(ले.—श्री धूमसिंह वर्मा ‘धूम’ समोली)
बंदे उनके पद की धूल।
जिनके मन मानस में से करुणा का झरना झरता।
जो कल-कल-कल सुमधुर ध्वनि से, दिगमंडल में अमृत भरता॥
ऊसर, प्यासे, भूखंडों में उपजाता सुन्दर हरियाली—
अगणित जल थल चर जीवों को, जीवन देता प्रमुदित करता॥
नन्दन बन सा शीतल कूल।
बंदे उनके पद की धूल॥
खुद औरों को देख दया से, भर आती है जिनकी छाती।
तृषित जनों को शीतल करती, जिनकी वाणी रस बरसाती।
टिम-2 जिनका जीवन दीपक, तिल-तिल निशदिन जलता रहता—
जनता जिनकी चिनगारी के नीचे अपना पथ लख पाती।
जिनका जीवन सुरभित फूल।
बंदे उनके पद की धूल॥
खुद तपते हैं किन्तु दूसरों का अन्तस्थल शीतल करते।
खुद दुख सहते रहते लेकिन औरों की पीड़ाएं हरते॥
भिक्षुक पर कुबेर से दानी, अपमानित सुरपति से मानी—
जिनकी ज्ञानमयी गंगा में, डुबकी लेकर जग-जग तरते॥
जिनको प्रिय है शूल बबूल।
बंदे उनके पद की धूल॥
पाठक अपने जीवन को सफल बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं। हर आदमी यह चाहता है कि मैं जीवन का फल प्राप्त कर सकूँ, बड़ा बन सकूँ, औरों से मुझमें विशेषताएं हों, जिन कामों को कर सकने में, दूसरे लोग समर्थ नहीं हुए हैं उन्हें मैं संपादित कर सकूँ, उच्च पद प्राप्त कर सकूँ। यह इच्छाएं हर आदमी को सताती हैं। इन्हें पूरा करने के लिए आदमी भरसक कोशिश भी करता है। उसने अपनी लड़की के विवाह में बड़ा दहेज दिया, उसने पुत्र के विवाह में रुपयों की बखेर की, उसने अपने पिता की मृत्यु पर बड़ा भारी भोज दिया, उसने चारों धामों की तीर्थ यात्रा की, उसने अमुक मंदिर की मूर्ति पर सोने का छत्र चढ़वाया, उसने अपने खर्च से कई दिन लोगों के लिए तमाशा करवाया, उसने चांद्रायण व्रत किया, इस प्रकार के काम हम रोज सुनते और देखते हैं। करने वाला इनमें काफी त्याग करता है, कष्ट उठाता है, उदारता प्रकट करता है और अपनी सुख सामग्री में कमी कर लेता है। यहाँ इस बात पर बहस नहीं है कि इन कार्यों का क्या फल होता है। धन से उच्च पद मिलता है या नहीं। कर्म का फल मिलता है यह बात निर्विवाद है।
उपरोक्त पंक्तियों का तात्पर्य इतना ही है कि महत्ता प्राप्त करने की उम्र आकाँक्षा हम धारण किये हुए हैं। कितनी ही अविकसित दशा में, कितनी ही पिछड़ी परिस्थितियों में हम हों यह दैवी प्रेरणा हर घड़ी भीतर ही भीतर नोंचती रहती है। जिसका ज्ञान जितना है या जो जैसी परिस्थिति में प्रसन्न है, उसे उसी के अनुसार अपना कार्यक्रम बनाना पड़ता है। हम उस मोटर के समान हैं जिसका पहिया हर घड़ी घूमता रहता है। ड्राइवर उसे अपनी इच्छानुसार चाहे जहाँ ले जा सकता है। इच्छा करते ही वह पूरब, पच्छिम, उत्तर, दक्खिन, चाहे जिधर की सड़क पर सरपट दौड़ लगा सकती है। महत्व कामना दबाई नहीं जा सकती क्योंकि वह मनुष्य का धर्म और दैवी प्रेरणा है।
ईश्वरीय नियम है कि तुम्हें आगे बढ़ना पड़ेगा। संसार चक्र आगे बढ़ रहा है, नन्हे बालक, पौधे, घास-पात, कीड़े-मकोड़े, वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी, आकाश आग बढ़ने के लिए सब को घसीटा जा रहा है। इस सृष्टि की धारा ही ऐसी है। वृद्धि, उन्नति, विकास इसका धर्म है। बढ़ो, बढ़ो, बढ़ो, जर्रे जर्रे से यही आवाज आ रही है बढ़ो! आगे बढ़ो! उस घूमते हुए पहिये को ध्यान से देखो, क्या वह निरंतर आगे नहीं बढ़ रहा है? जब तुम किसी भौतिक विज्ञानी से विकासवाद के संबंध में पूछने जाओगे तो वह तुम्हें विस्तारपूर्वक बतायेगा कि आगे बढ़ने का निश्चित परिणाम घूमना है। तुम यदि लगातार चलते ही रहो तो घूमकर वहीं आ जाओगे जहाँ से चले थे। पृथ्वी, सूर्य, नक्षत्र, आदि सब चल रहे हैं इसलिए घूम रहे हैं। वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हो गया है कि प्रकृति का प्रत्येक परमाणु घूम रहा है अर्थात् वह बिना ठहरे आगे की ओर बढ़ता जा रहा है। ध्यानपूर्वक सुनलो, अच्छी तरह समझलो, भली प्रकार अनुभव कर लो कि तुम बढ़ रहे हो, एक निश्चित चेतना द्वारा तुम्हारे मन को बढ़ने के लिए अग्रसर किया जा रहा है। फिर भी उसकी गति किस ओर हो यह बात तुम्हारे ही ऊपर छोड़ी गई है। ईश्वर ने एक गतिवान यंत्र देकर जीव को इस चतुर्मुखी दुनिया में घूमने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया है।
जिस मोटर का पहिया बराबर घूम रहा हो और उसका ड्राइवर यदि उसे चाहे जिस ओर चला जाने दे तो वह कहाँ जा पहुँचेगा? जिस सड़क पर वह दौड़ लगा रहा है वह कहाँ पहुँचेगी इस बात की जानकारी उसे रखनी चाहिये। सड़क साफ है, मुझे पसन्द है, इस पर बहुत से आदमी चल रहे हैं, इन्हीं तर्कों के आधार पर जो अपना कार्यक्रम बना लेते हैं वे अंधेरे में हैं और वे उस अन्धे के समान हैं जो बिना सोचे विचारे चाहे जिधर को कदम उठाता जा रहा है। ऐसे सारथी को क्या कहा जाय जो चलती हुई सड़क को देखकर अपना रथ भी उसी पर डाल देता है। कहीं तुम भी ऐसे ही संचालक तो नहीं हो।
जीवन केन्द्र जहाँ से आरंभ होता है वहीं से हजारों लाखों पगडंडियाँ निकलती हैं। यह मत स्वातन्त्र्य के भेद से विभिन्न दिशाओं को जाती हैं। नीच उद्देश्य, पाशविक वासना और भोगेच्छा की पगडंडियाँ हरी भरी मालूम होती हैं। थोड़ी ही दूरी पर सब्जबाग दिखाई देते हैं। इसलिए ललचा कर हरे भरे खेतों में पिल पड़ने वाली भेड़ों की तरह हम में से अधिकाँश लोग उधर पिल पड़ते हैं और इस बात को भूल जाते हैं कि इसका परिणाम क्या होगा? ऐसी हरकत करने वाली दूसरी भेड़ों को किसान द्वारा लाठियों से पीटे जाते उन्होंने देखा होता है किन्तु अपनी पीठ पर धमाका हुए बिना उनकी जड़ता दूर नहीं होती। उच्च उद्देश्यों के मार्ग उतने लुभावने नहीं है। हमारी जड़ता दूर पर खड़े हुए अमृत फलों को नहीं देख पाती और पास की कठिनाइयों एवं कम चलने वाले रास्ते को देखकर निराश हो जाती है। ऐसी जड़ता और अदूरदर्शिता भेड़ों को ही शोभा देती है। कहीं तुम भी ऐसी ही भेड़ तो नहीं हो?
निरंतर चलने वाले प्रकृति चक्र में हम अपना कौन सा स्थान ग्रहण कर रहे हैं और हमारा विकास रथ किस मार्ग पर चला जा रहा है? क्या इस बात को सोचने की तुम कोई जरूरत नहीं समझते? जीवन जैसा बहुमूल्य भण्डार किन कामों में खर्च हो रहा है क्या इसका हिसाब रखना तुम्हारी दृष्टि में व्यर्थ है? अखंड ज्योति के पाठकों से मैं ऐसी आशा नहीं कर सकता। मेरा विश्वास है कि वे अपनी स्थिति के बारे में कुछ अधिक जानने के लिए प्रयत्नशील होंगे। इस देव दुर्लभ मानव शरीर में विचार शक्ति ही मुख्य है। शास्त्र कहता है ‘मनानत् मनुष्य’ अर्थात् मनन करने से ही मनुष्य है। हम सोच विचार सकते हैं यही हमारी विशेषता है। कितनी गुत्थियों को हमारा मस्तिष्क सुलझाता है। किसी में झगड़ा हो रहा है तुम जाकर शान्त करते हो, आर्थिक कठिनाई का हल निकालते हो, असंतुष्ट लोगों को संतुष्ट करते हो। सामाजिक प्रथाओं में परिवर्तन करते हो, विद्या प्राप्त करते हो, नई व्यापारिक योजनाएं बनाते हो, गुप्त मंत्रणाएं करते हो, षडयंत्र रचते हो, ऐसे ऐसे पेचीदा मामलों को समझते हो, उनका स्वरूप निर्माण करते हो और वह वह तरकीबें सोचते हों जिन्हें देखकर दंग रह जाना पड़ता है। इतनी योग्यता रखते हुए भी ऐ मेरे अभिन्न! अपने बारे में कुछ क्यों नहीं सोचते कि तुम क्या हो? कैसे हो? क्या कर रहे हो? कहाँ जा रहे हो?
बाहरी कार्यों में जितना प्रयत्न करते हो उसका एक अंश अपने लिये भी करो। दूसरों की हजामत बना कर अपना मतलब गाँठने में तो तुम बड़े प्रवीण हो, इस कला में काफी निपुणता प्राप्त कर चुके हो, पर तथ्य के स्थान पर आकर क्यों गड़बड़ा जाते हो। उसकी जेब तो बड़ी सफाई से काट लाये पर मिले हुए द्रव्य को इसके घर में क्यों पटक दिया? तुम तो बहुत सयाने हो पर यहाँ चौकड़ी क्यों भूलते हो? होशियारी बहुत अच्छी चीज है। कमाऊ पूत होना बहुत बढ़िया काम है। हर किसी से अपना मतलब निकाल लेना तुम्हें आता है। पर मेरे अच्छे भाई, उसे क्यों नहीं पहचानते जो तुम्हारी भी जेब काट लेता है और अपने मतलब के लिये तुम्हारा वैसा ही उपयोग करता है जैसे मदारी, एक चालाक बन्दर से खूब नाच-कूद करवाता है और उसकी कमाई को खुद हजम कर जाता है। तुम्हारी होशियारी की परीक्षा का स्थल यह है। यहाँ फेल होकर तुम उस गधे के उदाहरण बनते हो जिसने सारे दिन सुभोज्य पदार्थ लादे थे किन्तु शाम को सड़े गले भूसे पर बाँध दिया गया था।
हम लोग अपने को भूल जाते हैं अपने घर को ठीक तरह नहीं पहचानते इसलिये कठिन श्रम साध्य अपनी कमाई दूसरों के घर पटक आते हैं। इसे कैसी चालाकी, बुद्धिमानी, होशियारी समझें जरा तुम्हीं मुझे समझाओ।
चलो, उठो, उस एकान्त कोठरी में चले जाओ और अपने शरीर व मन को शान्त करके अपने बारे में विचार करो, सोचो, मनन करो कि हमारी प्रगति किस दिशा में हो रही है, हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं, हमारी मोटर किस सड़क पर दौड़ी जा रही है, खेत के चरने का क्या परिणाम होगा। जिस प्रकार एक गहरे षड़यंत्र का सुराग लगाया जाता है वैसे ही पता लगाओ कि हम अपना जीवन रूपी अमूल्य निधि खर्च करके जो कमाते हैं वह हमारे ही पास रहता है या बीच में ही हड़प लिया जाता है? अपने बारे में पूरी तरह से विचार करो तो तुम्हें बहुत नई बातें मालूम होंगी और समझ सकोगे कि किस तरफ बढ़ रहे हो किन्तु वास्तव में किस तरफ बढ़ना चाहिए था।
पथिक
(1)
पथिक! सजग हो, आँख खोल, हा! कैसी निद्रा आई है!
होजा होजा सावधान, उठ, कैसी बुद्धि गंवाई है!
अरे मूर्ख! क्या नहीं जानता, कहां पड़ा है आकर तू!
अभी समय है चेत! चेत!! करले प्रयत्न कुछ जाकर तू!
(2)
गये सभी साथी हैं तेरे, यहाँ न कोई अपना है!
जिसको समझा है अपना, वह मृग तृष्णा है, सपना है!
‘तू—तू मैं—मैं की भट्टी में वहाँ निरन्तर जलना है!
पथिक! कहीं यह भूल न जाना कितना तुझको चलना है!
(3)
बेशक मार्ग कठिन है तेरा, पर इसकी परवाह न कर!
चुभते काँटे हों पगतल में, ले निकाल पर आह न कर!
देख सामने वही देश है तुझको जहाँ पहुँचना है!
इस सराय में क्यों ललचाया किसको यहाँ ठहराना है!
स्मरण शक्ति और उसका विकास
(ले.—श्र. गिरराज किशोर विशारद, चिरहोली)
(4)
पीछे के तीन लेखों में स्मरण शक्ति के सम्बन्ध में बहुत कुछ कहा जा चुका है। परन्तु यह विषय इतना गंभीर है इस पर जितना भी कहा जाय कम है। मनुष्य का मस्तिष्क इतना गूढ़ है कि उसकी याहडडडडड पा लेना आसान नहीं। कहते हैं कि जो ‘पिंड में सो ब्रह्माण्ड में’ संसार के अन्दर जो शक्तियाँ भरीं हुई हैं वह शरीर के अन्दर भी हैं। यों कहा जा सकता है कि प्रकृति के अजायब घर का छोटा मानचित्र मनुष्य का शरीर है। स्थूल पदार्थों का प्रतिनिधित्व यह पंच भौतिक शरीर करता है तो विश्व व्यापी सूक्ष्म चेतनाओं की तस्वीर मस्तिष्क है। इस अद्भुत अवयव की वैज्ञानिक खोज शताब्दियों से हो रही है। अब तक जितनी जानकारी इसके सम्बन्ध में प्राप्त की जा सकी है। वह बहुत ही कम है। मस्तिष्कीय श्वेत बालुका का क्या कार्य है विज्ञान अभी यह भी नहीं जान पाया है। फिर भी अब तक जो शोध हुई है हम सब लोगों को आश्चर्य में डाल देने के लिए काफी है। इस अद्भुत यंत्र में पृथ्वी को डावांडोल कर देने की शक्ति है। एक दो दस आदमियों की आर्थिक एवं सामाजिक दशा बदलने की नहीं समस्त भूमण्डल में उलट पुलट पैदा कर देने की ताकत है। कार्लमार्क्स का मस्तिष्क पैसे की दुनिया में एक पहेली बन गया है। यूरोप का रावण-हर हिटलर-विश्व भर में अपने मस्तिष्क का आतंक जमाये हुए है, उसके त्रास के मारे करीब आधी दुनिया की नींद हराम हो रही है। जिन महापुरुषों के मस्तिष्कों ने रेल तार बिजली आदि आधुनिक पंत्रों का निर्माण किया है आप लोग उनके नाम भी जानते होंगे पर आप यह देखते हैं कि पिछली शताब्दियों की अपेक्षा अब हमारे जीवन की धारा ही बदल गई है। हिन्दू समाज की चिर कालीन धार्मिक प्रथाओं में स्वामी दयानन्द का मस्तिष्क कितनी क्रान्ति कर गया। कमाल पाशा ने टर्की को सिर पर उठा कर पश्चिम से पूरब में पटक दिया। यह कार्य शरीर के नहीं हैं। शरीर का बल नगण्य है। मानसिक बल के सामने उसका आस्तित्व इतना ही समझना चाहिए जितना विशाल वृक्ष में एक पत्ती का।
इस लेख में मस्तिष्क की बनावट और उसकी महान् कार्य शक्ति पर विचार करने की हमारी इच्छा नहीं है क्योंकि लेख की परंपरा स्मरण शक्ति के संबंध में है। इन पंक्तियों को लिखने का अभिप्राय इतना ही है कि मस्तिष्क की स्मरण शक्ति, धारणा शक्ति, कल्पना शक्ति, इच्छा शक्ति आदि के बारे में जितनी शोधें हो चुकी है वे पूर्ण नहीं हैं। भौतिक विज्ञानी हैरान हैं कि इस अद्भुत भाँडागार का पूरा परिचय किस तरह प्राप्त कर पावेंगे। जितना आगे बढ़ते जाते हैं उतनी ही अधिक गहराई का परिचय मिलता जाता है। स्मरण शक्ति के संबंध में पिछले अंकों में अब तक की शोध का बहुत कुछ आवश्यकीय भाग बताया जा चुका है। उसके आधार पर इस शक्ति के बढ़ाने के नित नये उपाय निर्धारित किये जा रहे हैं और उनका परीक्षण हो रहा है इन परीक्षणों में जो सफल और संतोष जनक सिद्ध हो चुके हैं उन्हीं का उल्लेख इन पृष्ठों में करने का में प्रयत्न करता रहा हूँ और आगे करूंगा।
पाठक जानते हैं कि हर काम के करने में कुछ चीज खर्च होती है। सृष्टि में जन्म मरण का नियम इसी सिद्धान्त के आधार पर है। गेहूँ पीस डालने पर आटा बनता है, तेल जलाने पर दीपक का प्रकाश होता है। कोयले के बल पर रेल, बिजली के बल पर तार और पेट्रोल की ताकत से मोटर जहाज आदि चलते हैं। एक चीज़ का खर्च दूसरी को उत्पन्न करता है, इस बात को मानने में किसी को कठिनाई न होनी चाहिए। अब विचार करना चाहिए कि मस्तिष्क, द्वारा इतने गजब के काम क्या बिना कुछ खर्च किये होते रहते होंगे? स्मरण शक्ति का मूल आधार मस्तिष्क जिस प्रकार शरीर का सर्वोत्तम अंग है उसी प्रकार उसकी खुराक भी देह का सर्वोत्तम भाग होना चाहिए। मस्तिष्क के मोटर में वीर्य का पेट्रोल डलता है। यह उक्ति आपने अनेक विचारकों के मुँह सुनी होगी कि ‘अच्छे शरीर में अच्छा मस्तिष्क रहता है’ इस कहावत की सचाई इस आधार पर है कि अच्छा, शरीर, अच्छा और अधिक वीर्य मस्तिष्क की खुराक के लिए दे सकता है। डॉक्टर पराबैल ने लिखा है कि “खराब मस्तिष्क वाले, मूढ़, दीर्घ सूत्री, मुलक्कड, विक्षिप्त, क्रोधी तथा अन्य प्रकार के मस्तिष्क संबंधी जितने रोगी मेरे पास आते हैं उनमें से 97 प्रतिशत ऐसे होते हैं जिन्हें वीर्य संबंधी विकार पहले हुआ होता है।”
हस्त मैथुन बहु मैथुन आदि कारण वीर्य बहुत अधिक मात्रा में खर्च हो जाता है और उष्णता पाकर वह पतला एवं प्रवाही बन जाता है। स्वप्न दोष, प्रमेह, शीघ्र पतन आदि रोग वीर्य पतले और प्रवाही होने के लक्षण मात्र हैं। ऐसा दीपक जिसका तेल दूसरे छेद में होकर टपक रहा हो क्या अपने प्रकाश को स्थिर रख सकता है? कम मात्रा में और अशुद्ध पेट्रोल पाने वाली मोटर क्या दूसरी की बराबरी कर सकेगी? सब चिकित्सक जानते हैं कि वीर्य रोगों, शिर में भारीपन, आँखों के आगे चक्कर आना, निद्रा की कमी, नेत्रों में जलन, अनुत्साह, मानसिक थकावट, कानों की सनसनाहट, आदि लक्षणों को भी धारण किये रहते हैं। क्योंकि अपनी पूरी खुराक न पाने के कारण दिमाग दिन दिन कमजोर होता जाता है। यही कमजोरी उपरोक्त लक्षणों के रूप में दिखाई पड़ती है।
अन्य मानसिक साधन जितने उपयोगी हैं उनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण वीर्य रक्षा का सवाल है। अपने पशुओं को मजबूत रखने के इच्छुकों को चारागाह का प्रबंध करना पड़ेगा। जो लोग अपने मस्तिष्क को विकसित देखना चाहते हैं उन्हें अपने वीर्य को स्थित करना पड़ेगा ओर उसे मानसिक भोजन में लगाना होगा। बिना इसके काम नहीं चल सकता। जब हम अपने अखंड ब्रह्मचारी ऋषि मुनियों की ओर देखते हैं तो पता लगता है कि वीर्य का मस्तिष्क द्वारा उपयोग कर ऊर्ध्वरेता बन कर कितने महान कार्य संपादित किये थे। एक ही व्यक्ति महर्षि व्यास द्वारा अठारह पुराणों का लिखा जाना क्या कम आश्चर्य की बात है। इस पाठ में पाठकों से यह बात बिलकुल स्पष्ट कर देना ठीक होगा कि अन्य उपाय पौधे के आस पास नाश कराने के और जमीन तोड़ने के समान हैं जब कि ब्रह्मचर्य पालन उसकी जड़ में जल सींचने के तुल्य है।
ब्रह्मचर्य के साधारण नियम आप सब लोग पढ़ और सुन चुके होंगे। न जानते हों तो ब्रह्मचर्य संबंधी कोई अच्छी पुस्तक पढ़कर या किसी अनुभवी विद्वान से शिक्षा प्राप्त कर लेनी चाहिए। उस विस्तृत विज्ञान का इन पंक्तियों में उल्लेख करने से तो विषयान्तर हो जायगा और पाठक दूसरे मामले में उलझ जावेंगे। एक ऊर्ध्वरेता महात्मा ने वीर्य रक्षा के संबंध में अपना एक अनुभूत चुटकुला बनाया था जो परीक्षा करने पर बड़ा ही उपयोगी और अल्प प्रयत्न में बहुत लाभ देने वाला सिद्ध हुआ है। उन महात्मा ने कहा था कि जब कभी मेरी कामेन्द्रिय उत्तेजित होती है तब में ऐसी भावना करता हूँ कि शिश्न में आया हुआ वीर्य अपने मानसिक बल द्वारा खींच कर में मस्तिष्क में ले जाता हूँ और वहां उसे धारण कर देता हूँ। दुधारू पशु की दुग्ध धारा को तब तक निकालते रहते हैं जब तक निकलना बन्द न हो जाय उसी प्रकार शिखा से मस्तिष्क तक जाने वाली नाड़ियों में बार-बार यह भावना करनी पड़ती है कि मेरा मानसिक बल इन्हें भरे हुए वीर्य को दुह दुह कर मस्तिष्क में बार-बार ले जाया जा रहा है और वहाँ स्थापित किया जा रहा है, पूर्ण मनोबल के साथ ऐसी भावना करने से प्रायः पाँच मिनट से कम में ही काम वासना शान्त हो जाती है।” जिन लोगों को अनावश्यक और असामयिक कामोत्तेजना होती है और उससे पीड़ित होकर वीर्यपात करने में प्रवृत्त हो जाते हैं वे महात्मा जी के इस अनुभूत प्रयोग से पूरा लाभ उठा सकेंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।
सूचना
विगत अंक में ‘मैं क्या हूँ?’ पुस्तक मई मास में छप जाने को विज्ञापन किया गया था। किन्तु वह कारण वश सप्ताह लेट छप रही है। 7 अप्रैल का वहाँ को वह छप कर तैयार हो जायगी। जिन प्रेमियों ने पुस्तक को मंगाने के लिए टिकट भेजे हैं उन्हें पुस्तक 7 अप्रैल का रवाना करदी जायेगी। सुरक्षा की दृष्टि से एक का टिकट हम कम लगायेंगे, फलतः पुस्तक दो पैसे की वैरंग पहुँचेगा। सूचनायें निवेदन है।
—मैनेजर अखंड ज्योति।
मैस्मरेजम द्वारा दूसरों की सेवा
(ले—प्रो. धीरेन्द्र कुमार चक्रवर्ती वी. एस. पी.)
(5)
पिछले अंकों में मैस्मरेजम के मूल सिद्धान्त और उसकी कार्य शक्ति के संबंध में प्रकाश डाला गया है, यह विषय अत्यन्त गहन है इसे पूरी तरह से समझाये बिन अभ्यास के साधनों का वर्णन करने लग जाना न उचित होता। इस मास अखंड ज्योति संपादक की मारफत पाठक के करीब नौ दर्जन पत्र मुझे मिले हैं जिनमें पाठकों ने अभ्यास सिखाने में शीघ्रता करने का अनुरोध किया है। मैं उनकी उत्सुकता का आदर करता हूँ। किन्तु एक बात कहूँगा कि केवल उत्सुकता और जल्द बाजी से काम न चलेगा। दृढ़ संकल्प और लगातार साधन करने योग्य धैर्य उन्हें प्राप्त करना होगा तभी इस साधन में कुछ सफलता मिल सकेगी। मानसिक अभ्यासों के लिए श्रद्धा और अविचलता अनिवार्य है। पाठक विश्वास रखें अब तक के लेखों में जो वर्णन किये गए हैं वे आधार प्रस्तर थे, बिना उन बातों को समझाये यदि मैं अभ्यास मार्ग को बताने लगता तो पाठकों का ऐसे ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर ला खड़ा करता जहाँ वे यह न जान सकते कि हमें यहाँ किस उद्देश्य से किस प्रकार ले आया गया है। अगले अंक में मैस्मरेजम के अभ्यास का विधान बढ़ाया जायगा। इस लय में यह बात बतानी रह गई है कि मैस्मरेजम द्वारा दूसरों की क्या सेवा हो सकती है?
मैस्मरेजम एक मानसिक बल है। शारीरिक बल है लाभों से आप परिचित हैं बलवान शरीर अपने लिए पर्याप्त सुख सुविधाएं प्राप्त कर सकता है एवं सुखद प्रतीत होता है। जो अपनी सेवा कर लेता है वहीं इस की सेवा भी कर सकता है। निरोग और सशक्त शरीर ही दूसरों की सेवा कर सकने लायक योग्यता रखता है। किसी दुर्बल को अत्याचारी के पंजे से छुड़ाने, जालिम को दण्ड देने, रोगी की तीमारदारी करने, किसी के काम काज में मदद देने प्यासों को पानी पिलाने आदि के कार्य शारीरिक बल द्वारा पूरे होते हैं। रोगी और निर्बल तो अपने लिए ही मदद माँगेगा दूसरों का उससे क्या भला हो सकता है। यही बात मानसिक बल के बारे में है? जिनका मनोबल दृढ़ है वे अपने शारीरिक और मानसिक यंत्रों को ठीक प्रकार चला कर सुख सफलता प्राप्त कर सकते हैं और साथ ही दूसरों पर भी अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं। अब मुझे यह कहने की जरूरत नहीं है कि मनोबल को इच्छानुसार काम में ला सकने की योग्यता ही मैस्मरेजम है।
मैस्मरेजम को प्रयोग करने वाले आम तौर से अपने से निर्बल इच्छा शक्ति वालों और प्रभावित हो जाने की इच्छा रखने वालों को बेहोश कर देते हैं। वे कुछ देर तक दूसरे आदमी की आँखों से आंखें लड़ा कर उसके शरीर में अपनी इतनी विद्युत शक्ति प्रवेश कर देते हैं कि वह सावधान न रह सके और एक प्रकार की योग निद्रा में गिर पड़े। इस निद्रित व्यक्ति के शरीर और मन पर प्रयोगकर्ता का पूरा अधिकार हो जाता है, वह उनका वैसा ही उपयोग कर सकता है जैसा अपने शरीर और मन का करता। यदि उसे आज्ञा दें कि अपनी जीभ बाहर निकाले रहो तो वह इस व्यर्थ बात को भी पूरी तरह से स्वीकार करेगा। जब तक प्रयोक्ता चाहे अपनी जीभ बाहर निकाले रहेगा। मन का भी ऐसा ही उपयोग हो सकता है। मिट्टी खिलाकर मिठाई जैसा स्वाद अनुभव करने को कहा जाय तो वह खुशी खुशी वैसा स्वीकार करेगा। यह बातें मनोरंजन सा खेल तमाशा न समझनी चाहिये। दिल बहलाव करने या भीख माँगने के लिए इनका प्रयोग करना गुनाह है।
जरा गंभीरतापूर्वक विचार कीजिए कि जिस विद्या द्वारा दूसरे के शरीर और मन पर इतना कब्जा किया जा सकता है, क्या उसके द्वारा उनका नफा नुकसान कुछ नहीं किया जा सकता है? जो आदमी किसी दूसरे की तिजोरी पर पूर्ण अधिकार रखता है उस पर पूरी तरह कब्जा कर लेता है, यदि वह चाहे तो क्या उस तिजोरी में से कुछ ले दे नहीं सकता? निश्चय ही वह उसमें से चाहे जितना निकाल या रख सकेगा। आवश्यकता इतनी ही है कि इस क्रिया में भी उसने कुशलता प्राप्त कर रखी हो। बिना उस क्रिया को जाने उस रखने उठाने का कार्य नहीं हो सकता।
मैस्मरेजम की कुछ ऊँची योग्यता रखने वाला प्रयोक्ता दूसरों के मनोगत भावों को पढ़ सकता है, और जान सकता है कि उसे क्या मानसिक वेदनाएं सता रही हैं। वह आदतें जिनके कारण उसका जीवन नरक तुल्य बना हुआ है उन्हें वह समझ सकता है और निदान कर सकता है कि मन की कितनी गहरी भूमिका में वह गढ़ चुकी हैं। यह भ्रम और संशय मस्तिष्क को चिंतित बना देते हैं बार-बार विश्वास कराये जाने पर साधारण कोटि के मन किसी व्यक्ति पर अन्ध श्रद्धा धारण कर लेते हैं और उसके द्वारा जीवन भर दुख पाते रहते हैं। मैस्मरेजम का सिद्ध यह जान जाता है कि मस्तिष्क में कहाँ क्या गाँठें पड़ी हुई हैं और उनके द्वारा किस प्रकार कहाँ विकृति अटकी हुई हैं। एक टूटी हुई मशीन के असंतोषजनक कार्य से उसको काम में लाने वाला दुखी रहता है और अपने भाग्य को कोसता हुआ ईश्वर को गाली देता है। उसकी यह दशा एक चतुर इंजीनियर के सामने एक मजाक है। क्योंकि वह वास्तविक कारण को जानता है मशीन को देखते ही उसे पता लग जाता है कि इसका अमुक पुर्जा घिस या टूट जाता है अमुक पेच ढीले हो गये हैं और अमुक जगह पर धूल जमा हो गई है। वही अपने विद्या बल से मशीन को खोलकर उसको दुरुस्त कर देता है तो मशीन ठीक तौर से चलने लगती है।
शारीरिक रोगों पर भी मैस्मरेजम चिकित्सा प्रणाली अन्य किसी भी उत्तम चिकित्सा प्रणाली से कम असर नहीं करती। शरीर स्वयं कुछ नहीं है वह तो पाँच तत्वों की गठरी मात्र है। इसमें जो चेतना है वह मन की है। मन और शरीर का संबंध किस प्रकार है और किस प्रकार यह शासन चलता है इस विषय को समझाने का आज अवकाश नहीं है। इस समय तो एक शब्द से पाठकों को इतना ही समझ लेना चाहिये कि मन का शरीर पर शासन है। समाधि के बारे में आप सब लोग जानते हैं कि इस दशा में योगी लोग शरीर की सारी क्रियाओं को बन्द कर देते हैं और फिर भी जीवित रहते हैं कई साधक कुछ समय के लिए रक्त और हृदय की गति बन्द कर देते हैं। मन पर काबू पा लेने के साथ शरीर पर भी कब्जा हो जाता है। जिस प्रकार मैस्मरेजम द्वारा मानसिक रोग मिट सकते हैं उसी प्रकार शारीरिक बीमारियों को भी दूर किया जा सकता है।
इस प्रकार आप समझ गये होंगे कि शरीर और मन की विकृतियों को मैस्मरेजम विद्या द्वारा झाड़ बुहार कर साफ किया जा सकता है उन्हें निर्मल और निरोग बनाया जा सकता है। इतना ही नहीं बल्कि इससे भी कुछ अधिक हो सकता है। तिजोरी को खोल कर उसमें से कूड़ा झाड़ने, रद्दी चीजों को फेंकने का काम जो कर सकता है वह इसमें रखे हुए बहु मूल्य रत्नों को सजा कर भी रख सकता है, जिससे उसका प्राचीन रूप रंग ही बदल जाय और नवीन सौंदर्य प्रकटित होने लगे। वह उसमें कुछ और नई चीजें भी रख सकता है लौकिक व्यवहार के अनुसार हम दूसरों के खेत में बीज डाल सकते हैं और वह फल फूल कर बड़ा हो सकता है। चतुर मेस्मरेज्मी किसान किसी के मस्तिष्क की भूमि को उपजाऊ बनाकर उसमें सद्गुणों के बीज बो सकता है और प्रयत्नपूर्वक सींच सींच कर इस योग्य कर सकता है कि वह फलने फूलने लगे। सद्गुणों की कृपा से कितने तुच्छ जीवन महापुरुष हो गये और लौकिक पारलौकिक संपत्ति उपार्जित कर सके।
इस विद्या का एक काला पहलू भी है। भ्रष्ट मेस्मराइजर जिन्हें पिशाच या ब्रह्म राक्षस कहना चाहिये अपनी इस शक्ति का दुरुपयोग भी कर सकते हैं। नीच वासनाओं से प्रेरित होकर ये किसी के मानस पटल पर ऐसा असह्य आक्रमण कर सकते हैं कि पर बेचारा नष्ट भ्रष्ट हो जाय, अंग भंग हो जाय, रोगी हो जाय, शारीरिक मानसिक शक्तियाँ खो बैठे, उसके जाल में जकड़ जाय, पागल हो जाय या प्राणों से हाथ धो बैठे। यह पैशाचिक प्रहार क्रिया भी होती हैं इनसे सावधान रखने के लिए इन पंक्तियों का उल्लेख किया गया है। अखंड ज्योति के इन पृष्ठों में लगातार कितने ही मास तक चलने वाली इस लेख माला में इस अनैतिक आक्रमण की शिक्षा किसी को न मिलेगी। क्योंकि हम जानते हैं कि ऐसा पाजीपन लौटकर प्रयोक्ता को भी चबा डाल सकता है और उसकी सारी शक्ति को न्यायी प्रभु की सर्व शक्तिवान् सत्ता द्वारा एक ही झटके में छीन लिया जा सकता है। समयानुसार हम अपने पाठकों को यह शिक्षा देंगे कि वे किस प्रकार दूसरों की शारीरिक एवं मानसिक सेवा कर सकने की योग्यता प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही यह भी बताया जायगा कि किसी के किये हुए मानसिक आघात से अपना बचाव किस प्रकार करना चाहिये।
(ले.—मास्टर उमादत्त सारस्वत, कविरत्न, बिसवाँ)
(पं. सीताराम शर्मा बी.ए.एल.एल.बी. मुरारी)
गत अंक में यह अच्छी तरह समझाया जा चुका है कि बुढ़ापा एक मानसिक रोग है। समयानुसार शरीर के कलपुर्जे घिस जाते हैं और प्रकृति के नियमानुसार एक समय उसे मरना पड़ता है यह सच है। परन्तु वह दुख, निराश और रोगों से घिरा हुआ नहीं होना चाहिए। इस लेख में उस बुढ़ापे को रोकने का कोई उपाय नहीं बताया जा सकेगा जिसमें बाल पक जाते हैं, चमड़ी पर सिकुड़ने पड़ जाती हैं, दाँत हिल या गिर जाते हैं। यह स्वाभाविक दशाएं हैं बड़ी उम्र में यह बातें स्वभावतः हो जाती हैं। स्वाभाविक होने के कारण यह सब परिवर्तन सुन्दर भी मालूम पड़ते हैं। जिस प्रकार एक सुन्दर तरुणी का चन्द्रबदन अपना एक विशेष आकर्षण रखता है उसी प्रकार वयोवृद्ध पुरुषों की बुढ़ौती अपने में एक श्रद्धा और रौब धारण किये होती है। नौजवान लड़के आपस में ठट्ठा मार रहे हों पर वे किसी वृद्ध पुरुष को देख पावेंगे तो झेंप जायेंगे और अपनी उच्छृंखलता बन्द कर देंगे। कहते हैं कि वृद्ध पुरुषों से सभा की शोभा होती है। अनुभव और ज्ञान वृद्धि के कारण उनकी उपयोगिता भी कम नहीं मानी जाती। प्रबंध, समझौता और निर्णय करने का भार वृद्ध पुरुषों पर डाला जाता है। इस प्रकार पाठक देखेंगे कि बुढ़ापा कोई अभिशाप नहीं है। स्वयं बुड्ढों को यह उम्र अखरनी भी नहीं चाहिए, पहले अंक में बताया जा चुका है कि बड़ी उम्र में इन्द्रियाँ शिथिल हो जाने के कारण यद्यपि वे स्थूल भोगों को नहीं भोग सकते, किसी तरुणी से मुहब्बत नहीं कर सकते। किन्तु मानसिक तत्वों की वृद्धि हो जाने के कारण दूसरे प्रकार के आनंद उन्हें प्राप्त होने लगते हैं। विभिन्न विचारधाराओं का अध्ययन, अपने अनुभव, दूसरों के शिक्षण, ईश्वर की अविचल भक्ति आदि के द्वारा वे ऐसा आनंद भोग सकते हैं जैसा नौजवानों को नसीब नहीं हो सकता।
इस लेख में हम उस बुढ़ापे को बुरा बता रहे हैं और उसी से बचने के उपायों पर प्रकाश डाल रहे हैं जिसके द्वारा आदमी दुख, शोकों में डूबा रहता है। देह बीमारियों का घर बन जाती है जिसके कारण उत्साह और फुर्ती तो दूर हलके काम करना और भोजन पचा लेना भी कठिन हो जाता है। मानसिक दशा बड़ी करुणा जनक हो जाती है। उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो हमारा सर्वस्व चला गया हो, सब प्रकार का बल गंवा बैठे हों और मानों कोई घसीट घसीट कर मृत्यु के मुँह में पटकने के लिये ले जा रहे हों। शारीरिक अशक्ति उन्हें असहाय अवस्था का अनुभव कराती है। वे मृत्यु के दाँतों में उलझे हुए अशक्त जन्तु की तरह अपनी बेबसी पर आँसू बहाते हैं। पिछली क्रियाशीलता, भोग शक्ति और ऐश्वर्य की तुलना आज की लाचारी से करते ही उनके हृदय में एक ऐसी टीस सी उठती है जिसका हम नौजवान लोग ठीक तरह अनुभव नहीं कर सकते। यह बुढ़ापा अस्वाभाविक, अप्राकृतिक और अनुचित है।
हम सब को बुड्ढा होना है। हमारा बुढ़ापा भी ऐसा ही अप्राकृतिक न हो जाय इसलिए अभी से सावधान हो जाने की जरूरत है। चूँकि अस्वाभाविक बुढ़ापा अप्राकृतिक है। एक प्रकार का रोग है। इसलिए उससे छुटकारा मिल सकता है और आसानी के साथ अपना बचाव किया जा सकता है। स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने से निरोगता बनी रहती है और बीमारियों का आक्रमण नहीं होता। उसी प्रकार पहले से सावधान रहना अनुचित बुढ़ापे को रोक सकता है।
डॉक्टर ग्रे का कथन है कि चिन्ता मनुष्य का बुढ़ापा है। यह जवान आदमी को बुड्ढा कर देती है। मेरे अनुभव में ऐसे कई रोगी आ चुके हैं। एक स्त्री का पति मर गया पाँच बच्चों के पालन पोषण का भार वह किस प्रकार उठा सकेगी, इस चिन्ता से वह बेचैन रहने लगी। डेढ़ वर्ष के बाद मैंने देखा तो उस अधेड़ स्त्री के बाल पक गये थे और कमर झुक गई थी। एक दूसरा रोगी एक नानबाई है। पैंतालीस वर्षीय यह प्रौढ़ अपने दो बेटों समेत रोटी की दुकान करता था। निमोनिया रोग से एक सप्ताह के अन्दर उसके दोनों पुत्र मर गये। दो वर्ष लाठी टेक कर एक कृशकाय बुड्ढे को देखा तो मैं पहचान न सका कि वह वही नानबाई है। तीसरा व्यक्ति एक बड़ी जहाजी कंपनी का मालिक है। करोड़ों पोण्ड की पूँजी से इसका काम चल रहा था। दैवयोग से एक वर्ष में तीन जहाज दो दफ्तरों में आग लगी, एक बैंक में रुपया डूबने के फलस्वरूप वह बड़ी कम्पनी दिवालिया हो गई। उसका मालिक अपनी सारी प्रतिष्ठा खो बैठा और वह खाता पीता आदमी है पर सम्पत्ति नाश का सदमा बैठा कि चंद रोज में ही क्षीण काय जर्जर बुड्ढा बन गया। चौथा आदमी जौन्स होटल का क्लर्क है। उसे सन्देह हो गया कि मेरा मालिक मुझसे नाराज हो गया है और किसी ऐसे जाल में फंसा देने का षड्यंत्र कर रहा है जिसमें लंबी मुद्दत के लिए जेल हो सकती है। बेचारा क्लर्क घर छोड़कर भागा और आपने को छिपाता हुए तीन महीने तक देश विदेश की खाक छानता फिरा। उसे विश्वास हो गया कि ऐसी कोई बात नहीं है तब वह वापिस आया। लोग यह देखकर हैरान हो गये कि तीन महीने में ही उसके सिर के सारे बाल सफेद क्योंकर हो गये?
विद्वानों के उपरोक्त दोनों मतों को पढ़कर पाठक समझ सकते हैं कि साँसारिक माया जाल में अपने को ऊँचा उठा हुआ समझना मानसिक वेदनाओं को असहाय नहीं बनने देगा। जिसने मानसिक कष्टों पर काबू पा लिया है और मुसकराते रहने का दैवी गुण ग्रहण कर लिया है वह किसी परिस्थिति में विचलित नहीं किया जा सकता। ऐसा धीर और अविचल व्यक्ति जब तक मधु मृत्यु शय्या पर सुलाया जायेगा तब तक नौजवान बना रहेगा।
मानसिक कष्टों के बाद शारीरिक अयोग्यता का नम्बर आता है। यह ठीक है कि काम काजी लोग आपने स्वाभाविक शारीरिक संगठन में कोई है चमत्कारी परिवर्तन करने का अवसर प्राप्त नहीं कर सकते फिर भी स्वस्थ रहने की क्षमता धारण किए रहे सकते है। इसके सम्बंध में लाईपील का कहना है ढेरों मोटे-मोटे ग्रंथ बाजार में मिलते हैं। साधारण लोग जो उन सब का पालन नहीं कर सकते यह जानने में असमर्थ रहते हैं कि इन में से कौन से मुख्य है। मेरा अनुभव है डडड डडडड डडडडडड डडडडडडड
करना पर्याप्त है। भोजन और मैथुन करने से पूर्व उनकी आवश्यकता पर भली प्रकार विचार करके तब प्रवृत्त हुआ जाय। बस इतना ही काफी है।
उपरोक्त साधारण शब्दों में कितना सत्य और गूढ़ ज्ञान छिपा हुआ है। भोजन की सावधानी कितनी जरूरी और महत्वपूर्ण है इसे सब लोग जानते हैं खूब भूख लगने पर अच्छी तरह चबा चबा कर ताजा पौष्टिक और सात्विक भोजन करना दीर्घजीवन की पहली सीढ़ी है पर्याप्त स्वास्थ्य, तीव्र कामेच्छा और अनुकूल अवसर का ध्यान रखकर विचार और विवेक के साथ वीर्यपात करें तो उस सारी क्षति से बचे रह सकते हैं जो इस विषय में अविचार पूर्वक प्रवृत्त होने के कारण होती है। वायु सेवन, व्यायाम, प्रातः काल उठना, स्नान, सफाई निद्रा आदि बातें भी अपना काफी महत्व रखती हैं परन्तु यह उन दोनों बातों की सीमा में आ जाती है जिनका आहार बिहार ठीक होगा उनको यह सब बातें स्वयमेव सूझ पड़ेगी और उनका पालन अपने आप होने लगेगा।
बुढ़ापे से बचने के लिए यह उपाय सर्वोत्तम है। पाठकों को नोट कर लेना चाहिए कि उन्हें यदि अस्वाभाविक बुढ़ापे से बचना है तो मन को माया से ऊँचा उठाना होगा और प्रसन्नता को अपनाना होगा। साथ ही भोजन और मैथुन के संबंध में पूर्ण संयम के साथ काम लेना होगा। यही उपाय उनकी जवानी को मृत्यु पर्यन्त कायम रख सकेंगे।
शान्त प्रकृति का मनुष्य सुख और कर्तव्य को अलग अलग नहीं कर सकता। वह जो काम करता है उसी में सुख का अनुभव करता है। कर्तव्य कर्म के करने में दुख उन्हें होता है जो इन्द्रिय जन्य सुखों और क्षणिक भोग विलास के दास होते हैं।
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उस परिमित और संकुचित स्वार्थ को त्याग दो जो संपूर्ण वस्तुओं को अपने ही लाभ के लिए चाहता है। सच्चा स्वार्थ परमार्थ ही हो सकता है।
इच्छा शक्ति के चमत्कार—लेखक वा0 बुद्धिसागर वर्मा विशारद वी0 ए॰ एल॰ टी0 प्रकाशक तरुण भारत ग्रन्थावली कार्यालय, दारागंज प्रयाग। मूल्य 1-)
इस पुस्तक में इच्छा शक्ति की महत्ता, उसे उपयोगी बनाने के उपाय, तथा इच्छा शक्ति के द्वारा स्वास्थ्य लाभ करने की रीतियाँ हैं। पुस्तक उपयोगी और पठनीय है।
स्वर योग
(ले.—श्री. नारायणप्रसाद तिवारी कान्हीवाड़ा)
चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र इन चारों में और विशेषकर शुक्ल पक्ष में बाई नाड़ी चलना शुभ है। रवि, मंगल और शनि इन वारों में और विशेष कर कृष्ण पक्ष में दक्षिण नाड़ी चलना शुभदायक है। रविवार को सूर्योदय पर सूर्य नाड़ी और चन्द्रवार को चन्द्र नाड़ी चलना शुभ माना गया है।
चन्द्र स्वर में शुक्ल पक्ष का (दूज को) प्रथम चन्द्र दर्शन होना शुभ कहा गया है।
उदयं चन्द्र मार्गेणा सूर्येणास्तमनं यदि।
तदा ते गुणसंधाता विपरीतं विवर्जयेत॥
यदि दिन चन्द्र के स्वर से उदय और सूर्य के स्वर से अस्त हो तो इससे अनेकों गुण उत्पन्न होते हैं और यदि इसके विपरीत हो तो अनेकों दोष होते हैं।
दिन को जो चन्दा चले रात चखावे सूर।
तो यह निश्चय जानिये प्राण गमन है दूर॥
स्वाभाविक यह प्रश्न हो सकता है कि प्राकृतिक चलते हुए स्वर को यदि वह अशुभ भी है तो क्या किया जाये? मनुष्य बहुत थोड़े अभ्यास से स्वर बदल सकता है और इच्छापूर्वक स्वर चला सकता है। हाँ कभी-कभी जब कि कोई आपत्तिजनक घटना घटने वाली ही होती है तो स्वर हठीला हो (Obstinete) जाता है-किन्तु तब भी मनुष्य प्रयत्न से बहुत कुछ स्वर बदल सकता है जिसके लिये कुछ नियम इस प्रकार हैं।
(1) जो स्वर नहीं चल रहा है उसे अंगूठे से दबावे और जिस नथने से साँस चलती है उससे हवा खींचे फिर जिससे श्वाँस खींची है उसे दबाकर पहले नथने से यानी जिससे स्वर चलाना हैं उससे श्वाँस छोड़ें इस प्रकार कुछ देर तक बार-2 करें। श्वास की चाल बदल जायेगी।
(2)जिस नथने से श्वांस चल रही हो उसी करवट लेट जायें तो स्वर बदल जायेगा इस प्रयोग के साथ पहला प्रयोग करने से स्वर और भी शीघ्र बदलता है।
(3) जिस तरफ का स्वर चल रहा हो उस और काँख में कोई सख्त चीज कुछ देर दबा रखो पहले और दूसरे प्रयोग साथ यह प्रयोग करने से शीघ्र स्वर बदलेगा।
(4) घी खाने से वाम स्वर और शहद खाने से दक्षिण स्वर चलाना कहा जाता है।
(5) चलित स्वर में पुरानी स्वच्छ रुई का फोहा रखने से स्वर बदलता।
शुभ या अशुभ कार्य के लिए प्रस्थान करते समय चलित स्वर के शरीर भाग को हाथ से स्पर्श कर उसी चलित स्वर वाले कदम को (यदि चन्द्र नाड़ी चलती है तो 4 बार और सूर्य स्वर है तो 5 बार) जमीन पर पटक कर प्रस्थान करें।
चन्द्र स्वर में पूर्व और उत्तर की ओर नहीं जाना चाहिये और सूर्य स्वर में पश्चिम तथा उत्तर को जाना मना है सुषुम्ना स्वर में कहीं भी प्रस्थान करना मना है।
दूर के युद्ध में चन्द्र स्वर (इड़ा नाड़ी) विजय देने वाला है और निकट के युद्ध में सूर्य स्वर (पिंगला नाड़ी) इस काम में के लिये ठीक है जिधर का स्वर चलता हो उसी ओर का पैर पहले आगे धरकर यात्रा करें अवश्य फलीभूत होगा।
यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना है तो अचलित स्वर (जो स्वर न चल रहा हो) के पैर को पहले आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिये और अचलित स्वर की ओर उस पुरुष को करके बातचीत करना चाहिये इस रीति से उसका क्रोध शाँति कर अपने मनोरथ में सिद्धि प्राप्ति होगी। गुरु, मित्र, ऑफिसर, राज दरबार से जब कि वाम स्वर चलित हो उस समय वार्तालाप और कार्यारंभ करना श्रेयष्कर है। यात्रा के समय विवाह में नगर इत्यादि के प्रवेश आदि शुभ कार्यों में चन्द्र स्वर सदा सिद्धि देने वाला कहा गया है।
जो जीवाँग (अर्थात् जिधर का स्वर चलता हो उसी) अंग में वस्त्र पहिनकर “जीवं रक्ष” “जीवं रक्ष” ऐसा मंत्र जपता है वह विजयी होता है।
सूर्य स्वर में किसी भी सवारी, अश्व, मोटर साईकिल इत्यादि पर दाहिना पैर पहले सवारी पर रख कर बैठना उत्तम है। मासिक धर्म के 5वें दिन जब कि पुरुष की सूर्य तथा स्त्री की इड़ा नाड़ी चलती है उस समय गर्भादान होने से डडडडडडडडडडडडड सुषुम्ना स्वर में गर्भदान होने से सन्तान किसी भी इन्द्रिय से हीन होगी।
बाँझपन मिटाने के लिये इसकी परीक्षा करने वालों से निवेदन है कि मासिक धर्म के पहले पन्द्रह दिन के अन्दर जब कि पुरुष की तीव्र सूर्य नाड़ी तथा स्त्री की तीव्र चन्द्रनाड़ी चलती हो, संगम किया जावे। यदि स्वाभाविक न चले तो उपर्युक्त रीति से चलाने का प्रयत्न करना चाहिये।
तत्व
अब मैं स्वरोदय के अन्य विषय पर विचार करने के पूर्व तत्व पर सूक्ष्म प्रकाश डाल देना चाहता हूँ क्योंकि बिना तत्व ज्ञान के अन्य विषयों की विवेचना स्पष्ट न होगी वह कहा जा चुका है कि तत्व पाँच हैं।
धरती अरु आकाश है, और तीसरी यौन।
पानी पावक पाँचवों करत स्वास में गौन॥
संपूर्ण लोकों में स्थित जोर्वा की देर तत्वा से भिन्न नहीं है अर्थात् सभी पंचभूतात्म है परन्तु नाड़ी भेद भिन्न हैं।
लोग कहते हैं कि भूख लगने पर कुछ खा लेना चाहिये वरना भूख मर जाती है यह भूख मरने वाली कहावत बच्चे तक जानते हैं पर बात विचारणीय है कि भूख मरी कैसे? इसका उत्तर यही है कि तत्व तथा स्वर बदल जाता है। अग्नि तत्व भूख पैदा करती है आकाश तत्व वात कारक है अतएव भूख लगने पर अग्नि तत्व में आग्न को प्रचलित करने के लिए कुछ न रहने से खाली घर में प्रकाश प्रवेश कर अग्नि को शीतल कर वायु अपना अधिकार जमाती है जिससे वात पैदा होती है आपने देखा होगा कि वात प्रकृति का पुरुष देखने में तो मोटा अवश्य दीखेगा किन्तु उसे सदा भूख कम लगती है और सदा वह चूरन की पुड़िया से पेट भरना अपना नियम बना लेता है। आप चूल्हे में आग जलाइये यदि उसमें और भी लकड़ियाँ बराबर न लगाते रहेंगे तो न लकड़ियों की अग्नि क्रमश शीतल हो जायेगी इसीलिए अग्नि तत्व तथा पूर्ण स्वर में भोजन करना उत्तम माना गया है।
किस समय कौन से तत्व का अधिकार है इसको जानने के लिए इस विषय में बहुत अभ्यास की आवश्यकता है।
तथा काल में तत्व परीक्षा का अभ्यास उत्तम है।
1. डडडडडडडड के छेदों में दोनों मध्यमा (बीच की अंगुली) दोनों आँखों पर तर्जनी तथा अनामिकाओं कनिष्ठा से ओठों को बन्द करे, इसे षडमुखी मुद्रा कहते हैं।
यदि पीला रंग दीखे तो पृथ्वी, सफेद हो तो जल, लाल हो तो अग्नि, काला या नीला हो तो वायु तत्व समझना चाहिये और विचित्र मिश्रित रंग दीखें तो आकाश तत्व समझना चाहिये।
2. दर्पण में देख कर श्वाँस बाहर छोड़ें, उसमें यदि चौकोर आकार हो तो पृथ्वी, अर्धचन्द्र हो तो जल, त्रिकोण हो तो अग्नि, चतुआकार हो तो आकाश तत्व समझना चाहिये।
3. मुँह का स्वाद मीठा हो तो पृथ्वी, कसैला हो तो जल, तीक्ष्ण (तेज) हो तो अग्नि, खट्टा हो तो वायु और कड़वा हो तो आकाश तत्व समझना चाहिये।
4. पाँच रंग की गोली बनाकर जेब में डाले और एक गोली हाथ डाल कर निकाले जिस रंग की गोली निकले वही तत्व की उस समय प्रधानता समझी जावे—(यह निकृष्ट नियम है)
5. वायु का स्वर आठ अंगुल चलता है, अग्नि का स्वर चार, पृथ्वी का बारह, जल का सोलह अंगुल चलता है, आकाश तत्व की बात ही निराली है कोई नियमित रूप से नहीं चलता।
पृथ्वी तत्व में स्थिर कर्म, जल तत्व में चर कर्म, अग्नि तत्व में क्रूर कर्म, वायु तत्व में मारण उच्चाटन कर्म करना वर्जित है कथा क्योंकि फलीभूत भूख नहीं होता। कारण आकाश शून्य है। पृथ्वी तत्व और जल तत्व दोनों शुभदायक है, अग्नि तत्व मृत्युदायक वायु तत्व क्षय दायक है। पृथ्वी तत्व विलम्ब से लाभदायक है। जल तत्व शीघ्र ही फलदायक है अग्नि और वायु तत्व हानिदायक है। दिन में पृथ्वी तत्व और रात्रि में जल तत्व चलना गुप्तदायक है। जीवन में, जप में, लाभ में, खेती के, कार्यों में, धन पैदा करने में, मन्त्र जप में, प्रभु के शुद्ध में, आने जाने में पृथ्वी तत्व उत्तम है।
क्रमशः
मनुष्य का सबसे बड़ा मुक्ति दाता स्वयं उसी के भीतर विद्यमान है। वह सत्य है। सत्य ही भलाई है। जिसके विचार और कार्य निरंतर भले हैं वही वास्तव में भला मनुष्य है।
(अखंड ज्योति कार्यालय से इसी मास प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ)
अब तक बताई गई मानसिक कसरतों का अभ्यास कर लेने के बाद ‘अहम्’ से भिन्न पदार्थों का तुम्हें पूरा निश्चय हो जायगा। इस सत्य को ग्रहण कर लेने के बाद अपने को मन और वृत्तियों का स्वामी अनुभव करोगे और तब उन चीजों को पूरे बल और प्रमाण के साथ काम में लाने की सामर्थ्य प्राप्त कर लोगे।
अब तुम्हें अपने को दास नहीं, स्वामी मानना पड़ेगा। तुम शासक हो और मन आज्ञा पालक। मन द्वारा जो अत्याचार अब तक तुम्हारे ऊपर हो रहे थे उन सबको फड़फड़ा कर फेंक दो और अपने को उनसे मुक्त हुआ समझो। तुम्हें आज राज्य सिंहासन सौंपा जा रहा है। अपने को राजा अनुभव करो। दृढ़तापूर्वक आज्ञा दो कि स्वभाव, विचार, संकल्प, बुद्धि, कामनाएँ समस्त कर्मचारी शासन को स्वीकार करें और नये संधि-पत्र पर दस्तखत करें कि हम वफादार नौकर की तरह अपने राजा की आज्ञा मानेंगे और राज्य प्रबंध को सर्वोच्च एवं सुन्दरतम बनाने की रत्ती भर भी प्रमाद न करेंगे।
लोग समझते हैं कि मन ने हमें ऐसी स्थिति में डाल दिया है कि हमारी वृत्तियाँ हमें बुरी तरह काँटों में घसीटे फिरती हैं और तरह-तरह के त्रास देकर दुखी बनाता है। साधक इन दुखों से छुटकारा पा जावेंगे। क्यों कि वह उन सब उद्गमों से परिचित हैं और वहाँ काबू पाने की योग्यता संपादन कर चुके हैं। किसी बड़े मिल में सैकड़ों घोड़ों की ताकत से चलने वाला इंजन और उसके द्वारा संचालित होने वाली सैकड़ों मशीनें तथा उनके असंख्य कलपुर्जे किसी अनाड़ी को डरा देंगे। वह उस घर में घुसते ही हड़बड़ा जायगा, किसी पुर्जे में धोती फंस गई तो उसे छुड़ा सकने में असमर्थ पावेगा और अज्ञान के कारण बड़ा त्रास पावेगा किन्तु वह इंजीनियर जो मशीनों के पुर्जे पुर्जे से परिचित है और इंजन चलाने के सारे सिद्धान्त को भलीभाँति समझे हुए है उस कारखाने में घुसते हुए तनिक भी न घबरायेगा और गर्व के साथ उन दैत्याकार यंत्रों पर यासन करता रहेगा। जैसा एक महावत हाथी पर और सपेरा भयंकर विषसर्पों पर करता है। उसे इतने बड़े यंत्रालय का उत्तरदायित्व लेते हुए भय नहीं अभिमान होगा। वह हर्ष और प्रसन्नतापूर्वक शाम को मिल मालिक को हिसाब देगा, बढ़िया माल की इतनी राशि उसने थोड़े समय में ही तैयार कर दी है। उसकी फूली हुई छाती पर से सफलता का गर्व मानो टपका पड़ रहा होता है। जिससे अपने ‘अहम’ और वृत्तियों का ठीक-ठीक स्वरूप और संबंध जान लिया है वह ऐसा ही कुशल इंजीनियर यंत्र संचालक है। अधिक दिनों का अभ्यास और भी अद्भुत शक्ति देता है। जागृत मन ही नहीं उस समय प्रवृत्त मन, गुप्त मानस भी शिक्षित हो गया होता है और वह जो आज्ञा प्राप्त करता है उसे पूरा करने के लिए चुपचाप तब भी काम किया करता है जब हम दूसरे कामों में लगे होते हैं या सोये होते हैं। गुप्त मन जब उन कार्यों को पूरा करके सामने रखता है तब नया साधक चौंकता है कि अदृष्ट सहायता है या अलौकिक करामात है। परन्तु योगी उन्हें समझता है कि यह तुम्हारी अपनी अपरिचित योग्यता है, इससे असंख्य गुणी प्रतिभा तो अभी तुम में सोई ही पड़ी है।
संतोष और धैर्य धारण करो। कार्य कठिन है, पर इसके द्वारा जो पुरस्कार मिलना है उसका लाभ बड़ा भारी है। यदि वर्षों के कठिन अभ्यास और मनन द्वारा भी तुम अपने पद, सत्ता, महत्व, गौरव, शक्ति की चेतना प्राप्त कर सको तब भी वह करना ही चाहिए। यदि तुम इन विचारों में हमसे सहमत हो तो केवल पढ़कर ही संतुष्ट मत हो जाओ। अध्ययन करो, मनन करो, आशा करो, साहस करो और सावधानी तथा गंभीरता के साथ साधन पथ की ओर चल पड़ो।
इस पाठ का बीज-मंत्र
—”मैं” सत्ता हूँ। मन मेरे प्रकट होने का उपकरण है।
—”मैं” मन से भिन्न हूँ। उसकी सत्ता पर आश्रित नहीं हूँ।
—”मैं” बुद्धि, वृत्ति, स्वभाव, इच्छा और अन्य समस्त मानसिक उपकरणों को अपने से अलग कर सकता हूँ। तब जो कुछ शेष रह जाता है वह “मैं” हूँ।
—”मैं” अजर अमर, अविकारी और एक रस हूँ।
—”मैं हूँ”—
आपने कष्ट मिटाने में हमारी सेवा स्वीकार कीजिये।
‘आनन्द प्रतिष्ठान, तन्त्र विद्या की उपासना का एक केन्द्र है। इसके साधक तन्त्र विज्ञान की दुरूह क्रियाएं करके जो शक्ति प्राप्त करते हैं, उसे जनहित में बाँट देते हैं। अब यह निश्चित हो चुका है कि योरोप के डॉक्टर मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म, मैगनेटिज्म, मनो विज्ञान आदि के द्वारा लोगों पर जितना असर डालते हैं तन्त्र विज्ञान द्वारा उन सब से कई गुना असर लोगों पर डाला जा सकता है, क्योंकि मैस्मरेजम आदि के जो सिद्धान्त हैं वह सब तो तन्त्र विद्या के भीतर हैं ही, वरन् उससे भी बहुत अधिक बातें उसमें हैं।
मैस्मरेजम आदि की शक्ति स्थूल होने के कारण केवल इतनी ही होती है कि सामने बैठे हुए आदमी पर तात्कालिक असर डाला जा सके। तंत्र-विद्या इससे कहीं सूक्ष्म है। इसकी गूढ़ क्रियाओं द्वारा उत्पन्न किये सूक्ष्म कम्पन इतने शक्तिशाली होते है कि हजारों मील बैठे हुए आदमी पर भी उतना ही असर डालते हैं जितना पास बैठे हुए पर। उन मंत्रों का प्रभाव क्षण भर खेल दिखाकर ही समाप्त नहीं हो जाता वरन् जिसके ऊपर उपचार किया जाता है उसके गुप्त मन में इतना गहरा उतर जाता है कि साधक में शारीरिक तथा मानसिक विचित्र परिवर्तन हो जाते हैं।
‘आनन्द प्रतिष्ठान, ने अपना एक ऐसा कार्यक्रम बना रखा है कि कठिन साधना द्वारा शक्ति को पीड़ितों की सेवा में लगाया जाय और इसके बदले किसी गरीब अमीर से पाई पैसा का कोई ठहराव न किया जाय। अर्थात् लोगों के कष्टों को दूर करने का उपचार बिल्कुल मुफ्त किया जाय। लाभ होने पर बिना माँगे कोई कुछ दे दे तो संतोषपूर्वक उसी से साधक जीवन निर्वाह करें।
तन्त्र विद्या द्वारा कठिन से कठिन शारीरिक रोग, मानसिक रोग, बुरी आदतें, संतान संबंधी चिन्ता, गृह कलह, बुरे दिन, अनिष्ट की आशंका भूत बाधा, अशान्ति आदि का आसानी से उपचार हो सकता है। जिन लोगों को कोई ऐसा रोग है जिससे जिन्दगी को खतरा है उनका हम उपचार करते हैं (अब शारीरिक रोगियों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि उपचारक कठिन परिश्रम के कारण स्वयं बीमार पड़ने लगे हैं। इसलिए शारीरिक रोगों की चिकित्सा के लिए यह नियम बना दिया गया है कि केवल वे ही रोगी पत्र व्यवहार करें जिन्हें जीवन का खतरा है। साधारण छोटे मोटे रोगों के लिए अपने यहाँ के चिकित्सकों से ही इलाज करा लेना चाहिए। हाँ मानसिक रोगों की उपचार व्यवस्था पूर्ववत् ही चालू है। ) स्मरण शक्ति की कमी, सिर में भारीपन, उद्विग्नता, चिन्ता, उदासी, निराशा, निरुत्साह, भय, हीनता की भावना, बुरे कामों की प्रवृत्ति, क्रोध, बुरी आदतें, चिड़चिड़ापन, नींद की कमी आदि मानसिक रोगों के लिए तंत्रोपचार रामबाण है। कुटुम्ब, मित्र या पत्नी से झगड़ा रहता है, संतान नहीं होती, होकर मर जाती है या लड़कियाँ ही लड़कियाँ होती हैं, किसी शत्रु द्वारा अपना अनिष्ट होने की आशंका है, भूत प्रेतादि के उपद्रव होते हैं तो भी इस विद्या द्वारा आश्चर्यजनक लाभ उठाया जा सकता है। एक बात हम स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तंभन आदि पाप-पूर्ण क्रियाएँ किसी के पक्ष विपक्ष में किसी दशा में नहीं करते इसके लिए कोई सज्जन लिखा-पढ़ी न करें। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि तेजी मन्दी का भाव, दड़ा, सट्टा, फ्यूचर, गढ़ा धन, चोरी का माल, भविष्य, हस्तरेखा, जन्मपत्र आदि भी हम नहीं बताते इसलिए कोई महानुभाव इन कामों के लिए भी पूछने ताछने का कष्ट न उठावें।
एक और बात भी समझ रखनी चाहिये कि हमारा उद्देश्य शारीरिक, मानसिक तथा बाहरी कष्टों से अपने भाई बहिनों को बचाने का यत्न करने मात्र का है और इसके लिए मनोविज्ञान के डाक्टरों के मत से विशुद्ध वैज्ञानिक आध्यात्मिक क्रियाओं का ही उपयोग करते हैं। किसी अंधविश्वास, ढोंग, भ्रमजाल के फैलाने का हमारा कोई मन्तव्य नहीं है। स्पष्ट है कि जब हम किसी से कोई ठहराव नहीं करते, फीस नहीं माँगते, रुपये नहीं ऐंठते तो क्यों किसी को धोखे में डालेंगे! और क्यों ढोंग फैलावेंगे।
जिन्हें इस विज्ञान पर विश्वास हो, या कम से कम जितने दिनों इस विज्ञान से लाभ उठावें उतने ही दिन तक परीक्षा के तौर पर जो विश्वास रख सकें वे निःसंकोच बन्द लिफाफे में अपना पूरा विवरण लिख भेजें, हम तुरंत ही उपचार सामग्री भेजेंगे इसके बदले में किसी प्रकार की कीमत नहीं लेंगे। उपचार आरंभ करते समय हमें रोगी की चार चीजों की जरूरत पड़ती है। (1) रोग का कारण, वर्तमान स्थिति और रोगी का वर्तमान समय का पूरा परिचय (2) रोगी फोटो (यह पाँच वर्ष से अधिक पुराना न हो) (3) रोगी के शिखा स्थान (चोटी) के 11 बाल (4) सफेद स्याही सोख (ब्लाटिंग पेपर) पर लटकाया हुआ रोगी के बाँए अंगूठे में से एक बूँद खून। यह चारों चीजें पास होने पर पूरी तरह उपचार आरंभ हो सकता है, यदि फोटो तैयार न हो तो वह पीछे भेजा जा सकता है। यदि रोगी छोटा बालक हो या बहुत डरपोक हो तो खून से भी छुट्टी दी जा सकती है। पर सफलता में जरा देर लग जाती है।
आध्यात्म विद्या की शिक्षा देने की भी व्यवस्था की गई है। जो सज्जन अपनी आध्यात्मिक उन्नति करना चाहते हैं दूसरों की चिकित्सा करने की शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं, अलौकिक और गुप्त बात को जानने की योग्यता प्राप्त करना चाहते हैं, वे निष्कपट भाव से बिलकुल मुफ्त शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। किन्तु उन्हें यह प्रतिज्ञा अवश्य करने पड़ेगी कि वे इस विद्या का उपयोग परोपकार के लिए ही करेंगे। अपनी नीच वासनाओं की पूर्ति या अपना अनुचित स्वार्थ साधन करने के लिए इस विद्या को उपयोग करने वाले लोगों को हमारे द्वारा किसी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने की आशा न करनी चाहिए।
यह पहले ही कहा जा चुका है कि किसी भी उपचार के लिए न तो फीस माँगी जाती है और न ठहराई जाती है न पीछे कोई झगड़ा किया जाता है। कुछ देने न देने में रोगी बिलकुल स्वतन्त्र है। बहुमूल्य रामबाण दवाएं, रसायनें, जड़ी बूटियां, साधना यंत्र, कवच, रक्षा विधान आदि सब चीजें अपने पैसे से बिलकुल मुफ्त भेजते हैं। पर डाक खर्च का भी भार उठाने में हम अभी असमर्थ है। इसके लिए रोगी को ही व्यवस्था करनी पड़ेगी। पत्र के साथ एक आने का टिकट जरूर भेजना चाहिए अन्यथा उत्तर न दिया जा सकेगा।
विज्ञान-सम्मत तन्त्र विद्या के अपूर्व लाभों को उठाने से आप वंचित न रहिये। हमसे अपनी कुछ सेवा लीजिये तो सही, शायद ईश्वर इसी बहाने आपका कुछ भला करने की सोच रहा हो।
पत्र व्यवहार का पता—
आनन्द प्रतिष्ठान, फ्रीगंज, आगरा।
मरुथल तुझको रौंदा सबने ।
छाये छेरे तुझ पर सबने ।
देखे सुख के सपने सबने ।
उखड़ गये पर खेमे सब के बाकी तुझ पर बेल न बूटा।
जब से है यह चला काफिला अब तक इसका तार न टूटा॥
सौदागर सौदा करने को ।
चले लाद सामान नफे को ।
सोने से मुट्ठी भरने को ।
खाली हाथों गये यहाँ से-फिर भी उनका स्वप्न न टूटा।
जब से है यह चला काफिला-अब तक इसका तार न टूटा॥
क्यों आया है कहाँ चला है।
किसको इसका पता चला है।
इसमें किसको मोद मिला है।
किये पड़ाव अनेकों लेकिन-मंजिल का उपहार न लूटा।
जब से है यह चला काफिला-अब तक इसका तार न टूटा॥
सौदा तो तू कर सौदागर।
फूल न पर सौदे को पाकर।
लेकर देना सीख यहाँ पर।
भटकर जायगा पथ से राही- यदि माया से मोह न छूटा।
जब से है यह चला काफिला- अब तक इसका तार न टूटा॥
वही-जिसे कहते ध्रुव तारा।
लिये काफिला जाता सारा।
छाने दो- छाया अंधयारा।
उस पर यदि विश्वास रहा तो सौदागर का भाग न फूटा।
जब से है यह चला काफिला अब तक इसका तार न टूटा॥
*समाप्त*
(श्री. रज्जनलाल प्रधान, एम. ए. मन्दसौर)
पाठक अपने जीवन को सफल बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं। हर आदमी यह चाहता है कि मैं जीवन का फल प्राप्त कर सकूँ, बड़ा बन सकूँ, औरों से मुझमें विशेषताएं हों, जिन कामों को कर सकने में, दूसरे लोग समर्थ नहीं हुए हैं उन्हें मैं संपादित कर सकूँ, उच्च पद प्राप्त कर सकूँ। यह इच्छाएं हर आदमी को सताती हैं। इन्हें पूरा करने के लिए आदमी भरसक कोशिश भी करता है। उसने अपनी लड़की के विवाह में बड़ा दहेज दिया, उसने पुत्र के विवाह में रुपयों की बखेर की, उसने अपने पिता की मृत्यु पर बड़ा भारी भोज दिया, उसने चारों धामों की तीर्थ यात्रा की, उसने अमुक मंदिर की मूर्ति पर सोने का छत्र चढ़वाया, उसने अपने खर्च से कई दिन लोगों के लिए तमाशा करवाया, उसने चांद्रायण व्रत किया, इस प्रकार के काम हम रोज सुनते और देखते हैं। करने वाला इनमें काफी त्याग करता है, कष्ट उठाता है, उदारता प्रकट करता है और अपनी सुख सामग्री में कमी कर लेता है। यहाँ इस बात पर बहस नहीं है कि इन कार्यों का क्या फल होता है। धन से उच्च पद मिलता है या नहीं। कर्म का फल मिलता है यह बात निर्विवाद है।
उपरोक्त पंक्तियों का तात्पर्य इतना ही है कि महत्ता प्राप्त करने की उम्र आकाँक्षा हम धारण किये हुए हैं। कितनी ही अविकसित दशा में, कितनी ही पिछड़ी परिस्थितियों में हम हों यह दैवी प्रेरणा हर घड़ी भीतर ही भीतर नोंचती रहती है। जिसका ज्ञान जितना है या जो जैसी परिस्थिति में प्रसन्न है, उसे उसी के अनुसार अपना कार्यक्रम बनाना पड़ता है। हम उस मोटर के समान हैं जिसका पहिया हर घड़ी घूमता रहता है। ड्राइवर उसे अपनी इच्छानुसार चाहे जहाँ ले जा सकता है। इच्छा करते ही वह पूरब, पच्छिम, उत्तर, दक्खिन, चाहे जिधर की सड़क पर सरपट दौड़ लगा सकती है। महत्व कामना दबाई नहीं जा सकती क्योंकि वह मनुष्य का धर्म और दैवी प्रेरणा है।
ईश्वरीय नियम है कि तुम्हें आगे बढ़ना पड़ेगा। संसार चक्र आगे बढ़ रहा है, नन्हे बालक, पौधे, घास-पात, कीड़े-मकोड़े, वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी, आकाश आग बढ़ने के लिए सब को घसीटा जा रहा है। इस सृष्टि की धारा ही ऐसी है। वृद्धि, उन्नति, विकास इसका धर्म है। बढ़ो, बढ़ो, बढ़ो, जर्रे जर्रे से यही आवाज आ रही है बढ़ो! आगे बढ़ो! उस घूमते हुए पहिये को ध्यान से देखो, क्या वह निरंतर आगे नहीं बढ़ रहा है? जब तुम किसी भौतिक विज्ञानी से विकासवाद के संबंध में पूछने जाओगे तो वह तुम्हें विस्तारपूर्वक बतायेगा कि आगे बढ़ने का निश्चित परिणाम घूमना है। तुम यदि लगातार चलते ही रहो तो घूमकर वहीं आ जाओगे जहाँ से चले थे। पृथ्वी, सूर्य, नक्षत्र, आदि सब चल रहे हैं इसलिए घूम रहे हैं। वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हो गया है कि प्रकृति का प्रत्येक परमाणु घूम रहा है अर्थात् वह बिना ठहरे आगे की ओर बढ़ता जा रहा है। ध्यानपूर्वक सुनलो, अच्छी तरह समझलो, भली प्रकार अनुभव कर लो कि तुम बढ़ रहे हो, एक निश्चित चेतना द्वारा तुम्हारे मन को बढ़ने के लिए अग्रसर किया जा रहा है। फिर भी उसकी गति किस ओर हो यह बात तुम्हारे ही ऊपर छोड़ी गई है। ईश्वर ने एक गतिवान यंत्र देकर जीव को इस चतुर्मुखी दुनिया में घूमने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया है।
जिस मोटर का पहिया बराबर घूम रहा हो और उसका ड्राइवर यदि उसे चाहे जिस ओर चला जाने दे तो वह कहाँ जा पहुँचेगा? जिस सड़क पर वह दौड़ लगा रहा है वह कहाँ पहुँचेगी इस बात की जानकारी उसे रखनी चाहिये। सड़क साफ है, मुझे पसन्द है, इस पर बहुत से आदमी चल रहे हैं, इन्हीं तर्कों के आधार पर जो अपना कार्यक्रम बना लेते हैं वे अंधेरे में हैं और वे उस अन्धे के समान हैं जो बिना सोचे विचारे चाहे जिधर को कदम उठाता जा रहा है। ऐसे सारथी को क्या कहा जाय जो चलती हुई सड़क को देखकर अपना रथ भी उसी पर डाल देता है। कहीं तुम भी ऐसे ही संचालक तो नहीं हो।
जीवन केन्द्र जहाँ से आरंभ होता है वहीं से हजारों लाखों पगडंडियाँ निकलती हैं। यह मत स्वातन्त्र्य के भेद से विभिन्न दिशाओं को जाती हैं। नीच उद्देश्य, पाशविक वासना और भोगेच्छा की पगडंडियाँ हरी भरी मालूम होती हैं। थोड़ी ही दूरी पर सब्जबाग दिखाई देते हैं। इसलिए ललचा कर हरे भरे खेतों में पिल पड़ने वाली भेड़ों की तरह हम में से अधिकाँश लोग उधर पिल पड़ते हैं और इस बात को भूल जाते हैं कि इसका परिणाम क्या होगा? ऐसी हरकत करने वाली दूसरी भेड़ों को किसान द्वारा लाठियों से पीटे जाते उन्होंने देखा होता है किन्तु अपनी पीठ पर धमाका हुए बिना उनकी जड़ता दूर नहीं होती। उच्च उद्देश्यों के मार्ग उतने लुभावने नहीं है। हमारी जड़ता दूर पर खड़े हुए अमृत फलों को नहीं देख पाती और पास की कठिनाइयों एवं कम चलने वाले रास्ते को देखकर निराश हो जाती है। ऐसी जड़ता और अदूरदर्शिता भेड़ों को ही शोभा देती है। कहीं तुम भी ऐसी ही भेड़ तो नहीं हो?
निरंतर चलने वाले प्रकृति चक्र में हम अपना कौन सा स्थान ग्रहण कर रहे हैं और हमारा विकास रथ किस मार्ग पर चला जा रहा है? क्या इस बात को सोचने की तुम कोई जरूरत नहीं समझते? जीवन जैसा बहुमूल्य भण्डार किन कामों में खर्च हो रहा है क्या इसका हिसाब रखना तुम्हारी दृष्टि में व्यर्थ है? अखंड ज्योति के पाठकों से मैं ऐसी आशा नहीं कर सकता। मेरा विश्वास है कि वे अपनी स्थिति के बारे में कुछ अधिक जानने के लिए प्रयत्नशील होंगे। इस देव दुर्लभ मानव शरीर में विचार शक्ति ही मुख्य है। शास्त्र कहता है ‘मनानत् मनुष्य’ अर्थात् मनन करने से ही मनुष्य है। हम सोच विचार सकते हैं यही हमारी विशेषता है। कितनी गुत्थियों को हमारा मस्तिष्क सुलझाता है। किसी में झगड़ा हो रहा है तुम जाकर शान्त करते हो, आर्थिक कठिनाई का हल निकालते हो, असंतुष्ट लोगों को संतुष्ट करते हो। सामाजिक प्रथाओं में परिवर्तन करते हो, विद्या प्राप्त करते हो, नई व्यापारिक योजनाएं बनाते हो, गुप्त मंत्रणाएं करते हो, षडयंत्र रचते हो, ऐसे ऐसे पेचीदा मामलों को समझते हो, उनका स्वरूप निर्माण करते हो और वह वह तरकीबें सोचते हों जिन्हें देखकर दंग रह जाना पड़ता है। इतनी योग्यता रखते हुए भी ऐ मेरे अभिन्न! अपने बारे में कुछ क्यों नहीं सोचते कि तुम क्या हो? कैसे हो? क्या कर रहे हो? कहाँ जा रहे हो?
बाहरी कार्यों में जितना प्रयत्न करते हो उसका एक अंश अपने लिये भी करो। दूसरों की हजामत बना कर अपना मतलब गाँठने में तो तुम बड़े प्रवीण हो, इस कला में काफी निपुणता प्राप्त कर चुके हो, पर तथ्य के स्थान पर आकर क्यों गड़बड़ा जाते हो। उसकी जेब तो बड़ी सफाई से काट लाये पर मिले हुए द्रव्य को इसके घर में क्यों पटक दिया? तुम तो बहुत सयाने हो पर यहाँ चौकड़ी क्यों भूलते हो? होशियारी बहुत अच्छी चीज है। कमाऊ पूत होना बहुत बढ़िया काम है। हर किसी से अपना मतलब निकाल लेना तुम्हें आता है। पर मेरे अच्छे भाई, उसे क्यों नहीं पहचानते जो तुम्हारी भी जेब काट लेता है और अपने मतलब के लिये तुम्हारा वैसा ही उपयोग करता है जैसे मदारी, एक चालाक बन्दर से खूब नाच-कूद करवाता है और उसकी कमाई को खुद हजम कर जाता है। तुम्हारी होशियारी की परीक्षा का स्थल यह है। यहाँ फेल होकर तुम उस गधे के उदाहरण बनते हो जिसने सारे दिन सुभोज्य पदार्थ लादे थे किन्तु शाम को सड़े गले भूसे पर बाँध दिया गया था।
हम लोग अपने को भूल जाते हैं अपने घर को ठीक तरह नहीं पहचानते इसलिये कठिन श्रम साध्य अपनी कमाई दूसरों के घर पटक आते हैं। इसे कैसी चालाकी, बुद्धिमानी, होशियारी समझें जरा तुम्हीं मुझे समझाओ।
चलो, उठो, उस एकान्त कोठरी में चले जाओ और अपने शरीर व मन को शान्त करके अपने बारे में विचार करो, सोचो, मनन करो कि हमारी प्रगति किस दिशा में हो रही है, हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं, हमारी मोटर किस सड़क पर दौड़ी जा रही है, खेत के चरने का क्या परिणाम होगा। जिस प्रकार एक गहरे षड़यंत्र का सुराग लगाया जाता है वैसे ही पता लगाओ कि हम अपना जीवन रूपी अमूल्य निधि खर्च करके जो कमाते हैं वह हमारे ही पास रहता है या बीच में ही हड़प लिया जाता है? अपने बारे में पूरी तरह से विचार करो तो तुम्हें बहुत नई बातें मालूम होंगी और समझ सकोगे कि किस तरफ बढ़ रहे हो किन्तु वास्तव में किस तरफ बढ़ना चाहिए था।
(प्रेषक—एक श्रोता)
ईश्वर घट घट में समाया हुआ है। फिर मनुष्यों में विपरीत स्वभाव क्यों देख पड़ते हैं? एक पुण्य कार्यों में प्रवृत्त है तो दूसरा पाप कर रहा है। इसका कारण यह है कि पापी पुरुष अपनी इन्द्रियों को सब कुछ सौंप देता है किन्तु पुण्य कर्मों में प्रवृत्त मनुष्य ने अपना सर्वस्व परमात्मा के सुपुर्द कर दिया होता है।
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मनुष्य के सामने दो मार्ग हैं एक श्रेय दूसरा प्रेय। जो श्रेय मार्ग—परमात्म पथ की ओर चला उसने अपने सब पाप ताप धो डाले और मुक्त हो गया किन्तु जिसने प्रेय मार्ग दुनियादारी को अपनाया वह उसी में उलझ गया और दुःख से छटपटाने लगा।
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लोग भक्ति की अपेक्षा ज्ञान को अधिक महत्व देते हैं। वे समझते हैं कि बिना ज्ञान के भक्ति न कर सकेंगे? यह भ्रम है। दुनिया में लोग जिन चीजों से प्रेम करते हैं क्या पहले उनका पूरा ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं? भक्ति का ऊँचा दर्जा है। जो अनन्य भाव से भगवान की भक्ति करता है उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं। ईश्वर का भक्त अज्ञानी नहीं रह सकता।
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ज्ञानी और अज्ञानी के साधारण कार्यों में बहुत अधिक अन्तर नहीं होता। शरीर यात्रा के कार्य प्रायः दोनों को ही करने पड़ते हैं। फिर भी उनमें एक आनन्द मनाता है और दूसरा दुखी होता है। क्योंकि दोनों में वस्तु का वास्तविक रूप समझने में मतभेद होता है। ज्ञानी पुरुष संसार और साँसारिक वस्तुओं को मिथ्या समझता हुआ उपयोग करता है और निर्लिप्त रहता हुआ आनन्द मनाता है। इसके विपरीत अज्ञानी पुरुष, संसार को सत्य मानता है और उसकी भोग्य वस्तुओं में लिप्त होकर दुःख उठाता है।
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माता कितनी दयालु होती है। गोदी में चढ़ने के लिए ललचाते हुए बच्चे को उठाकर वह छाती से लगा लेती है। भगवान माता से भी अधिक दयालु हैं। जो भक्त उनके चरणों से लिपटने को कटिबद्ध हो जाता है वह ठुकराया नहीं जाता। उसे अपना लिया जाता है।
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एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं। जब तक हृदय मन्दिर में बुरी वासनाओं, पाप और कल्मषों की पूजा हो रही है तब तक धर्म और ईश्वर भक्ति को वहाँ स्थान नहीं मिल सकता है। जब हृदयासन पर परमात्मा को बिठाया जाता है तो दुष्वृत्तियां नहीं ठहर सकतीं।
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शास्त्र कहता है—”नायमात्मा बल हीनेन लभ्यः” इस आत्मा की बल हीन को प्राप्ति नहीं होती। आत्म ज्ञान के लिए बलवान बनने की आवश्यकता है। जिन्हें प्रभु को प्राप्त करना हो वह सब प्रकार का श्रेष्ठ बल प्राप्त करें।
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निर्मल हृदय शिष्य, दर्पण के समान है। जब वह अपने मन को निर्मल करके गुरु के समीप उपस्थित होता है तो उसे अपने हृदय में गुरु का सारा ज्ञान प्रतिबिम्बित हुआ प्रतीत होने लगता है ऐसा गुरु-भक्त शिष्य अल्प श्रम में ही तत्व को प्राप्त कर लेता है।
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पोथी रटने, माला घिसने और शरीर को सुखाने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो जाती। ईश्वर प्राप्ति जीव को करनी होती है। जो जीव अपने को अहिर्निश ईश्वर चिन्तन में लगाये रहता है वही परम पद को पाता है।
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संसार के माया मोह से बचने के इच्छुक भक्त को चाहिए कि दुनिया की सब वस्तुओं में ईश्वर को रूप देखे। ऐसा विचार करता रहे कि यह सब परमात्मा के ही रूप हैं। ऐसा करने से ममता नहीं सताती।
(महात्मा—गाँधी)
हमारे व्रतों में तीसरा स्थान ब्रह्मचर्य का है। हकीकत तो यह है कि दूसरे सब व्रत एक सत्य के व्रत में से ही उत्पन्न होते हैं और उसी के लिये रहे हैं। जो मनुष्य सत्य का प्रण किये हुए है, उसी की उपासना करता है, वह यदि किसी भी दूसरी चीज की आराधना करता है तो व्यभिचारी ठहरता है। तो फिर विकार को आराधना क्योंकर की जा सकती है? जिसकी सारी प्रवृत्ति एक सत्य के दर्शन के लिये है, वह सन्तान पैदा करने या गृहस्थी चलाने के काम में क्यों कर पड़ सकता है। भोगविलास द्वारा किसी को किसी को सत्य की प्राप्ति हुई हो, ऐसी एक भी मिसाल हमारे पास नहीं।
अहिंसा के पालन को लें तो उसका सम्पूर्ण पालन भी ब्रह्मचर्य के बिना अशक्य है। अहिंसा के मानी हैं, सर्वव्यापी प्रेम। पुरुष के एक स्त्री को या स्त्री के एक पुरुष को अपना प्रेम अर्पण कर चुकने पर उसके पास दूसरे के लिये क्या रहा? इसका तो यही मतलब हुआ कि ‘हम दो पहले और दूसरे सब पीछे। पतिव्रता स्त्री पुरुष के लिये और पत्नीव्रता पुरुष स्त्री के लिये सर्वस्व होमने को तैयार होगा, यानी इससे यह जाहिर है कि उससे सर्व व्यापी प्रेम का पालन हो ही नहीं सकता। वह सारी सृष्टि को अपना कुटुम्ब कभी बना नहीं सकता, क्योंकि उसके पास उसका अपना माना हुआ कुटुम्ब है। या तैयार हो रहा है। जितनी उसमें वृद्धि होगी, सर्वयायी प्रेम में उतनी ही बाधा पड़ेगी। हम देखते हैं कि सारे जगत में यही हो रहा है। इसलिये अहिंसा व्रत का पालन करने वाला विवाह कर नहीं सकता, विवाह के बाहर के विकार की तो बात ही क्या?
तो फिर जो विवाह कर चुके हैं, उनका क्या हो? उन्हें सत्य किसी दिन नहीं मिलेगा? वे कभी सर्वार्पण नहीं कर सकेंगे? हमने इसका रास्ता निकाला ही है। विवाहित अविवाहित सा बन जाय। इस दिशा में इस-सा सुन्दर अनुभव और कोई मैंने किया नहीं। इस स्थिति का स्वाद जिसने चखा है, वह इसकी गवाही दे सकता है। आज तो इस प्रयोग की सफलता सिद्ध हुई कही जा सकती है। विवाहित स्त्री-पुरुष का एक दूसरे को भाई बहन मानने लगना, सारी झंझटों में मुक्त होना है। संसार भर की सारी स्त्रियाँ बहनें हैं, माताएँ हैं, लड़कियाँ हैं, यह विचार ही मनुष्य को एकदम ऊंचा उठाने वाला है, बन्धन से मुक्त करने वाला है। इससे पति-पत्नी कुछ खोते नहीं उलटे अपनी पूँजी बढ़ाते हैं। कुटुम्ब-वृद्धि करते हैं। विकार रूपी मैल को दूर करने से प्रेम भी बढ़ता है; विकार नष्ट होने से एक दूसरे की सेवा भी अधिक अच्छी हो सकती है। एक दूसरे के बीच कलह के अवसर कम होते हैं। जहाँ प्रेम स्वार्थी और एकाँगी है, वहीं कलह की गुंजाइश ज्यादा है।
इस मुख्य बात का विचार करने के बाद और इसके हृदय में ठंस जाने पर ब्रह्मचर्य से होने वाले शारीरिक लाभ, वीर्य-लाभ आदि बहुत गौण हो जाते हैं। इरादतन भोग विलास के लिये वीर्य हानि करना और शरीर को निचोड़ना कैसी मूर्खता है। वीर्य का उपयोग तो दोनों की शारीरिक मानसिक शक्ति को बढ़ाने में है। विषय भोग में उसका उपयोग करना उसका अति दुरुपयोग है और इस कारण वह कई रोगों का मूल बन जाता है।
ब्रह्मचर्य का पालन मन, वचन और काया से होना चाहिये। हर व्रत के लिये यही ठीक है। हमने गीता में पढ़ा है कि जो शरीर को काबू में रखता हुआ जान पड़ता है, पर मन से विकार का पोषण किया करता है, वह मूढ़ मिथ्याचारी है। सब किसी को इसका अनुभव होता है। मन को विकारपूर्ण रहने देकर शरीर को दबाने की कोशिश करना हानिकर है। जहाँ मन है, वहाँ अन्त को शरीर भी घसीटाये बिना नहीं रहता। यहीं एक भेद समझ लेना जरूरी है। मन को विकारवश होने देना एक बात है और मन को अपने आप अनिच्छा से, बलात् विकार को प्राप्त होना या होते रहना, दूसरी बात है। इस विकार में यदि हम सहायक न बनें तो आखिर जीत हमारी ही है। हम प्रति पल यह अनुभव करते हैं कि शरीर तो काबू में रहता है, पर मन नहीं रहता। इसलिये शरीर को तुरन्त ही वश में कर के मन को वश में करने की रोज कोशिश करने से हम अपने कर्तव्य का पालन करते हैं—कर चुकते हैं। यदि हम मन के अधीन हो जायें तो शरीर और मन में विरोध खड़ा हो जाता है, मिथ्याचार का आरम्भ हो जाता है। पर कह सकते हैं कि जब तक मनोविकार को दबाते ही रहते हैं तब तक दोनों साथ-साथ चलते हैं।
इस ब्रह्मचर्य का पालन बहुत कठिन, लगभग, अशक्य ही माना गया है। इसके कारण का पता लगाने से मालूम होता है कि ब्रह्मचर्य का संकुचित अर्थ किया गया है। जननेन्द्रिय-विकार के निरोध को ही ब्रह्मचर्य का पालन माना गया है। मेरी राय में वह अधूरी और खोटी व्याख्या है। विषय मात्र का निरोध ही ब्रह्मचर्य है। जो और-और इन्द्रियों को जहाँ तहाँ भटकने देकर केवल एक ही इन्द्रिय को रोकने का प्रयत्न करता है, वह निष्फल प्रयत्न करता है, इसमें शक ही क्या है? कान से विकार की बातें सुनना, आँख से विकार उत्पन्न करने वाली वस्तु देखना, जीभ से विकारोत्तेजक वस्तु चखना, हाथ से विकारों को भड़काने वाली चीज को छूना और साथ ही जननेन्द्रिय को रोकने का प्रयत्न करेगा, यह तो आग में हाथ डालकर जलने से बचने का प्रयत्न करने के समान हुआ। इसलिये जो जननेन्द्रिय को रोकने का निश्चय करे उसे पहले ही से प्रत्येक इन्द्रिय को उस-उस इन्द्रिय के विकारों से रोकने का निश्चय कर ही लिया होना चाहिये। मैंने सदा से यह अनुभव किया है कि ब्रह्मचर्य की संकुचित व्याख्या से नुकसान हुआ है। मेरा तो यह निश्चय मत है, और अनुभव है कि यदि हम सब इन्द्रियों को एक साथ वश में करने का अभ्यास करें-रफ्त डालें तो जननेन्द्रिय को वश में करने का प्रयत्न शीघ्र ही सफल हो सकता है, तभी उसमें सफलता प्राप्त की जा सकती है। इसमें मुख्य स्वाद इन्द्रिय है। इसीलिये उसके संयम को हमने पृथक स्थान दिया है। उसका अगली बार विचार करेंगे।
ब्रह्मचर्य के मूल अर्थ को सब याद रक्खें। ब्रह्मचर्य अर्थात् ब्रह्म की-सत्य की शोध में चर्चा, अर्थात् तत्संबंधी आचार। इस मूल अर्थ से सर्वन्द्रिय-संयम का विशेष अर्थ निकलता है। सिर्फ जननेन्द्रिय-संयम के अधूरे अर्थ को तो हम भुला ही दें।
(पं॰ गोविन्द, रघुनाथ दांडे, पूना)
जीव की युगों पुरानी यह प्यास अभी तृप्त नहीं हो पाई है कि वह ईश्वर को प्राप्त करे। किसी धन कुबेर पिता का पुत्र भटक कर दूर देश चला जाय और तरह-तरह के कष्टों से दुखी हो तो वह बड़ी उत्सुकता पूर्वक यह बात चाहेगा कि मैं अपने पिता के पास पहुँच जाऊँ और उस अपार संपदा को प्राप्त करूं जिसका मैं अधिकारी हूँ। जीव, ईश्वर का पुत्र और उसका उत्तराधिकारी है। अपने पिता के अतुलित वैभव प्राप्त करने का उसकी उत्कृष्ट अभिलाषा का होना स्वाभाविक ही है।
जीव, वासनाओं के जाल में बुरी तरह जकड़ गया है, किंकर्तव्यविमूढ़ होकर वह ऐसी दशा को प्राप्त हो गया है जहाँ से उसे कुछ ठीक-ठीक सूझ नहीं पड़ता है कि वह क्या है? कहाँ है? और किस प्रकार है? इस भ्रमपूर्ण अवस्था में वह सब वस्तुओं का स्वरूप ठीक तौर से समझने में असमर्थ हो रहा है। ईश्वर के संबंध में भी यही बात है।
मनुष्य, शरीर को ‘मैं” समझता है उसके एक जन श्रुति ऐसी अवश्य सुन रखी होती है कि आत्मा शरीर से भिन्न है परन्तु इस पर उसका विश्वास नहीं होता। हम सब शरीर को ही यदि आत्मा न मानते होते तो यह भारत भूमि दुराचारी का केन्द्र न बन गई होती। गीता में भगवान कृष्ण ने अपना उपदेश आरम्भ करते हुए अर्जुन को यही दिव्य ज्ञान दिया है “तू, देह नहीं है।” आत्म स्वरूप को जिस प्रकार विस्मरण कर दिया गया है उसी प्रकार ईश्वर को भी दृष्टि से ओझल कर दिया गया है। हमारे चारों ओर जो घोर अज्ञानाँधकार छाया हुआ है उसके तम तोम में कुछ और ही वस्तुएं हमारे हाथ लगी हैं और उन्हें ही ईश्वर मान लिया है। रस्सी का साँप मान लेने का उदाहरण प्रसिद्ध है। रस्सी का स्वरूप कुछ कुछ सर्प से मिलता जुलता है। अंधेरे के कारण ज्ञान ठीक प्रकार काम नहीं करता, फलस्वरूप भ्रम सच्चा मालूम होता है। रस्सी सर्प का प्रतिनिधित्व भली प्रकार करती है। इस गड़बड़ी के समय में ईश्वर के स्थान पर शैतान विराजमान हो गया है और उसी को हम लोग पूजते हैं।
आत्मा पंच तत्वों से सूक्ष्म है। पंच तत्वों के रसों को इन्हीं तत्वों से बना हुआ शरीर भोग सकता है। आत्मा तक कडुआ मीठा कुछ नहीं पहुँचता। वह तो केवल इन्द्रियों की तृप्ति अतृप्ति को अपनी तृप्ति मानती भर है। मायाजाल, या गाँठ जो कुछ है यह मानना भर है। मिठाई से जीभ सन्तुष्ट होती है पेट पचाता है और मल रूप उसे बाहर निकाल फेंका जाता है। पंच तत्व आत्मा की गहराई तक नहीं पहुँच सकते और क्योंकि तत्व स्थूल और आत्मा सूक्ष्म है। ईश्वर आत्मा से भी सूक्ष्म है। जीव और ईश्वर का मिलन, चुम्बन, आलिंगन एक विशेष प्रकार का है। यह आनन्द ऐसा नहीं है जैसा रंडी का नाच देखने या पकौड़ियों की चाट खाने में आता है। जैसे दो भैंसों के लड़ पड़ने से हमारे शरीर को कोई आघात नहीं पहुंचता उसी प्रकार बाहरी स्थूल पदार्थ जीव तक अपनी अनुभूति नहीं पहुँचा सकते।
उपरोक्त पंक्तियों का तात्पर्य यह है कि ईश्वर अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण भौतिक पदार्थों के देने लेने में हस्तक्षेप नहीं करता। एक निश्चय क्रम के अनुसार भौतिक तत्व आपस में मिलते और टूटते रहते हैं। उनकी भिन्न-भिन्न मात्राओं की स्फुरणा भिन्न-भिन्न होती है। तत्वों की मूल शक्ति भी ईश्वर में ही निहित है। परन्तु वह लोगों को प्रसन्न अप्रसन्न करने के लिए अपनी एकरसता में अन्तर नहीं आने देता। प्रकृति का पहिया घूमता रहता है। बिजली का संचालक यंत्र चलता रहता है। उसमें आटा पीसना और कुट्टी कूटना लोगों की इच्छा पर निर्भर है। जानकारी और सावधानी होने पर सफलता और इसके विपरीत दशा में असफलता प्राप्त करने का भार लोगों के ऊपर छोड़ा गया है, बिजली की धारा इस झमेले से कुछ परे रहना चाहती है।
ईश्वर एक अखण्ड चेतना है। जीव उसका पुत्र है। दोनों एक दूसरे से मिल सकते हैं, एक दूसरे की सत्ता का उपयोग कर सकते हैं। जीव ईश्वर को शक्ति प्राप्त करके अपने को भौतिक वेदनाओं से छूटने की योग्यता प्राप्त कर सकता है। बिना इस योग्यता का तात्विक स्फुरणा रोक रखना या बदल देना नहीं हो सकता। बिना जानकारी के प्राप्त किये जो बिजली की मशीन को रोकने के लिए हाथ डालेगा वह असफल होगा और खतरा उठायेगा। विद्युत यंत्र के सम्मुख नाक रगड़ कर यह कहने से कि श्रीमान जी आप चल पड़िये और मेरा अमुक काम कर दीजिए कुछ भी प्रयोजन न निकलेगा। उसे रिश्वत का लालच देना भी वैसा ही होगा। क्योंकि बिजली जिस प्रकार की चेतना है उसे उसी जाति के पदार्थों की प्राप्ति हो सकती है। लड्डू और मालपुओं का भोग उसे चलाने में असमर्थ है। हाँ, उत्तम कोटि के यंत्र लगा देने से अधिक फल प्राप्त किया जा सकता है।
हम में स्वयं अनेक विकार भरे हैं। अपना मुँह ही दर्पण में भी देखते हैं। ईश्वर को भी अपने ही जैसा विकारी मानते हैं। जो हमारी बहुत खुशामद और तारीफ करता है उससे हम प्रसन्न हो जाते हैं और कुछ चीजें कृपापूर्वक दे देते हैं, जो भिखारी हमारे दरवाजे पर अड़कर बैठ जाता है उसे कुछ दाने डाल कर बला टाल देते हैं। जो हमें रिश्वत दे देता है उसका काम खुशी खुशी चला देते हैं। इन्हीं आदतों को ईश्वर में देखना चाहते हैं ईश्वर पूजा का भी आज यही रूप है। मुकदमा जीत जावें, लड़ाई में विजय हो, या मिल जाय, बीमारी दूर हो जाय, पुत्र उत्पन्न हो, परीक्षा में पास हो जायँ, विवाह हो जाय, बैकुण्ठ मिल जाय, मुक्त हो जायँ, आदि इच्छाओं की पूर्ति ईश्वर से चाही जाती है। अपने तक ही यह कामना सीमित नहीं रहती वरन् अपने बेटे, पोतों, कुटुम्बी, रिश्तेदारों, यार दोस्तों के लिए भी यही चीजें चाही जाती हैं। स्तोत्र-पाठ करते समय ईश्वर की तारीफ करते हैं कि तुम ऐसे हो तुम वैसे हो। तुमने रावण मारा, तुमने कंस मारा, तुमने सुदामा को सोने के महल दिये, नरसी को हुंडियां दीं, अमुक को अमुक चीज दी। सो तुम मुझे भी वह सब वस्तुएँ दे दो। मानो हम भाई हैं और ईश्वर कोई जमींदार है, जिसको प्रशंसा के कवित्त सुना-सुना कर इस बात के लिए रजामंद किया जा रहा है कि वह प्रसन्न होकर इसके बदले में कुछ धन दौलत दे दे। रिश्वत देने में भी हम क्यों चूकने लगे। तुम्हारी कथा कहलवायेंगे, तुम्हारा प्रसाद बाँटेंगे, तुम्हारे अमुक तीर्थ में दर्शन करेंगे, तुम्हारा मंदिर बनवाएंगे, छत्र चढ़ायेंगे, ब्राह्मण भोजन करावेंगे, मानों ईश्वर कोई बे घर बार का और भूखा प्यासा घूम रहा है जिसके लिये आप कृपापूर्वक घर बनवाएंगे और खाना खिलावेंगे। ऐसा कहते समय, ईश्वर को हम रिश्वतखोर हाकिम की तरह देखते हैं जिससे ऐसी आशा की जाती है कि भेंट पूजा कर देने पर जुर्मों को माफ कर देगा और कष्टों में पड़ने से बचा लेगा।
कुछ लोग डर के मारे ईश्वर को पूजते हैं। वे देखते हैं कि जबरदस्त का काम ही छोटों को सताना है। उस गाँव का जमींदार बात की बात में जूतों से पिटवा देता है। दरोगा जी नाराज होते ही किसी मामले में फँसा देते हैं। इसलिए उनका विरोध न करके हाँ हुजूरी करनी चाहिए जिससे सब राग बवाल से बचे रहे। ईश्वर को वे बहुत बलवान सुनते हैं। दरोगा जमींदार, शेर आदि से भी बलवान!! तो डर के मारे वे ईश्वर के सामने गिड़गिड़ाते रहते हैं कि ‘हे महाबली ईश्वर महाराज! अपने बल की आज़माइश मुझ पर मत कर बैठना जिसमें में बेचारा निर्दोष कुचल जाऊँ।’ डर के मारे वे तरह तरह से पूजा पत्री कर के उसे रिझाते हैं और फुसलाकर किसी प्रकार काम निकाल लेने की बात सोचते हैं। जो अपने को कुछ अधिक ज्ञानी समझते हैं कि रुपया, पैसा, औरतें आदि तो नहीं माँगते पर जन्म मृत्यु के डर के मारे उसके पाँव पलोटते हैं। मोक्ष की दरख्वास्त लेकर ईश्वर की कचहरी के चक्कर काटते हैं।
खुले शब्दों में कहने पर यह बातें बहुत कड़वी लगेंगी परन्तु आपको सोचना होगा कि आपकी पूजा सचमुच कहीं ऐसी ही तो नहीं है। आप को ईश्वर के नाम पर पूजा, भक्ति, यज्ञ, जप, तप, व्रत, दान, त्याग आदि करते हैं कि ईश्वर को फुसलाकर भौतिक वस्तुएं माँगने के लिए? अपनी कमजोरी को बारीकी के साथ पहचानिये यदि उपरोक्त बातें या उन से मिलती जुलती कोई भौतिक भावना से भजन हो रहा है तो वह स्थूल है, भौतिक है, ईश्वर तक उसकी पहुँच नहीं हो सकती। बदले का सौदा शैतान के यहाँ होता है। पैसे लेकर वेश्या आनंद प्रदान कर सकती है सती साध्वी नहीं। बदले पाने के लिए आप कुछ धार्मिक लेन देन करते हैं। कीजिए, फल मिलेगा। पर इतना स्मरण रखिये, यह खरीद फरोख्त ईश्वर की दुकान से नहीं हो रही है।
(आचार्य टी. एन. अप्पा, बंगलौर)
यह एक सचाई है कि मनुष्य जीवन की रीढ़ धर्म है। धर्म के बिना मनुष्य, मनुष्य नहीं रह सकता। धर्म तत्व को यदि अपने जीवन में से निकाल डालें तो हम इतने भयंकर प्राणी हो जावें जितने सिंह, व्याघ्र, सर्पादि सहस्रों वर्षों में भी नहीं हो सकते। क्योंकि संसार के हिंसक जीवों की बुद्धि का विकास इतना नहीं हुआ है। मानवी बुद्धि के सामने यदि अधर्म ही एक वस्तु रह जाय तो भूतल अग्नि की सी दाहकता ग्रहण करले और सुख शान्ति नामक वस्तु इसे स्वप्न में भी उपलब्ध न हो सकें।
संसार में असंख्य मजहब दिखाई पड़ते हैं यह सब सच्चे धर्म की धुँधली तस्वीरें हैं। सब की धुरी सत्य के किसी अंश पर टिकी हुई है, परन्तु फिर भी उनमें से कोई पूर्ण सत्य तक नहीं पहुँच सका है। सभी अधूरे और अपूर्ण हैं। यदि ऐसा न होता तो एक धर्म को ग्रहण करके लोग पूर्ण संतुष्ट हो सकते थे। वर्तमान मजहबों में से किसी से भी लोग सन्तुष्ट नहीं है और उसके अनुयायी दिन प्रतिदिन विद्रोही होते जाते हैं। सच तो यह है मनुष्य का दिन प्रतिदिन विकास होता जा रहा है और साथ ही साथ सत्य, हित, सौंदर्य एवं आनन्द की इच्छा तीव्र होती जाती है। इस युग में पुराने जमाने की बैलगाड़ी भद्दी मालूम होती है और उसके स्थान पर साइकल, मोटर, रेल, जहाज आदि यन्त्रों का उपयोग बढ़ता जाता है। इसी प्रकार धर्म के नाम पर प्रसारित हुए मजहबों की स्थिति में भी परिवर्तन हो रहा है। इतने मजहबों के बढ़ जाने का कारण यह है कि जैसे जैसे बुद्धि और विचारों में परिवर्तन पैदा हुआ वैसे ही वैसे सामाजिक व्यवस्था एवं परिस्थितियों में लौट फेर हुआ, तदनुसार पुराने मजहब अनुपयुक्त जँचने लगे और आवश्यकता ने नये मजहबों को जन्म दिया। हेर फेर का यह क्रम आज भी जारी है। यह शताब्दी विज्ञान का युग है। वैज्ञानिक अन्वेषणों ने हमारी जीवन धारा को ही बदल दिया है। तब क्या मजहब उससे अछूते रह सकते हैं। साइंस ने प्राचीन किम्वदंतियों का तिरस्कार और बहिष्कार कर दिया है। मजहबों के विरुद्ध हर एक दिल में एक हलका सा प्रतिद्वन्दी खड़ा हो गया है। रूस-पृथ्वी के पाँचवें भाग से तो उसे देश निकाला ही दे दिया गया है। अगणित संगठित आन्दोलन मजहबों के विरुद्ध प्रचार कर रहे हैं। समाज भय के कारण खुले रूप में किसी को कुछ कहने का साहस भले ही न हो पर सन्देह और अविश्वास का कोई अंश मन में अवश्य छुपा होगा। समाज शास्त्र और मानस शास्त्र के वर्तमान आचार्यों का मत है कि मजहबों पर जितनी अश्रद्धा इस समय फैली हुई है उतनी पहले कभी नहीं थी।
यहाँ एक प्रश्न आता है कि ‘फिर साम्प्रदायिक दंगे क्यों होते हैं? इस संबंध में एक लाट पादरी का मत है कि विशुद्ध साम्प्रदायिक दंगों का अस्तित्व मिट गया है। भारत वर्ष में मन्दिर मस्जिद और राम रहीम के नाम पर दंगों को भी साम्प्रदायिक नहीं मानना चाहिए। इसके पीछे राजनैतिक स्वार्थ छिपे होते हैं। महात्मा गान्धी का मत है कि भारतवर्ष का राजनैतिक आकाश साफ होते ही साम्प्रदायिक दंगों का अस्तित्व मिट जायगा।
मजहबों पर अविश्वास बढ़ते जाने के कारण संसार के समस्त पुजारी और मठाधीश चिन्तित हो रहे हैं। विचारक लोग समस्या की गम्भीरता को स्वीकार करते हैं। योरोप का प्रसिद्ध श्वेतांग चतुर्वेदी ब्राह्मण प्रो. मैक्समूलर अपनी पुस्तक में लिखता है कि संसार के सबसे बड़े मजहब बौद्ध, ईसाई, हिन्दू और मुसलमान है। साइंस की तरक्की से इन चारों की आन्तरिक दीवार बड़ी कमजोर हो गई हैं और इनके भीतर एक तरह की खलबली मच गई है।।
ईसाई मत के अनुयायी आजकल अधिक उन्नतिशील समझे जाते हैं। वे अपने पंथ को अधिक वैज्ञानिक, उदार और सत्य प्रमाणित करते है तथापि मजहबों पर अविश्वास की समस्या उनके सामने भी उग्र रूप से खड़ी हुई है। उस वर्ष पादरी कान्फ्रेंस में लंदन के राज पुरोहित ने कहा था- समस्त योरोप में नवीन सभ्यता और ईसाई मत में घोर युद्ध चल रहा है। लोगों का विश्वास पूजा विधान तथा कथा वार्ता पर से उठता जाता है और इंग्लैण्ड की अधिकांश जनता अपने मजहब की कुछ भी परवाह नहीं करती। पादरी ह्यूज सीसल का कथन है कि चारों ओर ईमान पर से विश्वास उठ रहा है और लोगों की शंकाएँ बढ़ती जाती हैं। फादर गिरनारल्ड कहते हैं- संसार के इतिहास में धर्म पर इतनी अश्रद्धा किसी समय नहीं हुई। विज्ञान ने इस अविश्वास को और भी बढ़ा दिया है। पादरी विलसन कहते हैं- लोग भय और लापरवाही के कारण अपने मनोगत भावों को प्रकट नहीं करते किन्तु वे भीतर यह मानते हैं कि धार्मिक विधान ढ़कोसला मात्र हैं। राबर्ट विलिचफोर्ड ने लिखा है- धर्म पुस्तकों के अन्दर अन्य जातियों के साथ भ्रातृ भाव रखने की नहीं वरन् घृणा करने की शिक्षा है। किसी खास जाति को ही ईश्वर की प्यारी कहना और उसी के साथ पक्षपात करने पर विश्वास करना परमात्मा के नाम पर कलंग पोतना और उसकी बेइज्जती करना है। डाक्टर वेल्स का कथन है- लोग अब किसी मजहब को स्वार्थ के कारण ग्रहण किये रहते हैं न कि धर्म की इच्छा से। शिक्षित पुरुष धर्म पुस्तकों को ईश्वर की वाणी नहीं मानते वरन् सिद्ध करते हैं कि ये किताबें मनुष्यों की लिखी हुई हैं, और उनके वे सब दोष मौजूद हैं जो आदमी में हो सकते हैं।।
उपरोक्त सम्मतियाँ केवल ईसाई मन पर ही लागू नहीं होती वरन् सभी मतों पर घटित होती हैं। सर्वत्र एक ही विचार धारा बह रही है। मौलवी मुहम्मद जरीफ अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि- आश्चर्य की बात है कि संसार में अब तक ऐसे लोग हैं जो खुदा, फिरश्तों, जिलात्, कयामत, हिसाब, मीजान और हूरों को मानते हैं। स्वामी दयानन्द ने एक स्थान पर लिखा है भारतवर्ष में धर्म स्त्रियों की कृपा से ही टिका हुआ है। हिन्दू धर्म के लिए सम्मतियाँ इकट्ठी करने की जरूरत नहीं। किसी भी धर्म स्थान और पुरोहित से जाकर पूछिये वह शपथ पूर्वक यह साक्षी देगा कि धर्म का दिन दिन ह्रास होता जा रहा है और लोगों की आस्था पूजा पत्री, धर्म विधान एवं कर्मकाण्ड पर से उठती जा रही है। पुजारियों को दूसरे पेशे अख्तियार करना और मन्दिरों का खण्डहर होते जाना इसी सच्चाई की गम्भीर और विश्वस्त गवाहियाँ हैं।
इस प्रश्न पर आधी शताब्दी से विचार हो रहा है और एक ऐसे सार्वभौम धर्म की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। जिसकी छाया में हर देश ओर हर जाति का मनुष्य बिना भेदभाव के बैठ सके और शान्ति एवं सन्तोष उपलब्ध कर सके। इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध पत्र इंगलिश मैन के विचार मनन करने योग्य हैं वह लिखता है- यह सिद्ध करना तो आसान है कि अमुक मजहब झूठा है। लेकिन इससे काम नहीं चलेगा। मनुष्य जीवन के लिए धर्म की नितान्त आवश्यकता है बिना उसके किसी भी प्रकार काम नहीं चल सकता। इसलिए हमें एक सार्वभौम धर्म को प्रकाश में लाना होगा जिससे विश्व बन्धुत्व फैलाया जा सके और उद्विग्न मनुष्यों के हृदयों को शान्ति प्राप्त हो सके। अब आगे का रचनात्मक कार्य होना चाहिए। मरे हुए मजहबों को कोड़े लगाना ठीक नहीं क्योंकि मरते को मारना शूरता नहीं निर्दयता है। उन्हें अपनी अन्तिम साँसे लेने देने में कोई बाधा नहीं देनी चाहिए, वरन् सहानुभूति और आदर पूर्वक उनसे कहना चाहिए- आज आप बेकार हैं, फिर भी एक समय आपकी आवश्यकता थी और अपने समय में आपके द्वारा हमारे समाज की बड़ी सेवा हुई थी।
सार्वभौम धर्म वही हो सकता है जिसका उल्लेख भगवान मनु ने धर्म के दश लक्षण बताते हुए किया ह और यम नियमों में जिसका निचोड़ योगाचार्य महर्षि पातंजलि ने रख दिया हैं। अगले अंक में उन पर विस्तृत प्रकाश डाला जायेगा।
(ले. पं. शिवनारायण शर्मा हैड मास्टर वि. व. पाठशाला आगरा)
सर्वभूतस्थ मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योग युक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।।
आत्मोपम्येन सर्वत्र समं, पश्यनियोऽर्जुन।
सुखं वा यदिवा दुःखं स योगी परमोमतः।।
संसार में अशान्ति का उत्पात क्यों है? कौरव पाण्डवों के बीच जो घोर संग्राम हुआ था उसका मूल कारण क्या था? कौरव समझते थे कि पाण्डव हमसे अलग है। पांडव समझते थे दुर्योधनादि हमसे पृथक हैं। कौरव यदि पाण्डवों को अपना समझते या समझ सके होते तो क्या कुरुक्षेत्र का युद्ध होता? कदापि नहीं। आधुनिक, प्राचीन ,, जातीय या व्यक्तिगत सब ही विवादों का मूल अहंभाव का संकोच है। यदि मैं आपको मैं समझ सकता तो क्या आपके साथ विवाद कर सकता? कदापि नहीं। तू को मैं से पृथक जानने ही के कारण मैं तुमसे प्यार नहीं करता और विजातीय मानता हूँ। अहंभाव संकोच ही सारी अशान्ति का कारण है, इसका प्रसार सर्व शान्ति का मूल है। पड़ोसी को अपने से पृथक समझता हूँ, इसी से उसका सुख दुख मेरा सुख दुख नहीं हुआ या नहीं है। दुर्भिक्ष, भूकम्प, महामारी आदि ने आकर हजारों प्राणियों का नाश कर दिया है किन्तु हमारे प्राण नहीं रोये। वे कहाँ के थे? वे हमारे कोई नहीं। हम अपने से प्यार करते हैं जगत में हमको छोड़ कोई भी हमसे प्यार नहीं कर सकता। शास्त्र कहता है कि अहंता का नाश करो। तब ही शान्ति होगी। वही बात इस तरह भी कही जा सकती है कि अहंभाव का प्रसार करोगे तब ही शान्ति पाओगे। अहंभाव का नाश होने से हममें तुममें भेद नहीं रहेगा, और यही बात अहंभाव के प्रसार में भी होगी। अहं पन का नाश और प्रसार एक ही बात है। अहंता जब तक मुझमें बंधी हुई है तब तक वह शुद्ध वैयक्तिक अहंता है और वही विश्वव्यापी हो जाने पर मुझमें बँधी न रहेगी एवं तब उसका ध्वंस होना कहा जा सकेगा। शास्त्र कहता है- सब भूतों में जो आत्मा को देखता है वही विद्वान मोक्ष पाता है। वस्तुतः मुझमें तुझमें और उसमें कोई भेद नहीं। सर्वनाम, प्रोनाउन सब रट डाले परन्तु यह समझ नहीं आई कि तीन पुरुष पास- पास खड़े होकर बातचीत करें तो कहने वाला अपने को ‘मैं’ और सुनने वाले को ‘तू’ और तीसरे को वह ‘उस’ कहेगा, फिर मध्यम पुरुष वाला तू अपने को ‘मैं’ कहेगा और मैं वाले को ‘तू’ और तीसरे को वह ‘उस’ कहेगा। तीसरे को वह फिर तीसरा अपने को ‘मैं’ कहेगा तब इन तीनों के मैं में क्या भेद रहा, कुछ भी नहीं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज। अहंत्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयि स्यामि माशुचः।।’’ यह मान अहंकारी रूप तो हैं, पढ़ा भी है परन्तु अन्तःकरण में भाव नहीं बैठा है। इसको विचारिये अभ्यास कीजिये तब यही पदार्थ जान पड़ेगा। ''एकमेवाद्वितियम्।''
अविद्या व अज्ञान वश हम भेद देखते हैं। इस तत्व की उच्च दार्शनिक मीमांसा यहाँ छोड़कर यदि स्थूल बुद्धि से भी देख पावेंगे के तुम्हारा और हमारा जीवन इतने घनिष्ट सम्बन्ध से बँध हुआ है कि जब तक कि आप मुझको आत्मीय समझ कर ग्रहण न कर सकेंगे, तब तक आपके सुख की आशा दुराशा मात्र है। आप धनी हैं आपको हैजा हुआ, डाक्टर या वैद्य हकीम आये, उपयुक्त चिकित्सा से आपको आराम हो गया। मैं दरिद्र हूँ हैजा या प्लेग हुआ, न वैद्य डाक्टर आये न अच्छा हो सका, मर गया, किसी ने भी खबर न ली, मेरे मृत देह से हैजे का विष चारों ओर फैल गया है, आपने मुझको त्याग अवश्य किया था परन्तु विषूचिका के विष को परित्याग नहीं कर सके, उसने आप पर तथा गाँव या मुहल्ले के अनेक लोगों पर आक्रमण किया गाँव नष्ट हो गया। यदि आप मुझको आत्मीय, अपना जान कर चिकित्सा और सुश्रुषा से बचा सकते अथवा कम से कम मृतदेह को शीघ्र ही दाह संस्कार भी करा सकते तो शायद ऐसा न होता। आपको तन्दुरुस्त रहने के लिये, बीमारी से बचने के लिये दूसरों को भी अपना ही समझकर स्वस्थ रखना चाहिये। ‘‘जो दूसरों की रक्षा करता है उसी की रक्षा होती है।’’ यह साधारण कहावत है इसके अर्थ का रहस्य भी अहंभाव का प्रसार है। आप अपने अहंभाव का प्रसार कीजिये अवश्य सुख से रह सकेंगे। जो बात पड़ोसी के विषय में कही है वही ग्राम, प्रान्त, देश आदि में भी समझ लीजिये। यूरोप, अमेरिका या एशिया में आज कोई नई बीमारी उत्पन्न हुई, दो ही एक दिन में देखेंगे कि वह सर्वर्त्र फैल गई। उदाहरण प्लेग इन्फ़्लुएञ्ज़ा स्पष्ट ही हैं। समाज या देश भेद से जगत का सब शुभाशुभ, समस्त घटनायें समस्त मानव जाति के पक्ष में साक्षात् वा परम्परा सम्बन्ध से भोगनी पड़ती है। अतएव शान्ति चाहते वाले पुरुष को सर्वत्र ही समदृष्टि रहनी चाहिये। केवल अपनी ओर दृष्टि रखने से काम न चलेगा, दूसरों की ओर भी दृष्टि रखनी चाहिये।
आप यथेष्ट धन उपार्जित करते हैं, किन्तु दरिद्र जगत उस धन से वंचित हैं। सैकड़ों पड़ोसी अन्न वस्त्रादि से दुःखी हैं। उन पर आपकी दृष्टि नहीं है। सैकड़ों पड़ोसी अभाव की पीड़ा से अज्ञान वश अधर्माचरण में प्रवृत्त हैं और आप अपने धन में ही मत्त हैं। किन्तु कुछ दिन बाद ही डाकुओं ने आपका सर्वस्व ले लिया। तब आप का अहंभाव संकोच संचित धन कहां चला गया? इसमें विचार कीजिये कि दोष किसका? आप कहेंगे कि डाकुओं का दोष हैं, परन्तु वास्तव में पहले आपका दोष है, पीछे उनका। आप अपने देश में दस्यु होने ही क्यों देते हैं? जो दस्यु हुए हैं वे शायद ऐसी प्रकृति वाले होते ही नहीं, यदि आप अपने द्रव्य का सदुपयोग करते।
आज कल पाश्चात्य जगत में सामाजिक धन, साम्य नीति पर बहुत आन्दोलन चल रहा है, और इसके दुरुपयोग के फल से अनेक स्थलों में निहिलिस्ट सोसलिस्ट आदि की सृष्टि पुष्ट होने से पाश्चात्य समाज में दिन दिन प्रशान्ति बढ़ रही है, किन्तु भारत वर्ष में प्राचीन काल से सर्वशास्त्र सार सिद्धान्त, संभूत अहंता का विनाश अथवा उसके विश्व विस्तार तत्व की शिक्षा होने से सात्विक दान धर्म की साधना से, आर्य समाज शान्ति की गोद में सोता था। उसी शिक्षा का ध्वंसावशेष अब भी भारत की रक्षा कर रहा है।
जब आपने शास्त्र सिन्धु मंथन कर ज्ञानामृत पान कर, देवता स्वरूप गृह में बैठकर देव कार्य में तत्पर रहे, वह ज्ञानामृत दूसरों को दान न करें और फिर सब असुर होकर आपके देव कार्य में बाधा देने लगें, तब फिर परिताप ही क्या? फिर आप उनके विनाश का उपाय सोचने लगते हैं। क्यों, इतने गोलमाल करने की आवश्यकता ही क्या? उनको भी ज्ञानामृत देकर देवता बनाया होता। देखिये देश में जितने असुर राक्षस हैं वे हमारे ही दोष से हैं।
हमारे पुत्र ने अच्छी तरह लिखना पढ़ना सीखा है, शान्त है, धार्मिक है, किन्तु पड़ोसी के पुत्र मूर्ख हैं। हमारा पुत्र भी उनके साथ मिल कर क्रम से सुहबत का असर पाकर मूर्ख हो जायेगा। अतएव केवल अपने पुत्र को पढ़ाने से ही काम न चलेगा, दूसरों के पुत्रों को भी लिखना पढ़ना सिखाना चाहिये।
जगत ब्रह्ममय है, अतएव परमार्थतः कोई भी किसी से जुदा नहीं है। छोटी चींटी के साथ भी आपका घनिष्ट सम्बन्ध है। ज्ञान विकाश के साथ हममे जो स्नेह है जब उसका क्रम से विस्तार होता रहे, तो सब भूतों में आत्मदर्शन हो और सब गोलमाल मिट जाय।
देखिये, आपके पुत्र या पौत्र ने जो आपके पास बैठा था या गोद में था, पेशाब कर दी, आप कहते हैं अरे भाई, इस बच्चे को ले जाओं इसने हमारे कपड़ों पर पेशाब कर दी। इससे जरा भी नाक नहीं सकोड़ी, किन्तु पड़ोसी का बालक आपके बिछौनों पर आकर कहीं पेशाब कर दे तो तुरन्त चिल्लाने लगते हो। ऐसे अलग अलग व्यवहार का कारण क्या है? वही अहंभाव का प्रसार न होना। आप उस बालक को अपना बालक नहीं समझते, इसी से भेदभाव है। बालक का मूत्र त्याग करना इस गोलमाल का कारण नहीं है। आपका बालक बीमार है। उठने की शक्ति नहीं है। मल मूत्र त्याग कर देता है, आप बिना क्लेश के उसे साफ कर देते हैं, बल्कि उसमें उत्साह अनुभव करते हैं, किन्तु हमारे पुत्र के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकते? हमारे पुत्र का मलमूत्र उसका कारण नहीं है। तुम हमारे पुत्र को अपने पुत्र के समान नहीं जानते तुम्हारा अहंभाव अति संकुचित हैं। यदि अहंभाव विस्तारित होता तो हमारे पुत्र का मल मूत्र साफ करके भी तुम्हें आनन्द होता। मेहतर को क्यों नहीं छूते? क्या वह मूर्ख है इसलिये? यदि यह बसत है तब तो आप का अमुक सम्बन्धी भी उसी की तरह मूर्ख है, किन्तु उसके स्पर्श करने में कुछ भी विचार नहीं करते। अशौचाचारी, मलिन ,, अधर्मी, कुरुप इत्यादि कारणों से यदि उसे स्पर्श न करते हो तो स्नान करके आने पर तो स्पर्श करो। नहीं, ऐसा भी तो नहीं करते। तुम आप यदि मल स्पर्श करो तब तो हाथ पाँव इत्यादि धोने से पवित्र हो जाते हो, किन्तु मेहतर पवित्र नहीं होता? उसका कारण क्या मल स्पर्श है? शरीर मल संयुक्त होने पर उसे धोकर स्नान कर लिया जाय तो उसका अंग तुम्हारी तरह पवित्र क्यों न होगा? अब देखिए कि मल स्पर्श करने से मेहतर आपकी समझ में हेय नहीं हैं बल्कि तुमने उसे अपने मैं से बहुत दूरवर्ती और पृथक समझ कर ही अछूत मान लिया है।
कुष्ठ रोग से पीड़ित मनुष्य तुम्हारे सामने उपस्थित हुआ तो तुम्हें असह्य उद्वेग उत्पन्न हुआ, परन्तु यदि तुम्हें स्वयं कुष्ठ हो जाय, तब क्या करोगे? अतएव कुष्ठ रोग के कारण ही तुम कुष्ठी से घृणा नहीं करते बल्कि अहंभाव से कृपण होकर उसे स्वतंत्र समझ कर ही ऐसी घृणा करते हो। अपने शरीर पर एक घाव हो जाय तो उसकी चिकित्सा करते हो। जिससे आरोग्य हो जाओ ऐसी चेष्टा करते हो। परन्तु यदि दूसरे को भी अपना जानते तो उसके घाव को भी अपने घाव की तरह चिकित्सा करते।
तुम विद्वान, धार्मिक, धनी हो तो दूसरों को भी अपनी तरह धार्मिक और धनी बनाने का यत्न करो। पापी, रोगी, दरिद्र से घृणा न करो बल्कि उनको उन्नत अवस्था में लाने की चेष्टा करो। पूर्व ही कहा है कि ऐसा न करने से तुम्हारा अपना जो कुछ है वह भी वृथा है।
मनुष्य तभी दुःख में ग्रसित हाता है जब उसके आन्तरिक विचारों और परिस्थितियों में मेल नहीं खाता।
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इन्द्रिय निग्रह में बल है, सद्विचारों में विजय है और शान्ति में शक्ति है।
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मूर्ख और बुद्धिमान दोनों ही हानि जनक नहीं होते केवल अर्द्ध मूर्ख ही डरने की चीज है।
(ले. प्रो. जयशंकर एम.ए.)
बुद्धि के विकाश के साथ- साथ ज्ञान की प्यास भी बढ़ती जाती है। जड़ता को छोड़कर मनुष्य जैसे जैसे चेतना में प्रवेश करता जाता ह वैसे ही वैसे वह अपने को अनेक प्रश्नों से घिरा हुआ पाता है। सबसे पहले उसकी निगाह अपने आसपास की चीजों पर जाती है। सोचता है कि यह सब क्या है? इसका इतिहास और कार्यक्रम क्या है? संसार के सब धर्म सृष्टि की कथा कुछ कुछ कहते हैं। अब तक उस पर जैसे तैसे विश्वास किया जाता रहा। परन्तु इस युग की वैज्ञानिक संक्रान्ति ने दुनियाँ का दिमाग फेर दिया है। इसलिए धार्मिक पुस्तकों की वे बातें लँगड़ी लूली और काल्पनिक कहानी प्रतीत होती है। दूसरे विभिन्न धर्मों द्वारा भिन्न भिन्न प्रकार के उत्तर मिलते हैं और वे उत्तर आपस में एक दूसरे से रत्ती भर में भी नहीं मिलते। ऐसी दशा में दुखी होकर जिज्ञासु विज्ञान की ओर मुँह करके उसी से कुछ समाधान की इच्छा करता है।
विज्ञान ने सृष्टि की उत्पत्ति विकास और कार्यक्रम के बारे में बहुत कुछ खोज की है। यह खोज अंतिम रूप से निर्विवाद स्वीकृत हो गई हो सो बात तो नहीं, पर हाँ अब करीब करीब जिस सिद्धान्त को ज्योतिषी स्वीकृत कर रहे हैं उसी के पाश्चात्य सृष्टि विज्ञान को पाठकों की जानकारी के लिए वर्णन किया जा रहा है।
कुछ समय के लिए आप अपने मकान को बन्द करके चले जाते हैं। बाद को आकर जब उसे खोलते हैं तो मेज, कुर्सी, तस्वीर, पलंग, फर्श आदि सब चीजों पर धूलि की एकपतली तह जमी पाते हैं। यह धूलि कहाँ से आ गई? वायु मण्डल में धूलि के कण सदैव उड़ते रहते हैं। यन्त्रों द्वारा उसे एक हलके से बादल, बदली के रूप में हर समय उड़ता हुआ देखा जा सकता है। आंधी आने पर या गर्मी के दिनों में संध्या समय आकाश पर छाई हुई यह धूलि साफ दिखाई देती है। यही धूलि पृथ्वी की आकर्षण शक्ति द्वारा खिंच कर बन्द मकानों में भी फर्श आदि पर जमा हो जाती है। इससे आप एक संसार व्यापी धूलि की बल की बदली की कल्पना कर सकते हैं।
सृष्टि का आरम्भ ऐसी ही एक असंख्य मील लम्बी चौड़ी बदली से शुरु होता है। जिसमें धूलि के समान पंच तत्वों के परमाणु भरे होते हैं। स्वभावतः यह परमाणु सर्वत्र बराबर वजन सा दूरी में नहीं रह सकते। कुछ एक स्थान पर एकत्रित होंगे तो कुछ दूसरे स्थान पर। बदली कहीं घनी हो जायेगी तो कही छितरी रहेगी। इस प्रकार वह अनेक भागों में बँट जायेगी। घने भाग अपनी आकर्षण शक्ति द्वारा छितरे भागों में से परमाणुओं को खींच खींच कर अपने को और अधिक मजबूत बनाते रहेंगे और पिंडों का रूप धारण कर लेंगे। यह बातें इस स्थान पर नहीं समझाई जा सकती कि घने भाग में किस प्रकार आकर्षण शक्ति का समावेश हो जाता है और चारों ओर से पदार्थ खिंच-खिंच कर एकत्रित हो, किस प्रकार उसकी शकल गोले के समान हो जाती है। इसके लिए पाठकों को भौतिक शास्त्र का क्रमिक अध्ययन करके ज्ञान प्राप्त करना होगा। इस समय आपको यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि यह दोनों सिद्धान्त भौतिक शास्त्रियों को सर्वमान्य हैं इसलिए हम भी स्वीकार कर लें।
अनंत में छाई हुई तात्विक परमाणुओं की बदली से पिंड बनते हैं और अरबों खरबों वर्ष में एक ठोस एवं विशालकाय ग्रह बन जाते हैं। यह प्रायः सहज ही समझ में आ जाती है कि भारी होने के कारण धातुओं के परमाणु पिंडों के भीतर चले जायेंगे और वायुओं के ऊपर रह जायेंगे। नक्षत्रों का रूप यही माना जाता है कि वे धातुओं जैसी ठोस वस्तुओं के गोले हैं और उनके चारों ओर वायु का आवरण है। जिन्होंने विज्ञान की शिक्षा प्राप्त की हैं उन्होंने अपने पहले ही पाठ में पढ़ा होगा कि दबाव पड़ने एवं सिकुड़ने से गर्मी पैदा होती है। परमाणुओं के पिंड जब अपने घनत्व के कारा दबते और सिकुड़ते हैं तो भीषण गर्मी के साथ तप का प्रज्वलित हो उठते हैं। यह जलते हुए पिण्ड गर्मी के नियमानुसार अपनी धुरी पर घूमने लग जाते हैं। यह घूमने की गति केवल अपने निश्चित स्थान तक ही नहीं रहती वरन् दूसरे ग्रहों की आकर्षण शक्ति के कारण इस प्रकार से भी हो जाती है जैसे हम एक रस्सी में बाँध कर लोहे के टुकड़े को चारों ओर घुमाते हैं और एक निश्चित मार्ग से परिक्रमा भी करते हैं। आरम्भिक परिक्रमा बड़ी कठिन होती है। जिस प्रकार बड़े परिश्रम पूर्वक दूसरों से लड़ झगड़कर अपनी सुविधाऐं इकट्ठी करनी पड़ती हैं वैसा ही उन नवजात पिण्डों को करना पड़ता है। दूसरे पिंडों की आकर्षण शक्ति से वे खिंचते हुए परिक्रमा करने के लिए जब अग्रसर होते हैं तो रास्ता खाली नहीं पड़ा होता। रास्ते में दूसरे पिंड मिलते हैं। दोनों आपस में टकराते हैं और बड़े छोटे को अपने पेट में निगल जाता है। इस महायुद्ध में असंख्य पिंड एक दूसरे को उदरस्थ करते जाते हैं और अन्त में कुछ विशालकाय बहुभक्षी और ऐसे पिंड बने रहते हैं जिन्होंने दिग्विजय करके अपना रास्ता पूरी तरह से साफ कर लिया है। इनमें से जो सबसे बड़ा शक्तिशाली होगा वह सूर्य कहलावेगा और अन्य छोटे ग्रह उसकी परिक्रमा करते रहेंगे। यह सौर मण्डल बनने की बात हुई।
अखिल विश्व में ऐसे करोड़ों सूर्य सम्प्रदाय या सौर मण्डल हैं। हमारे सौर मण्डल में लगभग पाँच सौ ग्रह हैं जो इस सूर्य की परिक्रमा करते रहते हैं। अन्य सूर्यों में से कई इससे छोटे और कई बड़े है। कुछ बहुत बुड्ढ़े हो चले है और पृथ्वी के समान ठंडे होने जा रहे हैं कुछ हमारे सूर्य की तरह अधेड़ हैं और कुछ अभी बिलकुल बच्चे हैं। प्रो. पिंकरिंग नाम ज्योजिषी ने गणित बनाया है कि टाइजले नक्षत्र हमारे सूर्य से सत्तासी हजार गुणा अधिक प्रकाश और तेज वितरित करता है। एक दूसरे पंडित ने उन्नाभद्रपद नक्षत्र का विस्तार आश्चर्यजनक सिद्ध किया हैं। वे कहते है कि यदि इस नक्षत्र में सूर्य के घनत्व की अपेक्षा दो करोड़वाँ भाग भी घनत्व होता तो पृथ्वी को उसी तरह अपनी परिक्रमा करने के लिए बाध्य करता जैसे आजकल सूर्य करता है।
तात्विक परमाणुओं की महान बदली टूट टूट कर असंख्य भागों में बँट गई है। आजकल के ज्योतिषी ऐसी लगभग दो लाख बदलियों के बारे में जानकारी रखते हैं। फिर भी उनकी जानकारी पूरी नहीं है। इन अखिल ब्रह्माण्डों सौर मण्डलों और बदलियों की लम्बाई चौड़ाई मीलों में नहीं बताई जा सकती। क्योंकि बेचारे मनुष्य तुच्छ मस्तिष्क उतनी गणना की कल्पना भी नहीं कर सकता। रात को जो तारे हमें दीखते हैं उनमें से कई ऐसे हैं जिनका प्रकाश पृथ्वी तक आने में लाखों वर्ष लगते हैं जबकि प्रकाश की चाल प्रत्येक सेकिण्ड में करीब एक लाख मील है। जो तारे हमें दीखते हैं उनमें से हजारों युगों पहले नष्ट भ्रष्ट हो गये होंगे किन्तु उनका पुराना प्रकाश ही अब तक यहाँ चला आ रहा होगा। इसी प्रकार युगों पहले ऐसे अनेक नक्षत्र नये बन चुके होंगे जिनका प्रकाश लाखों वर्षों से चलता आ रहा होगा और अब तक हमारे पास नहीं आ पहुँचा हैं। प्रतिदिन नक्षत्र, ग्रह, बदलियाँ और सौर मण्डल न जाने कितने बनते होंगे और कितने नष्ट हो जाते होंगे। बदलियों के विस्तार की भी मीलों में गणना नहीं हो सकती। हमारी पृथ्वी जिस बदली में है उसमें हमारे सौर मण्डल के समान करीब दो अरब सौर मण्डल हैं। ऐसी ही दो लाख बदलियों में कितने सौर मण्डल और कितने ग्रह उपग्रह होंगे इसकी कल्पना करने में भी मानवी मस्तिष्क अपने को असमर्थ पाता है।
यह समस्त ब्रह्माण्ड निर्जीव या धातुओं के ठंडे गरम गोले ही न समझने चाहिए। इनमें असंख्य पृथ्वी के समान सजीव भी हैं और उनमें इस पृथ्वी के प्राण धारियों के समान अल्पज्ञ बहुज्ञ, स्वल्पेन्द्रिय ,, बहु इन्द्रिय प्राणी भी हैं। निश्चय ही उनमें से किसी में हम सब मनुष्यों की अपेक्षा बहुत अधिक ज्ञानवान और विकसित जीव भी होंगे।
ऐसी इस कल्पनातीत प्रकृति में हमारी पृथ्वी एक तिल के बराबर है और उस पृथ्वी में हम एक धूलि के कण के बराबर है। महान विश्व में कितने तुच्छ होते हुये भी तुम कितने महान हो, क्या इसकी कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क को कुछ कष्ट दोगे?
क्रमशः
(ले. श्री गिरराज किशोर विशारद चिरहोली)
पीछे के तीन लेखों में स्मरण शक्ति के सम्बन्ध में बहुत कुछ कहा जा चुका है। परन्तु यह विषय इतना गंभीर कि है इस पर जितना भी कहा जाय कम है। मनुष्य का मस्तिष्क इतना गूढ़ है कि उसकी थाह पा लेना आसान नहीं। कहते हैं कि जो ‘पिंड में सो ब्रह्माण्ड में’ संसार के अन्दर जो शक्तियाँ भरी हुई हैं वह शरीर के अन्दर भी हैं। यों कहा जा सकता है कि प्रकृति के अजायब घर का छोटा मानचित्र मनुष्य का शरीर है। स्थूल पदार्थों का प्रतिनिधित्व यह पंच भौतिक शरीर है तो विश्व व्यापी सूक्ष्म चेतनाओं की तस्वीर मस्तिष्क है। इस अद्भुत अवयव की वैज्ञानिक खोज शताब्दियों से हो रही हैं। अब तक जितनी जानकारी इसके सम्बन्ध में प्राप्त की जा सकी है। वह बहुत ही कम है। मस्तिष्कीय श्वेत बालुका का क्या कार्य है विज्ञान अभी यह भी नहीं जान पाया है। फिर भी अब तक जो शोध हुई है हम सब लोगों को आश्चर्य में डाल देने के लिए काफी है। इस अद्भुत यन्त्र में पृथ्वी को डावाँडोल कर देने की शक्ति है। एक दो दस आदमियों की आर्थिक एवं सामाजिक दशा बदलने की नहीं समस्त भूमण्डल में उलट पुलट पैदा कर देने की ताकत है। कार्लमार्क्स का मस्तिष्क पैसे की दुनियाँ में एक पहेली बन गया है। यूरोप का रावण, हिटलर विश्व भर में अपने मस्तिष्क का आतंक जमाये हुए है, उसके त्रास के मारे करीब आधी दुनियाँ की नींद हराम हो रही है। जिन महापुरुषों के मस्तिष्कों ने रेल, तार, बिजली आदि आधुनिक यन्त्रों का निर्माण किया है आप लोग उनके नाम भी नहीं जानते होंगे पर आप यह देखते है कि पिछली शताब्दियों की अपेक्षा अब हमारे जीवन की धारा ही बदल गई है। हिन्दू समाज की चिर कालीन धार्मिक प्रथाओं में स्वामी दयानन्द का मस्तिष्क कितनी क्रान्ति कर गया। कमाल पाशा ने टर्की को सिर पर उठा कर पश्चिम से पूरब में पटक दिया। यह कार्य शरीर के नहीं हैं। शरीर का बल नगन्य है। मानसिक बल के सामने उसका अस्तित्व इतना ही समझना चाहिए जितना विशाल वृक्ष में एक पत्ती का।
इस लेख में मस्तिष्क की बनावट और उसकी महान कार्य शक्ति पर विचार करने की हमारी इच्छा नहीं है क्योंकि लेख की परम्परा स्मरण शक्ति के सम्बन्ध में है। इन पंक्तियों को लिखने का अभिप्राय इतना ही है कि मस्तिष्क की स्मरण शक्ति, धारणा शक्ति, कल्पना शक्ति, इच्छा शक्ति आदि के बारे में जितनी शोधें हो चुकी हैं वे पूर्ण नहीं हैं। भौतिक विज्ञानी हैरान है कि इस अद्भुत भण्डागार का पूरा परिचय किस तरह प्राप्त कर पावेंगे। जितना आगे बढ़ते जाते हैं उतनी ही अधिक गहराई का परिचय मिलता जाता है। स्मरण शक्ति के सम्बन्ध में पिछले अंकों में अब तक की शोध का बहुत कुछ आवश्यकीय भाग बताया जा चुका है। उसके आधार पर इस शक्ति के बढ़ाने के नित नये उपाय निर्धारित किये जा रहे हैं और उनका परीक्षण हो रहा हैं। इन परीक्षणों में जो सफल और संतोष जनक सिद्ध हो चुके हैं उन्हें का उल्लेख इन पृष्ठों में करने का मैं प्रयत्न करता रहा हूँ और आगे करूँगा।
पाठक जानते हैं कि हर काम के करने में कुछ चीज खर्च होती है। सृष्टि में जन्म मरण का नियम इसी सिद्धान्त के आधार पर है। गेहूँ पीस डालने पर आटा बतना हैं, तेल जलाने पर दीपक का प्रकाश होता है। कोयले के बल पर रेल, बिजली के बल पर तार और पेट्रोल की ताकत से मोटर जहाज आदि चलते हैं। एक चीज का खर्च दूसरी को उत्पन्न करता है, इस बात को मानने में किसी को कठिनाई न होनी चाहिए। अब विचार करना चाहिए कि मस्तिष्क द्वारा इतने गजब के काम क्या बिना कुछ खर्च किये होते रहते होंगे? स्मरण शक्ति का मूल आधार मस्तिष्क जिस प्रकार शरीर का सर्वोत्तम अंग है, उसी प्रकार उसकी खुराक भी देह का सर्वोत्तम भाग होना चाहिए। मस्तिष्क के मोटर में वीर्य का पेट्रोल जलता है। यह उक्ति आपने अनेक विचारकों के मुँह से सुनी होगी कि ‘अच्छे शरीर में अच्छा मस्तिष्क रहता है।’ इ इस कहावत की सच्चाई इस आधार पर है कि अच्छा शरीर अच्छा और अधिक वीर्य मस्तिष्क की खुराक के लिए दे सकता है। डाक्टर परावैल ने लिखा है कि ‘‘खराब मस्तिष्क वाले, मूढ़ ,, दीर्घसूत्री, भुलक्कड़, विक्षिप्त, क्रोधी तथा अन्य प्रकार के मस्तिष्क सम्बन्धी जितने रोगी मेरे पास आते हैं, उनमें से ९७ प्रतिशत ऐसे होते हैं जिन्हें वीर्य सम्बन्धी विकार पहले हुआ होता है।’’
हस्त मैथुन बहु मैथुन आदि के कारण वीर्य बहुत अधिक मात्रा में खर्च हो जाता है। और उष्णता पाकर वह पतला एवं प्रवाही बन जाता है। स्वप्र दोष, प्रमेह, शीघ्र पतन आदि रोग वीर्य पतले और प्रवाही होने के लक्षण मात्र हैं। ऐसा दीपक जिसका तेल दूसरे छेद में होकर टपक रहा हो क्या अपने प्रकाश को स्थिर रख सकता है? कम मात्रा में और अशुद्ध पेट्रोल पाले वाली मोटर क्या दूसरी की बराबरी कर सकेगी? सब चिकित्सक जानते है कि वीर्य रोगों, शिर में भारीपन, आँखों के आगे चक्कर आना, निद्रा की कमी, नेत्रों में जलन, अनुत्साह, मानसिक थकावट, कानों की सनसनाहट आदि लक्षणों को भी धारण किये रहते हैं। क्योंकि अपनी पूरी खुराक न पाने के कारण दिमाग दिन- दिन कमजोर होता जाता है। यही कमजोरी उपरोक्त लक्षणों के रूप में दिखाई पड़ती है।
अन्य मानसिक साधन जितने उपयोगी हैं उनमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण वीर्य रक्षा का सवाल है। अपने पशुओं को मजबूत रखने के इच्छुकों को चारागाह का प्रबन्ध करना पड़ेगा। जो लोग अपने मस्तिष्क को विकसित देखना चाहते हैं उन्हें अपने वीर्य को स्थित करना पड़ेगा और उसे मानसिक भोजन में खर्च करने में लगाना होगा। जब हम अपने अखण्ड ब्रह्मचारी ऋषि मुनियों की ओर देखते हैं तो पता लगता है कि वीर्य का मस्तिष्क द्वारा उपयोग कर ऊर्ध्वरेत्ता बन कर कितने महान कार्य संपादित किये थे। एक ही व्यक्ति महर्षि व्यास द्वारा अठारह पुराणों का लिखा जाना क्या कम आश्चर्य की बात है। इस पाठ में पाठकों से यह बात बिलकुल स्पष्ट कर देना ही होगा कि अन्य उपाय पौधे के आस पास भराव कराने के और जमीन फोड़ने के समान हैं जबकि ब्रह्मचर्य पालन उसकी जड़ में जल सींचने के तुल्य है।
ब्रह्मवर्चस के साधारण नियम आप सब लोग पढ़ और सुन चुके होंगे। न जानते हो तो ब्रह्मचर्य सम्बन्धी कोई अच्छी पुस्तक पढ़कर या किसी अनुभवी विद्वान से शिक्षा प्राप्त कर लेनी चाहिए। उस विस्तृत विज्ञान का इन पंक्तियों में उल्लेख करने से तो विषयान्तर हो जायेगा और पाठक दूसरे मामले में उलझ जावेंगे। एक ऊर्ध्वरेता महात्मा ने वीर्य रक्षा के सम्बन्ध में अपना एक अनुभूत चुटकुला बताया था जो परीक्षा करने पर बड़ा ही उपयोगी और अल्प प्रयत्न में बहुत लाभ देने वाला सिद्ध हुआ है। उन महात्मा ने कहा था कि जब कभी मेरी कामेन्द्रिय उत्तेजित होती है तब मैं ऐसी भावना करता हूँ कि शिश्न में आया हुआ वीर्य अपने मानसिक बल द्वारा खींचकर मैं मस्तिष्क में ले जाता हूँ और वहाँ उसे धारण कर देता हूँ। दुधारू पशु की दुग्ध धारा को तब तक निकालते रहते हैं जब तक निकलना बन्द न हो जाय, उसी प्रकार शिश्न से मस्तिष्क तक जाने वाली नाड़ियों में बार- बार यह भावना करनी पड़ती है कि मेरा मानसिक बल इसमें भरे हुए वीर्य को दुह दुह कर मस्तिष्क में बार- बार ले जाया जा रहा है और वहाँ स्थापित किया जा रहा है। पूर्ण मनोबल के साथ ऐसी भावना करने से प्रायः पाँच मिनट से कम में ही काम वासना शान्त हो जाती है। जिन लोगों को अनावश्यक और असामयिक कामोत्तेजना होती है और उससे पीड़ित होकर वीर्यपात करने में प्रवृत्त होते है वे महात्मा जी के इस अनुभूत प्रयोग से पूरा लाभ उठा सकेंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।
(ले. प्रो. धीरेन्द्र कुमार चक्रवर्ती बी.एस.सी.)
पिछले अंकों में मैस्मरेजम के मूल सिद्धान्ती और उसकी कार्य शक्ति के सम्बन्ध में प्रकाश डाला गया है। यह विषय अत्यन्त गहन है इसे पूरी तरह से समझाये बिना अभ्यास के साधनों का वर्णन करने लग जाना उचित न होता। इस मास अखण्ड ज्योति संपादक की मारफत पाठक के करीब नो दर्जन पत्र मुझे मिले हैं जिनमें पाठकों ने अभ्यास में लाने में शीघ्रता करने का अनुरोध किया है। उनकी उत्सुकता का आदर करता हूँ। किन्तु एक बात कहूँगा कि केवल उत्सुकता और जल्दबाजी से काम न चलेगा। दृढ़ संकल्प और लगातार साधन करने योग्य धैर्य उन्हें प्राप्त करना होगा तभी इस साधन में कुछ सफलता मिल सकेगी। मानसिक अभ्यासों के लिए श्रद्धा और अविचलता अनिवार्य है। पाठक विश्वास रखें अब तक के लेखों में जो वर्णन किये गये थे वे आधार प्रस्तर थे, बिना उन बातों को समझाये यदि में अभ्यास मार्ग को बताने लगता तो पाठकों को ऐसे ऊबड़- खाबड़ रास्ते पर ला खड़ा करता जहाँ वे यह न जान सकते कि हमें यहाँ किस उद्देश्य से किस प्रकार ले आया गया है। अगले अंक में मैस्मरेजप के अभ्यास का विधान बताया जायेगा। इस लेख में यह बात बतानी रह गई है कि मैस्मरेजम द्वारा दूसरों की क्या सेवा हो सकती है?
मैस्मरेजम एक मानसिक बल है। शारीरिक बल के लाभों से आप परिचित हैं, बलवान शरी अपने लिये पर्याप्त सुख सुविधाऐं प्राप्त कर सकता है एवं सुन्दर प्रतीत होता है। जो अपनी सेवा कर सकता है वहीं दूसरों की सेवा भी कर सकता है। नीरोग और सशक्त शरीर ही दूसरों की सेवा कर सकने लायक योग्यता रखता है। किसी दुर्बल को अत्याचारी के पंजे से छुड़ाने, जालिम को दण्ड देने, रोगी की तीमरदारी करने, किसी के कामकाज में मदद देने, प्यासों को पानी पिलाने आदि के कार्य शारीरिक बल द्वारा पूरे होते हैं। रोगी और निर्बल तो अपने लिए ही मदद मांगेगा दूसरों का उससे क्या भला हो सकता है। यही बात मानसिक बल के बारे में है। जिनका मनोबल दृढ़ है वे अपने शारीरिक और मानसिक यन्त्रों को ठीक प्रकार चलाकर सुख सफलता प्राप्त कर सकते हैं और साथ ही दूसरों पर भी अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं। अब मुझे यह कहने की जरुरत नहीं हैं कि मनोबल को इच्छानुसार काम में ला सकने की योग्यता ही मैस्मरेजम है।
मैस्मरेजम को प्रयोग करने वाले आम तौर से अपने से निर्बल इच्छा शक्ति वालों और प्रभावित हो जाने की इच्छा रखने वालों को बेहोश कर देते हैं। वे कुछ देर तक दूसरे आदमी की आँखों से आँखे लड़ा कर उसके शरीर में अपनी इतनी विद्युत शक्ति प्रवेश कर देते हैं कि वह सावधान न रह सके और एक प्रकार की योगनिद्रा में गिर पड़े। इय निद्रित व्यक्ति को शरीर और मन पर प्रयोग कर्त्ता का पूरा अधिकार हो जाता है, वह उनका वैसा ही उपयोग कर सकता है जैसा अपने शरीर और मन का करता है। यदि उसे आज्ञा दें कि अपनी जीभ बाहर निकाले रहो तो वह इस व्यर्थ बात को भी पूरी तरह से स्वीकार करेगा। जब तक प्रयोक्ता चाहे अपनी जीभ बाहर निकाले रहेगा। मन का भी ऐसा ही उपयोग हो सकता है। मिट्टी खिला कर मिठाई जैसा स्वाद अनुभव करने को कहा जाय तो वह खुशी- खुशी वैसा स्वीकार करेगा। यह बातें मनोरंजन सा खेल मताशा न समझनी चाहिये। दिल बहलाव करने या भीख मांगने के लिए इनका प्रयोग करना गुनाह हैं।
जरा गंभीरता पूर्वक विचार कीजिए कि जिस विद्या द्वारा दूसरे के शरीर और मन पर इतना कब्जा किया जा सकता है, क्या उसके द्वारा उनका नफा नुकसान कुछ नहीं किया जा सकता है? जो आदमी किसी दूसरे की तिजोरी पर पूर्ण अधिकार रखता है उस पर पूरी तरह कब्जा कर लेता है, यदि वह चाहे तो क्या उस तिजोरी में से कुछ ले दे नहीं सकता? निश्चय ही वह उसमें से चाहे जितना निकाल या रख सकेगा। आवश्यकता इतनी ही है कि इस क्रिया में भी उसने कुशलता प्राप्त कर रखी हो। बिना उस क्रिया को जाने उस रखने उठाने का कार्य नहीं हो सकता।
मैस्मरेजम की कुछ ऊँची योग्यता रखने वाला प्रयोक्ता दूसरों के मनोगत भावों को पढ़ सकता है, और जान सकता है कि उसे क्या मानसिक वेदनाऐं सता रही है। बुरी आदतें जिनके कारण उसका जीवन नरक तुल्य बना हुआ है उन्हें वह समझ सकता है और निदान कर सकता है कि मन की कितनी गहरी भूमिका में वह गड़ चुकी हैं। भय, भ्रम और संशय मस्तिष्क को चिंतित बता देते हैं। बार- बार विश्वास कराये जाने पर साधारण कोटि के मन किसी- किसी पर अन्ध श्रद्धा कर लेते हैं और उसके द्वारा जीवन भर दुख पाते रहते हैं। मैस्मरेजन का सिद्ध यह जान जाता है कि मस्तिष्क में कहाँ क्या गाँठें पड़ी हुई हैं और उनके द्वारा किस प्रकार कहाँ विकृति अटकी हुई हैं। एक टूटी हुई मशीन के असंतोष जनक कार्य से उसको काम में लाने वाला दुखी रहता है और अपने भाग्य को कोसता हुआ ईश्वर को गाली देता है। उसकी यह दशा एक चतुर इंजीनियर के सामने एक मजाक है। क्योंकि वह वास्तविक कारण को जानता है। मशीन को देखते ही उसे पता लग जाता है कि इसका अमुक पुर्जा घिस या टूट गया है, अमुक पेंच ढीले हो गये हैं और अमुक जगह पर धूल जमा हो गई है। वह अपने विद्या बल से मशीन को खोल कर उसको दुरुस्त कर देता है तो मशीन ठीक से चलने लगती है।
शारीरिक रोगों पर भी मैस्मरेजम चिकित्सा प्रणाली अन्य किसी भी उत्तम चिकित्सा प्रणाली से कम असर नहीं करती। शरीर स्वयं कुछ नहीं है वह तो पाँच तत्वों की गठरी मात्र है। इसमें जो चेतना है वह मन की है। मन और शरीर का सम्बन्ध किस प्रकार है और किस प्रका यह शासन चलता है इस विषय को समझने का आज अवकाश नहीं है। इस समय तो एक शब्द में पाठकों को इतना ही समझ लेना चाहिये कि मन का शरीर पर शासन है। समाधि के बारे में आप सब लोग जानते हैं कि इस दशा में योगी लोग शरी की सारी क्रियाओं को बन्द कर देते हैं। और फिर भी जीवित रहते हैं। कई साधक कुछ समय के लिए रक्त और हृदय की गति बन्द कर देते हैं। मन पर काबू पा लेने के साथ शरीर पर भी कब्जा हो जाता हैं। जिस प्रकार मैस्मरेजम द्वारा मानसिक रोग मिट सकते हैं, उसी प्रकार शारीरिक बीमारियों को भी दूर किया जा सकता हैं।
इस प्रकार आप समझ गये होंगे कि शरीर और मन की विकृत्तियों को मैस्मरेजम विद्या द्वारा झाड़ बुहार कर साफ किया जा सकता है, उन्हें निर्मल और निरोग बनाया जा सकता है। इतना ही नहीं बल्कि इससे भी कुछ अधिक हो सकता है। तिजोरी को खोलकर उसमें से कूड़ा झाड़ने रद्दी चीजों को फेंकने का काम जो कर सकता है वह इसमें रखे हुए वह मूल्य रत्नों को सजा कर भी रख सकता है, जिससे उसका प्राचीन रूप रंग ही बदल जाय और नवीन सौन्दर्य प्रकटित होने लगे। वह उसमें कुछ और नई चीजें भी रख सकता है, लौकिक व्यवहार के अनुसार हम दूसरों के खेत में बीज डाल सकते हैं और वह फल फूल कर बड़ा हो सकता है। चतुर मैस्मरेज्मी किसान किसी के मस्तिष्क की भूमि को उपजाऊ बनाकर उसमें सदगुणों की बीज बो सकता है और प्रयत्न पूर्वक सींच- सींच कर इस योग्य कर सकता है कि वह फलने फूलने लगें, सद्गुणों की कृपा से कितने तुच्छ जीव महापुरुष हो गये और लौकिक पारलौकिक सम्पत्ति उपार्जित कर सके।
इस विद्या का एक काला पहलू भी है भ्रष्ट मैस्मराइजर, जिन्हें पिशाच या ब्रह्म राक्षस कहना चाहिये। अपनी इस शक्ति का दुरुपयोग भी कर सकते हैं। नीच वासनाओं से प्रेरित होकर ये किसी के मानस पटल पर ऐसा असह्य आक्रमण कर सकते हैं कि वह बेचारा नष्ट- भ्रष्ट हो जाय, अंग- भंग हो जाय, रोगी हो जाय, शारीरिक मानसिक शक्तियाँ खो बैठे, उसके जाल में जकड़ जाय, पागल हो जाय या प्राणों से हाथ धो बैठे। यह पैशाचिक प्रहार किया क्रिया भी होती हैं इनसे सावधान रखने के लिए इन पंक्तियों का उल्लेख किया गया हैं। अखण्ड ज्योति के इन पृष्ठों में लगातार कितने ही मास तक चलने वाली इस लेख माला में उस अनैतिक आक्रमण की शिक्षा किसी को न मिलेगी। क्योंकि हम जानते हैं कि ऐसा पाजीपन लौट कर प्रयोक्ता को भी चबा डाल सकता है और उसकी सारी शक्ति को न्यायी प्रभु की सर्वशक्तिमान सत्ता द्वारा एक ही झटके में छीन लिया जा सकता है। समयानुसार हम अपने पाठकों को यह शिक्षा देंगे कि वे किस प्रकार दूसरों की शारीरिक एवं मानसिक सेवा कर सकने की योग्यता प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही यह भी बताया जायेगा कि किसी के किये हुए मानसिक आघात से अपना बचाव किस प्रकार करना चाहिये।
पाठक अपने जीवन को सफल बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं। हर आदमी यह चाहता है कि मैं जीवन का फल प्राप्त कर सकूँ, बड़ा बन सकूँ, औरों से मुझमें विशेषताएं हों, जिन कामों को कर सकने में, दूसरे लोग समर्थ नहीं हुए हैं उन्हें मैं संपादित कर सकूँ, उच्च पद प्राप्त कर सकूँ। यह इच्छाएं हर आदमी को सताती हैं। इन्हें पूरा करने के लिए आदमी भरसक कोशिश भी करता है। उसने अपनी लड़की के विवाह में बड़ा दहेज दिया, उसने पुत्र के विवाह में रुपयों की बखेर की, उसने अपने पिता की मृत्यु पर बड़ा भारी भोज दिया, उसने चारों धामों की तीर्थ यात्रा की, उसने अमुक मंदिर की मूर्ति पर सोने का छत्र चढ़वाया, उसने अपने खर्च से कई दिन लोगों के लिए तमाशा करवाया, उसने चांद्रायण व्रत किया, इस प्रकार के काम हम रोज सुनते और देखते हैं। करने वाला इनमें काफी त्याग करता है, कष्ट उठाता है, उदारता प्रकट करता है और अपनी सुख सामग्री में कमी कर लेता है। यहाँ इस बात पर बहस नहीं है कि इन कार्यों का क्या फल होता है। धन से उच्च पद मिलता है या नहीं। कर्म का फल मिलता है यह बात निर्विवाद है।
उपरोक्त पंक्तियों का तात्पर्य इतना ही है कि महत्ता प्राप्त करने की उम्र आकाँक्षा हम धारण किये हुए हैं। कितनी ही अविकसित दशा में, कितनी ही पिछड़ी परिस्थितियों में हम हों यह दैवी प्रेरणा हर घड़ी भीतर ही भीतर नोंचती रहती है। जिसका ज्ञान जितना है या जो जैसी परिस्थिति में प्रसन्न है, उसे उसी के अनुसार अपना कार्यक्रम बनाना पड़ता है। हम उस मोटर के समान हैं जिसका पहिया हर घड़ी घूमता रहता है। ड्राइवर उसे अपनी इच्छानुसार चाहे जहाँ ले जा सकता है। इच्छा करते ही वह पूरब, पच्छिम, उत्तर, दक्खिन, चाहे जिधर की सड़क पर सरपट दौड़ लगा सकती है। महत्व कामना दबाई नहीं जा सकती क्योंकि वह मनुष्य का धर्म और दैवी प्रेरणा है।
ईश्वरीय नियम है कि तुम्हें आगे बढ़ना पड़ेगा। संसार चक्र आगे बढ़ रहा है, नन्हे बालक, पौधे, घास-पात, कीड़े-मकोड़े, वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी, आकाश आग बढ़ने के लिए सब को घसीटा जा रहा है। इस सृष्टि की धारा ही ऐसी है। वृद्धि, उन्नति, विकास इसका धर्म है। बढ़ो, बढ़ो, बढ़ो, जर्रे जर्रे से यही आवाज आ रही है बढ़ो! आगे बढ़ो! उस घूमते हुए पहिये को ध्यान से देखो, क्या वह निरंतर आगे नहीं बढ़ रहा है? जब तुम किसी भौतिक विज्ञानी से विकासवाद के संबंध में पूछने जाओगे तो वह तुम्हें विस्तारपूर्वक बतायेगा कि आगे बढ़ने का निश्चित परिणाम घूमना है। तुम यदि लगातार चलते ही रहो तो घूमकर वहीं आ जाओगे जहाँ से चले थे। पृथ्वी, सूर्य, नक्षत्र, आदि सब चल रहे हैं इसलिए घूम रहे हैं। वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हो गया है कि प्रकृति का प्रत्येक परमाणु घूम रहा है अर्थात् वह बिना ठहरे आगे की ओर बढ़ता जा रहा है। ध्यानपूर्वक सुनलो, अच्छी तरह समझलो, भली प्रकार अनुभव कर लो कि तुम बढ़ रहे हो, एक निश्चित चेतना द्वारा तुम्हारे मन को बढ़ने के लिए अग्रसर किया जा रहा है। फिर भी उसकी गति किस ओर हो यह बात तुम्हारे ही ऊपर छोड़ी गई है। ईश्वर ने एक गतिवान यंत्र देकर जीव को इस चतुर्मुखी दुनिया में घूमने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया है।
जिस मोटर का पहिया बराबर घूम रहा हो और उसका ड्राइवर यदि उसे चाहे जिस ओर चला जाने दे तो वह कहाँ जा पहुँचेगा? जिस सड़क पर वह दौड़ लगा रहा है वह कहाँ पहुँचेगी इस बात की जानकारी उसे रखनी चाहिये। सड़क साफ है, मुझे पसन्द है, इस पर बहुत से आदमी चल रहे हैं, इन्हीं तर्कों के आधार पर जो अपना कार्यक्रम बना लेते हैं वे अंधेरे में हैं और वे उस अन्धे के समान हैं जो बिना सोचे विचारे चाहे जिधर को कदम उठाता जा रहा है। ऐसे सारथी को क्या कहा जाय जो चलती हुई सड़क को देखकर अपना रथ भी उसी पर डाल देता है। कहीं तुम भी ऐसे ही संचालक तो नहीं हो।
जीवन केन्द्र जहाँ से आरंभ होता है वहीं से हजारों लाखों पगडंडियाँ निकलती हैं। यह मत स्वातन्त्र्य के भेद से विभिन्न दिशाओं को जाती हैं। नीच उद्देश्य, पाशविक वासना और भोगेच्छा की पगडंडियाँ हरी भरी मालूम होती हैं। थोड़ी ही दूरी पर सब्जबाग दिखाई देते हैं। इसलिए ललचा कर हरे भरे खेतों में पिल पड़ने वाली भेड़ों की तरह हम में से अधिकाँश लोग उधर पिल पड़ते हैं और इस बात को भूल जाते हैं कि इसका परिणाम क्या होगा? ऐसी हरकत करने वाली दूसरी भेड़ों को किसान द्वारा लाठियों से पीटे जाते उन्होंने देखा होता है किन्तु अपनी पीठ पर धमाका हुए बिना उनकी जड़ता दूर नहीं होती। उच्च उद्देश्यों के मार्ग उतने लुभावने नहीं है। हमारी जड़ता दूर पर खड़े हुए अमृत फलों को नहीं देख पाती और पास की कठिनाइयों एवं कम चलने वाले रास्ते को देखकर निराश हो जाती है। ऐसी जड़ता और अदूरदर्शिता भेड़ों को ही शोभा देती है। कहीं तुम भी ऐसी ही भेड़ तो नहीं हो?
निरंतर चलने वाले प्रकृति चक्र में हम अपना कौन सा स्थान ग्रहण कर रहे हैं और हमारा विकास रथ किस मार्ग पर चला जा रहा है? क्या इस बात को सोचने की तुम कोई जरूरत नहीं समझते? जीवन जैसा बहुमूल्य भण्डार किन कामों में खर्च हो रहा है क्या इसका हिसाब रखना तुम्हारी दृष्टि में व्यर्थ है? अखंड ज्योति के पाठकों से मैं ऐसी आशा नहीं कर सकता। मेरा विश्वास है कि वे अपनी स्थिति के बारे में कुछ अधिक जानने के लिए प्रयत्नशील होंगे। इस देव दुर्लभ मानव शरीर में विचार शक्ति ही मुख्य है। शास्त्र कहता है ‘मनानत् मनुष्य’ अर्थात् मनन करने से ही मनुष्य है। हम सोच विचार सकते हैं यही हमारी विशेषता है। कितनी गुत्थियों को हमारा मस्तिष्क सुलझाता है। किसी में झगड़ा हो रहा है तुम जाकर शान्त करते हो, आर्थिक कठिनाई का हल निकालते हो, असंतुष्ट लोगों को संतुष्ट करते हो। सामाजिक प्रथाओं में परिवर्तन करते हो, विद्या प्राप्त करते हो, नई व्यापारिक योजनाएं बनाते हो, गुप्त मंत्रणाएं करते हो, षडयंत्र रचते हो, ऐसे ऐसे पेचीदा मामलों को समझते हो, उनका स्वरूप निर्माण करते हो और वह वह तरकीबें सोचते हों जिन्हें देखकर दंग रह जाना पड़ता है। इतनी योग्यता रखते हुए भी ऐ मेरे अभिन्न! अपने बारे में कुछ क्यों नहीं सोचते कि तुम क्या हो? कैसे हो? क्या कर रहे हो? कहाँ जा रहे हो?
बाहरी कार्यों में जितना प्रयत्न करते हो उसका एक अंश अपने लिये भी करो। दूसरों की हजामत बना कर अपना मतलब गाँठने में तो तुम बड़े प्रवीण हो, इस कला में काफी निपुणता प्राप्त कर चुके हो, पर तथ्य के स्थान पर आकर क्यों गड़बड़ा जाते हो। उसकी जेब तो बड़ी सफाई से काट लाये पर मिले हुए द्रव्य को इसके घर में क्यों पटक दिया? तुम तो बहुत सयाने हो पर यहाँ चौकड़ी क्यों भूलते हो? होशियारी बहुत अच्छी चीज है। कमाऊ पूत होना बहुत बढ़िया काम है। हर किसी से अपना मतलब निकाल लेना तुम्हें आता है। पर मेरे अच्छे भाई, उसे क्यों नहीं पहचानते जो तुम्हारी भी जेब काट लेता है और अपने मतलब के लिये तुम्हारा वैसा ही उपयोग करता है जैसे मदारी, एक चालाक बन्दर से खूब नाच-कूद करवाता है और उसकी कमाई को खुद हजम कर जाता है। तुम्हारी होशियारी की परीक्षा का स्थल यह है। यहाँ फेल होकर तुम उस गधे के उदाहरण बनते हो जिसने सारे दिन सुभोज्य पदार्थ लादे थे किन्तु शाम को सड़े गले भूसे पर बाँध दिया गया था।
हम लोग अपने को भूल जाते हैं अपने घर को ठीक तरह नहीं पहचानते इसलिये कठिन श्रम साध्य अपनी कमाई दूसरों के घर पटक आते हैं। इसे कैसी चालाकी, बुद्धिमानी, होशियारी समझें जरा तुम्हीं मुझे समझाओ।
चलो, उठो, उस एकान्त कोठरी में चले जाओ और अपने शरीर व मन को शान्त करके अपने बारे में विचार करो, सोचो, मनन करो कि हमारी प्रगति किस दिशा में हो रही है, हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं, हमारी मोटर किस सड़क पर दौड़ी जा रही है, खेत के चरने का क्या परिणाम होगा। जिस प्रकार एक गहरे षड़यंत्र का सुराग लगाया जाता है वैसे ही पता लगाओ कि हम अपना जीवन रूपी अमूल्य निधि खर्च करके जो कमाते हैं वह हमारे ही पास रहता है या बीच में ही हड़प लिया जाता है? अपने बारे में पूरी तरह से विचार करो तो तुम्हें बहुत नई बातें मालूम होंगी और समझ सकोगे कि किस तरफ बढ़ रहे हो किन्तु वास्तव में किस तरफ बढ़ना चाहिए था।
(ले. पं. कालीचरण शर्मा रुई की मंडी आगरा)
मनुष्य के स्वभाव विचार और आदतों का प्रभाव शरीर पर पड़ता है। यह बात अखण्ड ज्योति के पाठक अच्छी तरह जानते होंगे। महात्माओं के चेहरे से शान्ति और दुराचारियों पर से क्रूरता टपकते हुए एक बच्चा भी देख सकता है। चेहरे, आकृति और उसके आसपास का वातावरण ऐसा हो जाता है जिसके द्वारा दूसरों के मनोगत भावों का पता लग जाता है। किसी अज्ञान शक्ति द्वारा लोहा चुम्बक की भाँति अपने समान स्वभाव वालों के प्रति आकर्षण और विरुद्ध विचार वालों के प्रति अरुचि उत्पन्न होती है। मानसिक चेतना की ऊँची भूमिका में जगे हुए महात्मा इस बात का पता भली भाँति लगा लेते हैं कि किसकी आदतें कैसी हैं और वह क्या इच्छाऐं धारण किये हुए हैं। परन्तु साधारण लोगों के लिये यह बातें उतनी आसान नहीं है। बुरे आदमियों के सहवास में उन्हें सन्देह और अरुचि की जो गंध आती है यह इतनी सूक्ष्म होती हैं कि बारीकी के साथ विचार किये बिना कुछ निश्चित ज्ञान नहीं होता जिन्होंने सांसारिक चतुरता तो प्राप्त कर ली है, पर आध्यात्मिकता की ओर नहीं उतने हैं। वे दूसरों के मनोगत भावों की जानने में प्रायः अधिक सफल नहीं होते।
मानसिक चेतना के बाद शारीरिक बनावट का नम्बर आता है। स्वभाव के लक्षण शरीर पर भी प्रतीत होते हैं। चिरस्थायी आदत के बाद उसका प्रभाव शरीर पर प्रत्यक्ष हो जाता है। आदत बदलते ही इन चिन्हों में भी परिवर्तन होने लगता है। नई और अस्थिर आदत के लक्षण शरीर पर अंकित होने आरम्भ तो हो जाते हैं, पर आँखों द्वारा देखने लायक ये तभी बनते हैं जब कुछ समय पुराने और अधिक स्थायी हो जाते हैं। जो लोग इन लक्षणों को जानते हैं वे शरीर पर उन्हें देखकर यह जान लेते हैं कि इस आदमी का स्वभाव कैसा है और उसके अनुसार भविष्य कैसा होना चाहिए।
इस लेख में हम यही बताने का प्रयत्न करेंगे कि किन शारीरिक लक्षणों से मनुष्य के स्वभाव के बारे में क्या- क्या जाना जा सकता है। आरम्भ में इन्हें पहचानने में कुछ कठिनाई होती है परन्तु अभ्यास के बाद यह सब सुलभ हो जाता है।
जिस आदमी की कनपटी सपाट हो, समझना चाहिए कि यह आत्म विश्वासी है, अपने ऊपर भरोसा रखता है। उभरी हुई कनपटियाँ और चौड़ा मस्तक इस बात का साक्षी है कि इस व्यक्ति में पढ़ने लिखने की रूचि और किसी भी बात को शीघ्र समझ लेने की शक्ति है। सकुड़ा हुआ मस्तक बुद्धि में न्यूनता प्रकट करना है। परन्तु यदि मस्तक में सकुड़्न पड़ती हो, झुर्रियों की रेखा सी पड़ जाती हो तो यह बात नहीं होती, ऐसा व्यक्ति छोटा मस्तक होते हुए भी बुद्धिमान होता है। गड्ढ़ेदार कनपटी नीच प्रकृति वालों की होती है।
जिस व्यक्ति की नाक जड़ में से ही कमानीदार हो कुछ गोलाई लिये हुए हो उसके विचार और निश्चय दृढ़ होने चाहिये। विचारशील, अध्ययन प्रिय और खोज करते रहने के स्वभाव वालों की नाक लम्बी तथा सिरे पर उठी हुई या मुड़ी हुई होती हैं। यदि वह सिरे पर झुकी हुई बैठी हुई हो तो कुशलता, चतुराई या हँसने वाला स्वभाव प्रकट करती है। छोटी या चिपटी नाक आत्म निर्भरता की द्योतक है। मोटी नाक वाले व्यक्ति धनी देखे जाते हैं। जिनके नथुने चौड़े होते हैं वे न तो भूखों मरते हैं और न अन्य प्रकार के कष्टों से भरा हुआ जीवन व्यतीत करते हैं।
आँखें यदि एक दूसरी से ज्यादा दूर हो तो सच्चाई प्रेम और सरलता का होना बताती हैं किन्तु यदि बहुत ज्यादा दूर हो तो मूर्खता और बुद्धूपन का प्रमाण होती है, आपस में एक दूसरे से पास- पास जिनकी आँखें होंगी वह चालाक और धोखेबाज होगा। छोटी पलकें दुराचार, लम्बी पलकें कविता प्रेम, मोटी पलकें ईमानदारी तथा पतली पलकें तीव्र बुद्धि का होना प्रकट करती हैं। जिस व्यक्ति की दोनों भौंहें खुली हुई हो वह चंचल स्वभाव और शक्ति प्रिय होगा। जिसकी भौंहे मिली हुई हैं वह कलाओं का प्रेमी होना चाहिए।
इसी प्रकार लम्बे कानों वाला झगड़ालू, बड़े कानों वाला सज्जन और दीर्घायु, छोटे कानों वाला स्वार्थी और टेढ़े मेढ़े शकल के कानों वाला मूर्ख होता है।
छोटे होट जो आपस में मिल जाते हो अर्थात आगे का सिरा बाहर न निकला रहता हो इस बात के प्रतीक हैं यह व्यक्ति मितभाषी, मधुर भाषी और गंभीर है। जिसका मुँह अधिक फटा हुआ हो, होट लम्बे हो वह मजाक पसंद और छिछोरे स्वभाव का होगा। गोलाई लिए हुए ऊपर का होट स्वभाव की सुन्दरता बताता है। साथ ही यदि वह मोटा भी हो तो अच्छे चरित्र का होना प्रमाणित करता है। ऐसे लोग जिनके ऊपर का होट पतला और नीचे का मोटा होता है अक्सर विषयी और लम्पट होते हैं।
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(ले. रामसिंह चौहान, ऑवलखेड़ा)
वह मुट्ठी बांधकर आया था और हाथ पसार कर चला गया। अखण्ड ज्योति के चित्र पृष्ठ पर जो तीन फोटो छपे हुए हैं उनमें बीच वाले चित्र को जरा ध्यान से देखिए। जोश उनके चेहरे में से मानों टपक पड़ रहा हैं। झुकी हुई भौंह, स्थिर दृष्टि, होटों की गंभीरता अपना एक खास अर्थ रखती हैं। चेहरे की सरबटें जिन भावनाओं को प्रकट कर रही हैं उनसे किसी का भी हृदय प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। यह तीस वर्षीय योद्धा अपनी भरी जवानी में फूल की तरह हँसता हुआ अभी कल परसों इसी २५ मई को बैसाखी पूर्णिमा को इस दुनियाँ से चला गया।
यह था कौन? आगरा जिले के एक छोटे से नगले में पैदा हुआ था, मामूली सी हिन्दी की शिक्षा पाई थी, गरीब घराने में जन्म लिया था। फिर भी यह बहुत कुछ था। रग- रग में अदम्य उत्साह, छाती में धधकती आग, हृदय में अपूर्व जोश, मन में दृढ़ निश्चय और चेहरे पर हँसी की धारा लिए हुए यह पथिक उद्देश्य और सिद्धान्तों की लकड़ी के सहारे एक निश्चित मार्ग पर चला जा रहा था। विघ्न बाधाओं ने उसे हरचंद रोका। प्रलोभनों ने बार- बार फुसलाया। इसने उनकी पीठ थपथपाई और वैरागी की तरह पल्ला झाड़कर आगे चला गया। आज तो वह बिल्कुल ही चला गया।
इसका नाम कमलसिंह चौहान था। ऑवलखेड़ा के एक छोटे नगले गढ़ी हज्जू में यह पैदा हुआ था। खेलने के दिन व्यतीत होते ही यह सैलानी घर छोड़कर परदेश चल दिया। अभी जी. आई. पी. रेलवे में नौकरी कर रहा है तो अभी पूना में ।। अभी बम्बई में दुकान लिये बैठा है तो अभी राजपुताने की सैर कर रहा है। बीस वर्ष की उम्र तक पहुँचते- पहुँचते यह अपने घुमक्कड़ पन से ऊब गया। सन् १९३० में महात्मा गांधी ने सत्याग्रह की रण भेरी बजाई तो उसका क्षत्रिय रक्त उबल पड़ा। पिछले सारे मनसुबे को उठाकर एक कोने में पटका और सर पर कफन बाँधकर शहीदों की टोली में जा मिला। राजनीति में लोग अक्सर हाथ पाँव बचा कर और मौके को देखकर काम करते हैं, पर यह अल्हड़ बछेड़ा उन बातों को जानता हुआ भी नहीं जानता था। उसके दिल की आग भीतर ही भीतर उसे जलाये डालती थी। एकबार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार नहीं, इन दस वर्षों में उसने पूरे सात बार जेल काटी। जरार के काण्ड में घोड़ों की टापों से कुचल डाला गया। फिर भी वह मरा नहीं, मृत्यु से लड़ा और लोट- पोट कर उठ खड़ा हुआ।
केवल जोश ही नहीं, होश भी उसने सीखा था। सत्याग्रह बन्द होते ही दूने उत्साह के साथ रचनात्मक कामों में जुट गया। लोगों ने देखा कि वह खद्दर बुनना सिखाता है, सिर पर खादी की गठरी रख कर बेचता है, बीमारों को दवाऐं देता है, दौड़- दौड़ कर गाँवों में लोगों को रचनात्मक साहित्य पढ़वाता है, हरिजनों को शिक्षा देता है, और सर्व साधारण में सुविचार फैलाता है। लोगों ने उसका विरोध किया, बुरा बताया, दोष लगाये, बहिष्कार किये फिर भी वह विचलित नहीं हुआ। लोगों के भोलेपन को उसने एक मुस्कराहट के साथ देखा और सारे विरोधों को हँस कर टाल दिया। हिन्दू धर्म की रक्षा पुकार कानों में आई तो भी वह कमर कस कर खड़ा हो गया। ग्वालियर आर्य पाठशाला की अध्यापकी छोड़कर हैदराबाद जेल में पत्थर फोड़ने के लिये चला गया।
आज के सुधार, देश का उद्धार करना चाहते हैं, पर उनमें से बहुतों के हृदय में नीच वासनाऐं भरी होती हैं। कुछ ही आगे बढ़ने पर पार्टीबाजी की बीमारी में वे इतने ग्रसित हो जाते हैं कि जरा भी स्वतन्त्र विचार रखने वाला उन्हें दुश्मन प्रतीत होने लगता है। ऐसी दुष्ट वृत्तियों से घिरे हुए साथी उसके विरोधी बन गये। फिर भी किसी को इतना साहस न हो सका कि उसके चरित्र पर उँगली उठावे। जेल की यातनाओं ने, लाठियों की मार ने, आर्थिक कठिनाइयों ने, साथियों के दुर्व्यवहार ने उसका शरीर जर्जर कर डाला था। आये दिन उसकी नाक में से खून का फुहारा छूट निकलता था। जरा सी गर्मी में चक्कर आ जाते थे। इन दिनों वह झगड़ों से ऊब गया था और आध्यात्मिक शान्ति प्राप्त करने की प्यास उठ खड़ी हुई थी। अखण्ड ज्योति सम्पादक ने अपने इस बाल सखा को अपने ही पास बुला लिया था। और वह आगरे रह कर साधन तथा प्रचार कार्य करने लगा था। गत १५ मई को ज्वर आया, जो पाँच दिन में उतर गया। स्वास्थ्य सुधारने की इच्छा से आगरे से गाँव आया था किन्तु यहाँ फिर ज्वर आया। ज्वर ने कहा- चलों। वह चुपचाप सिर झुका कर उसके साथ चला गया।
वह चला गया। जहाँ सबको जाना है वहाँ वह भी चला गया। साधारण तौर से नहीं, शहीदों की भाँति। तलवार से उसका सिर कटता किसी नहीं देखा, पर जानने वाले जानते है कि बूँद- बूँद करके उसने अपना सारा जीवन रस मातृभूमि के लिए टपका दिया था। अन्तिम घड़ी उसके पास खोखला शरीर बच रहा था, उसे उसने हँस कर छोड़ दिया।
कोलाहल मयी दुनियाँ अपने नाच रंग में कुछ क्षण बाद उसे भूल जायेगी। पर स्वाधीन देश की महान भित्ति के गारे चूने का कोई निरीक्षण करेगा तो देखेगा कि इस मौन संन्यासी को रक्त ने उसे कितनी दृढ़तर बना दिया है।
(ले. श्री. नारायण प्रसाद तिवारी कान्हीवाड़ा)
चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र इन चारों में और विशेषकर शुक्ल पक्ष में बाई नाड़ी चलना शुभ है। रवि, मंगल और शनि इन वारों में और विशेषकर कृष्ण पक्ष में दक्षिण नाड़ी चलना शुभदायक है। रविवार को सूर्योदय पर सूर्य नाड़ी और चन्द्रवार को चन्द्र नाड़ी चलना शुभ माना गया है। चन्द्र स्वर में शुक्ल पक्ष का (दूज को) प्रथम चन्द्र दर्शन होना शुभ कहा गया है।
उदयं चन्द्र मार्गेण सूर्येण्णस्तमणं यदि।
तदा ते गुणसंधाता विपरीतं विवर्जयेत।।
यदि दिन चन्द्र के स्वर से उदय और सूर्य के स्वर से अस्त हो तो इससे अनेकों गुण उत्पन्न होते हैं और यदि इसके विपरीत हो तो अनेकों दोष होते हैं।
दिन को जो चन्दा चलै, रात चलावे सूर।
तो यह निश्चय जानिये, प्राण गमन है दूर।।
स्वाभाविक यह प्रश्न हो सकता है कि प्राकृतिक चलते हुए स्वर को यदि वह अशुभ भी है तो क्या किया जावे? मनुष्य बहुत थोड़े अभ्यास से स्वर बदल सकता है और इच्छा पूर्वक स्वर चला सकता है। हाँ कभी- कभी जबकि कोई आपत्ति जनक घटना घटने वाली ही होती है तो स्वर हठीला हो जाता है, किन्तु जब भी मनुष्य प्रयत्न से बहुत कुछ स्वर बदल सकता है जिसके लिये कुछ नियम इस प्रकार है।
(१) जो स्वर नहीं चल रहा है उसे अंगूठे से दबावे और जिस नथुने से साँस चलता है उससे हवा खींचे फिर जिससे श्वाँस खींची है उसे दबा कर पहले नथुने से यानि जिससे स्वर चलाना है उससे श्वाँस छोड़े। इस प्रकार कुछ देर तक बार- बार करे। श्वाँस की चाल बदल जावेगी।
(२) जिस नथुने से श्वाँस चल रही हो उसी करवट लेट जावे तो स्वर बदल जावेगा। इस प्रयोग के साथ पहला प्रयोग करने से स्वर और भी शीघ्र बदलता है।
(३)जिस तरफ का स्वर चल रहा है उस ओर कांख में कोई सक्त चीज कुछ देर दबा रखो। पहले और दूसरे प्रयोग साथ यह प्रयोग करने से शीघ्र स्वर बदलेगा।
(४) घी खाने से वाम स्वर और शहद खाने से दक्षिण स्वर चलता कहा जाता है।
(५) चलित स्वर में पुरानी स्वच्छ रुई का फोहा रखने से स्वर बदलता है।
शुभ या अशुभ कार्य के लिये प्रस्थान करते समय चलित स्वर के शरीर भाग को हाथ से स्पर्श कर उसी चलित स्वर वाले कदम को (यदि चन्द्र नाड़ी चलती है तो ४ बार और सूर्य स्वर है तो ५ बार) जमीन पर पटक का प्रस्थान करे।
चन्द्र स्वर में पूर्व और उत्तर की ओर नहीं जाना चाहिये और सूर्य स्वर में पश्चिम तथा उत्तर को जाना मना है।
दूर के युद्ध में चन्द्र स्वर (इड़ा नाड़ी) विजय देने वाला है और निकट के युद्ध में सूर्य स्वर (पिंगला नाड़ी) इस काम के लिये ठीक है। जिधर का स्वर चलता हो उसी ओर का पैर पहले आगे धर कर यात्रा करे, अवश्य फलीभूत होगा।
यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना ह तो अचलित स्वर (जो स्वर न चल रहा हो) के पैर को पहले आगे बढ़ा कर प्रस्थान करना चाहिये और अचलित स्वर की ओर उस पुरुष को करके बातचीत करना चाहिये। इस रीति से उसका क्रोध शान्त कर अपने मनोरथ में सिद्धि प्राप्ति होगी। गुरु, मित्र, ऑफिसर, राज दरबार से जबकि वाम स्वर चलित हो उस समय वार्तालाप और कार्यारंभ करना श्रेयस्कर है। यात्रा के समय विवाह में नगर इत्यादि के प्रवेश आदि शुभ कार्यों में चन्द्र स्वर सदा सिद्धि देने वाला कहा गया है।
जो जीवांग (अर्थात जिधर का स्वर चलता हो) उसी अंग में वस्त्र पहिन कर जीवं रक्ष, जीवं रक्ष ऐसा मन्त्र जपता है वह विजयी होता है।
सूर्य स्वर में किसी भी सवारी अश्व, मोटर साईकिल इत्यादि पर दाहिना पैर पहले सवारी पर रख कर बैठना उत्तम है। मासिक धर्म के ५ वे दिन जबकि पुरुष की सूर्य तथा स्त्री की ईड़ा नाड़ी चलती है उस समय गर्भदान होने से अवश्य पुत्र प्राप्ति होगी इसके विपरीत कन्या, तथा शुषुम्ना स्वर में गर्भदान होने से सन्तान किसी भी इन्द्रिय से हीन होगी।
बाँझपन मिटाने के लिये इसकी परीक्षा करने वालों से निवेदन है कि मासिक धर्म के पहले पन्द्रह दिन के अन्दर जबकि पुरुष की तीव्र सूर्य नाड़ी तथा स्त्री की तीव्र चन्द्र नाड़ी चलती हो संगम किया जावे। यदि स्वाभाविक न चले तो उपर्युक्त रीति से चलाने का प्रयत्न करना चाहिये।
तत्व
अब में स्वरोदय के अन्य विषयों पर विचार करने के पूर्व तत्व पर सूक्ष्म प्रकाश डाल देना चाहता हूँ क्योंकि बिना तत्व ज्ञान के अन्य विषयों की विवेचना स्पष्ट न होगी। यह कहा जा चुका है कि तत्व पाँच हैं।
धाती अरु आकाश है, और तीसरी धौन। पानी पावक पाँच यों, करत श्वाँस में गान।।
सम्पूर्ण लोकों में स्थित जीवों की देह तत्वों से भिन्न नहीं है अर्थात सभी पंच भूतात्मक हैं परन्तु नाड़ी भेद भिन्न हैं।
लोग कहते हैं कि भूख लगने पर कुछ खा लेना चाहिये वरना भूख मर जाती है। यह भूख मरने वाली कहावत बच्चे तक जानते हैं पर बात विचारणीय है कि भूख मरी कैसे? इसका उत्तर यही है कि तत्व तथा स्वर बदल जाता है। अग्नि तत्व भूख पैदा करती है। आकाश तत्व वात कारक है अतएव भूख लगने पर अग्नि तत्व में अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए कुछ न रहने से खाली घर में आकाश प्रवेश कर अग्नि को शीतल कर वायु अपना अधिकार जमाती है जिससे वात पैदा होती है ।। आपने देखा होगा कि वात प्रकृति का पुरुष देखने में तो मोटा अवश्य दीखेगा किन्तु उसे सदा भूख कम लगती है और सदा वह चूरन की पुड़ियों से पेट भरना अपना नियम बना लेता है। आप चूल्हे में आग जलाइए। यदि उसमें और भी लकड़ियाँ बराबर न लगाते रहेंगे तो उन लकड़ियों की अग्नि क्रमशः शीतल हो जावेगी। इसलिए अग्नि तत्व तथा सूर्य स्वर में भोजन करना उत्तम माना गया है।
किस समय कौन से तत्व का अधिकार है इसके जानने के लिए इस विषय में बहुत अभ्यास की आवश्यकता है। उषा काल में तत्व परीक्षा का अभ्यास उत्तम हैं।
(१) के छेदों में दोनों मध्यमा (बीच की अंगुली) दोनों आँखों पर तर्जनी तथा अनामिकाओं कनिष्ठा से आठों को बन्द करे, इसे पण्मुखी मुद्र कहते हैं।
यदि पीला रंग दीखे तो पृथ्वी, सफेद हो तो जल, लाल हो तो अग्नि, काला या नीला हो तो वायु तत्व समझना चाहिये और विचित्र मिश्रित रंग दीखें तो आकाश तत्व समझना चाहिये।
(२) दर्पण में देख कर श्वाँस छोड़े, उसमें यदि चौकोण आकार हो तो पृथ्वी, अर्धचन्द्र हो तो जल, त्रिकोण हो तो अग्नि, वर्तुलाकार हो तो आकाश तत्व समझना चाहिये।
(३) मुँह का स्वाद मीठा हो तो पृथ्वी, कसैला हो तो जल, तीक्ष्ण हो तो अग्नि, खट्टा हो तो वायु और कड़वा हो तो आकाश तत्व समझना चाहिये।
(४) पाँच रंग की गोली बना कर जेब में डाले और एक गोली हाथ डाल कर निकाले, जिस रंग की गोली निकले वही तत्व की उस समय प्रधानता समझी जावे (यह निकृष्ट नियम है)
(५) वायु का स्वर आठ अंगुल चलता है, अग्नि का स्वर चार, पृथ्वी का बारह, जल का सोलह अंगुल चलता है, आकाश तत्व की चाल ही निराली है कोई नियमित रूप से नहीं चलता।
पृथ्वी तत्व में स्थिर कर्म, जल तत्व में चर कर्म, अग्नि तत्व में क्रूर कर्म, वायु तत्व में मारण उच्चाटन कर्म करना वर्जित है, क्योंकि फलीभूत नहीं होता। कारण आकाश शून्य है। पृथ्वी तत्व और जल तत्व दोनों शुभ दायक है। अग्नि तत्व मृत्यु दायक, वायु तत्व क्षय दायक है। पृथ्वी तत्व विलम्ब से लाभदायक है। जल तत्व शीघ्र ही फलदायक हैं। अग्नि और वायु तत्व हानिकारक है। दिन में पृथ्वी तत्व और रात्रि में जल तत्व सहज शुभ दायक है। जीवन में, जय में, खेती के कार्यों में, धन पैदा करने में, मन्त्र जप में, युद्ध के प्रश्न में, आने जाने में, पृथ्वी तत्व उत्तम है।