उठो, अपना गुण प्रकट करो!

दूसरों में बुराई ढूंढ़ने से तुम्हें क्या लाभ? दुनिया में बुराइयाँ ढूँढोगे तो कहीं एक इंच जगह भी ऐसी न मिलेगी जो सर्वथा निर्दोष हो। सूर्य और चन्द्रमा में धब्बे मौजूद हैं, समुद्र खारी है और पृथ्वी ऊबड़ खाबड़ पड़ी हुई है। इन सब के दोषों को गाते फिरो तो तुम्हें क्या मिलेगा? यदि तुम सत्य के शोधक बन कर बुराइयों को ढूंढ़ना चाहते हो, तो आओ। पहले अपना अन्तर ढूंढ़ डालो। दूसरों की शुद्धि करने से पहले अपने को निर्दोष बनालो। जब तुम्हारी अपनी बुराइयाँ दूर हो जावेंगी तो तुम देखोगे कि ईश्वर की पवित्र सृष्टि में बुराई का एक कण भी मौजूद नहीं है।

जिन्हें तुम अप्रिय समझते हो उनकी रचना तुम्हारी परीक्षा करने के लिये की गई है। कसौटी और हथौड़े इसलिये हैं कि सोने की जाँच कर उसकी प्रामाणिकता पर मोहर लगायें। परीक्षा के लिये जलाई गई अग्नि से डरी मत, उसे गालियाँ मत दो और न बुरा बताओ, क्योंकि यह तुम्हारे लिए ही उत्पन्न हुई है। यदि तुम भले हो तो उठो, बुराइयों को हटा कर वहाँ अपना गुण प्रकट कर दो। छोटा दीपक अन्धकार को गालियाँ नहीं देता वरन् वह खुद जलता है और अपने क्षेत्र में प्रकाश फैला कर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करता है।

क्यों? क्या तुम्हें यह मार्ग पसन्द नहीं आता?

भाग 2 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक 8


प्रभु से


प्रभु से

(श्री ‘बिकल’ कविरत्न)

देखा ही नहीं है कभी, कैसा तेरा रूप−रंग,

जो कुछ सुना है वैसा, चित्र खींच लूँगा मैं।

विकल विभूति भल, जग में तलाश करूं,

मिल जाय उर से लगाय भींच लूँगा मैं॥

आशा की सुबेल कभी, जीतेजी न सूखने दूँ,

नयनों से नीर नित, बहा सींच लूँगा मैं।

देखना निकल कहाँ, जायगा तू चितचोर,

आँख में बसा है जब, आँख मींच लूँगा मैं॥

(2)

हो गया निराश आश, रही न किसी की अब,

भूल कर भी न जग, और मैं निहारुंगा।

आओ हृदयेश बैठ जाओ हृदयासन पे,

अश्रुविंदुओं से पद-पड़ा मैं पखारुंगा॥

पत्र पुष्प भी तो नहीं, पूजन के रहे नाथ,

भव्य भावनाओं की सुमाल गल डारुंगा।

पत्र पुष्प भी तो नहीं, पूजन के रहे नाथ,

भव्य भावनाओं की सुमाल गल डारुंगा।

निश दिन जलती जो, बिकल वियोग ज्वाल,

उससे तुम्हारी देव, आरती उतारुंगा॥


आओ, गंगा में जौ बोवें

मनुष्य केवल आहार निद्रा और मैथुन के लिये ही जीवित नहीं है। यदि धन और भोगों की ही आवश्यकता उसके लिए पर्याप्त होती तो वह बहुत नीची श्रेणी का प्राणी कहलाता। जिन महान प्रयत्नों और ईश्वर की महती अनुकम्पा के कारण यह सुर-दुर्लभ मनुष्य शरीर प्राप्त हुआ है उनका तात्विक कारण यह है कि वह अपने उत्कर्ष के लिए इस अलभ्य अवसर का अच्छे से अच्छा उपयोग करके अपना भावी पथ निर्माण करे।

जीवन एक यात्रा है। हम एक महान लक्ष की ओर बढ़ने के लिए जीवन धारण करते हैं और उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए बहुत वर्षों तक जीते हैं। कुछेक जीवों को छोड़ कर सृष्टि के शेष समस्त प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य को इसलिए ईश्वर अधिक समय तक जीने देता है कि वह अपनी उन्नति के लिए इतने दिनों में पर्याप्त प्रयत्न कर लें। किन्तु हाय! हम कितने अभागे हैं जो कुच काँचन जैसे साधारण साधनों में ही पूरी तरह उलझ जाते हैं इस बात को बिलकुल ही भुला देते हैं कि हम कौन हैं। और किस कारण इस जीवन को कितनी कठिनाइयों के साथ प्राप्त करके उस को धारण किये हुए हैं।

भवसागर के अज्ञानाँधकार में मनुष्य बिलकुल ही अपने मार्ग को पहचानने में असमर्थ न हो जाय इसलिए प्रभु ने उसे एक दीपक देकर भेजा है जिसका नाम है ज्ञान! विवेक की सहायता से मनुष्य यदि जरा देखना चाहे तो उसे दिखाई पड़ता है कि उसका मार्ग क्या है और उसे क्या करना चाहिए। संसार के महापुरुष चिल्ला-चिल्ला कर हमें सचेत करते हैं कि मनुष्यों, अन्धकार की ओर नहीं प्रकाश की ओर चलो “तमसो मा ज्योतिर्गमय” अज्ञान में मत भटको, ज्ञान का आश्रय पकड़ो। इसी से तुम्हारा कल्याण होगा। जब मन के ऊपर कुविचारों और माया-मोह का पर्दा पड़ा होता है तब भी विवेक बुद्धि भीतर पुकार कर कहती है ‘आत्मन्! तेरा यह क्षणिक जीवन नष्ट हुआ ही चाहता है, जो कुछ करना हो जल्दी कर लो, फिर अवसर हाथ न आवेगा। यदि पेट ही भरना था तो अन्य योनियाँ भी प्राप्त थीं, प्रभु की महान अनुकम्पा से प्राप्त हुए इस जीवन को यों ही नष्ट मत होने दो, कुछ करो, अन्यथा मृत्यु मुख फाड़े सामने ही खड़ी है, न जाने दूसरा दिन आवे या नहीं।” अन्दर ही अन्दर यह आवाज हर मनुष्य के उठती है किन्तु कितने हैं जो उस आवाज को साफ कानों से सुनते हैं या सुन कर उस पर ध्यान देते हैं?

कई मनुष्य अपने भविष्य का चिन्तन भी करते हैं और उसके लिए जैसे-तैसे थोड़ा प्रयत्न भी करते हैं परन्तु अपने कर्तव्य को ठीक चुनने में गड़बड़ा जाते हैं और चक्करदार रास्तों में उलझ कर अपने बीज को ऐसी पथरीली भूमि पर बोते हैं जहाँ वास्तविक फल प्राप्त नहीं होता। तत्वज्ञानी योगी इस बात की खोज करते रहते हैं कि मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य क्या है। अपनी अनेक शंकाओं और असंख्य तर्कों के साथ इस देश के तत्वदर्शियों और जीवन मुक्त महात्माओं ने अनेक अनुसंधानों के पश्चात् यही निश्चित कर पाया है कि मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य आत्मकल्याण करना है। आत्मकल्याण का मार्ग यह है कि बुरे विचार और कर्मों को त्यागता हुआ हृदय को पवित्र बनावे इस पवित्र हृदय में ही परमात्मा का दर्शन होता है। जैसे-जैसे अपनी आत्मा निर्दोष होती जाती है वैसे ही वैसे उसमें भगवान के दिव्य स्वरूप की झाँकी स्पष्ट रूप से होती जाती है। कोई मनुष्य बुरे विचारों को धारण किये हुए आत्मोन्नति करना चाहे तो यह असंभव है। यह तो हुई आत्मसाधना की बात।

आत्मसाधना के अतिरिक्त शरीर, धर्म और बच रहता है। यह विभाजन हम समझने की सरलता की दृष्टि से कर रहे हैं, अन्यथा शारीरिक कर्मों और आत्म-साधना के दो भाग नहीं किये जा सकते। जैसे भोजन से रक्त और रक्त से वीर्य बनता है, वैसे ही शारीरिक कर्मों से विचार और विचारों से आध्यात्मिक स्थिति उत्पन्न होती है। यदि कोई यों भी कहना चाहे कि शुभ कर्मों से आत्म कल्याण होता है, तो भी एक ही बात है। मन और विचारों का पवित्र करना ही केन्द्र बिन्दु है, इसी में सफलता प्राप्त करने से मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकता है। यही ताली है। शास्त्र कहता है मन एवं मनुष्याणाँ कारण बन्धमोक्षयोः।

शरीर से हमें ऐसे शुभ कर्म करने में सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिये जिनसे हृदय और विचारों में पवित्रता उत्पन्न हो। ऐसे कार्यों में ‘देना’ सर्वश्रेष्ठ है। इससे उत्तम कर्म विधान आज तक किसी ने खोज नहीं निकाला। यह प्रत्यक्ष देखिए कि अपनी वस्तु किसी को दे देने पर हम हलके हो जाते हैं, और यदि दूसरों से लें तो लद जाते हैं-भारी हो जाते हैं। निखिल विश्व में वही कर्म पुण्य की श्रेणी में रखे गये हैं, जिनमें लेना कम और देना अधिक होता है। उपनिषद् की कथा है कि जब देव दानव मनुष्य, अपने लिए श्रेष्ठ कर्म पूछने ब्रह्मा के पास गये तो ब्रह्मा ने उन्हें ‘द’ शब्द का उपदेश किया। सचमुच ‘देना’ प्रभु की सर्वश्रेष्ठ पूजा है। उनकी सृष्टि को यदि हम निरंतर वह सब देते रहें जो हमारे पास है, तो निश्चय ही हम मनुष्य जीवन को सफल बनाने योग्य कर्तव्य करते हैं।

क्या दें? जो निर्धन है, वे कहते हैं हमारे पास देने को क्या है? जिनके पास धन है, वे उसे अपनी शेखी शान के कामों में खर्च करके दान का संतोष कर लेते हैं। यथार्थ में देने योग्य सब से उत्तम वस्तु है “ज्ञान”। मनुष्यों को इसी वस्तु की आवश्यकता है। ज्ञान के अभाव में ही सारा संसार नारकीय यातनाओं में झुलस रहा है। संपत्ति और बुद्धि इस युग में मनुष्यों के खून की कमाई है पर इससे लाभ कुछ नहीं हुआ जितने जितने दाँत पैने हुए उतनी ही उतनी काट खाने की शक्ति बढ़ गई। आज एक देश दूसरे देश को, एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को काट खाने के लिए दौड़ रहा है। इस लिये संपत्ति और बुद्धि का दान करने से काम न चलेगा। सदावर्त खोल देना अच्छा है, पर दूसरे ही दिन वह मनुष्य मल मार्ग से उसे निकाल कर फिर वैसा ही भूखा बन जावेगा। प्याऊ खोल देने से पानी की प्यास केवल कुछ घंटे के लिए बुझेगी। इन दोनों का हम विरोध नहीं कर रहे हैं, यह भी कर्तव्य हैं परन्तु अति उत्तम दान “ज्ञान दान” है। इसके लिए धनी या निर्धन का अन्तर कुछ बाधा नहीं डालता यदि हम दूसरों को सद्विचार बतावें, उनके जीवन का वास्तविक तत्व सिखलायें, कुछ काँचन की निस्सारता उनके सामने खोल कर रखें और समझावें कि प्रेम एवं सेवा ही जीवन का सार है तो इससे संसार का बड़ा उपकार हो सकता है। निरन्तर प्रयत्न करने पर यदि कोई किसी दूसरे एक भी मनुष्य का जीवन सुधार दे तो समझना चाहिए कि उसने एक बेल बो दी जिसके मीठे फल और बीज फिर इधर-उधर फैलेंगे। संसार में सद्ज्ञान का प्रसार हुए बिना कलह, पाप, दुराचार, हत्या, चोरी, अशान्ति आदि का अन्त नहीं हो सकता चाहे कितने ही भौतिक प्रयत्न किये जाए। जब तक मनुष्य के मन में शैतान बैठा रहेगा तब तक अन्य प्रकार के दान उसका कुछ भी भला न कर सकेंगे। इसलिए कोई विवेकशील महानुभाव यदि ऐसा दान करते हैं, जिससे संसार की सच्ची सेवा हो, दूसरों का सच्चा उपकार हो, और उसके बदले में उसे सच्ची आत्म शान्ति मिले तो अब तक के समस्त तत्वज्ञों के इस वचन को हम उद्घोषित करते हैं- “ज्ञान दान दीजिये ! संसार में सद्ज्ञान का प्रचार कीजिये।” इस दान का इतना फल तो निश्चय है कि इसका जन्म मनुष्य योनि में और किसी विद्वान परिवार में ही होता है, क्योंकि ज्ञान के दान का फल ज्ञान ही है। और यह फल मनुष्य योनि के अतिरिक्त अन्य कोई ज्ञान योनि नहीं है। इसलिये ज्ञान दान करने वाला कदापि नीच योनि में जन्म नहीं लेता।

सद्ज्ञान का प्रचार करने के लिए यह आवश्यक नहीं है, कि हर मनुष्य बड़ा भारी विद्वान, वक्ता या लेखक ही हो। संसार में अब तक अनेक महापुरुष हो चुके हैं, जिन्होंने युगयुगान्तरों की तपस्या से जो आत्मशक्ति प्राप्त की थी उनके फलस्वरूप उत्पन्न हुए ज्ञान को जनता के समक्ष रखा था इस ज्ञान को-उनके वचनों को उनकी पुस्तकों को, उनके मन्तव्यों को हम जन-साधारण में फैलाते रहकर एक श्रेष्ठ कर्तव्य करते रह सकते हैं। प्राचीन ऋषियों से लेकर अवतारों और महात्माओं ने जो उपदेश किये हैं, उनको भी हम जनता तक पहुँचाते रहें तो यह बीज कहीं न कहीं जमेगा ही। हिन्दू धर्म गंगा जी में जौ बोने का उपदेश करता है। क्योंकि वह जौ पानी की लहरों के सहारे कहीं न कहीं उपजेंगे ही और जहाँ उपजेंगे वहाँ किसी न किसी का भला होगा ही। उतावले लड़कों की तरह यह न देखना चाहिए कि कल जिसे उपदेश दिया गया था आज महात्मा बना या नहीं? विश्वास रखिये यदि आपने सच्चे हृदय से सन्देश पहुँचाया है, तो उन महात्माओं की दिव्य वाणी मनुष्य के हृदय में संस्कार जमावेगा ही और उसका कभी न कभी फल मिलेगा ही। अपने विचारों एवं वचनों से अथवा महापुरुषों की दिव्य वाणियों द्वारा संसार में ज्ञान मार्ग का प्रचार करना यह एक ऐसा कर्म है, जो विचारों को पवित्र करता है, दूसरा जन्म विद्वान परिवार में प्रदान करता है, आत्म कल्याण का मार्ग खोलता है, और एक दिन प्रभु के साक्षात दर्शन करा देता है। यह सरल और सत्य धर्म इस युग की आवश्यकता को देखते हुए बहुत उत्तम कहा जा सकता है।


पौरुष का गौरव

यह नहीं कहा गया है कि विधाता नादान दुर्बलों को अपनी गोद में खिलाता है। वह हमें बुद्धि देता है, जिसका अर्थ है कि हम अपने ही ऊपर निर्भर रहें। उसने हमें यह आदेश दिया है कि हम रोते हुए जाकर उसका दरवाजा न खटखटायें। उसने अपने आपको हमारे क्षेत्र से अलग रखा है और वह निरन्तर चिंताशील माता के समान बार-बार प्रकट नहीं होता। इसके लिये उसे मैं वंदन करता हूँ। मुझे पूरी-पूरी जिम्मेवारी का अधिकार बख्श कर उसने मेरे पौरुष को सम्मानित किया है। वह कायरों को अपने हाथ का सहारा देकर नहीं चलाता, किन्तु उन्हें मृत्यु के अनुभव में से भी अकेले चलाने को मजबूर करता है ताकि वे निर्भयता से जी सकें।

माडर्न रिव्यू,

जनवरी 1940 ई. कवीन्द्र रवीन्द्र


धर्म का स्वरूप

(महामना पं. मदन मोहन मालवीय)

दूसरे के प्रति हमको वह काम नहीं करना चाहिये जिसको यदि दूसरा हमारे प्रति करे तो हमको बुरा मालूम हो या दुःख हो। संक्षेप में यही धर्म है, इसके अतिरिक्त दूसरे सब धर्म किसी बात की कामना से किये जाते हैं।

अहिंसा, सत्य, असत्य, धर्म जिनका सब समय में पालन करना सब प्राणियों के लिये विहित है और जिनके उल्लंघन करने से आदमी नीचे गिरता है, इन्हीं सिद्धान्तों पर स्थित हैं। इन्हीं सिद्धान्तों पर वेदों में गृहस्थों के लिये पक्ष महायज्ञ का विधान किया गया है कि जो भूल से भी किसी निर्दोष जीव की हिंसा हो जाय तो हम उसका प्रायश्चित करें। जो हिंसक जीव हैं, जो हमारा या किसी दूसरे निर्दोष प्राणी का प्राणघात करना चाहते हैं या उनका धन हरना या धर्म बिगाड़ना चाहते हैं, जो हम पर या हमारे देश पर, हमारे गाँव पर आक्रमण करते हैं या जो आग लगाते हैं या किसी को विष देते हैं-ऐसे लोग आततायी कहे जाते हैं। अपने या अपने किसी भाई या बहिन के प्राण, धन, धर्म, मान की रक्षा के लिये ऐसे आततायी पुरुषों या जीवों का आवश्यकता के अनुसार आत्मरक्षा के सिद्धान्त पर वध करना धर्म है। निरपराधी अहिंसक जीवों की हिंसा करना अधर्म है।

इसी सिद्धान्त पर वेद के समय से हिन्दू लोग सारी सृष्टि के निर्दोष जीवों के साथ सहानुभूति करते आये हैं। गौ को हिन्दू लोकमाता कहते हैं, क्योंकि वह मनुष्य-जाति को दूध पिलाती है और सब प्रकार से उनका उपकार करती है। इसलिये उसकी रक्षा करना तो मनुष्यमात्र का विशेष कर्तव्य है किन्तु किसी भी निर्दोष या निरपराध प्राणी को मारना, किसी का धन या प्राण हरना, किसी के साथ अत्याचार करना, किसी को झूठ से ठगना, ऊपर लिखे धर्म के परम सिद्धान्त के अनुसार अकार्य अर्थात् न करने की बाते हैं और अपने समान सुख-दुःख का अनुभव करने वाले जीवधारियों की सेवा करना, उनका उपकार करना, यह त्रिकाल में सार्वलौकिक सत्य धर्म है। मेरी यह प्रार्थना है कि ब्रह्मज्योति की सहायता से सब धर्मशील जन अपने ज्ञान को विशुद्ध और अविचल कर और अपने उत्साह को नूतन और प्रबल कर सारे संसार में इस धर्म के सिद्धान्तों का प्रचार करें और समस्त जगत को यह विश्वास करा दें कि सब का ईश्वर एक ही है और वह अंश रूप से न केवल सब मनुष्यों में किन्तु समस्त जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उदिभज अर्थात् मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष और विटप सब में समान रूप से अवस्थित है और उसकी सब से उत्तम पूजा यही है कि हम प्राणीमात्र में ईश्वर का भाव देखें, सब से मित्रता का भाव रक्खें और सब का हित चाहें। सर्वजनीन प्रेम से इस सत्य ज्ञान के प्रचार से ईश्वरीय शक्ति का संगठन और विस्तार करें। जगत से अज्ञान को दूर करें, अन्याय और अत्याचार को रोकें और सत्य, न्याय और दया का प्रचार कर मनुष्यों में परस्पर प्रीति, सुख और शान्ति बढ़ावें।

विश्वास करो-कि अधर्मी जीवन बिना मतलब का होता है। बिना सिद्धान्त का जीवन बिना पतवार के जहाज के समान है। जैसे कि यह जहाज इतस्ततः फिरता रहेगा। ठीक स्थान पर नहीं पहुँच पाता । ऐसे ही अधर्मी जीवन भी संसार में मारा-मारा फिर कर अपने उद्दिष्ट स्थान पर नहीं पहुँचता है।

कथा-


‘ब्रह्म तेजो बलं बलम्’

विश्वामित्र तब तक एक क्षत्रिय राजा थे। उनका प्रचंड प्रताप दूर-दूर तक प्रख्यात था। शत्रुओं की हिम्मत उनके सम्मुख पड़ने की न होती थी। दुष्ट उनके दर्प से थर-थर काँपा करते थे। बल में उनके समान दूसरा उस समय न था।

एक दिन राजा विश्वामित्र शिकार खेलते-खेलते वशिष्ठ मुनि के आश्रम में जा पहुँचे। मुनि ने राजा का समुचित आतिथ्य-सत्कार किया और अपने आश्रम की सारी व्यवस्था उन्हें दिखाई। राजा ने नन्दिनी नामक उस गौ को भी देखा, जिसकी प्रशंसा दूर-दूर देशों में हो रही थी। यह गौ प्रचुर मात्रा में और अमृत के समान गुण दूध तो देती ही थी, साथ ही उसमें और भी दिव्य गुण थे, जिस स्थान पर वह रहती, वहाँ देवता निवास करते और किसी बात का घाटा न रहता। सुन्दरता में अद्वितीय ही थी।

राजा विश्वामित्र का मन इस गौ को लेने के लिए ललचाने लगा। उन्होंने अपनी इच्छा मुनि के सामने प्रकट की, पर उन्होंने मना कर दिया। राजा ने बहुत समझाया और बहुत से धन का लालच दिया पर वशिष्ठ उस गौ को देने के लिए किसी प्रकार तैयार न हुए। इस पर विश्वामित्र को बड़ा क्रोध आया। मेरी एक छोटी सी बात भी यह ब्राह्मण नहीं मानता। यह मेरी शक्ति को नहीं जानता और मेरा तिरस्कार करता है। इन्हीं विचारों से अहंकार और क्रोध उबल आया। रोष में उनके नेत्र लाल हो गये। उन्होंने सिपाहियों को बुलाकर आज्ञा दी कि ‘जबरदस्ती इस गौ को खोल कर ले चलो’ नौकर आज्ञा पालन करने लगे। वशिष्ठ साधारण व्यक्ति न थे। उन्होंने कुटी से बाहर निकल कर निर्भयता की दृष्टि से सब की ओर देखा। ‘अकारण मेरी गौ लेने का साहस किसमें है, वह जरा आगे तो आवे। यद्यपि उनके पास अस्त्र-शस्त्र न थे, अहिंसक थे, तो भी उनका आत्मतेज प्रस्फुटित हो रहा था। सत्य पर आरुढ़ और ईश्वर का दृढ़ विश्वासी पुरुष इतना आत्म तेज रखता है कि उसके सामने बड़े-बड़ों को झुकना पड़ता है। घर के मालिक एक बच्चे के खाँस देने मात्र से बलवान चोर के पाँव उखड़ जाते हैं। विश्वामित्र और उनके सिपाहियों की हिम्मतें पस्त हो गईं। उन्हें लगा कि उनका सारा बल पराक्रम बिदा हो गया है।

विश्वामित्र विचार करने लगे। भौतिक वस्तुओं का बल मिथ्या है। तन, धन की शक्ति बहुत ही तुच्छ, अस्थिर और नश्वर है। सच्चा बल तो आत्मबल है। आत्मबल से आध्यात्मिक और पारलौकिक उन्नति तो होती ही है, साथ ही लौकिक शक्ति भी प्राप्त होती है। मैं इतना पराक्रमी राजा-जिसके दर्प को बड़े-बड़े शूर सामन्त सहन नहीं कर सकते। इस ब्राह्मण के सम्मुख हतप्रभ होकर बैठा हूँ और मुझ से कुछ भी बन नहीं पड़ रहा है। निश्चय ही तन बल, धनबल की अपेक्षा आत्मबल अनेकों गुनी शक्ति रखता है।

उन्होंने निश्चय कर लिया कि भविष्य में वे सब ओर से मुँह मोड़ कर आत्मसाधना करेंगे और ब्रह्म तेज को प्राप्त करेंगे। ब्रह्म तेज पर वे इतने मुग्ध हुए कि अनायास ही उनके मुँह से निकल पड़ा कि-’धिग् बलं, क्षत्रिय बलं, ब्रह्म तेजो बलं बलम्’ क्षत्रिय बल तुच्छ है, बल तो ब्रह्म तेज ही है।

विश्वामित्र ने घोर तपस्या की और समयानुसार ब्रह्म तेज को प्राप्त कर लिया।

आजकल हमारा आधार आनन्द मंगल है। इससे प्रतीत होता है कि हम लोग निर्बल होकर कायरता में गिर रहे हैं।

कथा-


पापों का अन्त क्यों नहीं होता?

एक जिज्ञासु किसी तत्वज्ञानी पुरुष से पूछ रहा था कि-महाराज! संसार से पापों का अन्त क्यों नहीं होता? अब तक इतने महात्मा, साधु, अवतार, हो चुके हैं सबने इस दुनिया को भला बनाने का प्रयत्न किया, पर किसी के प्रयत्न का कुछ भी फल नहीं हुआ, संसार जैसे का तैसा पापपूर्ण अब भी बना हुआ है। इसमें सदा ही बुराइयों की भरमार है।

तत्व ज्ञानी ने जिज्ञासु को एक कथा सुनाई, उसने कहा-एक बार एक मनुष्य बहुत बुरी दशा में निर्वाह कर रहा था। उससे सुना कि यदि किसी के वश में भूत हो जाय तो उसे मनचाही चीजें बात की बात में लाकर दे सकता है। उसने सोचा कि किसी प्रकार भूत को वश में कर पाऊँ तो मेरे सब अभाव मिट जायेंगे। अब वह भूत को वश में करने की क्रिया मालूम करने के लिये जगह-जगह घूमने लगा।

एक दिन उसे दैवयोग से किसी ऐसे महानुभाव से भेंट हो गई जो भूत को वश में करने की विद्या जानते थे। उस गरीब आदमी के बहुत अनुनय-विनय करने पर वह विधि उसने उसे बता दी? उसी प्रकार उसने अनुष्ठान किया और मरघट को जगा कर एक भूत को वश में कर लिया। जब वह वश में आ गया तो भूत ने प्रकट होकर कहा-महानुभाव, अब मैं आप के वश में हूँ, मुझसे जो चाहें काम लीजिये, लेकिन मैं ठाली न बैठूँगा, जब ठाली रहूँगा तो आप पर ही पिल पढूंगा। गरीब आदमी ने कहा कि अच्छी बात है, बेकार न रहने दूँगा, मेरे पास बहुत काम हैं। जाइये, मेरे लिये एक महल बनाइये। भूत ने चन्द मिनटों में ही महल बना दिया। फिर उसने काम माँगा, तो उसने कहा-इस महल में बहुत सा धन, खजाना, सजावट का सामान, नौकर चाकर आदि सब चीजें लाकर दो। भूत ने पाँच मिनट के अन्दर राजमहलों की तरह सब चीजों से उसे सजा दिया और फिर काम माँगने के लिये सामने आ खड़ा हुआ। उसकी उतनी कार्य-शक्ति देख कर मालिक बहुत घबराया और अपनी जान बचाने के लिये उन्हीं तान्त्रिक महानुभाव के पास भागा, जिन्होंने उसे भूत वश में करना सिखाया था। मालिक आगे-आगे भूत पीछे-पीछे। दोनों दौड़ते-दौड़ते उन्हीं सज्जन के यहाँ पहुँचे। उस गरीब आदमी ने सारा किस्सा कह सुनाया और उससे बचने का उपाय पूछा।

तान्त्रिक महोदय बुद्धिमान थे, उन्होंने भूत को एक कटी हुई कुत्ते की पूँछ दिलाई और कहा इसे सीधी कर के रख दे। भूत उस पूछ को हाथों से पकड़ कर सीधी कर देता, किंतु जैसे ही उसे रखता कि वह फिर वैसी ही टेढ़ी हो जाती, भूत फिर सीधी करके रखता वह फिर टेढ़ी हो जाती, इस प्रकार पूँछ का बार-बार टेढ़ा होना गरीब आदमी के लिये-भूत से छुटकारा पाने का एक अच्छा उपाय मिल गया।

तत्व ज्ञानी महोदय ने इस कथा के आधार पर जिज्ञासु को समझाया कि संसार की बुराइयाँ, प्राणियों को अपने बचाव के लिये अच्छा मार्ग है। जिस प्रकार पत्थर का नाल उठाने का अभ्यास करने से अनेक मनुष्य पहलवान बन जाते हैं, किंतु मूर्ख लोग उससे ठोकरें खाते और पछताते हैं। संसार एक प्रकार की व्यायाम शाला है, इसमें तरह-तरह की बुराइयों के मुद्गर, नाल आदि पड़े हुए हैं। इनको उठाने के अभ्यास में अनेक लोग उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त कर जाते हैं, किंतु वह मुद्गर और पत्थर ज्यों के त्यों पड़े रहते हैं। मन एक प्रकार का भूत है, इसे टेढ़ी होने वाली पूँछ को सीधी करने में और बुराइयाँ दूर करने में लगाया जाय तो उसी में उलझा रहता है और आत्मा का अनिष्ट नहीं कर पाता। इसीलिये परमात्मा में आत्मोद्धार का अभ्यास करने के लिये संसार में बुराइयाँ छोड़ रखी हैं और उनका अन्त नहीं होता।

कथा-


गुप्त साधना

एक मनुष्य ने सुन रखा था कि आध्यात्मिक जगत में कुछ ऐसे गुप्त मंत्र हैं जो यदि किसी को सिद्ध हो जावें तो उसे बहुत सिद्धियाँ मिल सकती हैं। मन्त्रों की अद्भुत शक्तियों के बारे में उसने बहुत कुछ सुन रक्खा था और बहुत कुछ देखा था इसलिए उसे बड़ी प्रबल उत्कंठा थी कि किसी प्रकार कोई मन्त्र सिद्ध कर लें, तो आराम से जिन्दगी बीते और गुणवान तथा यशस्वी बन जावें।

गुप्त मन्त्र की दीक्षा लेने के विचार से गुरुओं को तलाश करता हुआ, वह दूर-दूर मारा फिरने लगा। एक दिन एक सुयोग्य गुरु का उसे पता चला और वह उनके पास जा पहुँचा। वह महानुभाव दीक्षा देने के लिये तैयार न होते थे। पर जब उस मनुष्य ने बहुत प्रार्थना की और चरणों पर गिरा तो उन महानुभाव ने उसे शिष्य बना लिया। कुछ दिन के उपरान्त उसे गुप्त मंत्र बताने की तिथि नियत की गई। उस दिन उसे गायत्री मंत्र की दीक्षा दे दी और आदेश कर दिया कि इस मंत्र को गुप्त रखना, यह अलभ्य मंत्र औरों को मालूम नहीं है, तू इसका निष्ठापूर्वक जप कर ले तो बहुत सी सिद्धियाँ प्राप्त हो जावेंगी।

शिष्य उस मंत्र का जप करने लगा। एक दिन वह नदी किनारे गया तो देखा कि कुछ लोग गायत्री मंत्र को जोर-जोर से उच्चारण करके गा रहे थे। शिष्य को सन्देह हुआ कि इसे तो और लोग भी जानते हैं, इसमें गुप्त बात क्या है। इसी सोच विचार में वह आगे नगर में गया तो दिखा कि कितनी ही दीवारों पर गायत्री मंत्र लिखा हुआ है। वह और आगे चला तो एक पुस्तक विक्रेता की दुकान पर गायत्री सम्बन्धी कई पुस्तकें देखीं, जिनमें वह मंत्र छपा हुआ था। अब उसका सन्देह दृढ़ होने लगा। वह सोचने लगा यह तो मामूली मंत्र है और सब पर प्रकट है। गुरुजी ने मुझे योंही बहका दिया है। भला इससे क्या लाभ हो सकता है?

इन सन्देहों के साथ वह गुरुजी के पास पहुँचा और क्रोध पूर्वक उनसे कहने लगा कि आप ने व्यर्थ ही मुझे उलझा रखा है और एक मामूली मंत्र को गुप्त एवं रहस्यपूर्ण बताया है।

गुरु जी बड़े उदार और क्षमाशील थे। उतावले शिष्य को क्रोधपूर्वक वैसी ही उतावली का उत्तर देने की अपेक्षा उसे समझा कर सन्तोष करा देना ही उचित समझा। उन्होंने उस समय उससे कुछ न कहा और चुप हो गये। दूसरे दिन उन्होंने उस शिष्य को बुलाकर एक हीरा दिया और कहा इसे क्रमशः कुँजड़े, पंसारी, सुनार, महाजन और जौहरी के पास ले जाओ और वे जो इसका मूल्य बतावें उसे आकर मुझे बताओ। शिष्य गुरु जी की आज्ञानुसार चल दिया। पहले वह कुँजड़े के पास पहुँचा और उसे दिखाते हुए कहा इस वस्तु का क्या मूल्य दे सकते हो? कुँजड़े ने उसे देखा और कहा-काँच की गोली है, पड़ी रहेगी, बच्चे खेलते रहेंगे, इसके बदले में पाव भर साग ले जाओ। इसके बाद वह उसे पंसारी के यहाँ ले गया। पंसारी ने देखा काँच चमकदार है, तोलने के लिए बाँट अच्छा रहेगा। उसने कहा भाई, इसके बदले में एक सेर नमक ले सकते हो। शिष्य फिर आगे बढ़ा और एक सुनार के पास पहुँचा। सुनार ने देखा कोई अच्छा पत्थर है। जेवरों में नग लगाने के लिए अच्छा रहेगा। उसने कहा-इसकी कीमत 50 दे सकता हूँ। इसके बाद वह महाजन के पास पहुँचा। महाजन पहचान गया कि यह हीरा है पर यह न समझ सका किस जाति का है, तब भी उसने अपनी बुद्धि के अनुसार उसका मूल्य एक हजार रुपया लगा दिया। अन्त में शिष्य जब जौहरी के पास पहुँचा तो उसने दस हजार रुपया दाम लगाया। इन सब के उत्तरों को लेकर वह गुरु जी के पास पहुँचा और जिसने जो कीमत लगाई थी वह उन्हें कह सुनाई।

गुरु ने कहा-यही तुम्हारी संदेहों का उत्तर है। एक वस्तु को देखा तो सब ने, पर मूल्य अपनी बुद्धि के अनुसार आँका। मंत्र साधारण मालूम पड़ता है और उसे सब कोई जानते हैं, पर उसका असली मूल्य जान लेना सब के लिए संभव नहीं है। जो उसके गुप्त तत्व को जान लेता है, वही अपनी श्रद्धा के अनुसार लाभ उठा लेता है।

यथार्थ में मंत्रानुष्ठान और आध्यात्मिक क्रियाओं को स्थूल दृष्टि से देखा जाये, तो वे वैसी ही मामूली और तुच्छ प्रतीत होती हैं जैसी कि कुँजड़े को वह काँच की गोली प्रतीत हुई थी, किन्तु श्रद्धा और निष्ठा के द्वारा जिसने अपना मन जौहरी बना लिया है, उसके लिये वह साधनाएं बड़ा महत्व रखती हैं और इच्छानुसार फल भी देती है। सारा महत्व श्रद्धा और विश्वास में है। विश्वास के साथ की गई एक छोटी सी क्रिया भी विचित्र फल दिखाती है, किन्तु अविश्वास और अश्रद्धा के साथ किया हुआ अश्वमेध भी निष्फल है। यही गुप्त साधनाओं का रहस्य है।


ईश्वर का अस्तित्व

(महात्मा गाँधी)

जो आदमी स्वयं ही ईश्वर की उपस्थिति की परीक्षा करना चाहे वह जीवंत श्रद्धा से उसका अनुभव कर सकता है और चूँकि श्रद्धा और विश्वास बाहरी प्रमाणों से सिद्ध नहीं किया जा सकता, इसलिये, सब से सुरक्षित मार्ग है संसार के नैतिक शासन में विश्वास रखना और इसलिये नैतिक नियम-सत्य और प्रेम के नियम की सर्वोपरिता में श्रद्धा रखनी। जहाँ पर सत्य और प्रेम के विरुद्ध हर एक वस्तु को तुरंत ही इन्कार कर देता हो, वहाँ पर श्रद्धा या विश्वास का सहारा ही सबसे अधिक सुरक्षित है। मगर ईश्वर के अविश्वास की दलीलों का जवाब नहीं दिया जा सकता। मैं कबूल करता हूँ कि उन्हें इन पंक्तियों से विश्वास नहीं दिला सकता। श्रद्धा बुद्धि से परे है। मैं उन्हें इतनी ही सलाह दे सकता हूँ कि आप असंभव काम करने की कोशिश मत कीजिये। युक्तियों के जरिये मैं दुनिया में बुराइयों के अस्तित्व का कारण नहीं समझ सकता। यह करने की चाहना करना तो ईश्वर की ही बराबरी करनी है। इसलिये मैं बुराई को बुराई मान लेने की नम्रता रखता हूँ और ठीक इसीलिये मैं ईश्वर को बहुत ही सहनशील और धैर्यशाली कहता हूँ कि वह संसार में बुराइयों को भी रहने देता है। मैं जानता हूँ कि उसमें कुछ बुराई नहीं है, और तो भी अगर बुराई होवे तो वह उसका सृष्टा है, मगर तो भी उससे अछूता रहता है। मैं यह भी जानता हूँ कि अगर मैं ठेठ मौत तक का खतरा झेल कर भी बुराइयों के विरुद्ध युद्ध नहीं करूंगा तो मैं परमात्मा को कभी नहीं जान सकूँगा। मेरी श्रद्धा का कवच तो मेरा अपना ही मर्यादित और नम्र अनुभव है। मैं जितना ही शुद्ध विकार-रहित बनने का प्रयत्न करता हूँ मुझे परमात्मा उतना ही निकट जान पड़ता है। आज तो मेरी श्रद्धा महज़ नाम की ही है मगर जिस दिन वह हिमालय पहाड़ के समान अटल हो जायगी, हिमालय की चोटियों पर के बर्फ के समान ही चमकीली और शुभ्र हो जायगी, उस दिन मुझमें और कितनी शक्ति होगी? तब तक मैं तर्क करने वालों को यही कहूँगा कि आप भी न्यू मैन के समान परमात्मा का भजन कीजिये, जिससे अपने अनुभव से गाया था किः-

चारों ओर फैले हुये अन्धकार में,

हे प्रेमल ज्योति मुझे रास्ता बता, मुझे रास्ता बता।


महान कार्यों का रहस्य

(श्री स्वेड मार्टन)

थामस ऐडीसन से किसी ने पूछा-”महाशय आपने इतने आविष्कार किये हैं क्या आप रात-दिन इन्हीं के लिये लगे रहते हैं? ऐडीसन ने कहा-मेरे सब आविष्कार लगातार प्रयत्न करने के फल मात्र हैं। जो काम मुझे करना होता है उसके पीछे जी जान से पड़ जाता हूँ।” धीरे-धीरे चलने वाला घोड़ा, घुड़दौड़ की कोतल से ज्यादा लम्बा सफ़र कर लेता है।

बाइबल का एक मंत्र है-”जो आपत्तियों का मुकाबला करता है उसके लिये मैं अपने तख्त पर जगह देता हूँ। जीवन संग्राम की सफलता, मित्रों की सहायता अथवा सुनहले अवसर की अपेक्षा निरन्तर प्रयत्न करने पर अधिक निर्भर रहती है। सडनी स्मिथ कहता है-”महापुरुषों का जीवन अत्यंत अविरल परिश्रम वाला होता है, उनकी जिन्दगी का पहला आधा भाग बड़े परिश्रम और कष्टों के बीच होकर गुजरता है।” जिस समय संसार ऐश आराम में मस्त होता है तब वे कठोर परिश्रम में जुटे होते हैं।

एक चीनी विद्यार्थी जब बराबर फेल होता रहा तो उसे बड़ी निराशा हुई और उसने पुस्तकों का बस्ता उठा कर एक कोने में पटक दिया। एक दिन उसने देखा कि एक वृद्धा स्त्री सुई बनाने के लिये एक लोहे के टुकड़े को पत्थर पर घिस रही थी, उसका धैर्य देख कर विद्यार्थी ने अपना नवीन निश्चय किया और चीन के तीन प्रसिद्ध विद्वानों में उसकी गिनती हुई। कालिदास की कथा सब जानते हैं। विवाह होने के बाद जवानी में उन्होंने पढ़ना आरम्भ किया और संस्कृत के प्रतिभाशाली विद्वान हो गये। एक मंद बुद्धि विद्यार्थी अपनी असफलताओं पर ऊब कर कहीं चले जाने की सोचने लगा। वह एक कुँए के पास जा निकला और देखा कि रस्सी की रगड़ से पत्थर घिस गया है। उसने सोचा कि जब रस्सी से पत्थर घिस सकता है तो क्या उद्योग से मेरी मंद बुद्धि नहीं घिस सकती। उसने उत्साहपूर्वक अध्ययन आरम्भ किया और अंततः एक बड़ा विद्वान कहलाया।

शेरीडन ने जब पार्लिआमेंट में पहला भाषण दिया तो लोगों ने उसका मजाक उड़ाया। एक सज्जन ने तो यहाँ तक कह दिया कि महोदय! यह कार्य आपकी सामर्थ्य से बाहर है। शेरीडन कुछ देर चुप रहे फिर उन्होंने कटाक्ष करने वाले से कहा-आप शीघ्र देखेंगे कि यह कार्य मेरी सामर्थ्य के भीतर है। कुछ दिनों में ही उन्होंने भाषण देने की अद्भुत योग्यता प्राप्त कर ली। उनकी एक वक्तृता को सुन कर विद्वान फाक्स ने कहा-ऐसा भाषण आज तक इस हाउस आफ कामन्स में नहीं हुआ। कारलाईन कहता है- ‘हर एक अच्छा काम पहले असम्भव प्रतीत होता है।’ जैरमी कोलयर का कहना है कि-’विश्वास के साथ आगे बढ़ते रहने से कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं।’ महाशय टरनर ने अपनी सफलताओं का रहस्य बताते हुए कहा था-सफलता की कुँजी निरंतर कठिन परिश्रम करने की आदत डाल लेना है। केनाल्ड कहते हैं-’यदि तुम सफल बनना चाहते हो तो आवश्यक है कि अपने ध्येय में तन्मय हो जाओ, सारी शक्तियाँ उसमें लगा दो और सोते समय तक में उसी का विचार करो।’

उचित धैर्य और निरंतर अध्यवसाय से बड़े-बड़े कठिन काम पूरे होते हैं। विपरीत परिस्थितियों का विरोध करने से नवीन शक्ति उत्पन्न होती है। एक बाधा को दूर करने पर उससे बड़ी दूसरी बाधाओं को हटा देने की योग्यता प्राप्त हो जाती है। इतिहासकार गिविन बीस वर्ष तक एक पुस्तक को लिखने में लगा रहा तब कहीं उसे पूरी कर सका। अंग्रेजी का एक बड़ा कोष तैयार करने में वेब्स्टर 26 वर्ष तक जुटा रहा। जार्जबेंक्राफ्ट ने प्राचीन राष्ट्रों के वंश परम्परा पर एक ग्रन्थ लिखा था। वह लिखता, परंतु लिखने के बाद वह अधूरा मालूम पड़ता। इस प्रकार उसने पन्द्रह बार उस पुस्तक को लिखा तब कहीं वह पूरी हुई। इस कार्य में उसे 26 वर्ष लगाने पड़े। टिटन ने अपनी एक पुस्तक सात वर्ष में तैयार की। रेलगाड़ी बनाने वाला स्टीफनसन ने रेलगाड़ी की अपूर्णताओं को दूर करने में पन्द्रह साल लगाये तब कहीं वह कुछ काम लायक हुई। भाप से चलने वाले इंजन को रोज बनाने-बिगाड़ने में वाट ने अपने वर्ष लगा कर थोड़ी सी सफलता पाई थी। कोलम्बस ने अमेरिका को तलाश करने में अपने को मृत्यु के मुख में ही डाल दिया था।

एक विद्वान कहता है-असफलता का कारण यह है कि लोग बार-बार अपने इरादों को बदलते हैं अपने निर्धारित लक्ष में दिलचस्पी कम कर देते हैं। वुलकर का मत है-विजेता का साहस धैर्य है। इस गुण में ऐसी दैवी शक्ति है कि दुर्भाग्य को सौभाग्य में पलट सकता है। वर्क ने कहा है-कभी निराश मत होओ, यदि कभी निराशा का सामना करना पड़े तो भी अपना काम बंद मत करो।

कथा-


सत्संग

(श्री आनन्दकुार चतुर्वेदी ‘कुमार’ छिवरामऊ)

किसी जंगल में एक साधु ने दो तोते पाल रक्खे थे, जिन को नित्य वेद मंत्रों का उच्चारण करना सिखाते थे। थोड़े ही समय में दोनों तोते भली-भाँति उन मंत्रों को पढ़ने लगे और नित्य प्रातः काल साधु जी की भाँति उठ कर भजन इत्यादि करते थे।

एक दिन उस मार्ग से एक कसाई निकला इन तोतों के विषय में पहले से ही वह सब बातें सुन चुका था, चाहा कि इन तोतों में से एक भी उसे मिल जाय तो क्या ही अच्छा हो। निदान इसी हेतु वह साधु जी की कुटी पर गया और हाथ जोड़ कर विनती की कि महाराज, एक बात कहना चाहता हूँ, यदि आज्ञा हो तो निवेदन करूं, साधु जी ने कहा कि कहो क्या कहना है?

कसाई ने तब कहा कि महाराज ये तोते हमको बहुत प्रिय मालूम होते हैं, इसलिये इन में से कृपा करके एक मुझको दे दीजिये। साधु जी ने उत्तर दिया कि मैंने इनको बड़े लाड़ से पाला था, परन्तु तेरी इच्छा अधिक देख कर मैं तुझको एक दे रहा हूँ। एक बात का ध्यान रखना कि इसको कोई कष्ट न हो।”

कुछ समय पश्चात उस देश के राजा ने सारे प्राँत में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो साधु सत्संग का अर्थ बतलायेगा जेल जाना होगा, परन्तु उत्तर प्रत्येक साधु को देना जरूरी है। अब राजा प्रत्येक साधु की खोज कराता और अपना प्रश्न करता, परन्तु सभी असफल रहने के कारण कैद कर लिये जाते।

कुछ दिन पश्चात राजा के सिपाही दैवयोग उस साधु के आश्रम में पहुँचे और सत्संग के अर्थ पूछे साधु ने नम्रतापूर्वक कहा कि मैं इस प्रश्न का उत्तर कल दूँगा। परन्तु सिपाहियों ने आग्रह तथा विनती से उनको राज दरबार चलने को कहा, साधु ने तब अपना तोता उन सिपाहियों को दिया और बोले कि इस तोते को राजा साहब को देना और मेरा एक तोता जो इसका भाई है, अमुक कसाई के यहाँ से माँग लेना। राजा साहब इन दोनों को अपने ही पास रक्खें और रात में एकान्त में इनकी बातें सुनें मैं कल 10 बजे राज दरबार में पहुँचूँगा। निदान ऐसा ही किया गया।

राजा साहब ने अपने पास शयनागार में दोनों तोतों को टाँग लिया और उनकी बातों को सुनने की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करने लगा। रात भर कोई तोता नहीं बोला, परन्तु प्रातः 4 बजते ही साधु का तोता जागा और सदैव की भाँति यथाविधि मंत्रों का उच्चारण करने लगा। राजा जी यह देख कर अत्यन्त प्रसन्न हुए और मन ही मन उसकी प्रशंसा करने लगे। आठ बजे पर साधु वाला तोता मौन रहा, परन्तु कसाई वाले तोते ने बोलना शुरू किया कि नौकर जल्दी जाओ, स्टेशनों से खाल की पार्सल ले आओ, यह बकरा लाओ, उसे मारो, गोश्त इतने आना सेर इत्यादि। राजा इसके वाक्यों को सुन कर अत्यन्त क्रोधित हुये और नौकरों को आज्ञा दी इसको मार डाला जाय, परन्तु इतने में ही साधु वाला तोता बोला कि-हे राजन् इसमें इसका कोई दोष नहीं है, यह सारा परिणाम इसकी संगति का है।

पहले मैं और यह जब साथ-साथ रहते थे तो मेरे ही समान यह वेद मंत्रों का उच्चारण करता था, परन्तु जब से यह कसाई के यहाँ गया तभी से इस की यह आदत पड़ गई है, क्योंकि कसाई के यहाँ सिवाय मारो काटो के दूसरी बात नहीं, और साधु जी का सत्संग होने के कारण मुझमें उनकी बातों तथा आदतों का प्रभाव पड़ा है। मनुष्य जीवन का सत्संग से पर्याप्त सम्बन्ध है, जैसी मनुष्य की संगति होगी, वैसा ही उसका भविष्य भी बन जावेगा। सत्संग की महिमा तथा उदाहरण तो बहुत से हैं, परन्तु नीचे के दो उदाहरण पाठकों के लाभार्थ दिये जाते हैं, यदि एक मनुष्य कितने ही स्वच्छ वस्त्र क्यों न पहने यदि वह किसी लोहार की दुकान पर जायगा तो उसके वस्त्र कुछ न कुछ काले अवश्य पड़ जायेंगे इसी प्रकार गुलाब के वृक्ष के फूलों की सुगन्धि स्वतः आ ही जाती है। स्वामी एकारसानन्द जी ने सच कहा है कि पुस्तक अध्ययन करना वैसा ही है, जैसे पानी के ऊपर जमी हुई काई, परन्तु सत्संग का अध्ययन करना गंगा जी के निर्मल तथा पवित्र जल के समान है।


Quotation

लोगों की निन्दा स्तुति की तुम्हें जितनी ही अधिक चिंता होगी उतना ही तुम अपनी आत्मा का चिंतन कम करोगे।

जन्म कोलाहल करता आता है, मृत्यु दबे पावों आती है।


धर्म से ही उद्धार होगा

(योगी अरविन्द घोष)

धर्म द्वारा ही भारत की भावी सन्तान गौरव प्राप्त करेगी योग ही धर्म प्रीति की मुख्य प्रणाली है। योग सिद्ध व्यक्ति की शक्ति अपने को गुणान्वित करके आत्म परिधि विस्तृत करेगी। योग सिद्ध व्यक्ति का व्यक्तिगत स्वातन्त्रय समष्टि बोध को तोड़ मरोड़ डालेगा। बहुत से बाजों के स्वरों के मिलने से जिस प्रकार एक तान की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार बहुत से व्यक्तियों की ऐक्य स्थापना में सुसामंजस्य पूर्ण नवीन राज्य तैयार होगा। वह राज्य किसी और का नहीं होगा। बल्कि आत्मा की ऐक्य मूर्ति का देवसमाज का होगा।

आत्मा को बिना जाने या बिना पाये, जो नवीन समाज गठन का स्वपन् देखा जा रहा है। वह सफल नहीं होगा। आत्मा को लेकर ही मानव जीवन है। जीवन के आडम्बर के भीतर सत्य वस्तु प्रच्छन्न हो गई है। ज्ञान का विकास होने पर ही आत्म-लाभ होगा इसके लिए शिक्षा की आवश्यकता है। यह शिक्षा योग के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। योग के पथ में अग्रसर होने पर जो समृद्धि और सम्पत्ति उद्भूत होगी उसका बाहरी साम्राज्य है। अपने को पा जाने और जान लेने से स्वराज्य प्राप्त होता है। स्वराज्य प्राप्त होने के बाद ही साम्राज्य की रचना होती है।

बुद्धि मानव जीवन का श्रेष्ठ तत्व है। इसी बुद्धि द्वारा देह राज्य पैदा होता और उसका काम चलता है। बुद्धि ने अपने स्वर्ण पात्र द्वारा जो करोड़ों सूर्य के समान अन्तरात्माओं को आवृत करके रखा है, उन्हें समेटना होगा-तभी ज्ञान-सूर्य की किरणों के प्रभाव से देह राज्य का नवीन रूप पैदा होगा।


गृहस्थ योगी

(ले. पं. भोजराज शुक्ल, ऐत्मादपुर, आगरा)

गृहस्थ, जिसने धर्म परायण होकर काम, क्रोध, लोभ और मोह को वश कर लिया है, सच्चा योगी है। गेरुआ वस्त्र धारण करने वाला लोक में मान, बड़ाई तथा मोह रखने वाला पुरुष, सच्चा योगी नहीं कहा जाता। क्योंकि गृहस्थ, अपने समस्त व्यवहारों को निरन्तर करता रहता है, यदि उसका चित्त क्षीण वासना वाला है, तो वह योगी ही है। संन्यासी का चित्त यदि समाधि स्थान में चंचल है, तो वह चंचलता ब्रह्म में सावधान उन्मत्त के नृत्य के तुल्य है। यदि कोई संन्यासी अपने शिष्यों तथा शिष्याओं से सेवा कराते हैं, तो धर्मिष्ठ गृहस्थ को अपने पुत्रों तथा पुत्र वधुओं से सेवा कराने में क्या हर्ज है? गृहस्थाश्रमी सब कर्मों की फलासक्ति का त्याग कर समय विभाग द्वारा अर्थ, धर्म, काम का अनुष्ठान करते हुए ब्रह्मपरायण होकर मोक्ष की प्राप्ति कर सकते हैं, तभी तो गृहस्थों के लिये पंच महायज्ञ का विधान बतलाया गया है। इन सबका त्याग करके मोक्ष के लिये साधना करना कष्ट साध्य है। किन्तु फल की कामना छोड़ के इन कर्मों को करते हुए अन्तःकरण की शुद्धि द्वारा निश्श्रेयस् प्राप्त करना चाहिये। देवऋण, पितृ ऋण और ऋषिऋण को चुका कर ही मनुष्य बन्धन-मुक्त हो सकता है। जो बिना ऋण चुकाये भाग निकलता है, वह अवश्य पकड़ा जाता है, उसे येन-केन प्रकारेण ऋण को चुकाना ही पड़ता है। एक जन्म में न सही, तो अनेक जन्मों में। तीनों ऋणों से मुक्त होने के पश्चात् जिस दिन वैराग्य हो उसी दिन संन्यास ले सकता है। बिना ज्ञान और वैराग्य के संन्यास लेना निषेध है। आज कल प्रायः ऐसे संन्यासी देखने में आते हैं, जो कि दमड़ी चमड़ी से लगे हुए हैं। भविष्य पुराण का वचन है।

मिष्टान्न कामै रल्पज्ञैर्लोलुपै र्वञ्चकैः कलौ।

ज्ञान वैराग्य ही नैस्तु, संन्यासोस्तं गमिष्यति॥

अर्थ-कलियुग में जिह्वा लोलुप, अल्पज्ञानी, लोभी, बञ्चक तथा ज्ञान, वैराग्य हीन पुरुषों के कारण संन्यास नष्ट हो जायगा। इसी कारण योगेश्वर श्री कृष्ण भगवान् कलियुग के आने से प्रथम ही अर्जुन को उपदेश कर गए हैं।

संन्यासः कर्म योगश्च, निश्श्रेयस् करावुभौ।

तयोस्तु कर्म संन्यासार्त्कम योगो विशिष्यते॥

अर्थ-यद्यपि संन्यास और कर्म योग समान निश्श्रेयस्कर हैं, तथापि मेरे विचार में संन्यास की अपेक्षा कर्म योग ही अधिक उत्तम है।

यज्ञ, दान, तप तथा कर्मों के अनुष्ठान से ही विद्वान पवित्र होते हैं, अतः इनको हेय न समझना चाहिये। फलेच्छा तथा आसक्ति को त्याग कर ही मनुष्य कर्मों को करे, इसी में उसका कल्याण है। अतएव कल्याणभिलाषी पुरुषों को चाहिये कि जैसे हो वैसे अपने हृदय से वासनाओं को दूर करें और कामासक्त पुरुषों की संगति से बचते रहें। कामी (आसुरी सम्पति) का पुरुष वही कहा जाता है, जो यह चाहता है कि पृथ्वी में जितना धन है, वह किसी प्रकार से मेरे ही पास आजाए, मैं सम्पूर्ण ऐश्वर्यों का भोगने वाला हो जाऊँ, मैं ही सब पर आज्ञा करने वाला होऊँ। मेरे पर आज्ञा करने वाला कोई न हो इत्यादि ऐसे विचार के पुरुषों से बचना चाहिए। दैवी सम्पत्ति के पुरुषों से प्रेम रख के इसी सम्पत्ति को सदैव धारण करें, वही गृहस्थ सच्चा योगी है।


मानवजन्म और योग तत्व

(ठाकुर बलवीर शाही रेणु टिंहरी)

मानव जन्म क्यों हुआ?- यह प्रश्न जीवन की सब से बड़ी और पहली पहेली है। इस में सन्देह नहीं कि इस पहेली के निराकरण करने के लिये जाने कब से सारे विश्व भर के विभिन्न देशों में अनेक महात्माओं का आविर्भाव होता आया है। जिसने इसके जितने अंश तक गवेषणा पूर्ण विचार विमर्श किया एवं जितनी इसकी अपरोक्तनुभूति प्राप्त की उसने उतनी ही सीमा तक उसे सत्य रूप से अभिव्यक्त किया है। अतएव इस नानात्व मय संसार में इसी हेतु नाना मत, वाद, संप्रदाय, एवं पन्थों का आविर्भाव हुआ है और होता आ रहा है। फलतः यह नहीं कहा जा सकता कि कौन पथ इस पहेली के पूर्ण रूप का साक्षात्कार करा देने में सक्षम है, और कौन नहीं! वस्तु अपरोक्षानुभूति ही इस विषय में सत्य की कसौटी है-यह निर्विवाद है।

सृष्टि में हम देखते हैं कि अनन्त सागर का अपरिमित जल सूर्य की प्रखर किरणों से प्रतप्त होकर वाष्प रूप में परिणत हो जाता है। वह वाष्प वायु से उन्नत हुआ आकाश मण्डल में स्थिर होकर ‘बादल’ संबा को प्राप्त होता है। फिर वही बादल शीतल समीर से सम्पृक्त हुआ जल कणों के रूप में परिणत होकर भूमण्डल में गिर जाता है। वे जल-कण गिरिशिखर से निर्झर रूप में, नद रूप में, पुनः नदी रूप में होते हुए अन्ततः अपने उसी मूल स्रोत सागर में जाकर निज रूप को प्राप्त हो जाते हैं। जल-बिन्दु का यह अनादि क्रम अनन्तकाल से निरवच्छिन्न रूप से चला आ रहा है।

तद्वत् पूर्ण एवं अनन्त वर्णनातीत समष्टि चैतन्य से व्यष्ठि रुप चैयन्य की सृष्टि हुई है। इसी व्यष्टि चैतन्य की जीव संज्ञा है। जिस प्रकार उसकी परम क्रिया महाशक्ति भी अनादि और अनंत है। यह समष्टि पूर्ण चैतन्य स्वरुपतः निष्क्रिय है, किंतु जड़ नहीं वह तो सत्ता रूप से, साक्षीरूप से, सर्व-काल में, सर्व देश में, पदार्थ मात्र में नित्य रूप से विराजमान है। क्रिया मात्र तो वही परम क्रिया करती रहती है। यही परम क्रिया महामाया जीव की जननी है। भगवान् श्री कृष्ण गीता में इस तत्व को यों समझाते हैंः-

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम।

हेतुनानेन कौन्तेय! ज्गद् विपरिवर्त्तते॥

इस चराचर सृष्टि को उत्पन्न करने वाली महामाया प्रकृति ही कारण है। मैं तो उसकी इस क्रिया में अध्यक्ष (साक्षी मात्र) हूँ। इसी कारण हे कौन्तेय ! यह संसार गतिशील है और प्रति क्षण विशेष-2 परिवर्तनों को प्राप्त होता रहता है।

सत्व, रजस और तमस-इन तीनों गुणों से संयुक्त होने के कारण ही प्रकृति को त्रिगुणात्मिका, त्रिधाम जननी आदि कहा गया है। इन तीनों के उपादानत्व से यावत चराचर की सृष्टि होती है। सत्व, रजस, तमस, महत्तत्व, अहंकार, बुद्धि, चित्त, मन, पंचतन्मात्रा, पंच प्राण, पंच भूत, पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रियादि की क्रमशः सृष्टि होती हुई समस्त ब्रह्माँड का सृजन होता है। पराशक्ति महामाया वासना रूप से बीजाँकुरन्यायेन जीव के लगी रह कर जन्म-मरण, सुख दुःखादि अनंत द्वंद्वात्मक संसार-चक्र में उसे घुमाती रहती है।

यह सब क्यों और किस लिए ऐसा होता है? यही प्रस्तुत विषय का विशिष्ट सूत्र है। जीव और जगत की जो इस प्रकार की बंधन-कारिणी सृष्टि है, वह त्रिगुणात्मिका महामाया का विशुद्ध व्यष्टि चैतन्य पुरुष विशेष के निमित्त एक खेल है। किंतु यह खेल तब तक पूर्ण नहीं, जब तक जीव इस बंधन से निर्मुक्त न हो और वह स्वरूप को न प्राप्त हो जाय। इस खेल का वास्तविक अभीष्ट ही यह है कि वह प्रकृति के आवरणों का अतिक्रमण करता हुआ स्वाधिष्ठान रूप परम चैतन्य में पूर्णरूपेण विलीन हो सके। वह अपने को पहिचान सके, अन्त में वह जो है उसमें समरस हो सके,-यही मानव-जन्म का मूल प्रयोजन है।


थोथा ब्रह्मज्ञान

एक वैद्य अपनी जीविका के लिए एक नगर में पहुँचा। वहाँ उसने अपना औषधालय स्थापित किया। सैकड़ों व्यक्ति दवा लेने आते और लाभ उठाते, किन्तु जब वैद्य जी दवा के दाम माँगते तो वे ब्रह्मज्ञान का उपदेश देने लगते। कहते हम सब ब्रह्म हैं। आप और हम एक ही हैं। औषधि भी ब्रह्म रूप है। फिर ब्रह्म को ब्रह्म से क्या लेना देना?

उस नगर में थोथे ब्रह्मज्ञान का शब्दाडम्बर लोगों ने खूब रट लिया था और बाहर के आदमियों को मूर्ख बनाने के लिए उन्होंने यह अच्छा बहाना ढूंढ़ रखा था। अपने मतलब में तो चौकस रहते, किन्तु जब किसी दूसरे को कुछ देने का अवसर आता, तो ब्रह्मज्ञान की बात बना कर छुटकारा पा जाते।

वैद्य जी इन ब्रह्मज्ञानियों के मारे बड़े चकराए जब दवा लेने आवें, तब ब्रह्मज्ञानी बन जावें। वैद्य जी इस व्यवहार से बड़े दुखी हुए और अपना औषधालय बन्द करके अपने देश वापिस चले जाने की बात सोचने लगे। वैद्यजी सोच विचार में बैठे ही थे कि उस नगर के राजा का एक दूत उन्हें लिवाने आया। वैद्यजी की प्रशंसा दूर-दूर तक फैल चुकी थी। राजा ने भी उनके सम्बन्ध में कुछ सुना था। राजकुमार की बीमारी अब अन्य वैद्यों से अच्छी न हुई, तो राजा ने इन परदेशी वैद्य को बुलवाया।

दूतों के साथ वैद्यजी राजा के यहाँ पहुँचे। और राजकुमार की बीमारी का इलाज करने लगे। धीरे-धीरे रोग अच्छा होने लगा। एक दिन राजा ने वैद्यजी से कहा-कोई ऐसी दवा बनाइये जिससे राजकुमार जल्दी अच्छा हो जाय।

वैद्य को यह अवसर बड़ा अच्छा जान पड़ा, उसकी समझ में आ गया कि यही मौका ब्रह्मज्ञानियों से बदला लेने का है। वैद्य ने कहा-राजन, आपके राजकुमार एक दिन में बिलकुल चंगे हो सकते हैं, इस प्रकार की मैं एक दवा जानता हूँ। पर उसके लिए एक कठिन वस्तु की आवश्यकता है, यदि आप उसे मंगा सकें, तो दवा बन सकती है। राजा ने उत्सुकतापूर्वक पूछा वह क्या वस्तु है? वैद्य ने कहा-’कुछ ब्रह्मज्ञानियों का तेल चाहिये। राजा ने प्रसन्नतापूर्वक कहा-यह क्या कठिन बात है। हमारी सारी प्रजा ब्रह्मज्ञानी है। अभी सौ दो सौ ब्रह्मज्ञानी पकड़ कर मांगता हूँ। राजा की आज्ञा पाते ही पुलिस के सिपाही ब्रह्मज्ञानियों को तलाश करने के लिये चल दिये।

नगर में यह खबर बिजली की तरह फैल गई थी कि राजकुमार के लिये ब्रह्मज्ञानियों के तेल की जरूरत है। इस समाचार से सब के कान खड़े हो गये। पुलिस के जत्थे बड़ी सरगर्मी के साथ खोजते फिर रहे थे कि ब्रह्मज्ञानी कौन है? परन्तु कुछ भी पता न चला, जिससे पूछते मना कर देता। बड़े बूढ़ों, मुखिया पंचों से पूछा गया, तो उन्होंने गिड़गिड़ा कर यही कहा-भगवान्! हमारे कुटुम्ब में सात पुश्त से कोई ब्रह्मज्ञानी नहीं हुआ। दूसरे मुहल्ले में तलाश कीजिये। दूसरे मुहल्ले वालों से पूछा गया, तो उत्तर मिला कि हम तो अन्न ज्ञानी हैं, ब्रह्मज्ञान का तो हमने कभी नाम भी नहीं सुना। जब सारे शहर में कोई ब्रह्मज्ञानी न मिला, तो वैद्य ने अपनी दुख गाथा राजा से कह सुनाई और बताया कि किस प्रकार लोगों ने उनके पैसे ब्रह्मज्ञान की आड़ में रख लिये हैं। वैद्य ने दूसरी दवा देकर राजकुमार को अच्छा कर दिया ओर राजा ने उन थोथे ब्रह्मज्ञानियों को बुला कर वैद्यजी के पैसे दिलवा दिये।

हम ऐसे लोगों की बहुतायत देखते हैं, जो अपने मतलब में कभी नहीं चूकते और बुरे-बुरे कर्म करते हैं। किन्तु जब भेद खुलता है तो या दण्ड मिलता है, तो कहने लगते हैं, भाग्य में ऐसा ही लिखा था, ऐसी होनी थी, होनहार को कौन मिटा सकता है। कलियुग का प्रभाव है, अच्छी बुद्धि को बुरी कर देता है, बुरे दिनों का चक्कर है, ईश्वर की ऐसी ही मर्जी है, इस प्रकार ब्रह्मज्ञान बघार कर अपने को निर्दोष साबित करना और दूसरों को मूर्ख बनाकर जीवन मुक्त परम् हंस का ज्ञान अपने ऊपर लागू करते हैं, जो ब्रह्म को सर्वत्र एक-एक समान देखने लगेगा, वह दूसरों के हित और लाभ को अपने लाभ से किसी प्रकार कम नहीं समझ सकता। वह पाप-पुण्य से बहुत ऊंचा उठ जाता है, किन्तु हम साधारण लोगों के लिये तो प्रेम और परोपकार यही ब्रह्मज्ञान है। स्वयं कष्ट सह कर दूसरों का भला करना, यही उत्तम वेदान्त है।


त्राटक की रीति और लाभ

(लेखक-योगीराज श्री उमेशवंद्र जी, संचालक श्री रामतीर्थ योगाश्रम, बम्बई-4)

विशाल विश्व की विलक्षण वाटिका में बढ़िया फूल भी हैं और नुकीले काँटे भी। मनुष्य को कर्म की पूरी स्वतंत्रता है, वह सुमनों का हार गूँथे या काँटों से शरीर बिंधवाये। सुमन की शौकीनी में काँटों का चुभ जाना स्वाभाविक है। इससे यदि डरकर, चीख कर भाग निकला तो उसके भाग्य में सुगंधित का रसास्वादन है ही नहीं। संसार में करने, बढ़ने और डटने वालों को ही कुछ मिलता है। आप में परमात्मा का अंश, आत्मा मौजूद है। चाहे आप उसे प्रभाकर की तरह प्रकाशित करें या मृत्तिका पिंड की भाँति निस्तेज !

योग विधान आपके सामने है। आप प्राचीन ऋषियों की इस पूँजी से लाभ उठावें, जिसे जीवन में उतार कर आज पश्चिम सम्पन्न बन रहा है।

योग शास्त्राँतर्गत छै (6) प्रकार के कर्म हैं। जिसका नाम नेति, धोति, नौलि, बस्ति, त्राटक और कपालभाति है। ब्रह्मदातण, कुँजल क्रिया आदि कर्म हैं। वह षट्कर्म के अर्न्तगत है। स्थूल शरीर में रोगोत्पादन करने वाला मल है। बात, पित्त और कफ की अधिकता और विकार ही रोगों का कारण है और उसके साथ सप्त धातुओं का विकार भी। स्थूल और सूक्ष्म ऐसे दो प्रकार के मल हैं। छोटी आँत, बड़ी आँत, अमाशय कोष, किडनी आदि अवयवों में स्थूल मल उत्पन्न होता है और ज्ञानेन्द्रियों के साथ संपर्क रखने वाली रक्त वाहिनी नाड़ियाँ तथा सारे शरीर में रहने वाली वायु वाहिनी नाड़ियों, स्वादुग्रन्थियों, रस ग्रन्थियों में सूक्ष्म मल उत्पन्न होता है। त्राटक कर्म और कपाल भांति कर्म, वे सूक्ष्म मल का नाश करते हैं।

त्राटक की बनावट।

एक फुट चौरस कागज का गत्ता (Card Board) लीजिये और उस पर सफेद कागज चिपका दीजिये। उसके बीच में आधा इंच गोल काला निशान कर दीजिये और उसके इर्द-गिर्द चारों ओर किरणों के समान रेखायें खींच लो। बनाने में नहीं समझो तो किसी योगाश्रम से त्राटक चार्ट खरीद लो। उसकी कीमत चार आना है। कम से कम 5 वर्ष तक चार्ट को उपयोग में ला सकते हैं।

त्राटक चार्ट ठीक आँख के सामने (अधिक ऊंचा व नीचा न हो) दीवाल पर टाँग दो और उससे तीन फीट दूर पद्यासन व स्वस्तिकासन लगाकर बैठ जाइये। उस काले निशान की तरफ देखना आरम्भ (शुरू) करो। प्रथम दिन एक मिनट तक बिना आँख बन्द किये एकटक देखते रहो। दूसरे दिन डेढ़ मिनट, तीसरे दिन दो मिनट तक। इस क्रम से आधा मिनट का अभ्यास नित्य बढ़ाते जाइये। जब चार मिनट तक बैठने लगो तब चार मिनट आँखें बन्द कर बैठ जाइये। जो कि कदावत् तीन मिनट के ही अभ्यास से त्राटक चार्ट के मध्य काले निशान और किरणें प्रकाशित हो जायगी यानी काली नहीं दीखेगी। बाद में आँख बन्द कर लेने पर दोनों भौओं (Eye-Brow) के बीच में दृष्टि स्थिर करो। जो प्रकाश त्राटक चार्ट में दीखता, वही अन्दर भी दीखेगा (दिव्य चक्षु में)।

अब यह प्रकाश त्राटक चार्ट का नहीं है, यह तो तुम्हारा है। कारण त्राटक चार्ट जड़ है इस में त्राटक कहाँ से आ सकता है। अब इसी प्रकार अभ्यास आगे बढ़ाते जाइये और तेरह दिन तक बिना नागा लगातार करने रहते के पश्चात् दूसरा कोर्स आरम्भ (शुरू) होगा।

बैठते समय सिर तक सारा शरीर दीख पड़े, ऐसा शीशा चाहिये। उसे अपने सामने रखकर बैठ जाओ और अपनी दोनों भौओं के मध्य (आज्ञा चक्र में आधा इंच का गोल काला निशान करो और काँच के प्रतिबिम्ब में देखना शुरू करो। पहिले दिन दो मिनट देखो और इसी तरह प्रति दिन एक मिनट बढ़ाते जाओ। आधे घण्टे तक बराबर बढ़ाते रहो।

जब तक कर्म चालू हो भारी भोजन मत खाओ। त्राटक करते समय आँखों को तानों या अधिक फाड़ो नहीं, मध्य स्थिति में रखो। जैसे किसी मनुष्य की तरफ देखते हो। हमेशा एक ही आसन से बैठो। कर्म करते समय आसन बदला-बदली नहीं करना चाहिये और विचार पवित्र रहना चाहिये। एक चित्त से अपने उपासना देव या ॐ का मन में उच्चारण करते रहना चाहिये।

यदि तन्दुरुस्ती चाहते हो तो वही इच्छा करनी चाहिये। इसके सिवाय दूसरे विचार नहीं आने पावे। उसका ध्यान रखना चाहिये। त्राटक कर्म के पश्चात् ठण्डे जल से आँखें धो डालिये।

लाभ

आधा घण्टा अभ्यास हो जाने पर त्राटक सिद्ध होता है। इससे चित्त प्रसन्न रहता है। अन्तर आलोकित होता है। मन स्थिर रहता है। मस्तिष्क शाँत रहता है। स्वास्थ्य और सौंदर्य में वृद्धि होती है। निद्रा अच्छी आती है। आँखों की ज्योति बढ़ती है। कमजोर निगाह वालों को त्राटक हरे पानादि के पत्ते पर करना अधिक लाभप्रद है। शरीर में सात्विक गुण बढ़ता है। रजो गुण और तमो गुण सामान्य रूप से रहता है। चश्मा का उपयोग करने वाले अवश्यमेव त्राटक कर्म करें। हिप्नोटिज्म, मेस्मेरिज्म आदि विद्या सीखने वाले को प्रथम त्राटक कर्म में पारंगत होना पड़ता है। स्मरण शक्ति बहुत बढ़ती है। अर्थात् हाई स्कूल, कालेज में पढ़ने वाले विद्यार्थी एवं विद्यार्थिनियों को त्राटक कर्म सीखना अत्यंत लाभप्रद है। त्राटक कर्म के लाभ से परीक्षा में अवश्यमेव उत्तीर्ण होवेंगे। 10 वर्ष उम्र से 200 वर्ष उम्र तक के स्त्री, पुरुष, रोगी, निरोगी एवं सर्व स्त्री पुरुष त्राटक कर्म को कर सकते हैं। त्राटक करने का उत्तम समय प्रातः काल सूर्य उदय होने के पश्चात् 9 बजे तक।


Quotation

यदि मनुष्य जीवन को उच्च विजयी बनाना चाहता है तो अपने ऊपर आने वाली आपदाओं, कठिनाइयों और अपमानों से जरा भी नहीं डरना चाहिये, न निराश ही होना चाहिये।

मृत्यु के बाद जीवित होने का मन्त्र सीखना चाहो तो वह मन्त्र ‘त्याग‘ है। बीज के मरने पर ही बाजरा पकता है। मृत्यु के समान कष्ट भोगकर माँ बच्चे को जीवित रखती है।


शाश्वत सुख की खोज

(महात्मा जेम्स ऐलन)

क्या आप उस नित्य सुख की तलाश में हैं, जिसका कभी नाश नहीं होता? क्या आप उस प्रसन्नता को ढूँढ़ रहे हैं जो स्थायी है और जिसके बाद दुख के दिन शेष नहीं रह जाते? क्या आप प्रेम, जीवन और शान्ति के स्रोतों के लिये लालायित हैं? अगर ऐसा है, तो आप तमाम बुरी तृष्णाओं और स्वार्थपूर्ण भावनाओं का परित्याग कर दीजिए क्या आप दुख के रास्तों में ठोकर खा रहे हैं? क्या आपका मार्ग कंटकाकीर्ण है? क्या आप उस विश्राम के स्थान की तलाश में हैं जहाँ क्रन्दन और रोदन बन्द हो जाता है? अगर ऐसा है, तो आपको अपने स्वार्थ का दमन करके हृदय को शीतलता देनी चाहिये।

ऐ श्रम से चूर हुए भाई ! आओ अपने समस्त संयंत्रों को छोड़ कर अनन्त अनुकम्पा के स्थायी केन्द्र परमात्मा की तलाश करो। सत्य के सरोवर को ढूंढ़ रहे हो, तो स्वार्थ की निर्जन मरु भूमि में भटकने से क्या लाभ? इस पापमय जीवन की गठरी को पीठ पर लाद कर सत्य की शोध के पथ पर भला कैसे चल सकोगे? इसलिये आओ ! वापस आओ। विश्राम करो और अपने पथ का आदि अन्त जान लो। अपना और अपनी प्रिय वस्तु का स्वरूप जान लो तब आगे बढ़ना।

तुम्हारा प्रभु न तो पर्वतों की कन्दराओं में कैद है ओर न किन्हीं नदी नालों में घुला हुआ है। जरा आँख खोल कर देखो, तुम्हारे आस-पास फैली हुई धूलि के कणों में भी मौजूद हैं। वायु के साथ मिल कर वह हर घड़ी तुम्हारे मस्तक पर हाथ फेरता रहता है।

ऐ थके हुए बन्धु! दर-दर भटकने की अपेक्षा उसकी दया को प्राप्त करो। स्वार्थ की मृग तृष्णा में भटकना छोड़ो, आओ! सत्य की शीतल सरिता में ध्यान करो और प्यास बुझाओ।


परमहंस रामकृष्ण के उपदेश

किसी राजा को अपने सेवक के यहाँ जाना होता है तो वह उसके यहाँ कुर्सियाँ, फर्श, गलीचे आदि सजावट की आवश्यक सामग्री भेज देता है, ताकि वह उसका स्वागत कर सके। इसी प्रकार परमात्मा दर्शन देने से पहले अपने भक्त के हृदय में प्रेम, पवित्रता और श्रद्धा उत्पन्न कर देता है।

जब तक समुद्र का पानी हिलता रहता है तब तक उसमें सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखाई नहीं पड़ता उसी प्रकार जब तक मन में वासनाओं की अस्थिरता है तब तक उसमें ईश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ सकता।

तुरन्त का पैदा हुआ बछड़ा पहले बार-बार फिसलता है और उठते ही गिर पड़ता है, उसी प्रकार धर्म मार्ग में कई बार असफलता होती है, परन्तु पीछे दृढ़ता आ जाती है।

एक छोटे पौधे के आस-पास बाढ़ खड़ी करके उसकी रक्षा करनी पड़ती है कि कहीं उसे पशु न चर जाय, किन्तु जब वह बड़ा हो जाता है, तो उसके नीचे अनेक पशु विश्राम करते रहते हैं। इसलिये आरम्भ में बुरी संगत से बचना चाहिये, किन्तु जब आत्मा महान् हो जावे तो दुर्जनों से कुछ हानि नहीं होती।

चुम्बक पत्थर वर्षों पानी में पड़ा रहे तो भी उसका अग्नि उत्पन्न करने का गुण नष्ट नहीं होता।

इसी प्रकार श्रेष्ठ पुरुष चाहे बुरे लोगों के बीच रहते रहें, पर उनके सद्गुणों में कमी नहीं आती।

एक मनुष्य को कुआँ खोदना था उसने एक जगह बीस हाथ खोदा वहाँ पानी न निकला तो दूसरी जगह खोदा, इसी तरह उसने बहुत सी जगह थोड़ा-थोड़ा खोदा पर कहीं पानी न निकला। एक विद्वान ने उससे कहा, मूर्ख! यदि एक ही स्थान पर इससे चौथाई भी मेहनत करता तो पानी निकल आता। चंचल मनुष्य धैर्य खोकर एक के बाद दूसरा काम टटोलते हैं पर यदि वे एक ही लक्ष पर स्थिर रहें तो सफल हो सकते हैं।


तप की महिमा अपार है।

(ऋषि तिरुवल्लुवर)

तप की महिमा अपार है। तपस्या से मनुष्य तेजस्वी होता है, बलवान् होता है, शत्रुओं को जीत सकने में समर्थ होता है, मनचाही इच्छाओं को पूर्ण कर सकता है, स्वस्थ रहता है, ऐश्वर्य प्राप्त करता है, सोने की तरह चमकता है, स्वर्ग प्राप्त करता है और अमर तक बन जाता है।

पर यह तप है क्या-सुनो! दूसरों की भलाई के लिये अपने सूखों की परवाह न करना यही तप है। तुम्हारे उपकारों के बदले में यदि कोई प्रशंसा न करे, कृतज्ञता प्रगट न करे तो भी कुछ परवाह मत करो, यहाँ तक कि भोजन वस्त्र में भी न्यूवता आवे और सर्दी-गर्मी से बचने का भी प्रबन्ध न हो तो इन सब कष्टों को खुशी-खुशी से सहन कर लो, यह मत सोचो कि दूसरे लोग थोड़े परिश्रम से बहुत सुख पाते हैं और तुम्हें बहुत करने पर भी कुछ सुख नहीं मिलता। सच समझो उन्हें कुछ नहीं मिलता है और तुम्हें बहुत मिलने वाला है। तप परीक्षा है, यदि तुम इसमें उत्तीर्ण हो, खरे तपस्वी सिद्ध होते हो, तो वह सब विभूतियाँ तुम्हें प्राप्त होंगी जो कि तपस्वियों को प्राप्त होती रहती हैं।

हमें दुनिया में भुखमरों की पलटनें दौड़ती दिखाई पड़ती हैं, यह लोग तप का महत्व भूल गये हैं और बीज बो कर फसल तक ठहरने पर विश्वास नहीं करते। प्रभु, इन्हें बीज देता है कि इसे बोओ और सींचो ताकि हजार गुना अन्न उपजे और तुम्हारे भंडार भर जावें, किन्तु इन्हें इतना धैर्य कहाँ? आज के बीज को यह आज ही कुटक लेते हैं और खाली हाथ हिलाते फिरते हैं। तपस्या से किस प्रकार इनका पूरा पड़ेगा? तपस्वी-बुद्धिमान् किसान है, वह कष्ट सह कर खेती करता है और फसल तक के लिये विश्वासपूर्वक ठहरता है। जब पौधे पकते हैं तो वह देखता है कि उसकी मेहनत अकारथ नहीं गई। जो बीज रेत में बखेर दिया गया था वह हजार गुना होकर लौट आया है।


दंभ मत करो

(महात्मा ईसा के उपदेश)

जब तुम दान करो तो नगाड़े मत बजवाओ। जैसे कि दंभी लोग जरा सा शुभ-कर्म करते हैं और उसका ढिंढोरा गली-गली में पिटवाते हैं ताकि लोग उनकी बड़ाई करें। मैं तुम से सच कहता हूँ कि वे अपना फल पा चुके। जब तुम दान करो तो जो तुम्हारा दाहिना हाथ करता है उसे बाँया हाथ न जानने पाये। तुम्हारे गुप्त दान को अदृश्य पिता जानता है और वह बदला देना न भूलेगा।

जब तुम प्रार्थना करो तो धूर्तों की तरह चौराहों पर और हाट बाजारों में प्रदर्शन मत करो। अपने विज्ञान के लिये जो भजन करते हैं वे अपना फल पा चुके। एकान्त स्थान में सच्चे हृदय से जब तुम प्रार्थना करोगे तो घट-घट वासी पिता उसे देखेगा और बदला देगा। प्रार्थना करते समय गला फाड़ कर चिल्लाओ मत और न बहुत बक-बक करो। वे और ही लोग हैं जो समझते हैं कि हमारे बहुत बकने पर ही परमात्मा सुनेगा। तुम्हारे माँगने से पहले ही प्रभु जानते हैं कि तुम्हें क्या चाहिये। तुम इस प्रकार प्रार्थना करना कि ‘हे पिता तेरी जय हो ! तेरे पवित्र नाम को दुनिया समझे, तेरी इच्छा पूर्ण हो। हमारे अपराध क्षमा कर। हमें परीक्षा में न डाल, पर बुराई से बचा।’

तुम व्रत रखो तो पाखण्डियों की तरह अपने मुँह पर उदासी मत आने दो। जब तुम उपवास करो तो चेहरे पर प्रसन्नता बनाये रहो ताकि लोगों को नहीं पर अपने अदृश्य पिता को उपवासी दिखाई दो, परम पिता जो गुप्त बातों को भी जानता है तुम्हें बदला देगा।

यदि तुम दूसरों के अपराध क्षमा करोगे तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराधों को क्षमा करेगा। पर यदि तुम दूसरों के अपराध क्षमा न करोगे तो परम पिता भी तुम्हारे अपराधों को क्षमा न करेगा। सावधान रहो ! प्रदर्शन और ढोंग के साथ धर्म कार्य न करो, नहीं तो कुछ फल न पाओगे।


कलियुग या सतयुग

(ले. श्री सत्य भक्त सम्पादक ‘सतयुग‘)

कुछ समय से हमारे देश में एक नया आन्दोलन सतयुग आगमन का आरम्भ हुआ है। विभिन्न स्थानों में ऐसे दल या व्यक्ति उत्पन्न हो रहे हैं, जो कहते हैं कि अब कलियुग का अन्त बिल्कुल पास आ गया है और थोड़े ही समय में सतयुग का आविर्भाव होगा। इनमें से कितने ही लोग यह भी मानते हैं कि यह सतयुग ता. 1 अगस्त 1983 को आरम्भ होगा।

कुछ लोगों का यह ख्याल है कि यह सतयुग आन्दोलन फ़जालिका के स्वामी राज नारायण जी ने शुरू किया है, पर यह ठीक नहीं। खोज करने पर पता लगा है, कि यह कम से कम साठ सत्तर वर्ष पुराना अवश्य है। उस समय श्री बाल मुकुन्दजी नाम के भक्त ने इसका दिल्ली में प्रचार किया था। बाल मुकुन्द जी की जीवनी हाल ही में खोज कर ‘सतयुग‘ (मासिक पत्र) में प्रकाशित की गई थी। उसमें मालूम होता है कि सन् 1880 के लगभग बालमुकुन्द जी प्रेमोन्मत्त होकर बन और जंगलों में कल्कि भगवान को ढूँढ़ते फिरते थे। उन्होंने कुछ साथियों को लेकर कल्कि मंडल की स्थापना की थी जो आज तक कल्कि अवतार और सतयुग आगमन का प्रचार कर रहा है। सन् 1910 के लगभग बंगाल में स्वामी दयानन्द नामक महापुरुष ने सतयुग आगमन का संदेश सुना था। आज भी बंगाल में उनके हजारों अनुयायी मौजूद हैं, जो कीर्तन द्वारा युग-परिवर्तन की चेष्टा कर रहे हैं। इसी समय के आस-पास हरिपुर योगाश्रम के योगिराज स्वामी दयानन्द जी ने अवतार और ‘सतयुग‘ का झंडा उठाया था और ‘कल्कि पत्रिका’ नाम की एक मासिक पत्रिका भी प्रकाशित की थी। इस समय तो संसार के सैकड़ों प्रसिद्ध व्यक्ति जिनमें हमारे देश के आध्यात्म ज्ञान के विख्यात ज्ञाता श्री अरविन्द घोष तक सम्मिलित हैं, शीघ्र ही युग परिवर्तन होने का समर्थन कर रहे हैं। उनके विचार जुलाई की ‘अखण्ड ज्योति’ में ही मौजूद हैं।

इन सब बातों को लिखने से मेरा तात्पर्य यही है कि आन्दोलन केवल बालकों का खिलवाड़ नहीं है, अच्छे-अच्छे विचारशील व्यक्ति इसके समर्थक और प्रचारक हैं। खेद है कि ‘सतयुग आगमन’ के खण्डन या मण्डन करने वाले लोग इन आत्मदर्शी विद्वानों की बातों पर गौर नहीं करते और मनुस्मृति अथवा भागवत के एकाध श्लोक के अर्थ को लेकर बेकार की खींचा तानी कर रहे हैं। मैं ‘सतयुग-आगमन’ के विषय में विचार करते समय कभी कुल्लूक भट्ट या मेघातिथि के फेर में नहीं पड़ा। मुझे तो समय के प्रत्यक्ष चिन्हों और साथ ही अनेक ज्ञानी पुरुषों के कथनों से यह विश्वास होता है कि अब मौजूदा जमाना बहुत जल्द बदलेगा जो नया जमाना आयेगा वह मौजूदा जमाने से श्रेष्ठ और जन साधारण के लिये कल्याणकारी होगा।

इसीलिये हम उसे ‘सतयुग के नाम से पुकारते हैं क्योंकि शास्त्रों में सतयुग का यही प्रधान लक्षण बतलाया है कि उसमें सत्य और न्याय की अधिकता होती है और लोग धर्माचरण करते हैं, जिसका फल कल्याणजनक होता है।

यही मेरी समझ के अनुसार सतयुग की व्याख्या है। आशा है पाठकों को इसमें कोई अस्वाभाविक या रहस्यपूर्ण बात न जान पड़ेगी। कलियुग की भावना ने हिन्दू जाति का बड़ा अहित किया है इसके कारण उनमें सैकड़ों दोष पैदा हो गये हैं और सब के लिये एक बहाना पैदा कर दिया गया है कि आज कल तो कलियुग है, अगर लोग पाप करते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या? इस दृष्टि से यह अधोगति का एक बहुत बड़ा कारण है। इस भावना को दूर करके सतयुग की भावना पैदा करना कौन सत्पुरुष न चाहेगा? रह गया कलियुग के समाप्त और सतयुग के आरम्भ होने का ठीक समय, वह कोई बड़े महत्व की बात नहीं है। कोई आश्चर्य नहीं जो सन् 1943 में वर्तमान समाज खण्ड-खण्ड होने लगे और नये युग की नींव पड़ जाय। उसकी वृद्धि और विकास धीरे-धीरे सौ पचास साल में होगी। यह भी सम्भव है कि अच्छा जमाना या सतयुग कुछ सौ या कुछ हजार वर्ष तक ही ठहरे और फिर समाज में दोष उत्पन्न होकर हालत बिगड़ने लगे। पर यह लम्बा किस्सा है, और आज यहीं तक लिखना काफी है।


परमार्थ में स्वार्थ

(श्री धर्मपाल जी बरला)

किसी महापुरुष का वचन हैः-

मनसा वाचा कर्मणा जो नर एक समान

तामें और भगवान में, किंचित भेद न जान

इस पद से हमें यह शिक्षा मिलती है, कि मनुष्य जैसा मन से सोचे वैसा ही वाणी से कहे और जैसा वाणी से कहे वैसा ही कार्य रूप में करके दिखावे-यही सत पुरुषों के कार्य करने का मार्ग है। उनके यह तीनों स्थान एकता और सत्य की डोरी से बंधे हुए होते हैं, तभी उनके हृदय मन्दिर में भगवान आ विराजते हैं, जिनकी शक्ति से हर कठिन से कठिन कार्य आनन फानन में उनके द्वारा होता दिखाई देता है, जिसे देखकर दूसरे व्यक्ति जिनके मन, वाणी और कार्य में एकता नहीं है आश्चर्य में भर दाँतों में अंगुली दबाते हैं। इसी गुर को काम में न लाकर मनुष्य पापों की दलदल में फंसते रहते हैं, और अपनी हर प्रकार की उन्नति में स्वयं बाधा पहुँचाते हैं। हम जो कुछ भी करते है, वह सर्वप्रथम मन से होता है।

उपरोक्त पद में भी मनसा (मन) शब्द कवि ने प्रथम इसी लिए रक्खा है। कार्य का प्रथम स्थान मन है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए तो मन का पवित्र करना अति आवश्यक कहा गया है? मन को पवित्र करने के लिए वेद में भगवान से अनेक प्रार्थना की गई है। मन से जैसा हम सोचते हैं, वास्तव में कार्य की वही आकृति है। पाप पुण्य का स्थान भी हमारा मन है। हानि, लाभ, सुख दुःख भोग वश प्राप्त होते हैं। ऐसा महात्मा तुलसी दासजी ने रामायण में कहा है। मनुष्य किसी का हानि लाभ नहीं कर सकता। यदि हम दूसरे को अपने मन से हानि पहुंचाना सोचते हैं, जो कि भोगवश उसको पहुँचना अवश्य थी, तो इस प्रकार मन से उसके लिये बुरा चाह कर हमने अकरण पाप मोल ले लिया, क्योंकि हानि तो हमारे बिना चाहे भी अवश्य उसे होती। इसी प्रकार यदि हम उन में से किसी की भलाई चाहते हैं और भलाई उसके भोगवश उसे मिलती है, तो हम अनायास ही पुण्य के भागी बन जाते हैं, इसलिये मन से सदा दूसरों का कल्याण ही सोचना श्रेष्ठ और हितकर है। दूसरों का हानि, लाभ विचारना अपना ही हानि लाभ विचारना है, जो दूसरों का लाभ सोच रहे हैं वह अपना लाभ ही कर रहे हैं। इसके द्वारा उनका मन शुद्ध पवित्र बन रहा है, मन शुद्ध होकर प्रभु के पवित्र प्रेम को प्राप्त करेगा, जो मुक्ति जैसे दुर्लभ सुख की प्राप्ति का हेतु होगा। अतएव मन से सदैव दूसरों का कल्याण सोचिये। होगा तो वही जो होना है, अकारण क्यों बात-बात में पापी बना जाय।


Quotation

तुमको सब से पहले आत्मज्ञान का ध्यान रखना जरूरी है। सुचरित्रों से आत्मज्ञान मिल सकता है। सुचरित्र मनुष्य वही होता है जो सत्य, दया, ब्रर्ह्मच परोपकारादि व्रतों का यथायोग्य पालन करता है। प्राणों के जाने के समय भी सत्य को नहीं छोड़ता है। स्वयं मरते हुए भी किसी को कष्ट नहीं पहुँचाता है।


संकल्पों का एकत्रीकरण

(श्री स्वामी विवेकानन्द जी महाराज)

जब समुद्र के किनारे कोई बड़ी लहर आकर टक्कर मारती है, तब उससे बड़ी भारी आवाज निकलती है, परन्तु वह लहर करोड़ों सूक्ष्म तरंगों के एकीकरण से उत्पन्न होती है और वह बड़ी भारी आवाज भी उन सूक्ष्म तरंगों की तरह छोटी-छोटी आवाजों के एकत्रीकरण का ही फल होती है। वे छोटी-छोटी आवाजें स्वतंत्र रूप से हमारे अनुभव में नहीं आतीं। इसी प्रकार हमारे हृदय की गति इत्यादि सब क्रियाएं कर्म ही हैं। यदि किसी मनुष्य का सच्चा चरित्र आपको जानना हो, तो उसके किये हुये किसी बड़े कार्य में आप उसकी ठीक-ठीक परीक्षा नहीं कर सकते। मौका आ जाने पर कोई अत्यन्त कृपण मनुष्य कर्म को भी लज्जित कर सकता है। यदि ऐसे ही किसी मौके से हम किसी के चरित्र का अनुमान करेंगे, तो प्रायः उसमें भूल होने की सम्भावना है। मनुष्य के प्रतिदिन के व्यवहार और उसकी छोटी-छोटी बातों का सूक्ष्म अवलोकन करने से ही उसके चरित्र का यथार्थ ज्ञान होगा। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में कुछ ऐसे मौके आते हैं कि वह उस समय लघुत्वं भूलकर कुछ महत्वार्थ कर जाता है।

किसी मनुष्य का दैनिक जीवन ध्यानपूर्वक और निकटस्थ होकर देखने से पता चल जाता है कि यह किस प्रकार के विचार करता है। विचारों की अत्यंत सूक्ष्म लहरें जब घनीभूत होकर दृश्यमान होती हैं, तो वह कार्य के रूप में दिखाई पड़ती हैं अपनी व्यापक इच्छा शक्ति से जिन्होंने संसार का स्वरूप ही बदल दिया, वे समर्थ पुरुष बड़े भारी कर्मशील थे। संपूर्ण संसार की उलट पलट देने वाली सामर्थ्य उन्होंने अनेक युगों तक सक्षम कर्म-विचार करके अपने में एकत्र की थी। भगवान् बुद्ध अथवा भगवान् ईसा मसीह ने जन्म जन्मान्तरों से अपने मन में शुभ संकल्पों का बीजारोपण किया था, उनके अन्तिम पराक्रम उन्हीं संकल्पों का एकत्रीकरण समझना चाहिए।


प्रकाण्ड पंडित कावेट

महापुरुष विलियम कावेट किस प्रकार गरीबी और कठिनाइयों का जीवन बिताते हुए भी प्रकाण्ड पंडित बने और अपने कष्टमय जीवन को समुन्नत बना सके। इसका वर्णन करते हुए वे स्वयं लिखते हैं -

मैंने आठ वर्ष हल जोता है। मेरा मन पढ़ने के लिये बहुत ही व्यग्र रहता था इसलिए एक दिन मैं अपने गाँव से भाग खड़ा हुआ और लंदन आया, बहुत दिनों तक कागजों की नकल करके पेट पालता रहा। जब मुझे छः पैसा प्रतिदिन मजूरी मिलती थी तो भी मैं व्याकरण सीखता रहा। आखिर मैंने सिपाहियों में नौकरी करली। यहाँ कुछ पढ़ने लिखने की सुविधा न थी तो भी परिस्थितियों को मैंने अपने अनुकूल बनाया। झोले से अलमारी का काम और लकड़ी के तख्ते को गोद में रख कर मेज का काम चलाता था। लालटेन जलाने के लिये तेल खरीदने को पैसे नहीं बच पाते थे इसलिये आग जला कर उसके प्रकाश से काम निकालता। कागज स्याही के लिये, आटे में से पैसे बचाने पड़ते थे, इसलिए कई बार आधे पेट खाकर सो जाता।

हर सिपाही को प्रति सप्ताह दो पैसे जेब खर्च के लिए मिलते थे। मैं इन पैसों को पढ़ने की चीजें खरीदने में खर्च करता। एक बार कल के भोजन के लिए एक पैसा बचाकर मैंने जेब में रख लिया था। दूसरे दिन भोजन के समय जब जेब में हाथ डाला तो देखा कि पैसा कहीं गिर गया है, और जेब खाली है। भूख के मारे मेरा दम निकल रहा था, पर करता क्या? बिछौने पर सिर रख कर बच्चों की तरह बेकली के आँसू बहाता रहा।

जब मैंने इतनी कठिनाइयों में विद्याध्ययन किया है, और इतनी विपरीत परिस्थितियों को पार करते हुए उन्नति कर सका हूँ तो मैं पूछता हूँ इस दुनिया में कौन लड़का ऐसा है या होगा जो काम न करने के लिए कोई बहाना तलाश करे।


महर्षि दधीचि का त्याग

(ले-श्री मन्शाराम विद्यार्थी, गवर्नमेंट हाईस्कूल, एटा)

त्वष्टा का पुत्र विश्वरूप देवताओं का पुरोहित और असुरों का भानजा था। वह प्रत्यक्ष रूप से तो देवताओं को भाग (यज्ञ भाग) देता और असुरों की छिपे-छिपे देता था।

तब हरणकशिपु को अगुआ बना कर असुरों ने विश्वरूप की माता-अपनी बहन से कहा-हे बहिन ! यह तुम्हारा पुत्र, त्यष्टासन् विश्वरूप त्रिशिरा जो कि देवताओं का पुरोहित है, देवताओं को तो प्रत्यक्ष रूप से भाग देता है और हमें छिपा कर। इसलिये देवता बढ़ते और हम नष्ट (दुबले) होते जाते हैं। तुम इसे रोको, जिससे यह हमारा साथ देवें।

असुरों की इच्छानुसार विश्वरूप से माता ने कहा-”हे पुत्र ! तू शत्रु पक्ष को बढ़ाता हुआ मातुल पक्ष का क्यों नाश करता है? तुझे यह करना उचित नहीं।” वह विश्वरूप ‘माता का वचन उल्लंघन करने योग्य नहीं’ यह समझ कर और उसे आदरपूर्वक ग्रहण करके हिरणकशिपु के पास गया। इधर ब्रह्म पुत्र वशिष्ठ ने हिरणकशिपु को शाप दिया हुआ था कि चूँकि तूने दूसरे को होता बना लिया अतएव यज्ञ पूर्ण बिना हुए ही तू अपूर्व प्राणी से मारा जायगा। उसके शाप देने से ही हिरणकशिपु वध को प्राप्त हुआ।

तब मातृ पक्ष को बढ़ाने वाला विश्वरूप घोर तप करने में लगा, उसका तप नष्ट करने के लिये इन्द्र ने बहुत सी रूपवती अप्सरा भेजीं। उन्हें देख कर उसका मन चंचल हो गया। तुरन्त ही वह उन अप्सराओं में फंस गया। उसको फंसा हुआ जान कर अप्सराओं ने कहा कि-हम अपने स्थान को जाती हैं।

त्वष्टा पुत्र विश्वरूप ने उनसे कहा-”कहाँ जाओगी ! यहाँ मेरे पास ही बैठो, तुम्हारा कल्याण होगा।” उन्होंने उससे कहा-’हम देवताओं की स्त्रियाँ अप्सराएं हैं, हम सब कामनापूर्ण करने वाले समर्थ इन्द्र को ही वरेंजीं। विश्वरूप ने उनसे कहा-” आज ही इन्द्र सहित सब देवता न रहेंगे, नष्ट हो जायेंगे।” तब उसने मंत्र का जाप किया। इन मंत्रों के प्रभाव से वह बढ़ा और उसके तीन सीर हो गये। उसने एक मुख से तो सब लोकों में अग्निहोवादि करने वाले ब्राह्मण द्वारा विधिपूर्वक आहुत सोम का पान किया, एक (दूसरे से) अन्न और (तीसरे से) देवताओं को भक्षण करना प्रारम्भ किया।

तब सोमपान से पुष्ट शरीर वाले उस विश्वरूप को बढ़ता हुआ देख कर इन्द्र देवताओं सहित चिंतन में पड़ गया। इन्द्र सहित देवता ब्रह्मा के पास पहुँचे। उन्होंने कहा-”विश्वरूप सब यज्ञों में हवन किया सोम पी जाता है, हमारा भाग ही न रहा इसलिये असुर बढ़ रहे हैं और हम क्षीण हो रहे हैं। आप अब हमारा कल्याण कीजिये।”

ब्रह्मा ने उनसे कहा-”भृगु पुत्र दधीचि ऋषि तप कर रहे हैं। जाकर उनसे वर माँगो। ऐसा करो जिससे वह अपना शरीर त्याग दें, तब उसकी हड्डियों से वज्र बनाओ।” तब देवता लोग भगवान दधीचि ऋषि जहाँ तप कर रहे थे, वहाँ पहुँचे। इंद्र सहित देवता उनके पास जाकर बोले।

दधीचि ने उनसे कहा-”आप लोगों का स्वागत है, कहिये क्या करूं? जो आप लोग कहेंगे, उसे मैं पूरा करूंगा।” उन्होंने उनसे कहा-”लोक के कल्याण के लिये आप अपना शरीर परित्याग कर दीजिये।”

तब सुख-दुख को समान समझने वाले महा-योगी दधीचि ने बिना किसी प्रकार का दुःख प्रकट किये आत्मा को समाधिस्त कर शरीर छोड़ दिया। शरीर से जीवन के निकल जाने पर ब्रह्मा ने वे हड्डियाँ ले वज्र बनाया। न टूटने वाले दुर्जेय ब्राह्मण की हड्डी से बने हुए विष्णु आविष्ट उस वज्र से इन्द्र ने विश्वरूप को मारा और उसके सर काट लिये। संसार पर आई हुई विपत्तियों का निवारण करने के लिये साधु पुरुष अपने शरीर का भी परित्याग कर देते हैं।


स्वरोदय

(श्री नारायणप्रसाद तिवारी उज्ज्वल, कान्हीबाड़ा)

“स्वर योग से दिव्य ज्ञान” पुस्तक का समाज ने जो आदर किया तथा अनेक सज्जनों ने पत्र भरा” मुझे उत्साहित किया, मैं उन सबका आभारी हूँ।

इसी विषय पर मैं कुछ और भी प्रकाश डालने का साहस करता हूँ। स्वरोदय विषय सरल अतीत होते हुए भी गहन है। उपर्युक्त प्रकाशित पुस्तक के बाद मैं इस विषय की इति-श्री नहीं समझता। मुझे कतिपय पाठकों ने यह कहा कि उसमें तत्व विषय बहुत कठिन है। मैं इसे स्वीकार करता हूँ, किन्तु अनुभव और अभ्यास से मनुष्य क्या नहीं कर सकता? हताश होना उचित नहीं। पाठकगण कृपया इस पत्र के मुख-पृष्ठ पर श्रीमान् सम्पादक जी के विचार देखें किः-

‘सुधाबीज बोने से पहले, कालकूट पीना होगा।’ इसी प्रकार कोई भी लाभ प्राप्त करने के पहले कष्ट सहन करना ही होगा। लेकिन करत 2 अभ्यास के जड़मत होत सुजान”। मैं इस विषय की खोज में बराबर लगा हुआ हूँ और मुझे जो भी मालूम होगा, प्रेमी जनों की सेवा में उपस्थित करुंगा। पुस्तक प्रकाशित होने के पश्चात् मेरी भेंट एक पण्डित जी से हुई, जिनके द्वारा उनके पूर्वजों के बंधे हुए बण्डल से मुझे स्वरोदय शास्त्र पर रनदास जी की हस्तलिखित पुस्तक तथा अस्त-अस्त कुछेक कागज प्राप्त हुए। उन कागजों से यद्यपि मुझे अपूर्ण प्रतीत हुए। मुझे जो कुछ भी प्राप्त हुए, उनकी चासनी मैं सेवा में उपस्थित करता हूँः-

स्वर-विचार

सोरठा-

अहरि शिष्य शिर नाय, कह दोई कर जोरि कै।

दीजै मोहि बताय, नाथ स्वरन को भेद अब॥

दोहा-

चन्द्र सूर्य मुन्द्र बसत, परम पुरुष के ठाम।

निर अक्षर सों मिलत है, नरातीत को धाम॥

वाही धाम सिर ऊपरे, कमल सहस दस आँहि।

सो छाया शशि भाग की, कमल अष्ट दल माहि॥

वाही के परकास से, स्वाँस बीच दरसाय।

उदय किरन जो मेल के, रवि शशि फेर लखाय॥

मुद्रा है वहाँ रहत है, नाड़ी यहाँ कहाय।

सो अब मैं वरनन करुँ, तिनके नाम बताय॥

बाँये सुर नाड़ी इड़ा, पिंगली दहिने जान।

दोनों सुर इक दम चले, तेहि को सुखमन मान॥

सोरठा-

सोई ईश्वर में लखे, चन्द्र सूर्य करता उभय।

भोगे विपति विशेष, जो स्वर बिन समझे चलै॥

छोहा-

चन्द्र चलत नाड़ी इड़ा, बायें नासिका स्वाँस।

नाड़ी पिंगला जानिये, दहिने सूरज बास॥

इड़ा मध्य गंगा बहै, जमुना पिंगला जान।

दो स्वर सम है सरस्वती, नाड़ी सुखमन मान॥

इड़ा नाड़ि के बीच में, चन्द्र बीज साकार।

पिंगल नाड़ि के बीच में, भानु बीज आकार॥

सुखमन नाड़ी में रहै, पावक बीज रकार।

बैनाड़ी में रम रहो, आतम राम विचार॥

उन्हें सिद्धि चाहै करन, जपै बीज ले साथ।

लिखो देख मत भूलियो, युक्ति गुरु के हाथ॥

सोरठा-

जारत कर्म रकार, ज्ञान प्रकाश अकार तें।

भक्ति देत साकार, अरु नासत त्रै ताप को॥

अपूर्ण


Quotation

शान्ति और दृढ़ निश्चय का साथ जब न्याय युक्त कारण के साथ होता है, तब उसके नतीजे में हमेशा जीत ही मिलती है। न्याय के कारण मनुष्य प्राण छोड़ दे, यह उसका कर्तव्य है। अपने लिये प्राण छुड़वा लेना पशु का नियम है।


अलिप्त, कर्मकर्ता

(ले-पं श्रीकाँत शास्त्री, नारायणपुर)

निविड़तम-निशीथ का दर्शनीय दृश्य ! चन्द्रदेव की चमकती हुई चाँदनी पृथ्वी की निश्छल छाती पर रंगरेलियाँ मचा रही थी। सौरभमय सगर्व पवन का सुमधुर सन-सन समस्त प्राणियों में नव-जीवन भर रहा था। लताओं की कमनीय कलियों की मन्द मुस्कुराहट, मादकता उड़ेलने में व्यस्त थी, पर इस मनोरम बेला में भी कृष्णभक्त गोप बालाओं को क्षणिक सुख भी प्रदान करने में सर्वथा असमर्थ थी। उन पर सुधाँशु की सुस्निग्ध किरणें भी विष-वर्षण कर रही थीं ज्योत्स्नापूर्ण विभावरी भी अन्धकाराच्छन्न थी। कारण? कारण उनका सर्वस्व श्री कृष्ण आज इस समय तक गायब थे। उनका हृदय, आशा, निराशा, भय, आशंका, क्षोभ और ग्लानि का केन्द्र बन रहा था। इतने में पदध्वनि डूबने की आधायिका हुई। उनकी आँखें खुलीं तो वह तृप्त हो गईं। गद्-गद् हो गईं। ‘देखत बने न देखते’ की उदाहृति बन गईं। उफ ये तो आनंदकंद श्री कृष्णचंद अपराधी सी मुद्रा बनाये खड़े हैं। देर हो गई प्रिये ! देर हो गई प्रिये क्षमा करो।’ भगवन् ब्रज-वैभव नन्द-नन्दन ने कहा। गोप-कन्याओं के हृदय बाँसों उछल पड़े। मान की सोची हुई सारी बातें काफूर हो गई, ब्रज-विहारी ने फिर गम्भीर स्वर में कहना प्रारम्भ कियाः क्या इस वियोग ने प्रेम-परीक्षा में हमें नीचे गिराया है? नहीं, वियोग की बिसात ही क्या है, जो प्रेम का उन्मूलन कर सके। क्या आकाश और अवनि का अन्यतम अन्तर भी कमल और कमल-प्रसादक सूर्य के प्रेम को निर्मूल करता है? गोपिकाऐं वसंत की कोकिलाओं के समान कुहुक उठीं-तो फिर आज यह अत्यधिक प्रतीक्षा का अवसर आया ही कैसे? वासुदेव ने कहा-हृदयेश्वरी! आज इसका कारण गुरुदेव दुर्वासा का सौभाग्य गमन है।

वे यमुना पार माँडीर बन में ठहरे हैं। उनकी सेवा-सुश्रूषा ने इतना समय ले लिया, गोप-वालाओं की आशंका ने विस्मय का स्वरूप धारण किया। वे सार्श्चय बोल उठीं। गुरु? गुरु? आपके भी गुरु? भगवान् कृष्ण का चेहरा कुछ और गम्भीर हो उठा और कहना प्रारम्भ किया। इसमें आर्श्चय की बात क्या है प्रिये ! गुरु के बिना किसकी जीवन-यात्रा सफल हुई है सुभगे? स्मरण रक्खो, जिसने सच्चा गुरु खोज कर अपनी व्यवहारिकता को गुरु के प्रति ईश्वर की तरह लगा दी है, वह आज ही नहीं तो कल उसे कौन अमुक्त कने का दुस्साहस करेगा? गोप-सुताओं की जिज्ञासा ने अब दिशा का स्वरूप ग्रहण किया। वह आकुलचित हो कर बोल उठीं-तो हम उन्हें देखना चाहती हैं। क्या इस दुस्समय में भी उनका दर्शन कर कृतकृत्व हो सकती हैं? श्री कृष्ण ने अपनी सफलता की क्षीण आशा देख तत्परता के साथ कहा-हाँ ! हाँ ! अभी जा सकती हो सुन्दरी!

तो यमुना पार करने का सुगम-साधन? गोपियों ने उत्कंठा पूर्ण स्वर में कहा। ब्रज नन्दन ने गम्भीर मुद्रा में उत्तर दिया-जाओ यमुना से यह कह कर मार्ग माँगना। ‘यमुने ! यदि कृष्ण बाल-ब्रह्मचारी हैं, तो हमारी राह दे दे। वह दे देगी। जाने की पूर्ण तैयारी की गई। उपहार के लिये तरह-तरह की चीजें तैयार हुईं और वे चल खड़ी हुई। यमुना ने मार्ग दे दिया। दिशा ने रास्ते के शूल, फूल बना दिये। दुर्वासा का निवास सामने आया। गोप-रमणियों ने दुर्वासा को दंडवत किया और आने की सारी कथा कही। बाद अपना भोजन करने को सभी बाध्य करने लगीं। दुर्बासा ने मन्द-स्वर में कहा-सौभाग्यनि ! मैं परमहंस हूँ, अतः अपने हाथ से खा नहीं सकता, मुँह फाड़ता हूँ, जिससे जो हो देती जाओ। दुर्वासा ने अपना मुख कन्दरा सा फाड़ दिया। सभी की थालियाँ साफ होने लगीं और साफ हो कर रहीं। फिर भी दुर्वासा का मुख फटा था। बाद आचमन करा कर चलने की आज्ञा माँगी। दुर्वासा ने क्षीण स्वर में कहा-जा सकती हैं ! ऋषि ने मूक-सखियों की मनोभावना समझी और फिर कहना प्रारम्भ किया-यमुना पार की समस्या हल करना चाहती हो न? वह तो हो जावेगी, जाकर यमुना से कहना-यदि दुर्वासा की जिह्वा ने आज तक दूर्वारस के सिवा अन्य रसों का स्वाद नहीं लिया हो तो हमें मार्ग दे दे। वह राह दे देगी। गोपियाँ उल्टे पाँव लौटीं, फिर मार्ग मिल गया।

घर आने पर श्री कृष्ण से त्यौरी पूर्ण भाषा में कहा-देख तो आईं जैसे झूठे आप, वैसे वे ! क्या आप ब्रह्मचारी हैं? और वे दूर्वारस पाकी? आँखों देखी बातों पर भी हरताल लगाना? श्री कृष्ण ने उनके अभाव को समझा और सुस्मित शब्दों में कहना आरम्भ किया? ‘प्रिये, जिस प्रकार मैं निर्मम, साभ्यदृष्टा, रागद्वेषातीत और निर्गुण होते हुए भी भक्तों की कल्याणकांक्षा करते हुए अपने आचरण को बदलता हूँ, वही गति महात्माओं की है। विद्वान वही है, जो संयमशील हो और सभी कुछ करके भी उसमें क्षणिक आसक्त नहीं होता। उसके सभी कर्म, ज्ञानाग्नि भस्म हो जाते हैं। संयम-प्रवीण कर्म योगी दैनिक कृत्य करता हुआ भी मुक्त ही है। अनासक्त चित्त से किया हुआ दुर्ष्कम भी पाप के प्रतिकूल है। यदि मैं सहस्त्रों गोपिकाओं से रमण करता हूँ और मेरी आत्मा उस आनन्द से वंचित रहती है तो मैं ब्रह्मचारी ही कहा जाऊंगा। इसी तरह मिष्ठान्नों का आस्वादन कर दुर्वासा दूर्वा-रस पाकी ही कहे जायेंगे।

गोपबालाएं श्री कृष्ण के पतिन-पावन चरणों पर मूर्छित हो गिर गई। उन्होंने कर्म-कलाप के अन्तर्भेंदों को जान लिया था, जो मानव-जीवन का चरम श्रेय है और जिसका ज्ञान चर्म-चक्षुओं को फोड़ कर तीसरे नेत्र विवेक को ज्योतिर्मय कर देता है। कैसी सौभाग्यशालिनी थीं वह ! क्या हमें भी वह............।


उत्साह का जादू

समय बीत गया, अब हम बुड्ढे हो चले क्या करें, अब किस काम को पूरा कर सकते हैं। ऐसा कहने वालों के पास समय, शक्ति अथवा साधनों का अभाव नहीं होता, असल में उनमें उत्साह की कमी होती है। उत्साही मनुष्य के लिये अधिक उम्र होने का प्रश्न नहीं उठता, वह सीखने के लिए विद्यार्थी और काम करने के लिए नौजवान तब तक बना रहता है, जब तक कि वह जीवित रहता है।

डा. जाँनसन ने अपनी सर्वोत्तम रचना, ‘कवियों की जीवनिया अपनी 78 वर्ष की उम्र में लिखीं। डेनियल डेको जब 58 वर्ष का था, तो उसने अपनी ‘राबिन्सन क्रूसो’ पुस्तक छपाई। 83 वर्ष की उम्र में न्यूटन ने अपनी पुस्तक ‘प्रिंसिपिया’ के नये वर्णन लिखे। प्लेटो लिखते-लिखते मरा, मृत्यु समय में वह 80 वर्ष से भी अधिक उम्र का था। टामस्कार जब 86 वर्ष के थे तो उन्होंने हिब्रु भाषा को पढ़ना शुरू किया। 70 वर्ष की उम्र में गेलीलियो ने एक वैज्ञानिक ग्रन्थ लिखा। जेम्सवाल्ट ने 85 वर्ष की आयु में जर्मन भाषा पढ़ी। उम्वाल्ट ने अपना ग्रन्थ ‘कासमाम’ 60 वर्ष की उम्र में पूरा किया। एलिविट उस समय पाठशाला में भर्ती हुआ जब उसकी दाढ़ी मूँछें निकल आई थीं, आखिर उसने ‘ग्रेजुएट’ की उपाधि प्राप्त कर ही ली। महाकवि लागफेलो, टेनीसन, ह्वीठियर आदि ने अपनी उत्तम पुस्तकें 70 वर्ष बाद पूरी कीं। 80 वर्ष की उम्र में ग्लेडस्टन, बेलिंगटन और बिस्मार्क इतना काम करते थे, जितना 25 वर्ष का नौजवान मुश्किल से कर सकता है।

उत्साह एक अग्नि है, जो हमारे कार्यों को चलाने के लिये भाप तैयार करती है। यदि लोग समझ लें कि हममें कितनी शक्ति है और उस शक्ति का उत्साहपूर्वक उपयोग करें तो गजब के काम करके दिखा सकते हैं, परन्तु अड़ियल घोड़े के स्वभाव के मनुष्य अपनी शक्ति को निराशा और निरुत्साह पर बलिदान करते रहते हैं।


गरीब की हाय

(श्री मंगलचंद भीण्डारी “मंगल” अजमेर)

एक राजा ने किसी विद्वान से पूछा कि “दुष्ट लोग जल्दी क्यों मर जाते हैं? और सज्जन पुरुष चिरकाल तक क्यों जीवित रहते हैं”? विद्वान इसका उत्तर तो अच्छी तरह जानता था, लेकिन फिर भी उसने उत्तर राजा को उस समय न बतला कर तीन माह की अवधि माँगी ! राजा ने तीन माह की अवधि दे दी।

बड़ी उत्सुकता और प्रतिक्षा के बाद तीन माह पूरे हुये। सारी प्रजा भी इस विचित्र प्रश्न का उत्तर सुनने को उत्सुक थी ! नियत समय पर विद्वान भी उपस्थित हुआ। वहाँ आकर उसने एक लम्बी साँस ली, बड़े दुःख के साथ कहा श्रीमान् ! मैं आप के इस प्रश्न का उत्तर किसी जंगल में दूँगा ! अतः आपको 500 सैनिक साथ ले चलना होगा? राजा तो प्रश्न का उत्तर चाहता था, इसलिये विद्वान के कथानुसार जाने की भी तैयारी प्रारम्भ कर दी।

राजा ने बाहर जाने के लिये विशेष रूप से प्रबन्ध किया। 500 सिपाहियों को शस्त्र सहित तैयार होने की आज्ञा दे दी। मन्त्री को खास तौर से हिदायत कर दी की जब तक लौट कर मैं वापिस न आऊं, तब तक राजकाज बड़ी सावधानी से चलाना ! प्रजा की भलाई का सदैव खयाल रखना प्रजा को तकलीफ न हो! आदि प्रजा के हित की अनेक बातें समझा-बुझा कर राजा ने प्रस्थान किया।

सारे दिन चलते-चलते एक घने जंगल में पहुँचे, जहाँ आदमी का नाम निशान तक न था। पक्षियों की बोली भी कम ही सुनाई पड़ती थी ! ऐसी जगह पहुँच कर विद्वान् ने राजा से कहा-श्रीमान यहीं पर ठहरना ठीक होगा राजा ने सैनिकों को वहीं ठहरने की आज्ञा दी सैनिक लोग वहीं ठहर गये। कुछ ही देर में 500 सैनिकों की सहायता से वहाँ पर तम्बू बंध गये ! भोजन करने के पश्चात् दिन भर के थके सैनिक विश्राम करने लगे ! सोते ही सब को नींद आ गई।

सबेरे नित्य कर्म से निवृत्त हो सबने फिर भोजन किया और पश्चात् महाराज के आदेश की प्रतीक्षा करने लगे। विद्वान ने बड़ी गम्भीरता पूर्वक दुःख प्रकट करते हुए कहा श्रीमान् ! मैंने सोचा था कि बाहर आकर मैं आपके प्रश्न का उत्तर सुगमतापूर्वक दे सकूँगा, लेकिन यहाँ पर फिर एक विघ्न उपस्थित हो गया है? यह सामने वाला बरगद का पेड़ इस विघ्न का खास कारण है ! अतः यह पेड़ जब तक जड़-सहित अपने आप न गिर जाय तब तक मैं अपना उत्तर नहीं बता सकता ! इसलिये अच्छा हो आप अपने 500 सैनिकों को उस बरगद की देख-रेख में तैनात कर दें।

राजा की पहले तो ऐसा करने के लिये इच्छा न हुई, लेकिन फिर कुछ सोचने के पश्चात् उन्होंने इस कठिन कार्य को भी करना मंजूर कर लिया ! राजा ने जब यह प्रस्ताव मंजूर कर लिया तब विद्वान ने कहा महाराज सैनिकों को तैनात करने के पूर्व उनसे आप यह भी सख्ती कर दीजिये कि जब तक वह पेड़ न सूख जाय तब तक कोई भी वहाँ से न हटे ! और एक बात की हिदायत यह भी कर दीजिये कि कोई सैनिक भूल कर भी उस पेड़ को नष्ट करने के लिये, उस पर शस्त्र का प्रयोग न करे ! महाराज ने विद्वान के कथनानुसार सब करवा दिया ! 500 सैनिक उस पेड़ की देख-रेख में लग गये ! महाराज स्वयम् भी उस पेड़ के सूखने की राह देखने लगे।

एक दो दिन तो जैसे-तैसे बीत गये! लेकिन फिर सैनिकों का हाल बुरा हो गया ! ज्येष्ठ की लू से सब घबरा गये! पीने को पानी भी बड़ी कठिनता से प्राप्त होता था ! सारे दिन धूप में चने की भाँति सिक जाते थे। 500 जवान केवल घबरा ही न गये थे, बल्कि बड़े व्याकुल हो गये थे ! लेकिन करते क्या?

हाय! हाय पेड़ कब सूखेगा? कब हम अपने घर जाकर अपने बाल बच्चों को संभालेंगे? बस सोते, जागते, खाते, पीते, उठते, बैठते, बोलते उनके मुँह से यही हाय ! के शब्द निकलते थे ! इस तरह 500 जवान उस पेड़ के लिये हृदय से दुखी थे।

किसे विश्वास था कि यह सैकड़ों वर्षों में गिरने वाला पेड़ जल्दी ही सूख कर गिर जायेगा, लेकिन यह क्या? तीन मास भी न हुए और पेड़ के तमाम पत्ते एक-एक करके झड़ गये! अब था तो सिर्फ पत्तों रहित पेड़। सब को कुछ आशा बंधी ! पूरे 6 माह भी समाप्त न हुए कि वह पेड़ जड़ सहित जमीन पर गिर गया।

सबकी खुशी का पार न रहा ! घर जाने के लिये कई दिनों से लालायित सिपाहियों की इच्छा पूर्ण हुई। खुशी के मारे उछलते कूदते एक सिपाही ने यह सन्देश राजा को भी सुना दिया कि-श्रीमान बरगद का पेड़ अपने आप जड़ सहित गिर पड़ा है? राजा और विद्वान बड़ी उत्सुकता पूर्वक देखने आये ! यह सब देख कर विद्वान ने सैनिकों से पूछा-तुमने इस हजारों वर्ष में नष्ट होने वाले पेड़ को कैसे गिरा दिया है? क्या तुमने किसी शस्त्र की सहायता से ऐसा किया है। वे सब डरते-डरते बोले, महाराज यह तो अपने आप गिर पड़ा है। हमने कोई शस्त्र का प्रयोग नहीं किया है। हमने सोते जागते इतनी विनती प्रभु से अवश्य की है कि हाय! यह पेड़ कब सूखे? और कब हम अपने घर जाएं?

तब विद्वान ने कहा राजन् ! जिस प्रकार यह हजारों वर्ष में नष्ट होने वाला पेड़ 500 जवानों की ‘हाय’ खाकर अपने आप ही जड़ सहित गिर पड़ा है, उसी तरह आदमी भी अनेकों की हाय खाकर अपने आप ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं ! राजा ने कभी भी इस प्रश्न पर विचार न किया था कि “हाय क्या है?” आज यह अच्छी तरह समझ गया कि हाय से कौन सी चीज नाश को प्राप्त नहीं हो सकती?


अपरोक्ष आवाहन

(परलोक विद्या के आचार्य श्री वी.डी.ऋ षि)

(जून के अंक से आगे)

प्रेतात्माओं को आवाहन के इन प्रयोगों में जो सन्देश आते हैं वे अतीव विचारणीय रहते हैं, किन्तु स्नेह बन्धन के अभाव से वह तुलनात्मक दृष्टि के स्वरूप होते हैं, उसी मुताबिक ऐसे अवसर पर भिन्न-भिन्न सम्बन्धियों के नाम प्राप्त करने से कठिनाई प्रतीत होती है। आनुषंगिक प्रमाणों से तथा संदेश में लिखी हुई बातों से विवक्षित व्यक्ति का आगमन निश्चित किया जा सकता है।

यह प्रयोग करने के लिये विशिष्ट शक्ति युक्त माध्यम की तथा परलोकस्य मार्गदर्शक के सहायता की आवश्यकता रहती है। साधारणतः यह देखा गया है कि कई लोग अपने प्रिय स्वर्गीय सम्बन्धियों से संवाद करने में सफल होते हैं, किन्तु अन्य जिज्ञासुओं को उनके उपस्थिति में भी सहायता नहीं कर सकते वे अप्रत्यक्ष आवाहन के प्रयोग करने में असमर्थ होंगे। उनकी माध्यमिक शक्ति उतने अंश तक विकसित नहीं रहती, इसलिये उनके प्रयोगों में उचित अनुभव नहीं आ सकते।

शास्त्रीय दृष्टि से इन प्रयोगों का महत्व बहुत ही विचारणीय है, स्वयं लेखन अथवा औजाबोर्ड द्वारा जो संदेश प्राप्त होते हैं उनके संबंध में अनभिज्ञ लोग गुप्तमन अथवा विचार संक्रमण के आक्षेप व्यक्त करते हैं, किन्तु अपरोक्ष आवाहन के प्रयोगों से वह आक्षेप निर्मूल रहते हैं, कारण प्रयोगकर्ताओं को उस व्यक्ति के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं रहता है। ऐसी अवस्था में अज्ञात अवस्थायें भिन्न-भिन्न व्यक्ति से भिन्न-भिन्न प्रकार के संदेश केवल नाम मात्र से प्राप्त होना निस्संदेह आश्चर्योत्पादक है।


स्वप्नदोष का यौगिक उपचार

(पं शिवनारायण शर्मा एच.एम. पाठशाला, माईथान-आगरा)

अश्विनी मुद्रा और उसका फल

आकुश्चयेद् गुद्द्वारं प्रकाशयेत् पुनः पुनः।

सा भवेदश्विनी मुद्रा शक्ति प्रबोधकारिणी॥

(उप. 3 श्लोक 82 घे सं.)

अर्थ-बार-बार गुह्य द्वार का आकुँचल प्रसारण करने को अश्विनी मुद्रा कहते हैं। यह मुद्रा शक्ति प्रबोधकारिणी कही जाती है। अश्विनी परमा मुद्रा गुह्यरोग विनाशिनी।

बल पुष्टि करी चैव अकाल मरणं हरेत।

(घे सं 3/83)

अर्थ-इस सर्वोत्कृष्ट अश्विनी मुद्रा साधन के प्रभाव से गुह्यरोग नष्ट होते हैं। यह बल और पुष्टि साधन करने वाली है और इसके प्रसाद से अकाल मृत्यु नहीं होती।

मरणं विन्दुपातेन जीवनं विन्दुधारणात।

तस्मादति प्रयत्नेन कुरुते विन्दुधारणम॥

(शिव संहिता 488)

शक्तिचालन मुद्रा और उसका फ ल

मूलाधार पक्ष में कुण्डलिनी शक्ति दृढ़ रूप से स्वयम्भूलिंग से 3॥ लपेट लगाये सोती है, धीमान् योगी अपनी वायु के सहयोग से शक्तिपूर्वक इस कुण्डलिनी देवी को आकर्षण करके ऊपर को चलावें, इसको शक्ति चालन मुद्रा कहते हैं। इसके द्वारा शक्ति प्राप्त होती है। (शिव सं 3।105) जो योगी (साधक) प्रतिदिन इसका अभ्यास करेंगे, उनके शरीर में धातु सम्बन्धी रोग न होगा और परमायु बढ़ेगी। (3।106) सिंहासन पर बैठ कर दो घड़ी रोज अभ्यास करें। इस विषय में अधिक जानना हो तो घेरंड संहिता और शिव-संहिता देखिये।

पशुओं से शिक्षा

1. अश्विनी मुद्रा क्या? अश्विनी का अर्थ है घोड़ी। घोड़ी जब पेशाब कर चुकती है, तब अपनी योनि का आकुँचन प्रसारण करती है। उसी प्रकार साधक अपने गुह्यद्वार का आकुँचन प्रसारण साधन करे।

2. पेशाब करने का साधन-भैंसा जिस प्रकार रुक-रुक कर पेशाब करता है, उस तरह रुक-रुक कर पेशाब करे। दो सेकेंड पेशाब किया, एक सेकेंड रुक गये। फिर किया, फिर रोका इससे दुर्बल नसों में शक्ति आती है।

(विजयकृष्ण गोस्वामी)

3. आप ध्यान देकर विचार कीजिये कि कोई पशु दस्त और पेशाब साथ-साथ नहीं करता। यदि साथ-साथ करे तो वह रोगी समझा जाता है, परन्तु मनुष्य प्रायः ऐसा ही करते हैं। जो साधन मनुष्यों को सीखने से आते हैं, पशुओं में प्राकृतिक हैं। इसी प्रकार धातु दौर्बल्य वाला मनुष्य यदि शौच जाने से 4/6 मिनट पहले पेशाब करके पीछे शौच जाया करे तो उसका स्वप्नदोष, धातुदौर्बल्य दूर हो।

(एक रमते राम)

4. यदि किसी की समझ में यह बातें स्पष्ट न आवें तो वह अपने धातु-रोग की उत्पत्ति का कारण, कितने दिन से है, क्या-क्या उपचार कर चुके हैं, क्या दशा है इत्यादि पूर्ण विवरण और उत्तर के लिये टिकट भेज कर सम्मति ले सकते हैं। उनका पत्र गुप्त रक्खा जायगा संकोचवश ये बीमारियाँ जड़ पकड़ जाती हैं।

5. श्री मद्भगवद्गीता या देवी माहात्म्य के किसी श्लोक की यौगिक आध्यात्मिक व्याख्या जाननी हो तो पत्र-व्यवहार कीजिये। उत्तर के लिये टिकट न आने से क्षमा प्रार्थी हूँ।

पाठकों का पृष्ठ

गत मास ऐसी विज्ञप्ति प्रकाशित की गई थी कि “अखण्ड ज्योति” में शिक्षाप्रद कथाएं और महापुरुषों के दिव्य वचन विशेष रूप से रहा करेंगे और आध्यात्मिक साधनाओं की शिक्षा पुस्तकों द्वारा दी जाया करेगी।” इस परिवर्तन का कारण यह था कि सर्व साधारण की रुचि के साथ आध्यात्मिक तत्वों को मिला देने से हमारा उद्देश्य भी पूरा होता रहेगा और पत्रिका का प्रचार भी पर्याप्त होगा। देखा जाता है कि जिस अंक में कथाएं अधिक रहती हैं, उसकी माँग बहुत बढ़ जाती है। गम्भीर आध्यात्मिक लेखों के प्रेमी कम हैं। जो हैं वे अपने प्रिय विषय की उन्नति के सम्बन्ध में बड़े उदासीन रहते हैं। ऐसी दशा में पत्रिका उन्नति नहीं कर पाती और महंगाई से युग का घाटा उसे सताता रहता है।

इस मास पाठकों के 387 पत्र ऐसे आये हैं, जिनमें गम्भीर आध्यात्मिक लेखों का समावेश रखने पर बहुत जोर दिया गया है। यह संख्या यद्यपि हमारे कथा प्रेमियों के दसवें भाग से भी कम है, तो भी उनकी भावनाओं का आदर किया जायगा। घाटे का भार ईश्वर पर छोड़ते हुए आध्यात्मिक विषय के उत्तमोत्तम लेख जुटाने का पूरा-पूरा प्रयत्न करेंगे। साथ ही थोड़ी बहुत कथाएं भी देते रहेंगे।

आशा है कि इससे प्रेमी पाठकों को संतोष होगा।

-सम्पादक।


Quotation

सूर्य चिकित्सा और प्राण चिकित्सा पद्धतियों के अनुसार मैंने एक चिकित्सालय खोल दिया है। मुफ्त इलाज करता हूँ। लोगों को बहुत फायदा हो रहा है। साथ ही आध्यात्मिक शिक्षाओं का केन्द्र भी स्थापित किया है। प्रतिदिन चालीस-पचास पीड़ितों की सेवा करके मुझे आन्तरिक आनन्द प्राप्त होता है। ईश्वर की कृपा से अनायास ही खर्च के लायक आमदनी हो जाती है।

-भीखचन्द जैसवाल, बीकानेर।

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गत वर्ष आपकी हस्तलिखित पुस्तक ‘बुद्धि बढ़ाने के उपाय’ में से जो विधियाँ नोट करके लाया था, उनके प्रयोग से बड़े आश्चर्यजनक लाभ हुए हैं। हमारे स्कूल में 5 लड़के ऐसे थे, जिनके पास होने की स्वप्न में भी उम्मीद न थी, पर उनमें से - दूसरी और तीसरी श्रेणी में पास हो गये। मेरी स्मरण शक्ति बहुत बढ़ी है। मुझे आपसे यह बहुत शिकायत है कि ऐसी उपयोगी पुस्तक को अभी तक नहीं छपा रहे हैं। चाहिए तो यह था, पहले उसे छापते पीछे दूसरी। आशा है आप उस अद्भुत पुस्तक को छापने में अब विलम्ब न करेंगे।

-सुरेन्द्रदत्त भट्ट हैड मास्टर, सिमरई।

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‘स्वस्थ और सुन्दर बनने की विद्या’ के साधनों को काम में ला रहा हूँ। पुरानी खाँसी कम हो रही है। शरीर में फुर्ती और मन में प्रसन्नता है।

-ज्योतीप्रसाद सक्सेना, फ रीदपुर।

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मैस्मरेजम सीखने की मुद्दतों से इच्छा थी। कई बार ठगा गया हूँ और दर्जनों पुस्तकें खरीद चुका हूँ। पर किसी से मनोकामना पूर्ण न हुई थी। आपकी (1) परकाया प्रवेश, (2) प्राण चिकित्सा, (3) मानवीय विद्युत के चमत्कार को पढ़ कर मुझे इतनी ठोस सामग्री प्राप्त हुई, जितनी गत पाँच वर्षों में बहुत प्रयत्न करने के बाद भी न पा सका था। पात्र को निद्रित करने के अभ्यास में पूरी सफलता मिली है।

-गोकुलप्रसाद सूद, जलालपुर।


नश्वर संसार!


नश्वर संसार

(रचियता-श्री महताबनारायण त्यागी, वै. ध. विशारद, लश्कर)

यौवन-सरिता-तट पर पी सौर्न्दय-सुरा मस्ताने वाले!

श्रणभंगुर जीवन में दाहक तन से नेह लगाने वाले!

तेरा विश्वप्रेम एकाकी कलुषित होकर जाग रहा है!

अमर पुत्र मानव, तुझको लख भय से पशु भी भाग रहा॥

रणप्राँगिण में डडडड सचमुच विस्मयान्वित बल है दिखलाया।

मानस के दूर्धर रिपुओं का दमन नहीं क्योंकर कर पाया?

जीवन जो अवशिष्ट उसी में जोड़ विश्व पति से अब नाता।

इस अनन्त संघर्ष-मध्य मानव ही व्यर्थ रहा टकराता॥

मिट्टी के पुतले, सोचा भी धरा-धाम पर क्यों है आया?

नश्वर जग के इस समत्व में जो निज को है व्यर्थ फंसाया॥

मोह-श्रृंखला के अय बन्दी! देख समय भागा जाता है।

जीवन का क्षण बीत गया जो कभी, नहीं वापिस आता है॥

केश श्वेत हो गये सँभल जा, मद-मत्सर के अरे पुजारी।

दिव्य योनि पाकर भी पगले, निष्फल आयु गँवाई सारी॥

अन्तरिक्ष में पंचतत्व हैं शीघ्र तिरोहित हो जाने को।

पथिक! गँवा बैठा संचित भी धिक् तेरे नर तन पाने को॥

परवर्धित तेरा वैभव यह आज देखकर के हँसता है।

“बाजीगर की माया है” नर जान बूझ कर भी फंसता है॥

मरणोदिप्त चिता को लख कर उदासीन हो जाने वालो!

अन्तिम शिक्षा को धारण कर कुछ तो निज को मित्र, सँभालो॥

*समाप्त*