विचारों को पवित्र रखो!

“अपने विचारों को पवित्र रखो” धर्म का समस्त तत्व इसी एक वाक्य में छिपा हुआ है। अन्याय विधान तो धर्म की भूमिका और शब्दाडम्बर मात्र है। क्रोध, कटु भाषण, ईर्ष्या और लोभ से बचना यही तो धर्म प्राप्ति का मार्ग है। सदैव शुभ कर्म करने में प्रवृत्त रहो परोपकार को कार्यों में पूरी शक्ति और पूरा उत्साह लगाना यही तो कर्तव्य है। नेकी से बढ़कर न तो काई धर्म है और न बदी से बढ़कर कोई पाप। यह मत पूछो कि धर्म से क्या लाभ है? जिज्ञासुओं! धर्म से उत्पन्न होने वाला सुख ही सच्चा सुख है। अन्य सुख तो विडम्बना मात्र हैं। यदि तुम एक क्षण भी व्यर्थ खोए बिना जीवन भर नेक काम करते रहो तो निश्चय ही एक दिन जन्म मरण की फंसी से छूट जाओगे। धर्म के पथ पर आरुढ़ होने में एक पल का भी विलम्ब मत लगाओ। आज से ही सेवा मार्ग को अपनालो, ऐसा न हो कि ‘कल करूंगा’ सोचते सोचते मृत्यु तुम्हारा गला दबाले और जनम जन्मान्तरों तक साथ रहने वाले धर्म रूपी अमर मित्र को प्राप्त करने से वंचित रह जाओ।

भाग 2 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक 11


अपने पथिक से


अपने पथिक से

लेखक-श्री राम रीझनजी रसूलपुरो।

कितनी दूर, कहाँ से आयें; ओ अज्ञात देश के वासी।

निशदिन अपनी राह जा रहे, कितनी दूर तुम्हारी काशी?

संवल साथी हीन विजन में एकाकी निर्जन कानन में,

क्यों असीम की ओर लक्ष है? अविश्रान्त जीवन-प्राँगण में॥

क्षणभर रुको पथिक, निज पथ पर, श्रान्ति मिटालो, सुस्थिर होलो।

अगम कूल है जिस असीम का, कैसे पार करोगे बोलो?

अरे ठहर जा ! देख लगे है वहाँ विपुल बाजार।

क्रय-विक्रय है मोल-तोल है, निज-निज का व्यापार॥

ले लो कुछ तो पथिक यहाँ से अपनी गाँठ टटोल।

हो रक और हिरण्य यहाँ बिकते गुन्जों से तोल।

खिले फूल जो आज हँस रहें, ले यौवन का भार।

उन के उर में छिपी वेदना की प्रतिमा साकार॥

सुना रही है उत्पीड़न की व्यथा करुण संदेश।

क्षण भर सुन लेना, रुक कर फिर जाना अपने देश॥


प्रार्थना का स्वरूप

पवित्र आत्मा वाले मनुष्य की प्रार्थना वस्तु होती है। वह सन्निपात के रोगी की तरह चीज की इच्छा नहीं करता वस्तुतः किसी की किसी को जरूरत हो तो उस शुद्ध अपेक्षा की पूर्ति अवश्यमेव कहीं से न कहीं से हो जाती है। कोई आदमी पानी में डूब रहा है तो बचाने वाले उसके प्रार्थना करने से पूर्व उसे बचाने लिये दौड़ पड़ते हैं। किसी के घर में आग लगी हो तो बिना बुलाये सैकड़ों मनुष्य उसे बुझाने जाते हैं। विद्या पढ़ने के इच्छुक बालक के कोई न कोई दयालु महानुभाव उसके लिये आवश्यक सामग्री जुटा ही देते हैं। सच्चे जिज्ञासु को सच्चा गुरु मिलकर रहता है। परोपकार में धार्मिक संस्थाओं का बहुत बड़ा मासिक खर्च अपने आप जुट जाता है। किन्तु आलस्य और आदतवश कामचोर आदमी जो माँगते हैं वह वास्तविक आवश्यकता नहीं होती ऐसे लोग एक पाई माँगते फिरते हैं, और हर जगह से धिक्कारे जाकर आधा चौथाई पेट भरकर सो जाते हैं। सच्ची आवश्यकताओं की पूर्ति के पर्याप्त साधन ईश्वर की इस पवित्र सृष्टि में मौजूद हैं। वे निकम्मे लोगों को प्राप्त नहीं होते।

अदृश्य जगत में अनेक प्रकार और स्वभावों की चेतनाएं निवास करती हैं। इन में अनेक देव स्वभाव की और सूक्ष्म शक्तियों से सम्पन्न होती हैं। जिस प्रकार हम डूबते हुए मनुष्य को बचाने के लिये अनायास ही दौड़ पड़ते हैं वैसे ही अपने उच्च संस्कारों के कारण वे चेतनाएं मृत्युलोक के प्राणियों की सहायता करती हैं जिन्हें कि उस सहायता की वास्तविक आवश्यकता होती है। हम उनके कार्य-कलापों को देख नहीं पाते तो भी वे हमारी मूक प्रार्थना को सुनती हैं और उसके औचित्य को देखते हुए भरपूर सहायता देने का प्रयत्न करती रहती हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी को राम का दर्शन कराने के लिये हनुमान जी की सहायता प्राप्त होने की कथा प्रसिद्ध है। ठीक ऐसी ही सहायताएं हम में से बहुतों को जीवन में अनेक बार मिलती हैं। परन्तु जड़ जगत में लिप्त रहने और आध्यात्मिक साधनाओं में दूर हटते जाने के कारण हमारी मनोभूमि ऐसी जड़ बन गई हैं कि अपनी उन अदृश्य सहायताओं के स्वरूप को पहचानना तो दूर उन सहायताओं तक को नहीं जानते। काश; आध्यात्मिक साधनाओं द्वारा हमने अपनी अन्त दृष्टि को कुछ स्वच्छ किया होता तो देखते कि हमारे ऊपर कितनी अयाचित सहायताओं की वर्षा हो रही है और हम दूसरों के जरा से उपकार के लिये कितनी आनाकानी करते हैं।

वास्तविक आवश्यकता एक उत्तम प्रार्थना है। वह अखिल आकाश में ऐसी कम्पन लहरें उत्पन्न करती हैं जिनमें पर्याप्त मात्रा में चुम्बकत्व होता है। कबूतरबाज अपने सिखाये हुए कबूतर को ऊपर उड़ा देते हैं और वह किसी झुण्ड में जाकर बहुत से कबूतरों को उड़ाकर अपने साथ ले आता है उसी तरह आकर्षण शक्ति युक्त हमारी कामना लहरें जब यात्रा पूरी करके अपने मूल स्थान पर वापिस लौटकर आती हैं तो अपनी जाति के बहुत से तत्वों को साथ में चिपकाये लाती हैं। चुम्बक पत्थर के टुकड़े को लोहे के बुरादे के बीच में से यदि खींचकर ले जाओ तो उसके साथ साथ बहुत सा चूरा चिपका हुआ चला आवेगा। बलवान मानस की प्रार्थना जब वापिस लौटती है तो उसके साथ उसकी पूर्ति के बहुत से साधन भी होते हैं।

उपरोक्त पंक्तियों में अभी यह निराकरण अच्छी तरह नहीं हुआ है कि किन वस्तुओं के लिये किससे प्रार्थना करनी चाहिये और उसकी क्या विधि होनी चाहिये? जिज्ञासुओं को जानना चाहिये कि परमात्मा से पिता का काम लेना चाहिये नौकर का नहीं, जिस प्रकार हम किसी महान् कार्य को करने के लिये चलते हैं तो माता पिता या गुरुजनों के चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद चाहते हैं। आशीर्वाद सुदृढ़. कवच का काम देता है। दिव्य आत्माओं द्वारा वरदान प्राप्त होने की साक्षी से समस्त धर्मों के इतिहास पुराण भरे पड़े हैं। गुरुजनों के आशीर्वाद से कठोर कार्य सहज में ही पूरे हो जाते हैं। क्योंकि अन्तरात्मा से निकला हुआ आशीर्वाद सूक्ष्म जगत में एक स्वतन्त्र व्यक्ति का रूप धारण कर लेता हैं और उनकी रक्षा करता है। दुर्वासा के शाप से एक राक्षसी का पैदा होकर अम्बदीप के पीछे दौड़ना और शिवजी के शाप से वीरभद्रा का पैदा होकर राजा दक्ष का यज्ञ विध्वंस करने की कथाएं झूठी नहीं हैं। उस समय के मनुष्यों के आत्मिक बल के अनुसार यह सूक्ष्म प्राण अधिक बलवान होते होंगे और आँखों से प्रत्यक्ष भी दिखाई देते होंगे पर आज भी उनका अभाव नहीं है। आत्मशक्ति के अनुसार इन अदृश्य प्राणियों का उत्पन्न होना विज्ञान सम्मत है। वे सदा पैदा होते थे और अब भी होते हैं। अस्तु गुरुजनों का आशीर्वाद प्राप्त करना किसी महान् कार्य के लिये आवश्यक होता है। परन्तु कोई मूर्ख यदि यह सोचे कि “पिताजी के आशीर्वाद में इतना बल है तो शरीर में न जाने कितना होगा इसलिये इन्हें घोड़ा बनाकर सवारी के काम में लिया जाये’ तो उस अज्ञानी का विचार उपहासास्पद होगा। यदि वह अपने इस विचार को कार्य रूप में परिणित करे तो लाभ के स्थान पर हानि ही उठाएगा। हममें से असंख्य लोग इसी नादानी को दुहराते रहते हैं।

विश्व कवि श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर एक स्थान पर कहते हैं-परमात्मा हमें बुद्धि देता है, जिसका अर्थ हैं कि हम अपने ऊपर निर्भर रहें। उसने हमें वह आदर्श दिया है कि हम रोते हुए जाकर उसका द्वार न खटखटावें। उसने अपने को हमारे क्षेत्र से अलग रखा है और एक चिन्ताशील माता की तरह बार-बार प्रकट नहीं होता। उसने पूरी पूरी जिम्मेदारी के अधिकार देकर हमारे पौरुष को सम्मानित किया है। वह कायरों की उँगली नहीं पकड़ता, वरन् उन्हें विपत्तियों को अकेले भुगतने के लिये धकेल देता है ताकि वे निर्भयता और स्वावलम्बन के साथ जीना सीखें” यह शब्द बड़े ही भव्य पूर्ण हैं। किन को यह पसंद नहीं कि हर पुत्र उसे घोड़ा बनावे या हर घड़ी नौकर की तरह पानी पिलाने और हाथ धुलाने के लिये मजबूर करे। परन्तु अज्ञानी भक्त स्वयं निकम्मे बैठे रहते हैं और प्रार्थना करते हैं कि है ईश्वर! आप हमारे कपड़े धोकर सुखा जाइये। जब सारे अधिकार और सारे हथियार हमें दे चुका हैं फिर भी हम उसे ही हल में जोतना चाहें तो यह कितनी बेवकूफी की बात है। हर काम जिसे हम उचित समझते हैं और करने की योग्यता रखते हैं स्वयं करें। परमात्मा द्वारा दिये हुए शरीर और मस्तिष्क का भरपूर प्रयोग करें तो वह वस्तु जिस के लिये प्रार्थना करते हैं आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। चिट्ठियाँ लाने और ले जाने का काम डाकखाने का है, कोई मूर्ख यदि कलक्टर साहब के ऊपर बरस पड़े कि भगवन्! आप मेरी चिट्ठियाँ लाया कीजिये तो वे यही उत्तर देंगे कि महाशय ! सरकार ने इस सुविधा के लिये डाकखाने का महकमा अलग खोल दिया है, आप उससे भरपूर लाभ उठा सकते हैं, जो कार्य शरीर और मस्तिष्क के करने के हैं, उनको पूरे उत्साह और पूरी शक्ति के साथ करना चाहियें।

ईश्वर से प्रार्थना इस प्रकार करनी चाहिए। कि -”आप हमें प्रेरणा दीजिए, हमारे अन्दर अपनी शक्ति का संचार कीजिए, हमें साहस, उत्साह और धैर्य दीजिए।” यही वस्तुएं सूक्ष्म सत्ता के केन्द्र से आती है और इन्हें ही हम ईश्वर से प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर आटा गूँथने न आवेगा, पर हम प्रार्थना करेंगे तो वह हमारी उस योग्यता को जागृत कर देगा, जिसके द्वारा वैसे कामों को आसानी से किया जा सकता है। इन पंक्तियों में बार-बार यह दुहराया जा रहा है कि आप अपना कर्तव्य अवश्य पूरा कीजिये परिश्रम में रत्तीभर भी कमी न रखिये। तभी पिता का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं, प्रार्थना की पहली सीढ़ी यह है कि यदि किसी साँसारिक वस्तु की हमें आवश्यकता है तो उसके लिये भरपूर प्रयत्न करें, जैसे आज्ञाकारी पुत्र को पिता अधिक प्यार करता है और अधिक वस्तु देता है, उसी प्रकार शक्ति भर प्रयत्न करने की ईश्वरीय आज्ञा को पालन करने वाला जगत पिता का अधिक स्नेह भोजन बन सकता है। भूल कर भी अकर्मण होकर मत बैठिये कि हम तो भजन करेंगे, यह कार्य तो ईश्वर करके रख जायगा। ईश्वर को ऐसे भजन या खुशामद की जरूरत नहीं है कि वह बदले में तुम्हारा चूल्हा फूँके। प्रार्थना की दूसरी सीढ़ी यह है कि कर्तव्य पूरा करते हुए भी प्रारब्ध कर्मों के कारण, अपनी त्रुटि के कारण या समष्टि मन के दोषों के कारण जो विपत्तियाँ सामने आवें उनसे कायरों की भाँति न तो डरें और न घबराये वरन् प्रभु से प्रार्थना करें “कि प्रभो, हमें इन्हें सहन करने की शक्ति दीजिये, हमारे अन्दर धैर्य भर दीजिये, ताकि फोड़े को चिरवाते समय विचलित न हों।” विपत्तियाँ सब पर आती हैं। राम, कृष्ण, बुद्ध, ईसा, मुहम्मद, शिव, दधीचि, हरिश्चन्द्र जैसी महान आत्माओं को विपत्ति ने नहीं छोड़ा, तो हम उससे अछूते नहीं बचे रह सकते। अप्रिय अवस्था को देख कर न तो चीखना चाहिए और न डरपोकों की तरह किंकर्तव्य विमूढ़ होना चाहिये। यह उचित है कि ऐसे समय में निवारण का उपाय करें और जब तक वह कष्ट है तब तक अविचल धैर्य की प्रभु से याचना करें। तीसरा प्रेम का ऊँचा दर्जा है। सबसे ऊँची प्रेम सगाई। परमात्मा-सत चित् आनन्द स्वरूप है। जैसे-जैसे आत्मा-परमात्मा के निकट पहुँचती जाती है, वैसे-वैसे ही आनन्द का अविचल स्त्रोत प्राप्त होता जाता है। स्वार्थ और इन्द्रिय परायणता को छोड़ कर जैसे-जैसे हम सत्य और परमार्थ की ओर बढ़ते जाते हैं, वैसे ही वैसे आत्मा निर्मल होकर दिव्य स्वरूप में चमकने लगती है और अन्ततः हृदय में आनन्द ही आनन्द शेष रह जाता है। जिस दिन एक पैसा भिखारी को देकर हम स्वार्थ का करोड़वाँ कण छोड़ देते हैं, उसी दिन मन बड़ा हलका रहता है, अन्दर शान्ति सी प्रतीत होती है। स्वार्थ और लिप्सा का जितना ही अधिक त्याग होता चलता है उतने ही अनुपात से लघु आत्मा परमात्मा के रूप में परिणित होती जाती है। तत्व दर्शियों का मत है कि जिसका हृदय तुच्छ विचारों से रहित होकर समदर्शी हो गया है अपने और पराये में जिसे भेद नहीं प्रतीत होता वह ब्राह्मी भूत परमहंस यथार्थ में जीवन मुक्त है। मुक्ति का आनन्द, जिसके लिये प्राणी व्याकुल रहते हैं, वह पवित्र और निस्वार्थ आत्मा को ही प्राप्त हो सकता है। भले ही वह आत्मा शरीर धारण किये हुए हो या अदृश्य जगत में विचरण कर रही हो।

प्रार्थना का एक ही रूप होना चाहिए विशुद्ध ज्ञान की याचना। यह पदार्थ सूक्ष्म लोक से ही प्राप्त होता है। इसलिए नित्य जितने अधिक समय तक संभव हो मन की बहिर्मुखी वृत्तियों को रोक कर अन्तर्मुखी करना चाहिये। साँसारिक विचारों का बिलकुल परित्याग करके आत्म-चिन्तन करना चाहिये।


गीता में भाग्य

न जाने क्यों और किस प्रकार यह घातक विश्व से जनसाधारण के मस्तिष्कों में घर कर गया है कि मनुष्य का भविष्य भाग्य के अधीन है। ईश्वर ने जैसा कुछ भाग्य में लिख दिया है, वहीं भोगना पड़ेगा हमारे करने से कुछ नहीं हो सकता।’ यह विचार मूर्ख और आलसी ही रख सकते हैं। अपनी त्रुटियों की जिम्मेदारी ईश्वर पर थोपकर लोग कुछ देर के लिए आत्म वंचना कर लें इसके अतिरिक्त और कोई लाभ किसी को नहीं मिल सकता।

ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि देकर कर्म क्षेत्र में भेजा हैं कि वह इच्छानुसार काम करे और तदनुसार फल भोगे। ईश्वर किसी को बुरे कर्म करने की प्रेरणा नहीं करता। वह तो इन कर्म-अकर्मों से बहुत दूर रहता हैं। गीता में भगवान कहते हैं-

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।

न कर्म फल संयोग स्व भावस्तु प्रवर्तते॥

गीता अ. 5 श्लोक 14॥

कर्तापन कर्म और कर्म फल की ईश्वर नहीं बनाता इनमें तो जीवन स्वभाव से ही प्रवृत्त होता है।

अनादित्वान्निर्गुण त्वात्परमात्माय मव्ययः।

शरीरस्थोऽपि कोन्तेय न करोति न लिप्यते॥

अ. 13 श्लोक 31॥

हे अर्जुन ! ईश्वर अनादि है, निर्गुण है, और अपरिवर्तनशील है। वह शरीर में है तो भी कुछ नहीं करता और अच्छी या बुरी बात से उसका कोई सम्बन्ध नहीं।

न माँ कर्माणि लिप्यन्ति न में कर्म फले स्पृहा।

इति माँ यो∙िभ जानाति कर्ममिर्नप बद्धयते॥

अ 4 श्लोक 14॥

मुझे (ईश्वर को) कर्मफल की इच्छा नहीं है इससे कर्म मुझको बन्धन में नहीं डालते और जो मुझे मुझको ऐसा समझता है कि ईश्वर है कि ईश्वर न कुछ करता हैं और न कराता है, निरंजन, निष्काम, अकर्ता अभोक्ता, अव्यय, निर्गुण, कूटस्थ, अचिन्त्य और अविकारी है, वह मनुष्य भी कर्म के बन्धन में नहीं पड़ता।

त्रिभिर्गुण मयै र्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत।

मोहितं नाभि जानाति मामेभ्य परमव्ययम्।

अ. 7 श्लोक 25॥

सत्व गुण, रजोगुण और तमोगुण इन तीन गुण वाले स्वभाव पर सारा जगत मोहित है। इसे वहीं नहीं जानता कि मैं (ईश्वर) इन तीनों गुणों से अलग हूँ, श्रेष्ठ हूँ और विकार रहित हूँ।

मूढो∙यं नाभि जानाति लोकोमामजमव्ययम्।

अ 7 श्लोक 25॥

यह मूढ़ लोग नहीं जानते कि मैं अजन्मा और विकाररहित हूँ।

नादत्ते कस्य चित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।

अज्ञाने नावृतं ज्ञानं तेन मुह्यान्ति जन्तवः।

अ. 5 श्लोक 15॥

सर्वव्यापक ईश्वर किसी के पाप पुण्यों से सम्बन्ध नहीं रखता। अज्ञान से ज्ञान ढ़का होने के कारण ही जीव मोह में पड़ जाते हैं।

गीताकार ने स्पष्ट कर दिया है कि जो जैसा करता है वैसा पाता है इसमें ईश्वर, भाग्य या और किसी का दोष नहीं है।

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नरः।

स्वकर्म निरतः सिद्धिं यथ विन्दन्ति तच्छुगु॥

अ 18 श्लोक 45॥

अपने अपने कर्म में लगे हुए मनुष्य अच्छी से अच्छी और बड़ी सिद्धि पाते हैं।

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।

आत्मैं ह्यात्मनों बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।

अ. 6 श्लोक 5॥

आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा ही आत्मा का शत्रु है इसलिए आत्मा का उद्धार करना चाहिए, नाश नहीं।

बन्धुरात्मात्मन स्तस्य येनात्मैवात्मनोजितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥

अ. 6 श्लोक 6॥

जिसने आत्मा को अपनी आत्मा से जीता है उसकी आत्मा अपनी आत्मा का मित्र है और जो अनात्मा है अर्थात् आत्मज्ञान से रहित है उसी की आत्मा उसके साथ शत्रु सा व्यवहार करती है।

गीता के अन्त में सारा ज्ञान सुनाने के बाद भी भगवान ने किसी प्रकार का हुक्म नहीं दिया वरन् उसकी स्वतन्त्रता का सम्मान करते हुए यही कहा है-जो तेरी इच्छा हो सो कर।

इति ते ज्ञान माख्यातं गुह्याद गुह्यतरं मया।

विमृश्यै तदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।

अ 18 श्लोक 13॥

मैंने तुझसे गुप्त से गुप्त ज्ञान कहा, इसको शुरू से अन्त तक विचार करके जैसी तेरी इच्छा हो वैसा कर।

पाठकों को यह जानना चाहिये कि ईश्वर किसी के भाग्य में कुछ, किसी के में कुछ लिख कर पक्षपात नहीं करता और न भविष्य को पहले से ही तैयार करके किसी को कर्म करने की स्वतन्त्रता में बाधा डालता है। हर आदमी अपनी इच्छानुसार कर्म करने में पूर्ण स्वतन्त्र है कर्मों के अनुसार ही हम सब फल प्राप्त करते हैं। इसलिये भाग्य के ऊपर अवलंबित न रह कर मनुष्य को कर्म करना चाहिए।


Quotation

यह न भूलना चाहिये कि जो दैवी अंश तुम में है सो दूसरे में भी है।

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लाख मण ज्ञान से बढ़ कर एक मुट्ठी सदाचार उत्तम है।


आत्मबल

(योगी अरविन्द घोष)

महापुरुष की तपस्या, स्वार्थ-त्यागी का कष्ट सहन, साहसी का आत्म-विसर्जन, योगी का योगबल ज्ञानी का ज्ञान संचार और सन्तों की शुद्धि-साधुता आध्यात्मिक बल का निर्झर है। मूल प्रकृति शुद्धात्मा के अधीन है वही आद्य-प्रकृति असम्भव को भी सम्भव कर दिखाती है। मूक को वाचालता तथा पंगु को पर्वत चढ़ने की शक्ति देती है। समस्त जगत इसी शक्ति से निर्मित हुआ है।

हमारे पास बाहुबल नहीं है। समग्र सामग्री नहीं है शिक्षा नहीं है, न राज शक्ति ही है। तब किसके बूते पर हम उस कार्य साधन को उद्यत हुए हैं जो प्रबल और शिक्षित यूरोपीय जाति के लिए भी असाध्य जान पड़ता है। लेकिन यह तो सब को स्वीकार करना पड़ेगा कि केवल बाहुबल से किसी महान कार्य का होना असम्भव है। अतः बाहुबल से आत्मबल ही कार्य सिद्धि में अधिक क्षमता रखता है।

आत्मबल ही बाहुबल को तुच्छ प्रमाणित कर मनुष्य जाति को सिखाता चला रहा है कि यह जगत भगवान का राज्य है। अन्य स्थूल प्रकृति का खाली क्षेत्र नहीं। जिसका आत्मबल विकसित हो चुका है उसके जय की सामग्री आप ही आप सामने उपस्थित हो जाती है। सारी विश्व बाधाएं और विपत्तियाँ स्वयं टूटकर अनुकूल अवस्था को लाती हैं। कार्य का सामर्थ्य स्वयं प्रकट होकर तेजस्वी और वेग गतिवान होता है।


अवकाश के क्षण

(श्री स्वेट मार्डेन)

हम अपने निर्धारित काम करते हैं। किन्तु काम को करते हुए भी बहुत सी फुरसत की घड़ियाँ मिलती हैं यदि उनका उपयोग ठीक प्रकार किया जावे तो इस थोड़े-थोड़े समय से ही बहुत काम हो सकता है।

पार्लियामेण्ट के प्रमुख वक्ता एल हुवरिट का ओजस्वी भाषण सुनकर उसके भाई प्रभावित हुए और प्रशंसा करते हुए बोले-”हमारे कुटुम्ब में सबसे प्रतिभावान हुवरिट है। मुझे याद है कि जब हम लोग खेला करते थे तब उस फुरसत के वक्त में वह अपना काम किया करता था।” हेरेट बीचरस्होव ने अपनी सर्वोत्तम कृति ‘टाम काका की कुटिया’ की रचना घर गृहस्थी के झंझटों के बीच फंसे रहते हुए ही की है। भोजन की प्रतीक्षा में जितना समय लगता था उतने ही क्षणों के नियमपूर्वक काम में लाकर वीचर महोदन ने एक महाग्रन्थ को पढ़ डाला। महाशय लाँग फेलो ने चाय उबलने तक की फुरसत को काम में लाकर ‘इन करनो’ नामक ग्रन्थ का अनुवाद कर डाला था। कवि वर्न्स खेती का काम करते थे जब जहाँ मौका मिलता तो कविता करने लगते उनकी अमर रचनाओं का बड़ा मान है। महाकवि मिल्टन राज्य मंत्री था उसे बड़ा काम रहता था फिर भी उसने कुछ घड़ियाँ नित्य बचाकर ‘पेरेडाइज लाँस्ट’ नामक महाकाव्य रच डाला। ईस्ट इण्डिया हाउस में क्लर्की करते करते जान स्टुअर्ट मिल ने अपना सर्वोत्तम ग्रन्थ लिखा।

डॉक्टर गेलीलियो को अपने बीमारों की देख-भाल में बड़ा सर पचाना पड़ता था फिर भी वह कुछ समय बचाकर विज्ञान की शोध करता। अन्त में उसने ऐसे-ऐसे आविष्कार किये जिनके लिये संसार सदा उनका कृतज्ञ रहेगा। माइकिल फेर्ड नामक जिल्द साज ने कुछ घंटे बचाकर बड़ी-बड़ी वैज्ञानिक शोधे कर डाली। चार्ल्स फास्ट नामक चमार एक घंटे प्रतिदिन अध्ययन करके अमेरिका का सर्वोपरि गणिताचार्य हो गया। रोज थोड़ा-थोड़ा काम करने से कुछ ही दिनों में उसका आश्चर्यजनक परिणाम दिखाई देता है। प्रति दिन एक घंटा भी किसी काम के सीखने में लगाया जाये तो मनुष्य उसमें बहुत उन्नति प्राप्त कर सकता है।

मि. माजर्ट प्रतिक्षण कुछ न कुछ करते रहते थे उन्होंने अपनी मृत्यु शैय्या पर ‘रेक्यूयम’ नामक पुस्तक को लिखा। डॉक्टर मारसन गुड लंदन में एक बीमार को देखने गये रास्ते में उन्होंने ‘लुक्रेशियश’ का अनुवाद कर डाला। हेनरी क्रिक ह्वाइट ने दफ्तर आने जाने के समय में ग्रीक भाषा सीखी थी और डॉक्टर वर्नें ने इटालियन और फ्रेंच भाषाओं को घोड़े की पीठ पर पढ़ा था। समय जैसी अमूल्य वस्तु दुनियाँ में और कोई नहीं हो सकती। जार्ज स्टीफ नसन कहते हैं-फुरसत के वक्त को मैं सुवर्ण समझता हूँ और उसे कभी व्यर्थ नहीं जाने देता। सिसरो कहता था- ‘जिस समय को अन्य व्यक्ति दिखावे तथा आराम में खर्च करते हैं उसे ही मैं तत्वज्ञान के अध्ययन में लगाता हूँ। इटली के एक विद्वान ने अपने दरवाजे पर लिख रखा था-’जो यहाँ आवे वह मेरे काम में मदद करे।’ जान एड्यस का समय जब कोई नष्ट करता था तो उसे बड़ा बुरा लगता था। ह्टियर कहता है-’आज के दिन में हमारा भविष्य छिपा हुआ है। आज का दिन नष्ट करने का अर्थ है अपने भाग्य को कुचलना।’

समय ही सम्पत्ति है। सच बात तो यह है कि पैसे की अपेक्षा समय कहीं अधिक मूल्यवान है समय को बरबाद करने के माफिक हैं-शक्ति को नष्ट करना, योग्यता को नष्ट करना, सौभाग्य को नष्ट करना, और अपना लोक परलोक नष्ट करना। समझदार व्यक्ति फुरसत के समय के छोटे-छोटे टुकड़ों को बचाकर महान् बन जाते हैं किन्तु उन्हें योंही लापरवाही में उड़ा देने वाले अपनी असफलता पर रोते हैं और भाग्य को कोसते हैं। समय मित्र के वेश में हमारे सम्मुख उपस्थित होता है और ईश्वर की भेजी हुई बहुमूल्य नियामतें हमारे लिए लाता हैं किन्तु जब हम उसका उचित आदर नहीं करते तो उलटे पावों लौट जाता है। फ्रेंकलिन कहते हैं-”क्या तुम्हें अपने जीवन से प्रेम है? यदि है तो समय को व्यर्थ नष्ट न करो क्योंकि जीवन समय से ही बना हुआ है।” शेक्सपियर के यह शब्द कितने मार्मिक हैं-”मैंने समय को नष्ट किया और अब समय मुझे नष्ट कर रहा है।”


अन्तः स्थल की टेर

(श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर)

मनुष्य की सबको श्रेष्ठ प्रार्थना यह है कि वह असत्य से सत्य की ओर बढ़े, अँधेरे से उजाले की दिशा में अग्रसर हो, मृत्यु से अमरत्व की तरफ पग बढ़ावे। यह दुर्बलों के उपयुक्त प्रार्थना नहीं है। वह तो मनुष्य के परम कल्याण का आह्वान है। वह उसे कष्ट और वेदनाओं में से पूर्णता की ओर पुकार रहा है। वह मनुष्य की अन्तरात्मा में से रुद्र की स्फूर्ति व्यक्त करता है और उसे सत्य के विकट मार्ग पर आरुढ़ करता है।

तमसो मा ज्योतिर्गमय

असतो मा सद्गमय

मृत्योमा∙मृतं गमय


दंगे और अहिंसा

(महात्मा गाँधी)

मेरी अहिंसा में खतरे से भाग जाने की या अपने प्रियजनों को अरक्षित छोड़ देने की गुँजाइश नहीं है। जहाँ हिंसा और डर कर भाग जाने में से एक चीज़ चुननी हो वहाँ मैं कायरपन की अपेक्षा हिंसा को ही अधिक पसन्द कर सकता हूँ। जिस प्रकार मैं किसी अन्धे आदमी को स्वास्थ्यकर दृश्यों का आस्वाद लेने के लिए ललचा नहीं सकता उसी प्रकार डरपोक को अहिंसा का उपदेश नहीं दे सकता। अहिंसा तो वीरता का गौरीशंकर है। मेरा अपना यह अनुभव ही है, कि जिन लोगों ने हिंसा की तालीम पाई है उनको अहिंसा की श्रेष्ठता समझाने में मुझे कोई कठिनाई नहीं होती। मैं खुद बरसों तक कायर रहा तब तो मेरे दिल में हिंसा थी। ज्यों ज्यों मैं अपनी कायरता छोड़ने लगा, त्यों -त्यों अहिंसा की कीमत करने लगा। जो हिन्दू संकट के समय अपने कर्तव्य क्षेत्र से भागे वे इसलिए नहीं भागे कि वे अहिंसक थे या प्रहार करने से परहेज करते थे, बल्कि इसलिए भागे कि मरना या कोई चोट सहना भी नहीं चाहते थे। शिकारी कुत्ते के सामने से भाग जाने वाला खरगोश कुछ खास तौर से अहिंसक नहीं होता। वह तो कुत्ते को देखते ही काँपने लगता है और अपनी जान बचाने के लिये भागता है। जो हिन्दू अपनी जान बचाने के लिए भाग गये वे अगर अपना सीना खोल कर मुस्कराते हुए अपनी जगह पर डटे रहते और मर जाते तो वे दरअसल अहिंसक होते अथवा यश उज्ज्वल करते, अपने धर्म की क्रान्ति बढ़ाते और अपने मुसलमान हमलावरों की दोस्ती के पात्र होते। अगर वे अपनी जगह डटे रह कर प्रहार के बदले प्रहार करते तो भी वे इससे कुछ कम अच्छा काम करते, फिर भी अच्छा ही काम करते।


तम्बाकू पीना छोड़ दीजिये

(ले. श्री डॉक्टर ज्ञानचन्द्र जी)

शरीर पर तम्बाकू का घातक प्रभाव पड़ता है। यह मेदे को सिकोड़ कर पाचन क्रिया को शिथिल कर देती है और समस्त नर्वस सिस्टम मुर्दा हो जाता है। होठ काले पड़ जाते हैं, जीभ की स्वाद-शक्ति कम हो जाती है। तम्बाकू पीने पर निम्न परिणाम होते है ः-

1. गीली भाप बनती है 2. कार्बन बनती है, कार्बन गले में तथा कलेजे की नालियों में जम जाती है। 3. अमोनिया होता है, जो अधिक काल तक पीने से जिह्वा को फाड़ डालता है, गले को खुश्क करता है, जिससे प्यास बढ़ती है और तीव्र धूम्रपान की इच्छा जागृत होती है। अमोनिया रक्त को भी दूषित करता है। 4. कारबोनिक एसिड ‘कोयले का तेजाब’ होता है, जिससे सिर दर्द, अनिद्रा और स्मरण शक्ति का हृास होता है। 5. निकोटीन प्रवाहित होती है, निकोटीन एक तीव्र विष है, इसकी एक बूँद खरगोश के मुँह में डाल दो तो वह तुरन्त मर जायेगा। डाँक्टर ब्रोडे ने बिल्ली की जीभ पर एक बूँद डाली तो वह तुरन्त मर गई। 6. और भी सूक्ष्म विष हैं; जैसे कोलिडीन, प्रसिक एसिड, कार्बनमोनोकसाइड, फुरफुरल और एक्रोलीन, क्रोलिडीन, जहरीले क्षार हैं, जिससे स्नायु दुर्बल हो जाते हैं और चक्कर आने लगते हैं। प्रसिक एसिड ज्ञान-तन्तुओं को मलीन कर देता हैं। सिर में भारीपन रखता है तथा मन में अरुचि पैदा करता है। कार्बनमोनोक्साइड दम घोट कर मार डालने वाली गैस है। इसका प्रभाव यह होता है कि साँस जल्दी चलने लगती है, हृदय की गति तेज हो जाती है, रोमाँच और ऐठन हो जाती है, आँखों की पुतलियाँ फैल जाती हैं और ठंडा पसीना, ठंडा बदन और बेहोशी होती है। फुरफुरल मस्तिष्क के ज्ञान-तन्तुओं को ढीला कर देता हैं, एक्रोलीन एक गैस है, जो मन में चिड़चिड़ाहट पैदा कर देता है।

अब प्रश्न यह है कि तम्बाकू पीना छोड़ा जा सकता है, अथवा नहीं? हमारा विश्वास है कि प्रत्येक ऐब का परित्याग सम्भव है। मन का संकल्प ही तप है जिस चीज को मन ने भुला दिया, वह छूट गई। जब तक मन दृढ़ है तब तक वह तप भी अखण्ड है। मैं प्रत्येक तम्बाकू पीने वाले से कहता हूँ कि वह इस ऐब को दृढ़ता से परित्याग करे, तम्बाकू पीना सर्वोपरि ऐब है। इसका नैतिक पाप परिवार को कष्ट पहुँचाता है। जरा उस अवस्था को सोचिये, जब एक अज्ञात नववधू एक सिगरेट पीने वाले के घर पहुँच कर अन्य अपरिचित आदतों के अतिरिक्त प्रणयकाल से भी भयभीत रहे, वह पति के मुंह से धुएं की बदबू को क्यों बरदाश्त करे, क्यों उसे धीरे-धीरे पी जाये। कोमल मिज़ाज स्त्रियाँ आरम्भ में दिमागी बू चढ़ जाने के कारण बेहोश हो गई हैं और इन्हें धीरे-धीरे अपना मिज़ाज उसे सह लेने के अनुकूल बनाना पड़ता है। वह जीवनपर्यन्त इस अभ्यास को निभाती है। पाठक इस बेबसी को तो समझिये, कैसा पैशाचिक आचार है।

स्त्री के बाद संतति उस दोष में रंगती है। अपने पिता को देख कर बेटा भी लुक छिप कर पीता है और बढ़ते-बढ़ते अपने पिता के रिकार्ड को तोड़ डालता है। आज स्कूल, कालेज के विद्यार्थियों को चुरट बिना चैन नहीं, इन करोड़ों युवकों के मुंह में कालिख पोतने वाले कौन हैं? उनके सिगरेटी पिता। मैं ऐसे सब पिताओं को जलती आग में कूद कर इस महापाप का प्रायश्चित करने की सलाह देता हूँ। उन कोमल बच्चों की नई छाती को सिगरेट के धुँए से झुलसा कर उनके तेज और शुद्ध रक्त को विषैला बना कर उन्हें क्षय के गड्ढ़े में डाल दिया जाता है, उनकी कमर झुकी, आँखों पर चश्मा चढ़ा कि गड्ढे में पैर खिसका। इन्हें मृत्यु से कौन रोकेगा?

सिगरेट का तीसरा शाप परिवार का फूँकना है। घरों में आग लग जाना और मृत्यु हो जाना प्रकट सत्य है। दिल्ली के एक सुप्रसिद्ध करोड़पति परिवार में एक ऐसी ही करुणा मृत्यु हुई थी, इसे हम कभी नहीं भूल सकते। सरदी के दिन सेठ साहब रेशमी बिस्तर पर पड़े सिगरेट पी रहे थे। पीते-पीते झपकी लग गई और सिगरेट वाला हाथ छाती पर आ गिरा। सिगरेट जल रही थी, उसने कुरते को पार कर सीने को जला दिया। चमड़ी पर गर्मी पहुँची ही थी कि उनकी आँख खुल गई। उन्होंने उस स्थल को मसल महल में दौड़-धूप मचाई, डॉक्टर साहब पहुँचते पहुँचते उनका हार्ट फेल होने लगा था। इन्जेक्शन देने पर भी चिराग बुझ गया। सेठ साहब हम अब तक अफसोस करते है।

मैं प्राकृतिक चिकित्सक हूँ और मुझे पूरा विश्वास है कि बड़े से बड़ा पियक्कड़ भी प्रकृति के आसरे इसे छोड़ सकता है। ध्यान रखिये कि इसका संकल्प सबसे पहला मुख्य उपाय है, “चाहे जो कुछ हो पर मैं तो इसे पीऊंगा ही नहीं” संकल्प डटे रह कर 8-10 दिन में स्वतः ही मन शाँत जाता है और हुड़क मिट जाती है। फिर भी हम कुछ उपाय देते हैंः-

1. सिगरेट एक दम छोड़कर उसे देखने से अनिच्छा कर लेनी चाहिये। 2.मन को सदैव दृढ़ बनाये रखना चाहिये। 3. जब कभी मन न माने, तबियत मचल ही रही हो, तो पारिवारिक जनों में बैठ कर एकान्तता नष्ट कर देनी चाहिये। याद रखो, अकेले रहोगे तो व्रत टूट जायेगा, जी मिचलाये, तबियत डूबी रहे, नींद नहीं आये, पेट में कष्ट हो तो “अश्वगंधारिष्ट” का सेवन करो। जब कभी आवश्यकता प्रतीत हो, एक मात्रा अश्वगंधारिष्ट को पीलो। अश्वगंधारिष्ट सिगरेट, मद्य-माँस आदि महा दोषों के छुड़वाने की दिव्य औषधि है। यह उनके शरीर को पूरा करती है तथा ज्ञान तन्तुओं को धीरे-धीरे मलिनता से रहित करती है। ‘अश्वगंधारिष्ट’ जितना पुराना होगा, उतने ही पुराने पियक्कड़ो को लाभ होगा। शराब पीने का अभ्यास भी इससे छूट जायेगा। शराब की जगह दिन में 2-3 बार पीना इसे आरम्भ कर दो, तबियत शराब से स्वयं घृणा करने लगेगी। 4. मुंह में बार-बार पानी भरे तो भुनी सौंफ और छोटी इलायची चबानी चाहिये। 5. हिचकी और सर दर्द हो तो बिंदाल के डोड़े के पानी से नहा लेना चाहिये। (बिंदाल के 3-4 डोडे पानी में भिगोदें 4 घटें बाद मलकर पानी छान लेना चाहिये। इस पानी की 2-3 बूँदे नाक में टपकाने से छीकें आकर बलगम तथा अन्य दोष निकल पड़ेंगे, यह नुस्खा सप्ताह में एक बार ही लेना चाहियें) 6. मल अवरुद्ध होने पर सोते समय 3-4 दिन तक गुड़ की शक्कर मिला हुआ दूध पीना चाहिये। 7-मन सदैव प्रसन्न रखना चाहिये। 8-सदैव स्वच्छ रहो, पौष्टिक भोजन करो। --यथासम्भव अपने को लोगों में घिरा रहने दो, जो तुम्हारे शुभचिंतक हों। 9-अपनी विजय पर गर्व करो। ध्यान रखिये कि समस्त उपद्रव व इच्छाएं दस दिन तक ही रहेंगी। ग्यारहवें दिन तबियत हल्की और खुश होगी। एक पाप का बोझ हटता सा प्रतीत होगा।

तम्बाकू पीने का समय भी कितना व्यर्थ जाता है, यह भी सोचिये, 2 घंटे नित्य इसमें खर्च हों, 60 दिन 1 वर्ष में खर्च हुए। मिस्टर मिक्स समस्त दुनिया का हिसाब लगा कर बतलाते हैं कि प्रति वर्ष करीब एक अरब रुपयों का तम्बाकू सेवन किया जाता है। वैज्ञानिक आधार पर यह बात मानी गई है कि पीने और खाने दोनों क्रियाओं से प्यास लगती है। मुँह और गला खुश्क हो जाता है। पानी पीने से भी प्यास कम नहीं होती, डॉक्टर हम्प्रे ने कहा था कि यह न तो पोषक तत्व है, न पाचक है, न मानसिक और न शारीरिक शक्ति को बढ़ाने वाला है। यह तो हमारा प्रबल शत्रु है, जो नसों को काट डालता है, पेट को नष्ट करता है, प्यास को बढ़ाता है, जिस भूमि में तम्बाकू की खेती होती है, वह शक्तिहीन हो जाती है, जो व्यक्ति सिगरेट पीता है, वह 60 फीट तक तम्बाकू की गन्ध फैलाता है। (जीवन सखा)


तान्त्रिक का व्यर्थ प्रयास

(श्री मंगल चंद भंडारी)

किसी घने जंगल में एक बड़ा भारी तान्त्रिक चिरकाल से महाकाल की साधना कर रहा था। उसने बहुत-सी अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त कर ली थीं और पूर्ण सिद्ध बनने के लिए घोर तप में प्रवृत्त था।

एक दिन वह अपनी गुफा में पड़ा हुआ सुस्ता रहा था, वह वहाँ हुई चीजों से मनोरंजन करने लगा। इतने में एक चूहा उधर से फुदकता हुआ आ निकला। तान्त्रिक को उसके मनोभाव जानने में क्षण भर की भी देर न लगी, वह बिल्ली से डर कर यहाँ भाग आया था और कहीं छिपने की बात सोच रहा था। योगीराज की मौज आई कि लाओ इस बेचारे का डर दूर कर दें, उन्होंने एक फूँक मारी, तो चूहा अपना शरीर बदल कर बिल्ली बन गया। अब तो म्याऊँ म्याऊँ करता वहीं रहने लगा।

बहुत दिन के बाद तान्त्रिक को एक बार फिर फुरसत मिली। वह यों ही बैठा हुआ था कि देखा-बिल्ली थर-थर काँप रही हैं। बेचारी को कुत्तों ने धर दबाया था। तान्त्रिक से न रहा गया, उसने चुटकी बजा कर बिल्ली को कुत्ता कर दिया, ताकि फिर डरने का अवसर न आवे। कुत्ता कुछ देर तक दुम हिलाता हुआ कृतज्ञता प्रकट करता रहा।

लेकिन फिर भी उसे चैन नहीं था। गुंडा से बाहर निकलता कि जंगली चीते उसका पीछा करते। डर के मारे वह फिर गुफा का कोना कुरेदने लगा। तान्त्रिक कुछ झुँझलाया तो सही, पर एक अवसर और दिया, पीठ पर हाथ फेर कर उसे चीता बना दिया और कह दिया-’जा अब निधड़क घूम फिर।’

लेकिन डर भी बड़ी बेढब चीज़ है। उसके लिए आसमान से विपत्ति आ खड़ी होती है। बहेलियों का झुण्ड चीते पकड़ने के लिये उस जंगल में आ टपका। बेचारे चीते का कलेजा धक-धक करने लगा। पिछली टाँगों में मुँह छिपाकर उसी गुफा के एक कोने में जान बचाने के लिए वह पड़ा रहा, डर तो उसका पीछा छोड़ता ही न था।

इस बार तान्त्रिक तप पर से अँगड़ाई लेता हुआ उठा, तो उसका पैर चीते की दुम पर पड़ा। उसने चौंक कर देखा कि क्या है-”अहा, यह तो चीते राम बैठे हुए हैं, महाशय जी को डर से छुटकारा नहीं, मन का भय इनके लिए साक्षात् भय बुला लाता है।” तान्त्रिक ने खोपड़ी घुमाई, तो उसमें से एक विचार टपक पड़ा-”जिसका हृदय जैसा है, वह वैसी ही परिस्थितियों में रहेगा। दूसरों के कन्धों पर खड़ा होकर कोई बड़ा हो भी जाये, तो इससे कुछ लाभ न होगा। अपने आप उपार्जित की हुई शक्ति ही वास्तविक और स्थायी शक्ति है। केवल दूसरों की सहायता से किसी का भला नहीं हो सकता।

योगी ने कमण्डल उठाया और एक चुल्लू जल उस चीते के ऊपर फेंक दिया। वह चूहा बन कर बिल की तलाश में फिर फुदकने लगा। तान्त्रिक जमहाई लेता हुआ, इधर-उधर टहल रहा था और इस बात का अनुभव कर रहा था कि उन्नति का एक ही मार्ग हो सकता है ‘अपने पैरों पर आप खड़े होना।”


Quotation

प्रत्येक से प्यार करो, थोड़े में सन्तोष रखो, और किसी को दुःख मत दो।


आध्यात्मिक साधना से क्या लाभ?

प्रश्न उपस्थित होता है कि आध्यात्मिक साधनाओं के अभ्यासों में हम क्यों प्रवृत्त हों? उनसे हमारा क्या प्रयोजन? हमें क्या लाभ मिलेगा? यह प्रश्न यथार्थ में महत्वपूर्ण है। आइये आज इन पर विचार करें।

जिस प्रकार शारीरिक बल का संपादन करने से शारीरिक स्वास्थ्य उपलब्ध होता है और इसके आधार पर दैनिक जीवन के अन्यान्य कार्य पूरे होते हैं, उसी प्रकार मानसिक बल का उपार्जन करके मन चित्त की स्थिरता और शान्ति का अनुभव कर सकते है। निश्चय ही मानसिक सन्तुलन ठीक रखने पर लौकिक और पारलौकिक सफलताएं मिल सकती है।

मनुष्य विद्युत शक्ति का भण्डार है। उसमें प्राण-तत्व इतनी प्रचुर मात्रा में भरा हुआ है कि इसके आधार पर असम्भव और आश्चर्यजनक कार्यों को पूरा किया जा सकता है। किन्तु हम उसका ठीक प्रकार उपयोग करना नहीं जानते। यदि उसका समुचित रीति से उपयोग करना जान लिया जाये तो जीवन की दिशा दूसरी हो सकती है। मानवीय विद्युत का समुचित उपयोग करना सीखना वैसा ही उपयोगी है जैसे घर के कीमती घोड़े पर चढ़ना जानना या बैंक में जमा हुए रुपये को निकालने की जानकारी रखना। वे मनुष्य बड़े अभागे हैं जिनके पास बहुमूल्य घोड़ा है पर उस पर चढ़ना नहीं जानते। अथवा जिनकी विपुल सम्पत्ति बैंक में जमा है किन्तु उसे निकालने की विधि नहीं जानते और पैसे पैसे को मोहताज फिरते हैं। आध्यात्मिक साधना का यह प्रथम फल बहुत ही महत्व-पूर्ण है कि अपनी अपरिमेय शक्ति का समुचित उपयोग करना मालूम हो जाये।

दुखों को दूर करने और सुख प्राप्त करने का हम सतत प्रयत्न करते हैं, सारा जीवन इन्हीं दोनों की उलट पुलट में व्यतीत हो जाता है, किन्तु मनोकामना पूरी नहीं होती। यदि कोई ऐसा उद्गम प्राप्त हो जाये जहाँ से सुख और दुख का उदय होता है और वहाँ अपनी इच्छानुसार चाहे जिसे ले लेने की सुविधा हो तो क्या इसे मामूली चीज़ समझना चाहिए। विद्या, धन, स्वास्थ्य, स्त्री, सन्तान, प्राप्त करने पर भी जिस सुख को हम नहीं प्राप्त कर सकते उसकी सच्ची स्थिति प्राप्ति का सच्चा मार्ग केवल आध्यात्मिक साधना द्वारा ही प्राप्त हो सकता है।

अपनी शक्ति को विकसित करना यह कितना महान लाभ है। मानवीय अन्तःस्थल में ऐसे ऐसे अस्त्र शस्त्र छिपे पड़े हैं जैसे भौतिक विज्ञान द्वारा अब तक न तो बन सके हैं और न भविष्य में बनने की सम्भावना है। यह हथियार, भ्रष्ट तान्त्रिक प्रयोक्ताओं की तरह मारण, मोहन, उच्चाटन के लिये ही नहीं वरन् बाल्मीक जैसे डाकुओं को ऋषि के रूप में परिणित करने की भी शक्ति रखते हैं। सुदामा और नरसी जैसे दरिद्रों के सामने क्षण भर में स्वर्ण सम्पदा के पर्वत खड़े कर सकते हैं, कोढ़ियों को स्वर्ण काय बना सकते हैं और डूबते दरिद्रों को पार कर सकते हैं यह दिव्य शक्तियाँ भी आत्म-साधना द्वारा ही संभव हैं।

यह बड़ी पेचीदगी है कि दूसरे क्या हैं? वे किस प्रकार के विचार रखते हैं? क्या चाहते हैं और कितनी योग्यता रखते हैं? यदि इन सब बातों का ज्ञान हो जाये तो मनुष्य की बहुत सी कठिन समस्याएं हल हो सकती हैं और वह ठीक व्यक्तियों से ठीक लाभ उठा सकता है। दूसरों के मनकों पहचानना, अन्यत्र होने वाली घटनाओं को जानना, भविष्य का पूर्वाभास प्राप्त करके सावधान रहना यह भी बातें एक से एक उत्तम हैं और मानवीय अपूर्णता को दूर करती हैं।

हम स्वयं क्या हैं? संसार क्या है? कुच और कंचन का तत्व क्या है? इनका ठीक ज्ञान न होने के कारण भव बाधाओं की कठिन पीड़ायें हम सहते हैं और चिरकाल तक नारकीय यंत्रणाओं में तड़पते रहते हैं। बंधन से मुक्त होकर सच्चिदानन्द स्वरूप को प्राप्त करना तभी संभव हैं जब हम ज्ञान दृष्टि से, दार्शनिक पद्धति से, ईश्वर, जीव, और प्रकृति का विवेचन कर सकें। रोग का ठीक रूप जाने बिना इलाज करना असंभव है। विश्व का तात्विक रूप जाने बिना भव से तरना नहीं हो सकता। और वह तत्व दर्शन आत्म-साधन के ही परिणामस्वरूप प्राप्त हो सकता है।

मिट्टी के खिलौनों से खेलने वाले, कुच कांचन में व्यस्त, बाल-बुद्धि के अज्ञानी पुरुष, आध्यात्मिक साधनाओं का उपहास कर सकते हैं, अविश्वास कर सकते हैं, परन्तु विश्व की प्रचण्ड अनुभूतियों का तेज हमसे कहता है कि अज्ञानियों ! आत्मा ही सत्य है। आध्यात्म-विद्या ही सत्य है। प्राणियों! असत् की ओर नहीं सत् की ओर चलो।


आवश्यकताओं को कम करो।

(ले. श्री सेठ अगरचन्द नाहटा, सिलहट, असम)

अपने पूर्वजों के सुख शान्तिमय जीवन से जब हम अपने वर्तमान जीवन की तुलना करते हैं, तो हमारे जीवन में अधिक अशान्ति पाई जाती है। यही क्यों, आज भी ग्रामीण जीवन शहर निवासियों के जीवन की अपेक्षा अधिक सुखमय नजर आता है। इसके कारण पर विचार करने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि उनकी आवश्यकताएं कम हैं और हमारी आवश्यकताएं इतनी अधिक बढ़ चुकी हैं, कि उनकी प्राप्ति करने में अविरत घुड़दौड़ लगी रहती है। साधारणतया लोगों की यह धारणा होती है कि शहर वाले नानाविधि वस्तुओं का उपभोग कर आनन्द उठाते हैं, ग्राम निवासियों को वे कहाँ से नसीब हों। पर जरा गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाये तो यह धारणा ठीक प्रतीत नहीं होती। यह ठीक है कि शहर में अनेक प्रकार की खाने पीने की चीजें मिलती हैं, और ग्राम निवासी केवल दाल रोटी, छाछ, दलिया ही पा सकते हैं फिर भी ग्राम निवासी अधिक स्वस्थ हैं और प्राप्त होने वाली थोड़ी वस्तुओं में ही संतुष्ट हैं, किन्तु शहर वाले अधिक प्रकार की खाद्य वस्तुएं प्राप्त होने पर भी अन्य विविध स्वादिष्ट वस्तुओं को खाने के लिये लालायित रहने के कारण अशान्त रहते हैं। इससे प्रतीत होता है कि यदि शाँति पाने की इच्छा हो, तो आवश्यकताओं को कम करना चाहिये।

सुख और शाँति तो संतोष में हैं, वस्तुओं के अधिकाधिक उपयोग में तो अधिक अशान्ति ही सम्भव है। मुझे बहुत बार विचार होता है, कि हमने अपनी आवश्यकताओं को बढ़ा कर ही अशान्ति मोल ली है, कलकत्ते में श्रमजीवियों को देखता हूँ और सिलहट में अपने आश्रित मजदूरों पर दृष्टिपात करता हूँ, तो उनको दिन भर कठोर परिश्रम करके भी रात्रि को सुख निद्रा में सोता हुआ पाता हूँ, वैसी निद्रा किसी लखपती को भी नहीं आती। मजदूर लोग संध्या होते ही खाने पीने से निपट कर गाना बजाना शुरू कर देते हैं और उसमें इतने मस्त हो जाते हैं, कि चिन्ता पास भी नहीं फटकती। किन्तु एक लखपती को रात के बारह बजे भी नींद नहीं आ रही है। एक के बाद दूसरी आवश्यकताओं की चिन्ता तैयार खड़ी है, उन चिन्ताओं का कोई आरपार नहीं। सब प्रकार की सुख सामग्री उसके पास मौजूद है, फिर भी जरूरतों का अन्त नहीं, इसके विपरीत मजदूर गरीबी में भी प्रसन्न है और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं।

बड़े आदमी नित्य नये आविष्कार करके फूले नहीं समाते। जनता समझती है, कि यह जो नित्य नई सुविधाओं का आविष्कार हो रहा है, हमारे लिये आनन्दप्रद होगा। विलास की नवीन-नवीन वस्तुएं बड़ी आकर्षक प्रतीत होती हैं, किंतु परिणामतः वे उससे तृष्णा को ही भड़काती हैं जो आकाश की तरह अनन्त हैं। मनुष्य उसके चक्कर में पड़ कर अपने अमूल्य जीवन को खो बैठता है, वह सुख चाहता है, पर दुख पल्ले पड़ता है। भारतीय ऋषियों ने सारे जीवन को तत्वचिन्तन में लगा कर इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था, कि-”जीवन को संयमित बनाओ, वासनाओं पर विजय प्राप्त करो, जो प्राप्त हो, उसी में संतोष करो, यही शाँति का राज-मार्ग है।” किन्तु आज की सभ्यता उन सिद्धान्तों का उपहास करती है और आवश्यकताओं को बढ़ाने में लगी हुई है, फलस्वरूप चिन्ता और अशाँति के बादल चारों और छाये हुए दिखाई पड़ रहें हैं।

मोटे तौर से यह बात कठिन प्रतीत होती है, कि जिनकी आवश्यकताएं बढ़ी हुई हैं, वे उन्हें क्यों कर घटा सकेंगे। बढ़े हुए खर्चे को कम करना बड़ा दुष्कर कार्य मालूम होता है, पर वास्तव में ऐसी बात नहीं है। जब आप दृढ़निश्चय के साथ आवश्यकताओं की कमी करने में जुट जावेंगे, तो आपको अनुभव होगा कि हमने अनेक अनावश्यक वस्तुओं को व्यर्थ ही आवश्यक समझ रखा था। हमारा गुजारा तो थोड़ी सी वस्तुओं से ही आनन्दपूर्वक हो सकता है। जीवन यापन करने और महान उद्देश्य की प्राप्ति करने के लिये बहुत सा जंजाल जमा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अनुभव बताता है कि सुख संग्रह करने में नहीं, अपरिग्रह में है।

जहाँ तक हो सके कम से कम वस्तुओं द्वारा जीवन-यापन करने का प्रयत्न करिये। ध्यान रखिये जितना ही आप अधिक जमा करेंगे, उतने ही अधिक गहरे दलदल में फंसेंगे। आवश्यकता को बढ़ाने में अशान्ति का और संयमित जीवन में शाँति का तत्व छिपा हुआ है।


निराशा के बाद आशा

(ले.-पं. प्रेमनारायण शर्मा गिरदावर कानूनगो, अम्बाह)

स्काटलैंड के राजा ब्रुश को अपने शत्रुओं से छह बार हारना पड़ा। उसने हर बार प्रयत्न किये, किन्तु असफलता के सिवाय और कुछ हाथ न आया।

छह बार हार जाने के पश्चात् वह बहुत निराश हो गया था और खिन्न मन से अपने प्राण बचाने के लिये एक टूटे-फूटे स्थान में छिपा पड़ा था। नाना प्रकार के विचार उसके मस्तक में घूम रहे थे, सोचता था, शायद मेरे भाग्य में असफलता ही लिखी होगी।

इन्हीं विचारों में वह पड़ा हुआ था, कि ऊपर छत पर उसकी निगाह गई। देखा कि एक मकड़ी जाला तान ने के लिये बार-बार प्रयत्न करती है, किन्तु बार-बार असफल होती है, उसका तार हर बार टूट जाता है। राजा बड़े मनोयोग के साथ उसकी ओर देख रहा था, छह बार वह मकड़ी असफल हुई, किन्तु सातवीं बार उसका मनोरथ पूरा हो गया उसने जाले को तान ही लिया।

ब्रुश के मन में एक नवीन स्फुरणा हुई, उसने कहा यदि सातवीं बार मकड़ी सफल हो सकती है, तो मैं भी कृतकार्य हो सकता हूँ। अबकी बार उसने दूने उत्साह के साथ सेना का संगठन किया और शत्रु पर चढ़ाई कर दी। इस हमले में उसे सचमुच विजय प्राप्त हुई और अपना खोया हुआ राजसिंहासन प्राप्त कर लिया।

हममें से कितने ही ऐसे हैं जो एक दो बार की असफलता से ही निराश हो जाते हैं और प्रयत्न को छोड़ बैठते हैं। यह सफलता का मार्ग नहीं है। विजय की पुष्पमाला उसके गले में पहनाई जाती है, जो अनेक बार निराशा के अवसर आने पर भी उन्हें कुचलता हुआ अपने ध्येय पथ पर बढ़ता ही चला जाता है।


मजबूत रस्सी बाँधो

(श्री पी. जगन्नाथ नायडू. नागपुर)

एक किसान के खेत में एक गाय नित्य चर जाती थी। दुखी होकर किसान ने एक दिन उस गाय को पकड़ लिया और लेकर राज दरबार में पहुँचा। जब फरियादियों की पुकार हुई तो उस किसान ने अर्जी दी कि यह गाय नित्य मेरा खेत चर जाती है। हाकिम ने उस गाय को बँधवा लिया और उस गाय के मालिक को सिपाहियों द्वारा बुलवाया। जब वह आया तो हाकिम ने पूछा कि अपनी गाय को इस तरह चरने के लिये क्यों छोड़ देते हो?

गाय के मालिक ने कहा-महाराज मेरा दोष नहीं है। यह गाय बहुत ही सीधी थी कभी किसी का खेत नहीं खाती थी पर मेरे पड़ौसी की गाय को चोरी की आदत है, उसी ने मेरी गाय को भी अपने जैसा बना लिया है। हाकिम ने पड़ोसी को भी बुलाया और पूछा के तुमने ऐसी चोर गाय क्यों रखी है जो दूसरी गायों को भी चोर बनाती है? इस प्रश्न के उत्तर में उस पड़ोसी ने विनीत भाव से कहा - भगवन्, इसमें मेरा भी दोष नहीं है। पहले मेरी गाय बहुत ही सुशील थी पर जब से नया ग्वाला उसे चराने ले जाने लगा है तब से इसमें यह चोरी की लत पड़ी है। हाकिम ने हुक्म दिया कि अच्छा उस ग्वाले को पकड़ लाओ। ग्वाला आया उस से पूछा गया कि तूने किस तरह इस गाय को चोरी करना सिखाया? ग्वाले ने उत्तर दिया कि श्रीमान् ! मेरी अधीनता में चरने वाले सब पशु कुछ दिन पूर्व तक बड़े ईमानदार थे, भूलकर भी किसी के खेत में मुंह न डालते थे पर जब से मोती धीवर की गाय मेरे झुण्ड में आई है तब से ही सब गायें बिगड़ी हैं, उसी के दुस्स्वभाव ने सारे झुण्ड को चोर बना दिया है।

हाकिम ने सोचा तब तो मोती धीवर का ही कसूर है। सिपाही आज्ञा पाते ही मोती को बाँधकर कचहरी में ले आये। हाकिम ने भौंह तिरछी करते हुए कहा - क्यों रे ! तूने गाय को चोरी करना किस प्रकार सिखाया? मोती के पाँव काँप रहे थे, उसने डरते-डरते कहा हुजूर ! मैंने चोरी करना नहीं सिखाया। कुछ दिनों तक कमजोर रस्सी से इसे बाँधता रहा उस रस्सी को यह झट तोड़ जाती थी और पास के खेतों में चर आती थी। उसी टूटी हुई कमजोर रस्सी को जोड़-जाड़ कर फिर इसे बाँधता लेकिन दूसरे दिन यह फिर तोड़ जाती। कई दिन यह क्रम चलता रहा, बस, तभी से यह पक्की चोर बन गई है।

दोष मामूली सा था इसलिये सब को डाट फटकार कर और आगे से ऐसा न करने की चेतावनी देकर किसान, गाय का मालिक, पड़ौसी, ग्वाला और मोती को छोड़ दिया गया। पर हाकिम को स्वयं सन्तोष न हुआ उसने चोरी की जड़ जानने के लिये और सारे मामले पर गम्भीरता पूर्वक विचार करने के लिये बड़े-बड़े न्याय अधिकारियों की एक सभा बुलाई। सभा में बहुत समय तक तर्क-वितर्क और विचार-विनिमय की धूम रही पीछे यही तय किया गया कि-झुण्ड की सारी गायों को चोर बना देने का दोष कमजोर रस्सी बाँधने पर है। यदि मोती मजबूत रस्सी से गाय को बाँधता तो चोरी का इतना प्रचार होने के कारण राज्य में जो अशान्ति उत्पन्न हुई है वह न होती।

लोग अपने मनकों कमजोर रस्सी से बाँधते हैं वह उसे तुड़वा कर हरियाली चरने चल देता है, कुछ दिनों में उसकी आदत मजबूत हो जाती है और पक्का चोर बन जाता है। एक चोर अपनी बुरी बात और बहुतों को सिखाता है, इस प्रकार बुराई की बेल फैलती है और संसार में अशान्ति का साम्राज्य छा जाता है। दुनिया को दुखों से बचाने का उपाय यह है कि हम लोग अपने मन को धर्म की मजबूत रस्सी से बाँधे, इधर उधर न भटकने दें।


असभ्य की सभ्यता

उस वन्य प्रदेश में जहाँ तहाँ झोपड़ियाँ बनाकर हब्शी लोग रहते थे। क्योंकि आधुनिक सभ्यता में अल्प बुद्धि वाले, जीने योग्य नहीं समझे जाते। बढ़ी हुई बुद्धि वाले लोग उनका पाशविक शोषण करते हैं और उनके स्वार्थ में वे जरा भी बाधक हुए तो चींटी की तरह कुचल दिये जाते हैं। उन दिनों स्पेन के गोरे चमड़े वाले हब्शियों के साथ बड़ी निर्दयता का बर्ताव करते थे। इसलिए बेचारे हब्शी अपने कुटुम्ब सहित जन शून्य जंगलों में रह रहे थे लेकिन यहाँ भी उन्हें त्राण न था। शिकारी लोग इधर से निकलते। काला हिरन न मिलता तो उसकी झुँझलाहट काले हब्शी पर निकालते। गोली ठण्डी करने के लिए कोई तो चाहिए।

ऐसी ही घटना उस दिन भी घटी। एक स्पेनिश शिकारी को जब उस जंगल में कोई पशु हाथ न लगा तो उधर से निकलते हुए एक दश वर्षीय हब्शी बालक पर ही निशाना साधा एक ही गोली में छोटा सा बालक भूमि पर लेट गया-जिस पाँव में गोली लगी थी उसमें से रक्त का एक फुहारा छूट निकला।

प्रतिशोध-मनुष्य का स्वभाव है। हब्शियों को पता चला तो उन्होंने बदला लेने के लिये उस शिकारी का पीछा किया। जालिम, और कुछ नहीं एक प्रकार का कायर है। दूसरों को सताने में वह वीर बनता है, पर अपने ऊपर जब आती है तो दीनता की हद कर देता है। शिकारी ने देखा कि उसका पीछा बड़ी तीव्रता से किया जा रहा है और वह जंगल में से जीता न निकल सकेगा तो वह एक हब्शी की झोपड़ी की तरफ दौड़ा। उस खेत पर एक कृष्ण काय पुरुष खड़ा हुआ था। हत्यारा उसके पैरों पर चोटने लगा-”मुझे बचा लीजिये, मेरे प्राणों की रक्षा कीजिये, आप न बचाओगे तो मेरी जान चली जायेगी।” उस असभ्य व्यक्ति ने कारण जानने की कुछ आवश्यकता न समझी और झट से एक कोठरी में छिपा दिया।

कुछ देर बाद उसकी तलाश करते हुए अन्य हब्शी उधर आये। साथ में बालक की लाश थी। कृष्ण काय असभ्य ने जाना कि मेरे घर में छिपा हुआ हत्यारा मेरे पुत्र का ही घातक है। इकलौते पुत्र के मृत शरीर पर पिता ने खून के आँसू टपका दिये। पर उसकी जुबान बन्द थी। पूछने वालों ने उस हत्यारे के ऊपर आने के सम्बन्ध में पूछा तो उसने अनभिज्ञता सूचक सिर हिला दिया। पीछा करने वाले लाश को पिता को सुपुर्द करके आगे बढ़ गये।

भगवान भास्कर इस पापी दुनिया पर से अपनी सुनहरी किरणें हटा कर चल दिये थे, रात्रि ने अपनी चादर तानना आरम्भ कर दिया था। हब्शी ने उस कोठरी में जाकर हत्यारे को निकाला और अपने घोड़े पर उसे बिठाते हुए कहा-” जा, अधर्मी हत्यारे, मेरी आँखों के आगे से चला जा। इस लाश को देख, मेरे ही इकलौते पुत्र को तूने मारा है। तेरा पाप दण्ड देने योग्य है, पर मैं शरणागत की रक्षा करना ही कर्तव्य समझता हूँ। मेरे इस तेज घोड़े पर बैठ कर रातों रात यहाँ से चला जा। ऐसा न हो कि कोई, हब्शी तुझे देखले और टुकड़े टुकड़े कर डाले। मैं बदला नहीं लेता और अपना इन्साफ परमात्मा पर छोड़ता हूँ।

घोड़े पर बैठ कर वह स्पेनिश चला गया और पुत्र की लाश को गोद में धरे हुए पिता आँसू बहाता रहा। रात के तारे टिमटिमाते हुए इधर उधर

झाँक रहे थे मानों वे असभ्य की सभ्यता और सभ्य की असभ्यता पर आश्चर्य प्रकट कर रहे हों।


Quotation

मनुष्य और पशु-पक्षी में जो चित-स्वरूप आत्मा है। वही परमात्मा है। चींटी से लेकर ब्रह्मा तक जितने प्राणी हैं उन सब की सेवा करना ही परमात्मा की सेवा है।


शिवजी कहाँ से देते हैं।

(ले.-मास्टर उमादत्त सारस्वत, कविरत्न विसवाँ)(सीतापुर)

एक थे ब्राह्मण-देवता। शिव के अनन्य-भक्त, साथ ही निर्धनता की साक्षात् मूर्ति। घर में भी सिवा उनकी स्त्री के और कोई नहीं था। जाड़ा, गर्मी वर्षा कुछ भी हो पण्डितजी प्रातःकाल चार बजे उठते, नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्वयं पुष्पं चुन लाते और फिर शंकर आराधना में निमग्न हो जाते। बेचारी स्त्री दूसरों का कूटना-पीसना करके किसी प्रकार से उदर-पोषण का प्रबन्ध कर पाती थी।

श्रावण का महीना। पण्डितजी एक सशस्त्र एक बेल पत्रों में राम-नाम लिख कर प्रतिदिन अत्यन्त भक्ति पूर्वक शिवजी पर चढ़ाते थे। शिव-संकीर्तन तथा नाना प्रकार से पूजा-पाठ करके तब कहीं सायं-काल में जाकर जल ग्रहण करते थे। इसी प्रकार से उनतीस दिन व्यतीत हो गये।

संयोग वश ठीक तीसवें दिन प्रातःकाल शंकरजी तथा पार्वती जी उधर से निकले। पण्डितजी शिव पूजन में तल्लीन थे। पार्वती जी की दृष्टि उन पर पड़ी तो उन्होंने शंकर जी से कहा-”भगवन् ! यह ब्राह्मण वर्षों से आप का भजन करता है, परन्तु निर्धन ही बना है। देखिये न, श्रावण भर इसने कैसी श्रद्धा एवं भक्ति से आप का पूजन किया है!”

“ठीक कहती हो, देवि ! महीने भर इसने जो इस प्रकार मेरी सेवा की है, उसका पारिश्रमिक इसे आज सायंकाल में दिया जायेगा।” इतना कह कर वे दोनों अन्तर्ध्यान हो गये।

संयोग तो देखिये, जिस समय भगवान् शंकर तथा पार्वती जी में यह वार्तालाप हो रहा था; ठीक उसी समय एक ‘करोड़पति’ वैश्य लोभीमल उधर से कहीं जा रहा था। उसने शंकर जी का अन्तिम वाक्य सुना तो वह बड़ा प्रसन्न हुआ (मन ही मन सोचने लगा कि ‘अरे यह तो बड़ा अच्छा सौदा हाथ लगा। शंकर जी उस ब्राह्मण को क्या कोई साधारण वस्तु थोड़े ही देंगे, सहस्रों-लाखों का धन उसके हाथ लगेगा। क्यों न इस अवसर से लाभ उठाया जाये तथा यह धन किसी प्रकार से स्वयं ही क्यों न हजम किया जाये!’

यह सोच कर यह उस ब्राह्मण से उसी दिन जाकर मिला। बोला-”महाराज ! आप अत्यन्त निर्धन हैं। अतः आपने श्रावण भर जो बेल-पत्र शंकर जी पर चढ़ाये हैं उसके बदले में आप मुझ से सौ रुपये ले लें उसका जो फल मिलेगा, वह मेरा रहा।”

ब्राह्मण ने स्त्री से यह समाचार कहा तो वह बोली “प्राणनाथ ! आप देखते ही हैं कि कैसी कठिनता से हम लोगों के दिन व्यतीत होते हैं। यद्यपि ‘पुण्य’ बेचना अनुचित है, फिर भी विवशता सब कुछ करा लेती है। सौ रुपये मिल रहे हैं, यही सही। कुछ दिन तो आराम से कट ही जाएंगे।

पण्डित जी राजी हो गये। उन्होंने सौ रुपये वैश्य से ले लिये और वैश्य खुश-खुश अपने घर चला गया।

श्रावण की पूर्णिमा। सन्ध्या का समय। लोभीमल शिवालय में विराजमान हैं। मारे प्रसन्नता के फूले नहीं समा रहे हैं शंकर जी से असंख्य धन उन्हें जो मिलने वाला था !!! बैठे-बैठे रात्रि के दस बज गये। ग्यारह का समय भी व्यतीत हो गया। अब उन्हें कुछ-कुछ सन्देह होने लगा।

“अरे क्या शंकर जी भी झूठ बोलते हैं।” एक घण्टा और व्यतीत हुआ बारह बजे, फिर एक भी बजा, परन्तु कहीं कुछ भी नहीं। अन्त में क्रोध में आकर उसने दोनों हाथ शिव-मूर्ति पर पटक दिये। बोला-”अरे, तू भी अब झूठ बोलने लगा!!” दोनों हाथ उसी मूर्ति में चिपक कर रह गये!! ज्यों-ज्यों छुड़ाता त्यों त्यों और भी मजबूती से चिपकते जाते अन्त में बेचारा हार कर बैठ रहा। हाथ छुड़ाने में उसने बड़ा परिश्रम किया था, इससे उसे तत्काल ही निद्रा आ गई। स्वप्न में देखा कि वही शंकर जी त्रिशूल लिये हुए सामने खड़े हैं। वह भयभीत होकर उनके चरणों पर गिर पड़ा। कहने लगा ‘-महाराज ! अब किसी प्रकार से मेरे हाथ इसमें से छुड़ वाइये।”

“काम तो तूने बड़ा बुरा किया है, परन्तु सबेरे यदि तू पचास हजार रुपया उस मेरे भक्त ब्राह्मण को दे दे, तो तू इस बन्धन से छूट सकता है, अन्यथा इसी प्रकार से तू कुत्ते की मौत मर जायेगा।”

प्रातःकाल वही ब्राह्मण-देवता शंकर जी की पूजा के लिये वहाँ गये तो देखा कि बेचारे लोभीमल बुरी तरह से मूर्ति से चिपके बैठे हैं। पूछा तो लोभी मल ने अपनी सारी कथा उनसे कह सुनाई। बोले-”कृपा करके आप मेरे पुत्र से कहलवा दीजिये कि वह फौरन पचास हजार रुपया लाकर मुझे दे जाये। वह रुपया शंकर जी ने आप को दिलवाया है।

इस प्रकार से पचास हजार रुपया जब उस शंकर-भक्त को मिल गया तब उस वैश्य के हाथ छूटे। ब्राह्मण ने वह धन कंगाल तथा अपाहिजों में बाँट दिया। उस दिन से उसकी भक्ति शिव जी के प्रति और भी बढ़ गई।

“भगवन् ! आपने अपने उस भक्त को कुछ दिया नहीं? पार्वती जी ने एक दिन शंकर जी से पूछा।

“क्यों? दिये तो पचास हजार रुपये।” “वह तो उस वैश्य ने दिये। आपने क्या दिया?”

इसी प्रकार से तो मैं देता ही हूँ। अन्यथा मेरे पास सिवा भाँग धतूरा तथा नन्दी बैल के और है ही क्या?

पार्वती जी मुस्कराई और चुप हो गई।


प्रेतात्माओं से साक्षात्कार

(ठा. रामकरण सिंह जी, जफरापुर)

दिन में शाम तक कोई भी समय निश्चित कर ठीक कर लो उसी समय बिस्तर पर चित्त हो जाओ सारे शरीर को ढीला कर दोनों हाथ पेडू पर रखो, चित्त एकाग्र करने की कोई आवश्यकता नहीं है, लेटते समय यह समझो कि हमारे मृत इष्ट मित्र हमारे पास बैठे हैं, इस प्रकार शक्ति विकास का प्रयत्न करने पर कई-कई बड़े-बड़े गोल प्रकाश के धब्बे दिखाई देते हैं, कोई दृश्य भी दीखता है, अभ्यासी को पहले पहल नींद सी आने लगती है, कभी-कभी स्वर्गस्थ मित्र नींद लाते हैं, जिससे उन्हें अपना कार्य करने में आसानी होती है, ऐसी नींद में या ऐसी नींद से जागने के बाद यदि आप को कोई दृश्य दिखाई दे तो उसे स्वप्न न कहो या कोई विशेष दृश्य भी दीखे तो उसे भ्रम न कहो जो कुछ दीखे वह सब नोट करके रखते जाओ और अपने स्वर्गस्थ मित्र का उपकार मानते जाओ। यह अभ्यास का समय बिल्कुल फुर्सत का होना चाहिये। जिससे अभ्यासी को अभ्यास कराने में कोई बाधा नहीं आवे। सोने का यदि कोई अलग कमरा हो तो वह सबसे अच्छा होगा एक बार एक दुःखिनी माता अपनी बच्ची का संदेश पाने के लिये एक महापुरुष के पास गई तब उसे जो संदेश मिलना था वह तो मिला ही साथ ही साथ योगी ने उसे ऊपर लिखे प्रकार से अभ्यास करने को कहा वह स्त्री उक्त विधि से अभ्यास करने लगी दो तीन बार अभ्यास करने के बाद ही उस कमरे की दीवार पर कुछ आवाज आने लगी बाद में धुन्ध सा दीखने लगा चन्द हफ्तों के बाद उसको लड़की की तरह की आवाज ‘माँ’ इस प्रकार पुकारती हुई सुनाई दी और मालूम हुआ कि किसी ने गले में हाथ डाला है। अब यह स्त्री अभ्यास से अपनी लड़की से वार्तालाप करने लगी है, किन्तु यह लड़की प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देती, अदृश्य आवाज़ से बोलती है। उपर्युक्त क्रिया ज्यादा से ज्यादा हफ्ते में तीन बार और प्रति बार एक घंटा भर करनी चाहिये। कभी-कभी आपके पार्थिव शरीर में से सूक्ष्म शरीर निकल कर बाहर के दृश्यों को देखता है।


बुरे दिनों का आगमन

(ऋषि तिरुबल्लुर)

उसके भाग्य में निस्संदेह दुःख लिखा है, जो अपने मन को शुभ कार्यों में नहीं लगाना चाहता। कहते हैं कि होनी बड़ी प्रबल है, यदि ऐसा न होता तो यह जानते हुए भी कि बुरे कर्मों का बुरा फल होता हैं, लोग क्यों पाप कर्मों में प्रवृत्त होते? जब किसी के बुरे दिन आते हैं, तो वह भलाई करना छोड़ देता है और बुराई को समेटता फिरता है। यद्यपि उसने हजारों बार यह देखा और सुना होता हैं कि बुराई से बढ़ कर और कोई विपत्ति नहीं है, तो भी वह उसे ही अपनाता है। भवितव्यता इसे ही तो कहते है।

जिसके बुरे दिन आते हैं, जिस पर दुर्भाग्य का प्रकोप होता है, वह आलसी बनता है और अप्रसन्न एवं उदास रहने लगता है। बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग से हटा कर प्रमाद की ओर झुकाता है। ऐसा करते करते वह अपन सर्वस्व खोकर दुःखों के कीचड़ में फँस जाता है। जिस पर भाग्य लक्ष्मी प्रसन्न होती है, उसे उत्साह प्रदान करती है, वह अपने कार्य में तन्मयता के साथ जुटने लगता है। उसकी बुद्धि कुमार्ग को छोड़कर सुमार्ग को ग्रहण करती है।

इसे हम भाग्य ही, भवितव्यता ही कहेंगे, जब कि इस बात को खूब अच्छी तरह जानते हुए भी कि बुरे कर्म का फल बुरा और अच्छे का अच्छा होता, नेकी के कार्यों को छोड़कर बदी करना स्वीकार करते हैं।


कर्तव्य कर्म

(श्री स्वामी विवेकानन्दजी महाराज)

केवल कर्तव्य समझ कर कर्म करने वाले बहुत थोड़े हैं। श्रेष्ठ पुरुष कीर्ति, धन अथवा अन्य कोई भी स्वार्थ मन में न रख कर सिर्फ इसीलिए कर्म करते हैं कि दूसरे का भला हो। किसी का भी भला उन्होंने देखा कि उन्हें आनन्द होता है। कीर्ति के हेतु जो कर्म किया जाता है, उसका फल प्रायः देर में मिलता है। कई बार देखा जाता है कि लोग जब जन्म भर कीर्ति के लिए प्रयत्न करते हैं, तब अन्त काल में कहीं जाकर यश मिलता है। यदि मनुष्य कोई भी उद्देश्य मन में न रखकर कर्म करेगा, तो क्या उसे उसके कर्मों का कोई भी फल न मिले? मिलेगा अवश्य मिलेगा। सब से उच्च श्रेणी का फल उसे मिलेगा। परन्तु साधारण मनुष्यों में इतना धैर्य नहीं होता कि वे उसके फल फूल होने तक रास्ता देखते रहे। शारीरिक स्वास्थ्य पर भी ऐसे कर्मों का बहुत उत्तम प्रभाव होता है।

प्रेम, सत्य और निस्वार्थ बुद्धि इन तीनों गुणों में हमारी चैतन्यता को पूर्णतया जागृत करने की सामर्थ्य है। स्वार्थ बुद्धि से प्रेरित होकर कर्म करने में हमारी जो सामर्थ्य खर्च होती है, वह किसी उपाय से फिर हमें लौट कर नहीं मिलती, किन्तु स्वार्थ बुद्धि छोड़ देने पर-मन पर अधिकार रखने में जो शक्ति खर्च होती है, वह कई गुनी अधिक होकर हमारे पास लौट आती है। इस प्रकार जिसका मन वश में हो जाता है, उसकी इच्छा शक्ति अत्यन्त दृढ़ हो जाती है और वही आगे चल कर ईसा मसीह, मुहम्मद और बुद्ध की पदवी तक पहुँच जाती है।


मृत्यु के बाद जीवन

कुछ समय पूर्व आस्ट्रेलिया के पोर्ट जैकसन नगर में केन्द्रीय जेलखाना था। उसी कारागार में देश के अधिकाँश कैदी बंद रखे जाते थे। उन दिनों एक ऐसा कानून था कि जो कैदी जेल में सच्चरित्रता पूर्वक जीवन यापन करें उन्हें जेल से बाहर स्वतंत्र नौकरी करने की सुविधा रहेगी। बहुत से कैदी जिन्होंने जेल अधिकारियों को अपने व्यवहार से संतुष्ट कर लिया था, जेल से बाहर नौकरी करके अपना जीवन सुविधापूर्वक व्यतीत करते थे।

जेम्स नामक एक कैदी को भी यह सुविधा मिली थी। उसने उसी नगर के निवासी फिशर नामक जमींदार के यहाँ नौकरी कर ली। कैदी बोलचाल और व्यवहार में ऐसा निपुण था कि वह बहुत जल्द अपने मालिक का विश्वास-भाजक और प्रिय बन गया। फिशर उसी से अपना सारा कारोबार कराते, यहाँ तक कि रुपये का लेन देन भी उसी के हाथों होता।

कुछ दिन बाद फिशर का बाहर आना जाना बिलकुल बन्द हो गया। जेम्स ही सारा कारोबार करता। कोई उससे पूछता कि फिशर कहाँ है तो वह कह देता कि-परदेश जाने की तैयारी कर रहे हैं। थोड़े दिनों बाद उसने यह घोषित कर दिया कि फिशर जहाज द्वारा इंग्लैंड चले गये। फिशर के एक घनिष्ठ मित्र जान्सन ने जब यह समाचार सुना तो उसे बड़ा दुख हुआ। जान्सन पास के गाँव में ही रहता था और फिशर का इतना घनिष्ठ था कि वे उसके बिना पूरा साधारण से काम को भी न करते थे। फिर वे उसे सूचना तक दिये बिना इंग्लैंड चले गये यह बात जान्सन के कलेजे में काँटे की तरह चुभी। वह पहिले तो बहुत बड़बड़ाता रहा, पर आखिर उसने सोचा कि-ऐसा हो नहीं सकता। फिशर मुझ से सलाह लिये बिना विदेश नहीं जा सकते। वे किसी कारण कहीं छिपकर कुछ काम कर रहे होंगे। अवश्य ही वे आस्ट्रेलिया में मौजूद होंगे।

कई महीने बीत गये पर फिशर के बारे में कुछ समाचार विदित न हुआ। जान्सन, हाट के दिन उधर से ही आया जाया करते थे। एक दिन संध्या समय वे हाट से लौट रहे थे, अचानक उसने देखा कि फिशर अपने घर के पास तालाब के किनारे खड़े हुए हैं। उनका मुख मलीन हो रहा है और किसी गंभीर व्यथा के साथ तालाब की ओर उंगली का इशारा कर रहे हैं।

जान्सन को इससे कुछ भी अचम्भा नहीं हुआ क्योंकि वह जानता था कि फिशर कहीं बाहर हरगिज नहीं गये हैं। वह जल्दी-जल्दी मित्र के पास पहुँचने के लिये कदम बढ़ाने लगा ताकि उनके अज्ञातवास का सविस्तार कारण पूछे। लेकिन जैसे ही जान्सन वहाँ पहुँचा वह मूर्ति अदृश्य, जेम्स के पास जाकर पूछताछ की पर फिशर के संबंध में कुछ भी पता न चला। जान्सन बड़े असमंजस के साथ घर लौटा और अपनी पत्नी से सारा हाल कह दिया। वह समझता था कि मैंने प्रेतात्मा देखी है और शायद फिशर मर चुका हैं पर उसकी पत्नी ने उसे झिड़क दिया और कहा अँधेरे में कुछ भ्रम हुआ होगा। व्यर्थ के संदेह को मन में से दूर करो और चुपचाप चारपाई पर सो जाओ।

दूसरे हफ्ते हाट का दिन फिर आया। जान्सन फिर गया और उस दिन वह दिन छिपने से कुछ पूर्व ही लौट पड़ा। आज भी उसने देखा कि बिलकुल पहले दिन की भाँति फिशर उसी मुद्रा में खड़े हुए हैं। दो तीन बार उसने आँखें मल मलकर अपना भ्रम निवारण करना चाहा पर यह तो उसके चिर सखा फिशर ही खड़े थे। वेदना पूर्ण विषाद के साथ तालाब की ओर उनकी उंगली इशारा कर रही थी। जान्सन भय और आशंका से काँप उठा, उसका कलेजा धक-धक करने लगा। इतने में ही वह मूर्ति फिर अदृश्य हो गई।

घर पहुँच कर वह तमाम रात इसी घटना के सम्बन्ध में सोचता रहा। अब उसका विश्वास दृढ़ हो गया था फिशर का मृत शरीर इसी तालाब में गढ़ा होगा। प्रातःकाल होते ही जान्सन पुलिस के दफ्तर में पहुँचा और उसने सारी घटना कह सुनाई। पहले तो सब लोग उसकी बात को भ्रम समझ कर हँसी में टालने लगे, पर जब उसने बहुत आग्रह किया, तो पुलिस साथ चलने को तैयार हो गई। ढूँढ़ खोज की गई, तो कीचड़ में गढ़ी हुई फिशर की सड़ी गली लाश मिल गई। सन्देह में जेम्स गिरफ्तार कर लिया गया।

इस महत्वपूर्ण मुकदमे का जजों को फैसला करना था। जेम्स अपने को निर्दोष कहता था और उसके विरुद्ध कोई प्रामाणिक गवाही ऐसी न थी, जिससे उसे अपराधी सिद्ध किया जा सके। निदान जूरी ने एक युक्ति सोची, उन्होंने झूठ मूँठ यह फैसला सुना दिया कि जेम्स अपराधी है, उसे फाँसी दी जायगी। सजा सुनने के बाद जेम्स ने एक लम्बी साँस ली और कहा-”अब छिपाने से क्या लाभ। हाँ, मैंने ही धन के लोभ से अपने स्वामी की हत्या करके लाश को तालाब में गाढ़ दिया था।” इस स्वीकारोक्ति के आधार पर अदालत को उसके दोषी होने का विश्वास हो गया और उसे प्राणदण्ड का सच्चा हुक्म सुनाया गया।

उपरोक्त घटना माननीय जजों ने मुकदमें के फैसले में लिखी है और उसे भ्रम नहीं, वरन् यथार्थता के रूप में स्वीकार किया है। मानचेस्टर में ‘टू वर्ल्डस’ नामक पत्र में योगिनी एमा हार्डिंग ने इस विवरण को प्रकाशित कराया था। वह घटना बताती है कि मरने के बाद भी मनुष्य जीवित रहता है और अपने भूतपूर्व जीवन के बहुत प्रसंगों के साथ घना सम्बन्ध रखता है।


दूसरों की नाराज़गी।

(पी. जगन्नाथराव नायडू नागपुर)

यदि हमसे कोई नाराज़ होता है, तो उसका उत्तर वैसी ही नाराज़गी में न देना चाहिए, वरन् गम्भीरता-पूर्वक विचार करना चाहिए कि इसका वास्तविक कारण क्या है। बहुत करके हमें अपने दोष दिखाई नहीं पड़ते और दूसरों पर दोषारोपण आसानी से कर देते हैं। एकान्त में न्यायबुद्धि से आत्म-चिन्तन करने पर यह मालूम हो सकता है कि इस नाराज़गी में हमारा कितना दोष है। अपनी त्रुटियों को सुधारना हर मनुष्य का धर्म है। हमारी भूल से यदि दूसरों को दुख पहुँचता हो, तो अपना सुधार करना चाहिए और नाराज़ होने वाले से निःसंकोच क्षमा माँग लेनी चाहिए।

किन्तु कई बार इसके विपरीत परिस्थितियाँ भी सामने आती हैं। दूसरे लोग अपनी भूलों का दण्ड हमें देना चाहते हैं। अपनी अनुचित इच्छाओं की पूर्ति के लिए हमारी आत्मा का हनन करना चाहते हैं। ऐसे अवसरों पर गिड़गिड़ाने या परास्त हो जाने से काम न चलेगा। सत्य मार्ग पर पर्वत की तरह दृढ़ता के साथ खड़े होकर अपने कर्तव्य का पालन करना ही योग्य है। बालकों की इच्छानुसार अध्यापक नहीं चलता और न अपराधियों की इच्छानुकूल शासक अपना धर्म छोड़ देता है। कर्तव्यनिष्ठ मनुष्य भूले भटके और भ्रमवश दोषारोपण करने वालों की रत्ती भर भी परवाह नहीं करता, वरन् उन्हें सुधारने के लिए कड़ुवे कार्यों को भी करता है, फिर भले ही उसे इसके लिए विरोध, उपहास या कष्टों का सामना करना पड़े।


लुँग-गोम-पा, सिद्धयोगी

प्रसिद्ध फ्रेंच परिव्राजक देवी श्रीमती अलेक्जेएंड्रा डैविड नील ने सिद्ध योगियों की बहुत खोज की है। वे ब्रसेल्स विश्वविद्यालय की प्रोफेसरी छोड़कर बौद्ध धर्म में दीक्षित हुईं और 12 वर्ष तक तिब्बत में रहकर लामा योगियों के साथ रहकर आध्यात्म विद्या का अभ्यास किया। उन्होंने अपनी पुस्तक में लामा योगियों की असाधारण सिद्धियों का वर्णन करते हुए एक घटना का इस प्रकार उल्लेख किया है -

“उत्तरी तिब्बत के छंग था पठार में मेरी एक लुँग गोम पा योगी से भेंट हुई। मैं अपने पुत्र और सेवकों के साथ उस पठार को पार कर रही थी। इतने में मुझे एक छोटी काली चीज़ बहुत दूर से अपनी ओर दौड़ती हुई दिखाई दी। दुरबीन लगाकर देखा तो एक मनुष्य आकृति दिखाई दी। इस सघन वन में यात्री का दिखाई देना एक आश्चर्य की बात थी। सोचा, शायद कोई यात्री भटककर इधर आ निकला होगा, चलो इसे भी साथ ले चलें। शंका निवारण के लिये मैंने अपनी दुरबीन सेवक को दी और ध्यानपूर्वक देखने का आदेश किया। वह बोला-’लामा लुँग-गोम छीग पा” अर्थात् यह तो लामा सिद्ध योगी के समान दिखाई देता है। मैंने ऐसे सिद्धों की करामातों के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। किन्तु आँखों से देखने के थोड़े ही अवसर मिले थे। मैं द्रुतवेग से अपनी ओर आते हुए उस योगी को ध्यानपूर्वक देखने लगी और सोचने लगी कि जब यह पास आवेंगे तो उन से कुछ बातें करूंगी और फोटो खीचूँगी।

सेवक ने मेरी उत्सुकता को पहचान लिया और कहा-’देवीजी, आप इस योगी को भूलकर भी न छेड़ना, ऐसा करने से प्राणों पर संकट आ सकता हैं।” मैंने उसकी बात मान ली और जरा हटकर खड़ी हो गई। जब वह हमारे पास से गुजरा तो मैंने देखा कि उस सिद्धयोगी की आंखें अधखुली थीं और आकाश में किसी ऊँचे पदार्थ को स्थिर दृष्टि से देखता था। वह रेलगाड़ी की तेजी से दौड़ रहा था। ऐसा प्रतीत होता था मानो उसका शरीर एक गेंद है, जो बार-बार जमीन में लगती और जोर से उछलती हुई आगे चली जा रही है। वह धुनी हुई रुई की तरह हलका लगता था। बाँए हाथ में वस्त्र और दाहिने हाथ में ‘फेर्वा (अभिमंत्रित छुरी) लिए हुए था यह छुरी उसे छड़ी की तरह जमीन छूने पर सहारा देती जाती थी। कुछ ही क्षणों में वह इतनी दूर निकल गया कि फिर मैं उसे दुरबीन की सहायता से भी न देख सकी।

आगे थेबगिपाई क्षेत्र पर जाकर अपने साथियों से मैंने उस दृश्य का वर्णन किया तो उन्होंने बताया कि लुँग-गोम-पा’ सिद्धयोगी रुई की तरह हलके बन जाने और हवा की तरह दौड़ने में पूर्ण दक्ष होते हैं। उन्हें और भी अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।


Quotation

दुष्ट मनुष्यों के मन ऐसे हैं जैसे कुत्ते की पूँछ उसे बार बार सीधा कीजिये, फिर भी टेढ़े होने की आदत न छूटेगी।

पुल के नीचे एक और से पानी आता है दूसरी ओर चला जाता है वह उसमें से एक चुल्लू भी

अपने पास नहीं रखता। स्वार्थी पुरुष सदुपदेशों को इस कान से सुनते हैं और उस कान से निकाल देते हैं।

जब जोर की आँधी चलती है तो वायु के वेग से हिलते हुए पेड़ पहचाने नहीं जाते कि यह पीपल है या गूलर। जब मनुष्य के हृदय में ज्ञान का तूफान होता है तो उसके प्राण मात्र एक ही जाति के दिखाई पड़ते हैं, ऊँच-नीच का भेद उसे दृष्टिगोचर नहीं होता।


प्रभु-प्रेम

(सन्त कबीर)

हिरदे भीतर लौ जले, धुवाँ प्रकट नहिं होय। जाकी लागी सो लखे, कै जिहि लागी सोय॥

मारया है ते मरि गया, बिन शिर थौथा भाल।

पड़ा पुकारै वृक्ष तर, आज मारै के काल॥

नदियाँ जलि कोयला भई समंदर लागी आग।

मछली रुखाँ चढ़ि गई, देखि कबीरा जाग॥

पिंजर प्रेम प्रकासिया जागा जोग अनंत।

संसय छूटा सुख भया, मिला पियारा कंत॥

पिंजर प्रेम प्रकासिया, अंतर भया उजास।

मुख कस्तूरी महँकसी, वाणी फूटी बास॥

पानी ही ते हिमि भया, हिमि है गया बिलाय।

जो कुछ था सोई भया, अब कछु कहा न जाय॥

अंक भरे भरि भेटिया, मन में नाहीं धीर।

कहै कबीर ते क्यूँ मिलै, जब लोग दोय शरीर॥

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं।

सब अंधियारा मिट गया, जब दीपक देखा माँहि॥

मान सरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं।

मुक्ताहल मुकता चुगैं, अब उड़ि अनत न जाहिं॥ ममता मेरा क्या करे प्रेम उघाड़ी पौलि।

दरशन भया दयाल का सूलि भई सुख सौड़॥

नैनों अंतर आब तू पलक बन्द कर लेहूँ।

न हौं देखों और को, ना तोहि देखन देहुँ॥

मेरा मुझको कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर।

तेरा तुझको सोंपते, क्या लागत है मोर॥

कबीर सीप समुद्र की, रटे पियास-पियास।

समुद्रहि तिनका सम गिनै स्वाँति बूँद की आस॥

तो तो करै तो बाहुरों, दुर दुर करे तो जाऊँ।

ज्यों हरि राखें त्यों रहो, जो देवैं सो खाऊँ॥

उस समरथ का दास हों, कभी न होय अकाज। पतिव्रता नंगी रहे, तो पति को हो लाज॥


रामकृष्ण परमंहस के उपदेश

लुहार अपनी धोंकनी को निरंतर इसलिये धोंकता रहता है कि उसकी भट्टी की आग ठीक प्रकार जलती रहे। बुद्धिमान मनुष्य सत्पुरुषों के सत्संग इसलिए करता है कि उसका विवेक सदैव दीप्तिमान रहे।

गिर्द्ध ऊँचे आकाश की स्वच्छ वायु में उड़ता हैं, परन्तु उसकी आंखें सड़े हुए मृत माँस को ढूँढ़ती रहती हैं। पाखंडी मनुष्य बातें तो आत्मज्ञान की बहुत करते हैं, पर मन उनका स्वार्थ साधन में लगा रहता है।

तोता वैसे तो ‘सीता रात-सीता राम’ रटता रहता है पर जब बिल्ली उसे पकड़ लेती है, तो सीता राम भूल कर ‘टें टें’ करने लगता है। बकवादी मनुष्य रोज-रोज बहुत ज्ञान विज्ञान की बातें करते हैं, पर जब परीक्षा का समय आता है, तो अपनी बुरी आदतों को ही प्रकट करते हैं।

काजल की कोठरी में कितनी ही सावधानी के साथ रहिए, पर कहीं न कहीं दाग लग ही जायेगा। इसी प्रकार दुष्ट स्वभाव के मनुष्यों के साथ रहने से मन में कुछ न कुछ दुर्भाव पैदा हो ही जाते हैं।

दर्पण के ऊपर मिट्टी चिपकी हो तो उसके ऊपर सूर्य की किरणें न चमकेंगी, जिसका हृदय कलुषित है, उसे ईश्वरीय सत्ता का आभास न मिलेगा।

लोहे की कील मिट्टी में तो आसानी से गड़ जाती है, पर पत्थर में नहीं गड़ती। सदुपदेश सज्जनों पर तो प्रभाव करते हैं, पर दुष्टों पर उनका असर नहीं होता।

लोहा जब तक गरम रहता है, तब तक लाल रहता है और जब ठंडा पड़ जाता है, तो उसका रंग काला हो जाता है। सत्पुरुषों के सत्संग से मनुष्य उज्ज्वल रहते हैं, परन्तु अकेले पड़ जाने पर मलीनता आ जाती है।


खुद भी मदद कीजिए।

अमेरिका में एक बार एक बड़ा युद्ध हो रहा था, सेना कहीं बाहर जा रही थी। रास्ते में एक बड़ा शहतीर इस प्रकार पड़ा हुआ मिला कि उससे निकलने में बड़ी रुकावट होती थी, इसलिये इस बात की जरूरत हुई कि इस शहतीर को रास्ते में से हटा कर एक तरफ डाल दिया जाये।

सेना के अधिनायक ने सिपाहियों को हुक्म दिया कि इसे उठाओ और एक तरफ फेंक दो। सिपाही आज्ञा का पालन करने लगे, परन्तु शहतीर बहुत भारी था इसलिये वह उठ नहीं रहा था। अधिनायक दूर खड़ा चिल्ला रहा था- नालायकों, इसे उठाओ ! हरामखोरी मत करो, मुर्दे की तरह हाथ मत चलाओ।

इस प्रकार के कटु शब्दों के प्रयोग से सिपाहियों में कोई नवीन उत्साह नहीं आ रहा था और शहतीर की समस्या हल नहीं हो रही थी। इतने में एक मामूली से आदमी ने अधिनायक के पास आकर विनम्र शब्दों में कहा-यदि आप स्वयं भी इन सिपाहियों के साथ जुट जावें तो यह काम आसानी से हो सकता है। अधिनायक ने झुँझला कर कहा ‘तू देखता नहीं, मैं कमाण्डर हूँ। मेरा काम हुक्म देना है, कुली का काम करना नहीं।’ उस व्यक्ति ने अपनी गलती पर क्षमा माँगी और खुद सिपाहियों के साथ जुट गया और उन्हें उत्साह दिला कर तथा उठाने की युक्तियाँ काम में लाकर उस शहतीर को उठा कर अलग पटकवा दिया। जो कार्य बहुत समय से नहीं हो रहा था, वह जरा सी देर में हो गया।

उस मामूली पोशाक वाले आदमी ने फिर जाकर अधिनायक के सम्मुख अभिवादन किया और कहा-यदि कभी फिर ऐसी कठिनाई आया करे तो आप मुझे बुला भेजा करें, मैं स्वयं मदद करके कठिन कामों को आसान कर दिया करूंगा। कमाण्डर ने उपेक्षा से मौंहे चढ़ाते हुए कहा-’तेरा क्या नाम है और कहाँ रहता है?’ उस आदमी ने नम्रता से कहा-महोदय ! मुझे जार्ज वाशिंगटन कहते हैं और इस देश के राष्ट्रपति के पते पर सूचना देने से वह मुझे मिल सकती है।

अमेरिका के प्रेसीडेण्ट जाँर्ज वाशिंगटन को अपने सामने खड़ा देखकर कमाण्डर के होश गुम हो गये, पैरों तले से जमीन खिसकने लगी। उसने गिड़गिड़ा कर अपने अपराध के लिये क्षमा माँगी और भविष्य में खुद भी सिपाहियों के कामों में मदद देने की प्रतिज्ञा की।

हम अपने कामों को दूसरों पर टालते हैं और जब वे पूरा नहीं कर पाते तो झुँझलाते हैं। क्या ही अच्छा हो यदि अपने साथियों के काम में थोड़ी सहायता की जाये और उन्हें सरलता का मार्ग बताया जाये। इस प्रकार कठिन कार्य आसानी से हल हो सकते हैं।


क्या आप अकेले हैं?

बहुत से मनुष्य ऐसी शिकायत करते सुने जाते हैं, हम अकेले हैं, हमसे कोई प्रेम नहीं करता, पैसा न होने की वजह से संसार में कोई हमारा नहीं है। उन्हें समझना चाहिये कि दूसरों के साथ अच्छे संबंध होने का कारण पैसा नहीं वरन् निष्कपट प्रेम है। आप अपने को पवित्र बनाइये, दूसरों से निस्वार्थ प्रेम रखिए, उनकी भलाई में प्रवृत्त रहिए फिर देखिए, कि कितने साथी हो जाते हैं और वे आप पर प्राण तक देने को तैयार रहते हैं। उदासीन और शत्रुओं से वह घिरा रहेगा, जो स्वार्थी है। चूँकि स्वार्थ स्वयं मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, लालची आदमी का स्वार्थ विभिन्न रूप धारण करके उसके सामने नाचता रहता है पीला चश्मा पहनने वाले को जैसे सब चीजें पीली दीखती हैं, वैसे ही स्वार्थी मनुष्य को सब लोग शत्रु या उदासीन दीखते हैं। उदारता, सहानुभूति और निस्वार्थता ऐसे बढ़िया रक्षक हैं, जैसे जल में नाव। गहरे जल के ऊपर भी नाव में बैठ कर हम सुखपूर्वक सैर करते रह सकते हैं, फिर क्या निस्वार्थ हृदय होने पर दुर्जनों का भी प्रेम प्राप्त कर लेना सम्भव नहीं है?


युग परिवर्तन का समय

(पं. श्याम बिहारी लाल जी रस्तोगी. बिहार शरीफ )

युग परिवर्तन के प्रश्न पर हरिवंश पुराण के भविष्य के अध्याय 4 में 12 से 19 तक के श्लोकों में कुछ प्रकाश डाला गया है। पाठकों के लाभार्थ उसका कुछ परिचय नीचे दिया जाता है-

मूर्खा स्वार्थापरालुब्धा क्षुद्राःक्षुद्र परिच्छदा।

व्यवहारोपकृत्त श्रच्युता धच्चि शाष्वतात्।

हर्वारः पर रत्रानाँ पर दारा पहारकाः।

कामात्मानों दुरात्मानः सोपधाः प्रिय साहसाः।

लोग मूर्ख, स्वार्थ परायण, लोभी, तुच्छ, नीच कामना वाले, दुर्व्यवहार करने वाले, शाश्वत धर्म से पतित, पराये धन को चुराने वाले, पराई स्त्रियों में रत, कामी, दुरात्मा, ठग, भयंकर कर्म करने वाले हो जावेंगे।

विप्र रुपाण रक्षाँसि राजान् कर्ण भेदिनः।

पृथ्वीमुप भोक्ष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते॥

निःस्वाध्यायावव षट्काम अर्नयाश्चयभि मानिनः

विप्राः कृव्याद रुपेण सर्व भक्षा वृथा ब्रताः।

दुष्ट, राक्षस लोग ब्राह्मण रुप बनाकर फिरेंगे। राजा कानों पर विश्वास करने वाले होंगे, ब्राह्मण लोग स्वाध्याय और धर्म कर्मों को छोड़कर अनीति एवं अभिपान का आश्रय लेंगे। चील कौओं की तरह अभक्ष होने को होगा तो ऐसी बातें होने लगेंगी।

महायुद्धं महानादं, महावर्ष, महभयम्।

भविष्यति युगे क्षीणे तत्कषायस्य लक्षणम्॥

महायुद्ध होगे, तोप बम जैसे आग्नेय अस्त्रों की भयंकर गड़गड़ाहट होगी, अतिवृष्टि अथवा अनावृष्टि होगी, साम्प्रदायिक दंगे, लूट मार अग्निकाण्ड आदि के द्वारा बड़े भय उत्पन्न होंगे। इस प्रकार के दृश्य युगांतर के समय उपस्थित होंगे।

यह बात आज प्रत्यक्ष दिखाई दे रही है, इस से प्रतीत होता है कि अब युग परिवर्तन का समय आ गया।


पतन का मार्ग

किसी ढालू पहाड़ के ऊपर से एक पत्थर को नीचे गिराइए। वह पहिले धीरे-धीरे लुढ़केगा और फिर आकर्षण शक्ति की तीव्रता के कारण हर क्षण दूने-चौगुने वेग से गिरने लगेगा। जैसे पहले सैकिंड में सोलह फीट गिरा था, दूसरे सैकिंड में अड़तालीस फीट तीसरे में अस्सी फीट पाँचवें में 144 और दसवें में यह वेग तीन सौ चार फीट प्रति सैकिंड के हिसाब से हो जायेगा और आगे जितनी देर लगेगी, उतनी ही तेजी बढ़ती जायेगी।

ठीक यही नियम हमारे स्वभाव पर लागू होता है। जब हम पतन के पथ पर कदम बढ़ाते हैं, तो पहले धीरे-धीरे खिसकते हैं, थोड़ी बुराई कर लेने से कुछ हर्ज नहीं। इसे कोई न जान सकेगा और न हमारी कोई बड़ी हानि होगी। “किन्तु असल में ऐसा सोचना मूर्खता है। पतन के मार्ग में ऐसी आकर्षण शक्ति है कि वह वेग को दिन दूना, रात चौगुना करती जाती है। एक छोटा-सा कुविचार बढ़ते-बढ़ते हमारे जीवन को पतन के गहरे गर्त में डाल सकता है।

इसलिए सावधान रहिए। पतन के पथ पर एक कदम भी आगे मत बढ़िये वरना पीछे संभलना कठिन हो जायेगा। तीर को छूटने से पहले ही रोक लीजिए, वरना पीछे पछताना ही हाथ लगेगा। यदि आज छोटा-सा कुविचार मन में उठे, तो उसे आज ही, इसी क्षण ही, कुचल दीजिए।


सदाचार का सोपान

(श्री गोपी किशनजी बियानी, अक्याव (ब्रह्मा))

स्वतृः शील सम्पन्नः प्रसन्नात्मात्मविद् बुधः।

प्राप्येह लोके सन्मानं सुगति प्रेत्य गच्छति॥

व्यक्ति हो चाहे कुटुम्ब हो, समाज हो चाहे राष्ट्र हो इन सबका कल्याण और सुख प्रायः उनके सदाचार पर अवलम्बित रहता है। सदाचार ही कल्याण और सुख का घर है। व्यक्ति, कुटुम्ब, समाज अथवा राष्ट्र के सदाचार का जब ह्मस होने लगता है, तब उनके नाश का आरम्भ हो जाता है।

सदाचार के अमृत रूपी वृक्ष का बीज बालपन मैं ही मनुष्य के हृदय में बोया जाता है और दुराचार के विष वृक्ष का बीज भी बालपन में ही बोया जाता है, इसलिये कुटुम्ब के प्रौढ़ मनुष्यों को अवश्य ही इस विषय में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

साँसारिक कर्तव्यों और व्यवहारों को सुचारु रूप से सम्पादित करने से मनुष्य की हार्दिक वृत्तियों का विकास होता जाता है।

निर्दोष और स्थिर अन्तःकरण में सद्बुद्धि की उपज होती है, सद्बुद्धि से कर्तव्य-निष्ठा बढ़ती जाती है। जब कर्तव्य-निष्ठा बढ़ने लगती है तब मनुष्य के द्वारा सत्कार्य होने लगते हैं। सत्कार्यों से हृदय पर उत्तम संस्कार पड़ते हैं, जिससे सदाचार की वृद्धि होती है, यदि आप सदाचार की उन्नति चाहते हो, तो सद्बुद्धि रूपी स्वच्छ और निर्मल बहके रहना चाहिए। हृदय खूब शुद्ध और पवित्र रहना चाहिए। हृदय में दोषों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेना अत्यन्त आवश्यक है और इसके लिये प्रत्येक मनुष्य को आत्म-निरीक्षण करके अपने दोषों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेना सदाचार सोपान का महत्वपूर्ण अंश है।

धर्म, ईश्वर और सत्पुरुष के विषय में पूज्य श्रद्धा उत्पन्न होने से हृदय की सद्वृत्तियां प्रबल होती हैं और मनुष्य के सदाचार की उन्नति होती है।

साराँश यह है कि शिक्षा, आर्थिक दशा, शासन पूवर्जनों का तिरस्कार और सज्जनों का पुरस्कार इत्यादि सामाजिक निबंधों का यदि उचित रूप से पालन किया जाये तो लोगों के सदाचार में अवश्य वृद्धि होती है।


सुखी दांपत्ति जीवन

वैवाहिक जीवन को सुखी बनाने के लिए बौद्ध धर्म में पुरुषों और स्त्रियों के लिए ये पाँच 2 नियम बताये गये हैं-

पुरुषों के लिए।

1-अपनी पत्नी का हृदय से सम्मान करो।

2-पत्नी के व्यक्तिगत मनोभावों के कारण क्रोधित मत हों।

3-अपनी पत्नी के सिवा किसी दूसरी स्त्री से प्रेम न करो।

4-पत्नी के भोजन, वस्त्र की सदा फिक्र रखो।

5- पत्नी को समय-समय पर उपहार लाकर दो।

स्त्रियों के लिये।

1-पति के घर में आने पर उठ कर उनका स्वागत करो।

2-इसी प्रकार उनके घर से बाहर जाने पर अभिनन्दन करो। पति के लौटने तक उनके लिये भोजन तैयार करके रखो तथा घर के दूसरे काम भी समाप्त कर लो।

3-किसी अन्य पुरुष से प्रेम न करो। पति क्रोध में हो तो तुम शान्त हो जाओ।

4-पति की आज्ञाओं का पालन करो और घर की कोई बात उससे मत छिपाओ।

5-पति जब आराम करता हो तो बिना बुलाये उनके पास मत जाओ।


सतयुग अभी दूर है।

(श्री अग्रसोची)

मनुष्य जाति को भविष्य जानने की बड़ी उत्सुकता रहती है। हर कोई जानना चाहता है कि भविष्य में क्या होगा। जड़ प्रकृति एक ही नियम पर निर्धारित है और वह अपने प्रेरक की इच्छानुसार घूमती रहती है। इसलिये ज्योतिष शास्त्र ग्रहण, वर्षा नक्षत्रों का उदय अस्त होना, भूकम्प अकाल आदि का तो निर्णय कर लेता है, परन्तु चैतन्य मनुष्यों के समाज के बारे में कोई निश्चित भविष्यवाणी करना असम्भव है। क्योंकि जीव चैतन्य और स्वतन्त्र है उसे अपना भविष्य बनाने की पूरी पूरी आजादी प्राप्त है। लोग चाहें तो आये हुए सतयुग को शताब्दियों के लिये दूर हटा सकते हैं।

फिर भी हम भविष्य के बारे में सोचते हैं और उस कल्पना में अधिकाँश बातें ठीक भी होती हैं। आज के विचार और कार्यों के आधार पर कल की बात बता देना कोई बहुत मुश्किल नहीं है। जो विद्यार्थी मन लगाकर पढ़ता है उसके लिये यह भविष्यवाणी कर देना कुछ कठिन नहीं है कि वह परीक्षा में पास होगा और होता भी यही है यदि कोई विशेष कठिनाई आकर उपस्थित न हो जाये तो प्रायः वह पास ही होगा। भविष्य की कल्पना पर आज का काम करते हैं और आज के कामों से भविष्य का अन्दाज करते हैं। चाहे सौ फीसदी यह अनुमान ठीक न बैठे तो भी अधिकाँश में यह ठीक ही बैठता है। कल हम पर क्या बीतेगी, इसका अनुमान आज के कार्यों के आधार पर सभी विचारक और विद्वान् लगाते हैं। एक दार्शनिक का कथन है कि भविष्य के बारे में सोच विचार करते रहना मनुष्य जाति की अनिवार्य आवश्यकता है।

आइए, हम मनुष्य जाति का भविष्य जानने के लिए आज की स्थिति का सिंहावलोकन करें। क्योंकि वर्तमान के आधार पर ही भविष्य का निर्माण होता है। जन-समाज में यह एक धारणा फैली हुई है कि युद्ध के बाद शान्ति होती है। इसलिए यह समझ लिया जाता है कि लड़ाई के बाद लोग अपनी मूर्खता समझ जायेँगे और शान्ति से रहने लगेंगे। परन्तु अनुभव से यह धारणा गलत साबित हुई है। सन् 14 से 19 तक महायुद्ध हुआ। उसके बाद यह समझा गया कि अब बहुत दिनों तक सुख-शान्ति का राज रहेगा। किन्तु ऐसा हुआ नहीं। जनता की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, वरन् स्वार्थ और शोषण का दौर पहिले से भी अधिक चलने लगा। दो दशाब्दियाँ ही बीतने पाई थीं कि युद्ध पहले से भी अधिक प्रचण्ड रूप धारण करके प्रकट हो गया। हमारा अनुमान है कि ऐसी सैकड़ों लड़ाइयाँ भी मानव जाति का सुन्दर भविष्य निर्माण न कर सकेंगी। जर्मनी सोचता है कि मेरे साथ गत युद्ध में न्याय नहीं हुआ। उसका प्रतिशोध कुछ ही दिनों बाद फूट पड़ा। सत्ताधारियों ने संसार की अधिकाँश निरीह जनता को पददलित शोषित और गुलाम बना लिया है। अरबों जिह्वाएं कुछ कहना चाहती है पर उनकी जबान पर ताला और सीने पर छुरा तना हुआ है। मानव की अन्तरात्मा को, उसकी प्रकृति-दत्त स्वाधीनता को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। क्या आप सोचते हैं कि अगणित हृदयों की मन मसोस कर दबाई हुई आकांक्षाएं यों ही दबी रहेंगी? नहीं ऐसा न होगा शोषण से शान्ति का नहीं विद्रोह का सूत्रपात होगा और उस विद्रोह की लपलपाती हुई चामुण्डा अपनी रक्त पिपासा तृप्त करती रहेगी।

युद्ध से युद्ध का अन्त नहीं होगा हिंसा से शान्ति का आविर्भाव नहीं होगा। आज हम देखते हैं कि संसार इस सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। वह अपनी महत्वाकाक्षों पर दूसरों के हितों को बलिदान करने पर तुला हुआ है। लोगों के हृदय में स्वार्थ की भट्टी धाँय-धाँय करके जल रही है, क्या छोटा क्या बड़ा, क्या अमीर क्या गरीब अपने तुच्छ स्वार्थ से आगे की बात नहीं सोचता। दया धर्म, प्रेम और मानवता का दर्शन होना कठिन हो रहा है। जब तक इस दुबु दुर्बुद्धि में अन्तर न आवेगा तब तक सुख शान्ति का साम्राज्य स्थापित न होगा। आज मनुष्य जाति धर्म को छोड़कर अधर्म की ओर अग्रसर हो रही है। इसके कडुए फल तो भोगने ही पड़ेंगे। इस दृष्टिकोण से विचार करने पर यह भविष्यवाणी करना अनुचित न होगा कि-”सतयुग अभी दूर है।”


Quotation

जिस तरह नदी के एक चुल्लू भर पानी में उसके सभी गुण होते हैं। उसी तरह पुरुष में भी प्रभु के सत गुण होते हैं।

*****

यदि तुमको आनन्द और शान्ति की आवश्यकता है, तो उसकी प्राप्ति का केवल यही रास्ता है-अपने को जीतो, अपनी समस्त अभिलाषाओं का अन्दर रहने वाली शक्ति को पहरेदार बना दो।

*****

यदि तुम को झूठ बोलने से, आत्मा को दुःख पहुँचाने से सम्पत्ति मिले, तो वह ठीक नहीं है। न्याय और परिश्रम का एक-एक पैसा, अन्याय के कई रुपये के बराबर है।


असन्तों के स्वभाव


असन्तों के स्वभाव

(तुलसीकृत रामायण से)

सुनहु असन्तन केर सुभाऊ।

भूलेहु सगत करिये न काऊ॥

तिन्ह कर संग सदा दुखदाई।

जिमि कपिलहि घाले हरहाई॥

खलन हृदय अति ताप विशेखी।

जरहिं सदा पर-सम्पति देखी॥

जहँ कहुँ निन्दा सुनहिं पराई।

हर्षहिं मनहुँ परी निधि पाई॥

काम क्रोध मद लोभ परायन।

निर्दय कपटी कुटिल मलायन॥

बैर अकारण सब काहू सों।

जो कर हित अनहित ताहू सों॥

झूठै लेना झूठे देना।

झूठे भोजन झूठ चबेना॥

बोलहिं मधुर वचन जिमि मोरा।

खाँय महा अहि हृदय कठोरा॥

दोहा-पर द्रोही पर-दाह रत, परधन पर अपवाद।

ते नर पामर पाप मय, देह धरे मनु जाद॥

लोभै ओढन लोभैं आसन।

शिश्नोदर पर यमपुर त्रासन॥

काहू की जो सुनहिं बड़ाई।

स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई॥

जब काहू के देखहिं विपती।

सुखी होहिं मानहु जग नृपती॥

स्वारथ रत परिवार विरोधी।

लंपट काम लोभ अति क्रोधी॥

मातु पिता गुरु विप्र न मानहिं।

आपु गये अरु आनहि घालहिं॥

करहिं मोह वष द्रोह परावा।

सन्त संग हरि कथा न भावा॥

अवगुण सिन्धु मन्द मति कामी।

वेद विदूषक पर धन स्वामी॥


पाठकों का पृष्ठ

“धनवान बनने के गुप्त रहस्य” पुस्तक मिली। पुस्तक क्या है, निराश, बेकार और गरीब लोगों में प्राण भर देने वाली बिजली है। लोग धन प्राप्त करना चाहते हैं, किन्तु उन्हें उसके गुप्त रहस्यों का पता नहीं होता, इसलिए जन्म भर असफल रहते है आपने इस पुस्तक में वे रहस्य खोल कर रख दिये हैं जिनके बिना कोई धनवान नहीं बन सकता।

-प्रकाशनारायण सक्सेना, रीवाँ।

मैं धनवान बनने के लिए बहुत दिनों से चिन्तित हूँ। इसके लिए सैकड़ों पुस्तकें पढ़ी हैं, उनमें चूरन, चटनी, तेल, साबुन बनाने की विधियों के अलावा कुछ नहीं होता। हम देखते हैं कि इन चीजों को बनाने और बेचने वाले हर शहर में सैंकड़ों हैं, पर एक भी धनवान दिखाई नहीं देता। आपकी पुस्तक अनूठी है, उसमें कुबेर की अन्तरात्मा बोलती हुई सुनाई पड़ती है। ऐसी ही पुस्तकें हम गरीबों का भला कर सकती हैं। धनवान बनने के गुप्त रहस्य पुस्तक छापने के लिए आपको बधाई।

-विद्याप्रकाश जैसवाल, फरीदपुर।

आपने ‘धनवान बनने के गुप्त रहस्य’ पुस्तक लिखकर देश की बड़ी भारी सेवा की है। मैंने इसे दस बार पढ़ा है, पर तृप्ति नहीं होती। निस्संदेह धनवान बनने का केवल यही मार्ग हो सकता है, जिसका इस पुस्तक में वर्णन किया गया है। भौतिकवाद और आध्यात्मवाद का यह अद्भुत संमिश्रण है।

-तिलकचंद लखनचंद राठी, जौनपुर।

‘बुद्धि बढ़ाने के उपाय’ मुझे बहुत पसंद है। बहुत खोज के साथ लिखी गई है, हमारे स्कूल के विद्यार्थी इसमें वर्णित उपायों को काम में ला रहे हैं।

-नन्दकिशोर द्विवेदी, जबलपुर।


समालोचना

नम महात्म्य-वृन्दावन-(तीर्थांक) संपादक पं दानबिहारीलाल शर्मा, वार्षिक मूल्य 1। इस अंक का 1. वार्षिक ग्राहकों को विशेषाँक मुफ्त में। भारतवर्ष के प्रायः सभी तीर्थों का परिचय इस अंक में है। अनेक चित्रों से सुसज्जित 300 पृष्ठ के इस विशेषाँक में तीर्थों सम्बन्धी अलभ्य सामग्री का समन्वय है। धार्मिक जनता के लिए एक बहुत ही आवश्यकीय विषय पर ऐसा सुन्दर विशेषाँक निकालने के लिए सम्पादक महोदय बधाई के पात्र हैं। धार्मिक जनता को इसे अपनाना चाहिये।

संकीर्तन -मेरठ (श्रीकृष्ण चरिताँक) संपादक श्री सुदर्शन सिंह ‘चक्र’ वार्षिक मूल्य 3 इस अंक का 2 भगवान कृष्ण की लीलाओं का सरस और सरल भाषा में वर्णन किया गया है। भावुक भक्तों के लिए कृष्णलीलामृत वैसे ही बड़ा मधुर है, इस अंक में बहुत ही योग्यतापूर्वक सुसज्जित करके उसे और भी हृदयग्राही बना दिया है। अपने ढंग का यह अनूठा विशेषाँक निकालना बड़े साहस का काम है, पत्र सर्वथा संग्राह्य है।

सात्विक जीवन -83 पुराना चीना बाजार कलकत्ता (नव वर्षांक) संपादक श्री महेन्द्रनाथ वर्मा वार्षिक मूल्य 3 सात्विक जीवन गत वर्ष साप्ताहिक रूप से प्रकाशित होता था, इस वर्ष से मासिक प्रकाशित हुआ करेगा। द्वितीय वर्ष का पहला अंक नव-वर्षांक के रूप में हमारे सामने है। पत्र के सभी लेख एक से एक बढ़कर गंभीर, खोजपूर्ण और उपयोगी हैं। सात्विक जीवन का दृष्टिकोण जन्म से ही मानवीय जीवन को उच्च बनाना रहा है। निस्संदेह यह पत्र एक महान् आवश्यकता की पूर्ति कर रहा है। इसे अपनाने की जनता से हमारी जोरदार प्रार्थना है।


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यह पत्र बहुत शीघ्र बड़ी सज धज के साथ निकल रहा था। इसमें पूज्य महात्माओं के कल्याणकारी उपदेश, मानव जीवन को देवी बनाने योग्य नैतिक एवं आध्यात्मिक लेख एवं सुरुचिपूर्ण उपदेश प्रद कवितायें तो प्रति मास रहेंगी ही, साथ ही स्वास्थ्य, सदाचार, तथा सन्मार्ग विषयक ऊंचे दर्जे के विचारों का भी नियमित प्रकाशन इसमें होगा। इस पत्र को देश के अनेक पूज्य महात्माओं, उच्च श्रेणी के प्रसिद्ध विद्वान् एवं नामी भावुक सुकवियों का पुनीत सहयोग प्राप्त हो गया है। इसी से इसमें ठोस और बड़े काम की पाठ्य सामग्री रहेगी।

इस सूचना के पढ़ते ही शीघ्र ही कृपया रु भेजकर ग्राहक श्रेणी में नाम लिखाइये। जो सज्जन इस पत्र के आठ ग्राहक बनाकर उनका मूल्य व पते हमें इकट्ठे भेजेंगे, उन्हें एक वर्ष तक यह बिना मूल्य ही मिलेगा। अतः ग्राहक बनने की शीघ्रता कीजिये।

पता - मैनेजर- ‘सत्संग‘ सत्संग-भवन, मथुरा। ()


देना तू मुझको बूँद बूँद!


देना तू मुझको बूँद बूँद!

(ले. श्री सत्य भूषण योगी)

लेने वालों से खचा द्वार

तू मुक्त हस्त देता सँभार॥

भर देता चपक लवालब तू-

उनके तुझ में है भरा प्यार॥

सच, दाता तेरा कोप बड़ा।

देने का तुझ को शौक बड़ा॥

पर मुझको मत ज्यादा देना-

करके कुछ अपना हदय कड़ा॥

मेरे भविष्य का क्षितिज देख-

देना तू मुझको बूँद बूँद॥1॥

यदि एक बार सकब दे देगा।

सम्भव न फि र रह जाएगा॥

मैं क्या माँगूँगा फि र तुझसे-

तू क्या देगा? पछतायेगा॥

और इतना एक साथ लेकर।

मैं क्या रस पाऊँगा प्रियवर॥

सब पड़ा रहेगा बिना पिये-

प्रिय! बना भार मेरे शिर पर॥

पीलूँ या भार उइाऊँ प्रिय,

देना तू मुझको बूँद बूँद॥2॥

तू बूँद बूँद देता जाए।

तू बूँद बूँद रस बरसाए॥

मैं चातक सा मुँह खोले हूँ-

तू बूँद बूँद हित तरसाए॥

है इसमें दाता का महत्व।

है इसमें याचक का ममत्व॥

अमरत्व यही है देने का-

लेने का सच्चा यही तत्व॥

युग-युग तक है यदि इष्ट प्राण्य,

देना तू मुझको बूँद बूँद॥3॥

यह बूँद बूँद लेती सीपी।

यह बूँद बूँद लेता मधुकर॥

लेता है मधुमय अम्बर से-

यह बूँद बूँद धरती का उर॥

जब बूँद बूँद का रस चाखें,

प्यारे।़ जीने का तभी स्वाद॥

जब चाट चाट कर होट मुझे,

सब पीने वाले रखें याद॥

देखो, क्या कहती हैं आँखें,

देना तू मुझको बूँद बूँद॥4॥

ऊषा ने माँगा है तुझसे,

प्रिय।़ ज्योति भरा विस्तृत-सागर॥

देखो, वह उसमें डूब मरी,

वह सुन पाई क्या जीवन स्वर॥

रजनी ने माँगी है तुझ से,

जग-प्राण ज्योति की बूँद बूँद॥

वह झिलमिल 2 समनों को,

जिससे लख पाए नयन मूँद॥

कुछ जागृत हो कुछ समने हों,

देना तू मुझको बूँद बूँद॥5॥

*समाप्त*