अखण्ड ज्योति का वार्षिक मूल्य 1॥) रु. एक प्रति का नौ पैसा है। मूल्य मनीऑर्डर से ही भेजना चाहिए। वी.पी. मँगाने पर 1) अधिक देने पड़ते हैं।
लेख या कविताएँ केवल आध्यात्मिक, योगशास्त्र, तन्त्र विज्ञान, मैस्मरेजम, मानसिक शक्ति यों की विवेचना, प्राकृतिक चिकित्सा तथा सदाचार पर ही आने चाहिए। अन्य विषयों को स्थान न दिया जायगा। लेख जहाँ तक हो सके छोटे होने चाहिए।
उत्तर के लिए जवाबी कार्ड या टिकट भेजना चाहिए अन्यथा उत्तर न दिया जाएगा।
प्रत्येक अंक जरूरत भर ही छपाया जाता है, इसलिए पुराने अंक लेने के लिए कोई सज्जन पत्र व्यवहार न करें।
अखण्ड ज्योति के मूल्य में कमी करने के लिए पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिए अखण्ड ज्योति के ग्राहक नहीं बनाये जाते।
अखण्ड ज्योति की एजेन्सी कम से कम 6 प्रति. प्रतिमास लेने पर दी जाती है। जिन्हें एजेन्सी लेनी हो वे कमीशन आदि के बारे में पत्र व्यवहार करें।
‘अखण्ड ज्योति’ प्रतिमास ठीक 20 तारीख को निकल जाती है। हमारे यहाँ से दो बार जाँच कर सब ग्राहकों के पास अखबार भेजा जाता है। फिर भी जिनको एक सप्ताह के अन्दर न मिले उन्हें रुष्ट न होकर डाकखाने के उत्तर सहित हमें लिखना चाहिए।
अध्यात्म विद्या प्रेमियों के चित्र अखण्ड ज्योति में छापे जाते हैं। पाठकों से प्रार्थना है कि वे लोक सेवी, सदाचारी एवं ईश्वर भक्त सज्जनों के परिचय भिजवाने की कृपा करें।
पत्र व्यवहार का पता-
मैनेजर- अखण्ड ज्योति फ्रीगंज, आगरा।
वर्ष-1 सम्पादक-श्रीराम शर्मा अंक-9
अभागा बटोही
(ले.—श्री जिज्ञासु)
प्राची का पट उधार ऊषा, अंगड़ाई सी लेती आई।
रवि लाल-लाल निकला, स्वर्णिम रेखा भू मण्डल पर छाई॥
उन्मत्त, विमुग्ध, वितन्द्रित से मानव को एक चुनौती सी-
देती, कुछ प्रश्न पूछती सी जग में सन्देह नया लाई॥
(2)
ओ, मरणोन्मुख मानव शरीर, कितनी सम्पत्ति समेट चला?
कितनी पूँजी संचित कर ली? संग्रह कितनी कर लो कमला??
ओ बनजारे कितना लादा? कि तना सामान बटोर लिया?
है आज कूच की तैयारी- इसका भी है कुछ ध्यान भला??
(3)
पर इस बेखबर बटोही को देखो कैसा प्रमाद छाया।
धुनना, बुनना, ताना, बाना, जंजाल नया एक फैलाया॥
मंजिल की सुधि बुधि भूल गया, इस नये जाल में उलझ पड़ा-
हा हन्त! कहाँ जाने को था, पर कहाँ अभागा ललचाया॥
आत्मा परमात्मा का अंश है, मनुष्य ईश्वर का पुत्र है। बिछुड़े हुओं का चरम उद्देश्य आपस में मिलना है। बच्चा अपनी माता से बिछुड़ जाता है तो दोनों बेचैन हो जाते हैं। माता बच्चे के लिए व्याकुल फिरती है। और बच्चा सब कुछ भूल कर माता के लिए रोता फिरता है। अज्ञान के नशे में बेहोश हो जाने की बात दूसरी है। परन्तु यदि बहुत दिन बीत जाने पर भी बच्चे को यह पता चले कि उसकी माता मौजूद है और उसके लिए व्याकुल है तो निश्चय ही बालक विह्वल हो जायगा और माता को तलाश करने के लिए छटपटाने लगेगा। भक्ति का मूल सिद्धान्त यही है सभी अपनी जाति के साथ रहना चाहते हैं। प्रकृति का प्रत्येक परमाणु इसी विषय का पालन कर रहा है। एक धातु के टुकड़े जहाँ कुछ अधिक तादाद में इकट्ठे होते हैं वहाँ उसी धातु के परमाणु दूर-दूर जगहों से अपने आप खिंचते चले आते हैं और वे सब इकट्ठे होकर एक बड़ी खान का रूप धारण करते जाते हैं। खाने इकट्ठी होने का यही सिद्धान्त है। विचारों के परमाणु भी इसी प्रकार इकट्ठे होते हैं जैसा हम सोचते हैं उसी प्रकार के अन्य विचार परमाणु हमारे मस्तिष्क में जमा होने लगते हैं। पशुओं के झुण्ड, डाकुओं के गिरोह, साधुओं की जमातें बन जाना भी इसी प्रकार होता है।
विकास हर वस्तु का परमधर्म है। सभी वस्तुओं को देखिये वे पूर्ण बनने के लिए दौड़ लगा रही हैं। पानी की बूँद झरने, नाले, नदियों में होती हुई समुद्र में मिलने के लिए कितनी तेजी से दौड़ी जा रही हैं? अग्नि की लपट, ईंधन समाप्त होते ही महान् अग्नितत्व में मिलना चाहती हैं। जीव भी अपनी अपूर्णता, अशुद्धता और हीनता को त्याग कर परम पूर्ण सच्चिदानन्द स्वरूप में मिल जाने के लिए बढ़ता जा रहा है। यह उसकी आन्तरिक आकाँक्षा और स्वाभाविक धर्म है।
ईश्वर की भक्ति मनुष्य मात्र के लिए स्वाभाविक है। हम निर्धन हैं इसलिए सौ रुपये की इच्छा करते हैं। सौ पूरे हो जाने पर अमीर बनने की इच्छा होती है, अमीर के बाद शासक, शासक के बाद राजा और राजा के बाद चक्रवर्ती बनना चाहते हैं। फिर चक्रवर्ती राजा, समस्त भूमण्डल के अधिपति होने पर भी क्या विकास की इच्छा पूर्ण हो जाती है? नहीं! वहाँ से भी ऊँची कक्षा के लिए हम जाना चाहते हैं। वह अन्तिम स्थान परमात्मा है। उसी की प्राप्ति करना जीव का चरम लक्ष्य है। दैवी आन्तरिक इच्छायें इसी परम तत्व से मिलने के लिए आतुर रहती हैं। किन्तु दुष्प्रवृत्तियों द्वारा भटका हुआ मन हम आवाज को ठीक तरह नहीं पहिचान पाता और इस प्रवाह को इन्द्रिय लिप्सा की ओर ले दौड़ता है।
विश्व का जर्रा-जर्रा उसी आनन्द कंद की मुरली से झंकृत हो रहा है उसी चरम लक्ष्य की ओर चलना चाह रहा है। परमात्मा के चरणों से लिपटने की जो तीव्र आकाँक्षा है वही सच्चा मार्ग है और इसी पथ की सफलता सच्ची सफलता है। इस स्थान तक नास्तिक आस्तिक और विभिन्न धर्मानुयायी एकमत हैं।
अब आगे जो प्रश्न पैदा है वह पेचीदा है। ईश्वर भक्ति किस प्रकार की जाय? इस प्रश्न के बाह्य रूप पर आचार्यों में मतभेद हैं। भक्ति का आन्तरिक तत्व तो यही है कि परमात्म समुद्र में अपने को नमक की डेली की तरह घुला दिया जाय।
ईश्वर के रंग में ही भीतर बाहर से रंग जायं। जिधर दृष्टि उठावे उधर महबूब ही नजर आवे। सिवाय उस प्रीतम के कहीं कोई चीज ही दिखाई न पड़े।
साधना की बाह्य रूप रेखाओं में मतभेद है। कर्म संन्यास, और कर्मयोग मुख्य दो मार्ग हैं इनकी अनेक शाखा प्रशाखायें हैं। संन्यास धर्म, कर्म त्याग, वन सेवक, अहर्निशि तप साधन, यह विरक्त मार्ग हैं दूसरा रास्ता कर्म योग का है। शरीर से गृह धर्म का पालन करते हुये मन से ईश्वर के चरणों में अपने को निछावर कर देना।
हम इसी दूसरे मार्ग को सर्व साधारण के लिए उपयोगी समझते हैं और अनुभव करते हैं कि प्रथम मार्ग की अपेक्षा यह किसी दृष्टि से न्यून नहीं है। संन्यासी बनकर तप साधना, योगाभ्यास और पूर्ण वैराग्य को धारण करते हुए समाधि, स्वर्ग या मुक्ति प्राप्त की जा सकती है पर वह लाभ अपने लिए ही तो रहा। दूसरों का उससे क्या हित हुआ? ऐसी साधना का परिणाम आत्म कल्याण तो है परन्तु परमार्थ नहीं। दूसरे मार्ग की साधना सीधी-सादी, सरल और विडम्बनाहीन दिखाई देती है पर वास्तव में वह भी पहली के समान ही कठिन और कष्ट साध्य है। किन्तु फल की दृष्टि से वह दूनी है। आत्म कल्याण के साथ ही परमार्थ भी इसमें है।
परमात्मा संसार के प्रत्येक पदार्थ में व्याप्त है। संपूर्ण जीवों में उसकी मूर्ति विराज रही है यह बात कहने सुनने में जितनी सरल मालूम पड़ती है। उतनी क्रिया रूप में लाने में सुगम नहीं है। मैं यदि समस्त जीवों में ईश्वर का स्वरूप देखूँ तो मैं उन्हें अपने सम्बन्धी से किसी प्रकार कम न समझूँगा। क्या मैं परमात्मा के साथ झूठ, छल, दगाबाजी का व्यवहार कर सकूँगा? क्या परमात्मा की चोरी करूंगा? जिस परमात्मा की पाषाण मूर्ति के सन्मुख श्रद्धा और भक्ति के आँसू बहाता हूँ उसकी जीती-जागती प्रतिमूर्तियों का पीड़ित और कष्ट से त्रस्त देखूँ तो क्या मेरा हृदय उमड़ न पड़ेगा? अपने पेट भरने के लिए दरिद्रनारायण के हाथ का ग्रास छीनकर क्या अपने मुँह में रख सकूँगा?
विश्व को परमात्म दृष्टि से देखने के पश्चात सब कुछ अपना हो जाता है या अपना कुछ भी नहीं रहता। बात एक ही है सिर्फ दो प्रकार के शब्दों में कही गई है। परमात्म दृष्टि धारण करने वाला भक्त अपने भीतर बाहर चारों और प्रभु को खींचता हुआ देखता है और कहता है-
लाली मेरे लाल की, जिन देखो तति लाल।
लाली देखन को गई, मैं भी हो गई लाल॥
वह भक्त जनता जनार्दन को अपना प्रभु समझता है। दरिद्रनारायण की पूजा करते हुए उसका हृदय उमड़ पड़ता है। पीड़ितों की सेवा ही उसके जीवन का व्रत होता है। पाप कर्म उससे बन ही नहीं पड़ते। अखण्ड ज्योति के पाठक ऐसी परमात्म दृष्टि को धारण कर सकें तो वे ईश्वर की सच्ची भक्ति कर सकेंगे।
बीज कहाँ बोया है?
(श्री पद्मचन्द्र गर्ग ‘पद्म’ इन्दौर)
“एक किसान खेत में बीज बोने गया।”
“उसने कुछ बीज रास्ते में गिरा दिया। कुछ बोते समय पैरों से कुचल दिया। कुछ ऐसी तरह डाला जिसे चिड़ियाँ चुरा गई।”
“जो थोड़ा बहुत बीज खेत में पड़ा था उसमें से कुछ पथरीली जगह पर उगा और तरी न मिलने की वजह से सूख गया। कुछ काँटों के झुरमुट में उगा पर काँटों ने उसे बढ़ने न दिया छोटा सा पौधा जहाँ का तहाँ सिसक गया। जो बीज अच्छी भूमि पर गिरा वह फला फूला और सौ गुने परिमाण में उत्पन्न हुआ।”
यह शब्द कह के यीशु गला फाड़ कर चिल्लाया और ऊँचे शब्दों में कहा- “जिसकी आंखें हों वह इसे देख ले, जिसके कान हों वह इसे सुन ले।”
“तब दर्शकों ने यीशु से पूछा- इस दृष्टान्त का क्या अर्थ है?”
यीशु ने उत्तर दिया- धर्म बीज है। मनुष्य बोने वाला है। मनोभूमि खेत है।
पत्थर पर उनका बीज पड़ा है जो आनन्द पूर्वक सुनते हैं, पर मन में जड़ न पकड़ने के कारण बीज उगता नहीं और जहाँ का तहाँ सूख जाता है। कांटों के बीच में उनका बीज गिरा है जो कानों से सुनते हैं और मन में धारण करते हैं किन्तु साँसारिक चिन्ता इतनी बढ़ा लेते हैं जिससे पौधा बढ़ नहीं पाता। रास्ते में उन्होंने अपना बीज बखेर दिया जिन्होंने धर्मतत्व को जानने की परवाह न की। पैरों तले उन्होंने कुचल दिया जिन्होंने अविश्वास किया। चिड़ियाँ उनका बीज चुग गई जिनका मन शैतान के भुलावे में आकर पाप कर्मों में भटक गया।
किन्तु जिन्होंने ईश्वरीय सन्देश को, धर्मतत्व को श्रद्धा और विश्वास भरे उपजाऊ हृदय में धारण किया है धर्म पूर्वक सींचा है उनका बीज सौ गुना फल देगा और वे जीवन मुक्त हो जायेंगे।
(इंजील से)
कहानी-
बहुत बक-बक मत करो। थोड़ा बोलो। काम की बातें करो। और दुष्टों के संग से बचते रहो।
कहानी-
(श्री रामेश्वर दयाल गुप्ता, नौगढ़)
“यदि किसी के पास अनावश्यक धन हो तो वह किसे देना चाहिए?” यह प्रश्न उस व्यक्ति ने कितने ही सम्भ्राँति व्यक्ति यों से पूछा।
कई ने उसे दुत्कार दिया। क्योंकि इस भिक्षुक के पास भला क्या धन हो सकता था। सब जानते थे कि पर्णक अपरिग्रही है। वह उदर भरने के उपरान्त अन्न का एक कण भी अपने पास नहीं रखता। इसके पास अनावश्यक धन क्या होगा? एकाध मुट्ठी चावल बच रहे होंगे उसी के लिए धर्म मीमाँसा कराता-फिरता है। यह सोच लेना परिचित पंडितों के लिए स्वाभाविक ही था। फिर भी वह निराश नहीं हुआ। एक जगह फटकारा गया तो दूसरी जगह पहुँचा, दूसरी जगह दुत्कारा गया तो तीसरे का दरवाजा खटखटाया। इतना फालतू वक्त किसी के पास नहीं था जो तुच्छ वस्तु के लिए भी अपनी बुद्धि को कष्ट दे, शुष्क जिज्ञासा को शान्त करे।
पर्णक था धुन का पक्का। अगर पक्का न होता तो दुनियादार लोगों की तरह वह भी निन्यानवे के फेर में पड़ जाता। माया ने उसे हजारों बार ललचाया था पर वह अपरिग्रही भिक्षुक ही बना रहा। इसने बड़े-बड़े ज्ञानियों के सामने अपनी जिज्ञासा रखी ‘यदि किसी के पास अनावश्यक धन हो तो वह किसे देना चाहिए?, आखिर उसने समस्या को हल कर ही लिया। विभिन्न मतों का सार उसे यह मिला कि ऐसा धन किसी कंगाल को देना चाहिए।
भिखारी पर्णक को कहीं से एक पैसा मिल गया था। उसे पैसे की जरूरत थी नहीं। इसलिए वह अनावश्यक धन था। किसी को देना निश्चय ही था। कुपात्र को दान देकर वह पाप नहीं कमाना चाहता था। इसलिए सबसे बड़े कंगाल की तलाश में वह घर से निकल पड़ा। पैसे को कसकर उसने खूँट में बाँध लिया।
सबसे बड़े कंगाल की तलाश आसान न थी। देश-विदेश वह इसके लिए मारा-मारा फिरने लगा। मोटी बुद्धि जिसे गरीब मान लेती है सूक्ष्म बुद्धि उसे वैसा नहीं मान सकती। अमीर की दृष्टि में दिन भर श्रम करने वाला मजदूर गरीब है परन्तु अपने मन का वह भी बादशाह हो सकता है। पर्णक ने असंख्य धन होने, निराश्रित, अपाहिज, पीड़ित, जरूरतमंद, भूखे, रोग तथा अनेक कष्टों से ग्रस्त मनुष्य देखे पर उसकी दार्शनिक बुद्धि के अनुसार वे सबसे बड़े कंगाल नहीं थे। वे दुखी थे बेशक, परन्तु ईश्वर पर भरोसा रखे हुए थे। दूसरे कष्ट उन्हें थे पर तृष्णा की तीव्र दावानल उनके हृदय का नहीं जला रही थी।
इसी ढूँढ़ खोज में कई वर्ष बीत गये। पैसा उसके खूँट में बँधा हुआ था। हजारों योजन की यात्रा समाप्त हो चुकी थी। पर सबसे बड़ा कंगाल अभी नहीं मिला था।
एक दिन उसने देखा कि एक बड़ी भारी सेना जा रही है। हजारों घोड़े हाथी हैं, चरखियों पर तोपें चढ़ी हुई हैं, तीर तलवार से खच्चर लदे हुए हैं, हथियारों के भार से सिपाही झुके जा रहे हैं, रसद के छकड़े लदे जा रहे हैं। सोने-चाँदी के रथों में सेनापति बैठे हुए हैं। पर्णक को बड़ा कौतूहल हुआ। उसने एक व्यक्ति से पूछा यह सब कौन हैं? और कहाँ, किस निमित्त जा रहे हैं? उत्तर में उसे बताया गया- कान्वी नगरी का राजा ऋतुपर्ण विन्ध्य देश को जीतने के लिए जा रहा है। ऋतुपर्ण सत्रह सौ देशों का राजा है उसके पास अपार संपत्ति है। खजाने सोने से भरे हुए हैं। फिर भी और भूमि, धन, खजाने की इसे चाह है। अपनी इसी तृष्णा को शान्त करने के लिए हजारों निरपराध व्यक्तियों का खून बहाने के लिए यह राजा जा रहा है।
पर्णक को निश्चय हो गया कि यही सबसे बड़ा कंगाल है। इससे बड़ा जरूरतमंद और कौन होगा? इतना वैभव होते हुए भी जिसकी जरूरत पूरी नहीं होती वह सबसे बड़ा गरीब है। उसे वह व्यक्ति मिल गया जिसकी तलाश में वर्षों से फिर रहा था। वह चुपचाप सड़क के एक किनारे पर खड़ा हो गया।
राजा की पालकी जैसे ही उधर से निकली वैसे ही पर्णक ने वह पैसा ऋतुपर्ण के ऊपर फेंक दिया। एक भिक्षुक द्वारा अपने ऊपर पैसा फेंका जाता देख कर राजा को बड़ा क्रोध आया। पालकी रुकवाकर भिक्षुक को उसने पकड़वा बुलाया।
घटना साधारण सी थी। पर हुई थी राजा के साथ! सारी सेना में खलबली मच गई। कूच रुक गया। सेनापति दौड़कर महाराज के पास जमा हो गये मानो कोई भारी विपत्ति उन पर आई हो। बात की बात में दरबार लग गया। हाथ पाँव बंधा हुआ भिखारी अपराधी की तरह हाजिर किया गया। उसे अपने अपराध का कारण बताने की आज्ञा हुई थी।
पर्णक ने- पैसा मिलने, उसके लिए धर्माचार्यों की व्यवस्था लेने, इतने वर्षों तक सबसे बड़े कंगाल की तलाश करने, अनेक दुखियों में भी कंगाली का अभाव देखने का विस्तार पूर्वक वर्णन किया और कहा- राजन् जिसकी तृष्णा तृप्त नहीं होती वही सबसे बड़ा दीन है। आपके पास इतना बड़ा वैभव है फिर भी अपनी तृष्णा को शान्त न कर सके। आपकी दरिद्रता इतनी बढ़ गई कि दूसरों का रक्त बहाकर भी अपना उदर भरने को व्याकुल हो गये। मैंने सोचा कि यही व्यक्ति सबसे बड़ा कंगाल है और इसी को वह पैसा दे दूँ। तदनुसार वह पैसा आपके पास फेंक दिया।
राजा मानों नींद से चौंक पड़ा। उसकी आँखें खुल गई। क्या मैं सबसे बड़ा कंगाल हूँ? मेरे पास मेरी जरूरत पूरी करने योग्य भी सम्पत्ति नहीं है? क्या मैं इस भिखारी से भी भिक्षा लेने का पात्र हूँ? देश की संपदा किसलिए इकट्ठा करता फिर रहा हूँ? वह सब प्रश्न उसके मस्तिष्क में कोलाहल मचाने लगे। गंभीरता और मौन उसके चेहरे पर छा रहे थे। सारा दरबार सन्न बैठा हुआ था।
राजा ने भिखारी को मुक्त करने की आज्ञा दे दी और सेनापति को आदेश दिया कि सेना को वापिस लौटा लिया जाय।
(महात्मा जेम्स ऐलन)
अपने आपको तुच्छ समझना ही आत्म पतन है। वास्तव में यह आत्महत्या का ही एक भेद है। जिस आदमी का इस प्रकार का विश्वास है कि उसके शुद्धाचार का महत्व गंदे वस्त्रों जितना है अर्थात् कुछ भी नहीं है, और वह कभी अपने प्रयत्नों से उन्नति नहीं कर सकता। ऐसा आदमी अपनी इस मनोवृत्ति से अपने आपको नपुँसक बना रहा है, अपनी आत्मा का गला घोंट रहा है। और अपने चरित्र की सर्वोच्च तथा परमोत्कृष्ट वस्तु की जड़ को काट रहा है एवं उसे तितर-बितर कर रहा है। आत्मतिरस्कार संबंधी प्रत्येक विचार व्यक्तित्व की शक्ति एवं जड़ को नष्ट करने वाला एक भयानक रोग है।
अपने आपको तुच्छ और नीच समझना बहुत हानिकारक है। इस प्रकार के विचार मानव समाज को उसकी शक्ति और वास्तविक बल से वंचित कर रहे हैं। ‘संसार झगड़ों का स्थान है’ अथवा ‘यह दुःखों का घर है’- इन विचारों के प्रभाव से मानव हृदयों की संसार के सौंदर्य को देखने की शक्ति नष्ट हो गई है। वास्तव में आदमी क्षुद्र जीव नहीं है। यदि वह परमात्मा पद को पाने का एक संकल्प करे, तो परमात्मा बन सकता है। वह अपने मन और शरीर का राजा है। वह अपने प्रत्येक वचन और प्रत्येक काम का नेता तथा पथ-प्रदर्शक है। जब कोई आदमी उपर्युक्त अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तब समझना चाहिए कि उस आदमी ने अपने सच्चे आदर्श की ओर बढ़ना आरम्भ कर दिया है। वह अपने ध्येय की ओर चल पड़ा है।
ब्रह्मचर्य आश्रम
(ले.-पं. शिवनारायण शर्मा, हैडमास्टर आगरा)
इस भूमण्डल में जन्म लेकर मनुष्य यदि श्रेय मार्ग पर न चले तो उसका जीवन बिलकुल निष्फल है। अज्ञानवश मनुष्य अपना देवत्व भूलकर प्रेय मार्ग पर विचरण करते-करते बार-बार जन्म मरण के अधीन हो रहे हैं। भारतवर्ष के आर्य ऋषि जानते थे कि मनुष्य क्या है। इस कारण वे केवल आहार-विहारादि दैहिक क्रिया में ही रहने वाले मनुष्य को देखकर बहुत दुखित होते थे, जिससे मनुष्य प्रेय मार्ग परित्याग कर श्रेय मार्ग का अवलम्बन कर सके। अहंभाव का संकोच छोड़कर उसका प्रसार साधन करके, विशुद्धानन्द सम्भोग कर सके इसीलिए वे अपना-अपना जीवन उत्सर्ग करते थे। परन्तु ब्रह्मचर्य पालन किये बिना कोई उनके मार्ग पर चल नहीं सकता था। तिल में से जिस तरह पेरे बिना तेल नहीं निकलता, दूध में से मथित हुए बिना जिस तरह मक्खन नहीं निकलता, जिस तरह भूमि खोदे बिना जल नहीं निकलता, घिसे बिना जैसे अरुणी में अग्नि नहीं निकलती, उसी तरह ब्रह्मचर्य बिना मनुष्य के अंतर्निहित छिपी हुई शक्ति विकसित नहीं होती मैं का प्रसार नहीं होता।
तिलेषु तैलं दघिनीव सर्पिरापः स्त्रोतः स्वरणीषु चाग्निः।
एवमात्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यिति॥
(श्वेताश्वतर)
ऋषि जानते थे कि मनुष्य ब्रह्म का पुत्र है, इसी से वे मानवों को बार-बार पिता के अनुरूप होने को उत्साहित किया करते थे। ममता का संकोच त्याग कर ब्रह्म सदृश असीम अहंता पाने को बलवान होने का आदेश देते थे। वे कहते थे-
वेदाहमेतं पुरुषं महाँत आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पंथा विद्यतेऽयनाय॥
(श्वेताश्वतर)
मैं उस महान पुरुष का विषय जानता हूँ वह आदित्य की भाँति प्रकाश है उसमें अज्ञानांधकार नहीं विराजता उसको जान सकने से ही जीव मृत्यु के हाथ से परित्राण पाता है। जीव को मोक्ष प्राप्ति का और कोई उपाय नहीं है।
वे कहते थे हे मानव! अपनी आपत्ति को मत भूलो तुम उसी पर ब्रह्म के पुत्र हो, अमर हो इंद्रादि देवता भी जिस तरह ब्रह्म के पुत्र हैं उसी तरह तुम भी उसी के पुत्र हो उन्होंने जैसे ब्रह्म में चित्तार्पण करके दिव्य ज्ञान प्राप्त किया है तुम भी उसी तरह उसकी शरण लेकर दिव्य ज्ञान की ओर चलो।
युजेवाँ ब्रह्म पूर्व नमोभि श्लोका याति पथ्येव सुराः।
शृण्वतिं विश्वे अमृतम्य पुत्रा आये धामानि दव्यानि ताथु॥
(श्वेता.)
ब्रह्मचर्य के द्वारा ही आत्मा की पूर्व जन्मार्जित और इस जन्म की मलिनता दूर होती है, सब भूतों में आत्मा का अनुभव होता है और अहंता का प्रसार होता है। इस प्रसार में ब्रह्मचर्य ही मुख्य सौपान है। वेदादि शास्त्रों में ब्रह्मचर्य की अपार महिमा कीर्तित हुई है। ब्रह्मचारी ही प्राचीन आर्य ऋषियों के हृदय की आदर्श मूर्ति थे; समिधपाणिं कृष्ण निताम्बर जटाधारी ब्रह्मचारी आर्य समाज के मुकुटमणि थे। वे अपने सुख-दुख भूलकर शीत ग्रीष्म वर्षा की परवाह न कर सागर पर्वतादि को प्रतिबन्धकता पर भ्रूक्षेप न कर केवल परोपकार व्रत हृदय का एकमात्र लक्ष्य करके देश-विदेश में सर्वत्र लौकिक और परलौकिक विविध मंगल साधन में अपना जीवन उत्सर्ग करते थे।
ब्रह्मचारी की आदर्शमूर्ति हृदय में उदित होने से ही वे आनन्दाश्रु विसर्जन करते-करते भूमण्डल में देव सदृश उन महात्माओं के गुण कीर्तन करना आरम्भ करते थे। आत्म संयम, क्लेश सहिष्णु और परोपकार वृत्ति रहे बिना जगत का कोई भी कार्य पूरा नहीं हो सकता। ज्वलन्त परोपकार वृत्ति हृदय में न रहने से कोई अपनी अधिकृत विद्या दूसरे को सिखा नहीं सकता। और बिना सिखाये भूलने लगता है। जितेन्द्रिय, निर्लोभ और प्रकृतिवर्ग का कुशल कामी हुए बिना राजा कभी राज्य शासन कर नहीं सकता। यदि कोई राजा ब्रह्मचारी ही आदर्शमूर्ति हृदय से बाहर कर दे तो अवश्य ही कुछ दिन में राज्य भ्रष्ट होना पड़ेगा। संसार में सर्वत्र देखा जाता है कि जहाँ नियम हैं, जहाँ आत्म संयम है, जहाँ परोपकार वृत्ति है, जहाँ अहंता का प्रसार है वहीं मृणाल, अरविन्द, सुशोभित, केलि पर हंसराजि विराजित सुशीतल वारिपूर्ण, मानस सरोवर रूप कुशल विद्यमान है। और जहाँ स्वेच्छाचार, असंयम, स्वार्थपरता है वहीं मानव के सब अनर्थ का स्वरूप विस्तीर्ण मरुमरीचिका तैयार है। अतएव ब्रह्मचर्य साधन बिना अपना या पराया कोई भी किसी का कार्य पूरा नहीं कर सकता। भारद्वाज ऋषि ने तीन जन्म तक ब्रह्मचर्य पालन किया। तीसरे जन्म के अन्त में जब वे आसन्न मृत्यु थे, तब इन्द्र ने उनसे जिज्ञासा की, कि यदि आपको चौथा जन्म मिले तो आप क्या करेंगे? उत्तर दिया कि “मैं ब्रह्मचर्य का अनुष्ठान करूंगा।”
(तैत्तिरीय ब्राह्मण)
परायाहित करने का संकल्प होने के लिए मानव को सबसे पहले अपना शरीर मन और आत्मा का उत्कर्ष साधने में पूरा यत्न करना चाहिए। दरिद्र कुटी को चाहे राज महल हो, अपने ज्ञान और कर्म के हेतु से जहाँ जन्म हुआ हो, आवश्यकतानुसार जो कार्यभार तुम्हारे कन्धे पर पड़ा हो उसे यदि सबल शरीर दीर्घायु, संयतमना, भगवद् भक्त न होंगे तो किसी तरह उसे अच्छी तरह पूरा न कर सकेंगे। ब्रह्मचर्य साधन द्वारा शरीर बलवान कर सकने से मानसिक वृत्तियों का उत्कर्ष साधन कर सकने से आपकी अहंता का प्रसार होगा, भववरिघ वक्ष पर जल के बुदबुदे की भाँति आपका बारम्बार उदय और लय न होगा।
दुर्बलकाय, दुर्बलचित्त, अविश्वासी पुरुष संसार का कोई काम नहीं कर सकता, इसी कारण ऋषि लोग जीवन के प्रथम भाग को ब्रह्मचर्य नाम से बता गये हैं। सब ज्ञान ब्रह्म ज्ञान ही के अंतर्गत है। जो कुछ ब्रह्मज्ञान का विरोधी है वही अज्ञान या अविद्या है।
वस्तुतः अनेक प्रकार के लौकिक कार्यों के साथ जो हम धर्माधर्म का कुछ सम्बन्ध नहीं समझते यह हमारा भ्रम है, बल्कि प्रत्येक मानव जीवन का जगत् के दृष्टानिष्ठ से घनिष्ठ सम्बन्ध है। हमारे छोटे-छोटे कामों से भी जगत् का हिताहित मिला हुआ है। ब्रह्म के चिदाकाश में हमारे जीवन के कार्य प्रतिबिम्बित होकर सुरक्षित रहते हैं, फिर वे बलिष्ठ और जीवन्त रूप से एक महती शक्ति रूप में परिणत होकर ‘अदृष्ट’ रूप से हमारे जीवन को चलाते हैं। केवल हमारे कार्य ही नहीं बल्कि हृदय के गुह्यतम विचार भी अदृष्ट बनकर हमें जीवन का, सुख-दुःख का विधान करते हैं। विश्वनाथ के विश्व में कोई कार्य निष्फल नहीं होता। आपके आहार-विहार, वस्त्राभूषणादि, जिनके साथ आप धर्माधर्म का कुछ सम्बन्ध नहीं मानना चाहते उनके साथ भी धर्म का सम्बन्ध रहता है, उन सबके साथ भी अहंता के प्रसार का सम्बन्ध है। विश्व के साथ आपके जीवन की इतनी घनिष्ठता है कि विश्व के अनिष्ट से आपका और आपके अनिष्ट से विश्व का अनिष्ट है। मैं यह कार्य करूंगा इससे मेरी यह क्षति होगी, दूसरे किसी को क्या, यह बात कहने का आपको अधिकार नहीं है, क्योंकि आप समाज के एक अंग मात्र हैं, आपकी क्षति होने से समाज के अन्यान्य लोगों की भी क्षति होगी अतएव समाज आपके अनिष्ट द्वारा समाज का अनिष्ट क्यों होने देगा? आर्यशास्त्र में आत्महत्या महापाप कहा है, इसके करने वाले को राजदण्ड भी मिलता है। इसका मूलतत्व तलाश करने पर समझ सकेंगे मनुष्य जीव का आपस में सम्बन्ध मिला होने से अपना अहित कोई भी करे तो समाज उसे रोकता है। जैसे कोई आत्महत्या कर अनाथ बाल-बच्चे छोड़ मरे तो वे समाज को भार रूप हो जाते हैं। यदि दीर्घायु होंगे तो समाज के तुम से अनेक लाभ होंगे, जगत के मंगल और तुम्हारे मंगल में कुछ विरोध नहीं है। अहं के प्रसार से भेद ज्ञान दूर होगा, ब्रह्मज्ञान प्राप्त होगा। जगत् की प्रायः सब क्रियायें प्रेयोमुखी हैं, श्रेयोमुखी नहीं है। श्रेयोमुखी ज्ञान क्रिया ही यथार्थ ज्ञान और यथार्थ कार्य है एवं प्रेयोमुखी ज्ञान क्रिया अज्ञान और अकार्य है। जिनका भेदज्ञान नष्ट नहीं हुआ, जिनका अहंभाव का प्रसार नहीं हुआ, जो आप ही अन्धे हैं उनसे ब्रह्मचर्य ग्रहण करने का ऋषियों ने निषेध किया है।
काम, क्रोध, लोभ ये तीन नरक के द्वार हैं, इस कारण इनका भी त्याग करो, इन्द्रिय संयम करो, सब जीवों पर दया करो यही ब्रह्मचारी जीवन का मूलमन्त्र है। जिन्होंने इन तीन को जीत लिया वे देवतुल्य हैं। हे भारतवासियों! जिस तरह अपने घर में शालिग्राम शिला स्थापन करते हो उसी तरह ब्रह्मचारी की मूर्ति प्रतिष्ठित करो, तो तुम्हारा क्षुद्रत्व दूर हो जायगा और जिनको तुम अछूत समझते हो वे तुम्हारे शिष्य बनने की प्रार्थना करेंगे।
मनुष्य गलतियों से भरा हुआ है। सब में कुछ न कुछ दोष होते हैं। इसलिए दूसरों के दोषों पर ध्यान न देकर उनके गुणों को परखना चाहिए और आपस में मिल जुल कर एक दूसरे को सुधारने का उद्योग करते हुए प्रेम पूर्वक आगे बढ़ना चाहिए।
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जिसने ईश्वर को नहीं पहचाना उसने कुछ नहीं जाना। जिसने ईश्वर को जान लिया उसने इस संसार की जानने योग्य संपूर्ण वस्तुओं को जान लिया।
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दूसरों के सद्व्यवहार और सत्कार से तुम्हें कितनी हार्दिक प्रसन्नता होती है। यदि तुम भी वैसा ही सद्व्यवहार और सत्कार दूसरों के साथ करो तो दुनिया तुमसे भी संतुष्ट रहेगी।
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लोगों का एक दुख मिटता है तो दूसरा उन्हें आ घेरता है। सदैव कोई न कोई भय बाधा उन्हें सताती रहती है। कारण यह है कि आनन्द के मूल स्त्रोत को उन्होंने छोड़ दिया है।
(श्री जगन्नाथप्रसाद शर्मा, अध्यापक, दाँता)
मगध देश का एक राजा था। उसका नाम था चित्रंगद। वह अपनी प्रजा के सुख दुखों का पता लगाने के लिए राज्य भर में भ्रमण करने निकला। पुराने जमाने में यात्रा के आज जैसे साधन न थे। रेल और मोटरें थी नहीं, पक्की सड़कें भी कम थीं। दूर देश जाने के लिए घने जंगलों को पार करना पड़ता था। राजा अपनी यात्रा करते हुए एक बड़े जंगल में होते हुए निकले।
दिन भर की यात्रा से सब लोग थक गये थे। वे कहीं विश्राम करने की फिक्र में ही थे कि सामने एक सुन्दर सरोवर दिखाई दिया। चारों ओर हरियाली थी, सुन्दर पुष्प खिले हुए थे, पक्षियों के कलरव से वह स्थान बड़ा शोभायमान हो रहा था। इस और रात को वहीं डेरा डाल देने का हुक्म दे दिया। सब लोग अपना श्रम मिटाने लगे।
पास में कुटी दिखाई दी। राजा ने नौकरों को पता लगाने भेजा- “देखो तो इस कुटी में कौन रहता है?”
नौकर वहाँ पहुँचे। देखा कि एक महात्मा भगवान का भजन कर रहे हैं। नौकरों ने जो देखा था राजा को बता दिया। राजा ने सोचा इस एकान्त वन में भजन करने वाला साधु निश्चय ही धनाभाव के कारण कष्ट उठाता रहता होगा। हम आज इसके आश्रम में आये हैं, राजा का धर्म है कि अपने राज्य में महात्मा को कष्ट न होने दे। इसलिए इसे कुछ धन देना चाहिए।
राजा ने एक दूत के द्वारा महात्मा के लिए सौ रुपये भेजे। नौकर साधु के पास पहुँचे और हाथ जोड़कर कहा- महाराज! आज आपके आश्रम में इस मगध देश के राजा चित्राँगद आये हुए हैं। उन्होंने यह धन आपके लिये भेजा है।
थैली को देखकर साधु मुस्कुराया और उसने धीमे स्वर में कहा- “यह धन किसी भूखे नंगे को दे देना मुझे इसकी जरूरत नहीं है।” बारबार आग्रह करने पर जब साधु ने यही उत्तर दिया तो दूत निराश लौट आया और साधु का उत्तर राजा को कह सुनाया।
राजा ने सोचा- साधु को कदाचित अधिक धन की आवश्यकता होगी। इन थोड़े रुपयों को देखकर वह असंतुष्ट हुआ होगा इसीलिए उन्हें लौटा दिया है। राजा ने दुबारा पाँच सौ रुपये भेजे। किन्तु साधु ने फिर वही उत्तर दिया। तीसरी बार एक हजार, चौथी बार दो हजार, पाँचवीं बार दस हजार रुपये राजा ने भेजे पर साधु टस से मस नहीं हुआ। उसने यही कहा- मुझे रुपयों की कोई जरूरत नहीं है।
अब तो राजा का कौतूहल बहुत बढ़ा और वे स्वयं साधु से पास चल दिये। राजा ने महात्मा को प्रणाम किया और पास में पड़ी हुई चटाई पर बैठ गये। चित्राँगद ने साधु से कहा- भगवन् क्यों मेरा धन आप स्वीकार नहीं करते? जीवन निर्वाह की उपयोगी वस्तुएँ धन द्वारा प्राप्त होती हैं। इससे आपके निर्वाह की आवश्यकताएं पूरी होंगी धन को ग्रहण करके मुझे कृतार्थ कीजिए।
साधु ने सहज स्वाभाविक हँसी हँसते हुए कहा- राजन! धन लौटाने से मेरा तात्पर्य यह नहीं था कि आपका धन कम है या उसमें कुछ दोष है। बात केवल इतनी सी है मुझे तुम्हारे धन की आवश्यकता नहीं थी। मेरी जरूरत के लिए मेरे पास धन है। राजा ने आश्चर्य से पूछा- आपकी कुटी में तो मुझे कुछ भी दिखाई नहीं देता, फिर वह धन कहाँ है?
महात्मा राजा का कल्याण करना चाहते थे। साधुओं का स्वभाव ही दूसरों का कल्याण करने का होता है। अपनी अंतर्दृष्टि से राजा की वर्तमान मनोदिशा परख ली और उसको मार्ग तक ले पहुँचने की युक्ति भी सोच ली। उन्होंने राजा के कान के पास मुँह ले जाकर चुपके से कहा- “मैं रसायनी विद्या जानता हूँ- ताँबे से सोना बना लेता हूँ।” राजा चुपचाप वापस चले आये।
चित्राँगद को रात भर नींद नहीं आई। वह सोचता रहा- किसी प्रकार मैं रसायनी विद्या सीख जाऊं तो कैसा अच्छा हो। धन की मुझे किसी प्रकार की कमी न रहे। खजाने सोने से भरे रहें। वैभव हजारों गुना बढ़ जाय और पृथ्वी भर का स्वामी हो जाऊं। तरह-तरह के सुनहले दृश्य उसके मस्तिष्क में घूमने लगे। किसी भी प्रकार हो इस विद्या को सीखूँ। राजा का मन व्याकुल हो रहा था। कब सवेरा हो कब साधु के पास पहुँचु। एक-एक क्षण वर्ष की बराबर बीत रहा था। बड़ी मुश्किल से उसने रात काटी। बड़े तड़के नित्यकर्म से निवृत्त होकर राजा कुटी की ओर लपका।
महात्माजी भजन में मग्न बैठे हुए थे। राज उनके चरणों में लोट गया। साधु ने उसे उठाकर बिठाया और कुशल समाचार पूछा। राजा ने कहा- भगवन् किसी प्रकार मुझे भी वह रसायनी विद्या सिखाइये जिसे सोना बना सकूँ। इससे मेरा जीवन सफल हो जायगा।
साधु अपनी युक्ति की सफलता पर मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए और कहा- राजन! मैं तुम्हें सिखा दूँगा। परन्तु इसके लिए कुछ समय चाहिए। तुम मेरे पास नित्य आया करो एक वर्ष के पश्चात तुम्हें वह विद्या सिखा दूँगा। राजा ने यह स्वीकार कर लिया और अपने रहने की ऐसी व्यवस्था करली कि नित्य साधु के पास आकर उनसे सत्संग कर सके।
उच्च आत्माएं मुख से कह कर या शरीर से कार्य करके ही नहीं वरन् आध्यात्मिक बल से भी संबंध रखने वालों में विचित्र परिवर्तन कर देती है। राजा साधु से निकटवर्ती वातावरण में बैठता और उनकी विचार गंगा में स्नान करके पवित्र हो जाता।
यही क्रम नित्य चलने लगा। माया ममता के द्वंद्व उससे छूटने लगे। और आत्मा के पवित्र स्वरूप का दर्शन करने लगा। सोना बनाना सीखने के लिए जो व्याकुलता थी, आध्यात्मिक शान्ति में परिणत होने लगी। राजा का मन भगवान के चरणों में रस लेने लगा। जैसे-जैसे दिन बीतते जाते थे उसका परिवर्तन तेजी से बढ़ता जाता था।
पूरा एक वर्ष बीत या। राजा अब स्वयं एक महात्मा, संसार का सच्चा अर्थ समझने वाला आदर्श त्यागी हो गया था। साधु ने उस दिन अपने निकट बिठाया और सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा- वत्स! रसायनी विद्या सीखोगे?
राजा ने गुरु के चरणों में शीश झुका दिया और कहा प्रभो, अब तो मैं स्वयं रसायन बन गया। अब और क्या सीखने को बाकी रह गया। किसी नश्वर विद्या को सीखने की अब मुझे आवश्यकता नहीं है।
राजा सचमुच सच्ची रसायनी विद्या सीख गया था। सोने या लोहे के पहाड़ जमा करके उसे अब कुछ नहीं करना था।
अपनी आन्तरिक बुराइयों और नीच वृत्तियों से डर कर भागने से काम न चलेगा। अपने इन आस्तीन के साँपों से धैर्य पूर्वक रक्षा करनी पड़ेगी और बुद्धिमानी के साथ उन्हें नष्ट करना पड़ेगा।
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अपनी बुरी इच्छाओं को शुरू होते ही रोको। सावधान! वे बढ़ने न पावें पापवृत्तियाँ थोड़े ही समय में इतनी बढ़ जाती है कि उनका सँभालना कठिन हो जाता है।
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बहुत जोड़ने की कोशिश मत करो। बहुत जोड़ने का अर्थ बहुत गंवाना है। रेशम के कीड़े और शहद की मक्खी को देखो। बहुत जोड़ने के फल स्वरूप उन्हें कितना गँवाना पड़ता है।
कहानी-
कल के लिये मत छोड़ो!
(श्री पं. हरिशंकर शास्त्री दुमदुमा)
लंका में राम-रावण का घोर युद्ध समाप्त हो चला था। दोनों ओर के हजारों योद्धा समरभूमि में अपना रक्त बहा चुके थे। रावण का परिवार इस युद्ध में नष्ट हो चुका था। आज रावण ने स्वयं अन्तिम युद्ध किया था पर वह भी मारा गया। श्रीराम के बाणों ने उसका उदर विदीर्ण कर डाला था। अवसान की अन्तिम घड़ियों में रावण मृत्यु शैया पर पड़ा हुआ था।
उसके कर्म आसुरी थे, फिर भी वह पंडित था। वेदों का उसे ज्ञान था। राजनीति और धर्म ग्रन्थों का उसने परायण किया था। अपने समय का सर्वश्रेष्ठ विद्वान् था। विद्वान होते हुए भी लोग पाप कर्मी हो जाते हैं, रावण भी अपने ज्ञान को कर्म से संबंधित न कर सका था। इसी से वह असुर था।
रावण का अन्तिम समय निकट जानकर राम ने लक्ष्मण को बुलाया और कहा- लक्ष्मण! अपने समय का सर्वश्रेष्ठ पंडित अब मर रहा है। तुम उसके पास जाकर नीति संबंधी कुछ शिक्षा प्राप्त करो।
लक्ष्मण जी प्रसन्नता पूर्वक चल दिये और रावण से नीति की शिक्षा देने की प्रार्थना की। किन्तु उसने कुछ उत्तर नहीं दिया। तीन बार लक्ष्मण ने वही प्रार्थना की किन्तु मौन के अतिरिक्त उन्हें कुछ उत्तर न मिला। निराश लक्ष्मण वापस लौट आये।
राम ने पूछा- कहो भाई! क्या शिक्षा प्राप्त की? लक्ष्मण ने कहा उसने कुछ भी उत्तर नहीं दिया है। राम ने सारी स्थिति जान ली। उन्होंने कहा कि तुम्हें व्यवहार नीति का ज्ञान होना चाहिए। तुम शत्रु की तरह युद्ध करने नहीं किन्तु उससे शिष्य की तरह विद्या पढ़ने गये थे। क्या तुमने शिष्य का सा आचरण रावण के साथ किया था? लक्ष्मण को अपनी भूल मालूम हो गई और वे लज्जित होकर पुनः रावण के पास पहुँचे।
अब की बार उन्होंने शिष्य की भाँति आचरण किया। रावण का पूजन करके, चरणों में सिर नवाया और उसकी प्रदक्षिणा की। धर्मशास्त्र ने इस विधान को गंभीर मनोवैज्ञानिक आधार पर स्थिर किया है कि शिष्य गुरु के सम्मुख विनम्र बन कर उन्हें संतुष्ट करते हुए विद्याध्ययन करें। क्योंकि बिना इसके वे विद्या का मर्म प्राप्त नहीं कर सकते।
लक्ष्मण के उचित आचरण से रावण संतुष्ट हुआ और उन्हें अधिकारी जानकर नीति की शिक्षा देने के लिए मृत्यु शैय्या पर से उठ बैठा।
धर्म और नीति की अनेक शिक्षा देने के उपरान्त उसने अपना सबसे मूल्यवान अनुभव बताना आरम्भ किया। रावण ने कहा- लक्ष्मण! मैं अपने जीवन में चार काम करना चाहता था। मेरा विचार था कि (1) लंका के आस-पास सौ योजन तक खारी समुद्र को मीठा कर दूँ। (2) सोने की लंका को सुगन्धित भी कर दूँ (3) स्वर्ग के लिये सीढ़ियां लगवा दूँ (4) मृत्यु को पूरी तरह वश में कर लूँ!
अपने बल वैभव के सम्मुख मुझे यह चारों काम बहुत सरल और तुच्छ प्रतीत होते थे। सोचता था कि जिस दिन चाहूँ उसी दिन इन्हें पूरा कर लूँगा। जिन देवताओं के अधिकार में उपरोक्त बातें हैं उन्हें किसी दिन पकड़ लाऊंगा और चारों ही बातें पूरी हो जायेंगी। अपने अभिमान के कारण इन कार्यों को छोटा समझ कर उपेक्षा की दृष्टि से देखता रहा और समय को टालता रहा।
आज मेरा अन्तिम समय आ पहुँचा है चारों में से एक भी बात पूरी न कर सका और अब मैं इस दुनिया से जा रहा हूँ मन के अरमान मन में ही रह रहे हैं। देखता हूँ कि उपेक्षा ,समय को टालना, अपनी शक्ति के गर्व में छोटे कामों को सरल समझना और जिस काम को आज कर सकते हैं उसे कल के लिए छोड़ना मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी भूल है।
“यही भूल मुझे इस मृत्यु की घड़ी में दारुण दुःख दे रही है।”
यह कहते-कहते रावण के नेत्र बन्द हो गये।
लक्ष्मण उपदेशों को ग्रहण करके रावण के मृत शरीर का अभिवादन करते हुए वापिस लौट आये।
बात युगों पुरानी हो गई। आज रावण नहीं है और न लक्ष्मण ही मौजूद है पर रावण की अन्तिम वेदना आज भी विश्व में गूँज रही है और हमारे मानस तंतुओं पर झंकृत होकर यह प्रश्न उपस्थित करती है कि “कहीं हम भी आज के कामों को कल पर तो नहीं छोड़ रहे हैं?
(ले. श्रीकृष्ण शंकर, उमिया शंकर जी)
साधना शब्द का प्रयोग देवी देवताओं को उपासना के लिए भी होता है, जिससे अभीष्ट महान् कार्य की सिद्धि होती है। देश, काल, क्रिया, वस्तु और कर्त्ता में पाँचों जब साधना के लिए उपयुक्त होते हैं तभी साधना सिद्ध होती है।
साधना दो प्रकार की होती है दैवी और आसुरी। इन्हीं को शास्त्र में दक्षिण और वाम मार्ग कहा गया है। दक्षिण मार्ग की साधना में साधक को लाभ चाहे न हो, परन्तु हानि तो होती ही नहीं। पर वाम मार्ग की साधना में लाभ नहीं होता तो नुकसान जरूर होता है। दक्षिण मार्ग में तत्काल लाभ नहीं दीखता, धीरे-धीरे कल्याण होता है, परन्तु वाम मार्ग में तत्काल ही लाभ-हानि हो जाती है।
दोनों में ही अक्रोध, शौच और ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है। इनका पालन न करने से दक्षिण मार्ग में कोई फल नहीं मिलता परन्तु वाम मार्ग में बड़ा नुकसान हो जाता है। कभी-कभी तो प्राणों पर आ बीतती है। वाम मार्ग में जरा भी कहीं चूके कि बलिदान होते देर नहीं लगती।
मेरे एक मित्र ने किसी मन्त्र की सिद्धि के लिए ग्रहण के दिन श्मशान में एक आक के पेड़ के नीचे बैठकर साधना शुरू की। उन्हें सामने के पहाड़ से एक अघोरी उतरता दिखाई दिया। अघोरी ने श्मशान में पहुँच कर एक बच्चे की गड़ी हुई लाश निकाली और उसे सेक कर खा गया। फिर वहीं गुम हो गया। यह देखकर मेरे मित्र का शरीर मारे डर के पसीने-पसीने हो गया, वे बड़े जोर से चीख मारकर वहीं ढुलक पड़े। वहाँ उनकी कौन सुनता? ग्रहण शुद्ध होने पर लोग नहाने को आये, चन्द्रमा का उजयाला हुआ, तब किसी ने उनको वहाँ पड़े देखा। उठाकर मन्दिर में लाया गया। जोर से ज्वर चढ़ा था। तीन चार दिनों बाद बुखार उतरा, पर वे पागल हो गये और कुछ ही वर्षों के बाद शरीर छोड़ कर चल बसे।
वेद में ब्राह्मण और मन्त्र- ये दो विभाग हैं, किसी भी देव की सिद्धि के लिए उस देवता की मूर्ति, यन्त्र और मन्त्र की जरूरत है। प्रयोग के समय वहाँ एक-दो आदमी उपस्थित रहने चाहिए। कभी-कभी तो मनुष्य एकाँत से ही डर जाता है और यों उसका सब काता-बुना कपास हो जाता है।
मेरे एक परिचित देवी के उपासक थे। वे अपने घर में रात्रि को सदा उनके मन्त्र का जाप करते। एक दिन उन्होंने एकाएक अपने शरीर पर कुछ बिच्छुओं को चढ़ते देखा। वे काँप उठे। बिच्छुओं को झड़काने लगे। फिर मंत्र शुरू किया, बिच्छू फिर चढ़ने लगे। बस, तब से उन्हें सिद्धि तो मिली ही नहीं, परन्तु जहाँ जप शुरू किया कि लगे कपड़े झड़काने! उनके मन में निश्चय हो गया कि मेरे कपड़ों पर अभी बिच्छू चढ़ रहे हैं। ऐसे समय में कोई दूसरा पुरुष पास होता तो शायद वे रास्ते पर आ सकते!
डामर-तन्त्र के मन्त्र तत्काल सिद्धि देते हैं, पर उनका फल थोड़े ही समय के लिए रहता है। स्थायी नहीं रहता। वे मन्त्र केवल चमत्कार दिखाने में ही काम करते हैं।
उग्र देवता की साधना और उग्र फल की प्राप्ति के लिए बहुत बार अपने प्राणों को हथेली पर रख देना पड़ता है। गाँवों और शहरों में कितने ही ऐसे साधू फकीर मिलते हैं, जो कुछ शून्य साधना करते हैं और जरूरत पड़ने पर किसी-किसी समय वे उन्हें आजमाते हैं। बिच्छू और साँपों का जहर उतारने वाले मन्त्र-साधक तो हम लोग बहुतेरे देखते हैं। हमारे राज्य में तो ऐसे एक सज्जन सौ रुपये मासिक वेतन पर नियुक्त हैं।
मेरे एक सम्बन्धी के घर हमेशा एकाधिक बिच्छू निकलता रहता। मेरे जात के एक सज्जन मन्त्रशास्त्री हैं। मैंने उनसे कहा। उन्होंने जाकर मकान के आसपास अभिमन्त्रित जल छिड़क दिया। प्रायः दस मिनट के बाद चारों ओर से बिच्छू आ-आकर इकट्ठे होने लगे। लगभग पचास बिच्छुओं की पकड़-पकड़कर एक बर्तन को भर लिया गया और उन्हें वे दूर छोड़ आये। तबसे आज तक वहाँ एक भी बिच्छू दिखलायी नहीं पड़ा।
लक्ष्मी की प्राप्ति के लिये मैंने लक्ष्मीसूक्त का ‘काँसोस्मिताँ’ मन्त्र सिद्ध करने का निश्चय किया। दुर्गापीठ में बतलाई हुई विधि के अनुसार न्यास और ध्यान सहित मैंने उक्त मन्त्र का सम्पुट देकर जप शुरू कर दिया। लगभग पन्द्रह सम्पुट शतचण्डी पूरी हो गई, परन्तु मेरी साधना सफल नहीं हुई। इस पर भी मैंने प्रयोग को चालू ही रखा। एक दिन एकाएक मेरे मन की स्फुरणा हुई कि इन मंत्रों को श्री महादेवजी ने कील रखा है। उत्कीलन किये बिना सिद्धि नहीं मिलती। तब मैंने मन्त्र को उत्कील किया। बस, तुरन्त ही घी और तेल के जो दीपक स्वाभाविक जल रहे थे उनमें ज्योति पैदा हुई और वह मेरी आँखों तक ऊपर की ओर उठी। देवता का सिंहासन मेरे सामने था। दुर्गापीठ की पोथी खुली पड़ी थी। पाठ लगभग पूरा होने को आया था। रात्रि के बारह बजे थे। जन्माष्टमी के कारण पास ही देव मन्दिर में दर्शनों के लिए दौड़-धूप हो रही थी और कोलाहल मचा हुआ था।
इसी बीच इस घटना के बन जाने पर मैंने सोचा, मेरी आँखों में जल भर आया होगा, इसी से मुझे ऐसा लगता होगा। इसलिये मैंने आसन से उठकर आँखों पर जल छिड़का, मुँह धोया और फिर पाठ करना शुरू कर दिया। पाठ शुरू करना था कि फिर वही हाल!
मुझे कुछ डर-सा लगा कि कहीं मैं जल न जाऊं। अतएव मैं उठकर दर्शन करने चला गया। फिर नहा धोकर अधूरा पाठ पूरा करने बैठा। पाठ शुरू करते ही फिर वही हाल हुआ। इस समय रात्रि के दो बजे थे। मनुष्यों के पैरों की आहट शाँत हो गयी थी। चारों ओर सुनसान था। सारी पोथी और सिंहासन तेजोमय हो रहे थे। जैसे-तैसे पाठ पूरा करके मैं उठा। उस समय सबेरे के पाँच बजे थे।
नवमी के दिन मैंने पाठ न करके केवल जप शुरू किया। जप करने में भी वैसा ही हुआ। तब से मेरे अन्दर लक्ष्मी जी आने लगीं। मेरी वकालत की प्रैक्टिस बढ़ती ही गई। यहाँ तक कि किसी-किसी समय तो खाने-पीने का भी अवकाश नहीं मिलता और अधिकाँश समय तो मुझे सिर्फ चाय और चिउरों पर चलाना पड़ा था। रात के दो बजे तक फुरसत नहीं मिलती।
मैं अपने एक मित्र के साथ गिरनार पहाड़ पर जा रहा था। साधु-संतों की चर्चा चल रही थी। मित्र ने कहा, तुम्हें यह सब एकाएक कैसे हो गया? ‘मैंने कहा- चमत्कार देखना हो तो अभी दिखाऊँ।’ मैंने तुरंत ही ‘काँसोस्मिताँ’ मन्त्र का जप शुरू किया। हम लोग बहुत आगे बढ़ गये, परन्तु कुछ भी हुआ नहीं। मैं कुछ सकुचाया। जप तो चालू था। इतने में ही एक पेड़ की ओर से आवाज आयी- ओ वकील साहेब। आवाज सुनकर मेरे मित्र और मैं स्तब्ध होकर इधर-उधर देखने लगे। एक फकीर ने केवड़े की एक फली और नकद पन्द्रह रुपये पैरों में रखकर मेरे चरण छुए। मेरे मित्र यह देखकर मन्त्रमुग्ध से रह गये। मुझे याद नहीं था कि इस फकीर की लगभग डेढ़ वर्ष पहले मैंने फौजदारी से छुड़ाया और वे रुपये उसी की फीस के थे।
कई मन्त्र देवता अन्धे होते हैं। कई बहरे, गूँगे और लूले-लंगड़े भी होते हैं। ऐसे देवताओं की साधना कष्टसाध्य है। द्वादश मुद्राओं के साधन से इनको सिद्धि प्राप्त हो सकती है, परन्तु अगर कहीं जरा भी चूके कि फिर चौकड़ी भूलते देर नहीं लगती।
किसी-किसी देवता से साधक की पूरी पटती ही नहीं, इससे वह चाह कितनी ही साधना करे, हाथ में आई हुई बाजी भी छटक जाती है और साधना व्यर्थ होती है।
सिद्ध-देव की साधना सिद्धि प्राप्त होने के बाद भी साधक को चालू रखनी चाहिये। नहीं तो, उस दैवी सिद्धि को अदृश्य होते देर नहीं लगती; और फिर उसका हाथ लगना असम्भव हो जाता है।
साधक के लिये प्राप्त हुई सिद्धि का उपयोग स्वार्थ में न करके परमार्थ में ही करना श्रेयस्कर है। थोड़े समय के लिये साधक को स्वार्थ-साधन होता देखकर सुख होता है, परन्तु इसके लिये आगे चलकर उसे बहुत कुछ सहन करना पड़ता है।
‘क्लौ काली-विनायकौ’ कलियुग में काली और विनायक की साधना शीघ्र सिद्ध होती है। बस, इतना सुनकर मेरे एक वकील मित्र ने गणपति की साधना आरम्भ की। जप, तर्पण, मार्जन, होम और ब्राह्मण भोजन सभी साधनों में आवश्यक है। कुछ खास-खास जप-तप प्रायश्चित्तादि तो दोष निवारण के लिये करने पड़ते हैं। इस प्रकार करते उक्त वकील मित्र को लगभग तीन महीने बीत गये। ब्रह्मचर्य का व्रत भंग हुआ। इससे चौथे महीने के चौथे दिन उन्हें रात को स्वप्न में हाथी दिखायी दिये, वे उन्हें मारने के लिये आगे बढ़ जा रहे थे एक-दो बार जागे, परन्तु विशेष ध्यान नहीं दिया फिर एकाएक जाग उठे और ‘मुझे ये हाथी मार रहे हैं, बचाओ-बचाओ’ पुकारते हुए दौड़ने लगे। चिल्लाहट सुनकर स्त्री-बच्चे जागे और उन्हें पकड़कर जल पिलाकर शान्त किया। सबेरे देखा गया, उनके मुँह पर सूजन थी। एक सप्ताह तक दवा हुई। आखिर ऑपरेशन कराकर दो महीने अस्पताल में रहना पड़ा। मुश्किल से मौत के मुँह से बचे।
काली और विनायक बहुत उग्र देवता हैं और उनकी सिद्धि भी बहुत उग्र है। सूरत के मेरे एक परिचित सज्जन ने दोनों चौथ शुरू की। वे जाति के ब्राह्मण है और भिखारी की हालत में थे। परन्तु प्रभुकृपा से इस समय उनकी ऋद्धि-सिद्धि लाखों की समझी जाती है। साधना के बाद ही उनका विवाह हुआ। इस समय वे बाल बच्चे वाले और ढेले-तबेले वाले सुखी हैं।
‘साधना’ हिन्दू को ही सिद्ध होती है, ऐसी बात नहीं है। कोई भी हो, आस्तिकता और श्रद्धा के साथ करने पर साधना सभी को फल देती है।
च्ह्रठ्ठद्ग ख्द्धश ह्ह्वठ्ठह्य ष्ड्डठ्ठ ह्द्गड्डष्द्धज् जो दौड़ता है वह पहुँच सकता है। हमें कुछ करना तो नहीं। फिर, ‘शास्त्रों में सब गपोड़े भरे हैं’ यों कहने से कोई भी काम सिद्ध नहीं होगा। ‘साधना’ का शास्त्र ‘वरदान’ या शाप का शास्त्र नहीं है। साधना से भड़कने का कोई कारण नहीं है। भूख मिटाने के लिये हमें रोज का अन्न सिद्ध करना पड़ता है। यह जैसे हमेशा का ‘रुटीन’ है; इसी प्रकार किसी बड़े काम की सिद्ध के लिये हम बड़े लोगों की मदद लिया करते हैं। ठीक, इसी प्रकार हमें देवताओं की साधना करनी चाहिये। देवताओं की साधना से हमें चिर-स्थायी सुख मिल सकता है, यह निर्विवाद बात है। यों तो ऐसा मानता हूँ कि किसी भी ‘साधना’ के बिना मनुष्य महान् बन ही नहीं सकता। किसी एक वस्तु को अवश्य सिद्ध कर रखना ही चाहिये। कर्ण, भीष्म, द्रोण आदि के पास महान सिद्धियाँ थी। इसी से वे महान् बन सके थे।
(कल्याण)
जिसने अपना अविनाशी, अजन्मा, अजर-अमर स्वरूप जान लिया वह ईश्वर से दूर नहीं रहता।
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उच्च सत्कर्म की परख कार्य की अधिकता से नहीं वरन् करने वाले की हार्दिक भावनाओं, प्रेम और श्रद्धा से करनी चाहिये।
(ले. कुँवर अमर सिंह जी)
बहुत सी वस्तुयें जो सूक्ष्मता, दूरी इत्यादि के कारण प्रतीत नहीं होती और उनकी सत्ता को सब मनुष्य मानते हैं, जैसे- बुद्धि, आत्मा, दुःख, सुख इत्यादि। इससे सिद्ध है कि संसार में ऐसी वस्तुयें विद्यमान हैं, जिनको मनुष्य इन्द्रियों से नहीं जान सकते। उनमें से एक ईश्वर है और यह प्रश्न कि ईश्वर कहाँ है बिल्कुल अशुद्ध है; क्योंकि कहाँ का शब्द स्थानीय के लिए आता है और वेद में ईश्वर को सर्वव्यापी बताया है। जैसे कोई कहे कि दूध में घी, या मिश्री में मिठास कहाँ है? तो उत्तर होगा सर्वत्र। कहाँ स्थानीय वस्तु के लिये प्रतीत होता है सर्वव्यापी के लिये नहीं।
जो परमात्मा को जानने के लिये इधर-उधर दौड़ते हैं, वह परमात्मा को कदापि नहीं पा सकते ईश्वर का सबसे निकटवर्ती स्थान अपने अन्दर है। क्योंकि हमारा आपा हमसे सब वस्तुओं की अपेक्षा निकट है। दुर्वासना, तृष्णा और लोक भक्षी भूख का धुँआ हमारे भीतर घुमड़ता रहता है। उसका विषैला प्रभाव दिव्य नेत्रों को खुलने नहीं देता इसलिये हमें परमात्मा के दर्शन नहीं होते। यदि हृदय को वासना रहित और निर्मल बना लिया जाये तो अपने रोम-रोम में परमात्मा तत्व की झंकार सुनी जा सकती है।
परमात्मा ने जीवात्मा को मन इत्यादि पर राज्य दिया है। और यह सब इन्द्रिय मन और शरीर आत्मा को नियत स्थान (मोक्ष) तक पहुँचाने के लिये साधन दिये हैं। अतएव जो मनुष्य आत्मा को इस स्थान से गिराकर अर्थात् बुरे कर्मों में लिप्त करने से मन इन्द्रिय और शरीर का दास बना देते हैं वह सचमुच आत्मा का नाश करते हैं।
रजकण-
(श्री लक्ष्मीनारायण जी गुप्त, मौदहा)
प्रत्येक व्यक्ति संसार की एक न एक पहेली सुलझाने में नित्य व्यस्त रहते हैं। कोई उलझे हुए मामले-मुकदमों को सुलझा लेना चाहते हैं, किन्हीं को पुत्र पौत्रों की (पारिवारिक) पहेली बेचैन किये है, कोई अपनी व्यापारिक उलझनों को दूर करने में ही दिन काटते हैं, किसी को अपने मान बड़ाई के किले को ही सुदृढ़ बनाने की लगन हैं। इन बातों के अतिरिक्त भी अनेक ऐसी पहेलियाँ हैं जो किसी न किसी रूप में सब के सन्मुख हैं और जन समुदाय उन्हें सुलझाने में अपनी सम्पूर्ण शक्तियों का ह्रास कर रहा है। परन्तु फिर भी सफलता दूर ही रहती है। यथार्थ में जीवन ही सब से बड़ी पहेली है यदि तमाम पहेलियों को त्याग कर जीवन का पथ ही सुलझा लिया जाय तो फिर उलझन ही क्या बाकी रहे?
न्यायी सभी होना चाहते हैं। दूसरे के मामले का फैसला कर देना आसान है, किन्तु अपना न्याय अपने आप कर लेना बहुत कठिन है। यदि अपना ठीक न्याय अपने ही हृदय से कर लिया जाय तो फिर दूसरों से अपने किये हुए भले-बुरे कर्मों के इन्साफ कराने की आवश्यकता ही क्या है?
आपने उपकार करना सीखा है? कैसे? अपने अहित होने पर भी दूसरों का हित होने देना त्याग पूर्ण उपकार है और इसी में शान्ति है, यह सभी जानते हैं। परन्तु यह शान्ति केवल उपदेश प्राप्त कर लेने से ही नहीं मिल सकती स्वयं इस पथ पर चलने से शान्ति का अनुभव प्राप्त हो सकता है।
(श्री नारायण प्रसाद तिवारी ‘उज्ज्वल’ काल्हीवाड)
यदि प्रकृति देवी की अवहेलना न की जावे तो संसार-निरीक्षण हमें बड़े मनोहर दृश्य दिखाता है। नदियाँ बहकर बतलाती हैं कि हमारा जीवन भी एक दिन बह जावेगा। चिड़ियाँ उड़ कर शिक्षा देती हैं कि यह जीवन किसी दिन उड़ जावेगा। प्रकृति देवी में कितनी सुन्दरता है, बहते हुए झरनों में कितना सौंदर्य है, उदयाँचल पर सूर्य की शोभा दर्शनीय है। बात यह है कि प्रकृति ‘सौंदर्य सार समुदाय निकेतन’ है, किन्तु मनुष्य भ्रम और भ्रान्ति का दास है उसका चंचल मन रुई के फोहे से भी हलका होकर काम क्रोधादि का दास बना हुआ है।
मनुष्य नवीनता का उपासक है, जीवन में नित्य प्रति होने वाली घटनायें चाहे वे कितनी ही भली क्यों न हों उनसे रोचकता घट जाती है। एक दिन मेरे मित्र से साँसारिक विषय की बातें हो रही थी प्रश्न हुआ कि पुरुष बड़ी संतान की अपेक्षा छोटी पर तथा पुत्र की अपेक्षा नाती पर क्यों अधिक प्रेम करना है, मेरा उत्तर था ‘मनुष्य नवीनता का उपासक है’।
प्रकृति देवी ने चौरासी लाख योनियों में भ्रमण कर हमें उन्नत योनि प्रदान की है, मानव जीवन प्राप्त करने के साथ मनुष्य ज्ञान का अधिकारी हो जाता है, इस दशा में मानव प्राणी का यह अपना काम है कि वह उत्थान की ओर जाय या पतन की ओर। यहीं से जीव के लिये कर्म की मीमाँसा आरंभ होती है।
कर्म दो प्रकार का है (1) इहलौकिक (2) पारलौकिक। किसी भी कर्म के पहले मनुष्य के हृदय में विचार उत्पन्न होता है; क्योंकि मन कल्पनाओं का पुञ्ज है। मन की किसी भी कल्पना को पूर्ण करने के लिये कर्म में निरत होना पड़ता है तथा उस कर्म को अन्तिम ध्येय तक पहुँचाने के लिये साधना की आवश्यकता है। मकान बनवाना है, कुँआ खुदवाना है, लेख लिखना है, इन सब बातों के लिये मन में विचार उत्पन्न होकर उस समय के कर्म की साधना करना पड़ती है। जीवन भी एक बड़ी साधना है, प्रेम साधन, भक्ति साधन, मोक्ष साधन, योग साधन इत्यादि अनेक हैं।
कोई भी कर्म करने के पहले उसका कारण भी अवश्य हुआ करता है। इहलौकिक कर्म के लिये कारण स्पष्ट है कि मनुष्य नवीनता का उपासक है। आज जिस एक वस्तु की इच्छा मन में उठकर उसकी प्राप्ति के लिये साधना की जाती है, कल उससे अनिच्छा भी हो सकती है; और भौतिक वस्तु की प्राप्ति के प्रायः यही फल हुआ करते हैं। मनुष्य वासनाओं का दास है इसी से भौतिक अथवा इहलोक साधना को और उसका झुकाव अधिक रहता है, किन्तु व्यावहारिक साँसारिक विभूतियों में भय है इसी से ब्रह्म ज्ञानियों ने संसार की नश्वर विभूतिओं को विभूतियाँ न कह कर भूति मात्र कहा है जिससे भौतिक शब्द की रचना हुई है। साँसारिक वैभव ‘बहुत कुछ’ है किन्तु ‘सब कुछ’ नहीं ढ्ढह्ल द्बह्य द्वह्वष्द्ध ड्ढह्वह्ल ठ्ठशह्ल ड्डद्यद्य. इस वैभव से मित्र, दास, दासी, रासी, राजपाट बहुत कुछ प्राप्त हो सकता है, किन्तु प्रेम, स्वास्थ्य, शाँति और सुख नहीं मिल सकता, हृदय की शाँति के लिये दूसरी विधि की खोज करना होगा। कितने ही ऐसे व्यक्ति मिलेंगे जो साँसारिक सम्पत्ति रहते हुए भी उस शाँति, सुख और प्रगाढ़ निद्रा के लिये लालायित रहते पाये जाते हैं जिसे सड़क के किनारे सोने वाले अनुभव करते हैं। साँसारिक सम्पत्ति गगनचुम्बी अट्टालिम्र बना सकती है किन्तु प्रत्येक मनुष्य को चाहे वह धनिक हो या दरिद्री अटूट समाधि के लिये 6 फुट जमीन से अधिक आवश्यकता न होगी।
रात दिन के आघात, दुख, सफलता और निराशाओं के कारण जब मानव हृदय रो पड़ता है, उसे अपनी शक्ति यों के ऊपर अविश्वास हो जाता है, एवं संसार में उसे अपना कोई भी दिखलाई नहीं पड़ता है उस समय वह अशरण शरण मंगलमय भगवान् की ओर आकर्षित होता है और संसार में रहते हुए भी संसार की चहल-पहल से दूर अपने जीवन पक्ष का निर्माण किसी अन्य दिशा में करने की आकाँक्षा करते हुए साधन पथ बदल देता है उस समय इहलौकिक ध्येय न होकर पारलौकिक ध्येय हो जाता है बस यही पारलौकिक कर्म का कारण है।
पृथक कर्म के लिये पृथक 2 साधनायें हुआ करती हैं। चाहे जिस साधना से चाहे जो साध्य प्राप्त नहीं होता। इह लोक अथवा भौतिक प्राप्ति के लिये संग्रह साधना होती है, पारलौकिक अथवा मोक्ष प्राप्ति के लिये त्याग साधना होती है।
कोई भी कर्म बिना साधना के अशक्य है किन्तु साधना के लिये चाहे वह इहलौकिक हो अथवा पारलौकिक, मन में एक स्थायी शाँति, और निश्चल नीरवता की आवश्यकता है, अन्यथा संभव है कि किसी अंश में सफलता प्राप्त हो किन्तु स्थायी लाभ कुछ भी प्राप्त न होगा। विशेषकर पारलौकिक साधना के लिये बहुत अधिक शाँति तथा नीरवता की आवश्यकता है, क्योंकि “एकै साधै सब सधै सब साधे सब जाय।” मेरा लक्ष्य केवल पारलौकिक साधना की ओर है जिससे हृदय की सच्ची शाँति प्राप्त हो।
मैं यह लिख चुका हूँ कि साधना कर्म के लिये पहले विचार उत्पन्न होते हैं अतएव विचारों पर नियंत्रण होना चाहिये, जिसका विचारों पर नियंत्रण नहीं है, यदि वह अपने विचारों का अनुमन्ता और स्वामी नहीं है तो वह मनुष्य पूर्ण मनोमय नहीं हो सकता।
यह बात अवश्य है कि आरंभ में शाँति और स्थिरता चलायमान रहती है। स्थायी रूप से उन्हें लाने के लिये दीर्घकाल की आवश्यकता होती है, किन्तु इससे अधीर नहीं होना चाहिए। यदि तुम अपने विचार में सच्चे हों तो अवश्यमेव सफलता प्राप्त होगी। अपनी कमजोरियों और कुप्रवृत्तियों को छुपाने का प्रयत्न करने की अपेक्षा उन्हें निकाल फेंकने का दृढ़ विचार करना चाहिए। जिसे पारलौकिक साधना अथवा आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करना है उसे सबसे पहले अपने हृदय में भगवान का मन्दिर बनाकर उनकी शरण में अन्य गौण साधन करने होंगे।
“कर्मण्येवाऽधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” गीता के इस महासूत्र को तनिक भी न भूलते हुए फल के लिये अधीर न होना चाहिये।
साधना में अनेक प्रकार की विरोधी परिस्थितियाँ उपस्थित हुआ करती हैं किन्तु ऐसी परिस्थितियों के आने पर (जो एक प्रकार की परीक्षा है) विचलित न हो धैर्य से उनका सामना करना चाहिए। क्योंकि दुःख और कष्ट में यदि तुमने समता बनाये रखी तो समझ लो कि साधना के एक महत्वपूर्ण अंग में फलीभूत हो चुके! क्योंकि अनुकूल अवस्था में सम और स्थिर होना तो मामूली बात है किन्तु विपरीत अवस्था में ही मनुष्य की स्थिरता, शान्ति और समता की परख हो सकती है।
जो विचार निश्चित उद्देश्य और प्रबल कामना के साथ प्रेरित होते हैं वे उतनी ही तीव्रता के साथ अभीष्ट स्थान को पहुँचते हैं अर्थात् विचार की शक्ति उस बल पर अवलंबित है जिस बल के साथ वह प्रेरित किया जावे।
(क्रमशः)
विपत्ति में पड़ने पर और प्रलोभन सामने आने पर ही मनुष्य की सच्ची परीक्षा होती है। जो इन परीक्षाओं में धर्म से नहीं डिगता, समझना चाहिए वह देवत्व के निकट पहुँच गया है।
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संसार के एक विनम्र सेवक बनने का प्रयत्न करोगे तो सुखपूर्वक रहोगे। मालिक बनने और हुकूमत चलाने की इच्छा करोगे तो बहुत क्लेश उठाओगे और अन्त में निराश हो उठोगे।
(श्री स्वामी विवेकानन्द जी)
संसार में ‘दो’ और ‘लो’ का अविरल प्रवाह बह रहा है। त्यागो और प्राप्त करो का सिद्धान्त अकाट्य है। जो तुम्हारे पास है उसे खुशी-खुशी दूसरों को दोगे तो तुम्हें ईश्वर भरपूर देगा। लेकिन जब तुम प्राप्त वस्तुओं को मुट्ठी में बाँधकर कहते हो ‘मैं नहीं दूँगा’ तब कुदरत तुम्हारे गाल पर चाँटा जमाती है और गाल पकड़ कर उस सबको उगलवा लेती है जिसे देने की बिलकुल इच्छा नहीं थी। सूरज को देखो वह पानी सोख कर इकट्ठा करता है पर उसे फिर बरसा कर पृथ्वी को दे देता है। प्रकृति का नियम है ‘त्याग‘। तुम लालच करके बहुत जोड़ना चाहते हो फलस्वरूप पिटना पड़ता है। पिटने का दर्द होता है उसी को लोग ‘दुख’ कहते हैं।
संसार की प्रत्येक वस्तु में परमात्मा का स्वरूप देखते रहने से हृदय से मोह अपने आप ही आगंडडडडड जाती है। और मोह के चले जाने से हृदय की अशान्ति जाती रहती है तथा सच्चिदानन्द का भंडार खुल जाता है।
(श्चड्डद्दद्ग द्वद्बह्यह्यद्बठ्ठद्द)
मृत्यु के बाद-
(लेखक श्री वी.डी. ऋषि, बम्बई)
अपनी स्वर्गस्थ स्त्री के अंत्येष्टि तथा अन्य संस्कार कर मैं इस विषय की खोज में लगा। मेरा अनुमान था, कि मुझे अपने इस उद्देश्य की सिद्धि में थियोसोफिष्टों से सहायता मिलेगी। इसके लिये मैंने एक पत्र श्रीमती एनी बीसेण्ट को लिखा। मेरे पत्र के उत्तर में श्रीमती एनी बीसेण्ट ने मेरे प्रति पूर्ण सम्वेदना प्रकट करते हुए लिखा। “आपकी पत्नी परलोक में होंगी और पारस्परिक प्रेमाकर्षण के कारण आपसे वह निद्रित अवस्था में मिली होंगी। आप यदि उसके लिये कोई प्रयत्न करें तो आप से उसकी भेंट हो सकती है।” श्रीमती एनी बीसेण्ट के इस पत्र से मेरी जिज्ञासा और भी बढ़ी, किन्तु उन के अनिश्चित उत्तर से मुझे सन्तोष नहीं हुआ। इसलिये मैंने उन्हें फिर पत्र लिखा। किन्तु उनका जो उत्तर आया उससे मेरा उत्साह नहीं बढ़ा। मैंने आस्ट्रेलिया निवासी मि. लीड विटर को एक पत्र लिखा। उनके उत्तर से मुझे मालूम हुआ कि मेरे शोक करने से यह वहाँ दुखी रहती है। वहाँ संदेश उसके पास जाय इसके लिए उसकी अनुमति नहीं थी। मि. लीड विटर का इस आशय का पत्र पढ़कर मेरा सन्तोष नहीं हुआ। उन्होंने अपने पत्र में मुझे श्री वाडिया का नाम लिख भेजा था। मैंने श्री वाडिया को अपनी पत्नी का चित्र और एक पत्र भेजा। पत्र और फोटो भेजे हुए 4 वर्ष हो गये थे, किन्तु उनकी ओर से कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। इस बीच में मैं अपने उद्योग में किंचित् भी शिथिल नहीं हुआ और मैंने अपना उद्योग जारी रखा। अन्त में मुझे मालूम हुआ कि इंग्लैंड के ‘अन्तर्राष्ट्रीय होम सरकिल फेडरेशन’ के प्रेसीडेण्ट मि. बुश से मुझे इस कार्य में सहायता मिलेगी। यह मालूम होते ही मैंने उन्हें तुरन्त एक पत्र लिखा। मेरे पत्र के उत्तर में उन्होंने जो कुछ लिखा और उन्होंने मुझे पत्र द्वारा जो साधन बताये थे, उनसे मुझे थोड़ी-थोड़ी सफलता प्राप्त हुई। मि. बुश ने मुझे एक मीडियम का नाम भी लिख भेजा था और साइकोमैट्री कर उन्होंने मेरी पत्नी के विषय में अनेक बातें लिखी थीं। उन्होंने मुझे यह भी लिखा था कि यदि मैं अपने हाथ से एक पत्र लिखकर तथा अपनी स्वर्गस्थ स्त्री की कोई वस्तु भी मीडियम के पास भेज दूँ तो पत्नी के विषय में मुझे बहुत कुछ मालूम हो सकता है।
पाठक यह जानना चाहेंगे कि यह ‘साइकोमैट्री’ क्या बला है? इससे क्या हो सकता है? इस संबंध में इतना बताना आवश्यक है कि मनुष्य के समीप रहने वाली प्रत्येक वस्तु पर उसके आचार-विचार का अवश्य संस्कार पड़ता है। यह संस्कार सूक्ष्म शक्ति युक्त मनुष्य मालूम कर सकते हैं। इसलिए यदि किसी मृत व्यक्ति की कोई वस्तु मीडियम के पास भेज दी जाये तो मीडियम स्वर्गस्थ प्राणी के सम्बन्ध में बहुत कुछ आश्चर्यजनक बातें कह सकता है। मैंने भी मि. बुश के आदेशानुसार अपनी स्वर्गस्थ स्त्री के पैर का छल्ला मीडियम के पास भेज दिया। उसके भेजने के बाद मेरी स्त्री के सम्बन्ध में कितनी ही आश्चर्यजनक बातें मुझे बताई गई। यद्यपि वे सब बातें सत्य तो नहीं थी किन्तु जितनी बातें सत्य थीं, वे भी ऐसे ही नहीं थीं, कि जिन्हें कोई पहले से ही जान सके। यहाँ यह भी बता देना आवश्यक है कि वह मीडियम भारत का रहने वाला नहीं था, किन्तु इंग्लैंड में रहने वाली अंग्रेज महिला थी। इनका नाम जानसेज रावर्टसन था। उन्होंने छल्ला बनाने वाले सुनार तक का हाल मेरे पास लिखकर भेज दिया मेरी स्त्री का स्वभाव, उसकी बीमारी और उसकी दिनचर्या के सम्बन्ध में उन्होंने जो बातें लिखी थीं, उनमें से अधिकाँश सत्य थीं।
मीडियम इस आभूषण को हाथ में लेकर जिन बातों को बता सकता है, उसका वर्णन हम आगे बतायेंगे। इसके साथ ही यह बात भी समझ लेना चाहिये, कि मीडियम जो वस्तु हाथ में लेता है उस के मालिक के संस्कारों को वह अनुभव कर सकता है। मीडियम ने मुझे लिखा “चाँदी का छल्ला हाथ में लेने से मुझे गरमी मालूम हुई। मेरी पीठ में जलन होने लगी। कन्धों में दर्द होने लगा और पेट के अन्दर भी दर्द हो रहा था। यहाँ तक कि मुझे साँस लेने में भी कठिनाई हो रही थी।” मीडियम को यह अनुभव मेरी स्वर्गस्थ स्त्री की बीमारी के होंगे। इसमें पेट के दाहिनी ओर दर्द होना विशेष महत्व का है। आगे उन्होंने लिखा, “वह अपना काम नियमित रूप से करती होंगी। सब चीजों को साफ स्वच्छ रखने की इनमें आदत पड़ गई होगी। कोई काम ऐसे-वैसे ही करना उन्हें पसन्द नहीं होगा” मीडियम का यह वर्णन उनके स्वभाव का वर्णन करने वाला है। इसके अतिरिक्त उन्होंने उनके आचरण के सम्बन्ध में लिखा, ‘कला वस्त्र पहने हुये माला फेरती हुई वह दिखती हैं।’ मेरी स्व. स्त्री नित्य भगवान के नाम की माला फेरा करती थी। यह उसका एक नियम था। आगे मीडियम ने उनकी मन की स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा- ‘यह थकी हुई हाथ फैला रही है। मालूम होता है।’ बहुत पीड़ा ग्रस्त है। पीड़ा सहन करने में यह करुणा की साक्षात मूर्ति मालूम होती है बहुत समय तक बीमार रहने के कारण ऐसा हो जाना संभव था। एक समय का वर्णन मीडियम ने जो निम्नलिखित किया है “आज प्रातःकाल मुझे ऐसा जान पड़ा कि संदेश देने वाली कोई स्त्री है। मुझे कुछ दिखता तो नहीं था, किन्तु ऐसा प्रतीत होता था, कि वह मुझसे यह कह रही थी कि समय का विचार मत करो, यदि विलंब हो जाये तो शाँति रखना चाहिए। अधीर मत होओ मैं आपकी बहुत सहायता करूंगी।” इस प्रकार के कुछ संदेश मेरी स्त्री ने स्वयं लेखन से मुझे दिये थे, यह बात भी मीडियम को उन्होंने कही थी। मेरी स्त्री के स्वरूप के सम्बन्ध में उक्त मीडियम ने लिखा था- “मुझे एक श्याम रंग की स्त्री जान पड़ती है। और उसकी आँखें बड़ी चमकीली और भवें सुन्दर और काले रंग की हैं। इसका कपाल गोल है और शरीर कोमल और ताम्र वर्ण का है। यह काले रंग की नहीं दिखती थी इनका मुँह जरा बड़ा है। यह कुछ लम्बी हैं। चेहरे पर युवावस्था जान पड़ती है। इन्होंने सुन्दर कपड़े पहने हैं। मालूम होता है कि यह अपना हाल बता रही हैं। मैं इनका वर्णन इस प्रकार कर सकती हूँ। यह सुन्दर है, जीवनकाल में इनका वर्ण ताम्र वर्ण का रहा होगा। यह मुझे चित्ताकर्षक जान पड़ती हैं। यह कहती हैं, “प्रेम अटूट है और यह हृदय का बन्धन होता है।” मेरी स्वर्गस्थ स्त्री का फोटो देखने से इस कथन की सत्यता प्रकट हो जायेगी। शरीर का वर्ण मीडियम के बताये हुए रंग का था। इस प्रकार का वर्णन कोई यों ही कर सकता है, यह असंभव है।
(क्रमशः)
निर्धनता मनुष्य के लिए बेइज्जती का कारण नहीं हो सकती यदि उसके पास वह सम्पत्ति मौजूद हो, जिसे ‘सदाचार’ कहते हैं।
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संसार में प्रतिदिन कितने जीव मरते हैं, पर उन सबके लिए तो हम नहीं रोते। रोते तो केवल उसी के लिए हैं जिसके साथ हमारी कुछ ममता रहती है। ममता मोह के कारण होती है। इसलिए सारे दुःखों की जड़ ममता को ही समझना चाहिये।
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नित्य हँसमुख रहो मुख को मलीन कभी मत करो। यह निश्चय कर लो कि चिन्ता ने तुम्हारे लिए जगत् में जन्म ही नहीं लिया। आनन्द स्वरूप में सिवा हँसने के चिन्ता को स्थान ही कहाँ है।
(लेखक- पं. भोजराज जी शुक्ल, ऐत्मादपुर)
संसार में दीर्घजीवी होना सभी चाहते हैं, सबकी इच्छा रहती है हम अधिक दिन तक जीवित रहें। इस लेख में कुछ ऐसे ही उपाय बताये जावेंगे जिनके नियम पूर्वक साधनों से मनुष्य अपनी आयु बढ़ा सकते हैं। प्रत्येक प्राणी के दीर्घ जीवन और उसकी आयु का समय उसके श्वासों पर निर्भर है। उसके प्रारब्धानुसार उसे श्वास प्रदान किये जाते हैं अर्थात् यह शरीर जितने श्वास लेकर समाप्त हो जायगा परमात्मा के दिये हुए श्वासों में व्यय कर देगा उसकी आयु उतनी ही बढ़-घट जायगी, साधारणतः प्रत्येक मनुष्य के दिन रात में 21600 श्वास चलते हैं, यदि कोई मनुष्य 21600 से कम श्वास चलाता है तो उसकी आयु का समय बढ़ जाता है यदि अपनी असावधानी से श्वास अधिक व्यय कर देता है तो उसकी आयु का काल घट जाता है साराँश यह है कि मनुष्य इस कार्य में स्वतन्त्र है कि ईश्वर दत्त श्वासों के कोष को चाहे जितनी शीघ्रता से लुटा दे या कंजूसी (कृपणता) से कम खर्च करें, जैसी कि श्वासों के विषय में कहावत प्रसिद्ध है।
बैठे बारह चले अठारह, सोबत चाले तीस।
विषय करत में छत्तीस चालें क्यों जीवे जगदीश॥
इसी कारण भजनानन्दी तथा योगियों की आयु अधिक होती है, अधिक सोने वाले और विषय लम्पट पुरुषों की आयु कम होती है वह अपनी जीवन यात्रा शीघ्र समाप्त कर देते हैं मैं नीचे एक तालिका देता हूँ जिससे आपको विदित हो जायगा कि जो प्राणी जितनी शीघ्र-शीघ्र श्वास लेता है उतनी आयु कम होती है।
प्राणी श्वास की गति प्रति मिनट, पूर्ण आयु
खरगोश...............38 बार..............8 वर्ष तक
बन्दर...............32 बार..............10 वर्ष तक
कुत्ता...............29 बार..............12 वर्ष तक
घोड़ा...............19 बार..............25 वर्ष तक
मनुष्य..............13 बार..............120 वर्ष तक
साँप............... 08 बार..............1000 वर्ष तक
कछुआ.............05 बार..............2000 वर्ष तक
कोई महाशय इसका यह अर्थ न लगा बैठे कि बैठे रहने में सबसे कम श्वास चलता है अतएव आलसी बन कर चुपचाप बैठे रहें इससे आयु बढ़ जायगी आपको जीवन निर्वाह के लिए साँसारिक सब ही कार्य करने पड़ेंगे आप सब कार्यों को नियमित रूप से करते रहिये। यदि आप अपने सामर्थ्य से अधिक परिश्रम करेंगे तो अवश्य रोग ग्रस्त हो जायेंगे जिन लोगों के दौड़ धूप के कामों में श्वास अधिक व्यय हो जाते हों उनको विषय भोग कम करके कुछ प्राणायाम करना चाहिए अथवा शीर्षासन करके उस कमी को पूरा कर लेना चाहिए (शीर्षासन में कुम्भक होने से श्वास कम चलता है यदि बैठे रहने के सिवाय आपको कुछ काम नहीं हैं तो परमात्मा का भजन करो और यथा शक्ति श्वास कुंभक करते रहो इससे आपका स्वास्थ्य ठीक रह कर लोक-परलोक का आनन्द प्राप्त होगा।)
चीन देश के पेकिन नगर में एक बुड्ढा 250 वर्ष का है उससे लोगों ने पूछा कि आप दीर्घजीवी कैसे हुए, उत्तर दिया कि मैंने अपने जीवन में 3 बातों का ध्यान रक्खा है। 1- श्वास पूरी नाभि तक लिया जाय, शीघ्रता से अधूरा श्वास कभी नहीं लिया जाय। 2- अपने मेरुदण्ड (रीढ़) को सदैव सीधा रक्खा कभी झुक कर नहीं बैठा। 3- अपने दिमाग को गर्म नहीं होने दिया, अर्थात् कभी क्रोध नहीं किया। वास्तव में उपरोक्त तीनों नियम योग विद्या सम्बन्ध आयु वृद्धि कर्त्ता है। 1- पूरा श्वास लेने से कुम्भक हो ही जाता है जिससे श्वास की गति न्यून हो जाती है। 2- मेरु दण्ड को सीधा रखने से उसके भीतर का एक तरल पदार्थ अपनी ठीक स्थिति में रहा आता है उस तरल पदार्थ के अन्दर जो सुषुम्ना नाड़ी सूक्ष्म रूप से रहती है। वह निर्बल नहीं होने पाती इससे मस्तिष्क पुष्ट रहता है तथा आयु बढ़ती है। 3- क्रोध करने से श्वास की गति तीव्र हो जाती है श्वास अधिक चल जाते हैं।
प्राणियों के दिन-रात जो श्वास चलते हैं उन्हीं का नाम प्राण है जब प्राण बाहर निकल कर फिर शरीर के भीतर नहीं जाता तब उसे मृत्यु कहते हैं। श्वास का स्वाभाविक नियम है जब वह बाहर निकलता है तो 12 अंगुल लम्बा जाता है जब भीतर को घुसता है तो उसकी लम्बाई 10 अंगुल होती है अर्थात् आमदनी से खर्च अधिक रहता है इसी कारण दिवाला निकल जाता है फिर दुकान उठ जाती है, यही मृत्यु है।
प्राणायाम द्वारा आप अपनी श्वास की इस गति को न्यून करके अपनी आयु बढ़ा सकते हैं। मनुष्य की स्वाभाविक श्वास की गति 12 अंगुल है। परन्तु गाने में 16 अंगुल, भोजन करते समय 20 अंगुल, चलने में 24 अंगुल, सोते समय 40 अंगुल सोते में 30 अंगुल और स्त्री संसर्ग में 36 अंगुल लम्बा श्वास चल जाता है। अधिक परिश्रम (साहस) के कामों में तथा ज्वर इत्यादि रोगों में इससे भी अधिक लम्बा श्वास चलने लगता है। राजयक्ष्मा (तपेदिक) के रोगियों का प्रायः 80 अंगुल तक लम्बा श्वास जाता है।
श्वास के नापने की सहज क्रिया यह है कि 12 अंगुल लम्बी एक सींक लेकर उसके एक सिरे पर जरा सी घुनी हुई साफ रुई लगा दो, दूसरा सिरा सींक का अपने नथुने से लगा कर देखो कि रुई हिल रही है। जहाँ तक रुई हिलती जान पड़े सींक को नाक के आगे बढ़ाते जाओ जहाँ रुई का हिलना बन्द हो जावे बस इतनी ही लम्बी श्वास की गति समझ लो, इसी प्रकार यदि 12 अंगुल पर रुई नहीं हिलती है तो सींक की लम्बाई कम करके देखा कि कितने अंगुल तक श्वास जाता है। श्वास की लम्बाई जितनी अधिक होगी समझलो उतना ही जीवन का ह्रास शीघ्रता से हो रहा है, जितनी श्वास कम लम्बी हो जान लो मृत्यु अभी दूर है।
प्राणायाम के अभ्यास से श्वास की गति न्यून हो सकती है योगियों का श्वास तो बाहर निकलती ही नहीं नाक ही में चलता रहता है। कोई-कोई गृहस्थ मनुष्य प्राणायाम के नाम से डरते हैं कहते हैं कि ‘देखा देखी साधो जोग, छीजी काया बाढ़ौ रोग‘ उनका यह कथन किसी दशा में सत्य तथा किसी दशा में असत्य है। यह समझ का फेर है कि उन्होंने एक ही बात पर विश्वास कर लिया क्योंकि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ अधिकता सब जगह निषेध है। जब आप श्वास के रोकने में अति हठ करेंगे तो अवश्य ही दमा इत्यादि रोगों से ग्रसित हो जायेंगे, यदि श्वास को नियमपूर्वक अपनी सामर्थ्य के अनुसार रोकेंगे अवश्य लाभ उठावेंगे। जब मनुष्य अपनी शक्ति से अधिक व्यायाम, भोजन, मैथुन इत्यादि करता है अथवा मस्तिष्क का कोई कार्य करता है तो वह रोगी अथवा पागल हो जाता है। अतएव प्राणायाम भी अपनी शक्ति से अधिक करना रोग को मोल लेना है। प्राणायाम के विषय में फिर कभी लिखूँगा, इस समय केवल इतना ही लिखना पर्याप्त समझता हूँ, श्वास के भीतर ले जाने को पूरक, बाहर निकालने को रेचक तथा स्थिर को कुम्भक कहते हैं। स्वच्छ वायु तथा एकान्त स्थान में पूरक करके यथाशक्ति कुम्भक करने से, इसी प्रकार रेचक करके कुम्भक करने से, श्वास की गति न्यून हो जाती है और आयु बढ़ती है, इस क्रिया को न्यून से न्यून दिन में 3 बार अवश्य करना चाहिये, इसका अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिये रेचक करते समय प्राण वायु को इतनी मन्दगति से निकालना चाहिये कि हथेली पर रक्खी हुई धुनी रुई का जरा सा टुकड़ा भी न उड़ सके, कुछ देर तक कुम्भक करने से स्वास्थ्य को वह लाभ पहुँचता है जितना कि पौष्टिक औषधि से नहीं पहुँच सकता यदि भोजन, निद्रा, स्त्री संसर्ग कम और नियमित रूप से किया जायेगा तो श्वास कम चलने से आयु में अवश्य वृद्धि होगी।
दर्शन शास्त्र वेत्ताओं का कथन है कि काम, क्रोध, चिन्ता तथा दुराशा ही असमय मृत्यु के कारण हैं। जितनी आयु तक जिस प्राणी का अखण्ड ब्रह्मचर्य रहेगा। शेष जीवन नियम पूर्वक व्यतीत करने से उसे ब्रह्मचर्य अवस्था से चौगुनी आयु मिलेगी। कई विद्वानों का लेख है कि भारतवर्ष के ब्राह्मण तथा प्राचीन अरब निवासी ब्राजील के निवासी 200 या 300 वर्ष तक जीते थे प्रोफेसर ह्यू फलेण्ड का कथन है कि जो प्राणी अधिक अवस्था में युवा होगा वह अधिक जीवित रहेगा, डॉक्टर एलन्स्टन लिखते हैं कि प्रायः जन्तु उससे छह गुना जीते हैं जितनी देर उनको युवा होने में लगती है।
इन सब बातों के अतिरिक्त मनुष्य को भोजन करने में ग्रास को 50 बार चबा कर निगलना चाहिये मैंने स्वयं परीक्षा की है कि गाय, भैंस 42 बार जुगाली करते हैं। खूब चबा के पात्र भर अन्न खाने से उतना ही रक्त माँस बनेगा जितना आधा सेर अन्न शीघ्रता से खाकर बनता है। सतोगुणी भोजन सदैव स्वास्थ्य तथा आयु वर्द्धक होता है। जैसा प्राण और शरीर का साथ है वैसा ही आयु और स्वास्थ्य का साथ है अतएव आयु वृद्धि चाहने वाले को स्वास्थ्य का अवश्य ध्यान रखना चाहिये। स्वास्थ्य के उपाय पाठकों ने अनेक पुस्तकों में पढ़े होंगे इस समय उनका लिखना आवश्यक नहीं पर इस कहावत पर ध्यान रखना जरूरी है।
“खाय के मूतै सौवें बाम।
काहे को वैद्य बसावै गाम॥”
भोजन करके तुरन्त ही मूत्र त्याग करना चाहिये, इससे दर्द गुर्दा की बीमारी कभी नहीं होने पावेगी। रात्रि को बाँयी करवट सोने से सीधा (दाहिना) स्वर चलेगा, हर एक मनुष्य का दिन में बाँया और रात्रि में दायाँ स्वर चलना चाहिये इससे मनुष्य निरोग तथा दीर्घजीवी होता है। इसके विपरीत स्वर चलने से वह रोगों तथा शीघ्र मृत्यु को प्राप्त होता है। यहाँ पर स्वर विषय से सिर्फ इतना ही इशारा काफी है, इस विषय में फिर कभी लिखूँगा हाँ, एक प्रयोग लिख देने की और आवश्यकता समझता हूँ यानी “प्रातःकाल नाक से जल पीना।”
विगत घन निशीथे, प्रातरुत्थाय नित्यम्।
पिवति खलु नरोगी, घ्राणरन्ध्रेण वारि॥
सभवति मति पूर्णश्चक्षुषः ताक्ष्य तुल्यो।
वलिपलित विहीन सर्वं रोगैर्विमुक्तः॥
जिस समय बादल और रात्रि का अन्धकार न रहे, तब प्रातःकाल में उठकर जो मनुष्य निश्चय नाक के छिद्रों से जल पीता है, वह मतिपूर्ण (बुद्धिमान) गरुड़ के समान नेत्र वाला होता है शरीर में वलि (झुर्री) नहीं पड़ती, बाल सफेद नहीं होते, सब रोग से रहित होता है।
जो मनुष्य अपने प्राण वायु को कुम्भक करके अपने शरीर में भ्रमण कराता है वह अमृत पान करने का लाभ उठाता है, अवश्य स्वास्थ्य तथा दीर्घजीवी होता है।
कहानी-
(महात्मा रामजीराम महाराज)
देवयानी ने कच के सम्मुख विवाह प्रस्ताव रखा तो कच सन्न रह गया। वह स्वयं देवयानी की जुदाई से व्यथित हो रहा था। परन्तु देवयानी से उसे ऐसी आशा न थी। बेचारा अवाक् रह गया। गुरु की पुत्री, जिसे वह बहिन से बढ़कर समझता है, पत्नी बनावे? न! यह न हो सकेगा उसने सिर हिला दिया।
यौवन की उद्दीप्त उमंगे, जिसे पाकर कोई भी अपने को धन्य मान सकता है ऐसी प्रतिभावान् सुन्दरी का प्रस्ताव, प्रेम की पराकाष्ठा, यह सब बातें कच के हृदय को विदीर्ण किये डालती थीं, प्रलोभन-प्रलोभन उसके चारों ओर मंडरा रहा था, ऐश्वर्य, अपार आनन्द और धर्म में घोर संघर्ष चल रहा था। कच क्षणभर के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया।
आखिर उसने धर्म को ही ग्रहण किया और सारे प्रलोभन को ठुकरा दिया।
गुरुपुत्री! तुम मेरी सगी बहिन से अधिक हो। तुम्हें मैं इस शरीर से बहिन के अतिरिक्त और कुछ नहीं कह सकता।
देवयानी ने कहा- तो मेरे साथ अब तक इतनी घनिष्ठता पूर्वक क्यों मिलते थे? कच ने उत्तर दिया, बहिन तुम्हीं बताओ कि पिता-पुत्री, भाई-बहिन, पुत्र-माता, क्या एक साथ हँसते-खेलते नहीं। छोटे बालक यदि पवित्र भावना से साथ-साथ नाच कूद सकते हैं तो बड़े होने पर वैसा क्यों नहीं किया जा सकता। शरीर के छोटे या बड़े होने से भावनाएं नहीं बदलती। जिसके मन में दूषण नहीं है उसका सात्विक मनोविनोद पाप कर्म नहीं कहा जा सकता। मैं विशुद्ध भावनाओं से ही तुम्हारे साथ खेलता-कूदता रहा हूँ उसी प्रकार अब भी और जीवन भर तुम्हारे साथ रह सकता हूँ।
देवयानी की चिरसंचित आशाओं पर मानो तुषार पड़ गया। प्रतिशोध की भावना से उसके नेत्र लाल हो गये। कुमारी ने शाप दिया- ‘जाओ कच, तुम्हारी विद्या निष्फल होगी।’
जीवन का एक बड़ा भाग जो देवयानी के पिता शुक्राचार्य द्वारा विद्याध्ययन में लगाया था, उसे खोकर तथा देवयानी जैसी रूपवती गुणवती रमणी को छोड़कर भी कच विचलित नहीं हुआ, वह देवयानी की चरण रज मस्तक पर चढ़ाता हुआ घर वापिस चल दिया।
उसकी आत्मा प्रसन्न थी क्योंकि सब कुछ खोकर भी धर्म को उसने नहीं खोया था। इसलिए उसने कुछ नहीं खोया था।
आलस्य का अर्थ समय की चोरी है। यदि मनुष्य आज का काम कल पर न टाले तो बहुत सी बुराइयों से बच सकता है।
(लेखक- श्री गौरीशंकर जी)
अपने सारे शरीर पर सूर्य की किरणों को डालना ही सूर्य स्नान कहलाता है। यदि हो सके तो नित्य और नहीं तो सप्ताह में 1-2 बार कम से कम आधे घंटे से एक घंटे तक अपने शरीर को धूप लगाना स्वास्थ्य के लिये बहुत हितकर है।
पूर्व काल में जानकार आदमी सूर्य-किरणों द्वारा ही अनेक बीमारियों का सफलतापूर्वक इलाज किया करते थे। वे यहाँ तक सफल हुये ये कि सूर्य को देवता स्वरूप मानकर नाना प्रकार से उसकी पूजा अर्चना के बहाने ही उसकी किरणों को अपने शरीर पर डालने के उन्होंने सभी प्रकार के साधन और विधियाँ बना रखी थी। नित्य सन्ध्या प्रकरण में भी दिन में कम से कम दो या तीन बार सूर्य को साक्षी में अर्थात् सूर्यास्त के समय सन्ध्या करने की शिक्षा वैदिककाल से ही किसी परमोपयोगी तथा लाभकारी उद्देश्य को लेकर दी गई है। इसी प्रकार अन्य बहुत से कार्य भी अधिकतर खुली हवा और सूर्य की बे-रोक-टोक या वृक्षों से छनकर आने वाली स्वच्छ रोशनी में ही हुआ करते थे। बड़ी-बड़ी पाठशाला और विद्यालय तथा ऋषि-मुनियों के आश्रम आदि ऐसे ही स्थानों में होते थे जहाँ स्वच्छ सूर्य-प्रकाश और खुली हवा को कभी किसी प्रकार की रोक-टोक न थी। यह वह कार्य करते समय पाठक लोग और शिष्य सब, कम से कम वस्त्र पहिना करते थे यहाँ तक कि रात-दिन के अधिक भाग में तो केवल कोपीन (लंगोट) ही धारण किया करते थे। इसी कारण उनका बल, बुद्धि आदि सब बातें, विलक्षणता पूर्वक पूर्ण विकास को प्राप्त होकर आजकल के लोगों को आश्चर्य में डालने वाली होती थीं।
वर्तमान समय में भी डॉक्टर सूर्य-स्नान का महत्व समझने लगे हैं और वे तो यहाँ तक बढ़ गये हैं कि साल में कुछ महीने शरीर के किसी अंग को बिना किसी प्रकार ढके ही अर्थात् बिलकुल नग्न होकर सूर्य-स्नान करने की उन्होंने परिपाटी निकाल रखी है और अनेक मासिक पत्र-पत्रिकाओं द्वारा वे इसका प्रचार दिनों-दिन बढ़ा रहे हैं। आज हमको उनकी यह बातें आश्चर्य में डालती हैं। उनका अंदरूनी उद्देश्य यही रहता है कि जहाँ तक हो सके कम से कम वस्त्र पहिने जायं जिससे शरीर पर सूर्य-किरणों का ज्यादा से ज्यादा प्रभाव पड़ सके क्योंकि इससे शरीर स्वस्थ और बलिष्ठ होकर अधिक समय तक काम कर सकने योग्य बनता है अर्थात् आयु की भी वृद्धि होती है।
औपचारिक दृष्टि से फ्राँस में एक परीक्षण हुआ था जिससे कुछ स्त्री पुरुष और बालकों को एक पक्ष के लिये बिलकुल हलके पतले सफेद बिस्तरों सहित सूर्य-किरणों में रक्खा गया था। उन्हीं को उतने ही समय के लिये बिना कपड़ों के भी सूर्य किरणों में रक्खा गया तो फल यह हुआ कि बिस्तरों सहित सूर्य किरणों में रखने के बनिस्बत बिना कपड़ों के रहने से उनके तौल में बहुत वृद्धि हुई। साथ ही उनका स्वास्थ्य भी ज्यादा ठीक प्रमाणित हुआ। नींद आराम की आई और साधारण कामकाज में तथा खेलकूद आदि में भी अधिक काम करने की शक्ति प्राप्त हुई देखी गई।
इसी प्रकार विगत यूरोपियन महासमर के समय डॉ. सीरेल (Serel) महोदय ने कुछ जख्मी सिपाहियों का इलाज पहिले सूर्य-किरणों द्वारा किया था। पहिले तो किरणों का उपयोग केवल उनके घावों पर ही किया गया जिसका फल बहुत थोड़ा हुआ। फिर जब उनके सारे शरीर को सूर्य-स्नान कराया गया तो उनके घावों में आशातीत लाभ हुआ और वे एकदम अच्छे होने लगे।
विगत 50 वर्षों से अधिक समय से सूर्य किरण-चिकित्सा से बहुत लाभदायक फल निकल रहे हैं। आजकल 6-7 अलग-अलग रंग की काँच की बोतलों में शुद्ध जल भरकर उन्हें 7-8 घण्टे धूप में रखकर उनके जल से ही भिन्न-भिन्न रोगों का इलाज किया जाता है। शरीर में जिस रंग की कमी हो जाने से जो रोग उत्पन्न हो जाते हैं उसी रंग की बोतल का जल उस रोग के रोगी को पिलाया जाता है जिससे वह रोग रहित हो जाता है। इसी प्रकार शरीर के बाहरी भाग पर मालिश आदि करने के लिए तेल भी तैयार किया जाता है जो अनेक रोगों पर काम आता है। जब सूर्य किरणों में रखे हुए जल में इस प्रकार की रोग-नाशक शक्ति आ जाती है तो सूर्य-किरणों के सीधे (Direct) शरीर पर लगाने में हम स्वास्थ्य क्यों न रह सकेंगे? अर्थात् अवश्य रहेंगे और संभव है कि कभी हमारे बीमार होने का अवसर न आवे।
प्रसिद्ध जर्मन डॉक्टर लुई कूहनी सभी रोगों पर सूर्य-किरणों का प्रयोग किया करते थे।
हम देखते हैं कि विशेषतया मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो अपने शरीर की रक्षा का उपाय कपड़ों से ढक कर करता है जिसका फल यह होता है कि वह सबसे अधिक तपेदिक आदि अनेकानेक बीमारियों का शिकार होकर पूर्ण आयु का उपयोग करने और सुखी जीवन बिताने में असफल होता है।
शरीर, बिजली की लहरों को ग्रहण करने और निकालने का मुख्य साधन है और जब उसको बहुत से अनावश्यक और तंग कपड़ों से लाद दिया जाता है तब उसकी यह क्रिया बहुत अंशों में बन्द होकर हानिकारक सिद्ध होती है। उपरोक्त पूर्वकालिक तथा आधुनिक बातों से शिक्षा ग्रहण करके हमको अपनी स्वास्थ्य रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि नित्य कुछ समय के लिए खुली हवा और धूप में रहा करें तथा बालकों को भी इसका अभ्यास करावें जिससे राष्ट्र की भावी सम्पत्ति स्वस्थ रह कर बल बुद्धि और वीरता का आदर्श बन पूर्वकालिक महाबालकों के सदृश्य स्वतन्त्रता पूर्वक रहने और विचरण करने योग्य बन जाय।
(जो साधक हमारी बताई हुई विधियों से विभिन्न प्रकार के अभ्यास कर रहे हैं। वे अपने अनुभव संक्षेप में प्रकाशनार्थ भेजें। जिनसे दूसरे साधक भी लाभ उठा सकें। संपादक)
(1)
“मैं क्या हूँ” प्राप्त हुई। ऐसी अद्भुत पुस्तक अब तक मेरे देखने में नहीं आई थी। साधन आरम्भ नहीं किया है पर पुस्तक पढ़ते ही एक नवीनता का मुझ में संचार हुआ है। मैंने प्रण किया है कि इसे 101 बार पढूँगा तब अभ्यास आरम्भ करूंगा। ऐसे ग्रन्थ रत्न प्राप्त करके मैं अपने को धन्य मानता हूँ।
-श्रीकान्त शास्त्री, नारायणपुर
(2)
आज्ञानुसार कार्य आरम्भ किया। दूसरे ही दिन ऐसा प्रतीत हुआ मानो फोटो रूपी टार्च मेरे शरीर में बाहर-भीतर लाइट दे रहा है और उसी समय से मेरे भ्रम का अन्त होना शुरू हो गया। प्रभु की असीम कृपा से आत्म साक्षात्कार हुआ, उस समय जो आनंद प्रतीत हुआ था वह अकथनीय है।
-बालमुकुन्द, इटारसी
(3)
रात को मुझे तो भयंकर स्वप्न आते थे अब नहीं आते। न वे मूर्तियाँ ही नजर आती हैं जिनके डर से मैं दिन में कई बार घिग्घी बाँध कर चिल्ला पड़ता था। इस महीने में सिर्फ दो बार दौरा हुआ है। अब पसीना खूब आता है और प्यास कम हो गई है। साधना में दिन-प्रतिदिन मेरी श्रद्धा दृढ़ होती जा रही है।
-मोथाराम पीतमराम व्यास, कोटा
(4)
मेरी स्त्री दो सप्ताह से जिद कर रही है कि इस साधना को मुझे भी कराओ। पर मैं आपकी आज्ञा के कारण किसी को न बताने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हूँ। मेरे स्वभाव में एकदम तब्दीली हो जाने की वजह से मिलने वाले ताज्जुब में है और स्त्री तो हैरत में है कि तुम क्या हो गये हो। यह बात मैं अपने पहले खत में अर्ज़ कर चुका हूँ कि मेरा मिज़ाज बहुत तेज है। जरा सी बात पर गुस्सा आ जाता है। घर वालों को यह बुरा लगता था पर वे डर के मारे कुछ कहते न थे क्योंकि कमाने वाला और घर का मालिक मैं ही था। स्त्री और बच्चे अक्सर पिट जाते थे इसलिए वे मुझ से अक्सर दूर भागते रहते थे। अब दो हफ्ते से उसका डर भी काफी दूर हो गया है। बच्चे गले से लिपटे रहते हैं और स्त्री हर वक्त यही जिद किये रहती है ‘इस जादू को तो मुझे भी सिखाओ।’
-साँवलदास मीना, गुरुदासपुर
(5)
‘मैं क्या हूँ’ के अनुसार अभ्यास करते हुये एक महीना बीत गया। अब मैं बहुत घबराने लगा हूँ। हमारा व्यापार ऐसा है जिसमें जो कुछ नफा है चालाकी का है। जब पुराने अभ्यास के अनुसार लेन-देन करने बैठता हूँ तो हाथ भारी हो जाते हैं और कुछ करते धरते नहीं बनता। इस महीने 45 रु. का घाटा हुआ है। बड़े पेशोपेश में हूँ या तो अभ्यास छोड़ना पड़ेगा या यह व्यापार।
राम नारायण दुबलिस, पटियाला
(6)
अब विधवा जीवन भार नहीं रहा। पढ़ी-लिखी होने के कारण अनेक बातें सूझती थीं। इस साल तो मैंने निश्चय कर लिया था कि पुनर्विवाह करूंगी। आपकी पत्रिका छह महीने से पढ़ने को मिल जाती है। उसने मेरे विचार बिलकुल बदल दिये हैं। अब पुनर्विवाह की इच्छा बिलकुल त्याग दी है। आपने सूर्य किरणों द्वारा चिकित्सा करने की जो पत्र व्यवहार द्वारा शिक्षा दी है। उसमें मुझे बड़ी सफलता मिल रही है। स्त्री और बच्चों का इलाज करती हूँ। दो महीने से 35 बीमार अच्छे हुये हैं। मैंने किसी से कुछ नहीं माँगा पर बिना माँगे भेंट स्वरूप 60 रु. मुझे मिले हैं। दो मास में इतनी आमदनी मेरे लिये बहुत है। अब मुझे अपना जीवन भार नहीं मालूम पड़ता। आपके चरण..............।
-रूपकुमारी कछवाहा, सिकन्दराबाद
मातृ शक्ति और मानव
(श्री रूपकान्ता देवी, आगरा)
मातृशक्ति और मानव (कविता)
(श्री रुपकान्ता देवी, आगारा)
जग के सूखे मरुस्थल में, सूखा बालू था छाया।
मैंने यह उर्वरा बनाया, जीवन-स्रोत बहाया॥
नष्ट किये देती थी मानव को विनाश की छाया।
मैंने इसे उठाया पथ में अमृत घोल पिलाया॥1॥
अपनी मिट्टी, अपना पानी, अपना बना खिलौना।
अपना लाड़ दुलार लुटाया, तब पनपा यह छोना॥
आज इसे इतना कर पाया, खाये और कमाये।
जग में खुद विकसे औरों को विकसाये-हरषाये॥2॥
पर यह चला कुल्हाड़ा लेकर कहता ‘काट धरूंगा’।
विश्व विनाश करूंगा, मैं अब मारूँ और मरूंगा॥
रक्त बहाऊँगा पृथ्वी पर, अपनी तृपा बुझाने।
मैं सम्राट बनूँगा सुरपति आयें मुकट पिन्हाने॥3॥
अरे अभागे! नश्वर कृमि! अपनी औकात न देखी।
भूल गया असली हस्ती यों चला मारने शेखी॥
चींटे! तेरे पर पग उग आये उचक उड़ान लगाता।
मेरे द्वारा पीली पोसा, मेरा हृदय दुखाता॥4॥
(श्री सावित्री देवी तिवारी हिंदी प्रभाकर, जयपुर)
नश्वर जग के अमित प्रलोभन बारबार हैं ललचाते।
बहुत रोकती हूँ पर मनके भाव उधर ही उड़ जाते॥
अन्तर्यामी प्रभु मेरी जीवन नौका को पार लगाना।
घोर निराशा और समझ न पड़ता अपना और बिराना॥
फूँक-फूँक कर रखती हूँ पग, काँटे हैं पर बिछ जाते।
झुलस-झुलस जग के तापों से नयन तप्त जल बरसाते॥
मुझको परवा नहीं तनिक भी इस कठोर तम बन्धन की।
प्रभु चरणों में मग्न रहे मन, यह अभिलाषा जीवन की॥
(श्री लक्ष्मी)
जीवन की मधुमय बेला में,
मैं शाँति-पाठ पढ़ने आई।
बलिहार हो गये दीवाने,
लख कर मेरी कोमलताई॥
साथी ने अपने अंक बीच,
मेरी शुचि सुषुमा विखराई।
मैं हँसी देख निज विभव मंजु,
विरदों ने गुण-गाथा गाई॥
दो दिन की चमक-दमक थी वह,
उस क्षण न समझ मैंने पाई।
अन्तिम परिणाम निहार स्वयं,
विवरण पर अपने पछताई॥
मैं श्रेयहीन हो गई अन्त में,
हो अधीर, अतिशय रोई।
सुख समय रही सबको होकर,
दुख में न बना अपना कोई॥
(श्री गिरजा देवी 'निर्लिप्त' लखनऊ)
प्रिय, तनिक परदा उठा दो!
ढूँढ़ता नभ में तुम्हीं को श्याम जल धर रो पड़ा है।
आज आशा दीप मेरा कुछ मलिन सा हो चला है॥
प्रिय, नई ज्योति जगा दो!
खोजते तुमको थकी आंखें अलस क्या मूँद सो लूँ?
स्वप्न के संसार में प्यासे दृगों के द्वार खोलूँ?
प्रिय, सलोनी छवि दिखा दो!
बस अकेले तुमको देखूँ आप अपने को न लेखूँ।
‘तुम’ बनूँ ‘मैं’ और अपने में तुम्हारा रूप देखूँ॥
प्रिय, खुदी मेरी मिटा दो!
प्रिय, तनिक परदा उठा दो!!
(प. मुरलीधर शर्मा)
(1) भाग्यशाली पुरुषों के पाँवों में निम्न लक्षण पाये जाते हैं (अ) पैरों में पसीना कम आता है (ब) तलवे कोमल होते हैं (स) उंगलियों के बीच में फासला कम होता है (द) नाखून लाल होते हैं (ह) एड़ियां गोल गरम और सुन्दर होती हैं।
(2) दरिद्री और दुखी लोगों के पैरों में यह लक्षण होते हैं (अ) एड़ी पतली और पंजे चौड़े होते हैं (ब) नाखून नीले या पीले होते हैं (स) उंगलियाँ सूखी तथा छितरी होती हैं।
(3) बड़े पैरों वाला अपने जीवन में बहुत चलता है।
(4) पकी मिट्टी की तरह कषाय वर्ण के तलुओं वाला धोखे बाज होता है।
(5) पीले तलवों वाला पुरुष व्यभिचारी और इन्द्रिय लोलुप होता है।
(6) जिनकी जाँघों पर रोम कम और पतले हों जिनकी जांघें गोल, हाथी की सूँड़ की तरह हो, जिनके घुटने सम बिना उभरे हों उनको पैसे का कष्ट न भोगना पड़ेगा
(7) कुत्ते के समान पतली, सियार के समान चौड़ी टाँगों वाले मनुष्य सब कामों में असफल होते हैं और सुख के स्थान में भी दुख पाते हैं।
(8) जिनके घुटनों की हड्डी उभरी होती है वह चिन्तातुर क्रोधी किन्तु दीर्घायु होते हैं।
(9) गोल और मोटे भरे हुए कूल्हे शूरवीर और साहसी लोगों के होते हैं।
(10) जिनके कूल्हे की हड्डियाँ उभरी हुई हों वह सम्पत्ति होते हुए भी सुख नहीं पाते।
(11) सूखे हुए चूतड़ों वाले अक्सर रोगी रहते हैं।
(12) भारी चूतड़ वाले मनुष्य यशस्वी, बहुत बोलने वाले और लोलुप होते हैं।
(13) सिंह सी पतली कमर वाले राजा होते हैं।
(14) बन्दर या ऊँट की सी टेड़ी कमर वाले दरिद्री होते हैं।
(15) घड़े से बड़े पेट वाले सुस्वादु भोजन पाते हैं उनकी जिन्दगी आराम से कट जाती है।
(16) जिनके पेट पर नीली नसें उभरी रहती हैं वह अजीर्ण, अरुचि और अतिसार से पीड़ित रहते हैं।
(17) जिनकी छाती, कमर और पसली बिलकुल सीधी एक लेवल में होती है वह क्षीण स्वास्थ्य वाला किन्तु दीर्घजीवी होता है।
(18) जिनका पेट साँप की तरह लम्बा होता है वह बहुत खाने वाले होते हैं, दिन भर मुँह चलाने की उन्हें इच्छा रहती है।
(19) जिनकी पसलियाँ उभरी हुई हों उन्हें शौक मौज से अरुचि होगी।
(20) फैली हुई पसलियों वाले सादा जीवन बिताते हैं।
(21) आपस में सटी हुई और माँस में भीतर दबी हुई पसलियाँ बलवान, विग्रहों और क्रूर स्वभाव वालों की होती है।
(22) गहरी नाभि वाले आनन्द मय जीवन का उपयोग करते हैं।
(23) उथली और फैली हुई नाभि चोरों की होती है।
(24) छोटी या ऊँची उठी हुई नाभि वालों से उनके स्नेही असंतुष्ट रहते हैं।
(25) जिसके पेट पर बैठते समय एक रेखा पड़ती है वह कला प्रेमी होते हैं।
(26) जिसके पेट पर दो पलेट पड़ती हैं वह बुद्धिमान व्यवसायी और परदेश में भ्रमण करने वाला होता है।
(27) पेट पर तीन पलेट पड़ने वाला संतान का दुख पाते हैं।
(28) कई टूटी हुई रेखाएं जिनके पेट पर पड़ती हैं। उनका जीवन अस्थिर और अनेक प्रकार की घटनाओं से घिरा होता है।
(रचयिता- श्री रामनाथ गुप्त)
अहे विकृत युग के विरोध चिर! उज्ज्वल अवरोध पतन के!
सहस्रांशु कर से विकसाते मानस-वारिज जन-जन के!
गरज उठे कितने मुसोलिनी! तड़प उठे कितने हिटलर!
साक्षी बन कर देख रहे हैं भूधर-सिन्धु, धरा-अम्बर।
कण-कण शोणित-सिक्त विश्व का रुदन कर रहा है कह कर-
“और न रुधिर बहे संगर में, मरे न प्रभु का प्यारा नर,
सजें न रण के साज लहर पर, उड़ें न वायुयान विषधर,
रक्त -माँस-सज्जा-मण्डित वह मृत्यु न चले विजय रथ पर;”
पीड़ित युग की इस पुकार के तुम्हीं एक प्रतिनिधि भूपर,
दानव के साम्राज्य क्षेत्र में तुम्हीं एक मानव भूपर;
तुम अनेक में एक, भ्रमों में शुचि विवेक की कलित किरन;
असुरावृत इस अवनीतल में तुम्हीं सुर-सदन गहन;
बीते युग के सार और तुम नवयुग की आधार-शिला;
वर्तमान के यौवन-जिससे जरा जीर्ण संसार खिला।
कर्मयोग-विज्ञान-भक्ति की सरल समन्वय की रेखा-
-खिंची हुई तब भव्यानन पर आँख खोल जग ने देखा।
नयन-नीलिमा से बहती जगती में विप्लव की बिजली;
भृकुटि भंगिमा से हिलती जड़-जीण पुरातन की अवली;
वाणी की गरिमा में जलती जीवन की जगमग ज्वाला;
तप की महिमा से उठती जग शीतल सजल मेघ-माला।
उच्च हिमालय प्रेमामय है! गंगा की शतशः धारें-
फूट रही हैं, बुझा रही हैं झोंपड़ियों अंगारे;
विभु की व्यापकता से तुम निज युग हस्तों में निधियाँ ले-
प्रकृति विधात्री के लेखों से शाश्वत उज्ज्वल विधियाँ ले-
मंगलमय मानवता के तुम तन्मय हो फिर सिरजन में,
खिंची ज्योति की रेख आज तो सघन तमोमय मन-मन में।
-प्रताप
*समाप्त*
इसे व्रतों में पृथक स्थान न है, न हो सकता है। यह अहिंसा का एक अर्थ है या यों कहिये कि उसके अंतर्गत है। परन्तु नम्रता अभ्यास से नहीं आती, वह स्वभाव में आ जानी चाहिए। जब पहली बार आश्रम की नियमावली तैयारी हुई तब उसका मसौदा मित्र वर्ग के पास भेजा था। सर गुरुदास बैनर्जी ने नम्रता को व्रतों में शुमार करने की सूचना दी थी, तब भी मैंने उसे व्रतों में न मानने का यही कारण बताया था, जो यहाँ लिखता हूँ। परन्तु इसे व्रतों में स्थान न होते हुए भी कदाचित यह व्रतों की अपेक्षा अधिक आवश्यक है, उनके जितना आवश्यक तो है ही। परन्तु अभ्यास से कोई नम्र बना हो सो तो कभी सुना ही नहीं। सत्य का, दया का, अभ्यास हो सकता है, नम्रता का अभ्यास करना तो दंभ सीखना हुआ। यहाँ नम्रता से मतलब उस चीज से नहीं है जो बड़े लोगों में एक दूसरे के सम्मानार्थ सिखाई-पढ़ाई जाती है। कोई आदमी दूसरे को साष्टांग नमस्कार करता हो तो भी उसके मन में उसके लिए तिरस्कार हो सकता है। यह नम्रता नहीं लुच्चपन है। कोई राम नाम जपता फिरे, माला फेरता रहे, मुनि जैसा बन कर समाज में विराजे, पर भीतर स्वार्थ भरा हो,- वह नम्र नहीं, पाखण्डी है। नम्र मनुष्य स्वयं नहीं जानता कि वह कब नम्र है। सत्य आदि का माप हम अपने पास रख सकते हैं, परन्तु नम्रता का माप नहीं होता स्वाभाविक नम्रता छिपी नहीं रहती। नम्र मनुष्य स्वयं उसे देख नहीं सकता। वशिष्ठ, विश्वामित्र के दृष्टान्त को तो हम अनेक बार आश्रम में समझ चुके हैं। हमारी नम्रता शून्यता तक जानी चाहिए। ‘हम कुछ हैं’ मन में इस भूत के आते ही नम्रता काफूर हो जाती है और हमारे सारे व्रत धूल में मिल जाते हैं। व्रत-पालन करने वाले यदि मन में अपने पालन का गर्व रखने लगे तो व्रतों का मूल्य खो बैठें, और समाज में विष रूप बन जायँ। उनके व्रत की कीमत न समाज करे न वे स्वयं ही उसका फल भोग सकें। नम्रता अर्थात् ‘अहं’-भाव का आत्यन्तिक क्षय। विचार करने से यह मालूम हो सकता है कि इस जगत में जीव मात्र एक रजकण की तुलना में भी कुछ नहीं है। शरीर के रूप में जीव क्षणजीवी है। काल के अनन्त चक्र में सौ वर्ष का प्रमाण निकाला ही नहीं जा सकता परन्तु यदि इस चक्र में से निकल जायँ, अर्थात् ‘कुछ भी नहीं’ हो जायँ, तो सब कुछ हो जायँ। ‘कुछ’ होना अर्थात् ईश्वर से, परमात्मा से, सत्य से दूर जा पड़ना, अलग होना। ‘कुछ’ मिट जाना, अर्थात् ‘परमात्मा में मिल जाना।’ समुद्र में रहने वाली बूँद समुद्र की महत्ता भोगती है, परन्तु इसे वह जानती नहीं। पर समुद्र से विलग हुई और आपे का दावा करने लगी कि उसी दम सुख गई है! इस जीवन को पानी के बुदबुदे की उपमा जो दी गई है, उसमें मैं लेशमात्र भी अतिश्योक्ति नहीं देखता। ऐसी नम्रता, शून्यता, अभ्यास द्वारा कैसे आ सकती है? परन्तु व्रतों को सच्चे रूप में समझने से नम्रता अपने आप आती जाती है। सत्य के पालन की इच्छा रखने वाला अहंकारी कैसे हो सकता है? दूसरों के लिए प्राण बिछाने वाला अपनी जगह कहाँ रोकने जाय? वह तो तभी अपनी देह को फेंक चुका, जब प्राण बिछाने का निश्चय किया। क्या इस नम्रता का अर्थ पुरुषार्थहीनता नहीं? हिन्दू धर्म में इसका अर्थ अवश्य ही किया जा चुका है; और इसी कारण अनेक स्थानों में आलस्य को, पाखण्ड को स्थान मिल गया है। वस्तुतः तो नम्रता का अर्थ तीव्रतम पुरुषार्थ है, परन्तु यह सब परमार्थ के लिए होना चाहिए। स्वयं ईश्वर चौबीसों घण्टे एक साँस से काम किया करता है, आलस्य मिटाने- जम्हाई लेने जितनी फुरसत भी नहीं लेता। हम भी वैसे ही हो जायें, उसमें मिल जायें, जिससे हमारा उद्यम भी उसके समान अतन्द्रित हो, और यही होना चाहिए। समुद्र से विलग बूँद के लिए हम आराम की कल्पना कर सकते हैं, पर समुद्र में रहने वाली बूँद को आराम कहाँ? ठीक यही बात हमारी है। ईश्वर रूपी समुद्र में हम समा जायँ, बस, हमारा आराम भी गया; आराम की जरूरत भी गई। यही सच्चा आराम है- यही है महा अशान्ति में शान्ति। अतः सच्ची नम्रता तो हमसे जीवमात्र की सेवा के लिए सर्वार्पण की आशा रखती है। सब कुछ परित्याग करने पर हमारे पास न रविवार रहता है, न शुक्रवार या सोमवार। इस स्थिति का वर्णन करना कठिन है। परन्तु यह अनुभवगम्य है। जिसने सर्वार्पण किया है, उसने इसका अनुभव भी किया है। हम सब इसका अनुभव कर सकते हैं। इस अनुभव की इच्छा से ही आश्रम में इकट्ठे हुए हैं, सारे व्रत, समस्त प्रवृत्तियाँ इस अनुभव के लिए हैं। दूसरा तीसरा करते हुए किसी दिन यह हमारे हाथ लग जायगा। इसी की शोध करने से यह प्राप्य नहीं।
इसे व्रतों में पृथक स्थान न है, न हो सकता है। यह अहिंसा का एक अर्थ है या यों कहिये कि उसके अंतर्गत है। परन्तु नम्रता अभ्यास से नहीं आती, वह स्वभाव में आ जानी चाहिए। जब पहली बार आश्रम की नियमावली तैयारी हुई तब उसका मसौदा मित्र वर्ग के पास भेजा था। सर गुरुदास बैनर्जी ने नम्रता को व्रतों में शुमार करने की सूचना दी थी, तब भी मैंने उसे व्रतों में न मानने का यही कारण बताया था, जो यहाँ लिखता हूँ। परन्तु इसे व्रतों में स्थान न होते हुए भी कदाचित यह व्रतों की अपेक्षा अधिक आवश्यक है, उनके जितना आवश्यक तो है ही। परन्तु अभ्यास से कोई नम्र बना हो सो तो कभी सुना ही नहीं। सत्य का, दया का, अभ्यास हो सकता है, नम्रता का अभ्यास करना तो दंभ सीखना हुआ। यहाँ नम्रता से मतलब उस चीज से नहीं है जो बड़े लोगों में एक दूसरे के सम्मानार्थ सिखाई-पढ़ाई जाती है। कोई आदमी दूसरे को साष्टांग नमस्कार करता हो तो भी उसके मन में उसके लिए तिरस्कार हो सकता है। यह नम्रता नहीं लुच्चपन है। कोई राम नाम जपता फिरे, माला फेरता रहे, मुनि जैसा बन कर समाज में विराजे, पर भीतर स्वार्थ भरा हो,- वह नम्र नहीं, पाखण्डी है। नम्र मनुष्य स्वयं नहीं जानता कि वह कब नम्र है। सत्य आदि का माप हम अपने पास रख सकते हैं, परन्तु नम्रता का माप नहीं होता स्वाभाविक नम्रता छिपी नहीं रहती। नम्र मनुष्य स्वयं उसे देख नहीं सकता। वशिष्ठ, विश्वामित्र के दृष्टान्त को तो हम अनेक बार आश्रम में समझ चुके हैं। हमारी नम्रता शून्यता तक जानी चाहिए। ‘हम कुछ हैं’ मन में इस भूत के आते ही नम्रता काफूर हो जाती है और हमारे सारे व्रत धूल में मिल जाते हैं। व्रत-पालन करने वाले यदि मन में अपने पालन का गर्व रखने लगे तो व्रतों का मूल्य खो बैठें, और समाज में विष रूप बन जायँ। उनके व्रत की कीमत न समाज करे न वे स्वयं ही उसका फल भोग सकें। नम्रता अर्थात् ‘अहं’-भाव का आत्यन्तिक क्षय। विचार करने से यह मालूम हो सकता है कि इस जगत में जीव मात्र एक रजकण की तुलना में भी कुछ नहीं है। शरीर के रूप में जीव क्षणजीवी है। काल के अनन्त चक्र में सौ वर्ष का प्रमाण निकाला ही नहीं जा सकता परन्तु यदि इस चक्र में से निकल जायँ, अर्थात् ‘कुछ भी नहीं’ हो जायँ, तो सब कुछ हो जायँ। ‘कुछ’ होना अर्थात् ईश्वर से, परमात्मा से, सत्य से दूर जा पड़ना, अलग होना। ‘कुछ’ मिट जाना, अर्थात् ‘परमात्मा में मिल जाना।’ समुद्र में रहने वाली बूँद समुद्र की महत्ता भोगती है, परन्तु इसे वह जानती नहीं। पर समुद्र से विलग हुई और आपे का दावा करने लगी कि उसी दम सुख गई है! इस जीवन को पानी के बुदबुदे की उपमा जो दी गई है, उसमें मैं लेशमात्र भी अतिश्योक्ति नहीं देखता। ऐसी नम्रता, शून्यता, अभ्यास द्वारा कैसे आ सकती है? परन्तु व्रतों को सच्चे रूप में समझने से नम्रता अपने आप आती जाती है। सत्य के पालन की इच्छा रखने वाला अहंकारी कैसे हो सकता है? दूसरों के लिए प्राण बिछाने वाला अपनी जगह कहाँ रोकने जाय? वह तो तभी अपनी देह को फेंक चुका, जब प्राण बिछाने का निश्चय किया। क्या इस नम्रता का अर्थ पुरुषार्थहीनता नहीं? हिन्दू धर्म में इसका अर्थ अवश्य ही किया जा चुका है; और इसी कारण अनेक स्थानों में आलस्य को, पाखण्ड को स्थान मिल गया है। वस्तुतः तो नम्रता का अर्थ तीव्रतम पुरुषार्थ है, परन्तु यह सब परमार्थ के लिए होना चाहिए। स्वयं ईश्वर चौबीसों घण्टे एक साँस से काम किया करता है, आलस्य मिटाने- जम्हाई लेने जितनी फुरसत भी नहीं लेता। हम भी वैसे ही हो जायें, उसमें मिल जायें, जिससे हमारा उद्यम भी उसके समान अतन्द्रित हो, और यही होना चाहिए। समुद्र से विलग बूँद के लिए हम आराम की कल्पना कर सकते हैं, पर समुद्र में रहने वाली बूँद को आराम कहाँ? ठीक यही बात हमारी है। ईश्वर रूपी समुद्र में हम समा जायँ, बस, हमारा आराम भी गया; आराम की जरूरत भी गई। यही सच्चा आराम है- यही है महा अशान्ति में शान्ति। अतः सच्ची नम्रता तो हमसे जीवमात्र की सेवा के लिए सर्वार्पण की आशा रखती है। सब कुछ परित्याग करने पर हमारे पास न रविवार रहता है, न शुक्रवार या सोमवार। इस स्थिति का वर्णन करना कठिन है। परन्तु यह अनुभवगम्य है। जिसने सर्वार्पण किया है, उसने इसका अनुभव भी किया है। हम सब इसका अनुभव कर सकते हैं। इस अनुभव की इच्छा से ही आश्रम में इकट्ठे हुए हैं, सारे व्रत, समस्त प्रवृत्तियाँ इस अनुभव के लिए हैं। दूसरा तीसरा करते हुए किसी दिन यह हमारे हाथ लग जायगा। इसी की शोध करने से यह प्राप्य नहीं।