हैं। महाप्रभु ईशा ने आत्मशक्ति के बल से असंख्य रोगियों को स्पर्श करके और दृष्टिपात करके अच्छा कर दिया था। महातान्त्रिक-उट्ठोश-भगवान शंकर के कोप से जब आत्मशक्ति का तीसरा नेत्र खोला तो कामदेव सरीखा बलशाली योद्धा क्षण भर में जलकर भस्म हो गया। अन्य ऋषियों के शाप वरदान से हजारों लोगों का हित अनहित होना पुराण इतिहासों से सिद्ध है। आज उस लुप्त प्रायः महाविद्या का पूर्ण अंश प्राप्त नहीं होता। पर जितना कुछ भी प्राप्त होता है, वही इन सब के लिये बड़ी मूल्यवान् वस्तु है और उसी से बहुत कुछ लाभ उठाया जा सकता है।
‘आनन्द प्रतिष्ठान’ तन्त्र विद्या की उपासना का एक केन्द्र है। इसके साधक तन्त्र विज्ञान की दुरूह क्रियाएं करके जो शक्ति प्राप्त करते हैं, उसे जन हित में बाँट देते हैं। अब यह निश्चित हो चुका है कि योरोप के डॉक्टर मैस्मरेजम हिप्नोटिज्म, मैगनेटिज्म, मनोविज्ञान आदि के द्वारा लोगों पर जितना असर डालते हैं तन्त्र विज्ञान द्वारा उन सब से कई गुना असर लोगों पर डाला जा सकता है क्योंकि मैस्मरेजम आदि के जो सिद्धाँत हैं वह सब तो तन्त्र विद्या के भीतर हैं ही, वरन् उसमें भी बहुत अधिक बातें उसमें हैं।
मैस्मरेजम आदि की शक्ति स्थूल होने के कारण केवल इतनी ही होती है कि सामने बैठे हुए आदमी पर तात्कालिक असर डाला जा सके। तंत्र-विद्या इससे कहीं सूक्ष्म है। इसकी गूढ़ क्रियाओं द्वारा उत्पन्न किये सूक्ष्म कम्पन इतने शक्तिशाली होते हैं कि हजारों मील बैठे हुए आदमी पर भी उतना ही असर डालते हैं जितना पास बैठे हुए पर। उन मंत्रों का प्रभाव क्षण भर खेल दिखाकर ही समाप्त नहीं हो जाता वरन् जिसके ऊपर उपचार किया जाता है उसके गुप्त मन में इतना गहरा उतर जाता है कि साधक में शारीरिक तथा मानसिक विचित्र परिवर्तन हो जाते हैं।
‘आनन्द प्रतिष्ठान’ ने अपना एक ऐसा कार्यक्रम बना रखा है कि कठिन साधना द्वारा प्राप्त शक्ति को पीड़ितों की सेवा में लगाया जाय और इसके बदले किसी गरीब अमीर से पाई पैसा का कोई ठहराव न किया जाय। अर्थात् लोगों के कष्टों को दूर करने का उपचार बिल्कुल मुफ्त किया जाय। लाभ होने पर बिना माँगें कोई कुछ दे दे तो संतोषपूर्वक उसी से साधक जीवन निर्वाह करें।
तन्त्र विद्या द्वारा कठिन से कठिन शारीरिक रोग, मानसिक रोग, बुरी आदतें, संतान सम्बन्धी चिन्ता, गृह कलह, बुरे दिन, अनिष्ट की आशंका, भूत बाधा, अशान्ति आदि का आसानी से उपचार हो सकता है। जिन लोगों को कोई ऐसा रोग है जिससे जिन्दगी को खतरा है उनका हम उपचार करते हैं (छोटे-छोटे खाँसी, जुकाम आदि रोगों के लिये हमें नहीं लिखना चाहिए) स्मरण शक्ति की कमी, सिर में भारीपन, उद्विग्नता, चिन्ता, उदासी, निराशा, निरुत्साह, भवहीनता की भावना, बुरे कामों की ओर प्रवृत्ति, क्रोध, बुरी आदतें, चिड़चिड़ापन, नींद की कमी आदि मानसिक रोगों के लिए तंत्रोपचार रामबाण हैं। कुटुम्ब, मित्र या पत्नी से झगड़ा रहता हैं, संतान नहीं होती, होकर मर जाती हैं या लड़कियाँ ही लड़कियाँ होती हैं, किसी शत्रु द्वारा अपना अनिष्ट होने के आशंका हैं, भूत प्रेतादि के उपद्रव होते हैं तो भी इस विद्या द्वारा आश्चर्यजनक लाभ उठाया जा सकता है। एक बात हम स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम मारण, मोइन, उद्घाटन, वशीकरण, स्तंभन आदि पाप पूर्ण क्रियाएं किसी के पंच विपक्ष में किसी दशा में नहीं करते इसके लिए कोई सज्जन लिखा पढ़ी न करें। वह भी ध्यान रखना चाहिए कि तेजी मन्दी का भाव, दड़ा, सट्टा, फ्यूचर, गढ़ा धन, चोरी का माल, भविष्य, हस्तरेखा, जन्म पत्र, आदि भी हम नहीं बताते इसलिए इन कामों के लिए भी कोई महानुभाव पूछने ताछने का कष्ट न उठावें।
एक और बात भी समझ रखनी चाहिये कि हमारा उद्देश्य शारीरिक, मानसिक तथा बाहरी कष्टों से अपने भाई बहिनों को बचाने का प्रयत्न करने मात्र का है और इसके लिए मनोविज्ञान के डाक्टरों के मत से विशुद्ध वैज्ञानिक आध्यात्मिक क्रियाओं का ही उपयोग करते हैं। किसी अंध विश्वास, ढोंग, भ्रमजाल के फैलाने का हमारा कोई मन्तव्य नहीं है। स्पष्ट है कि जब हम किसी से कोई ठहराव नहीं करते, फीस नहीं माँगते, रुपये नहीं ऐंठते तो क्यों किसी को धोखे में डालेंगे? और क्यों ढोंग फैलावेंगे?
जिन्हें इस विज्ञान पर विश्वास हो, या कम से कम जितने दिनों इस विज्ञान से लाभ उठावें उतने ही दिन तक परीक्षा के तौर पर जो विश्वास रख सकें वे निःसंकोच बन्द लिफाफे में अपना पूरा विवरण लिख भेजें, हम तुरंत ही उपचार सामग्री भेजेंगे। इसके बदले में किसी प्रकार की कीमत नहीं लेंगे। उपचार आरंभ करते समय हमें रोगी की चार चीजों की जरूरत पड़ती है। (1) रोग का कारण, वर्तमान स्थिति और रोगी का वर्तमान समय का पूरा परिचय (2) रोगी का फोटो (यह पाँच वर्ष से अधिक पुराना न हो) (3) रोगी के शिखा स्थान (चोटी) के 11 बाल (4) सफेद स्याही सेख (ब्लाटिंग पेपर) पर टपकाया हुआ रोगी के बाएं अंगूठे में से एक बूँद खून। यह चारों चीजें पास होने पर पूरी तरह उपचार आरंभ हो जाता है, फोटो तैयार न हो तो भी उपचार आरंभ हो जाता है, वह पीछे भेजा जा सकता है। यदि रोगी छोटा बालक हो या बहुत उपरोक्त हो तो खून से भी छुट्टी दी जा सकती है। पर सफलता में जरा देर लग जाती है।
उपचार सामग्री जो हम भेजते हैं उसमें शक्ति आकर्षण का एक ऐसा विधान है जिससे रोगी में कुछ समय के लिए अतिरिक्त शक्ति भर जाती है, उस समय उसका दम फूलने लगता है, और कंपकंपी सी आ जाती हैं, उस समय की हिफाजत के लिए कोई साथी होना जरूरी है उपचार के कुछ समय बाद ही रोगी को आश्चर्यजनक चमत्कारिक दृश्य स्वप्न और जाग्रत अवस्था में दिखने लगते हैं वह सब बातें गुप्त रखने की हैं। उसे पहले से ही निश्चय कर लेना चाहिए कि उन बातों को हर किसी से न कहूँगा। जिन लोगों को कोई कष्ट नहीं है वह आत्मोन्नति के लिए हमारी सेवा से लाभ उठा सकते हैं।
यह पहले ही कहा जा चुका है कि किसी भी रोग के उपचार के लिए न तो कुछ फीस माँगी जाती हैं और न ठहराई जाती है न पीछे कोई झगड़ा किया जाता है कुछ देने न देने में रोगी बिल्कुल स्वतन्त्र है। बहु मूल्य-प्रेम बाण दवाएं, रसायनें जड़ी बूटियाँ, साधनायंत्र, विधि, कवच, विधान आदि सब चीजें अपने पैसे से बिल्कुल मुफ्त भेजते हैं। हाँ, डाकखर्च का भी भार उठाने में हम अभी असमर्थ हैं। इसके लिए तो रोगी को ही व्यवस्था करनी पड़ेगी। पत्र के साथ एक आने का टिकट जरूर भेजना चाहिए अन्यथा उत्तर न दिया जा सकेगा।
विज्ञान सम्मत तन्त्र विद्या के अपूर्व लाभों को उठाने से आप वंचित न रहिये। हमसे अपनी कुछ सेवा लीजिए तो सही, शायद ईश्वर इसी बहाने आपका कुछ भला कर ने की सोच रहा हो।
पत्र व्यवहार का पता-
‘आनन्द प्रतिष्ठान’ फ्रीगंज, आगरा।
पथिक? अरे हाँ, सभी पथिक हैं, कौन यहाँ रहने आया है?
किसे प्रेम है इस ‘पड़ाव’ से? किसे यहाँ रहना भाया है?
कोई घड़ी, दो घड़ी, कोई कुछ क्षण का मेहमान हुआ,
सभी बनेंगे चलते, किसने, भला यहाँ ‘छप्पर’ छाया है? 1!!
कोई ठहर गया यदि कुछ क्षण, तो उसने जागीर न लूटी।
कोई चला गया वे ठहरे, तो उस की तकदीर न फूटी!
क्या पाया उसने जो ठहरा? क्या खोया, जो चला गया?
एक ‘छलावा’ यहाँ ठहराना, ऐसे सांत्वना है यह झूठी!! 2!!
यहाँ ठहर कर कुछ क्षण खोना, कोई ‘अनुपम त्याग’ नहीं है।
राह भूल कर इस पड़ाव से, पड़ रहना सौभाग्य नहीं है!!
एक भूल है यहाँ ठहरना, एक ‘प्रमाद’ बसेरा है,
यहाँ ठहर कर एक पथिक भी, तो, निकला बदाग नहीं है!! 3!!
इसे छोड़ना है यह निश्चय, किन्तु छोड़ना सरल नहीं है!
पुँछ जायेगा जो ‘दामन’ यह वह आंसू तरल नहीं है!!
यह वह रंग है, जिसका धुलना, कपड़े ही को ले बैठेगा,
जो पीयूष बना बैठा है, वही काल सा गरल यही है!! 4॥
जो आया इस थल में फिर वह, तिल भर आगे चल न सका है!
लौट लौट आया है, धक्के, खाकर भी वह टल न सका है!
यह वह पथ है, जिसके आगे चलते राह काँपते पग है,
यह वह महाव्याल है, जिसके , आगे दीपक बल न सका है। 5॥
यहाँ, यही है वह सराय, जिसमें ‘माया’ का डेरा है!
यही, वही चक्कर है, जिसका, आदि अन्त कुछ ज्ञात नहीं,
यह वह ‘पुकरा’ है कहता जग, जिसको “रैन-वसेरा” है!! 6॥
क्यों न चलें खुलने से पहले, रवि की आँखें, जब चलना है?
पड़े-पड़े करवट क्यों बदलें यहाँ न जब कुछ भी मिलना है!
कमर कसें, पथ अपना नापें, क्यों खोवें हम यहाँ कमाई?
चोर भरा जग, हम एकाकी, फिर न किसी का वश चलना है! 7॥
यह शीतल छाया, फल पत्तियाँ, यह सुन्दरता, सु-मधुर-स्वर।
अरे यही तो हैं वह जादू, जो न खिसकने देगा तिलभर॥
यह सोने का वह पिंजड़ा है, जिससे मुक्ति न जीवन भर भी,
यह ‘दूधभाव- ही की तो कैंची, काट रही है उड़ने के पर॥ 8॥
-जियाली प्रताप
*समाप्त*