कहने को तो हम लोग रोज ईश्वर-ईश्वर रटते हैं, पर असल में शरीर को ही ईश्वर मानते हैं। दिन-रात जो काम करते हैं, उन पर बारीक दृष्टि डालें तो पता चलता है कि चौबीस के चौबीसों घंटे शरीर की पूजा में जाते हैं। शाम को अपनी कमाई पर गौर कीजिये, यह सब शरीर सुख के लिये प्राप्त किया गया है। धन-दौलत इकट्ठा करना हमारा आराध्य विषय है। षट्रस व्यंजन, बढ़िया कपड़े, ऊँचा मकान, कीमती सवारी, सुन्दरी, सेविका, सब तो हमें प्रिय है। इन्हीं के लिये सारा प्रयत्न होता है। सारा का सारा समय शरीर की पूजा में लगता है। गिद्ध जैसे कितना ही ऊँचा उड़ जाए पर दृष्टि मुर्दा माँस पर ही रखता है। इसी प्रकार हम चाहे जितनी बढ़-चढ़ कर बातें करें, पर दृष्टि शरीर पर ही रहती है।
अभागे मनुष्य! यह शरीर अमर नहीं है। इसके सुख भी सदा नहीं भोगे जा सकते। विश्व में कोई सदा नहीं जिया। मौत के दांतों में लटके हुए आदमी! यह शरीर कल ही नष्ट होने वाला है। यह ईश्वर नहीं है, इसकी ईश्वर जैसे पूजा मत कर। हाड़ माँस की उपासना करने वाले मूर्ख! अपने अन्त को देख! संसार में मृत्यु ही यही सत्य है। यह शरीर नाशवान है। मनुष्यों! भूलो मत- यह शरीर नाशवान है। इस मल मूत्र की गठरी को ईश्वर मत मानो। स्वार्थ से कुछ ऊँची दृष्टि उठा कर परमार्थ की ओर भी देखो। अपने अन्धकारमय भविष्य का भी चिन्तन करो।
1.अखण्ड ज्योति का वार्षिक मूल्य 1॥) और एक प्रति का =1) है। मूल्य मनीआर्डर से भेजना चाहिए। वी.पी मँगाने पर 1-)अधिक देने पड़ते है।
2.उत्तर के लिये जवाबी कार्ड या टिकट भेजना चाहिये अन्यथा उत्तर न दिया जाएगा।
3.नये ग्राहकों को जनवरी या जून से ही ग्राहक बनना चाहियें, बीच में ग्राहक बनने वालों को पिछले अंक भेज दिये जाएंगे। पिछले अंक मँगा कर चालू मास से ही ग्राहक रहना पाठक की इच्छा पर निर्भर है। जैसी रुचि को लिख देना चाहिये।
4.अखण्ड ज्योति के मूल्य में कमी करने के लिये पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिये भी ग्राहक नहीं बनायें जाते।
5.अखण्ड ज्योति प्रति मास ठीक 20 तारीख को निकल जाती है। अपने यहाँ से दो बार जाँच कर ग्राहकों के पास भेजा जाता है। परन्तु कभी-कभी डाकखाने की गड़बड़ी से अंक पाठको को नहीं मिलते। ऐसी दशा में रुष्ट न होकर डाकखाने से पूछताछ करनी चाहिये। उसका उत्तर लिखते हुए अंक दुबारा मंगा लेना चाहिये।
6.स्वीकृत लेख सचित्र भी छापे जा सकेंगे। यदि लेखक ब्लॉक भेज देंगे या उसका प्रबन्ध कर देंगे।
7.पुस्तकों का मूल्य भी मनीआर्डर से भेजना चाहिए। वी. पी. मँगाने पर अधिक देने पड़ेंगे। 1) से कम मूल्य की पुस्तकों की वी. पी. नहीं भेजी जाती ।
8.पत्र व्यवहार करते समय अपना ग्राहक नम्बर अवश्य लिखना चाहिये।
पत्र व्यवहार का पता -
मैनेजर - अखण्ड ज्योति, कार्यालय- मथुरा
जो ज्ञान युगों के प्रयत्न से मिलता है - उसे हम अनायास ही आपके सम्मुख उपस्थित करते हैं।
यह पुस्तकें बाजारू किताबें नहीं है। इनकी एक-एक पंक्ति के पीछे गहरा अनुभव और अनुसन्धान है। विनम्र शब्दों में हमारा दावा है कि इतना खोज पूर्ण, अलभ्य साहित्य इतने स्वल्प मूल्य में अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकता।
1.मैं क्या हूँ? - आत्म साक्षात्कार करने के कुछ साधन ।
2.सूर्य चिकित्सा विज्ञान - सूर्य की प्रचंड रोग नाशक शक्ति द्वारा कठिन रोगों की चिकित्सा कीमत 1)
3.प्राण चिकित्सा विज्ञान - मनुष्य शरीर की बीमारियों को बिजली द्वारा अच्छा करना कीमत 1)
4.पर काया प्रवेश - आत्म शक्ति को दूसरे के शरीर में प्रविष्ट करके उसे इच्छानुसार चलाना। कीमत 1)
5.स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्भुत विद्या - आध्यात्मिक सरल साधनों से तन्दुरुस्त और खूबसूरत बनने के उपाय कीमत। 1)
6.मानवीय विद्युत के चमत्कार - शरीर की बिजली से कैसे-कैसे आश्चर्यजनक कार्य होते हैं इसका वैज्ञानिक विवरण। कीमत 1)
7.स्वर योग से दिव्य ज्ञान - स्वरोदय विद्या द्वारा गुप्त और भविष्य की बातों को जान लेना। कीमत 1)
8.भोग में योग - शीघ्र पतन, स्वप्नदोष, नपुँसकता आदि विकारों को योग साधनों से दूर करने की शिक्षा। कीमत 1)
9.बुद्धि बढ़ाने के उपाय - बुद्धि को तीव्र करने, स्मरण शक्ति को उन्नत करने के सरल उपाय। कीमत 1)
10.धनवान और विद्वान बनने के सिद्धान्त - मनुष्य चाहे कैसी ही बुरी परिस्थिति में क्यों न हो, इन उपायों द्वारा धनी और विद्वान बन जाएगा। कीमत 1)
11.इच्छानुसार पुत्र या पुत्री उत्पन्न करना - बन्ध्यापन निवारण और मनचाही सन्तान उत्पन्न करने की विधि । कीमत 1)
12.वशीकरण की सच्ची सिद्धि - ऐसे सद्गुणों की शिक्षा जिनके द्वारा दूसरों के हृदय को जीत कर वश में किया जा सकता है। कीमत 1)
13.मरने के बाद हमारा क्या होता है? - मृत्यु के उपरान्त प्रेत होने, स्वर्ग, नरक में जाने, जन्म लेने आदि की खोजपूर्ण चर्चा । कीमत 1)
14.क्या धर्म? क्या अधर्म? - दार्शनिक, व्यावहारिक और वैज्ञानिक दृष्टि से धर्म की मीमाँसा। कीमत 1)
15.गहनाँ कर्मणो गति - दुष्ट लोग सुखी और धर्मात्मा दुखी क्यों देखे जाते है? कर्म फल कैसे मिलता है। भाग्य क्या है? आदि का तात्विक दर्शन । कीमत 1)
16.ईश्वर कहाँ है? कौन है? कैसा है? - ईश्वर के स्वरूप और उसकी उपासना का मर्म भेद। कीमत 1)
नं. 8 तक की पुस्तकें छपकर तैयार है। शेष अगस्त सन 41 तक छप कर तैयार हो जाएंगी।
इन पुस्तकों की एक-एक प्रति अपने पास जरूर रखिये ।
पत्र व्यवहार का पता -
मैनेजर - ‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय मथुरा
अखण्ड ज्योति के ज्ञान प्रसार कार्य में सहयोग देना धर्म कर्तव्य समझ कर इस मास निम्न महानुभावों ने ग्राहक बढ़ाने का विशेष प्रयत्न किया है। इन सज्जनों के प्रति अखण्ड ज्योति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करती है।
पं. त्रिलोकीनाथ तिवारी, खरसिया बी. एन. रेलवे
श्री धर्मपाल सिंह जी बरला, मुजफ्फ र नगर
श्री टी एस पंडित, शुक्रवार पेठ, पूना
बाबा गोपालदास जी महाराज, वेटा गाँव, मुरादाबाद
बा. सूर्यनारायण वशिष्ठ बी. ए. एल.एल. बी, शिकारपुर
महन्त शंकरानन्द ब्रह्मचारी, शाक्तमठ, गन्लूर
श्री मन्नीलाल रतनचन्द जी, पालनपुर
श्री चिन्तामणि जी पाण्डेय, कन्ट्रैकटर लखनऊ
क्षत्रिय जाति के सच्चे हितैषी हैं और उसे उन्नति के शिखर पर देखना चाहते है तो वीर भूमि राजस्थान के केन्द्र अजमेर से प्रकाशित होने वाले विविध विषय विभूषित मासिक पत्र
“क्षात्र-धर्म”
को मंगाकर पढ़े और उसके संरक्षक, सहायक, शुभचिन्तक और ग्राहक बनें। वार्षिक मूल्य राज संस्करण 10) व साधारण 3) रु. नमूना मुफ्त
मैनेजर क्षात्र-धर्म, अजमेर
भगवन्नाम प्रचारक हिन्दी का पारमार्थिक मासिक पत्र “नाम-माहात्म्य” के चतुर्थ वर्ष का विशेषाँक “श्री तीर्थांक” प्रकाशित होगा। जिसमें भारत के तीर्थों का सचित्र विस्तृत विवरण रहेगा। भगवन्नाम प्रचार की दृष्टि से विशेषाँक का मूल्य लागत से भी कम केवल 1)है और वार्षिक मूल्य 1॥) रखा है। कागज आदि सभी वस्तुओं का मूल्य तेज़ हो जाने से विशेषाँक परिमित संख्या में ही छपाया जा रहा है। अतः आप आज ही अपना तथा अपने मित्रों का वार्षिक मूल्य 1) मनीआर्डर द्वारा भेज कर ग्राहक बन कर इस भगवन्नाम प्रचार में हमारा हाथ बटावे और इस अमूल्य वस्तु का भी आनन्द लेवें।
मैनेजर’ ‘नाम - माहात्म्य’ कार्यालय
श्री भजनाश्रम भवन, वृन्दावन, यू.पी
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
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भाग 2 मथुरा, 20 अप्रैल सन् 1941 अंक 4
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( श्री जिज्ञासु )
“वह पापी है दुष्ट नराधम, उसके पास न जाना ।
उसे देखना छूना मानो, शिर पर पाप चढ़ाना ॥”
“भाई सच कहते हो, लेकिन, पावन किसका तन है?
रक्त माँस मल मूत्र आदि से, रहित कौन सा जन है?
आत्मा तो सब की समान है, सुन्दर शुचि अविनाशी ।
सब में सदा समान बिराजें, शम् कर घंट घटवासी।”
“कर्म बुरे करता है” लेकिन, ‘गहन कर्म गति’ भाई ।
क्या अच्छा क्या बुरा न परिभाषा इसकी हो पाई ॥”
मानव की अपूर्ण प्रज्ञा-क्या, बेचारी ने जाना ।
कुछ आसान नहीं है जग में, ‘बुरा भला’ बतलाना ॥
प्रभु के इस पावन प्राँगण में, किसको दोष लगाऊं
उसकी पुण्य पूत कृतियों को, कैसे बुरा बताऊ॥
किससे द्वेष करूं? किससे बदला लूँ? किसकों मारूं?
किसे विपक्षी समझूँ किसकी सेना को संहारूं?
नवीन सभ्यता की यह आवाज है कि हमें अपनी उन्नति करने के लिये आर्थिक और बौद्धिक उन्नति करनी चाहिए, संगठन करना चाहिए। धर्म मार्ग की कड़ी आलोचना करते हुए कहा जाता है कि यह तो अफीम की गोली है, जिसे खाकर मनुष्य अपनी बुद्धि खो बैठता है। यह तो पंडे पुजारियों का पेशा है, जो लोगों को बहका कर अपना उल्लू सीधा करते है।
उपरोक्त विचार किसी एक मनुष्य के नहीं है, वरन् एक तीव्र विचारधारा है, जो दिन-दिन प्रबल होती जाती है। युग का प्रवाह या नास्तिकों का प्रलाप कह कर इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। हमें विचार करना है कि इन बातों में कितना तथ्य है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से जब हम बारीकी के साथ इस सम्बन्ध में विचार करने बैठते हैं, तो प्रतीत होता है कि इस युग की धार्मिक बगावत वस्तुतः धर्म-तत्व के विरुद्ध नहीं वरन् उसके साथ मिल जुल गये, पाखंड के विरुद्ध है। हिन्दू जाति धर्म प्राण रही है और उसमें उदारता की मात्रा का समावेश अत्यधिक रहा है, इसलिये हिन्दू धर्म के अन्दर अनेक पंथ,उप पंथ बढ़ते रहे और सब प्रकार हितकर अहितकर रीति-रिवाजें पनपती रहीं। देवदासी प्रथा (लड़कियों को नाचने के लिए मन्दिरों को दान करना), सखी सम्प्रदाय (भक्ति के नाम पर पुरुषों का स्त्री रूप बनाना), जीव वलि प्रथा (पशु पक्षी तथा मनुष्यों तक की बलि देना ), तान्त्रिकों के विकृत भैरवी चक्र (मद्य, माँस, मैथुन, धन संग्रह आदि में ही लिप्त रहना), जैसे कार्य जब धर्म का आवरण ओढ़ कर फले फूले तो स्वाभाविक है कि उनकी गंदगी उस तालाब को ही गन्दा कर दे, जिनमें से उनका उद्भव होता है। शताब्दियों का यह घपला अब धर्म के शुद्ध स्वरूप में मिल कर कुछ ऐसी विकृत दशा में सर्वसाधारण के सामने आता है कि स्थूल दृष्टि डालते ही उससे घृणा होने लगती है। मन्दिरों मठों में होने वाले दुराचार, साधुओं का वेश धारण किये हुए असंख्य हरामखोर बदमाश, धर्म पुण्य के नाम पर स्वार्थ साधन के लिए अज्ञानी जनता से हड़पी जाने वाली धनराशि , ज्योतिष भविष्य कथन आदि के नाम पर होने वाला भ्रम, प्रचार साम्प्रदायिक कलह, दंभियों के संगठित षडयन्त्र, जब नग्न रूप से जनता के सामने आते हैं, तो उनके अप्रबुद्ध मस्तिष्कों में धर्म के यही चित्र अंकित हो जाते है और यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि हर विचारशील एवं सहृदय व्यक्ति उनसे घोर घृणा करे। धर्म के विरुद्ध उठी हुई इस युग की प्रचण्ड बगावत की आदि कारण वे पाखण्ड हैं, जिन्होंने धर्म के पवित्र गंगाजल को गंदली कीचड़ का रूप दे दिया है। पेट में जब बगावत खड़ी होती हैं, दस्त लगते है, तो दूषित भाग के साथ श्रेष्ठ तत्व भी बाहर फेंक दिये जाते हैं, सूखे के साथ गीला भी जल जाता है, गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाता है। दुनिया के तीन चौथाई से अधिक मनुष्यों के मस्तिष्क पर अधिकार जमाये हुए धर्म विरोधी भावनाओं का यथार्थ कारण यही है।
धर्म के शुद्ध स्वरूप में बगावत के लिए रत्ती भर भी स्थान नहीं हैं। विरोध उसमें हो नहीं सकता। मनुष्य जाति की सामाजिक व्यवस्था को ठीक बनाये रहने वाली शृंखला केवल धर्म ही हो सकता है। धार्मिक भावनायें मनुष्य के हृदय में स्वार्थ का त्याग और परोपकार वृत्ति का बीजारोपण करती हैं। संसार के समस्त कलह और दुख-दरिंदों का कारण स्वार्थ की अनुचित साधना है। धर्म से विमुख हो कर मनुष्य स्वार्थ सिद्धि को ही अपना इष्ट बना रहे हैं। संसार में वस्तुएं एक नियत मात्रा में हैं, वे उतनी रहती हैं, जितनी से प्राणियों का उचित पालन पोषण हो सके ! यदि सभी अपने-अपने भाग का उपभोग करें, तो विश्व की शान्ति स्थापित रहेगी, समाज की सारी व्यवस्था बड़ी सुविधापूर्वक चलती रहेगी। किन्तु मनुष्य स्वभाव में अक्सर पशुता का उदय होता है, वह अपने लिये बहुत चाहता है और दूसरों को कुछ नहीं देना चाहता दूसरों को नहीं देना चाहता। दूसरों को कष्टकारक स्थिति में धकेल कर अपने लिये अधिक सुख-सुविधायें एकत्रित करता है, फलस्वरूप दूसरे लोग अभाव से दुखी रहते हैं और जब उनमें प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, तो प्रतिशोध लेने के लिए तत्पर हो जाते है, तदनुसार कलह का सूत्रपात होता है। हम समाज के अधिकाँश भाग को दुखी पाते हैं और उसमें कलह के बड़े नृशंस दृश्य देखते हैं। सारा संसार इन हाहाकारों से पीड़ित हो रहा है। सच्चे धर्म से विमुख होने का यही तो निश्चित परिणाम है।
धर्म की विषद विवेचना का तत्व ज्ञान यह है कि “मनुष्य अपनी सुविधाओं का दूसरों के सुख के लिये खुशी खुशी परित्याग करे”। यह भावनाएं जितनी-जितनी अधिक दृढ़ होती जाती हैं, उतना ही मनुष्य उदार होता जाता है, अपने सुख की अपेक्षा दूसरों की सुविधा का उसे विशेष ध्यान रहता है। आनन्द एक कल्पित चीज है, उसका आरोपण जिस वस्तु में कर लिया जाए, उसी में वह प्राप्त होने लगता है। स्वार्थ साधन में आनन्द आता है, पर जब उसका आरोपण परमार्थ में कर लिया, तो परमार्थ में ही स्वार्थ के समान भी आनन्द आने लगता है। वह आनन्द नामक पदार्थ जिसकी प्राप्ति के लिये स्वार्थ साधन किया गया था, जब धार्मिक भावनाओं के कारण परमार्थ में भी प्राप्त होने लगता है, तो वह समस्या हल होने लगती है, जिसके कारण संसार नरक बना हुआ है। इतिहास में ऐसे उदाहरण है कि कुछ शासकों की स्वार्थ भावनाएं राज्य के लिये अपने सगे भाइयों तक हत्याएँ कराती हैं। इसके विपरीत जब राम और भरत दोनों ही त्याग की भावनाओं से परिपूर्ण होते हैं, तो वह राज्य तुच्छ वस्तु बन जाता है, दोनों के जीवन में आनन्द का अविरल श्रोत फूट निकलता है। एक भाई राज्य को दूसरे भाई को खुशी खुशी देना चाहता है, दूसरा उसे उसी के लिये अर्पण करता है। कैसा स्वर्गीय दृश्य है। जिन पति पत्नियों में , मित्र मित्रों में, इस प्रकार की भावनाओं के कुछ अंश देख पड़ते हैं, वहाँ कितनी पवित्र प्रेम की धारा बह निकलती है। शाँति और सुव्यवस्था का मेरुदण्ड यही विचारधारा है, जिसे धार्मिक भावना के नाम से पुकारा जाता है।
नवीन सभ्यता धार्मिक आडम्बरों की बगावत करते हुए उसके सत्य तत्व का भी बहिष्कार कर देती है, उसका मुँह त्याग की अपेक्षा स्वार्थ की ओर मुड़ जाता है। तदनुसार कलह की दारुण विभीषिकाएं सामने आ खड़ी होती हैं। जहाँ स्वार्थ की प्रधानता है, वहाँ आर्थिक उन्नति, बौद्धिक विकास और संगठन कुछ भी काम नहीं दे सकते। जरा आज की अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति पर दृष्टिपात कीजिये। राष्ट्र संघ जैसा महान संगठन बेचारा एक झोंके में उड़ गया। धन-धान्य से सम्पन्न, राजाओं जैसा जीवन बिताने वाले व्यक्ति आज भूखे मर रहे है और गुफाओं में छिप कर अपनी प्राण रक्षा कर रहे हैं, विज्ञान के आश्चर्यजनक आविष्कार करने वाली बुद्धि आज मृत्यु किरणों और जहरीली गैसों का आविष्कार कर रही है। स्वार्थ की जितनी अधिकता होती जाएगी, संसार में उतने ही नारकीय दृश्य उपस्थित होते जाएंगे। जिस दिन धर्म की भावनाओं का बिलकुल लोप हो जाएगा, स्वार्थ का पूर्णतः साम्राज्य हो जायगा, उस दिन सर्पिणी की तरह माताएँ अपने बच्चों का माँस पका कर खाने लगेंगी, बहनें पशुओं की तरह लज्जा और रिश्ता छोड़कर इन्द्रिय परायण हो जायेंगी, मनुष्य शूकरों की तरह अखाद्य खाने लगेंगे और कुत्तों की तरह एक दूसरे की बोटी नोंच नोंच डालेंगे।
हे नवीन सभ्यता के अभिमानियों ! अपने तर्कों पर पुनः विचार करो, वस्तु स्थिति को पुनः सोचो, अपने कार्यक्रम का पुनः संशोधन करो। यह मार्ग कल्याण का नहीं है, जिस पर तुम प्रवृत्त हो रहे हो। आर्थिक उन्नति, बौद्धिक विकास,संघटन तीनों ही बड़ी सुन्दर वस्तुएं हैं परन्तु इनके मूल में धर्म होना चाहिए अन्यथा यह उन्नति विनाश की तीक्ष्ण तलवारें ही सिद्ध होंगी। धार्मिक रीति-रिवाजें वास्तविक धर्म नहीं हैं। यह तो इसके बाह्य चिन्ह हैं, जो समय- समय पर बदलते रहे हैं और बदलते रहेंगे। इनमें जो विकृतियाँ आ गई हों, जो अंग सड़ गये हों, उन में परिवर्तन कर लो। क्योंकि परिवर्तन ही जीवन है। परन्तु थोड़े से विकार के कारण सत्य तत्व की ही अवहेलना मत करो। खटमलों के डर से चारपाई का ही परित्याग कर देना बुद्धिमानी नहीं है।
कई बार यह भी सुनने में आता है कि सामाजिक व्यवस्था अच्छे राज-प्रबन्ध से रोकी जा सकती। उन्हें जानना चाहिये कि व्यवस्था केवल दण्ड से कायम नहीं रह सकती है। हर आदमी के पीछे एक-दो दरोगा लगा दिया जाए तो भी उससे पूरी तरह कानून का पालन नहीं कराया जा सकता। वह कुछ न कुछ तरकीब निकाल ही लेगा, फिर वे दरोगा भी उसी समाज में से होंगे। इसलिये धर्म का परिपालन ही एक ऐसी वस्तु हो सकती है, जिसके द्वारा समाज की शान्ति और व्यवस्था कायम रहे एवं सब लोग प्रेमभाव और सुख शान्ति के साथ रहें। बुद्धिमान विचारकों ! दुखों में सुख का आविर्भाव करने वाले इस महान तत्व को नष्ट मत करो, इस से बगावत मत करो। शास्त्र कहता है- “धर्म एव हतो हन्ति रक्षे रक्षित रक्षतः।” धर्म की रक्षा करने से तुम्हारी रक्षा होगी और धर्म के नष्ट होने पर तुम भी नष्ट हो जाओगे।
अति क्रामन्तो दुरिता पदानि ! शतं हिमाः सर्वे वीरा मदेम। अथर्व 12/2/28
मन से दुष्ट विचारों को दूर करना चाहिए। अच्छे निर्भय और धैर्यमय विचारों को अपने मन में धारण करना चाहिए और सौ वर्ष तक वीर पुरुषों के साथ आनन्द से जीवन व्यतीत करना चाहिए।
कस्ये मृजाना अति यन्ति रिप्रं । आयुर्दधानाः प्रतरं नवीयः। अथर्व 12/3/17
जो मनुष्य अपनी आयु पुरुषार्थ से बढ़ाते हैं। और अपने आपको ईश्वर की भक्ति से पवित्र बताते हैं उनके दोष दूर हो जाते हैं।
अप्यायमानाः प्रजया धनेन। शुद्धाः पूता भवत याशि यासः। ऋग्0 10/18/2
संतान और धन प्राप्त करके, सबको अपनी उन्नति करनी चाहिए। अन्दर से बाहर से और सब प्रकार से शुद्ध पवित्र और निर्दोष बनकर श्रेष्ठ बनना चाहिए।
अजैष्माद्यासनाय चाभूमाऽनागसो वयम्।
ऋग्0 10/164/5
सब से पहले हमको निर्दोष बनना चाहिए। पश्चात परस्पर प्रेम का बर्ताव करना चाहिए जिससे विजय और यश प्राप्त हो।
यन्मे छिद्रं चक्षुषो हृदयस्य मनसो वाऽति तृष्ण्ं बृहस्पतिर्मतेद्दधातु। यजु0 36/2
अपनी इन्द्रियों और अवयवों में जो दोष होंगे, वे ईश्वर की कृपा से दूर हो सकते हैं। मनुष्यों को उचित है कि वे ज्ञानी गुरु के पास जावें, उनकी सहायता से अपने दोषों को दूर करें और पवित्र बनें।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे ।
यजु0 36/18
सब प्राणियों को मित्र दृष्टि से देखना चाहिए, किसी से द्वेष नहीं करना चाहिए। किसी को भी दुख नहीं देना चाहिए और प्राणी मात्र से प्रेम करना चाहिए।
( प्रो.श्री धर्मपालसिंह जी, एस.एस.ए. बरला)
संसार के सभी जीव किसी न किसी रूप में उस सच्चिदानन्द परम पावन पिता को अपनी वाणी में याद करते हैं और इस संसार रूपी संग्राम भूमि में सभी अपने-अपने स्वभावानुसार किसी न किसी उद्देश्य की प्राप्ति के प्रयत्न में लगे हुए हैं। जब अपनी सब शक्तियाँ (शरीर बल, बुद्धिबल, मित्र बल, धन बल आदि) का प्रयोग करके भी उद्देश्य पूर्ति में असमर्थ हो जाते हैं तब निराश होकर संसार की एक गुप्त शक्ति को अपनी-अपनी भाषा में पुकार उठते हैं। हे राम ! अल्लाह ! ओ माई गाड ! यह वेदना पूर्ण सम्बोधन एक अन्तिम सहायतार्थ किया जाता है। इसी को प्रार्थना, प्रेयर आदि आदि नामों से कहा जाता है। प्रार्थना संसार के प्रत्येक धर्म का आवश्यक अंग है और मनुष्य जीवन की उन्नति का एक उत्तम साधन है, अपार दुःख सागर से निकलने के लिए एक सहारा है, इस में वह अनन्त शक्तियाँ है जिसके आगे कुछ असम्भव नहीं है, परन्तु यह सब प्रार्थी की दशा पर निर्भर है। संसार में प्रार्थना विशेषतया निम्न तीन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की जाती है। (1) केवल साँसारिक लाभ, अन्न, धन, वस्त्र, रोग निवृत्ति के लिए (2) मानसिक, बौद्धिक कठिनाइयों को दूर करने के लिए। जैसे काम, क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या, मानसिक कुभावों पर विजय पाने, आत्म उन्नति एवं आत्मा क्या है, वह कहाँ से आया है, कहाँ जाएगा इत्यादि गूढ़ विषयों का बुद्धि द्वारा समझने के लिए तथा आत्म अनुभव प्राप्त करने के निमित्त की जाती है। (3) इस में प्रार्थी कुछ नहीं चाहता, केवल परम दिव्य स्वरूप के प्रेम और ध्यान में निरन्तर लीन रहने, प्रभु से मेल और एक होने की परम चाह रखता है। यह प्रार्थनाएं स्वार्थ सिद्धि और परमार्थ सिद्धि दोनों तरह से की जा सकती हैं। प्रार्थना का उत्तर मिलना न मिलना यह सब प्रार्थी की अवस्था पर निर्भर है। जो मनुष्य पुण्य कर्मी, प्रबल इच्छा शक्ति वाले और निष्काम हैं, उनकी प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती और जो इसके विपरीत स्वार्थी, कुकर्मी एवं निर्बल धारणा वाले होते है, उनकी प्रार्थना अकसर निष्फल जाती है। प्रार्थना का उत्तर मिलने की साक्षी से इतिहास भरे पड़े हैं। मुगल सम्राट बाबर अपने पुत्र हुमायूँ के लिए जब वह कठिन रोग से मृत्यु के निकट पहुँच लिया था, उसके जीवन के लिए पिता से अपना जीवन आड़ में देकर प्रार्थना करता है कि हे स्वामी ! हुमायूँ की सारी पीड़ा मुझे दीजिये। और उसे रोग मुक्त करके जीवन दान दीजिये। कहते है उसी क्षण में हुमायूँ अच्छा होने लगा और बाबर ने उसी रोग में अपना जीवन भेंट कर दिया। द्रौपदी, दमयन्ती, सुबुक्तगीन आदि-2 प्रार्थियों की प्रार्थना का उत्तर मिलने का सबूत हमारे सामने आते हैं। वर्तमान काल में भी इन उत्तरों की कमी नहीं है, प्रतिक्षण असंख्य प्रार्थनाओं के उत्तर परम पावन प्रभु की ओर से मिल रहे हैं। सब प्रार्थनाओं के उत्तरदाता सर्व शक्तिमान, ज्ञान, प्रेम, में सब चराचर ठहरे हुए हैं। ऐसे सर्वेश्वर सर्वधर्ता ईश्वर ही हैं जो असंख्य प्राणियों की प्रार्थना सुनते हैं और यथोचित उत्तर देते हैं। जैसे देह में ज्ञानेन्द्रियाँ विषयों के ज्ञान को मस्तिष्क द्वारा आत्मा को बतलाती हैं और फिर उन को इन्द्रियाँ जीव की आज्ञानुसार ग्रहण करती और त्यागती हैं। देह में जिस प्रकार काम करने वाली इन्द्रियाँ और आज्ञा देने वाला जीव है, वैसे ही संसार रूपी देह में वह परमात्मा सबका उत्तर देने वाले हैं। यह सब चेतनाएं उनके कार्य को चला रही हैं। अन्तरिक्ष लोक में अगणित चेतनाएं वास करती हैं। उनमें कोई मनुष्य से उच्च दशा में है, कोई नीची। प्रार्थनाओं को सुनती और उत्तर देती है, इसके अतिरिक्त तीनों लोकों का भौतिक सार द्रव्य विद्यमान है जो मनुष्य के भावों और विचारों से भावित होता है, जिससे उसमें एक प्रकार की कम्पगती होती है जो ऐसे रूप में ढल जाती है, जो एक प्राणी की भाँति काम करती है। मनुष्य उन भावों और विचारों को पूर्ण करने का प्रयत्न करता है, जिससे वह भावित होते हैं। इस प्रकार मनुष्य अपनी इच्छा से आज्ञाकारी जीवों को पैदा कर सकता है, जो अन्तरिक्ष लोक में मनुष्य की प्रसन्नता को पूरा करते हैं इसके अलावा अन्य सहाय दाता उच्चावस्था वाले लोग जो गुप्त रीति से सहायता देते हैं। जहाँ कहीं सहायता की पुकार सुनते हैं। वहाँ तुरन्त किसी न किसी साधन से सहायता देते है। द्वितीय प्रकार की आत्म उन्नति के लिये की गई प्रार्थना उन उच्च अवस्था वाले आध्यात्मिक पुरुषों को आकृष्ट करती है, जो उत्साहित जिज्ञासुओं को उत्साह दिलाने और ज्ञान ज्योति जगाने को सदा तैयार रहते हैं। प्रथम प्रकार की साँसारिक वस्तुओं के लिये की गई प्रार्थना अनेक बार पूरी नहीं भी होती देखी जाती हैं। इसका कारण प्रार्थी के पूर्व जनम के अशुभ कर्मों का फल होता है। वह कितना ही रो-रो कर प्रार्थना करे, एक नहीं सुनी जाती क्योंकि होनहार के विपरीत कुछ नहीं हो सकता। जो लोग ऐसी प्रार्थना करते हैं, उनका श्रम बेकार जाता है। अतएव भौतिक सुख के लिये प्रार्थना करनी बहुत उत्तम नहीं है। क्योंकि भोग में मनुष्य स्वतन्त्र नहीं है।
प्रेम वह पदार्थ है जो झोंपड़ों में स्वर्ग धाम और खेतों में नन्दन वन की सृष्टि कर देता है।
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कठिनाइयाँ सच्ची सहायक हैं क्योंकि वे उस साँचे में हमें ढालती हैं जिसमें से निकला हुआ मनुष्य फौलाद की तरह सुदृढ़ और पुष्प की तरह सुन्दर बन जाता है।
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परमात्मा का सच्चा भक्त वह है जो उसकी बनाई हुई सृष्टि को ईश्वरीय भाव से देखता हुआ उसकी उपासना करता है।
(श्री स्वेट मार्डेन)
आत्मा के अन्दर कितनी अद्भुत शक्तियाँ भरी हुई हैं, इसका बुद्धि द्वारा विवेचन नहीं किया जा सकता, परन्तु हमें जो थोड़ा बहुत अनुभव होता है वह बहुत ही विचारणीय है। अपने भीतर एक ऐसी शक्ति है जो हमारी आज्ञाओं को मानती है और हमारे विचारों को प्रोत्साहित करके उन्हें मजबूत बनाती है। यदि इस प्रकार के विचार किये जाएं कि ‘हम क्षुद्र हैं, हमारी योग्यता बहुत ही नगण्य है, भला हम क्या कर सकते हैं।’ तो इन विचारों को आत्मा अपने स्मृति-पटल पर अंकित कर लेगी और उसकी प्रतिध्वनि शरीर के समस्त परमाणुओं में गुँजित करती रहेगी, तदनुसार सचमुच ही हम उसी तरह के बन जायेंगे जैसा कि अपने बारे में सोचते थे। कंगाली, बीमारी, लाचारी और बेबसी के विचारों को यदि रोज रोज अपनाया जाए, अपने को इनसे ग्रस्त समझा जाए तो निश्चय ही यह हमारी उपासना से प्रसन्न होकर अपना डेरा हमारे शिर के ऊपर डाल लेंगी और हर वक्त अपना प्रतिबन्ध डालती रहेंगी। हम अपने मानस क्षेत्र में जैसा बीज बोते हैं, ठीक वैसे ही पौधे उगा लेते हैं। दुख, द्रोह, कलह और निराशा के बीज बोएंगे तो अवश्य ही इनकी कँटीली बेलें उग कर चारों और फैल जावेंगी।
हम व्यापार में प्रवेश करते हैं और मन में तरह तरह की आशंकाएं पैदा करते हैं ‘कहीं घाटा तो न हो जाएगा, कही पूँजी तो न चली जाएगी’। विद्या पढ़ते हैं और पुस्तक उठाते ही झींकते है कि ‘ क्या करूं मुझे पढ़ने की सुविधाएं ही प्राप्त नहीं होतीं। किसी कार्य में लगते हैं और मन ही मन दुखी होते जाते हैं । ‘हाय ! हमारे भाग्य में ही सफलता नहीं है।’ इस प्रकार के विचार करने वाला कोई व्यक्ति किसी काम में सफल नहीं हो सकता। उसकी बोई हुई निराश पर जब फल आते हैं, तो उन्हें असफलता कहा जाता है।
यदि हम अपने को पतित, सामर्थ्यहीन और महत्व रहित समझेंगे तो दुनिया भी वैसा ही समझेगी जो आदमी अपनी बेकदरी करता है, दुनिया उसकी जरूर बेकदरी करेगी। संसार में ऐसा एक भी मनुष्य नहीं देखा गया जो अपने आपको, नाचीज, अयोग्य एवं निकम्मा समझते हुए भी कोई महान कार्य कर सका हो।
उपनिषद्-प्रसंग
(धर्माचार्य श्री सच्चिदान्द जी शास्त्री बदायूँ )
अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्तिमन्नपौ यातरिश्वादधाति॥
यह उपनिषद् का वचन है। इसके अन्दर बड़े ही मधुर शब्दों में उपासक और उपास्य देव का वर्णन किया है। यहाँ पर उपासक जीव है और उपास्य देव परमात्मा है। पहले पहल इसमें परमात्मा के गुणों का वर्णन है। फिर बाद में यह बतलाया गया है कि जीव यदि इसी परमात्मा को अपना आश्रय बनाये और अपने किये हुये कर्मों को परमात्मा के प्रति सौंप दे तो जीव इस संसार सागर से मुक्त हो सकता है अन्यथा इसी संसार के जंजाल में फंसा रह जायेगा अर्थात् जन्म−जन्मांतरों में पड़ जाएगा और न जाने कितने अनेक जन्मों में वह मोक्ष प्राप्त करें। यह इस उपनिषद् के वचन का सार है।
अब हम इस विषय पर जरा विस्तार पूर्वक विचार करते हैं कि पहले पहल इस मंत्र के पहले पद में यह बताया गया है कि वह परमात्मा “अनेजत्” गति राहत है, अचल है और दूसरे पद में वह बताया है कि “मनसो जवीयो” मन से भी ज्यादा गति वाला है। यहाँ पर आपस में हमको स्पष्ट विरोधाभास प्रतीत होता है। भला यह कैसे हो सकता है कि एक जगह अचल और दूसरी जगह गति वाला हो। परन्तु इनका निराकरण इस प्रकार करते हैं कि अपने स्वरूप में तो अचल है परन्तु जब दूसरे के साथ टक्कर खाता है तो उसको गति वाला कर देता है। यहाँ पर यह शंका उठती है कि अचल वस्तु अर्थात् जो स्वयं गति शील नहीं है। वह दूसरों को गति शील कैसे बना देती है। बात यह है कि ईश्वर निराकार है। हाँ उसकी कुछेक शक्तियाँ की हैं जो इस जगत में काम करती हैं। वे शक्तियाँ जब मन के साथ जुड़ती हैं तो मन गति शील हो जाता है उस शक्ति को इच्छा शक्ति के नाम से पुकारा जा सकता है। प्रभु की यह शक्तियाँ अवश्य हैं क्योंकि वह निराकार है। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि ईश्वर की इच्छा शक्ति मन से ज्यादा वेगवान है। इसी लिये यह इच्छा शक्ति मन को गति वाला बना देती है परन्तु कहने के लिये अविचल यानी अचल हैं क्योंकि स्वयं यह शक्ति क्रिया नहीं करती और स्वयं करे भी किसके लिये, यह संसार परमात्मा की इच्छा मात्र का ही आविर्भाव है। ईश्वर जीवों को उत्पन्न करके उनके ऊपर अपना शासन करना चाहता था और इस संसार को स्थिर रखने के लिये उसने संसार में गति यानी हलचल को रखना आवश्यक समझा था इसलिये उसने संसार में गति डाली जिससे संसार के अन्दर सदा एक जीवन धारा प्रकाशित रहे। इसलिये वह अपने आप अचल होता हुआ भी उसने संसार को गतिशील किया क्योंकि संसार शब्द का अर्थ ही “गति करना” ऐसा है। तीसरे पद में यह बात बताई गई है कि हमारी इन्द्रियाँ उस तक नहीं पहुँच सकतीं। कारण यह है कि हमारी इन्द्रियों की वृत्तियाँ बंडी तुच्छ हैं। जो जो इन्द्रिय जिस जिस भोग के लिये बनी है वह उसी में फंसी रहती है। जिह्वा का काम स्वाद लेना आँख का काम देखना, कान का काम सुनना इत्यादि। यह है इन्द्रियों का स्वाभाविक आनन्द लेने का विषय। यह इन्द्रियाँ उसी अवस्था में ईश्वर तक नहीं पहुँच सकती है कि जब तक कि ये अपने अपने स्वभाव में बनी रहें। परन्तु एक ऐसी अवस्था है कि उस अवस्था में आकर ये इन्द्रियाँ ईश्वर तक पहुँच का कारण बन सकती हैं। वह यह है कि अपने इन्द्रियों के स्वभाव को बदल देना, अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय का जो स्वभाव है उसको बिलकुल शान्त कर देना। तात्पर्य यह है कि एक समाधिस्थ अवस्था में बैठ जाना। यह चीज बड़ी मुश्किल है। किसी को ही ऐसी अवस्था प्राप्त हो सकती है सबको नहीं। इसलिये सामान्यतः यही कहा जा सकता है कि वह परमात्मा इतना बड़ा है कि यह तुच्छ इन्द्रियाँ उस तक नहीं पहुँच सकतीं।
चौथे पद में यह बताया गया है कि वह भगवान जो गतिशील करने वाली वस्तुयें हैं उनको भी लाँघ जाता है। इसका यह स्पष्ट मतलब है कि वह भगवान उनसे भी ज्यादा गतिशील है, तभी तो वह उन गति करने वाली वस्तुओं को लाँघ जाता है अन्यथा कैसे लाँघ सकता है। गतिशील वस्तुयें वायु विद्युत इत्यादि हैं जो संसार में गति कर रही हैं। परमात्मा इनको गति कराता है नियम में चलाता है इसलिये ईश्वर का तो ज्यादा गति वाला होना और गति वाले पदार्थों को लाँघना स्वयं सिद्ध है।
पाँचवें पद में यह बताया गया है कि उपरि- लिखित गुणों वाला जो परमात्मा है, जीव जो अपने कर्म करता है, उस परमात्मा को सौंप दें अर्थात् जो भी कोई कर्म करे प्रभु के लिये करे। इससे उसके अन्दर से स्वार्थ और अहंभावना नष्ट हो जाएगी जो कि जीव को मोक्ष दिलाने में बाधक हैं। स्वार्थ और अहं भावना नष्ट होकर जन्म−जन्मांतरों के झगड़े से छूट जाएगा और सीधा मोक्ष प्राप्त करेगा और जो ऐसा नहीं करेगा, वह इसी संसार में फँसा रह जाएगा और न जाने कब उसकी मुक्ति होगी। इस तरह से अपने कर्मों को ईश्वर के प्रति सौंप देने से फायदा यह होगा कि उसको अपना भार अपने आप नहीं उठाना पड़ेगा। सारा भार परमात्मा के ऊपर सौंप कर वह निश्चित और सुखी होगा। उदाहरण के तौर पर जब तक पुत्र अपना सारा भार अपने पिता के ऊपर सौंपा रहता है तब तक वह निश्चित और सुखी होता है। परमात्मा को अपने कर्मों को सौंप देने से एक फायदा यह भी होगा कि वह पुरुष जिसने अपने कर्मों को प्रभु के प्रति सौंपा है आत्म उद्देश्य को प्राप्त करेगा अर्थात् आत्म उद्देश्य तो है ही प्रभु प्रति अर्थात् वह पुरुष परमात्मा में ही लीन हो जायगा और अपने जीवन को सफल बनाता हुआ मोक्ष का भागी सिद्ध होगा।
(महात्मा जेम्स ऐलन)
जो व्यक्ति अपने स्वार्थ का परित्याग कर देता है और मिथ्या अभिमान को उठाकर एक तरफ पटक देता है, उसकी सारी पेचीदगियाँ हल हो जाती हैं। वह बहुत ही सादा और विनम्र बन जाता है। यहाँ तक कि कई बार लोग उसे बेवकूफ तक समझने लगते हैं। इस अवस्था में उस मनुष्य का व्यवहार संसार की परिवर्तनशील घटनाओं पर अवलम्बित नहीं रहता, वरन् वह अपने सिद्धान्तों पर दृढ़ रहता है और वही काम करता है जिसे करने के लिए उसकी आत्मा गवाही देती है, चाहे इसके फलस्वरूप उसे कितने ही साँसारिक कष्ट क्यों न उठाने पड़े। जीवन की यही एक ऐसी पवित्र स्थिति है, जिसमें मनुष्य अनुभव करता है कि वह वस्तुतः अमर है।
निःस्वार्थ भावना से जीवन व्यतीत करने के लिए संसार में निरुत्साह, पश्चाताप और दुख की कोई बात नहीं है। जरा सी बात के आवेश में आकर जब लोग मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं, वह किसी से नहीं लड़ता, बल्कि अपने विरोधियों पर दया और प्रेम की वर्षा करता रहता है। सद्भावना से दिव्य दृष्टि मिलती है। जिसके हृदय में समस्त प्राणियों के प्रति सद्भावना भरी हुई है यथार्थ में वही दिव्य ज्ञान का अधिकारी है। मनुष्यों में देवता वह पुरुष है जो पवित्र है, निःस्वार्थ है, प्रेमी है। अपने तुच्छ शारीरिक स्वार्थों का परित्याग करने के उपरान्त जो सन्तोष प्राप्त होता है, वह संसार को अपने अधीन कर लेने के सुख से भी हजारों गुना अधिक है।
इसलिए आप स्वार्थ को त्यागने का अभ्यास आरम्भ कीजिए। ज्ञान के द्वारा अपनी पाशविक वृत्तियों को काबू में लाने का प्रयत्न कीजिए। सुख और भोग विलासों के गुलाम बनने से इनकार कर दीजिए। नम्रता, भलमनसाहत, क्षमा, दया और प्रेम को अपने अन्दर धारण करने से हृदय के अन्दर शाश्वत शान्ति का आविर्भाव होता है। प्रेम के महान नियम में अपने को केन्द्रस्थ करना, संतोष,शीतलता, विश्राम और ईश्वर को प्राप्त करने के मार्ग पर पदार्पण करना है ।
(ले. रानी श्रीमती चन्द्रकुमारी देवी, कटनी )
प्रेम क्या है? जीवन का इससे बड़ा गूढ़ सम्बन्ध क्यों है? किस अशान्त शक्ति के अंतर्गत मनुष्य जाने अनजाने ही इसे तलाश करता है। वह सदा प्रेम की एक गुदगुदी की प्रतीक्षा करता है व मिल जाने पर कभी न बिछुड़ने की आशंका की व्याकुलता सी अनुभव आती है। प्रेम एक मीठा सा दर्द है जो जीवन का सुरीला तार है, दुखियों की आशा और वियोगियों का आकर्षण तथा थकावट की मदिरा व्यथितों की दवा है जो हृदय में कोमलता भर कर आत्मा पर एक आनन्द का बोझ डाल देता है। तभी तो प्रेमी प्रेम से मतवाला बन कर कहता है -
“दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे।
तुमको भी मुहब्ब्त कहीं ऐसा न बना दे॥”
इस प्रेम दर्द ने ही शायद दुनिया को प्रकृति के कष्ट प्रिय होने का आभास कराया है। उन्होंने कहा है कि प्रकृति ने हर सुन्दर वस्तु के साथ इसकी कठिन वस्तु को अवश्य पैदा करके उसका लालित्य नष्ट करना चाहा है। उसने हमें वह प्रेम दिया जो संसार की परम विमोहक वस्तु है, साथ ही उसने मनुष्य को निर्दयता भी दी है, फिर भी प्रेम निर्दयी को करुण बनाने की ताक़त रखता है, यहाँ तक कि मनुष्य क्या प्रभु को भी गज और ग्राह की लड़ाई में गज की प्रेम पुकार में नंगे पाँव दौड़ना पड़ा था-
“हाथी बूड़ो सूँड लौं, जब ही करी पुकार ।
आह ते आन छुड़ाइया, लगी न रञ्चक बार ॥”
भक्ति भी दिल में तब तक नहीं होती जब दिल में प्रेम न हो, सच्चा प्रेम ही भक्ति व भगवान हैं, स्वर्ग है, प्रेम में बड़ा विचित्र नशा है, उसमें थकावट नहीं है, बड़ी मस्त तबियत रहती है-
“प्रेम दिवाने जो भये, मन भयो, चकनाचूर।
छके रहे, झूमत रहे, सहजो देख हजूर॥
किस तरह प्रेम में दीवानापन आता है कि आदमी छक जाता है, नशे में चूर हो जाता है, सुधि बुद्धि खो देता है, प्रेम के रंग में रंग जाता है, अमीरी-गरीबी भूल जाता है, भूख, प्यास, और निद्रा खो देता है, अपना पराया भूल जाता है। वहाँ केवल प्रेमी और प्रेम रहता है, कैसा मीठा दर्द है।
“कबहूँ हक धक हो रहे, उठे प्रेम हित गाय।
‘सहजो’ आँख मूँदी रहे, कबहूँ सुधि हो जाए॥”
जीवन में सभी प्राणी किसी न किसी को प्रेम करते ही हैं और उस प्रेम को अपनी-अपनी कसौटी में कसते हैं। बगैर प्रेम के कोई जीवित नहीं रह सकता, किसी को भी प्यार करना ही पड़ेगा, नीरस जीवन किसी ने नहीं काटा है। यहाँ उस प्रेम का वर्णन है जिसे हमारे कवि प्रेम-दर्द कह कर अमर करते हुए हमारे हृदय पट खोल गये हैं। प्रेम तो सभी का जन्मसिद्ध अधिकार है-
“प्रेम न बाड़ी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा प्रजा जेहि रुचे, सीस देय ले जाए॥”
प्रेम में बड़ा दर्द है, प्रेम के नशे में प्रेमी बड़ी जिद करता है, प्रेम के बाण लगने का कोई इलाज नहीं है, जिसका बाण है वही इलाज कर सकता है। तभी तो देवी मीरा कहती है-
“मैं तो प्रेम की दीवानी, मेरो प्रेम न जाये कोय।
सूली ऊपर सेज हमारी, सोना किस विधि होय॥
गगन मंडल पर सेज पिया की मिलना किस विधि होय।
घायल की गति घायल जाने जो कोई घायल होय॥
दरद की मारी बन बन डोलूँ वैद मिला नहिं कोय।
मीरा की प्रभु पीर मिटेगी वैद संवलिया होय॥”
कितना ऊँचा अकथनीय प्यार था, वह भी किस से, जिसे कभी न देखा था, केवल सुना था, धन्य है।
ऊधो जब योग का संदेशा लेकर विरहणी गोपियों को समझाने जाते हैं तो गोपी कहती हैं-
“ऊधो ब्रह्म ज्ञान का संदेशा नहीं देते नेकु
देख लेते कान्ह जो हमारी अंखियान ते।”
गोपी कृष्ण भगवान के प्रेम में छकी थीं, प्रेम में पीड़ित गोपियों ने एक न सुनी और कैसे अपनी पीड़ा, अपनी दुनिया, अपना सर्वस्व इन शब्दों में प्रकट कर संदेश दूत का मुख बन्द कर दिया वह थोड़े शब्दों में सुनिये-
“श्याम तन श्याम मन, श्याम ही हमारो धन,
आठों याम ऊधो हमें श्याम ही से काम है।
श्याम हिये, श्याम जिये,श्याम बिन नाहीं तिये,
अन्धे को सी लाकड़ी आधार श्याम नाम है॥
श्याम गति श्याम मति श्याम ही हैं प्राणपति,
श्याम सुखदाई सो भलाई शोभा धाम है।
ऊधो तुम भये बौरे पाती लेके आये दौरे,
और योग कहाँ यहाँ रोम रोम श्याम है॥
यदि प्रेम की इतनी जंची दिव्य विभूतियाँ पैदा न हुई होतीं तो आज प्रेम की कीमत शायद कुछ भी न होती, जब हृदय प्रेम से विभोर हो उठता है तब उसे कुछ नहीं सूझता, तभी तो कहते हैं कि प्रेम अन्धा है।
भक्त सूरदास तो इतने से ही नहीं मानते। वे तो अपनी सगाई अपने प्रेमी के साथ नहीं बल्कि प्रेम की सगाई प्रेमी के करके ही चैन पाते हैं -
“सब से ऊँची प्रेम सगाई।”
दुर्योधन के मेवा त्यागे, साग विदुर घर खाई,
जूठे फल शबरी के खाये, बहु विधि स्वाद बताई॥
प्रेम के वश नृप सेवा कीन्हीं आप बने हरि नाई।
राजसु यज्ञ युधिष्ठिर कीन्हों तामें जूठ उठाई॥
प्रेम के वश अर्जुन रथ हाँक्यों भूल गये ठकुराई।
ऐसी प्रीति बढ़ी वृन्दावन गोपिय नाच नचाई॥
सूर कूर इस लायक नाहीं कहँ लगि करों बढ़ाई॥
प्रेम की सगाई ही सब से बढ़ कर निकली जो सब अमीर गरीब दीन दुखी का साथ देकर लज्जा रखते हैं। ऐसे जगतपति से किसकी सगाई करने की इच्छा होगी, कौन पति रूप में इन्हें न वरण करेगा, कौन न अपने जीवन नाथ को रिझाना चाहेगा। अपने पति के प्रेम दर्द से केवल पत्नी ही सती होगी व जगतपति पर संसार निछावर हो जायेगा।-
किस विधि रीझन हो प्रभु, का कहि टेरुं नाथ ।
लहर महर जब ही करो, तब ही होउँ सनाथ॥
कवियों की सूझ अनोखी ही हुआ करती है। मानव जाति का पता लिया ही करते है सो नहीं वे पता लगाते-लगाते जंगल में उड़ गये और वहाँ अपने चंचल नेत्र दौड़ाने लगे व पक्षियों के प्रेम दर्द की भाषा समझ कर सुनाते हैं -
मोर को धन श्याम से प्रेम है। जैसे ही वह श्याम घटा देखता है, वह गाने लगता है, व हरि का चिंतन करता है, तभी तो घनश्याम ने मोर के पंख, मोर का प्रेम दर्द चिन्ह समझ कर शीश पर धारण किया, सच जूठ क्या है पर बात जँचती भी है -
मोर सदा पिऊ पिऊ करत, नाचत लखि घनश्याम।
यासों ताकी पाँखड़ी सिर धारी धनश्याम ॥
कवि ने प्रेम की खोज कर जंगल में डेरा जमा लिया, छानबीन कर चकोर को पकड़ लिया और उसकी प्रेम-भाषा को भी प्रगट कर दिया।
“तुलसी ऐसी प्रीति कर, जैसे चन्द्र चकोर।
चोंच झुकी गरदन लगी, चितवत वाही ओर॥
कवि तो जाँच पर उतारू होकर जंगल की खाक छान रहे थे कि प्रेम का अधिकार मानव को ही है या पशु, पक्षियों, लकड़ी, पानी, दूध, को भी है, आखिर तलाश करने वाला सफल हो जाता है, उन्हें पता चल ही गया है कि पपीहा पिऊ की तलाश में बेकरार प्रेम दर्द से चिल्लाया करता है -
“पपीहा प्रन को ना तजै, तजै तो तन बेकाज।
तन छूटे तो कछु नहीं, प्रन छूटे अति लाज॥”
इसके बाद प्रेम के गुप्तचर भटकने थकते रात्रि को दीपक के उजाले में विश्राम लेना चाहते थे, किन्तु वहाँ भी उन्हें प्रेम रोग दिखाई दिया, वे दिल पकड़ कर बहने लगे -
चाहत वह किस काम की अनचाहत के संग ।
दीपक मन भावे नहीं जल जल मरत पतंग ॥
यहाँ से भी जलते भुनते कुढ़ते नदी के तट पर ठंडी हवा के झोंकों में शाँति लेना चाहते थे, पर वहाँ भी उन्हें प्रेम मंत्र का जादू दीखा वे सच झूठ के पानी में गोता लगातार चिल्लाते निकल पड़े।
अधिक स्नेही माछरी-दजा अल्प सनेह ।
जब ही जलते बिछूरे तब ही त्यागे देह ॥
प्रेम के सी. आई. डी. हर जगह अपनी तेज निगाह रखते हैं और पकड़ने में चतुर होते हैं। प्रेम का दर्द अनोखा होता है जो नहीं छुपता। मतलब यही कि जन्म-जन्मांतरों से भक्त, कुभक्त, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीड़े, पतंगें सभी संसार में भिन्न-भिन्न प्रेम रोग के दर्द से पीड़ित है यही प्रेम का मीठा दर्द है कि प्रत्येक जीव को जीवन चलाने का सुरीला तार है। इसमें आशा, सुख, स्मृति, उमंग, पीड़ा, तेजी के साथ आकर्षण है। तभी तो प्रेम दर्द से डराकर कहते हैं।
ये प्रेम वह है कि पत्थर को दम में आब करे।
लगाये दिल वही जिसे खुदा खराब करे॥
जब तक तुम स्वयं अपने उद्धार के लिए कमर कस कर खड़े नहीं होते, तब तक करोड़ों ईसा, मुहम्मद, बुद्ध या राम मिल कर भी तुम्हारी रत्ती भी सहायता नहीं कर सकते। इसलिए दूसरों की तरफ मत ताको, अपनी सहायता आप करो।
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विद्वत्ता-डडडडड का सब से बड़ा लाभ यह है कि उसके द्वारा अपनी मूर्खता का ज्ञान हो जाता है।
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जो तुम्हारे साथ शत्रुता करते हैं उनसे प्रेम करो। जो तुम्हारे साथ बुराई करते हैं उनके लिये ईश्वर से कल्याण की प्रार्थना करो।
(स्वामी रामकृष्ण परमहंस के उपदेश)
जिस प्रकार एक भिक्षुक एक हाथ से सितार बजाता है, दूसरे से ढोलक बजाता है और साथ ही मुँह से भजन भी गाता जाता है, उसी प्रकार ऐ मनुष्यों, तुम अपना कर्त्तव्य कर्म करो किन्तु सच्चे हृदय से ईश्वर का नाम जपना न भूलो।
जिस प्रकार एक व्यभिचारिणी स्त्री घर के काम-काज में लगी होती हुई भी अपने प्रेमी का स्मरण करती है, उसी प्रकार संसार के धन्धों में लगे रहते हुए भी मनुष्यों को ईश्वर का चिंतन दृढ़ता के साथ करते रहना चाहिये।
जिस प्रकार धनियों के घरों की सेविकाएं उनके लड़कों का पोषण करती हैं और अपने खास पुत्रों की तरह उनको लाड़-प्यार करती है किन्तु वे नौकरियों के पुत्र नहीं हो जाते। उसी प्रकार तुम लोग भी अपने को अपने पुत्रों के पोषणकर्ता समझो उनका असली पिता तो वास्तव में ईश्वर है।
जिसको उथले तालाब का स्वच्छ पानी पीना है, उसे हलके हाथ से पानी पीना होगा। यदि पानी कुछ भी हिला तो नीचे का मैल ऊपर चला आवेगा और सब पानी गंदा हो जाएगा, उसी प्रकार यदि तुम पवित्र रहना चाहते हो तो विश्वास और सावधानी के साथ ईश्वर से प्रेम करो। व्यर्थ के विवादों में अपने समय को नष्ट न करो नहीं तो नाना प्रकार की शंका प्रति शंकाओं से तुम्हारा मस्तिष्क गंदा हो जाएगा।
दूसरों की हत्या करने के लिए तलवार और दूसरे शस्त्रों की आवश्यकता होती है, किन्तु अपनी हत्या करने के लिए एक आलपीन ही काफी है, उसी प्रकार दूसरों को उपदेश देने के लिए तो बहुत से धर्म ग्रन्थों और शास्त्रों के पढ़ने की आवश्यकता है किन्तु आत्मज्ञान के लिए एक ही महावाक्य पर दृढ़ विश्वास करना काफी है।
जिस प्रकार पतंग प्रकाश को देखकर फिर अंधेरे में जाने की इच्छा नहीं करता, चींटी चीनी के ढेर में मर जाती है, किन्तु पीछे नहीं लौटती। उसी प्रकार ईश्वर भक्त भी किसी बात की परवाह न करता हुआ परमानन्द की प्राप्ति में अपने प्राणों तक का बलिदान कर देता है।
(डा. भगवान स्वरूप वर्मा ‘शूल’ आन्तरी )
मोटे तौर पर ‘विचार’ शब्द का अर्थ ‘सोचने की क्रिया किया जाता है। किन्तु आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होने वालों के लिए इसका अर्थ दूसरा ही है, उन्हें विचार कर अर्थ सृष्टि करना या रचना करने की क्रिया करना चाहिए। यह विशाल भूमण्डल किसी समय विधाता का विचार मात्र रहा होगा।
संसार में सब से शक्तिशाली वस्तु विचार है। कोई भी विचार अपने अच्छे या बुरे प्रभाव से खाली नहीं है। हृदय में घृणा के विचारों का उदय होने से देह में से एक प्रकार का विष निकलने लगता है। जो चारों ओर फैलता है और पास रहने वालों को हानि पहुँचाता है। इसी भाँति जब प्रेम कृपा या उदारता के विचारों का उदय होता है तो वे अपने निकटवर्ती प्राणियों में सन्तोष और शान्ति फैलाते हैं। सम्माननीय श्री बर्टरेण्ड रसल का मत है कि- विचारों में जैसी फलदात्री शक्ति है, वैसी किसी भी वस्तु में नहीं है। जो व्यक्ति उपकार और उन्नति के संबन्ध में कल्पना या मनन करते रहते हैं, वे अदृश्य रूप से संसार की बड़ी सेवा करते हैं।
विश्व में अनेक सूक्ष्म शक्तियाँ हैं। यद्यपि हम उन्हें आँखों से नहीं देख सकते तथापि उनको स्वीकार करते हैं। हवा आँखों से नहीं दिखाई पड़ती परन्तु उसका होना असिद्ध नहीं है। गर्मी से पानी भाप बन कर आकाश की ओर जाते हुए दिखाई नहीं देता परन्तु फिर भी इस बात को सब जानते है इसी तरह विचारों को खुली हुई आँखों से नहीं देखा जा सकता परन्तु उनकी भी पानी और हवा के समान तरंगें बहती हैं। विचारों की लहरों में एक बड़े गजब की ताकत यह है कि वह अपने समान अन्य विचारों को बड़ी शीघ्रता से खींच कर इकट्ठा कर लेती है। यदि तुम्हारे आंखों में विचारों की लहरों को उड़ते हुए देखने की शक्ति होती तो देखते कि हरे एक मनुष्य के मस्तिष्क में से बिजली या वायु की जैसी अगणित लहरें छूट- छूट कर आकाश में फैलती जा रही हैं। जब मनुष्य का विचार बदलता है, तभी इन लहरों का रंग रूप भी बदल जाता है। दया की लहरें एक तरह की होंगी तो छल की बिलकुल दूसरी तरह की। हाँ, एक ही प्रकार के विचार चाहें वे अलग अलग मनुष्यों द्वारा ही भले किये गये हों, उनका रंग रूप बिलकुल एक सा होगा । यह लहरें एक सी होने के कारण आकाश में आगे जाकर आपस में उसी तरह मिल भी जाती है। बहुत सी भाप इधर-उधर से इकट्ठी होकर बादल बन जाती है।
ऊपर बताया जा चुका है कि विचारों में आकर्षण शक्ति होती है और वह अपने सदृश लहरों को तुरन्त ही आकर्षित कर लेती हैं। हजारों मील दूर उड़ते हुए विचारों को हमारे पास तक आने में शायद ही एक दो सेकिंड लगें, इतनी तेज इनकी चाल होती है। जब तुम्हारे मन में क्रोध के विचार उदय होते हैं। तो उसी तरह के विचार, चाहे वे किसी द्वारा इसी समय या हजारों वर्ष पूर्व किये हों, आकाश में से तुम्हारी ओर दौड़ पड़ते हैं और तुम्हारे मस्तिष्क में आकर्षण होने के कारण आकर चिपक जाते हैं। फलस्वरूप क्रोध उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। जो लोग बुरे विचार करते है, वो सचमुच कुछ ही समय में बहुत बुरे बन जाते हैं। एक महापुरुष का कथन है कि- “जब तुम कहते हो कि मैं जीव हूं, तब जीव हो और जब कहते हो कि मैं शिव हूँ तो शिव हो।” उसके कथन का तात्पर्य यही है कि जैसा तुम अपने को समझते हो, जैसे विचार करते हो, वैसे ही बन जाते हो।
सम्मिलित रूप से विचार करने पर तो यह शक्ति ओर भी प्रवाल हो जाती है। यदि कोई व्यक्ति रोज-रोज आपस में बीमारी, मौत, गरीबी, तकलीफ की ही चर्चा करते रहें तो वे वैसे ही बन जायेंगे। अमुक मर गया, अमुक बीमारी से छटपटा रहा है। अमुक एक एक पैसे को तबाह है। अमुक का शरीर बीमारी से जर्जर हो रहा है । यदि इस प्रकार की कहानियाँ ही बार-बार कही सुनी जाय तो वैसे ही मानस चित्र बनेंगे और वे बीमारी तथा दुख की जीवन घातिनी लहरें अपनी ओर खींचेंगे। फलस्वरूप वैसी ही परिस्थितियाँ इकट्ठा हो जाएगी और कहने- सुनने वाले किसी भयंकर रोग या शोक में फँस जायेंगे। यदि ऐसे लोगों के बीच में रहो जो दुख दरिद्र के ही सोच विचार करते रहते हों, तो उनके विचार तुम्हारा भी अनिष्ट किये बिना न रहेंगे।
अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ञ्जद्धद्ग द्यद्बद्धद्ग द्गक्द्गह् द्यड्डह्यह्लद्बठ्ठद्द (अनन्त जीवन) में श्रीमती मेरी कोरेली (रुड्डह्द्बद्ग ष्टशह्द्गद्यद्यद्ब) ने उदासीनता, निराशा और कायरता के विचारों का भली-भाँति दिग्दर्शन कराया है। उसकी कथा के अनुसार कुमारी हरलेण्ड समुद्र-तट पर स्वास्थ्य लाभ के निर्मित गई हैं और अपने रोग का कारण अपने ही श्रीमुख से एक व्यक्ति से संवाद करती हुई कहती हैं। “मुझे यह बड़ा अच्छा लगता है कि कोई हमेशा मेरे लिये दुख की सहानुभूति प्रकट करता रहे, दुख दर्शाता रहे, मुझसे धीरज बंधाने वाली बातें कहता रहे । मेरे हृदय में सदा चिन्ता और दुख के विचार उठा करते हैं। दूसरे मनुष्यों के संबन्ध में मुझे यही प्रतीत होता रहता है। कि संसार में दुखी मनुष्यों का ही निवास है। वे असहाय पड़े-पड़े दुख भोग करते हैं। जेल खाने में सड़ते हुए कैदी, अस्पतालों में पड़े हुए बीमार, भूख से तड़पते हुए भिखारी, रोते हुए विरही, इन्हीं के चित्र मेरे सम्मुख आते रहते हैं और उन्हीं को देख-देख कर मैं रोती रहती हूँ। मुझे प्रतीत होता है कि जीवन में दुखों का ही सागर लहरा रहा है। सुख तो कहीं है ही नहीं।” पाठको! क्या तुम सोचते हो कि इस प्रकार के विचारों में ही लीन रहने वाला व्यक्ति क्या सुखी रह सकता है। उपरोक्त विचार प्रकट करने वाली कुमारी हेरलेण्ड यद्यपि स्वयं नहीं जानतीं कि मेरी बीमारी का असली कारण क्या है परन्तु असल में यही कारण था जो उसने अपने आप कह डाला । विचार अपना एक स्वरूप बनाते हैं और वह अपना असर पहले-पहले अपने बनाने वाले पर करते हैं। कहते है कि बिच्छू जब अपनी माँ के पेट में होता है तो वहाँ का माँस खाना आरंभ करता है और जब उसे पूरी तरह खा लेता है, तो पेट फाड़ कर बाहर दूसरों को खाने निकलता है। यही दशा बुरे विचारों की है।
एक समय राल्फ बोल्डो ट्राइन के साथ एक बड़ा ही मनोरंजन वार्तालाप हुआ । उनके एक मित्र ने उनसे बातचीत करते हुए कहा मेरे-पिता जी हमेशा चिन्ता ग्रस्त रहते हैं। मि. राल्फ ने उत्तर में कहा-”हाँ मुझे मालूम है कि उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है । वे निर्बल, आलसी और दुखी रहते हैं।” यह उत्तर सुनकर मित्र को आश्चर्य हुआ । उसने पूछा “आपने कभी मेरे पिता जी को न तो देखा है न सुना है फिर कैसे जान लिया कि वे बीमार रहते हैं?” “राल्फ ने हँसते हुए कहा अभी तुमने ही तो कहा था कि वे चिंतित रहते हैं। मैं जानता हूँ कि जो चिन्तित रहता है उसे अवश्य ही बीमार और दुखी होना चाहिए ।”
पाप, द्वेष, घृणा, ईर्ष्या और निराशा की विचार तरंगों में एक प्रकार के प्राणघातक सूक्ष्म जन्तु (Germs) होते हैं। जो मनुष्य की जीवनी शक्ति को खा डालते हैं। फलस्वरूप मनुष्य बीमार पड़ते हैं, दुखी होते हैं। और अल्पायु में ही मर जाते हैं। इसके विपरीत प्रेम, उदारता, परोपकार और प्रसन्नता में बिल्कुल दूसरी ही बात है। वे न केवल निरोग रखते है वरन् दूसरे सद्गुणों की वृद्धि करके दीर्घ जीवन प्रदान करते हैं। उत्तम विचार करने वाले मनुष्य का रक्त शुद्ध रहेगा और उसकी बुद्धि ऐसी निर्मल रहेगी कि स्वल्प परिश्रम से ही बहुत ज्ञान संपादन कर लेगी।
आध्यात्मिक चिकित्सक अपने विचारों द्वारा ही दूसरों के रोग दूर कर देते हैं। वे रोगी के हृदय में पवित्रता, उत्साह और प्रसन्नता के भाव उत्पन्न करते हैं। जिससे उनके रक्त के विषैले कीटाणु नष्ट होने लगते हैं और निर्बल अंग फिर से जागृत होकर अपनी क्रियायें करने में समर्थ हो जाते हैं।
(ले. श्री योगीराज श्रीउमेशचन्द्रजी, बम्बई 4)
उद्योगिनं पुरुषसिंह मुपैति लक्ष्मीः।
दैवेन देयमिति का पुरुषा वदन्ति॥
दैवं निहत्य कुरु पौरुष मात्म शक्त्या।
यत्ने कृते यदि न सिद्धयति कोऽत्रदोषः॥
जगत में अनेक स्त्री-पुरुष पुरुषार्थ को प्रधान स्थान देते हैं और बहुत से स्त्री, पुरुष ऐसे हैं, जो दैव गति (प्रारब्ध ) को प्रधान पद देते हैं। अब यह शंका उपस्थित होती है कि प्रथम प्रारब्ध को मानना चाहिये अथवा पुरुषार्थ (कर्म ) को? विचार करने पर पता लगता है कि प्रथम पुरुषार्थ, पश्चात प्रारब्ध मानना ठीक है। भूत काल में किये हुये कर्म का फल ही प्रारब्ध है। आधुनिक काल के अनेक स्त्री, पुरुषों के ऊपर दृष्टिपात करने पर पता लगता है कि पुरुषार्थहीन बनकर प्रारब्ध के ऊपर भार रक्खे हुए वे जीवन निर्वाह कर रहे हैं।
श्रुति माता क्या कहती है- “मनुष्य सौ वर्ष तक कर्म करके जीने की इच्छा करे। मुख्य दो प्रकार का है कर्म है। एक सकाम और दूसरा निष्काम, सकाम कर्म का फल से स्वर्ग सुख है और निष्काम कर्म का फल आत्म ज्ञान प्राप्त होता है। सकाम कर्म में भी दो प्रकार हैं। काम्य और निषिद्ध । निषिद्ध कर्म अत्यन्त निन्दनीय हैं। चोरी, परायी स्त्री से कुकर्म की इच्छा, मदिरा, पान, चाट, बीड़ी, तम्बाकू, गाँजा, भाँग, अफीम सेवन आदि अत्यन्त निन्दनीय तथा शरीर एवं मन को दुःख देने वाले कर्मों को निषिद्ध कर्म कहा जाता है। पुत्रेषणा, वित्तेषणा और कीर्ति वृद्धि करने के लिये जो कर्म करते हैं उसे काम्य कर्म कहते हैं। निषिद्ध कर्म वालों से काम्य कर्म करने वाले अच्छे हैं। काम्य कर्म करने वालों से निष्काम कर्म करने वाले अच्छे हैं। नैमित्तिक कर्म करना गृहस्थाश्रमियों का धर्म है। उद्योग करते रहने से शरीर निरोग और मन पवित्र रहता है। वह उद्योग निन्दनीय नहीं होना चाहिये ।
कर्म निरत को कष्ट साध्य कार्य भी सुगम हो जाता है। शास्त्र की आज्ञा से पढ़िये :-
वीरः सुधीः सुविद्याश्च पुरुषः पुरुषार्थं वान्।
तदन्ये पुरुषाकारः पशवः पुच्छ वर्जितः॥
अर्थात्- विद्या (लौकिक और पारलौकिक) बुद्धिमान्, वीर, (व्यावहारिक और परमार्थिक कार्य करने के लिये स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर से निरोगी, बलवान्) और सदा उत्तम प्रकार के पुरुषार्थ में संलग्न रहने वाला ही “पुरुष” इस नाम से शोभायमान हो सकता है और जो चिन्ताग्रस्त, आलस्य वान, भीरु, काम, क्रोध, लोभ, मोह, असंतोष आदि दुर्गुणों से भरे हुये हैं उनके शरीर का आकार केवल मनुष्य सरीखा है, किन्तु वह पूछ रहित पशु समान हैं।
मनुष्य व्यर्थ विलाप करता है। ‘कि मैं दुखी हूं, मैं शक्ति हीन हूँ, मैं परवश हूँ, यह सर्व विलाप अज्ञान दशा का चिन्ह है। श्रेष्ठ मनुष्य जन्म धारण करके भी ऐसा निरर्थक विलाप करना महान लज्जा की बात है। मनुष्य चाहे सो प्राप्त कर सकता है। परमात्मा ने माता के उदर से बाहर निकलने के समय में ही उसे स्वतन्त्र होने के लिये एकादश इन्द्रियाँ दी हैं । उन साधनों का उपयोग मनुष्य आहार, निद्रा, भय, और मैथुन के लिये करके दुख भोगता है। फिर कहता है कि मैं ‘दीन हीन हूँ।’
हृदयस्थ भगवान का सहारा लेकर जो मनुष्य योग्य पुरुषार्थ करे तो स्थूल सम्पत्ति को भोक्ता ही नहीं, किन्तु चौरासी के चक्र से परे हो सकता है। अर्थात् स्वयं सच्चिदानन्द स्वरूप हो सकता है। मानव जन्म सार्थक करने के लिये प्रारब्ध के ऊपर आधार नहीं रखना चाहिये । पुरुषार्थ- अर्थात् निष्काम कर्म, योगाभ्यास, भगवान का ध्यान, सत शास्त्र का पठन सत्संग और स्वधर्म के अनुसार उद्योग, धन्धा अथवा अन्य कोई व्यवहार।
(ले. श्री रामस्वरूप ‘अमर’ साहित्य रत्न, तालबेहट)
पिछले अंक में बतलाया गया है कि देहरूपी मन्दिर की ध्वजा शिखा है। क्योंकि बिना ध्वजा ‘झंडा’ के यह नहीं जाना जा सकता है कि यह किस समुदाय का व्यक्ति या कौन सी संस्था है? भारत की प्रधान संस्था काँग्रेस का शिखा (चिन्ह ) तिरंगा झंडा है, जिसके लिये महात्मा गाँधी, पं. जवाहरलाल नेहरू जैसे व्यक्तियों ने अपने प्राणों का मोह त्याग दिया है। अभी हाल ही में एक पत्र में यह देखा है। कि पोलैंड देश की एक देशभक्त रमणी ने और एक बालक ने अपने देश के झंडे को न झुकाने के अपराध में जर्मन सैनिकों के मार्मिक आघातों को सहन करते हुये संसार से कूँच तो कर दिया, किन्तु अपनी ध्वजा का अपमान अपने जीते जी न होने दिया। वाह री! वीरात्माओं! यदि तुम्हारे जैसा ज्ञान इस अभागी आर्य जाति को हो जाए तो उन्नति होने में कोई सन्देह न रहे। क्योंकि ‘धर्मों रक्षितः’ रक्षति यह नियम अटल है। आपने धर्म के वास्ते यदि कुछ त्याग दिखाये हों तो धर्म आपकी रक्षा करे। आज हम देखते हैं। ब्रिटिश और जर्मन जैसी शक्तिशाली राज्यों के महायुद्ध में हजारों सैनिक अपनी जान दे रहे हैं। यह क्यों? उन्हें न तो अपने साथ धन, न जन, न वैभव से कुछ मोह नहीं । केवल वे चाहते हैं तो अपने झंडे की शान । जहाँ एक किसी भी शक्तिशाली राज्य का झण्डा दूसरे राज्य पर चढ़ गया’ फिर लड़ाई बन्द। वही सैनिक, वही सब बातें मौजूद होंगी, मगर एक झंडे के न रहने से शक्ति का द्वार अपने आप बन्द हो जाएगा। यही बात तो हमारी इस ध्वजा (शिखा) पर लागू होती है। जब इस आर्य भूमि में शिखा, सूत्र, मूँछ का ख्याल था, तब किसी की दम न थी कि अत्याचार कर ले। यदि करता भी था, तो हम लोगों में शिखा के द्वारा वह तेज आया करता था कि एक एक सोलह वर्षीय बालक अभिमन्यु भी अपार कौरव (दुष्ट ) दल को कुछ न गिनता था। आज हमने अपने आर्यत्व के निशान शिखा को पाश्चात्य प्रणाल की बू में रंग कर तिलाँजलि दे दी है। तभी तो शक्ति का नाम नहीं रहा। भूषण कवि ने यदि शिवाजी की विजय के लिये उनकी शिखा और मूँछों को महत्व देते हुये उनका उत्साह न बढ़ाया होता , तो उन्हें इतना साहस भी शायद न बढ़ता? पुरातन ऋषि महर्षियों की ओर ध्यान दीजिये । किसी ने जटाओं से राक्षसी पैदा कर दी, तो किसी ने अपने दिव्य जटा पाशों में सूर्य और इन्द्र को मोहन मन्त्र द्वारा बाँध लिया।
महारानी द्रौपदी के केश (शिखा) तेरह वर्ष तक वैसी ही छिन भिन्नावस्था में रहें किन्तु उन्होंने उनका परिष्कार न किया । यदि वे परिष्कार कर लेतीं तो सम्भव था कि भीम जैसे वीर को वीर-शक्ति का जोश भी इतना न बढ़ता। आप में से कितनों ही ने यह देखा और सुना भी होगा कि जब कभी किसी औरत या मर्द को भूत या पिशाच सताता है तो प्रायः तद्विषयक जानकार यही सलाह देते हैं कि-चोटी काट लो। चोटी काटने पर पिशाच भी प्रायः भाग जाता है। कई खाकी सम्प्रदाय के साधुओं में जब किसी बनावटी साधु या ढोंगी सन्तों से वाद विवाद होकर झगड़ा हो जाता है तो प्रायः उनका सब से भारी अपमान उनके बालों के काटने में ही समझा जाता है। भस्मासुर को भस्म करने में विष्णु भगवान को सच्चा साथ किसने दिया था? इन्हीं सुषमा पूरित केश पाशों ने, इसी तेज जननी शिखा ने। न उस भस्मासुर का हाथ उस शिखा पर जाता, न भस्म होता । वहाँ मामला यह हुआ कि कुछ तो वरदत्त वलय की गर्मी का तेज और कुछ उसकी दूषित मनोमालिन्यता का विषैला तेज, यह दोनों संघर्ष को प्राप्त कर गये। दो चीजों के संघर्ष में तीसरी का विनाश निश्चित ही है- जैसे प्रस्तर लोहे की लड़ाई में रुई का नाश। ब्राह्म तेज क्यों विलीन है? शिखा के धर्म को न समझने से। एक कवि ने ठीक ही तो कहा है कि -
हरि ने शिर पर क्यों दिये, इतने भारी बाल।
रक्षा करने तेज की, आयु, बुद्धि ,तन पाल॥1॥
रुद्र तेज या शक्ति को, ठहरत चुटिया माँहि।
याते शिखा जु राखिये , और हेतु कछु नाहिं॥2॥
इससे स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि शिखा में तेज का स्थान सम्यक रीति से निहित है। देखिये -
चिद्र पिणि ! महामाये! दिव्य तेज समन्विते।
तिष्ट देवि ! शिखा- बन्धे तेजोवृद्धि कुरुष्व मे॥
अर्थ- हे चैतन्य रूपिणी ! दिव्य तेज वाली(आवागमन कारिणी) देवी ! शिखा - बन्धन में स्थित रहो और मेरे तेज की वृद्धि करो निराकरण तेज की गति पैरों से शिर तक होती है।
सोलह संस्कारों में “मुण्डन” संस्कार भी शामिल है- उस मुण्डन संस्कार का रहस्य मेरी समझ में तो यही हो सकता है कि माता के उदर में रहने से जीव को प्राक्तन -कर्मों का ख्याल आता रहा, उसे उसने अपने कर्म का भोग समझ छुटकारा पाना अभीष्ट समझा। जब उस दुःख सागर से उसका बहिर्गमन हुआ, मस्तिष्क में साँसारिक वायु मण्डल ने प्रवेश किया, तथापि उसे उस मुँडन संस्कार के पूर्व तक अपने पुरातन कर्मों का ध्यान रहा। वासना निर्मूल हो नहीं सकती, अतः हमारे पूर्वजों ने सोचा-इसके रोम में (बालों) में जो पूर्व वासनाओं समाविष्ट है, उनका अस्तित्व इसे न ज्ञात रहे अतः, मुँडन संस्कार कराने की प्रथा चालू की । जब तक बच्चे का मुँडन संस्कार नहीं हुआ था, तब तक तो वह अपने कर्तव्य यानी प्रारब्ध और ध्येय को कुछ न कुछ रूप में समझता रहा और उसी पूर्व जन्म कृत-कर्मों का याद में उसे अपने माँ, बाप, बन्धु और परिवार की प्रेम ग्रन्थि नहीं लग पाई। हालाँकि उसे खिलाने पालने का भार माँ बाप पर ही था। मगर वह बिलकुल निश्चिन्त था। कभी अपने कर्मों पर रोता तो कभी हंसता रहा। जब मुँडन संस्कार हुआ, या यों कहिये कि प्राक्तन कर्मों का शिरोहस्थ तेज समाप्त हुआ और नया केशारोहण कार्य प्रारम्भ हुआ, तो उसके मस्तिष्क में मन में यही अधिक तेज मोहमयी शक्ति समाविष्ट हुई । माँ बाप का ख्याल हुआ। प्राक्तन ज्ञान भूला और करणीय कार्यों का मोह पल्ले में पड़ गया। किन्तु बार-बार मुँडन कराने से वह पूर्व संचित अनुभूतियों को बिलकुल ही न भूल जाए, इसलिये आचार्यों ने कम से कम थोड़े से बाल तो अवश्य ही शिखा स्थान पर रखे जाने का आदेश किया है।
विपत्ति के समय धैर्य धारण करना, उसके निवारण का आधा उपाय कर लेने के बराबर है।
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घृणा करना असुरों का काम है, क्षमा मनुष्यता का लक्षण है और प्रेम देवताओं का स्वभाव है।
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पानी से शरीर, धर्म से आत्मा, ज्ञान से बुद्धि और सत्य से मन पवित्र होता है।
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पानी की बूँद गरम लोहे पर पड़कर नष्ट हो जाती है, वही बूँद कमल के पत्र पर मोती की तरह चमकती है और स्वाति के संयोग से सीप में प्रवेश करके सच्चा मोती बन जाती है। यह सब संगति का ही गुण है।
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जिसमें सद्गुण है , वही बुद्धिमान है, वही सज्जन है । जो सज्जन है,वही सदा सुखी है।
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जो मनुष्य सद्गुणों से प्रेम करता है उसे अभिन्न मित्रों, हितकारी उपदेशकों और विनोदी साथियों की कमी नहीं रहती ।
(लेखक -सी ई. एम. जोड)
प्रत्येक युग में मानव- प्राणी ने नाश और नृशंसता में सुख का अनुभव किया है। विश्वमंच पर मानव प्राणी के प्रादुर्भाव के पहिले भी पशु जगत में उसी तरह का व्यवहार पाया जाता था, जैसा आज पाया जाता है। मत्स्य न्याय का बोलबाला था- बड़े पशु छोटों को ग्रास बनाते थे। एक देहधारी दूसरे पर प्रहार करता था । पशु विज्ञान से परिचय रखने वाले महानुभाव जानते हैं, कि बर्र जैसी एक प्रकार की मक्खियाँ भी होती हैं, जो अपने अण्डों को कुछ कीड़ों की पीठ पर छोड़ जाती हैं, जिससे कीड़े मरते तो नहीं हैं, लेकिन उनकी गतिविधि को लकवा सा मार जाता है। इन कीड़ों की गरमी से उनके अण्डों में जीव पड़ जाता है और बाहर होते ही इन मक्खियों के बच्चे अपने चारों ओर जो कुछ पाते हैं उसको खाने लगते हैं। सबसे पहले इनका भोजन बनता है, वह कीड़ा ही जिसकी पीठ पर जन्म लिया और दुनिया की हवा में पहली साँस ली।
प्रकृति में दुःख जनक बातें देखने में आती हैं। और दुःख बुरी बात है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि बुराई केवल मानव प्राणी के पाप का ही परिणाम है। जब मैं किशोर अवस्था और पूर्ण वय प्राप्त करने के बीच में था, तब सोशलिज्म की बड़ी धूम थी, उसी का चारों ओर शोर था। सोशलिज्म से मैंने यह सीखा था कि मानव दुर्गति का कारण उसके जीवन की बुरी अवस्था है। “गरीबी संसार में सब से बड़ा पाप है” अपनी असाधारण वक्तृता शक्ति और अद्वितीय प्रतिभा से जार्ज बरनार्ड शा यही घोषणा कर रहे थे। हाँ, गरीबी सब से बड़ा पाप है, क्योंकि यही तो अन्य सब पापों को जनती है।
श्री बरनार्ड शा इस नतीजे पर पहुँचे हैं, कि प्रत्येक मानव प्राणी का यह धर्म है कि उसके पास पैसा हो। पैसा पास होना बुद्धिमानी और पुण्य का लक्षण है।
इससे क्या सीख मिलती है हमको? यही कि पाप को जननी दोष पूर्ण सामाजिक अवस्थायें हैं। अब आज चाहें तो पार्लियामेंट में एक कानून पास करा कर बुरी सामाजिक अवस्थाओं को सुधार सकते हैं, दुःख की जगह सुख, गन्दगी की जगह सफाई, रोग की जगह स्वास्थ्य, की स्थापना कर सकते हैं। इसलिये प्रगटतः आप चाहें तो जनता को पुण्यवान और धर्मनिष्ठायुक्त बना सकते हैं। किन्तु विचारना चाहिए कि यह बात कहाँ तक ठीक है? क्या मनुष्य पैसे के अभाव में ही पाप करता है?
कुछ दिन पहले की बात है कि मुझे वियन्ना के एक ऐसे व्यक्ति से मिलने का अवसर मिला जो हिटलर के डर से वहाँ से भाग आया था और भूतों जैसी सूरत लिये आज लन्दन के रेस्टोरेन्ट और बैठकों में मारा मारा फिरता है। वह नाजियों के आस्ट्रिया में पाँव रखने के पहले एक प्रसिद्ध डॉक्टर था। उसने मुझको दो घटनायें बताईं, जिनको मैं यहाँ दे रहा हूँ। उनको सुन कर एक बार फिर मेरे हृदय से यह भाव जगा कि धर्म गुरुओं की क्या यह बात सच ही थी कि इंसान पर शैतान की छाया है।
(1) वियन्ना में रिगस्ट्रा से के बराबर एक बूढ़ा यहूदी दौड़ा जा रहा था, चार युवा नाजी उसका पीछा कर रहे थे।
यहूदी सज्जन के लम्बी दाढ़ी थी, जो दो हिस्सों में बीच की एक पट्टी द्वारा बंटी हुई थी। उसकी दाढ़ी के दोनों हिस्सों में रस्सियाँ बँधी हुई थीं, और उन रस्सियों को कन्धे के ऊपर से उक्त युवा नाजी पकड़े हुये थे। जैसे ही बूढ़ा यहूदी अपनी गति को धीमा कर देता था। तैसे ही अपने ‘घोड़े’ की रफ्तार तेज करने के लिये पीछे से नाजी उस पर हंटर या लात से चोट लगा देते थे।
(2) वियन्ना के “प्रेटर” में युवा स्त्रियाँ टहलने निकला करती हैं, अपने अपने बच्चों को अपनी पिरम्बुलेटर गाड़ियों में लिटाये हुये । एक दिन की बात है दो नाजी युवक हाथ में भीगे हुए तौलिये लिये हुये जिनको ऐंठ कर रस्सी की तरह बना लिया गया था, उन स्त्रियों की तलाश में घूम रहे थे जो यहूदी थीं। जैसे ही कोई यहूदी स्त्री मिलती ये इन कोड़ों से उसको पीटने लगते। ये स्त्रियाँ जान बचाने को भागती, पीछे से कोड़ों की बौछार पड़ती जाती, वे और तेज भागती और, भी अधिक कौड़ों की बौछार उन पर होती , यहाँ तक कि उनके बच्चों की गाड़ियाँ उलट जातीं। उनके बच्चे सड़क पर लुढ़कते हुए इधर उधर ऊपर जा पड़ते !
ये दो घटनायें आपने पढ़ीं। मैं तो एक क्षण भर के लिए भी यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि आर्थिक संकट के कारण ही कोई ऐसा कर सकता है।
मानव जाति का इतिहास संकटपूर्ण रहा है। अपने जीवन में मानव प्राणी को अकाल, बाढ़, महामारी और भूकम्प आदि ऐसी शक्तियों का सामना करना पड़ा है, जो उसके बस से बाहर थीं। इन संकटों में उसके परिवार उसकी जाति नष्ट हो गई है। खून-पसीना एक करके उसने पेट भरने को अन्न और तन ढकने को कपड़ा पाया है। भेड़ियों, बाघों और साँपों से उसको लड़ाई लड़नी पड़ी हैं, कभी वह खुद मारा गया है और अक्सर उसने उनको मारा है, इतना प्रयत्न करने पर भी अनेक बार उसको रोटी नहीं मिली, कपड़ा नहीं मिला।
अधिकाँश मानव प्राणी यह नहीं जानते कि कब और कहाँ से उनको रोटी मिल सकती है और जब कभी उनको रोटी मिलती है तो इतनी नहीं कि उनकी क्षुधा सन्तुष्ट हो जाए! अधिकाँश मानव प्राणी अन्य मानव प्राणियों की दासता के जाल में जकड़े हुए हैं। अधिकाँश मानव प्राणी कभी दास रहे हैं तो कभी मालिक के खेत पर काम करने वाले, अधिकार विहीन कुली, कभी नौकर रहे हैं तो कभी भूख की माँग पूरी करने के लिये अपनी मजदूरी बेचने वाले मजदूर! अतृप्त भूख और भूख के बीच उन्होंने कलामुँड़ियाँ खाई हैं, अभाव और अपमान के गर्त किनारे पर पड़े रह कर दिन बिताये हैं- हमेशा किसी दूसरे के इशारे पर वह नाचे हैं कभी वे अपने स्वयं स्वामी नहीं बन सके।
खयाल कीजिये उन मानव कह जाने वाले प्राणियों का जिन्होंने गगनचुम्बी पिरामिड खड़े किये। खयाल कीजिए उन हतभाग्य प्रभु संतानों का, जिन्होंने किसी राजा या रानी की इच्छा पूरी करने के लिये कंधे पर ढो-ढो कर ऊँची पहाड़ियों की चोटियों पर शिलायें पहुंचाई और गढ़ और गढ़िया तैयार कीं। खयाल कीजिये उन देहधारियों का, जो किसी एक मध्य युगी डकैत के लिये जहाजों की पतवार खेंचते रहे, और इसी प्रयत्न में कुत्तों की तरह मर गये, आप कल्पना नहीं कर सकते, आप सिहर उठेंगे।
मानव इतिहास के पन्ने बदलते चलिये, आपको अनिवार्यतः इस परिणाम पर पहुँचना होगा, कि अतीत में मानव जीवन की विशेषता ही , भय, इंद्रिय लोलुपता, नृशंसता और पीड़ा रही है और यदि मानव जाति उसी रास्ते पर चली जिस पर उसको इस समय ले जाया जा रहा है तो भविष्य में भी उसके भाग्य में यही बदा है क्योंकि वही पुराना पाप आज भी अनियंत्रित रूप से क्रीड़ा कर रहा है-युद्ध का तो कहना ही क्या, शान्ति के समय में भी सन् 1928-30 में उत्तरी चीन में लगभग 60 लाख व्यक्ति भूख के कारण इहलोक की लीला समाप्त करके प्रभु के दरबार में चले गये। जिन नगरों और गाँवों में हमारे ये लाखों बन्धु मर रहे थे, वे व्यापारी भी थे, जिनके कोठों में गेहूँ और चावल भरा था और जिनकी रक्षा के लिए सरकार की तरफ से पुलिस पहरा देती थी। किनकी रक्षा के लिये? उनकी रक्षा के लिये जो भूखे मरने वाले प्राणियों में से, उनको जो अपने आपको या अपनी बेटियों को या बहुओं को बेच कर पैसा दे सकते थे, गेहूँ चावल बेच कर पैसा कमा रहे थे। टीन सिन आदि स्थानों में चंदा करके उन अभागे प्राणियों के लिए अनाज आदि इकट्ठा किया गया था। वह उन तक इसलिये न पहुँच सका था कि सैनिक अधिकारी एक भी रेल गाड़ी इस काम के लिये देने को तैयार न थे, क्योंकि रेलवे गाड़ियाँ उनको अपने लिये चाहिए थीं।
क्या बीसवीं सदी में भी ऐसी बातें हो सकती हैं? यह प्रश्न किया जा सकता है। लेकिन प्रश्न व्यर्थ है, क्योंकि ये होती हैं।.....पर क्या मानव प्राणी सदा अपने सहयोगियों के प्रति पशु जैसा ही व्यवहार करता रहा है? यह कहना, अधूरी बात है। वह साहित्य रचता है, संगीत का निर्माण करता है, दर्शन की रचना करता है और सभ्यता का सृजन भी करता है।
जीवन में सर्वतो मुखी सफलताओं के लिए चित्त को प्रसन्न रखना बहुत ही जरूरी है। चाहे कोई आदमी कितना ही धनी गुणी विद्वान या सुन्दर क्यों न हो, दुनिया उससे मिलकर तब तक हार्दिक प्रसन्नता प्रकट नहीं करती, जब तक कि उसका स्वभाव प्रसन्नता मय न हो । दुनिया के पास अपने ही कष्ट बहुत हैं, वह तुम्हारा रोना सुनने के लिये तैयार नहीं है। हाँ, वह तुम्हारी प्रसन्नता का आनन्द लूटने में सम्मिलित हो सकती है। प्रसन्न मनुष्य को सुगंधित पुष्पों की तरह दुनिया ढूँढ़ निकालती है और उसका समुचित आदर करती है । डॉक्टर शेल्डन लेविट लिखते हैं। व्यापार के लिये, बाह्य प्रभाव के लिए, अथवा आरोग्य प्राप्ति के लिए, हंसमुख रहना बहुत आवश्यक है।
खिन्नता और उदासी का कारण अपनी नासमझी है, हम रोज-रोज नई जरूरत पैदा करते जाते हैं और जब वे पूर्ण नहीं होतीं तो दुख मानते हैं, एवं अप्रसन्न रहने लगते हैं। अपनी कमजोरियों पर ध्यान न देकर असफलता का दूसरों पर दोषारोपण करते हैं। वास्तव में समस्त इच्छाओं की पूर्ति होना बहुत ही कठिन है। क्योंकि यदि एक ही वस्तु चरम लक्ष हो और उसके लिए अनवरत तपस्या की जाए, तो वह समयानुसार मिल सकती है, किन्तु हमारी हर एक छोटी बड़ी मनचाही इच्छाएँ सदा पूरी होती रहें, ऐसा कोई विधान नहीं है। इसलिये अपनी आवश्यकता को घटाना चाहिए। उन्नति की ओर से मुँह फेर कर एवं आलसियों की तरह निराश बैठ जाना बुरा है परन्तु आवश्यकताओं की तृष्णा को बढ़ाते ही जाना, यह उससे भी बुरा है। यदि मनुष्य अपना एक लक्ष स्थिर कर ले तो शेष व्यर्थ की बातों पर मन ललचाना अपने आप रुक जाएगा।
अपने से अधिक सुखी मनुष्यों को देख कर मन में ईर्ष्या उत्पन्न मत करो, वरन् अपने से गिरी हुई दशा के कुछ उदाहरणों को सामने रख कर उनकी और अपनी दशा का मुकाबला करो। तब तुम्हें प्रसन्नता होगी कि ईश्वर ने तुम्हें उनकी अपेक्षा कितनी सुविधाएँ दे रखी हैं। एक बार महात्मा शेखसादी के पास जूते न थे। वे सर्दी-गर्मी और कुश-कंटकों से बड़ा कष्ट पाते और जूते के अभाव में दुखी हो रहे थे एक दिन वे घूमते-घूमते कोफा की मस्जिद में पहुंचे और देखा कि एक व्यक्ति वहाँ ऐसा पड़ा हुआ था, जिसके हाथ पैर किसी प्रकार कट गये थे, और वह चूतड़ों के बल घसीट-घसीट कर चलता था। उसे देख कर शेखसादी ने परमात्मा को धन्यवाद किया कि मेरे पास जूता नहीं है, न सही, हाथ पैरों से आरोग्य तो हूँ। संसार में असंख्य मनुष्य तुम से नीची दशा में पड़े हुए हैं। उन्हें देख कर संतोष करो और अपने को दुखी मत होने दो। दूसरों को दुख न दोगे, तो तुम भी दुखी न रहोगे, यह प्रकृति का अकाट्य नियम है। किसी का दिल मत दुखाओ और न किसी के साथ अन्याय करो। यदि किसी से तुम्हारी लड़ाई हो जाए और वह तुम से बोलना छोड़ दे, तो भी तुम उसकी ओर से मुँह न फेरो । जब कभी वह फिर से रास्ता चलते मिल जाए तो एक बार हँस पड़ो और उसे गले लगा लो या माफी माँग लो। यह न समझना चाहिए कि ऐसा करने से तुम्हें कायर समझा जाएगा। उदारता कायरों से नहीं हो सकती, यह तो बलवान का लक्षण है। प्रेममय व्यवहार को कोई सच्चा मनुष्य चाहे वह कितना ही विरोधी हो, कमजोरी नहीं समझ सकता। तुम्हारे प्रेममय व्यवहार से उसका हृदय उमड़ पड़ेगा और सारे बैर भाव को भुला कर सच्चा मित्र बन जायेगा।
जब दुखदायी परिस्थितियाँ सामने आ खड़ी होती हैं । तो मनुष्य को विशेष रूप से चिन्ता सताने लगती है। व्यापार में घाटा है, मित्रों ने धोखा दिया है, धन का अभाव है, कोई आकस्मिक विपत्ति आ गई है, कुटुम्बी जन कहना नहीं मानते, रोगों ने आ घेरा है, ऐसी स्थितियों में साधारण पुरुषों को बड़ा क्लेश होता है, किन्तु जिनका ईश्वर पर भरोसा है, वे इन परिस्थितियों में भी न तो घबराते हैं, और न दुखी होते हैं, वे परमात्मा पर भरोसा रखने का कारण समझते हैं। कि यह विपत्ति भी शीघ्र टल जाएगी और एक कर्तव्यपरायण वीर पुरुष की भाँति उनके निवारण का साहसपूर्वक उपाय करते हैं। विपत्तियों को परीक्षा समझ कर उस पर अपने को प्रसन्नतापूर्वक कसने देते हैं ताकि उनका भविष्य बहुत ही उज्ज्वल और आनंदमय बन जावे। दुख- सुख रोज आने वाली घटनाएं है फिर क्यों उनके कारण अपने को दुखी बनाया जाए?
भलाई और उपकार के विचार एवं कार्य दुख में भी सुख उत्पन्न करते हैं। कोई व्यक्ति तुम्हारे साथ बुराई कर रहा हो तो तुम सच्चे हृदय से उसकी भलाई चाहो। जिस समय दुख का वातावरण पैदा हो रहा है उस समय किसी दुखी व्यक्ति की सेवा सहायता करने लगो या उपकार की महत्ता पर मन ही मन विचार करना आरंभ कर दो। भलाई के विचारों में एक ऐसी शक्ति है कि मन चाहे कितना ही भारी क्यों न हो रहा हो उसमें तुरन्त ही हलकापन आता है और शान्ति उपलब्ध होती है । पूजा पाठ, दान, धर्म, उपदेश, सेवा यह सब भलाई की श्रेणी ही में गिने जाते हैं।
अपने आप को चिन्ता में से उबारने की शिक्षा दो । भुला देने का अभ्यास कर लेना बहुत बढ़िया उपाय है क्रोध या चिन्ता के विचारों पर जितना ही अधिक ध्यान दिया जाता है वे उतने ही अधिक भड़कते हैं और दुख को अधिकाधिक बढ़ाते जाते हैं, इसलिये जब कोई आवेश आ रहा हो या दिल टूट रहा हो तो उसे भुलाने का प्रयत्न करो। दूसरे किसी प्रसन्नता उत्पन्न करने वाले काम पर लगा दो और उस दुखद प्रसंग को बिलकुल भुला देने का प्रयत्न करो मानो उस प्रकार की कोई बात हुई ही न थी। हँसो न आती हो तो भी हँसो, बनावटी हँसी हँसो। दर्पण में अपना हँसता हुआ चेहरा बार-बार देखो और मन ही मन प्रसन्नता प्राप्त करो ।
निम्न मंत्रों को बारबार दुहराते रहने पर भी अप्रसन्नता की आदत छूट जाती है और प्रसन्न रहने का स्वभाव बन जाता है।
(1) मैंने सदा प्रसन्न चित्त रहने की प्रतिज्ञा कर ली है।
(2) मैं ईश्वर की दयालुता पर पूर्ण विश्वास करता हूँ।
(3) मेरी आत्मा आनन्द, आरोग्य और ऐश्वर्य स्वरूप है।
(4) मेरे मन में चिन्ता, दुख, शोक आदि शत्रुओं के लिए तनिक भी स्थान नहीं है।
(5) मैं आनन्दमय हूँ और हर स्थिति में आनन्द प्राप्त करता हुँ।
(ले. श्री अगरचन्द नाहटा, बीकानेर)
विश्व में जितने भी प्राणी हैं, सभी सुख की आकाँक्षा रखते हैं । और उसकी प्राप्ति के लिये निरंतर प्रयत्नशील हैं। पर हजारों प्रयत्न करने पर भी वे सदा दुःख की ही विषम ज्वाला से संतप्त नजर आते हैं। उनकी अशाँति घटने के बदले बढ़ती ही जा रही है, इसका कारण क्या है? यही आश्चर्य एवं अन्वेषण का विषय है । गंभीर विचार करने पर सहसा दो प्रश्न हमारे सामने आते हैं। प्रथम क्या सुख कोई वास्तविक सत्य न होकर कल्पना मात्र है? या सुख के वास्तविक स्वरूप एवं मार्ग से हम सर्वथा अपरिचित है अर्थात् सुख की जो कल्पना हमने कर रखी है वह भ्रान्ति पूर्वक है? अन्यथा ऐसा अन्य कारण और हो ही क्या सकता है कि जिसके फलस्वरूप अपनी बुद्धि एवं शक्ति के अनुसार पूर्ण प्रयत्न करते रहने पर भी हमें इच्छित फल-सुख प्राप्त नहीं होता।
प्रथम प्रश्न पर जरा और गंभीरता से विचार करने पर पता चलता है कि वह प्रश्न समीचीन नहीं है। क्योंकि हमारे पूर्ववर्ती ऋषि मुनियों ने उस आनन्द का अनुभव किया है, एवं अब भी कई आत्माएं ऐसी नजर आती हैं कि उनके दर्शन, वचन श्रवण एवं सत्संग से परम शान्ति का अनुभव होता है अतएव यही विश्वास होता है कि सुख एक वास्तविक सत्य है। हाँ हमारी मान्यता एवं मार्ग में भ्रान्ति हो सकती है, जिस प्रकार तेली का बैल आँखों पर पट्टी बंधे रहने के कारण घाणी के चारों ओर घूमता हुआ जब थक जाता है, तो मन ही मन सोचता है कि मैंने बहुत लम्बी सफर करली, पर आँख खुलने पर उसी घाणी को पास पाकर उसको अपनी मान्यता भ्रान्ति भूल नजर आती है वही दशा हमारी है। हमारी सुख की कल्पना भ्रान्ति मूलक है, इसका विश्वास हमें दो समस्याओं पर विचार करने से स्वतः हो जाता है क्योंकि हमारी कल्पना में संग्रह एवं भोग ही सुख के साधन हैं, तब निरंतर आत्म चिंता करने वाले योगी जन कहते हैं कि सुख भोग में नहीं त्याग में है , इससे सुख के सम्बन्ध में एक नई दिशा मिलती है तथा एक प्राणी जिसे सुख का साधन मानता है, वही अन्य प्राणी के लिये दुख प्रद सिद्ध होता है। केवल यही नहीं, भिन्न-भिन्न प्राणियों की बात को छोड़ भी दें तो भी एक ही व्यक्ति को अपने जीवन में ऐसे अनेक अनुभव मिलते हैं कि एक ही बात एक बार उसे आनन्दप्रद होती है, वही अन्य समय में उसे दुखदायक हो जाती है। यथा- एक खाद्य वस्तु निरोग स्वस्थ में रुचिकर होती है, वही रोगी अवस्था में अप्रिय हो जाती है । पुत्र प्राप्ति सुख का साधन है, पर जब कोई पुत्र अविनीत हो गया या केवल पुत्र ही पुत्र उत्पन्न हो और द्रव्याभाव हो, तो ऊब कर कह उठता है, अब उत्पन्न न हो, तो अच्छा या कन्या हो जाने से ठीक है। इसी प्रकार अन्य अनेक प्रसंग हैं, इससे एक सिद्धान्त पाया जाता है कि सुख, दुख वस्तु के संयोग वियोग में नहीं पर व्यक्ति के विचारों पर निर्भर है।
यही बात अन्य एक उदाहरण द्वारा विशेष स्पष्ट हो जाती है । वह यह है-थोड़े समय पूर्व जेल जाना बड़ा ही निन्दनीय एवं भयप्रद समझा जाता था, पर राष्ट्रीय आन्दोलन ने लोक मानस को बदल डाला। आज कानून भंग कर राष्ट्रीय कार्यकर्त्ता जेल जाते हैं तो उनका मान बहुत अधिक बढ़ जाता है, जाते समय पुष्पों की माला पहनाई जाती है। जो जेल जाते हैं वे भी तनिक भय नहीं लाते। जो वस्तु अत्यन्त दुख प्रद थी उसे वे तनिक भी कष्टकर नहीं मानते। “योगीजन भी कष्टों को बड़े आनन्द के साथ भोगते हैं, बाह्य सुखों के वे दुख समझते हैं।
अब हमें देखना यह है कि सुख कहते किसे हैं? एवं दुःख का मूल कारण क्या है? महापुरुषों ने दुःख का अभाव सुख माना है । अतएव हमें केवल दुःख के कारण को जान कर उसका अभाव कर देना आवश्यक है। अनुभव एवं आगम ग्रन्थ बतलाते हैं कि दुःख ममत्व भाव के कारण होता है, जहाँ ममत्व भाव नहीं है, वहाँ दुःख की अनुभूति नहीं होती। उदाहरणार्थ-विश्व में प्रति समय अनंत प्राणी उत्पन्न होते हैं, व मरते हैं, पर हमें उससे कोई हर्ष विषाद नहीं होता और जब हमारे या हमारे कुटुम्ब में कोई बालक जन्म लेता है, तो हमारे हृदय में हर्ष होता है और जब कोई आत्मीय मरता है, तो शोक होता है इसका कारण अति स्पष्ट है कि जिसके प्रति हमने ममत्व किया, कि यह मेरा है, उसके संयोग वियोग से दुःख सुख के भाव उत्पन्न होते हैं, जहाँ हमारी ममत्व बुद्धि नहीं है, उसके संयोग वियोग से हमारी चित्त वृत्ति पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। हम हमारे सामने किसी दूसरे व्यक्ति की एक वस्तु को नष्ट होते या करते हुए देखते हैं, पर विचार करते हैं कि अपने को इससे क्या? और वही वस्तु जब हमारी होती है, तो उसको नष्ट नहीं होने देते। यदि कोई करे, तो उसके प्रति द्वेष उत्पन्न हो जाता है। इन सब बातों से यह सहज जाना जाता है कि दुःख ममत्व भाव में है। अतएव ममत्व भाव को छोड़ कर समत्व धारण करना चाहिये।
ममत्व बुद्धि वस्तु के सत्य स्वरूप के विचार से नष्ट होती है। जिस वस्तु के प्रति हमारा मोह हो, उसके सम्बन्ध एवं परिणाम पर विचार करते हैं, तो उस पर से ममत्व हटने लगता है जैसे किसी सुस्वादु खाद्य पदार्थ में हमारा मोह हो, तो हमें उस खाद्य पदार्थ को खाने के बाद क्या गति होती है? विष्ठा जिसे देखने को भी जी नहीं चाहता, दुर्गन्ध से जी मचलने लगता है, उस वस्तु की इस गति पर विचार करें, तो उस पर से रुचि हटने लगेगी। शरीर को हम अपना करके मानते हैं, इसके कारण उसके लिये अनेक पाप कर्म करते हैं, उसकी रक्षा एवं सुन्दरता वृद्धि के लिये अपने बहुमूल्य जीवन का काफी समय लगा देते हैं, पर जब हम इसकी अन्तिम अवस्था भस्मीभूत राख, जरावस्था, रुग्ण अवस्था पर विचार करते हैं, तो उस पर जो ममत्व है, वह शिथिल होता चला जाएगा। इसी प्रकार कुटुम्ब परिवार के प्रति जो स्वार्थमय सम्बन्ध है, उसके परिणाम पर विचार करें कि हम उनके लिये कहाँ तक दौड़ धूप मचा रहे हैं, अत्याचार से धनोपार्जन करते हैं, पर जब उनकी स्वार्थ पूर्ति में कमी हुई कि वे ही शत्रु सदृश हो जाते हैं, मरने पर कोई साथ नहीं जा सकता , सब धन माल जिसके ममत्व वश लाखों अन्याय मनुष्य करता है, वह सब यहीं पड़ा रहेगा, उसका तनिक भी हिस्सा साथ न जाएगा। आत्मा अकेला आया एवं अकेला जाएगा। अपने कर्मों का भोग उसे स्वयं भोगना पड़ता है, दुख परिणामों पर विचार करने से वैराग्य का उद्भव होता है और ममत्व घटता चला जाता है।
वास्तव में आनन्द आत्म ममता में है। हरिण जिस प्रकार अपनी नाभि में कस्तूरी होने पर भी उसकी सुगन्ध से मुग्ध होकर चारों ओर दौड़ता फिरता है, पर उस गन्ध का कारण उसकी नाभिस्थित कस्तूरी ही है, इसे नहीं जानता, उसी प्रकार मनुष्य वास्तविक सुख एवं उसके मार्ग को भूल कर आनन्द के लिए इधर-उधर दौड़ धूप कर रहा है, पर जब भूल भ्रान्ति का कारण अज्ञान एवं दुःख के कारण ममत्व को छोड़ देंगे, तो भी हमें परमानंद की प्राप्ति होगी।
साहस ऊँचे दर्जे की उदारता है, क्योंकि साहसी पुरुष अपनी बहुमूल्य वस्तुओं को भी मुक्त हस्त से अपने सिद्धान्तों पर निछावर कर सकता है।
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कटीली झाड़ियों में भी जब पुष्प खिलते हैं, तो वे बड़ी नयनाभिराम बन जाती हैं, तुच्छ और नगण्य मनुष्य में भी जब सद्गुणों का समावेश हो जाता है, तो वे महान् पुरुषों की समता करने लगते हैं।
(ले. श्री नारायणप्रसाद तिवारी ‘उज्जवल’ कन्हीबाड़ा)
हम लोग भोजन के सम्बन्ध में हानि-लाभ की कुछ थोड़ी बहुत बातें जानते हैं, परन्तु वायु जो भोजन से भी अधिक आवश्यक है, उसके सम्बन्ध में बहुत ही कम जानते हैं। स्वास्थ्य रक्षा के लिये प्राण वायु (शफ्ब्द्दद्गठ्ठ) जितनी आवश्यक है, उतनी और कोई वस्तु नहीं। हम लोग सड़े गले भोजन को खाना पसन्द नहीं करते, किन्तु सड़ी और गन्दी वायु से उन्हें कुछ भी परहेज नहीं होता। डॉक्टर रौडस्मंड के मतानुसार प्राण वायु(ओषजन) एक खुराक है, जिसका महत्व खाने पीने की अन्य चीजों की अपेक्षा बहुत अधिक है। वे कहते हैं कि यह बात असत्य है, कि हृदय के द्वारा रक्त का दौरा होता है, वरन् सच बात यह है, कि प्राण वायु रक्त में मिल कर उसे दौरा करने की शक्ति देता है। मनुष्य के शरीर को अपना काम चलाने के लिये जिस शक्ति की जरूरत होती है, वह कहाँ से आती है, इस विषय पर इस युग के धुरन्धर शरीर शास्त्री श्री बरनर मेकफेडन ने जो अनुसंधान किया है, वह जानने के योग्य है, वे लिखते हैं-”हम प्रत्येक श्वाँस के साथ जो वायु खींचते हैं, उसके साथ एक विद्युत शक्ति शरीर में जाती है और विद्युत शक्ति अन्य कोई वस्तु नहीं, ऑक्सीजन वायु का ही परिवर्तित रूप है। जब यह वायु रक्त में मिलती है, तो स्नायु मंडल से ग्रहण कर लेता है ओर स्नायविक केन्द्र में पहुँचा देता है और उसी की शक्ति से शरीर के सारे काम चलते हैं।” भोजन पचाने, बात-चीत करने, चलने फिरने आदि के कार्य इसी शक्ति द्वारा पूरे किये जाते हैं। बहुत से लोग समझते हैं, कि हमें तो दिमागी काम करना पड़ता है। इसलिये दिमागी ताकत बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिये। हमें शारीरिक मेहनत से क्या प्रयोजन? उन्हें याद रखना चाहिये कि मानसिक श्रम में भी स्नायविक शक्ति व्यय होती है। यह शक्ति शारीरिक स्वास्थ्य एवं स्नायु विद्युत से ही आती है, उस शक्ति का मूलसोत आक्सीजन है, जो वायु में ही प्राप्त होता है।
कितने अज्ञान की बात है, कि लोग इस प्राण शक्ति से डरते हैं, और खुली हवा में रहने की अपेक्षा बन्द मकानों में काम करना पसन्द करते हैं। जाड़े के दिनों में आप किसी मोहल्ले में चले जाइये, सारी खिड़कियाँ बन्द मिलेंगी, लोग अपने कमरे बन्द करके उनके अन्दर मुँह ढ़ककर सो रहे होंगे। यह प्रथा स्वास्थ्य के लिये बहुत ही हानिकर है। तेज या ठण्डी हवा में निकलने से लोग भयभीत होते हैं और समझते हैं कि इससे जुकाम आदि हो जाएगा। यह भ्रम मिथ्या है, तेज, या ठंडी हवा से कोई बीमारी नहीं होती। यदि जुकाम होता भी है, तो वह तुम्हारे लिये अच्छा है। अगर शरीर में दोष भरे पड़े हैं, तो जुकाम होकर बलगम द्वारा ही उनका निकल जाना भला है, उन्हें रोक कर या दबाकर रखा जाय तो आगे चल कर वे किसी भयंकर बीमारी के रूप में प्रकट हो सकते हैं। बन्द कमरे में बार-बार साँस लेने से शरीर का कार्बोनिक ऐसिड गैस नामक विष वायु में मिल जाता है और उसी विषैली वायु को बार-बार ग्रहण करने पर वह उत्तरोत्तर और भरी अधिक विषैली होती जाती है, बहुत देर तक उस विषैली गैस में रहने से शरीर की बड़ी क्षति होती है। इस बात की परीक्षा आप स्वयं कर सकते हैं, बन्द कमरे में मुँह ढक कर सोने पर सुबह उठते हुए शरीर भारी सा मालूम पड़ेगा। तन्द्रा और आलस्य छाये होंगे, खाट पर से उठना अच्छा न लगेगा और दिन भर सुस्ती बनी रहेगी। खुली हवा में सोने पर यह बातें नहीं हो सकतीं। रात भर जिसने ऑक्सीजन (प्राणप्रद वायु) प्राप्त की है, वह प्रातःकाल प्रसन्न वदन उठेगा और दिन भर फुर्ती का अनुभव करेगा।
फेडन महोदय कहते हैं कि लोग शुद्ध तरीके से साँस लेना भी नहीं जानते और स्त्रियाँ तो उस विषय में बहुत ही अज्ञ होती हैं। छोटे बालक का पेट उघाड़ कर देखिये, वह पेडू तक साँस लेता हुआ मिलेगा। जब वह साँस छोड़ेगा तो उसका पेडू सुकड़ेगा। इससे जाना जाता है कि श्वाँस लेने का प्राकृतिक नियम क्या है। अधिक कपड़ों से लदा रहने, आराम से पड़े रहने, एवं झुककर बैठने के कारण अधूरी साँस लेने की आदत पड़ जाती है। पूरी साँस लेने पर पेट फूलता एवं सिकुड़ता है जिससे (Diaphragm) नामक पेट का वह अंग जो पेट और आंतों को फेफड़े से अलग करता है, नीचे जाता है और फेफड़ों के निचले भाग का दबाव हलका करके उसमें पूरी हवा भर जाने देता है। इस प्रकार फेफड़ों की पूरी शुद्धि होती रहती है। इसके अतिरिक्त जब क्पंचीतंहउ नीचे खिसकता है तो, आमाशय, जिगर एवं आंतों की क्रिया तेज हो जाती है। क्योंकि उन पर इसका एक हलका धक्का सा लगता है। जो लोग अधूरी साँस लेते हैं, वे पूरी साँस लेकर देखें। उनकी पाचन शक्ति पहले की अपेक्षा बहुत तीव्र हो जायगी और फेफड़े मजबूत होने लगेंगे। क्योंकि पूरी साँस लेने से ही अधिक मात्रा में ऑक्सीजन वायु प्राप्त की जा सकती है। ऋषियों ने प्राणायाम की श्वास प्रश्वास क्रियाओं पर इसीलिये अधिक जोर दिया है, कि इनके द्वारा मनुष्य की स्नायविक शक्ति बढ़े और यह कार्यवाहिनी विद्युत को पर्याप्त मात्रा में प्राप्त करके स्वास्थ्य की उन्नति करता रहे। पर्याप्त मात्रा में ओषजन को शरीर में पहुँचाना निरोग रहने का सर्वोत्तम साधन कहा जा सकता है।
खुली हवा में गहरी साँस लेने की आदत डालिये। फेफड़ों में पूरी हवा भरिये, परन्तु याद रखिये पहले पेट को फुलाना चाहिए। कुछ दिनों के प्रयत्न से यह अभ्यास आदत के रूप में बदल जाता है और तब स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक उन्नति हो जाती है। पूरी साँस लेने की आदत डालने के लिये यह आवश्यक है कि अपने मन में यह बात अच्छी तरह जमा लो कि गहरी साँस लेना मनोरंजन का एक साधन है। इस भार रूप में समझोगे और ज्यों त्यों करके कुछ देर बेगार भुगतोगे तो कुछ लाभ न होगा। मन उसी काम में लगता है, जिसे मनोरंजन समझ कर किया जाता है। जब कभी खुली हवा में चलने का अवसर मिले तो खेल की तरह गहरी साँस खींचो और साथ ही गिनते जाओ कि जितने समय में एक साँस ली उतने समय में तुम कितने कदम चल लिए, उतने ही कदम चलने में साँस छोड़ो। फेफड़ों को पूरा भरना और पूरा खाली करना एवं पेडू का उठाना सिकोड़ना यह स्वाभाविक श्वास क्रिया की कसौटी है। इस सरल प्राणायाम से रक्त की सजीवता बहुत बढ़ जाती है।
संसार में अप्रिय घटनायें होती हैं, तुम विश्व की समस्त घटनाओं को अपने अनुकूल नहीं बना सकते। इससे दुख से छूट कर सुख प्राप्त करने का यह उपाय है कि घटनाओं को ईश्वर की इच्छा समझ कर शान्त रहो और धर्म समझकर अपने कर्तव्य का पालन करते जाओ।
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न तो निन्दा पर विचार करो और न प्रशंसा की चाह करो। दूसरे तुम्हारे लिये क्या कहते हैं, इसके लिये चिंतित होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। जिस कार्य को तुम्हारी अन्तरात्मा ठीक समझती है, उसी पर सच्चे हृदय से आरुढ़ रहो। विरोधी लोग एक दिन समर्थक बन जायेंगे।
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मूर्खों की मित्रता में खतरा है। आरम्भ में वह हँसावे तो भी अन्त समय रुलाये बिना न रहेगी।
( ले. पं. भोजराज शुक्ल, ऐत्मादपुर, आगरा)
ईश्वर के नाम का जप करने से उसके दिव्य गुणों का प्रभाव मनुष्य के हृदय पर पड़ता है, अधिक मात्रा में जप करने से वह गुण मनुष्य में भी आने लगते हैं। यदि मनुष्य प्राणायाम के साथ दृढ़ आसन हो कर एकाग्र चित से नित्य प्रति 3 घंटे जप करे, तो उसका चित्त ठहरने लगता है। इसी का स्थूल रूप हरि-कीर्तन है, इससे भी मन एकाग्र हो कर ईश्वर में प्रेम तथा भक्ति उत्पन्न होने लगती है, जप करने के लिये ईश्वर का सर्वोत्तम नाम ‘ओम्’ है। यदि अर्थ सहित जप किया जावे, तो विशेष लाभ होता है, जप करने से पहिले एकाँत निर्जन स्थान में बैठ कर जापक को प्रतिज्ञा करनी चाहिये कि “आज इतनी संख्या में जप करूंगा, पूर्ण किये बिना किसी दशा में भी उसे न छोड़ूंगा”। इस प्रतिज्ञा को प्रातः सायं दोनों समय करना चाहिये, अन्य समय में भी अपनी प्रतिज्ञा का ध्यान रखना चाहिये। यदि इतना प्रयत्न करते हुए भी विघ्न उपस्थित हों, तो यह विचार करते हुए कि “मैं अपनी प्रतिज्ञा तोड़ कर पातकी बनना चाहता हूँ” अपने को धिक्कार दे। ऐसा निरन्तर करते रहने से मन में ग्लानि उत्पन्न हो कर अपनी की हुई प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने की मन में भावना उत्पन्न हो जाती है, जप करने में मन लगने लगता है।
जप करने में निम्नलिखित विघ्न उत्पन्न होते हैं, इनका ध्यान रखना चाहिये।
(1) व्याधि (2) स्त्यान (3) संशय (4) प्रमोद (5) आलस्य (6) अविरति (7) भ्राँतिदर्शन (8) अलब्ध भुमिकत्व (9) अनवस्थितपन। ये चित्त के विक्षेप करने वाले विघ्न हैं। उपरोक्त विक्षेप चित्त की वृत्तियाँ रोक दी जाती हैं, तो ये विघ्न बाधक नहीं होते।
“ विक्षेपों की व्याख्या”
(1) व्याधि-रोगों से शरीर का वीर्य तथा रस बिगड़ने से कष्ट होना।
(2) स्त्यान-चित्त में कुकर्म करने का विचार आना अथवा कर्म छोड़ बैठना।
(3) संशय-अच्छे कर्मों के लिये चित्त में सन्देह उठना, कि कर्म करूं या न करूं।
(4) प्रमाद-ईश्वर भजन का कभी चिन्तन भी न करना।
(5) आलस्य-शरीर अथवा चित्त की स्थूलता से शुभ कर्म न करना।
(6) अविरति-विषयों के संसर्ग से चित्त का आत्मा को मोहित कर देना।
(7) भ्राँति-दर्शन-कुछ का कुछ समझना, सत्य को असत्य, असत्य को सत्य जानना।
(8) अलब्ध भूमिकत्व-भजन के लिये स्वच्छ एकाँत स्थान प्राप्त न होना।
(9) अनवस्थितपन-स्वच्छ एकान्त स्थान मिलने पर भी भजन में मन न लगना।
दृढ़प्रतिज्ञ हो कर नित्यप्रति जप करने से कुछ दिनों में यह विघ्न अपने आप शान्त हो जाते हैं। इस कलिकाल में हठ-योग से समाधिस्थ हर एक मनुष्य नहीं हो सकता। प्रथम तो योगी गुरु ही नहीं मिलते, यदि खोजने पर मिल भी जावें तो मनुष्यों में श्रद्धा नहीं है,यदि किसी प्रकार श्रद्धा भी हो जावे तो अशुद्ध खाद्य पदार्थों के खाने से शरीर और मन अशुद्ध हो गये हैं, इसलिये इस समय हठ-योग की सिद्धि एक प्रकार से असम्भव ही है, बस ईश्वर प्राप्ति का सुगम मार्ग प्रतीत होता है, तो ईश्वर नाम का कीर्तन और जप जैसे कि परमहंस स्वामी रामकृष्ण महाराज की समाधि हरिनाम कीर्तन ही से हो जाती थी। कीर्तन का सूक्ष्म तथा उत्तम जिह्वा को स्थिर रख कर केवल मन से जप करना, स्थूल दृष्टि से जप करने से जापक को सिद्धि प्राप्त हो जाती है, जिससे कि मनुष्य लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के लाभ उठा सकता है, यह उस की इच्छा पर निर्भर है, प्रेय या श्रेय किसी मार्ग को ग्रहण कर ले।
रंगों का मस्तिष्क पर प्रभाव।
डॉक्टर पोलोडस्की ने अपनी पुस्तक ‘दी डॉक्टर प्रेस क्राइब्स कलर’ नामक पुस्तक में एक मजेदार बात कही है। उनका मत है, कि श्वेत वस्त्र धारण करने वाली लड़कियों को, काले वस्त्र धारण करने वाली लड़कियों की अपेक्षा आसानी से वर मिल जाते हैं। डा पोलोडस्की ही नहीं, दूसरे बहुत से विशेषज्ञों का भी यही कहना है, कि रंग का शरीर और मस्तिष्क दोनों ही पर प्रभाव पड़ता है। डाक्टरों ने पता लगाया है, कि नीले कमरों में रखे जाने वाले रोगी चमकदार और खूब सजे हुए कमरों की अपेक्षा अधिक सरलता पूर्वक सोते हैं और उन्हें आराम भी जल्दी होता है। किन्तु यह बात रामजदा रोगियों के सम्बन्ध में नहीं है। उनके आसपास उज्ज्वल और मनोमुग्धकारी वस्तुएं रहनी चाहियें। इस बात की परीक्षा लन्दन के एक विशेषज्ञ ने हाल ही में की थी। उसने बम से आहत सैनिकों को एक उज्ज्वल और रोशनी दार कमरे में रखा, जिसके फलस्वरूप वे शीघ्र अच्छे हो गए।
काले रंग से उदासी फैलती है। एक बार विलायत के ‘ब्लेक फ्रैअर्स’ नामक पुल को काले रंग से रंगवाया गया। फल यह हुआ कि बहुत से आदमियों ने उस पर से कूद-कूद कर आत्म-हत्याएं कीं! इस पर पुल को हरा रँगवाया गया, तब जाकर आत्म-हत्याओं की संख्या घटी।
प्रेत कैसे रहते हैं?
इंग्लैंड में लेडी फ्लाँरे वैरेस नाम की एक प्रसिद्ध लेडी डॉक्टर हैं, जो पिछले 12 वर्षों से अपने मृत पति से सन्देश प्राप्त करती हैं। उनके पति सर डबल्यू आफ बेरेट, डबलिन के रायल कालेज में प्रोफेसर थे। उनकी मृत्यु सन् 1925 में हुई थी। उन्हें अंतर्जग की बातों पर विश्वास था और अपने जीवन काल में उन्होंने इस विषय में खोज करने के लिये एक संस्था भी स्थापित की थी । लेडी वैरेट ने अपने पति की आत्मा से एक बार उनके लोक के खान-पान और रहन-सहन के विषय में कुछ पूछा था, उसके उत्तर में सर विलियम वैरेट ने बतलाया- मैं कुछ खाता या पीता नहीं हूँ। मेरे शरीर के चर्म छिद्रों से पोषक तत्व अपने आप पहुँचते रहते हैं। रहने का घर करीब-करीब बिलकुल वैसा ही है, जैसा कि पृथ्वी पर था। मैं कपड़े भी पहनता हूँ। हम लोग कपड़े अपनी इच्छा मात्र से उत्पन्न कर लेते हैं। मैं सूट पहनता हूँ। क्योंकि मुझे उसमें आराम मिलता है। लेकिन अगर मैं चाहूँ तो दूसरा कोई भी वस्त्र पहन सकता हूँ। हर आदमी अपने-अपने पेशे का काम करते हैं, ऐसा करने में वह कुछ समय तक खुश रहता है। “
लेडी वैरेट का कहना है कि कभी मेरे पति अपने सन्देशों द्वारा मेरे डाक्टरी के काम में भी मदद पहुंचाते हैं। एक बार उन्होंने मेरे स्वास्थ्य सुधार के लिये क्या भोजन उपयुक्त होगा, यह बताया था।
पूर्व जन्म की स्मृति।
कन्नौल के एक संवाददाता लिखते हैं, कि मौजा भाटन की सरैया तहसील कन्नौज में ता0 26 अप्रैल सन 1936 को पं0 छक्कूलाल दरोगा अपनी जमींदारी में बन्दूक से मारे गये थे और जला दिये गये थे। अब सरैया के पास ही मौजा रामपुर में उनका पुनर्जन्म हुआ है। वहाँ के पं.उजागर लाल का 4 वर्षीय बालक भगवानदीन कहता है, कि मेरा बाप छक्कूलाल दरोगा है और मेरा मकान भाटन सरैया में है। बालक को उस गाँव में ले जा जाकर छोड़ा गया तो उसने अपना मकान तथा सभी बच्चे पहचान लिये तथा बहुत सी बातें बतलाई । उसने कहा कि मैं गढ़िया में सो रहा था कि किसी ने मुझे बन्दूक से मार डाला और एक काँता मेरे मस्तक पर मारा तथा मुझे जला दिया गया।’ बालक के शरीर पर गोली का और मस्तक पर काँते का निशान भी है।
अखंड ज्योति के पाठकों के कुछ पत्र नीचे दिये जाते हैं। अब तक हमारे पास इस प्रकार के कितने ही पत्र आ चुके हैं । संकोचवश अभी तक हम इन्हें दबाये हुए थे। पर जब बहुत पत्र आये हैं तो उन्हें पाठकों के सामने रख रहे हैं । हर एक पाठक से अनुरोध है कि वह इस सम्बन्ध में अपने यहाँ भी जाँच करे, जो अनुभव हो, उसे हमारे पास लिख भेजें। उन्हें ‘ज्योति’ में छापेंगे जिससे अन्य पाठक भी लाभ उठा सकें।
-संपादक
(1)
‘.................मुकदमे बाजी से हम तबाह हो गये हैं पिछले सात वर्षों से हमेशा दो चार मुकदमे फौजदारी आदि के लगे रहते थे, पर जब से अखंड ज्योति हमारे घर में आई है, परिस्थिति बिलकुल बदल गई है । मुकदमों से अब बिलकुल मुक्ति मिल गई है।
- केशव नरायन भटनागर , भिमसार
(2)
‘..............मेरी उम्र इस प्रकार 32 साल है । पहला विवाह 12 वर्ष की उम्र में हुआ था, जब बीस वर्ष उम्र तक कोई सन्तान न हुँई तो पिता ने मेरा दूसरा विवाह कर दिया। किन्तु दोनों स्त्रियों से अब तक कोई सन्तान न हुई थी। सारा घर दुखी था। अखण्ड ज्योति जब से मँगाई, तब से घर में बहुत खुशी है। दोनों स्त्रियों का इस समय गर्भ है।
-राजेन्द्रपाल सिंह कछवाहा, पटियाला।
(3)
‘..............हम दोनों स्त्री , पुरुषों में कभी नहीं पटी। सदा कलह रहता था। जैसे-तैसे तीन संतानें तो हो गईं, पर आप सच समझिये हम विवाहित होते हुए भी रडुआ और राँड रहे हैं। न जाने ईश्वर की क्या कृपा हुई है कि इस साल घर वाली का स्वभाव बदल गया है। अब मैं अपने को विवाहित अनुभव करने लगा हूँ। अखंड ज्योति का मँगाना हमारे यहाँ शुभ हुआ ।
-गोमती नन्दन डाकोर
(4)
‘..............मैं ऐसी परिस्थितियों में रहा हूँ। जिन्हें वर्णन करके आपका भी दिल दुखाना नहीं चाहता। बस मृत्यु को छोड़ कर और सब कष्ट मेरे ऊपर समझें । तीन वर्ष तीन युग की बराबर काटे हैं पर अब धीरे-धीरे सभी स्थितियाँ सुधरी जाती है। ऐसा मालूम पड़ता है कि कोई फंसी पर से उतार रहा है। क्या यह आपकी सहायता है?
-अयोध्याप्रसाद माथुर, सूरत
(5)
‘..............हमारे यहाँ मठ पर दश वर्षों से सत्संग और नियमपूर्वक आध्यात्मिक साधन होता है। होली पर अघोरी कुवलियानन्द जी आये थे उन्होंने अखंड ज्योति को अखरी तक पढ़ा था और कहा था कि इस कागज में ऐसे भाव भरे हुए हैं कि जहाँ यह रहेगा , मौज करेगा । सो आप पन्द्रह अखबार भेज दीजिए, हम लोग अपने अपने घरों में रक्खे रहेंगे ।
-शुभचरण गंगली, गोपालपुर
(6)
‘..............ऐसे लेख मैंने पढ़े हैं। इस प्रकार के विचारों वाली हिन्दी और अँग्रेजी की सैकड़ों पुस्तकें पढ़ चुका हूँ, परन्तु अखंड ज्योति में कुछ विशेष आकर्षण है। पढ़ते समय ऐसा मालूम पड़ता है कि एक-एक शब्द पेट में इठता हुआ उतर रहा है। कि एक अवश्य ही आपकी आन्तरिक प्रेरणाएं हमारे ऊपर सीधा आघात करती हैं।
-ए.एम. डागा, बलरामपुर।
(7)
सोच रहा था पास में कुछ नहीं है। अखंड ज्योति का चन्दा चुक गया। अब कहाँ से भेजूँ, अकस्मात एक ऐसे मनुष्य ने लाकर 2) रु. दिये जिससे मिलने की कोई उम्मीद न थी। चार वर्ष पहले वह उधार ले गया था। माँगने पर लड़ता था, पर बिना माँगे यह रुपया आ जाने पर मुझे बड़ा अचंभा हुआ । शायद अखंड ज्योति के भाग्य ने जोर मारा है। इस साल का चन्दा भेज रहा हूँ।
-गनपतिलाल बर्मा, मुचकंदगढ़
(ले. श्री आनन्दकुमार चतुर्वेदी कुमार, छिवरमऊ)
शिशिर का अन्त तथा बसंत का आगमन था। वृक्षों की पत्रावली पीली पड़कर वृक्षों से बिछुड़ रही थी । इसे देखकर मन में यह भावना उत्पन्न हो रही थी कि जो पत्ते साल भर से एक साथ रहकर परस्पर आमोद प्रमोद कर रहे थे, तथा उनका पालन-पोषण एक साथ ही हुआ था, काल की गति से अब बिछुड़ रहे हैं। यह दृश्य देखकर मेरे हृदय को अत्यंत दुःख हुआ, मुझसे न रहा गया। मैं उन पृथ्वी पर पड़े हुए पत्तों के समीप गया कि ऐ पत्तों! तुम्हें अपने भाइयों से बिछुड़ते हुए दुःख नहीं होता, “उन्होंने उत्तर दिया कि संसार में अपने कर्तव्य का पालन करने में कहीं दुःख होता है? चाहे मृत्यु को भी हँसते हँसते क्यों न आलिंगन करना पड़े।”
क्या यह सत्य है? मुझे उन पत्तों का उत्तर सुन कर संतोष नहीं हुआ, मैं अपने प्रश्न का उत्तर पाने के लिये आगे बढ़ गया, मार्ग में सहस्रों चींटियां इधर से उधर दौड़ती हुई दिखाई दीं जो बेधड़क अपने कार्य में व्यस्त थीं अनेकों मनुष्य तथा पशु उनके ऊपर पाँव रखकर निकल रहे थे। बहुत सी चींटियां अपने प्राण गँवा चुकी थीं। इस दृश्य को भी देखकर मेरे हृदय में अत्यंत वेदना हुई। मैंने एक चींटी को रोक कर पूछा कि चींटी रानी, तुम इस प्रकार निर्भय होकर दौड़ रही हो। तुम्हारे ऊपर सैकड़ों मनुष्य तथा पशु अपने पाँव रखकर कुचलते हुये निकल रहे हैं, तुम्हारे साथ की बहुत सी चींटियां मर चुकी है, सम्भव है कि इसी प्रकार किसी समय तुम्हारी भी मृत्यु हो जावे परन्तु तुम्हारे मन में इसका भय तनिक भी नहीं मालूम होता।
मैंने उस चींटी से भी यही उत्तर पाया कि संसार में जन्म लेकर अपने कर्तव्य पालन में मृत्यु से नहीं डरना चाहिये।
इन दोनों दृष्टाँतों से मेरे हृदय को सन्तोष हुआ, संसार में जो प्राणी कर्त्तव्यपालन में परायण हैं, सचमुच संसार-संग्राम में वही विजय पाते हैं, जो करना चाहते हैं, कर दिखाते हैं।
अद्यैव मरणामस्तु वा युगान्तरेवा।
कर्त्तव्य पथ विचलन्ति पदं न धीराः॥
चाहे आज ही मृत्यु हो जाए, चाहे युगों तक जीयें परन्तु धीर पुरुष कर्त्तव्य से विचलित नहीं होते।
(ले. श्री तुलसीराम शास्त्री, सितारी)
परापवादा श्रवणं परस्त्रीणामदर्शनम्।
एतच्छौचंश्रोत्र दृशोर्जिव्हा शुद्धिरपैशुनम्॥
दूसरे की निन्दा सुनने में चित्त न देना, पर स्त्रियों को अनुचित दृष्टि से न देखना, यह श्रवण और नेत्रों की शुद्धि है और चुगलखोरी, असत्य, रूखे वचन और व्यर्थ के वार्तालाप से बचना यह जिव्हा की शुद्धि है।
अप्राणी वधम मस्तेयं शुचित्वं पाद हस्तयोः।
अश्लेष परस्त्रीणाँ शारीरं शौच मिष्यते॥
हिंसा से बचना, पैर की पवित्रता, चोरी न करना हाथ की पवित्रता है, पर स्त्री गमन से बचना शरीर की पवित्रता है।
स बाह्याभ्यन्तरं शौच मेतदुक्त मशेषतः।
सर्वस्मादधिकं प्रोक्तमर्थ शौचं स्वयंभुवा॥
यह बाहरी भीतरी सम्पूर्ण पवित्रता कही, परंतु सब प्रकार की पवित्रताओं से अधिक पवित्रता ईमानदारी के साथ पैसा-पैदा करना है।
अन्यत्र भी लिखा है-
सर्वेषामेवशौचाना मर्थ शौचं परंस्मृतम्।
योऽर्थे शुचिहि सशुचिर्न मृद्वावरि शुचिः शुचिः॥
शौचाना मर्थ शौचं च (पद्य पु0 पाताल खंड
5। 86। 66)
अर्थात्-सारी पवित्रताओं में धन सम्बन्धी पवित्रता (नेक कमाई से पेट भरना ) बड़ी है।
(श्री मंगलचंद जी भंडारी, अजमेर)
एक विद्वान का कथन है, कि समय के सिर पर आगे की तरफ बड़े-बड़े बाल हैं, और पीछे की खोपड़ी गंजी है। यदि आगे से उसके बालों को पकड़ लिया जाए तो वश में आ जाएगा और सहायता करेगा। परन्तु यदि उसे चला जाने दिया जाए तो पीछे से उसे किसी प्रकार नहीं पकड़ सकते ।
मनुष्य जीवन में समय ही सबसे मूल्यवान है, जो उसका ठीक प्रकार उपयोग कर लेता है, उसका तो जन्म सार्थक हो जाता है अन्यथा हाथ मलते रहकर पछताना ही शेष रह जाता है। बहुत से लोग इस फिक्र में रहते हैं, कि कोई अच्छा मौका आएगा तो यह काम करेंगे। परन्तु जो समय की कदर नहीं करता वह मौके को भी नहीं पहचान सकता और अपने आलसी स्वभाव के कारण उसे भी गंवा देता है। भाग्योदय के लिए सब से अच्छा यही है, कि अपने जीवन की एक-एक घड़ी उपयोग किया जाए। यदि रोज रोज असफलता मिलती है, तो एक दिन सफलता का अवसर आवेगा।
आस्टले नामक एक बहुत विख्यात डॉक्टर हो गया है। आरंभ में वह बड़ी उम्र तक यों ही था। एक दिन वह बाजार में जा रहा था तो वहाँ क्या है, कि सामने एक लड़का मोटर से गिर गया और उसकी नस टूट गई। खून बहुत आ रहा था। आस्टले ने यों ही उसकी नस बाँध दिया जिससे खून रुक गया और लड़का अच्छा हो इस घटना से उसे उत्साह मिला और चिकित्सा का अध्ययन करने लगा। अन्त में वह एक बड़ा सिविल सर्जन हुआ। संसार में जो भी महापुरुष हुए हैं, उन्होंने अपने जीवन की एक -एक मिनट का ठीक उपयोग किया है। कितने दुख की है, कि हम लोग अपने अमूल्य समय को यों व्यर्थ बातों में गँवाते रहते हैं, और अन्त में सकल जीवन लेकर संसार से कूच कर जाते हैं।
(ले. स्व. गिजू भाई)
माताएं बच्चों को गलती दिखलाते समय उसके मूल में रही हुई अपनी गलती नहीं देखतीं।
माँ - ‘लेकिन तू सीधी तरह खड़ा रह । यों उछल कूद क्यों करता है?’
बेटा -’मुझे सर्दी लगती है मुझसे खड़ा नहीं रहा जाता।’
माँ- ‘कुर्ता पहनते देर न हुई और निकाल डाला? तू कैसा है रे?’
बेटा- ‘माँ कुर्ते में तो चींटी थी। देखो चींटी ने मुझे काट लिया !’
माँ- ‘देखा, तैने रकाबी को गिरा दिया और फोड़ डाली न?’
बेटा - ‘मैंने नहीं गिराई। रकाबी ही चिकनी थी, फिसल कर गिर पड़ी
माँ- ‘अरे दैया! अब क्या करूं? इसने तो कपड़े के टुकड़े-टुकड़े कर डाले?’
बेटा - ‘बहुत टुकड़े तो नहीं किये सिर्फ दो ही टुकड़े हैं । मुझे पैरों में पट्टी बाँधनी है।’
माँ - ‘यूँ लोट पोट क्या करता है? तुझे सोने भी नहीं आता है।’
बेटा - ‘माँ, ये कान के पास आकर जो गुन गुन करते हैं तू आकर सुनती नहीं?’
माँ- ‘अरे तू कब तक खेलता रहेगा? तुझे कुछ नहाने की भी सुध है?’
बेटा- ‘तुम्हीं ने तो कहा था कि जब बुलाऊँ तब आना, तुमने मुझे कभी पुकारा भी था? या ही झुल्लाने बैठ गई। ‘
माँ- ‘कैसी वाहियात आदत है रे? दो कौर नहीं खाये और पानी ढाँसने बैठ गया।’
बेटा - ‘लेकिन माँ साग में इतनी मिर्च है, कि मुँह जला जाता है। जरा तुम चखो तो?’
-’शिक्षण पत्रिका’
(ले. श्री गिरधर चतुर्वेदी, अलीगढ़)
सुन्दर महिमा जीवन की जो अति पुनीत दिखलाती ।
माया पर उसे सदा ही निज पाश फैंक उलझाती॥
वैभव का लालच देकर भोले मन को तरसाती।
कितने हा दम दिखाकर हम जीवों को फुसलाती ॥
इस माया ने भरमाया तपसी ऋषियों मुनियों को ।
नर नारी नरपतियों को कवियों वीरों गुणियों को॥
कोई भी ऐसा है जो
माया में नहीं फंसा हो?
गिरिधर सौभाग्य उसी का
गिरिधर जिस हृदय बसा हो॥
ले. मास्टर सारस्वत, कविरत्न (बिसवाँ, सीतापुर)
अरे मन, दौड़ा जाता व्यर्थ मृग तृष्णिका में,
विश्व है, रे विश्व लोग तुझे बहकावेंगे।
छोड़ के पुनीत रीति माधव प्रतीत की हा।
भटका फिरेगा कोई राह न बतावेंगे।
चारों ओर चकित थकित हो भ्रमेगा हाय ।
दारा सुत बन्धु भी तो काम नहीं आयेंगे।
प्रेम से मना ले अपना ले नटनागर को,
वे ही दीन बन्धु तेरी बिगड़ी बनायेंगे।
स्प्रिचुअलिज्म इन इण्डिया (अंग्रेजी में) ले. श्री बी.डी.ऋषि, बी.ए.एल.एल.बी. प्राप्ति स्थान इण्डियन स्प्रिचुअलिज्म सोसाइटी, 51 गोर धनदास बिल्डिंग, गिरगाँव बम्बई मूल्य 2) कागज छपाई, जिल्द सभी सुन्दर ।
श्री बी.डी. ऋषि परलोक विद्या के प्रकाण्ड पंडित हैं। आपने इस तत्व की पर्याप्त खोज की और प्रेतों का साक्षात करने में सफलता प्राप्त की है। आपने इसी खोज के सम्बन्ध में विदेशों की यात्रा की है और अन्तर्राष्ट्रीय परलोक विद्या काँग्रेस में भारत के प्रतिनिधि की हैसियत से शामिल रहे हैं। यह पुस्तक आपके अनुभवों का सार है प्रेम तत्व के सिद्धान्त एवं उनके साँसारिक मनुष्यों के साथ होने वाले संपर्क के सम्बन्ध में इसमें बहुत कुछ बताया गया है। जिज्ञासुओं के काम की चीज है।
श्री बसन्त कृष्णायन रचयिता श्रीयुत बसन्तराम जी महाराज प्रकाशक, श्री श्याम सनेही श्यामाशरण जी हैदराबार (सिन्धु) अठपेजी साइज के 1600 अनेक बहुरंगे चित्रों से सुसज्जित कागज छपाई बढ़िया कपड़े की जिल्द ।
पुस्तक के लेखक सिंध प्रान्त के एक उच्च कोटि के साधक महात्मा थे। यह आपकी अमूल्य कृति है समस्त पुस्तक 9 द्वार में विभाजित हैं। श्री राधाकृष्ण गोलोक, श्री वृंदावन, गिरिराज, गोपिका, मधुपुरी ,द्वारावती, बल्देव, और विज्ञान द्वार हैं। भगवान श्री कृष्ण के ललित एवं लीलामय जीवन का सुन्दर, सरस, सुबोध, दोहा, चौपाइयों में एक अनुपम एवं जीता जागता चित्र विद्वान लेखक ने धार्मिक जगत को प्रदान किया है। आशा है भगवान कृष्ण के भक्त इस अमूल्य पुस्तक को श्री रामायण की भाँति ही शीघ्र अपनावेंगे।
अखण्ड ज्योति के ग्राहकों को पौने मूल्य में ही मिल सकेगा डाक व्यय पृथक। इसकी प्राप्ति के लिये सम्पादक, नाम माहात्मय, वृन्दावन, यू.पी. को लिखना चाहिये।
*समाप्त*