Quotation

नेकी और भलाई को अपने अंदर धारण कर लेने से मनुष्य बुराई की सम्पूर्ण शक्तियों से सुरक्षित रहता है और परीक्षा के समय और भी दृढ़ हो जाता है। इन गुणों का अपने में उत्पन्न करना मानो अक्षय सुख और सफलता प्राप्त करना है।

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तुम्हें अपनी निर्बलताओं को दूर करने के लिए प्रतिदिन उद्योग करना चाहिए। निरंतर के प्रयत्न से हर कोई बुराई दूर हो सकती है।

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संसार का सारा ज्ञान पुस्तकों में भरा है। जिन बेचारों में पठन पाठन का व्यसन नहीं है वे सचमुच में बड़े अभागे हैं।


दिव्य विभूतियां कैसे प्राप्त हों?

तुम अपने मन में जैसे विचार करते हो वैसे ही बन जाते हो। इसलिए वैसे विचार करो जैसे कि तुम बनना चाहते हो। मन की भावनाओं का असर जीवन के कार्यों पर और उन कार्यों का असर शरीर पर पड़ता है। यदि तुम अपने शरीर को उन्नत बनाना चाहते हो, जीवन की गतिविधि में महत्वपूर्ण परिवर्तन करना चाहते हो तो पत्ते-पत्ते पर मत भटको! जड़ को तलाश करो। जीवन की सम्पूर्ण समस्याओं का आधार मन है और उस मन कार्य विचार है। छोटी परिस्थिति में हो तो भी कुछ हर्ज नहीं। विचार उच्च रखो। स्वार्थ, कपट, ढोंग और हिंसा के विचार मनुष्य के सब से बड़े शत्रु हैं, सिंह और सर्प की तरह इनसे दूर रहो।

परोपकार, प्रेम, दया और त्याग के शुभ विचारों से अपना हृदय भरपूर रक्खो। किसी की सक्रिय सहायता न कर सको तो भी दूसरों के लिये दो बूँद सहानुभूति के आँसू बहा दो। तुम्हारे विचार जितने पवित्र होते जायेंगे उतना ही हृदय विशाल बनता जायगा। तुम्हारा हृदय जितना विशाल होगा उसमें उतनी ही अधिक विभूतियाँ परमात्मा द्वारा भर दी जायेंगी।


अखण्ड ज्योति के नियम

(1) अखण्ड ज्योति का वार्षिक मूल्य 1 रु0 एक प्रति का नौ पैसा है। मूल्य मनीआर्डर से ही भेजना चाहिये। बी0 पी0 मंगाने पर। अधिक देने पड़ते हैं।

(2) लेख या कविताएँ केवल आध्यात्मिक योगशास्त्र, तन्त्र विज्ञान, मैस्मरेजम, मानसिक शक्तियों की विवेचना, प्राकृतिक चिकित्सा तथा सदाचार पर ही आने चाहिए। अन्य विषयों को स्थान न दिया जायेगा। लेख जहाँ तक हो सके छोटे होने चाहिए।

(3) उत्तर के लिए जवाबी कार्ड या टिकट भेजना चाहिए अन्यथा उत्तर नहीं दिया जाएगा।

(4) प्रत्येक अंक जरूरत भर ही छपाया जाता है, इसलिए पुराना अंक एक भी नहीं बचता। पुराने अंक लेने के लिए कोई सज्जन पत्र व्यवहार न करें।

(5) अखण्ड ज्योति के मूल्य में कमी करने के लिए पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिए अखण्ड ज्योति के ग्राहक नहीं बनाये जाते।

(6) अखण्ड ज्योति की एजेन्सी कम से कम 6 प्रति, प्रति मास लेने पर दी जाती है। जिन्हें एजेन्सी लेनी हो वे कमीशन आदि के बारे में पत्र व्यवहार करें।

(7) अखण्ड ज्योति प्रति मास 20 तारीख को निकल जाती है। हमारे यहाँ से दो बार जाँच कर सब ग्राहकों के पास अखबार भेजा जाता है। फिर भी जिनको एक सप्ताह के अन्दर न मिले उन्हें रुष्ट न होकर डाकखाने उत्तर सहित हमें लिखना चाहिए।

(8) अध्यात्म विद्या प्रेमियों के चित्र अखण्ड ज्योति में छापे जाते हैं। पाठकों से प्रार्थना है कि वे लोकसेवी, सदाचारी एवं ईश्वर भक्त सज्जनों के परिचय भिजवाने की कृपा करें।

पत्र व्यवहार का पता-

मैनेजर-अखण्ड ज्योति फ्रीगंज, आगरा।


सत्य की ओर


सत्य की ओर (कविता)

(श्री. जिज्ञासु)

अब तक भूले, अब क्यों भूले, गलती क्यों दुहरावें।

जिसमें धोखा जाब रहे हैं, उसमें क्यों फंस जावें॥

क्यों प्रसाद में भटकें, क्यों आलस में समय बितावें।

चलो चलें अब बन्धन काटें आगे पैर बढ़ावें॥

पछतावें न डरें घबरावें, भ्रम न करें ललचावें।

चलें सत्य की ओर और उन को सत्-मार्ग दिखावें॥

गिरी पर चढ़ कर शंख बजावें, निद्रित विश्व जगावें।

जीवन ज्योति जगावें जग में दिव्य प्रभा फैलावें॥

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घृणित दासता की कड़ियों को तोड़ मरोड़ धरेंगे।

सत्य; सत्य के लिये जिएंगे, उसके लिए मरेंगे॥


चौबीस घंटे का साथी।

“मुझे देखो- मेरे अंदर देखो; मैं तुम्हें दुनिया से बचा लूँगा” किसी धर्म पुस्तक में यह शब्द ईश्वर की ओर से कहे गये हैं। परमात्मा की प्रतिज्ञा है कि ‘तेषामहं समुद्धर्ता मृत्यु संसार सागरात्’ मैं उन्हें मृत्यु रूप संसार सागर से बचा लेता हूँ जो मुझे अपने में देखते हैं। उसे अपने में देखने से - अपने साथ अनुभव करने से, अपना सच्चा मित्र बनाया जा सकता है। और उस सच्चे मित्र की शक्ति भी इतनी है कि हमें क्षण भर में प्राणान्तक कष्टों से बचा लेता है उसे अपना न बनाना एक भयंकर हानि करना है।

हम लोग मित्रों की तलाश में रहते हैं। जिसके जितने अधिक मित्र होते हैं, वह उतना ही प्रसन्न रहता है क्योंकि साथियों से सहारा मिलता है। हमारी हंसी खुशी को वे बढ़ाते हैं, उन्नति का उपाय बताते हैं, कठिनाइयों में सहायता देते हैं और जो कुछ उनसे बन पड़ता है मित्र के लिए करते है। जिसकी स्त्री मित्र है उसके लिए घर स्वर्ग है, जिसके स्वजन सहायक हैं उसके लिए समाज स्वर्ग है और जिसकी जनता मित्र है उसके लिए देश स्वर्ग है। ‘शत्रु’ शब्द की कल्पना करते ही कलह, हानि, कष्ट, क्लेश की दुखदायी तस्वीर आँखों के सामने आ खड़ी होती है हम उससे घृणा करते हैं और इसीलिये मित्रों की तलाश में रहते है जिसने किसी योग्य व्यक्ति से मैत्री कर ली वह प्रसन्न होता है और जिसने सच्चा मित्र पा लिया वह अपने को धन्य समझता है। तुमने उन आदमियों के अभियान को देखा होगा जिन्होंने बड़े आदमियों को मित्र बना लिया वे खुद कुछ न होते हुए भी मित्र के बल पर फूले फिरते हैं। ऊंचे हाकिमों के अर्दली चपरासियों तक के मिज़ाज सातवें आसमान पर रहते हैं। कहावत है कि “हिमायत की गधी ऐरावत को लात मारती है” दूध के साथ पानी, फूल के साथ धूल, गेहूं के साथ में कोदों उन्हीं के पद को प्राप्त होते हैं यह सब जानते है।

तात्पर्य यह है कि मनुष्य जीवन में सहायकों-मित्रों का स्थान बहुत ऊंचा है। स्वजन, कुटुम्बी, परिवार, सहकारी, सेवक यह सब किसी प्रकार सहायक ही हैं इसीलिए हमारा जीवन प्रसन्नता से भरा हुआ है यदि यह सब या इनमें से अधिकाँश अपने शत्रु बन जायं तो देखिए कि जीवन कैसा क्लेशमय बन जाता है। एक दार्शनिक की दृष्टि में साँसारिक समस्त संपत्तियों में मित्र का मूल्य सबसे अधिक है।

हम जानते है कि अखण्ड ज्योति के पाठकों के अनेक मित्र होंगे और वे इस बात की तलाश में होंगे कि और भी कोई उपयोगी व्यक्ति मिले तो उससे मित्रता बढ़ावे। क्या तुम ऐसा नहीं चाहते? यदि चाहते हो तो तुम्हें एक ऐसे व्यक्ति से मित्रता करने की सलाह देते हैं जो चौबीस घंटे का साथी हो सकता हैं। दूसरे मित्र कुछ घंटे से तुम्हारे साथ रह सकते हैं वे एक परिमित समय में तुम्हारे साथ रह सकते है और जो मदद कर सकते हैं वह शरीर और मन तक पहुँचती है फिर उन बेचारों की सहायता की शक्ति भी बहुत सीमित है। जब तुम दुःख दर्द से छटपटाते हो तो मित्र पड़ोसी सान्त्वना देते हैं, सहानुभूति प्रकट करते हैं, पर उनसे कुछ विशेष लाभ नहीं होता तुम्हारी व्याकुलता में कोई अधिक कमी नहीं होती। क्योंकि उन की ताकत बहुत थोड़ी है, दैवी विपत्तियों में जैसे तुम किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाते हो वैसे ही वे भी हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाते हैं। नकली और खुशामदी मित्रों की बात तो छोड़ो जो श्रेष्ठ और अच्छे साथी मालूम पड़ते हैं, वे भी विपरीत परिस्थितियों में विपरीत विरोधी या उपेक्षा भाव धारण कर सकते हैं। किसी मित्र को हानि पहुँचाओ, खुद भ्रष्टाचारी हो जाओ, दरिद्र बन जाओ, और कुष्ठ आदि किसी घृणित रोग में फँस जाओ तो फिर अच्छे मित्रों में से भी शायद ही कोई कुछ मदद करेगा।

जिस व्यक्ति को अपना साथी बनाने के लिये तुम्हें उत्साह दे रहे हैं वह ऐसा है जो चौबीस घंटे का साथी हो सकता है। सोते-जागते, खाते-पीते, मल-मूत्र विसर्जन करते, यहाँ और वहाँ सब जगह सर्वत्र साथ रहता है। भीतर अन्तस्थल तक पहुँच सकता है। उसका विरोध करने पर या दुर्दशा में फँस जाने पर भी विरोधी नहीं बनता। और उसकी शक्ति तो साधारण मित्रों की अपेक्षा कई गुनी है। फिर वह अपनी मित्रता की एवज भी कुछ नहीं माँगता। ऐसा अच्छा और सस्ता मित्र दूरबीन लेकर समस्त पृथ्वी को ढूंढ़ने पर भी और कोई नहीं मिल सकता।

वह मित्र परमात्मा है। वह चौबीस घंटे का साथी है। सचाई की तरह सच्चा और प्रेम की तरह पवित्र है। माता की तरह उसकी ममता है। खराब बालक अपनी ऐंठ में जब उलटा उलटा चलता है तो भी माता उसके पीछे पीछे रक्षा का प्रयत्न करती है किंतु जब वह सीधा हो कर माता की ओर देखता है तो वह प्रेम से गद् गद् हो जाती है और उसे उठा कर छाती से लगा लेती है। परमात्मा को हम भूले रहते हैं तब भी वह हमें नहीं भूलता किंतु जब उसकी ओर प्रेम की दृष्टि से देखते हैं तो उसकी छाया को अपने अन्दर मुसकराता हुआ देखते हैं।

तुम परमात्मा को अपना मित्र बनाओ। हर घड़ी अपने को उसकी गोदी में बैठा हुआ अनुभव करो। यह मत सोचो कि वह अदृश्य है शरीरधारी नहीं है इसलिये उससे मैत्री किस प्रकार की जा सकती है? जितना ही तुम उसे अपने निकट मानोगे उतने ही निकट वह आता जाएगा। जिस प्रकार अपने सच्चे मित्र के आगे अपनी समस्या रख देते हो और उससे सलाह माँगते हो उसी प्रकार उसके सामने अपना हृदय खोल कर रख दो अपनी उलझनें उसके सन्मुख विस्तारपूर्वक उपस्थित करो और पूछो कि अब क्या करना चाहिये।

जैसे-जैसे अपनी मित्रता बढ़ाते जाओगे, अपने को उसके ऊपर छोड़ते जाओगे वैसे ही वैसे वह तुम्हें अपने प्रगाढ़ आलिंगन में लेता जायगा। ऐसी स्थिति में सारे दुख दर्द ; सुख और शाँति में परिणित होते जाते हैं। तुम्हें उसके स्वर्गीय संदेश अपने अंदर से आते हुए सुनाई देंगे। ऐसे प्रसंग जिन्हें देख कर साधारण आदमी घबरा जाता है और पीड़ा एवं व्याकुलता से छटपटाता है, परमात्मा पर विश्वास रखने वाला अचल रहता है। उसे ऐसा मालूम होता है मानो मैं तो किसी के हाथ का खिलौना मात्र हूँ। अन्तरात्मा के आदेशों का वह निर्माण पूर्वक पालन करता है और जो कुछ भी प्रिय अप्रिय परिणाम मिलता है उसे प्रभु का प्रसाद समझ कर सहर्ष शिरोधार्य करता है।

तुम उस परमात्मा को अपनाओ उसे ही अपना सखा - चौबीस घण्टे का साथी बनाओ अपने हृदय मन्दिर में उसकी मुस्कराती हुई छाया देखो। हर घड़ी अपने को उसी की गोद में सुरक्षित बैठा हुआ देखो। एक शरीरधारी व्यक्ति की तरह उससे बात चीत करो और सम्पूर्ण शरीर को शिथिल करके अपने अन्तरात्मा में से आती हुई दैवी वाणी को सुनो वह तुम्हें हर मामले में चूल्हा फूँकने से लेकर योगाभ्यास तक के कार्यों में सच्ची सलाह देगा और पथप्रदर्शन करेगा। उसकी इच्छा को अपनी इच्छा बना दो। अपने चौबीस घण्टे के साथी पर अपना बोझ डाल कर निश्चिंत हो जाओ तुम पार हो जाओगे और वह तुम्हें पार कर देगा।


व्रत की आवश्यकता

(लेखक - महात्मा गान्धी)

व्रत के महत्व सम्बन्धी कुछ बातें मैं इस लेखमाला में कहीं कहीं लिख गया हूँ। पर जीवन-निर्माण के लिये व्रत कितने आवश्यक हैं, इसका विचार उचित प्रतीत होता है। स्वदेशी को छोड़ कर अपने और सब व्रतों के सम्बन्ध में मैं लिख चुका, अतएव अब हम इन व्रतों की आवश्यकता का विचार करें। ऐसा एक सम्प्रदाय है, और वह प्रबल है, कि जो कहता है, कि अमुक नियमों का पालन तो उचित है, पर उनके सम्बन्ध में व्रत लेने की आवश्यकता नहीं; यही नहीं बल्कि ऐसा करना मन की कमजोरी का सूचक है और हानिकारक भी हो सकता है। दूसरे व्रत ले चुकने के बाद यदि यह नियम असुविधाजनक मालूम हो, या पाप रूप लगे और तो भी उस पर दृढ़ रहना पड़े तो यह असह्य है। उदाहरण के लिये वे कहते हैं कि शराब न पीना अच्छा है, इसलिये न पीनी चाहिये, पर कभी पी ली हो तो क्या हुआ? दवाई के रूप में तो पी लेनी चाहिये, अतः न पीने का व्रत लेना तो गले में हँसली डालना जैसा हुआ? और जैसे शराब का वैसे ही और बातों का भी। भलाई होती हो तो असत्य क्यों न बोलें?

मुझे इन दलीलों में कोई तथ्य नहीं लगता। व्रत अर्थात् अटल निश्चय। अड़चनों- असुविधाओं को लाँघने के लिये ही तो व्रतों की आवश्यकता है। अड़चन उठाते हुए जो टूटे नहीं, वही अटल निश्चय है-बगैर ऐसे निश्चय के मनुष्य उत्तरोत्तर चढ़ ही नहीं सकता - सारे जगत का अनुभव इस बात का साक्षी है- इसका समर्थन करता है। जो पाप रूप है, उसका निश्चय तो व्रत कहा नहीं जा सकता। वह तो राक्षी वृत्ति है। और यदि एक व्रत विशेष, जो पहले पुण्य रूप प्रतीत हुआ हो, और अन्त में पाप रूप सिद्ध हो तो उसे छोड़ने से धर्म अवश्य प्राप्त होता है। पर ऐसी वस्तु के लिये न कोई व्रत लेता है न लेना चाहिये। जो धर्म सर्व-मान्य माना गया है, पर जिस से आचरण की हमें आदत नहीं पड़ी है; उसका व्रत लिया जाता है। ऊपर से दृष्टान्त में पाप का आभास मात्र हो सकता है। ‘सच कहने से किसी को हानि पहुँची तो?’ सत्यवादी ऐसा विचार करने नहीं बैठता। सत्य से जगत् में किसी की हानि नहीं होती, और न होगी। सत्यवादी यह विश्वास रक्खे। यही बात मद्यपान पर लागू होती है। या तो व्रत में दवाई को अपवाद माना हो, या व्रत में शरीर का जोखिम उठाने का निश्चय हो। दवाई के रूप में भी शराब न पीने से देह का नाश हो भी जाय तो क्या? शराब पीने से देह रहेगी, ऐसा इकरारनामा कौन लिख सकता है? और उस क्षण देह बच जाय, पर दूसरे ही क्षण किसी दूसरे कारण से नष्ट हो जाय तो इस की जवाबदेही किसके सिर? और इसके विपरीत देह नष्ट हो तो भले ही हो जाय, पर शराब न पीने के दृष्टान्त का चमत्कारिक प्रभाव शराब के व्यसन में फँसे हुए मनुष्यों पर हो, जगत् को यह कितना बड़ा लाभ है! देह जाय अथवा रहे, मुझे तो धर्म-पालन करना ही है, ऐसा भव्य निश्चय करने वाले ही किसी समय ईश्वर का दर्शन कर सकते हैं।

व्रत लेना कमजोरी का नहीं, बल का सूचक है। अमुक काम करना उचित है, तो फिर वह करना ही चाहिये, इसी का नाम व्रत है। और इसमें बल है! फिर भले ही इसे व्रत न कह कर और किसी नाम से पुकारा जाय। इसमें हर्ज नहीं। परन्तु ‘जहाँ तक बन सकेगा, करूंगा’ अपनी निर्बलता या अभिमान का दर्शन कराता है। फिर वह स्वयं भले उसे नम्रता कहे। इसमें नम्रता की गन्ध तक नहीं। ‘जहाँ तक हो सकेगा’ यह वाक्य शुभ निश्चयों के लिये विष के समान है। मैंने इस बात को अपने जीवन में और दूसरे बहुतेरों के जीवन में अनुभव किया है, देखा है। ‘जहाँ तक हो सकेगा’ वहाँ तक करने का अर्थ है, पहली ही अड़चन में फिसल जाना। ‘यथासम्भव सत्य का पालन करूंगा, इस वाक्य का कोई अर्थ ही नहीं है। व्यापार में यदि इस आशय की कोई चिट्ठी लिखे कि मैं अमुक रकम “यथासम्भव” अमुक तारीख को लौटा दूँगा, तो उस चिट्ठी को चैक या हुँडी के रूप में कहीं भी कोई स्वीकार न करेगा इसी तरह यथा सम्भव सत्य का पालन करने की हुँडी ईश्वर की दुकान पर ‘सिकरी’ नहीं जाती।

ईश्वर स्वयं व्रत की, निश्चय की मूर्ति है। वह अपने नियम से एक अणु भी टले तो ईश्वर न रह जाय। सूर्य महाव्रतधारी है। इससे जग के काल का समय का निर्माण होता है और पंचांगों की रचना हो सकती है। उसने अपनी ऐसी ही साख जमाई है। वह हमेशा उगा है और उगता रहेगा और इसी से हम अपने को सुरक्षित समझते हैं। व्यापार मात्र का आधार एक टेक या साख पर निर्भर है। व्यापारी यदि एक दूसरे से वचनबद्ध न रहें तो व्यापार ही न चल सके। यों ‘व्रत’ एक सर्वव्यापक वस्तु पाई जाती है; तो फिर जब स्वयं हमारे जीवन निर्माण का प्रश्न उठता है, ईश्वर दर्शन का सवाल खड़ा होता है तब बिना व्रत के कैसे काम चल सकता है? इसलिये व्रत की आवश्यकता के सम्बन्ध में हमारे मन में कभी शंका ही पैदा न हो।


पवित्रता की शक्ति

(श्रीमती - लिली एल. एलन)

वास्तविक बल और शक्ति पवित्रता में है। जिस मनुष्य के कर्म अच्छे हैं जिसने अपने मस्तक पर कलंक का टीका नहीं लगाया और जिसकी गरदन किसी के सामने शर्म से नीची नहीं होती वह सच्चा बहादुर है। ऐसे आदमी के गले में विजय माला पहनाई जायगी। उसके चेहरे के आस पास वैभव की वास्तविक आभा चमकती होगी। जिस रास्ते वह निकलेगा उसके ईंट, पत्थर तक उसका आदर करेंगे पवित्रता के बिना ऐसा व्यक्तित्व और किसी प्रकार प्राप्त नहीं हो सकता।

जो मनुष्य संसार में अपना प्रकाश करना चाहते हैं जो अपने व्यक्तित्व को उज्ज्वल और प्रकाशवान् चाहते हैं उन्हें यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि अगर वे पवित्रता से - ईमानदारी से - सचाई से डिगें और नीच कामों की ओर झुकें तो उन्हें इसका भयंकर फल भोगना पड़ेगा।

तुम निर्बल हो, निर्धन हो, विद्या और बुद्धि से रहित हो तो जरा भी मत झिझको और न इन कमियों के कारण अपने को तुच्छ समझो। अपने अंदर पवित्रता, सदाचार, ईमानदारी को धारण कर लो अपना हृदय दर्पण की तरह स्वच्छ बना लो। बस, फिर देखो कि तुम्हारे अंदर कैसा एक दैवी बल संचारित होता है। जरा, ईमानदारी के विचारों का कुछ देर चिन्तन तो करो, देखो तुम्हें कैसी शीतलता और शाँति प्राप्ति हुई मालूम होती है।

पवित्रता की शक्ति अपार है। उसका कोई अन्त नहीं। यह बल साधारण ताकत नहीं वरन् दैवी तेज है। यदि तुममें ईमानदारी की शक्ति है तो हमारी घोषणा है कि लोगों के हृदय का राज्य तुम्हारे लिए है।


मूर्ति पूजा का तत्व ज्ञान

(श्री स्वामी विवेकानन्दजी का एक भाषण)

अन्य धर्मावलम्बियों के कथनानुसार हिन्दू लोग अनेक देवताओं को पूजने वाले समझे जाते हैं परन्तु वास्तविक बात ऐसी नहीं है। आप किसी हिन्दू मन्दिर में जाइये, भक्त लोग देवता की, एक ही परमात्मा को लक्ष्यकर स्तुति करते हुए दीख पड़ेंगे। गुलाब का अनेक नामों में उल्लेख करने पर भी उसकी सुगन्ध में फर्क नहीं होता। नाम भेद समझ लेना ठीक नहीं है। मेरे बचपन की बात है। एक पादरी हिन्दुस्तान के किसी गाँव में गंवारों को उपदेश दे रहा था। बीच ही में वह लोगों से कह बैठा- “यदि मैं अपने डण्डे से तुम्हारे देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ डालूँगा, तो वे मेरा क्या कर लेंगी?”इस पर एक गंवार बोला- “पादरीसाहब यदि मैं तुम्हारे आसमानी बाप को गालियाँ दूँगा तो वह मेरा क्या कर लेंगे?” पादरी ने कहा- “तेरे मरने पर वह तुझे दण्ड देगा।” गंवार नम्रता से बोला- “तुम्हारे मरने पर हमारे देवताओं की मूर्तियाँ भी तुम्हें दण्ड देंगी।” इस बात के बाद वितण्डा से क्या लाभ है? यदि मूर्तिपूजा करना पाप है, तो पाप से पवित्रता की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? मैंने उन्हीं मूर्ति-पूजकों में से ऐसे ऐसे महात्मा और पुण्यात्मा देखे हैं, जिनकी तुलना किसी देश या धर्म के महापुरुष से नहीं हो सकती।

इसमें संदेह नहीं है कि धर्म का पागलपन उन्नति में बाधा डालता है, पर अन्धश्रद्धा उससे भी भयानक है। ईसाइयों को प्रार्थना के लिये मंदिर की क्या आवश्यकता है? प्रार्थना करते समय आंखें क्यों मूँद लेनी चाहिएं? परमेश्वर के गुणों का वर्णन करते हुए ‘प्राटेस्टएट’ ईसाई मूर्तियों की कल्पना क्यों करते है? ‘कैथोलिक’ पन्थ वालों को मूर्तियों की क्यों आवश्यकता हुई? भाइयों, श्वास निश्वास के बिना जीना जैसे सम्भव नहीं, वैसे ही गुणों की किसी प्रकार की मनोमय मूर्ति बनाये बिना उनका चिन्तन होना असम्भव है। हमें यह अनुभव कभी नहीं हो सकता कि हमारा चित्त निराकार में लीन हो गया हो, क्योंकि जड़ विषय और गुणों की मिश्र अवस्था के देखने का हमें अभ्यास हो गया है गुणों के बिना जड़ विषय और जड़ विषयों के बिना गुणों का चिन्तन नहीं किया जा सकता, इसी तत्व के अनुसार हिन्दुओं ने गुणों का मूर्ति रूप दृश्य स्वरूप बनाया है। मूर्तियां ईश्वर के गुणों का स्मरण कराने वाले चिन्ह मात्र है। चित्त चंचल न होकर सद्गुणों की मूर्ति ईश्वर में तल्लीनता होने के हेतु मूर्तियाँ बनाई गई हैं। हरएक हिंदू जानता है कि पत्थर की मूर्ति ईश्वर नहीं है। इसी से वे पेड़, पत्ती, आग, जल, पत्थर आदि सभी दृश्य वस्तुओं की पूजा करते हैं। इससे वे पत्थर-पूजक नहीं है। आप मुख से कहते हैं “हे परमात्मन् तुम सर्वव्यापी हो।” परन्तु कभी इस बात का आपने अनुभव भी किया है? प्रार्थना करते हुए आपके हृदय में आकाश का आनन्द विस्तार या समुद्र की विशालता क्या नहीं झलकती? यही ‘सर्वव्यापी’ शब्द का दृश्य स्वरूप है।

मूर्ति पूजा में मनुष्य स्वभाव के विरुद्ध क्या हैं हमारे मन की रचना ही ऐसी है कि वह बिना किसी दृश्य पदार्थ की सहायता के केवल गुणों का चिन्तन नहीं कर सकता। मस्जिद, चर्च, क्रूस, अग्नि, आकाश, समुद्र, आदि दृश्य पदार्थ हैं। हिंदुओं ने उनके स्थान में मूर्ति की कल्पना की तो क्या बेजा किया? निराकार की स्तुति करने वाले लोग मूर्तियाँ पूजकों को घृणा की दृष्टि से देखते हैं, परन्तु उन्हें इस कल्पना की गन्ध तक नहीं है कि मनुष्य ईश्वर हो सकता है। वे बेचारे चार दीवालों की कोठारी में बंद हैं। पास पड़ोसियों को सहायता करने से अधिक दूर उनकी दृष्टि नहीं पहुँचती। कोई देवात्मा ग्रन्थ या मूर्ति तो उपासना के साधन मात्र ही हैं। एक बार हिन्दुस्तान में मैं एक महात्मा के पास जाता है। बाइबल, वेद, कुरान, आदि की चर्चा करने लगा। पास ही एक पुस्तक पड़ी थी। जिसमें पानी बरसने का भविष्य लिखा था। महात्मा ने मुझसे कहा इसे जोर से दबाओ, मैंने खूब दबाई वे आश्चर्य से बोले इसमें तो कई इंच पानी बरसने का भविष्य है, पर तुम्हारे दबाने से एक बूँद भी नहीं टपकी! मैंने कहा महाराज, यह पुस्तक जड़ है। इस पर उन्होंने उत्तर दिया कि इसी तरह जिस मूर्ति या पुस्तक को तुम मानते हो वह कुछ नहीं करती परन्तु इष्ट मार्ग को बताने में सहायक होती है। ईश्वर रूप हो जाना हिन्दुओं का अन्तिम लक्ष्य है। वेद कहते हैं कि बाह्य उपचारों से पूजा करना उन्नति की पहली सीढ़ी है। प्रार्थना दूसरी सीढ़ी और तन्मय हो जाना तीसरी सीढ़ी है। मूर्ति पूजक मूर्ति के सामने बैठकर कहता है- “प्रभो! सूर्य, चन्द्र या तारागणों का प्रकाश हम तुम्हें कैसे दिखायेंगे? ये सब ही तुम्हारे प्रकाश से प्रकाशमान हैं।” मूर्तिपूजक अन्य साधकों से पूजा करने वालों की निन्दा नहीं करते। दूसरी सीढ़ी पर चढ़े हुए मनुष्य का पहली सीढ़ी के मनुष्य की निन्दा करना, तरुण पुरुष का बच्चे को देखकर ‘वह अभी बच्चा है’ कहकर-हँसने के बराबर है। मूर्तिदर्शन के साथ- साथ यदि किसी के मन में पवित्र भाव उत्पन्न होते हों तो मूर्तिदर्शन करना पाप कैसा? हिन्दू जब दूसरे सोपान में पहुँचता है तब पहले सोपान पर स्थित समाज की निन्दा नहीं करता। वह यह नहीं समझता कि मैं पहिले कुछ बुरे कर्म करता था। सत्य की धुँधली कल्पना को पार कर प्रकाश में आना ही हिन्दुओं का कार्य है, वे अपने को पापी नहीं समझते। हिन्दुओं का विश्वास है कि जीवमात्र पुण्यमय-पुण्यस्वरूप के अनन्त रूप हैं। जंगली लोगों के धर्म मार्ग से लेकर अद्वैत वेदान्त तक सभी मार्ग एक ही केन्द्र के निकट पहुँचते हैं। देशकाल और पात्रतानुसार सब मानवी यत्न एक सत्य का पता लगाने के लिए हैं। नानाविध गरुड़ पक्षी एक सूर्य बिंब की ओर जा रहे है। हिन्दुओं का सिद्धान्त है कि कोई गरुड़ अशक्त होने से बीच के ही किसी मुकाम पर विश्राम कर लेगा, पर कालान्तर से वह, बिम्ब के पास अवश्य पहुँच जायगा। हिन्दुओं का यह हट नहीं हैं कि सब कोई हमारे विशिष्ट मतों को मानें। अन्य धर्मावलम्बी चाहते हैं कि एक ही नाप का अंगा सब कोई पहिने, चाहे वह ठीक बैठता हो या न हो। प्रतिमा या पुस्तक मूलरूप को व्यक्त करने वाले साधनमात्र हैं, यदि कोई उनका उपयोग न करे तो हिन्दू उसे मूर्ख अथवा पापी नहीं समझते। एक सूर्य की किरणें अनेक रंगों के काँचों से नानारूप की दीख पड़ती हैं, इसी तरह भिन्न-भिन्न धर्म सम्प्रदाय एक ही केन्द्र के भिन्न-भिन्न मार्ग हैं। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं:-

“हे धनंजय, मुझसे भिन्न कहीं कुछ नहीं है, मुझमें ही सब कुछ हैं। जैसे डोरे से मणि पोए हुए होते हैं, वैसे मुझसे संसार के सारे पदार्थ पोए हुए हैं।” “जिन 2 वस्तुओं में महत्ता, तेजस्विता अथवा बल है, उन उन वस्तुओं को मेरे ही तेज के अंश से उत्पन्न हुई जान।”

अनेक युगों की परम्परा से निर्माण हुए हिन्दु धर्म के मानव जाति पर अनन्त उपकार हुए हैं। “परमतासहिष्णुता” हिन्दुओं के हृदय में छूती तक नहीं। ‘अविरोधी तु यो धर्मों स धर्मों मुनिपुँगव।’ यह हिन्दुओं का सिद्धाँत है वे यह नहीं कहते कि हिन्दुओं को ही मुक्ति मिलेगी, बाकी सब नरक में जाएंगे। व्यास महर्षि का कथन है कि भिन्न जाति और भिन्न धर्म के ऐसे बहुत से लोग मैंने देखे हैं जो पूर्णता प्राप्त हुए हैं।


Quotation

मूर्ख मनुष्य अपनी संपूर्ण मानसिक और आत्मिक शक्ति को छिछोरेपन, व्यर्थ की बकवास और स्वार्थयुक्त बातों में नष्ट कर देते हैं साथ ही बुरे कामों में अपना समय भी बर्बाद कर देते हैं।

मूर्ख लोग केवल इच्छा करते रहते हैं और जब उन्हें कुछ नहीं मिलता तो कुड़कुड़ाने लगते हैं, परन्तु बुद्धिमान मनुष्य काम करते रहते है और फल की प्रतीक्षा करते हैं।


जीता जागता रेडियो

(ले. मानस भ्रमर पं0 प्यारे लाल मिश्र, रामायणी व्यास, काशी निवासी)

रेडियो यन्त्र तुमने जरूर देखा होगा दिल्ली, कलकत्ता, बम्बई या लन्दन, बर्लिन आदि स्थानों पर उच्चारण किये हुए शब्द पलक मारते मारते तुम्हारे पास तक दौड़ आते हैं। रेडियो यन्त्र अपनी बिजली के कारण उन शब्दों को पकड़ लेता और उन्हें अपनी मशीन में ले जाकर ज्यों का त्यों सुना देता है। नाच, गाने, बातचीत, हँसी, रोना सब ध्वनियाँ ज्यों की त्यों सुनाई देती हैं। इतनी दूरी पर होने वाले शब्द क्षण भर में हमारे पास तक बिना किसी सहायता के दौड़ आवें यह कितने आश्चर्य की बात है।

बेतार के तार के निर्माता मारकोनी ने मालूम किया था कि अखिल ब्रह्माण्ड में ईथर नामक एक महातत्व व्याप्त है इसमें शब्दों की लहरें बहती रहती हैं। जैसे किसी तालाब में पत्थर फेंकने पर पानी उछलता है और फिर वह लहरों का रूप धारण करके वहाँ तक चलता है जहाँ पानी का छोर होता है। समस्त ब्रह्माण्ड में ईथर तत्व व्याप्त है। उस में शब्दों की लहरें चलती हैं और वह बड़ी तीव्र गति से एक सेकिण्ड में हजारों मील की चाल से बहती रहती हैं।

इतना जान लेने के बाद मारकोनी को एक आधार मिल पाया उसने दो प्रकार के यन्त्र बनाये एक तो ऐसा जो शब्द साथ में कुछ विशेष प्रकार के विद्युत परमाणु घोल देता या दूसरा वह जो उस प्रकार के विद्युत परमाणुओं को अपनी शक्ति से पकड़ लेता था। मारकोनी का कहना था कि इस कार्य में कोई बहुत बड़ा आश्चर्य नहीं है बेतार के तार का यन्त्र भी कोई बहुत कीमती चीज नहीं है। यह सब काम बहुत मामूली कल पुर्जों से होता है। आश्चर्य जनक खोज केवल ईथर तत्व और उसकी क्रियाशीलता के बारे में जानकारी प्राप्त करने की थी।

यह तो हुई जड़ रेडियो की बात। अब हम तुम्हें एक जीते जागते रेडियो की बात बताते हैं। यह मनुष्य का मस्तिष्क है। यह चैतन्य रेडियो, जड़ रेडियो की अपेक्षा कई दृष्टियों से उत्तम है। मामूली रेडियो दूसरी जगह के शब्दों को सुना सकता है पर उसके द्वारा दूसरी जगह खबर नहीं भेजी जा सकती। मगर मनुष्य का मस्तिष्क दोनों काम करता है उसके द्वारा टेलीफोन की तरह आवाज ग्रहण की जा सकती है। और भेजी जा सकती है। लकड़ी के फ्रेम वाले रेडियो की तरह मस्तिष्क द्वारा नाच गाने की आवाजें नहीं आतीं परन्तु जो कुछ भी आता है वह इन शब्दों से अधिक कीमती है।

मस्तिष्क विचारों का यन्त्र है। इसमें अनेक प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं। क्या वे विचार जो हर घड़ी बनते हैं बन बन कर किसी कोठरी में इकट्ठे होते रहते हैं? नहीं उत्पन्न होते हैं और शब्दों वाले ईथर से भी सूक्ष्म ईथर से लहरों के रूप में अपने चारों ओर फैल जाते हैं। वैज्ञानिकों ने विचारों की लहरों को भी ग्रहण करने का यन्त्र निकाल लिया है यह एक फोटो खींचने के कैमरे की तरह है। एक नवयुवक किसी सुन्दरी के चिन्तन में डूबा हुआ था उसके मस्तिष्क के पास यन्त्र को रख कर फोटो लिया गया तो उसी सुन्दरी की तस्वीर खिंच गई। इसी प्रकार क्रोध, क्षोभ शान्ति, प्रेम, विरह, खुशी, निराशादि भावनाओं के फोटो खिंचने लगें हैं इस यन्त्र की सहायता से जाना कर सकता है कि अमुक व्यक्ति क्या सोच रहा है।

विचारों की इन लहरों के बारे में बहुत कुछ बातें मालूम की गई हैं। यह भाप की तरह हवा में इधर-उधर उड़ते हैं और अपने ही सदृश और विचारों को पाकर उनसे मिल जाते हैं और जिस तरह भाप के छोटे-छोटे बुलबुले आपस में मिलकर एक बादल का रूप धारण कर लेते हैं उसी प्रकार विभिन्न मनुष्यों द्वारा सोचे गये एक प्रकार के विचार आपस में इकट्ठे होते रहते हैं और घनीभूत बन जाते हैं। यह तो हुई विचारों को फेंकने की बात, अब ग्रहण करने की सुनिये जिस तरह की बात कोई सोचना आरम्भ करता है और तरह की अनेक विचार बदलियाँ घुमड़ घुमड़ कर मस्तिष्क के पास दौड़ी आती हैं। मस्तिष्क में जो विचार फेंकने की शक्ति है वहाँ ऐसी भी शक्ति पर्याप्त मात्रा में मौजूद है जो अपनी इच्छित विचार सामग्री को इसमें से खींच भी सके। कोई आदमी किसी बात को सोच रहा है तो उसे उस सम्बन्ध में अनेक नई बातें मालूम हो जाती हैं। जितना गहरा सोच विचार किसी बात पर किया जाता है उतना ही ज्ञान अपने आप मिलता जाता है। यह नई बातें कैसे मालूम हुईं? बात यह है कि मस्तिष्क को अपने अधिक आकर्षक बनाया तो उसके पास बहुत से उसी प्रकार के विचार खिंच आये, जिन्हें उसने अपना लिया। सोचने पर जो नई नई बातें मालूम होती हैं वह कितने ही मनुष्यों के अनेक समयों पर सोची हुई चीज होती है मस्तिष्क उन्हें पकड़ लेता है और ख्याल करता है कि मेरी समझ में यह नई बात आ गई। अब इस बात में रत्ती भर भी सन्देह करने की गुंजाइश नहीं रह गई है कि मनुष्य का मस्तिष्क एक जीता जागता रेडियो है और वह विचारों को ग्रहण करने एवं छोड़ने के दोनों काम कर सकता है।

रेडियो एक सावधानी से काम में लेने की वस्तु है। कानून के अनुसार सावधानी से रखने की चीजों का लाइसेंस लेना पड़ता है। जहर, बन्दूक, बारूद, हथियार, नशीली चीजें रेडियो इन सब का लाइसेन्स लेना पड़ता है और सरकार को विश्वास दिलाना पड़ता है कि इन वस्तुओं का सदुपयोग करेंगे जो इन चीजों का दुरुपयोग करता है उसका लाइसेन्स जब्त कर लिया जाता है और सजा भुगतनी पड़ती है। जर्मनी से भेजे हुए खराब समाचारों को फैलाने में रेडियो का उपयोग करो तो सरकार तुम्हारा लाइसेन्स जब्त कर लेगी और दण्ड देगी। इसी प्रकार मस्तिष्क रूपी बहुमूल्य और अपार शक्ति वाले रेडियो का लाइसेन्स हमें प्राप्त करना चाहिये। उसका ठीक उपयोग करने के लिए पूरी सावधानी रखनी चाहिये अन्यथा अनर्थ हो जाएगा और भारी हानि उठानी पड़ेगी।

तुम्हारा मस्तिष्क एक ब्रॉडकास्ट स्टेशन है इसलिए सार्वजनिक सम्पत्ति है इसका दुरुपयोग मत करो प्रेम, दया, उदारता, मातृभाव और आनन्द के शुभ विचार इसके द्वारा प्रेरित करो। जिनसे दूसरों को सहायता एवं सुख शान्ति प्राप्त हो। अच्छे विचार अपनी लहरों को दूसरों के मानस तन्तुओं पर टकरायेंगे तो उनमें से मधुर संगीत पैदा होगा किन्तु यदि दुराचार, पाप, दुख, क्रोध, और भय के विचार फैलाओगे तो संसार को उनसे क्षति पहुँचेगी और लोगों को तुम्हारे कृत्य से कष्ट उठाना पड़ेगा। वे संन्यासी जो दूर जंगलों में रहते हैं किन्तु इस विज्ञान का गुप्त रहस्य समझते हैं। संसार की बड़ी भारी सेवा कर रहे हैं क्योंकि उनकी बलपूर्वक प्रेरित की गई उच्चकोटि की पवित्र विचारधारा जनता की मौन रूप से बड़ी भारी सेवा और सहायता करती है। तुम यदि अच्छे विचार करते हो तो चाहे हाथ पाँव से कुछ भी न करो तब भी संसार की सेवा करते हो। इसके विपरीत धर्मात्मा का वेष बनाकर भी नीच विचार करोगे तो परमात्मा के दरबार में पापी ठहराये जाओगे।

शुभ विचारों का आकर्षण भी अपने ही समान होगा। प्रेम और आनन्द के विचार करोगे तो संसार की सद्भावनाएं उमड़-उमड़ कर तुम्हारे ऊपर आवेंगी प्रसन्नता की छाया से चारों ओर ढक देंगी। कोई तुम्हारे साथ बुराई कर रहा हो उसको क्षमा करो और प्रेम से उसके हृदय की आग भुजाओं। कोई कठिनाई आवे तो न तो रोओ और न घबराओ। सुख दुखों की नश्वरता पर एक बार विचार करो और हंसते हुए उसका सामना करो। पीड़ितों को देखो तो उन पर दया और सहानुभूति भरी एक दृष्टि फेंक दी, पराई सम्पदा को देख कर ललचाओ मत। पाप बुद्धि से किसी भी पुरुष को मत देखो। संसार में सर्वत्र आत्मस्वरूप को देखो और प्रेम तथा प्रसन्नता के विचार फैलाओ।

तुम्हारा यह कार्य संसार की अद्भुत सेवा करेगा। तुम्हारा ब्रॉडकास्ट हर हृदय के रेडियो पर बड़ी शान्ति के साथ सुना जायेगा और तुम्हारा रेडियो दुनिया के अत्यन्त सुन्दर फूलों से सजा हुआ होगा।


Quotation

इच्छाओं की पूर्ति से जो संतोष होता है वह क्षणिक और काल्पनिक होता है। इससे इच्छा पूर्ति की और अधिक चाह बढ़ती हैं। सच्चा सुख जिसे आनन्द और शान्ति भी कहते हैं वह अवस्था है जिसमें किसी प्रकार की इच्छा नहीं होती।

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तुम्हारी बाहरी दशा कैसी ही साधारण क्यों न हो किन्तु यदि अन्तःकरण असाधारण है तो निश्चय समझो तुम अपनी सारी परिस्थिति को बदल सकते हो।


जीवन कहानी

(ले. श्री नित्यानन्द पारीक, आगरा)

एक बड़ा सुन्दर शहर था, उसका राजा बड़ा उदार और धर्मात्मा था। प्रजा को प्राणों के समान प्यार करता और उनकी भलाई के लिए बड़ी बड़ी सुन्दर राज व्यवस्थाएं करता। उसने एक कानून प्रचलित किया कि अमुक अपराध करने पर देश निकाले की सजा मिलेगी। कानून तोड़ने वाले अनेक दुष्टात्मा राज्य से निकाल बाहर किये गये, राज्य में सर्वत्र सुख शान्ति का साम्राज्य था।

एक बार किसी प्रकार वही जुर्म राजा से बन पड़ा। बुराई करते तो कर गया पर पीछे उसे बहुत दुःख हुआ। राजा था सच्चा, अपने पाप को वह छिपा भी सकता था पर उसने ऐसा किया नहीं।

दूसरे दिन बहुत दुखी होता हुआ वह राज दरबार में उपस्थित हुआ और सबके सामने अपना अपराध कह सुनाया। साथ ही यह भी कहा मैं अपराधी हूँ इसलिए मुझे दण्ड मिलना चाहिए। दरबार के सभासद ऐसे धर्मात्मा राजा को अलग होने देना नहीं चाहते थे फिर भी राजा अपनी बात पर दृढ़ रहा उसने कड़े शब्दों में कहा राज्य के कानून को मैं ही नहीं मानूँगा तो प्रजा उसे किस प्रकार पालन करेगी? मुझे देश निकाला होना ही चाहिये।

निदान यह तय करना पड़ा कि राजा को निर्वासित किया जाय। अब प्रश्न उपस्थित हुआ कि नया राजा कौन हो? उस देश में प्रजा में से ही किसी व्यक्ति को राजा बनाने की प्रथा थी। जब तक नया राजा न चुन लिया जाय तब तक उसी पुराने राजा को कार्य भार सँभाले रहने के लिए विवश किया गया। उसे यह बात माननी पड़ी।

उस जमाने में आज की तरह वोट पड़कर चुनाव नहीं होते थे। तब वे लोग इस बात को जानते ही न हों सो बात न थी। वे अच्छी तरह जानते थे कि यह प्रथा उपहासास्पद है। लालच, धौंस, और झूठे प्रचार के बल पर कोई नालायक भी चुना जा सकता है। इसलिए उपयुक्त व्यक्ति की कसौटी उनके सद्गुण थे। जो अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करता था वही अधिकारी समझा जाता था।

उस देश का राजा जैसा धर्मात्मा था वैसा ही प्रधान मन्त्री बुद्धिमान था। उसने नया राजा चुनने की तिथि नियुक्त की। और घोषणा की कि अमुक तिथि को दिन के दस बजे जो सबसे पहले राजमहल में जाकर महाराज से भेंट करेगा वही राजा बना दिया जायेगा। राजमहल एक पथरीली पहाड़ी पर शहर से जरा एकाध मील हठ कर जरूर था पर उसके सब दरवाजे खोल दिये गये थे भीतर जाने की कोई रोक टोक न थी। राजा के बैठने की जगह भी खुले आम थी और वह मुनादी करके सबको बता दी गई थी।

राजा के चुनाव से एक दो दिन पहले प्रधान मन्त्री ने शहर खाली करवाया और उसे बड़ी अच्छी तरह सजाया। सभी सुखोपभोग की सामग्री जगह जगह उपस्थिति कर दी। उन्हें लेने की सबको छुट्टी थी किसी से कोई कीमत नहीं ली जाती। कहीं मेवे मिठाइयों के भण्डार खुले हुए थे तो कहीं खेल, तमाशे हो रहे थे कहीं आराम के लिए मुलायम पलंग बिछे हुए थे तो कहीं सुन्दर वस्त्र, आभूषण मुफ्त मिल रहे थे। कोमलाँगी तरुणियाँ सेवा सुश्रूषा के लिए मौजूद थीं जगह -जगह नौकर दूध और शर्बत के गिलास लिये हुए खड़े थे। इत्रों के छिड़काव और चन्दन के पंखे बहार दे रहे थे। शहर का हर एक गली कूचा ऐसा सज रहा था मानो कोई राजमहल हो।

चुनाव के दिन सबेरे से ही राजमहल खोल दिया गया और उस सजे हुए शहर में प्रवेश करने की आज्ञा दे दी गई। नगर से बाहर खड़े हुए प्रजाजन भीतर घुसे तो वे हक्के-बक्के रह गये। मुफ्त का चन्दन सब कोई घिसने लगा। किसी ने मिठाई के भण्डार पर आसन बिछाया तो कोई सिनेमा की कुर्सियों पर जम बैठा, कोई बढ़िया बढ़िया कपड़े पहनने लगा तो किसी ने गहने पसन्द करने शुरू किये। कई तो सुन्दरियों के गले में हाथ डालकर नाचने लगे सब लोग अपनी अपनी रुचि के अनुसार सुख सामग्री का उपयोग करने लगे।

एक दिन पहले ही सब प्रजाजनों को बता दिया गया था कि राजा से मिलने का ठीक समय 10 बजे है। इसके बाद पहुँचने वाला राज का अधिकारी न हो सकेगा। शहर सजावट चन्द रोजा है, वह कल समय बाद हटा दी जायेगी एक भी आदमी ऐसा नहीं बचा था जिसे यह बातें दुहरा दुहरा कर सुना न दी गई हों, सबने कान खोलकर सुन लिया था।

शहर की सस्ती सुख सामग्री ने सब का मन ललचा लिया उसे छोड़ने को किसी का जी नहीं चाहता था। राज मिलने की बात को लोग उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगे। कोई सोचता था दूसरों को चलने दो मैं उनसे आगे दौड़ जाऊँगा, कोई ऊंघ रहे थे अभी तो काफी वक्त पड़ा है, किसी का ख्याल था सामने की चीजों को ले लो, राज न मिला तो यह भी हाथ से जाएंगी, कोई तो राज मिलने की बात का मजाक उड़ाने लगे कि यह गप्प तो इसलिये उड़ाई गई है कि हम लोग सामने वाले सुखों को न भोग सकें। एक दो ने हिम्मत बाँधी और राजमहल की ओर चले भी पर थोड़ा ही आगे बढ़ने पर महल का पथरीला रास्ता और शहर के मनोहर दृश्य उनके स्वयं बाधक बन गये बेचारे उल्टे पाँव जहाँ के तहाँ लौट आये। सारा नगर उस मौज बहार में व्यस्त हो रहा था।

दस बज गये पर हजारों लाखों प्रजाजनों में से कोई वहाँ न पहुँचा। बेचारा राजा दरबार लगाये एक अकेला बैठा हुआ था। प्रधान मन्त्री मन ही मन खुश हो रहा था कि उसकी चाल कैसी सफल हुई। जब कोई न आया तो लाचार उसी राजा को पुनः राज भार सँभालना पड़ा।

यह कहानी काल्पनिक है परन्तु मनुष्य जीवन में यह बिल्कुल सच उतरती है। ईश्वर को प्राप्त करने पर हम राज्य मुक्ति अक्षय आनन्द प्राप्त कर सकते हैं। उसके पाने की अवधि भी नियत हैं मनुष्य जन्म समाप्त होने पर यह अवसर हाथ से चला जाता है। संसार के मौज तमाशे थोड़े समय के हैं यह कुछ काल बाद छिन जाते हैं। सब किसी ने यह घोषणा सुन रखी है कि संसार के भोग नश्वर हैं, ईश्वर की प्राप्ति में सच्चा सुख है, प्रभु की प्राप्ति का अवसर मनुष्य जन्म में रहने तक ही है। परन्तु हममें से कितने हैं जो इस घोषणा को याद रख कर नश्वर माया के लालच में नहीं डूबे रहते?

अवसर चला जा रहा है। हम माया के भुलावे में फँस कर तुच्छ वस्तुओं को समेट रहे हैं और अक्षय सुख की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते। हमारे इस व्यवहार को देखकर प्रधान मन्त्री शैतान मन ही मन खुश हो रहा है कि मेरी चाल कैसी सफल हो रही है। यह कहानी हमारे जीवन का एक कथा चित्र है।


Quotation

अपने जीवन पर दृष्टि डालो। पता चलेगा कि तुम्हारे सब से अधिक सुख और प्रसन्नता के वे क्षण थे जिसमें तुमने किसी के साथ दया, सहानुभूति, प्रेम, परोपकार, एवं उदारता का व्यवहार किया था।

*****

जितना स्वार्थपरता को छोड़ दोगे और जितना लोभ, क्रोध, दया, घमण्ड आदि की कड़ियों को एक-एक करके तोड़ दोगे उतना ही तुम्हें त्याग का आनन्द प्राप्त होगा। उसी समय तुम्हें स्वार्थपरता और कृपणता के दुःखों का पता चलेगा।


साधना के विघ्न

(ले. श्री रामदयालजी गुप्त, नौगड़)

[क्रमागत]

विचार करो और शान्त मस्तिष्क से दृढ़ता पूर्वक कदम बढ़ाओ, आपका मार्ग सुगम हो जायेगा।

(8) आलस्य - उदासीनता, उपेक्षा व निराशा की भावनाओं के मिश्रण से आलस्य उत्पन्न होता है। यह आलस्य अत्यन्त तामसी और नीच कर्मों से भी नीच है। जो क्रियाशील है वह यदि आज बुरे कर्म करता है तो कल अच्छे कर्म भी कर सकता है किन्तु जिसके मन और शरीर को आलस्य ने घेर लिया है वह साँस लेता हुआ मुर्दा है। पृथ्वी का भार बढ़ाने के अतिरिक्त उसका और कोई प्रयोजन नहीं। उसके मन में अच्छे विचार उठ नहीं सकते। आलस्य का मुख पतन की ओर है जो उसे नीच योनियों में ले जाता है। जिसने आलस्य को अपनाया उसने अपने सबसे बड़े और अत्यन्त भयंकर शत्रु को घर में बसाया है। ऐसे व्यक्ति को सफलता कोसों दूर से नमस्कार करती है। आप अपने जीवन को नष्ट नहीं होने देना चाहते हैं तो उसे क्रियाशील रखें। स्फूर्ति, उत्साह, लगन और काम में लगे रहने की धुन हर समय अपने अन्दर होनी चाहिये।

(9) अल्प में सन्तोष - यह अवगुण क्षुद्र हृदय का द्योतक है। हर स्थिति में संतुष्ट रहना यह मन का दैवी गुण है, मानसिक शान्ति के लिये इसकी आवश्यकता है। किन्तु यदि ये बात काम करने के बार में उतर आवे तो समझना चाहिये कि इसका कारण या तो आलस्य है या क्षुद्र हृदयता। एक पुस्तक पढ़कर, एक मिनट भजन करके, जरा सा परिश्रम करके, तुच्छ सी जन सेवा करके, कुछ ही पैसे कमाकर, जो संतुष्ट हो जाता है वह संतोषी नहीं अकर्मण्य है। मनुष्य के करने के लिए अपार काम पड़ा हुआ है। जितना अधिक हो सके, काम करना चाहिए और अपने उद्देश्य के अनुसार ऊँची से ऊँची सीढ़ी पर पहुँचने का प्रयत्न जारी रखना चाहिएं।

(10) वासना - तरह-तरह के इन्द्रिय सुखों पर मन ललचाना और उनके सम्बन्ध में खयाली पुलाव पकाते रहना, मनुष्य जीवन की सार्थकता के बारे में एक बहुत बड़ा विघ्न है। इन्द्रियों के सुख अतृप्त हैं ज्यों-ज्यों उन्हें पूरा करते हैं त्यों-त्यों वह आग भड़कती है और साथ ही वह शरीर एवं मन को जलाती जाती है। सुस्वाद भोजन, शिश्नेन्द्रिय की परायणता तमाशे देखने की रुचि इनके प्रलोभन मन को अपना दास बना लेते हैं और दूसरे किसी महान कार्य की ओर जाने नहीं देते। यदि जाता है तो बार -बार उचट देते हैं जिसका मन बार-बार उचटता हो तो समझे कि इन्द्रियों के सुख उसे बार बार बहका रहे हैं। आपको किसी उपेक्षा की पूर्ति करनी है तो इन्द्रिय सुखों को फटकार दीजिये। क्योंकि वे जैसे-जैसे तृप्त किये जाते हैं वैसे ही वैसे उग्र रूप धारण करके आपको उल्टा खाते हैं और अन्त में अपने वश में करके नष्ट कर डालते हैं।

(11) ब्रह्मचर्य का अभाव - प्राणशक्ति, स्फूर्ति बुद्धि और ओज यह वस्तुएं वीर्य से ही बनती हैं इसलिए उसे अमूल्य रत्न समझते हुए जी-जान इसकी रक्षा का प्रयत्न करना चाहिये। शरीर और मन का स्वास्थ्य वीर्य की शक्ति से प्राप्त होता है इसलिए क्षणिक इन्द्रिय सुख के लिए नष्ट करना धूति के बदले हीरा बेचना है। अखण्ड ब्रह्मचर्य धारण कीजिये। यदि विवाहित हैं तो केवल सन्तान उत्पन्न करने के उद्देश्य से धर्मपूर्वक उसका उपयोग कीजिए। इससे आपकी शक्ति सुरक्षित रहेगी।

(12) कुसंग- मनुष्य शरीर एक प्रभावशाली विद्युत धारण किये हुए है जो अपने पास वालों पर अनिवार्य रूप से असर डालती है मजबूत विचारों से दूसरों पर जरूर असर पड़ता है अगर आप आरम्भिक अभ्यासी हों तो बुरे चरित्र और अपने दुष्ट विचार वालों से दूर रहिये उनके कार्यों में कोई दिलचस्पी मत लीजिये। हो सके तो अरुचि प्रकट कीजिये इससे आप उनके संक्रामक असर से बचे रहेंगे। सत्संग की महिमा अपार है श्रेष्ठ पुरुषों का साथ गंगा के समान है जिसमें गोता लगाने से क्लेश कटते हैं श्रेष्ठ पुरुषों के साथ रहने से, उनके मौखिक या लेखबद्ध विचारों के मनन करने से आत्मोत्थान होता है। हाँ, यदि आप अपने को अत्यन्त सुदृढ़ समझते हैं तो सुधार की दृष्टि से बुरे विचार वाले को अपने साथ ले सकते हैं परन्तु सावधान! कहीं उसका उलटा असर आप पर न हो जाय।

(13) परदोष दर्शन - दूसरे के अवगुण देखना अपनी बुद्धि को दूषित करना है। फोटो खींचने के कैमरे के सामने जो चीज रखी जाती है उसी का अक्ष भीतर प्लेट पर खिंच जाता है। यदि आप दूसरों की बुराइयाँ ही देखेंगे तो उनके चित्र अपने अन्दर अंकित करके उन्हें खुद भी ग्रहण कर लेंगे। इसलिए दूसरों के सद्गुणों पर ही दृष्टि रखिये। सब में परमात्मा का स्वरूप देखिये और उन्हें प्रेम की दृष्टि से देखिये आपका हृदय प्रसन्न रहेगा। यदि किसी में बुराई दिखाई पड़े तो उससे घृणा मत कीजिये और जहाँ तक हो सके सुधारने का प्रयत्न कीजिये। परदोष दर्शन के कारण जो घृणा और द्वेश मन में उत्पन्न होते हैं वह भीतर ही भीतर अशान्ति उत्पन्न करके मन को निश्चित पथ से डिगा देते हैं। साधना को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है कि किसी की गन्दगी टटोलकर अपनी नाक को दुर्गन्धित न किया जाय।

(14) संकीर्णता - अपने मजहब, विचार या विश्वासों पर दृढ़ रहना उचित है। परन्तु दूसरों के विश्वासों को घृणा की दृष्टि से देखना या झूठा समझना अनुचित है। हम सब सत्य के आस-पास चक्कर काट रहे हैं किन्तु कोई पूर्ण सत्य तक नहीं पहुँच सका है। इसलिए हमें एक दूसरे के दृष्टिकोण को ध्यानपूर्वक देखना चाहिए। कट्टरता एक ऐसा दुर्गुण है जिसके कारण आदमी न तो अपनी बुराइयों को छोड़ सकता है और न अच्छाइयों को ग्रहण कर सकता है।


भटकों को मार्ग पर लाओ

फरीशी और अध्यापक एक ओर बैठे-बैठे कुड़कुड़ा रहे थे। हम लोग धर्म कार्यों में अपना जीवन खपा रहे हैं, तप करते हैं, उपदेश देते हैं, भजन करते हैं, और आज्ञाओं का पालन करते हैं फिर भी हमारी उतनी परवाह नहीं की जाती जितनी कि पापियों और भटके हुओं की।

यीशु के हर एक शिष्य के मन में ऐसे संदेह शिकायत के विचार उठ रहे थे। अजनबी पापी और विरोधियों की इतनी चिन्ता क्यों की जाय जब कि वह उल्टे घृणा करते हैं और दूर भागते हैं।

यीशु ने उनके मन को पहचाना और संदेह निवारण का उपाय किया। ईसा अपने सब शिष्यों को लेकर आगे चल दिया। रास्ते में एक गड़रिये की झोंपड़ी पर उन्हें ठहरना पड़ा। थोड़ी देर ठहरने पर घर का मालिक गड़रिया आया उसके कंधों पर एक भेड़ बंधी हुई थी। उसने बड़े प्यार से उस भेड़ को कंधे पर से उतारा और खूब नहला धुला कर उसके बाल सुनहरी रंगे और हरी घास खिलाई। खुशी के मारे उसका चेहरा खिला जा रहा था। अंत में उसने अपने प्रिय जनों को बुलाया और खुशी में मुँह मीठा कराया।

यीशु ने उस गड़रिये से पूछा इस भेड़ के लिए इतनी खुशी तुम क्यों मना रहे हो।

गड़रिये ने कहा मेरे पास सौ भेड़ हैं उनमें से यह एक भटक गई थी। मुझे बड़ी चिन्ता हुई। अपनी निन्यानवे भेड़ों की रखवाली का भार किसी पर ज्यों का त्यों डालकर इस एक की तलाश में निकला और बड़ी कठिनाई से इसे दूर जंगल में पाया चूँकि इसका स्वभाव खराब हो चला था और उसे मैं सुधारना चाहता हूँ। इसलिए इसे कंधे पर धर कर लाया हूँ। हरी घास खिला रहा हूँ और प्यार कर रहा हूँ। भटके हुए को ठीक राह पर लाकर मुझे बड़ी खुशी हो रही है।

यीशु ने अपने शिष्यों से कहा क्यों न हम सब इस गड़रिये का अनुसरण करें? जो भूले भटके हैं, जो गुमराह हो रहे हैं, जिन्हें धर्म का मार्ग सूझ नहीं पड़ता, उन्हें सच्चे मार्ग पर लाकर हम सब स्वर्गीय आनन्द प्राप्त कर सकते हैं।


उल्लू की दीवट

(पं. शिवनारायण शर्मा, हैडमास्टर, आगरा)

एक दिन एक मालिक अपने अधीन कर्मचारी पर नाराज होकर कहने लगा “उल्लू की दीवट” यह बात बहुत वर्ष की है। परन्तु इसका भाव मेरी समझ में इस प्रकार आया है-

मनुष्य के शरीर की उपमा दीवट से दी गई है। दीवट के ऊपर दिया रखा जाता है इस शरीर रूपी दीवट में अन्तःकरण रूपी दिया है। दिया में तीन चीजें होती हैं। (1) मिट्टी या टीन का दिया (2) तेल (3) बत्ती। इसी प्रकार अन्तःकरण में तैल रूपी मन है, बुद्धि बत्ती है, अन्तःकरण दिया है। जिस तरह दिया में ही तैल होते हुए दिया के ऊपर नीचे अन्दर तथा दीवट के ऊपर नीचे अन्दर यदि वह कास्ट का हो तो तेल ही तेल हो जाता है और दीवट पर तेल गिर गिर कर दीवट को तेल से भिगो देता है जिससे दिया और दीवट दोनों तेल से भीग जाते हैं ठीक उसी तरह हमारे शरीर में मन व्याप्त है, परन्तु उसका निवास स्थान अन्तःकरण है। इस शरीर में जो आत्मा है वह दीपक की लौ के समान है। जैसे दीपक बिना लौ के कमरे में रोशनी नहीं कर सकता उसी तरह यह शरीर भी बिना आत्मा के न स्वयं प्रकाशमय हो सकता है न दूसरों को प्रकाशित कर सकता है। यह सारा ब्रह्माण्ड शरीर रूपी दीपक का एक कमरा है और सारे ब्रह्माण्ड में एक ही आत्मा उजाला कर रहा है, यदि एक के सिवा कोई और भी हो तो यह क्यों कहा जावे कि “आप डूबा तो जग डूबा”। इससे स्पष्ट है कि सिवाय आपके दूसरा कोई संसार में है ही नहीं। जैसे स्वप्न में आप ही अनेक रूप होकर लीलायें करते और देखते हैं। सुषुप्ति आई कि खेल खत्म।

तेल और बत्ती होते हुए भी दिया नहीं जल सकता जब तक बत्ती दियासलाई लौ से न जलाया जाय और दियासलाई भी बिना जलाने वाले के नहीं जला सकती। तो कमरे में प्रकाश करने के लिये तीन चीजों की जरूरत हुई- मनुष्य, दियासलाई और दीपक। उसी प्रकार संसार में भी तीन वस्तुएं हैं- प्रकृति, ईश्वर और जीव। जैसे मनुष्य दियासलाई रगड़ कर जलती हुई को बत्ती में लगाता है तो दिया जलने लगता है। उसी तरह ब्रह्म अपनी प्रेरणा द्वारा माया में प्रवेश कर ईश्वर रूपी दियासलाई होता हुआ अन्तःकरण में प्रवेश कर लौ रूपी जीव कहलाता है और ईश्वर रूपी तेल का प्रकाश बुद्धि पर डालता है यानी अन्तःकरण सहित वह प्रकाश जीवात्मा कहलाता है।

मनुष्य दियासलाई जला कर अलग हो जाता है इसी तरह ब्रह्म ने एक बार प्रेरणा कर दी वह स्वतन्त्र हो गया, जैसे दीपक जला कर मनुष्य कहीं भी चला जाय आजाद है परन्तु जब तक तेल बत्ती रहेगा दिया बराबर जलता रहेगा परन्तु गुल हो जाने पर फिर दियासलाई से ही जलेगा। ब्रह्म भी इसी प्रकार प्रेरणा करके अलग हो गया मानो जीवात्मा से इसका कुछ सम्बन्ध ही नहीं है। “भुस में आग लगाकर जमालो दूर खड़ी हुई”।

ब्रह्म यहाँ मिसल जमालो के है, प्रेरणा करके जीवात्मा को शरीर के अन्दर बन्द करके अलग सा हो गया। जिस तरह दियासलाई से लालटेन, डिब्बी, गैस लैम्प आदि जलाते हैं तो दिया जीव रूप है और गैस लैम्प आदि अधिक रोशनी वाले अमीर और अवतार कहे जाते हैं इसका कारण सिर्फ उपाधि है।

यह ब्रह्म में ही ताकत है कि वह सारे समुद्र को एक बूँद के अन्दर भर दे यानी उसने अपने स्वरूप आत्मा को जो कि अजन्मा अमर आदि है और जो सारे संसार में सर्वत्र फैला हुआ है उसे अन्तःकरण के अन्दर भर दिया गया है।

अब उस अन्तःकरण से कैसे निकले?

एक शीशा लेकर सूर्य के सामने कीजिये उसके अक्ष अंधेरी जगह में डालिए तो आप देखेंगे कि खूब प्रकाश वाला अक्ष पड़ता है फिर वही अक्ष उजेली जगह पर डालिये तो उसका प्रकाश कम हो जायेगा। और यदि वही अक्ष धूप में डाला जाय तो शायद दिखाई न पड़े। इससे सिद्ध हुआ कि अक्ष अंधेरे में ज्यादा पड़ता है। अविद्या ही वह अंधेरा है। सूर्य यहाँ ब्रह्म है, उसकी किरणें ईश्वर हैं और आइना अन्तःकरण। आइने का अक्ष सूर्य की किरणों से पृथक तभी तक दिखाई देगा जब तक वह पूरी रोशनी में नहीं आया यानी अँधेरे में खूब दिखाई पड़ेगा और जैसे-जैसे अंधेरा कम होता जायेगा अक्ष का प्रकाश भी कम होता जावेगा।

जैसे सिनेमा में जब फिल्म दिखलाते हैं तो बिजली गुल कर देते है अंधेरे में तसवीरें खूब दिखलाई पड़ती हैं? तो जब तक अविद्यारूपी अंधेरा अन्तःकरण में रहेगा तब तक जीव ब्रह्म से पृथक सा मालूम होगा अविद्या हटते ही जीव ब्रह्म में जो पृथकता भास रही थी वह मिट जायगी। यानी अंधेरे वाला अक्ष अज्ञानियों का जीवात्मा है और उससे उजाले में जो अक्ष है वह ज्ञानियों का जीवात्मा है, तब ही बन्ध और मोक्ष का भ्रम मिट जावेगा। अविद्या ज्ञान से दूर होती है ज्ञान सत्मार्ग से प्राप्त होता है, राम को वशिष्ठ और कृष्ण को सन्दीपन पारमार्णिक गुरु करने पड़े थे। इसी से सन्तों का दर्जा अवतारों से भी बड़ा है।

‘विधि हरि हर कवि कोविद बानी,

कहत साधु महिमा सकुचानी।’

गीता में भगवान ने भी तत्वदर्शियों की शरण में जाना कहा है आत्मविद्या खुद नहीं बतलाई सिर्फ इशारा मात्र कर दिया था।

श्रेयान द्रव्यमयाद्यज्ञाज् ज्ञानयज्ञः परंतप।

सर्वंकर्मिखिलंपार्थ ज्ञानेपरि समाप्यते॥ 33॥

तद्विद्धिप्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

> उपदेश्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥ 33॥

यज्ञज्ञात्वान पुनर्मोहं मेवंयास्यसि पाण्डव।

येन भूतान्यशेषेण द्रक्षस्यात्मन्यथो मयि ॥ 35॥

सम्पूर्ण भूतों को अपने अंतर्गत देखेगा, तब मेरे सच्चिदानन्द स्वरूप में एकीभाव हुआ सच्चिदानन्दमय ही देखेगा।

यो माँ पश्यन्ति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।

तस्याहं नप्रणस्यामि सचमेन प्रणश्यति॥ 40॥

ब्रह्म प्रेरणा करके अलग हो जाता है फिर बार-बार प्रेरणा नहीं करता न उनमें आसक्त होता है इसी से वह कर्ता और अकर्ता दोनों कहलाता है कर्मों का उसे अहंकार नहीं होता जैसे-जैसे अविद्या दूर होती जाती है जीवात्मा का प्रकाश ब्रह्म के प्रकाश में मिलता जाता है यानी अभिन्नता दरसने लगती है। अव्यक्त का ध्यान और अचिन्त का चिन्तन कैसे किया जाय? जो विलास स्वरूप हो जिसकी संज्ञा (Noun) हो तो उसके चिन्तन को भी किया जा सकता है।

ब्रह्म अव्यक्त है अचिन्त्य है यह नाम किसने रखे? मनुष्य ने। तो जिस तरह मनुष्य ने उस अवाँग मनस गोचर का अव्यक्त अचिन्त्य ऐसे नाम रखे हैं वैसे ही यह उसका चिन्तन स्मरण भी कर सकता है यदि मनुष्य चाहे तो। परन्तु मनुष्य करना खुद नहीं चाहता है और बहाने ढूंढ़ता है कि कोई अच्छा गुरु नहीं मिलता।

गुरु की जरूरत?

जब आप किसी की बुराई करना चाहते हैं, तो उसकी तरकीब जानने के लिये कोई गुरु नहीं ढूंढ़ते बल्कि इतना गुप्त रखते हैं कि परमात्मा भी न जानने पावें और उसकी तदवीर खुद ही सोच विचार कर निकाल लेते हो और तदवीरें करते करते सफल ही हो जाते हो। किसने तदवीर बतलाई? किसी ने नहीं। आपके अन्दर ऐसा करने की तीव्र इच्छा हुई तरकीब सोचने को बुद्धि पर जोर दिया अपने इच्छित फल को प्राप्त हो जाये।

अब अधोगति में ले जाने वाली बुराई को तो बिना गुरु के ही खुद बुद्धि पर जोर देकर तदवीरें निकाल लीं और बुराई कर डाली तो जब आप शुभ की प्राप्ति के लिए तीव्र इच्छा कर बुद्धि पर जोर देंगे तो उसके प्राप्त की तदवीर भी बुद्धि से अवश्य पावेंगे क्योंकि सच्चा गुरु आत्मा वहाँ मौजूद ही है। गुरु न मिलने की बात कहना बहाने वाली है।

स्थावरंजंगमं व्याप्तं यत्किंचित् सचराचरम्

तत्पदंदर्शितंयेत तस्मै श्री गुरुवे नमः॥ 36॥

हिरामयेन पात्रेण सत्यास्यापिहि तंमुखं। ईश 15।

वह पात्र कहाँ है काशी में- “वाराणसी भ्रुवोर्मध्ये वलन्तीलोचनममि।”

काशी क्षेत्रे निवासश्च जाह्नवी चरणोदकम्॥॥

गुरुर्विश्वेश्वरः साक्षात् तारकंब्रह्मनिश्चितम्॥ 18॥

काशी क्षेत्र में आज्ञाचक्र वहाँ गुरु प्रकाश भाव से दीखता है इसी से इसका नाम काशी क्षेत्र है निवास जाह्नवी प्रवाह उनके चरण सम्भूत है उस काशी क्षेत्र में गुरु प्रत्यक्ष भाव से इस विषय के ईश्वर रूप से दृश्यमान हैं वहाँ जाने से विश्व की उत्पत्ति का निर्देश होता है, वही तारक ब्रह्म है उनके निकट जाने से संसार बन्धन से छूट जाते हैं।

परमार्थ की तीव्र इच्छा होने से बेचैनी होगी तो संसार की वस्तुओं की अनिच्छा हो जायेगी यही वैराग्य है, यह वैराग्य उत्पन्न होने पर प्रभु कृपा स्वतः होगी और उस कृपा से कोई न कोई सन्त तुम को प्राप्त हो कर उस दिल की बेचैनी को अपने आप शाँत कर देगा और वह आनन्दमय हो जायेगा।

लेकिन-

जिस पारस से सोना होवे, वह पारस है कच्चा।

जिस पारस से पारस होवे, वह पारस है सच्चा॥

सच्चा गुरु चेला नहीं बनाता, माला जपने को नहीं देता वह शिक्षा देता रहता है जो एक देशी उपदेश दे वह कच्चा और सर्वदेशी दे वह पक्का।

देखिये मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, क्षुधा, पिपासा, इच्छा, राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह इनका स्वरूप न कभी देखा न देख सकते हैं। लेकिन इनका चिन्तन स्मरण बार-बार करते हैं। कहते हैं इनका रूप देखा नहीं और यह भी कहते हैं मेरा मन भजन, इष्टदेव में नहीं लगता, स्थिर नहीं होता, हमारी बुद्धि में यह बात नहीं आती, इसी तरह उस अव्यक्त व ध्यान और चिन्तन भी उसके चरित्रों द्वारा हो सकता है, यदि मनुष्य चाहे तो।

मन की गति बुद्धि तक है, जिस कार्य के करने बुद्धि हार मान लेती है उसमें मन कभी नहीं लगता यही इसका प्रभाव है। बुद्धि के परे भगवान्-आत्म है तो मन की पहुँच भगवान् तक कैसे हो और जबर्दस्ती भगवान् में कैसे लगे, वह तो वहाँ तक पहुँच नहीं सकता। मन पर माया का प्रभाव पड़ा है इस से मन भगवान् का भजन पसन्द नहीं करता और माया के कार्यों में रात दिन परिणत रहता है।

जो लोग यह कहते हैं कि मेरा मन आज भजन में 5 मिनट लगा वे गलत कहते हैं वह तो माया से परे जा सकता, भजन माया के परे है उसमें बिन आधार के कैसे ठहरे।

‘गो गोचर जहंलगि मन जाई, सो सब माया जानोभ’

सो ऐसा मन ब्रह्म में कैसे लगे? उसे जबर्दस्ती लगाना बेकार है। यदि कोई कहे कि लगता है तो उसका मन माया में ही लगता है, उसका भगवान् माया का ही है इसी कारण सिर्फ मन से भजन करने वाले भजन करने में फेल हो जाते हैं।

मन बुद्धि के मातहत है यानी बुद्धि निश्चय करती है वही मन करता है इसलिए बुद्धिमान को चाहिए कि वह मन को न छोड़ कर बुद्धि को काबू में लाये और बुद्धि को सत्संग में डाले। बुद्धि की अमित शाश्वत है यह राम कृष्ण शंकर सबको प्यारी है इसी सत्संग रूपी अग्नि में बुद्धि को डालना चाहिये। अग्नि बुद्धि के मल को जला देगा। सत्य द्रव शेष रह जायेगा, इसी को शुद्ध बुद्धि कहते हैं।

बुद्धि का साथी मन है मन के भी पाप जाते हैं और उसे में विवेक उत्पन्न हो जाता है जब मन शुद्ध हुआ तो फिर कहता है, मैं कौन यह जगत क्या है? मैं अमुक व्यक्ति नहीं। बुद्धि के पास जाता और विचार करता है और अद्वैत का सब भेद तब समझ लेता है।

ब्रह्म का प्रभाव बुद्धि द्वारा मन पर पड़ता है। जैसे उल्लू सीधी सूर्य की रोशनी नहीं ले सकता, परन्तु चन्द्रमा द्वारा लेता है। यही उल्लू मन है साधू कहते हैं “मेरा उल्लू कहीं नहीं जाने का”। “माया रूपी रात में उल्लू बोला करता है।” मन बुद्धि के द्वारा ब्रह्म की आभा पाता है। मन के आधीन इन्द्रियाँ हैं, मन के सुधारने से आप ही सुधर जाती हैं मन जीवात्मा को परेशान करता है।

मन माया की कोठरी तन संशय का कोट

विषहर मन्त्र न लागई करे चोट पर चोट॥

जिस प्रकार दियासलाई रूपी ईश्वर को तेल रूपी मन ग्रहण नहीं कर सकता यानी दियासलाई जलाकर तेल पर लगाओ तो गुल हो जायेगी, पर तेल में कुछ अधार बत्ती लगा दी जाय तो वह बत्ती जलने लगेगी और बत्ती द्वार तेल जलने लगेगा और गरम भी होता जायगा। अब यदि बत्ती पर रंगीन चिमनी रख दी जावे तो रोशनी भी रंगीन दिखाई पड़ती है। हालाँकि असली लौ के रंग से फर्क न आवेगा। इसी प्रकार सत्संग के असर से मनुष्य का स्वरूप भला बुरा दीख पड़ता है परन्तु यथार्थ में वह सदैव एक-सा है।

अखण्ड ज्योति के पाठक अपनी ‘उल्लू की दीवट’ को संभाल कर रखें और उसका ठीक उपयोग करें तो अपने परम उद्देश्य को प्राप्त कर सकते हैं।


Quotation

त्याग का तात्पर्य है दूसरों की तन, मन, धन से सेवा करना, उनसे प्रेम और सहानुभूति रखना और उन्हें अपने ज्ञान से लाभ पहुँचाना। जब इस बात को अच्छी तरह समझ जाओगे तब तुम्हें ज्ञात होगा कि लेने की अपेक्षा देना श्रेष्ठ है।

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लालची आदमी चाहे करोड़पति हो जाये तो भी सदा नीच, पतित और घृणित रहेगा। जब तक दुनिया में उससे अधिक धनवान रहेंगे वह उन्हें देख कर अपने को निर्धन ही समझेगा।


पंद्रह आने का पिंजड़ा

(लेखक- श्रीरामनिवास शर्मा अम्बाह)

मनुष्य शरीर जिस पर इतना अभिमान किया जाता है, जिसकी तड़क भड़क के लिए जमीन आकाश के कुलाबे एक किये जाते हैं असल में क्या है यह जान कर आश्चर्य होता है।

लोग ‘आत्मा’ शब्द को मुँह से रटते तो हैं पर वास्तव में शरीर को ही आत्मा मानते हैं। हमारे प्रयत्न जीवन भर ऐसे रहते हैं जिनसे शरीर को सुख पहुंचे, शरीर सुन्दर मालूम पड़े शरीर की इन्द्रियाँ तृप्त रहें। माया से लिपटे रहना और ईश्वर तथा आत्म तत्व को उपेक्षा की दृष्टि से देखना इसका प्रमाण है।

यह शरीर जिसके लिये अपना अमूल्य जीवन नष्ट कर डालते हैं साँसारिक दृष्टि से बहुत ही तुच्छ वस्तु है। पशुओं का मृत शरीर चाम, हड्डी, माँस व खाद इन सब का मूल्य आँकने पर कई रुपये का होता है पर मनुष्य का शरीर उनके मुकाबले में बहुत ही हीन है।

वैज्ञानिकों ने मनुष्य शरीर का विश्लेषण करके पता लगाया है कि इसमें एक बैटरी लायक नाइट्रोजन, एक छोटा गुब्बारा भरने लायक हाइड्रोजन, एक पैकिट पिन बनाने वाला लोहा, दस हजार दियासलाइयां बनाने लायक फास्फोरस, साबुन के 5-6 बार बनाने लायक चर्बी, सात हजार पेंसिलों में भरने लायक कार्बन, तीन दिन की दाल बनाने लायक नमक, दो बाल्टी पानी एक दीवार पोतने लायक चूना और इतना गन्धक है जिसे लगाने से एक कुत्ते की जूँ मर सके। इतना सामान यदि बाजार से खरीदा जाय तो इस महंगी के जमाने में भी पौने पन्द्रह आने का मिल सकता है।

यह पौने पन्द्रह आने का पिंजड़ा? जो आज अमूल्य रत्न बना हुआ है वह पंछी कौन होगा, जिसकी बात है कि हम उस पंछी के पिंजड़े को सजाने में ही सारी शक्ति लगाए हुए है।


सुख और सफलता

(ले. - श्री मन्नालाल शर्मा, बदनावर)

संसार के सभी ज्ञानधारी क्या राजा क्या रंक सुख प्राप्त करना चाहते हैं आच्छन्नकारी अन्धकार से बचने तथा किसी प्रकार उसके घटाने के अभिप्राय से नर-नारी अंधे होकर असंख्य उपायों और मार्गों की शरण लेते हैं, इच्छित सुख सबको निकट आता हुआ प्रतीत होता है और कुछ समय के लिए जीव भी अपने को सुरक्षित समझ कर दुख के आस्तित्व की विस्मृतिजन्य प्रसन्नता में पागल सा हो जाता है परन्तु अन्त को दिवस आ ही जाता है या अरक्षित जीव पर किसी बड़े शोक आगमन या विपत्ति का हटात आक्रमण हो ही जाता है, जिसके कारण हमारा काल्पनिक सुख चकनाचूर हो जाता है।

इसी तरह हम देखते हैं कि संसार के क्या छोटे क्या बड़े सभी किसी न किसी दुख से पीड़ित हैं। शिशु, युवा अथवा युवती होने के लिए चिल्लाता है। पुरुष तथा स्त्री बचपन के लिए हुए सुखों के लिए दीर्घ श्वास लेते हैं, दरिद्र धनाभाव की जंजीरों से जकड़ा होने के कारण तड़पता है और धनी प्रायः भिखारी हो जाने की आशंका से ही दुखी जीवन बिताता है।

हममें से अधिकाँश मनुष्य तो इतने दुखी हैं कि मानो जीवन की दौड़ में गिरते पड़ते मृत्यु के निश्चित मार्ग तक पहुँचना ही अपना ध्येय समझते हैं इस दुनियावी दौड़ में हम दुर्घटना की ठोकर खाकर गिरे पड़ते हैं और यदि कुचले जाने से बच जाते हैं तो कपड़े झाड़कर खड़े हो जाते है और उसी दुनिया में लग जाते हैं इस जीवन में सिर्फ हाँफना ही हाँफना है कहीं देखिये मन व शान्ति नहीं है। आज हम इच्छा राग, द्वेष, है। कल चुनाव के झगड़े में स्वरूप न कभी देखा गया जब पाने की कोशिश में जुट चिन्तन स्मरण बार एक दिन मृत्यु भीषण रूप देखा नहीं और यह भी रूप में हमारे सामने आ उपस्थित होती है और हमें इच्छा न रहते हुए भी मजबूर होकर एक सिटपिटाई हुई हालत में अपने मित्रों और सम्बन्धियों से विदा माँगनी पड़ती है, न इस जीने में ही सुख है और न मृत्यु में ही ............अब प्रश्न केवल इतना है कि क्या हम किसी उपाय से अपने जीवन को बना सकते हैं?

सबसे पहले हमें जानना चाहिये कि सुख क्या है और कहाँ है? सुख वास्तव में हमारी एक हार्दिक अनुभूति है, जिसको हम अनुभव करते हैं और वह हमारे अन्दर है बाहर नहीं लेकिन भ्रमवश वह हमको मृग तृष्णा के जल के समान बाहर वस्तुओं में प्रतिभासित होता है। यह कारण है कि रात-दिन प्रयत्न करने पर भी हम वास्तविक सुख से दूर होते गये, स्वामी रामतीर्थ ने एक बार अपने प्रवचन में कहा था कि “पृथ्वी पर कई एक धुरन्धर विद्वान बड़े-बड़े फिलॉसफर और राम और कृष्ण जैसे महान नेताओं का प्रादुर्भाव हो गया परन्तु संसार एक इञ्च भर भी नहीं सुधरा और मनुष्य आत्मिक सुख को अधिकाधिक खोता गया सच यह है कि जो चीज जहाँ पर है ही नहीं उसको वहाँ पर ढूंढ़ना पागलपन के सिवाय और क्या हो सकता है?”

यदि हम अपनी भ्रान्त धारणाओं से निर्लिप्त हो जावे तो हम अपने वास्तविक सुख को समझ सकते हैं आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने दृष्टिकोण को बदलें और हृदय की गहराई तक पहुँचने का प्रयत्न करें। यह कार्य सरल नहीं है। इसके लिए अभ्यास की आवश्यकता है। क्योंकि शाश्वत अथवा स्थायी सुख हमारे अन्दर आत्मा में है अथवा कहिए कि आत्मा ही आनन्द स्वरूप है हमको उसका अनुभव करना चाहिए। और इसके लिए चित्त को एकाग्र करने की अत्यन्त आवश्यकता है जो कि क्रमशः अभ्यास करने से ही प्राप्त होती है। आपको याद रखना चाहिए कि किसी भी बालक को पढ़ना सिखाने के लिए पहले से ही एक कविता वैज्ञानिक पुस्तक अथवा बीजगणित का अध्ययन नहीं कराया जाता, जब कि हमें चिरकाल से दौड़ने का अभ्यास नहीं है तो पहले से ही 20 मील की दौड़ में हम कैसे कामयाब हो सकते हैं। जब हमने दैनिक जीवन की छोटी-छोटी आदतों को वश में नहीं किया थोड़ी प्रतिकूलता से ही जब हम एक दम आपे से बाहर हो जाते हैं और हमारे दिमाग में मानो एकाएक विस्फोट हो जाता है, व दिन भर के कार्यों के बाद रात को सोते समय भी जिनको हम ही विस्तृत नहीं कर सकते एक मूर्ति का ध्यान करते ही जब सैकड़ों मूर्तियाँ हमारे हृदय पटल पर अनायास ही अंकित हो जाती हैं तो भला आत्मा जैसे गंभीर विषय का हम कैसे ध्यान कर सकते हैं।..........हम मूर्ख की तरह विश्वास कर लेते हैं कि आत्मा एक ऐसी वस्तु है कि जिसका नाम लेते ही हमारी सोई हुई सब शक्तियाँ जाग उठेंगी लेकिन जब हम अपने को असफल देखते हैं तो एकदम निराश होकर साधन को ही छोड़ देते हैं यह हमारी मानसिक दुर्बलता है।

पहले आपको उन निरर्थक तुच्छ बातों पर विजय प्राप्त करनी चाहिये जिनके आप अब तक स्वेच्छापूर्वक आखेट बन रहे थे अब आप चित्त से निश्चलता अर्थात् विचार शून्यता का क्रमशः अभ्यास कीजिये किसी भी एकान्त स्थान में नियमित समय पर (हो सके तो प्रातःकाल 4 बजे या सायंकाल) शाँत चित्त होकर बैठ जाइए और अपने मन को बिल्कुल विचारों से रहित कर दीजिए और सारी चित्तवृत्ति को किसी भी एक मनमानी वस्तु पर लगाइये यदि मन इधर उधर भटके तो उसे हठपूर्वक अपनी इच्छित वस्तु पर केन्द्रित कीजिये इस अभ्यास को आप पहले पहल एक मिनट से शुरू करें और फिर क्रमशः इसे बढ़ाते जावें और जब आप कुछ अधिक समय तक मन को विचार शून्य रखने का अभ्यास कर सकें तब “मैं। आनन्द स्वरूप आत्मा हूँ” इस भावना को दृढ़तापूर्वक हृदयंगम कीजिए, कुछ समय के पश्चात आप उस शाश्वत सुख का अनुभव करने लगेंगे जिसके लिए आप चिरकाल से उत्कंठित थे।


दूसरों पर रहम करो

(लेखक - अध्यापक जहूरबख्श)

बदर के युद्ध में कुरैश लोग बुरी तरह परास्त हो चुके थे और हजरत मुहम्मद साहब के खून के प्यासे हो रहे थे। अनेक कुरैश युवकों ने बीड़ा उठाया था कि हम एक दिन जरूर मुहम्मद का सिर काट कर लायेंगे। दासूर उन्हीं कुरैश युवकों में से एक था।

एक दिन दोपहर के समय हजरत मुहम्मद साहब अपने खेमे से कुछ फासले पर एक वृक्ष की छाया में लेटे हुए थे। ठण्डी-ठण्डी हवा चली, तो उनकी आँख लग गई। दासूर उनके पीछे लगा हुआ था ही। यह मौका पाया, तो वह अपने घोड़े को तेजी से दौड़ा कर उनके निकट जा पहुँचा। घोड़े की टापों की भनक पड़ी तो हजरत मुहम्मद साहब जाग उठे। परन्तु, वे सम्हलने भी न पाये थे कि दासूर ने उनके कण्ठ पर तलवार रख दी और अभिमानपूर्वक कहा ‘मुहम्मद! बोल इस वक्त तुझे कौन बचायेगा?”

मुहम्मद साहब ने गरज कर उत्तर दिया- “अल्लाह!” उनकी आवाज में ऐसी कुछ शक्ति थी कि दासूर का हृदय हिल उठा और उसके हाथ से तलवार छूट कर भूमि पर जा गिरी। मुहम्मद साहब ने फौरन पैंतरा बदल कर तलवार उठा ली और उसे खींचते हुए पुनः गर्जना की- “ दासूर! बोल अब तुझे कौन बचायेगा?”

दासूर काँपते हुए उनके पैरों पर गिर पड़ा और गिड़गिड़ा कर बोला-”या हजरत, अब आपके सिवा मुझे कोई नहीं बचा सकता।”

यह सुनना था कि मुहम्मद साहब ने तलवार फेंक दी और दासूर से कहा- “ऐ बदनसीब इन्सान! इस वक्त भी तेरे मुँह से खुदा का नाम न निकला! उफ, तेरे माफिक मोहताज और कौन होगा? जा, आज से दूसरों पर रहम करना सीख।”

दासूर पर हजरत मुहम्मद के इस व्यवहार से ऐसा प्रभाव पड़ा कि वह उसी समय उन पर ईमान लाया और उनका शिष्य हो गया।


पारस पत्थर कहाँ है?

(श्री डॉ. शिवरतन लाल त्रिपाठी, गोला गोकरनाथ)

दुनिया में एक ऐसे पत्थर की कल्पना चली आती है जिसे छूने से लोहा सोना बन जाता है इस पत्थर को ‘पारस’ कहते हैं। अनेक किम्वदन्तियाँ इसके सम्बन्ध में चली आती हैं। कोई कहते हैं कि यह पहाड़ों पर कहीं होता है पहाड़ी चरवाहे बकरियों के खुरों में लोहे के नाल ठोक देते हैं वे कभी पारस के ऊपर होकर निकल जाती हैं तो लोहे के नाल सोने के हो जाते हैं। कोई कहते हैं कि सुअरिया का दूध यदि ईंटों पर पड़ जाय तो वह सोने की हो जाती हैं। कथाकारों ने भी इस सम्बन्ध में कई कहानियाँ गढ़ी हैं। राजा चन्देल के यहाँ पारस था ऐसा कहा जाता है। इन सब बातों में कितना सत्य है यह जानना कठिन है पर इतना निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इस युग के विज्ञान खोजियों को अभी तक इस प्रकार की किसी वस्तु का संसार भर में पता नहीं लगा है जिसे छूने से लोहा सोना हो जाता हो।

बहुत से लोग पारस पत्थर या इसी प्रकार की किसी वस्तु की तलाश में रहते हैं। जिसके द्वारा वे आसानी से पर्याप्त सुख सामग्री पा सकें। असल में ऐसा पत्थर परमात्मा ने सबको दे रखा है इसका उपयोग करना न करना अपनी कुशलता पर निर्भर है। दृढ़ विचार, आत्म संयम, कर्म निष्ठा और जिज्ञासा ऐसे गुण हैं जिनके मिलने पर पारस पत्थर बन जाता है। इन चारों गुणों के मिलने से जो बुद्धि बनती है वह ऐसी होती है कि जो उसे छू ले वही सोने का हो जाय।

अमेरिका का धनकुबेर जानएस्टर एक गरीब आदमी था। उसने थोड़े से रुपयों से चमड़े का व्यापार शुरू किया। इसी सिलसिले में वह अपनी नाव को उत्तर ध्रुव तक ले पहुँचा और अपनी कर्म निष्ठा के बल पर कुछ ही दिनों में विपुल सम्पत्ति का स्वामी बन गया।

फोर्ड मोटरों का संसार प्रसिद्ध निर्माता हैनरी फोर्ड बड़ी कठिनाई से मोटरों का कारखाना खोल सका था किन्तु अपनी दूरदर्शिता और अध्यवसाय से उस कारोबार को इतना ऊंचा बढ़ा लिया कि वह संसार का सर्वोच्च धनपति समझा जाता है। हैटीक्रीन नामक एक महिला का पति उसे कई बच्चों की माँ बनाकर भिखारिन की दशा में छोड़ मरा था। किन्तु वह हताश नहीं हुई और सस्ती चीजें खरीद कर उन्हें महंगी बनाकर बेचने का व्यापार शुरू किया कुछ ही दिनों में वह अमेरिका की लक्ष्मी बन गई टेम्सा प्रान्त की रेलवे कम्पनी तक उसकी हो चुकी थी। प्रसिद्ध तेली जान राम केलर बचपन में एक तेली के यहाँ नौकर था और तेल बेचकर अपना पेट भरता था। उसका मन इसी तेल के व्यापार की तह तक घुसा और इस सम्बन्ध के गूढ़ रहस्यों को उसने जाना। जो कुछ पैसे उसके बचाये थे उन्हीं को लेकर उसने तेल की तिजारत आरम्भ कर दी। अन्तिम समय में उसके पास इतनी सम्पत्ति थी कि अगर सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक उस सम्पत्ति में से 1400 रोज खर्च किये जाए तो सिर्फ उसकी आधी दौलत खर्च हो पाती। यह तेली अपनी विपुल सम्पत्ति में से 26 करोड़ रुपया हर साल तो धर्म पुण्य में खर्च करता रहता था। क्या आप समझते हैं कि इतनी सम्पदा बिना पारस पत्थर के कमाई जा सकती है।

घुमक्कड़ रोबिन्सन क्रूसो और कोलम्बस ने जिन कठिनाइयों का सामना करके स्वप्नतुल्य स्थानों को जाना क्या वे बिना पारस की मदद के जान लिये गये थे? ग्रामोफोन के आविष्कारक मिट एडीसन, रेलगाड़ी के निर्माता सर जेम्सवाट बेतार के तार को खोज निकालने वाले मार्कोनी जिस वस्तु की सहायता से उन अलभ्य वस्तुओं को बना सकने में समर्थ हुए थे वह पारस पत्थर ही था। अन्यथा वह हैरत में डालने वाली वस्तुएं कैसे बन जातीं।

एक जुलाहे को कबीर, घसखोदे को कालिदास, डाकू को बाल्मीकि, मोची को मुसोलिनी, एक आवारा को हिटलर, गड़रिये को ईसा के रूप में देखते हैं तो विश्वास करना पड़ता है कि इन्हें पारस पत्थर जरूर मिला होगा, वरना इतना अद्भुत परिवर्तन कैसे हो जाता?

निश्चय ही पारस का बीज हर एक आदमी के अन्दर रहता है और अगर वह चाहे तो उसे खोज कर निकाल सकता है। हम लोग बहुत होशियार और चालाक बनते हैं अपने को सुखी और कमाऊ पूत समझते हैं परन्तु यह होशियारी उस बन्दर जैसी है जो चने के दाने देखकर हाथ में रखी हुई रुपयों की थैली को एक ओर पटक देता है और चने खाने के लिए दौड़ पड़ता हैं।

आराम से पड़े रहना, अच्छा खा पहन लेना, मौज शौक की चीजों में मन बहलाना इन्हें पाकर हम समझते हैं कि जीवन धन्य हो गया और सब कुछ पा लिया आगे के लिए उनकी कोई इच्छा और आकाँक्षा ही नहीं होती। जितना जानते हैं उसी पर घमण्ड करते हैं और आगे की बात जानने की कोई जरूरत नहीं समझते। अपने आस-पास के किसी थोड़े से जानकार को देखिये वह अपनी योग्यता पर बहुत ऐंठा हुआ मिलेगा, इससे ज्यादा सीखने की उसे जरूरत महसूस न होती होगी। हर आदमी चाहता है कि कम परिश्रम में ज्यादा नफा हो जाय। बिना जोखिम में पड़े छप्पर फाड़ कर खजाना टपक पड़े। भला कहीं ऐसा हो सकता है? जो लोग थोड़ा सा उत्साह दिखाते हैं वह जरा सी कठिनाई आने पर उसे छोड़ देते हैं और एक चीज से दूसरी पर भटकते हैं फलस्वरूप उन्हें किसी भी काम में सफलता नहीं मिलती और वे अपने भाग्य को कोस कर रह जाते हैं।

जो अपने लोहे को सोना बनाना चाहते हों, जिन्हें पारस पत्थर की तलाश हो, वह उन 4 वस्तुओं को प्रचुर मात्रा में इकट्ठा करें जिनके मिलने से पारस सिद्ध बन जाती है। स्मरण रखो- दृढ़ विचार, आत्म संयम, कर्म निष्ठा और जिज्ञासा चार वस्तुओं के मिल जाने से सोना बनाने वाली पारस बुद्धि बनती है वह जिधर भी झुक पड़ती है उधर ही सोने के पहाड़ खड़े कर देती है।

जितना जानते हो उससे अधिक जानने को हर घड़ी कोशिश करते रहो, इन्द्रियों के गुलाम मत बनो और न आलस्य को ही अपने पास फटकने दो। काम को देखकर घबराओ मत, उसे पूरा करने के लिए मशीन की तरह जुट जाओ जितना अधिक काम करो उतनी ही अधिक प्रसन्नता का अनुभव करो। काम का तरीका ठीक रखो। ऐसा न हो कि जाना है पूर्व और पश्चिम को दौड़ पड़ो। अपनी बात पर मजबूत रहो, अपने काम पर श्रद्धा और विश्वास रखो, बार-बार विचारों को मत बदलो, यदि अपनी कार्यपद्धति सच्ची मालूम पड़ती है तो उस पर दृढ़ रहो किसी भी कठिनाई के आने पर मत डिगो। यह गुण तुम्हारे अन्दर जैसे जैसे बढ़ते जाएंगे वैसे ही वैसे भाग्य निर्माण होता जायगा। बाहम को सहायता, उपयुक्त साधन, पथप्रदर्शन और कठिनाइयों का हल अपने आप प्राप्त होता जायेगा। भीतर के यह गुण बाहर की सुविधाएं तुम्हारे सामने इकट्ठी करते चलेंगे। मोटी और स्थूल बुद्धि खराब भाग्य, ऐसी तेजी और सुन्दरता के साथ बदलने लगेंगे मानो किसी ने जादू कर दिया हो। कुछ ही दिनों में अनुभव करोगे कि तुम खुद पारस पत्थर हो, जिसे छूते हो उसे ही सोना बना देते हो।


Quotation

भलाई से बढ़कर संसार में कोई प्रबल शक्ति नहीं है। भलाई में ऐसी प्रबल शक्ति है कि संसार का भाग्य सदैव भले मनुष्यों के हाथ में रहा है और रहेगा। भले मनुष्य ही संसार के नेता, पथ प्रदर्शक और उद्धारक होते हैं।

*****

तुम हीन, असमर्थ, कायर, दुर्बल और निस्तेज नहीं हो। तुम अमृत सन्तान और आत्म तेज के केन्द्र हो।


स्नान तथा तैरने की कला

(ले. श्री रामकिशोरलाल मसीने, गोंदिया)

इस संसार में उत्तम स्वास्थ्य का होना व आरोग्य जीवन व्यतीत करना ही सर्व सुखों का मूल है। आरोग्यता व स्वास्थ्य उसी मनुष्य का ठीक है जिसके वातादिक दोष, अग्नि, रसादिक, धातु व मल क्रिया समान हों, जिसकी आत्मा तथा मन प्रसन्न हों, अब यह जानना आवश्यक है कि क्या स्वास्थ्य, आरोग्यता तथा रूप लावण्य ऊपरी बातों (साधनों) से आ सकते हैं व आकर टिक सकते हैं जैसे दवाओं के सेवन से व टूथपेस्ट साबुन, तेल, इत्र, क्रीम, पाउडर, शीशी, बढ़िया सैलून में फैशनदार कटे बालों में। फैशन से कटे सिले वस्त्र, छड़ी, सूट, टाई, अंगूठी, सुनहरी, घड़ी- सजाने के लिए; चश्मा, माँग अप-टू-डेट शेविंग- अच्छे दिखने के लिए वैज, कावर, पिन आदि यह सब लावण्य बढ़ाने को ही काम में लाये जाते हैं। किन्तु इन सब ऊपरी टीमटामों से रूप लावण्य नहीं आ सकता और न टिक ही सकता है। यह तो हमारे प्राकृतिक जीवन के बरतने से ही रह सकता है। प्राकृतिक जीवन से चलना मानो रूप लावण्य को खोना है। हमें प्रकृति के साथ नित्य व्यायाम करना तथा सफाई से रहना चाहिए। भोजन शुद्ध, ताजा, सादा, रसयुक्त, हल्का तथा प्रिय करना चाहिए। जहाँ तक हो हरी सब्जी का अधिक व्यवहार करो। “जो जैसा आहार करेगा वह वैसा ही बनेगा” यह बड़े-बड़े विद्वानों का कथन है। सर्वदा प्रत्येक ग्रास को खूब चबा-चबा कर खाना चाहिये। फलों का अधिक सेवन कर सको तो उत्तम है। क्योंकि वीर्योत्पादन की शक्ति दूध से भी ज्यादा फल में हुआ करती है कोई भी वस्तु जल्दी-जल्दी नहीं खानी चाहिए। भोजन दो वक्त करना चाहिए। पहला 10 बजे से 12 बजे के अन्दर तथा शाम को 8 बजे के अन्दर। रात्रि में सोते समय थोड़ा गुन- गुना दूध मिल सके तो अवश्य लेना चाहिये। बासी कभी न खाओ उससे बुद्धि, वायु तेज नष्ट होते हैं। थके हुए बदन पर भोजन कभी न करें। भोजन शान्त चित्त से रुचि सहित करना चाहिये तथा उस समय यह मन में ख्याल करना चाहिये कि जो कुछ हम खा रहे हैं उससे हम जीवन खींच रहे हैं और हममें शक्ति बढ़ रही है। भोजन के समय अधिक पानी नहीं पीना चाहिये बल्कि आधा घण्टा ठहर कर दूध के सहित थोड़ा-थोड़ा पीना चाहिए। भोजनोपरान्त 140 कदम चलना। बाद में दाहिने फिर बाएं करवट लेटकर आराम करना चाहियें।

शुद्ध जल का पर्याप्त मात्रा में सेवन करो। रेतीली जमीन का बहता हुआ जल उत्तम होता है। कुंए का भी जल शुद्ध है। परन्तु उसमें सूर्य की किरणें तथा यथेष्ट शुद्ध वायु प्रति दिन लगे।

प्रचुर सूर्य किरण का सेवन करना भी आवश्यक है। प्रातःकाल का सूर्य, बल और वीर्योत्पादक होता है। इससे आरोग्यता तो आवेगी ही, रूप−लावण्य भी बढ़ेगा व टिकेगा। प्रकृति सेवी मनुष्य के पास स्वाध्याय तथा रूप लावण्य दास बनकर रहते हैं। कम से कम आधा घण्टा अवश्य ही प्रातः सूर्य किरण का सेवन करो।

हर एक ऋतुओं का, वर्षा में वर्षा का शीतकाल में ठण्ड का ग्रीष्म में गर्मी का यथेष्ट सेवन करना चाहिए। सभी वस्तुओं में फलों का भी यथेष्ट सेवन करो। प्रकृति सेवी अपने समय का परिस्थिति के अनुसार विभाग करके नियमपूर्वक कार्य करता है प्रातः चार बजे ही उठना, नित्य क्रिया से निबटकर खुले मैदान में दो चार मील घूमने जाना। वहाँ एक प्रचुर शुद्ध वायु का सेवन करना और उसी समय खुले मैदान में एकाध कपड़ा पहिने हुए थोड़ा व्यायाम करता है। इससे उसके अंग प्रत्यंग सुडौल बनते व गहरी साँस द्वारा शुद्ध वायु का यथेष्ट सेवन भी होता है।

स्वास्थ्य के लिए व्यायाम अमृत समान है। व्यायाम करते समय सीना हमेशा ऊँचा रखो व्यायाम के समय नाक से ही श्वास लेना तथा मुँह से छोड़ना चाहिये कसरत के बाद एकाएक बैठ जाना या तुरन्त ही जल पीना अत्यन्त हानिकारक है। यदि मुँह सूखे तो कुल्ला कर लो या मिश्री चबालो। व्यायाम के बाद शीघ्र ही स्नान भी नहीं करना चाहिये, क्योंकि गरम शरीर को एकदम ठण्डा करना हानिकारक होगा। कम से कम आधा घण्टा ठहरकर घर्षण स्नान (मल-2 कर) अवश्य करें। ताकि चमड़े के छिद्र साफ हो जावें।

स्नान के समय यदि साबुन के स्थान में पीली व बिना कंकड़ की कोई भी शुद्ध मिट्टी रगड़ रगड़ कर लेपन करने के बाद 10-15 मिनट सूखने दें घर्षण से घिस-घिस कर धो डालो इससे मैल तो रहेगा ही नहीं, शरीर शुद्ध तथा चमड़े के सब छिद्र भी खुल जायेंगे। छिद्रों का साफ रहना अत्यन्त आवश्यक है।

कहीं एक लेख में मैंने पढ़ा है कि मुहर्रम के समय एक मनुष्य शेर बना। वार्निश मिलाया हुआ पीला पीला रंग सारे शरीर में पोता। दिन भर तो खूब खेला कूदा, रात्रि में आया तो थकावट के मारे वैसे ही सो गया। सूर्योदय के पश्चात भी 8-9 बजे तक सोकर न उठा। पुकारने पर भी वह न बोला। किवाड़ तोड़े गये तो अचल मुर्दे के समान पड़ा मिला। तुरन्त ही डॉक्टर बुलाया गया। डॉक्टर ने तारपिन तेल, गरम पानी और साबुन से रगड़ रगड़ कर उसे नहलवाया। जब शरीर शुद्ध हुआ- चमड़े के छिद्र खुले तब कहीं बाद में उसे होश आया। इससे साफ जाहिर होता है कि नाक और मुँह से हवा लेते रहने पर भी हमारे शरीर का चमड़ा छिद्रों द्वारा कहीं अधिक श्वास लेता है। छिद्रों के बन्द हो जाने से हम जी भी नहीं सकते। अतः शरीर की स्वच्छता में कभी आलस्य न करे। घर्षण से शरीर के चमड़े के सारे छिद्र खुल जायेंगे जिससे शरीर के अन्दर के सारे दूषित पदार्थ पसीने द्वारा निकल जाया करेंगे और बाहर की शुद्ध वायु भी भीतर जायगी जिससे शरीर निरोगी रहेगा। घर्षण स्नान से मनुष्य निर्विकारी ब्रह्मचारी तथा दीर्घजीवी सहज में ही बनता है। गन्देपन से रोगी, आलसी विषयी तथा अल्पायु होता है। स्नान के लिए प्रातःकाल ही श्रेष्ठ है। जब तक शिर ठण्डा न हो ले स्नान करना चाहिये। ठण्ड में 5 से 10 मिनट व गर्मी में कम से कम आधा घण्टा अवश्य घर्षण स्नान करें।

कुएं का जल सब ऋतुओं में स्नान के लिये अच्छा होता है। पर बहता हुआ तथा तालाब का जल जिसमें सूर्य का प्रकाश तथा शुद्ध वायु पर्याप्त मात्रा में लगते हों लाभदायक हैं। प्रचुर जल से स्नान करना अच्छा है - न कि एक लोटे जल से। शिर पर स्वच्छ ताजा शीतल जल छोड़ें, बाद में खुरखुरे मुलायम वस्त्र से पोंछ डालें ताकि खाज व दाद का भय न रहे। घर्षण स्नान से निश्चय ही मनुष्य आनन्द, उत्साह, आरोग्यता, शाँति व कान्ति के लक्षण प्रतिदिन बढ़ती पर पावेगा। नित्य अभ्यास करने से आरोग्यता व रूप-लावण्य अवश्य आवेगा तथा टिकेगा। जापानी लोग घर्षण स्नान को बहुत महत्व देते हैं इसी से वे उद्योगी, तेजस्वी व दीर्घजीवी होते हैं।

स्नान के कुछ साधारण नियम :-

(1)- नित्य देश कालानुसार दो वक्त स्नान करना चाहिये। और कारणवश दो बार न हो तो प्रातः तैरना व घर्षण स्नान नित्य नियमपूर्वक हो। दूसरे वक्त तौलिया को गीला करके सारे शरीर को रगड़-रगड़ कर पोंछ डालों। इससे शरीर का दिन भर का जमा पसीना साफ हो जावेगा व चमड़े के छिद्र खुल जावेंगे तथा थकावट दूर होकर निद्रा आवेगी। इससे भोजन हजम होगा एवं शरीर निरोग, चुस्त तथा फुर्तीला होगा।

(2)- नित्य उष्ण जल से स्नान करो। यह अप्राकृतिक है : इससे शरीर कमजोर, नाजुक, चंचल व विषयी बनता है। ब्रह्मचर्य के लिये हानिकर है।

(3)- शास्त्रों में समुद्र-स्नान की महिमा है। कारण यह कि समुद्र जल में एक प्रकार की बिजली होती है जिससे मनुष्य निरोगी व चैतन्य रहता है। यदि सुभीता हो तो घर के पानी में समुद्री नमक डालकर स्नान करो। बाद में शुद्ध जल से नहा लो। इससे विशेष लाभ होगा।

(4)- स्नान भोजन के पहले करना चाहिये। भोजनोपरान्त तीन घण्टों के बाद नहाना चाहिये। नहाने के बाद तुरन्त भोजन करने से व भोजनोपरान्त तुरन्त नहाने से पित्त बढ़ जाता है। पाचनक्रिया भी बिगड़ जाती है- अनपच रह जाता है। इससे सावधान रहना चाहिये।

(5)- रोगी, दुर्बल व नाजुकों को भी कम से कम टावेलाबाथ (रुमाल भिगोकर) से घर्षण स्नान करना चाहिये व धीरे-धीरे ठण्डे जल से स्नान करने की आदत डालना चाहिये।

(6)- शरीर के गुप्त-गुप्त हिस्सों व जोड़-जोड़ के स्थानों को विशेष रगड़-रगड़ कर धोना चाहिये, ताकि वहाँ का जमा हुआ पसीना साफ हो जावे।

(7)- स्नान करते करते जब ठण्ड मालूम होने लगे व चमड़े के रोएं खड़े हो जावे (काँटा उठ आवे) तब शीघ्र ही स्नान बन्द कर बाहर निकल पड़ना चाहिये व सूखे कपड़े से रगड़-रगड़ कर पोंछना चाहिये। ठण्ड लगने व रोएं खड़े हो जाने के बाद जबर्दस्ती नहाते रहने से शरीर बिगड़ जायगा। सर्दी व बुखार का होना मामूली हो जावेगा।

(8)- स्नान के लिये हवादार खुली प्रकाशमय जहाँ सूर्य की किरणें पहुँचती हों, एकान्त जगह का होना जरूरी है। घाट भी एकान्त का चुनना चाहिये।

(9)- स्नान के समय शरीर पर कम से कम कपड़े रखना चाहिये। खुले शरीर पर स्नान करने से सर्दी-गर्मी असर नहीं करती। भारतवर्ष में लंगोट पहनकर नहाया जाता है। पाश्चात्यों में नग्न ही स्नान करना आरम्भ किया है किंतु यह भारत की सभ्यता के सर्वथा विरुद्ध है। वीर्यपात होने के बाद (कुछ देर ठहर कर) तुरन्त स्नान करना चाहिये।

(10)- व्यायाम के बाद शीघ्र ही स्नान मत करो; आधा घण्टा ठहरो।

सूर्योदय के पहले तैरने का नित्य का नियम करो चाहे 5 मिनट भी क्यों न हो। इससे बहुत लाभ होते हैं। शुद्धता तो है ही; सभी अंग प्रत्यंगों का व्यायाम हो जाता है। सीना पुष्ट तथा चौड़ा होता है फेफड़े शुद्ध व बलवान होते हैं। सम्पूर्ण शरीर निरोग चुस्त, फुर्तीला, दमदार उत्साही तथा शक्तिशाली बनता है। मस्तिष्क ठण्डे जल की धीमी-धीमी मार से शुद्ध, ठण्डा तथा निर्विकार हो जाता है। चेहरे की कान्ति दूनी होती है। इस विषय को स्वास्थ्य की ही दृष्टि से हर एक आम व खास, गरीब व अमीर सभी को सीखना जरूरी है। देश-सेवा के नाते भी इस कला को जानना ही चाहिये इससे न केवल अपने स्वास्थ्य का ही फायदा होता है किंतु दूसरों को डूबने से भी बचाया जा सकता है। सोचिये, इस विषय का जानकर जब डूबते हुए एक जीवन की रक्षा करता है तब उसकी आत्मा को कितना संतोष तथा मन को कितनी प्रसन्नता होगी?

कुछ लड़के मिल कर तैरने का अभ्यास आरम्भ कर सकते हैं। अध्यापक लोग इसका विशेष रूप से प्रचार करके बालकों को यह जीवनोपयोगी कला सिखा सकते हैं।


Quotation

जिस प्रकार गंगा की धार हमेशा अविरल गति से चलती रहती है उसी प्रकार तुम भी जीवन भर कर्तव्य की धारा बहाते रहो। बराबर काम करते रहो। क्षण भर के लिये भी आलसी बन कर मत बैठो।

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इस बात की परवाह मत करो कि लोग तुम्हें क्या कहते हैं। लोग तो अपने अपने मन की कहेंगे। वे राग, द्वेष का जैसा चश्मा चढ़ाये होंगे वैसा ही कहेंगे। उनकी प्रशंसा में भूलो मत और उनकी निन्दा से घबरा कर लक्ष्य से मत हटो।

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सुख और शाँति का सबसे प्रथम साधन ईश्वर में विश्वास करना है। यह विश्वास मनुष्य के आत्मा की चिर सम्पत्ति है।


शीर्षासन के अनुभव

(ले.-श्री सूर्यकान्तिसिंह भटिया, रावलपिंडी)

दिन प्रति दिन नये नये आसनों का प्रयोग बराबर होता जा रहा है परन्तु जब तक आसन का अध्ययन भली भाँति न किया जाय कदापि उसका प्रयोग मत करो। कारण, कभी-कभी लाभ के लोभ में प्रायः हानि और दुख ही देखा गया है। आपने नाना प्रकार की पुस्तकें जिनमें भिन्न-भिन्न प्रकार के आसनों का प्रयोग और वर्णन किया होता है पढ़ी होगी और उन पर विचार भी किया होगा। परन्तु यह निश्चय न कर सके होंगे कि कौस का आसन उपयोगी है। मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि शीर्षासन के व्यवहार से अद्भुत लाभ हो सकता है। इस आसन के सम्बन्ध में जिन बातों को जानना आवश्यक है वह नीचे दी जाती हैं-

यह आसन सर्वदा प्रातःकाल सूर्य उदय होने से पूर्व और सायंकाल अस्त होने के पश्चात् करना उचित है। इस आसन में सबसे पहले कम से कम तीन बातों का होना परम आवश्यक है जैसे- स्थान साफ सुथरा, हवादार और चौरस हो, दूसरे किसी वस्तु का सहारा जैसे दिवाल या मनुष्य की सहायता तीसरी के नीचे को गुदगुदी वस्तु अथवा तकिया या कोई मुलायम वस्तु, जिससे सिर में दर्द व कष्ट न हो।

प्रयोग-

आसन करते समय किसी वस्तु, जैसे गद्दी या कोई अन्य वस्तु सिर के तले रखें फिर आप पृथ्वी पर उल्टे लेट जायं और दोनों हाथों को तकिये से अलग जमीन पर सटा दें, या दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में बींध दें यानी (दोनों हाथों की अंगुलियाँ एक दूसरे को आपस में पकड़ लें) अगर आसन दूसरे प्रकार से करें तो फिर दोनों हाथों को सिर के नीचे रख दें, और धीरे-धीरे पिछले पैरों का भाग जमीन से ऊपर उठाते जायं, यहाँ तक कि पैर और टाँगें बिल्कुल सीधे हो जायं। जमीन पर केवल सिर ही रहे। आपको दो चार दिन आसन करने में सिर में चक्कर से आ जायेंगे, प्रयोग करते-करते सब ठीक हो जाते हैं। आप सीधे सिर के बल खड़े भी हो सकेंगे तरकीब यह है- पैर उठाते समय पैर दिवाल पर एक दम सदा दो और फिर उनको धीरे-धीरे दिवाल के सहारे सीधा करो, अभ्यास करने के पश्चात फिर कष्ट न होगा और किसी वस्तु का सहारा लिये बिना आप सिर के बल उल्टे खड़े हो जावेंगे।

आसन प्रति दिन केवल दो ही बार सुबह और शाम करना चाहिए। पहले पाँच दिन केवल दो मिनट तक आसन करें। फिर धीरे-धीरे समय इच्छानुसार बढ़ाते जायं, अधिक से अधिक 1 घण्टा अभ्यास करें लेकिन साधारणतः आधा घण्टा करना काफी है। आसन करते समय आपको श्वांस नाक के जरिये लेनी चाहिए। जब अधिक अनुभव और अभ्यास हो जाय, तब श्वांस को धीरे-धीरे निकालो, इसी प्रकार करना चाहिये।

लाभ-

गला, छाती, हाथ, पाँव मजबूत होते हैं फेफड़े मजबूत और उचित रूप से कार्य करने लगते हैं। कब्ज सर्वदा के लिए दूर हो जाता है। खूब खुल कर और बंधा हुआ पखाना आता है, सीना चौड़ा और कठोर बन जाता है। भूख लगातार बढ़ती जाती है खून का दौरा बराबर ठीक होता है। खून शुद्ध बनने लगता है। हृदय प्रसन्न रहता है। मानसिक शक्ति बढ़ जाती है। कठिन से कठिन कार्य करने में दिल नहीं घबड़ायेगा। नेत्रों की ज्योति बढ़ जाती है। चश्मा लगाने की आवश्यकता न पड़ेगी।

शीर्षासन से वीर्य सम्बन्धी लाभ होता है। स्वप्न दोष, धातु का पतलापन आदि विकार मिट जाते हैं। एवं शरीर और मन में उत्साह मालूम होने लगता है।


भयंकर - प्रेत - लीला

(ले.- श्री. अनन्तराम दुवे, सिवनी)

पढ़ा लिखा होने के कारण मैं भूत-प्रेतों के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता था। जब मेरे से कोई मनुष्य भूतों के बारे में कुछ कहता तो मैं उसका मजाक उड़ाता। मैं उनकी सब बातों को मिथ्या समझता और मैं भूत-प्रेतों को दुर्बल हृदयों की कल्पना मात्र समझता था। पर, जब आज से दो वर्ष पूर्व मैंने उनकी लीला अपनी आँखों से देखी तो मुझे उनके अस्तित्व पर विश्वास हो गया।

एक बार मैं अपने मित्र के घर गया। मैं उनका पता ठिकाना नहीं बताऊंगा क्योंकि ऐसा करने की मुझे इजाजत नहीं है। वे बस्ती के छोर में रहते हैं। उनका मकान पक्का दो मंजिल है। नीचे के खण्ड में तीन कमरे हैं और ऊपर का खण्ड एक बढ़े हाल के समान है। उनके घर के पीछे बहुत लम्बा चौड़ा मैदान है। पीछे एक नीम का तीन चार बिही और केले के पेड़ हैं। जिस समय की हम बात कह रहे है, उस समय मेरे मित्र की, स्त्री के अतिरिक्त, कोई सन्तान न थी।

आज मुझे मित्र के घर आये तीन दिन हो गये थे। ठण्ड के दिन थे। रात के 10 बजे थे। शीत ऋतु की रात बड़ी भयानक प्रतीत होती थी। मैं और मित्र बैठे यहाँ वहाँ की चर्चा कर रहे थे। हम लोग नीचे के खण्ड के प्रथम कमरे में बैठे थे। दूसरे कमरे में मित्र की पत्नी विश्राम कर रही थी। सहसा हमें ऐसा मालूम हुआ कि ऊपर मंजिले से कोई रो रहा है। आवाज धीरे-धीरे स्पष्ट हो गई। हमने महसूस किया कि कोई बच्चा रो रहा है। मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा था बच्चा रोने को यहाँ कैसे आया। मित्र का तो कोई बच्चा था ही नहीं। मैंने मित्र की ओर देखा वह ज्यों के त्यों पूर्ववत् बैठे थे न चेहरे पर उद्विग्नता थी और न दिल में भय। मैंने पूछा ‘कौन बच्चा रो रहा है? मित्र सुन कर हंस पड़े ‘कहाँ का बच्चा दुबे जी! ये सब उन्हीं बदमाशों की शरारत है। मैं बदमाशों का मतलब समझ गया, पर फिर भी भ्रम-निवारणार्थ पूछा क्या भूत-प्रेतों की। वे बोले ‘हाँ’ यह सब उन्हीं की शरारत है। यह बात शायद आपके लिये नई है, पर यह हमारे लिये तो रात दिन का धन्धा है। मैं अपने मित्र का विश्वास न कर सका मैंने स्वयं देख कर विश्वास करने की इच्छा प्रगट की। मित्र दिखाने को तैयार हो गये।

पैरों में जूते डाल कर और हाथ में बैटरी लेकर वे आगे बढ़े। उनने मुझे पीछे पीछे सावधानी से आने का कहा। भूतों को देखने का कौतूहल बढ़ता जा रहा था। हम लोग धीरे-धीरे ऊपर चढ़े। सीढ़ियाँ सिर्फ दस थीं। अंतिम सीढ़ी पर मैंने कमरे के भीतर का जो दृश्य देखा उसे देख मैं डर सा गया। एक दुर्बल भद्दी सी स्त्री काले केशों को फैलायें हरे रंग की साड़ी पहने बैठी थी। पास ही जमीन पर ज्यादा से ज्यादा एक वर्ष का बच्चा पड़ा रो रहा था। बच्चे की आंखें चमक रही थी। सहसा मुझे विश्वास न हुआ, मैंने आंखें मल कर फिर देखा वही दृश्य था मेरे मित्र ने उस पर बैटरी का प्रकाश फेंका। इस बार वहाँ कुछ न दीखा मित्र ने उसे स्थान को देखा पर वहाँ कुछ भी नहीं था। वे स्थान पर लात पटक दरवाजे की ओर बढ़े। मैंने महसूस किया मेरा हृदय डर से काँप रहा था। मेरे मित्र निर्भयता से कमरे में घूम रहे थे। मुझे अपनी दुर्बलता पर लज्जा आई और मैं दिल कड़ा कर पिछवाड़े के दरवाजे पर पहुँचा। मित्र ने दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही मुझे एक जोरदार धक्का लगा और मैं काँप उठा।

घना अन्धकार छाया हुआ था। चन्द्रदेव भी क्षीण किरणों द्वारा अन्धकार को दूर करने की बेकार कोशिश कर रहे थे। कुछ देर के बाद, लगभग 100 गज की दूरी पर मुझे एक प्रकाश-पिण्ड दीखा। उसे मैंने अपने मित्र को दिखाया। वे हंस पड़े। उनकी विकराल हंसी सुन मैं डर गया। सहसा मुझे बचपन की याद आ गई मेरी माँ अक्सर कहती थी कि भूत ‘आग के गोले के समान होते है। धीरे-धीरे वह बड़ा होने लगा और यहाँ वहाँ दौड़ने सा लगा मैं और भी डरा। शायद मित्र मेरी कमजोरी ताड़ गये वे बोले यदि भय मालूम होता है तो चलो नीचे चले चलें मैं शरमाया। यह दिखलाने के लिए कि मैं डर नहीं रहा मैं बोला, मैं देखना चाहता हूँ कि यह पिण्ड कैसा है। चलो मुझे बताओ।

हम लोक पीछे पहुँचे। हमें उस समय वह पिण्ड कहीं नजर नहीं आया मैं आश्चर्य से मित्र का मुँह देखने लगा। वे फिर हंस पड़े शायद उन्हें हंसने का रोग था। करीब 50 गज के फासले पर वह पिण्ड फिर दीखा। साहस बटोर कर मित्र के साथ मैं आगे बढ़ा। सहसा पिण्ड हमारी ओर बढ़ा। मैं चार कदम पीछे हट गया। पिण्ड 12 गज की दूरी पर गिरा और गायब हो गया। वह आग का धकधकाता पिण्ड था। मैं काँप रहा था। अचानक वह कुछ फासले पर फिर देखा। इस बार पिण्ड देखते ही मैं काँप कर गिर पड़ा। आगे क्या हुआ मुझे पता नहीं।

दूसरे दिन मैंने अपने को बिस्तर पर पड़ा पाया। मित्र उस समय भी मेरे पास बैठे थे। मुझे जागा देख वे हंस पड़े। सच कहता हूँ उस समय भी मेरा दिल भय से उछल रहा था। मैं आगे का हाल जानने के लिये उत्सुक था। मैंने आगे का हाल पूछा। मित्र बोले। ‘तुम्हारे गिरने के बाद वह पिण्ड उछला और मेरे बहुत पास गिरा। मैं भी अपने को अकेला पाकर डर रहा था।’ साहस कर मैंने उस पर ‘टार्च लाइट’ फेंका, पर वहाँ वह पिण्ड न दीखा। हाँ वह स्थान बहुत गरम अवश्य था। कुछ देर बाद वह मुझे फिर दीखा मैंने पास ही पड़े पत्थर को उठा कर उसे मारा पर कुछ न हुआ, होता ही क्या वहाँ कुछ तो था ही नहीं। मैं कुछ देर तक खड़ा देखता रहा पर वह फिर न दीखा। कुछ देर बाद तुम्हें उठा कर मैं ले आया। तुम्हें होश में लाने की हमने बहुत कोशिशें की पर उनसे कुछ लाभ न हुआ।

मैं अब भी कभी उस घटना की याद कर डर सा जाता हूँ।


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विपत्तियों को देख कर घबराओ मत। इनका परिणाम अच्छा है। विपत्ति सहने से मनुष्य में ऐसी शक्ति आ जाती है कि उसके सहारे वह साँसारिक कठिनाइयों का सामना कर सकता है।

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जिनको दूसरों की निन्दा करने में रस आता है वे मित्र बनाने की मोठी कला को नहीं जानते। वे फूट का बीज बोकर अपने मित्रों को शत्रु बनाते हैं।


स्वरयोग से रोग निवारण

(ले. श्री नारायणप्रसाद तिवारी ‘उज्ज्वल’ कान्हीबाड़ा)

इस बीसवीं शताब्दी में जन्मा मनुष्य उन्हीं बातों पर विश्वास करेगा जिनका समर्थन विज्ञान से होता है। पग-पग पर प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व विज्ञान की दृष्टि से देखा जा रहा है, किंतु जन समुदाय अब इन आविष्कारों से घबरा उठा है और ऐसी शक्ति की खोज में संलग्न हो गया है जिसके द्वारा अपनी कठिनाइयों को सरलतापूर्वक हल कर सके हम लोग अपने आस्तित्व तक को भूल बैठे हैं। हमारे भीतर जो शक्ति छिपी है उससे निरे अनभिज्ञ हैं मनुष्य स्वयं प्रकृति का अद्भुत जीव है, जिसके भीतर भौतिक विज्ञान की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली गुण छुपे हुए हैं, क्योंकि भौतिक भी तो मनुष्य के मस्तिष्क की ही उपज है।

प्रत्येक पुरुष की स्थिर अवस्था में अव्यक्त शक्ति रहती है, गतिशील किये जाने पर वह व्यक्त हुआ करती है। बिजली की बत्ती में cells मसाला भरा है, स्विच मौजूद है किंतु जब तक स्विच नहीं दबाया जाता, प्रकाश नहीं होता, क्योंकि उसकी शक्ति अव्यक्त है, बटन दबाते ही प्रकाश फैल जाता है और शक्ति व्यक्ति हो जाती है। गति का रुकना मृत्यु है, किंतु अव्यक्त शक्ति को व्यक्त रूप में लाना भी गतिशील जीवन द्वारा होना चाहिये जीव विज्ञान में विश्व पिता विधाता ने एक ऐसा अनोखा यन्त्र लगाया है कि जिससे समझ कर चलाने से साँसारिक असफलता और कष्ट पिस कर चूर्ण हो जाते हैं।

प्रत्येक मनुष्य संसार में सुखी जीवन व्यतीत करने की इच्छा करता है किंतु ऐसे कितने सौख्याभिलाषी जीव हैं जो यथार्थतः प्रकृति के नियमों की सफलतापूर्वक खोज कर उसका सद् उपयोग करते हैं। ईश्वर प्रदत्त उस अनोखे यन्त्र को सुचारु रूप से चलाने की पद्धति न जान कर हम अपना काम बिगाड़ लेते हैं।

प्रकृति के वायु तत्व उपभोगी को ‘जीव’ संज्ञा दी है। किंतु खेद है इस निःशुल्क उपादान का भी हम लोग ठीक उपयोग न कर कृत्रिम उपायों के इतने अधिक वशीभूत हो चुके हैं कि प्राकृतिक नियमों की अवहेलना ही नहीं वरन् उन पर अविश्वास तक करने लगे हैं।

वायु का स्थान जीवन में सर्वोपरि है क्योंकि अन्न जल बिना मनुष्य कुछ काल तक रह सकता है, किंतु वायु के बिना शीघ्र ही नहीं तब भी कुछ कालान्तर प्राणांत तक हो जाते हैं प्रत्येक मनुष्य का श्वास प्रश्वास ही जीवन है। जीवन को यदि श्वासों की शृंखला भी कहा जावे तो अनुचित होगा।

श्वास वायु फुफ्फुस तक ही सीमित नहीं है किंतु सम्पूर्ण शरीर में उसका आवागमन है। श्वास प्रश्वास तथा रोग निदान वैद्य नाड़ी से करते हैं नाडी देखने पर जब नाड़ी स्थान पर नहीं मिलती तो कहा जात है कि नाड़ी ने स्थान छोड़ दिया और उसका अर्थ होता है कि रोगी की आशा छोड़ दी जावे, यद्यपि यह नाड़ी वैद्य केवल कलाई के पास देखते हैं किंतु नाड़ी का जाल हमारे शरीर भर में फैला हुआ है शरीर में कुछ 72000 नाड़ियाँ हैं, और पुरुष दिन रात में 25600 बार श्वास प्रश्वास करता है इससे कम श्वास लेने वाला दीर्घजीवी होता है क्योंकि अपने धन का जितना कम व्यय होगा उतने ही अधिक काल तक संचित रहेगा कहावत है waste will bring in wants वास की पूँजी की भी यही दशा है। मेरा अभिप्राय यह है कि वायु को अधिकार में लाने से मनुष्य दीर्घजीवी हो सकता है। प्राणायाम का भी यही सिद्धान्त है। शरीर और मन का घनिष्ठ सम्बन्ध है, अतएव मन की एकाग्रता कर वायु पर अधिकार करने से मनुष्य अपने शरीर को भला-चंगा रख सकता है। योग के आधार पर उज्जैन, टिनाबल्ली, लोनावाला, बम्बई, औंध आदि अनेक स्थानों में रोग निवारण केन्द्र भी स्थापित हो चुके हैं।

(अपूर्ण)


कठिन प्रसंग आने पर

(लेखिका- श्रीमती सावित्री देवी तिवारी, जयपुर)

तुम्हारे जीवन में कई बार ऐसे अवसर आते हैं जब चित्त बड़ा व्याकुल हो जाता है, किसी काम में मन नहीं लगता, कुछ समझ में नहीं आता क्या करें, और क्या न करें। मन बड़ा खिन्न हो जाता है, चारों और दुःख और अरुचि ही छाई दीखती है संसार बड़ा कड़ुवा लगता है। इसका कारण क्या है? इसमें दोषी कौन है?

इसका कारण हमारा अपना दृष्टिकोण है। जब तुम उल्टी दृष्टि से दुनिया को देखते हो तो इसकी हर एक वस्तु उल्टी मालूम देती है। यदि अंधेरी कोठरी में अपने को बन्द करोगे तो समस्त ब्रह्माण्ड अन्धकार में भरा हुआ देखोगे। जब प्रकाश में होगे तो हर चीज चमकती हुई दिखाई देगी।

अपने को ईश्वर के हाथ का खिलौना मानो। खुद ईश्वर मत बनो। संसार से यह आशा मत करो कि उसकी सब वस्तुएँ तुम्हारी इच्छानुकूल बन जायँ वरन् अपने को ऐसा बनाओ कि जैसी कुछ भी परिस्थिति आ जाय उसे धैर्यपूर्वक सह लो। संसार के सब पदार्थों को परमात्मा भाव से देखो अपने को उनका सेवक समझो, स्वामी मत बनो। अपना कर्तव्य पालन करो और प्रसन्नता से मुस्कुराओ।

संसार में यदि अप्रिय घटनाएं होती हैं तो उनसे दूर मत भागो और न घबराओ। हृदय में धैर्य रखो और साहस के साथ उनका सामना करो। बाहरी जगत में फेरफार करने से पूर्व अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करो। जब कोई कठिन अवसर आवे तो आंखें बन्द करके गहरे उतरो और अन्तरात्मा के निकट पहुँचो। बाहरी तूफान को बिल्कुल भुला दो। पूर्ण शाँति का अनुभव करो। तुम्हें इस कठिन अवसर पर क्या करना चाहिए? इसका उत्तर तुम्हारी अंतरात्मा चुपके-चुपके देख रही होगी उसे ध्यानपूर्वक सुनो और उसका अनुसरण करो।


उद्वेग ! (कविता

(श्रीकान्त शास्त्री, नारायणपुर)

अपनी बीती क्या कहूँ तुझे, वह करुण कथा ‘उड़ते पंछी’।

इस रुद्ध कण्ठ से करुण गान, कैसे गाऊं ‘उड़ते पंछी’॥

आया था मैं इस नगरी में, जीवन का नव उल्लास लिए।

यौवन का विमल विकास लिए, औ वैभव, विपुल विलास लिए॥

पर कहाँ छिपा वह कला-लास, अपना अनुपम आभास लिए।

वह जोर, जवानी, जर, जाया, सब कहाँ गई सुख साँस लिए॥

हैं याद नहीं, मैं गया भूल, क्या बतलाऊँ ‘उड़ते पंछी’।

इस रुद्ध-कण्ठ से तरल-गान, कैसे गाऊँ ‘उड़ते पंछी’॥

चल ले चल इस चल - जगती से, हो जहाँ शाँति का शुभ्र धाम।

हो सत्य अहिंसा का सुराज्य, जावें न जहाँ कमनीय काम॥

मानवता का हो जहाँ राज, रह सकें साथ भीलनी- राम।

जिस जगह न बतलाते होंवे, नर के महत्व को चाम, दाम॥

विचरूँ मैं सुख से सात्विक बन, वन, वन, उपवन ‘उड़ते पंछी’।

इस रुद्ध कण्ठ से करुण गान, कैसे गाऊँ ‘उड़ते पंछी’॥

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सम्बोधन ! (कविता)

(अन्जना देवी लूम्बा, विशारद, भेलसा)

रे मन! क्यों उस रूपलता पर, सुधा जानकर जाता।

वह तो गरल भरी है पागल, नाहक भरम गंवाता॥

तृष्णा से उनका उपवन, मत देखो आँखें मींचो।

अपनी सूखी हृदयलता को, शाँति सलिल से सींचो॥

देखो तो इस मनोगगन में, फिर न कालिमा छाये।

अब तक इसका मर्म न जाना, व्यर्थ फिरे बौराये॥

जीवन भार हुआ जाता है, जल्दी नशा उतारो।

आत्म त्राण की शक्ति जगा दो, उर में धीरज धारो॥

अब भी जो न संभल पाओगे, रे मूरख! अज्ञानी।

पीर बढ़ेगी, सूख जायगा, इन नयनों का पानी॥

जग में आकर मानव को है, देख देख ही चलना।

नयन मूँद कर चलने से तो, पड़ता है कर मलना॥

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चाहता क्या विश्व मुझ से? (कविता)

(श्री शिवनारायण गौड, लश्कर)

चाहता क्या विश्व मुझसे, क्यों मुझे आदेश देता ?

जो अनिच्छित हो, उसे भी, मान क्यों कर्तव्य लेता॥

कार्य करता रात दिन मैं, कर्म-रत रहते सभी जन ।

हित अहित और लाभहानि, जानते हैं जब सभी मन॥

नियम-तन्तु विचित्र क्यों जग, आत्म-बंधन-हेतु ताने ।

क्यों भला यदि हो नियंत्रित, हो बुरा यदि वे न माने॥

नियम हैं सब विश्व के ये, देखता जग निज दृगों से।

चाल मेरी अटपटी को, मापता जग निज डगों से॥

चाहता जग पूर्णता है, पूर्णता जब नाम केवल।

नापता जग पूर्णता से, जब नियंत्रित व्यक्ति का बल॥

छेड़ता जब गान की इक, तान सुन्दर और मनोहर।

तर्क से क्यों नापता जग, भाव का जब भार मन पर॥

वृद्ध जग क्या भावनाएँ, युवक के उल्लास जाने।

नव्य यौवन की उमंगें, नित्य-नूतन हास, गाने॥

विश्व चलता लोक पर है, मैं स्वयं पथ को बनाता।

विश्व है अब भी पुरातन, मैं नयापन साथ लाता॥


साधकों का पृष्ठ

(हमारी बताई हुई विधियों से अभ्यास करने वाले साधकों के अनुभव इस पृष्ठ में छापे जाते हैं।)

-सम्पादक

(1)

“मैं क्या हूँ” पुस्तक मिली। खराब छपाई और सुन्दर सामग्री को देखकर उस नारियल का ध्यान हो आया जो बाहर से अप्रिय किन्तु भीतर से अत्यन्त मधुर होता है। विधिपूर्वक साधना नहीं कर रहा हूँ परन्तु पढ़ते-पढ़ते मुझे ऐसा अनुभव होने लगता है मानो मैं आत्म स्वरूप का दर्शन कर रहा हूँ और जीवन मुक्त हो गया है। ऐसा अनुपम ज्ञान सर्वसुलभ करने के लिए निश्चय ही जिज्ञासु जन आपके चिर कृतस रहेंगे।

-बेचेलाल पुरोहित नासिक।

(2)

आपने सूर्य चिकित्सा पद्धति से इलाज करने की शिक्षा दी थी उसके अनुसार मैंने यहाँ चिकित्सालय खोल दिया है। रोगियों को आशातीत लाभ हो रहा है। इस कस्बे में कोई ग्यारह बारह डॉक्टर हैं उन सब से अधिक रोगी हमारे यहाँ आते हैं पं0 नित्यानन्द जी का सहयोग भी हमें प्राप्त है। औषधालय का नियम आपकी आज्ञानुसार ही रखा गया है। आरम्भ में कुछ नहीं लेते। अच्छा हो जाने पर जो कुछ कोई दे देता है उसे ही स्वीकार करते हैं। इस महीने में सत्ताईस रुपया मिले हैं। नये औषधालयों को देखते हुए इतना भी कम नहीं है बीमारों को बहुत फायदा हो रहा है।

-जीवन दत्त कुशवाल, करनाल।

(3)

‘प्राण चिकित्सा’ विधि से इलाज करने पर अद्भुत फल दिखाई दे रहे हैं। एक लड़का जिसके पैर बहुत ही कमजोर थे दो सप्ताह के प्रयोग के बाद खड़ा होने लगा है और दस पाँच कदम चलता भी है, एक स्त्री जिसे रोज मिरगी का दौरा होता था। तीन सप्ताह से मेरे इलाज में है इतने दिनों में सिर्फ दो दौरे उसे हुए हैं। एक गठिया का बीमार जिसे दर्द के मारे चैन नहीं पड़ता था अब पूरी नींद सोता है। गाँठों की सूजन कम हो रही है। अब हम कई साधक मिलकर एक ‘पीड़ित सेवा केन्द्र’ खोलने की तैयारी कर रहे हैं।

-श्रीराममूर्ति, त्रिचनापल्ली।

(4)

‘प्राण चिकित्सा’ का पूरा विधान आपसे आगरे सीखकर आया था। इससे किसी की कुछ सेवा करूं, यह सोचकर घर से ही इलाज शुरू किया। मेरे भतीजे के गले के पास एक भयंकर फोड़ा उठा था। सारा घर चिन्तित था कि यह बढ़ा तो गले को रोककर प्राणघातक बन सकता है। घरवालों को सान्त्वना देते हुए मैंने उपचार आरम्भ किया । तीन दिन में वह फोड़ा बैठ गया। यहीं से मेरी ख्याति फैली। बाहर से मरीज रोगी आ जाते हैं। इन्हें जादू की तरह आराम होता है। आपकी इस कृपा ........।

-मणिशंकर, सहारवर।

(5)

आपने मुझे क्रियाएं बताई हैं उन्हें नियमित रूप से कर रहा हूँ बड़ा लाभ हुआ है। वजन पाँच पौंड बढ़ गया है शरीर में फुर्ती और चैतन्यता बढ़ रही है।

-वेदप्रकाश गुप्ता, चाँदपुर।

(1) मैं क्या हूँ? (2) सूर्य चिकित्सा विज्ञान (3) प्राण चिकित्सा विज्ञान। तीनों पुस्तकों का मूल्य छः छः आना है। तीनों एक साथ लेने पर डाकखर्च हम लगा देते हैं। 2 पैसे के कम टिकट लगाते हैं। जिससे एक आने की बैरंग होकर सुरक्षित पहुँच जाती हैं।

अखण्ड-ज्योति कार्यालय, फ्रीगंज, आगरा


आत्म चिन्ता (कविता

(ले.-श्री शशिभुषण जी)

ऊपर समा बाँध घन रोवे, नीचे रोवे विरही-जीवन,

बाहर भीतर एक बन्ध है, एक विषाद एक ही उलझन!

थक-थक के रोता मानव मन, पाप पुण्य के दो-दो लालच;

हाँ बयार की गति पहचाने बढ़, मन! बढ़, अपने-भर बच-बच,

यहाँ सीखना होगा सबको पाठ, अरे! लोहित शैली का,

भ्रान्ति आयेगी वेश बदल कर मर्म खोलने इस थैली का,

उस गायक का सुन शृंगी-स्वर इन प्राणों में हूक बजेगी,

करुणा के जल बरसाने को ऊपर घनी घटा गरजेगी!

किन्तु, आह वह करुणा-घन भी मायावी का दिल क्यों घेरे?

पुरइन के दल-सा जिसका दिल जल-कण उस पर क्यों ठहरें रे?

चक्रवाक का मर्म चीर देगा दिग्वालाओं का क्रन्दन!

ताराओं में ताराओं का होगा एक अनर्गल घर्षण!

ज्योति न सब लुट जावे, मैं छाया-पट से उसको ढ़ाकूँगा!

और खिजाँ की स्याही से हग का सुन्दर मधुवन आकूँगा!

कलावन्त के फूल लुटेंगे, लुट जायेगी जब सब क्यारी,

क्या दूँगा मैं? जब माँगेगा मुझसे वह निज थाती सारी?

मैं बेदाग बचा देखूँगा खड़ा प्रलय का भला तमाशा?

अपनी आशा-बीच नाचते सारे जग की नग्न निराशा।

विश्व-विभव की चिता धधकती देखूँगा जब अपने सन्मुख,

कलावन्त की लुटी धरोहर का दायित्व न देगा तब दुख?

क्यों न प्रलय की व्यापकता में मेरा भी अस्तित्व मिलाये,

उस विराट की छिपी कृपा भी शायद क्यों कर मुझे जिलाये।

किन्तु आह! मैं अमर वहाँ हूँ? मुझे मिला अमरत्व कहाँ है?

मुझ मानव को अपनेपन पर भी थोड़ा सा स्वतंत्र कहाँ है?

ठेस लगी यह एक कड़ी सी, भ्रम! भ्रम!! भ्रम!!! यह केवल भ्रम है,

मैं तो पहले ही क्रम में हूँ, पहला ही तो मेरा क्रम है?

कूल अरे! मैं कूल धरे हूँ, अभी लहर में कहाँ बहा हूँ?

मुझे देखना था सो देखा, देखूँगा, सो देख रहा हूँ!

*समाप्त*