प्रेम का अमृत चखो।

क्या तुम जानते हो कि सत्यशिव सुन्दर और मुक्त आत्मा इस हड्डियों की ठठरी में बद्ध होने के लिए क्यों रजामंद हुआ? सुनो, वह प्रेम का अमृत चखने के लिए इस मल-मूत्र की गठरी में बँधा है। उसी का जीवन धन्य है, वही सौभाग्यशाली है, जो प्रेम का आस्वादन करता है, उसने मनुष्य जन्म धारण करने का सच्चा फल पाया, जिसे परमेश्वर ने प्रेम का अलौकिक उपहार प्रदान किया है। प्रेम की बूँद हृदय में पड़ कर कैसे अमूल्य मोती उपजाती है, इसे कुँजड़े नहीं जौहरी ही जान सकते हैं। प्रेमी अपने लिए नहीं जीता, वह दधीचि के समान अपनी हड्डियाँ भी दूसरों को दे देता है। क्यों? इसलिए कि दूसरों को प्यार करता है। वे मूर्ख हैं, जो कहते हैं कि सज्जनों के साथ प्रेम और दुष्टों के साथ द्वेष करना चाहिए। वे नहीं जानते कि द्वेष का हथियार इतना पैना हीं है जितना प्रेम। बिना हड्डी के जीवों का अस्तित्व अस्थिर है, इसी प्रकार प्रेम रहित मनुष्य का जीवन डाँवा डोल है। आँधी में उड़ने वाली रुई की रतरह वह परिस्थितियों के वश में होकर उधर से इधर नाचता फिरता है और अन्त में नष्ट हो जाता है। सौंदर्य बाहर कहाँ ढूँढ़ते फिर रहे हो? अपने हृदय को टटोलो जरा देखो तो सही उसमें कितना सुन्दर प्रेम का रस भरा है, अन्यथा मनुष्य क्या है? मुट्ठी भर हड्डियों का ढाँचा मात्र है।

भाग 2 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक 9


एक-ज्योति


एक-ज्योति

(ले. श्री लक्ष्मीनारायण गुप्त ‘कमलेश’)

जिसका विस्तार युगों से है, परिमित है, वही एक-क्षण में।

वह सर्व भूतमय एक ज्योति है, व्याप्त विश्व के कण-कण में॥

है राम, श्याम में शक्ति वही-राधा में है, सोता में है।

वह एक विलक्षण अटल-तेज-मानस में है, गीता में है॥

वह गिरि में है, सरिता में है, तरुओं में है, निर्जन-बन में।

है वही योगियों के उर में, मन्दिर में, मूरति में, मन में॥

उसका प्रतिबिम्ब विमल-विधु में, उसकी ज्वाला अंगारों में।

उसकी प्रतिभा दिनकर में है, उसका प्रकाश है-तारों में॥

उसकी उपमा-उपमान वही वह अविचल चेतन है, सत है।

वह स्थित है सब में समान, सब कुछ उसके अर्न्तगत है॥


नायमात्माबलहीने न लभ्यः

उपनिषद् का वचन है कि- ‘यह आत्मा निर्बलों को प्राप्त नहीं होती।’ आइए, जरा इस विषय पर गंभीरता पूर्वक विचार करें। अखण्ड ज्योति के पाठक बहुत दिनों से यह सुनते आ रहे हैं, कि मनुष्य में जो कुछ भी चेतना शक्ति है, वह आत्मा के द्वारा ही प्राप्त होती है। यह समस्त सत्ताओं का केन्द्र है। हमारी भौतिक योग्यताएं भी उस आध्यात्मिक केन्द्र से आविर्भूत होती हैं। कोई व्यक्ति जो धनवान, बलवान, विद्वान, बुद्धिमान, गुणवान, ऐश्वर्यवान, या तेजवान दिखाई पड़ता है, उससे यह प्रसाद जड़ शरीर से नहीं वरन् आत्मा की कृपा से प्राप्त हुए हैं। बहुमुखी आन्तरिक सत्ता का जिसने जितना और जिस प्रकार विकास कर लिया है, उसमें इसी से ही महत्व प्रदर्शित होता है। सच्चिदानंद आत्मा की अपरिमित शक्ति में से जो जितना ग्रहण कर लेता है, वह वैसा ही सुयोग्य दिखाई देता है। केवल सतोगुण ही नहीं रजोगुण और तमोगुण की जागृति भी आत्मशक्ति का उपयोग लाये बिना होना असंभव है। निदान यह मानना पड़ता है, कि जिसके पास जो कुछ है वह आत्मा का ही प्रसाद है। इसी सत्य को ध्यान में रखते हुए मुँडकोपनिपद आदेश करती है किः-

तमेवैकं जानथ आत्मा नमन्या

वाचो विमुञच्थ अमृतस्यैष सेतु॥

अर्थात्-’एकमात्र आत्मा को जानो, इसके अतिरिक्त और कोई वार्ता कदापि मत करो, सुनो! यही अमृत का सेतु-पुल है।’ सचमुच आत्मशक्ति को प्राप्त करने से बढ़ कर और कोई ऐश्वर्य नहीं है। इसे यों भी कहा जा सकता है, कि आत्मा के अतिरिक्त और कोई वस्तु है ही नहीं। आत्मशक्ति के अभाव में विश्व का अस्तित्व ही मिट जाता है जिसमें यह सत्ता जितनी प्रसुप्त है वह उतना ही दीन मलीन और दुःखी है।

इस दिव्य तत्व को प्राप्त करना मनुष्य जीवन का एक मात्र उद्देश्य है, परन्तु कितने दुःख की बात है कि हम मूल को छोड़ कर पत्ते-पत्ते पर भटकते हैं, फलस्वरूप जीवन यों ही व्यर्थ चला जाता है और एक भी तृष्णा को पूरा नहीं कर पाते क्योंकि मनोवाँच्छाओं को पूर्ण करने के स्थल-आत्मा की ओर ध्यान न देकर बारहसिंगा की भाँति कस्तूरी की तलाश में इधर-उधर दौड़ते फिरते हैं। आत्मिक सुख को छोड़ दें तो भी कोई साँसारिक सुख आत्म प्रसाद के बिना प्राप्त नहीं हो सकता। जिस प्रकार तेल के अभाव में दीपक बुझ जाता है, और उसके न्यून होने पर वनबी जरा-जरा टिमटिमाती रहती है, वैसे ही आत्म शक्ति से रहित मनुष्य सब प्रकार असहाय, अभावों से ग्रस्त, चिन्ताओं से व्याकुल और दास वृत्ति के साथ जैसे-तैसे जीवन यापन करते हैं।

हम चाहते हैं कि क्षुद्र न रह कर महान बनें, दास नहीं स्वतंत्र बनें और इच्छित ऐश्वर्यों का उपभोग करें। यह बातें आत्मशक्ति से सम्बंध रखती हैं, निश्चय ही कोई निर्बल आत्मा सुखी स्वतंत्र और महान नहीं हो सकती। इसलिये सबसे अधिक आवश्यकता हमें इस बात की है कि आत्मा को जानें, आत्म शक्ति को प्राप्त करें। अब विचार करना चाहिये कि आत्मा किस प्रकार और किन लोगों को प्राप्त हो सकती है? उपरोक्त पद में स्पष्ट कर दिया है कि- नायमात्मा बलहीने न लभ्यः। अर्थात् निर्बलों को यह आत्मा प्राप्त नहीं होती। जो आत्मा को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें बलवान बनना चाहिए।

निर्बलता, दासता, दीनता, अकर्मण्यता, कायरता यथार्थ में सब से बड़ा पाप है। पत्थर जैसी जड़ता धारण करने वाला और अपनी क्रिया शक्ति स्फूर्ति एवं आशा का तिरस्कार करने वाला एक प्रकार का आत्म-हत्यारा है। और ऐसे आत्म-हत्यारों को निश्चय ही घोर नरक प्राप्त होता है। यह नरक मृत्यु के बाद नहीं वरन् उसी क्षण से उतने ही परिणाम में प्राप्त होना आरम्भ हो जाता है, जब से कि वह इन जघन्य दोषों को अपनाना शुरू करता है। ईश्वर ने हमें सम्पूर्ण शारीरिक और मानसिक साधन इस प्रकार के दिये हैं, कि उनका भरपूर उपयोग करके, अपने को अधिक से अधिक बलशाली बनावें। वह राजा को अपने घर में नहीं ठहरा सकता है, जिसके यहाँ थोड़ी बहुत जगह है। सड़क पर सोकर गुजर करने वाला भिखमंगा भला किस प्रकार एक राजा को अपने घर में ठहरा कर उसका स्वागत-सत्कार करने का आनन्द लाभ कर सकेगा? ईश्वर को वही प्राप्त कर सकता है, जो बलवान है, आत्मशक्ति उसे प्राप्त हो सकती है जो सशक्त है। भौतिक विज्ञानी कहते हैं कि- “प्रकृति श्रेष्ठतम का चुनाव करती है और कमजोरों को नष्ट कर डालती है।” आध्यात्मिक विज्ञानी कहते हैं कि- निर्बलता आत्महत्या है, ऐसे पापियों को नरक की ज्वाला में जलना पड़ता है।” बात दोनों की एक है। असंख्य जातियाँ और सभ्यताएं निर्बलता के पाप के कारण अपना, अस्तित्व खो चुकीं और भविष्य में भी जो व्यष्टि या समष्टि निर्बल होगी, वह अपने पाप का पूरा-पूरा फल भोगेगी। इसलिये जो जीवित रहना चाहते हैं, जो उन्नति करना चाहते हैं, जो ऐश्वर्य प्राप्त करने के इच्छुक हैं उन्हें चाहिये कि बलवान बनें और आत्मशक्ति को प्राप्त करके सौभाग्यशाली कहलावें।

भौतिक विज्ञान ने तामसी बल का संपादन करने की सलाह दी है। पश्चिमी देशों ने पाशविक बल संग्रह किया है। हिंसा और छल में निपुणता प्राप्त करना बहुत निकृष्ट कोटि की बल साधना है इसका परिणाम कुछ क्षण के लिए सुखद भले ही प्रतीत हो, अन्ततः वह समूल नाश का कारण बन जाता है। उत्तम बल सात्विक बल है। हमें चाहिए कि सात्विक बल की आराधना करें। सत्य और अहिंसा के आधार पर जो आध्यात्मिक बल संपादन किया जाएगा वह आसुरी बल की अपेक्षा अधिक दृढ़ और स्थायी होगा एवं उसी के द्वारा सुख शान्ति का साम्राज्य स्थापित किया जा सकेगा।

आवश्यक है कि हम न केवल शरीर से वरन् मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी बलवान बनें। कायरता और अकर्मण्यता को छोड़कर कर्त्तव्य क्षेत्र में अवतीर्ण हों। हीनता, दीनता और दासता के विचारों का परित्याग करके अपने वास्तविक ‘सोऽहम्’ स्वरूप को जानें। जिन योग्यताओं को जीवन यावन के लिये आवश्यक समझें उनका विकास करें और एक दिन पूर्ण परमात्म पदवी को प्राप्त करने में समर्थ हो जावें। ऐसा पौरुष करने पर ही हम बलवान बने सकेंगे और पर आत्मा को प्राप्त करने में समर्थ होंगे।

पाठकों! निश्चय समझो कि बिना आत्मा प्राप्त किए कल्याण नहीं किन्तु ‘नायमात्मा बलहीने लभ्यः।’ इसलिए उठो, बलवान बनो- अपने बल सशक्त बनाओ।


Quotation

जैसे अत्याचारी तथा न्यायी का विरोध करना परम धर्म है। उसी तरह पतितों से प्रेम रखना भी परम धर्म है।

*****

धर्मोपदेश यही है। दुष्ट को न मार सको तो स्वयं ही उसके द्वारा मर जाना ठीक है, किन्तु अत्याचार को देख कर भाग जाना तो पशुता से भी बढ़कर है।


प्राणियों को रचने वाला

(महामना पं. मदनमोहन जी मालवीय)

हम देखते हैं कि प्राणात्मक जगत् की रचना इस बात की घोषणा करती है कि इस जगत् का रचने वाला एक ईश्वर है। यह चैतन्य जगत् अत्यन्त आश्चर्य से भरा हुआ है। जरायु से उत्पन्न होने वाले मनुष्य, सिंह, हाथी, घोड़े, गौ आदि; अण्डों से उत्पन्न होने वाली पक्षी; पसीने और मैल से पैदा होने वाले कीड़े; पृथ्वी को फोड़कर उगने वाले वृक्ष, इन सबकी उत्पत्ति, रचना और इनका जीवन परम आश्चर्यमय है। नर और नारी का समागम होता है। उस समागम में नर का एक अत्यन्त सूक्ष्म किन्तु चैतन्य अंश गर्भ में प्रवेश कर नारी के एक अत्यन्त सूक्ष्म सचेत अंश से मिल जाता है, इसको हम जीव कहते हैं।

एक बाल के आगे के भाग के खड़े-खड़े सौ भाग कीजिये और उन सौ में से एक के फिर सौ खड़े-खड़े टुकड़े कीजिये और इसमें से एक टुकड़ा लीजिये तो आपको ध्यान में आवेगा कि उतना सूक्ष्म जीव है। यह जीव गर्भ में प्रवेश करने के समय से शरीर रूप से बढ़ता है। विज्ञान के जानने वाले विद्वानों ने अणुवीक्षण यंत्र से देखकर यह बताया है कि मनुष्य के वीर्य के एक बिन्दु में लाखों जीवाणु होते हैं और उनमें से एक ही गर्भ में प्रवेश पाकर टिकता और वृद्धि पाता है। नारी के शरीर में ऐसा प्रबंध किया गया है कि यह जीव गर्भ में प्रवेश पाने के समय से एक नली के द्वारा आहार पावे, इसकी वृद्धि के साथ-साथ नारी के गर्भ में एक जल से भरा थैला बनता जाता है जो गर्भ को चोट से बचाता है। इस सूक्ष्म से सूक्ष्म, अणु से अणु, बाल के आगे के भाग के दस हज़ार वे भाग के समान सूक्ष्म वस्तु में यह शक्ति कहाँ से आती है कि जिससे यह शक्ति कहाँ से आती है कि जिससे यह धीरे-धीरे अपने माता और पिता के समान रूप रंग और सब अवयवों को धारण कर लेता है? कौन सी शक्ति है, जो गर्भ में इसका पालन करती और इसको बढ़ाती है? यह क्या अद्भुत रचना है, जिससे बच्चे के उत्पन्न होने के थोड़े समय पूर्व ही माता के स्तनों में दूध आ जाता है? कौन सी शक्ति है, जो सब असंख्य प्राणवन्तों को, सब मनुष्यों को, सब पशु-पक्षियों को, सब कीट-पतंगों को, सब पेड़-पल्लवों को पालती है और उनको समय से चारा और पानी पहुँचाती है? कौन सी शक्ति है, जिससे चींटियाँ दिन में भी और रात में भी सीधी-भीत पर चढ़ती चली जाती हैं? कौन सी शक्ति है, जिससे छोटे से छोटे और बड़े से बड़े पक्षी अनन्त आकाश में दूर से दूर तक बिना किसी आधार के उड़ा करते हैं?

नरों और नारियों की, मनुष्यों की, गौवों की, सिंहों की, हाथियों की, पक्षियों की, कीड़ों की सृष्टि कैसे होती है? मनुष्यों से मनुष्य, सिंहों से सिंह, घोड़ों से घोड़ा, गौवों से गौ, मयूरों से मयूर, हंसों से हंस, तोतों से तोते, कबूतरों से कबूतर, अपने-अपने माता-पिता के रंग-रूप-अवयव लिये हुए कैसे उत्पन्न होते हैं? छोटे से छोटे बीजों से किसी अचिन्त्य शक्ति से बढ़ाये हुए बड़े और छोटे असंख्य वृक्ष उगते हैं तथा प्रतिवर्ष और बहुत वर्षों तक पत्ती, फल, फूल, रस, तैल, छाल और लकड़ी से जीवधारियों को सुख पहुँचाते, सैकड़ों, सहस्रों स्वादु, रसीले फलों से उनको तृप्त और पुष्ट करते, बहुत वर्षों तक श्वास लेते, पानी-पीते, पृथ्वी से और आकाश से आहार खींचते, आकाश के नीचे झूमते-लहराते रहते हैं?

इस आश्चर्यमयी शक्ति की खोज में हमारा ध्यान मनुष्य के रचे हुए एक घर की ओर जाता है। हम देखते हैं, हमारे सामने यह एक घर बना हुआ है। इसमें भीतर जाने के लिये एक बड़ा द्वार है। इसमें अनेक स्थानों में पवन और प्रकाश के लिये खिड़कियाँ तथा झरोखे हैं। भीतर बड़े-बड़े खम्भे और दालान हैं। धूप और पानी रोकने के लिये छतें और छज्जे बने हुए हैं। दालान-दालान में, कोठरी-कोठरी में भिन्न-भिन्न प्रकार से मनुष्य को सुख पहुँचाने का प्रबंध किया गया है। घर के भीतर से पानी बाहर निकालने के लिये नालियाँ बनी हुई हैं। ऐसे विचार से घर बनाया गया है कि रहने वालों को सब ऋतु में सुख देवें। इस घर को देखकर हम कहते हैं कि इसकी रचना करने वाला कोई चतुर पुरुष था, जिसने रहने वालों के सुख के लिये जो-जो प्रबंध आवश्यक था, उसको विचार कर रचा। हमने रचने वाले को देखा भी नहीं, तो भी हमको निश्चय होता है कि घर का रचने वाला कोई था या है और वह ज्ञानवान विचारवान पुरुष है।

अब हम अपने शरीर की ओर देखते हैं। हमारे शरीर में भोजन करने के लिये मुँह बना है। जिसको पचाने के लिये गले में नानी बनी है। उसी के पास पवन, के मार्ग के लिये एक दूसरी नाली बनी हुई है। भोजन को रखने के लिये उदर में स्थान बना है। भोजन पचकर रुधिर का रूप धारण करता है, वह हृदय में जाकर इकट्ठा होता है और वहाँ से सिर से पैर तक सब नसों में पहुँच कर मनुष्य के सम्पूर्ण अंगों को शक्ति, सुख और शोभा पहुँचाता है। भोजन का जो अंश शरीर के लिये आवश्यक नहीं है। उसके मल होकर बाहर जाने के लिये मार्ग बना है। दूध, पानी या अन्य रस का जो अंश शरीर को पोसने के लिये आवश्यक नहीं है, उसके निकलने के लिये दूसरी नाली बनी हुई है। देखने के लिये हमारी दो आँखें, सुनने के लिये दो कान, सूँघने को नासिका के दो रन्ध्र और, चलने-फिरने के लिये हाथ-पैर बने हैं। सन्तान की उत्पत्ति के लिये जनन इन्द्रियाँ हैं। हम पूछते हैं- क्या यह परम आश्चर्यमय रचना केवल जड़ पदार्थों के संयोग से हुई है? या इसके जन्म देने और वृद्धि में, हमारे घर के रचयिता के समान, किन्तु उससे अनन्त गुण अधिक किसी ज्ञानवान विवेकवान शक्तिमान आत्मा का प्रभाव है?

इसी विचार में डूबते और उतराते हुए अपने मन की ओर ध्यान देते हैं तो हम देखते हैं कि हमारा मन भी एक आश्चर्यमय वस्तु है इसकी-हमारे मन की विचारशक्ति, कल्पनाशक्ति गणनाशक्ति, रचना शक्ति, स्मृति, घी, मेधा हमको चकित करती है। इन शक्तियों से मनुष्य ने क्या-क्या ग्रंथ लिखे हैं, कैसे-कैसे काव्य रचे क्या-क्या विज्ञान निकाले हैं, क्या-क्या आविष्कार किये हैं और कर रहे हैं। यह थोड़ा आश्चर्य नहीं उत्पन्न करता। हमारी बोलने और गाने की शक्ति भी हमको आश्चर्य में डुबा देती है। हम देखते हैं कि यह प्रयोजन व्रती रचना सृष्टि में सर्वत्र दिख पड़ती है और यह रचना ऐसी है कि जिससे अन्त तथा आदि का पता नहीं चलता इस रचना में एक-एक जाति के शरीरियों के अवयव ऐसे नियम से बैठाए गये हैं कि सारी सृष्टि शोभा से पूर्ण है। हम देखते हैं कि सृष्टि के आदि सारे जगत् में एक कोई अद्भुत शक्ति काम कर रही है, जो सदा से चली आई है, सर्वत्र व्याप्त और अविनाशी है।

हमारी बुद्धि विवश होकर इस बात को स्वीकार करती है कि ऐसी ज्ञानात्मिका रचना का कोई आदि, सनातन, आज, अविनाशी, सत-चित्-आनन्द स्वरूप जगत-व्यापक, अनन्त-शक्ति सम्पन्न रचयिता है। उसी एक अनिर्वचनीय शक्ति को हम ईश्वर, परमेश्वर, परब्रह्म, नारायण भगवान वासुदेव, शिव, राम कृष्ण, जिसके जिहोवा, गाँड, खुदा, अल्लाह आदि सहस्रों नाम से पुकारते हैं।


Quotation

प्रेम आत्मा का स्वरूप है। आनन्द उसके गुण है। यदि तुम प्रेम में विश्वास करते हो तो प्रेम-शक्ति दुनिया को आनंद में डुबो दोगे।


और प्रेम ईश्वर है।

(महात्मा गाँधी)

बुद्धिवाद द्वारा ईश्वर पर श्रद्धा नहीं कर सकता, मैं अपने लेखों द्वारा दूसरों में श्रद्धा उत्पन्न नहीं कर सकता, मैं कबूल करता रहा अनुभव अकेले मुझे ही मदद कर सकता जिन्हें शंका हो, वे दूसरा सत्संग खोज करें। मेरा ईश्वर तो मेरा सत्य और प्रेम है। नीति परे है। ईश्वर अन्तरात्मा ही है। वह मृतकों की नास्तिकता भी है। क्योंकि वह अपने मर्यादित प्रेम से उन्हें भी जिन्दा रहने देता है। हृदय को देखने वाला है। वह बुद्धि और ज्ञान से परे है। हम स्वयं जितना अपने को जानते हैं उससे कहीं अधिक वह हमें और हमारे दिलों को जानता है। जैसे कहते हैं, वैसे ही वह हमें बताता है, क्योंकि वह जानता है कि जो हम कहते हैं। अक्सर वही हमारा भाव होता और कुछ लोग यह जान कर करते हैं, कुछ अनजान में। ईश्वर उनके लिये एक व्यक्ति है तो उसे व्यक्ति रूप में हाजिर देखना चाहते हैं, उसका स्पर्श करना चाहते हैं, उनके लिए वह स्वयं धारण करता है। वह पवित्र से पवित्र तत्व है उन्हें उसमें श्रद्धा है, उन्हीं के लिए उसका तत्व है। सब लोगों के लिए वह सभी चीज हममें व्याप्त है और फिर भी हमसे परे है। क्योंकि वह पश्चाताप करने के लिए मौका देता है। दुनिया में सबसे बड़ा प्रजा तंत्रवादी वही है। और वह बुरे-भले को पसन्द करने के लिए हमें एकाँत छोड़ देता है। वह सबसे बड़ा जालिम है, अक्सर हमारे मुँह तक आये हुए कौर निगल लेता है और इच्छा स्वतंत्र की ओट में आत्म छूट देता है, कि हमारी मजबूरी सिर्फ उसी को आनन्द मिलता है। उस हिन्दू धर्म के अनुसार उसकी लीला है। तो छाया है हम कुछ नहीं है। सिर्फ वही हो अगर हम हों तो हमें सदा उसके गुणों का गान करना चाहिये और उसकी इच्छा के अनुसार चलना चाहिये। आइये, उसकी वंशी की नाद पर हम नाचें सब अच्छा ही होगा।


बदला मत माँगो

(ऋषि तिरुवल्लुवर के उपदेश)

मैंने इतना किया पर इसका बदला मुझे क्या मिला? उतावले मनुष्य! बदले के लिए इतनी जल्दी क्यों करते हो? बादलों को देखो, वे सारे संसार पर जल बरसाते फिरते हैं, किसने उनके अहसान का बदला चुका दिया? बड़े-बड़े भूमि-खंडों का सिंचन करके उनमें हरियाली उपजाने वाली नदियों के परिश्रम की कीमत कौन देता है? हम पृथ्वी की छाती पर जन्म भर लदे रहते हैं और उसे मल-मूत्र से गंदी करते रहते हैं, किसने उसका मुआवज़ा अदा किया है? वृक्षों से फल, छाया, लकड़ी पाते हैं, पर उन्हें क्या कीमत देते हैं? परोपकार स्वयं ही एक बदला है। इस समय तुम उसे व्यर्थ समझ रहे हो, पर जब तुम परोपकार करने का स्वयं अनुभव करोगे, तो देखोगे कि ईश्वरीय व दान की तरह यह दिव्य गुण स्वयं ही कितना शाँतिदायक है, हृदय को कितनी महानता प्रदान करता है। उपकारी जानता है मेरे कार्यों से जितना लाभ दूसरों का होता है, उससे कई गुना स्वयं मेरा होता है। ज्ञानवान पुरुष जो कमाते हैं, वह दूसरों को बाँट देते हैं, वे सोचते हैं, कि प्रकृति जय जीवन सरीखी बहुमूल्य वस्तु मुफ्त दे रही है, तो हम अपनी फालतू चीजें दूसरों को देने में कंजूसी क्यों करें? वह बुरे दिनों में और विपत्तियों की घड़ियों में भी इस दिव्य गुण का परित्याग नहीं करता। वह जब भौतिक पदार्थ देने में असमर्थ होता है, तो अपनी सद्भावनाएं और शुभकामनाएं ही दूसरों को देता रहता है।


सत्य नारायण का व्रत

(विद्यालंकार पं. शिवनारायण शर्मा, आगरा)

“नहीं सत्यात् परोधर्मः” - सत्य से परे और धर्म नहीं है, इस श्रेष्ठ धर्म से पतित होकर, मिथ्या के वशीभूत होकर, केवल अर्थ और काम की सेवा करने से ही आज हम रोग, शोक, अभाव, उत्पीड़न से जर्जरीभूत, मिथ्या-अधर्म के तीव्र पोषण से संकुचित हैं। याद रखिये, हमारा यह देश धर्म-भूमि’ है, यहाँ धर्म को त्याग कर कोई अधिक समय तक सुख स्वच्छन्द होकर रह नहीं सकता। अधर्म के सामयिक प्रलोभन से मुग्ध होकर अब कब तक जीवन मिथ्यामय अशन्तिमय किये रहोगे? आओ, जाति, धर्म, सम्प्रदाय का विचार छोड़कर सब ‘सत्य-परायण होओ’।

आपके बालक, दास-दासी, मित्र आदि यदि आपसे झूठी बात कहें, आपको धोखा दें, तो आपके प्राण पर कितनी चोट लगती है; उतनी ही, वैसी ही व्यथा आपकी झूठी बातों से पाकर दूसरे लोग भी व्यथित होते होंगे- यह तो विचार देखिये। जिनके संसर्ग में आप रहते हैं, वे यदि निष्कपट व्यवहार करें, तो आप कितने सुखी होंगे; उसी प्रकार दूसरे लोग भी आपसे सरल सत्य-व्यवहार पाने की आशा करते हैं। पक्षान्तर में जगत के सब लोग झूठ बोलें, धोखा दें, तो भी आप कभी सत्य न छोड़िये, फिर देखिये कि आपके प्राण में कैसी शान्ति विराजती है, उस शाँति का कण-मात्र पाने की आशा से सारा जगत मुग्ध नेत्रों से आपकी ओर ताकता रहेगा।

आप मनुष्य हैं, आपकी नस-नस में सत्य दर्शी ऋषियों का रक्त प्रवाहित हो रहा है, आप सत्य से ही आये हैं, अब उस विलुप्त प्रायः पुण्यमय सत्य-स्मृति को जाग्रत करके देखिये कि आपका वाक्य सत्य, विचार सत्य, और कार्य सत्य है या नहीं। क्या आप सत्यमय होना चाहते हैं? तो उसका उपाय ध्यान देकर सुनियेः-

किसी दिन उपयुक्त समय पर यथासम्भव शुद्ध प्रशान्त चित्त होकर किसी पवित्र निर्जन स्थान में स्थिर भाव से बैठिये “सत्यं परं धीमहि” मन-ही-मन धारण कीजिये, कि सत्य स्वरूप परमात्मा तुम्हारे अन्त बाहर पूर्ण रूप से व्याप्त हो रहा है। भगवान् का जो नाम और रूप आपको प्रिय हो, वही नाम और रूप यथाशक्ति स्मरण कर भक्तिपूर्वक प्रणाम कर अधीरभाव से प्रार्थना कीजिये, कि ‘आप हमें सत्य परायण कीजिये, आप हमें सत्य परायण कीजिये। मिथ्या प्रलोभन से हमारी रक्षा कीजिये, जिससे हम भूल कर भी कभी झूठ न बोलें। आप सर्वशक्तिमान हैं, हमें शक्ति दीजिये, जिससे हम किसी अवस्था में कभी भी मिथ्या मार्ग पर न चलें।

किसी ऐसे विशेष भाव से प्रार्थना करके सत्य बोलने के लिए दृढ़-प्रतिज्ञ हों, फिर प्रतिदिन प्रातः काल उठते ही शय्या पर बैठे-बैठे कई बार “सत्यं परं धीमहि” मंत्र पाठ कीजिये, अपने अभीष्ट देवता को स्मरण कर दिन भर के लिए प्रार्थना कीजिये, कि प्रभो! आप हमें इस भाव से चलाइये कि जिससे आज दिन-रात में एक बार भी झूठ न बोलना पड़े।

प्रतिदिन प्रातः काल यह स्मरण करने और अनावश्यक बातें त्यागने की प्राण पन से चेष्टा करो। जब किसी से बात-चीत या व्यवहार करो, तब कम से कम एक बार पूर्वोक्त सत्य मन्त्र स्मरण कर लो। इसी तरह दिन के कार्य समाप्त करके रात्रि में शय्या पर शयन करते समय एक बार स्मरण कर देखो कि दिन में कोई झूठी बात कही वा कोई मिथ्या व्यवहार तो नहीं किया है यदि न हुआ हो तो कृतज्ञापूर्वक भगवान् को धन्यवाद देकर कहो- प्रभो! आपकी कृपा से मैं आज सत्य की रक्षा कर सका हूँ, आप मेरा भक्ति-हीन प्रणाम ग्रहण कीजिये, जिससे मैं प्रतिदिन इस भाव से आपकी कृपा का अनुभव कर सकूँ।”


शिवोऽहम्, शिवोऽहम्

(श्री स्वामी रामतीर्थ का वचनामृत)

“शिवोऽहम्” तो सभी कहते हैं, क्या भेदवादी क्या अभेदवादी, क्या भक्त, क्या कर्मकाण्डी, क्या हिन्दू और क्या कोई। सब ही अपने दिल के भीतर अपने आपको बड़े से बड़ा मानते हैं और साबित करते हैं। वह भेदवादी भक्त जो अभी मन्दिर में देव के सामने अपने नई ‘नीच, पापी, अधम, मूर्ख’ कहते-कहते थकता नहीं था, जब बाहर बाजार में निकला तो उसे कोई “अरे ओ नीच” कह कर पुकारे तो सही, फिर देखो तमाशा, कचहरियों में क्या-क्या गति होती है। अन्दर का ‘शिवोऽहम्’ कभी मर ही नहीं सकता। मरे क्यों कर, साँच को आँच कहाँ? पर हाँ, अपने तईं देहादि रख कर जो शिवोऽहम् का मुलम्मा ऊपर चढ़ाना है यह तो पौंड्रक की तरह झूठा विष्णु बनना है। इस प्रकार से ‘वासुदेवोऽहम्’ अब दुनिया अहंकार की बोली द्वारा बोल रही है। यह तो मैले ताम्र के पात्र में पायस पकाना है और ज़हर से मर जाना है। वेदान्त का उपदेश यह है कि क्षीर तो पिया जाए, पर मैले ताम्र पात्र में नहीं। देहाभिमान अन्दर और शिवोऽहम् का ऊपर-ऊपर से मुलम्मा तो नहीं बल्कि शिवोऽहम् अन्दर हो और अन्दर से अग्नि की तरह भड़क-भड़क कर देहाभिमान को जला दे। यह हो गया तो देहाभिमान, कृपणता, भय, शोक की ठौर कहाँ? इस भेद को (नहीं अभेद की) जिसने जाना, निधड़क हो गया, मूर्तिमान दाता बन गया, बल, शक्ति और तेज का दरिया नद हो निकला। कोई भी बल कहाँ से आता है? उस उदारता से जिसमें शरीर और प्राण की बलि देने को हम तैयार हों, सिर को हथेली पर लिये चलें।

पर्वत के शिखर से राम पुकार कर सुनाता हैः- संसार को सत्य मान कर उसमें कूदते हो, फूस की आग में पच-पच कर मरते हो, यह उग्र तपस्या क्यों? इससे कुछ भी सिद्ध नहीं होगा। देहाभिमान के कीचड़ में, अपने शुद्ध सच्चिदानन्द स्वरूप को भूल कर, फँसते हो, दलदल में धँसते हो, गल जाओगे। ब्रह्म को बिसार कर दुःखों को बुलाते हो सिर पर गोले बरसाते हो, गुल (पुष्प)! जल जाओगे। सत्य को जवाब देकर मिथ्या नाम रूप में क्यों धक्के खाते हो? जिनको श्वेत मक्खन का पेड़ा समझे हो, यह तो चूने (कलई) के गोले हैं खाओ तो सही, फट जायगी अन्तड़ियाँ, झूठ बोलने वाले का बेड़ा गरक। मैं सच कहता हूँ, दुनिया की चीजें धोखा हैं। होश में आओ, ब्रह्म ही ब्रह्म सत्य है। ज्येष्ठ, आषाढ़ के दोपहर के वक्त भाड़ की तरह तपे हुए मरुस्थल में मंकि मुनि जब अति व्याकुल हो रहा था, और उसने पास के एक ग्राम में जाकर आराम करना चाहा, उस समय वशिष्ठ भगवान् के दर्शन हुए। वशिष्ठ जी कहते हैं- बेशक इस गर्मी में हजार बार जल मर-पर वहाँ मत जा, जहाँ तन के तनूर में पड़ेगा। यहाँ पर तो शरीर ही जलता है, वहाँ अविद्या के ताप से सारे का सारा सड़ेगा।

भाई! मुर्दे को उठा कर जो चिल्लाया करते हो ‘राम नाम सत्य है’ आज पहले ही समझ जाओ, अभी समझ लो तो मारोगे ही नहीं, मरने के वक्त गीता तुम्हारे किस काम आवेगी? अपनी जिन्दगी को ही भगवन् का गीत बना दो। मरने वक्त दीपक तुम्हें क्या उजाला करेगा? हृदय में हरि ज्ञान प्रदीप अभी जला दो।

कृष्ण त्वदीय पद पंकज पञ्जरान्ते, अद्यैव मेविशतु मानस राजहंसः। प्राण प्रयाण समये कफ़ वात पित्तैः; कण्ठावरोधन विधौ स्मरणं कुतस्ते॥

हे भगवान् कृष्ण! आपके चरणकमल के पिंजड़े में मेरा मन रूपी राजहंस आज ही बैठ जावे क्योंकि प्राण त्यागते समय कफ़ वात और पित्त से कण्ठ रुक जायेगा और हमें इस कारण आपका स्मरण कैसे हो सकेगा।

पतितः पशुरपि कूपे निःसर्तु चरण चलनं कुरुते।

धिक्त्या चित्तभवाब्धे रिच्छामपि नोविभर्षिनिःसर्तुम्॥

कुएं में गिरा हुआ पशु भी वहाँ से निकलने को पैरों को चलाते हैं, परन्तु हे मन, तू उस संसार से मिलने की इच्छा तक नहीं करता, इसलिये तुझे धिक्कार है।


परमहंस रामकृष्ण जी के उपदेश!

पानी पड़ते ही मिट्टी गल जाती है किन्तु पत्थर ज्यों का त्यों बना रहता है। दुर्बल श्रद्धा वाले मनुष्य दुःखों में घबरा जाते हैं किन्तु परमात्मा पर विश्वास करने वाला पत्थर की तरह अविचल बना रहता है। पटरी पर चलने वाला इंजन, लोहे व पत्थर से भरे हुए अनेकों डिब्बों को खींचता हुआ दौड़ता रहता है। धर्म मार्ग पर चलने वाला अनेक साँसारिक मनुष्यों को अपने साथ पार करता जाता है।

बच्चे एक खम्भे को पकड़ कर उसके चारों ओर घूमते रहते हैं, किन्तु गिरते नहीं। इसी तरह ईश्वर का अवलम्ब रख कर मनुष्य साँसारिक कर्म करता हुआ भी पतित नहीं होता।

फटे-पुराने जूते और कपड़े पहनने से नम्रता के विचार उत्पन्न होते हैं और कोट-बूट पहनने से अभिमान पैदा होता है। चिकन का कुर्ता और पल्लेदार टोपी पहन कर गज़लें गाने की सूझती है तो गेरुआ वस्त्र पहन कर वैराग्य के विचार उठते हैं। वस्त्र निर्जीव हैं फिर भी उनकी श्रेणी के अनुसार विचार उत्पन्न होते हैं। सादगी पसन्द लोगों को सादे वस्त्र पहनने चाहिये।

सूर्य प्रकाश सब जगह एक समान पड़ता है परन्तु पानी या शीशे जैसे स्वच्छ पदार्थों पर ही, उसका प्रतिबिम्ब पड़ता है, इसी प्रकार का ईश्वर प्रकाश सर्वत्र सामने है, किन्तु वह दिखाई पवित्र आत्माओं में ही देता है।

कचौड़ियाँ बाहर से तो आटे की होती हैं, किन्तु भीतर मसाला भरा होता है, उनकी अच्छाई, बुराई भीतर के मसाले से देखी जाती है, इसी प्रकार सब मनुष्यों के शरीर तो प्रायः एक से ही होते हैं, परन्तु हृदयों में अन्तर होता है, इसी अन्तर के कारण भले और बुरे, की पहचान की जाती है।


सच्चा प्रेम-सुख का मूल

(स्वामी विवेकानन्द जी)

सच्चे प्रेम से दुःख की उत्पत्ति हो ही नहीं सकती। सच्चा प्रेम करने वाले को, अथवा जिस वस्तु पर उसका प्रेम है उसको, प्रेम से दुःख होना सर्वथा असम्भव है। फिर प्रेम करने वाला और उसका प्रेम-विषय हर घड़ी दुःख में डूबे हुए क्यों दिखाई देते हैं? इसके उत्तर में हम एक उदाहरण उपस्थित करते हैं जो संसार में सब जगह पाया जाता है। एक पुरुष का एक स्त्री पर प्रेम होता है। यहाँ तक कि ध्यान में, मन में स्वप्न में उसे छोड़कर और कुछ दीखता ही नहीं। क्या यह स्वर्गीय प्रेम है? जरा ठहरिये और प्रेम का शास्त्रीय पृथक्करण हमें करने दीजिये, तब आपको इसका सच्चा स्वरूप मालूम होगा। उसकी इच्छा रहती है कि वह स्त्री सदैव मेरे पास ही रहे, पास ही खड़ी रहे, पास ही खावें-पीवे, मतलब यह है कि उसे करीब-करीब इसका गुलाम ही बन कर रहना चाहिये। मानव स्वतंत्र रीति से उसे और कार्य ही नहीं है। उसके मुँह से निकलने वाला प्रत्येक शब्द यह स्वीकार करता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि उसे स्वयं अपना गुलाम बना कर वह स्वयं भी उसका गुलाम बनता है। अब आप ही सोचिये, इन दो गुलामों के प्रेम का सच्चा स्वरूप चिरस्थायी कहाँ तक हो सकता है? यदि वह स्त्री कहीं क्षणभर के लिये कहीं बाहर जाती है तो यह स्वयं अपने मन में उल्टे सवाल विचार लाकर अपने को दुःखी कर लेता है। मित्रों सच्चे प्रेम का यह स्वरूप नहीं है।

इन्द्रियजन्य सुख की अभिलाषा से पागल होने वाले मनुष्य की यह एक लहर मात्र है। यदि स्वयं उसके कहने के अनुसार कोई बात करने से इन्कार करती है तो बस इसका मन बिगड़ते देर नहीं लगती। जिस जगह दुःख की उत्पत्ति होती हुई देखी जाती है वह सच्चा प्रेम ही नहीं है। वास्तव में वह और ही कुछ है।


दत्तात्रेय के 24 गुरु

सिद्ध योगियों के अधिराज महर्षि दत्तात्रेय को बहुत बड़ी मात्रा में ज्ञान की आवश्यकता थी। वे मनोविज्ञान शास्त्र के धुरन्धर पंडित थे, इसलिये जानते थे कि किसी भी ज्ञान को जान लेने मात्र से वह मन की गहरी भूमिका में उतर कर संस्कारों का रूप धारण नहीं कर सकता। एक-एक पैसे में बिकने वाली पोथियों में सत्य बोलो! धर्म का आचरण करो, लिखा होता है परन्तु इससे कौन सत्यवादी बन गया है? किसने धर्मात्मा का पद पाया है? मन को सच्ची शिक्षा देने के लिये अनेक साधनों की आवश्यकता होती है, इनमें सबसे बड़ा साधन गुरु है। गुरु के बिना ज्ञान नहीं हो सकता। दत्तात्रेय विचार करने लगे-किसे गुरु बनाना चाहिए? वे बहुत से योगी संन्यासियों को जानते थे, अनेक विद्वानों से उनका परिचय था, सैंकड़ों सिद्ध उनके मित्र थे। तीनों लोकों में एक भी तत्वदर्शी ऐसा न था, जो उन्हें जानता न हो और यदि वे उससे ज्ञान सीखने जाते, तो मना कर देने की क्षमता रखता हो। इनमें से किसके पास ज्ञान पाने जावें, इस प्रश्न पर बहुत दिनों तक वे सोचते रहे, पर कोई ठीक निर्णय न कर सके। वे सर्वगुण सम्पन्न गुरु से दीक्षा लेना चाहते थे, पर वैसा कहीं भी कोई उन्हें दिखाई न पड़ रहा था। मनुष्य-शरीर त्रुटियों का भण्डार है। जिसे देखिये, उसमें कुछ न कुछ त्रुटि मिल जायेगी। पूर्णतः निर्दोष तो परमात्मा है। जीवित मनुष्य ऐसा नहीं देखा जाता।

दत्तात्रेय जब सर्वगुण सम्पन्न गुरु न चुन सके तो उनके हृदयाकाश में आकाशवाणी हुई। मन को आत्मा का दिव्य संदेश आया कि ऋषि, मूर्ख मत बनो! पूर्णतः निर्दोष और पूर्ण ज्ञानवान व्यक्ति तुम तीनों लोकों में ढूँढ़ नहीं सकते, इसलिये अपने में सच्चा शिष्यत्व पैदा करो। जिज्ञासा, श्रद्धा और विश्वास से अपने हृदय में पात्रता उत्पन्न करो, फिर तुम्हें गुरुओं का अभाव न रहेगा। दत्तात्रेय के नेत्र खुल गये, उनकी सारी समस्या हल हो गई। ज्ञान-लाभ करने का जो एक मात्र रहस्य है, वह उन्हें आकाशवाणी ने अनायास ही समझा दिया।

ऋषि का मस्तक श्रद्धा से नत हो गया। उन्होंने दूसरों के अवगुणों को देखना बन्द कर दिया और ज्ञान एवं पवित्रता की दृष्टि से ही संसार को देखने लगे। शिष्य की भावना उनके मानस-लोक में लहलहाने लगी। उन्हें गुरुओं के तलाश करने में जो कठिनाई प्रतीत हो रही थी, वह अब बिलकुल न रही। अपना मनोरथ पूरा करने के लिये-ज्ञान लाभ की इच्छा से वे उत्तर दिशा की ओर चल दिये।

घर से निकलते ही उन्होंने देखा कि अन्तरिक्ष तक विशाल भूमण्डल फैला हुआ है। वे सोचने लगे, यह पृथ्वी माता कितनी क्षमाशील है। स्वयं पद-दलित होती हुई भी समस्त जीव-जन्तुओं को सब प्रकार की सुविधाएं देती रहती है, ऐसी परोप कारिणी पृथ्वी मेरी गुरु है। इससे मैंने क्षमा का गुण सीखा। हे पृथ्वी! मैं तुझे नमस्कार करता हूँ, तेरा शिष्य हूँ।

आगे चलकर उन्होंने पर्वत देखा। वह अपने प्रदेश में अनेक प्रकार के वृक्ष, धातुएं, रत्न, नदी-नद उत्पन्न करता था और उस समस्त उत्पादन को लोक-सेवा के लिये निःस्वार्थ भाव से दूसरों को दे देता था। ऐसे उदार, परोपकारी से उपकार का गुण सीखते हुए ऋषि ने उसे भी अपना गुरु बना लिया।

कुछ दूर और चलने पर उन्हें एक विशाल वृक्ष दिखाई पड़ा। यह वृक्ष धूप, शीत को सहन करता हुआ एकाग्र भाव से खड़ा था और अपनी छाया में असंख्य प्राणियों को आश्रय दे रहा था।

पत्थर मारने वालों को फल देना इसका स्वभाव था। ऋषि ने कहा- हे उदार वृक्ष, तू धन्य है! मैं तुझे गुरु बनाता हुआ प्रणाम करता हूँ।

वृक्ष को छोड़कर आगे चले, तो शीतल सुगन्धित वायु ने उनका ध्यान आकर्षित किया। वे सोचने लगे-यह पवन क्षण भर भी बिना विश्राम लिये प्राणियों की जीवन-यात्रा के लिये बहता रहता है। अपने पोषक द्रव्य उन्हें देता है और उनकी दुर्गन्धियों को अपने में ले लेता हैं इसी के आधार पर समस्त जीव जीवित हैं, तो भी यह कितना निरभिमान और कर्त्तव्य-परायण है। ऋषि ने शिष्य-भाव से वायु को भी नमस्कार किया।

आकाश, जल और अग्नि की उपयोगिता पर उन्होंने ध्यान दिया, तो उनके मन में बड़ी श्रद्धा उपजी। यह तत्व जड़ होते हुए भी चैतन्य मनुष्य की अपेक्षा कितने तपस्वी, कर्मवीर, परोपकारी और त्यागी है। इनका जीवन एकमात्र उपकार के लिये ही तो लगा हुआ है। दत्तात्रेय ने इन तीनों को भी गुरु बना लिया।

अब उनकी निगाह सूर्य और चन्द्रमा पर गई। यह अपने प्रकाश से विश्व की कितनी आवश्यकताएं पूर्ण करते हैं। बेचारे स्वयं दिन-रात घूम-घूम कर दूसरों के लिये प्रकाश, गर्मी और शीतलता जैसी अमूल्य वस्तुएं उनके स्थानों पर ही बाँटते रहते हैं। वे इस बात की भी प्रतीक्षा नहीं करते कि कोई हमारे पास हमारी सम्पदा को माँगने आवे, तब उसे दान दें। बिना माँगे ही उनका अक्षय सदावर्त सबके घर पर पहुँचता रहता है। ऋषि ने उन्हें भी अपना गुरु मान लिया।

पृथ्वी, पर्वत, वृक्ष, वायु, अग्नि, जल, आकाश, सूर्य और चन्द्र को गुरु बनाने के बाद वे एक स्थान पर बैठ कर सुस्ता रहे थे कि उन्होंने देखा, सामने एक पेड़ की डाल पर एक चिड़िया अपने बच्चों की मृत्यु से दुःखी होकर प्राण त्याग रही है। जब वह मर गई, तो उसके पति ने भी प्राण त्याग दिये। ऋषि ने सोचा कि साँसारिक पदार्थों पर, धन-संतान पर अत्यधिक मोह करने का परिणाम मृत्यु जैसी वेदना को सहन करना है। उन्हें लगता कि मृत पक्षी मुझे उपदेश कर रहे हैं कि- “संसार के प्रति अपना कर्त्तव्य पालन करना चाहिए, पर उससे झूठा ममत्व बाँध लेने पर बड़ी दुर्गति होती है।” ऋषि ने उस होला नामक पक्षी की शिक्षा स्वीकार की और उस मृतक पक्षी को गुरु बना लिया। पक्षी की दीक्षा पर वे मनन कर रहे थे कि पास के बिल में एक अजगर सर्प बैठा हुआ दिखाई दिया। वह भारी शरीर के कारण अधिक दौड़-धूप करने में असमर्थ था, इसलिए उसे अक्सर भूखा रहना पड़ता था। जो कुछ थोड़ा-बहुत मिल जाता, उसी से सन्तोष कर लेता अजगर की ओर ध्यान से देखा तो दत्तात्रेय के मन में ऐसे विचार उठे-मानो यह मेरी ओर मुँह करके कह रहा है कि परिस्थितियों के कारण जब हम असमर्थ हों, तो थोड़े में ही संतोष कर लें और न मिलने वाली वस्तु के लिये दुःख करें। दत्तात्रेय ने उसे भी गुरु-भाव से अभिवादन किया।

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Quotation

ईश्वर और उनके नियम भिन्न नहीं है। कोई किसी को छोड़ता नहीं, न ईश्वर किसी को छोड़ता है। दोनों एक वस्तु है। एक विचार हमें कठोर बनाता है, दूसरा नम्र। संसार में कोई न कोई अपूर्व चेतन मय शक्ति काम कर रही है। उसे आप चाहे जिस नाम से पुकारें, लेकिन वह प्रत्येक काम में हस्तक्षेप तो किया ही करती है। हमारा प्रत्येक विचार कर्म है। कर्म का फल होता है। फल ईश्वरीय नियम के अधीन है। यानी हमारे प्रत्येक काम में ईश्वरीय सत्ता नियम हस्तक्षेप किया करता है। फिर भले हम इसको जानते हों या अनजाने हों। स्वीकार करें या अस्वीकार।


संतोषी सदा सुखी

(श्री प्रेम नारायण शर्मा गिरदावर कानून गो, अम्वाह)

एक राजा को इस बात से बड़ा दुःख था कि उसके अपार सम्पत्ति और पुत्रादि होते हुए भी उसको सुख नहीं मिलता था। अतएव उसने अपने प्रधान मंत्री से पूछा कि क्या अपने राज्य में कोई ऐसा भी मनुष्य है जो सुखी हो? अगर हो तो उसे दरबार में उपस्थित किया जाय।

मंत्री जी यह आज्ञा पाकर सुखी मनुष्य ढूँढ़ने को निकले। एक स्थान पर देखते हैं, कि एक मनुष्य हाथी पर सवार है, अच्छे-अच्छे वस्त्राभूषण पहिने हुए है, उसके चारों तरफ बाजे बज रहे हैं और अनेकों पुरुष उसके साथ हाथी घोड़ों पर सवार आनन्द से जा रहे हैं, प्रधान जी यह सब देखकर बड़े प्रसन्न हुए और सोचा कि यह मनुष्य सुखी मालूम होता है इसको कल महाराज के पास ले चलेंगे। ऐसा विचार कर पीछे हो लिये और उसके घर पहुँचे जहाँ पर अनेकों दीप प्रकाश कर रहे थे, स्त्रियाँ मंगल गीत गा रहीं थी, रात को वहीं ठहरे। सुबह क्या देखते हैं, कि जो मनुष्य एक हाथी पर सवार बड़ा प्रसन्न चित्त बैठा था, आज बहुत उदास है और अपने पास बैठे हुए मनुष्यों से कह रहा है कि इस विवाह में मैं बहुत ऋणी हो गया। अब कैसे होगा। प्रधान जी यह देखकर वहाँ से चल दिये।

एक स्थान पर क्या देखते हैं, कि एक बड़े हृष्ट-पुष्ट महात्मा जटा रखाए बैठे हुए माला जप रहे हैं, प्रधान जी ने इनको देख कर सोचा कि यह सुखी मालूम होते हैं, इनको महाराज के पास ले चलेंगे वहाँ खड़े विचार करने लगे। इतने में दो साधु आए जो महात्माजी के चेले प्रतीत होते थे। दोनों आकर महात्माजी के पास लड़ने लगे कि महाराज इसने आपकी बिना आज्ञा बाजार में मिठाई खाई, दूसरा कहने लगा महाराज यह आटा कम लाया, और पैसे बचा लिये, महात्मा जी यह बातें सुन के बड़े दुखित हुए। प्रधान जी वहाँ से भी चल दिये।

एक स्थान पर क्या देखते हैं कि एक बहुत छोटा सा घर है और घर के सामने एक सुन्दर गाय बंधी हुई घास खा रही है। प्रधान जी उस गाय को देख रहे थे कि इतने में एक मनुष्य ने सिर पर रखा घास का गट्ठा घर के भीतर रखा, बैलों को बाँधा और इनके पास आकर हाथ जोड़कर बोला, महाराज आप कौन हैं? कहाँ से पधारे हैं? और क्या आज्ञा है? प्रधान जी बोले हम परदेशी हैं और आज यहाँ ठहरना चाहते हैं, उस मनुष्य ने कहा अहोभाग्य, आप ठहरिये और कह कर भीतर गया और एक छोटी सी खाट और बोरी लाकर बिछा दी। प्रधान जी बैठ गए।

प्रधान जी- तुम्हारा नाम क्या है और तुम्हारा जीवन किस प्रकार व्यतीत होता है?

किसान- महाराज, मेरा नाम संतोषी है, यह मेरा छोटा सा घर है, मेरी स्त्री है और एक पुत्र है, 12 बीघा खेती है। यह एक गाय है, यही मेरी गृहस्थी है। इसी से भगवान जीविका चलाते हैं, दोनों समय आनन्द से भोजन करते हैं, समय पर जमींदार का पोता दे देते हैं। महाराज हमारे पास द्रव्य तो है नहीं, परन्तु हम को किसी का कुछ देना भी नहीं है, और न हमें कुछ चाहिए भी, जो कुछ भगवान ने दिया है, हमारे लिये सब कुछ है।

प्रधान जी रात को वहाँ ठहरे प्रातःकाल उस मनुष्य को लेकर दरबार में उपस्थित हुए।

महाराज- क्या सुखी मनुष्य मिला?

प्रधान जी- हाँ महाराज उपस्थित है। महाराज एक किसान को देख कर बोले क्या यह सुखी है? प्रधान जी ने उत्तर दिया हाँ महाराज! इसी से पूछिये, यह स्वयं सब बता देगा।

महाराज से संतोषी ने वही अपना हाल जो उसने प्रधान जी से कहा था, कह दिया। प्रधान मंत्री ने भी अपनी खोज का सारा हाल कहा। महाराज उनकी बातें सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और कहा वास्तव में संतोषी ही सदा सुखी है।


सूर्य की जीवनदात्री शक्ति

प्राणियों को जीवन और आरोग्य प्रदान करके उनके रोग और अंधकार को दूर करने की जितनी शक्ति सूर्य में हैं, उतनी संसार भर के समस्त आरोग्यप्रद पदार्थों को मिला देने से भी नहीं हो सकती। भारतीय तत्वदर्शी इस रहस्य को अतीतकाल से जानते हैं, अतएव उन्होंने सूर्य को भगवान माना है और अपने दैनिक कार्यों एवं धार्मिक विधान में सूर्य के सम्मुख रहने, उससे शक्ति प्राप्त करने की उत्तम व्यवस्था की है।

वैज्ञानिक खोजों ने सूर्य की अद्भुत शक्ति को एक स्वर से स्वीकार किया है। सर्वप्रथम विज्ञान-वेत्ता नौर्मन डेवी ने अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अपने महत्वपूर्ण अनुसंधानों के पश्चात् यह घोषित किया था कि “सूर्य से बढ़ कर रोगों को दूर करने वाला और कोई चिकित्सक नहीं है। सूर्य रश्मियों की समता संसार की कोई औषधि नहीं कर सकती, करोड़ों बीमारियों को बहुत ही शीघ्र दूर कर देना सूर्य शक्ति के अर्न्तगत ही हो सकता है।”

एक दूसरे आधुनिक अन्वेषक ने निर्विवाद-रूप से इस बात को मान लिया है, कि रोग कीटों को नष्ट करने की सूर्य किरणों में प्रचंड शक्ति है। कृमिनाशक, जर्मीसाइड (Germicide) या फनायल आदि किसी वस्तु में वैसा गुण नहीं है।

सर आलिवर लाज इस बात पर आश्चर्य प्रकट करते हैं, कि लोग स्वास्थ्य की उन्नति के लिए अनेक भोज्य पदार्थों, औषधियों और विशिष्ट क्रिया की खोज तो करते हैं, किन्तु सूर्य की किरणें जो आरोग्यता की अद्वितीय शक्ति रखती हैं और मुफ्त मिलती हैं, उन्हें न जाने क्यों नहीं अपनाते?

इंग्लैंड के मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट सर हेनरी गौवेन अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं, कि जिन लोगों को सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता या कम मिलता है, अधिकाँश वे ही लोग पागल, दुष्टकर्मा, अपाहिज, अशक्त और बीमार रहते हैं। मृत्यु रजिस्टरों की रिपोर्ट इस बात की साक्षी है, कि जिस ऋतु में कुहरा अधिक रहता है और सूर्य की किरणें पृथ्वी पर कम आती हैं, उन दिनों में मृत्यु संख्या अधिक बढ़ जाती है। सबसे अधिक अंधेरा सूर्योदय से कुछ घड़ी पहले रहता है, इसलिए उसी समय बहुत बड़ी संख्या में रोगियों का महाप्रयाण होता है।

टाइम्स के सन् 1923 के 18 अप्रैल के अंक में उसका मेडीकल रिपोर्टर लिखता है, कि इस वर्ष इंग्लैंड और वेल्स में मृत्यु संख्या का अनुपात 1.21 रहा। इतनी कम मृत्युएं आज तक कभी इस देश में नहीं हुई थी। कारण यह है कि इस साल सूर्य का प्रकाश हमारे देश को प्रचुर परिमाण में प्राप्त हुआ, जो कि निश्चित रूप से रोगों को दूर करने वाला और जीवनी शक्ति को बढ़ाने वाला है।

तपेदिक की बीमारी-क्षय के सम्बंध में हैलिंग द्वीप के सैंडी वाइंट स्थान में बहुत अन्वेषण हुआ है और वहाँ बड़े-बड़े शरीर शास्त्रियों ने इस सम्बंध में गहरी खोजें की हैं, इस सब का विस्तृत विवरण श्री सी. ई. लोरेन्स ने एक पुस्तक में प्रकाशित किया है, वे कहते हैं कि- ‘यह प्रभाव प्रत्यक्ष देख लिया गया है, कि सूर्य की किरणों के प्रयोग से बीमारों के फेफड़े की सूजन कम हो जाती है और भीतर की क्षय के कीटाणु धूप लेने के बाद बहुत घट जाते हैं। इसी प्रकार जो अनेकानेक परिवर्तन होते हैं, उनका कारण अल्ट्रा वायलेट (द्यह्लह्ड्ड कद्बशद्यद्गह्ल) किरणें ही नहीं, वरन् धूप के अन्य तत्व भी हैं, जिनका अनुसंधान अभी किया ही जा रहा है।

डाँक्टर मेवरिन ने इस बात को प्रमाणित किया है, कि बच्चे की हड्डियाँ टेढ़ी हो जाने का रोग (Ricket) सूर्य का प्रकाश पर्याप्त न मिलने के कारण होता है और जब इन रोगी बच्चों को धूप की समुचित व्यवस्था कर दी जाती है, तो वह बीमारी अच्छी हो जाती है।

वेद कहता है, कि सूर्य संसार की आत्मा है। भौतिक विज्ञान, इस सूत्र के एक-एक पद पर महाभाष्य रच रहा है। विश्व के समस्त तत्वज्ञ एक स्वर से घोषित करते हैं, सूर्य से बढ़ कर कोई डॉक्टर नहीं। किन्तु हाय, अज्ञानी मनुष्य अब भी सभ्यता के नाम पर धूप का सेवन करना नहीं चाहते और खोये हुए स्वास्थ्य को सुधारने के लिए सद्वैद्य सूर्य से बच कर इधर-उधर टक्करें खाते फिरते हैं। प्रभु, इस अज्ञान को शीघ्र दूर करें।


सतयुग आ गया

(महात्मा सच्चे बाबाजी, धौलपुर)

कलियुग समाप्ति और सतयुग के आरंभ के संबन्ध में स्थूल दृष्टि से देखने पर काम न चलेगा वरन् इस सम्बंध में सूक्ष्म तत्वों पर दृष्टिपात करना पड़ेगा। इसके लिये इस चतुर्युगी पर विचार करना पर्याप्त न होगा, बल्कि और भी पीछे का हिसाब देखना होगा। इस समय श्री स्वेतबाराह्कल्प चल रहा है, इसमें 6 मन्वन्तर और 28 चतुर्भुजी बीत चुकी। 72 चतुर्युगी का एक मन्वन्तर होता है, इस प्रकार 6 मन्वन्तरों में 432 चतुर्युगी और इस सातवें वैवस्वत मन्वन्तर में 28 चतुर्युगी, इस प्रकार वर्तमान कल्प में 460 चतुर्युगी व्यतीत हो चुकी।

जिस प्रकार ऋतुओं के परिवर्तन तथा प्रातः मध्याह्न, सन्ध्या और रात्रि आदि के समय पृथ्वी का निकटवर्ती वातावरण बदलता रहता है उसी प्रकार सूर्यमण्डल में ईश्वरेच्छा से युगों का वातावरण परिवर्तित होता रहता है। अदृश्य लोकों में सत, रज, तम में से जिनकी न्यूनाधिकता होती रहती है उसी के अनुसार युगों का आविर्भाव होता है। यद्यपि युगों की अवधि निर्धारित है तो भी प्रकृति जड़ होने के कारण वह चैतन्य सत्ता द्वारा शासित है। अतएव जब कोई दिव्य चेतना में जागृत आत्माएं उसमें परिवर्तन करना चाहती हैं तो कर लेती हैं। बीच-बीच में यह समय घट-बढ़ जाता है पर कल्प का पूरा हिसाब अन्ततः ठीक ही बैठता है। सत् के कारण 17 लाख 28 हजार वर्ष सतयुग, सत् रज के कारण 12 लाख 96 हजार वर्ष त्रेता, रज तम् के कारण 8 लाख 64 हजार वर्ष द्वापर एवं तम् के कारण 4 लाख 32 हजार वर्ष कलियुग होता है। कई बार उच्च योग्यताओं में जागृत आत्माएं जब अवतीर्ण होती हैं तो युग धर्म को हराकर अपनी इच्छानुसार नवीन वातावरण भी बना डालती हैं। स्वायम्भूमन्वन्तर के त्रेता युग में राम ने अवतार लेकर उस समय सतयुग की ही सृष्टि कर दी थी द्वापर का कृष्णावतार बीच में ही सतयुग को बहुत दिनों तक प्रकट करने में समर्थ हुआ है।

इसी प्रकार कुछ तम् प्रधान आत्माएं भी समय पर अवतीर्ण हुई हैं। रावण, कुम्भकरण, मेघनाद, सरीखी तामसी चेतनाओं ने त्रेता में कलियुग उपस्थित कर दिया। कई बार तो वृत्तासुर, त्रिपुर आदि तामसी आत्माएं लगातार कई चौकड़ी तक तम का ही वातावरण बनाये रही हैं और अविचल रूप से कलिकाल छाया रहा है।

उच्च कोटि की, ईश्वरीय सत्ता में जागृत आत्माएं अपने निजी अनुभव से बताती हैं कि इन 462 चतुर्युगियों 68 करोड़ वर्ष तम में व्यतीत हो चुके हैं चतुर्युगियों 42 करोड़ वर्ष तम में व्यतीत हो चुके हैं जबकि एक कल्प में 42 करोड़ वर्ष ही तम रहना चाहिये अभी लगभग आधा कल्प व्यतीत होता है, पर पूरे कल्प में रहने वाले तम की अपेक्षा भी कुछ काल अधिक व्यतीत हो गया। अब और अधिक समय तम में व्यतीत होना किसी प्रकार वाँछनीय नहीं है। योग दृष्टि से देखने पर विदित होता है कि अदृश्य जगत् में दिव्य आत्माएं इस बात के लिए प्रबल प्रयत्न कर रही हैं कि अब तम को अधिक स्थान न मिलना चाहिये। तदनुसार युगान्तर आरंभ हो रहा है। पिछले कुछ वर्षों से तम की समाप्ति और सत् का आगमन आरम्भ हो गया है और यह कार्य बहुत जल्द पूरा होने वाला है। अब वह युग दूर नहीं है जिसमें सत् का साम्राज्य होगा। वह सतयुग आरम्भ हो गया है, उसका पूरा-पूरा अधिकार होने में कुछ समय भले ही लगे, पर अब सतयुग में का आगमन निश्चित है।


मन चंगा तो कठौती में गंगा

शरीर सा प्रदोष या निर्दोष होना, स्वस्थ या रोगी होना मन के ऊपर निर्भर है, क्योंकि वस्तुतः शरीर पर मन का ही शासन है। जिस प्रकार शासक को पराजित किये बिना कोई शत्रु राज्य पर अधिकार नहीं कर सकता। उसी प्रकार मन के परास्त हुए बिना दुःख शोकों का आगमन शरीर में नहीं हो सकता। इस सुदृढ़ दुर्ग की सब दीवारें अभेद्य हैं, आवागमन का केवल वही एक द्वार है, जिस का प्रहरी मन है। मन जब तक अपना दरवाजा न खोल दे कहीं से कोई वस्तु इस शरीर में आ जा नहीं सकती।

यह समझना भ्रम है कि शरीर पर मन का कोई विशेष अधिकार नहीं होता। हम रोज देखते हैं, कि मनोभावों की प्रतिक्रिया तत्क्षण शरीर के ऊपर होती है। एक समाचार को सुन कर दिल धड़कने लगता है, तो दूसरे को सुन कर उसकी गति मन्द पड़ जाती है। प्रेम और आशा की भावनाओं से चेहरा दमकने लगता है, भय से रक्त का अवरोध होता है, घृणा से सिर चकरा जाता है, क्रोध से रक्त सूखता है, लोभ से मन्दाग्नि पैदा होती है और कामुकता के विचारों से क्षयी तक उत्पन्न हो जाती है। इससे सिद्ध होता है कि आत्मा और शरीर का सम्बंध सूत्र मन ही है और मन की स्वस्थता अस्वस्थता से शारीरिक प्रत्यक्ष परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।

कहा जाता है कि आहार के अनुसार शरीर बनता है। हमारा मत है कि मन के अनुसार शरीर बनता है। अमुक वस्तु बहुमूल्य है, अमुक श्रेणी के विटामिनों से युक्त है, इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि यह पदार्थ शरीर को लाभ ही पहुँचावेगा। कई मनुष्यों को दूध से घृणा हो जाती है, यदि वे एक बूँद भी दूध पी लें तो उलटी हुए बिना न रहेगी। डॉक्टरी मतानुसार अण्डा एक पौष्टिक भोजन है, किन्तु एक धार्मिक मनोवृत्ति के हिन्दू को अण्डा खिला दिया जाए तो वह बीमार हुए बिना न रहेगा। मछली का तेल किन्हीं के लिए टॉनिक हो सकता है, परन्तु कोई ऐसे भी होते हैं, जिन्हें उसकी गंध मात्र उलटी करा देने के लिए काफी है। इसका तात्पर्य यह है कि भोजन के गुण, खाने वाले के मनोभावों के सदृश्य होते हैं। क्रोध और शोक के साथ किया हुआ बहुमूल्य भोजन विषैले पदार्थ की तुलना करेगा, किन्तु हंसी खुशी के साथ खाई हुए कोदों की रोटी अंगूरों के रस जैसी बलदायक होगी।

जो लोग स्वस्थ और निरोग रहना चाहते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि इसका मूल केन्द्र मन है। कहा है कि- मन चंगा तो कठौती में गंगा। मन के पवित्र और प्रसन्न होने पर कठौती जैसे क्षुद्र साधन के अंतर्गत गंगा जैसे दुर्लभ तत्व भरे जा सकते हैं, यह कोई कल्पना नहीं, वरन् अक्षरशः सत्य है। अपनी स्थिति के अनुसार जो कुछ भोजन तुम प्राप्त कर सकते हो उसे पवित्रता और प्रसन्नता के साथ खाओ। एक-एक ग्रास के चर्वण के साथ अमृतत्व की भावना करते जाओ। थाली पर हाथ डालते और छोड़ते समय परमात्मा से प्रार्थना करो कि हे प्रभु यह अन्न हमारे लिए कल्याणकारी हो हमें अमृतत्व प्रदान करें। निश्चय ही वह अन्न हमारे लिए उत्तम पौष्टिक पदार्थों के समान बलवर्द्धक सिद्ध होगा।

अपने दैनिक जीवन में मन को ऐसी स्थिति में रखिए कि वह प्रसन्न रहे और निराशा एवं क्षोभ के अन्ध कूप में न गिरने पावे। अपने कार्यों को निर्दोष एवं पवित्र रखिए, जिससे आन्तरिक शान्ति नष्ट न होने पावे। निर्भय और निर्द्वन्द रहिए ताकि रोग शोक आपको देखते ही उल्टे पाँवों लौट जावें कहते हैं कि भूत वहाँ जाते हैं जहाँ उन्हें बुलाया जाता है। इसी प्रकार रोग वहाँ जाते हैं, जहाँ उनका आदर होता है जो रोग की आवभगत नहीं करता यहाँ तक कि उनके आने का विचारक तक मन में नहीं उठने देता, उसके घर ‘तिरस्कृत अतिथि की तरह वे पुनः वहाँ जाने की इच्छा नहीं करते। दुर्गुणों और कुविचारों के लिये अपने मन के कपाट मत खोलिये क्योंकि रोग और शोक इन्हीं का नाम है। आप चाहे कुछ कहते रहें पर हमें दृढ़तापूर्वक यही घोषणा करने दीजिये कि सुविचार ही स्वास्थ्य है, प्रसन्नता की शक्ति है। यदि कोई स्वस्थ रहना चाहता है तो मन को पवित्र और प्रसन्न रखे, क्योंकि मन चंगा तो कठौती में गंगा का सिद्धाँत बिलकुल सत्य है।


बहुत गई थोड़ी रही?

(ले. मंगलचंद भण्डरी ‘मंगल’ अजमेर)

राजा यहाँ बुद्धिमान था, वहाँ वह विचारवान और न्याय वान भी था! प्रजा को अपने प्राणों से अधिक प्यार करता था। उसे अपनी प्रजा के सुख-दुःख का बड़ा ध्यान रहता था। अतः यदा-कदा रात को भी भेष बदल प्रजा की दशा जानने निकल जाता था।

एक दिन कोतवाल को साथ लेकर वह सारे पहर का चक्कर लगा रहा था, कि रास्ते में राजा ने एक मकान में रोशनी जगमगाती हुई देखी। राजा ने सोचा दो बजने आये हैं और अभी तक इसमें से इतनी तेज रोशनी कैसे आ रही है। उसे सन्देह हुआ वह मकान के पास जा आहट लेने लगा। राजा ने एक छेद में से झाँका तो दिखाई दिया कि एक सुन्दर लड़की कह रही है नींद नहीं लेती हूँ, सब कुछ मैं करती हूँ। इतने पर भी मेरी माँ मुझे डाँटती और सारी कमाई भी अपने पास रखती है। इसलिये मैं तो कल ही माँ को जहर दे मार डालूँगी।” इतना कह कर वह लड़की बैठ गई।

राजा को अधिक जानकारी प्राप्त करने का कौतुहल बढ़ा, वह छेद में आँखें लगा कर दीवार के सहारे अधिक सावधानी से खड़ा हो गया। उसने देखा कि एक साधु वेश धारी युवक वहाँ उपस्थित है और कह रहा है कि बाई! मैं भी तुम्हारी ही तरह फंसा हूँ। गुरु जी रात दिन चैन नहीं लेने देते। यहाँ तक आने का अवकाश बड़ी मुश्किल से कभी-कभी निकाल पाता हूँ। कल रात को मैं भी उनका गला घोट दूँगा जिससे मार्ग की सारी बाधा उठ जाय। इसी प्रकार एक तीसरे उपस्थित सज्जन जो देखने में कोई सेठ से प्रतीत होते थे कह रहे थे कि- मेरा लड़का जवान हो चला है। और मेरे मार्ग में रोड़ा अटकाता है, अब उसे जल्लादों के सुपुर्द कर दूँगा, ताकि मेरी राह साफ हो जावे।

तीनों के कथन जब राजा सुन चुका तो उसे बड़ा दुःख हुआ और अपने साथी कोतवाल से पूछने लगा कि- प्रियवर! कोई ऐसा उपाय बताओ जिससे कल तीन व्यक्तियों की हत्या होने से रुक जावे और भविष्य में इनका जीवन सुधर जावे। कोतवाल ने बताया कि- श्रीमन्, यह लोग अपनी मृत्यु को भूल गये हैं, और समझते हैं कि शायद हम सदैव ही जीवित रहेंगे, इसीलिए यह ऐसे कुकर्म करने पर उतारू हैं। इसमें यह सेठ जी तो अपनी पुत्र वधू तक पर पाप दृष्टि रखते हैं, पुत्र के समझाने पर अपना आचरण सुधार कर परलोक साधना में प्रवृत्त होना तो दूर रहा, वरन् अपने इन्द्रिय स्वार्थ पर आत्मज-पुत्र तक का बलिदान करने को तैयार हो गये। इन लोगों को शरीर की नश्वरता का बोध हुए बिना सद्गति प्राप्त नहीं हो सकती।

दूसरे दिन राजा ने एकान्त कमरे में साधु सेठ और वैश्या को बुलाया। राज्य कार्य तो प्रधान मंत्री को सौंप दिया और स्वयं उन तीनों के साथ एकान्त दरबार में जा बैठे। राजा ने वैश्या को आज्ञा की कि गाना गाओ, वैश्या ने गाना गाया पर राजा को वह पसन्द न आया। दूसरा गाना गाने की आज्ञा हुई वह भी पसंद न आया। शाम तक इसी प्रकार गाने होते रहे पर राजा की एक भी पसंद न आया। सब लोग भूखे प्यासे बैठे हुए थे, वैश्या भी थक गई थी, उसने कहा-महाराज! मुझे जितने गाने याद थे वह सब समाप्त हो गये अब बस, एक ही गाना शेष रह गया है। आज्ञा हो तो उसे भी सुना दूँ। राजा ने कहा- सुनाओ। वैश्या ने एक बड़ा मर्मस्पर्शी गाना गया- ‘बहुत गई, थोड़ी रही, यह भी बीती जाय।’ यह गान इतने वेदना भरे स्वर में गाया गया था कि राजा के मुँह से वाह! वाह। निकलने लगी। साधु और सेठ के पत्थर हृदयों पर तो अद्भुत असर पड़ा वे पानी की तरह पिघल पड़े और फूट-फूट कर रोने लगे। स्वयं वैश्या की आँखों से पश्चाताप की अविरल धार बह रही थी।

राजा ने गद्-गद् स्वर से कहा- अज्ञानी मित्रों! मैं तुम्हारी आन्तरिक दशा जान चुका हूँ। रोने से कुछ न होगा। इस पद के महत्व पर ध्यान दो- तुम्हारी आयु बहुत बीत गई है, और थोड़ी सी शेष रह गई है इसके बीतने में भी अब देर नहीं है। यह मनुष्य शरीर बार-बार नहीं मिलता। तुच्छ इन्द्रिय लिप्सा को छोड़ो और धर्म का पालन करो, जिससे तुम्हारा मनुष्य जीवन सफल हो। उन तीनों ही व्यक्तियों ने अपने जीवन की क्षणभंगुरता का अनुभव किया और भविष्य में सदाचार पूर्ण जीवन बिताने की प्रतिज्ञा कर ली।

तीनों जब राज दरबार से विदा हुए तो उन का जीवन दूसरे ही प्रवाह में बह रहा था। उनकी अन्तरात्मा इसी पद को गाती जाती थी-’बहुत गई थोड़ी रही, यह भी बीती जाय।”


Quotation

केवल गीता पाठ मात्र करने के बजाय तुम व्यायाम करते रहो, तो स्वर्ग के निकट पहुँच सकते हो।


भलमनसाहत व्यवहार

जब पोप धर्म गुरु के पद पर चौदहवाँ क्लेमेण्ट आसीन हुआ तो आगन्तुकों ने उसे प्रणाम किया। इसके उत्तर में पोप ने भी उन्हें प्रणाम किया। चर्च के प्रधान कार्य-कर्त्ता ने उनके निकट आकर कहा- जनता के अभिवादन के धर्म को वैसा ही उत्तर नहीं देना चाहिये। पोप ने कहा- ‘लेकिन मुझे धर्म गुरु के आसन पर बैठे हुए इतना समय नहीं हुआ है कि अपने भलमनसाहत के व्यवहार को भी भूल जाऊँ।’

एक बार सेन्ट हेलेना में नेपोलियन दरबारियों सहित कहीं जा रहा था, सामने से एक मजदूर सिर पर भारी बोझा लादे हुए जा रहा था। दरबारी तो अपने पद के रौब से रास्ते में से हटना नहीं चाहते थे। इस पर नेपोलियन ने कहा- ‘बोझ का सम्मान कीजिये। रास्ते में से एक तरफ हट जाइए।’ वास्तव में भलमनसाहत का व्यवहार मनुष्य का एक बड़ा उत्तम गुण है। प्रसन्न चित्त और उदार व्यवहार वाला मनुष्य संसार में जहाँ कहीं भी रहेगा वहीं उसे आदर मिलेगा।

चार्ल्स डिकिन्स शीत काल में फुरसत के वक्त जिन लोगों के यहाँ जा पहुँचा था, वे उसे गरम अंगीठी की तरह घेर कर बैठ जाते थे। महाकवि गेटे जिस होटल में जाता वहाँ के सब लोग भोजन छोड़कर उसके निकट खिसक आते। मिरावो बड़ा ही कुरूप और भद्दी शकल का आदमी था, परन्तु उसके स्वभाव में इतनी भलमनसाहत थी कि सैकड़ों स्वरूप वालों की अपेक्षा उसकी प्रतिष्ठा कहीं अधिक थी। भले मनुष्यों के लिये सब जगह स्थान है। सूर्य के प्रकाश की तरह हर मनुष्य उन का स्वागत करता है। विनम्र व्यक्ति के लिए क्रोधी और कडुए स्वभाव का मनुष्य गरम-नरम हो जाता है शहद के पुते हुए मनुष्य को मधुमक्खियां नहीं काटती।


आत्म-विश्वास

बोबी का यह कथन बिलकुल सत्य है कि “जिन्हें अपने ऊपर विश्वास नहीं, वे चाहे कितने ही बलवान् क्यों न हों, यथार्थ में सबसे निर्बल हैं।” हमें उसी आदमी पर विश्वास करना चाहिए, जो अपने ऊपर विश्वास करता है। जो खुद अपनी योग्यता पर भरोसा नहीं करता, दूसरा कोई उस पर कैसे यकीन कर सकता है?

जब शत्रुओं ने कालोना के स्टीफेन को कैद कर लिया तो उससे कहा- “बताओ, अब तुम्हारा किला कहाँ है?” उसने हृदय पर हाथ रखते हुए उत्तर दिया- “यहाँ”। एक बार एक नाव में सीजर कहीं जा रहा था, रास्ते में तूफान आया और नाव डगमगाने लगी। यह देख कर मल्लाह घबराने लगे। तब सीजर ने कहा था- “घबराओ मत, तुम्हारी नाव में सीजर और उसका भाग्य भी है।” ऐसे ही साहसी वीरों के दुनिया चरण चूमती है, जो संपत्ति और विपत्ति सब दशा में अपने ऊपर विश्वास रखते हैं।

कई मनुष्य नम्रता या विनय के नाम पर अपना आत्म-सम्मान खो देते हैं। विनय का अर्थ यदि अपनी योग्यता प्रकट करने में असमर्थ होना होता हो और नम्रता का अर्थ किसी के सामने नाक रगड़ना हो, तो यह दोनों ही दुर्गुण कहलावेंगे। स्वाभिमानी ही नम्रता का ठीक पालन कर सकते हैं। झूठी खुशामद करने वाले बुजदिलों को भला कौन विनयी कहेगा? दुनिया के पास इतनी फुरसत नहीं है, कि वह हर आदमी की विद्वत्त या योग्यता की जाँच करें। मनुष्य का चुनाव उसके मुँह से बतलाई हुई योग्यता से ही किया जाता है। जो अपने सद्गुणों पर विश्वास करता है और साहसपूर्वक प्रकट करता है, उसी को उपयुक्त मिलता है। कहते हैं कि सोते हुए शेर से भोंकने वाला कुत्ता अधिक अच्छा है।

सेचलिग कहता है- ‘जो मनुष्य जानता है कि मैं क्या हूँ, वह यह भी जान लेगा कि मुझे क्या होना चाहिए।’ माइकेल रेनाल्डस ने कहा है, विश्वास, आचरण का एक मूल्यवान तत्व है विद्वान का कथन है, जो आत्मा का निरादर है, परमात्मा उसका निरादर करता है।


खोज में

(श्री आनन्दकुमार चतुर्वेदी ‘कुमार’ छिबरामऊ)

पथिक! तुम्हें क्या हो गया है? देखो पश्चिम दिशा से काले मेघों के झुँड चले आ रहे हैं, छोटी-छोटी बूंदें भी पड़ रही हैं, चिड़िया वनों को छोड़ कर अपने घोंसलों में आ रही हैं, छोटे-छोटे बच्चे अपने झूलों को उतार कर अपने घर की ओर भाग रहे हैं और तुम प्रस्थान कर रहे हो!

बूँदें जोरों से बरसने लगी हैं, चारों ओर रिमझिम-रिमझिम का शब्द सुनाई देता है, वृक्षों का हिलना बंद हो गया है। प्रकृति में आज एक अनोखी छटा छाई हुई है। पपीहा की पी-पी और कोयल की कू कू किसके मन को आज नहीं लुभा रही है। पथिक चलो थोड़ा विश्राम कर लो।

बालाओं ने अपना गान प्रारंभ कर दिया है, वीणा की ध्वनि से घर गूँज उठा है, घुँघरुओं का स्वर बूँदों के स्वर से मिल कर एक अनोखी लहर का संचार कर रहा है। पथिक! क्या यह तुम्हारे हृदय पर कुछ भी प्रभाव नहीं डालती। आओ, इस समय कहाँ जाओगे।

आह! तुम हँस रहे हो, तुम किस ओर अपनी दृष्टि लगाये हो, तुम्हारी इस मुस्कान में क्या रहस्य छिपा है, क्या यहाँ तुम्हें शान्ति न मिलेगी? तुम मौन क्यों हो?

पथिक जाओ, मगर यह न भूलना कि तुम्हारा मार्ग अत्यंत संकीर्ण है, वह सरिता पानी के कारण वेग से बह रही मार्ग में अनेक सुवासित पुष्प तथा कंटक मिलेंगे, सावधान रहना, क्या ही अच्छा होता, कि तुम कुछ देर विश्राम करते, परन्तु नहीं, तुम तो किसी और ही की खोज में हो।


हिमालय के महापुरुष

हिमालय प्रदेश सच्चे योगी महात्माओं का चिरकाल से खास केन्द्र है। इस पुण्य प्रान्त में जैसे महान् योगी हो चुके हैं वैसे अन्य प्रान्तों में बहुत ही कम हुए हैं। अब भी वहाँ बड़े-बड़े महात्माओं के वर्तमान होने की बात सुनी जाती है। सुना जाता है कि तिब्बत का ज्ञान गंज योगाश्रम योगियों का एक महान शिक्षालय है, जिसमें सैकड़ों महान योगी अब भी वर्तमान हैं। हिमालय में कई योगियों के दर्शन भाग्यवान पुरुषों को हो जाते हैं। स्वामी माधव तीर्थ जी दण्डी गत वर्ष वहाँ गये थे। उन्हें एक महात्मा मिले। आपने उस घटना को काशी के ‘पन्था’ नामक बंगला-पत्र में लिखा है, उसका मर्म इस प्रकार है-

“इस शरीर ने गौरी गिरी की परिक्रमा करने के लिए अक्षय तृतीया के दिन काठगोदाम से यात्रा की। शैल पुत्री तीर्थ का दर्शन करते समय वहाँ भी कतिपय महापुरुषों के दर्शन हुए।

यह शरीर गौरी तीर्थ में जिस पर्वत पर गया, वह हिमाचल प्रदेश का एक उत्कृष्ट स्थान है। स्वयं गौरी ने इस पर्वत पर शिव की आराधना की थी। जगत् में ऐसा कोई कवि या कलाविद पैदा नहीं हुआ, जो हिमाचल के सौंदर्य को व्यक्त कर सके। केवल यह सौंदर्य ही तीर्थ यात्रियों की पथ की सारी क्रान्ति दूर कर देता है।

और भी दो एक पहाड़ी गौरी के दर्शन के लिए जा रहे थे। उनसे मुलाकात होने पर इस शरीर ने पूछा कि यहाँ कोई साधु-महात्मा हैं कि नहीं? अगर हैं तो कहाँ पर? उन लोगों ने उंगली का इशारा करके तीन-चार स्थान दिखा दिये। वे सब प्रायः 3-4 कोस की दूरी पर थे। फिर दिखाकर उन्होंने कहा उस पहाड़ पर कभी-कभी एक महापुरुष आकर रहते हैं। जो स्थान समीप में दिखाया, वह भी बहुत ऊँचा था, परन्तु महापुरुष के दर्शन की आकाँक्षा अत्यन्त बलवती होने के कारण इस शरीर ने उस पहाड़ पर चढ़ना शुरू कर दिया। वहाँ पहुँचने पर महात्मा के दर्शन मात्र से ऐसा मालूम हुआ कि आप कोई महापुरुष हैं, दिव्य दर्शन हैं।

एक छोटी सी गुफा में वे महात्मा पद्मासन लगा कर बैठे थे। नेत्र बंद थे, श्वास भी शायद बंद था। सामने पाँच-छः हाथ की दूरी पर एक सूखा हुआ वृक्ष पृथ्वी पर पड़ा था, उसमें आग लगा दी गई थी। इस शरीर की उपस्थिति की बात शायद महात्मा जी को मालूम नहीं हुई। परन्तु झोला कम्बल रख कर नमो नारायण का उच्चारण करते ही उन्होंने नेत्र खोल कर इस शरीर को देखा और उसी क्षण पुनः नेत्र बन्द कर लिये।

उस समय मध्याह्न का समय प्रायः बीत चुका था। सूर्य देव पश्चिम आकाश में ढल चुके थे। प्रातः काल से पर्वत पर चढ़ते-चढ़ते शरीर भूख, प्यास से क्लाँत हो रहा था। पर्वत पर पहाड़ियों के घर हैं, परन्तु शरीर वहाँ जाने में अशक्त था। झोला, कम्बल वहीं रख कर, झरने में हाथ मुँह धोकर, अंजुली पानी पीते ही शरीर बहुत कुछ स्वस्थ हो गया। कम्बल बिछा कर गुफा के बाहर आसन लगा कर यह शरीर आराम करने लगा। महात्मा जी के यहाँ भोजनादि का कोई बखेड़ा किसी समय नहीं होता, यह बात उनके सामान को, जो वहाँ था देखने से ही मालूम होती थी। अतएव सहज ही धारण हो गई थी कि वे भोजन नहीं करते। दर्शन तो हुए, परन्तु दर्शन का आनन्द नहीं मिला, क्योंकि वे मौन थे।

अन्य दिनों इस शरीर के झोले में चने का सत्तू और गुड़ रहता था। देव संयोग से यह भी आज नहीं था, अतएव यह निश्चित था कि आज भोजनादि की कोई व्यवस्था न हो सकेगी। सोचा सन्ध्या के पहले बस्ती में जाने पर जो होगा सो होगा नारायण का स्मरण करते हुए समीप बैठकर महात्मा के दर्शन करने में समय बिताने लगा उस समय शरीर भूख के मारे व्याकुल था।

जहाँ पर यह शरीर था वहाँ से बहुत दूरी तक दिखाई देता था। घास चरती हुई गाय जिस तरह स्वाभाविक ढंग से घूमती है, उसी तरह घूमती फिरती एक सफेद गाय महात्मा की गुफा के द्वार पर आकर पीछे के दोनों पैरों को थोड़ा फैला कर खड़ी हो गई। उस समय महात्मा ने नेत्र खोल कर मुस्कराते हुए गाय की ओर देखा। गाय के एक थन से खूब बारीक धार से दूध झरने लगा। यह शरीर जैसे मंत्र द्वारा चालित हो, इस तरह अपने आसन से उठ खड़ा हुआ। महात्मा के आसन के पास काठ का एक बड़ा सा पात्र उलट कर रक्खा था। उसे उठा कर उस शरीर ने गाय के थन के नीचे रख दिया, उस समय गाय के चारों थनों से दूध अबाध गति से उस पात्र में झरने लगा। देखते-देखते वह भर गया। प्रायः 4-5 सेर दूध होगा, महात्मा के सामने वह रक्खा गया, इस शरीर के साथ जो जल पात्र था वह भी थन के नीचे रक्खा गया। तब महापुरुष ने ‘माई! माई!’ कह कर दो बार उच्च - स्वर से पुकारा। उसके क्षण भर बाद हवा का शब्द सुनाई पड़ा, मानों दूर से आँधी आती हो। यह शब्द कहाँ से आ रहा है, कुछ समझ में नहीं आया। क्षण भर बाद मालूम हुआ कि महापुरुष की नासिका से श्वास बाहर निकल रहा है। देखते-देखते उनका स्थूल शरीर अत्यन्त कृश हो गया। इसके बाद उन्होंने दूध का पात्र मुँह में लगाया और सारा दूध चढ़ा गये। इस बीच दूसरा पात्र भी भर गया और वे उसे भी खाली कर गये। पुनः उनका पात्र स्तन की नीचे रक्खा गया और दूध से भर जाने पर वे उसे भी पी गये। इस प्रकार दूध के तीन पात्र वे पी गये। अब दोनों पात्रों का दूध पीने के लिये महात्माजी ने इस देह को इशारा किया। आदेश होते ही कमंडल का दूध पी लिया गया महापुरुष के पात्र का भी कुछ दूध पिया गया। पेट में और स्थान न रहा। अपूर्व स्वाद था। दूध के ऐसे माधुर्य रस का अनुभव और कभी नहीं हुआ था। असीम तृप्ति हुई। महात्मा के दर्शन से जो तृप्ति आज हुई, उस से शरीर धारण करना पूर्ण सार्थक हो गया। उनके मुख से निकली हुई कोई बात सुनने को नहीं मिली। बहुत देर तक इस आशा में शरीर बैठा रहा संध्या से पहले वे आसन से उठ कर झरने की ओर गये जहाँ पर यह शरीर था वहाँ से झरने तक अच्छी तरह दिखाई पड़ता था। वहाँ से वे अदृश्य हो गये। किसी ओर दिखाई न पड़े। बहुत खोजने पर भी फिर दर्शन नहीं हुए। संध्या समय बस्ती में जाकर इस शरीर ने आश्रय लिया। दो-तीन दिन और दर्शन की चेष्टा की गई। पर्वतीय लोगों ने कहा बीच-बीच में वे महापुरुष वहाँ आते हैं। कभी-कभी दूसरे पहाड़ पर उनका आसन पड़ता है। जो दर्शन करता है, उसका जीवन धन्य है। नारायण का स्मरण करते हुए बहुत खोज की गई, परन्तु फिर दर्शन नहीं हुए।

-कल्याण


Quotation

करुणा और प्रेम इन्हीं दो शब्दों में धर्म के सारे तत्व निहित है।

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जो तुम से बेर करते हैं, तुम उनसे प्रेम करो, तथा सदाचार से रहो और जो निन्दा करते हैं, उनसे प्रार्थना करो।

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ईश्वर जो कुछ करता है वह बुद्धि से करता है। अपनी इच्छानुसार कोई काम नहीं होता है। यह जानना चाहिए कि जो कुछ होता है, वह अच्छा ही होता है।


स्वरोदय


स्वरोदय

(श्री नारायण प्रसाद तिवारी, ‘उज्ज्वल’)

(गतांक से आगे)

दोहा-

शुक्ल पक्ष है चन्द को, कृष्ण पक्ष रवि केर।

कृष्णपक्ष से तीज तक, रविकी ही तिथि हेर॥

तीन तिथी फिर चन्द की, फेरि तीन रचि मान।

तीन तिथी फिर चंद्रमा, तीन तिथी फिर भान॥

शुक्लपक्ष से तीज तक, तिथी चंद्र की लेख।

ऊपर के परमान सम, जानो बहुत विसेख॥

शुक्लपक्ष की तीज तक, प्रति चंद्र स्वर होय।

पक्ष भरे तक कुशल है, सिद्धि कार्य सब होय॥

कृष्ण पक्ष की तीज तक, सूरज सुर चल जाय।

शुभ कारज उहि पक्षभर, अरु अब कुशल रहाय॥

सोरठा-

चलै जो स्वर विपरीत, हानि दुख भय जानिये।

करिये यह परतीत, पक्ष भरै लौं अशुभ है॥

दोहा-

बुध वृहस्पति शुक्र अरु, सोमवार दिन चार।

चंदा स्वर को जानिये, शुभ कारज निरधार॥

शनि रवि मंगल वार के, जो ये दिन तीन।

सूरज स्वर में जानिये, क्रुर कर्म लौ लीन॥

चंद्र दिनन में चन्द्र स्वर, चलो चही प्रतकाल।

सूरज के स्वर में चले, सूरज स्वर की चाल॥

जो स्वर उलटे चलैं तो, ताको कहौं विशेष।

दुध दिना सूरज चलै, तो विरुद्ध कुछ लेख॥

गुरु वासर रवि स्वर चले, तो कुछ राज चिगार।

शुक्रवार को रवि चल, जिय विपरीत विचार॥

सोरठा-

मन कछु चिंतित होय, सोम जो सूरज स्वर चलै।

अवश हानि कुछ होय; बाये स्वर मंगल दिना॥

दोहा-

शनिवार बहे चंद्र जो जिय उदास कछु जान।

रविवार इडा चलै, कष्ट होय यह मान॥

ढाई घड़ी लौं प्रात ही, स्वर को है परमान।

जो प्रमान स्वर ना चलै, दुःख होय अरु हान॥

प्रात समय नित उठत ही, चलित होय स्वर जोय।

सो पग आगे धर उठे, सिद्ध सब कारज होय॥

चनदा स्वर में दोई पग, सूरज स्वर में तीन।

यहि विधि सगुन विचार नित उठे पुरुष परवीन॥

सोरठा-

गयो चहै जो कोय, पूर्व उत्तर की दिशा।

पूरण कारज होय, जो सूरज स्वर में चलै॥

दोहा-

दक्षिण अरु पश्चिम दिशा, चंदा स्वर में जाय।

तो शुभ कारज जानिये, मन प्रसन्न हुई जाय॥

मेष, सिंह, धन, कुँभ, अरु, मिथुन, तुला षटजान।

सूरज स्वर की लगन ये, क्रुर कर्म हित मान॥

मकर मीन कन्या वृश्चिक, वृष अरु, कर्क विचार।

ये लगनें स्वर चन्द्र को, शुभ कारज निरधार॥

कौनें स्वर में कौन सों, चहिये कारज कीन।

बरणत हूँ संक्षेप मे, गुनिये ह्नै लवलीन॥

चन्द स्वर में कीजिये, चिर कारज शुभ जोय।

चर कारज सिध होत हैं, सूरज स्वर जवै होय॥

सोरठा-

चलत सुखमना होय, हिये में हरि को ध्यान धर।

कारज कछू होय, करत हो होवे हानि दुख॥

स्वरोदय प्रेमियों से निवेदन

कई सज्जनों ने मुझे “स्वर योग से दिव्य ज्ञान” नामी पुस्तक पर अपना संतोषप्रद विचार भेजा है, जिसके लिये गतांक में मैं सश्रम प्रदर्शन कर चुका हूँ तथा उसके बाद भी जो पत्र आये उनको भी मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ।

कई सज्जन कुछ शंका समाधान के लिये पत्र भेजते हैं, तथा उत्तर के लिये टिकट या कार्ड भेजते हैं, मैं निवेदन करता हूँ कि कोई भी सज्जन सहर्ष शंका समाधान के लिये मुझे लिख सकते हैं, चाहे वे टिकट भेजें अथवा न भेजें यथासंभव उत्तर अवश्य दिया जावेगा।

-उज्ज्वल

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दूसरों से भलमनसिह का व्यवहार करने वाला एक चमकता हुआ हीरा है। दुनिया को ऐसे मनुष्यों की जरूरत है, जो अपने सभ्य व्यवहार से द्वेष और कलह की आग बुझा कर प्रेम की शीतल सरिता बहावे।

दूसरों से भलमनसिह का व्यवहार करने वाला एक चमकता हुआ हीरा है। दुनिया को ऐसे मनुष्यों की जरूरत है, जो अपने सभ्य व्यवहार से द्वेष और कलह की आग बुझा कर प्रेम की शीतल सरिता बहावे।


दो सरल प्राणायाम

दिन भर काम करने में शरीर का बहुत सा अंश खर्च हो जाता है और उसे थकावट आ जाती है, खर्च हुए पदार्थों में से कुछ तो स्थूल होते हैं, जो भोजन आदि द्वारा प्राप्त हो जाते हैं; किन्तु कुछ ऐसे होते हैं, जिनका सम्बंध सूक्ष्म लोक से है। यह पदार्थ भोजन से नहीं, वरन् मन की आकर्षण शक्ति द्वारा प्राप्त होते हैं।

कुविचारों और दुर्भावनाओं के कारण माँस पेशियों और नाड़ी संस्थान पर एक प्रकार का तनाव और अनावश्यक खिंचवा पड़ता है, इससे ओर भी अधिक परिमाण में शक्तियों का ह्रास होता है, तदनुसार मनुष्य मृत्यु को निकट खिंचता जाता है। क्रोध आने से भौहें बनी रहती हैं, कपट से चेहरे के भाव दूसरी तरह के बनाने पड़ते हैं। धोखेबाज लोगों के कंठ पर अधिक खिंचाव पड़ने के कारण उनकी वाणी में कर्कशता आ जाती है। धीरे-धीरे यह बाह्य चिन्ह आदत का रूप धारण कर लेते हैं और शरीर में स्थायी अड्डा जमा कर बैठ जाते हैं।

शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के इच्छुकों को चाहिये कि नित्य अपने मन की दुर्भावनाओं को मिटाने और तज्जनित स्नायविक तनाव को दूर करने का प्रयत्न करते रहें। नीचे ऐसे ही दो अभ्यास बताये जाते हैं।

1. शरीर को ढीला और सम स्थिति में रख कर आसन के ऊपर सुखपूर्वक बैठ जाओ। ठोड़ी को थोड़ा सा भीतर की ओर झुकाओ और मुँह बन्द कर लो। पर दांतों को भींच कर मिलाने की जरूरत नहीं हैं। स्थिरतापूर्वक बैठ कर नाक के द्वारा धीरे-धीरे साँस लेना आरंभ करो और जब पूरी साँस खींच लो, तो 5 सेकिंड उसे अन्दर रोको और फिर उसे धीरे-धीरे बाहर निकाल दो। साँस खींचते समय इस प्रकार की भावना करो कि वायु के साथ पवित्र प्राण तत्व हमारे शरीर में प्रवृष्ट हो रहा है। कुँभक करते समय अनुभव करो कि खींची हुई जीवनी शक्ति शरीर के अंग प्रत्यंगों में व्याप्त होकर उन्हीं में घुल रही है। साँस छोड़ते समय मनन करो कि अन्दर के शारीरिक और मानसिक विष बलपूर्वक खींच कर बाहर फेंके जा रहे हैं।

इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिये कि अभ्यास के समय में तनाव कम होता जावे। हर अंग को ढीला-ढाला और विश्राम करने की हालत रखना चाहिए। इससे कुविचारों के कारण अवयवों को तने रहने की जो आदत पड़ जाती है, वह छूटने लगती है और शरीर अनावश्यक शक्ति व्यय करने से बच जाता है। पहला अभ्यास कम से कम 4 सप्ताह करना चाहिए, इसके बाद दूसरे अभ्यास का साधन करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए।

2. पूर्वोक्त शिथिलासन पर बैठ कर दाहिने हाथ की उंगलियों से नाक का बाँया छिद्र बंद करो और फिर दाहिने छेद से धीरे-धीरे साँस खींचो। जब पूरी वायु खींच लो, तो अंगूठे से खुले हुए छेद को भी बन्द कर लो और जितनी देर आसानी से वायु रोक सको भीतर रोके रहो। तदुपरान्त दाहिने छेद को बन्द करके बाँए छेद से धीरे-धीरे साँस निकाल दो। अब कुछ देर बिना साँस के रहो और फिर पहले की तरह साँस खींचने, रोकने और छोड़ने की क्रिया दुहराओ। इस प्रकार पाँच मिनट से आरंभ करके आधे घंटे तक यह प्राणायाम करने का अभ्यास बढ़ाना चाहिये। हर क्रिया के साथ शुद्ध प्राण तत्व खींचने, उसे सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होने और विषैले पदार्थों के बाहर निकल जाने की भावनाओं को क्रमानुसार अवश्य दुहराना चाहिए। इसी प्रकार नाड़ियों को पूर्ण रूप से ढीला रखने का ध्यान रखना चाहिये। इस अभ्यास को लगातार करते रहने से मन में उत्तम गुणों का समावेश होता है और बुराइयाँ हटने लगती हैं।


तुम क्या हो? और क्या होगे?

एक विद्वान का कथन है कि जो अपने को जीव मानता है, वह जीव है और जो अपने को शिव मानता है, वह शिव है। सचमुच हम वैसे ही बन जाते हैं, जैसा कि अपने बारे में सोचते हैं। जो कहता है कि मैं अभागा हूँ, मेरे ऊपर बुरे दिनों का फेर है, दुनिया मेरे विपरीत है, कोई मेरी सहायता नहीं करता। अवश्य ही उसे उन बातों का सामना करना पड़ता है। चाहे आज इन बातों को बढ़ा-चढ़ा कर कहता हो, चाहे आज उस पर वैसी विपत्ति न हो, पर कल जरूर वह सब बात पूर्ण रूप से सत्य होने लगेंगी।

मनोविज्ञान शास्त्र कहता है कि जो बात बार-बार मन में उठती है, वह विश्वास का रूप धारण कर लेती है और विश्वास के आधार पर शरीर एवं मन के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। कहा गया है कि- “शदृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी” जिसके मन में जैसी भावना होती है, वैसी ही सिद्धि मिलती है।

जो मनुष्य अपने ऊपर अविश्वास करते हैं। जिसे अपनी योग्यता और कार्य शक्ति पर विश्वास नहीं वह न तो कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर सकेगा और न उसे कहीं कोई विशेष सफलता मिलेगी। मर जाने के बाद मिट्टी की तरह पड़े रहने वाले शरीर की अपनी निजी शक्ति कुछ भी नहीं है। वह तो चैतन्य सत्ता द्वारा प्रभावित होकर काम करता है। यदि तुम्हारी चैतन्य सत्ता निर्बल है, तो बेचारे मृत पिण्ड शरीर से यह आशा नहीं की जा सकती कि उसके द्वारा किन्हीं महत् कार्यों का सम्पादन होगा।

मानव प्राणियों की बनावटें और शारीरिक ढाँचे आपस में मिलते जुलते हैं, उनमें कोई खास फर्क नहीं होता। फिर क्यों एक दूसरे में जमीन आसमान का अन्तर देखने में आता है? कारण यह है कि एक की मनोभावनाएं दूसरे से भिन्न हैं। एक सी संपत्ति वाले, एक सी विद्या वाले या एक से शरीर वाले दो मनुष्यों में भी बड़ा भारी अन्तर होता है। उनके अपने विश्वास, विचार और स्वभाव जैसे होते हैं, संसार में उनका आदर उसी दृष्टि कोण से होता है। लोग उनका मूल्य उसी हिसाब से आँकते हैं शरीर विचारों का दर्पण है। दुष्ट और साधु, दुराचारी और धर्मनिष्ठ, आलसी और उत्साही, सत्यवक्ता और मिथ्यावादी इन भिन्न स्वभाव के मनुष्यों को पहचानना कुछ भी कठिन नहीं है। उनकी सम्पूर्ण चेष्टाएं और सूक्ष्म आकृतियाँ उसी ढाँचे में ढल जाती हैं। जिसे जरा भी तमीज है, वह आसानी से पहचान सकता है कि कौन मनुष्य क्या है? और उसका कितना मूल्य है। बनावट अधिक समय तक नहीं ठहर सकती। कपड़े और आभूषणों से किसी को माननीय नहीं बनाया जा सकता। गुणवान मनुष्य चाहे वह फटे हुए कपड़े ही क्यों न पहने हो पूजा जायेगा, वह जहाँ जायेगा वहीं अपनी सुगन्ध से लोगों के हृदयों को प्रफुल्लित कर देगा

वे दरिद्र हैं, जो दरिद्रता के विचार करते हैं, उसी प्रकार वे दुष्ट हैं, जो दुष्टता के विचार करते हैं। तुम क्या हो? यदि इस बात को जानना चाहते हो, तो आत्मचिन्तन करके देखो कि तुम कैसे विचार करते हो। जिस प्रकार की इच्छा और आकाँक्षाएं, तुम्हारे मन में उठती रहती हैं, अवश्य ही तुम वह हो। इस समय बाह्य परिस्थितियां दूसरी भले ही हों, पर निकट भविष्य में तुम उसी ढाँचे में ढल जाओगे। विचार साँचे हैं और जीवन गीली मिट्टी, दोनों एक साथ मिले हुए हैं। ऐसा हो नहीं सकता कि साँचे में रखी हुई मिट्टी पर वैसी ही आकृति अंकित न हो जाय। हम देर सबेर में पूर्णतः वैसे ही बन जाते हैं, जैसा कि सोचते हैं। एक विद्वान का कथन है कि यदि मुझे मालूम हो जाय कि तुम क्या सोचते हो, तो मैं बता सकता हूँ कि क्या हो और भविष्य में क्या बन जाओगे

जो जैसा सोचता है वह वैसा ही है या हो जायेगा इसलिये तुम जैसे बनना चाहते हो, वैसे ही विचारों को अपने मस्तिष्क में स्थान देना आरंभ कर दो।


शिखा के लाभ

(वि. रामस्वरुपजी ‘अमर’ तालबेहट)

(4 जून के अंक से आगे)

पुरुषों के क्यों बाल विशेष होते हैं, और स्त्रियों के क्यों कम होते हैं? इस विषय में पाश्चात्य विद्वानों की राय है कि- स्त्री और पुरुष के जीवन में जिस समय युवावस्था का आगमन होता है, उस समय पुरुष शक्ति का विकास मुख, छाती इत्यादि स्थानों से होता है यानी पुरुषों की छाती और मुखादि अंगों पर केश उगने लगते हैं, लेकिन स्त्रियों में इन स्थानों पर बाल का उगना नहीं देखा जाता है। स्त्रियों की शक्ति का विकास मासिक ऋतु धर्म, स्तनों में दुग्धागमन और जरायु की वृद्धि होता है। उनके नाम अंग्रेजी में क्रमशः “केटेबाँलिक” और ‘एजेबाँलिक’ हैं। इन्हीं दोनों भेदों से स्त्री पुरुषों की प्रकृति में विशेष अन्तर पाया जाता है। पुरुष स्वयं क्रियाशील और अपनी सहचरी की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने वाला तथा दूसरों के लिये अपनी शक्ति का ह्रास करने वाला है। लेकिन स्त्रियों में स्वयं क्रियाशीलता नहीं है। वे अपने सहचर के लिये निश्चेष्ट होकर मार्ग प्रतीक्षा करने वाली होती हैं। अपनी शक्ति को वे अन्तःस्थिर ही रखती हैं, पुरुषों में क्रियाशीलता होने से ज्ञान-विज्ञान के विषयों में अधिक प्रवेश कर सकते हैं और कर भी जाते हैं। उनके मस्तिष्क में बाह्य संसार के संस्कार बहुत जल्दी प्रविष्ट हो जाते हैं। इसी से वे विचारधारा पर चलते-चलते अपने सिद्धान्त की सिद्धि पर पहुँच जाते हैं। किन्तु स्त्रियों में स्वकतृत्व न होने से उनमें धैर्य का बाहुल्य रहता है, इसी से वे अपने विश्वासपात्र मनुष्य पर अपनी आत्मा स्वयं खुली रख देती हैं, यानि उन्हें अपने आन्तरिक विचारों को बताने में अपने प्रेमी से कोई दुराव नहीं होता है। इसी से उनमें पुरुषों के बनिस्बत प्राकृतिक प्रेरणा और मनोवेग ज्यादा पाया जाता है। इस प्रकार स्त्री और पुरुष के स्वभाव में भेद देखा और पाया जाता है। यह विषय केश निर्गमन के संबंध में है जब यौवन विकास के साथ ही साथ केश वृद्धि का सम्बंध है, तब जिस प्रकार किसी वृक्ष की शाखा के काट डालने पर उसमें नई शाखाओं के निकलने का वेग बढ़ता है, ठीक उसी तरह ही प्रतिदिन या बारम्बार बाल बनवाने से या हजामत कराने से आन्तरिक काम शक्ति का आविर्भाव स्नायुओं में प्राचुर्यता के साथ होता जाता है इसी से तो ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी, संन्यासी आदि पुरुषों के लिये केश धारण विधि शास्त्रों में प्रतिपादित की गई है। केश-वृद्धि से ही काम सम्बंधी नसों की शक्ति का स्वभाविक ह्रास होता है। मनुष्य इसी से सहज में ही संयमी बन सकता है। संन्यासी कुटीचक और बहूदक अवस्थाओं का अतिक्रमण करके जब ‘हंसत्त् अवस्था पर पहुँच जाता है तब ‘सोऽहम्’ भाव में उसे काम विषयक चिन्ता ही नहीं रहती है। इससे दण्डी संन्यासी केश मुण्डन करा लेते हैं। गृहस्थ दशा में सम्पूर्ण बालों का रखना असंभव सा है इसीलिये तो ‘गोखुर” के बराबर शिखा मस्तक पर रखवा कर बाकी के बालों को मुण्डन कराने की शास्त्रों में आज्ञा दी गई है। इसमें भी बहुत लाभ है। इतनी शिखा के रखाने से शिर के अग्र भाग और पीछे का थोड़ा-थोड़ा भाग क्रमशः ढका रहता है। यहाँ मस्तक के ऊपर शिखा कहलाती है। योग शास्त्र के सिद्धान्तानुसार शिर पर ब्रह्मरन्ध्र और ब्रह्मरन्ध्र के बराबर सहस्रदल कमल में परमात्मा का केन्द्र स्थान है और डा. के सिद्धान्त से शिर के उस शिखा भाग में क्चह्ड्डद्बठ्ठ ष्टद्गद्यद्य या मस्तिष्क भाग में काम का स्थान यानी केन्द्र है। इस लिये इन दोनों अंशों में शिखा रहने से पूर्व लेखानुसार आत्मिक शक्ति स्थायी बन जाती है। तथा चिन्ता शक्ति दबी रहती है, यह निश्चय है।


हम सुन्दर कैसे बनें?

जैसे स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिये भीतरी और बाहरी नियमों को पालन करने की आवश्यकता है, वैसे ही सौंदर्य के लिए दोनों प्रकार की आवश्यकता है। प्रेम भावना और सौंदर्य की दृष्टि होने से आत्मा का स्वाभाविक सौंदर्य स्रोत फूट निकलता है अब हमें बताना है कि सौंदर्य के बाह्य साधन क्या हैं? वैसे तो स्वास्थ्य ही सौंदर्य है। तन्दुरुस्त आदमी हमेशा खूबसूरत मालूम पड़ता है। जब शरीर और मन, अनावश्यक भारों से मुक्त होकर हलका हो जाता है, तो देवी गुण उसमें ऊपर झलकने लगते हैं। कीचड़ में पड़े हुए लकड़ी के टुकड़े जहाँ के तहाँ पड़े रहते हैं, किन्तु जब कीचड़ हट जाती है और स्वच्छ जल में वे रहते हैं, तो फिर गढ़े नहीं रहते, वरन् सतह पर ऊपर आकर तैरने लगते हैं। काँच की खिड़कियों पर से जब गर्द गुबार हट जाता है और वे स्वच्छ कर दी जाती है, तो सूर्य का प्रकाश उनमें होकर आर-पार जाने लगता है। निर्मल शरीर और मन में होकर आत्मा की ज्योति जगमगाने लगती है, यही श्रेष्ठतम सौंदर्य है।

सफाई सौंदर्य की अग्रदूती है। मन की सफाई से आत्म-ज्योति के ऊपर पड़े हुए पर्दे हट जाते हैं। बाहरी सफाई से वे खिड़कियाँ स्वच्छ हो जाती हैं, जिनमें होकर इस जगमग ज्योति के दर्शन होते हैं। मन के साथ शरीर को भी निर्मल रखना चाहिये। क्योंकि मलीनता ही कुरूपता है। तुम्हारे शरीर पर कहीं भी मैल जमा न होना चाहिये। रोज स्नान करो और खुरदरे तौलिये से चमड़ी को खूब अच्छी तरह रगड़ डालो, ताकि पसीने का मेल और बाहर से उड़ कर जमा हुई धूलि कहीं भी लगी हुई न रह पावे। जहाँ कुछ छिपने का स्थान मिलता है, वहाँ चोर की नाई मैल छिप बैठता है, इसलिये छिपने के स्थानों पर तीव्र दृष्टि रखो। गुप्त अंग सदा छिपे रहते हैं, इसलिये हम उधर ध्यान नहीं देते। चोर को तो वही जगह चाहिए, जहाँ कोई देखता न हो। इसलिये जंघाओं के आस-पास कोई भी जगह बिना अच्छी तरह साफ किये न छोड़ो। बगलें भी छूट जाती हैं, फलस्वरूप उनमें एक प्रकार की गंध आने का रोग हो जाता है। उन्हें खूब रगड़-रगड़ कर धो डालो। बालों की जड़ों में मैल को छिपने की जगह मिल सकती है, इसलिये सिर को खूब अच्छी तरह रगड़-रगड़ कर साफ करो, ताकि कहीं जरा भी मैल न छिपा रहे। नाक, कान में भी कोई खुरट जमा न रहने चाहिये। दाँतों की सफाई तो सब से बहुमूल्य है। यदि दाँत गंदे हैं, तो उनमें विष अवश्य जमा होगा, यह विष साँस के साथ पेट में जाकर बड़े उपद्रव पैदा करता है। दाँतों की गंदगी बढ़कर जब पायेरिया का रूप धारण कर लेती है और पीप निकलने लगता है, तब तो मुँह से बड़ी बुरी बदबू आती है और वह पीप भोजन के साथ मिल कर उसे जहरीला बना देता है। इसलिये नित्य दाँतों को माँजो और भोजन के उपरान्त अच्छी तरह कई बार कुल्ला कर डालो, जिससे कि अन्न का एक भी कण दाँतों की जड़ में जमा न रहे और सड़ कर कोई रोग न पैदा कर सके। शौच जाते समय मल-मूत्र की इन्द्रियों को शीतल जल से अच्छी तरह धो डालो, ताकि अशुद्धता का लेश भी वहाँ न रह जावे। पेट में भीतर मल जमा हो गया हो कृष्ट बद्ध हो, तो तुरन्त ही उसकी सफाई करने का प्रयत्न करो। शरीर में भीतर बाहर सर्वत्र निर्मलता रहनी चाहिये।

कपड़े अधिक मूल्यवान या रंग-बिरंगे पहनने की कोई जरूरत नहीं है। मामूली हलके कपड़े पहने जा सकते हैं, परन्तु वे रहें बिलकुल साफ यदि तुम्हारे पास पैसा है, तो धुलाई का खर्च बढ़ा दो। स्नान करने के बाद रोज नया धुला हुआ कपड़ा पहनो। यदि पैसे की कमी है, तो अपने हाथ से स्नान के बाद रोज अपने कपड़े साबुन से साफ करो। जो कपड़े शरीर को छूते हैं, वह तो जरूरी ही नित्य धुलने चाहिये। सोते समय बिस्तर के ऊपर चादर बिछाओ जो जल्दी-जल्दी धुलते रहना चाहिए। जाड़े के दिनों में रुई का लिहाफ या कम्बल ओढ़ो तो उसके नीचे भी चादर लगा लो क्यों भारी लिहाफ एवं कम्बल न धुल सकें तो वह चादर जरूर ही धुलता रहे।

टीम-टाम के बीस उपायों की अपेक्षा उपरोक्त दो बातें ही कई गुनी मूल्यवान हैं। आज ही अपने शरीर को इंच इंच जगह रगड़-रगड़ कर अच्छी तरह साफ कर डालो और बिलकुल साफ धुले हुए कपड़े पहन कर दर्पण में मुँह देखो, तुम्हें मालूम पड़ेगा कि कल की अपेक्षा आज सुन्दरता ठीक दूनी हो गई है। इस क्रम को यदि नित्य नियम में आदत की तरह ले आओ तो देखोगे कि कुछ ही दिनों में तुम्हारी सुन्दरता कितनी बढ़ जाती है। तुम्हारे प्रयोग में जो वस्तुएं आवें वह भी साफ-सुथरी रहनी चाहिए। पलंग, बिस्तर, कुर्सी, मेज, दवात, कलम, पुस्तकें, अलमारी, कमरा, बर्तन, घर, सवारी सब में सफाई का ध्यान रखो। तुम देखो कि जो वस्तु गंदगी के कारण मलीनता लिए हुए कुरूप अवस्था में पड़ी थी, वही सफाई होने के साथ दूसरे ही रूप में चमक उठी। इस सिद्धान्त का मूल मत है कि मलीनता ही कुरुता की जननी है। जो वस्तु भद्दी मालूम पड़ती हो, जान लो कि इसमें कहीं न कहीं मैल जमा हो गया है। चाहे कोई वस्तु कितनी ही बुरी क्यों न हो, उसकी सफाई हो जायेगी तो उसकी आत्मा निखर जाएगी और उसमें भी भीतरी प्रकाश चमक उठेगा।

जब तुम सफाई का सिद्धान्त स्वीकार कर लेते हो उसे कार्य रूप में परिणित करना आरंभ कर देते हो तो उसी क्षण से सुन्दर बनना आरंभ कर देते हो। अब अपनी सुन्दरता पर विश्वास करने लगो। विद्वानों द्वारा कलाकार की सौंदर्य दृष्टि से विश्व की प्रत्येक वस्तु को सुन्दर देखने का उपदेश किया गया है, उसका प्रारंभ अपने घर से ही होना चाहिए। अपने अंग-अंग को सौंदर्यमयी दृष्टि से देखो। एक बड़ा सा दर्पण लेकर बैठ जाओ और उसमें अपने चेहरे का एक-एक अंग, नाक, कान, आँखें, भवें, गाल, होंठ, दाँत ध्यानपूर्वक देखो और उन पर सौंदर्य की दृष्टि डालो। विश्वास करो कि उनकी मालीनता हट गई है और स्वच्छता के साथ सौंदर्य की ज्योति जगमगाने लगी है। दिन में कई-कई बार दर्पण देखो और हर बार अपने अंगों पर पहले की अपेक्षा अधिक सौंदर्य की दृष्टि डालो। जरा सा मुस्कराओ और देखो कि तुम्हारी मुसकराहट में कितना अपूर्व सौंदर्य छिपा हुआ है। अपनी मुसकराहट पर मुग्ध हो जाओ। मानो तुम्हारी मुसकराहट में आज ही विश्व वशीकरण का अमृत परमात्मा ने घोल दिया है, मानो आज ही यह बहुमूल्य नियामत तुम्हें मिली है। मुस्कराओ। अपने सौंदर्य पर, अपनी मुसकराहट पर, मुसकराहट में मिले हुए अमृत पर, परमात्मा की महती अनुकम्पा पर खूब मुस्कराओ। जब फुरसत मिले तभी मुस्कराओ, इतना मुस्कराओ कि तुम्हारा जीवन ही प्रसन्नता की मधुर मुसकराहट के साँचे में ढल जाय। तुम्हारे होठों से फूल बरसने लगेंगे।

अपने सौंदर्य पर विश्वास करने से सचमुच मनुष्य सुन्दर बन जाता है। वेश्याओं के सभी कार्य कुरूपता उत्पन्न करने वाले होते हैं, परन्तु वे हर वक्त मन में अपने सौंदर्य का चिन्तन करती रहती हैं, सौंदर्य की बनाव संभाल पर उनका विशेष ध्यान रहता है, फलस्वरूप ब्रह्मचर्य के अभाव और स्वास्थ्य के निर्बल होने पर भी वे सुन्दर बनी रहती हैं। इसके विपरीत हमारे घरों में जो स्त्रियाँ सौंदर्य पर ध्यान नहीं देती वे वेश्याओं की अपेक्षा अनेक गुनी सुन्दर होने पर भी उतनी आकर्षक नहीं रहती। नाटकों में स्त्रियों का पात्र खेलने वाले नट बहुत उम्र तक सुन्दर बने रहते हैं। इसके विपरीत अपने को बुजुर्ग कहने के उत्सुक बहुत जल्द बुड्ढे हो जाते हैं।


थियोडर पार्क

विद्वान थियोडर पार्कर का नाम शायद आपने सुना होगा। उसका पिता बहुत गरीब था, इसलिए उसे बचपन से ही कठिन परिश्रम में जूझना पड़ा। वह हल चलाते समय अथवा घास खोदते वक्त भी अपना पाठ याद करता रहता। जब मौका मिलता पुस्तकें पढ़ने बैठ जाता। किताबें खरीदने को भला वह पैसा कहाँ पाता? इसलिए दूसरे लड़कों की खुशामद करके उनकी फटी पुरानी किताबें माँग लाता। एक पुस्तक की उसे बहुत सख्त जरूरत थी, परन्तु बहुत कोशिश करने पर भी वह कहीं मिल न सकी। एक दिन उसे एक उपाय सूझा। रात को चुपके से उठ कर जंगल में गया और जंगली बेरों को तोड़-तोड़ इकठ्ठा किया और उन्हें बोस्टन नगर की हाट में बेच आया इन्हीं पैसों से उसने वह पुस्तक खरीद ली। एक दिन पाकर ने बड़ी विनय के साथ पिता से प्रार्थना की कि- क्या आप मुझे एक दिन की छुट्टी दे सकते हैं? गरीब पिता ने अपने छोटे बालक की ओर आश्चर्य से देखा। उन दिनों उसे खेती का बहुत काम करना था। फिर भी पिता बालक की याचना को अस्वीकृत न कर सका उसने स्वीकृत सूचक सिर हिला दिया।

बालक बहुत सवेरे उठा और पाँच कोस पैदल चल कर हाबर्ट कालेज में जा पहुँचा। उसने वहाँ अपना नाम लिखाया और खुशी-खुशी शाम को घर वापिस लौट आया। उसने घर आकर अपने कालेज में प्रवेश होने की बात बताई। पिता बालक के प्रयत्न पर प्रसन्न हुआ, पर आर्थिक चिन्ता की रेखा उसके चेहरे पर झलक आई। बालक उसे ताड़ गया। पार्कर ने कहा पिता जी आप चिन्ता न कीजिये, मैं न तो आपका काम करना छोड़ूंगा और न खर्च के लिए पैसे मांगूंगा। मैंने कालेज में इस शर्त के साथ नाम लिखाया है कि घर पर पढ़ता रहूँगा और अन्तिम परीक्षा में बैठ कर सनद ले लूँगा। पिता की आँखें छलक आई। यह बालक कठोर परिश्रम कर पिता का हाथ बंटाता और इधर-उधर से पुस्तक इकट्ठी करके पढ़ता। अन्त में यह महापुरुष अपने देश का उज्ज्वल रत्न साबित हुआ।


पूजा या नित्य नेम

(श्री रामदयाल जी गुप्त, नौ गढ़)

पूजा वास्तव में वही कही जा सकती है, जिसके करने से मन में सिवा भगवत् चिन्तन के और ख्याल पैदा न होते हों। मन में ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ प्रेम हो और उस प्रेम में समय का कुछ ख्याल न हो अलावा इसके पूजा करते समय किसी बात का संकोच पैदा न हो अर्थात् यह ख्याल न हो कि मुझे कोई देख ही नहीं रहा है। ऐसा ख्याल आने से पूजा में त्रुटि अवश्य पड़ जाती है। मतलब यह कि भगवत्-उपासना करते समय मन में सिवाय भगवत् चिन्तन के और कुछ ख्याल ही न पैदा हो अथवा पैदा हो भी तो वह चिन्तन के समक्ष तुच्छ प्रतीत हो।

नित्य नेम इसे कहा जा सकता है कि मनुष्य प्रथम मन की प्रेरणा से उपासना करना शुरू करता है। कुछ दिन ठीक तौर पर करने के उपरान्त मन में इसके प्रति फिर आलस्य आ जाता है, तथा उपासना छोड़ने की भी इच्छा हो जाती है, परन्तु फिर किसी कारण उसको न छोड़ किसी रूप में निभाते चलना मन में स्थिर करता है ऐसी हालत में मन में वास्तविक श्रद्धा नहीं रहती और वह उपासना किसी बात का नियम कर लेने के बतौर एक नियम बन जाती है। ऐसी हालत में मन से श्रद्धा हटती जाती है और फिर उपासना जल्दी से जल्दी खत्म करने का ख्याल बना रहता है। ऐसी पूजा को मैं ‘नित्य नेम’ समझता हूँ।

श्रद्धा सहित पूजा दो घंटे की बजाए आधे घंटे ही अति उत्तम होती है। परन्तु गौ-श्रद्धा इतनी उत्तम नहीं होती। वैसे नाम लेते तो हर हालत में उत्तम है, परन्तु श्रद्धा सहित नाम लेने से मन में जो आनन्द प्रतीत होता है वह श्रद्धा के बिना नहीं।


उद्बोधन


उद्बोधन

(पं. श्रीकान्त शास्त्री, नारायणपुर)

रे ससीमद्ध़! सीमा संक्रामक! रे सम! विषम-परिस्थिति वाले।

चन्दन-चर्चित तन होकर क्यों छान रहे हो दूषित नाले।

होकर भी सक्रिय-साक्षर से बैठ कर रहे कलित-कल्पना।

जाग्रत-जीवन भी पाकर क्यों देख रहे माया-मय सपना॥

कटुक-सत्य की संस्मृति को तो लोप किया है रूप-शिखा ने।

डवषय-विघ्न हो स्वयं चले हो पल्लव ग्राही ज्ञान सिखा ने।

धारण कर शरीर सर्पिप का, जिगमिषु होकर र्स्वण लोक का।

पत् चित् को तू चला ढूंढ़ने अनुचर बन कर रोग शोक का॥

देख! देख!! ये तारक हँसते तुझ पर अश्रु बहाते बादल।

सन-सन मिस ये पवन कह रहे चेतो मानव! मिस मत प्रतिपल॥

हन्त! अन्त दिन, काल कवल! तेरी क्या दुर्गति हो पायेगी।

चिर-अर्जित विभुता की सत्ता जब हाथों से लुट जायेगी॥

जल जावेगी यह विभूति जब अनित्यता की उस ज्वाला पर।

जप लेगी कुछ दिन तक दुनियाँ तेरा नाम अश्रु माला पर॥

मृषा-तृषा में भटक रहे क्यों चाक चाक्य लख क्यों चकराया।

कुच-चामीकर के फ रे में व्यय क्यों करता रत्न पराया॥

इन्द्रिय-अश्व-सादि! गिर जावोगे लगाम मत छोड़ो ढीला।

अगम-गर्त हैं अगल-बगल में पथ भी है उच्चावच् गीला॥

-प्रताप

*समाप्त*