दुनिया का अन्त कैसे होगा - इस प्रश्न पर भूतत्व वेत्ता बहुत दिनों से विचार कर रहें हैं। कुछ लोगों का अनुमान है कि ज्यों-ज्यों पृथ्वी की उम्र ज्यादा होती जायगी त्यों-त्यों धीरे-धीरे उसे शिगाफ खुलते जायेंगे, जो उस पर अंकित होंगे यहाँ तक कि पृथ्वी के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे और वह बड़े जोर से फट कर वायु मण्डल में बिखर जायगी और उसके टुकड़े सूर्य के चारों तरफ घूमने लगेंगे। शेष सब और ग्रह उसी तरह बने रहेंगे, जैसे पहले थे। इससे वर्षों पहले चाँद का अन्त इसी तरह हो चुका होगा। पृथ्वी के लोग देखेंगे कि चाँद बम की तरह फट जायगा। रातें सिवा तारों की रोशनी के बिलकुल अंधेरी हुआ करेंगी। इसके हजारों साल बाद एक तारा फटेगा जो इस बात की निशानी होगी कि पृथ्वी का अन्त नजदीक है
(संकलित)
सहृदयं साँमनस्यम्। अविद्वेषं कृणो मिवः।
अथर्व ॥ 30। 3 1
ईश्वर की आज्ञा है कि सब लोग आपस में दया भाव रखें। मन में उत्तम विचार किया करें और आपस में प्रेम का बर्ताव करें। एक दूसरे से कभी द्वेष न करें।
देवा भागं यथा पूर्वें संजानाना उपासते॥
ऋग 10।19।12
श्रेष्ठ और सदाचारी पुरुष जिस प्रकार कर्त्तव्य करते हैं। उसी प्रकार हर एक मनुष्य को अपना कर्त्तव्य उत्तम रीति से करना चाहिए।
अभयं मित्रादभयममित्रादयं ज्ञातादभयं परोक्षात् ॥ अथर्व 19।15। 6
मनुष्यों को उचित है कि वे अपने मन को बलवान बनाकर किसी से भी न डरते हुए, सदा निर्भयता पूर्वक अच्छे कर्त्तव्य करते रहें।
उत्तिष्ठत सं नह्यध्वं। मित्रा देव जनायूयम्
अथर्व 11।11।12
सब लोगों को उचित है कि वे परस्पर प्रेम करें और ज्ञानी बनकर अपनी उन्नति के लिए यत्र करें।
हृत्प्रतिष्ठं यदिजिरं जविष्ठं। तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु। यजु॰ 34। 6
मनुष्यों का मन हृदय में रहता है। वह मन अत्यन्त बलवान और वेगवान है। उस मनकों सदा उत्तम विचारों का मनन करने में ही लगाना चाहिए।
भद्रं ना अपि वातय। मनो दक्षमुत ऋतुम्॥
ऋ॰ 10।25।1
मनुष्यों को उचित है कि वे सब के कल्याण के लिए सब को बलवान बनाने के लिए और उत्तम पुरुषार्थों प्राप्त करने के लिए अपने मन को उत्साहित करें।
(स्व॰ विवेकानन्दजी महाराज)
मनुष्य की आत्मा क्या है? दार्शनिकों के एक समुदाय का मत है कि एक सत्ता ईश्वर की है और उसके अतिरिक्त अपरिमित आत्मायें हैं, जो रूप, गुण तथा अन्य समस्त बातों में उस ईश्वरीय सत्ता-ब्रह्म -से सर्वथा भिन्न हैं। यह सिद्धान्त है। इसके उत्तर में एक दूसरे सम्प्रदाय ने कहा कि आत्मा एक अत्यन्त अपार्थिव सत्ता का अंश है। मानो यह शरीर स्वयं एक छोटा सा संसार है। इस शरीर के अन्तराल में मन और बुद्धि हैं और इन दोनों ही के अन्तराल में आत्मा ठीक इसी प्रकार यह सारा संसार एक शरीर है। इस के अन्तराल में आत्मा। जिस तरह यह शरीर विश्वव्यापी शरीर का एक अंश है, उसी तरह यह मन विश्व मन का तथा आत्मा का एक अंश है। इस तरह का सिद्धान्त विशिष्टाद्वैत वाद के नाम से प्रसिद्ध है।
अब हम यह जानते हैं कि विश्व व्यापी आत्मा अनंत है। परन्तु भला अनन्तता के खण्ड कैसे हो सकते हैं? वह तोड़ा कैसे जा सकता है? उसमें विभाग कैसे होगा ? यह कहना कि मैं उस अनन्त का एक कण हूँ, बहुत ही कवित्वमय है। परन्तु विवेकशील मन के लिये यह बात एक बहुत ही बेतुकी है। अनन्त को विभक्त करने का तात्पर्य क्या है? क्या कोई परिमेय पदार्थ है, जिसे आप खण्ड 2 विभक्त कर सकेंगे? जिस वस्तु में परिणाम नहीं है, जिसे हम नाप नहीं सकते, उसके खण्ड भी नहीं किये जा सकते जिससे खण्ड करना संभव है, उससे फिर अपरिमेयता नहीं रह जाती है। इसका निष्कर्ष यह निकला कि आत्मा जो कि विश्व व्यापी है वह ‘तुम’ हो और तुम एक खण्ड नहीं, बल्कि उसके पूर्ण अंश हो। तुम ईश्वर के पूर्ण अंश हो। परन्तु ये सब विभिन्नतायें क्या हैं? इस संसार में हमें लाखों विभिन्न आत्मायें मिलती हैं। ये सब क्या हैं? जिस समय पानी के लाखों बुदबुदों पर सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है, उस समय उसमें से हर एक सूर्य की प्रतिमूर्तियाँ दिखाई देती हैं। हर एक बुदबुदे में सूर्य की अविकल मूर्ति परिलक्षित होती है। इस प्रकार उस समय हमें लाखों सूर्य दिखाई देते है, यद्यपि वास्तविक सूर्य केवल एक ही है। इस प्रकार यह माया विशिष्ट आत्मा जोकि हममें से प्रत्येक प्राणी के अन्तःकरण में विद्यमान है, ईश्वर की प्रतिमा मात्र है। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वास्तविक सत्ता जो कि अन्तराल में है, वह एक मात्र ईश्वर है। उसके समीप हम सभी लोग एक हैं।
इस विश्व ब्रह्माण्ड में आत्मा केवल एक है और वही, हम, तुम संसार के अन्य समस्त प्राणियों के शरीर में प्रतिबिम्बित होती है और वह भिन्न-भिन्न आत्मा के रूप में प्रदर्शित होती है। परन्तु हम यह बात नहीं जानते। हमारी धारणा है कि हम सब एक दूसरे से भिन्न हैं और उससे-ईश्वर से भिन्न हैं। जब तक हमारी यह धारणा बनी रहेगी, तब तक संसार से दुखों का भी अन्त न होगा। यह भ्रान्ति है। इसके अतिरिक्त दुःख क्लेश और बहुत बड़ा कारण भय है।
भला एक व्यक्ति दूसरे के स्वार्थ का विघातक क्यों बनता है? कारण वह डरता है कि मैं यथेष्ट सुख न प्राप्त कर सकूँगा। मनुष्य को भय रहता है यथेष्ट धन न प्राप्त कर सकूँगा। इस भय के ही कारण वह दूसरों को हानि पहुँचाता है, इसी से वह दूसरों को धोखा देता है, ठगता है। यदि समस्त विश्व में केवल एक मात्र सत्ता होती तो, भला इस प्रकार का भय क्यों होता ? यदि मेरे ऊपर वज्र गिर पड़े, तो मैं अपने ही ऊपर स्वयं भी गिर पड़ता हूँ, क्योंकि इस समस्त विश्व में मैं ही एक मात्र सत्ता हूँ। यदि प्लेग आता है, तो वह मैं हूँ, यदि कोई सिंह आता है, तो मैं हूं, यदि मृत्यु आती है, तो वह मैं हूँ। मैं जन्म और मृत्यु दोनों ही हूँ।
विश्व में दो सत्ताओं का अस्तित्व मानने पर भय का संचार होता है। इस तरह का उपदेश हम सदा से सुनते चले आ रहे हैं कि एक दूसरे को प्रेम करो। किस लिए? हमें प्रत्येक व्यक्ति को प्रेम दृष्टि से क्यों देखना चाहिए? वह इसलिए कि मैं तथा संसार के अन्य समस्त प्राणी अभिन्न हैं। मैं अपने भाई से प्रेम क्यों करूं? इसलिए कि वह और मैं एक हूँ। इस प्रकार समस्त विश्व के सुख-दुख को समान मानने में ही यह एकता हैं। हमारे पैरों से कुचल जाने वाले छोटे से छोटे कीड़ों से लेकर सृष्टि के बड़े से बड़े प्राणी तक पृथक-पृथक शरीर धारण करते हुए भी एक ही जीव हैं। सभी मुखों द्वारा तुम खाते हों, सभी हाथों के द्वारा तुम काम करते हो और सभी नेत्रों के द्वारा तुम देखते हो। इन लाखों शरीरों के द्वारा तुम स्वास्थ्य का उपयोग करते हो, तथा रोगों की यंत्रणा भी सहन करते हैं। जब मन में हो इस तरह की भावना आ जाती है और हम इसका अनुभव करने लगते हैं, तब दुखों क्लेशों और भयों का अन्त हो जाता है।
जो अपनी पाशविक वृत्तियाँ जागृत करके दैवी वृत्तियों को दबा देता है, उसके मानव होने के केवल यही प्रमाण रह जाता है कि दूसरे मनुष्यों की तरह दो हाथ पैर हैं।
*****
हम सुख चाहते हैं। सुख का मूल्य चुकाओ, बिना चुकाये वह किस प्रकार मिल सकता है। हलुवा खाने से पहले कोयले में काले हाथ करके आग जलानी पड़ती है।
*****
जो संसार को दुख देने के लिए अवतीर्ण नहीं हुए, वरन् सुख की नदियाँ बहाने के लिए आये, वे मृत्युलोक में मनुष्य रूप में देवता हैं।
(ब्रह्मर्षि श्री सत्यदेव जी महाराज)
दिन के कार्य समाप्त करके रात्रि में शय्या पर शयन करते समय एक बार स्मरण कर देखो कि दिन में कोई झूठी बात कही वा मिथ्या व्यवहार तो नहीं किया है। यदि न हुआ हो तो कृतज्ञतापूर्वक भगवान को धन्यवाद देकर कहो- “प्रभो ! आपकी कृपा से मैं आज सत्य की रक्षा कर सका हूँ, आप मेरा भक्ति हीन प्रणाम कीजिए, जिससे, मैं प्रतिदिन इस भाव से आपकी कृपा का अनुभव कर सकूँ।”
और यदि दिन रात में कोई झूठी बात कही गई हो तो अनुतप्त हृदय से, कातर प्रणाम से प्रार्थना करो-’प्रभो ! आज मैं सत्य की रक्षा नहीं कर सका हूँ, आप मुझे क्षमा करें, भविष्य में फिर कभी असत्य के मार्ग पर नहीं चलूँगा। आप सत्य हैं, सत्य ही आपका स्वरूप है, आप सत्य के सारथी हैं, सत्य ही आपका नाम हैं, तब आपका नाम स्मरण करके भी हम झूठ क्यों बोल जाते हैं? हमारी रक्षा कीजिए, हमें सत्य परायण कीजिए।’
आग्रह पूर्वक कुछ चेष्टा करते करते सत्य बात कहने का अभ्यास हो जाएगा। जब तक सत्य-मय स्वभाव न हो जाय तब तक होशियार रहना पड़ता है, कारण कि चिरकाल से झूठ बोलते बोलते मनुष्य ऐसी अवस्था में पहुंच गये हैं कि अनजान हूं दशा में अनेक बार झूठ बोल जाते हैं और उनको मालूम भी नहीं पड़ता, इस कारण कुछ दिन इस प्रकार अनुशीलन व साधना करनी चाहिए।
प्रातः काल जब आप सोकर उठें, कई बार ‘सत्यं परं धीमहि’ मन्त्र का पाठ कीजिए और सच्चे हृदय से ईश्वर प्रार्थना कीजिए कि-हे प्रभो आप हमें इस प्रकार चलाइये कि जिससे आज दिन रात में एक बार भी झूठ न बोलना पड़े।
इस प्रकार आप दिन दिन सत्य की ओर बढ़ते जायेंगे और एक दिन अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे।
(ले॰ श्री हनुमत प्रसाद ‘कुसुम’ सीकर)
पाप एक प्रकार की अग्नि है, जो जहाँ रहती है, उसी स्थान को जलाती है। कोई किसी की चोरी करता है,जिस आदमी की चोरी की गई थी, उसे अपना धन जाने का दुख हुआ पर थोड़े समय बाद वह और धन कमा लेता है, एवं चोरी के दुख को भूल जाता है, किन्तु जिस आदमी ने चोरी की थी, उसके मन पर एक प्रकार का भार जमा हो गया और आत्म ग्लानि की चिनगारी का प्रवेश हो गया । अन्तरात्मा हर घड़ी भीतर ही भीतर उस बुरे काम के लिये धिक्कारता है। यह ‘आत्म-धिक्कार’ दुनिया में सब से बड़ी पीड़ा है। फोड़े का दर्द कुछ समय बाद अच्छा हो जाता है, किन्तु ‘आत्म-धिक्कार’ से जो अशान्ति, उद्विग्नता, बेचैनी भीतर ही भीतर उठती रहती है, वह बड़ी ही दुखदायी होती है। पापी मनुष्य मदिरा आदि नशीली चीजों का इसलिए सेवन करते हैं, कि आत्म -धिक्कार के दर्द को भुलाया जा सके। उस आवाज को न सुनने के लिए बेहोश पड़े रहें। परन्तु इससे कुछ भाग लाभ ही होता । दुखती हुई आँख में अफीम डाल देने से दर्द बेशक बन्द हो जाता है। पर उस दर्द से शरीर को जो हानि होती है, उससे बचाव नहीं हो सकता । नशे पीकर या नाच, सिनेमा आदि मनोरंजन के स्थानों में जाकर थोड़ी देर मन बहलाता है, परन्तु शान्ति नहीं। मन ही मन आत्म धिक्कार का दर्द उसे कचोटता रहता है। फलस्वरूप उसके चेहरे पर डरावने भाव उड़ने लगते हैं शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है।
जो एक बार पाप कर चुके है, उन्हें उसके दर्द से छुटकारा नहीं मिल सकता ? ऐसी बात नहीं है। पश्चाताप द्वारा छुटकारा मिल सकता है। पश्चात्ताप का सबसे श्रेष्ठ मार्ग यह है, कि जिस आदमी का अपराध किया हो उसी से क्षमा माँगनी चाहिए और जो कुछ बन सके उसका मुआवज़ा अदा करना चाहिए। केवल बातों से पश्चाताप नहीं हो जाता । जिसने चोरी की है, उसे चाहिए जिसकी चोरी की है, उसके सामने अपराधी की भाँति जाकर खड़ा हो और दोष स्वीकार करते हुए उससे दण्ड देने की प्रार्थना करे। वह जो दण्ड दे उसे स्वीकार करे यदि वह उदारतावश बिलकुल माफ करदे तो भी यों ही न बैठ जाना चाहिए। जितना धन लिया हो उतना या परिस्थिति वश ज्यादा कम हो तो उतना उस व्यक्ति को लौटाना चाहिये। यदि वह न ले तो अधिकारी पात्रों को दान कर देना चाहिये।
इतने दिनों तक वह पाप मन में छिपा रहा इस लिये मन भी गन्दा हो गया, जिस स्थान पर मृतक शरीर पड़ा रहता है, वह अपवित्र समझा जाता है, उसे शुद्ध करने की आवश्यकता होती है। मन शरीर का अंग है, इसलिये शारीरिक शुद्धि के लिए उपवास करना चाहिये। सच्चा प्रायश्चित्त पाप की पुनरावृत्ति न करना है। परमात्मा को साक्षी देकर दृढ़ प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि भविष्य में ऐसा पाप फिर कभी न करूंगा।
अपने पूर्व को प्रकट कर देना भी अच्छा प्रायश्चित्त है। गौ हत्या करने पर गौ की पूँछ हाथ में लेकर जगह-जगह अपने अपराध की घोषणा करते फिरने का हिन्दू धर्म शास्त्रों में विधान है। कारण यह है कि जिस प्रकार का पाप एक बार किया था वैसा ही फिर भी बन पड़ने का बहुत अन्देशा रहता है। पाप को प्रकट करने पर सर्व-साधारण को मालूम हो जाता है कि इसने अमुक कार्य ऐसा किया था, अतएव वे सावधान रहते हैं और उस व्यक्ति को फिर पास करने का मौका ही नहीं मिलता ।
यदि सच्चे हृदय से पाप का पश्चात्ताप किया जाय तो उसके भयानक परिणाम से छुटकारा मिल सकता है और पाप नष्ट हो सकता है।
(गुलिस्तां से)
लोगों ने बिच्छू से पूछा तुम जाड़े में बाहर क्यों नहीं निकलते? उसने उत्तर दिया-गर्मी में ही मेरी कौन बड़ी इज्जत होती है कि जाड़े में भी निकलूँ।
किसी ने एक बुद्धिमान मनुष्य से पूछा भाग्यवान कौन है और अभागा कौन है? उसने उत्तर दिया- ‘भाग्यवान वह है जिसने बोया और खाया’ अभागा वह ‘है जो मर गया और छोड़ गया।’
कोई बुद्धिमान किसी मूर्ख से विवाद नहीं करता कड़ी बात सुन कर भी बुद्धिमान अपनी सज्जनता से उसके हृदय को अपने वश में कर लेता है। किसी दुष्ट ने एक भले मानस को गाली दी उससे गर्मी से जवाब दिया तुमने मुझे बुरा कहा है मैं उससे भी ज्यादा बुरा हूँ।
एक बुद्धिमान जब विद्वानों की सभा में जाता तो सदा चुप रहता । किसी ने पूछा आप सभी में बोलते क्यों नहीं? उसने उत्तर दिया - मैं डरता हूँ कि लोग मुझ से वह बात न पूछ बैठें जो मैं नहीं जानता । तुमने सुना है, कि एक सूफी अपने जूतों के तले में कील ठोक रहा था, एक सरदार ने उसकी बाँह पकड़ कर कहा -चल मेरे जानवर के नाल भी बाँध दे।
एक हाथ पैर कटे हुए आदमी ने एक कान खजूरे को मार डाला । एक साधु उधर से आ निकला और बोला सुभान-अल्लाह। इस जीव के हजार पैर थे। पर जब इसका काल आ गया तो एक लँगड़े लूले से भी बचकर भाग न सका।
एक बार मेरे पास जूते न थे, मैं दुखी होकर कोफडडडडडडड की मस्जिद में आया । वहाँ मैंने एक मनुष्य को देखा कि उसके पैर ही न थे। मैंने परमेश्वर को धन्यवाद दिया और नंगे पैरों पर ही संतोष किया।
एक साधू को किसी चीज की आवश्यकता थी। एक भला आदमी उसे एक धनी आदमी के घर ले गया। साधू ने देखा कि वह होंठ लटकाये, भौंहें चढ़ाये और अत्यन्त कठोर रूप धारण किए बैठा है। साधू एक शब्द भी बिना कहे लौट पड़ा, किसी ने पूछा-’तुमने क्या कहा और क्या किया?’ उसने जवाब दिया । मैंने उसकी कृपा को उसके रूप पर ही न्यौछावर कर दिया।
एक पीर ने अपने मुरीद से कहा, मैं लोगों से बहुत परेशान हूँ। वह तो मेरे दर्शन करने के लिये आते हैं। किन्तु मेरा समय नष्ट होता है । मुरीद ने जवाब दिया कि इन लोगों में से जो गरीब हैं उन्हें कुछ कर्ज दे दो और जो अमीर हैं, उनसे माँगने शुरू कर दो। बस फिर कोई तुम्हें परेशान न करेगा।
एक बादशाह किसी महात्मा से मिला और पूछा कि हमारी याद भी आती है? महात्मा ने कहा- हाँ आती है, पर उस वक्त जब कि खुदा को भूल जाता हूँ।
एक अन्यायी ने किसी सूफी से पूछा कि ‘मेरे लिये सब से अच्छी पूजा कौन सी है?’ उसने जवाब दिया कि तुम्हारे लिये दोपहर का सोना सब से अच्छी पूजा है, ताकि थोड़ी देर के लिये तो लोग तुम्हारे जुल्म से बचे रहें।
(श्री मंगलचन्द भण्डारी, देवास)
एक चोर चोरी करता हुआ पकड़ा गया। सिपाही पकड़ कर उसे राजा के पास लाये। राजा ने चोर को अपराधी पाया और उस समय के दंड-विधान के अनुसार फंसी की सजा का हुक्म सुना दिया।
जब फंसी की तिथि निकट आई, तो राज कर्मचारियों ने चोर से पूछा-तू कुछ चाहता है? यदि चाहता हो तो बता, जिसे हम तेरे इस अन्तिम समय में प्रस्तुत करने का प्रयत्न करें। चोर ने नम्रता पूर्वक कहा -भगवन् ! मेरी एक ही इच्छा है कि मृत्यु से पूर्व अपने प्रजापालक महाराज के एक बार दर्शन कर लूँ। यदि आप ऐसा करा सकें, तो मुझे बड़ी शान्ति मिलेगी।
कर्मचारियों ने राजा के पास उसकी इच्छा का संदेश भेजा। राजा दयालु था। उसने एक मरते हुए आदमी की अन्तिम इच्छा को ठुकराना उचित न समझा और खुद ही उठ कर जेलखाने में चोर से मिलने चल दिया।
राजा को आया देखकर चोर ने उन्हें साष्टाँग प्रणाम किया और -श्रीमन्, मैंने जैसा किया वैसा पाया। इसमें मुझे कुछ भी रंज नहीं है कि मेरी मृत्यु होगी, क्योंकि एक दिन तो मरना ही था। रंज मुझे इस बात का है कि मैं एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण विद्या जानता था जो कि मेरे साथ ही लुप्त हो जाएगी, राजा ने पूछा - वह विद्या क्या है? चोर ने कहा - वह है, सोने की कृषि करना।’ मैं खेतों में सोना देने वाले पेड़ उगाना जानता हूँ।
राजा स्वयं इस विद्या को जानने के लिये उत्सुक हो उठा । उसने तुरन्त ही फाँसी की तिथि स्थगित कर दी और चोर से कहा हमें उस विद्या को सिखाओ। जब सिखा चुकोगे, तभी फाँसी दी जाएगी। चोर ने कहा -अधिक नहीं, एक मास पर्याप्त है। इतने दिनों में आप एक खेत अच्छी तरह जुतवा दीजिये।
खेत जोतने का विशेष प्रबन्ध हो गया। दिन रात हल चलने लगे। सारे राज दरबार का ध्यान उस खेत पर था। कोई मिट्टी की परीक्षा करता, कोई जोतने का ढंग सुधारता , कोई नमी की जाँच करता, कोई कुछ करता तो कोई कुछ । राजा खुद दस पाँच वार उस खेत की जुताई देखने जाते, बड़ी उत्सुकता और प्रतीक्षा के बाद महीना पूरा हुआ, जैसे तैसे सीखने की तिथि आई। उसी दिन बड़ा उत्सव मनाया गया। सारी प्रजा कौतूहलवश देखने को उपस्थित हुई। भारी भीड़ लगी हुई थी।
नियत समय पर चोर बड़ी प्रसन्नता के साथ मुसकराता हुआ गम्भीरता पूर्वक खेत पर पहुँचा । उसने अपनी जेब में से कुछ काले-काले अत्यन्त ही छोटे बीज निकले, जो देखने में किसी जंगली घास के से प्रतीत होते थे। उन बीजों को बड़े गर्व के साथ उसने संभाल-संभाल कर हथेली पर रखा और एक ऊँची जगह पर खड़े होकर सारे प्रजाजनों को वह बीज दिखाया और कहा आप,”लोग देखें! यही स्वर्णलता के बीज हैं ‘इन्हें मैं शल्य देश से बड़े प्रयत्न पूर्वक लाया था और इनके लगाने की सारी विद्या सीख कर आया था । इन बीजों से जो पौधे उत्पन्न होंगे, वह सेरों सोना रोज दिया करेंगे।” इसके बाद उसने बड़े दुख के साथ एक लम्बी साँस खींची और “कहा’-हाय ! मैं पहले से ही चोर न हुआ होता, तो खुद ही सोने की खेती करता और पृथ्वी का कुबेर बन जाता।”
लोगों ने पूछा-चोरी करने से और उन बीजों से क्या सम्बन्ध? उसने कहा बस यही तो कठिनाई है, इन्हें वही बो सकता है, जिसने कभी चोरी न की हो। आप में से जिसने कभी चोरी न की हो, वह आगे आवे और महाराज के इस खेत में बीज बो दे।
प्रजाजन सब चुपचाप खड़े थे। कोई ऐसा न था, जिसने कभी चोरी न की हो। जब चोर ने उधर सन्नाटा देखा तो हाथ पर बीज रखे, राजकर्मचारियों की ओर मुड़ा, पर वे भी सब काठ की मूर्ति की तरह खड़े थे। सारी भीड़ में एक भी ऐसा न था, जो अपने को निर्दोष समझता हो, कभी न कभी हर एक चोरी कर चुका था। अब राजा की बारी आई। उस सन्नाटे को चीरता हुआ चोर राजा के समक्ष पहुँचा और कहा-महाराज ! आप ही इन बीजों को बो दें। परन्तु महाराज का हाथ भी न उठा। वे भी अपने घर में अनेक बार चोरी कर चुके थे। चोर मस्तक झुकाये खड़ा था। फैले हुए हाथों पर स्वर्णलता के बीज रखे हुए थे पर बोने वाला कोई न था।
घन्टों बीत गये। चोरों का हज्जूम एक-एक करके खिसकता गया। राज दरबारी भी चले गये। राजा के सामने अकेला चोर खड़ा था, वह चरणों पर झुक गया और कहा -’महाराज ! मुझ अकेले ही को फंसी क्यों?’
राजा विचारक था और दयालु भी। उसने मनुष्य प्राणी की आन्तरिक कमजोरियों का दार्शनिक अनुभव किया और चोर से कहा- “जा तुझे अकेले को ही मैं फंसी नहीं दे सकता।”
मनुष्य ईर्ष्या से अन्धा बनता है। दूसरों के पाप तो आँखों के सामने रखता है, पर अपना पाप पीठ पीछे। दूसरों को क्षमा कर दो, प्रभु तुम्हें क्षमा करेगा।
*****
सज्जनों के साथ नर्क में रहना अच्छा, पर दुर्जनों के साथ स्वर्ग में रहना अच्छा नहीं क्योंकि सज्जन लोग अपने पुनीत कर्तव्यों से नर्क को भी स्वर्ग बना लेते है और दुर्जन लोग स्वर्ग को भ्रष्ट करके उसे नर्क बना डालेंगे।
*****
जो मनुष्य न मिलने योग्य चीजों को चाहता है और जो शक्ति रहित होकर क्रोध करता है। ये दोनों ही मनुष्य अपने शरीर को नाश करते हैं।
(ठा॰ रामकरणसिंह वैद्य, जफ रापुर)
मनुष्य के हृदय में पाप वृत्तियाँ जब प्रवेश करती है, तो बहुत धीरे-धीरे आती हैं। उनका आगमन ऐसी मंदगति से होता है, कि हमें उनका पता भी नहीं लग पाता और जब वे पूरी तरह कब्जा कर लेती हैं, तब कुछ ज्ञान होता है। चूहे को पकड़ने के लिए बिल्ली बहुत धीरे-धीरे कदम बढ़ाती है, मछली को निगलने के लिये बगुला बहुत ही सावधानी से पाँव धरता है और जब अपने शिकार को बेखबर देखा कि चट कर जाते हैं, फिर उनके मुँह में से निकल भागना मछली या चूहे के लिए बहुत कठिन होता है।
असंख्य भले आदमी बुराइयों के शिकार हो जाते है। पहले उनके हृदय बहुत शुद्ध थे, पापों से घृणा करते थे, किन्तु जब उनके मन में धीरे धीरे दुष्ट वृत्तियाँ घुसने लगीं, तो वे जागरुक न थे, वे बेहोशी में पड़े रहे, इधर वे विकार मन में धीरे-धीरे बढ़ते रहे, परिणाम यह हुआ कि दिन उनके समस्त गुणों को हटा कर बुरे विचारों ने अपना कब्जा कर लिया, वे मन ही मन पुराने अच्छे जीवन को प्राप्त करने के लिये तड़पते हैं, पर लाचार हैं, बुरी आदतों ने उनके ऊपर अपना पूरा अधिकार कर लिया है, पूरी तरह गुलाम बना लिया है।
इसलिए जो लोग अपने जीवन को पवित्र और निर्मल बनाये रखना चाहते हैं, कि वे प्रति दिन सोने से पूर्व आत्म निरीक्षण कर लिया करें, आज क्या बुराई हमने की ? आज क्या बुरे विचार हमारे मन में आये ? इन दोनों प्रश्न के उत्तर खूब बारीकी से ढूंढ़ने चाहिए और जो बुराइयाँ हुई हों, उनके लिये ईश्वर से क्षमा माँगते हुए दूसरे दिन सावधान रहने की प्रतिज्ञा करनी चाहिये । इस प्रकार यदि रोज आत्म-निरीक्षण का क्रम जारी रखा जाए , तो हम उन समस्त पापों से बच सकते हैं, जो पहले चुपके चुपके आते हैं और अन्त में नष्ट कर डालते हैं।
(श्री॰ आनन्दकुमार चतुर्वेदी ‘कुमार’ छिवरामऊ)
किसी गाँव के बाहर रास्ते के किनारे एक बड़ा विषधर सर्प रहता था। उस मार्ग से निकलने वाले मनुष्यों को डस लेता था, इस कारण उसके भय से उस मार्ग से लोगों का आना जाना बन्द हो गया। संयोगवश एक दिन एक महात्मा उस गाँव में पधारे, लोगों ने उनकी सेवा-शुश्रूषा की । जब वह महात्मा उस मार्ग से जाने लगे , तब लोगों ने उनको रोका और निवेदन किया कि महाराज इस रास्ते में एक बड़ा विषधर सर्प रहता है, जो सबको काट लेता है। इस पर महात्मा ने उत्तर दिया, हम निर्भय हैं, हमारा साँप कुछ नहीं कर सकता, महात्मा उसी मार्ग से चल दिये। सर्प महात्मा को देखकर फुंसकार देता हुआ उनकी ओर दौड़ा, महात्मा ने थोड़ी सी मिट्टी उठाकर मन्त्र पढ़ कर उस पर फेंकी, सर्प वहीं स्थगित हो गया। इसके पश्चात् महात्मा ने उसके पास जाकर उसको उसके पिछले जन्म का ज्ञान कराया और कहने लगे कि तू अपने पिछले जन्म में लोगों को अत्यन्त कष्ट देता था, इससे तुझको सर्प योनि मिली, अब भी तू नहीं मानता है और लोगों को कष्ट पहुँचाता है, तू सबको डसना छोड़ दे, जिससे तुझको भविष्य में अच्छी योनि मिले। सर्प ने कहा जो आज्ञा, अब मैं भविष्य में किसी को नहीं काटूँगा।
महात्मा सर्प को उपदेश देकर चले गये, सर्प ने उस समय से मनुष्यों को डसना बन्द कर दिया। अब तो उस सर्प को सब लोग तथा बच्चे बहुत तंग करने लगे, कोई उस पर पैर रख निकल जाता, तो कोई उसे लकड़ी से उठा कर फेंक देता, बालक उसको पूँछ पकड़ कर घसीटने लगे, साराँश यह कि सर्प अत्यन्त निर्बल हो गया, उसको अपना भोजन ढूंढ़ना भी कठिन हो गया था।
कुछ दिनों बाद उस मार्ग से फिर वही महात्मा निकले तथा देखा कि सर्प अत्यन्त निर्बल तथा दीन दशा में पड़ा है। सर्प से महात्मा ने प्रेम तथा दया से पूछा-तेरी ऐसी दशा क्यों हो गई? सर्प ने उत्तर दिया कि आपकी आज्ञा मानने से।
जिस दिन से आपका उपदेश सुना, मैंने सबको डसना बन्द कर दिया, परिणाम यह हुआ कि मनुष्य तथा बालक सभी ही मुझको तंग करने लगे, यहाँ तक कि मुझको अपना भोजन ढूँढ़ना भी कठिन हो गया। इस पर महात्मा ने सर्प से कहा कि मैंने तुझको काटने के लिये मना किया था, न कि फुंसकार देने के लिये।
आज हिन्दू समाज की ऐसी ही दशा हो गई है। धार्मिक विचारों के कारण वे अपने को हानि पहुँचाने वाले गुण्डे, बदमाश, आततायी लोगों का भी विरोध नहीं करते। फल स्वरूप हिन्दू स्त्रियों तथा बालकों का अपहरण , साम्प्रदायिक दंगों में हिन्दुओं की अधिक हानि आदि दृष्टिगोचर होते हैं। हमें किसी पर आक्रमण नहीं करना चाहिये, पर अपने ऊपर होने वाले हमलों से बचाव के लिए शक्ति-सम्पन्न जरूर रहना चाहिये, जिससे हर कोई मीठा गुड़ समझ कर चट न करने लगे।
अपने व्यक्तित्व का गौरव अक्षुण्ण बनाये रहो। चुलबुलापन और बकवाद तुम्हारे व्यक्तित्व के नाश के कारण हो सकते हैं।
*****
कुत्ता मारा-2 फिरता है, पर वह भी धैर्य रखने से मन भर भोजन पाता है। देखो। सूखे पेड़ धैर्य रखने से हरे भरे हो जाते है।
(ले॰ श्री वी॰ डी॰ ऋषि बम्बई)
जब मैं स्वयं लेखन के प्रयोग कर रहा था, तो मुझे इंग्लैंड में मि॰ बुश का एक तार मिला कि कुछ दिनों के लिये स्वयं लेखन के प्रयोग बन्द कर दीजिये । मैंने उनके आदेशानुसार वह प्रयोग बन्द कर दिये। कुछ दिनों के बाद मेरी स्वर्गस्थ स्त्री ने मि॰ बुश को संदेश द्वारा कहा, कि स्वयं लेखन के प्रयोग बन्द क्यों कर दिये हैं? इन्हें फिर जारी कर दिया जाये। इसका कारण यह बताया गया, कि मेरी स्वर्गस्थ पत्नी मुझसे बातचीत करने के लिये बड़ी उत्सुक है। इसलिये मैंने स्वयं लेखन के फिर प्रयोग आरम्भ किये। तब से मैं निरन्तर रूप से प्रति दिन अपनी पत्नी से बात करता हूँ। उनसे मुझे अनेक सन्देश मिले हैं। इसका कारण भी उन्होंने यह बताया, कि मेरा उन पर अगाध प्रेम है।
इस सम्बन्ध में मि॰ बुश ने मुझे 30 वीं मार्च को एक पत्र में लिखा-’28 वीं मार्च की सन्ध्या को साढ़े सात बजे मुझे एक आश्चर्यजनक अनुभव हुआ। मेरी सारी पीठ जलने लगी मालूम होता था, कि कोई गर्म प्रवाही वस्तु मेरी पीठ में लगा दी गई हो । आपकी जब पत्नी आती है, तब मुझे ऐसा ही अनुभव हुआ करता है। मैंने मन में प्रश्न किया ‘क्या श्रीमती ऋषि पत्नी हैं?’ इस प्रश्न के उत्तर में मेरे घुटने पर रखे हुए हाथ ने तीन ठोंके मेरे घुटने पर मारे, अर्थात् “हाँ, हाँ”। मैंने उनका मन ही स्वागत किया और कुछ देर तक मन ही मन बात-चीत भी करता रहा। मैं मन में उनसे प्रश्न करता और वे मुझे हाँ- न, के ठोंके मार कर बता देती थी। मैंने उनसे पूछा, कि मैंने ऋषि जी को स्वयं लेखन के प्रयोग करने की स्वीकृति दे दी थी, क्या आप श्रीमती ऋषि जी बात-चीत करती हैं? उन्होंने उत्तर में कहा, ‘हाँ’ । इस उत्तर के बाद आपका पत्र मिला। मैंने अनुमान किया, कि यह आपके पत्र के साथ ही आई हैं।
इंग्लैंड में आत्माओं को प्रत्यक्ष देखने वाले एक मीडिया को भी मेरी स्त्री दिखाई दी थी। इस सम्बन्ध में मि॰ बुश ने मुझे 28-11-21 के पत्र में लिखा,- ‘हमारे प्रयोगों में आपकी पत्नी आयी थीं। एक मीडिया ने उसे दो बार देखा। एक बार उनकी आत्मा ने बेहोश मीडिया में प्रवेश कर कुछ बात-चीत भी की थी। मालूम होता था, कि अभी आपकी पत्नी के विचार प्राचीन रूढ़ि के हैं। मालूम होता है, कि प्राचीन रूढ़िवादी आत्माओं का उन पर अधिक दबाव है। यह एक अच्छी आत्मा हैं, किन्तु पुराने रूढ़ि के विचारों से वे मुक्त नहीं हुई।
आपकी स्त्री के फोटो से ऐसा देख पड़ता है, कि वे सुन्दर स्त्री और सुन्दर आत्मा रही हैं। आप यह पढ़ कर चकित होंगे, कि इनके संवाद प्राप्ति में जो विक्षेप पड़ता है, उससे भी उन्हें लाभ पहुँचता है। आपकी पत्नी आत्म उन्नति के लिये विशेष रूप से तैयार हैं। इनमें अनेक सद्गुण हैं, किन्तु इनकी आत्मिक उन्नति जीवन काल में परिपक्व नहीं हुई थी, आप शान्ति से ध्यान करो और नये सिद्धान्त ग्रहण करने को सदैव तैयार रहो। फिर भले ही यह नये सिद्धान्त कट्टरपन्थी हिन्दुओं को विसंगत ही क्यों न मालूम पड़ें। आपकी पत्नी के जो विचार जीवनकाल में थे, वही अब भी है। उनकी दिनचर्या में विशेष कोई अन्तर नहीं पड़ा। जिस देवता की पूजा वे परलोक में भी करती हैं। परन्तु अभी इनकी आत्मा की उन्नति नहीं हुई, अचानक परिवर्तन की आशा भी न करना चाहिये। शान्ति और स्वच्छ हृदय से व्यवहार करो।’
इसके उपरान्त जब मैं सन् 1925 और 1928 की अन्तर्राष्ट्रीय परलोक विद्या परिषद में इंग्लैंड गया , तो मेरी पत्नी वहाँ मीडियमों को दिखाई दी। एक पेरिस की मीडिया ने भी उन्हें देखा। मैंने वहाँ अपनी पत्नी की आवाज ट्रम्पेट द्वारा सुनी। एक प्रयोग में उनका फोटो भी आ गया । स्वयं लेखन द्वारा मुझे अपनी पत्नी श्री सुभद्रा देवी से कितने ही संदेश प्राप्त हुए हैं, जिनसे जीवन की पिछली घटनाओं पर प्रकाश पड़ता है। इन संदेशों से यह पता लगता है, कि मेरी पत्नी की कितनी अधिक स्मृति है और उनका कितना अधिक प्रेम है। उनकी बताई हुई कुछ बातों का उदाहरण नीचे देता हूँ। ‘क्या तुम्हें उन पत्रों की याद है, जो मैं तुम्हें बंगले से लिखा करती थी?”, ‘मैंने तुम्हें आपरेशन करवा देने के लिये कितना जोर देकर कहा था”। ‘जिस प्रकार मैं बंगले में एकान्तवास करती थी, उसी प्रकार मुझे एकान्तवास करने की आवश्यकता है’।” “मैं कहा करती थी, कि मेरे पत्र दुनिया को दिखा दो।” ‘जब हम लोग बम्बई रहते थे तब मैं नित्य कुछ मिठाई बनाया करते थे।’ ‘हम लोग नित्य दूर तक घूमने जाया करते थे।’ ‘आप मेरी इच्छा की जरा भी चिन्ता न करते थे।’ मीरज में हम लोग जिस घर में रहे थे, उसमें आँगन नहीं था। विवाह के समय मैं कितने ही लोगों को पसन्द नहीं आई थी । मेरे पेट में व्याधि थी, उसका फोटो एक्सरे गक्रड्डब् से बम्बई और मीरज में लिया था । मेरा स्वभाव तेज था। मैं जरा भी अपमान नहीं सह सकती थी। मैंने जो कविता बनाई थी, वह क्या आपको याद है? एक दिन मैं गुटकेश्वर मन्दिर के कुएं के पास सो गई थी। क्यों आपको उन लड्डुओं की याद है, जो मैंने मीरज में बनाये थे। उसमें से एक लड्डू तो वर्षा तक ट्रंक में रहा था। मैं अपना समय पूजा पाठ में व्यतीत किया करती थी, इसके लिये कुछ लोग विरोध भी करते थे। मेरी पुरानी चीजें अब एक भी नहीं रहीं, दूसरे लोगों ने उन्हें फेंक दिया होगा, इत्यादि।
निश्चय भाव से सबके साथ प्रेम करो। अपने प्रेम बल से दूसरों से चरित्र को सुधारों। उन्हें ऊँचा उठाओ। तुम्हारे आचरण पवित्र होंगे तो तुम निराशों के हृदय में आशा का संचार कर सकोगे।
(श्री रामसेवक गुप्त ‘सेवकन्दु’ सेवड़ा, दतिया)
विश्व में सुख-दुख की कोई व्याख्या नहीं हैं हमारी चार पैसों की आवश्यकता की पूर्ति ही सुख है और आपूर्ति दुख।
किन्तु मानव लोभ तथा अज्ञान के वशीभूत होकर क्षण-क्षण पर गला फाड़ कर सुख और दुख को चिल्लाता है।
सुख की गोदी में पले हुए, जीवन में आनन्द उल्लास-सागर में क्रीड़ा करने वाले मनुष्य को जीवन की विषम परिस्थितियों को, उतार-चढ़ाव का और संसार के कटु वातावरण का क्या अनुभव होगा?
वह कूप मंडूप होगा। उसे तो जीवन के सुनहले स्वप्नों का- मीठे मीठे सुरीले स्वरों का- कोमल मखमल रेशम का और मिठास, धन तथा यौवन का ही केवल ज्ञान होगा।
वह सुर्खाब के पर वाला धन तथा यौवन के गर्व में चूर होकर मदान्ध हो गया होगा, तथा पथ- भ्रष्ट हो कर उस सच्चिदानन्द परमात्मा को भूल गया होगा!
किन्तु दुख में मर्मभेदिनी आह और टीसें, क्रन्दन तथा रोदन, भीषण कटुता, जीवन की कसौटी टिमटिमाती आशा और जीवन के धुँधले स्वप्न होंगे और प्रभु के ऊपर श्रद्धा करने को जी चाहेगा।
तब प्यारे दुख, आओ! तुम्हारा सानुराग आवाहन और स्वागत करें, क्योंकि तुम्हारी अठखेलियाँ उस सच्चिदानन्द प्रभु का सुन्दर रूप दिखाती है, ओर सहनशीलता तथा सन्तोष का मधुर पाठ पढ़ाती हैं। तुम सचमुच प्रशंसनीय तथा सराहनीय हो। तुम्हारा आरम्भ तीव्र कटु है, किन्तु अन्त में अत्यंत मीठा है। कड़वी औषधि ही अन्त में लाभदायक होती है और पुष्प तोड़ने वाले को ही अपना हाथ कांटों से छेदना पड़ता है।
तब दुख सुख से उत्तम है तथा दुख ही सुख का जनक है।
(ले॰ पं॰ भोजराज शुक्ल, ऐत्मादपुर, आगरा)
मैंने सितम्बर मास के अखण्ड ज्योति में ‘दीर्घायु होने के उपाय’ शीर्षक लेख में प्राणायाम की सुगम विधि बतलाने को लिखा था, अतएव आज मैं पाठकों को प्राणायाम की ऐसी सुगम क्रिया बतलाना चाहता हूँ, जिसके नियम पूर्वक करने से विशेष लाभ होगा। यह वचन माननीय है कि बिना गुरु के किसी कार्य में सफलता प्राप्त नहीं होती, परन्तु श्रद्धा, विश्वास तथा साहस और उत्साह से भी कभी-2 कार्य सिद्ध हो जाते हैं। जिस प्रकार एकलव्य नामक भील ने गुरु द्रोणाचार्य की मृत्तिका मूर्ति अपने सन्मुख रख कर श्रद्धा तथा विश्वासपूर्वक उस मूर्ति में गुरु द्रोणाचार्य की भावना करके अर्चन वन्दन करते हुए धनुर्विद्या में सफलता प्राप्त कर ली थी, जिसके सन्मुख श्रीकृष्ण भगवान के सखा तथा भक्त अर्जुन को उसके सन्मुख नत मस्तक होना पड़ा। अतएव प्राणायाम क्रिया को यदि नियम से किया जावे, तो उसमें भी सफलता प्राप्त हो सकती है। प्राण और अपानवायु के संयोग को प्राणायाम कहते हैं, साधारणतः इसमें तीन क्रियायें होती है (1) रेचक, (2) पूरक, (3) कुँभक वायु को नासिका मार्ग से धीरे-धीरे बाहर निकालना रेचक, शुद्ध वायु को नासिका मार्ग से धीरे- 2 पेट में भरना पूरक, पेट में भरी हुई वायु को पेट में ही स्थिर रखना कुंभक कहलाता है। दाहिने नथने से श्वास चलने को पिंगला नाड़ी का चलना कहते हैं। बाँये नथने से श्वास चलने को इड़ा नाड़ी का चलना कहते है तथा दोनों नथुनों से जब श्वास निकलती है, तो उसको सुषुम्ना नाड़ी का चलना कहते हैं, सुषुम्ना नाड़ी मूलाधार (गुदा ) से प्रारम्भ होकर मेरु दण्ड (रीढ़) के बीचों बीच छिद्र में होती हुई ब्रह्मरन्ध्र तक जाती है, सुषुम्ना नाड़ी के बाँयी ओर इड़ा नाड़ी (चन्द्रनाड़ी) बाँये नथने तक चली गई है, तथा सुषुम्ना के दायीं ओर पिंगला नाड़ी (सूर्य नाडी) दाहिने नथने तक चली गई है। अब प्राणायाम की विधि कहता हूँ।
विधियाँ
जिस आसन का अभ्यास हो, उसी आसन को सुख पूर्वक लगाकर अपनी रीढ़ को तना हुआ सीधा रक्खो किसी ओर को हिले-जुले नहीं, ठोड़ी को छाती से लगाकर दृष्टि नासिका के अग्र भाग पर जमाओ तथा हाथों को आगे अपनी गोद में रखलो, फिर दाहिने हाथ में अंगूठे से दाहिने नथने को दबाकर बाँये नथने से वायु खींचकर उदर में धारण करो, पेट में यथाशक्ति वायु को रोके रहो तथा अनामिका और कनिष्ठिका अंगुलियों से बाँये नथने को भी बन्द करलो, साथ ही प्रणव (ॐ) का जप करते रहो, अथवा जो तुम्हारा इष्ट मन्त्र हो, उसे जपते रहो, इसे आन्तर कुँभक कहते हैं। वायु को पेट में थोड़ी देर रोको और फिर दाहिने नथने से अंगूठा हटा कर उदरस्थ वायु को अत्यन्त धीमी गति से बाहर निकाल कर बाहर ही रोक दो, अँगूठे से दाहिने नथने को फिर बन्द कर लो, इसे बाह्य कुँभक कहते हैं, प्रणव का जप बराबर करते रहो, थोड़ी देर बाद दोनों नथुनों को खोल कर वायु धीरे-2 पेट में भर लो, यह एक प्राणायाम हुआ। इस प्रकार न्यून से न्यून तीन प्राणायाम अवश्य करने चाहिये तथा धीरे-धीरे अभ्यास करके वायु निरोध करने की शक्ति बढ़ानी चाहिये, परन्तु हठ कदापि न करना, अति हठ करके वायु को रोकने से उसके कुपित हो जाने का भय रहता है, जिसके कारण हिचकी, दमा , खाँसी, आँख, कान और शिर के रोग उत्पन्न हो सकते हैं यदि प्राणायाम नियमपूर्वक सामर्थ्यानुसार खुली तथा स्वच्छ वायु के स्थान में किया जाएगा तो इससे जठराग्नि तीव्र होकर स्वास्थ्य तथा आयु की वृद्धि होगी। उपरोक्त प्राणायाम विधि के विपरीत भी रेचक, पूरक क्रियायें करनी चाहियें, अर्थात् दाहिने नथने से वायु खींच कर बायो नथने से निकाल देना चाहिये। पूरक, कुँभक और रेचक करते समय प्रणव (ॐ) का जप दस-दस बार करते रहना चाहिए, पन्द्रह दिन अभ्यास कर लेने के पश्चात् बीस-बीस बार, तथा एक मास के पश्चात् तीस-तीस बार जप करना चाहिये। इसी प्रकार क्रमशः जप संख्या बढ़ाते रहना चाहिए।
अभ्यसेन मनसा शुद्धं, त्रिविद् ब्रह्माक्षरं परम। मनो यच्छेज्जित श्वासों, ब्रह्म बीजमनिस्मरन्॥ त्रिवित् ओंकार-रूपी ब्रह्म का अभ्यास मन से करे। प्राणायाम को रोक कर ब्रह्म बीज (ॐ) का स्मरण करता हुआ मन का निग्रह करे॥
अपनी शक्ति से बाहर कदापि प्राणायाम न करे, इस पर पूर्ण ध्यान रखना चाहिये, साधारण प्राणायाम की विधि रही है, जो कि आरोग्यप्रद तथा आयु वृद्धि करता है।
एक मनुष्य एक बीमार के सिरहाने रात भर रोया। जब दिन निकला तब रोने वाला तो मर गया, किन्तु बीमार अच्छा हो गया। जनाब, बहुत तेज घोड़े गिर गये हैं, पर लँगड़े गधे न कुशल पूर्वक यात्रा समाप्त की है। अक्सर हट्टे कट्टे पुरुष कब्र में डाल दिये जाते हैं और घायल आदमी मौत से बच जाते हैं।
एक गरीब लकड़हारा जंगल में लकड़ियाँ काट रहा था किसी ने उससे कहा-’देश के बड़े बड़े लोग ‘हातिम’ के यहाँ खाना खाते हैं। तू भी उनका मेहमान क्यों नहीं हो जाता?’ लकड़हारे ने जवाब दिया, ‘जो आदमी अपनी मेहनत से रोटी खाता है, उसे हातिम का एहसान उठाने की क्या जरूरत?’
(श्री त्रिलोकनाथ जी)
सब लोग चित्त का संतोष और सच्चा आनन्द प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार के उपाय करते हैं। किन्तु धर्म प्रवृत्ति को अपनाने से जो सुख मिलता है, वह और किसी प्रकार नहीं मिल सकता, जो ईश्वर के बँधे हुए नियमों के अनुसार सदा सत् कर्म करते है, उनको आत्म प्रसाद का सच्चा सुख मिलता है, उनका मन विकसित पुष्पों के समान सदा प्रफुल्लित रहता है। जो लोग कह सकते हैं कि हम अपनी सामर्थ्य भर ईश्वर के नियमों का पालन करते हैं, यथा शक्ति परोपकार करते है, सब लोगों के साथ अनीति छोड़ कर नीति पूर्वक सुहृद-भाव रखते हैं, वही सच्चे सुखी हैं। वे अपने निर्मल चरित्रों को बारम्बार स्मरण करके परम संतोष पाते हैं। ऐसे धर्म-प्रवृत्त मनुष्य की ओर उसके शुभ कर्मों को चाहे, लोग न जानते हों, चाहें उसे अपनी प्रशंसा सुनने का अवसर कभी प्राप्त न होता हो, तथापि वह अपने कर्तव्य कर्मों से ही अपने को कृतार्थ करते हैं। दुखियों के दुख मिटाने तथा किसी अज्ञान के मार्ग पर अग्रसर करने की एक-एक बात बड़े से बड़े राज्य के मिलने पर भी दूसरे लोग नहीं पा सकते।
हमें चाहिए कि धर्म की प्रवृत्ति को अपनावें। यही प्रवृत्ति सुधार का सच्चा मार्ग है। क्योंकि मनुष्य से यदि कोई भूल हुई, तो वह तुरन्त ही सचेत कर देगी और हम अपनी भूल को अंगीकार करके उसे सुधारने को यत्न करेंगे। पर यदि निकृष्ट प्रवृत्ति प्रबल हुई तो छल से उसे छिपाना चाहेंगे या अपनी भूल दूसरों के शिर मढ़ना चाहेंगे और एक अपराध को छिपाने के लिए दूसरा अपराध करेंगे। यह स्मरण रखना चाहिए कि धर्म-प्रवृत्ति से आत्म प्रसाद और निकृष्ट प्रवृत्ति से आत्म ग्लानि होना अवश्यम्भावी है और यही वस्तुयें सुख दुख का मूल हेतु हैं।
एक बिलकुल सत्य घटना -
(श्री रामरत्न वड़ोला, ‘शूल’ गंगोह)
उस दिन मैं पौड़ी (गड़वाल) से गाँव लौट रहा था। शाम हो चली थी। फिर भी युवावस्था का जोश और निर्भय स्वभाव के कारण किसी प्रकार की चिन्ता न थी, हाथ में मोटा सा डंडा लेकर हमेशा की भाँति चल पड़ा, डर जैसी चीज मेरे मस्तिष्क में न थी। भूत-प्रेतों की बात निर्बल मनुष्यों की मानसिक कल्पना से बढ़ कर मुझे और कुछ प्रतीत न होती थी। इसलिये रास्ते में ‘भूत मिलने’ का तो स्वप्न में भी खयाल न था। सूरदास का एक पद गाता हुआ मैं उस पहाड़ी इलाके के झाड़ झंखाड़ों से भरे हुए रास्ते को पार करता हुआ उस घनघोर अन्धकार में भी प्रसन्नता पूर्वक चला जा रहा था।
रास्ते में एक घने झुरमुट में अचानक किसी के खाँसने की आवाज आई। मुझे प्रसन्नता हुई कि शायद कोई रास्तागीर इधर से जा रहा है, चलो साथ हो जाएगा। खाँसने वाले को तलाश करने के लिये मैंने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई, तो सामने वाले पेड़ के सहारे एक आदमी खड़ा हुआ दिखाई दिया। मैं उधर बढ़ना ही चाहता था, कि उस व्यक्ति ने मुझे पुकारा भाई तेरे पास बीड़ी है? मेरी जेब में बीड़ी और दियासलाई थी, मैंने उसे दोनों चीजें दे दीं। बीड़ी पीता हुआ वह मेरे साथ चलने लगा। मुझे एक साथी पाकर प्रसन्नता हुई।
कुछ दूर आगे चलने पर उसने फिर बीड़ी माँगी, मैंने उसे फिर दी। उसने दियासलाई जलाई तो उसके पाँव पीछे की ओर मुड़े हुए दिखाई दिये। मैंने सुन रखा था कि भूत के पाँव उलटे होते हैं। भ्रम समझ कर मैंने कई बार आँखें मलीं और ध्यान से देखा तो सचमुच उसके पाँव उलटे थे। इस घोर घने एकान्त और निर्जन स्थान में भूत से पाला पड़ने के डर से मेरी छाती धक-धक करने लगी। एक क्षण के लिए मैं स्तब्ध खड़ा रह गया। इतने में क्या देखता हूँ कि साथी गायब है और चारों ओर आग के जलते हुए गोले उछल कूद रहे हैं और एक तरफ से गाने -बजाने की आवाज आ रही है।
इस दृश्य ने मुझे भयभीत बना दिया था, फिर भी मैंने हिम्मत नहीं छोड़ी और साहस करके अपने डंडे को जमीन पर खटखटाया। अब वह दृश्य गायब हो चले थे, पर अचानक वही व्यक्ति फिर कहीं से मेरे सामने आ खड़ा हुआ । उससे बोलने की हिम्मत न होती थी। पर उसने खुद ही मुझे न डरने का आश्वासन दिया और पीछे-पीछे चले आने को कहा। उसने फिर बीड़ी माँगी, मैंने दे दी। पर एक शब्द भी मेरे मुँह से न निकल सका। जब उसने दियासलाई जलाई तो मैंने देखा कि उसकी टाँगें सीधी हैं, पर पैर घुटने पर से गायब हैं। दो तीन मील मैं उसके साथ चला आया, रास्ते में कई बार उसने मुझे निर्भय रहने का आश्वासन दिया। आगे एक घाटी के पास जब हम आये तो फिर अचानक कलेजा हिला देने वाली घटना हुई- दहाड़ने की सी बड़ी भयानक एक गगनभेदी ध्वनि हुई, मैं बेंत की तरह काँपने लगा । आगे देखता हूँ कि लकड़ियों का एक ढेर जल रहा है और उस ढेर में से जलती हुई लकड़ियाँ ले ले कर दो मनुष्य आपस में लड़ रहे हैं। मुझे पेड़ पर चढ़ना सूझा । प्राणों के भय ने एक कटीले पेड़ पर भी ऊंचा चढ़ा दिया।
कुछ देर में लड़ाई शान्त हुई। वही मुसाफिर फिर मेरे निकट आया और आश्वासन देते हुए आगे चलने को कहा । मैं संज्ञा शून्य हो रहा था । डर के मारे बुद्धि भी कुछ काम न करती थी, जबान बन्द थी। मन्त्र मुग्ध की तरह मैं उसके पीछे पीछे चल दिया। गाँव के निकट पहुँचने से पूर्व एक फूंस करता हुआ साँप मिला, जिसे उठा कर उसने एक और फेंक दिया।
आधी रात हो चली थी, अब हम गाँव के बिलकुल निकट पहुँच गये। अब मेरा भय दूर हुआ और जबान खुलने लगी। इस विचित्र साथी से मैंने नम्रता पूर्वक पूछा, आप कौन हैं? आगे कहाँ जाएंगे? रास्ते में यह घटनाएं कैसे हुई थी? उसने एक साँस में ही तीनों प्रश्नों का उत्तर दे डाला- ‘मैं प्रेत हूँ-पूर्व जन्म का तुम्हारा मित्र हूँ-तुम्हारी रक्षा के लिये साथ-साथ यहाँ तक आया हूँ-रास्ते में दूसरी दुष्ट आत्माएं मिली थीं, वे तुम्हें हानि पहुंचाती, मैंने उन्हें तथा उस सर्प को हटाया और अब तुम्हें सुरक्षित पहुँचा कर वापिस जाता हूँ।’ मैं उससे और कुछ कहना ही चाहता था, कि साथी अन्तर्ध्यान हो गया।
उस दिन से मैं प्रेतों के अस्तित्व पर विश्वास करने लगा हूँ और समझता हूँ कि वे केवल हानि ही नहीं पहुँचाते, परन्तु जिसे वे चाहते हैं, लाभ भी पहुँचाते हैं और रक्षा भी करते हैं।
मनुष्य का जीवन तीन वस्तुओं से पूर्ण बनता है, (1) काम करने का अभ्यास, (2) ईश्वर में अटूट विश्वास, (3) प्राणिमात्र की सच्ची सेवा।
*****
मनुष्यता सीखने की सबसे बड़ी पाठशाला अपना घर है। स्नेह और त्याग क्षमा, और उदारता की भावनाओं के विकास के जितने सुन्दर अवसर अपने घर में मिल सकते हैं, उतने और कहीं नहीं मिल सकते।
*****
संसार में शान्ति तभी स्थापित होगी, जब बलवान लोभी होना छोड़ दें और जो निर्बल हैं, वे बलवान बनना सीखें।
(पं॰ श्रीराम वाजपेयी)
क्वेटा का भूकम्प अभी हाल की ही बात है। बात की बात में सारा शहर मेसमार होकर एक ईंट पत्थर का ढेर बन गया। आलीशान और खूबसूरत इमारतें खाक में मिला गई और माल-असवाब तथा धन, जन का गहरा नुकसान हुआ। इस लम्बे चौड़े ढेर के खास स्थान पर एक कुत्ता रोज सुबह शाम आता और रोने की आवाज लगाता। लोग उसे चुचकारते पर वह उनकी तरफ देखता तक नहीं। जो खाने पीने का सामान दिया जाता, वह उसे सूँघता तक नहीं। उसे इन्सान से नफरत सी हो गई। वह पागल सा हो गया। अब लोग उसे पगला कुत्ता कह कर दुत्कारने लगे। वे अब उस पर पहले की तरह तरस न खाते।
पगली हालत में भी वह कुत्ता उस स्थान पर विशेष कर जाता और सुबह-शाम धाड़ें मारता। एक दिन उस कुत्ते के उसी स्थान पर दम निकल गया।
जब खुदाई शुरू हुई तो उस स्थान विशेष पर एक लाश निकली। यह लाश करीब के गाँव के रहने वाले एक आदमी की थी। वह कुत्ता जिसका जिक्र ऊपर हो चुका है, उस आदमी का पालतू था। अपने मालिक को मकान पर न पाकर इस कुत्ते ने अपनी सूँघने की शक्ति से उस स्थान का पता लगा लिया, जहाँ वह ढेर के नीचे दबा पड़ा था । दिन और राम में कुत्ता गाँव में रहता और सुबह शाम वहाँ जाकर अपने मलिक की अलख जगा जाता। खाने पीने को तिलांजलि देकर और अलख जगा जगा कर वह उस लोक में अपने स्वामी से जा मिला।
असली पता चलने पर लोग कुत्ते की भूरि-भूरि प्रशंसा करते और कहते-’जेहिकर जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलत न फल सन्देहू।’
(ले. श्री राम भरोसे पाठक, अध्यापक नदीगाँव)
अपने इष्ट देवों की पूजा के लिये साधक लोग भिन्न भिन्न प्रकार से आराधना करते हैं। सच्चिदानन्द परमात्मा या गणेश, शिव, दुर्गा आदि उसके विभिन्न नामों एवं रूपों की पूजा एक ही बात है। अलग अलग नाम रख लेने या अलग अलग स्वरूपों का ध्यान करने से परमात्मा की अखण्डता में कोई फर्क नहीं आता। कोई किसी देवता को पूजे तत्वतः वह ईश्वर की ही पूजा है-’सर्व देव नमस्कारं केशवं प्रति गच्छति।’
पूजा उपासना की अनेक विधियाँ सम्प्रदायों या देश काल के अनुसार प्रचलित हैं। बाह्य दृष्टि से देखने पर इनमें विरोधाभास होता है। कई विधियाँ तो बहुत टेढ़ी मेढ़ी, कष्ट साध्य और बहुत देर में लक्ष तक पहुँचाने वाली होती हैं। कई स्थलों पर उनमें ऐसी पेचीदगियाँ भी होती हैं, जिनमें भटक जाने पर साधना भ्रष्ट तान्त्रिकों की तरह बड़े भारी खतरे का सामना करना पड़ता है। कई साधना, बहुत समय, श्रम और धन चाहती हैं।
तत्वदर्शी योगियों ने इन सब कठिनाइयों से साधकों को बचाने के हेतु एक सार्वभौम उपासना की विधि का उद्घाटन किया था। यह विधि थी ‘मानसी पूजा।’ मानसी पूजा का अर्थ है, मन में ही आराधना करना। इसके लिये किसी बाहरी वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ती। प्रतिमा पुस्तक, पुष्प, धूप, दीप, चन्दन अक्षत आदि किसी की कुछ आवश्यकता नहीं होती। वास्तव में इन वस्तुओं द्वारा की जाने वाली उपासना बहुत ही आरम्भ की है। जैसा बालक पहले अ, आ, इ, ई, लिखते हैं। जब मन अधिक गहरा उतरता है और सूक्ष्म लोक में प्रवेश करता है, तब तो यह वस्तुएं उलटी ध्यान बटाने की बाधा उपस्थित करती हैं। इसी लिये योगाभ्यासी किसी बाह्याचार में नहीं पड़ते और प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि के मानसी आचारों का अभ्यास करते हैं।
योग शास्त्र बतलाता है, कि आपको जो अभीष्ट हो, उस की मानसी पूजा कीजिए, आत्म कल्याण के लिये ईश्वर की आराधना करते हैं, या उसके किसी गणेश, सूर्य आदि प्रतिबिंब को अपना आराध्य बनाया है, तो उसका साकार निराकार जैसा कुछ रूप आप ठीक समझते हैं, अपने हृदय में धारण कीजिये, उसी रूप की स्पष्ट कल्पना अपने मनो लोक में कीजिये चित्त को रोक कर बार ध्यान करने से वह मूर्ति स्पष्टतः अपने भीतर प्रतिष्ठित हो जाएगी। सूक्ष्म नेत्रों से उसके दर्शन अच्छी तरह किये जा सकेंगे।
अपने इष्ट देव के ध्यान में स्थित होकर उन्हीं में अपने को तन्मय करने का प्रयत्न कीजिये। मानसी पूजा के लिये धूप, दीप आदि बाहरी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि वह इष्ट देव आराध्य है तो आत्मा आराधन या आराधना की सामग्री। जैसे यज्ञ में आहुत डालते समय सामग्री को अग्नि में डाल कर उसी के स्वरूप में मिला देते हैं, और आहुत के साथ कहते हैं। ‘इदन्नमम’ अर्थात् यह यह मेरा नहीं है। इसी प्रकार आप इष्टदेव रूपी यज्ञ में अपनी आत्मा को समिधा रूप में जलाकर दीजिये और भावना कीजिये कि इसमें मेरा कुछ नहीं है जब अपने ‘आपे’ को भुला कर हम तदाकार होते हैं तो दो वस्तुएं नहीं रहतीं। या तो इष्टदेव ही रह जाता है या आत्मा ही,बात एक ही है। यही तदाकारता सच्ची उपासना है, इसी, को अद्वैत साधन कहते हैं।
संसार में आपका जो भी लक्ष हो उसी की मान सी पूजा कीजिये, उसी में तदाकार हो जाइये, इसके लिये किसी आसन, स्थान, समय आदि का प्रतिबंध नहीं है। जैसी भी स्थिति में रहें, अपने को अपने इष्ट-उद्देश्य में पिरोते रहिये। बस आप की पूजा सफल हो जाएगी और इच्छित फल मिल जायगा।
(वि॰ रामस्वरूप ‘अमर’ साहित्य रत्न,)
शिखा शब्द ‘शिख् जाने अर्थ धातु से बनता है जिसका अर्थ शिखा यानी ब्रह्मरन्ध्रस्थ वालों के द्वारा जीवन शक्ति का आना और जाना बतलाया “तत्सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत” इसमें बतलाया गया है, मनुष्य शरीर में ब्रह्मरन्ध्र के द्वार है, जिसके द्वारा परमात्मा का प्रवेश होता है। इस परमात्मा को जीवात्मा कहते हैं। यही नियम है, कि मनुष्य या प्राणी मात्र गर्भ स्थिति में रहता है, तो प्रथम शिर की रचना होती है, बाद में दूसरे अंग प्रत्यंगों की। हमारे पूर्वज ऋषि महर्षियों का यह अनुभूत सिद्धान्त है कि प्राणों का गमन यदि ब्रह्मरन्ध्र के मार्ग से हो तो अवश्य इस संसार से आवागवन् छूट जाता है, क्योंकि “गो-गोचर जहाँ लग मन जाई। सो सब माया जानहु भाई।” अब जहाँ तक मन की दौड़ है वहाँ सर्वत्र माया भासित होगी। माया से ‘आब्रह्म भुवना लोकाः पुनरा वर्तिनोऽर्जुन’ के सिद्धान्त से आवागवन तो निश्चय ही है। सब वर्णों यानी अंगों में ‘मुखं श्रेष्ठतमं मतम्’ माना है । शिखा रखने का रहस्य मय कारण यह है, कि जो मस्तक की माँस पेशियाँ हैं, वे प्रायः बहुत कोमल होती हैं। उन में जितनी शीघ्रता से सर्दी और गर्मी प्रवेश कर सकती है, उतनी किसी स्थान में नहीं कर सकती सिक्ख लोग जटा (शिखा) आदि पञ्च केशों के रखने से कितने स्वस्थ और सुन्दर प्रतीत होते हैं? यह बाल वीर्य रक्षा के लिये अत्युपयोगी साधन हैं। बारम्बार मुण्डन आदि कृत्यों से मनुष्य की विषय-वासनायें उत्तेजित हो उठती हैं और विषय वासना ही अधोगति का कारण है। नारी समाज की ओर दृष्टि कीजिये, उन्हें केश रखने का कितना चाव है, वही उनकी शिखा है जिसकी बदौलत नारियों में अपूर्व सौंदर्य, सहन शीलता और कार्यक्षमता की विशेषता पुरुषों से अधिक पाई जाती है। हमारे ऋषि-मुनि शिखाधारी होने के कारण ही प्रायः दीर्घजीवी होते थे, क्योंकि उनके वीर्य की रक्षा और इन्द्रियों की शाँति केशों के द्वारा सरलता से हो जाती थी। आजकल का नर समाज विलासिता की ओर इतना अग्रसर क्यों हो रहा है? केवल केशों की ओर ध्यान न देने से । शिखा की गति प्रायः ऊर्ध्व हुआ करती है, जैसे दीपक की शिखा को लीजिये। जिस प्रकार दीपक अपनी शिखा के द्वारा धुएं के रूप में अपनी कालिमा को फेंकता जाता है, उसी भाँति यह जीवात्मा रूपी दीपक भी अपनी शिखा द्वारा ब्रह्मरन्ध्र से सब पाप रूपी धुयें को निकालता हुआ अन्त में अपने यथेष्ट स्थान को पहुँच जाता है। इसी शिखा के द्वारा ‘चिद्र पिणि। महामाये’ दिव्य तेजः समन्तिते। तिष्ठदेवि। शिखा बन्धे तेजो वृद्धि कुरुष्व मे।’ तेजो वृद्धि का आवाहन किया जाता है। शिखा बाहर की सर्दी या गर्मी को मस्तिष्क में प्रविष्ट नहीं होने देती क्योंकि केशों में ऊन के सभी गुण विद्यमान होते हैं। जैसे ऊन के ऊपर पानी कम ठहरता है, वैसे ही वालों में भी पानी नहीं ठहर पाता ऊन के तन्तु जैसे पशु पक्षियों की शारीरिक-गर्मी को बाहर नहीं निकलने देते वैसे ही हमारे बाल भी शारीरिक गर्मी और सर्दी का बचाव करते रहते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि बाल रखने से बल, आयु आरोग्य की वृद्धि और न रखने से इनका ह्रास होता है। वेद मन्त्रों में देखिये -’दीर्घायुष्ट-वाय बालक वच से । शक्त्यै शिखायें वषट्’ इत्यादि पहिले कैदियों को सब से बड़ा दण्ड उनका मुण्डन कराना ही समझा जाता था, क्योंकि उनमें कष्ट सहने की वह शक्ति नहीं रहने पाती थी, जिससे वे यातनायें भोग सकें। मुण्डन हो जाने से अपराधी अपना दोष भी शीघ्र स्वीकार कर लेते थे। ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं। शिखा आर्य धर्म का एक चिन्ह भी है। जैसे आज कल प्रत्येक संस्था अपनी-अपनी समाज का अलग 2 चिन्ह रखती है, उसी प्रकार हमारे समाज का शिखा प्रधान चिन्ह है। एक झण्डे के लिए जैसे सेनानी प्राणों की बाजी लगा देता है वैसे ही नर समाज के प्रधान अंग मस्तिष्क-राज्य की ध्वजा शिखा की रक्षा में कोई कसर नहीं रखनी चाहिए। इसी शिखा और धर्म की रक्षा के लिये शिवाजी, गोविन्दसिंह जी जैसे वीरों ने अपने प्राणों की बाजीयाँ लगा दी थीं। अगर ‘शिवाजी न होते तो सुत्रतडडडडडड होती सबकी’ इसमें कोई सन्देह न होता और आर्य जाति अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को खो बैठती । विशेष तो मैं एक अपनी ‘शिखा-सन्देश’ पुस्तक में लिख रहा हूँ जो शीघ्र ही प्रकाशित होगी । जिसमें प्रसिद्ध महापुरुषों के विचारों का समन्वय और चयन किया गया है। ‘देहो देवालयः प्रोक्तः’ यानी देह एक देवालय है जिसमें जीवात्मा रूपी देव का निवास है, उसका निशान शिखा है जैसे दूसरे देवालयों में ध्वजादि निशान हुआ करते हैं वैसे ही हमारे देह-देवालय का शिखा एक निशान है, जिसकी रक्षा हमें जीते जी करनी है और इसी के द्वारा अन्त में आवागमन से छुटकारा पाना है।
दानी होने से पहले विचारवान होना आवश्यक है, बिना विचारे दान देना धन का दुरुपयोग करना है।
*****
अनेक धर्माचार्य सच्चे तो होते हैं पर उनमें उदारता की कमी रहती है। उनसे बढ़कर सख्त मिज़ाज और भुक्खड़ दूसरा न होगा।
*****
वही व्यक्ति विवेक मय है जो भविष्य से न तो आशा रखता है और न उससे भयभीत होता है।
*****
जो मनुष्य कभी गलती नहीं करता वह संसार में कुछ भी कर सकेगा, इसमें सन्देह है।
*****
बुरे प्रभावों से बचना, उनका प्रतिकार करना, इसी का नाम संयम है, जो मनुष्य में योग्यता पैदा कर उसे प्रभावशाली बनाता है।
कई मास पूर्व ‘मैं क्या हूँ’ पुस्तक प्राप्त हुई थी। गत एक मास से अभ्यास आरम्भ किया है। इस समय में मेरे मन को अत्यन्त शान्ति प्राप्त हुई है, आगे और भी अधिक लाभ होने की मुझे आशा है।
लक्ष्मी कुमार नगीना)
(2)
आपकी भेजी हुई ‘सूर्य-चिकित्सा-विज्ञान’ और ‘प्राण चिकित्सा-विज्ञान का महत्व मेरे से वर्णन नहीं हो सकता। पुस्तक क्या है गागर में सागर है। आपने इन पुस्तकों की रचना करके मनुष्य जाति का बड़ा उपकार किया है, अभ्यास कर रहा हूँ, साथ ही लाभ भी हो रहा है। (मंनलचन्द भंडारी, देवास)
(3)
पर काया प्रवेश मिली, मैस्मरेजम का ऐसा सर्वांग पूर्ण ग्रन्थ किसी भाषा में अब तक मेरे देखने में नहीं आया। अभ्यास प्रारम्भ कर दिया है।
(विद्याविनौद शुक्ल, पिथौरा)
(4)
‘प्राण-चिकित्सा’ प्राप्त हुई, उसके अनुसार प्रयोग करने से सफलता मिल रही है।
(रणजीतराम आर्य्य, बड़वानी)
(5)
आपके यहाँ से ‘पर काया प्रवेश’ का अभ्यास सीखा था। उसके द्वारा अनेक व्यक्तियों के जीवन में भारी परिवर्तन कर चुका हूँ। कई पशु, मनुष्य बन गये हैं।
(जीवानन्द संन्यासी, हरिद्वार)
(पंडित अनन्तराम दुबे ‘प्रभात’ सिवनी)
आप एक विद्यालय खोलते हैं, विद्यालय खोलने के पीछे आपका उद्देश्य रहता है कि लोग वहाँ अच्छी अच्छी शिक्षाएँ प्राप्त करें। विद्यार्थियों का उच्च विद्या ग्रहण करें। पाठशाला का कार्य सुचारु रूप से चले, इसलिये कुछ नियम बना देते हैं और उन नियमों का पालन करना प्रत्येक के लिये अनिवार्य सा हो जाता है। जो उन नियमों का उल्लंघन करता है, उसे दंड दिया जाता है जो नियमों का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करता है, वह परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता है अर्थात् उसके ध्येय की पूर्ति हो जाती है।
ठीक इसी प्रकार सृष्टि का हाल है। ईश्वर ने किसी विशेष उद्देश्य से इस सृष्टि की रचना की है। ईश्वर चाहता है कि प्राणी इस जग में अच्छे अच्छे कार्य करे और अन्त में परम विकास मोक्ष को प्राप्त हों। संसार के प्रायः सभी मतों (धर्मों) का अन्तिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति ही है । अपनी सृष्टि का कार्य ठीक रीति से चले, इसलिये ईश्वर ने कुछ नियम बना दिये हैं, जिनका पालन करना प्रत्येक जीवधारी का ‘कर्तव्य’ है। जिसने भी, जरा भी, अपने कर्तव्यों की अवहेलना की कि उसे प्रकृति के दंड का भागी बनना पड़ा। जो इन ईश्वर दत्त नियमों का पालन करते हुए अपना कार्य करता है, उसे ही सफलता मिलती है। उसे अपने जीवन के प्रधान उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। साराँश यह कि जिन कार्यों के करने से ‘निर्वाण’ प्राप्त हो जावे, उनका करना मनुष्य का ‘कर्तव्य’ है और इसके विपरीत ‘अकर्तव्य’ ।
कर्तव्य और अकर्तव्य की जाँच करने के लिये सब से सुगम तरीका एक ही है। हमें ईश्वर ने ऐसी शक्ति प्रदान की है, हमें भले बुरे अथवा धर्म अधर्म का ज्ञान कराती है। हमारी प्रवृत्ति की वह बुरे कर्मों से छुड़ा कर सुकर्मों में लगाती हैं। जब चोर चोरी करने जाता है, तब वह शक्ति उसे रोकती है- यह कार्य मत करो ‘यह अन्याय है’ पर प्रायः लोग इस पुकार पर कान नहीं देते और इस तरह ईश्वरीय नियमों को तोड़ दुख भोगते हैं। जिन कार्यों को करने की हृदय स्वीकृति दे, वही मनुष्य का कर्त्तव्य अथवा धर्म है और हृदय जिन कार्यों को करने की सलाह न दे, उसे नहीं करना चाहिये क्योंकि वे अधर्म या अकर्तव्य हैं।
जो मनुष्य अपने कर्तव्यों का यथोचित रीति से पालन करता है, उस सदाचारी मनुष्य को कभी भी कोई दुख नहीं सहना पड़ता, क्योंकि वह ईश्वर की, इच्छानुसार कार्य करता है, इसलिये ईश्वर सदैव उस पर दया दृष्टि रखते हैं। प्रायः ऊपर से देखने पर सदाचारी पुरुष निर्धन और दुखी मालूम होते हैं, पर वास्तव में यह बात नहीं है। सदाचारी पुरुष में असाधारण दैवी शक्ति होती ही है। जिस पुरुष में वह दैवी शक्ति है, वह दुखी कैसा ? सदाचारी मनुष्य निर्धन तो हो ही नहीं सकता। सच पूछा जाय, तो सच्चा खजाना सदाचारी ही के पास है। उसका वह खजाना कभी खाली नहीं होता, उसे खर्च करने पर बढ़ता ही जाता है। सदाचारिता के कार्य करने का फल कितना मीठा होता है, यह तो सदाचारी पुरुष ही जानता है। जरा से भी सदाचारिता के विचारों का चिन्तन करने से ही आत्मा को अपार शाँति और शीतलता प्राप्त होती है। दुष्टों को सदा अपने दुश्मनों का भय बना रहता है कि कहीं कोई हमारा अनिष्ट न कर दे, पर सदाचारी के पास यह सब बातें कहाँ, वहाँ न तो कोई दोस्त है, न दुश्मन। उसके लिये तो सारा संसार एक सा है।
सदाचार से प्राप्त होने वाला सुख स्थायी और मूल्यवान है, इसलिए ‘कर्तव्य पालन’ रूपी कीमत चुकाने पर ही मिलता है, किन्तु झूँठी और नकली चीजों से सारा बाजार भरा पड़ा है।
(श्री नारायण प्रसाद तिवारी ‘उज्ज्वल’ कान्हीबाड़ा)
लंग शौचं पुरा कृत्वा गुद शौचं ततः परम्। गृहीत्वा जल पात्रं तु विण्मूत्रं कुरुते यदि॥
प्रथम मूत्र स्थान की शुद्धि करके फिर गुदा की शुद्धि करे तथा जल का पात्र लेकर मल मूत्र की शुद्धि करनी चाहिये।
यह लिखा जा चुका है कि दक्षिण स्वर में मल तथा वाम स्वर में मूत्र त्याग करना चाहिये, इसके विशेष नियम इस प्रकार हैं।
मूत्र त्याग करते समय तक ऊपर नीचे के दाँतों को खूब दबाकर रखो तथा अण्डकोष को ऊपर उठाकर रखो इससे दो लाभ होंगे। दाँतों को दबाकर रखने से दांतों की बीमारियाँ न होंगी, जिनको दाँतों में दर्द की शिकायत रहा करती हो प्रयोग का अनुभव करें, दूसरे यह कि अण्डकोष का रोग न होगा और जिसे यह रोग आरम्भ हुआ हो इस प्रयोग को करके लाभ उठावें, इससे शक्ति का ह्रास भी नहीं होता ।
अपान वायु की गड़बड़ी अथवा मल विकार के कारण ही अनेक रोग हुआ करते हैं। गुदा के से नाभि तक अपान वायु का स्थान है, नाभि समान वायु का तथा नाभि से ऊपर जो वायु हम ग्रहण करते हैं, प्राण वायु है।
शौच करते समय तर्जनी अथवा मध्यमा अँगुली से गुदा के भीतर का स्थान जल से स्वच्छ करना चाहिये, अन्दर का मल द्वार घोंघा आकृति है, उसके आस-पास यदि कोई पपड़ी रह जाती है तो अपान वायु अशुद्ध होती है, किन्तु इस रीति से सरलता पूर्वक सफाई की जा सकती है, यद्यपि पाठक गण इसे घृणित अथवा कठिन क्रिया समझेंगे, किन्तु दो तीन दिन के अभ्यास से यह क्रिया सरल प्रतीत होगी इसे मल शोधन क्रिया कहते हैं।
गर्मी से वायु फैलती है यह Science विज्ञान का मामूली नियम है और फिर वायु ऊपर को उठती है। इसी प्रकार जब मल साफ नहीं होता तो गर्मी से वायु ऊपर उठती है, जिससे दिल में धड़कन, Heart palpitation, सिर दर्द acidity आदि की बीमारियाँ होती हैं। हाँ मल शोधन करते समय अँगुली तथा गुदा द्वार में तेल लगा लेना ठीक होगा, जिससे नख लगने का भय न रहे। इस मल शोधन क्रिया से , कब्ज, अर्श, भगन्दर, खट्टी डकारें आने की शिकायतें दूर होती हैं। मल साफ होता है, इस मल इस शोधन के विषय में अधिक लिखना व्यर्थ है। पाठक गण इस क्रिया को करके स्वयं उससे लाभ अनुभव करें।
शौच क्रिया के पश्चात् हाथ, मुँह धोकर मुँह में जितना पानी भर सको भर लो और पानी को मुँह में ही रोक कर हथेली में ठंडा जल भर खुली हुई आँखों पर खूब छिड़को, पाँच, सात बार ऐसा करने के बाद मुँह में भरा हुआ पानी फेंक दो, इसी प्रकार भोजनान्तर भी यही क्रिया करनी चाहिये, या कि जब कभी भी मुँह धोते हो यह क्रिया कर लेना आँखों को अत्यन्त लाभदायक है। इस क्रिया से आँखों की बीमारी नहीं होती और ज्योति ठीक रहती है
भोजन :- भोजन से शरीर बनता है। यह सभी जानते हैं, किन्तु यह जानते हुए भी मनुष्य भोजन के विषय में बहुत ही लापरवाह रहता है, कहावत है Live not to eat lent eat to live. अर्थात् भोजन के लिये जीवन नहीं है, वरन् जीवन के लिये भोजन है। कुछ भी खाद्य-अखाद्य का विचार किये बिना भोजन करना स्वास्थ्य के लिये अहितकर लेता है। सुखी जीवन व्यतीत करने के लिये स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना नितान्त आवश्यक है।
सब स्वादिष्ट वस्तुएं स्वस्थ कर होती हैं, यह नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह कहा जा सकता है कि जो स्वस्थ रहना चाहते हैं, उन्हें पूर्ण शाकाहारी होना चाहिये, माँसाहार से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं, यह बात अब बड़े- बड़े डॉक्टर भी स्वीकार करने लगे हैं। मैं यह लिख चुका हूँ कि सूर्य नाड़ी में भोजन करना उत्तम है, इस प्रकार किया हुआ भोजन जल्दी पचता है, बाजारू पेटेंट दवाइयों से क्षणिक पाचन शक्ति चाहे ठीक मालूम हो, किन्तु स्थायी लाभ नहीं हो सकता, जिनकी पाचनशक्ति कमजोर हो कब्ज की शिकायत रहा करती हो, उन्हें पाँच सात दिन इस प्रकार भोजन करके देखना चाहिये।
सूरज में भोजन करे, चन्द्र में पीवै पानी। पालन इसका जो करै, राखे अटल जवानी॥
भोजनान्तर कुल्ली करने का नियम मैं ऊपर लिख चुका हूँ, पश्चात् वीरासन बैठ कर दस-पन्द्रह मिनट तक नोंक दार कंघी से सिर के बलों पर इस प्रकार फेरना चाहिये, कि सिर में चुभे, आरम्भ में इतने समय तक वीरासन बैठने में कष्ट होगा, अतएव पहले एक या दो मिनट ही बैठना चाहिये, क्रमशः अभ्यास बढ़ाना चाहिये, इस क्रिया से अर्श तथा वात का नाश होता है जिसे अर्श तथा वात का आरम्भ है उसे इससे बहुत शीघ्र लाभ प्रगट होगा, तथा कुसमय बाल नहीं पकेंगे , गाढ़ निद्रा आवेगी और स्वप्नदोष न होगा, मस्तक के रोगों का नाश होगा। स्वास्थ्य के लिये निद्रा भी उतनी ही आवश्यक है, जितना भोजन, गाढ़ निद्रा मनुष्य को सुस्थ तथा दीर्घजीवी बनाती है।
सीधी करवट लेने से Liver पर जोर पड़ता है, जिससे पाचन शक्ति में रुकावट होती है, इसलिये भोजन पचाने के निमित्त दक्षिण स्वर चलाने की आवश्यकता है, अतएव बाँई करवट लेटना ही उत्तम है, अपितु रात्रि में जितने अधिक समय के लिये पिंगला स्वर चले उतना ही उत्तम है, जैसा कि कहा जा चुका है कि-
दिन में जो चन्दा चले रात चलावे सूर। तो यह निश्चय जानिये, प्राण गमन है दूर॥
किसी किसी का यह मत है, कि बांई करवट लेटने से दिल Heart दबेगा, तथा उसकी चाल में कमजोरी होगी, किन्तु यह भ्रम मात्र है, क्योंकि पाचन क्रिया ठीक रहने से हृदय की गति कदापि शिथिल नहीं हो सकती, मल-मूत्र त्याग करने के कुछ और भी नियमों का पालन करना हितकर होगा।
सूर्य, चन्द्र अथवा हवा जिस ओर से चल रही हो, उस ओर मुँह करके मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिये, सूर्य की ओर त्याग करने से शिर रोग तथा चन्द्र और हवा की ओर त्याग करने से मूत्राशय के रोग होने की सम्भावना है, खड़े होकर पेशाब करने से रीढ़ में कमजोरी आती है, कदाचित पाठक पाश्चात्य सभ्यता की ओर ध्यान आकर्षित करेंगे, किन्तु जलवायु पर भी बहुत से नियम निर्भर हैं, यह नहीं भूलना चाहिये।
पूर्व की ओर से जब वायु का प्रवाह हो उस ओर से वायु जोर से नहीं खीचना चाहिये, इससे कफ का जोर बढ़ता है, साराँश जिस ओर से भी वायु का प्रवाह हो उस ओर मुँह करके दीर्घ श्वास नहीं लेना चाहिये, क्योंकि हवा में कई प्रकार के कीटाणु उड़ा करते हैं और श्वास द्वारा शरीर में प्रवेश कर रोग उत्पन्न करने का भय रहता है, पाठकों ने अनुभव किया होगा कि हवा की ओर पीठ करने से ठंडक मालूम होती है। मल-मूत्र तथा छींक का वेग कदापि नहीं रोकना चाहिये।
दूसरों की सहायता और सेवा करना बड़ी उत्तम बात है, पर यह तभी हो सकता है, जब तुम स्वयं सच्चे और पवित्र बन जाओ।
*****
दुनिया के भाग्य को रोक कर नष्ट करने वाले दो ही कारण हैं, पहला अभिमान, दूसरा घृणा। भाग्यवान वह है, जिसका धन उसका गुलाम है, अभागा वह है, जो धन का गुलाम है।
(ले॰-श्री धर्मपालसिंहजी, बरला)
बहुधा लोगों के मन में जो कर्म फिलॉसफी के मानने वाले हैं, यह विचार पैदा हुआ करते हैं कि कर्म के बिना कुछ नहीं मिलता, हम जैसा अच्छा या बुरा कर्म करते है उसका वैसा ही फल मिलता है। दूसरे ईश्वर न्यायकारी है, वह भी कर्म फल में कोई परिवर्तन नहीं करता फिर बेकार क्यों उपासना में समय लगाया जाए? उपरोक्त दलील को देखकर जब हम संसार में देखते है कि एक मूर्ख भी बिना प्रयोजन किसी कार्य में हाथ नहीं डालता और बुद्धिमान की सदैव खोज कर करते हैं, तो यह आवश्यक है कि इस रहस्य पर कुछ विचार किया जाए। ‘ज्योति’ के पाठकों को इससे पूर्व कि इस विषय पर विचार किया जाय, यह जान लेना अति आवश्यक होगा कि उपासना शब्द का क्या अर्थ है, उपासना का अर्थ है पास बैठना, ईश्वर शब्द का अर्थ सर्वेश्वर या ऐसी शक्ति जो सत्-चित्-आनन्द हो। अब यह प्रश्न होता है कि क्या ईश्वर हम से दूर है, जिससे हमें पास बैठने यानी उपासना की जरूरत हुई। दूरी तीन प्रकार की होती है । स्थान सम्बन्धी जैसे सूर्य हम से करोड़ों कोस दूर हैं। दूसरी -(काल सम्बन्धी) जैसे महाभारत हम से पाँच सहस्र वर्ष पहिले हुआ। तीसरी-(ज्ञान सम्बन्धी) जैसे बहुत बार हम अपने को भूल जाते हैं या समीप की वस्तुओं को भ्रान्ति के कारण नहीं देख सकते । उपासना शब्द को सिद्ध करने के लिये अब हमें विचारना चाहिये कि ईश्वर में और हम में कौन सी दूरी है, चूँकि ईश्वर सर्व व्यापक और अपरिमित है, इसलिए-स्थान दूरी नहीं हो सकती, वह नित्य है, अतएव काल दूरी भी उसमें नहीं है। अब रही ज्ञान दूरी-सो यह प्रत्येक मनुष्य को मानना पड़ता है, क्योंकि हर मनुष्य को ईश्वर का पूर्ण परिचय नहीं है,अब हम यह जान गये कि ज्ञान दूरी है, तो हमें ईश्वर के ज्ञान को प्राप्त करने के लिए ही उपासना की जरूरत है। अब यह ध्यानपूर्वक देखिये कि संसार में हम कब किसी की उपासना करते हैं। जब किसी व्यक्ति को सर्दी लगती है, तो वह गर्मी के लिए तथा उससे बचने के लिए अग्नि आर वस्त्र की उपासना करता है और जब गर्मी की अधिकता से प्यास कष्ट देती है, तो जल की उपासना करता है। इससे यह स्पष्ट विदित हो गया कि जब हमें किसी वस्तु की उपासना से कष्ट मालूम होता है, तो हम दूसरी प्रतिकूल वस्तु जो हमारे अनुकूल होती है की उपासना करते हैं, जो हमारे कष्ट को आनन्द से बदल देती है । अब यह बात साफ हो गई कि उपासना दुःख से बचने और सुख को प्राप्त करने की गरज भी आती है । पाठक गण अब यह विचारने की आवश्यकता हुई कि हमें दुःख किस वस्तु से मिलता है। संसार में हम दो शक्तियों को काम करते देखते है एक ज्ञात दूसरी अज्ञात जो वस्तुएं हमें इंद्रियों द्वारा अनुभव होती हैं वह सबकी सब अज्ञात हैं।
इन शक्तियाँ के समूह को प्रकृति के नाम से पुकारा जाता है । हमारी कामनायें उत्पन्न होकर जो कि हमारे दुःख का एक ही कारण हैं, इसी प्रकृति से पैदा होती हैं यानी दुःख का कारण प्रकृति है। परन्तु क्या कारण है कि हम ज्ञाता होते हुए भी इसके सेवक हो जाते हैं? बात यह है कि हमारा ज्ञान निर्बल है और प्रकृति (शक्तियों का समूह) नाना प्रकार के भेष बदल कर हमारे सामने आती है, यद्यपि प्रथम दशा में हम इसे अस्वीकार भी कर चुके हों, परन्तु नूतन दशा में फिर अपना लेते हैं, जैसे किसी व्यक्ति ने कोई फल खाया । पेट में जाकर, मल मूत्र, रुधिर, माँस, मज्जा, वीर्य इत्यादि की दशाओं में परिवर्तन हो गया । हमें अब इससे घृणा हो गई, परन्तु जब इन्हीं वस्तुओं से पृथ्वी के नीचे से दूसरे फल पैदा होकर आते हैं, तो हमारा मन जो प्रथम घृणा कर चुका था, फिर ललचा जाता है, वास्तव में हम प्रकृति के मूल कारणों से जानकार नहीं। इसी कारण न तो इससे इच्छा पूरी होती है और न दुःख ही दूर होता है, अब अच्छी तरह समझ में आ गया कि हमारे दुःखों का कारण प्रकृति के भेद को न जानना है संसार में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसे प्रकृति का पूर्ण ज्ञान हो। प्रकृति का ज्ञान न होने तथा उसकी विरुद्ध शक्ति को न जानने के कारण हम दुःख उठा रहे हैं, इस लिये जरूरत है कि हम ऐसी शक्ति की उपासना करें, जिसे प्रकृति का पूर्ण ज्ञान हो और इसके प्रतिकूल गुण वाली हो।
प्रकृति सर्व व्यापक (अपरिमित) और जड़, प्रकृति को वही जान सकता है, जो सर्व व्यापक और ज्ञाता हो, सो सर्व व्यापक ज्ञाता एक परमात्मा है, उसी को प्रकृति या यथार्थ ज्ञान है। परमात्मा आनन्द स्वरूप है, प्रकृति के व्यापक और नित्य होने से जीवात्मा सदैव प्रकृति से सम्बन्ध रखता है, जिससे वह दुःखी रहता है, दुःख रूप प्रकृति की विरुद्ध शक्ति परमात्मा के सिवा जो आनन्द रूप है, जीव किस की उपासना से दुख से छूट सकता है, इस कारण परमात्मा की उपासना करने योग्य है जब परमात्मा के ज्ञान को जान लेंगे, तब हमें पापों से घृणा हो जाएगी । यह जो दलील होती हैं जब ईश्वर उपासना से किए हुए कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, तो क्या लाभ । परन्तु यह सत्य है कि ईश्वर उपासना से पाप का फल भोगते हुए भी कष्ट नहीं होता, क्योंकि दुःख को अनुभव करने वाला मन परमात्मा की उपासना में लगा होता है।
चुप रहना एक कला ही नहीं, वाक् प्रवीणता भी है।
*****
चार बातें नहीं भूलनी चाहिये (1) बड़ों का आदर करना (2) छोटों को सलाह देना। (3) बुद्धि- मानों से सलाह लेना (4) मूर्खों से न उलझना।
*****
यदि मनुष्य सीखना चाहे, तो उसकी प्रत्येक भूल उसे कुछ न कुछ सिखा देती है।
(श्रीमती सावित्री देवी तिवारी, जयपुर)
प्रभो! उस दिन आपको खूब ही रोकर बुलाया, घन्टों गिड़गिड़ाई, हिचकियाँ बँध गईं, दर्शन की आशा से आंखें उमड़ आई । पूजा की थाली में हृदय-पुष्प रखा हुआ था। प्रतीक्षा में युग बीत गये परन्तु प्रभु ! आपके दर्शन न हो सके।
भगवान्! क्या करूं ? कैसे करूं? संसार सागर की प्रचंड लहरें मेरी आत्मा को इधर से उधर बहाती फिरती हैं, एक चट्टान से टकरा कर लौटती हूँ तो दूसरे से टकराना पड़ता है। यह निर्बाधित क्रम कितने अतीत काल से चला आ रहा है । छील छील कर मेरे अँग घायल हो गये हैं। वेदना से अन्तःकरण चीत्कार करने लगा है।
दया सिन्धु! सुनती हूँ कि तुम्हारी दया से यह समस्त विश्व परिपूर्ण हो रहा है । पापी और दुष्ट जीव भी अनायास ही उस दया का उपभोग करते हैं। गणिका, गीध, अजामिल तर गये, तो क्या मैं न तर सकूँगी? प्रेम रूप परमात्मा! तो क्या मैं न तर सकूँगी ? प्रेम रूप परमात्मा ! क्या आपके दर्शन मुझे न हो सकेंगे ? मेरा परित्राण न होगा?
करुणावतार! अब अधिक मत तरसाओ! अधिक परीक्षा मत लो, मेरी भुजाओं में बल नहीं है। नौका को खेकर आपके मन्दिर तक ले जाने की मुझमें शक्ति नहीं है। नाथ! आप ही गरुण पर चढ़ कर मेरे उद्धार के लिये चले आओ । आप ही मेरी भुजा पकड़ कर पार कर दो।
मेरे आराध्य! आप घट घट वासी हैं। मेरे अन्तराल में व्याप्त हो रहे हैं। किससे कहूँ और क्या कहूँ? संसार के माया मोहों से त्रस्त होकर आपकी शरण आई हूँ। आप मुझे पार कर दीजिए। अशान्ति के भय सागर में से उबार कर अपने शाँतिदायी चरणों में मुझे शरण दे दीजिए। मेरे अन्तःस्थल में प्रकट हूजिए। इस घनीभूत अन्धकार में प्रकाश की सुनहरी किरणें बिखेर दीजिए मेरे सर्वस्व !
(श्री भगवानस्वरूप वर्मा ‘शूल’ आन्तरी)
निशि बासर याद करें तुमको,
फिर भी तुम दर्श दिखाते न हो।
कलपाते हुए निज भक्त को देख के
कैसे प्रभो, कलपाते कहो ?
किस भाँति पुरानी प्रतीत को नाथ,
बिसारतें, डारते, जाते अहो !
हम दारिद्र, दीन, मलीन रहें,
सुर-स्वर्ग में आप विराजे रहो!!
(श्री महादेव प्रसाद शर्मा ‘प्रिय’ काशी)
तिमिराच्छादित उर अन्दर प्रभु,
ज्योति-अखण्ड जला दो।
मोह-निशा के नन्दन-वन में,
बिहर रहा मद से परिपूरित-
ध्यान न जिसका तुम में,
उसका -विष-सा राग भुला दो।
तिमिराच्छादित उर अन्दर प्रभु,
ज्योति-अखण्ड जला दो।
पद पद पर ‘प्रिय’ पीड़ित होता,
विषय-भोग की विषम-वात से-
बुझते-से इस लघु दीपक को-
कर से स्नेह पिला दो।
तिमिराच्छादित कर अन्दर प्रभु !
ज्योति अखण्ड जला दो॥
ज्योति अखण्ड जला दो॥
(पं॰ प्रेम नारायण शर्मा, लश्कर)
उस व्यक्ति का संसार में नर देह धारण व्यर्थ है।
जो दूसरों के साथ पर उपकार में असमर्थ है॥
निज पेट को तो आदमी क्या श्वान भी भरते सदा।
इसमें बड़ाई क्या हुई? यदि जोड़ ली कुछ संपदा॥
निज पूर्वजों के विमल यश का भी तुम्हें कुछ ज्ञान हो।
मा भारती के पुत्र हो, ऋषि रक्त की संतान हो॥
फिर स्वार्थ साधन, दासता, दुख दीनता में व्यस्त क्यों?
मृगराज इन लघु रज्जुओं में बद्ध क्यों? संग्रस्त क्यों?
ओ, वीर ! उठ!! नर देह के कुछ कर्म कर, उपकार कर!
पोत, अपना और पराया पार कर, उद्धार कर!!
(मा॰ उमादत्त सारस्वत,कविरत्न, बिसवाँ, सीतापुर)
सोचा है क्या कभी जीव ! तू कौन कहाँ से आया है?
किसने तुझको भेजा है,क्यों नर का यह तन पाया है?
यह दुनिया है रंग मंच सम, इस पर ‘खेल’ दिखाना है।
चतुर खिलाड़ी ! सावधान ! द्रुत पटाक्षेप हो जाना है।
नियत समय के अन्दर तू यदि ‘पार्ट’ न पूरा न कर पाया।
भूल गया या वादा वह जो ‘मालिक’ से था कर आया। ।
तो चौरासी लाख योनि के चक्कर में पड़ना होगा।
नरक कुँड में रह कर जाने कितने दिन सड़ना होगा!!
भाँति-भाँति के रूप बना कर ‘अभिनेता’ कितने आये!
‘रोकर’ ‘गाकर’ ‘नाच-कूद कर’ चले गये जितने आए!
क्षण भर का यह ‘नाटक’ है मत गफ लत होने पाये कुछ!
वह कर जिसमें वाह-वाह हो और काम बन जाये कुछ!
प्रेम-दर्शन-मीमाँसा- लेखक-आचार्य इन्द्र प्रकाशक-श्री विष्णु-ग्रन्थ माला, वृन्दावन । प्राप्ति स्थान-गायत्री काक पुस्तक भण्डार, मथुरा, दो भागों में प्रकाशित पुस्तक का मूल्य 2) रु ॰ है।
इस ग्रन्थ में अनेकों प्रेम-सम्बन्धी आवश्यक विषय हैं (1) दृश्य-जगत, (2) दृश्य-जगत् में सत्य वस्तु क्या है? (3) मानवता की विशेषता (4) मानव जीवन में क्या है? (5) मनुष्य क्या चाहता है? (6) मनुष्य की जिज्ञासा और उसका यत्न, (7) इन्द्रियों की पवित्रता एवं ध्यान जन्य शक्तियों का प्रकाश (8) अन्तःकरण परिचय (9) हृदय क्या है? (10) हृदयाकर्षण, (11) प्रेम विग्रह, प्रभु कैसा है? (12) प्रेम-प्राप्ति के उपाय, (13) प्रेम-व्यथा, (14) प्रेम का स्वरूप, (15)प्रेम का अधिकारी, (16) हृदय में गति क्यों होती है? (17) क्या आकर्षण को ही पारस्परिक प्रेम कहते हैं, (18) हृदय और प्रेम, (19) प्रेम और मोह, (20)प्रेम और आसक्ति के भाव, (21) प्रेम और काम, (22) प्रेम की अवस्थायें, (23) प्रेम क्या चाहता है? (24) प्रेम का बाह्य रूप और प्रेम का अन्तरंग रूप, प्रेम और अंगरेजी कवितायें, प्रेम और उर्दू कवितायें, प्रेम और ब्रज भाषा की कवितायें, प्रेम और संस्कृत की कवितायें, प्रेम और आँख के आँसू इत्यादि विषय हैं, जो सरल सरस भाषा में, साहित्यिक और दार्शनिक पद्धति से लिखे गये हैं। पुस्तक पठनीय और सर्वथा संग्रहणीय है । सुन्दर चिकने कागज पर छपी है, 700 पृष्ठ की पुस्तक का मूल्य 2) अधिक नहीं हैं।
जीवन सखा- सम्पादक श्री बालेश्वप्रसाद सिंह तथा श्री विट्ठलदास मोदी, 87 हिम्मत गंज, इलाहाबाद, वार्षिक मूल्य 3) ‘ जीवन सखा’ गत 5 वर्ष से हिन्दी संसार के स्वास्थ्य साहित्य की बड़ी महत्वपूर्ण पूर्ति कर रहा है। प्राकृतिक विधियों से आरोग्य लाभ प्राप्त करने की इसमें बड़ी खोज पूर्ण चर्चा रहती है। जनवरी मासिक 120 पृष्ठ सुन्दर विशेषांक हमारे सामने है, इसका मूल्य 1) और संपादक हैं, श्री जानकी शरण वर्मा। विशेषाँक के सभी लेख अधिकारी लेखकों के लेख हुए हैं। छपाई सफाई बहुत सुन्दर हैं। संचालकों को प्रयत्न स्तुत्य है।
सचित्र योग साधन- लेखक योगराज मुनीश्वर पं॰ शिव कुमार शास्त्री प्रकाशक-ज्ञान शक्ति, गोरखपुर। पृष्ठ संख्या 312 मू॰ 2॥), इस पुस्तक में राजयोग के यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि का वर्णन है। प्रत्येक विषय पर स्वतन्त्र दृष्टिकोण से प्रकाश डाला गया है और इस कठिन विषय को सुलभ रूप से उपस्थित किया गया है। पुस्तक उपयोगी है।
वेदान्त सिद्धान्त - लेखक और प्रकाशक उपरोक्त। पृष्ठ संख्या 252 मू॰ 2) आत्मा और ईश्वर एक ही वस्तु है। किन्तु लोग भ्रमवश ईश्वर को अलग मानते हैं, फल स्वरूप वे बारहसिंगा की भाँति कस्तूरी के लिये चारों और दौड़ते रहते हैं। इस पुस्तक में भली प्रकार समझाया गया है कि ईश्वर आत्मा से भिन्न नहीं। वह बाहर नहीं, आपके अन्दर है। पुस्तक विद्वत्ता और खोज के साथ लिखी गई है।
सत्य सुन्दर और स्वतन्त्र विचार- लेखक और प्रकाशक उपरोक्त। पृष्ठ 304 मू 2॥) ईश्वर और धर्म के सम्बन्ध में अनेक प्रकार की भ्रमपूर्ण धारणायें जनता में फैली हुई हैं। इसलिये ईश्वर और धर्म के नाम पर बड़े-बड़े अनर्थ होते रहते हैं। पुस्तक में ईश्वर और धर्म के सम्बन्ध में स्वतन्त्र विचार प्रकट किये गये है, जिससे सत्य बात पर प्रकाश पड़ता है।
“संकीर्तन” का आगामी विशेषाँक
श्रीकृष्णचरिताँक
*******
‘संकीर्तन’ के पाठकों को यह जान कर हर्ष होगा कि हमने अपने आगामी विशेषाँक के रूप में उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का भावमय पूरा चरित भेंट करने का निश्चय किया है। अब तक हिन्दी में अनेक श्री कृष्ण चरित निकले हैं, पर उनमें एक भी भक्तों के अनुकूल नहीं। सब उन लीला-पुरुषोत्तम को सामान्य पुरुष मान कर लिखे गये हैं। ‘आँजनेय’ के लेखक की लेखनी से निकला यह चरित प्रति पृष्ठ पर आपको भाव विभोर कर देगा। जिन सज्जनों को इस अद्भुत प्रेममय ग्रन्थ को प्राप्त करना हो, वे अभी से ‘संकीर्तन’ के आगामी वर्ष के ग्राहक होकर अपना अंक रिजर्व करालें। कागज के दाम बहुत बढ़ गये है, इससे अंक थोड़े ही छपेंगे। फिर नहीं प्राप्त हो सकते।
विनीत गंगा प्रसाद शर्मा व्यवस्थापक-संकीर्तन कार्यालय, मेरठ
विख्यात दार्शनिक विद्वान् आचार्य इन्द्र रचित पुस्तकें
जो पौने मूल्य पर मिलेंगी :-
(1) श्रीकृष्ण लीला-रहस्य - लगभग 2000 पृष्ठों के चार भागों में श्रीकृष्ण लीला सम्बन्धी -ऐतिहासिक, धार्मिक, दार्शनिक एवं साहित्यिक अन्वेषणों से युक्त -अद्भुत ग्रन्थ संसार के सभी विद्वानों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। मूल्य 6) किन्तु अब 4॥) में।
(2) प्रेम-दर्शन-मीमाँसा - लगभग 700 पृष्ठों के दो भागों में- थोड़ी सी प्रतियाँ शेष रह गई हैं। प्रेम-सम्बन्धी इस महाग्रन्थ को प्रेमियों ने बहुत अपनाया। प्रेम के सभी आवश्यक-प्रसंगों पर सरस, प्रेममयी भाषा में, लिखे हुए इस प्रेम-ग्रन्थ का मूल्य 2) किन्तु अब 1॥)
निःश्वास- गद्य-काव्य-की॰ । ), किन्तु अब।) (4) Sighs- अंगरेजी-गद्य-काव्य-की॰ ॥) किन्तु अब । ) (5) भक्ति रत्नावली-भागवत महापुराण के चुने हुए प्रेम और भक्ति-बोधक श्लोकों सहित हिन्दी अनुवाद-मूल्य ॥।) किन्तु अब ॥)
‘अखण्ड ज्योति’ के कुछ अमूल्य रत्न
*******
यह पुस्तकें आपको देव-दूत बना सकती हैं॥
अपनी अनन्त शक्ति द्वारा, पीड़ित संसार का भला कीजिए।
अखण्ड ज्योति द्वारा ‘सद् ज्ञान ग्रंथमाला’ नामक एक पुस्तकमाला का प्रकाशन भी आरम्भ हो गया है। इस योजना के अनुसार ऐसे ग्रन्थ रत्न प्रकाशित किये जाएंगे जो मानव जीवन में एक नवीन क्रान्ति उपस्थित करते हैं । जिस अलभ्य ज्ञान के लिये जीवन का बहुत बड़ा भाग तलाश और अभ्यास में लगाना पड़ता है, उसे वैज्ञानिक ढंग से सुगम तरीकों द्वारा समझाया जाता है और पुस्तक प्रकाशन से पूर्व उस विषय को पूरी तरह से अनुभव एवं परीक्षा की कसौटी पर कस लिया जाता है। यह ग्रन्थमाला किसी ऐसी पुस्तकों को कदापि प्रकाशित न करेगी जिसकी भली भाँति परीक्षा न कर ली गई हो ।
अब तक जो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं उनका परिचय इस प्रकार है।
मैं क्या हूँ? - यह पुस्तक आत्मा के अमरत्व और उसके वास्तविकता स्वरूप का प्रत्यक्ष चित्र है। साँसारिक भ्रम और माया के कठिन बन्धनों से छुटकारा पाकर आत्मा कैसे मुक्त हो सकती है। इसमें आत्म साक्षात्कार के कुछ अभ्यास बताये गये हैं। इन साधनों को घरेलू काम काजों में लगे रह कर भी प्रतिदिन थोड़े समय में कर सकते है और अमर फल प्राप्त कर सकते हैं मूल्य 1)
सूर्य चिकित्सा विज्ञान -सूर्य की प्रचण्ड रोगनाशक शक्ति से कठिन और असाध्य रोगों को भी दूर किया जा सकता है। डाक्टरों के अनेक अनुसंधानों का सार लेकर लिखा गया है और यह पुस्तक एक स्वतन्त्र चिकित्सा शास्त्र बन गई है, इसी के आधार पर साधारण बुद्धि का आदमी डाक्टरों की भाँति इलाज करके हजारों व्यक्तियों को रोग मुक्त कर सकता है, मूल्य)
प्राण चिकित्सा विज्ञान-मनुष्य के अन्दर गजब की विद्युत शक्ति है, इसका प्रयोग करके अपने और दूसरों के कष्टों को दूर किया जा सकता है, झाड़ फूँक ओर तन्त्र मन्त्रों की प्राचीन पद्धति को यह पुस्तक वैज्ञानिक स्वरूप में उपस्थित करती है। विदेशों में इस विधि से बड़े बड़े अस्पताल चल रहे हैं। मूल्य 1)
पर काया प्रवेश-मनुष्यों के शरीर में प्रेतात्माओं के घुस आने की बात सब लोग जानते हैं। इस पुस्तक में मैस्मरेज्म के ढंग पर कुछ अद्भुत उपाय बताते हैं, जिनके आधार पर आप जीवित अवस्था में भी दूसरों के शरीर में प्रवेश कर सकते है और उनके विचारों में आश्चर्यजनक परिवर्तन करके उन्हें अपनी इच्छानुसार चलने को मजबूर कर सकते हैं। मूल्य 11) वी॰पी॰ से मंगाने पर 11) पोस्टेज अलग देने होंगे। इसलिये मूल्य मनीआर्डर से भेजना चाहिये।
पता अखण्ड-ज्योति कार्यालय, मथुरा
*समाप्त*