इन्द्रियों पर काबू रखो।

दुनिया को मत बाँधो—अपने को बाँध लो। अपनी इन्द्रियों को वश में कर लो तो तुम विजयी कहलाओगे। अपनी इन्द्रियों की रखवाली वैसे ही करो, जैसे एक कर्त्तव्यनिष्ठ सिपाही खजाने के दरवाजे की रक्षा करता है। यदि चोरों को अवसर मिलेगा तो वे इन्हीं दरवाजों से घुस पड़ेंगे और सारा खजाना खाली कर देंगे। इसलिये खबरदार! दरवाजों पर गफलत न होने देना। इन्द्रियों पर पाप का कब्जा न होने पावे, वरना धर्म का खजाना खाली हो जायगा। मन के संयम से स्वर्ग मिलता है किन्तु अनियन्त्रित इन्द्रियाँ तो नरक की ओर ले दौड़ती हैं। क्या तुम नहीं जानते कि उत्तम स्वास्थ्य दीर्घजीवन, दिव्य बुद्धि और साँसारिक संपदायें इन्द्रिय-निग्रह से ही मिलते हैं। जिसने अपने ऊपर काबू पा लिया है वह हर परिस्थिति में पर्वत की तरह स्थित बना रह सकता है।


चिनगारी


चिनगारी

(रचयिता—श्री गुरु प्रसाद शर्मा ‘विशारद्’)

चेतना है एक मुझ में ;क्षुद्र-सा व्यक्तित्व मेरा,

बन चमकती ज्योति सी हूँ। है; मगर मैं, जानती

मैं प्रबल पावक मयी हूँ; कौन-सी है शक्ति मुझ में;

मत गुनो खद्योत सी हूँ। बस; उसे पहचानती हूँ।

मैं न भूली हूँ कभी भी, मैं फिरूं निस्सीय में नित;

ज्वाल से है जन्म मेरा तपिश दिल में इक छिपाये।

बस सदा जलना-जलाना; उग्र हूँ, उद्याम हूँ मैं—

ही रहा है धर्म मेरा।कौन?, जो मुझको मिटाए।

खेलती हूँ मैं पवन में, मौत का मुझको नहीं भय;

नित नई रंगरेलियों से। वश्यतः, में मैं नहीं हूँ।

फूँक देती हूँ पलों को,पाठ बस अमरत्व का मैं;

तुच्छ सी अठखेलियों से। नित्यशः पढ़ती रही हूँ।

बन गया इस भाँति जीवन;

लोक में प्रत्यक्ष मेरा।

मैं निशांिकडडडडड बन गई हूँ;

प्रबल बन करती बसेरा।


कृतज्ञता प्रकाशन

अनेक सहृदय और विचारवान सज्जनों ने केवल निस्वार्थ भाव से अखंड ज्योति की सहायता एवं सद्-विचारों के प्रचार को कर्तव्य-धर्म समझ कर ग्राहक बढ़ाने में सहायता की है। इन महानुभावों का अखंड ज्योति हृदय से अभिवादन करती है, एवं अन्य सज्जनों से आशा करती है कि इनका अनुमान करके अखंड ज्योति के महान् मिशन की पूर्ति में सहायता करें;

नाम कितने ग्राहक बने

श्री जगन्नाथ राव नायडू, नागपुर 40

श्रीमती विष्णुकुमारी देवी, लखनऊ 7

पं0 रामेश्वरानद शर्मा, लाल बाग, बंबई 9

पं0 जगन्नाथप्रसाद शर्मा, अध्यापक, बाय 5

आचार्य रामनारायण जी शास्त्री, नुनहाड़ 4

मास्टर रुद्रबहादुर श्रेष्ठ, चालाछे नेपाल 5

वानप्रस्थी श्री मुरली जिज्ञासु, अजीतमल 6

श्री मंगलचंद जी भंडारी, अजमेर 4

नाम कितने ग्राहक बने

श्री भगवानसिंह गौतम, अध्यापक, सितलता 2

श्री प्रेमनारायण शर्मा, कानूनबर, अमाह 3

श्री धर्मपालसिंह जी, रुड़की,7

श्री देवकीनन्दन माहेश्वरी, मोरेना 3

पं0 हरिप्रसाद जी भोझा, ‘प्रेम’ अलीगढ़ 3

पं0 ऋषिराम शुक्र ताल्लुकेदार, शाहपुर 8

श्री रामस्वरूप जी ‘अमर’, तालवेहट 2

श्री गोवर्द्धनजी मोदाणी, भारवाड़ मुँडवा 2

(शेष नाम अगले अंक में छपेंगे)

प्रतीक्षा करने योग्य अगले तीन अंक


VigyapanSuchana

महत्वपूर्ण सामग्री से परिपूर्ण

सत्य अंक, प्रेम अंक, न्याय अंक।

इन अंकों को विशेषांक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस गलाघोंटू कागज के अकाल में जितने स्वल्प मूल्य में जितने पृष्ठ अखंड ज्योति दे रही है, वह भार ही अत्यन्त कठिन हो रहा है। ऐसी दशा में कितने पृष्ठ पढ़ाये जा सकेंगे यह नहीं कहा जा सकता। परन्तु साधारण अंक ऐसे अलभ्य होंगे कि इनकी एक-एक पंक्ति अन्तर में प्रवेश करने वाली एवं मन में ज्ञान-गंगा की नवीन धारा प्रवाहित करने वाली होगी। जिसका रसास्वादन आध्यात्म विषय के मर्मज्ञ विचारक ही कर सकेंगे।

इन अंकों का सम्पादन—

धुरंधर विद्वान, मर्मज्ञ, तत्वदर्शी और गंभीर विचारकों द्वारा होगा।

अगला-मई का अंक—”प्रेम अंक” होगा।

जिसके सम्पादक बाय, जयपुर के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् श्री0 जगन्नाथप्रसाद शर्मा होंगे

इन अंकों के लिए साँस रोक कर प्रतीक्षा कीजिये!


आओ, युद्ध सामग्री बनावें!

बहुधा हमारे सामने ऐसे प्रश्न आते हैं कि वर्तमान महायुद्ध कब तक चलेगा, इसमें कौन जीतेगा। इसके बाद भविष्य कैसा होगा, आत्म रक्षा के लिए क्या करना चाहिये, इस समय हमारा क्या कर्त्तव्य है। आज इस विषय में कुछ प्रकाश डाला जा रहा है।

यह युद्ध मानव के अन्दर से दानवत्व हटाने के लिये आरम्भ हुआ है और जब तक दुनिया में से स्वार्थ, षडयन्त्र और पैशाचिक लिप्सा उठ न जाएगी तब तक जारी रहेगा। विगत शताब्दियों में मानव-जाति अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करके अपने से निर्बलों के साथ मनमाने अत्याचार कर चुकी है। उसका फल उसे भोगना ही पड़ेगा। यह भली-भाँति समझ लेना चाहिये कि सारी मनुष्य जाति एक मजबूत धागे में बँधी हुई है।

मनुष्य जाति अब एक समूचे शरीर की तरह बन गई है। इसमें एक अंग का परिणाम सारे अंगों को भोगना पड़ेगा। हाथ धन कमायेगा तो उसका सुफल सारे शरीर को मिलेगा और मुँह विष पी लेगा तो सारे अंगों पर आपत्ति आवेगी। एक समय था जब हर मनुष्य एक स्वतन्त्र इकाई था या एक परिवार अपनी आवश्यकताएँ स्वयं पूरी करके समाज से अलग बना रहता था और इसमें के भले-बुरे कर्मों के फल से बचता था। आज तो विज्ञान ने संसार के हर एक व्यक्ति को एक सूत्र में बाँध दिया है। इसलिये एक के भले-बुरे कर्मों का फल दूसरों को जरूर भुगतना होगा। पड़ोसी के जलते हुए घर को खड़े-2 देखने वालों का घर भी बच नहीं सकता। खड़े-2 दुष्कर्म को होते हुए देखना कानूनन जुर्म है। कोई किसी की हत्या कर रहा हो और आप उसका विरोध न करें तो आप भी दोषी ठहराये जावेंगे और दण्ड के भागी बनेंगे। इस प्रकार संसार में जो पाप-अत्याचार बढ़े हैं, उन्हें करने वाले और न करने वाले दोनों को ही दण्ड भुगतान होगा। जब पाप का परिशोध हो जायगा और दण्ड-शोधित मनुष्य जाति अन्तःकरण से पश्चाताप करते हुए भविष्य में सन्मार्ग पर चलने की अनिवार्य आवश्यक अनुभव करेगी, तब लीलाधारी भगवान अपनी माया समेट लेंगे, रुद्र का हाहाकारी तीसरा नेत्र शान्त हो जाएगा। इस युद्ध की समाप्ति हो जाएगी। तोप, टैंक, हवाई जहाज, बम और गैसों के बल पर यह युद्ध समाप्त न होगा। अधिक साधनों के कारण कोई शक्ति अपने विरोधी को कुछ समय के लिये दबा भले ही दे, पर रावण के सिरों की भाँति अन्य प्रतिद्वन्द्वी उपज खड़े होंगे और उसी विभीषिका की फिर पुनरावृत्ति आरम्भ हो जाएगी।

हो सकता है इस देश में अन्य देशों की अपेक्षा फौजी संकट कम आवे और अधिकाँश देहाती क्षेत्र अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार से बचे रहें। फिर भी गरीबों को अन्न-कष्ट और अमीरों को लूट-पाट का संकट सहना पड़े, यह सम्भव है। नित्य हजारों टन बारूद का जो हवन हो रहा है, उससे महामारियों का प्रकोप होने की भी सम्भावना है, जैसा कि गत युद्ध के बाद नाना प्रकार की महामारियाँ फैली थीं और युद्ध में जितने व्यक्ति मरे थे, उससे कहीं अधिक संख्या में नरसंहार करके शान्त हुई थी। मनुष्य जाति के मस्तिष्क में दुष्पूर तृष्णा, कपट, मायाचार और स्वार्थ का जब तक ऐसा ही विकट धान रहेगा, तब तक दुनिया खूब कुटेगी और उसकी एक-2 नस लोहे की लाठियों से तोड़ी जाती रहेगी। प्रसव-वेदना के बाद जैसे पुत्र उत्पन्न होने का लाभ होता है, वैसे ही उस युद्ध का परिणाम भी लाभदायक होगा। जमाना बिलकुल पलट जाएगा, वर्तमान युग की विचार-धाराएं पूर्णतः बदल जाएगी, कलियुग के स्थान में सतयुग बरतने लगेगा। अन्धों को यह बात आश्चर्यजनक और असम्भव प्रतीत हो, परन्तु आँखों वाले देखते हैं कि समय बड़े ही द्रुत वेग से बदल रहा है, इतने द्रुत वेग से कि पूर्ण रूप से युग बदल जाने में शायद पच्चीस-पचास वर्ष भी न लगें।

इस समय हमें क्या करना चाहिये। आध्यात्मिक व्यक्तियों को वही करना चाहिये, जो भौतिक जगत् में अमेरिका कर रहा है। अमेरिका का विश्वास है कि अधिक शास्त्रास्त्र उत्पन्न करने से शत्रु को हराया जा सकेगा। आध्यात्मिक व्यक्तियों का विश्वास होना चाहिये कि सत्य, प्रेम और न्याय की पवित्र भावनाओं का प्रसार करके सूक्ष्म लोकों की गन्दगी को मार भगाया जा सकता है। हम न्याय के टैंक, प्रेम के वायुयान और सत्य के बम अपने मस्तिष्कों के कारखानों में तैयार करें, जिनकी मार से शत्रु शैतान का सारा बल चूर-2 हो जाए। राष्ट्रपति रुजवेल्ट अपने देश की आमदनी का बहुत बड़ा अंश युद्ध-सामग्री तैयार करने में खर्च कर रहे हैं। हमें अपनी शक्तियों का अधिक से अधिक अंश आध्यात्मिक हथियार बनाने में लगाना चाहिये। इसके लिये न तो किसी सामान की जरूरत है और न तैयारी की। आज से ही आप अपने मन में पवित्रता, त्याग, उदारता, ईमानदारी, सच्चाई और इन्साफ-पसन्दगी को भरने की कोशिश शुरू कर दीजिये। अपने जीवन को नेक बनाइये और दूसरों को नेकी के मार्ग में जुटाने का भगीरथ प्रयत्न कीजिये। इस प्रकार आप संसार में ऐसी दैवी कुमुक भर देंगे जो आसुरी प्रकृतियों को मार कर दूर भगा देगी। यदि आप सत्यं को अपना धर्म मान लेते हैं और ईमानदारी के अनुसार आचरण करना आरम्भ कर देते हैं तो अपने को, अपनी जाति को, अपने देश को और अपने संसार को इस महान तम-विपत्ति में से बचाने का सबसे कामयाब तरीका अख़्तियार करते हैं। यह न समझना चाहिये कि युद्ध के दैत्याकार अस्त्र-शस्त्रों के सामने यह छोटा-सा उपाय क्या काम दे सकता है। हम कहते हैं कि सत्य का आश्रय लेना सबसे बड़ी सुरक्षा है। ईश्वर की शरण में जाना सबसे बड़ी गारण्टी है। भले ही इससे हमारा शरीर न बच सके, लेकिन संसार का सर्वनाश बच सकता है। हमारा शत्रु पाप है और उस पाप का अन्त करने के लिये सत्यमय विचार धाराओं को युद्ध सामग्री का निर्माण प्रारम्भ करना चाहिये।

इस महान निर्माण में अखण्ड ज्योति अपने पाठकों का सहयोग चाहती है।

युद्ध सम्बन्धी कुछ नैतिक तैयारियाँ।

युद्ध सम्बन्धी खतरे से बचने के लिये पाठकों को निम्न बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिये।

1—जो लोग ऐसे शहरों में रहते हैं, जिनमें खतरे की अधिक सम्भावना है उन्हें अपने बाल-बच्चे और बढ़ा हुआ सामान सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा देने चाहियें।

2—जीवन का रहन-सहन बिलकुल सादा और अल्पव्ययी बना लेना चाहिये जिससे गरीब लोग अपनी गुजर कर सकें और अमीरों के आडम्बर को देख कर किसी को जलन न हो।

3—अन्न और वस्त्र उचित मात्रा में जमा कर लेने चाहिये, जिन्हें अपने और दूसरों के काम में लगाया जा सकें।

4—फैलाव कम करना चाहिये, आपसी लड़ाई-झगड़ों को जल्द से जल्द सुलझाना चाहिये।

5—अपने विचार के अधिक से अधिक लोगों को एक सूत्र में बाँधना चाहिये जो आपत्ति के समय एक दूसरे की सहायता करें।

6—स्त्री पुरुषों को अधिक से अधिक ब्रह्मचर्य से रहना चाहिये। वर्तमान काल सन्ध्या समय है, ऐसे समय में उत्तम संतान उत्पन्न नहीं हो सकती।

7—नित्य व्यायाम करना और शरीर को बलवान बनाना आरम्भ कर देना चाहिये जिससे आपत्तियों का मुकाबला करने की क्षमता रहे।

8—मन को मजबूत बनाना चाहिये। भय, घबराहट, चिन्ता और व्याकुलता को दूर करके दृढ़, आत्मविश्वासी और निर्भय बनाना चाहिये। आपत्ति के समय मस्तिष्क का सन्तुलन न खोने का अभ्यास करना चाहिये, जिससे तत्काल उचित निर्णय किया जा सके।

9—रक्षा विभाग द्वारा जो सूचनाएँ दी जाएं, उनको समझने और आचरण करने का प्रयत्न करना चाहिये। दैनिक अखबार नित्य पढ़ने चाहियें।

10—नित्य ईश्वर का चिन्तन करना चाहिये। भजन, कथा, कीर्तन और उपदेशों में शामिल होना चाहिये। सत्य धर्म के मन्तव्यों को स्वयं अपनाना चाहिये और जनता में उनका प्रचार करना चाहिये।

कथा—


ईश्वर प्राप्ति का उपाय

एक चोर एक बड़े महात्मा के पास नित्य जाता और उनसे बड़ी प्रार्थना करता कि कोई ऐसा उपाय बता दीजिए, जिससे मैं माया-बन्धन से छूटकर स्वर्ग का अधिकारी हो जाऊँ और परमात्मा के दर्शन कर लूँ।

महात्मा जी बहुत दिन तो टालते रहे पर एक दिन जब चोर बहुत आग्रह करने लगा, तो महात्मा जी ने उसकी प्रार्थना मंजूर कर ली और कहा-कल आना, मैं सामने वाली पहाड़ी की चोटी पर ले जा कर एकान्त में तुझे ईश्वर प्राप्त करने का सारा रहस्य समझा दूँगा।

दूसरे दिन सवेरे ही चोर बहुत खुश होता हुआ आ गया। महात्मा जी ने तीन भारी-भारी पत्थर उसके ऊपर रख दिये और कहा-मेरे पीछे-पीछे चले आओ। पत्थर बहुत भारी थे, पहाड़ी की चढ़ाई बड़ी कठिन थी, कुछ दूर चलकर चोर हाँफने लगा। उसने कहा- भगवन्, यह बोझा तो बहुत भारी है, इसे लेकर मैं आगे नहीं चल सकता। महात्मा ने कहा—अच्छा तो एक पत्थर फेंक दो और मेरे पीछे चले आओ। एक पत्थर फेंकने पर कुछ बोझा हलका हुआ और वह चलने लगा। लेकिन दो पत्थर ही क्या कम थे। दो चार फर्लांग चलकर उसके पाँव काँपने लगे, गरदन टूटने लगी। वह चिल्लाया- महाराज! यह बोझा तो मुझे मारे डालता है। साधु ने उससे एक और पत्थर फिंकवा दिया। अब कुछ सरलता हुई और चोर धीरे-धीरे चलने लगा। अभी पहाड़ी की आधी चढ़ाई ही पूरी हो पाई थी कि चोर पसीने में लथपथ हो गया, उसका दम फूल गया और थकान के मारे आगे बढ़ना कठिन हो गया। वह दुखी होकर महात्मा जी से कहने लगा—अब आगे चलना मेरे बस की बात नहीं, यह पत्थर भी तो बहुत भारी है। मैं तो थक कर चूर-चूर हो गया हूँ। शरीर में एक कदम भी आगे चलने की शक्ति नहीं। महात्मा जी ने तीसरा पत्थर भी उससे फिंकवा दिया।

तीनों पत्थरों को फेंक कर चोर हलका हो गया और साधु के साथ आनन्दपूर्वक चला गया। पहाड़ी के शिखर पर जब वे पहुँच गये, तो महात्मा जी ने पेड़ की छाया में आसन बिछाया और कहा- बेटा! मैंने तुझे ईश्वर प्राप्त करने का सारा रहस्य समझा दिया। अपने सिर पर अन्याय, स्वार्थ और असत्य के भारी-भारी पत्थर लादकर इस ऊँची चोटी पर परमपद के महान शिखर पर पहुँचने की इच्छा करने वालों के लिए आवश्यक है कि वे इन तीनों भारी पत्थरों को फेंक दें, तभी ईश्वर का दर्शन हो सकता है।

चोर समझ गया कि बुरे आचरण रखकर झूठ-मूठ पूजा-उपासना का आडम्बर रखने से मुक्ति नहीं मिल सकती। अपने को सदाचारी बनाने में ही सारी योग-साधना छिपी हुई है। चोर ने उसी दिन से बुरे कर्म करना छोड़ दिया और सत् कर्म करने लगा।


मस्तिष्क की सुरक्षा

मस्तिष्क हमारे शरीर का बहुत ही उपयोगी अंग है। इसकी सुरक्षा हमारे जीवन की सुरक्षा है किन्तु हममें से कितने हैं, जो इसका ठीक प्रकार उपयोग करते हैं? अधिकाँश मनुष्य अज्ञानवश मस्तिष्क का दुरुपयोग करते हैं और उसकी महान सामर्थ्य के द्वारा प्राप्त होने वाले आश्चर्यजनक परिणामों से वंचित रह जाते हैं।

मस्तिष्क को विषाक्त बनाकर कुँठित कर देने वाले कारणों में ‘चिन्ता’ प्रमुख है। कहते हैं कि चिन्ता चिता के समान है, जो जीवित मनुष्य को जला देती है। चिन्ता के कारण मस्तिष्क में गर्मी बहुत बढ़ जाती है और वह वहाँ की स्निग्धता, सरलता एवं कोमलता को नष्ट करके दाह एवं उष्णता उत्पन्न करती है। चिन्ताशील मनुष्य का मस्तिष्कीय परीक्षण करने पर पाया गया है कि श्वेत बालुका और पीत पदार्थ (ग्रे मैटर) सूखकर कड़े और ठोस हो जाते हैं। समस्त शरीर का शासन दिमाग द्वारा होता है, जब शासन-कर्ता जीर्ण-शीर्ण हो रहा हो तो राज्य में अव्यवस्था फैल जाना स्वभाविक है, चिन्ता-ग्रस्त और निर्बल मस्तिष्क वाले शरीर का रोगी और दुर्बल होना स्वाभाविक है मनुष्य अधिक दिन जी सकेंगे, इस पर कौन विश्वास करेगा?

जलन, गर्मी और खुश्की के कारण प्राण-प्रद पदार्थ (ऑक्सीजन) जलते हैं और वे विषाक्त वायु (कार्बन) के रूप में परिणत हो जाते हैं। फिक्र के कारण भुनते हुए मस्तिष्क में से विषैले पदार्थों का आविर्भाव होता है और वे पदार्थ रक्त के साथ मिलकर शरीर की अन्य धातुओं को भी विषैला कर देते हैं। पहले ही दिन वे मंदाग्नि उत्पन्न करते हैं और क्रमशः अन्य रोगों को बुलाते हुए अन्ततः संग्रहणी, कुष्ठ, क्षय, मधुमेह, प्रमेह या ऐसे ही अन्य भयंकर रोगों तक को उत्पन्न करा लेते हैं।

लोग अपनी विपत्ति को उस खुर्दबीन शीशे से देखते हैं, जिसमें से छोटी सी चीज़ कई गुनी होकर दिखाई पड़ती है। इस दुनिया में तिल को ताड़ बनाने वाले बहुत हैं। जरा से कष्ट के मारे घबरा जाते हैं और चिन्ता के समुद्र में डुबकियाँ लेने लगते हैं। यह बड़ी ही दयनीय अवस्था है। घबराहट एक स्वतंत्र विपत्ति है, वह अपने कुटुम्ब को साथ लेकर आती है और ऐसी अव्यवस्था पैदा करती है कि मनुष्य यह भी ठीक तरह निर्णय नहीं कर पाता कि अब क्या करना चाहिए? उलटा उपाय करने से कष्ट और भी बढ़ जाता है। देखा गया है कि मामूली से रोग से घबरा कर लोग चारों ओर दौड़ते हैं और उल्टे-सीधे इलाज करा कर रोग के स्थान पर रोगी को ही मार डालते हैं।

हाय अब इस विपत्ति का निवारण न होगा। मेरी कोई सहायता न करेगा। मेरे लिए दुःख ही दुःख है। सफलता मेरे भाग्य में ही नहीं बदी है। इस प्रकार के निराशाजनक विचार विपत्ति को दृढ़ बनाकर चिन्ता को स्थायी कर देते हैं। ऐसी अवस्था में अधिकाँश लोग मानसिक आत्म-हत्या कर लेते हैं। कोई भीमकर्मा शारीरिक आत्महत्या तक कर डालते हैं।

क्या विपत्ति के समय यही एक मार्ग हमारे लिए रह जाता है? कितने दुःख की बात है कि उलटे रास्ते पर भटक कर हम जरा से कारण को घातक बना लेते हैं। यथार्थ में सुख की तरह दुःख और संपत्ति की तरह विपत्ति जीवन में आने वाली आवश्यक परिस्थितियाँ हैं। इनसे कोई बच नहीं सकता। सर्दी और गर्मी, दिन और रात्रि, मीठा और चरपरा दोनों ही विरोधी तत्व इस प्रकृति में हैं, जो अपने को इन दोनों को सहने योग्य बना लेता है, वह प्रसन्न रहता है। जो एक ही स्थिति में सदा रहना चाहता है, वह डरता है, दुखी होता है, घबराता है और मर जाता है। हमें अपने को सुदृढ़ बनाना चाहिए ताकि प्रतिकूल परिस्थितियों से डरने की अपेक्षा उनका सामना करें।

भगवान कृष्ण का वह मन्त्र इसी स्थान के लिए है—’सन्तुष्टो येन केन चित्’ जैसी भी कुछ स्थिति हो, उसमें सन्तुष्ट रहो। यह विधान अकर्मण्यता का पोषक नहीं, धैर्य का उद्बोधक है। “जो कुछ हो रहा है, मेरी भलाई के लिए है।” यह विचार करते ही आधी विपत्ति टल जाती है। संसार में तुम से भी अधिक कष्ट में दूसरे लोग पड़े हुए हैं। उनकी तुलना अपने से करते हुए ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए कि —दूसरों की अपेक्षा मुझे अधिक सुविधा प्राप्त है। ईश्वर विश्वासी, सन्तोषी और आशावादी मनुष्य के सन्मुख बड़ी से बड़ी विपत्ति छोटी हो जाती है और वह हर परिस्थिति में प्रसन्न रह सकता है। जिस प्रकार वर्षा ऋतु में उसे प्रसन्नता होती है। वैसे ही सर्दी और गर्मी में भी वह प्रसन्नता का कोई कारण ढूँढ़ निकालता है। सब सुख में तुम हँसते हो, तो ऐ बहादुरों! दुख में भी हँसो।

चिन्ता और निराशा के कुविचारों को जब हम मन में से हटा देते हैं, तो आनन्द और उत्साह की दशा शेष रह जाती है। इससे मस्तिष्कीय कोषों को बड़ा आराम मिलता है और उन्हें फलने-फूलने योग्य पर्याप्त सुविधाएं मिल जाती हैं। वही मनुष्य बुद्धि-कौशल प्राप्त करते हैं, जो निर्भय हैं। वही विद्वान होते हैं, जो धैर्य धारण करते हैं और आपत्तियों को क्षणिक समझकर उनकी परवाह नहीं करते, एवं सुनहरे भविष्य की आशा करते रहते हैं। मस्तिष्क की सुरक्षा का यह अत्यन्त ही उत्तम उपाय है।


Quotation

मनुष्य की सफलता विशेषतः इच्छा-शक्ति और परिश्रम पर निर्भर है। जो कठिनाइयों का दृढ़ता से सामना करने वाली और उद्योग देवता के नाम से पुकारी जाती है। यह देखकर आश्चर्य होता है कि इसके द्वारा किस प्रकार असम्भव बातें भी सम्भव हो जाती हैं।


रामकृष्ण परमहंस के उपदेश

खाज खुजाने के समय तो बड़ा आनन्द आता है, पीछे बड़ा दर्द होता है और घाव पड़ जाते हैं। विषय भोगते समय तो बड़े अच्छे मालूम होते हैं, पर पीछे से वे नारकीय यातना में जलाते हैं।

नाव पानी में रह सकती है, पर पानी नाव में रहेगा, तो उसे ले बैठेगा। मुमुक्षु साँसारिक मनुष्यों में रह सकता है, पर यदि उसके मन में साँसारिक विषय रहेंगे, तो वह पतन की ओर चला जाएगा।

सोने से अनेक प्रकार के आभूषण , लोग अपनी रुचि के अनुसार बना लेते हैं, पर सोना-सोना ही रहता है। मनुष्य अपनी बुद्धि के अनुसार ईश्वर के विभिन्न स्वरूपों की कल्पना कर लेते हैं। वह सभी भावों में समान रूप से रहता है।

घड़े में एक बार पानी भरकर यदि फिर उसे कहीं यों ही रखा रहने दो तो कुछ दिन में पानी सूख जायेगा; किन्तु यदि पानी के भावर ही वह घड़ा रखा रहे तो पानी कभी न सूखेगा। यदि एक बार सत्य मार्ग का अवलम्बन करके फिर उस ओर से उदासीन हो जाओ तो परिश्रम व्यर्थ चला जाएगा; किन्तु यदि उस पथ पर सदैव आरुढ़ रहो तो जीवन उसी तत्व से ओत-प्रोत हो जायेगा।

मक्खियाँ किसी स्वच्छ स्थान पर बैठी हों उन्हें कहीं मैले का टोकरा दिखाई पड़ जाए, तो वह उस स्वच्छ स्थान को छोड़कर मैले पर ही बैठेंगी; परन्तु शहर की मक्खियाँ ऐसा नहीं करतीं, वे फूलों को छोड़कर दूषित वस्तुओं पर दृष्टिपात नहीं करतीं। विषयी पुरुष सत्कर्मों को छोड़कर वासनाओं की गन्दगी में भटकते फिरते हैं; किन्तु धैर्यवान् पुरुष प्रभु-प्रेम के अमृत को पाकर दूसरी ओर आँख भी नहीं उठाते।

गुबरैला कीड़ा गोबर में ही रहना पसन्द करता है। कोई उसे अच्छे स्थान पर बिठा दे, तो भी वह उड़कर वहीं पहुँचेगा! दुष्ट मनुष्यों की सत्संग में रुचि नहीं होती, वे तो पाप कर्मों में ही खुश रहते हैं।

निराशा नास्तिकता है।


(महात्मा गाँधी)

आशावाद आस्तिकता है। सिर्फ नास्तिक ही निराशावादी हो सकता है। आशावादी ईश्वर का डर मानता है, विजय पूर्वक अपना अन्तर्वाद सुनाता है, उसके अनुसार बरतता है और मानता है कि “ईश्वर जो करता है, अच्छे के लिये करता है।”

निराशावादी कहता है कि ‘मैं करता हूँ’। अगर सफलता न मिले तो अपने को बचाकर दूसरे सब लोगों के मत्थे दोष मढ़ता है। भ्रमवश कहता है कि ‘किसे पता, ईश्वर है या नहीं’ और खुद अपने को भला और दुनिया को बुरा मानकर कहता है कि मेरी किसी ने कद्र नहीं की’ एवं अन्त को आत्मघात कर लेता है और यदि न करे तो भी मुर्दे की तरह जीवन बिताता है।

आशावादी प्रेम में मगन रहता है। किसी को अपना दुश्मन नहीं मानता। इससे वह निडर हो कर जंगलों में और गाँवों में सैर करता है। भयानक जानवरों तथा ऐसे जानवरों जैसे मनुष्यों से भी वह नहीं डरता; क्योंकि उसी आत्मा को न साँप काट सकता है और न पापी का खंजर ही छेद सकता है। शरीर की तो वह चिन्ता ही नहीं करता; क्योंकि वह तो काया को काँच की बोतल समझता है। वह जानता है कि एक न एक दिन तो यह छूटने ही वाली है, इस लिये वह उसकी रक्षा के निर्मित संसार को पीड़ित नहीं करता। वह न किसी को दिक ही करता है, न किसी की जान पर ही हाथ उठाता है। वह तो अपने हृदय में वीणा का मधुर गान निरन्तर सुनता और आनन्द-सागर में डूबा रहता है।

निराशावादी स्वयं रागद्वेष से भरपूर होता है। इसलिये वह हर एक को अपना दुश्मन मानता है और हर एक से डरता है। अन्तर्नाद तो उसके होता ही नहीं। वह तो मधु-मक्खियों की तरह इधर-उधर भिनभिनाता हुआ बाहरी भोगों को भोगकर रोज थकता है और रोज नया भोग खोजता है और इस तरह प्रेमरहित तथा अमित होकर इस दुनिया से कूच कर देता है और उसके नाम की याद तक किसी को नहीं आती।

हिन्दुस्तान के दुःखों, आर्थिक और नैतिक दोनों का मैंने इतना अनुभव किया है कि उनकी लपटों से अगर मैं जलकर भस्म नहीं हो गया हूँ, तो उसका कारण केवल यही है कि मैं जनता की दिलाई आशा के बल पर ही जी रहा हूँ। मैं तो इसी आशा और केवल आशा के ही भरोसे घूमता फिरता हूँ कि कभी तो हम आत्म शुद्ध होंगे। कभी हमारे करोड़ों भाई-बहनों की हड्डियों में कुछ मान दिखाई देगा।


सतयुगी बादशाह

दिल्ली के तख्त पर बैठा हुआ भारत का सम्राट् टोपियाँ सीकर अपना पेट भरता था। एक दिन भोजन बनाते समय उसकी बेगम का हाथ जल गया। कई फफोले उठ आये, पीड़ा से बेचैन होकर बेगम झुँझलाती हुई बादशाह के पास आई और बहुत दुखी होकर कहने लगी। -इतने बड़े देश के मालिक होकर भी क्या आप रोटी बनाने के लिए एक दासी नहीं रख सकते? देखिए, मेरे हाथ कैसे जल गये हैं।

नासिरुद्दीन ने एक प्रेम भरी दृष्टि बेगम पर डाली और कहा-प्यारी! मुल्क का मालिक मैं नहीं। मालिक तो खुदा है। मैं तो नाचीज खिदमतगार हूँ। तुम देखतीं नहीं, टोपियाँ सीकर जो कमाता हूँ, उससे ही अपनी गुजर-बसर करता हूँ। इसमें इतना कहाँ बचता है कि दासी या नौकर रखा जा सके ।

बेगम ने कहा—खजाना तो आपका है। इसमें से खर्च करने से आपको कौन रोकता है?

नासिरुद्दीन ने उत्तर दिया—सरकारी खजाने में मेरा क्या है, यह तो प्रजा की चीज़ है और उसी के काम में खर्च होनी चाहिए। यह ठीक है कि मैं अनुचित रीति से उसमें से खर्च करूं तो आज मेरा हाथ न पकड़ेगा; किन्तु कल खुदा के सामने तो हिसाब देना ही होगा। सार्वजनिक सम्पत्ति का ट्रस्टी मैं बना हुआ हूँ। यदि इस अमानत में खयानत करूं, प्रजा के पैसे को अपने काम लाऊँ तो अल्लाह के सामने गुनहगार ठहराया जाऊँगा। बेगम अपना दुःख भूल गई और बादशाह की सच्चाई की प्रशंसा करती हुई, महल में वापिस लौट गई।


निष्कलंक भगवान् की जय।

कौशलपुर के राजा प्रसेनजित के पुरोहित आचार्य भार्गव अपनी दयालुता, न्याय-शीलता और परोपकार वृत्ति के लिए प्रसिद्ध थे। पराये दुख दूर करने को आत्म त्याग करने के लिये वे सदैव तत्पर रहते थे।

आचार्य भार्गव के घर एक बड़ा ही सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। इस समाचार से सारे कौशलपुर में आनन्द छा गया। घर-घर बधाये बँटने लगे। घड़ी मुहूर्त देखने के लिये ज्योतिषी लोग पधारे, उन्होंने बालक के जो लक्षण बताये उसे सुनकर सब लोग सन्न रह गये। आचार्य का मुख सूख गया। ज्योतिषियों ने कहा कि “यह बालक बड़ा होकर भयंकर डाकू होगा। यह अनेक निरपराध मनुष्यों की हत्या करेगा।”

ऐसा बालक भला भार्गव जैसे ऋषि के लिये कुछ प्रसन्नता का कारण थोड़े ही हो सकता था। उसने सोचा कि इसे अभी ही मार दिया जाए तो अनेक लोगों की विपत्ति कट जायगी। उन्होंने निश्चय किया कि अपना विचार राजा के सम्मुख रखूंगा और इस बालक का वध करा दूँगा।

दूसरे दिन अपने नवजात बालक को लेकर आचार्य भार्गव राज दरबार में पहुँचे। उन्होंने राजा को अपना विचार सुनाया और कहा-अनेक मनुष्यों के लिये विपत्ति बनने वाले इस बालक का आप वध करा दीजिये।

आचार्य की त्याग वृत्ति और बालक की सुन्दर आकृति को देखकर राजा का हृदय दया से भर गया। उसने कहा-भगवान्! देवताओं तक से भूल होती है फिर ज्योतिषी तो मनुष्य ही हैं। कौन जाने ज्योतिषियों का कथन मिथ्या ही निकले। फिर यदि यह डाकू हुआ तो राज-शक्ति द्वारा जैसे अनेक डाकुओं का दमन किया जाता है वैसे इसका भी प्रबन्ध कर दिया जाएगा। इस बालक का अकारण वध करना मुझे उचित प्रतीत नहीं होता, इस लिये आप इसे लौटा ले जाइये।

भार्गव को राजा की बात माननी पड़ी, वे बालक को घर लौटा लाये। मृत्यु के मुख में से वापिस आये हुए बालक को पाकर माता को बड़ा आनन्द हुआ, उसने पुचकारते हुए बच्चे को छाती से लगा लिया। माता ने हाथ जोड़े कर ईश्वर से प्रार्थना की कि—प्रभो! मेरे बच्चे को कलंक से बचाना। इसे निष्कलंक रखना। माता को निष्कलंक नाम इतना प्रिय लगा कि उसने बालक का नाम ही ‘निष्कलंक’ रख दिया।

निष्कलंक बड़ा होने लगा। उसकी बुद्धि ऐसी तीव्र थी कि सभी को आश्चर्य होता। सद्गुणों का तो मानो अवतार ही हो। पिता ने समस्त संस्कार उसमें कूट-2 कर भरे थे। ऐसे सुयोग्य बालक को पाकर माता-पिता के आनन्द की सीमा न रही। सात वर्ष का होते-2 उसे तक्षशिला के विश्वविद्यालय में विद्याध्ययन करने के लिये भेज दिया गया।

विधि की इच्छा। निष्कलंक को ऐसे अध्यापक के पास पढ़ना पड़ा जो छिप कर मद्यपान करता था। थोड़े दिन तो वह कुछ न समझ सका। पर जब वह अठारह वर्ष का हो गया तो ऊँच-नीच समझने लगा। एक दिन अपने गुरु को छिपकर मद्य-पान करते देखा। ब्राह्मण और उपाध्याय होते हुए भी सुरा पान! बालक को बड़ा क्षोभ आया। उसने अपना रोष प्रकट करते हुए कहा—गुरु जी! यह बहुत ही अनुचित है। आप इतने विद्वान् होते हुए भी ऐसा पाप करते हैं। मैं राजा से इसकी शिकायत करूंगा।

अध्यापक भय से काँपने लगे। उस युग में ब्राह्मण के लिये सुरापान करना अक्षम्य अपराध था, यदि राजा को पता चल जाए तो कठोर दण्ड भोगे बिना छुटकारा न मिले। जन्म-भर को जाति से बहिष्कृत होकर अपमान की अग्नि में जलना पड़े सो अलग। इस विपत्ति की सम्भावना से अध्यापक अत्यन्त व्याकुल हो गया। फिर उसने धैर्य धारण किया और एक उपाय सोच निकाला।

अध्याक ने एक मर्म हँसी हँसते हुए बालक के सिर पर हाथ फिराया और उसके कान के पास मुँह ले जा कर अत्यन्त धीमे स्वर में कहा-बेटा, इसमें बड़ा भारी रहस्य छिपा हुआ है। मेरे साथ घर चल, घर तुझे ये सब बताऊँगा। निष्कलंक गुरु के साथ हो लिया। जब दोनों कुटी पर पहुँच गये तो आदरपूर्वक बालक को बिठाते हुए गुरु ने कहा-बेटा, मैं तान्त्रिक हूँ। तन्त्र द्वारा कैसे-2 जादू भरे चमत्कारी कार्य मनुष्य कर सकता है सो तो तुम जानते ही हो। उसी तन्त्र साधना के लिए मुझे मद्यपान करना पड़ता है। तुम मेरे सब से प्यारे शिष्य हो। यदि तुम तन्त्र विद्या सीखना चाहो तो मैं तुम्हें सिखा सकता हूँ।

विभूतियों का लोभ किससे त्यागा गया है। अपने अन्दर आश्चर्यजनक शक्तियाँ लेने और दुनिया को अपनी उंगली के इशारे पर नचाने का लालच एक किशोर को फँसा लेने के लिये पर्याप्त था। वह गुरु के चरणों पर गिर पड़ा। ‘भगवान् मुझे वह विद्या सिखा कर कृतार्थ कर दीजिये।’ अध्यापक ने देखा कि मेरा जादू काम कर गया। उन्होंने गंभीरता पूर्वक उत्तर दिया, ‘अवश्य! मैं तुम्हें अवश्य सिखाऊंगा। पर उसकी साधना में जो कठोर कार्य करने पड़ते हैं उन्हें तुम कैसे कर सकोगे?’

किशोर ने कहा- कैसी ही कठोर साधना क्यों न हो मैं उसे पूरी करूंगा। गुरु ने उससे कहा- बेटा! तुम्हें एक हजार मनुष्यों का वध करना पड़ेगा। युवक ने यह स्वीकार कर लिया और वह तलवार लेकर जंगल की ओर चल दिया।

निष्कलंक घने वन में एक ऐसे स्थान पर छिपा रहा जहाँ आठ मार्गों का चौराहा था। वहाँ से जो पथिक निकलता वही निष्कलंक की तलवार का शिकार बन जाता। इस प्रकार राज-पथ के बन्द हो जाने से चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। सारा कौशल राज्य उसके आतंक से त्रस्त हो उठा। गुप्तचरों ने घोषित कर दिया कि यह डाकू और कोई नहीं आचार्य भार्गव का पुत्र निष्कलंक है। राजा एक बड़ी सेना के साथ स्वयं जाकर उस डाकू को मारने गये पर उन्हें बहुत प्रयत्न करने के बाद भी निराश लौटना पड़ा।

दस्यु की दुष्टता का सबसे अधिक दुःख निष्कलंक की माता को हुआ। वह तपस्वी ज्योतिर्भिक्षु के आश्रम में पहुँची। यह बौद्ध भिक्षु अहिंसा धर्म का प्रबल प्रचारक और ऐसा तेजस्वी था कि असंख्य मनुष्यों के जीवन का प्रवाह उसने पच्छिम से पूरब को पलट दिया था। माता ने भिक्षु के चरणों में अपना मस्तक रख दिया। माता की ममता उसकी आँखों में से टपक कर अपनी कथा आप कह रही थी। आँसू का प्रत्येक कण प्रार्थना कर रहा था। ऋषि निष्कलंक को सकलंक होने से बचा दीजिये।

भिक्षु को सारा घटना क्रम जानने में क्षण भर का भी विलम्ब न हुआ। उसने वृद्धा को भूमि पर से उठाते हुए कहा, ‘माता तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी, तुम्हारा पुत्र निष्कलंक ही रहेगा। तुम्हारा दुःख दूर करके अपना जीवन धन्य करूंगा।’ यह कहता हुआ भिक्षु अपने आसन पर से उठा और उत्तर दिशा के लिये चल दिया।

डाकू को ढूँढ़ता हुआ ज्योतिर्भिक्षु निविड़ वन में पहुँचा। अचानक अपने आप एक शिकार पास में आया देखकर दस्यु को बड़ी प्रसन्नता हुई। एक हजार मनुष्यों का वध करने में आज एक ही की कमी रह गई थी, सो ईश्वर ने अपने आप घर बैठे भेज दिया। साधना पूरी होने पर जो विभूतियाँ प्राप्त होंगी, उनकी कल्पना करता हुआ, तलवार हाथ में लेकर डाकू आगे बढ़ा।

दोनों निगाह से निगाह मिली। भिक्षु ने आत्म तेज की एक किरण फेंकते हुए कहा-बस, आगे पैर मत बढ़ाओ, जहाँ हो वहीं खड़े रहो। डाकू प्रस्तर मूर्ति की तरह जहाँ का तहाँ खड़ा रहा। अब वह अपना एक अंग हिलाने में भी असमर्थ था।

भिक्षु ने कहा-बेटा, तुम्हें बहुत भ्रम हुआ। धूर्त द्वारा बुरा तरह ठगे गये। हत्या और हिंसा द्वारा जो विभूतियाँ प्राप्त होती है, वे बड़ी ही मलीन और नीच कोटि की होती हैं तो अधिक दिन ठहरती भी नहीं। तुमने दुष्ट के बहकावे में आकर अपना लोक और परलोक बिगाड़ा। अब तुम्हें इस प्रपंच से बच कर ब्राह्मण धर्म का पालन करना चाहिये। चलो मेरे साथ चलो, मैं देखता हूँ कि तुम्हारे अन्दर ज्ञान की ज्योति जल रही है, मैं इसे प्रदीप्त करूंगा और तुम्हें ब्रह्म विद्या की शिक्षा दूँगा।

डाकू मन्त्र-मुग्ध की तरह खड़ा हुआ था। उसके हृदय को मानों कोई जोर-2 से मसोस रहा हो, पश्चात्ताप से सौ बिच्छू काटने की पीड़ा वह अनुभव कर रहा था। हाथ! मैं किस भ्रम में पड़ा रहा; मैंने अपने कर्त्तव्य धर्म की कितनी भारी उपेक्षा की। आँखों में से पानी की बूंदें टपक पड़ीं। भिक्षु उसे अपनी कुटी पर ले आया और सत्य धर्म की शिक्षा देने लगा।

समय बीतने लगा। निष्कलंक के कपाय कटने लगे। गुरु के लिये भिक्षा माँग लाना और विद्या पढ़ना, यही दो कार्य आश्रम में उसे करने पड़ते थे। अब वह सचमुच अपने नाम को सार्थक करने की स्थिति में पहुँच चुका था। ज्ञान की महिमा ऐसी ही है, उस गंगा में स्नान करके कौए कोयल हो जाते हैं और बगले हंस बन जाते हैं।

एक दिन वह भिक्षा माँगने गया हुआ था। रास्ते में देखा कि एक विधवा का बालक मर गया है और वह बिलख-2 कर रो रही है। निष्कंक उस विधवा को आश्रम में ले पहुँचा और भिक्षु जी से सब वृत्तांत कह दिया।

ज्योतिर्भिक्षु ने कहा-वत्स, आज तुम्हारी ही परीक्षा का समय है। मृत बालक को हाथ में लो और कहो कि “यदि मैंने जीवन भर में आज तक किसी भी प्राणी की हिंसा न की हो तो मेरे पुण्य प्रताप से यह बालक जीवित हो जाए।” निष्कलंक ने उन्हीं शब्दों को दुहरा दिया। वाक्य समाप्त होते-2 मृत बालक ने आँखें खोल दीं।

निष्कलंक आश्चर्य से चिल्ला उठा—प्रभो! यह कैसी विडम्बना! मैं 999 मनुष्यों की तो हत्या प्रत्यक्ष ही की है, फिर “किसी भी प्राणी की हिंसा न करने का क्या अर्थ?”

ज्योतिर्भिक्षु खिल-खिला कर हँस पड़े और बोले, वत्स! कर्म बन्धन तो तभी तक है जब तक कि मनुष्य उसमें बँधता है। स्वार्थ और लोभ जब तक है, तब तक कर्मों के भले-बुरे फल भी अवश्य मिलते हैं! पर जब आत्मा के असली स्वरूप को समझ लिया जाता है तो उसका अन्तर ईश्वरीय अखण्ड ज्योति से भर जाता है। उसके आचरण स्वार्थ, तृष्णा एवं भोगों के लिये नहीं वरन् सत्य, प्रेम, न्याय के लिये होते हैं। ऐसा जीवन मुक्त आत्म सर्वथा निष्कलंक है। तुमने सत्य की शोध करके तत्वज्ञान प्राप्त कर लिया है इसलिये पिछले कर्म-बन्धन से तुम्हें अनायास ही छुटकारा मिल गया। हे आत्मन! तुम सत्चित आनन्द स्वरूप हो इसलिये निष्कलंक हो। जीवन मुक्त हो। आत्मा और परमात्मा को पहिचान लेने पर तुम्हारी तरह अन्य प्राणी भी निष्कलंक हो सकते हैं।”

आश्रम के छात्र और अनेक दर्शक इस उपदेश को सुन रहे थे। यह सार उनके अन्तर में उतर गया। और सब ने अपने को निष्कलंक बनाने की प्रतिज्ञा कर ली।

गुरु ने उच्च स्वर में आवाज लगाई-निष्कलंक भगवान् की जय। सुनने वालों के असंख्य कण्ठों ने उसका अनुगमन किया। निष्कलंक भगवान की जय। आश्रम का पवित्र वातावरण उसकी प्रतिध्वनि से गूँज उठा। वायु ने यह पवित्र सन्देश दूर-2 देशों में फैला दिया। जागृति आत्माएं एक स्वर पुकारने लगीं:—

निष्कलंक भगवान की जय।


बुरी आदतें

(ले.—प्रो. विद्याभूषण जी अग्रवाल, एम. ए.)

प्रायः हम सभी यह भली-भाँति जानते हैं कि मनुष्य में भलाई और बुराई दोनों का समावेश होता है। एक ही प्राणी में अच्छाइयाँ और बुराइयाँ दूध-पानी अथवा धूप-छाया की तरह मिली रहती हैं। कोई भी मनुष्य न तो सम्पूर्णतः अच्छा ही है और न ही सौ फीसदी बुरा। बुरे से बुरा समझे जाना वाला मनुष्य भी कभी-कभी सद्गुणों से या तो प्रभावित हो जाता है और साधु-सन्त तथा महात्माओं से भी यदा-कदा गलती हो जाती है। ऐसा भी हम सभी जानते हैं।

जब तक हम मानव हैं अथवा मानवी विकारों की सीमा में आबद्ध हैं, तब तक हममें बुराई तथा अच्छाई दोनों ही रहेंगी। बुराइयों से हमारा छुटकारा तब तक नहीं है, जब तक हम देवत्व-पद न प्राप्त कर लें। फिर भी हम बुराइयों को दूर करना चाहते हैं। जीवन का ध्येय भी यही है। यह मानव के विकास का एक साधन है। उन्नति की एक सीढ़ी है। दुर्गुणों को दूर कर सद्गुणों को ग्रहण करना चाहिए। यही सदा हमारा एक मात्र लक्ष्य होना चाहिए।

बुराइयों को छोड़ने के सम्बन्ध में एक बात दृढ़तापूर्वक मन में निश्चय कर लेनी चाहिए कि वे दूर हो सकती हैं। अक्सर लोग बुराई अथवा बुरी आदतों के शिकार होते हैं; पर उन्हें नहीं छोड़ पाते। इसका एक कारण है कि वे अपने को अपने ‘अहं’ को बुराई के सामने कमजोर मान बैठते हैं। बुरी आदतों को कभी भी अपने स्वभाव अथवा चरित्र का एक आन्तरिक अंश नहीं मानना चाहिए। दुर्गुण हमारे चरित्र का एक अंश नहीं, वह तो ऊपर का एक छिलका है, जो दूर किया जा सकता है। जो लोग बुराई को यह समझते हैं कि वह उनके व्यक्तित्व का एक अंश है, वह भूल करते हैं और वही लोग अपनी आदतों के शिकार बने रहते हैं।

दुर्गुणों से छुटकारा पाने का एक दूसरा उपाय है, दृढ़ इच्छा शक्ति। बहुधा ऐसा होता है, लोग बुराई को दूर करने में अपने मन का पूरा जोर नहीं लगाते। या वह बिना सोचे समझे झट से तय कर लेते हैं कि अमुक चीज बुरी है। मान लीजिए आप सिगरेट पीते हैं। अब इसको छोड़ने का तब तक निश्चय मत कीजिए, जब तक आपको वास्तव में यह विश्वास नहीं हो जावे कि सिगरेट एक बुरी चीज़ है। उसके सेवन से आपको हानि हो रही है और उसके सेवन को छोड़ने से आपको चरित्र लाभ होगा। बुरी आदतों से लड़ना तब तक सहज नहीं, जब तक आपने उन पर अच्छी तरह सोच-विचार नहीं कर लिया है और उससे जूझने की आपकी अदम्य इच्छा-शक्ति नहीं है; युद्ध के लिए तैयारी करनी पड़ती है। ठीक उसी प्रकार बुरी आदतों से लड़ने के लिए अनेक प्रकार की तैयारी अपेक्षित है। जहाँ तुम्हारी बुराई सब से अधिक हल्की अथवा मामूली हो वहाँ पहले आक्रमण करना चाहिए। छोटी-छोटी बुराइयों को जीत लेने से मन में विश्वास जमता है और इच्छा-शक्ति बढ़ती है। इस लिए जब कभी तुम बुराइयों पर विजय पाना चाहो तो सदा छोटी दिखने वाली बुराई से प्रारम्भ करो। वर्षों की पड़ी आदतों से एक दम लड़ना प्रारम्भ मत करो, नहीं तो तुम अपनी अशक्त इच्छा-शक्ति के कारण हार जाओगे।

बुराइयाँ दूर करने की क्रिया में एक बान अधिक मदद करती है। वह यह है कि हमें बुराई पर उतना अधिक ध्यान नहीं देना चाहिए, जितना कि उसके विरोधी गुणों पर। उदाहरण के लिए मान लो, आपको क्रोध जल्दी आ जाता है। तो क्रोध की आदत को छोड़ने का सरल ढंग यह नहीं कि सदा क्रोध करने से हानि पर विचार किया जाए। क्रोध का त्याग करने में अधिक सहायता इस बात से मिलेगी कि आप “चित्त की शान्ति” पर विचार करें और उसे बढ़ाने का प्रयत्न करें। स्मरण रहे कि दुर्गुणों को दूर करने की उपेक्षा सद्गुणों का विकास करना अत्यन्त सरल है। मनुष्य स्वभावतः सद्गुणों की ओर प्रवृत्त होता है। इसलिए उन नवयुवकों को जो बुराइयों के शिकार हो रहे हैं, सदा अच्छाइयों के विकास पर अधिक ध्यान देना चाहिए। तभी वे अपनी बुरी आदतों को छोड़ सकेंगे। बुरी आदतों को छोड़ने के इच्छुक नवयुवकों को निम्नलिखित बातों पर सदा ध्यान रखना चाहिए—

1—बुराई मनुष्य की आत्मा का बाह्य उपकरण है; वह इच्छा-शक्ति-द्वारा छिलके के समान उतार कर फेंका जा सकता है।

2—बहुत पुरानी और तुम्हारे स्वभाव में गहरी जड़ें जमाने वाली आदतों को पहले मत छुओ। सर्वप्रथम छोटी-छोटी बुराइयों को त्यागो, फिर क्रमशः कठिन बुराइयों को दूर करने का उद्योग करो।

3—बुराइयों को दूर करने पर उतना अधिक जोर मत दो, जितना कि उनकी विरोधी अच्छाइयों के विकास पर।

4—सदा मन में इस बात का विश्वास रखो कि जो कोई कार्य अन्य कोई भी प्राणी कर चुका है, उसे तुम भी कर सकते हो। ऐसा सोचने में ही तुम्हारा कल्याण है।


Quotation

सच्चा मित्र आपत्ति काल में ही जाना जा सकता है।

*****

समय का दुर्व्यय करने अपना ही जीवन से द्वेष करना है। समय के द्वारा ही जीवन का संगठन हुआ है।


सत्संग का महत्व

(ले.—ऋषि तिरुवल्लुवर)

यह एक बड़े सौभाग्य की बात है कि किसी मनुष्य को महान पुरुषों का सत्संग, प्रेम या समीप रहना प्राप्त हो। योग्य व्यक्तियों को तुमने यदि अपना मित्र बना लिया, तो सचमुच ही तुमने एक शक्ति संपादित कर ली, जो बहुत मूल्यवान् और महत्वपूर्ण है। तुम्हें ऐसे व्यक्तियों का प्रेम-पात्र बनने का सदैव प्रयत्न करते रहना चाहिए, जो कष्ट पड़ने पर तुम्हारी सहायता कर सकते हैं और बुराइयों से बचाने की एवं निराशा में आशा का संचार करने की क्षमता रखते हैं।

खुशामदी और चापलूसों से घिर जाना आसान है। मतलबी दोस्त तो पल भर में इकट्ठे हो सकते हैं, पर ऐसे व्यक्तियों का मिलना कठिन है, जो कड़ुई समालोचना कर सकें, जो खरी सलाह दे सकें। राजा और साहूकारों की मित्रता मूल्यवान् समझी जाती हैं, पर सब से उत्तम मित्रता उन धार्मिक पुरुषों की है, जिनकी आत्मा महान है। जिसके पास पूँजी नहीं है, वह कैसा व्यापारी? जिसके पास सच्चे मित्र नहीं हैं, वह कैसा बुद्धिमान? उन्नति के साधनों में इस बात का बड़ा मूल्य है कि मनुष्य को श्रेष्ठ मित्रों का सहयोग प्राप्त हो। बहुत से शत्रु उत्पन्न कर लेना मूर्खता है, पर उससे भी बढ़कर मूर्खता यह है कि भले व्यक्तियों की मित्रता को छोड़ दिया जाए।

निर्मल बुद्धि और श्रम में श्रद्धा, यही दो वस्तुएं तो किसी मनुष्य को महान बनाने वाली हैं। उत्तम गुणों को अपनाने से नीच ऊँचे बन सकते हैं और दुर्गुणों के द्वारा बड़े-छोटे हो जाते हैं। निरन्तर की लगन, सावधानी, समय का सदुपयोग छोटे को बड़ा बना सकते हैं, हीन मनुष्यों को कुलीन कर सकते हैं।


‘सत्’ के अनादि त्रिभद

सत्य धर्म का प्रचार करने के लिये अखण्ड-ज्योति की ओर से जो सतयुग आन्दोलन आरम्भ किया गया है, वह कोई नवीन पथ नहीं है। सृष्टि का निर्माण जिन तत्वों के आधार पर हुआ है और जिनके द्वारा निखिल विश्व ब्रह्माण्ड की समस्त क्रियायें हो रही हैं, उन्हीं को नवीन व्यवस्था के साथ उपस्थित किया गया है। वर्तमान पाप-तापों से छुटकारा पाना है तो इस त्रिवेणी में डुबकी लगा कर ही मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। यह शाश्वत तत्व अनादि हैं। इनका संतुलन ठीक रखने से संसार की वर्तमान अव्यवस्था दूर हो सकती है और सतयुग आ सकता है। पाठक, नीचे के कोष्ठक पर गम्भीरतापूर्वक मनन करेंगे, तो उन्हें ‘सत्’ आन्दोलन की गहरी नींव का प्रमाण मिलेगा।

सत्य प्रेम न्याय

ह्रीं श्रीं कीं

भूः भुवः स्वः

सत्चित्आनन्द

सत रज तम

सत्य शिव सुन्दर

ईश्वर जीव प्रकृति

ब्रह्मा विष्णु महेश

ज्ञान भक्ति कर्म

आध्यात्मिक आधिदैविक आधिभौतिक

योग यज्ञ तप

मन वचन कर्म

आत्मा हृदय मस्तिष्क

कर्ता कर्म क्रिया

शैशव यौवन बुढ़ापा

वात कफ पित्त

ब्राह्मण वैश्य क्षत्रिय

ऋग् यजु साम

गंगा यमुना सरस्वती

ब्रह्मर्षि देवर्षि राजर्षि


विश्व शान्ति का राज-मार्ग

लोबेल फिल्मोर

“आज की दुनिया में जब मनुष्य और राष्ट्र अपनी क्षुद्र सीमाओं में घुट रहा है, तुच्छातितुच्छ स्वार्थ को लेकर पशुता को लज्जित कर रहा है और संहार पर तुला हुआ है। इस बात की और भी आवश्यकता है कि हम अपने भीतर दैवी विभूतियों का दान-दम अभय का विकास करें और इस प्रकार विश्व-कल्याण में अपना सच्चा हार्दिक योग प्रदान करें। भयत्रस्त, आपद् ग्रस्त मानवता की वास्तविक मुक्ति का एक-मात्र यही मार्ग है। हममें से कुछ के भीतर भी यदि इन दैवी गुणों का सही-2 विकास हो सका तो संसार की काया पलट जाएगी। अभाव और कष्टों से घिरी मानवता एक बार खुली हवा में सुख की साँस लेगी। सद्धर्म की एक धारा हवा में सुख की साँस लेगी। सद्धर्म की एक धारा सी छूट पड़ेगी और उसमें हमारे भीतर जो कुछ भी खोटापन होगा, संकीर्णता होगी, सब बह जाएगी और संसार के परदे पर जो आज गर्दा जम गया है, वह सब एक झटके में झड़ जाएगा। इस प्रकार आत्माहुति के साधनों की संख्या ज्यों-ज्यों बढ़ेगी, त्यों-त्यों संसार से युद्ध का नामोनिशाँ मिट जाएगा, दुःख, अवसाद, अन्याय, उत्पीड़न, पूँजीवादियों के अत्याचार, सब के सब सदा के लिये मिट जायेंगे और फिर जेल और पागलखाने की जरूरत भी न रहेगी। परन्तु इस उच्च आदर्श की प्राप्ति तब तक हो ही कैसे सकती है, जब तक हम में से एक-एक अपने आपको और अपने सर्वस्व को भगवत्कार्य और भगवत्संकल्प को सिद्ध करने में होम न कर दे। समाज में परिवार में एक व्यक्ति जहाँ इस शुभ योजना में लग जाएगा वहाँ संक्रामक की तरह वह चीज़ आस-पास के व्यक्तियों और वातावरण को प्रभावित किये बिना न रहेगी। इसलिये समय और सुयोग की प्रतीक्षा न कर हमें इस पवित्र अनुष्ठान में अविलम्ब लग जाना चाहिये, इसी में हमारा और विश्व का वास्तविक कल्याण है।”


महात्मा बुद्ध की डायरी

(ले—श्री दरबारीलाल जी, ‘सत्य-भक्त’)

मनुष्य वास्तव में अभी पशु है, वह पशु बल के आगे झुकता है, त्याग-तप और सेवा का उसके सामने कुछ मूल्य नहीं। अगर मैं तलवार उठाये स्त्रियों को विधवा बनाना शुरू कर दूँ, बच्चों के बाप छीन लूँ, बुड्ढों के बच्चे छीन लूँ, तो वे ही लोग मेरे सामने सिर झुकायेंगे, सोना, चाँदी, हीरा, माणिक आदि की भेंट चढ़ायेंगे। मुझे अपना रक्षक और अन्नदाता कहेंगे, जिनके बेटों को भाइयों को और बापों को मैं तलवार के घाट उतारूंगा और आज जब मैं समस्त राज-वैभव त्याग कर, बिलकुल निरुप द्रव होकर, सेवक बनकर, जनता के सामने आया तो मुझे जनता ने खाने को क्या दिया? वही दिया जो मेरे यहाँ जानवर भी नहीं खा सकते थे। जिसे देखकर आँतें तक मुँह से निकलना चाहती हैं।

मार पापी कह रहा है-”मार्ष, मैंने तुम से कहा था न, दुनिया को तुम्हारे त्याग की परवाह नहीं है, उसकी दृष्टि में जैसे सैकड़ों भिखारी भीख माँगते फिरते हैं, वैसे तुम भी हो। तुम उसे इस तरह क्या दे पाओगे। लातों के देवता बातों से नहीं मानते। तुम घर में तीन वर्ष के पुराने सुगन्धित चावलों का भोजन करते थे। एक से एक बढ़कर रस पीते थे, वह सब तुम्हें यहाँ भी मिलता, अगर तुम राजा बनकर आते। आज तुम त्यागी बनकर आये, समझे होगे, अब मैं राजाओं से भी बड़ा हो गया, पर दुनिया ने तुम्हें क्या समझा? सिर्फ एक भिखारी। मार्ष भला चाहो तो अब लौट जाओ।” मन में बैठा हुआ पापी मार मौके बे मौके ऐसी ही चोटें किया करता है। पर मुझे नहीं जीत पाता। पापी मार ने जब मुझे ऐसे ताने मारे, तब मैंने उससे कहा-

मूर्ख, तू त्याग के रहस्य को क्या जाने। दुनिया पशु-बल के वैभव के और अधिकार के आगे झुकती है। त्याग की सेवा की कद्र नहीं करती। यह तो उसकी बीमारी है, जिसे मैं दूर करना चाहता हूँ। वैद्य अगर रोगी के रोग से घबरा जाये, तो वह उसकी चिकित्सा क्या करेगा। सन्निपात में रोगी वैद्य को गालियाँ भी देता है। लातें भी मारता है, पर वैद्य इन बातों का विचार कहीं करता। वह उसकी चिकित्सा करता है। मुझे उसकी चिकित्सा का विचार करना है। मूर्खता से किये गये अपमान या उपेक्षा पर ध्यान नहीं देना है। राजा बनकर मैं आदर पा सकता हूँ, पर अनन्त यश नहीं। वह यश तो अपने हृदय से निकलता है और जगत् की परवाह नहीं करता।

मेरी बातों से पापी निरुत्तर हो जाता है।

-नई दुनिया।


टेढ़ापन निकाल दो।

एक बुढ़िया के चरखे का तकुआ टेढ़ा हो गया था। उसमें ठीक तरह सूत न कतता। बुढ़िया ने अपने लड़के को तकुआ ठीक कराने के लिए लुहार की दुकान पर भेजा। लड़के ने लुहार के हाथ में तकुआ दे दिया और कहा इसमें टेढ़ापन आ गया, कृपया उसे निकाल दीजिए।

लुहार ने तकुए को ले लिया और उसमें जहाँ टेढ़ापन था, वहाँ हथोड़े को चोट लगाकर ठीक कर दिया और अपनी मजदूरी माँगने लगा। लड़के ने कहा-जो टेढ़ापन आपने इसमें से निकाला है, वह मुझे दे दो, माता जी माँगेंगी। लुहार ने लड़के को बताया कि—भोले बच्चे, टेढ़ापन कोई चीज़ नहीं है। वह तो तकुए की एक हालत है, जो हथौड़े के लगने से ठीक हो जाती है और उसका सीधापन फिर वापिस आ जाता है। ऐसी हालत में तुम्हें टेढ़ापन वापिस कैसे दे सकता हूँ। लड़के ने कहा-जब आपने इसमें से कुछ निकाला ही नहीं, तो मज़दूरी किस बात की माँगते हो? दुकान पर बैठे हुए सब लोग हँसने लगे। लड़के की बात से लुहार बहुत खुश हुआ और बिना मजदूरी लिये ही उसको तकुआ दे दिया। लड़का चला गया।

दुकान पर बहुत लोग बैठे हुए हँस रहे थे कि लड़का कैसा बातूनी था। एक साधु भी वहीं बैठे हुए थे। उन्होंने कहा—भाइयो, यह घटना हमारी आत्मा के ऊपर ठीक तरह घटित होती है। जैसे टेढ़ापन कोई अलग चीज़ नहीं है, एक खयाली बात है वैसे ही मनोविकार कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है। हथौड़े की एक चोट लगाते ही जैसे तकुआ फिर सीधा हो जाता है वैसे ही ज्ञान की एक ठोकर लगते ही आत्मा का सत्-चित् आनन्द स्वरूप अपने आप प्रकट हो जाता है।

लुहार ने कोई वस्तु न तो उस तकुए में से निकाली और न उसमें कुछ नई डाली। इसी प्रकार कोई उपदेशक न तो कुछ हमारे अन्दर से निकाल सकता है और न डाल सकता है। गुरु ज्ञान का हथौड़ा लगा कर हमारी टेढ़ी चाल को सीधी कर देता है, बस फिर चर्खा ठीक तरह सूत कातने लगता है। अपना उद्धार करने के लिये हम लोग बहुत सा मसाला इधर-उधर से इकट्ठा करते फिरते हैं, पर सच तो यह है कि हमें न तो कुछ अपना बाहर निकालने की जरूरत है और न बाहर से कुछ लेने की। यदि हम लोग अपना टेढ़ापन निकाल दें और स्वाभाविक सीधेपन पर आ जायें तो बस, फिर सब काम ठीक हो जाये, मनचाही वस्तु अपने आप प्राप्त हो जाये।


कर्तव्य की जिम्मेदारी

प्राचीन समय में रात्रि के समय समुद्री जहाजों के पथ-प्रदर्शन करने के लिए छोटे-छोटे टापुओं पर प्रकाश-स्तम्भ खड़े किये जाते हैं। उन पर रोशनी ठीक रखने के लिए चौकीदार नियुक्त किये जाते थे। इन चौकीदारों का कर्तव्य बड़ा कठोर होता था। यदि किसी कारणवश रोशनी न हो तो पानी के जहाज टापू से टकरा कर उलट सकते थे और सैकड़ों आदमियों की जानें जा सकती थीं।

अमेरिका के एक टापू में ऐसा ही प्रकाश-स्तंभ था, एक दिन रोशनी करने वाला चौकीदार हृदय की गति रुक जाने से अचानक संध्या-समय मर गया। स्त्री को बड़ा दुःख हुआ। उस टापू पर वहाँ यह तीन व्यक्ति थे, चौकीदार,उसकी स्त्री और दो वर्ष का बालक। स्त्री विपत्ति और वियोग के दुःख से आर्त्त होकर रोने लगी।

दस मिनट भी न हो पाये थे कि स्त्री को अपने महान कर्तव्य का ध्यान आया। आँखों से बहते हुए पानी को उसने रोका, पति की लाश को एक कोठरी में बन्द किया और उसी में अपने छोटे बच्चे को सुलाकर बाहर से किवाड़ बन्द कर दिये। स्त्री प्रकाश-दीपक के पास स्तंभ पर चढ़कर पहुँची और उसे जलाने लगी। दीपक तो उसने जला दिया, पर काँच की चिमनी यथा-स्थान न लगा सकी। उसे इसका कुछ अनुभव थोड़े ही था।

स्त्री ने सोचा चिमनी ठीक न लगने पर हवा से दीपक बुझ जाएगा। इसलिए उसने निश्चय किया कि हाथ से चिमनी पकड़े हुए रात भर वहीं खड़ी रहेगी। कर्तव्य का उत्तरदायित्व जो उसे पूरा करना था। वह फौजी कप्तान की तरह अपने कर्तव्य के मोर्चे पर डटी रही। रात को इतनी अधिक सर्दी पड़ी और ऐसा बर्फीला तूफान आया कि सवेरा होते-होते वह स्त्री भी ठंड के मारे गिरकर मर गई।

दूसरे दिन प्रातः काल एक जहाज उधर से निकला। उसने देखा कि प्रकाश स्तम्भ सुनसान पड़ा हुआ है। नाविक उतर कर वहाँ गया। स्त्री की लाश चिमनी हाथ में लिये हुए पड़ी थी। कोठरी खोली गई तो चौकीदार का मृत शरीर रखा हुआ था। कोठरी में बन्द हुआ बच्चा रो-रो कर अम्मा को पुकार रहा था।

जहाज के अधिकारियों को सारी घटना समझने में देर न लगी। उनने बालक को गोदी में उठा लिया और पुचकारते हुए उससे कहा—बच्चे, तुम भूलते हो, वह तुम्हारी ही अम्मा नहीं थी, वह तो अनेक स्त्री-पुरुषों की माता थी, जिनकी जानों को उसने अपनी जान देकर बचाया।”


‘सत्य’ सम्प्रदाय का धर्म-शास्त्र

कई पाठक हम से पूछते हैं कि “अखण्ड-ज्योति द्वारा जो सत्-धर्म का प्रचार किया जा रहा है। क्या यह कोई सम्प्रदाय है? उसका कोई धर्म-ग्रन्थ है? किस शास्त्र के आधार पर इसका निर्माण हुआ है? सत्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को क्या करना चाहिये? क्या मानना चाहिये? क्या न मानना चाहिये? इन सब बातों का विस्तारपूर्वक उत्तर देने वाला कोई विधान होना चाहिये।”

पाठकों को जानना चाहिये कि ‘सत्-धर्म’ अत्यन्त प्राचीन सम्प्रदाय है। इससे पूर्व किसी भी धर्म की स्थापना नहीं हुई है। सृष्टि का निर्माण होने पर जीवों में जब चेतना-शक्ति उत्पन्न हुई और वे कुछ सोचने-विचारने लगे तो उनके सामने सबसे प्रथम यह प्रश्न आया कि ‘हमें क्या करना चाहिये?’ उस समय भाषा और लिपि का सुव्यवस्थित प्रचलन नहीं था और न कोई धर्म-पुस्तकें ही मौजूद थीं। शिक्षा देने वाले धर्म-गुरु भी दृष्टिगोचर न होते थे, ऐसी दशा में अपने अन्दर से ही पथ-प्रदर्शन करने वाली प्रेरणा जागृत होती थी और प्राणी उसी के अनुसार आचरण करते थे।

नटनागर ने त्रिगुणमयी सृष्टि का निर्माण करके बालकों को खेलने और अभ्यास करने के लिये तीन रंग की गेंदें फेंक दीं, कभी एक लुढ़कती, कभी दूसरी, बच्चे उनमें उलझने लगे। प्रकृति के साथ विकृति का जन्म हुआ। अल्लाह के साथ शैतान उत्पन्न हुआ और सत् के पीछे असत् पैदा हो गया। अल्लाह ने आदम को सब से पहिले आदेश किया था पीछे उन्हें शैतान ने बहका लिया। अन्तःकरण में से सत् की, औचित्य की, कर्त्तव्य की, धर्म की, पुकार सबसे पहिले उठती है, ईश्वर का सन्देश सबसे पहिले आता है, उसके पीछे ही पीछे शैतान की हरकत होती आई है। सत् असत् का द्वन्द्व प्राचीन काल से है। पर इसमें पहिले सत् ही उत्पन्न हुआ। सुर पहिले जन्मे, असुर उसके बाद। जीवन पहिले हुआ मृत्यु उसके बाद। वेद अनादि है इसका अर्थ यह है कि जीवों की अन्तरात्मा में सब से प्रथम सत्य धर्म का सन्देश आया। वेद की भाषा या मंत्र संहिता ईश्वर की लिखी हुई है, यह मान्यता ठीक नहीं, वास्तविकता यह है कि प्रबुद्ध आत्माओं के ऋषियों के अन्तःकरण में ईश्वरीय संदेश आये और उन्होंने उस सन्देश को मन्त्र की तरह रच दिया। प्रायः सभी धर्मों की मान्यता यह है कि उनका धर्म अनादि है, पैगम्बरों और अवतारों ने तो उनका पुनरुद्धार मात्र किया है।

तत्वतः सभी धर्म अनादि हैं। अर्थात् एक ही अनादि धर्म की शाखाएँ हैं। उनका पोषण, जिस वस्तु से होता है वह ‘सत्’ तत्व है। वही धर्म ठहर सकते हैं जो सत् पर अवलंबित हैं। असत् वंचना है वह अल्प-स्थायी होती है और वह बहुत जल्दी नष्ट हो जाती है। कोई भी संप्रदाय यह कहने का साहस नहीं कर सकता कि हमारा धर्म ‘सत्’ पर अवलंबित नहीं है। इस लिये यह स्वीकार करना ही होगा कि सब से प्राचीन धर्म अनादि धर्म ‘सत्’ है और उसका आश्रय लेकर प्राचीन और अर्वाचीन मजहबों की रचना हुई है। इसलिये पाठकों को ऐसा न समझना चाहिये कि अखण्ड-ज्योति द्वारा प्रचारित ‘सत्-धर्म’ कोई नवीन संप्रदाय है। यह तो वही महान् तत्व है जिसे अनादि कह सकते हैं।

विभिन्न सम्प्रदायों के अपने-2 स्वतन्त्र धर्म-ग्रन्थ हैं। वेद, कुरान, बाइबिल, जिन्दावस्ता, धम्मपद आदि असंख्य धर्म-शास्त्रों में उसी महान् सत् की व्याख्या की गई है। अपनी-2 शक्ति के अनुसार इन महान शाखाओं ने सत् की व्याख्या की है, फिर भी उन्हें सन्तोष नहीं हुआ और अपने कथन की अपूर्णता स्वीकार करते हुए ‘नेति नेति’ ही कहते रहे। सभी धर्मों में नये सुधारक होते रहे और उन्होंने पुरानी व्याख्या को दोषपूर्ण बता कर अपनी रुचि के अनुसार सुधार किये। इन सुधारकों का कथन था कि उन्हें ईश्वर ने ऐसा ही सुधार करने के निमित्त भेजा है, उन्हें ऐसी ही ईश्वरीय प्रेरणा हुई है। बाइबिल और कुरान के संशोधन सर्वविदित हैं। वेदों का एक से चार हो जाना इसी सुधार का द्योतक है। इन सुधारकों में भी सुधार करने वाले होते आये हैं, और वे सब भी धर्माचार्य ही थे। संप्रदायों के मूल धर्म-ग्रन्थों की रचना और उनमें हुए संशोधन एवं एक-दूसरे की भिन्नता पर गंभीर पर्यावलोकन करने से यह बात अच्छी तरह समझी जा सकती है कि विश्व के लाखों-करोड़ों धर्म-ग्रन्थ उस महान् ‘सत्’ की व्याख्या करने में लगे हुए हैं किन्तु कोई भी पूर्णता को नहीं पहुँच सका है। जब हजारों-लाखों धर्म-ग्रन्थों में सत् की व्याख्या पूरी नहीं हो सकी और अभी तक उनमें लगातार सुधार होते चले आ रहे हैं तो अखण्ड-ज्योति से ऐसे किसी धर्म-ग्रन्थ की आशा करना व्यर्थ है जो पूर्ण हो। पाठकों को किसी धर्म-ग्रन्थ की माँग करने से पूर्व इस बात पर विचार करना होगा कि यह शास्त्र आखिर हैं क्या? करीब तीन सौ धर्मों के प्रधान शास्त्रों का अध्ययन करके हम (सम्पादक) यह जान सके हैं कि उनकी अन्तरात्मा में ज्ञान और कर्म की विवेचना है। कुछ-2 इतिहास का भी सम्मिश्रण है। इतिहास को हम इस समय अलग छोड़ देते हैं। ज्ञान का मूलभूत सिद्धान्त, जो सभी धर्मों को मान्य है, वह यह है कि “सर्व शक्तिमान ईश्वर को प्राप्त करना चाहिये।” वह ईश्वर क्या है और कैसा है, इसकी व्याख्या में उसके गुण बताये गये हैं। वह अजर, अमर, निर्विकार, दयालु, दाता, क्षमा करने वाला, सत्य प्रेमी, उपकारी आदि है। इन गुणों वाले ईश्वर को प्राप्त करना चाहिये। अर्थात् जो शक्ति इन गुणों वाली है, उसे अपने अन्दर धारण करना चाहिये। सूर्य का सेवन करना अर्थात् उसकी किरणों का प्रयोग करना, अग्नि का उपयोग करना अर्थात् गर्मी को काम में लाना; ईश्वर को प्राप्त करना अर्थात् उसके जैसे गुणों वाला स्वयं बन जाना। तात्पर्य यह है कि जीव को उच्च-ईश्वरीय गुणों को प्राप्त करना, ईश्वर को प्राप्त करना, उसमें मिल जाना चाहिये। शास्त्रों की दूसरी व्यवस्था कर्म है। कर्म परिवर्तनशील है। वह घड़ी-घड़ी पर बदलता है। एक दिन-रात में आवश्यकतानुसार पचासों तरह के काम करने पड़ते हैं। वर्ष दो वर्ष बाद इन कर्मों का क्रम बिलकुल बदल जाता है और पुराना टाइम टेबल उस समय के लिये व्यर्थ एवं हानिकारक बन जाता है। बचपन की दिनचर्या को जवानी में और जवानी की दिनचर्या को बुढ़ापे में काम में लाने वाला मूर्ख कहा जाएगा। उसे इच्छा, या अनिच्छा से समय की प्रगति के साथ-2 कार्य-क्रम बदलना पड़ेगा। जाड़े के नियम गर्मी के दिनों में बेकार हैं।

“ईश्वर को प्राप्त करना चाहिये। “ यह मन्त्र सर्वसम्मत है। मतभेद इस बात में है कि ईश्वर में कौन-कौन से गुण हैं और उसे किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। यह जिज्ञासु की मनोभूमि के ऊपर निर्भर है। अविकसित मस्तिष्क वाला जंगली मनुष्य यह समझता है कि चिड़ियों का अण्डा चढ़ाने से ईश्वर खुश होता है। एक देश के मनुष्य समझते हैं कि बकरी, गाय आदि की कुर्बानी करने से ईश्वर प्राप्त किया जा सकता है। ईश्वर के स्वभाव और गुणों के बारे में भी ऐसी ही विरोधी कल्पनाएं हैं। जंगली लोगों का ईश्वर बात-बात में नाराज हो जाता है और लोगों को विपत्ति में डाल देता है, जब कि ईसाइयों का परमात्मा प्रेममय है। लोगों का हृदय जितना विशाल होता जाता है, उतने ही उच्च गुण वह ईश्वर में आरोपित करते हैं। अर्थात् हर मनुष्य अपने वर्तमान जीवन की अपेक्षा ऊँचे गुण वाले ईश्वर को मानता है। विकास की सीढ़ी पर जैसे-जैसे कदम बढ़ाता है, वैसे ही वैसे वास्तविक तत्व के निकट पहुँचता जाता है। ईश्वर के गुण-स्वभाव का कोई ठीक-ठीक निर्धारण इस लिए नहीं हो सकता कि मनुष्यों की मनो-भूमि भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है, इसलिए ईश्वर भी भिन्न-भिन्न प्रकार का ही होता है। हर आदमी का ईश्वर उसकी योग्यतानुसार अलग प्रकार का है, इसलिए धर्म-ग्रन्थों में ईश्वर सम्बन्धी मतभेद रचना आवश्यक है।

कर्म के विषय में भी पहिले ही कह चुके हैं कि रीति-रिवाजों का बदलना बहुत ही स्वाभाविक और आवश्यक है। नये अवतार पैगम्बर, ज्ञान (ईश्वर) और कर्म (रिवाजों) के सम्बन्ध में परिवर्तन करते रहे हैं और रहेंगे। इसका कारण यह है कि उनसे पहले पैगम्बर के समय की और इस समय की परिस्थितियों में अन्तर हो गया। यह परिवर्तन अत्यन्त आवश्यक है, इन्हें रोकना साँस रोकने जैसा कठिन है।

उपरोक्त पंक्तियों को ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद पाठक समझ गये होंगे कि धर्मग्रन्थों में क्यों परिवर्तन होते रहते हैं और उनमें परस्पर विरोध होने का कारण क्या है? मनुष्यों की मनोभूमि के अनुसार ईश्वर के, ज्ञान के, स्वरूप में अन्तर आता है और समय के अनुसार कर्मों में, रीति-रिवाजों में फर्क पड़ता है। इस प्रकार कोई भी धर्म-शास्त्र एक प्रकार की मनोभूमि वालों के लिए और एक समय के लिए ही उपयोगी हो सकता है। किसी के लिए कभी कोई शास्त्र उपयोगी है, तो किन्हीं के लिए कभी वह अत्यन्त हानिकारक भी हो सकता है।

अखण्ड-ज्योति मानती है कि आत्मा स्वतन्त्र, शक्तिवान् और प्रकाशस्वरूप है। उस पर नाना प्रकार के नियन्त्रण स्थापित करने की आवश्यकता नहीं है। केवल आत्मा के दैवी अंश को प्रोत्साहन देने और आसुरी अंश को दबाने की व्यवस्था करने से धर्मग्रन्थ की आवश्यकता पूरी हो सकती है। अब हमें नाना जंजालों से भरे हुए मत-मतान्तरों की ओर पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उनमें से बहुत सी वस्तुएं समय से पीछे की हो जाने के कारण निरुपयोगी हो गई हैं। उनसे चिपके रहने का अर्थ यह होगा कि हम अपने हाथ पाँव बाँधकर अपने को अंधेरी कोठरी में पटक लें। सभी धर्मग्रन्थों में गुण और सभी में दोष हैं। उनकी आधार शिला सत्य के ऊपर रखी गई है, इसलिए उनमें बहुत से गुण हैं; किन्तु मनुष्य ने उन्हें बनाया है, इसलिए मनुष्य में भी जो दोष होते हैं, वे भी उनमें मिल गये हैं। हमें सभी धर्मग्रन्थों का आदर करना चाहिए। हंस की वृत्ति ग्रहण करके उनमें से दूध को ले लेना चाहिए और पानी को छोड़ देना चाहिए। अब इतने धर्म-ग्रन्थ मौजूद हैं तो और नये ग्रन्थों की क्या आवश्यकता रह जाती है। जो भी नया धर्म शास्त्र बनेगा, वह उन्हीं गुण-दोषों से परिपूर्ण होगा, जिनसे कि पुराने ग्रन्थ भरे पड़े हैं।

सत् धर्म का सन्देश है कि-हे ईश्वर के प्राण प्रिय राजकुमारों! हे सच्चिदानन्द आत्माओं! हे नवीन युग के निष्कलंक अग्रदूतों! अपने अन्तःकरणों में ज्योति पैदा करो। अपने हृदयों के कषाय कल्मषों को मथकर निरन्तर धोते रहो। अपने अन्दर पवित्रता, निर्मलता और स्वच्छता को प्रतिक्षण स्थान देते रहो, इससे तुम्हारे अन्दर ब्रह्मत्व जागृत होगा, ऋषित्व उदय होगा। ईश्वर की वाणी तुम्हारे अन्तरात्मा का स्वयं पथ-प्रदर्शन करेगी और बतायेगी कि इस युग का धर्म क्या है, इस वर्तमान समय का कर्म क्या है? अब आप अनादि सत् धर्म को स्वीकार करते हैं, तो इन नाना प्रकार के जंजालों से भरी हुई पुस्तकों की ओर क्यों ताकें? सृष्टि के आदि में जब सत् धर्म का उदय हुआ था तो जीवों का पथ-प्रदर्शन उनकी अन्तरात्मा में बैठे हुए परमात्मा ने किया था, इसी को ‘वेद’ या आकाशवाणी कहा जाता है। आप पुस्तकों की गुलामी छोड़िए और आकाशवाणी की ओर दृष्टिपात कीजिए। आपकी अन्तरात्मा स्वतंत्र है, शक्तिमान है और प्रकाशस्वरूप है। वह आपको आपकी स्थिति के अनुकूल ठीक-ठीक मार्ग बता सकती है। यह मत सोचिए कि आप तुच्छ, अल्प और असहाय प्राणी हैं और आपको अन्धे की तरह किसी उंगली पकड़कर ले चलने वाले की जरूरत है। ऐसा विचार करना आत्मा के ईश्वरीय अंश का तिरस्कार करना होगा।

अखण्ड ज्योति कहती है कि हे सत् धर्म की दीक्षा देने वालों, अपने अन्दर सत्य को धारण करो। अपने अन्दर प्रेम को धारण करो। अपने आत्मा के सामने और परमात्मा के सामने सच्चे बनो। अपने अन्दर ऋषित्व को उत्पन्न करो, फिर अन्तर में बैठे हुए परमात्मा से पूछो कि हे हमारे अनादि सत् -धर्म के आचार्य ! हे सत्य नारायण प्रभु! हमें हमारे धर्म का उपदेश दीजिए, हमें हमारे कर्तव्य की शिक्षा दीजिए, हमारा पथ प्रदर्शन कीजिए। आप देखेंगे कि वेद का ज्ञान, आकाशवाणी का उद्भव, आपके अन्दर से ही होता है, हर समस्या के सम्बन्ध में एक सुलझा हुआ ठीक आदेश मिलता है, और वह गुरु धर्माधर्म का ठीक-ठीक निर्णय कर देता है। सत् धर्म मनुष्यकृत नहीं है, दैवी है। इसलिए इस धर्म का धर्मग्रन्थ मनुष्य द्वारा नहीं, अन्तः करण द्वारा निर्मित होगा। यह धर्मग्रन्थ आप सब लोगों के पास है। केवल अपनी दृष्टिशोधन करके नेत्रों के देखने के लिए सक्षम बनाने की आवश्यकता है।


खतरे का घंटा बज रहा है!

आगामी क्षण कितने विषम, भयानक और चिन्ताजनक हैं, उनका आभास हर कोई समझदार व्यक्ति पा रहा है। खतरे का घंटा घनघोर गर्जना कर रहा है। भविष्य के गर्भ में कितनी वेदना छिपी हुई है, उसे कौन जानता है? कितनी सौभाग्यवती देवियों का सौभाग्य-सिन्दूर पुँछ जाएगा। कितनी माताएँ अपने बालकों के लिए विलाप करेंगी, कितने स्नेह-सम्बन्धी एक-दूसरे से सदा के लिए पृथक हो जाएंगे, कितने अमीर भिक्षा का ठीकरा हाथ में लिये हुए दर-दर भटकेंगे, कितने विशाल भवन खंडहर की तरह धूलि में लोटेंगे, यह सब निकटवर्ती समय हमें बता देगा। निस्संदेह राजा से रंक तक सभी को प्रज्ज्वलित अग्नि शिखाओं के बीच में से गुजरना पड़ेगा। कितने सौभाग्यशाली इन लपटों को चीरते हुए बिना दाग बाहर निकले यह देखना है। महाभारत की इन कराल डाढ़ों में से अछूते निकलने वाले व्यक्ति कितने होंगे, यह कौन जानता है। इन पंक्तियों को लिखते समय भारत के समुद्री तट पर बम वर्षा हो रही है। छप कर अंक पाठकों के हाथ में पहुँचते समय तक संकट कई दिशाओं में बढ़ चुकेगा। आगे की घड़ियों में तो कठिनाइयाँ बढ़ती ही जायेंगी।

यह समय न तो उपेक्षा का है और न लापरवाही में दिन बिताने का। हमें अपनी एक-एक घड़ी को बहुमूल्य समझ कर इस समय दत्त-चित्त होने की आवश्यकता है। इस समय निजी भौतिक वस्तुओं की रक्षा का अत्यधिक विचार करना योग्य नहीं है। क्योंकि प्रयत्न करने पर भी धन-सम्पत्ति की बहुत कम अंशों में रक्षा हो सकेगी। अपनी सम्पदा की जो जितनी रक्षा कर सकेगा, वह उतनी करेगा ही। इसके संबंध में न तो हमारा कुछ विशेष ज्ञान है और न कुछ कह ही सकते हैं। जिसे जो उचित सूझ पड़े करे। हमें तो अपने प्रत्येक पाठक का ध्यान उस वस्तु की ओर आकर्षित करना है जिसकी हानि वास्तव में हानि है और जिसका लाभ वास्तविक लाभ है। सारी संपदाएं जीवन के लिए हैं और जीवन आत्मा के लिए। बड़ी कठिनाई से मनुष्य योनि प्राप्त होती है। यही ऐसा मार्ग है, जहाँ से हमारे कल्याण का दरवाजा पास पड़ता है। इस अवसर को चूक जाने पर दूसरा अवसर फिर बड़ी कठिनाई से ही प्राप्त होता है।

आज उपेक्षा और लापरवाही का समय नहीं है। वरन् सब से अधिक सतर्कता के इन क्षणों का जोरदार तकाजा है कि—मनुष्य अपने महान् उद्देश्य का स्मरण करे, कहीं ऐसा न हो कि यह जीवन रूपी बहुमूल्य हीरा हाथ से चला जाए और इस अलभ्य अवसर के लिये सिर धुन-धुन कर पछताना ही शेष रह जावे। यह घड़ी हमारे लिए वैसी ही है जैसी उसकी शृंगी के शाप के पश्चात् राज परीक्षित की हुई थी। शाप के कारण सातवें दिन राजा की मृत्यु तक्षक सर्प के काटने से हो जाएगी। यह समाचार शमीक ऋषि द्वारा जब राजा के पास पहुँचाया गया तो वह सावधान हो गया। उसने धन सम्पत्ति की सुरक्षा, राज-पाट की व्यवस्था में अपना शेष समय नहीं बिताया वरन् सब ओर से चित्त हटा कर आत्म-कल्याण के मार्ग पर जुट गया। सारा जीवन वह माया के प्रपंचों में बिता चुका था, यदि इन स्वर्ण घड़ियों को भी वह गँवा देता तो निस्संदेह वह अपनी आत्मा के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात करता। दुनिया वाले “होशियार लोग“ कहते कि मरते वक्त राजा ने अपनी धन-सम्पदा को बेटे-पोतों के लिये खूब सुरक्षित करके रख दिया। परन्तु ज्ञानवान् आत्माएँ उसे परले सिरे का मूर्ख कहतीं और उसकी मूर्खता पर हंसती। धन किसका है? इस पृथ्वी को अपनी-अपनी कहते हुए बड़े-बड़े शक्तिशाली नृपति इसी में मिल गये हैं। सिकन्दर के हाथ अर्थी से बाहर निकले हुए थे कि मैंने इतना कमाया पर अन्त में खाली हाथ जा रहा हूँ।

खतरे की इन घड़ियों में पाठक धैर्य को हाथ से न जाने दें, सावधान रहें, कठिनाइयों का मुकाबला करें और अपनी भौतिक व्यवस्था के संबंध में स्वयं विचार करें। हमारी चेतावनी आध्यात्मिक व्यवस्था के संबन्ध में है। आत्मा कल्याण के लिए आन्तरिक पवित्रता आवश्यक है। हमारे हृदयों में हर घड़ी प्रभु का ध्यान होना चाहिए, एक घड़ी के लिए भी उन्हें बिसारना उचित नहीं। अपने अन्तःकरण में सत्य, प्रेम और न्याय को गहरा स्थान देना चाहिए। करुणा, दया, उदारता, प्रेम, सहानुभूति, सेवा, सत्य-निष्ठा आदि गुणों को निरन्तर अपने में धारण करना चाहिए। —”आप सर्वतो भावेन सत्यनारायण की शरण में अपने को समर्पण कर दें। बालक की तरह सत्य के अंचल में अपने को छिपा लें जहाँ कि बम और वायुयान कुछ भी असर नहीं कर सकते। नित्य प्रभु की प्रार्थना करना, बुराइयाँ त्यागकर भलाई अपनाना और शक्ति-संग्रह करना यह कार्य आज से ही आरम्भ हो जाने चाहिएं। सार्वभौम वातावरण को पवित्र बनाने के लिए आध्यात्मिक ब्रह्म यज्ञ की आवश्यकता है। शुभ विचार करना और कराना ही ब्रह्म यज्ञ है।” इन्हीं शब्दों को हम आज फिर दुहराते हैं और प्रत्येक पाठक से अपील करते हैं कि सत्यनारायण की शरण में अपने को अविलम्ब समर्पित कर दें। वर्तमान खतरे से बचने का सबसे सुरक्षित मार्ग यही है।


Quotation

जिसकी इच्छा शक्ति प्रबल है। उसे कोई बात असंभव नहीं।

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निश्चल स्वभाव अपनी इच्छा की पूर्ति का मार्ग स्वयं ढूंढ़ निकालता है।

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सुअर के सौ पूत किस काम के, कि फिर भी भूखों मरें, धन्य है सिंहनी का एक पूत कि जिसके बल पर झाड़ी में निर्द्वंद्व सोवे। मनुष्य संख्या बढ़ने से लाभ नहीं, आवश्यकता है पूर्ण मनुष्य की।

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प्रयत्न द्वारा बुराइयों से बचना तथा श्रेष्ठ बातों से लाभ उठाना अपने वश की बात है। बस इसी में तुम्हारी होशियारी है।

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चाहे तुमको मूर्खों की संगति हंसा भी दे तो भी पीछे वह अत्यन्त हानिकारक होती है।

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जल से शरीर शुद्ध होता है। सत्य से मन, भक्ति और पुण्य से आत्मा, ज्ञान से बुद्धि पवित्र होती है।


सूर्य चिकित्सा का जादू

(श्री मंगलचन्दजी भंडारी, अजमेर)

सन् 39 के अगस्त माह में मेरे सीधे पाँव के कूल्हे में अकस्मात कुछ दर्द हुआ। अजमेर के प्रमुख डाक्टरों और वैद्यों को दिखाया और इलाज भी करवाया, किन्तु किसी से भी लाभ न हुआ, अपितु रोग बढ़ता ही गया। बीमारी का नाम भी कोई ठीक-2 न बता सके। 3-4 एक्स-रेज भी लिये मगर सब बेकार हुये। डाक्टरों ने (T. B. Bone) बताया, वैद्यों ने बाय बतलाई, हकीमों ने अरकुनिशा बताई, पहलवानों ने पाँव उतर गया बताया, और जिन्न आदि उतारने वालों ने भूत-प्रेत की छाँह पड़ गई यह बताया। हम हैरान हो गये कि आखिर क्या बला है? अन्त में लोगों के कहने से हम एक अनजान खाती के पंजे में फँस गये। उसने पाँव उतरा हुआ बता कर पाँव को झटके आदि दिये, जिससे तकलीफ कई गुणी और ज्यादा बढ़ गई और इतनी बढ़ी कि उठना, बैठना मुश्किल हो गया। रात भर नींद नहीं आती थी।

रियासत मारवाड़ के अन्दर एक सोजत करके शहर है, जो कि मेरी जन्मभूमि है, वहाँ एक मुस्लिम प्राकृतिक चिकित्सक कासम भाई का नाम सुनकर हम वहाँ पहुँचे। छह माह कासम भाई का इलाज करवाया। इलाज सेक, मालिश और मिट्टी का ही होता था। उससे हम लकड़ी के सहारे से फिरने लग गये और रात को नींद भी आ जाती थी। कासम भाई का जितना सरल और सीधा स्वभाव था, उतना मैंने अन्य किसी मुस्लिम भाई का न देखा। वह मुझे प्यार करता था एक बच्चे की तरह। क्यों न करे वह था बुड्ढा और मैं था बच्चा।

लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था, इसमें कासम भाई का इलाज छोड़ा, जल्दी ठीक हो जाने के लोभ में इन्दौर गये और वहाँ से 4-5 माईल की दूरी पर एक देवास सीनियर नामक ग्राम में गये। वहाँ पर राबर्ट साहब का 6 माह तक इलाज करवाया, वहाँ पर हमारा स्वास्थ्य तो अवश्य ठीक हो गया, मगर पाँव की बीमारी में कोई सन्तोषजनक लाभ न हुआ। यहीं पर हमने एक अखण्ड-ज्योति की नमूने की प्रति मँगाई थी!

बस! यहाँ पर पत्रों द्वारा अखण्ड ज्योति के उदार सम्पादक पं0 श्रीराम जी शर्मा आचार्य का परिचय हो गया। पंडितजी को हमने अपने रोग का हाल लिख भेजा, पंडित जी ने ढाढ़स बँधाया और शीघ्र ही रोग से मुक्त होने का विश्वास दिलाया।

सन् 41 के दिसम्बर माह में मैं स्वयं मथुरा पहुँचा। पंडित जी के पास तीन सप्ताह से अधिक रहा हूँगा। पंडित जी ने अपने कार्य विशेष का कोई ख्याल न कर हमारी चिकित्सा का खास रूप से प्रबन्ध किया। पंडित जी ने सूर्य किरण लेने की प्रमुख रूप से हिदायत की। तीन सप्ताह किरणें लेने से हमारे पाँव में आश्चर्यजनक लाभ हुआ। दर्द में भी काफी न्यूनता हो गई। प्रायः एक घण्टे कम से कम नीले रंग के शीशे से हम सूर्य रश्मियाँ प्रयोग में लेते थे। सूर्य किरणें वास्तव में आश्चर्यपूर्ण लाभ दिखलाती हैं। अब भी हमें इतना समय नहीं मिलता है कि हम सदैव सूर्य किरणों का सेवन कर सकें, किन्तु जब कभी भी दर्द अधिक होता है, एक घंटा सूर्य रश्मियों का सेवन कर लेते हैं, जिससे दर्द कम हो जाता है।

सूर्य किरणों के सेवन करने से अब तक हमारे पाँव में जो लाभ हुए हैं वे ये हैं,—(1) चलने-फिरने से पहले काफी रुकावट होती थी, वह अब बहुत कम होती है। (2) पाँव में पहले प्रायः हर समय दर्द रहता था, वह अब बहुत ही कम रहता है। (3) पाँव को हिलाने-डुलाने में पहले काफी दर्द होता है, वह अब बिलकुल नहीं होता था। (4) पाँव पतला पड़ने लग गया था, वह पतला पड़ना अब रुक गया है। (5) पाँव की वजह से कभी-कभी कमर में भी दर्द हो जाता था, वह भी अब नहीं होता है।


प्रेम का अर्थ

(पी.जगन्नाथ राव नायडू, नागपुर)

प्रेम का अर्थ हर प्राणी भली-भाँति समझता है,उसके अनुसार हर एक प्राणी अपने-अपने कार्य किया करता है। पक्षियों में भी देखो, कितना प्रेम है। चकवी और चकवा, हंस, सारस ये पक्षी भी अपनी या दूसरी जाति के पक्षियों को दुःख नहीं दिया करते। प्रातः काल सब पक्षी मिलकर कितना सुन्दर गान गाते और किलोल किया करते हैं।

एक पक्षी अपना अण्डा कौओं के घोंसले में रख जाता है। कौआ उसे सेता है, नन्हे बच्चों को अपने बच्चे जैसा प्रेम करता है। जब उड़ने लायक हो जाता है, तब अपने जाति के पक्षी से संबंध करता है; वैसे ही टिटहरी नाम का पक्षी जब रात्रि को विश्राम करता है तब दोनों पैर ऊपर को उठाये रहता है। वह समझता है कि भगवान गिरेंगे तो अपने पैरों पर थाम लेंगे।

मनुष्य सब प्राणियों से श्रेष्ठ गिना जाता है, और कुत्तों का सा व्यवहार भी कुछ लोग करते हैं। कुत्ता दूसरों से प्रेम भी कुछ करता है, बिरादरी से संद्वेष, कुत्तों में भी अनेक स्वभाव के हैं, पनियर, बुलडाग, ताजी। जो नम स्वभाव के होते हैं, उन्हें क्रूर स्वभाव के कुत्ते ज्यादा तंग करते हैं, इसीलिए कुछ बुद्धिमान और अफसर लोग नर्म स्वभाव वाले को ज्यादा पसन्द करते हैं, उनकी इज्जत भी किया करते हैं। ऐसे ही कुछ मनुष्यों में कुत्तों के स्वभाव की प्रथा चालू है। मनुष्य होते हुए कुत्ता बनना बड़ा आश्चर्य है, कुत्तों जैसे स्वभाव वालों की संगत से अच्छा मनुष्य भी वो ही आचरण करने लगता है। इसी से कतरी कुत्ते ज्यादा हो जाने से जहर डाल कर मार डालते हैं।

मनुष्य क्या नहीं कर सकता है, अच्छे आचरण तो पक्षियों को और जानवरों को भी सिखाता है, कहीं-कहीं उनसे भी नीच कर्म किया करता है, ऐसे मनुष्यों के नाम कोई पुस्तकों में भी नहीं मिलेंगे। जैसे स्त्री, पुरुष, नपुँसक। लेकिन इन पुरुषों का नाम ही नहीं है।


सूर्य-चिकित्सा की पाठशाला

(अलीगढ़ में व्यवस्थित शिक्षा का प्रबंध)

सूर्य चिकित्सा कितनी अद्भुत गुणकारी है, इसका अनुभव परीक्षा करने के उपराँत हर कोई कर सकता है। प्रतिष्ठित विद्वान् एवं तत्वज्ञानी विचारक पं0 फूलचंदजी मिश्र ने इस चिकित्सा के मर्म को समझते हुए, इस महा-विज्ञान को प्रसारित करने का संकल्प किया है। आपने रामघाट रोड, अलीगढ़ की मैथिल, ब्राह्मण पाठशाला में इसकी शिक्षा का प्रबंध किया है। गर्मी के दिनों में जब कि पाठशालाओं के छात्र और अध्यापक एवं दफ्तरों में काम करने वाले व्यक्ति अवकाश पाते हैं, इस अवकाश का वह एक बहुत ही सुँदर उपयोग होगा कि सूर्य चिकित्सा की शिक्षा प्राप्त करके अनेक पीड़ित बन्धुओं के प्राण बचाने की योग्यता प्राप्त की जावे। वह पाठशाला इन गर्मी के दिनों में शिक्षा का विशेष रूप से प्रबन्ध करेगी, हो सका तो इसकी एक कक्षा नियमित रूप से चलती रहेगी।

इस शिक्षा को आरम्भ करने के सम्बन्ध में श्री मिश्र जी लिखते हैं-”अब से ढाई वर्ष पहले मुझे अपने एक आत्मीय नवयुवक के रुष्ठ हो कर चले जाने और घर पर यह पत्र लिख कर छोड़ जाने से हार्दिक वेदना हुई कि-’ताऊजी मुझे भूल जाना” जिसके कारण पेचिश रोग हो गया, जो कभी-कभी उभर आता है। वैद्य, हकीम और डाक्टरों से चिकित्सा कराई, धन भी पर्याप्त व्यय हुआ, पर स्थायी लाभ न हुआ। दैवान् पं0 हरि प्रसाद जी ओझा, ‘प्रेम’ ने मुझे अखण्ड ज्योति कार्यालय में ले गये। वहाँ पर में अखण्ड ज्योति का ग्राहक बनाया। आपने सूर्य-चिकित्सा विज्ञान पुस्तकें उपहार में दीं। इस पुस्तक को मैंने आद्योपान्त पढ़ा और नारंगी रंग की बोतल के पानी से अपना इलाज करना आरम्भ किया। उससे लाभ हुआ। इसी आधार पर अपने अधीन श्री मैथिल ब्राह्मण संस्कृत पाठशाला, रामघाट रोड अलीगढ़ में इस चिकित्सा विधि को पढ़ाने का प्रबन्ध इस प्रकार किया है कि आयुर्वेदाचार्य फिजीशियन एण्ड सर्जन पं0 बसु मिश्र को शिक्षक नियुक्त किया है। जिन्होंने ता0 27 मार्च से 22 जून तक वैज्ञानिक रूप से इस कार्य को करने का भार लिया है। रंगीन बोतल आदि सामान पाठशाला कमेटी ने देना स्वीकार किया है। पढ़ने वाले पुस्तक अपने व्यय से क्रय करेंगे। पहले-पहले पाठशाला के मध्यमा के विद्यार्थियों को चिकित्सा सीखने के लिए प्रोत्साहित किया है। पुनः मेरा विचार है कि मई के अन्तिम सप्ताह या जून के प्रथम सप्ताह में आप को अलीगढ़ पधारने का दो-तीन दिन के लिए कष्ट दूँ, ताकि शिक्षा की त्रुटियाँ दूर हो जावें और भविष्य में शिक्षा सुचारु रूप से हो।

मिश्र जी का यह कार्य सर्वथा स्तुत्य, प्रशंसनीय और अनुकरणीय है, हमारा विश्वास है कि मिश्र जी सूर्य चिकित्सा की भारतीय प्राचीनतम पद्धति का प्रसार करने का जो प्रयत्न कर रहे हैं, उससे जन-समाज की बड़ी भारी सेवा होगी।


वेदों में सूर्य चिकित्सा

अपचितः प्रपतत सुपर्णो बसतेरिक सूर्यः कृणोतु भेषजं चन्द्रमा वोपोच्छतु।

अथर्व0 6 । 3। 3

(अप चितः) हे हानिकारक व्याधियों! (प्रपतत) दूर जाओ (इव) जैसे (सूपर्णः) तेज उड़ने वाला पक्षी (बसतेः) अपने घोंसले से निकल जाता है। (सूर्यः) सूर्य (भेषजम्) चिकित्सा (कृणोतु) करे (वा) तथा (चन्द्रमा) चन्द्रमा (उप उच्छतु) समीप होकर प्रकाश करे।

भावार्थ—सूर्य की प्रचण्ड शक्ति समस्त रोगों की चिकित्सा करती है। शरीर की जीवनी शक्ति सूर्य द्वारा ही संचित होती है। रक्त के रोग विनाशक श्वेत कीटाणुओं को बल सूर्य की किरणों द्वारा ही मिलता है। जब हम सूर्य भगवान का तेज अपने अन्दर धारण करते हैं, तो समस्त हानिकारक व्याधियाँ इसी प्रकार दूर भाग जाती हैं, जैसे पक्षी अपने घोंसले को छोड़ कर सूर्योदय होने पर दूसरी जगह चले जाते हैं। चन्द्रमा के प्रकाश में शीतलता और स्निग्धता के गुण हैं।

उत पुरस्तात् सूर्य एति विश्व दृष्टो अदृष्ट हा।

दृष्टाँश्च घ्नन्नदृष्टाँश्च सवाँश्च प्रमृणान् किमीन्॥

अथर्व 5। 23। 5

(पुरस्तात्) पूर्व दिशा में (सूर्यः) सूर्य (अतएति) उदय होता है, (विश्वदृष्टः) सब उसको देखते हैं, (अदृष्ट हो) जो सूक्ष्म रोग जन्तु हमें दिखाई देने वाले को (घ्नन्) मारता हुआ (च) और (अदृष्टान्) न दिखाई देने वाले (सर्वान्) जितने प्रकार के भी हैं, उन सभी (क्रसीन्) रोग कीटाणुओं को (प्रमृणन्) नष्ट करता हुआ, सूर्य उदय होता है।

भावार्थ—नाना प्रकार के रोग कीटाणुओं से हमारी रक्षा करने वाले सूर्य हैं। वे अदृष्ट रोग जन्तुओं का निरन्तर संहार करते रहते हैं। दिखाई देने वाले ज्वर, क्षय, खाँसी, संग्रहणी आदि प्रबल रोग सूर्य द्वारा अच्छे होते हैं और जो रोग प्रकट नहीं हुए हैं वरन् गर्भ में ही हैं, उन्हें भी सूर्य का तेज नाश कर देता है जब सूर्य उदय होता है, तो समस्त रोग बाधाओं को नाश करता आता है।

या रोहिणीर्देवत्या जावो या उत रोहिणीः।

रुपं रुपं वयोवयस्ता भिष्ट्वा परि दध्मसि॥

अथर्व0 1 । 22 । 3

जो देवता सम्बन्धी काल सूर्य किरणें हैं, वे लाल गौवें हैं, उनको रूप और बल के अनुरोध उनके साथ तुझको चारों ओर धारण करते हैं, पुष्ट करते हैं।

भावार्थ—सूर्य की लाल किरणों की उपमा वेद से लाल गौओं से दी गई है, जैसे गौएँ उत्तम दूध देकर हमारे शरीरों को परिपुष्ट करती हैं, बल वीर्य को बढ़ाती हैं, अशक्तता और निर्बलता को दूर करती है, उसी प्रकार लाल किरणों में भी अनेक गुण हैं। वे रोगों के पंजे से छुड़ा कर शरीर को पुष्ट करती हैं, बलवान बनाती हैं।

परित्वा रोहितैर्वणै र्दीर्घायुत्वाय दध्मसि।

यथा यमरपा असदथो अहरितों भुवत्॥

अथर्व 1। 22। 2

दीर्घ आयु की प्राप्ति के लिए तुझको लाल रंगों से चारों ओर धारण करता हूँ। जिससे यह निरोग हो जाये और फीकेपन से रहित हो जाय।

भावार्थ—जिन्हें दीर्घायु प्राप्त करने की इच्छा हो; जो अधिक काल तक जीवित रहने की इच्छा करते हों, उन्हें सूर्य की लाल किरणों का सेवन करना चाहिए। फीकापन, निस्तेजता, कफ प्रकोप, आलस्य, मलीनता को इन लाल किरणों की महानता से बड़ी सुगमतापूर्वक दूर किया जा सकता है।

अनुसूर्य मुदयताँ हृदयो तो हरिमा चते।

गो रोहितस्य वर्णन तेनत्वा परि दध्मसि ॥

अथर्व 1। 22। 1

तेरा पीलापन, पाण्डुरोग तथा हृदय की जलन, हृदय रोग, सूर्य की अनुकूलता से उड़ जाय। गो के तथा प्रकाश के उस लाल रंग से तुझको सब ओर धारण करता हूँ।

भावार्थ—सूर्य की लाल किरणों में पीलिया, पाण्डु, हृदय की जलन, हृदय रोग, आदि अनेक रोगों को दूर करने की बड़ी प्रचण्ड शक्ति भरी हुई है। जो उनको गो-दूध की तरह सेवन करते रहते हैं, वे निरोग रहते हैं।

उपरोक्त मंत्रों में सूर्य की लाल किरणों का वर्णन किया गया है। पीली, नीली, आदि सप्त रंग की किरणों में सब गुण हैं। सूर्य के सप्त मुखी घोड़े यह सात रंगों की किरण ही हैं। इनके गुणों को जानने वाला व्यक्ति अमृतपाणि होकर यशस्वी चिकित्सक बन सकता है।

उत् सूर्यो दिव एति पुरो रक्षाँसि निजूर्वन् आदित्वः पर्वतेभ्यों विश्व दृष्टों अदृष्टहा।

अथर्व 6। 52। 1

(विघ्व दृष्टः भदृष्ट हा) सबको दिखाई देने वाला अदृश्य रोग जन्तुओं को मारने वाला (आदित्यः) नाश रहित (सूर्य) सूर्य (दिवः) गुगर से (पर्वतेभ्यः) पर्वतों से (उत् एति) उदय होता है, (पुर) अपने आगे आगे (रक्षाँसि) नाना प्रकार के रोग क्रिमियों को (निजूर्दन्) नष्ट करता जाता है।

भावार्थ—अविनाशी सूर्य नाना प्रकार के दृश्य और अदृश्य रोग जन्तुओं का नाश करता हुआ आगे बढ़ता है। जिन स्थानों पर सूर्य की किरणें पहुँचती हैं, वहाँ रोग नहीं ठहर पाते।


बलवान बनने के लिए

“बहुमूल्य भोजन से विशेष बल” यह एक बड़ी ही गलत धारणा है। मक्खन और मलाई आप को कितना बलवान् बना सकती हैं, यह बताना कठिन है। हो सकता है कि खीर, पुआ खाकर आपकी देह मोटी हो जाए और पेट पर चर्बी झूलने लगे; परन्तु क्या यह मोटापा आप को बलवान् बना सकता है? इस प्रकार दण्ड, बैठक करने वाले और कुश्ती लड़ने वाले को हम बलवान नहीं कह सकते।

शक्ति का मूल स्रोत हमारे सूक्ष्म जीवन में छिपा हुआ है। ईश्वरपरायण, निष्कपट हृदय वाला एवं पवित्र आचरण करने वाला मनुष्य ही वास्तव में बलवान कहा जा सकता है। सच्चा मनुष्य सिंह की तरह विपत्तियों के पर्वत पर निर्भीकतापूर्वक चढ़ता चला जाता है और विरोध एवं कठिनाइयों की प्रचंड धारा को काटता हुआ मछली की तरह अपने इच्छित मार्ग पर कदम बढ़ाता है, क्या ऐसा करना पापी हृदय वालों के लिए संभव है? सुख के लिए वे पपीहे की तरह प्यास की रट लगाते फिरते हैं और दुखों की छाया देखते ही घिग्घी बाँध कर रोते-चिल्लाते हैं।

आपको यदि जौ का सत्तू मिलता हो, तो खुशी, खुशी खाइए। हम कहत हैं कि वह षट्रस व्यंजनों के बहुमूल्य थाल की अपेक्षा आपको अधिक बल प्रदान करेगा। धर्म पूर्वक से कमाई हुई रोटी आरोग्य एवं आयुष्य की वृद्धि करती है, किन्तु अधर्म का पैसा पारे की तरह फूट-2 कर बाहर निकलता है, वह बुरे स्थान से आया था। इसलिए वेश्यालय, मद्यालय, धूतग्रह, डॉक्टर की दुकान, वकील की जेब, चोर की थैली या राज दंड उगाहने वाले के पास चला जाता है, देह को पीड़ा और मन को पश्चाताप यही वस्तुएं पीछे के लिए अपनी निशानी छोड़ जाता हैं।


तुम्हीं सर्वोच्च हो!

(स्वामी रामतीर्थ)

जब हमारे द्वारा कोई महान् और विचित्र कार्य सम्पादित होता है, तब उसका श्रेय लेना मूर्खता है, क्योंकि जब वह कार्य हो रहा था, तब यश का भी अहंकार बिल्कुल गैरहाजिर था, अन्यथा कार्य का सौंदर्य नष्ट हो जाता । मैं कह रहा हूँ कि चेतना बिल्कुल गैरहाजिर थी। ईश्वर से अपने आप ही वह बात आई। इस प्रकार हम देखते हैं कि ये लोग तात्विक और महान लेखक कोई भी वे हों, अपने आचरणों से ही नहीं, अपनी देह के प्रत्येक रोम कूप से यह उपदेश देते और प्रचार करते पाये गये हैं कि —’जगत् मिथ्या है।’ यदि हम उनके समय के निर्णय को, सम्मति को ग्रहण करें, तब ये अपनी उत्कृष्ट दशा में होते हैं। शब्दों की अपेक्षा कार्य जोरों से बोलते हैं, प्रभाव डालते हैं। समर में हम महान शूरों और नायकों को देखते हैं, अपनी श्रेष्ठ दशा से वे लड़ते रहते हैं। गोलियाँ दनादन और सनासन उनके आस पास मंडराती रहती हैं। वहाँ गोली है, यहाँ घाव है, खून उनकी देहों से वेग से बहता रहता है, उनके शरीर टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। ऐसी दशा में पीड़ा-पीड़ा ही नहीं है व्यवहारतः शरीर, शरीर नहीं है; और न बाहरी दुनिया—दुनिया है। उद्योग की भाषा में वह जगत् और शरीर को मिथ्या कर रहा है। इस तरह तुम्हारे नैपोलियन, तुम्हारे वाशिंगटन और दूसरे सब अपने कामों के द्वारा तुमसे कहते हैं कि तुच्छ बनाने वाली बुद्धि की उपेक्षापूर्वक जब वास्तविक आत्मा जो अखिल तेज है, अपना सिक्का जमाता है, तब दुनिया कुछ नहीं है, सच्चा अपना आप जो पूर्ण ज्ञान और परमशक्ति है, एक मात्र कठोर सत्य ही है, जिसके सामने जगत् की बाह्य सत्यता घुल जाती है।


सत् पथ पर कदम बढ़ाओ!

(वेदों का अमर सन्देश)

ऋतस्य कि शुरुधः सति पूर्वीः ऋतम्य धीति वृजिनानि हैति। ऋतस्य श्लोकों बधिरादतर्द, कर्णा बुधानः शचमान आयोः।(ऋ0)

सत्य की शोक-निवारक सम्पत्तियाँ सनातन हैं। सत्य की धारणा करना पापों का, वर्जनीय वस्तुओं का नाश कर देता है। सत्य की जगाने वाली और दीर्प्यमान आवाज को बहरे मनुष्य भी सुन लेते हैं।

अहं भूमिम ददामार्यायाह वृष्टिंदाशुषे मर्त्याय।

अहमपो अनयं वावशानामम देवासों अनुकेतनायम्

(ऋ ॰ 5 : 26 । 2)

मैंने (परमेश्वर ने) श्रेष्ठ पुरुषों को भूमि दी है, दान देने वाले मनुष्यों के लिए धन तथा सुख की वर्षा करता हूँ। मैं बार-बार शब्द करने वाले मेघों को लाता हूँ, विद्वान लोग मेरे ज्ञान के अनुसार चलते हैं।

मोघमत्रं विन्दने अप्रचेताः सत्यं ब्रचरमि वध इत्स तस्य। नार्यमणं पुण्यतिनो सखायं केवलाघो भवति केवनादी।

(ऋ ॰ 10 । 117।6)

अर्थ—मैं सत्य कहता हूँ कि वह मूर्ख व्यर्थ ही अन्न प्राप्त करता है, जो न प्रियजन को, न अतिथि को, न मित्रों को खिला कर पुष्ट करता है, वह (अन्न) उसका नाश कर देता है। वह अकेलखोरा निरा पाप-पुँज होता है।

य आध्राय चकमानाय पित्वोऽन्न वान्त्सनाफितायापजग्मुषे। स्थिरं मनः कृणुते सेबते पुरोतोचित्स मर्द्वितारं न विन्दते।

(ऋ ॰ 1।117 2)

अर्थ-जो अन्नवान् (सम्पत्तिवान) होते हुए भी किसी असमय याचक के लिए अपना हृदय कड़ा कर लेता है। ऐसे उस (संपत्तिवान) पर कोई दूसरा भी उपकार नहीं करता। महन्त बालकृष्णदास जी कराँची, स्वामी यदुनाथ जी पुनियाद, श्री बलवीरसिंह जी रेणु टिहरी, स्वामी चन्द्रशेखर जी अब्बीगेरी, डॉक्टर रामनन्दसिंह जी सहनोरा, महन्त सुन्दरदास जी खुन्दपुर जैसे साहसी महानुभावों का काम है।

ग्रीष्म ऋतु की छुट्टियाँ निकट हैं। इन दिनों प्रायः सभी लोगों के पास अवकाश कुछ अधिक रहता है। अध्यापक लोगों के स्कूलों से अवकाश रहता है, विद्यार्थी छुट्टी मनाते हैं, दफ्तरों की तातीलें रहने के कारण कर्मचारीगण फुरसत में रहते हैं। कृषि का काम भी बन्द रहता है। इन दिनों कितने ही पढ़े लिखे व्यक्ति फुरसत में होंगे। कुछ सज्जन इकट्ठे होकर इन दिनों एक शिक्षा-केन्द्र बना सकते हैं। पुस्तकों की सहायता से शिक्षा चल सकती है। जो साधक इन विषयों की शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं, उन्हें तो अवश्य ही गर्मियों में अपने यहाँ शिक्षा-केन्द्र स्थापित करके भारत की इन गुप्त विद्याओं के प्रचार का पुण्य प्रयत्न करना चाहिये।


एक गुप्त निमंत्रण

गत मास मार्च के अंक में पृष्ठ 30 पर ‘वह काम जो आज ही करना है’ शीर्षक एक लेख के अंतर्गत जागृत आत्माओं को संगठित होने की एक योजना प्रस्तुत हो गई थी। इस योजना को विचारवान व्यक्तियों ने बड़ी गम्भीरता से देखा है और करीब पौने छः सौ व्यक्तियों ने इस सम्बन्ध में प्रत्यक्ष मिल कर तथा पत्र-व्यवहार द्वारा परामर्श किया है। समय की अत्यन्त गंभीरता और पेचोदारी को देखते हुए विशेष सावधानी के साथ विचार-विनिमय हुआ है।

अखंड ज्योति परिवार के अलौकिक दिव्य पुरुषों, महात्माओं, वीतरागी सन्तों, तपस्वियों, ऋषियों और भूसुरों ने कृपापूर्वक अपनी यंत्रणायें भेजी हैं।

उन्होंने हमें बताया है कि सतयुग सभायें या और कोई संगठन पृथक-पृथक रूप से करने का यह समय नहीं है। यह समय आगे आवेगा। अभी तो केवल इतना करना चाहिये कि जागृत आत्माएं, आध्यात्मिक साधक, धर्म-प्रेमी सज्जन एक सूत्र में बँध जावें, और निकटवर्ती विषम परिस्थितियों में सब लोग एक दूसरे की सहायता करें।

“सत् धर्म अन्तरंग गोष्ठी” का संगठन एक परिवार की तरह है। जिसका सञ्चालन अखण्ड ज्योति की संरक्षता में उसके सम्पादक द्वारा होगा। जो धर्म प्रेमी सज्जन इसमें प्रविष्ट होना चाहते हों वे ‘सत्य धर्म’ में दीक्षित होने का संकल्प-पत्र लिखें, दीक्षित होने के दिन उपवास रखना चाहिए, मौनपूर्वक आत्म चिन्तन करना चाहिये और स्याही में गंगाजल डाल कर पवित्रता, एकाग्रता और विचारपूर्वक निम्न संकल्प लिखना चाहिये।

“मैं अपने को भगवान सत्यनारायण की शरण में सौंपता हूँ, अपनी अन्तरात्मा को निष्पाप-निष्कलंक बनाने के लिये कदम बढ़ाता हूँ। अपने मन, वचन, और कर्म को सत्य, प्रेम तथा न्याय से ओत-प्रोत करने के लिये अग्रसर होता हूँ। अपने पवित्र, अविनाशी और निर्लेप आत्मा स्वीकार करता हूँ, अपनी नीति को त्याग और सेवामय बनाता हूँ और जीवन को जीने-योग्य बनाने का संकल्प करता हूँ।”

उपरोक्त संकल्प के नीचे अपने (1) पूरे हस्ताक्षर, (2) प्रवेश की तिथि, (3) पूरा पता, (4) वर्ण, (5) जन्म-तिथि साफ अक्षरों में लिखने चाहियें। यह प्रतिज्ञा-पत्र छपे हुए नहीं होने चाहिये, वरन् हाथ से ही एक-एक अक्षर लिखना चाहिए, क्योंकि इससे संकल्प में वास्तविकता और गम्भीरता आती है।

दीक्षा के दिन जो लोग निराहार रह सकें वे केवल जल पीकर रहें, जो ऐसा न कर सकें वे फलाहार पर रहें। अशक्त नमक त्याग कर एक समय अन्न का भोजन करें। उस दिन उपवास में बचा हुआ अन्न दान के रूप में सार्वदेशिक सत्य प्रचार के लिये संकल्प-पत्र के साथ मथुरा भेजना चाहिये।

मथुरा पहुँचने पर इन संकल्पों में से जो तत्काल स्वीकार करने योग्य होंगे वे स्वीकार कर लिये जायेंगे और जिनमें निर्बल संकल्प होगा उसे कुछ समय के लिये रोक लिया जायेगा। स्वीकृत संकल्पों के स्वीकृति पत्र भेज दिये जाएंगे और उनसे आशा की जाएगी कि वे इनका पालन करें। यह आदेश विशुद्ध आध्यात्मिक होंगे और उनमें किन्हीं विशेष साधनाओं का उल्लेख होगा। जो सब प्रकार सरल और किसी भी प्रकार की हानि से रहित होंगी।

सत्य धर्म में दीक्षित होकर गोष्ठी में प्रवेश करना जागृत आध्यात्मिक व्यक्तियों के लिए आवश्यक है। ताकि वे वर्तमान काल की कठोर घड़ियों से सुरक्षित रहने के लिये उच्च आत्माओं की कृपा एवं सहायता के भागी बन सकें। अन्तरंग गोष्ठी के सदस्यों को किन्हीं विशेष नियम, उपनियमों में इस समय वंचित नहीं किया जायगा। इस समय एक विशेष साधना दीक्षितों को बताई जाएगी, जिसकी शक्ति से विपत्तियों से बचा जा सके। इस सम्मिलित अनुष्ठान का फल एक सूत्र में बँधे हुए सभी सदस्य समान रूप से पा सकेंगे। यह सहायता कितनी बहुमूल्य होगी, इसको आगामी समय भली प्रकार सिद्ध कर देगा। उसकी विशेष चर्चा करके अनधिकारी लोगों का ध्यान भर आकर्षित करने का हमारा विचार नहीं है। इसलिए धर्म-प्रिय, सात्विक वृत्ति की आत्माओं को ही संकेत रूप में यह गुप्त निमन्त्रण दिया जा रहा है।


युद्ध समाप्ति के सम्बन्ध में एक विचित्र अनुमान

समस्त संसार-व्यापी इस महा-संग्राम में जो महाशक्तियाँ मोर्चा ले रही हैं, उनके कर्णधारों की जीवनी के कुछ आँकड़ों के आधार पर यह विचित्र अनुमान हम अपने पाठकों की जानकारी के लिए यहाँ प्रकाशित करते हैं—

1—नाम चर्चिल स्टेलिन रुजवेल्ट मुसोलिनी हिटलर मिकाडी

2—जन्म सन् 1873 1879 1882 1883 1889 1901

3—शक्ति-संपन्नता सन् 1940 1928 1924 1933 1922 1933

4—अधिकार के वर्ष 2 18 9 20 9 18

5—उम्र 69 63 60 59 53 41

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योग 3884 3884 3884 3884 3884 3884

(धुरी व मित्र)

भाग देने से 2 2 2 2 2 2

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1942 1942 1942 19421942 1942

इसलिए अपनी इस गवेषणा के आधार पर विद्वान् लेखक ने अपने अनुमान से भविष्यवाणी की है कि इस संग्राम का अन्त 1942 में ही होगा।

—सात्विक जीवन।


VigyapanSuchana

मनुष्य को देवता बनाने वाली पुस्तकें।

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जो ज्ञान युगों के प्रयत्न से मिलता है- उसे हम अनायास ही आपके सन्मुख उपस्थित करते हैं।

यह पुस्तकें बाजारू किताबें नहीं हैं। उनकी एक-एक पंक्ति के पीछे गहरा अनुभव और अनुसंधान है। विनम्र शब्दों में हमारा दावा है कि इतना खोजपूर्ण अलभ्य साहित्य इतने स्वल्प मूल्य में अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकता।

1. मैं क्या हूँ?- आत्मा का प्रत्यक्ष प्रदर्शन करने के कुछ सरल साधन। मू. 1 रुपया

2. सूर्य चिकित्सा विज्ञान- सूर्य की प्रचंड रोगनाशक शक्ति द्वारा वैज्ञानिक ढंग से कठिन रोगों की चिकित्सा। मूल्य 1 रुपया

3. प्राणचिकित्सा विज्ञान- मनुष्य के अंदर गजब की विद्युत शक्ति है। उसके द्वारा समस्त रोगों का इलाज। विदेशों में इस विधि से बड़े-बड़े अस्पताल चल रहे हैं। मूल्य 1 रुपया

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14. जीव जन्तुओं की बोली समझना- मूक जीव जन्तुओं की भी स्वतंत्र भाषा है और वे भी हमारी ही तरह बातचीत करते हैं। उसे समझने का महत्वपूर्ण विधान। मूल्य 1 रुपया

नोट- चार या अधिक पुस्तकें लेने पर चौथाई कमीशन दिया जाता है। हर पुस्तक पर एक आना के हिसाब से पोस्टेज लगता है, जो खरीदार को देना होता है। इस प्रकार कमीशन काटकर और पोस्टेज जोड़ कर 1 रुपया प्रति पुस्तक के हिसाब से मूल्य भेजना चाहिए। चार से कम पुस्तकें मंगाने वाले सात आना प्रति के हिसाब से भेजें।

पता- मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा।


मैं अपने ही पर दीवाना!


मैं अपने ही पर दीवाना

(श्री पं. प्रियामदास जी चतुर्वेदी)

मैं अपने ही पर दीवाना!

जाने क्यों यह पगली दुनिया फिर भी देती मुझको ताना!

मंदिर मस्जिद गिरजाघर में, मिलता मुझको आराम नहीं,

पंडित, मोमिन, पादरियों से, मुझको है कुछ भी काम नहीं;

मैं क्यों अपनी इस क्षणभंगुर काया को लेकर इतराऊँ,

जो एक दिवस मिट जायेगी क्यों उससे जी को बहलाऊँ ;

मैं खूब समझता हूँ इसको यह जग केवल बन्दीखाना।

मैं आपने ही पर दीवाना॥

(2)

जन्नत के हूरों की, मैं की, मुझको कुछ भी परवाह नहीं,

उन दिव्य सुखद श्लोकों के, अतुलित वैभव की चाह नहीं;

मैं तो उस पथ का अनुगामी जिसमें मिलता है क्लेश नहीं,

सुख-शान्ति बसा करती प्रतिपल, चिंताओं का रंचलेश नहीं;

जिस पर चलने से तेज देता नर भूतल का आना जाना

मैं अपने ही पर दीवाना॥

(3)

जब अपने ही तन के अन्दर वह ज्योति भ्रमर झलका करती,

जिससे घट गागर में प्रतिपल शुचि शाँति सुधा छलका करती;

जब हम इसको पा सकते हैं क्यों सूनी मस्जिद में भटकें,

किस मूक बधिर पाषाण हृदय प्रतिमा के सन्मुख सर पटकें;

जिनका है केवल ध्येय यही भोले मानव को बहकाना।

मैं अपने ही पर दीवाना॥

(4)

मानव ही सुख-दुख की जड़ है, मानव ही भाग्य विधाता है,

मानव अपने ही हाथों से विपदाओं में पड़ जाता है;

मानव चाहे तो पल भर में भव-सागर से तर सकता है,

मानव चाहे तो जगती में जो चाहे सो कर सकता है;

लेकिन मानव ने तो दानव बन जाने का है प्रण ठाना।

मैं अपने ही पर दीवाना॥

*समाप्त*