अखण्ड ज्योति के नियम

अखण्ड ज्योति का वार्षिक मूल्य 1॥) रु0 एक प्रति का नौ पैसा है। मूल्य मनीऑर्डर से ही भेजना चाहिए। वी.पी. मँगाने पर 1=) अधिक देने पड़ते हैं।

लेख या कविताएँ केवल आध्यात्मिक योगशास्त्र, तन्त्र विज्ञान, मैस्मरेजम, मानसिक शक्तियों की विवेचना, प्राकृतिक चिकित्सा तथा सदाचार पर ही आने चाहिए। अन्य विषयों को स्थान न दिया जायगा। लेख जहाँ तक हो सके छोटे होने चाहिए।

उत्तर के लिए जवाबी कार्ड या टिकट भेजना चाहिए अन्यथा उत्तर न दिया जाएगा।

प्रत्येक अंक जरूरत भर ही छपाया जाता है, इसलिए पुराना पुराना अंक एक भी नहीं बचता। पुराने अंक लेने के लिए कोई सज्जन पत्र व्यवहार न करें।

अखण्ड ज्योति के मूल्य में कमी करने के लिए पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिए अखण्ड ज्योति के ग्राहक नहीं बनाये जाते।

अखण्ड ज्योति की एजेन्सी कम से कम 6 प्रति, प्रतिमास लेने पर दी जाती है। जिन्हें एजेन्सी लेनी हो वे कमीशन आदि के बारे में पत्र व्यवहार करें।

‘अखण्ड ज्योति’ प्रतिमास ठीक 20 तारीख को निकल जाती है। हमारे यहाँ से दो बार जाँच कर सब ग्राहकों के पास अखबार भेजा जाता है। फिर भी जिनको एक सप्ताह के अन्दर न मिले उन्हें रुष्ट न होकर डाकखाने के उत्तर सहित हमें लिखना चाहिए।

अध्यात्म विद्या प्रेमियों के चित्र अखण्ड ज्योति में छापे जाते हैं। पाठकों से प्रार्थना है कि वे लोक सेवी, सदाचारी एवं ईश्वर भक्त सज्जनों के परिचय भिजवाने की कृपा करें।

पत्र व्यवहार का पता:-

मैनेजर- अखण्ड-ज्योति कार्यालय,

फ्रीगंज आगरा।


एक सहारा (कविता)

(श्री के. मित्तल, मुरार)

। यह सब सपने की बातें, क्यों इनमें जी ललचाया।

तू सोच समझले भाई, यह क्षण भंगुर है माया॥

इसके फंदे में फँस कर, क्यों अपना भरम गंवाया।

दिन खोकर झूठे सुख में, फिर अन्त काल पछिताया॥

थे बड़े बड़े बलधारी, ज्ञानी अरु धीर धुरंधर।

रहे न रावण से बलशाली योधा शूर सिकन्दर॥

यह मेला दो दिन का है, जो लेना हो सो ले ले।

अवसर ऐसा नहीं मिलेगा, जीवन नौका खे ले॥

बीत चुका सो बीत चुका, जो बाकी उसे बचाले।

शिर पर मृत्यु खड़ी है अब भी जगजा सोने वाले॥

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इस नश्वर मानव जीवन का केवल एक सहारा।

दीन बन्धु का नाम विश्व में है अविचल ध्रुवतारा॥


संशयात्मा विनश्यति

योगीराज कृष्ण ने स्पष्ट कर दिया है संशयात्मा लोग नष्ट हो जाते हैं। इस युग में तर्क की प्रधानता है बात बात में तर्क उपस्थिति है कोई भी कार्य सामने आने पर संशय का ज्वार भाटा मन में उठने लगता है। आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होते ही कितने प्रश्नों की झड़ी लग जाती है। हमारे अन्दर ईश्वर और आत्मा पर संदेह की मात्रा प्रचुर परिमात्रा में होती है यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से हम उसे जान नहीं पाते तो भी वह भीतर ही भीतर काम करता रहता है। सत्संग में जाने की अपेक्षा मेला देखना पूजा करने की अपेक्षा सिनेमा जाना, दान करने की अपेक्षा संग्रह करना, त्याग की अपेक्षा भोगों में मस्त रहना, और धर्म कार्यों में अरुचि प्रकट करना यह लक्षण बतलाते हैं कि मन के भीतरी कोने में परमार्थ के प्रति संदेह बहुत बड़ी मात्रा में मौजूद है। थोड़े से लाभ के लिये लोग एड़ी से चोटी तक पसीना बहाते हैं मन की सारी शक्तियों को एकत्रित कर देते हैं, सारा बुद्धिबल खर्च करते हैं, और भूख, प्यास, नींद, थकान किसी बात की भी परवाह न करके जुटे रहते हैं। क्योंकि उनका विश्वास है कि इस परिश्रम से लाभ होगा परन्तु जीवन के सच्चे लाभ जिसके आगे संसार की सारी विभूतियाँ धूलि के समान हैं। उस परमार्थ-पथ पर अरुचि और उपेक्षा बनी रहती है। मन बार बार उचटता है और भजन में अनेक विघ्न आ जाते हैं। यह अरुचि, उपेक्षा, मन न लगना, विघ्न आदि वास्तव में संशय की छाया मात्र हैं। भीतर ही भीतर यह संशय चलता रहता है कि परलोक और परमात्मा का अस्तित्व यदि न हुआ तो? पूजा पाठ व्यर्थ हुए तो? हमारी उपासना निष्फल हुई तो? आदि आदि। यद्यपि मुँह से इन बातों का कहना बुरा मालूम होता है। तथापि भीतर इसका बीज बहुत कुछ बढ़ा हुआ होता है इसके अतिरिक्त धर्म विमुख होने का और कोई कारण दिखाई नहीं देता।

तर्क की एक मर्यादा है। वह आवश्यक वस्तु है। बहुत बातों में उससे मदद मिलती है और साँसारिक व्यवहार चलाने में उसके बिना काम नहीं चल सकता। फिर भी वह एक उपकरण मात्र है। न कि मूल तत्व। मानव जीवन की मूल भित्ति तर्क नहीं वरन् श्रद्धा के ऊपर अवलंबित है। छोटा बालक माता पिता के शब्द सुनता है। भोजन के लिये ‘रोटी’ शब्द व्यवहार होता है इस बात को वह श्रद्धा करके मान लेता है और भोजन की आवश्यकता होने पर ‘रोटी’ माँगता है। उसी प्रकार वस्तुओं के नाम सुन कर उन्हें श्रद्धा पूर्वक स्वीकार कर लेता है। अन्य सामाजिक रीति, नीति, और विचारधारा को भी वह चुपचाप ग्रहण कर लेता है। यह बातें तर्क के आधार पर नहीं हो सकती थीं तर्क तो यह भी प्रमाणित नहीं कर सकती कि वही व्यक्ति वास्तव में पिता है जिसे हम ‘पिता जी’ कह कर संबोधन करते हैं।

मनोविज्ञान के आधार पर यदि हम अपने विश्वासों, मान्यताओं, आदतों तथा विचारों का परीक्षण करें तो मालूम होगा कि जीवन के तीन चौथाई विश्वासों का आधार श्रद्धा पर अवलम्बित है। तर्क तो केवल किसी नयी साँसारिक समस्या के सामने आने पर उसे सुलझाने में कुछ थोड़ी सी मदद करती है। यदि स्वजनों की ईमानदारी पर संदेह किया जाय, उनके हर काम को अविश्वास की दृष्टि से देखा जाय, माता, पत्नी, संतान, मित्र आदि का भरोसा न किया जाय तो मनुष्य, पिशाच की तरह उद्विग्न और अनिश्चित हो जाय उसका दैनिक जीवन आशंका एवं अनिष्ट की भट्टी में जल उठे, सुख और शान्ति के दर्शन दुर्लभ हो जायें। यदि अपने भविष्य तथा स्वास्थ्य पर से श्रद्धा खो दे तो निश्चय ही बहुत शीघ्र वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आत्म हत्या कर लेगा।

हमारा तात्पर्य यह नहीं है कि कोई बिना समझे बूझे चाहे जिस बात को मान ले और उसी भ्रम के ऊपर अपने जीवन रस को डाल दे। नहीं, हर बात में खूब सोचने समझने, गहरा मनन करने पूर्ण अनुसंधान करने के पश्चात् ही कोई बात माननी चाहिए किन्तु तर्क का अवलंब श्रद्धा हो। श्रद्धा की आधार शिला पर बैठ कर ही तर्क सफल होगा अन्यथा वह हलके बादल की तरह क्षण भर में एक स्थान से दूसरे स्थान को उड़ जायेगा। श्रेष्ठ से श्रेष्ठ पक्ष से लगा कर बुरी से बुरी बात तक के पक्ष में बड़ी लच्छेदार दलीलें हो सकती हैं और हमारा अपूर्ण मस्तिष्क उनके आगे परास्त हो सकता है ऐसी दशा में भला हम कहीं खड़े हो सकते हैं? तर्क बेचारा अंधा और लंगड़ा है वह मनुष्य जीवन की आधार भित्ति का निर्माण नहीं कर सकता और न ईश्वर और धर्म का मार्ग दिखा सकता है तर्क की अन्तिम गति नास्तिकता तक है।

यदि तुम्हारा मन धर्म मार्ग की ओर प्रवृत्त न होता हो, साँसारिक लालचों की ओर बार बार इच्छा होती हो तो समझो कि यह कार्य शंकाशील तर्क का है और वह तुम्हें नास्तिकता की ओर पकड़ कर घसीटे लिये जा रही है। ऐसी दशा में तुम तर्क से तर्क का निवारण नहीं कर सकते। आग से आग नहीं बुझ सकती। अपना पथ प्रदर्शक चुनो, आप्त पुरुषों के पद चिन्हों की ओर देखो। ईश्वरीय ज्ञान की धर्म पुस्तकों से मदद माँगो। महापुरुष जिस मार्ग पर गये हों उसका अनुसरण करो। सोई हुई श्रद्धा की जागृति करो वह तुम्हें परम तत्व के उस दरवाजे पर ले जाकर खड़ा कर देगी जहाँ से प्रकाश दिखाई पड़ता है और उस प्रकाश के सहारे आत्मा अपने आप अपना मार्ग खोज लेता है। जैसे जैसे आगे बढ़ता जाता है वैसे ही वैसे सत्य का दर्शन होने लगता है। फिर हजारों तर्क मिल कर भी वहाँ अविश्वास नहीं कर सकते।

‘अखंड ज्योति’ के पाठक अपनी आध्यात्मिक भूमिका में छिप कर बैठे हुए इस संदेह को चिराग ले कर ढूंढ़ें और जहाँ कहीं उसे पावें निकाल कर बाहर करें। तभी वे अपने जीवन का सच्चा लक्ष और मार्ग देख सकेंगे। अन्यथा विभिन्न दलीलों और शंकाओं की आँधी में इधर से उधर उड़ते रह कर भगवान् कृष्ण के शब्दों में वे संशयात्मा विनाश की ओर चले जायेंगे।


प्रार्थना किसे कहते हैं?

(महात्मा गाँधी)

एक डाक्टरी डिग्री प्राप्त किये हुए महाशय मुझसे प्रश्न करते हैं:-

“प्रार्थना का सबसे उत्तम प्रकार क्या हो सकता है ? उसमें कितना समय लगाना चाहिये? मेरी राय में तो न्याय करना ही उत्तम प्रकार की प्रार्थना है और जो मनुष्य सबके साथ न्याय करने के लिये सच्चे दिल से तैयार होता है उसे दूसरी प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। कुछ लोग तो संध्या करने में बहुत सा समय लगा देते हैं परन्तु बहुत से मनुष्य तो उस समय जो कुछ बोलते हैं उसका अर्थ भी नहीं समझते। मेरी राय में तो मातृभाषा से ही प्रार्थना करनी चाहिये। उसका ही आत्मा पर असर पड़ सकता है। मैं तो यह भी कहता हूँ कि सच्ची प्रार्थना यदि एक मिनट के लिये भी की गई हो तो वह भी काफी होगी। ईश्वर को पाप न करने का अभिवचन देना ही काफी है।”

प्रार्थना के माने हैं धर्म भावना और आदर पूर्वक ईश्वर से कुछ माँगना। परन्तु किसी भक्ति-युक्त भाव को व्यक्त करने के लिये भी शब्द का प्रयोग किया जाता है। लेखक के मन में जो बात है उसके लिये भक्ति शब्द का प्रयोग करना ही अधिक अच्छा है। परन्तु इसकी व्याख्या का विचार छोड़कर हम इसी का ही विचार करें कि करोड़ों हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी और दूसरे लोग रोजाना अपने स्रष्टा की भक्ति करने के लिये निश्चित किये हुए समय में क्या करते हैं। मुझे तो यह मालूम होता है कि वह स्रष्टा के साथ एक होने की, हृदय की उत्कट इच्छा का प्रकट करना है और उसके आशीर्वाद के लिये याचना करना है। इसमें मन की वृत्ति और भावों का ही महत्त्व होता है शब्दों का नहीं। अक्सर पुराने जमाने से जो शब्द रचना चली आती है उसका भी असर होता है। जो मातृ भाषा में उसका अनुवाद करने पर सर्वथा नष्ट हो जाता है गुजराती में गायत्री का अनुवाद कर उसका पाठ करने पर उसका वह असर न होगा जो असल गायत्री में होता है। ‘राम’ शब्द के उच्चार से लाखों करोड़ों हिन्दुओं पर फौरन असर होगा और ‘गौड’ शब्द का अर्थ समझने पर भी उसका कोई असर न होगा। चिरकाल के प्रयोग से और उनके उपयोग के साथ संयोजक पवित्रता में शब्दों को शक्ति प्राप्त होती है। इसलिये एक से अधिक प्रचलित मंत्र और श्लोकों को संस्कृत भाषा में रखने के लिये बहुत सी दलीलें की जा सकती हैं। परन्तु उनका अर्थ अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। ऐसी भक्ति युक्त क्रियायें किस समय करनी चाहियें इसका कोई निश्चित नियम नहीं हो सकता है। इसका आधार जुदी जुदी व्यक्तियों के स्वभाव पर होता है। मनुष्य के जीवन में ये क्षण बड़े ही कीमती होते हैं। ये क्रियायें हमें नम्र और शान्त बनाने के लिये होती हैं। और उससे हम इस बात का अनुभव कर सकते हैं। उसकी इच्छा के बिना कुछ भी नहीं हो सकता है और हम तो “उस प्रजापति के हाथ में मिट्टी के पिंड हैं।” ये पल ऐसे हैं कि इससे मनुष्य अपने भूतकाल का निरीक्षण करता है और अपनी दुर्बलता को स्वीकार करता है तथा क्षमा याचना करते हुये अच्छा कार्य करने की शक्ति के लिये प्रार्थना करता है कुछ लोगों को इसके लिये एक मिनट भी बस होता है तो कुछ लोगों को 24 घण्टे भी काफी नहीं हो सकते हैं। उन लोगों के लिये जो ईश्वर के अस्तित्व को अपने में अनुभव करते हैं केवल मेहनत और मजूरी करना भी प्रार्थना हो सकती है। उनका जीवन ही सतत प्रार्थना और भक्ति के कार्यों से बना होता है। परन्तु वह लोग जो केवल पाप कर्म ही करते हैं प्रार्थना में जितना भी समय लगावेंगे उतना ही कम होगा। यदि उसमें धैर्य और श्रद्धा होगी और पवित्र बनने की इच्छा होगी तो वे तब तक प्रार्थना करेंगे जब तक कि उन्हें अपने में ईश्वर की पवित्र उपस्थिति का निर्णयात्मक अनुभव न होगा। हम साधारण वर्ग के मनुष्यों के लिये तो इन दो सिरे के भागों के मध्य का एक और भी मार्ग होना चाहिये। हम ऐसे उन्नत नहीं हो गये हैं कि यह कह सकें कि हमारे सब कर्म ईश्वरार्पण ही हैं और शायद इतने गिरे हुए भी नहीं हैं कि केवल स्वार्थी जीवन ही बिताते हैं इसलिये सभी धर्मों ने समान भक्ति भाव प्रदर्शित करने के लिये अलग समय मुकर्रर किया है दुर्भाग्य से इन दिनों यह प्रार्थनाएं जहाँ दाँभिक नहीं होती हैं वहाँ यान्त्रिक और औपचारिक हो गई हैं इसलिये यह आवश्यक है कि इन प्रार्थनाओं के साथ वृत्ति भी शुद्ध और सच्ची हो।

निश्चयात्मक वैयक्तिक प्रार्थना जो ईश्वर से कुछ माँगने के लिये की गई हो वह तो अपनी ही भाषा में होनी चाहिये। इस प्रार्थना से कि ईश्वर हर एक जीव के प्रति हमें न्याय पूर्वक व्यवहार रखने की शक्ति दे और कोई भी बढ़कर नहीं हो सकती है।


Quotation

यदि गिर पड़ो तो हताश मत होओ। गिरना बुरा नहीं है। क्योंकि गिरकर भी उठा जा सकता है। जो चढ़ता है वही गिरता भी है। घबराओ मत चलो- गिरो उठो फिर आगे बढ़ो।

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जो अपने लिये उचित न समझो दूसरों के लिये भी वैसी इच्छा मत करो। सब किसी के हक को पहचानो।

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प्राणी मात्र से दिल खोल कर मिलो किसी से घृणा मत करो। याद रक्खो परमात्मा सदा सबमें समान रूप से विराजमान है।

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स्वार्थ से भरा हुआ प्रेम हृदय को कलुषित करता है अपने सुख की लालसा और पवित्र प्रेम परस्पर भिन्न वस्तु हैं। प्रेम कंचन है, और स्वार्थ काँच है।

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यदि सत्य को अपने हृदय में बसाना चाहते हो तो ईर्ष्या, द्वेष को उसमें से निकाल बाहर करो। जब तक शत्रु घर से बाहर नहीं होगा, मित्र का प्रवेश कैसे हो सकता है?

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मनुष्य जितना अधिक नम्र होगा, जितना अधिक परमात्मा में विश्वास करेगा, उतना ही वह अपने कार्यों में कुशल होगा और उतनी ही अधिक शान्ति और तृप्ति भोगेगा।


शक्ति अपने अन्दर है

(श्रीमती - ओ. हष्णुहारा)

यदि तुम केवल सफलता का ही चिन्तन करोगे तो उसे प्राप्त कर लोगे। परन्तु इसे भौतिक कार्यों में ही अपना हृदय दे डालोगे तो तुम्हारी सफलता केवल कुछ समय के लिये होगी। अच्छी तरह याद रक्खो कि आत्मा की आज्ञा का पालन करना भी आवश्यक है। जब तक आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार की बातों में समान उन्नति न हो लौकिक आनन्द भी प्राप्त नहीं हो सकता।

मनोविज्ञान की प्रतिज्ञा है कि तुम पाप को निकाल कर उसका स्थान पुण्य को दे देने में पूरी तरह समर्थ हो। यदि प्रेम की किरणें निकालोगे तो घृणा रूपी निशाचरी भाग जायेगी। जब कि मनुष्य एक बड़ी सीमा तक अपने जीवन को स्वर्गमय बना सकता है तो मैं नहीं कह सकती कि वह जानबूझ कर उसे बनाने का प्रयत्न क्यों करता है?

सारी शक्ति तुम्हारे भीतर से आती है और सारा सार अन्दर ही है। अर्थात् आत्मा के बाहर कुछ ढूंढ़ते फिरने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम्हारा भौतिक शरीर के भीतर सब शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। तुम्हारा सूक्ष्म शरीर भी इसी के अन्दर है। जीवन तथा मृत्यु का, प्रेम का, सत्य का, शक्ति का और जो भी घटना कभी हुई है उसका सारा ज्ञान और आत्मा की सारी शिक्षाएं भूत काल की स्मृति में बन्द हैं, पूर्वजन्मों की स्मृति के ताले को खोलने की ही देर है कि तुम अपने सामने एक ऐसे ज्ञान का भण्डार देखोगे जिसकी कल्पना भी तुमने पहले न की होगी।

मैं कहती हूँ कि जो कुछ तुम बनना चाहो इच्छापूर्वक बन सकते हो और जो कुछ करना चाहो कर सकते हो। इसमें स्त्री पुरुष और आयु की कोई बाधा नहीं है। भूतकाल बीत गया समाप्त हो गया। अब वर्तमान और भविष्य तुम्हारे लिये मौजूद हैं। उन्हें जैसा चाहो बना सकते हो।


धर्म का अनुसंधान।

(स्वामी विवेकानन्द के एक भाषण का अंश)

पुरानी बाइबिल में मूसा से कहा गया है- “अपने पैरों से जूते उतार डालो, क्योंकि जहाँ तुम खड़े हो वह ईश्वर के बैठने का पवित्र स्थान है।” हमें सदा ही बहुत श्रद्धाभाव से धर्म के अध्ययन की ओर अग्रसर होना चाहिए। वह व्यक्ति जो पवित्र हृदय और श्रद्धा का भाव लेकर आता है उसका हृदय खुल जायेगा। उसके लिये द्वार मुक्त रहेगा और सत्य का दर्शन करने में समर्थ होगा।

यदि आप केवल प्रतिभा या बुद्धि लेकर ही आवेंगे तो थोड़ा बुद्धि कौशल दिखाने का क्षेत्र, थोड़े से बुद्धि कौशल सम्बन्धी सिद्धान्त मात्र प्राप्त कर सकेंगे, किन्तु सत्य आपके हाथ नहीं लग सकेगा। सत्य में एक ऐसा आकर्षण है कि जो व्यक्ति उसे देख पाता है, केवल वही सन्देह रहित होता है। सूर्य को प्रदर्शित करने के लिये किसी प्रकार के मशाल की आवश्यकता नहीं पड़ती। सूर्य अपनी प्रभा से ही दीप्तिमान है। यदि सत्य के लिये भी कोई प्रमाण आवश्यक होगा तो भला उस प्रमाण को कौन प्रमाणित कर सकेगा ? इस विश्व में भला कहाँ ऐसा प्रमाण उपलब्ध हो सकता है जो सत्य को प्रमाणित कर सके। श्रद्धा और प्रेम भाव से हमें ईश्वर की ओर-ईश्वर प्राप्ति की ओर अग्रसर होना चाहिए। हमारा हृदय खिलेगा और हमें बतला देगा कि यह सत्य है और यह असत्य। धर्म का क्षेत्र हमारी ज्ञानेन्द्रियों से परे है, वह हमारी वेदना शक्ति से भी परे है। हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों से ईश्वर को नहीं देख सकते। कोई भी व्यक्ति अपने नेत्रों से ईश्वर को नहीं देख सका है। भविष्य में भी इस तरह कोई उसका दर्शन नहीं प्राप्त कर सकेगा। ईश्वर किसी की भी चेतना-शक्ति में नहीं आता। मैं ईश्वर को नहीं जानता। उसे न तो आप जानते हैं और न कोई दूसरा ही व्यक्ति जानता है। ईश्वर कहाँ है? धर्म का क्षेत्र कहाँ है? यह बुद्धि से परे है, चेतना शक्ति से परे है। बहुतों में से चेतना-शक्ति ही एक मात्र ऐसा क्षेत्र है, जिसमें हम काम करते हैं। स्वयं अपने ही केन्द्र स्थान के अधिक समीप पहुँचने के लिये आपको चेतना-शक्ति के क्षेत्र का अतिक्रमण करना पड़ेगा। यदि आप अपने केन्द्र के समीप पहुँच जायेंगे तो बहुत कुछ ईश्वर के भी समीप पहुँच जायेंगे। ईश्वर का प्रमाण क्या है? प्रत्यक्ष अर्थात् साक्षात् दर्शन। इस दीवार का प्रमाण यही है कि मैं इसे अपने नेत्रों से देख रहा हूँ। इस मार्ग का अनुसरण करके हजारों आदमी ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन कर चुके हैं और जो लोग अभिलाषी होंगे वह भविष्य में भी करेंगे। परन्तु इस प्रकार का प्रत्यक्ष इन्द्रियों के द्वारा बिलकुल सम्भव नहीं है। यह इन्द्रियों से परे है, चेतना-शक्ति से परे है। इस विषय की शिक्षा भी हमें इसलिये आवश्यक है कि वह हमें इन्द्रियों से प्रतीत कर दे, इन्द्रियों को तृप्त करने की लालसा बिलकुल जाती रहे। हर तरह के अपने पूर्व कार्यों तथा दासता के कारण हम लोग अधःपतन की ओर चले जा रहे हैं। पूर्वोक्त ढंग से अभ्यास करते करते हम विशुद्ध हो जायेंगे और कर्म का भार हल्का हो जायेगा। उस समय दासता की बेड़ी अपने आप कट कर गिर जायेगी और हम इन्द्रियों के प्रत्यक्ष के क्षेत्र से, जिसमें कि हम जकड़ कर बंधे हुए हैं, ऊपर उठ जायेंगे। उसमें हम ऐसी वस्तु को देखेंगे, सुनेंगे या उनका स्पर्श करेंगे, जिसे कि साधारण मनुष्य, जो आहार, निद्रा और भय के फेर में पड़े रहते हैं, न तो स्पर्श कर सकेंगे, न देख सकेंगे, और न सुन सकेंगे। उस समय हम एक विचित्र ही भाषा बोलेंगे। तब संसार हमें न समझ सकेगा, क्योंकि यह तो इन्द्रियों के विषयों के अतिरिक्त और कुछ जानता नहीं। वास्तविक धर्म तो अलौकिक है, यह ज्ञानातीत है। इस विषय के हर एक प्राणी में इन्द्रियों का अतिक्रमण करने की शक्ति होती है। यहाँ तक कि एक जरा सा कीड़ा भी किसी दिन इन्द्रियों का अतिक्रमण करके ईश्वर के समीप पहुँच जायेगा। जीव असफल न होगा। विश्व में असफलता के समान और कोई भी वस्तु नहीं है। मनुष्य सैंकड़ों बार अपने आप को व्यथित करता है, हजारों बार अधःपतन की ओर जाता है परन्तु अन्त में वह अनुभव करेगा कि मैं ईश्वर हूँ। हमें यह मालूम है कि जीवात्मा सीधे उन्नति की ही ओर नहीं अग्रसर होता जाता। हर एक जीवात्मा को भ्रमण करना पड़ता है। मानो वह एक तरह के चक्र में डाल दिया जाता है और उसे उसकी परिक्रमा करनी पड़ती है। यह अभी पतन की ओर अत्यधिक नहीं जा पाता और समय आने पर उन्नति करने लगता है। कोई भी नष्ट न होगा। हम सभी लोगों का एक समान केन्द्र से प्रादुर्भाव हुआ है। क्या उच्चतम और क्या निम्नतम, ईश्वर जितने भी जीवों का प्रादुर्भाव करता है, वे सभी उस परम पिता की गोद में लौट आते हैं। जिससे समस्त प्राणियों का प्रादुर्भाव हुआ है, जिसमें वे रहते हैं और अन्त में लौटकर जिसकी शरण लेंगे वह ईश्वर है।


Quotation

बदला लेने का विचार छोड़ कर क्षमा करना अंधकार से प्रकाश में आना है और जीते जी नरक की जगह सुख भोगना है।

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अपने विरोधी को अनुकूल बनाने का सब से अच्छा उपाय यही है कि उनके साथ सरल और सच्चा प्रेम करो। वह तुम से द्वेष करे और तुम्हारा अनिष्ट करे, तब भी तुम प्रेम ही करो।

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परमात्मा में विश्वास न होने ही से विपत्तियों का, विषयों के नाश का और मृत्यु का भय रहता है। जिनका उस भयहारी भगवान् में भरोसा है, वह सदा निर्भय है।

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जो ईश्वर को अपना सर्वस्व मानता है, वही असली धनवान् है। दुनिया की चीजों को अपनी सम्पत्ति मानने वाला तो सदा गरीब ही रहेगा।


वह तू है?

(लेखक - श्री रामनिवास शर्मा, अम्बाह)

“अध्ययन और मनन किये बिना कोई ‘मनुष्य’ नहीं बन सकता। पशुता से मानवता की ओर जाने का मार्ग विद्या और ज्ञान द्वारा ही प्राप्त होता है। फिर मेरा पुत्र अशिक्षित रहकर हीन जीवन क्यों व्यतीत करे?” ऋषि आरुणि के हृदय में यह विचार हलचल मचा रहे थे वे अपने खिलाड़ी लड़के श्वेतकेतु को विद्या पढ़ने के लिये कई बार कह चुके थे पर उसके ऊपर कोई कहने लायक असर न हुआ था। पिता की आँख बची कि श्वेतकेतु पोथी पटक कर गायब।

लड़का बड़ा हो चुका था। यह न पढ़ेगा तो एक ऋषि के लिये कितनी लज्जा की बात है। आरुणि का मन दुःख से भरा हुआ था। उन्होंने आज श्वेतकेतु को फिर प्रेमपूर्वक निकट बुलाया और बड़े मार्मिक शब्दों में उसे कल्याण के मार्ग पर चलने को समझाया उसके बार बार उद्दण्डता करने और अध्ययन में मन न लगाने से ऋषि को जो वेदना हो रही थी वह उनकी आँखों में होकर छलक पड़ी।

डाट डपट से जो कार्य अब तक न हो सका था वह एक आत्मा ने दूसरी आत्मा को आलिंगन करके क्षण मात्र में पूरा कर दिया। उद्दण्ड लड़के को पिघल जाना पड़ा। उसने पुस्तक उठाई और पिता की चरण रज मस्तक पर रख कर गुरुकुल की ओर चला गया।

अध्ययन का चस्का और किसी आनन्द से कम नहीं होता बशर्ते कि किसी योग्य शिक्षक द्वारा शिक्षा दी जाय। श्वेतकेतु एक, दो, पाँच, दश वर्ष नहीं वरन् पूरे चौबीस साल तक लगातार पढ़ता रहा। गुरु ने उसे आज्ञा दी- इतनी विद्या काफी है जीवन के दूसरे क्षेत्रों में तुम्हें अभी बहुत काम करना है, जाओ घर लौट जाओ। श्वेतकेतु गुरु की आज्ञानुसार घर लौट आया।

धनबल, भुजबल, जनबल, की भाँति विद्या भी एक बल है। बल प्राप्त करके आदमी अभिमानी बन जाता है। और अभिमानी दूसरों को तृण समान गिनता हुआ तिरछा-तिरछा चलता है। श्वेतकेतु विद्या के घमंड में मदमत्त हाथी की तरह घर पहुँचा। पिता बैठे हुए थे। उसने उन्हें प्रणाम करना उचित न समझा। और उद्धत आचरण से उनके समीप जा बैठा। घमंड उसकी नस-नस में से फूटा पड़ रहा था।

महर्षि आरुणि बड़े अनुभवी तपस्वी थे। उन्होंने मनुष्य स्वभाव, उसकी त्रुटियाँ एवं उन त्रुटियों के जन्म स्थान के जानने में बहुत काल लगाया था। लड़के के इस आचरण पर उन्हें क्रोध नहीं आया क्योंकि वास्तविक स्थिति को उन्होंने जान लिया था। पुत्र के आगमन पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए उससे कुशल समाचार पूछे। तदुपरान्त प्रश्न किया- “पुत्र! मालूम होता है तू बहुत अधिक पढ़ गया है। क्योंकि विद्या का फल विनय है। तू कदाचित विद्या से भी अधिक जान गया है। अच्छा उस वस्तु को बता जिस एक के ही जान जाने से सब वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है।”

इस प्रश्न को सुनकर पण्डित श्वेतकेतु का अभिमान चूर हो गया। इतने दिन पढ़ने पर भी वह ऐसी किसी वस्तु को नहीं जान सका था जिस एक की सीमा के अंतर्गत ही सब कुछ आ जाता हो। वह पिता के चरणों पर गिर पड़ा - ‘भगवन्! उस वस्तु को मैं नहीं जानता - आप ही बताइये!”

आरुणि ने कहा - वत्स! जैसे मिट्टी का गुण धर्म, मालूम हो जाने पर घड़े, सकोरे, आदि के बनने की बात, और धातु का स्वभाव विदित होने पर हथियार, आभूषण आदि बनाने का रहस्य मालूम हो जाता है उसी प्रकार एक ‘सत्’ को जान लेने पर विश्व की संपूर्ण वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है।

श्वेतकेतु अब और उलझन में पड़ गया, उसने पूछा - पिताजी वह ‘सत्’ कहाँ है? कैसा है? है तो दिखाई नहीं पड़ता।

आरुणि ने उसके हाथ में नमक की डेली देते हुए कहा पुत्र! इसे जल से भरे हुए लोटे में डाल दो और कल प्रातःकाल लोटे को लेकर मेरे पास आना। श्वेतकेतु ने वैसा ही किया।

दूसरे दिन सवेरे वह जल का भरा हुआ लोटा लेकर पिताजी के पास पहुँचा। तब उन्होंने कहा कि कल जो नमक की डेली इसमें डाली थी वह तुम्हें दिखाई देती है? उसने बहुत ध्यान से देखा पर नहीं दिखाई दी। तब ऋषि ने कहा अच्छा हाथ डालकर उसे टटोल शायद मिल जाय। उसने हाथ डालकर खूब टटोला पर वह नमक की डेली हाथ न आई। फिर आरुणि ने कहा- अच्छा इसमें से इस तरफ से थोड़ा जल चख और इसका स्वाद बता? श्वेतकेतु ने चख कर बताया कि ‘खारा है।’ उन्होंने कहा अब इधर से, बीच में से, नीचे से, चारों ओर से चख। उसने थोड़ा थोड़ा सब ओर से चखा और कहा पिताजी यह तो सब ओर खारा है। मैंने जो नमक की डेली इसमें डाली थी वह पानी में घुल गई और अब वह इसमें सर्वत्र व्याप्त हो गई। मैं उसे आँख या हाथ से नहीं देख सकता तथापि चखकर अनुभव करता हूँ कि वह है और पानी में सर्वत्र व्याप्त है।

ऋषि ने कहा- हे सौम्य! वह ‘सत्’ इस नमक की भाँति है जो संसार में सर्वत्र घुला हुआ है जो कि आँखों से दिखाई नहीं देता तथापि अनुभव से जाना जा सकता है! वह सत् है और वहीं आत्मा है। श्वेतकेतु! (तत्वमसि) वह आत्मा तू ही है।


Quotation

अब श्वेतकेतु की आँखें खुल गई थीं। उसने जाना कि विश्व के समस्त ज्ञानों का मूल भगवत् परमात्मा है और वह परमात्मा मेरी आत्मा ही है।

(छाँदोग्य उपनिषद्)


निष्पाप लोग पत्थर मारें

(लेखक - जगन्नाथ शर्मा, अध्यापक, दाँता)

“यह दुराचारिणी है। मूसा ने हमें आदेश किया है कि पत्थर मार मार कर इसके प्राण ले लें।” पण्डित और धर्म शास्त्रियों ने यह शब्द कहते हुए उस स्त्री को यीशु के सामने उपस्थित किया। वे लोग इस विषय में उसकी सलाह चाहते थे।

जैतून पर्वत के एक मन्दिर में बैठे हुए ईसा मसीह लोगों को धर्मोपदेश दे रहे थे। उनके सामने यह भी एक धर्म-समस्या लाई गई। वह एक क्षण के लिये चुप हो गये और उँगलियों से जमीन कुरेदने लगे।

लोगों ने फिर उनसे पूछा-प्रभु क्या आज्ञा है? हम इस दुराचारिणी स्त्री का वध करना चाहते हैं।

यीशु ने अपना सिर उठाया और कहा - इसे मारो, पर सबसे पहला पत्थर वह मारे जिसने कभी कोई दुष्कर्म न किया हो।

उस स्त्री का वध करने का मजा लूटने जो भीड़ आई थी। उसमें से सब एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। ऐसा कौन था जिसने कभी कोई पाप न किया हो। हाथों में लगे हुए पत्थर छूट-छूट कर जमीन पर गिरने लगे। प्रहार करने के लिये किसी का हाथ न उठ सका। सब एक-एक करके खिसकने लगे।

अब स्त्री अकेली खड़ी थी। उसे मारने वाला कोई दिखाई नहीं देता था क्योंकि कोई निष्पाप नहीं था। यीशु ने कहा, यदि तुम्हें कोई दण्ड नहीं दे सका तो मैं भी नहीं दे सकता जा और फिर पाप न करना।

इञ्जील की यह कथा पुरानी है। परन्तु हमारे दैनिक जीवन में प्रतिदिन इसकी पुनरावृत्ति होती है।

यदि हम निष्पाप होने तक दूसरों पर ढेला फेंकने से हाथ रोके रहें तो हमारे जीवन में क्षमा ही शेष रह जायेगी।


मौन व्रत से महान् लाभ

(लेखक - योगीराज उमेशचन्द्रजी, बम्बई)

मनुष्य के शरीर में कुदरत की अजब कारीगरी समाई हुई है। योगशास्त्र कहता है कि जो मनुष्य शरीर रूपी पिंड को बराबर जानता है उस मनुष्य को समष्टी रूप ब्रह्माण्ड जानना कुछ मुश्किल नहीं।

शरीर में चार वाणी हैं। जैसे कि:- परावाणी नाभि (टुन्डी) में, पश्यन्तिवाणी छाती में, मध्यमावाणी कण्ठ (गले में), और वैखरी वाणी मुँह में है। शब्द की उत्पत्ति परावाणी में होती हैं परन्तु जब शब्द स्थूल रूप धारण करता है, तब मुँह में रही हुई वैखरी वाणी द्वारा बाहर निकलता है।

मौन दो प्रकार के हैं।

(1) वाणी से और (2) मन से। वाणी को वश में रखना, कम बोलना, नहीं बोलना, जरूरत के अनुसार शब्दोच्चार करना आदि वाणी के मौन कहे जाते हैं। मन को स्थिर करना, मन में बुरे विचार नहीं लाना, अनात्म विचारों को हटा कर आत्म (अध्यात्म) विचार करना, बाह्य सुख की इच्छा से मुक्त होकर अंतर सुख में मस्त होना, और मन को आत्मा के वश रखना वगैरह मन का मौनव्रत कहलाता है।

मौन व्रतधारी व्यक्तियों को मुनि के नाम से सम्बोधन करते हैं। मौन व्रतधारियों में महान् शक्ति होती है, यह बात सत्य है। उदाहरण देखिये कि जब ज्यादा प्रमाण में बोलने में आता है, तब गले की आवाज बैठ जाती है, प्यास अधिक लगती है, कण्ठ सूखता है, छाती में दर्द होता है, और बेचैनी सी मालूम पड़ती है, अर्थात् सख्त मेहनत करने वाले मजदूर वर्ग से भी अधिक परिश्रम बोलने में पड़ता है। इसलिये जितने प्रमाण में बोला जाय उतने ही प्रमाण में शरीर की शक्ति व्यय होती है।

मेरे कहने का यह मतलब नहीं कि मुँह बन्द कर लेना चाहिये, परन्तु हमेशा के व्यवहार में आवश्यकतानुसार ही वाणी का उपयोग किया जावे, तो भी बहुत सी शक्ति का अपव्यय बचेगा।

दुनिया में महान् व्यक्ति होने के लिये कुदरत के कुछ नियम पालने पड़ते हैं। उन नियमों में ‘वाणी स्वातंत्र्य’ भी एक नियम है किन्तु वर्तमान समय की संसार व्यापी अव्यवस्था के कारण साधारण जीवन बिताने के लिये भी बहुत बोलना पड़ता है। लोगों को इसमें कमी करने के लिये निम्न नियमों का पालन करना चाहिये।

पालने के नियम-

(1) कोई कोई स्त्री पुरुषों को ऐसी आदत होती है कि बिना कारण ही बोला करते हैं उन्हें बोलने का प्रमाण कम करना चाहिये।

(2) बिना कारण (हँसी, दिल्लगी या दूसरे किसी के साथ) बोलने की इच्छा हो तब दोनों नासिका द्वारा श्वास खींच कर छाती के फेफड़ों में भर रखना और धीरे धीरे निकाल देना, भरते समय ईश्वर का ध्यान या अपने धर्म गुरु के बताये हुए मन्त्र का जाप करना।

(3) पखवाड़े भर में एक दिन सुबह या शाम को पौन घण्टे मौन धारण करना। उस समय “मेरा मन पवित्र होता जाता है” “मेरी जिन्दगी सुधरती जाती है” “व्यवहार या परमार्थ के लिये जो भी शुभकार्य करता हूँ वे सब कर्म लाभकारक होते हैं” इस प्रकार के विचार करना।

(4) ज्यादा समय मिल सकता हो तो अठवारे में एक वक्त या 4 दिन में एक वक्त 3 से 6 घण्टे मौन रहना।

(5) मौन धारण करते समय दूध या फलों पर रहना। हो सके तो बगीचे आदि रम्य स्थान में घूमने जाना।

(6) वायु प्रधान शरीर वाले को अधिक बोलने की आदत होती है, वास्ते उनके पेट में से और सिर में से वायु दोष निवारण करने के लिये रोज सबेरे ताँबे के लोटे में रक्खा हुआ पानी 12 या 14 ओंस पी जाना, पानी पीकर आधे घण्टे बाद सण्डास (मल विसर्जन करने) जाना चाहिये।

मौन धारण करने से लाभ।

अन्तरशक्ति बढ़ती है, महान कार्यों को कैसे करना चाहिये, वह काम शुरू करने के बाद उसका क्या परिणाम होगा, यदि विघ्न आवे तो कैसे टालना चाहिये, अटल श्रद्धा से कार्य सिद्धि आदि सन्देश हृदय में रहे हुए परमात्मा द्वारा मिलेंगे।

मौनधारियों के वचन सत्य होते हैं, सुनने वाले को सम्पूर्ण विश्वास तथा सचोट असर होता है। बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, चाय और अफीम वगैरह शरीर को अत्यन्त नुकसान करने वाले व्यसन के ऊपर काबू रखने की शक्ति आती है और धीरे धीरे खराब व्यसन छूट जाते हैं। अन्तःकरण, मन, बुद्धि, चित्त अहंकार में रहे हुए छह रिपु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर) का नाश होता है, सुख और दुःख के समय सौम्य दृष्टि व संतोषवृत्ति उत्पन्न होती है, ज्ञानेन्द्रियों की स्थिरता जाती रहती है, नाभि में रही हुई परावाणी में से शब्द गुप्त रूप से प्रकट होते हैं। वे शब्द मनुष्य (अपने) कल्याण के पन्थ में ले जाने वाली आज्ञा है अपने शरीर में से उत्पन्न होने वाले शब्दों के आधार से भविष्य में जाने वाले सुख या दुःख के समाचार मिल सकते हैं। पूर्व जन्म में कौन थे वह ज्ञात होता है। अपने सगे सम्बन्धी इष्ट मित्र मरने के बाद कहाँ (किस योनी, स्वर्ग, मृत्यु, पाताल, नरक अथवा मोक्ष) गये हैं उसकी समझ पड़ती है।


Quotation

अपने शत्रु को प्यार करो। जो तुम्हें शाप दें उन्हें आशीर्वाद दो। जो तुमसे घृणा करें उनके प्रति भलाई करो और उनके लिये भी प्रभु से शुभ प्रार्थना करो, जो तुम्हारे साथ तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करते हों।


सूर्य का महत्व।

(अखंड ज्योति कार्यालय से इसी मास प्रकाशित ‘सूर्य-चिकित्सा विज्ञान’ नामक पुस्तक के कुछ पृष्ठ)

सूर्यत्आमा जगतस्तरथुषश्च। - यजु. 7।42

सूर्य संसार की आत्मा है। संसार का संपूर्ण भौतिक विकास सूर्य की सत्ता पर निर्भर है। सूर्य की शक्ति के बिना पौधे नहीं उग सकते, अण्डे नहीं बढ़ सकते, वायु का शोधन नहीं हो सकता, जल की उपलब्धि नहीं हो सकती। निदान कुछ भी नहीं हो सकता। सूर्य की शक्ति के बिना हमारा जन्म होना तो दूर इस पृथ्वी का जन्म न हुआ होता।

प्रकृति का केन्द्र सूर्य है। इसकी समस्त शक्तियाँ सूर्य से ही प्राप्त हैं। आत्मा के बिना शरीर का अस्तित्व नहीं हो सकता उसी प्रकार जगत की सत्ता सूर्य पर अवलंबित है। भौंरा अपना जीवन-रस प्राप्त करने के लिये फूल के चारों ओर जिस प्रकार मँडराया करता है उसी प्रकार पृथ्वी अपनी जीवन रक्षा के उपयुक्त सामग्री पाने के लिये सूर्य की परिक्रमा किया करती है। धरती यदि हमारी माता है तो सूर्य पिता है। दोनों के रजवीर्य से हम जीवन धारण किये हुए हैं। शारीरिक रसों का परिपाक सूर्य की गर्मी से होता है। शक्तियों का विकास, अंगों की परिपुष्टि और मलों का निकलना उसी महत शक्ति पर निर्भर है। यह तो हुई हमारे शरीर और उसके जीवित रहने के साधनों के विकास और परिपुष्टि की बात। यह साधारण क्रम सभी जड़ चेतन जीवधारियों के जीवन में चलता रहता है।

जब संकटपूर्ण दशायें आती हैं तब सूर्य से हमें असाधारण मदद मिलती है। भगवान भास्कर में इतनी प्रचण्ड रोग नाशक शक्ति है जिसके बल से कठिन रोग दूर हो जाते हैं। दूर जाने की जरूरत नहीं भूखे प्यासे रहकर दिन काटने वाले किसान जिन्हें बहुमूल्य पौष्टिक पदार्थों के दर्शन भी दुर्लभ होते हैं और दिन रात कठोर कार्य में पिले रहते हैं फिर भी स्वस्थ और हट्टे कट्टे रहते हैं। बीमारी उनके पास भी नहीं आती यदि कोई रोग हुआ तो दो-चार दिन में बिना दवा के अपने आप ही अच्छा हो जाता है। इसके विपरीत शहरों में रहने वाले वे लोग जो दिन भर छाया में रहते हैं। पौष्टिक पदार्थ खाने और पूरा आराम करने के बावजूद भी बीमार पड़े रहते हैं। पेट की शिकायत, भोजन हजम न होने, टट्टी साफ न आने की शिकायत तो प्रायः शत प्रतिशत लोगों को होती है। धातुस्राव, जुकाम, रक्तहीनता और मेद वृद्धि आदि बीमारियाँ भी उनमें से अधिकाँश को घेरे रहती हैं तपेदिक और निमोनिया से जितने शहरी लोग मरते हैं उतने ग्रामीण नहीं। सब जगह पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का स्वास्थ्य खराब पाया जाता है। इन सब का एक ही कारण है सूर्य रश्मियों का अनादर। जब से हमने धूप में रहना असभ्यता और बन्द जगहों में निवास करना सभ्यता में शामिल किया है तब से बहुमूल्य स्वास्थ्य को गँवा दिया है। सभ्यता के चक्कर में पड़ हमने सूर्य का तिरस्कार किया, फलस्वरुप स्वास्थ्य ने हमारा तिरस्कार कर दिया।

स्वस्थ जीवन बिताने के लिये सूर्य से सहायता लेने की बड़ी आवश्यकता है। इस महत्व को समझ कर हमारे प्राचीन आचार्यों ने सूर्य प्राणायाम, सूर्य नमस्कार, सूर्य उपासना, सूर्य योग, सूर्य चक्र वेधन तथा सूर्य यज्ञ आदि अनेक क्रियाओं को धार्मिक स्थान दिया था। डॉक्टर सोले कहते हैं कि “सूर्य में जितनी रोगनाशक शक्ति मौजूद है उतनी संसार की किसी वस्तु में नहीं है। केन्सर, नासूर और भगन्दर प्रभृति दुस्साध्य रोग जो जली और रेडियम के प्रयोग से भी अच्छे नहीं किये जा सकते थे वे सूर्य किरणों के ठीक प्रकार प्रयोग करने से अच्छे हो गये।” तपेदिक के विशेषज्ञ डॉक्टर हरनिच का कथन है कि “पिछले तीस वर्षों से मैंने करीब करीब सभी प्रसिद्ध औषधियों को अपने चिकित्सालय में आये हुए प्रायः बाईस हजार रोगियों पर आजमा डाला पर मुझे उनमें से किसी पर भी संतोष न हुआ। अब गत तीन वर्षों से मैंने सूर्य चिकित्सा प्रणाली का उपयोग अपने मरीजों पर किया है फलतः मैं यह कह सकने को तत्पर हूँ कि सूर्य शक्ति से बढ़कर क्षयी के लिये और कोई औषधि नहीं है।”

डॉक्टर होनर्ग ने लिखा है कि “रक्त का पीलापन, पतलापन, लोह की कमी, नसों की दुर्बलता, कमजोरी, थकान, पेशियों की शिथिलता आदि बीमारियों में मैंने पाया कि सूर्य की मदद से इलाज करना लाजवाब है।” लेडी कीवो जो अमेरिका की प्रसिद्ध सूर्य चिकित्सक हैं अपने अनुभवों की पुस्तक में लिखती हैं कि “इस वर्ष मेरे इलाज में करीब एक दर्जन ऐसे बच्चों की जो बिलकुल दुबले हो रहे थे, जिनकी चमड़ी लटक रही थी और हड्डियाँ टेढ़ी पड़ गई थीं जाँच करने पर पता लगा कि इन्हें धूप से वंचित रखा गया है। मैंने उन्हें सलाह दी कि प्रातःकाल एक घण्टे तक इन्हें नंगे बदन धूप में टहलाया जाय और खुली हवा में उन्हें घूमने फिरने दिया जाय। इस उपाय से उनकी तन्दुरुस्ती दिन प्रतिदिन बढ़ने लगी और कुछ ही दिनों में बिलकुल स्वस्थ हो गये।” मियो अस्पताल के सिविल सर्जन एफ . प्रिवेल्ड ने विवरण पुस्तक में अपना अनुभव लिखते हुए सिद्ध किया है कि “सूरज की धूप का अगर ठीक तौर से इस्तेमाल किया जाय तो सेहत दुरुस्त रह सकती है और अगर किसी किस्म की बीमारी हो जाय तो वह भी धूप के जरिये दूर हो सकती है।” प्रसिद्ध दार्शनिक न्योची का मत है कि - “जब तक दुनिया में सूरज मौजूद है तब तक लोग व्यर्थ ही दवाओं की तलाश में भटकते हैं। उन्हें चाहिए कि इस शक्ति सौंदर्य और स्वास्थ्य के केन्द्र सूर्य की ओर देखें और उसकी सहायता से अपनी असली अवस्था को प्राप्त करें।”

भारतवासी भगवान सूर्य के इस अद्भुत रहस्य से अपरिचित नहीं हैं। गुरु लोग बालकों को अपराध करने पर धूप में खड़ा रहने का दण्ड देते थे। योगी लोग धूप में तप करते थे। यह करने से पूर्व सूर्य की रोगनाशक शक्ति के बारे में विचार कर लिया गया था। सूर्य उपासना से कुष्ठ रोग नष्ट हो जाने और सोवरण काया हो जाने की बात घर-घर में प्रचलित है और उस पर विश्वास किया जाता है।


हम पुण्य क्यों करें?

(लेखक - श्री नागेश्वरप्रसाद जी दीघाघाट)

अखण्ड ज्योति के पाठकों के सामने मैं एक ऐसे प्रश्न पर विचार करना चाहता हूँ जिसका सम्बन्ध प्रत्येक मानव शरीर से रहता है पर जिसकी तात्विक जानकारी बहुत कम लोगों को रहती है। सभी शास्त्रों, ऋषि महात्माओं की वाणी है कि पुण्य कार्य की ओर प्रवृत्त होना चाहिये और पाप कर्म से अपने को बचाये रखना चाहिये। पुण्य क्या है? कहा जाता है कि अच्छे कर्म से पुण्य होता है। इतना तो हम अपनी आँखों के सामने देखते हैं। भलाई अथवा अन्य भले कार्यों के फलस्वरूप सुख की वृद्धि होती है। दूसरों के प्रति की गई भलाइयां ही सुकर्म क्यों कही जाएं? अपने प्रति जो कुछ अपनी सुख वृद्धि के लिए अथवा अन्य स्वार्थ साधन के लिये अच्छे कर्म किये जाते हैं वे सुकर्म क्यों नहीं हों और अगर सुकर्म हों भी तो कम दर्जे का क्यों माना जाय? और फिर यह सुकर्म क्यों किये जायं? अर्थात्, इनके करने से अगर पुण्य होते हैं तो पुण्य ही क्यों किया जाय?

यह दार्शनिक क्षेत्र के गहन प्रश्न हैं। अगर हम यह मान कर चलें कि सभी लोग परस्पर हित का ख्याल रखेंगे तो संसार भर में प्रेम सम्पादन होगा तो यह प्रेम राज्य तो केवल मानव प्राणियों तक ही सीमित नहीं है। बल्कि मानवता में तो चींटी, पतंगों पर भी दया करने का उपदेश है तो क्या उनसे प्रेम व्यवहार सम्भव है? क्या उनसे भी कभी प्रेम विनिमय की आशा है? अगर हम यह मानते हैं कि अखिल विश्व ब्रह्माण्ड में एक ही अखण्ड, अव्यक्त सत्ता व्याप्त हो रही है, चाहे उसे हम ईश्वर, ब्रह्म, जीव या जो भी नाम दें तो भी यही समझ में आता है कि जिस तरह तालाब के किसी भाग का पानी गन्दा हो तो तालाब ही गन्दा कहलायेगा; उसी तरह संसार के बीच अपनी भलाई के लिये दूसरे को कष्ट दिया अथवा दूसरे की भलाई के लिये अपने को कष्ट दिया, तो बात तो एक ही होनी चाहिए परन्तु दोनों में ये भेद नजर आता है। एक को पाप और दूसरे को पुण्य कह कर आकाश पाताल का अन्तर कर दिया गया। ऐसा क्यों?

सभी शंकाओं पर विचारपूर्वक मनन करने पर हम एक निष्कर्ष पर पहुँचते हैं जो सभी शंकाओं का निराकरण कर देता है। हम पुण्य सिर्फ इस उद्देश्य से नहीं करते कि उससे दूसरे को लाभ पहुँचता है बल्कि इसलिये भी कि दूसरे की लाभार्थ उस किये गये उपकार के कारण अपना ही हित अधिक होता है। विचार शुद्ध होने से मन पवित्र होता जाता है जिससे धीरे-धीरे सात्विकता को अपनाता हुआ मनुष्य परम पद को प्राप्त कर लेता है जो मानव जीवन का अन्तिम उत्कर्ष है। हम अगर कुछ भला कर्म करते हैं तो उसका संस्कार मन में जाता और वह संस्कार बार-बार सुकर्म की प्रेरणा करता है। यही नियम बुरे कार्यों के लिये भी है। कर्म का फल दूसरों को जितना मिलता है, उससे अधिक अपने को मिलता है, यह ध्यान में रखते हुए स्वान्तःसुखाय कर्म करते जाना चाहिये। वासनायें मनुष्य को साँसारिक बन्धन में डाल देती हैं और सात्विक वृत्ति वासनाओं की आसक्ति मिटा देती है। अतएव हम अपने अन्दर सतोगुण विकास की इच्छा से कर्म करें।

इस तरह कर्म निःस्वार्थभाव से किया जाना चाहिए। स्वान्तः सुखाय का बहुत बड़ा स्वार्थ तो अपने ही आप आ जायेगा परन्तु साँसारिक लाभ की इच्छा न रखते हुये कर्म करना अच्छा है। जितना ही फल की भावना बिना कर्म में लगेंगे उतना ही उसका उत्तम आध्यात्मिक फल प्राप्त होगा। इसी से कहा कि ‘भलाई करो और कूयें में डालो।’ इस तरह अपना जीवन सदैव परोपकार परसेवा में तो लगाए रखना चाहिये ही, पर साथ ही किसी पर उसके लिए एहसान भी प्रकट नहीं करना चाहिये। क्योंकि यह सभी सुकर्म मुक्ति के लिये हैं - इस विश्व-बन्धन से छुटकारे के लिये हैं।


अहंभाव का प्रसार करो।

(पं. शिवनारायण शर्मा, हैड मास्टर, आगरा)

ब्रह्मचर्याश्रम में गुरु गृह वा विद्या-मन्दिर ही ब्रह्मचारी का विश्व-संसार है। जिसने जीवन में कभी किसी का आज्ञापालन नहीं किया है वह कभी उन्नति के सोपान पर नहीं चढ़ सकता, जब तक अपने ज्ञान का विकास न हो, जब तक अपने हिताहित का बोध न हो, जब तक अपना चरित्र गठन न हो, तब तक यदि गुरु सेवा में न रहोगे तो स्वेच्छाचार रूपी कीड़ा तुमको काटता रहेगा। जिसने कभी सिपाही की तरह सेनापति की आज्ञा-पालन करना नहीं सीखा, वह कभी नेता नहीं बन सकता। कठोर शासनाधीन रहने पर चमचमाती तलवार और तोपों को देखकर भी योद्धा लोग नहीं डरते। शासन और नियम में रहने से हृदय में एक अपूर्व शक्ति का विकास होता है और अहंभाव का क्रमिक विकास होता है। इसी से आर्य ऋषियों ने ब्रह्मचारियों के लिये सुदृढ़ शासन की व्यवस्था की है, इसी व्यवस्था के कारण आर्यावर्त प्राचीन समय में उन्नति के शिखर पर था। अब वह कठोर शासन न रहने से हम ज्ञान विज्ञान भ्रष्ट, असंयत चरित्र, दुर्बलकाय, दुर्बल चित्त हो कर पराधीन हो रहे हैं। आजकल ब्रह्मचर्य न होने से ही भारत की यह दुर्दशा है।

मानव की शिक्षा का विकास गृहस्थाश्रम में होता है। रसायनादि शिक्षा के लिये जिस तरह उपदेश-गृह (Lecture-Room) में उपदेश प्राप्त होने पर भी, उपदेश सम्यक् हृदयंगम करने के लिये परीक्षागृह (Laboratory) में यन्त्रादि की सहायता से क्रिया करना आवश्यक है, उसी तरह ब्रह्मचर्य काल में मानव जीवन के सब कर्तव्य विषयक उपदेश प्राप्त होने पर भी, उन उपदेशों की दृढ़ता और परिणति सम्पादन के लिये गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना आवश्यक है। जो ज्ञान कार्य रूप में परिणत न हो वह व्यर्थ है। विद्या पढ़ कर उस विद्या द्वारा जगत् का और अपना उपकार न करे तो उसकी वह विद्या वृथा है। बलवान होकर जो दुर्बल की सहायता न करे, उसका बल निरर्थक है। संक्षेप में - जो जिसके पास है उसका सद्व्यवहार न होने से उसका रहना और न रहना बराबर है।

गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने पर कर्तव्याकर्तव्य की अनेक प्रकार की जटिल समस्यायें मनुष्य के सामने आती हैं; तब यदि मानव में “मैं-मेरा” के प्रसार को इष्टदेव का दिया हुआ मूल मंत्र समझकर चले तो वह कभी न गिरे। क्या पारिवारिक, क्या सामाजिक, क्या राजनैतिक सब तरह के कार्यों में यदि अहंभाव का प्रसार करके देखा जाय अर्थात् सभी कार्यों में यदि ‘मुझको’ ‘पर के’ स्थान में स्थापित किया जा सके तो कर्तव्य मीमाँसा उतनी कठिन न हो। पिता जब पुत्र के साथ यदि कोई व्यवहार करे तब अपने को पुत्र कल्पना कर उसके साथ कर्तव्य का निश्चय करे। इसी तरह पुत्र जब पिता के साथ कोई व्यवहार करे तब अपने को पिता समझकर व्यवहार करे। इसी तरह स्त्री, भाई बहिन, कुटुम्बी, आत्मीय, बन्धु देशी विदेशी सबके स्थान में ही “मुझको” कल्पना करके उसके साथ अपना कर्तव्य निश्चय करे। राजा-प्रजा, धनी-दरिद्र, ऋणी-धनी, यजमान-पुरोहित, स्वामी-सेवक, रोगी-वैद्य इत्यादि सब ही एक दूसरे के साथ अपना कर्तव्य निर्णय करते समय दूसरे के स्थान में अपने को कल्पना करें, तो जगत में कभी अशान्ति न रह सके, गृहस्थ के सब ही कर्तव्यों में अहंभाव का प्रसार होने से कर्तव्य सुगम और सुखद होते हैं, और जब ऐसा नहीं होता तब ही मनुष्य एक दूसरे के प्रतिकूल होने से अशान्ति उत्पन्न होती है।

ब्रह्मचर्य के बाद गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने पर “अहंभाव का प्रसार” अधिक कठिन नहीं है, किन्तु कालवश उस ब्रह्मचर्य का लोप होने से गृहस्थाश्रम में “अहंभाव का प्रसार” रूप मूल मंत्र द्वारा प्रेरित होना कठिन हो गया है। तो भी अहं को प्रसार ही मानव जीवन में साधना का मूल तत्व होने से मानव कितना ही विकृत क्यों न हो, वह मूल तत्व एक दम विस्मृत नहीं हो सकता, इसी कारण मनुष्य के अनेक कार्यों में उनके अनजान में ‘अहं भाव’ का प्रसार अधिकार कर लेता है। इन्द्रिय परितृप्ति के लिये ही साधारण गृहस्थ विवाह करते हैं, सन्तान होने पर उनके अहं का प्रसार और बढ़ जाता है। अपने परिवार को अपना समझने पर क्रम से अन्य परिवारों पर भी सहानुभूति की स्वाभाविकता से ‘मैं’ का प्रसार उत्पन्न होता है और धीरे धीरे मानवमात्र में फैल जाता है। कार्यक्षेत्र जितना ही बढ़ता जाता है, मनुष्य उतना ही भिन्न भिन्न देशों में भ्रमण करता है, भिन्न भिन्न भाषायें सीखता है, भिन्न भिन्न देश के रहने वालों से मिलता है उतना ही वह अपने को उनके स्थान में स्थापन करना सीखता है। विदेश में भ्रमण करने से विदेश के भ्रमण के कष्ट अनुभव होते हैं, फिर यदि कोई विदेशी हमारे देश में आवे तो उसके साथ सौजन्य और सद्व्यवहार करने को व्याकुल होते हैं। तीर्थ भ्रमण का यह एक महान फल है।

इसी कारण गृहस्थाश्रम में अनेक प्रकार के कर्तव्य करने की व्यवस्था है। धर्म क्या है? कई प्रकार के कर्तव्य का नाम ही धर्म है। माता पिता की भक्ति करो, स्त्री-पुत्र, आत्मीय स्वजनों का प्रतिपालन करो, अतिथि सेवा करो, दीन-दुखियों को दान करो, अज्ञानी को ज्ञान का उपदेश करो, साधु का सम्मान करो, असाधु को यथा योग्य भाव से दण्ड व उपदेश द्वारा सत्मार्ग पर लाओ, ईश्वर में भक्ति रक्खो इत्यादि जो कुछ मानव का कर्तव्य है उन्हीं की समष्टि को धर्म कहते हैं। केवल ईश्वर उपासना को ही यदि धर्म कहा जाय तो ईश्वर उपासना में भी आपके सब कर्तव्य निहित हैं। ईश्वर उपासना करने के लिये ईश्वर को आदर्श पुरुष जानकर उपासना की जाती है और उस आदर्श पुरुष में पूर्ण अहंता का प्रसार साधन व आत्म समर्पण करते हैं, अतएव ऐसे पुरुष की उपासना करने के लिये उसका आदर्श हृदय में अंकित कर कार्यक्षेत्र में उस आदर्श का अनुगामी होना होता है। बुद्धिमान पाठक जीवन के प्रत्येक कर्तव्य को सूक्ष्म दृष्टि से आलोचना कर देखने से समझ सकेंगे कि प्रत्येक कर्तव्य ‘मैं’ के प्रसार पर स्थापित है। यह भित्ति दूर करते ही वह अकर्तव्य में परिणत हो जायेगा।

इस तरह अपना कर्तव्य निश्चय करके गृहस्थाश्रम में सब प्रकार के कर्तव्य पालन करने का उत्तम सुयोग्य पाया जाता है। इस आश्रम में ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सब प्रकार के अधिकारी व्यक्ति अपना कर्तव्य पालन करते हुये अहंभाव का प्रसार कर सकते हैं। निम्न अधिकारी लोग उच्च अधिकारियों के सुसंग में आकर अपने अहंता के प्रसार के साथ, उनकी अहंता के प्रसार की तुलना करके अपने को उन्नति कर सकते हैं। इसी स्थान में ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, शूद्र, पिता-पुत्र, पति-पत्नि, भाई-बहिन, स्वामि-सेवक, मित्र आदि के सत्संग में आकर सब विषयों में अहंता का प्रसार कर सकते हैं। अतएव हे पाठक! आप यदि अपना और जगत का मंगल चाहते हैं तो ब्रह्मचर्याश्रम में अहंता के प्रसार की शिक्षा से ज्ञान तपस्या साधन कर गृहस्थाश्रम में भी अहंभाव के प्रसार रूप मूल मंत्र द्वारा चलते हुए, कर्म तपस्या द्वारा उस ज्ञान का परिपाक या परिणति कर जीवन कृतार्थ करें।


Quotation

चंचल लक्ष्मी और नश्वर सुखों को समेटने के लिये तुम जितना परिश्रम करते हो यदि उसका सौवाँ भाग श्रम भी परमार्थ संचय में करते तो अविचल धन का सच्चा खजाना इकट्ठा कर लेते।

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जिस विद्या से लोग जीवन संग्राम में शक्तिमान नहीं होते, जिस विद्या से मनुष्य के चरित्र का विकास नहीं होता, और जिस विद्या से परोपकार प्रेमी तथा पराक्रमी नहीं बनते, उसका नाम विद्या नहीं है।


कीड़ों की आत्म विद्युत

(ले.- पद्मचन्द जी गर्ग ‘पद्म’ इन्दौर)

संसार के सभी विद्वान, डॉक्टर, अन्वेषक, वैज्ञानिक, योगी, आत्म-तत्त्ववेत्ता यह स्वीकार करते हैं कि मनुष्य अनन्त शक्ति का भण्डार है। उसके अन्दर जो महान तत्व छिपे पड़े हैं उनका थोड़ा बहुत परिचय जब कभी किसी के पास देख पड़ता है तो दांतों तले उँगली दबानी पड़ती है- आश्चर्य की सीमा नहीं रहती। सरकसों के तमाशे में मनुष्य शरीर गेंद या कठपुतली दिखाई देता है। जादूगर और मोहनी विद्या जानने वाले अपने करतब दिखा कर हैरानी में डाल देते हैं। अभी किसी पहुँचे हुए सिद्ध महात्मा के निकट रहने का जिन्हें सौभाग्य मिला है वे तो और भी विचित्र स्थिति में पड़ जाते हैं और समझ नहीं पाते कि आखिर यह मनुष्य शरीर है या जादू का पिटारा।

ऐसी विचित्र शक्ति मनुष्य में ही हो सो बात नहीं है। प्रकृति ने उस शक्ति को छोटे जानवरों और कीड़े, मकोड़ों में भी दिया है। जिसको देखकर और आश्चर्य होता है, यदि शरीर के हिसाब से कीड़े मकोड़े और मनुष्य शरीर की दिव्य शक्तियों का मुकाबला किया जाय तो मालूम होता है मनुष्य के हिस्से में कम आया है।

आजकल एक धुरन्धर विद्वान डॉक्टर आर. डबल्यू.जी. हिंगस्टन कीड़े मकोड़ों के सम्बन्ध में गहरे अन्वेषण कर रहे हैं। आपकी खोज की जो विचित्र बातें अब तक मालूम हो सकी हैं वे बड़ी कौतूहलवर्द्धक हैं। उन्होंने पता लगाया है कि ‘केलन’ नामक मकोड़े में इतनी विद्युत शक्ति होती है कि वह उससे दूसरे कीड़ों की जान तक ले सकता है। उक्त डॉक्टर साहब ने एक काँच के बक्स में उस कीड़े को बन्द किया और उससे लड़ने के लिए जहरीले डंक वाला एक ततैया भी उसी में छोड़ दिया। अब उस मकोड़े और ततैये की लड़ाई शुरू हुई। घंटों युद्ध होता रहा। जब मकोड़ा हारने लगा तो उसने अपना सम्मोहनास्त्र संभाला। एक कोने में हटकर वह कुछ देर के लिये चुप खड़ा हो गया और एक गहरी साँस के साथ ऐसा विद्युत प्रवाह छोड़ा कि ततैया लड़खड़ा कर गिर पड़ा और तुरन्त ही मर गया। डॉक्टर साहब ने ततैये के मृत शरीर की परीक्षा की तो मालूम हुआ कि उसकी मृत्यु बिजली का झटका लगने के कारण हुई है। अधिक अनुसंधान करने पर उन्होंने साबित किया कि उस जाति के मकोड़ों के शरीर में इतनी बिजली होती है जितनी से एक छोटा बल्ब जल सके।

हिन्दू धर्मानुयायी प्रायः छिपकली को अछूत मानते हैं और उसका शरीर पर गिरना अपशकुन मानते हैं। डॉक्टर ए. कौर्बन ने सिद्ध किया है कि छिपकली एक चलती फिरती बैटरी है। उसकी दुम में जितना झटका होता है उतना छोटी बैटरी में नहीं होता। भारतीय वैज्ञानिक और प्रसिद्ध यन्त्रकारी श्री हंसराज वायरलैस ने एक बार बेतार का तार तैयार करने में छिपकली के शरीर की बिजली का उपयोग किया था। छिपकली की घातक बिजली का आदमी के शरीर पर जो हानिकर असर होता है, उसी को देखते हुए हिन्दू लोग छिपकली छूना बुरा समझते हैं।

एक खोजी को चित्रकूट की पहाड़ियों में इस प्रकार के सर्प मिले जो स्वयं शिकार की तलाश में कहीं नहीं जाते थे और पीले रंग के छोटे मेंढक अपने आप उसका भोजन बनने के लिये चले आते थे। अन्वेषक ने बहुत छानबीन की कि यहाँ पास में कोई तालाब आदि मेंढ़कों के रहने योग्य कोई स्थान भी नहीं है फिर यह इतनी अधिक संख्या में कहाँ से और किस प्रकार चले आते हैं? वह स्वयं जब इसका कुछ संतोषजनक निर्णय न कर सका तो बंगाल की विज्ञान परिषद् को इसकी सूचना दी। कलकत्ता की वैज्ञानिक सभा द्वारा दो वर्ष तक इसका अनुसंधान किया गया और सिद्ध हुआ कि इन सर्पों के शरीर में एक प्रकार की चुम्बकीय विद्युत है और इन मेंढ़कों की देह में लोहतत्व-प्रचुर परिमाण में है इसलिये वे इच्छा न रहते हुए भी आस-पास से खिंचकर साँपों तक चले आते हैं और उनका भोजन बन जाते हैं।

अमेरिका के कन्सास नगर निवासी एक धनपति मि. हर्ट को शिकार का बड़ा शौक था। एक दिन वे दूर के जंगल में शिकार खेलने गये। जब वे थक गये तो एक सघन स्थान पर घास पर पड़े रहे। कुछ देर में उनका दाहिना हाथ काँपने लगा और दिल की धड़कन बढ़ गई। मि. हर्ट चौंके कि बात क्या है? उन्होंने हाथ उठाया तो फिर कुछ न था। अब तो उन्हें और भी अचम्भा हुआ और फिर उसी स्थान पर हाथ रखा। हाथ रखते ही फिर हाथ काँपने लगा। मि. हर्ट उठ बैठे और गम्भीरतापूर्वक वहाँ की चीजों की खोज में लगे। एक एक करके उन्होंने वहाँ की घास, तिनके, जमीन, कंकड़ियाँ छुए पर कोई खास बात न मालूम हुई, आखिरी बार जब उन्होंने एक पीले रंग के कीड़े को छुआ तो उन्हें फिर झटका लगा। आश्चर्य के साथ वे उस कीड़े को अपने नगर की विज्ञानशाला में ले गये। दूसरे वर्ष वैज्ञानिकों के अखबार में यह समाचार छपा कि टर्न नामक पीला कीड़ा मुँह से भोजन नहीं करता, वरन् अपनी आकर्षक विद्युत द्वारा दूसरे जीवित प्राणियों के शरीर में से बिना किसी प्रकार के जख्म किये खाद्य पदार्थ खींच लेता है। वह इतनी चीजें एक साथ खींच सकता है जो उसके लिये सत्रह दिन तक पर्याप्त होती हैं।

अभी पिछले साल अफ्रीका के द्वीप समूहों में एक माँसाहारी तितली पाई गई है। यह अपनी रुचि का शिकार चुनती है और उसके शरीर पर चुपके से जा बैठती है। क्षणभर में ही उसका शिकार मूर्छित हो जाता है, जब भर पेट रक्त पीकर वह उड़ जाती है तब प्रायः दो घण्टे बाद उस जीव को होश आता है और दूसरे दिन चलने फिरने लायक होता है।

खद्योत को रात के समय अपना प्रकाश चमकाते हुए सब लोगों ने देखा है। केंचुए मल रूप में अपने शरीर से ऐसी फास्फोरस मिली हुई शक्ति निकालते हैं जो बरसात के दिनों में रात को जलते अंगारों की तरह दीख पड़ती है। कुर्री कीड़े से लड़के अक्सर खेल करते हैं, उसके रास्ते के आसपास छोटे तिनके लोहे की सुइयाँ आदि बिछा देते हैं, कुर्री का शरीर इन सब चीजों को खींच खींच कर अपने ऊपर चिपकाता चलता है। कुछ ही देर में उसके शरीर से इतना बोझ उस पर लद जाता है। तब लड़के खूब हँसते हैं। तिनकों को खींच खींच कर लड़के छुड़ा देते हैं और फिर उसी प्रकार की पुनरावृत्ति करके कुर्री को गधा बनाते हैं।

प्रकाश, शब्द, ऋतु परिवर्तन आदि की जो सूक्ष्म लहरें बहती रहती हैं उन्हें छोटे कीड़े बड़ी आसानी से ग्रहण कर लेते हैं। सूँघ कर जितनी तेजी से वे अपनी रुचि के अनुकूल प्रतिकूल चीजों का पता लगा लेते हैं उतना आदमी नहीं कर सकता। कई कीड़ों में अद्भुत शक्ति होती है। खोपड़ा नामक काला मकोड़ा चार मन भारी पत्थर को इतना उठा लेता है जितने में हो कर वह निकल सके। दीमक एक दिन में इतना गड्ढा खोद लेती है जितना एक जवान मजदूर कुदाली लेकर नहीं खोद सकता।

शरीर की लम्बाई चौड़ाई और बोझा के आधार पर यदि मनुष्य और कीड़ों की शक्ति का हिसाब फैलाया जाय तो मालूम पड़ता है कि प्रकृति ने मनुष्य की अपेक्षा मकोड़ों को 300 से लेकर 7500 गुणी तक अधिक विद्युत शक्ति दी है।


Quotation

सुन्दर वही है जिसका हृदय सुन्दर है। जो आकृति से बहुत सुन्दर है जिसके शरीर का रंग और चेहरे की बनावट बहुत आकर्षक है परन्तु जिसके हृदय में दुर्गुण और दोष भरे हैं वह मनुष्य वास्तव में बड़ा गंदा और कुरूप है।

शत्रु से शत्रुता करना तो बैर को दूना बढ़ाना है। बैर दूर करने का उपाय तो प्रेम है।


दुख-दर्द के आत्मोद्गार

(अनुवादक : श्री भदन्त आनन्द कौसल्यायन)

(1)

मेरा नाम है दुख-दर्द। प्रायः लोग मुझसे घृणा करते हैं। मुझे निर्दयी समझते हैं, और समझते हैं हृदय-हीन। वे मुझे रिश्वत देकर तथा और भी जैसे तैसे हो, ठगने की कोशिश करते हैं। वे मुझे धोखा देना चाहते हैं। वे मुझे मार डालना चाहते हैं।

वे बेहोशी की दवाएँ खाते हैं वे पेटेंट दवाइयों से अपने पेट भरते हैं। वे डॉक्टर और उसकी विषैली दवाइयों का स्वागत करते हैं वे ज्योतिषियों तथा मन्त्र-जाप करने-कराने वालों की शरण जाते हैं।

वे ढोल-ढमाके बजवाते हैं। वे यज्ञ करते-कराते हैं वे देवों की क्रोधाग्नि को शान्त करने का प्रयत्न करते हैं। वे अनेक प्रकार की प्रार्थनाएँ तथा याचनाएँ करते हैं।

उन प्रार्थनाओं का उद्देश्य अपने अन्दर के रोग को दूर करना नहीं होता, अपनी सफाई करना नहीं होता। उसका उद्देश्य होता है उस दर्द को दूर करना जो उन्हें कष्ट देता है, उस मित्र की हत्या कर डालना जो उन्हें सचेत करता है।

(2)

हाँ, मैं दुःख हूँ, मैं दर्द हूँ। जिस दिन तुम मेरा रहस्य समझोगे उस दिन जानोगे कि मैं जब आता हूँ तब तुम्हें सहायता देने के लिये आता हूँ, सचेत करने के लिये तथा मार्ग दिखाने के लिये आता हूँ।

जब तुम मेरे प्रेम-पूर्ण स्वभाव को जानोगे, तब समझोगे कि मैं कैसे तुम्हें आरम्भ में जरा सा कष्ट देकर सचेत करता हूँ- इसी आशा से कि याद दिला दिये जाने पर तुम मेरी बात को सुनोगे और मानोगे।

मुझे पूर्ण निश्चय है कि जब तुम मुझे पहचानोगे तब तुम प्रसन्नता से मेरा स्वागत करोगे। मुझे अपना मित्र समझोगे और मुझसे मेरा सन्देश पूछोगे!

(3)

मेरा सन्देश क्या है? मेरे आगमन का कारण क्या है? मैं तुम्हें किस खतरे से सचेत करना चाहता हूँ? मैं तुम्हें कौनसा रहस्य सिखाना चाहता हूँ?- वह यह है-

जब तुम प्रकृति के अनुसार जीवन व्यतीत करोगे, जिसकी दया, जिसकी करुणा, जिसकी बुद्धि तथा जिसकी शुभेच्छा इसी बात में है कि हम जीयें और काम करें..................

जब तुम उन टेढ़े रास्तों से चलना छोड़ दोगे, जो तुम्हें अनेक कुटेवों की ओर ले जाते हैं, जब तुम अपने शरीर को मजबूत, साफ, पवित्र और फुर्तीला रखोगे .................

जब तुम इससे यथोचित काम लोगे; जब तुम इसे यथोचित हवा, भोजन और पानी दोगे, जिससे सभी अंगों की रचना हो, सभी क्रियायें ठीक ठीक हों................

जब तुम अपने मन और आत्मा को पवित्र और ऊँचे-ऊँचे विचारों से भर दोगे। जब तुम अपने दिल से भय, घृणा तथा ईर्ष्या को दूर भगा दोगे। जब तुम्हारा दिल मैत्री से भरा होगा.................

जब इन सब बातों को, जिन्हें मैंने तुम्हें बताया है, तुम समझोगे, उनके अनुसार चलोगे, तब मैं तुम्हें छोड़ कर चला जाऊँगा, तब दुःख दर्द की आवश्यकता न रहेगी।

(4)

यही वह सत्य सन्देश है जो मैं तुम्हारे दिये लाया हूँ। मैं तुम्हें जो कष्ट देता हूँ वह तुम्हें सचेत कर लेने के लिए देता हूँ। तुम्हें हानि पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हारा हित करने के लिए। मैं तुम्हें मार्ग दिखाने तथा शिक्षा देने के लिए आता हूँ।

मैं एक ‘दिव्य-दूत’ हूँ। तुम्हें सदाचार का रास्ता बताने के लिए, मनुष्यत्व की शिक्षा देने के लिये; लोगों के मन में पवित्र भावनाओं का संचार करने के लिए मैं आया हूँ।

मुझसे प्रेम करो। मुझ पर विश्वास करो। मेरे सन्देश को सुनो। मैं तुम्हें शान्ति और सुख दूँगा।

(जीवन सखा)


समुद्र के प्रेत

(कैप्टन जे.डी. क्रेग)

मैंने एक रूसी गोताखोर युवक से जो पिछले महायुद्ध के समय ब्रिटिश नौ-सेना में काम कर चुका था, प्रेतों के सम्बन्ध में कुछ विचित्र बातें सुनीं। ओडेसा के बारे में यह बहुत कुछ जानता था। उसने उस समय का जिक्र किया जब रूस में क्रान्ति हुई थी और सारे रूस में आतंक फैल रहा था। हजारों व्यक्ति तलवार के घाट उतारे जा रहे थे। रूस में केरेन्स्की की सरकार का खात्मा हो चुका था। ओडेसा नगर में परस्पर विरोधी दलों के बीच झगड़ा था, लोगों में उत्तेजना फैल रही थी। लोग आविष्कार के लिये एक दूसरे की हत्या कर रहे थे।

इसी जमाने में जर्मनी व इंग्लैंड की विराम संधि हो जाने पर एक ब्रिटिश विध्वंसक जहाज काला सागर में गया और उसने ओडेसा की खाड़ी में लंगर डाला। जहाज का एक लंगर खो गया और उसका पता लगाने के लिए एक गोताखोर समुद्र के नीचे उतरा। लेकिन तह तक पहुँचने के पूर्व ही वह बाहर निकाले जाने के लिये संकेत देने लगा। उसे फौरन पानी के बाहर निकाल कर जहाज पर लाया गया। लेकिन कुछ बताने से पूर्व ही वह बेहोश हो गया। उसके चेहरे को देखने से यह प्रतीत होता था कि जैसे वह कोई भयानक चीज देख कर अत्यधिक आतंकित हो उठा हो। इधर लंगर का पता लगाना भी जरूरी था। इसलिए जहाज के कप्तान ने गोता लगाने के लिए आदेश किया। एक अफसर इसके लिये तैयार हुआ। उसे जहाज से पानी में उतार दिया गया।

वह अफसर पानी के भीतर लंगर की तलाश में व्यस्त हो रहा था कि इसी बीच में एकाएक उसे जीवन को खतरे में डाल देने वाली बात दिखाई दी।

उसने देखा कि आदमियों की एक कतार उसकी तरफ बढ़ रही है- उसे जान पड़ा कि मुर्दों का झुण्ड उससे मिलने के लिए आ रहा है। उसमें से कुछ मुर्दों के शरीर पर फटी हुई फौजी पोशाक थी व कुछ नागरिकों के से वस्त्र पहने थे। उनकी आँखें मछली की आँखों की भाँति चमक रहीं थीं और उनके मुख खुले हुए थे। कुछ के चेहरे पर मौन हंसी झलक रही थी ध्यानपूर्वक देखने से ऐसा जान पड़ता था कि वे अब शोर मचाने वाले ही हैं। वे धीरे-धीरे आगे की तरफ बढ़ रहे थे।

एक दृश्य देखकर मारे भय के उस अफसर का रक्त जम रहा था। इसी बीच में एक और भी बात हुई जिससे यह जान पड़ा कि उसका कलेजा बाहर निकल आवेगा। वे भयानक जीव एकाएक रुक गये, शरीर के चिथड़ों से उसकी नग्न बांहें और ऊपर उठ गई उन्होंने अपने हाथ बढ़ाये- उनके हंसते हुए चेहरों को देखकर ऐसा जान पड़ा कि जैसे वे उस अफसर का स्वागत कर रहे हैं। वे बहुत ही मोटे देख पड़ते थे। उनके शरीर का रंग चितकबरा और मन में घृणा उत्पन्न करने वाला था। उनमें से कई एक डाड़ी रखे हुए थे, लेकिन अन्य बिना डाड़ी के भी थे और वे अपने हाथ फैलाए हुए उसकी ओर बढ़ रहे थे।

इधर ऊपर जहाज के लोगों को मालूम हुआ कि जिस रस्से से वह अफसर पानी के अन्दर लटकाया गया है, वह हिल रहा है। इस लिये उन्हें लोगों ने फौरन उसे पानी से बाहर निकाल लिया जहाज पर आ जाने के बाद उस अफसर के मुँह से नकाब हटाया गया तो लोगों ने देखा वह बेहोश है। डाक्टरों ने उपचार शुरू किया। होश में आने पर उसने उनसे सारा किस्सा सुनाया।

उस ब्रिटिश माझी ने जो कुछ बताया था उससे मेरी यह निश्चित धारणा थी कि इस पहेली को हल किया जा सकता है। आखिरकार अमेरिका के एक वैज्ञानिक डॉक्टर ने इस रहस्य का उद्घाटन किया कुछ समय हुआ उस डॉक्टर के साथ परस्पर बात करने का अवसर मुझे मिला था। उस डॉक्टर ने कहा- ‘मैं महायुद्ध के समय उड़ीसा के एक अस्पताल में ही था। मेरे स्टाफ का एक रूसी डॉक्टर, जिसका नाम सोकोराव था आतंकवादियों द्वारा पकड़ लिया गया। उसकी तलाश करने में वोलशेविकों ने सहायता पहुँचाई। हमें पता चला कि उस डॉक्टर की आतंकवादियों ने हत्या कर डाली और उसकी लाश को उड़ीसा की खाड़ी में फेंक दिया है। हमने उसकी लाश का पता लगाने वाले को इनाम की घोषणा की। गोताखोर लाग उड़ीसा की खाड़ी के नीचे उतरे लेकिन उनमें से कुछ तो पागल होकर निकले और दो एक मर भी गये। उसके बाद यहाँ पर एक ब्रिटिश विध्वंसक जहाज गया। जहाज का लंगर खो गया था, जिसका पता लगाने के लिए एक ब्रिटिश अफसर पानी में उतरा उसे लंगर का तो पता नहीं मिला, लेकिन उसने एक भयानक दृश्य अवश्य ही देखा, जिसका उस पर बहुत बुरा असर पड़ा। उसने वहाँ का सारा हाल बताया कि इस समुद्र के नीचे मुर्दे सैनिकों की कतार चल फिर रही हैं। उसके साथियों ने समझा कि यह पागल हो गया है।’

आगे डॉक्टर ने कहना जारी रखा- ‘वोलशेविकों ने उड़ीसा में पहुँचने से पूर्व ही आतंकवादियों ने कई दर्जन के दर्जन व्यक्तियों को, बदला लेने की गरज से, जेलों में ठूँस दिया गया कैदियों से जेल भर उठे। कैदियों के पैरों में लोहे ही जंजीरें डाल दी गई थीं, ताकि वे भाग न सकें वोलशेविक सेनाओं के पहुँचने पर आतंकवादियों के पाँव उखड़ गये। लेकिन भागने से पहले उन्होंने बहुत से कैदियों को गोली से उड़ा दिया, क्योंकि उन्हें भय था कि कहीं वे लोग आक्रमणकारियों से मिल न जायं। बाद में उनकी लाशों को उन आतंकवादियों ने उस खाड़ी में फेंक दिया। उन्हीं लाशों को पानी के अन्दर गोताखोरों ने देखा था। और अब उन लाशों ने किसी कारण विशेष से जीवितों की सी हरकतें करना शुरू कर दिया है।’

-संकलित


ध्यान के समय

(अनु. श्री सुदर्शनसिंह ‘चक्र’ मेरठ)

ऐसा समय आता है जब मनुष्य संसार को भूल कर ऐसे शान्तिमय प्रदेशों में पहुँचता है, जहाँ आत्मा स्वरूप स्थित रहती है, परमात्मा के सन्निकट रहती है।

तब अन्तःकरण की समस्त वासनायें विलीन हो जाती हैं, इंद्रियों की चेष्टायें शान्त हो जाती हैं, केवल ईश्वर रहता है।

एक शुद्ध मन जो परमात्मा में स्थित है, उससे पवित्र कोई मन्दिर नहीं है। उस पवित्र देश में, जिस में परमात्मा में स्थिर हुआ मन प्रवेश करता है, दूसरा कोई पवित्र स्थान नहीं है। परमात्मा में उठते हुए विचार की माप नहीं की जा सकती। पवित्रता, शान्ति, आनन्द, इन्हीं से ध्यान की अवस्था प्राप्त होती है। इसी एकान्त और पवित्र समय में धार्मिक विचारों का उदय होता है। आत्मा का उद्गम स्थान के अत्यन्त समीप रहती है। इसी व्यक्तित्व का स्रोत विकसित होकर एक महान् शीघ्रगामी नद का स्वरूप धारण कर, उस सत्य सनातन कैवल्य पद की ओर प्रवाहित होता है जो परमात्मा का समुद्रवत् चित्त है। वह केवल एक है।

ध्यान के समय जीवात्मा महान् (परमात्मा) से उन दैवी गुणों को आकर्षित करती है, जो उसके स्वाभाविक हैं। जैसे निर्भयता, सत्यता, अमरत्व, आदि।

ओ आत्मन्! अपने अन्दर उनको आकर्षित कर!

सत्य के साथ उस शान्त समय को ढूँढ़!!

अपने को सत्य का तत्व तथा ईश्वर रहता है!!


एडिसन और गाँधी

(ले. श्री काका कालेलकर)

ग्रामोफोन की वजह से एडिसन का नाम सारी दुनिया में मशहूर हो गया है। रेल की मुसाफिरी करने वाले लोग जानते हैं कि हर एक डब्बे की छत के किनारे एक धोखे की जंजीर होती है, जिसे खींचते ही रेल गाड़ी रुक जाती है और गार्ड दौड़ कर आता है और दरियाफ्त करता है कि ‘किसने जंजीर खींची?’ गाड़ी क्यों रोकी गई? जंजीर खींच कर गाड़ी रोकने की तरकीब भी उसी अमेरिकन महानुभाव के उर्वरा दिमाग की उपज है, जिसका नाम एडिसन था।

एडिसन ने जब यह आविष्कार किया, तब वह लक्षाधीश नहीं हुआ था। अपनी गरीबी लिबास पहन कर वह एक रेलवे कम्पनी के डायरेक्टर के पास गया और उससे कहने लगा, ‘मैंने हवा के दबाव से गाड़ी के पहिये रखने की एक तरकीब का आविष्कार किया है। अगर आप खरीदना चाहें, तो मैं अपना आविष्कार आपको बेचने के लिए तैयार हूँ।’

उसके पहले ‘वैक्यूम ब्रेक’ का दुनिया में किसी को पता नहीं था। रेलवे कम्पनी के डायरेक्टर कुछ अश्रद्धा से बोल उठे, “अजी, क्या आपका यह मतलब है कि मैं इस बात पर विश्वास करूं कि बीस या तीस डब्बे लेकर चालीस मील के प्रचण्ड वेग से दौड़ाने वाली रेल गाड़ी आप केवल हवा की मदद से रोक सकते हैं?” ऐडिसन ने नम्रता से किन्तु दृढ़ता से कहा, “जी, हाँ”

अब डायरेक्टर साहब अधिक धैर्य नहीं रख सके। हाथ में टोपी लेकर वे अपने आसन से उठ खड़े हुए। उन्होंने तिरस्कार से एडिसन को नख-शिखान्त देखा और कहने लगे, “प्रचण्ड वेग वाली ट्रेन को सिर्फ हवा से रोकने की आप बातें करते हैं और उम्मीद करते हैं कि मैं आपकी बात पर विश्वास करूं? आप यहाँ से तशरीफ ले जाइये। पागलों के साथ बातें करने को मुझे फुरसत नहीं है।”

एडिसन चुपचाप वहाँ से चला गया। उसने बड़े विज्ञानाचार्यों को अपने आविष्कार का स्वरूप समझाया। उन्होंने सरकार द्वारा एक कानून बनवाया कि हजारों लोगों की जाने जिस साधन से बच सकती हैं, उस तरकीब को हर एक ट्रेन में बाकायदा स्थान देना चाहिये। जिस ट्रेन में वैक्यूम ब्रेक न हो, वह ट्रेन अमेरिका में कहीं भी नहीं चल सकती।

एडिसन ने अपना ‘पेटण्ट’ तो ले ही रखा था। अमेरिका में रेलवे कम्पनियाँ बहुत हैं। हर एक कम्पनी के डाइरेक्टर ने एडिसन के पास जाकर स्वामित्व (रायल्टी) का दाम देकर अपनी अपनी ट्रेनों में वैक्यूम ब्रेक्स लगवा लिये। अब हमारे पूर्वोक्त डायरेक्टर महाशय की बारी आई। अगर वे वैक्यूम ब्रेक्स नहीं लगवाते, तो कानून के अनुसार उनकी ट्रेनें चल ही नहीं सकती थी और उनकी कम्पनी का दिवाला निकल जाता। वे एडिसन के पास गये और कहने लगे कि मैं भी आपको आपकी रायल्टी देकर आपका वैक्यूम ब्रेक लगवाना चाहता हूँ।

एडिसन को करारा और तीक्ष्ण विनोद सूझा। उन्होंने हाथ में अपनी टोपी ले ली, आसन से उठ कर खड़े हुए और जवाब दिया, “ पागलों के साथ बातचीत करने के लिए मुझे अवकाश कहाँ है?”

जब गान्धी जी कहते हैं कि प्रचण्ड टैंक, किलों के जैसे जंगी जहाज, आकाश से गिरने वाले बम और वायुयान आदि आसुरी और राक्षसी करतब बताने वाले यूरोप के बड़े अहिरावणों, महिरावणों का मुकाबला हम केवल अहिंसा से करेंगे, तब चर्म- चक्षु से देखने वाली दुनिया का धैर्य टूट जाता है। वह मन में कहती है, ‘इस उदात्त पागल की बात पर विश्वास भी कैसे किया जाय? कहाँ हिटलर, चर्चिल, स्टैलिन, मुसोलनी और रुजवेल्ट की तैयारी, कहाँ जापान और चीन की तैयारी और कहाँ इस अहिंसावादी महात्मा की सत्याग्रह की बात।

एडिसन को किसी अनजान डाइरेक्टर ने ‘तशरीफ ले जाने’ को कहा। यहाँ महात्मा जी का अनादर उस ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से हो रहा है, जिसे वे आज करीब पचास वर्ष से नेकी और इन्साफ का रास्ता बताते आये हैं। और देव की लीला भी कैसी है कि गाँधी जी को इस काँग्रेस ने भी मुक्त किया था, जिसकी सेवा गाँधी ने अनन्य निष्ठा से आज पच्चीस बरस से लगातार की है। एडिसन चला गया, लेकिन उसे फिर बुलाना पड़ा। जैसे वैक्यूम ब्रेक आज दुनिया में सार्वभौम हो गया है, उसी तरह गाँधी जी का अहिंसक सत्याग्रह भी विश्व विजयी होने वाला है, क्योंकि वही एकमात्र विश्व-कल्याणकारी तत्व है।

-सर्वोदय


साधना के विघ्न

(ले. श्री रामदयाल गुप्त, नौगढ़)

संसार में अनेक प्रकार की लौकिक परलौकिक साधनाएं हैं। किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने तक की जो मंजिल है वह साधना कहलाती है। इस साधना में यदि कुछ विघ्न उपस्थित होते हैं तो उद्देश्य भ्रष्ट हो जाता है और सफलता नहीं मिलती। आप यदि किसी महत्वपूर्ण कार्य में लगे हुए हैं और उसमें सफलता प्राप्त करने की हार्दिक कामना करते हैं तो आपको उन विघ्न बाधाओं से बचाव करना होगा जो मार्ग को कंटकाकीर्ण बना देती है। विद्याध्ययन, अन्वेषण, कोई महान कार्य पूरा करना, दैवी साधना, ईश्वर प्राप्ति आदि किसी लक्ष को आपने स्थिर किया है तो साधना के विघ्नों से भी परिचित होना जरूरी है। नीचे उन विघ्नों का कुछ विवरण किया जाता है।

(1) स्वास्थ्य का अभाव- खराब स्वास्थ्य होने पर कोई कार्य अच्छी तरह नहीं हो सकता। रोग पीड़ित और निर्बल शरीर मनुष्य जीवन धारण किये रहने का कार्य भी कठिनाई से कर पाता है। भला वह अन्य साधनाएं किस प्रकार करेगा? साधन के लिये स्वस्थ रहने की आवश्यकता है। सोने, काम करने, खाने, पीने आदि का ऐसा नियम रखना चाहिये जिससे स्वास्थ्य बिगड़ने न पावे। प्रकृति सेवन, नियमित व्यायाम तथा आसनों से स्वास्थ्य को बड़ा लाभ पहुँचता है।

(2) खान पान में असंयम- आहार की अशुद्धि तथा असंयम से शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। अन्न के अनुसार ही मन बनता है। तामसी और अनियमितता पूर्वक किया हुआ भोजन चित्त में चंचलता और दुष्ट विचार उत्पन्न करता है पल स्वरूप बुद्धि भ्रष्ट होने लगती है और कुछ करते धरते नहीं बन पड़ता। तीक्ष्ण मसालों वाला, गरम रूखा, आहार, बासी, सड़ा हुआ जूठा अपवित्र, गरिष्ठ और अनीति के साथ लिया हुआ भोजन तामसी है। इससे बचना चाहिये। मादक द्रव्यों से दूर रहना चाहिये। जहां तक हो सके सादा, सात्विक, रसीला और पौष्टिक भोजन भूख से कुछ कम मात्रा में ही करना चाहिये।

(3) सन्देह- सफलता उतनी सरल नहीं है जितनी लोग समझते हैं। जब साधारण काम काजों में कामयाबी मुश्किल से होती है तो महान कार्यों में तो और भी अधिक कठिनाई आती है। कभी कभी तो इतनी अधिक बढ़ जाती है कि उनका रूप असफलता जैसा प्रतीत होता है। इन सारे विघ्नों को दूर करने वाली यदि कोई चीज है तो वह अटूट श्रद्धा और दृढ़ विश्वास ही है। किसी भी काम को करते समय यदि मन में संदेह उठते रहें सफलता के बारे में यदि बार-बार आशंकाओं से मन भरा रहे तो अविश्वास बढ़ता जायेगा और तदनुसार कार्य करने की क्षमता नष्ट होती जायगी अल्प शक्ति से कठिन कार्य पूरे नहीं हो सकते। इस प्रकार संदेह का निश्चित फल असफलता होती है। जिस काम को करना है पूरी तरह और काफी समय लगा कर सोच विचार लो। किन्तु जब आरम्भ कर दो तो सारे संदेहों को उठा कर ताक में रख दो और मशीन की तरह कान में जुट जाओ। तभी वह पूरा हो सकेगा।

(4) सद्गुरु का अभाव- हर विषय का संपूर्ण ज्ञान मनुष्य अपने पेट में से ही नहीं प्राप्त कर सकता। उसे उस विषय के बारे में अधिक जानकारी हासिल करनी होती है यों तो हर विषय अनेकों प्रकार से बताने वाले अनेक पुरुष हैं पर उनके पथ प्रदर्शन से खतरा है। क्योंकि जिसने खुद रास्ता नहीं देखा वह दूसरों को क्या बतायेगा। अनुभवी निस्स्वार्थ और उदार शिक्षक को चुनना कठिन है पर जो इस कार्य में सफल हो गया वह अपने उद्देश्य में भी सफल हो गया। कई व्यक्ति इधर उधर से कुछ जान कर उसी के आधार पर अपना कार्य प्रारम्भ करते हैं, वे कठिन प्रसंग आने पर गड़बड़ा जाते हैं और अपने को खतरे में डाल लेते हैं इसलिये उचित है कि सत्=सच्चे, गुरु=शिक्षक। सच्चे शिक्षक को तलाश किया जाय। यदि वह आसानी से न मिल सकता हो तो उतावली में अल्पज्ञ व्यक्तियों को अपने मार्गदर्शक मत बनाओ। नहीं पुरुषों की लेखनी का सत्संग करो और उन्हें अपना शिक्षक बनाओ जो बहुत दूर हैं या गुजर चुके किन्तु जिन की असर वाणी पुस्तकों द्वारा तुम्हें आसानी से प्राप्त होती है।

(5) नियमानुवर्तिता का अभाव- नियत समय पर सोना, उठना, बैठना, खाना, पीना आदि मन को एकाग्र करने में बड़े सहायक होते हैं। जो काम आप को करना है उसे नियम पूर्वक करो। प्रति दिन थोड़ा सा समय भी यदि नियम पूर्वक लगाया जाय तो कुछ ही दिनों में बहुत काम हो जाता है। किन्तु यदि एक दिन बहुत किया और दूसरे दिन बिल्कुल नहीं तो कुछ विशेष लाभ न होगा, एक दिन का अभ्यास दूसरे दिन भूल जाओगे। इसलिये दैनिक जीवन निर्वाह के कार्य तथा अपने विशेष प्रोग्राम के लिये समय नियत करलो और अनिवार्य कारण के बिना उसे किसी प्रकार मत छोड़ो।

(6) प्रसिद्धि- यश बड़ी सुन्दर वस्तु है। उसे हर कोई चाहता है। किन्तु कुछ लोग यश को मुख्य और काम को गौण बना लेते हैं फल स्वरूप उनके सारे काम यश के लिये होते है। वे वही काम करेंगे जिसमें तारीफ सुनने को मिले। यह इच्छा बढ़ते बढ़ते इतनी बढ़ जाती है कि वह दम्भ करने पर उतर आता है। इससे वास्तविक लाभ कुछ नहीं होता। दम्भ खुल जाने पर उल्टी अपकीर्ति होती है। इसलिये प्रसिद्ध की ओर से अपना मन बिलकुल हटा कर ठोस कार्य करने पर जुट जाना चाहिये। यश तो महान कार्यों की छाया है जो सदा साथ रहता है। छाया के पीछे दौड़ने से वह दूर हटती जायगी किन्तु उसकी ओर से मुँह मोड़ लोगे तो पीछे फिरेगी। प्रसिद्धि की ओर से मुँह मोड़ कर एकान्त वनों में रहते हुए जिन ऋषियों ने लोक कल्याण के अनेक कार्य किये थे उनकी कीर्ति लाखों वर्षों से अब तक अमर है। किन्तु झूठे विज्ञापन बाजों की ओर तो लोग आंखें उठाकर भी नहीं देखते। सच्चे हृदय ठोस काम करिये प्रसिद्ध की इच्छा मत कीजिये। वह तो अपने आप ही मिलने वाली है।

(7) कुतर्क- अपने को बुद्धिमान समझने वाले लोग बात बात में बहस और तर्कों से काम लेते हैं। उनके तर्क इतने बढ़ जाते हैं कि बिना बहस के कदम भी नहीं रखना चाहते। तर्क यद्यपि अच्छी चीज है उससे भले बुरे की पहचान करने में बहुत मदद मिलती है फिर भी उसकी जड़ में श्रद्धा का होना आवश्यक है। तर्क के लिये किया जाने वाला तर्क यथार्थ में कुतर्क है। इन कुतर्कों का समाधान किसी भी तरह नहीं हो सकता यदि भोजन, शयन के काम में आने वाली वस्तुओं के बारे में तर्क उठाया जाय तो उन्हें काम में नहीं लाया जा सकता। हमारी रीति रिवाजें, सामाजिक नियम, धर्म व्यवस्था, ईश्वर के आस्तित्व इनमें से किसी को तर्क स्वीकार नहीं कर सकता। फिर तर्क के ऊपर तर्क है। एक तर्क के इतने बच्चे हो सकते हैं कि उन्हें देख कर किंकर्तव्य विमूढ़ होना पड़ेगा। अन्त में श्रद्धा के अवलम्ब से ही शान्ति मिलेगी। इसलिये कुतर्कों को त्यागो अपनी आत्मा की आवाज सुनो सद्बुद्धि से उस पर विजय प्राप्त करो।

(क्रमशः)


निराश पथिक से:- (कविता)

(श्री शिवनारायण गौड़, लश्कर)

कितने क्षण रो रोकर बीते, अति क्षीण हुई तेरी काया।

ऐ पथिक, निराशा का यह घन, कैसे तेरे ऊपर छाया॥

जग का पथ इतना कठिन नहीं, जितना तूने पहचाना है।

यह सुख दुख सारा भ्रम मय है नश्वर है आना−जाना है॥

बेशक मंजिल है दूर अभी, फिर भी चल तू पग आगे धर।

> नैराश्य निशा को चीर उषा, आशा की किरण निहारा कर॥

अज, अक्षय, अभेद्य अविचल ओ, कभी नहीं मरने वाले!

कब है इतनी हस्ती जग की, जो तुझ को संकट में डाले!!

अपनी नौका दे खोल सुदृढ़ हाथों में ले पतवार सखे!

मन के जीते है जीत और है मन के हारे हार सखे!!


तू कौन कहाँ से आया? (कविता)

(श्री गिरजा देवी 'निर्लिप्त' लखनऊ)

तेरी पावन स्मृति में, कितने आँसू बिखराए।

भर-भर के दृग सीपों में, नित मुक्त हार लुटाए॥

गत जीवन की स्मृतियाँ, चंचल समीर बन आतीं।

उर के प्रशाँत सागर में, मृदु कम्पन सा कर जातीं॥

उत्ताल तरंगावलियाँ, उठ-उठ विलीन हो जातीं।

ये किस निराश जीवन के , सूने पन को बतलातीं॥

नभ में जब सजल घटायें, घनघोर उमड़ छा जाती है।

मेरी यह प्यासी अखियाँ, आँसू की झड़ी लगातीं॥

आकर के मानस पट पर, चुपके से कोई छाया।

अपना अधिकार जताती, बन प्रबल मोहनी माया॥

पूछा कब मैंने तुझसे, कब पता तुम्हारा पाया।

मैं भेद समझ कब पाई, तू कौन कहाँ से आया।


प्रतिबोध (कविता)

(श्री हरिशंकरलाल शास्त्री “कामारि”)

कौन रे! मुझको बनाया, विकल जग का अधम प्राणी।

मौन, एकाकी हृदय को, फिर सुनाई बिरह-वाणी॥

मैं नहीं सोया, जगा था, सिर्फ तन्द्रा थी दृगों पर।

विश्व हलचल से जुदा था, आह! अपना ‘अहम्’ खोकर॥

शान्त-जीवन का बना क्या? एक उपक्रम था मनोहर।

दिग्वधू के मलय संचित, प्रेम में, आबद्ध होकर॥

स्वर्ण रक्तिम, पड़ चुकी थी, रेख, अवनी, में पता था।

विहँग, कलरव से निनादित, हो चुका बन, जानता था॥

इसलिये रे अधम! हठकर, फिर न अपना राग रोना।

मैं न बे सुध, बे खबर हूँ, देखना, मत आप सोना॥


दानी से (कविता)

(मास्टर उमादत्त सारस्वत कविरत्न, बिसवाँ)

क्या अद्भुत दान कहानी है!

तू दानी है! तू दानी है!!

शुचि तरुवों को फल-दान किया;

अग-जलनिधि को जल-दान किया;

जग को विवेक-बल दान किया;

क्या छोड़ा जब थल दान किया?

क्या भंग दान की छानी है! तू दानी है! तू दानी है!!

शशि को प्रकाश का दान किया;

रवि को प्रदीप्त दे, मान दिया;

कोयल को अनुपम तान दिया;

नदियों को ‘कल-कल’ गान दिया;

तू दानीवर लासानी है! तू दानी है! तू दानी है!!

जननी को पालन-शक्ति दिया;

जो मिटे न वह अनुरक्ति दिया;

भक्तों को तूने भक्ति दिया;

योगी को योग विरक्ति दिया;

तुझ से ही राजा-रानी है! तू दानी है! तू दानी है!!

***


साधकों का पृष्ठ

(1)

“मैं क्या हूँ” पुस्तक प्राप्त हुई। इसे पढ़कर मुझे एक नई ज्योति प्राप्त हो रही है। ऐसी अद्भुत किताब अभी तक मेरे देखने में नहीं आई। शीघ्र ही उसके अनुसार अभ्यास आरम्भ करूंगा।

-विशम्भरदयाल अग्रवाल, बरेली।

(2)

आज से दो माह पूर्व “मैं क्या हूँ” पुस्तक प्राप्त हुई थी। उसे मैं कई बार पढ़ चुका हूँ। हर बार उसमें मुझे एक नवीन सामग्री ही मिलती है। पुस्तक के बताये हुए अभ्यास करते हुए मुझे एक मास व्यतीत हो चुका है। इस अवधि में मुझे बहुत कुछ प्राप्त हो गया। पहले किसी कार्य के करने में मन न लगता था परन्तु अब काफी उत्साह प्राप्त होता है मनोबल में भी उन्नति हुई है।

-विद्याधर कन्ट्रैक्टर, बल्हमपुर।

(3)

‘शक्ति आकर्षण’ क्रिया करने से मुझमें एक दिव्य शक्ति का आविर्भाव हुआ है। इस बीच में मेरे जीवन पर ऐसी घटनाएं घटित हुई हैं जो ईश्वरीय नहीं तो अलौकिक अवश्य कही जा सकती हैं। मैं तब और अब के जीवन का परीक्षण कर उसमें हुए परिवर्तन देख कर कभी-कभी आश्चर्य में गिर जाता हूँ। इस साधन के सहारे मैं वास्तव में ‘मैं’ कहाने योग्य होता जा रहा हूँ।

-श्री कान्त शास्त्री, नारायणपुर।

(4)

आपने सूर्य शक्ति द्वारा चिकित्सा करने की विधियाँ बताई थीं उस समय भीतर ही भीतर मैं अविश्वास सा कर रहा था कि जब इतनी कीमती दवाइयां बीमारियों को दूर नहीं कर सकतीं, तब रंगीन काँचों द्वारा किये हुए कुछ उपचार भला क्या फायदा कर सकेंगे? मैंने डरते डरते मरीजों पर उपचार आरम्भ किया था। और अब मैं बहुत आगे बढ़ गया हूँ। मैं पूर्ण विश्वास के साथ अनुभव करता हूँ कि सूर्य चिकित्सा से बढ़कर दूसरा कोई इलाज नहीं हो सकता। गत तीन मास में सैंकड़ों रोगियों पर हाथ डाल चुका हूँ उनमें से कम से कम अस्सी फी सैंकड़ा अच्छे हुए हैं।

-मधुसूदन डागा, सहसवान्।

(5)

प्राण चिकित्सा विधि से इलाज आरम्भ करने पर मेरी ख्याति बहुत बढ़ गई है। बीस-बीस कोस के बीमार बैल गाड़ियों में बैठ कर आते हैं। उन्हें लाभ भी आशातीत होता है। लोग अपने आप कुछ ऐसी धारणा गढ़ लेते हैं कि मुझे कोई देवता सिद्ध हो गया है। आपके आदेशानुसार मैं इस भ्रम का जोरदार शब्दों में खण्डन कर प्राण शक्ति का वैज्ञानिक महत्व बराबर समझता रहता हूँ। इस मास एक सौ बाईस पीड़ितों को अच्छा किया है।

-नन्दलाल शाह, ब्रह्मपुरी।

(6)

आपने पत्रों द्वारा सूर्य चिकित्सा और प्राण चिकित्सा की कुछ विधियाँ बताई हैं। इन थोड़ी सी बातों में मुझे संतोष नहीं होता। अधूरा ज्ञान व्यर्थ है। आप दो महीने से बराबर यही लिखते हैं पुस्तकें अब छपीं, तब छपीं। आप जैसे व्यक्ति भी अपने वायदे को पूरा न करें तो कितने दुख की बात है। यदि आप दिवाली तक भी पुस्तकें न छपवा सकें तो मैं 30 रु. खर्च करके आगरा आऊंगा और आपसे खुद ही सीखूँगा।

-रघुनाथ रेड्डी, नलगोंडा।

(7)

आपने तीन मास प्रयत्न करके मुझे मौत के मुँह में से निकाल लिया। अब सिर्फ कमजोरी बाकी है डाक्टरों ने तपेदिक और संग्रहणी को तीसरे दर्जे की बताकर जब मर जाने का फतवा दे दिया था तब कौन जानता था मुझे अभी और जीना है। अब मैं बच गया हूँ।

-जगदम्बा दत्त, मिदनापुर।


VigyapanSuchana

नोट:- ‘मैं क्या हूँ’ पुस्तक तैयार है। ‘सूर्य चिकित्सा विज्ञान’ और ‘प्राण चिकित्सा विज्ञान’ दिवाली तक छप जायेंगी, हर एक का मूल्य 1=) है।

मैनेजर- अखण्ड ज्योति, फ्रीगंज, आगरा।


क्षण-भंगुर जीवन


क्षण भंगुर जीवन (कविता)

(लेखक- श्री यदुवंशलाल ‘चन्द्र’ तिलाठी)

क्षण-भंगुर जीवन है मेरा, क्षण-भंगुर संसार, सखे!

माया के मोहक मन्दिर का मिला न कुछ आधार, सखे!!

धूल उड़ाते आया था जब शूर सिकन्दर यूनानी।

झुक एशिया चला तब करने सादर उसकी अगवानी॥

अन्त समय में उसी सिकन्दर की न चली कुछ एक कला।

खुले हाथ जाते देखा- वह लिये साथ क्या गया भला॥

इस क्षण-भंगुरता का कुछ भी नहीं यहाँ अभिसार, सखे!

क्षण-भंगुर जीवन है मेरा- क्षण भंगुर संसार, सखे!!

तरु-पत्रों में आँख-मिचौनी खेल रहा था शशि सुकुमार।

शत-शत कर से शरत निशा में गूँथे पिन्हाये कितने हार।

नष्ट हुई उसकी उजियाली द्रुत-गति से वह भाग चला।

कहाँ समेट गया क्या जानें अपनी बिखरी कलित कला॥

उदय हुआ है जिसका जग में, उसका होगा अस्त, सखे!

क्षण-भंगुर जीवन है मेरा- क्षण भंगुर संसार सखे!!

कलियों में आयी मादकता, सह न सकीं वे यौवन-भार।

आलिंगन करता था अलि झुक, पीता था मधु पंख पसार॥

कल तक तो इस उपवन में होता था मधुपों का गुञ्जार।

मौल गई ये कलियाँ सारी, चले मोड़ मुख मधुप-कुमार॥

खिले हुए फूलों को देखा, मुरझाते भी यहाँ, सखे!

क्षण-भंगुर जीवन है मेरा- क्षण भंगुर संसार, सखे!!

मत इठला, रे मानव! यौवन में, यौवन जग का अभिशाप।

जिसमें तुम सुख खोज रहे हो, उसमें दुख-दारुण संताप॥

लुट जाएगा वैभव तेरा, मिट जाएगा सुन्दर रूप।

इसी रूप में तुम्हें बनाया, इसी रूप ने किया कुरूप॥

दो दिन का यह वैभव तेरा क्यों करती अभिमान, सखे!

क्षण-भंगुर जीवन है मेरा- क्षण-भंगुर संसार, सखे!!

*समाप्त*


प्रार्थना किसे कहते हैं?

(महात्मा गाँधी)

एक डाक्टरी डिग्री प्राप्त किये हुए महाशय मुझसे प्रश्न करते हैं:-

“प्रार्थना का सबसे उत्तम प्रकार क्या हो सकता है ? उसमें कितना समय लगाना चाहिये? मेरी राय में तो न्याय करना ही उत्तम प्रकार की प्रार्थना है और जो मनुष्य सबके साथ न्याय करने के लिये सच्चे दिल से तैयार होता है उसे दूसरी प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। कुछ लोग तो संध्या करने में बहुत सा समय लगा देते हैं परन्तु बहुत से मनुष्य तो उस समय जो कुछ बोलते हैं उसका अर्थ भी नहीं समझते। मेरी राय में तो मातृभाषा से ही प्रार्थना करनी चाहिये। उसका ही आत्मा पर असर पड़ सकता है। मैं तो यह भी कहता हूँ कि सच्ची प्रार्थना यदि एक मिनट के लिये भी की गई हो तो वह भी काफी होगी। ईश्वर को पाप न करने का अभिवचन देना ही काफी है।”

प्रार्थना के माने हैं धर्म भावना और आदर पूर्वक ईश्वर से कुछ माँगना। परन्तु किसी भक्ति-युक्त भाव को व्यक्त करने के लिये भी शब्द का प्रयोग किया जाता है। लेखक के मन में जो बात है उसके लिये भक्ति शब्द का प्रयोग करना ही अधिक अच्छा है। परन्तु इसकी व्याख्या का विचार छोड़कर हम इसी का ही विचार करें कि करोड़ों हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी और दूसरे लोग रोजाना अपने स्रष्टा की भक्ति करने के लिये निश्चित किये हुए समय में क्या करते हैं। मुझे तो यह मालूम होता है कि वह स्रष्टा के साथ एक होने की, हृदय की उत्कट इच्छा का प्रकट करना है और उसके आशीर्वाद के लिये याचना करना है। इसमें मन की वृत्ति और भावों का ही महत्त्व होता है शब्दों का नहीं। अक्सर पुराने जमाने से जो शब्द रचना चली आती है उसका भी असर होता है। जो मातृ भाषा में उसका अनुवाद करने पर सर्वथा नष्ट हो जाता है गुजराती में गायत्री का अनुवाद कर उसका पाठ करने पर उसका वह असर न होगा जो असल गायत्री में होता है। ‘राम’ शब्द के उच्चार से लाखों करोड़ों हिन्दुओं पर फौरन असर होगा और ‘गौड’ शब्द का अर्थ समझने पर भी उसका कोई असर न होगा। चिरकाल के प्रयोग से और उनके उपयोग के साथ संयोजक पवित्रता में शब्दों को शक्ति प्राप्त होती है। इसलिये एक से अधिक प्रचलित मंत्र और श्लोकों को संस्कृत भाषा में रखने के लिये बहुत सी दलीलें की जा सकती हैं। परन्तु उनका अर्थ अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। ऐसी भक्ति युक्त क्रियायें किस समय करनी चाहियें इसका कोई निश्चित नियम नहीं हो सकता है। इसका आधार जुदी जुदी व्यक्तियों के स्वभाव पर होता है। मनुष्य के जीवन में ये क्षण बड़े ही कीमती होते हैं। ये क्रियायें हमें नम्र और शान्त बनाने के लिये होती हैं। और उससे हम इस बात का अनुभव कर सकते हैं। उसकी इच्छा के बिना कुछ भी नहीं हो सकता है और हम तो “उस प्रजापति के हाथ में मिट्टी के पिंड हैं।” ये पल ऐसे हैं कि इससे मनुष्य अपने भूतकाल का निरीक्षण करता है और अपनी दुर्बलता को स्वीकार करता है तथा क्षमा याचना करते हुये अच्छा कार्य करने की शक्ति के लिये प्रार्थना करता है कुछ लोगों को इसके लिये एक मिनट भी बस होता है तो कुछ लोगों को 24 घण्टे भी काफी नहीं हो सकते हैं। उन लोगों के लिये जो ईश्वर के अस्तित्व को अपने में अनुभव करते हैं केवल मेहनत और मजूरी करना भी प्रार्थना हो सकती है। उनका जीवन ही सतत प्रार्थना और भक्ति के कार्यों से बना होता है। परन्तु वह लोग जो केवल पाप कर्म ही करते हैं प्रार्थना में जितना भी समय लगावेंगे उतना ही कम होगा। यदि उसमें धैर्य और श्रद्धा होगी और पवित्र बनने की इच्छा होगी तो वे तब तक प्रार्थना करेंगे जब तक कि उन्हें अपने में ईश्वर की पवित्र उपस्थिति का निर्णयात्मक अनुभव न होगा। हम साधारण वर्ग के मनुष्यों के लिये तो इन दो सिरे के भागों के मध्य का एक और भी मार्ग होना चाहिये। हम ऐसे उन्नत नहीं हो गये हैं कि यह कह सकें कि हमारे सब कर्म ईश्वरार्पण ही हैं और शायद इतने गिरे हुए भी नहीं हैं कि केवल स्वार्थी जीवन ही बिताते हैं इसलिये सभी धर्मों ने समान भक्ति भाव प्रदर्शित करने के लिये अलग समय मुकर्रर किया है दुर्भाग्य से इन दिनों यह प्रार्थनाएं जहाँ दाँभिक नहीं होती हैं वहाँ यान्त्रिक और औपचारिक हो गई हैं इसलिये यह आवश्यक है कि इन प्रार्थनाओं के साथ वृत्ति भी शुद्ध और सच्ची हो।

निश्चयात्मक वैयक्तिक प्रार्थना जो ईश्वर से कुछ माँगने के लिये की गई हो वह तो अपनी ही भाषा में होनी चाहिये। इस प्रार्थना से कि ईश्वर हर एक जीव के प्रति हमें न्याय पूर्वक व्यवहार रखने की शक्ति दे और कोई भी बढ़कर नहीं हो सकती है।


Quotation

तुम्हें विश्वास करना चाहिये कि - “जिस वस्तु का मुझे प्रयोजन है, उसे अवश्य प्राप्त करूंगा।” यह आदर्श वाक्य तुम्हें जीवन में सफलता की सीमा तथा तुम्हारी सब आकाँक्षाओं की सिद्धि तक ले पहुँचेगा।


प्रार्थना किसे कहते हैं?

(महात्मा गाँधी)

एक डाक्टरी डिग्री प्राप्त किये हुए महाशय मुझसे प्रश्न करते हैं:-

“प्रार्थना का सबसे उत्तम प्रकार क्या हो सकता है ? उसमें कितना समय लगाना चाहिये? मेरी राय में तो न्याय करना ही उत्तम प्रकार की प्रार्थना है और जो मनुष्य सबके साथ न्याय करने के लिये सच्चे दिल से तैयार होता है उसे दूसरी प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। कुछ लोग तो संध्या करने में बहुत सा समय लगा देते हैं परन्तु बहुत से मनुष्य तो उस समय जो कुछ बोलते हैं उसका अर्थ भी नहीं समझते। मेरी राय में तो मातृभाषा से ही प्रार्थना करनी चाहिये। उसका ही आत्मा पर असर पड़ सकता है। मैं तो यह भी कहता हूँ कि सच्ची प्रार्थना यदि एक मिनट के लिये भी की गई हो तो वह भी काफी होगी। ईश्वर को पाप न करने का अभिवचन देना ही काफी है।”

प्रार्थना के माने हैं धर्म भावना और आदर पूर्वक ईश्वर से कुछ माँगना। परन्तु किसी भक्ति-युक्त भाव को व्यक्त करने के लिये भी शब्द का प्रयोग किया जाता है। लेखक के मन में जो बात है उसके लिये भक्ति शब्द का प्रयोग करना ही अधिक अच्छा है। परन्तु इसकी व्याख्या का विचार छोड़कर हम इसी का ही विचार करें कि करोड़ों हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी और दूसरे लोग रोजाना अपने स्रष्टा की भक्ति करने के लिये निश्चित किये हुए समय में क्या करते हैं। मुझे तो यह मालूम होता है कि वह स्रष्टा के साथ एक होने की, हृदय की उत्कट इच्छा का प्रकट करना है और उसके आशीर्वाद के लिये याचना करना है। इसमें मन की वृत्ति और भावों का ही महत्त्व होता है शब्दों का नहीं। अक्सर पुराने जमाने से जो शब्द रचना चली आती है उसका भी असर होता है। जो मातृ भाषा में उसका अनुवाद करने पर सर्वथा नष्ट हो जाता है गुजराती में गायत्री का अनुवाद कर उसका पाठ करने पर उसका वह असर न होगा जो असल गायत्री में होता है। ‘राम’ शब्द के उच्चार से लाखों करोड़ों हिन्दुओं पर फौरन असर होगा और ‘गौड’ शब्द का अर्थ समझने पर भी उसका कोई असर न होगा। चिरकाल के प्रयोग से और उनके उपयोग के साथ संयोजक पवित्रता में शब्दों को शक्ति प्राप्त होती है। इसलिये एक से अधिक प्रचलित मंत्र और श्लोकों को संस्कृत भाषा में रखने के लिये बहुत सी दलीलें की जा सकती हैं। परन्तु उनका अर्थ अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। ऐसी भक्ति युक्त क्रियायें किस समय करनी चाहियें इसका कोई निश्चित नियम नहीं हो सकता है। इसका आधार जुदी जुदी व्यक्तियों के स्वभाव पर होता है। मनुष्य के जीवन में ये क्षण बड़े ही कीमती होते हैं। ये क्रियायें हमें नम्र और शान्त बनाने के लिये होती हैं। और उससे हम इस बात का अनुभव कर सकते हैं। उसकी इच्छा के बिना कुछ भी नहीं हो सकता है और हम तो “उस प्रजापति के हाथ में मिट्टी के पिंड हैं।” ये पल ऐसे हैं कि इससे मनुष्य अपने भूतकाल का निरीक्षण करता है और अपनी दुर्बलता को स्वीकार करता है तथा क्षमा याचना करते हुये अच्छा कार्य करने की शक्ति के लिये प्रार्थना करता है कुछ लोगों को इसके लिये एक मिनट भी बस होता है तो कुछ लोगों को 24 घण्टे भी काफी नहीं हो सकते हैं। उन लोगों के लिये जो ईश्वर के अस्तित्व को अपने में अनुभव करते हैं केवल मेहनत और मजूरी करना भी प्रार्थना हो सकती है। उनका जीवन ही सतत प्रार्थना और भक्ति के कार्यों से बना होता है। परन्तु वह लोग जो केवल पाप कर्म ही करते हैं प्रार्थना में जितना भी समय लगावेंगे उतना ही कम होगा। यदि उसमें धैर्य और श्रद्धा होगी और पवित्र बनने की इच्छा होगी तो वे तब तक प्रार्थना करेंगे जब तक कि उन्हें अपने में ईश्वर की पवित्र उपस्थिति का निर्णयात्मक अनुभव न होगा। हम साधारण वर्ग के मनुष्यों के लिये तो इन दो सिरे के भागों के मध्य का एक और भी मार्ग होना चाहिये। हम ऐसे उन्नत नहीं हो गये हैं कि यह कह सकें कि हमारे सब कर्म ईश्वरार्पण ही हैं और शायद इतने गिरे हुए भी नहीं हैं कि केवल स्वार्थी जीवन ही बिताते हैं इसलिये सभी धर्मों ने समान भक्ति भाव प्रदर्शित करने के लिये अलग समय मुकर्रर किया है दुर्भाग्य से इन दिनों यह प्रार्थनाएं जहाँ दाँभिक नहीं होती हैं वहाँ यान्त्रिक और औपचारिक हो गई हैं इसलिये यह आवश्यक है कि इन प्रार्थनाओं के साथ वृत्ति भी शुद्ध और सच्ची हो।

निश्चयात्मक वैयक्तिक प्रार्थना जो ईश्वर से कुछ माँगने के लिये की गई हो वह तो अपनी ही भाषा में होनी चाहिये। इस प्रार्थना से कि ईश्वर हर एक जीव के प्रति हमें न्याय पूर्वक व्यवहार रखने की शक्ति दे और कोई भी बढ़कर नहीं हो सकती है।


क्या समय बीत गया?

एक कल्पना चित्र-

(लेखक - श्री पं. भोजराजजी शुक्ल, एत्मादपुर)

वर्ष की अन्तिम रात्रि को एक वृद्ध अपने अंधेरे घर में अकेला बैठा है, रात्रि भी बड़ी भयावनी और अंधेरी है, घटा छा रही है, बिजली चमक कर कड़क रही है, वायु भी बड़े वेग से चल रही है, हृदय दहलाता और मन घबड़ाता है। चन्द्रदेव भी भयभीत होकर छिप गये हैं। वृद्ध अत्यन्त शोकातुर हो रहा है। परन्तु उसका शोक न अंधेरे घर पर है और न अकेलेपन पर, न अंधेरी रात्रि, बिजली की कड़क और पवन की सनसनाहट पर। वह अपनी गत-आयु के समय को स्मरण करता है, विगत काल जितना ही अधिक स्मरण आता है, उतना ही उसका शोक बढ़ता जाता है। आँखों से अश्रुपात हो रहा है, अपनी आयु का व्यतीत समय उसके नेत्रों के समक्ष घूम रहा है।

उसे अपनी बाल्यावस्था का ध्यान आता है, जबकि उसको किसी वस्तु का शोक तथा चिन्ता मन में न थी, रुपये पैसे के बदले मिठाई तथा चाट अच्छी लगती थी। माता, पिता, भाई और बहिन सब घर उसको प्यार करता था। विद्याध्ययन के लिये छुट्टी का समय शीघ्र आने की प्रसन्नता में, पुस्तकें बगल में दबाकर पाठशाला को चला जाता था पाठशाला का ध्यान आते ही उसको अपने सहपाठियों का ध्यान आता था तब वह और भी अधिक शोकातुर हो जाता था, तथा विवश हो पुकारने लगता था हाय, समय! हाय, समय!! मोह, विगत काल! शोक! मैंने तुझे अति विलम्ब से स्मरण किया।वह अपनी युवा अवस्था का समय स्मरण करता था, अपना भरा हुआ लावण्यमय मुखड़ा, सुडौल शरीर, रसीले नेत्र, उमंगों से पूर्ण मन तथा मानवी इच्छाओं और उत्साहों का ध्यान करता था, मदान्ध नेत्रों के समय में माता पिता जो शिक्षा देते थे, भलाई तथा ईश्वर-भक्ति का उपदेश करते थे तब कह देता था उँह अभी इन सब बातों के लिये बहुत समय पड़ा है बुढ़ापे में देखा जायगा। वृद्धावस्था का कभी ध्यान भी न आता था, और न उसका कभी विचार ही होता था।

“अभी समय बहुत है” यह कहते हुए वह अपने स्थान से उठा और टटोल-टटोल कर खिड़की तक आया, खिड़की खोली देखा कि रात्रि वैसी ही भयानक है। अंधेरी घटा छा रही है, बिजली की कड़क से हृदय काँपता है, प्रचण्ड पवन चल रहा है, वृक्षों के पत्ते उड़ रहे हैं, शाखाएँ टूट-टूट कर गिर रही हैं। तब वह चिल्ला कर बोला कि हाय! हाय!! मेरा जीवन भी ऐसा ही भयानक है, जैसी यह रात्रि! यह कहकर वह वृद्ध फिर उसी स्थान पर आ बैठा।उसको अपने माता-पिता भाई-बहन तथा इष्ट मित्रों का ध्यान आ गया, जो कि सब निर्दयी कराल काल के ग्रास बन चुके थे। माता मानो प्रेम से उसे हृदय से लगाये नेत्रों में आँसू भरे खड़ी है और कह रही है कि बेटा! “समय निकल गया” पिता का प्रकाशित मुख उसके सन्मुख है, उससे यह शब्द निकल रहे हैं “बेटा हम तुम्हारी ही भलाई के लिये कहते थे” भाई-बहिन दाँतों में अंगुली दबाये चुपचाप खड़े हैं उनके नेत्रों से अश्रुपात हो रहा है। इष्ट-मित्र सब खड़े कह रहे हैं “अब हम क्या कर सकते हैं” ऐसी दशा में उसको अपनी उन बातों का स्मरण हुआ जो उसने अवहेलना तथा असावधानी और धृष्टता से अपने माता-पिता भाई-बहिन तथा इष्ट-मित्रों के साथ बरती थी। इन सब की उस पर प्रेम-दृष्टि रखना उसके हृदय को और भी विदीर्ण करता था उसका चित्त घबड़ाता और व्याकुल होता था वह कह उठता था कि “हाय! समय निकल गया इसका प्रतिकार कैसे हो।”

वह व्याकुलता से फिर खिड़की की ओर दौड़ा टकराता, टटोलता खिड़की तक पहुँचा उसे खोलकर देखा कि पवन का वेग कुछ कम हुआ है बिजली की कड़क भी कुछ थमी है, परन्तु रात्रि पूर्ववत् अँधेरी है, वृद्ध की घबड़ाहट कुछ कम हुई, वह फिर अपने स्थान पर आ बैठा, इतने में उसको अपनी प्रौढ़ावस्था का स्मरण हो आया, जिसमें उसका न वह यौवन रहा था न वह सुन्दरता तथा लावण्यता न वह मन, न मन की उमंगें, उसने अपने उस भलाई के समय को याद किया जिसमें वह बुराई की अपेक्षा भलाई की ओर अधिक झुका हुआ था। वह अपना व्रत, उपवास रखना, संध्योपासना तथा तीर्थ-यात्रा करना, दान देना, भूखों को भोजन कराना, मन्दिर और कूपादि बनवाना इत्यादि इन सब बातों से वह अपने मन को ढाढ़स देता था, सन्त महात्माओं की जिनकी उसने सेवा की थी, सद्गुरु जिनसे दीक्षा ली थी अपनी सहायता के लिए पुकारता था परन्तु मन उसका अत्यन्त व्याकुल था वह कहता कि उस के व्यक्तिगत कार्यों की उसी तक समाप्ति है। भूखे फिर भी उसी प्रकार भूखे हैं, मन्दिर टूट कर खण्डहर पड़े हैं कूप भी टूट-फूट कर जल रहित हो गये हैं। गुरु, साधु-महात्मा कोई भी उसकी पुकार नहीं सुनता, और न सहायता ही करता है, उसका चित्त फिर व्याकुल होता है और सोचता है कि उसने व्यर्थ असत्य और नाशवान पदार्थों पर मन लगाया तथा विश्वास किया यह पिछली बुद्धि पहले ही क्यों न सूझी अब कुछ वश नहीं फिर यह कह कर चिल्ला उठा कि “हाय! समय मैंने तुझको क्यों खो दिया।”

अब इन अन्तिम क्षणों में वह क्या करे? इतना गंवा चुकने के बाद उसके पास क्या शेष रहा? गत वैभव की अन्तर्वेदना दाँत निकाल कर चारों ओर से काटने को दौड़ रही थी, वृद्ध फूट-फूट कर रोने लगा।अपनी भूल पर सच्चे हृदय से रो पड़ना और भविष्य के लिए संभल जाना सच्चा प्रायश्चित है। इस प्रायश्चित से उसका भार कम हो गया। अन्धकार हटते ही प्रकाश चमकने लगा। अब बिजली की कड़कड़ाहट और रात्रि की भयंकरता कम हो चली थी।

वृद्ध ने देखा कि खिड़की में होकर एक क्षीण प्रकाश दौड़ा आ रहा है। ध्यानपूर्वक देखा तो एक स्वर्गीय प्रतिमा आगे खड़ी है और सन्देश दे रही है “वत्स! शोक मत करो। जो बीत गया वह नहीं आ सकता। अभी आगे के जो क्षण शेष हैं वह भी कम नहीं हैं। इन्हें संभालो। बदलने के लिए युगों की नहीं क्षणों की आवश्यकता होती है। उठो अपने जीवन की दशा बदल डालो। तुम्हारा कल्याण होगा।”

वृद्ध का रोम रोम प्रफुल्लित हो उठा उसने उस प्रतिमा के सामने शीश झुकाते हुये पूछा - ‘देवि! संसार में सत्य क्या है? कहाँ है? और मैं उसे किस प्रकार प्राप्त कर सकता हूँ।’ उत्तर में उसे सन्देश मिला कि ‘संसार सत्यनारायण की ही प्रति मूर्ति है। इसको ईश्वर भाव से देखो और सच्चे हृदय से इसकी पूजा करो। धर्म का स्थान कुएं और मन्दिरों में नहीं है उसे अपनी आत्मा में खोजो।”

वह कृतय कृत्य हो गया। मरने में अधिक दिन नहीं थे - अन्तिम क्षणों को उसने आत्मदर्शन और लोक सेवा में लगा कर जीवन को सफल बना लिया।

हम में से हर एक के सामने सवाल आता है कि उपयुक्त समय बीत गया। ईश्वर की ओर से सन्देश मिलता है कि नहीं अभी बहुत है। जो बचा है वह भी कम नहीं है। इसे भी संभाल कर रक्खो तो काफी है।


प्रार्थना किसे कहते हैं?

(महात्मा गाँधी)

एक डाक्टरी डिग्री प्राप्त किये हुए महाशय मुझसे प्रश्न करते हैं:-

“प्रार्थना का सबसे उत्तम प्रकार क्या हो सकता है ? उसमें कितना समय लगाना चाहिये? मेरी राय में तो न्याय करना ही उत्तम प्रकार की प्रार्थना है और जो मनुष्य सबके साथ न्याय करने के लिये सच्चे दिल से तैयार होता है उसे दूसरी प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। कुछ लोग तो संध्या करने में बहुत सा समय लगा देते हैं परन्तु बहुत से मनुष्य तो उस समय जो कुछ बोलते हैं उसका अर्थ भी नहीं समझते। मेरी राय में तो मातृभाषा से ही प्रार्थना करनी चाहिये। उसका ही आत्मा पर असर पड़ सकता है। मैं तो यह भी कहता हूँ कि सच्ची प्रार्थना यदि एक मिनट के लिये भी की गई हो तो वह भी काफी होगी। ईश्वर को पाप न करने का अभिवचन देना ही काफी है।”

प्रार्थना के माने हैं धर्म भावना और आदर पूर्वक ईश्वर से कुछ माँगना। परन्तु किसी भक्ति-युक्त भाव को व्यक्त करने के लिये भी शब्द का प्रयोग किया जाता है। लेखक के मन में जो बात है उसके लिये भक्ति शब्द का प्रयोग करना ही अधिक अच्छा है। परन्तु इसकी व्याख्या का विचार छोड़कर हम इसी का ही विचार करें कि करोड़ों हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी और दूसरे लोग रोजाना अपने स्रष्टा की भक्ति करने के लिये निश्चित किये हुए समय में क्या करते हैं। मुझे तो यह मालूम होता है कि वह स्रष्टा के साथ एक होने की, हृदय की उत्कट इच्छा का प्रकट करना है और उसके आशीर्वाद के लिये याचना करना है। इसमें मन की वृत्ति और भावों का ही महत्त्व होता है शब्दों का नहीं। अक्सर पुराने जमाने से जो शब्द रचना चली आती है उसका भी असर होता है। जो मातृ भाषा में उसका अनुवाद करने पर सर्वथा नष्ट हो जाता है गुजराती में गायत्री का अनुवाद कर उसका पाठ करने पर उसका वह असर न होगा जो असल गायत्री में होता है। ‘राम’ शब्द के उच्चार से लाखों करोड़ों हिन्दुओं पर फौरन असर होगा और ‘गौड’ शब्द का अर्थ समझने पर भी उसका कोई असर न होगा। चिरकाल के प्रयोग से और उनके उपयोग के साथ संयोजक पवित्रता में शब्दों को शक्ति प्राप्त होती है। इसलिये एक से अधिक प्रचलित मंत्र और श्लोकों को संस्कृत भाषा में रखने के लिये बहुत सी दलीलें की जा सकती हैं। परन्तु उनका अर्थ अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। ऐसी भक्ति युक्त क्रियायें किस समय करनी चाहियें इसका कोई निश्चित नियम नहीं हो सकता है। इसका आधार जुदी जुदी व्यक्तियों के स्वभाव पर होता है। मनुष्य के जीवन में ये क्षण बड़े ही कीमती होते हैं। ये क्रियायें हमें नम्र और शान्त बनाने के लिये होती हैं। और उससे हम इस बात का अनुभव कर सकते हैं। उसकी इच्छा के बिना कुछ भी नहीं हो सकता है और हम तो “उस प्रजापति के हाथ में मिट्टी के पिंड हैं।” ये पल ऐसे हैं कि इससे मनुष्य अपने भूतकाल का निरीक्षण करता है और अपनी दुर्बलता को स्वीकार करता है तथा क्षमा याचना करते हुये अच्छा कार्य करने की शक्ति के लिये प्रार्थना करता है कुछ लोगों को इसके लिये एक मिनट भी बस होता है तो कुछ लोगों को 24 घण्टे भी काफी नहीं हो सकते हैं। उन लोगों के लिये जो ईश्वर के अस्तित्व को अपने में अनुभव करते हैं केवल मेहनत और मजूरी करना भी प्रार्थना हो सकती है। उनका जीवन ही सतत प्रार्थना और भक्ति के कार्यों से बना होता है। परन्तु वह लोग जो केवल पाप कर्म ही करते हैं प्रार्थना में जितना भी समय लगावेंगे उतना ही कम होगा। यदि उसमें धैर्य और श्रद्धा होगी और पवित्र बनने की इच्छा होगी तो वे तब तक प्रार्थना करेंगे जब तक कि उन्हें अपने में ईश्वर की पवित्र उपस्थिति का निर्णयात्मक अनुभव न होगा। हम साधारण वर्ग के मनुष्यों के लिये तो इन दो सिरे के भागों के मध्य का एक और भी मार्ग होना चाहिये। हम ऐसे उन्नत नहीं हो गये हैं कि यह कह सकें कि हमारे सब कर्म ईश्वरार्पण ही हैं और शायद इतने गिरे हुए भी नहीं हैं कि केवल स्वार्थी जीवन ही बिताते हैं इसलिये सभी धर्मों ने समान भक्ति भाव प्रदर्शित करने के लिये अलग समय मुकर्रर किया है दुर्भाग्य से इन दिनों यह प्रार्थनाएं जहाँ दाँभिक नहीं होती हैं वहाँ यान्त्रिक और औपचारिक हो गई हैं इसलिये यह आवश्यक है कि इन प्रार्थनाओं के साथ वृत्ति भी शुद्ध और सच्ची हो।

निश्चयात्मक वैयक्तिक प्रार्थना जो ईश्वर से कुछ माँगने के लिये की गई हो वह तो अपनी ही भाषा में होनी चाहिये। इस प्रार्थना से कि ईश्वर हर एक जीव के प्रति हमें न्याय पूर्वक व्यवहार रखने की शक्ति दे और कोई भी बढ़कर नहीं हो सकती है।


मैस्मरेजम का उपयोग।

(लेखक- प्रो. धीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती, बी.एस.सी.)

गत आठ अंकों में मैस्मरेजम विज्ञान और उसका महत्व अच्छी तरह समझ चुका हूँ। पिछले दो अंकों से उन्हें करने की क्रिया भी बताई जा रही है। अब तक के अभ्यास के आधार पर साधक किसी व्यक्ति को निद्रित कर सकते हैं। यह निद्रा हर एक आदमी को नहीं आ सकती। कई की मनोभूमि इतनी शुष्क और कठोर होती है कि वह अपने निमित्त इस में से कुछ ग्रहण नहीं करते। जिनका उद्दण्ड प्राण सूखे बबूल की तरह अकड़े रहने का आदी हो गया है और किसी के आगे झुकना नहीं चाहता वह आसानी से प्रभावित नहीं किया जा सकता। साधारण अभ्यासियों के लिये तो वह प्रायः असम्भव ही है विशेष शक्ति सम्पन्न योगी उन्हें विशेष क्रियाओं से ही झुका सकते हैं।

जिन साधकों ने हमारे बताये हुए क्रम से अभ्यास किया है उनके लिये हमारी सलाह है कि अपने प्रयोग के लिये आरम्भ में केवल उन्हीं व्यक्तियों को चुनो जो तुम्हारे प्रति नम्र हों जिनके मन में तुम्हारे लिये आदर हो।

किसी को अपना अभ्यास बढ़ाने का साधन मात्र मत बनाओ। यह तो दूसरों की गरदन पर तलवार चलाना सीखने के समान हुआ हम ऐसा रीति विरुद्ध काम करने को किसी को सलाह नहीं दे सकते। किसी को बल पूर्वक संज्ञाहीन करो, उसे उसे मृतक की दशा में पड़ा रहने दो और फिर उसे मनमानी देर कैद रख कर छोड़ो क्या यह उचित है? कभी कभी तो नौसिखिया अभ्यासी अपने पात्र को खतरे में डाल देता है और ऐसी स्थिति में ले पहुँचता है जहाँ जान जोखिम हो सकती है। डूबे हुए आदमी को पानी में से निकालने और तैरने का अभ्यास करने के लिये यदि तुम किसी भोले-भाले अजनबी आदमी को नदी में ले जाकर डुबाओ और फिर उसे निकालने का अभ्यास करो तो यह बुरी बात है तुम्हारा अभ्यास नया है तैरना अभी आता ही कितना है? यदि डूबे हुए को न निकाल सके या कहीं पट्टी भूलकर उसे गड्ढ़े में पटक बैठे तो एक पाप कर बैठोगे। यदि कोई दुर्घटना न घटे तो भी यह खेल उस व्यक्ति के पक्ष में अहित कर है जिसने अपने को तुम्हारे सुपुर्द कर दिया है। अनाड़ी वैद्य जब किसी सीधे मरीज के साथ अपना अनुभव बढ़ाने के लिये उसकी जान के साथ खिलवाड़ करता है तब क्या तुम उसे बुरा नहीं कहते?

संज्ञाहीन करके किसी व्यक्ति का तमाशा बनाना तो और भी बुरा है। यह तो उन मुड़चिरे भिखारियों के योग्य है जो अपने जिस्म में चाकू मार कर खून निकालते हैं और पैसे माँगते हैं या फिर यह बात उन्हें शोभा देती है जो किसी मूक प्राणी को हथियारों से छेदते हैं और उसके चिल्लाने में एक बड़ा मनोरंजक अनुभव करते हैं। निद्रित व्यक्ति को नीम के कडुए पत्ते खिला कर उससे मिठाई स्वीकार करवाते रहो तो खूब तमाशा होगा पर उस व्यक्ति पर क्या बीतेगी इसे भी तुम्हें जानना चाहिये। नीम का गुण वही रहेगा और पेट में जाकर उपद्रव खड़े करेगा। निद्रित का साधारण ज्ञान उसे कडुआ अनुभव कराना चाहता है किन्तु तुम्हारा प्राण उसकी छाती पर चढ़ बैठता है और उठने नहीं देता अपनी मनमानी से उसके मुँह में से कडुए को मीठा कहलवाते हो। इस बलात्कार का उस पर वैसा ही असर होता है जैसा क्लोरोफार्म सुँघा कर किसी को खूब पीटा जाय। बेहोशी के कारण उस वक्त तो तुम्हारा कुछ प्रतिरोध न कर सकेगा पर जब सचेत होगा तो अपने अंगों में वेदना का अनुभव करेगा और उस पिटाई से जो शारीरिक क्षति हुई है उसका दुख भोगेगा।

मैस्मरेजम द्वारा तमाशे दिखाना कई दृष्टियों से महंगा है। तमाशा सिर्फ इतना हो सकता है कि जो शारीरिक या मानसिक कार्य तुम अपने शरीर या बुद्धि से कर सकते हो उसी को दूसरे व्यक्ति के शरीर से करवा लो। क्या यह भी कोई तमाशा हुआ? मैं झूठ बोल सकता हूँ उसे खुद न बोल कर दूसरे से बुलवाओ तो इसमें क्या आश्चर्य हुआ? एक बात को मैं जानता हूँ उसी को किसी दूसरे को बता कर उससे कहलवाऊँ तो इसमें हैरत की क्या बात है? इस जमाने में बिलकुल ही जड़ बुद्धि मूढ़ों को छोड़कर शेष सब लोग यह मानते हैं कि प्राण की अद्भुत शक्ति है और वह एक शरीर में आ जा सकती है उसे प्रभावित कर सकती है। फिर बात सिर्फ इतनी सी रह जाती है कि आप अपने मन की बात दूसरे को बताने में उस शक्ति का उपयोग कर सकते हैं।

तमाशे में तुम्हारी शक्ति का दुरुपयोग न होता हो सो बात नहीं है। खेल खतम होने के बाद तुम देखोगे कि तुमने अपना बहुत सा प्राण फेंक दिया है, फलस्वरूप तुम्हारा शरीर एक प्रकार की बेचैनी अनुभव कर रहा है। इस प्रकार का अपव्यय हस्त मैथुन की तरह भयंकर, हानिप्रद और मूर्खतापूर्ण है।

इतना लिख जाने का तात्पर्य यह है कि हमारे अनुयायी तमाशे की तरह इसका जरा भी उपयोग न करें। वे इस महान शक्ति को यदि दूसरों पर प्रयोग करना चाहें तो उनकी शारीरिक एवं मानसिक उन्नति के लिये करें। मैस्मरेजम शक्ति से दूसरों के भयंकर रोग दूर हो सकते हैं, उनका गया गुजरा स्वास्थ्य फिर से वापिस लौट सकता है, मुर्दा नसों में नया रक्त संचार हो सकता है। जिनका मस्तिष्क मानसिक विकारों से भर रहा है। बुद्धि स्थूल, मोटी और कठोर है दिमाग सही काम नहीं करता, मन में कुसंस्कार जम गये हैं, बुरी आदतें पड़ गई हैं या विचारधारा उलटी दिशा में बह रही है तो वह इस प्राण शक्ति से सुधारी जा सकती है और उपरोक्त कठिनाइयों को हल किया जा सकता है। अन्य कामों में अपनी आत्मविद्युत से दूसरों को प्रभावित किया जा सकता है। इतने महत्वपूर्ण कार्य क्या उस घृणित तमाशे से भी कम आश्चर्यजनक हैं?

एक बार हम पुनः इन पंक्तियों द्वारा अभ्यासियों को उपदेश करते हैं कि वे भूल कर भी इस विद्या का तमाशा किसी को न दिखावें केवल लोक हित के कार्यों में इसका उपयोग करें।


Quotation

जो दयालु हैं उन्हीं पर भगवान की दया होगी। जिसका मन शुद्ध है उन्हीं को परमात्मा के दर्शन होंगे। जो धर्म के लिये कष्ट सहते हैं, स्वर्ग में उन्हीं का राज्य होगा। जिन्हें सत्य की प्यास है उन्हें ही तृप्ति मिलेगी।*****

दुख आँधियों की तरह आते हैं। यदि तुम अपने को चट्टान की तरह दृढ़ बनाये रहो तो वे चले जायेंगे और तुम्हारा कुछ न बिगड़ेगा।*****

लोग चाहे तुम्हें बड़ा भाग्यवान् समझें परन्तु यदि तुम्हारे मन में पाप भरे हैं, कामना की ज्वाला जल रही है, भगवत् प्रेम का अमृत नहीं बह रहा है तो निश्चय समझो कि तुम्हारा जीवन निष्फल है।*****

जिसने वासनाओं को नहीं जीता उसे बन में रहने से क्या लाभ? और जो तृष्णा का गुलाम नहीं उसे घर छोड़ने से क्या प्रयोजन? जिसकी आत्मा में शान्ति है उसके लिये घर और वन सब एक हैं।*****

तुम सेवा करने आये हो हुकूमत चलाने नहीं। विश्व की सेवा करोगे तो मधुर फल पाओगे, हुकूमत चलाओगे तो फेंक दिये जाओगे।*****

यदि तुम्हारा बोलना न्याय संगत तथा आवश्यक हो तो उन्हीं बातों को बोलो जो तुम्हें गौरवान्वित कर सकें।*****

यदि तुम्हारे पास धन हो तो उस पर गर्व न करो बलशाली स्थितियों पर भी गर्व मत करो। गर्व उस परमात्मा पर करो जो तुम्हें सब कुछ देता है और जो तुम्हें स्वयं अपना बना लेना चाहता है।*****

जितना ऊँचा ज्ञान उतना ही उत्तम जीवन। यदि ऐसा हो सके तो ठीक; नहीं तो सारा प्रयास भूसी कूटने के समान व्यर्थ और निस्सार है।*****