जीवन एक पाठशाला है, जिसमें अनुभवों के आधार पर हम शिक्षा प्राप्त करते हैं। विश्व में आज तक जो भी व्यक्ति आया है, उसने अपनी यात्रा के दिन पूरे करते हुए यही कहा है कि संसार में एक ही वस्तु ग्रहण करने योग्य है और वह है- ‘धर्मज्ञ’ इस लोक की और परलोक की सारी संपदाएं धर्म की धुरी से बँधी हुई हैं।
धर्म के बिना स्थायी सुख आज तक न तो किसी को मिला है और न आगे मिलेगा। यह सब कुछ जानते हुए भी जो क्षणिक लालसा के वशीभूत होकर अधर्म की ओर कदम बढ़ाते हैं- हाय! ये कैसे अभागे हैं? चमकीले दमकीले पाप के प्रलोभन में फंस कर अपने भविष्य को अन्धकारपूर्ण और रौख की ज्वालाओं में जलता हुआ बनाने जा रहे हैं, सचमुच में अभागे बड़े ही दया के पात्र हैं।
संसार की महानात्माओं के चिरकालीन अनुभव से लाभ उठाओ। हर एक संत सदा से अपना यही अनुभव कहता रहा है कि धर्म में ही कल्याण है। सो हे कल्याण के चाहने वालो! ठहरो, अधर्म से डरो और धर्म को अपनाओ।
बिना धर्म का आश्रय लिये किसी का कल्याण न होगा।
हे ईश्वर के राजपुत्रों! अधर्म छोड़कर धर्म पर आरुढ़ होओ।
युग परिवर्तन की इस विषम घड़ी में चारों ओर अशान्ति, आतंक और अस्थिरता का वातावरण छाया हुआ है। आगामी घड़ियाँ अपने साथ जिस उथल-पुथल को ला रही हैं, वह सब हमें देखना होगा। भविष्य की हर परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए तैयार रहना प्रत्येक बुद्धिमान का आवश्यक कर्तव्य है।
अखण्ड ज्योति आपके कर्तव्य का आज भली प्रकार स्मरण करा देना चाहती है। वह मानवता के नाम अपना सन्देश भेजती है कि-”अधर्म से नीचे उतरो और धर्म की शरण में आओ।” विश्व शान्ति का एक ही मार्ग है कि अपने संकुचित स्वार्थों, तृष्णाओं, पाखण्डों और कुविचारों को छोड़ कर सत्य का अवलंबन ग्रहण जिया जाय। अनीति से तो विपत्तियाँ बढ़ ही सकती हैं।
निस्सन्देह आगामी नवीन युग द्रुत गति से दौड़ता हुआ चला आ रहा है, उसमें असत्य का नाश होकर सत्य की सत्ता स्थापित होगी। विश्व का नव-निमार्ण कूटनीतिज्ञों से न हो सकेगा। यह कार्य तो सन्त पुरुषों द्वारा सत्य के आधार पर ही होगा। इसलिए असत्यपूर्ण प्रपंचों में अपनी बुद्धिमत्ता दिखाने वालो! अपनी आध्यात्मिक स्थिति पर पुनर्विचार करो, ईश्वर से डरो, सत्य का आश्रय ग्रहण करो और धर्म पर आरुढ़ हो जाओ।
सत्य धर्म है। प्रेम धर्म है। न्याय धर्म है। इसलिए हे धर्मात्माओं! मिथ्या पाखण्डों, रूढ़ियों, अन्ध परम्पराओं और तुच्छ स्वार्थों में उलझकर अपना समय बर्बाद मत करो। हृदय के कपाटों को खोल डालो और सच्चे धर्म का प्रकाश अन्दर आने दो। भविष्य में सत्य और केवल सत्य ही विजयी होगा, इसलिए असत्य को हृदय में से धो डालो और सत्य की उपासना करो- धर्म की उपासना करो!
आज की दुनिया खौलते कढ़ाव में उबल रही है। ऐसी विपत्ति से मनुष्य जाति की रक्षा धर्म कही कर सकता है। इसलिए सुख, शान्ति के इच्छुकों से ‘अखण्ड ज्योति’ मार्मिक अपील करती है कि- हे ईश्वर के अमर राजपुत्रों! अनीति को छोड़ कर नीति पर आरुढ़ हो जाओ, हे मनुष्यों! अधर्म से घृणा करो और धर्म को अपनाओ।
रक्षा करने की शक्ति धर्म में ही होती है। आप धर्म की रक्षा करेंगे, तो धर्म आपकी रक्षा करेगा।
“धर्मे रक्षति रक्षतः।”
कतो स्मर कृत्स्मर
-श्रुति
ईश्वर को स्मरण कीजिए, किये कर्मों को स्मरण कीजिए!
जीवन का महत्व इसी पर निर्भर है
-कि-
आप प्रभु को स्मरण रखें और पिछले अनुभवों से लाभ उठावें।
वर्ष 3 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक 8
(ले. श्री लक्ष्मीनारायण गुप्त ‘कमलेश’, मौदहा)
विचलित न कभी गति हो मन की!
मतिमन्द हों या मतिमान बनें,
निर्धन हों या धनवान बनें,
बलहीन हों या बलवान बनें,
गुणरिक्त हों या गुणवान बनें,
कुछ भी हो दशा अपने पन की।
विचलित न कभी गति हो मन की॥
पग-पग पर दुर्गम नाले मिलें,
पथ में बिछे भीषण-भाले मिलें,
या उत्तम शाल-दुशाले मिलें,
महलों के विलास निराले मिलें,
गति एक सी हो सब में तन की।
विचलित न कभी गति हो मन की॥
अति तप्त हो या शीतल जल हो,
अंगार हो या हिम का दल हो,
वर्षा हो चाहे सूखा थल हो,
सब में सदैव इकसा फल हो,
दुनिया बतलाये चाहे सनकी।
विचलित न कभी गति हो मन की॥
विष में अमृत का मान रहे,
सोना और धूल समान रहे,
सब जग अपना मेहमान रहे,
परहित का निश दिन ध्यान रहे,
हो स्वर्ग सदन या गुफा वन की।
विचलित न कभी गति हो मन की॥
हमारे गाँव में एक पटवारी जी थे, नाम था -ला0 हुब्बलाल। मैं जब छोटा था, तो देखा करता था कि उनके पास जैसी बड़ी घोड़ी है, वैसी गाँव भर में किसी जमींदार के पास नहीं है। कहने को तो उन्हें तेरह या चौदह रुपये ही तनख्वाह के मिलते थे, पर उन्होंने गाँव की पटवारगिरी में ही हजारों रुपया कमाया था। उनके से ठाट बाट अच्छे-2 जमींदारों के न थे। आतंक ऐसा था कि, जिसकी तरफ लालाजी की टेढ़ी नजर हो जाती, वह भय से सूख जाता और जिस पर उनकी कृपा-दृष्टि होती, वह अपने को अभय समझता। मुकदमेबाजी में, जाल बनाने में, आपस में लड़ा देने में, सरकार-दरबार में, गुण्डे बदमाशों में उनकी अच्छी पहुँच थी। जिस बात का इरादा कर लेते, किसी भी कूटनीति से उसे पूरा कर के ही मानते। उनके कोप ने कई खाते-पीते घरों को धूल में मिला दिया, कई सियार शेर बन गये, उनकी नाना वर्णाश्रमों की प्रेमिकायें राजैश्वर्य का उपभोग करती थीं। ऐसे थे वे पटवारीजी- ला हुब्बलाल जी।
मैं बड़ा हुआ, गाँव का मदरसा पास करके आगरा आ गया। अध्ययन के साथ कुछ सेवा-कार्य भी करता था। हमारी सेवा-समिति ने जाड़े के दिनों में अपाहिजों को कम्बल और रजाइयाँ बाँटने का प्रबन्ध किया था, इसी सिलसिले में दौरा करने, मैं जिले में घूम रहा था। अपाहिजों की सूची तैयार की जा रही थी। घूमता-घामता अपने गाँव भी पहुँचा, पूछताछ की तो पटवारी जी का नाम सब से पहिले लिखाया गया। मैं आश्चर्य से सन्न रह गया। छह, सात वर्ष पहले जो पटवारी गाँव के बेताज बादशाह थे, आज उनका यह हाल है कि, अपाहिजों के कम्बल दिये जायें। उनकी नौकरी छूटने और बीमार पड़ जाने का तो मुझे पता था, पर यह नहीं मालूम था कि अब ऐसी दशा हो गई है।
मैं उठा और पूरा विवरण जानने के लिए, उनके पास चल दिया। लालाजी एक टूटी चारपाई पर, फटे-टूटे चिथड़ों में लिपटे पड़े थे। लकवा मार गया था, हाथ-पैर हिलते न थे। शौच के लिए उठा न जाता था, स्नेही-सम्बन्धी किनारा कर गये थे, कोई सहायक न था। चारपाई में एक छेद कर लिया था, जिसमें से ही टट्टी हो लेते, शौच-शुद्धि का कोई प्रबन्ध न था। भोजन की व्यवस्था ईश्वर के अधीन थी। उनका स्वभाव ऐसा कातर हो गया था कि, किसी पूर्व परिचित व्यक्ति को देखते ही फूट-फूट कर रो पड़ते थे। मैं उनके पास पहुँचा, तो बिना पूछताछ किये, ‘लल्लू’ - ‘लल्लू’ कह कर फूट फूट कर रोने लगे। मैं भी अपने को सँभाल न सका, उनकी चारपाई के सिरहाने बैठ कर आँसू बहाने लगा।
एकान्त में हम दोनों रो रहे थे। कोई तीसरा देखने वाला न था। दोनों में से किसी के मुँह से एक शब्द भी न निकलता था, फिर भी परस्पर वार्तालाप जारी था। उनके आँसू कह रहे थे- “पाप का परिणाम देखा।” मेरे आँसू कह रहे थे-”चार दिन की चाँदनी में इतराना व्यर्थ है।”
लालाजी की दशा का एक-एक अंग मैंने अध्ययन किया। यह अध्ययन मेरे मस्तिष्क में कीलें ठोक-ठोक कर समझा रहा था कि - “जीवन जैसी अमूल्य वस्तु का सदुपयोग होना चाहिए।” इन्हीं क्षणों ने जीवन में क्रान्ति उपस्थित कर दी। भावी जीवन में धन, ऐश्वर्य, वैभव, कीर्ति आदि के जो स्वप्न देखा करता था, वह तत्क्षण तिरोहित हो गये। लालाजी ने मूक शब्दों में कहा -’लल्लू, मेरी ओर देख!’ मैंने ध्यानपूर्वक देखा और निश्चय किया कि, वह अज्ञान, अविवेक, पाप और पतन, जिसके कारण हमारे लालाजी की यह दशा हो रही है, हमें संसार से मिटाना होगा; और निद्रित मानव-जाति को जगा कर बताना होगा कि - पाप की भयंकरता को देखो। और उससे सावधान होकर बचो! जो सहायता मुझ से हो सकती थी, लालाजी को दी और नमस्कार करके चला आया।
आध घण्टे का यह सत्संग, जिसमें मूक रोदन के अतिरिक्त शब्दों का प्रयोग बहुत की कम हुआ था, मेरे लिए हजार गीता पाठों से अधिक शिक्षाप्रद साबित हुआ। उन्हीं घड़ियों से प्रभावित होकर, मैं धर्म प्रचार में लग गया और आज धर्म प्रचारक के रूप में, ‘अखण्ड ज्योति’ के सम्पादक के रूप में दुनिया के सामने मौजूद हूँ।
निस्संदेह घटनाओं के आधार पर जो अनुभव होता है, वह बड़ा ही ठोस, गम्भीर, प्रभावशाली और महत्वपूर्ण होता है। इस ‘अनुभव अंक’ में सुविज्ञ लेखकों के सच्चे और निजी अनुभव हैं। हमारा विचार है कि यह अनुभव, सूखे उपदेशों की अपेक्षा अधिक शिक्षाप्रद होंगे। धर्म पर चलने और पाप से दूर रहने की शिक्षा इस अंक के पाठक ग्रहण करेंगे, ऐसी हमें आशा हैं।
-श्रीराम शर्मा।
(प. प्रेमनारायणजी शर्मा, गि. कानूनगो, अम्बाह)
सन् 1917 की बात है- मैं बहुत सख्त बीमार हुआ। सारे बदन में फुन्सियां हो गई थी, बहुत ज्यादा तकलीफ थी। मुझे खुद अपने से नफरत हो गई थी। एक दिन लश्करबाड़े पर टहलने गया। घर लौट रहा था कि रास्ते में खिलौने बिक रहे थे, खिलौने शारा मिट्टी के थे। मैंने उनमें से एक पैसे की हनुमानजी की मूर्ति खरीदी, पूजन करना शुरू कर दिया। पूजन विधि तो जानता न था, परन्तु लगन सच्ची थी। प्रातः काल 3-4 बजे रोज उठना, कुएँ पर से अपने हाथ से पानी लाना, मूर्ति को स्नान कराना, चंदन चढ़ाना, आरती करना। मेरा कष्ट एक सप्ताह में ही दूर हो गया, स्वप्न में दर्शन हुए। मुझे इससे अपार आनन्द हुआ कि, 6 माह बीमार रहा था, पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई थी, परन्तु प्रभु की दया से परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया। रामायण जी का पाठ सन् 1941 तक करता रहा। इसके बाद साधु-महात्माओं के दर्शनों की इच्छा उत्पन्न हुई और जहाँ कहीं महात्माओं का पता लगे, उनके दर्शन करने जाना, जीवन का यह मुख्य कर्त्तव्य हो गया।
लश्कर में सख्या विलास के सामने हनुमान टेकरी है, वहाँ नित्य दर्शनों को जाना और टेकरी के नीचे कुएँ से बाल्टी जल भर कर मन्दिर में रखता। कभी-कभी मेरे एक मित्र भी साथ जाते। एक दिन हम दोनों ने हनुमानजी के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना की। मैंने तो माँगा -”घोड़े की सवारी, खाकी कपड़े और साथ में अर्दली।” उन्होंने माँगा - ‘कुर्सी पर बैठ कर जीवन व्यतीत करना।” कैसी देवी कृपा है कि आज मैं गिरदावर कानूनगो हूँ और वे स्कूल मास्टर हैं।
(श्री वी. पी. मेहरोत्रा बनारस)
बात बहुत दिन पुरानी हैं। उस दिन निर्जला एकादशी थी। नित्य की भाँति मैं गंगा स्नान कर रहा था। जल पर बँधे हुए तख्तों पर दस बारह पुजारी सन्ध्या - पूजन में मग्न थे। घाट के बगल वाले टूटे घाट पर एक दरिद्र व्यक्ति भगवती गंगा में स्नान कर रहा था। उसने सभक्ति स्नान किया और सूर्य नारायण को अर्घ देने के लिए गंगाजल भर कर अंजलि ऊपर उठाई।
वह अर्घ दे नहीं पाया था कि तख्ते के ऊपर बैठे हुए पुजारी एक दम बलबला उठे। “अरे ओ, पापी, अधर्मी, दुष्ट, नारकी!! ठहर, ठहर, हाथ नीचे कर, खबरदार, सूर्य को जल मत देना” इस प्रकार के अनेकों वाक्य-बाण उसके ऊपर बरस पड़े। हम लोगों का ध्यान उस कोलाहल की ओर गया। स्नान करने वाला व्यक्ति ठिठुरा हुआ खड़ा था, उसके हाथ प्रस्तर मूर्ति की भाँति ऊपर के ऊपर ही रह गये। गालियों पर गालियाँ बरस रही हैं। पुजारी लोग दिल के गुबार निकाल रहे हैं। वर्षों का अर्जीण वे आज गालियों के द्वारा निकाल देने पर तुले हुए थे। भय के मारे वह जहाँ का तहाँ खड़ा रहा तो उन धर्म गुरुओं का कोप और भी बढ़ गया। बेचारा बुरी तरह पिटने लगा।
अब हम लोग घटना-स्थल की ओर बढ़े। मालूम हुआ कि स्नान करने वाला कोढ़ी है। वह दीन, दरिद्र, रोग पीड़ित, दुखिया भगवती गंगा में स्नान करके सूर्य उपासना से अपने विचारों के अनुसार अपने कष्टों से छूटना चाहता है, पर वे धर्मध्वजी ऐसा करना धर्म विरुद्ध समझते हैं। इसी बात के लिए यह गाली-गलौज और मार-पीट हो रही है। हम लोगों ने जैसे-तैसे उस दुखिया को छुड़ाया, वह रोता कलपता अपने घर चला गया।
इस घटना के बाद फिर कभी वह दुखिया स्नान करता हुआ नहीं देखा गया। पर हाँ, उसकी पूर्ति अब एक पंडित जी कर देते हैं, जिन्हें देखकर पुरानी बातों का स्मरण हो आता हैं। पंडित जी की दशा उस दुखिया से भी अधिक शोचनीय, घृणित, एवं दयनीय हो गई है, पर उन्हें गाली बकने, मारने व निकालने की किसी की हिम्मत नहीं होती।
यह घटना है। घटना ही से अनुभव का निर्माण होता हैं। पण्डित जी के प्रत्यक्ष अनुभव से मेरे जीवन में एक भारी परिवर्तन हो गया हैं। जब भी मैं किसी दरिद्र या अपाहिज को देखता हूँ तो मेरे मुँह से निकल पड़ता है-”अवहेलना का परिणाम।”
(श्री गोपाल जी माहेश्वरी, हाईस्कूल, मुरैना)
मैं कक्षा 8 में था। उर्दू में कवियों के जीवन चरित्र याद नहीं होते थे। इस कारण अर्ध-वार्षिक परीक्षा में एक दो अंगुल चौड़े पर्चे पर उनकी संक्षिप्त जीवनी लिख ले गया और उससे लाभ उठा कर परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया। परन्तु वार्षिक परीक्षा में इसी विषय में फेल हो गया और दर्जे में प्रमोशन से पास हुआ। परीक्षा में यह मेरी पहली और अन्तिम बेईमानी थी। मैं हमेशा ही परीक्षा में प्रथम, द्वितीय और तृतीय नम्बरों से पास होता था और उसके बाद में भी इसी तरह से पास होता रहा। परन्तु मेरी बेईमानी ने मुझे सदैव के लिए नीचा दिखाया।
मैं यहाँ इस अपने हाईस्कूल में भी यही बात देखता हूँ कि जो लड़के नकल करते हैं, वे उसी विषय में अथवा उस विषय में जिसे वे अपना कहते हैं और स्वप्न में भी उसमें फेल होने का ध्यान नहीं होता, फेल हो जाते हैं।
निश्चय है कि बेईमानी से सफलता नहीं मिल सकती, यदि मिल भी जाय तो अन्त में बड़ी दुखदायी होती है।
(श्री सेठ अगरचन्द जी नाहटा, बीकानेर)
मेरे जीवन पर बाल्यकाल में धर्म मार्ग पर विशेष रूप से झुकाने वाला प्रभाव उस समय पड़ा जब हमारे यहाँ जैनाचार्य श्री जिन कृपाचन्द्र सूरि जी अपनी शिष्य मंडली के साथ पधारे थे। गंगा दरवाजे के बाहर जब वे खड़े हुए थे, तो उनके दर्शन करके मैं बहुत प्रभावित हुआ। इसके पश्चात् उनका पदार्पण हमारे बाबा जी की कोटड़ी में हुआ और बहुत समय तक यहाँ विराजे। मैं उनके व्याख्यान में रोज जाया करता। उनके शिष्य मुनि सुख सागर जी के पास भवतत्व दंडकादि प्रकरण ग्रन्थों का अध्ययन किया। सन्ध्या समय प्रतिक्रमण करने के लिए वहाँ जाता, रात्रि को भी धर्मचर्चा, प्रश्नोत्तर चलते रहते, इस प्रकार निरंतर साधु समागम के कारण धार्मिक भाव काफी दृढ़ हो गये। धार्मिक ज्ञान भी उत्तरोत्तर बढ़ने लगा। उनके पास बहुत से नये-नये ग्रन्थ देखने में आते।
इसके पश्चात् स्वाध्याय और सद्ग्रन्थावलोकन की ओर रुचि बढ़ी और विभिन्न स्थानों से अनेकानेक ग्रन्थों को मँगा कर अध्ययन किया। इन ग्रन्थों के स्वाध्याय से आध्यात्मिक भावों की ओर झुकाव दिन-दिन बढ़ता गया और उस अध्ययन से मेरा जीवन बहुत कुछ ऊँचा उठता गया। यद्यपि मैं किसी प्रकार की योग साधना नहीं कर सका तो भी सद्ग्रन्थों का कई बार स्वाध्याय करने से चित विशुद्धि काफी परिणाम में हुई हैं। मेरी इस उन्नति का मुख्य कारण स्वाध्याय प्रेम है, परन्तु वह प्रेम भी तो साधु समागम के कारण ही उत्पन्न हुआ, अतएव मैं उसी को मुख्य मानता हुआ पाठकों का ध्यान साधु समागम एवं सद्ग्रन्थों के निरंतर स्वाध्याय की और विशेष रूप से आकर्षित करता हूँ।
यहाँ एक बात और स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि जिस प्रकार सत साधुसंग एवं सद्ग्रन्थों के अध्ययन का महत्व है, उसी प्रकार दुष्ट-संगति एवं कुत्सित साहित्य के अध्ययन से मनुष्य का जीवन बरबाद भी हो जाता हैं। इसलिए प्रथम उनकी परीक्षा करके तब संपर्क में आना चाहिए। सत्साधुजनों का समागम कष्ट साध्य है, पर सद्ग्रन्थों की प्राप्ति सुगमता से हो सकती है। हमें चाहिए कि सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय को जीवन का प्रमुख कर्त्तव्य बनाकर लाभ उठाते रहें।
(मास्टर उमादत्त सारस्वत, कविरत्न, विसवाँ)
आँखों देखी बात है कि एक महाशय का पेशा निरपराधों पर झूठे मुकदमे चलाना तथा झूठी-झूठी गवाहियाँ देना था। हजरत के आस-औलाद तो कोई थी ही नहीं, जिसकी उन्हें कुछ चिन्ता होती या उन्हें वास्तविक प्रेम का कुछ अनुभव होता। दूसरों को सताना, किसी प्रकार से उनसे रुपया ऐंठना तथा पराई बहू-बेटियों की इज्जत बिगाड़ना, यही उनके काम थे। जवानी का जोश, अपने समान किसी को समझते ही न थे। कई बार हल्के-हल्के दंड देकर परमात्मा ने सचेत भी किया, परन्तु वे न चेते। अन्त में उन्हें गठिया-वायु का ऐसा रोग हुआ कि उनके दोनों हाथ-पैर बुरी तरह से जकड़ गये। हिलना-डुलना तक दूभर हो गया। चारपाई ही पर खाना और उसी पर पाखाना!! जरा कुछ स्वस्थ हुये तो फिर वही करतूतें। थोड़े ही दिनों में फिर उसी रोग ने धर दबाया। लाख कोशिशें कीं, लेकिन - मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की वे अच्छे न हुए।
इतना ही नहीं, कुछ दिनों में उनकी आंखों ने भी जवाब दे दिया। बड़ी बुरी दशा को प्राप्त हुए। अभी दो ही वर्ष तो हुए है जब उनकी मृत्यु हुई है।
अधर्म पर चलने वाला कभी सुखी नहीं रह सकता है, यह ध्रुव निश्चित है।
(पं. मन्नीश्याम द्विवेदी, कोर्रा सादान)
मेरे पिता जी व चाचा जी में बहुत दिनों से वैमनस्य रहा करता था। जब से मैंने सुध संभाली, दोनों भ्राताओं में कभी प्रेम न देखा। यह विरोध-भावनाएं एक बार बहुत जोर पकड़ गई। कारण यह था कि चाचा साहब हमारे सदर दरवाजे के सामने एक दीवार उठा रहे थे। इससे पिता जी के लिए बड़ी बाधा उपस्थित होती थी। वे इसके विरोधी थे। चाचा जी ने कई बार दीवार उठाई, पिताजी ने उसे फावड़ा लेकर गिरा गिरा दिया। मैं उन दिनों गुरुवर पं0 चन्द्रभूषण जी के यहाँ विद्याध्ययन कर रहा था। पिता जी का पत्र पाकर घर चला गया।
घर पर आकर देखा कि दोनों भाइयों में भारी कलह मचा हुआ है। मेरा हृदय नहीं चाहता था कि इस लड़ाई में मुझे भी भाग लेना पड़े। चाचा जी के पूर्व स्नेह को ध्यान में रखकर उनसे लड़ने की इच्छा न थी, तो भी घटनाएं आगे बढ़ी और मुझे आगे कदम बढ़ाना पड़ा। एक दिन चाचा साहब दोपहर में कहीं से घर आये और अनेक प्रकार की गालियाँ बकने लगे। माताजी ने कहा, अब हम लोगों से सहन नहीं होता, जो कुछ करना हो जल्दी तय करो। फिर क्या था लट्ठ लेकर पिता जी कुएं की जगत पर चढ़ गये, मैं भी क्या करता, बाँस लेकर पिता जी की रक्षा के लिए खड़ा हो गया। पिता जी ने उनसे कहा- “अच्छा है, यह रोज-रोज क्यों झगड़ा हो, आज जिस तरह चाहो, निपट लो, हम तैयार हैं, अब अधिक बातचीत की आवश्यकता नहीं हैं।” जब तक हम लोग सहन करते थे, तब तक तो चाचा जी खूब बड़बड़ करते थे, पर आज जब मरने-मारने पर उतारू हो गये तो परिणाम दूसरा ही हुआ। चाचा जी घबराये और लड़ने के बदले बिल्कुल शाँत हो गये।
उन्होंने कहा- हम फौजदारी लड़ाई नहीं चाहते, पंचायत से फैसला करा लो। इस बात पर पिता जी भी तैयार हो गये और पंचायत के फैसले से दोनों भ्राताओं ने सन्तोषप्रद लाभ उठाया।
यह छोटी सी घटना मानव जीवन के एक महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डालती है जब तक आप ज्यादतियों को सहते हैं, तब तक उनका अन्त नहीं होता, वरन् कठिनाइयाँ बढ़ती ही जाती हैं। जिस दिन उनका प्रतिकार करने के लिए सचमुच खड़े हो जाते हैं, तब वे बुराइयां भाग जाती हैं और परिणाम सन्तोषजनक ही होता है।
(पं0 गणेशप्रसाद मिश्र विशारद, भिटौरा)
अज्ञात पूर्व जन्म के कर्मवश मैं 4 वर्ष तक पृष्ठ भाग के व्रणक्षय से पीड़ित रहा। दस-बारह प्रान्तों के प्रसिद्ध अनुभवी वैध और डाक्टरों के औषधोपचार से कुछ लाभ न हुआ तथा मेरे समस्त कुटुम्बी जन और शुभ-चिन्तक गण मेरे जीवन से निराश हो गये थे, किन्तु मुझे ईश्वर के प्रति हार्दिक दृढ़ विश्वास बना रहा कि कर्मदंड भोग ही से नाश को प्राप्त होगा और फिर न्याययुक्त भगवदेच्छा होगी, वही परिणाम होगा। शास्त्र में भी कहा गया है कि -
‘अवश्य मेव भोक्तव्यं, कृतम् कर्म शुभाशुभम्।
कृतं कर्म क्षयोनास्ति, कोटि कल्प शतैरपि।”
इस प्रकार मेरा औषधोपचार का साहस किसी प्रकार कम न हुआ। कर्म जारी रहा, मेरे पूर्व पाप कर्मों का भगवद्कृपा से क्षय हुआ। फलतः अन्तिम चौथे वर्ष पूर्ण स्वस्थता प्राप्त हुई, तभी से मेरा जीवन विशेष रूप से और भी धार्मिक बन गया और साथ- साथ श्रीमद्भगवद्गीता एवं ईश्वर के प्रति अनन्य श्रद्धा बढ़ गई जो निरन्तर आगे बढ़ती जाती है।
इस प्रकार मैं देखता हूँ कि कष्टदायक रोग भी मुझे धर्म मार्ग पर अधिक अग्रसर करने में सफल हुआ। बुराई में भी कुछ भलाइयाँ छिपी रहती हैं।
(श्री रामनारायणजी श्रीवास्तव्य ‘हृदयस्थ’ गोहद)
लोग कहते हैं कि गिर्द नवाह में पानी खूब बरस चुका है, किन्तु यहाँ बहुत थोड़ा है। संभवतः यही सुनकर न्यायकारी परम पिता ने आज रात को इस तरह वर्षा करने का निश्चय किया था। नियत समय पर नींद खुली, पानी रिमझिम-रिमझिम बरस रहा था। आँखें बन्द करके सोचने लगा, आज पानी बहुत बरस कर भी बन्द नहीं हो रहा है। भगवन्! आज कैसे नित्य-कृत्य में लगा जाय? इसी बीच कुछ झपकी सी लग गई। एकाएक अन्तरात्मा से आदेश मिला कि इस पास पड़े हुए टाट के टुकड़े को ओढ़ कर नित्य-कृत्य से निवृत्त हो लो। तुरन्त उठ कर देखा- सचमुच एक टाट का टुकड़ा पास ही पड़ा था। आदेशानुसार कार्य में संलग्न हो गया।
सन्ध्यावन्दन के लिए निश्चित स्थान पर गया तो देखा कि वहाँ छत से पानी खूब टपक रहा है, थोड़ी दूर सूखा स्थान देख कर आसन बिछा कर बैठ गया। नियत कार्य में लगा तो था किन्तु मन बार-बार उचट कर कह रहा था, अभी उधर से पानी बह कर इधर ही आ रहा है और आसन आदि सब सराबोर हुए जाते हैं, लेकिन अब क्या? पहिले ही ध्यान आ जाता तो यहाँ बैठते ही नहीं। साधन समाप्त कर के उठा तो देखा कि पानी मुझ से लगा हुआ भरा है, किन्तु मैं सूखे में हूँ।
भद्र बन्धुओं! यह कोई घटना नहीं है, तो भी एक महत्वपूर्ण विषय की चर्चा है। यदि हम अपनी अन्तरात्मा को निरन्तर पवित्र बनाते जायं तो वह सतेज होती जाती है और हमारे दैनिक कार्यों में अत्यन्त महत्वपूर्ण सलाहें दिया करती हैं एवं शत-प्रतिशत ठीक उतरने वाली भविष्य वाणियाँ करने लगती हैं। मुझे अपने कुछ दिनों के साधनों के आधार पर इसका भली प्रकार आभास हो रहा है।
आचार्य जी ने ‘सत् धर्म की दीक्षा’ पुस्तक में कितना अनुभवपूर्ण लिखा है- “तुम्हें अपनी अन्तरात्मा से ही एक निश्चित, सुलझा हुआ उत्तर प्रत्येक समस्या पर मिलेगा, सघन की निरन्तरता तो रखिए।”
(श्री रामप्रसाद सिंह, सिसहनी, गोंडा)
मैंने बहुत से धर्म ग्रन्थों का स्वाध्याय किया परन्तु मेरी समझ में नहीं आया कि धर्म का पालन एक गृहस्थ कैसे कर सकता है। धर्मग्रन्थों ने सत्य की जैसी व्याख्या की है, राजा हरिश्चन्द्र ने सत्य का जिस तरह पालन किया है, उस तरह से यदि हम किसान अपने गृहस्थ जीवन में करें तो गृहस्थी की गाड़ी एक कदम नहीं चल सकती। किसान जीवन गृहस्थी में ऐसा होता है कि दुष्ट लोग जिसे समझते हैं कि ये महाशय झूठ नहीं बोलते, हिंसा, चोरी, कूटनीति, मुकदमेबाजी इत्यादि अवगुणों से कोसों दूर रहते हैं, उनकी फसलों को पशुओं से चरा लेना, घर में चोरी कर लेना इत्यादि कर्म करने में जरा भी संकोच नहीं करते, ऐसी कई घटनायें मेरे साथ घटित हुई जिससे धर्म पर से मेरा विश्वास उठा दिया। मैंने एक पत्र अखण्ड ज्योति सम्पादक के पास लिखा और उनसे पूछा कि जिनको मैं चोर समझता हूँ, परन्तु पकड़ नहीं पाता- उनसे मैं किस तरह बच सकता हूँ, सत्य प्रेम न्याय का पालन पूर्णरूप से करते हुए अपने और अपने ऐसे और भाइयों के साथ होने वाले अत्याचारों को किस तरह बन्द कर सकता हूँ। शर्मा जी ने मुझे लिखा- ‘जिस तरह एक डॉक्टर रोगी के फोड़े में नश्तर चुभा कर, उसे रुला कर, पाप का भागी नहीं होता, उसी तरह आपको भी दुष्टों की दुष्टता दूर करने के लिये, समाज से बुराई दूर कर भलाई की स्थापना के लिये सच्चे हृदय से प्रयत्न करने में यदि असत्य, चोरी, हिंसा, कूटनीति से भी काम लेना पड़े तो यह अधर्म का कार्य नहीं कहा जा सकता।’ इस पत्र ने मेरी आंखें खोल दीं, मेरे मन में जितनी ही धर्म के प्रति घृणा उत्पन्न हुई थी, उतना ही दृढ़ प्रेम हो गया।
(ले. श्री “प्रेम-पथ-पथिक,” बेगूसराय)
(1)
उस समय मैं किसी कार्यवश काशी गया हुआ था। एक दिन इच्छा हुई जरा गंगा-तट का आनन्द लूँ। घूमता-घामता ‘तुलसी घाट’ पर जा पहुँचा और सीढ़ियों पर बैठे, भगवती भागीरथी की तरल तरंगों का कलकल नाद सुनने लगा। उस समय उस घाट पर केवल इने-गिने लोग थे। इतने में एक सर्प न मालूम यकायक कहाँ से आ पड़ा और मेरे पैर के निकट आ पहुँचा। मैं कुछ विस्मय और डर से उठ खड़ा हुआ, पर इतने में ही वह सर्प न मालूम कहाँ गायब हो गया। संध्या हो चली थी, अतएव मैं घर जाने की तैयारी में था। किन्तु उसी क्षण पीछे से आवाज आई - “...............” “.................” (मेरा नाम)। मैंने पीछे देखा। आज भी वह स्वरूप नहीं भूलता। मोटा-ताजा शरीर, कमर में बाघम्बर, बड़ी- बड़ी जटायें, शरीर से एक अजीब ज्योति निकलती हुई, साक्षात् भगवान् काशीनाथ से दीख पड़े। मैं एकटक देखता रहा और बस, पशुपतिनाथ अंतर्ध्यान हो गये। मैं झटपट वहाँ पहुँचा, खूब ढूँढ़ा, पर पता न पाया। निराश तथा प्रसन्न होता हुआ घर लौट आया, पर हृदय में एक अजीब सजीवता तथा प्रसन्नता होती रही।
(2)
मेरे आराध्य गुरुदेव ने मुझे कुष्य-व्याधि सम्बन्धी एक मन्त्र लिखवा दिया था और बस मैंने अपनी नोट-बुक में दर्ज कर लिया था। एक दिन किसी रोगी के लिए दवा देखने को नोट-बुक की जरूरत पड़ी, पर खूब ढूंढ़ने पर भी वह न मिली। मैंने घर पर किसी से पूछ-ताछ नहीं की, क्योंकि उनको नोटबुक की कोई जानकारी न थी।
दूसरे दिन जैसे ही मैंने कुर्सी पर बैठना चाहा, मुझे कुर्सी पर कुछ चीज दिखाई पड़ी। मैंने डरते हुए उसे उठा लिया। देखा कि, एक रुमाल में ठीक से बँधी वही नोट-बुक है, जिसे मैं ढूँढ़ चुका था। मुझे गुरुदेव की कृपा का स्मरण हो आया, क्योंकि यह उन्हीं की कृपा से बिना प्रयास मिल गई।
(श्री रामप्रतापजी ‘राम’, झोझू)
जब मैं 6 या 7 वर्ष का था, तब मेरी दादी मुझे ध्रुव, प्रहलाद आदि अनेक भगवत् भक्तों की कहानियाँ सुनाया करती थी। इन कहानियों का मेरे ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ता और ऐसी इच्छा करता कि मैं भी ध्रुव बालक की तरह परमात्मा के दर्शन करूंगा। 7 वर्ष की अवस्था में परमात्मा के दर्शनों के लिए जंगल में जाकर एक झाड़ी में छिप जाता और परमात्मा का भजन करता। पिताजी मुझे मुश्किल से खोज कर लाते। जब मैं स्कूल में भरती हुआ और हिन्दी पढ़ने लगा, तब भक्तभाल और रामायण को बड़े प्रेम से पढ़ने लगा। जब 24 वर्ष का था तो एक भजनोपदेशक ने हमारे गाँव में आकर ध्रुव, प्रहलाद की कथा बड़े सुन्दर रूप से गाई। इन भजनों ने मेरे उन बाल्य संस्कारों को जागृत कर दिया। मैं उसी समय उपदेशक के प्रभाव से प्रभावित होकर परमात्मा के दर्शन के लिए 211 कोस दूरी पर, निर्जन जंगल में जाकर एक शुष्क पहाड़ पर ध्यान लगा कर बैठ गया। दिन भर ध्यान में बैठा रहा, सुनसान जंगल में रात्रि भी बितानी थी। नाम स्मरण करते- करते निद्रा आ गई, और स्वप्नावस्था में परमात्मा मेरे पास आये। उन्होंने बड़े प्रेम से मुझ से कहा - “दुखी क्यों होते हो? मैं तो सदैव तुम्हारे पास ही हूँ।” नींद खुलने पर वह दर्शन अदृश्य हो गये।
मेरी इच्छा थी कि जागृत अवस्था में परमात्मा के दर्शन करूं और उनसे (1) अनन्य भक्ति (2) काव्य शक्ति (3) जीवन मुक्ति के वरदान माँगू। इसी इच्छा से दो दिन और दो रात्रि उस निर्जन पर्वत पर बिताये, न तो वहाँ अन्न का एक दाना था और न पानी की एक बूँद। दर्शनों की लालसा, भूख प्यास का कष्ट और निर्जन स्थान की भयंकरता ने मुझे व्याकुल कर दिया और फूट-फूट कर रोने लगा। खूब रोया, जी भर कर रोया और दर्शन न मिलने पर पर्वत पर से कूद कर प्राण देने के लिए तैयार हो गया। सचमुच मैं मरने के लिए उद्यत था।
व्याकुलता, विचलता और भावुकता के प्रवाह में बहता हुआ मैं बाल्य बुद्धि के कारण अनर्थ करने जा रहा था कि अचानक मुझे समाधि जैसी निद्रावस्था प्राप्त हुई और भीतर आत्मा में से ऐसी प्रेरणा हुई कि- ‘तुम्हारी इच्छा पूरी होगी।” इस आश्वासन को आकाशवाणी समझकर वापिस चला आया। घर आकर दो रोज की इस गड़बड़ के कारण ऐसा बीमार पड़ा कि महीने भर तक शय्या में पड़ा रहा और मरते-मरते बचा।
मेरी यह घटना पाठकों को शिक्षा देती है कि छोटे बालकों के हृदयों पर कथाओं और उपदेशों का कैसा असर होता है और उन्हें किस प्रकार के उपदेश देने की आवश्यकता है, ताकि वे भावी जीवन को ठीक दिशा में ले जा सकें।
(पं. रामनिवास शर्मा, मलावन)
इस संसार में जन्म धारण किया, उसके डेढ़ वर्ष के अन्दर माँ बाप दोनों ही स्वर्ग सिधार गये और हम छोटे-छोटे पाँच भाई अनाथ रह गये। घर की सम्पत्ति नातेदार, रिश्तेदार ले गये। हमारे सबसे बड़े भाई पं. बाबूराम शर्मा को 10 या 11 वर्ष की अवस्था में इस परिवार का भार उठाना पड़ा।
हमारी ननिहाल से दो छोटे-छोटे बैल आये, बस इसी के सहारे बड़े भ्राता जी अपने से छोटे भाई बाँकेलाल जी की सहायता से खेती करने लगे। खून का पसीना बना कर निकाला, धर्म पर दृढ़ रहकर हम छोटे भाइयों का भरण-पोषण करने लगे। धर्मयुक्त बोया हुआ बीज अनेक गुना होकर आने लगा, जब कि दूसरे किसानों की खेती में घाटा रहता था। भाई साहब की खेती में कभी घाटा नहीं हुआ। इसी छोटी सी आय से उन्होंने बहिन की शादी की, हम तीन भाइयों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाया। जिनमें भाई साहब सियारामजी सिडपुरा मिडिल स्कूल में 30 रु. मासिक पर अध्यापक हैं। और मैं मलावन स्कूल में 27 रु. पाता हूँ। भाई रामचन्द्र जी खेती का काम करते हैं।
बड़े भ्राता जी की आज्ञा में हम सब भाई हाथ जोड़े तैयार रहते हैं और उनकी धर्ममय बुद्धि बल से सुख शान्तिमय जीवन बिताते हैं, उनके धर्म कृषि के आधार पर हम सब की शादियाँ हो गई। अच्छा घर बन गया, नई जमीन पैदा कर ली, तथा घर ईश्वर की कृपा से सब प्रकार भरा पूरा है।
धर्म की कमाई सदा फलती-फूलती है।
(श्री पं. लक्ष्मीनारायण सिंह शर्मा, सा शिरोमणि, बखरी)
मेरे स्कूल के द्वितीय शिक्षक बा. रामगुलाम जी ने एक दिन क्लास के सब लड़कों से कहा- जो कोई ऊर्ध्व पुँग तिलक धारण करके आवेगा उसे मैं मिष्ठान खाने को दूँगा। इस बात को सुनकर बहुत से लड़के चन्दन धारण करके आने लगे और मिष्ठान पाने लगे। मैं भी उत्साह से तिलक लगाता पर संकोचवश स्कूल में पहुँचने से पहले ही मिटा देता था। कुछ दिनों तक सहपाठियों का यह कार्यक्रम जारी रहा, किन्तु जब मिष्ठान का दिवाला निकल गया तो सभी लड़कों ने चन्दन लगाना छोड़ दिया।
इन दिनों मेरे दिल में एकाएक यह भाव उठा कि लोभ वश नहीं किन्तु कर्त्तव्यवश तिलक धारण करना चाहिए और साथ ही कुछ पाठ भी अवश्य करना चाहिये। ऐसा निश्चय कर मैं रामायण का एक गुटका ले आया और उसका पाठ, तिलक धारण तथा हवन करने लगा। स्कूल में जाता, मन लगा कर पाठ याद करता, मेरी दिनोंदिन तरक्की होने लगी, यहाँ तक कि क्लास का मॉनिटर बन गया। मिथ्या भाषण और पाप से सदैव बचता रहता।
धीरे-धीरे मुझे ऐसी शक्ति प्राप्त हो गई कि दूसरों के मन की बात जानने लगा। एक दिन मैंने यों ही अचानक मुनीलाल चौधरी से कहा- आज आपकी दही बूरा खाने की इच्छा थी, किन्तु भात खाकर आये हैं। चौधरी जी अचम्भे में रह गये क्योंकि मैंने उनके मन की बात ठीक-ठीक बता दी थी। चर्चा स्कूल में फैली सब आकर वही प्रश्न किया करते और मैं सब को ठीक-ठीक उत्तर दे दिया करता। लोग समझते थे मुझे कोई मन्त्र सिद्ध है। मैं उनसे स्पष्ट कह देता, भाई यह श्री रामचरित्रमानस का प्रभाव है। आप लोग भी उसका पाठ किया कीजिये। इस प्रकार स्कूल भर में रामायण प्रचार जोरों से होने लगा।
समय के प्रभाव के साथ स्कूल छूटा और अब मैं अध्यापकी करता हूँ, पर श्री रामचरित्र मानस के प्रभाव से जो सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं उनका अनुभव निरन्तर अधिकाधिक करता जाता हूँ।
(पं. देवीप्रसादजी चतुर्वेदी ‘प्रसाद’ गोहद)
मेरे पितामह ने श्री गोस्वामीजीकृत रामायण और हनुमान चालीसा के पाठ का श्री गणेश कराया था और उसका निरन्तर स्वाध्याय करते रहने का उपदेश दिया था। मैंने उनकी आज्ञा का पालन करने में श्रद्धा और विश्वास की पुट और लगा दी और अब तक इसी सुलभ नियम को पालन करता आ रहा हूँ। इससे मुझे अनेक हार्दिक अभिलाषाओं में सफलता मिली है और आध्यात्मिक तत्व की ओर रुचि भी स्वतः उत्पन्न हो गई है। इसी साधन की निरंतरता का प्रतिफल मैं यह पा चुका हूँ कि मुझे अपने वाँछित आध्यात्मिक गुरु की प्राप्ति भी हो गई है। मेरे अनुभव का संक्षेप में यही सार है कि आध्यात्मिक साधन चाहे छोटी सी क्यों न हो उसकी निरन्तरता ही सफलता की जननी है।
प्रिय पाठक बन्धुओं! मेरे जीवन में अनेकों उलटफेर विचित्रतापूर्ण हुए हैं और अपने उसी छोटे से साधन से अनेक सफलताएँ मिली हैं। मेरा अनुभव है कि श्रद्धा, विश्वास और निरंतरता के साथ किये हुए सत्-साधन अवश्य सफल होते हैं।
(महात्मा गोपालदास जी महाराज, बघोई)
मैं नौ वर्ष का था, तब एक बार हमारी जन्म भूमि में रास करने वाले आये, उन्होंने एक दिन प्रहलाद लीला दिखाई। इस दृश्य को देखकर मैं इतना प्रभावित हुआ कि आगे चलकर रामलीला करने वाली बड़ी-बड़ी कम्पनियों में काम करने वाला हो गया। इच्छा अपने लिए मार्ग निर्माण कर लेती है। रास देखकर मुझ पर जो प्रभाव पड़ा था, उसने मुझे आखिर रासधारी ही बना दिया।
जिस कम्पनी में काम करता था, वह पंजाब में उन दिनों काम कर रही थी। हमारे मास्टर और डायरेक्टर साहब एक दिन सुलफे की चिलम उड़ा रहे थे और गीता पढ़ रहे थे। गीता में श्री विराट भगवान का चित्र था, मैं सोकर उठा तो उस चित्र को देखने के लिए पास खिसक आया। इस पर डायरेक्टर साहब नाराज हुए और कहा - “तू इसे देखने का अधिकारी नहीं है।”
“मैं अधिकारी नहीं हूँ, मनुष्य होकर ज्ञान प्राप्त करने का अधिकारी नहीं हूँ, इस ताने ने मेरे मन में कोलाहल मचा दिया। वहाँ से उठकर चल दिया, पर निश्चय किया कि मैं अधिकारी होकर रहूँगा।” गीता के अध्ययन का क्रम चलने लगा। कम्पनी के अन्य कार्यकर्ता जब तीन बजे खेल खत्म करके गहरी नींद में सो जाते, मैं केवल एक डेढ़ घन्टे सोकर उठ बैठता और लालटेन जलाकर गीता पढ़ने लगता। जब तक साथी सोकर न उठते, तब तक गीता पढ़कर, आध मील दूर नहर में स्नान करके वापिस आ जाता।
धीरे-धीरे ज्ञान में वृद्धि होती गई और मैंने सब कुछ छोड़कर आत्म कल्याण के लिए, गृह छोड़ कर संन्यास ले लिया। अब मैं साधु जीवन व्यतीत कर रहा हूँ।
पाठक देखेंगे कि घटनाओं, संगतियों और परिस्थितियों के प्रभाव से जीवन उसी प्रकार लुढ़कता हुआ आगे बढ़ता है, जैसे पत्थर का टुकड़ा नदी की धार के साथ घिसटता हुआ समुद्र में पहुँच जाता है। इसलिए हमें वैसी ही घटनाओं, संगतियों और परिस्थितियों को अपनाना चाहिए, जैसा कि बनना चाहते हैं।
(श्री नयनसिंह वर्मा, बसन्तपुर)
एक अत्यन्त आवश्यक समारोह था। पास में एक पैसा भी न था, पर खर्च की बहुत जरूरत थी। दृष्टि दौड़ाई, तो पूरे तीन महीने तक कहीं से कुछ मिलने की आशा भी न थी। फिर भी भगवान के भरोसे कार्य आरम्भ कर ही दिया गया, कर्त्तव्य आवश्यक था, इसलिए उसमें जुट ही जाना पड़ा। परन्तु कार्य पूरा होने में बहुत बाधाएं तथा कठिनाइयाँ दिखाई दे रही थी, निराश के बादल झूल रहे थे।
उस परम पिता की अपार महिमा तो देखिए कि कार्य के समीप आते -आते जिन भी खर्च की जरूरत पड़ी, वह अनायास ही प्राप्त होता रहा। यहाँ तक कि कार्य पूरा होने के बाद भी शेष रह गया।
शुभ कर्म आरम्भ करने में लोग डरते हैं और नाना प्रकार की कठिनाइयों की आशंका करते हैं। पर देखा जाता है कि जिसने साहस करके श्रेष्ठ कामों में कदम बढ़ाया, वह निस्संदेह पूरा हुआ है। धर्म की भगवान् रक्षा करते हैं।
(श्री रामेश्वरदयाल जी दिग्धर गोरमी)
अपनी ग्राम्य पाठशाला की शिक्षा समाप्त करके मैं गोहद के बड़े स्कूल में भरती हो गया। गाँव में भोला-भाला था, पर बड़े स्कूल और बड़े कस्बे के वातावरण ने मुझे दूसरे ही साँचे में ढाल दिया। वहाँ पहुँचने पर कुछ ही समय में मैं अव्वल दर्जे का उद्दण्ड, उच्छृंखल हो गया। इसी बढ़ी हुई उच्छृंखलता को देखकर कोई भी व्यक्ति मेरे भविष्य को ‘अन्धकार पूर्ण’ कह सकता था। मेरे आचरण दिन-दिन उद्धत होते जा रहे थे।
किन्तु ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है। अखंड ज्योति का यह कथन कितना सत्य है कि “ईश्वर स्वयं ही प्राणियों को अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचाने के लिये प्रयत्नशील है। वह हमारी गुत्थियों को निरन्तर खोलता हुआ जा रहा हैं।” मेरा निजी प्रयत्न कुछ न था, पर स्कूल छोड़ने से कुछ ही समय पूर्व एक गीताप्रेमी सहपाठी से मित्रता हो गई और उसके प्रभाव से गीता जी से मेरा प्रेम बढ़ गया। परीक्षा देकर घर आया, परिस्थितिवश आगे न पढ़ सका और कोई विशेष ऊँचा सत्संग भी प्राप्त न हुआ, तो भी उस सहपाठी मित्र द्वारा बोया हुआ गीताप्रेम का बीज अंकुर होकर बढ़ने और फलने फूलने लगा। कल्याण, अखंड ज्योति आदि पत्रों तथा उत्तमोत्तम पुस्तकों के स्वाध्याय से आत्मोन्नति की प्रक्रिया आगे बढ़ने लगी।
मैं देखता हूँ, जीवन की गुत्थी स्वयं सुलझती जाती है। ईश्वर भुजा पकड़ कर आगे-आगे घसीटता ले जा रहा है। जीवन सरिता अपनी निर्धारित दिशा में प्रबल वेग के साथ बहती हुई चली जा रही है। आज का जीवन दोषों और त्रुटियों से भरा हुआ है, तो भी परम पिता की अपार दया पर विश्वास रखता हुआ मैं अनुभव करता हूँ कि एक दिन यह सरिता महासागर में अवश्य मिल जायेगी। जीवन का परम ध्येय मैं अवश्य प्राप्त कर लूँगा, क्योंकि अनायास ही भगवान वैसे साधन जुटाते चले जा रहे हैं।
(पं. प्रभूदयाल शर्मा वैद्य, काँकन)
मुझे राम नाम पर बचपन से ही विश्वास है। कोई कष्ट पड़ता है तो वह राम नाम संकीर्तन से दूर हो जाता है। इसी नाम प्रेम के कारण मैनपुरी के श्री 1008 स्वामी भजनानन्द जी महाराज के चरणों में अनुराग उत्पन्न हो गया। उनके सत्संग से अविद्या रूपी गाँठ खुलने लगी और समझ में आने लगा कि दुख अविधा से होता है, मेरे जीवन में जो कुछ सुख शान्ति पैदा हुई है, वह श्री स्वामी जी महाराज की कृपा से ही है। आप अनुभवी योगी तथा पूर्ण विद्वान हैं।
भगवान के नाम प्रेम से मुझे श्री स्वामी जी महाराज का सत्संग मिला और सत्संग के कारण ज्ञान का प्रकाश हुआ। आत्मज्ञान का जितना अनुभव होता जाता है, उतनी ही आन्तरिक शान्ति उत्पन्न होती जाती है और निरन्तर यह प्रेरणा बढ़ती जाती है कि संसार रूपी नाटकशाला में हम सब नट हैं, हमें अपना अपना पार्ट ईमानदारी से पूरा करते हुए ईश्वर को प्राप्त करना चाहिए।
निस्संदेह नाम का आधार और महात्माओं का सत्संग जीवन सुधार का मूल आधार है।
(वि. भू. पं. मोहन शर्मा सं, मोहिनी इटारसी)
एक सुदूरस्थ देशी राज्य के राजप्रसाद से लगे हुए अतिथि -गृह में मैं अपने एक विश्वासी भृत्य को लेकर ठहरा था। एक समूचा दिन और दो काली रातें जैसी आई वैसी ही चली गईं। पर यहाँ के राज्याधिपति, रियासत के सैर सपाटे से उस समय तक भी लौट कर नहीं आयें। वक्त काटने और एकान्त सेवन के लिये मैं धोती, तौलिया सम्हाल कर पूर्वीय मार्ग से जय सागर की ओर चल पड़ा। सघन अमराई के बीच की मेदिनी में अपनी पुरातन स्मृति को समेटे हुए जय सागर लहरा रहा था। बीच-बीच में किनारे से पक्के घाट बँध रहे थे। एक निभृत स्थान पर मैंने स्नान सन्ध्योपासन आदि किया और ज्यों−ही लौटने के उद्देश्य से मैं पश्चिमीय मार्ग पर बढ़ा था कि ठीक सामने से पगडण्डी पर किसी के पायल की ध्वनि सुनाई दी। एक नवयौवनसम्पन्ना रमणी सिर पर ताँबे का घड़ा रखे छिछले उतार की ओर बढ़ रही थी। हम दोनों का फासला जैसे ही कम होता गया, आँखों में बसी हुई पवित्रता ने अनुभव किया कि किसी ने हम पर व्यर्थ ही आँखें गड़ा दी हैं। उससे कतरा कर पास से निकल जाने पर मैंने मुड़ कर देखा तो वह ठिठुक कर खड़ी थी। कोई न देखे। पर सर्वदृष्टा परमात्मा तो यह सब देख ही रहा था।
दोनों ओर से प्रश्नोत्तरी छिड़ गई। एक ओर से नाहक की छेड़छाड़ और दूसरी ओर जान साँसत में फंसी थी। उसकी, आँखों में खुला प्रेम प्रस्ताव कुलांचे मार रहा था। ऊपर से तुहमत यह कि ‘वह तुम्हीं हो जो पिछले साल राजा के यहाँ दशहरा के जश्न में आये थे” मैंने लाख इनकार किया और सफाई भी दी, पर इसकी वहाँ थोड़ी भी गुजर नहीं हुई। मैंने आई बला से कन्नी काटने के लिये अपने लम्बे कदम बढ़ाये, परन्तु पीछे से फिर कोई आर्त्त वाणी में कह रहा था- “ठहरो जी! मैं अभी घड़ा भर कर आती हूँ।” मैंने अब मार्ग बदल दिया था, पर मुझे क्या पता कि उसकी झोंपड़ी उसी पगडंडी पर आगे है। वृक्षों की एक कतार पार कर लेने पर कुछ झोंपड़ियाँ दिखाई दीं। यहाँ पीपल के चबूतरे पर टेढ़ी टाँग वाले गदाधारी हनुमान रूप से खड़े थे। सद्यः घटित घटना की विचित्रता ने मूर्ति के तेज को हृदय से स्पर्श करा दिया। मूक वाणी से मूक हृदय के भाव अपने लिये दया और न्याय की याचना करने लगे।
राजकीय अतिथि-गृह से थोड़े फासले पर यहाँ के छात्रावास में अध्यापकों की एक छोटी-मोटी सभा भर रही थी। सद्यः घटित घटना की जिज्ञासा वृत्ति मुझे उस सभा में खींच कर ले गई। वहाँ परस्पर सम्भाषण और प्रेम परिचय हो जाने पर जब सभा का कार्य खत्म हो गया, तो कुछ नवयुवक अध्यापकों और विद्यार्थियों के बीच आज की आपबीती घटना का रहस्य जानने के लिये मैंने निर्भीकता पूर्वक चर्चा छेड़ दी। फिर क्या था सब लोग ठहाका मार कर हँसने लगे। छात्रावास कहकहे दीवार जैसा बन गया, एक अध्यापक ने बताया वह और कोई नहीं यहाँ की जोगिनी थी। बेचारे दूर के पथिक इसी तरह झाँसो में आकर अपना ईमान धर्म खो चुकते हैं, वहाँ नित्य ही पाप के सौदे का बाजार लगा है।
एक अध्यापक जी भावों की पवित्रता और घटनाक्रम में गर्भित सदाचार की विजय से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मुझे विजय मूर्ति मान लिया। वे आज भी मुझे इसी शब्द से सम्बोधित करते हैं। राजाजी के स्नेह और गुणग्राहकता से मैं अब भी हर दूसरे तीसरे वर्ष राज्य में जाता रहता हूँ। पिछली यात्रा में जय सागर के समीप जाकर देखा तो न वह झोंपड़ी थी और न झोंपड़ी की मालकिन जोगिनी ही। उसके रूप का बाजार उठ गया था और वह खुद भी दीन दुनिया से कूच कर चुकी थी। इस घटना में सदाचार की रक्षा के लिये भगवान प्रेम प्रेरणा ही साधक कारण सिद्ध हुई। जो भक्तवत्सल भगवान की दया में आस्था रखते हैं, उनकी सर्वत्र ही विजय और सफलता होती है।
(श्री राधाकृष्ण पाठक, नुनहड़)
मेरे कुटुम्ब के भरण-पोषण का एक मात्र आधार मेरी 15 रुपया मासिक शिक्षावृत्ति ही थी। दैव योग से मेरा ट्रान्सफर पिछोर नामक स्थान को हुआ, जहाँ पर कि मेरी ससुराल भी थी। उन्नत होने के लिये मनुष्य की जन्म-जात अभिलाषा है। इसी प्रेरणानुसार मैंने क्लैरिकल परीक्षा पास करने का विचार किया।
श्री हनुमान जी मेरे आराध्य एवं इष्टदेव हैं। उन दिनों ग्रीष्म-काल होने के कारण मैं उनके मन्दिर में ठण्डक रखने के लिये अपने फुरसत के समय में पानी से धोया करता था। देखने वाले कोई मुझे आडम्बरी, कोई पागल कहा करते थे। पर मुझे उनकी आलोचना की कोई परवाह नहीं थी। एक दिन श्री मारुति विग्रह के पास बैठा हुआ विचार कर ही रहा था कि प्रभो। कहीं से 5) प्राप्त हो जावें तो फीस भेज दें, ताकि परीक्षा में प्रविष्ट हो जाने का निश्चय हो जावे। कोर्स की पुस्तकें तो जहाँ-तहाँ से भी तलाश कर लेंगे और कुछ न मिलने पर खरीद भी लेंगे। वहाँ बैठा हुआ इस प्रकार प्रार्थना कर ही रहा था कि बाहर से किसी के बुलाने की आवाज आई। मैंने बाहर आकर देखा कि मेरा पढ़ाया हुआ विद्यार्थी बाबूलाल गुप्ता अपनी परीक्षा साफल्य पर प्रणाम कर मुझे 5) दे रहा है और कहने लगा कि आपके कृपा के बल पर ही मैं पास हो सका हूँ। इस प्रकार का सुयोग पाकर मुझे श्रद्धा व विश्वास में और भी दृढ़ता हो गई।
फीस भेज दी थी, परन्तु पुस्तकें प्राप्त होने में देरी होने के कारण अध्ययन के लिये केवल 3 मास ही शेष रहा था। यथावकाश पढ़ाई करता था और श्री महावीर जी की कृपा से परीक्षा में सफलता मिलने का भी पूर्ण विश्वास था। समय पर परीक्षा कार्य भी सम्पन्न हो गया। मुझे विश्वास तो पूर्ण था, परन्तु कभी 2 कुछ लोगों के मजाक उड़ाये जाने पर खेद सा होने लगता था कि अगर कहीं फेल हो गये तो ससुराल का मजाक स्थायी हो जायेगा। “चिन्ता को जितना दुहराया जाता है, वह उतना ही दृढ़ता का रूप धारण करती जाती है” अतः उसने मुझे पूर्ण ग्रास लिया। रात को 8:30 बजे अपने इष्टदेव के पास गया, वहाँ बैठकर एकाग्रतापूर्वक उनका मूक चिन्तन करीब 3 घन्टे करता रहा। अन्त में कातर प्रार्थना करता हुआ कि अब परीक्षा फल प्रकाशित होने वाला ही है, लज्जा आपके हाथ है, घर आया।
रात आधी से अधिक व्यतीत हो चुकी थी। नींद नहीं आ रही थी, न जाने कब झपकी लगी, तो देखा एक वृद्ध ब्राह्मण परीक्षा-फल नामक एक पत्र लिये बता रहा है और कह रहा है कि अब रोते क्यों हो, यह 606 रोल नम्बर तुम्हारा ही तो है, देखो? एक दम घबरा कर उठा वहाँ कोई न था। कुछ देर बाद चार बजे तो उठ कर नित्य कृत्य में लग गया। सरकारी गजेट की प्रतीक्षा में सभी थे, मैं भी अपना परीक्षाफल देखने की चिन्ता में था। लोग मेरी ओर सहास्य देख रहे थे और कह रहे थे कि आज पाठकजी भी सफेद स्याही में पास निकलेंगे, मैं चुप था। थोड़ी देर पश्चात् अधिकारी ने गजेट खोलकर बताया तो हम दस सहपाठियों में से केवल 3 पास थे, जिन में मेरा नम्बर प्रथम था। सब आश्चर्य करने लगे मुझे तो पूर्ण विश्वास था ही।
(श्रीमती विष्णु कुमारी देवी सिन्हा, लखनऊ)
मेरे जन्म से लगभग पूर्व मेरे जन्मदाता अपने पिता जी के लिए नौकर के साथ माँस लेने गये थे। 19 वर्ष की आयु थी। वहाँ उन्होंने जीव को कटते हुए और तड़फड़ाते हुए देखा। उस दृश्य का उनके ऊपर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वह वापिस चले आये और पिता जी से स्पष्ट कह दिया कि मैं भविष्य में न तो कभी माँस खाऊँगा और न कभी छुऊँगा। काफी सख्तियाँ की गईं, पर वे अटल रहे, इस घटना के बाद मैंने शरीर में प्रवेश किया।
जन्मदाता की इस वृत्ति का मेरे मन पर ऐसा प्रभाव हुआ कि घर के अन्य सब व्यक्ति मुझे लोभ एवं भय से फुसला कर माँस खिलाना चाहते थे, पितामह मेरी दुर्बलता का एक मात्र उपाय माँस खाना ही बताते थे, पर किसी को सफलता न मिली। एक दिन पितामह मुझे अपने साथ ले गये और उन्होंने मेरे मुँह में माँस रखा, इस पर मैंने वहीं उनकी थाली में ही उलटी कर दी और इस कठिन प्रयोगवश बहुत दिनों तक रोगी रही। पुनः मेरे साथ यह प्रयोग नहीं किया गया। दस वर्ष की अवस्था तक मैंने भयवश तरबूज नहीं ग्रहण किया।
इस घटना का सम्बन्ध जो भी हो, वास्तव में मेरे जन्मदाता का सत्पथ पर आरुढ़ होना ही मेरा जीवन सुधार है। आज संसार को दुखों से छटपटाता देखकर मुझे जी आन्तरिक वेदना होती है, इसका कारण भी पिताजी की वह दया भावना ही है। निस्संदेह माता-पिता के गुण स्वभावों का सन्तान पर बहुत अधिक असर होता है।
(श्री सूर्यप्रकाश जी शुक्ल, बढ़ापुर)
जब चौथी कक्षा पास करके आगे का विद्याध्ययन करने के लिए घर छोड़ कर बाहर जाना पड़ा। चलते समय पिता जी ने शिक्षा दी कि “पुत्र! सदा सच बोलना, सदा सत्य ही की विजय होती है।” मैंने उनकी शिक्षा को गाँठ बाँध लिया। पहले दो साल तक प्राइवेट पढ़ता रहा, इसके पश्चात् एक अंग्रेजी स्कूल में सातवें दर्ज में भर्ती हो गया। मैं अपनी कक्षा में इसी शिक्षा के अनुसार काम करता रहा। जो बात होती, सच-सच कह देता, इसी पर कभी-कभी तो हमें दण्ड भी सहना पड़ा। परन्तु जब एक वर्ष व्यतीत हुआ और आठवीं कक्षा में पहुँचा तो सब लड़कों की ओर से मुझे ‘न्याय मंत्री’ बनाया गया। लड़कों के झगड़े मेरे पास आते और उन्हें जिस तरह तय कर देता, उसे दोनों पक्ष मानते थे। यह पद दसवीं कक्षा तक मुझे ही प्रति वर्ष मिलता रहा।
विद्यार्थी जीवन तो इस प्रकार व्यतीत हो गया; अब साँसारिक जीवन बिताने का प्रश्न सामने आया। जीविकोपार्जन के लिए कपड़े का व्यापार करना उचित समझा। माल लेने के लिये दिल्ली पहुँचा। मैंने एक दलाल को साथ लिया। वह जिस दुकान पर जाता और थान का दाम पूछता तो दुकानदार कुछ माँगता, दलाल कुछ चाहता, इस तरह बड़ी जद्दोजहद के बाद एक थान के दाम तय होते। उनके इस झूठे व्यापार को देखकर मुझे बड़ा कष्ट हुआ और देहली का बाजार छोड़ कर सीधा कानपुर पहुँचा। वहाँ की दुकान पर एक दाम का बोर्ड लगा हुआ था और उसके नीचे लिस्ट टँगी हुई थी, जिसमें कपड़े का नम्बर, उसका मूल्य लिखा हुआ था। मुझे उनकी सचाई पसन्द आई और उन्हीं के यहाँ से कपड़ा लेकर ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ वापिस चल दिया कि ‘तूने जैसे को तैसा मिला दिया।’
दुकान खुली तो बड़ी कठिनाई हुई। ग्राहक आते और माँगी हुई कीमत में कमी करने को कहते। मैं अपनी बात पर डटा रहता। इस प्रारम्भ में तो यह मालूम पड़ा कि दुकान इस तरह न चलेगी। परन्तु मैंने निश्चय कर लिया था, चाहे दुकान बन्द करनी पड़े, पर झूठ न बोलूँगा। फल यह हुआ कि कुछ दिन में मेरी सचाई सब पर प्रकट हो गई और ग्राहक बिना मोल भाव किये हुए कपड़ा ले जाने लगे। अब हमारी दुकान बड़ी अच्छी तरह चल रही है। जो लोग यह कहते थे कि सचाई से व्यापार नहीं हो सकता, उन्हें हमारा व्यापार देखकर लज्जित होना पड़ता है।
(ले. - पं. श्यामजी शर्मा काव्यतीर्थ, प्राँत बिहार)
1- मैं मकान बनवा कर छत पिटवाने की आरंभ करता था। इसी बीच में स्टेशन से दो-एक गाड़ी जलावन का कोयला मँगाया। गाड़ीवान ने कोयले के मालिक से छिपा कर दो एक मन कोयला अधिक लाद लिया और अधिक माल का मूल्य माँगने लगा। मैंने कहा भाई! जब तुम चुपके से माल उठा लाये हो तो इसका पूरा मूल्य देने में हमें क्या लाभ? दोनों में रजामन्दी हो गई। गाड़ीवान माल का आधा मूल्य लेकर चला गया। मुझे आधा माल मुफ्त मिल गया, छत पिटवाने लगा। राज-मिस्त्री के मिथ्या अभिमान के कारण छत की चूना सुर्खी सूखने भी नहीं पाई थी कि नीचे का आश्रय हटा दिया गया। छत लिंटर का था, ऊपर से पानी दे दस-बारह मजदूर पीटने लगे। छत फट कर नीचे आ पड़ा, राजमिस्त्री और मजदूर भाग्य से बचे। 1)एक रुपया के नाजायज माल के कारण 100)एक सौ रुपया का घाटा हो गया। मैं पहले से भी किसी का एक एक पैसा भी लेना अन्याय समझता था, पर इस बार लोभ ने अपना प्रभाव जमाया, जिससे हानि उठानी पड़ी।
2- एक मौलवी साहब असिस्टेंट स्टेशन मास्टर हैं, वह मेरे चिर परिचित हैं, तथापि सर्विस में हैं, इससे उनका नाम नहीं धरता, जो कुछ लिख रहा हूँ उनके स्वमुख का कहा हुआ है, वह बहुत खुदापरस्त सज्जन मुसलमान हैं। युवावस्था में वेतन के अलावा कुछ नित्य उपार्जन कर लिया करते थे, फिर भी महीने के अन्त में उन्हें कुछ दूसरों से माँगने की जरूरत पड़ जाती थी। एक बार कोई फकीर उनके घर आये। मौलवी साहब ने उचित अतिथि सत्कार किया, कथा प्रसंग में उन्होंने फकीर से अपनी दयनीय विवशता का जिक्र किया। फकीर ने कहा- आप नाजायज तरीके से जो मुसाफिरों से लेते हैं, उसको बन्द कर दीजिये और अपना वेतन बीबी के हवाले कर खुदा का नाम लेते रहे।’ मौलवी साहब ने उस फकीर के उपदेश को मान वैसा ही कर दिया। अब वह सब तरह से खुशहाल हैं, कई बीघा खेत खरीद चुके हैं। स्टेशन में अपने वक्त पर काम करना और तस्बीह (माला) पर खुदा का नाम जपना यही उनका मुख्य काम है, बड़े आनन्द में रहते हैं, पुत्रों को पाल भी रहे हैं।
(ले.- के. नन्द व्यास नम्बरदार, गरोठा)
मेरी जन्म-भूमि तो घुगुआ ग्राम में है, पर यहाँ गरोठा में मामा की जमींदारी पर गोद आया था। स्वतन्त्र होकर बिगड़ा, अपव्ययी होने के कारण तामसी व्यक्तियों की छाया मेरी आत्मा के ऊपर जमा हो गई। जिसकी वजह से घर, पड़ोस व गाँव में घृणा की दृष्टियाँ बरसने लगी। अनियमित होने से तन्दुरुस्ती नष्ट हो चली, चारों ओर से तिरस्कार का भाजन बन गया। अशान्ति और चिन्ता के बादल मस्तिष्क में मँडराने लगे। मैंने कुमार्ग पर कदम उठाया और विपत्तियों के जंजाल में फंस गया, जीवन भार बनने लगा।
ऐसे संकट के समय में मुझे जिन मित्रों ने जीवन दान देकर सच्ची सहायता की, उनका नाम है -’सद्ग्रन्थ’। अच्छी-अच्छी पुस्तकें पढ़ने की ओर मेरा झुकाव हुआ और फुरसत के समय में सद्ग्रन्थों का अध्ययन करने लगा। स्वाध्याय का शौक जैसे जैसे बढ़ा, वैसे ही वैसे उत्तमोत्तम पुस्तकें मेरे पास आने लगीं। मित्रता दिन दिन बढ़ने लगी। अब मैंने पुस्तकों को अपना सच्चा मित्र बना लिया है, क्योंकि जीवन को नष्ट करने वाली विपत्ति में से उन्होंने ही मुझे छुड़ाया हैं। ऐसे सच्चे मित्रों से बिछोह करने की इच्छा नहीं होती। अब मेरे जीवन का प्रधान कार्य सद्ग्रन्थों का अध्ययन और ज्ञान सम्पादन करना हो गया हैं। पिछली बुराइयाँ जिनने मेरे ऊपर बुरी तरह अड्डा जमा लिया था, धीरे धीरे अपने आप विदा हो गई हैं। देखता हूँ कि उत्तम विचार वाली पुस्तकों का स्वाध्याय जीवन-सुधार का बहूमूल्य साधन है, इसी भाग को अपना कर अन्य बन्धु भी मेरी तरह लाभ उठा सकते हैं।
(श्री नरेशचन्द्र जी रस्तोगी, कायमगंज)
मेरे एक मित्र का पूर्वजों के समय का मकान फतेहपुर में था। हमारे मित्र बहुत दिनों से उस मकान में नहीं रहते थे, इसलिए उसे बिना किराये रहने के लिए एक निर्धन ब्राह्मण को दे दिया। वह व्यक्ति बहुत दिनों से उस मकान में रहता रहा। पीछे उसके मन में बेईमानी पैदा हुई और उस घर पर अपना अधिकार बताने लगा। यह समाचार जब हमारे मित्र के कान तक पहुँचा, तो उनको यह “नेकी का बदला बदी” देखकर बड़ा खेद हुआ।
कुछ दिनों पश्चात् उनका जाना फतेहपुर हुआ तो उन्होंने देखा कि मकान की सारी लकड़ी, वह व्यक्ति बेच कर खा चुका है और मकान पर अपना कब्जा बताता है। इस पर उससे किरायेनामा लिख देने को कहा गया। परन्तु वह रजामन्द न हुआ, वरन् अपने मिलने वाले बदमाशों को फिसाद कराने के लिए लिया लाया। झगड़े का समाचार नगर में फैला। समझदार व्यक्तियों ने किरायेनामा लिख देने के लिए उससे बहुत कुछ कहा, पर सबकी बात को उसने अनसुनी कर दिया। अन्त में मामला मजिस्ट्रेट महोदय के सामने पहुँचा। उनने उसे खूब फटकारा, तब कहीं किरायानामा लिखने पर रजामंद हुआ। इस प्रकार यह घटना पूरी हुई।
लोगों ने देखा कि वह व्यक्ति कुछ समय पश्चात् भूखों मरने के कारण घर छोड़कर चला गया। उसके चले जाने के पश्चात् बाल-बच्चे भूखों मरने लगे और भीख माँग कर पेट भरने लगें। लेकिन उनको जब उस शहर में भिक्षा भी नहीं मिली, तो कुछ समय बाद वह लोग उस शहर से भी चले गये और इधर-उधर पाप फल भोगते फिरे।
हर व्यक्ति को समझ रखना चाहिए कि बेईमानी ऐसी वस्तु है जो करने वालों को और उसके बाल-बच्चों को भी दुःख देती है।
(श्री भगवती प्रसाद जी व्यथित, बाड़ा)
अभी थोड़े दिन की बात है, एक रोज की घटना है, जब प्रातः काल करीब 6 बजे स्नान आदि से निवृत्त होकर संध्या भजन करने के लिए नित्य की भाँति अपनी टूटी-फूटी मढैय्या में एकाग्रचित्त होकर बैठ गया। एकाएक दिल में नाना प्रकार की शंकाएं उत्पन्न हो गईं। सब से बड़ी शंका यह थी कि ‘अखण्ड-ज्योति’ से क्या तात्पर्य? इसका क्या भाव? इसके भीतर वास्तविक रहस्य क्या है? इसी उथल-पुथल में पूजा भी प्रेम से न कर सका। चित्त में व्यग्रता छा गई, तीन रोज तक खाना-पीना भी काल स्वरूप हो गया। अन्त में मैंने प्रार्थना की कि हे प्रभो! मेरे सन्देह को निवारण कराइए।
तीसरे रोज रात्रि के 1 बजे के करीब मेरे कानों में सनसनी सा बड़े जोरों का शब्द मालूम हुआ। देखा तो स्फटिक सा स्वच्छ आकाश दृष्टिगोचर हुआ, उसमें बिजली जैसी चमक रह-रह कर मालूम होने लगी। उसी निर्मल आकाश में चमकायमान जगमग करता हुआ “अखण्ड ज्योति” मोटे अक्षरों में अंकित बहुत विस्तार रूप से दृश्यमान हुई। उसी अवस्था में नम्रवत् इन दिव्य अक्षरों को प्रणाम किया। तत्काल क्षण मात्र में वह अक्षर लुप्त हो गये। मुझे ऐसा लगा मानो सिनेमा जगत में बैठा हुआ हूँ। फिर वहीं स्वच्छन्द आकाश दिखाई दिया- कोई जोर-जोर से कह रहा था- “सावधान! सावधान!!” फिर थोड़े काल में सूर्य जैसा तेज चहुँ दिशा में प्रकट हुआ, जैसे सूर्य अपनी रश्मियों को धीरे-धीरे समेट लेता है, वैसे ही वह प्रकाश भी एक बिन्दु पर एकत्रित होकर विलीन हो चला। वह ज्योति का समेटा हुआ बिन्दु महान् शक्तिशाली हो गया। अपनी धुरी पर एक सैकिण्ड में मानों हजारों चक्कर करने लगा। उसी कम्पन से हुँकार, सोहंकार, शब्दनाद चरितार्थ हुआ और सोहंकार से त्रिगुणात्मक सत, रज, तम प्रकट हुए और उनसे सत्य, प्रेम, न्याय का स्वरूप धारण कर लिया।
यह इस प्रकार का दृश्य देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। उसी क्षण सारी शंकाएं जाती रही और मुझे पूरा विश्वास हो गया कि अखण्ड ज्योति दैवी प्रेरणा है और इसका निर्माण संसार के कल्याण के लिए हुआ है।
(पं. द्वारिकाप्रसाद जी भट्ठ, चमियानी)
मेरे अध्यापक के जीवन में एक बार स्कूल के प्रधानाध्यापक से कुछ अनबन हो गई, उन्होंने झूठी शान जमाने की कोशिश की, मुझे इतना परेशान किया गया कि मैं संघर्ष में पड़ गया और राजकीय दण्ड विधान उठ गया।
मैं वास्तविक अपराधी नहीं था, तो भी भय था कि अधिकारी वर्ग जो कि प्रधानाध्यापक के सजातीय है, मेरे साथ अन्याय न कर बैठे। रात को एकान्त में बैठ कर रोता रहा और ईश्वर से प्रार्थना करता रहा-नाथ! निर्दोष की रक्षा करना।
अपराधी की तरह जब जिले के दफ्तर में हाजिर हुआ तो क्या देखता हूँ कि प्रधान अधिकारी के घर रोना पीटना शुरू है। मालूम हुआ कि उनके इकलौते पुत्र की असह्य बीमारी का तार आया है। सारे दफ्तर में उदासी छाई हुई है। देखा कि सभी लोगों का झुकाव उस दुखद समाचार ने धर्म की ओर कर दिया है। निर्दोष को सताने का किसी का विचार नहीं है।
मैं धर्मशाला में जाकर स्नान-पूजन में लग गया। दूसरे दिन बिना पूछे, जाँचे, अपने स्थान पर काम करने के लिए मुझे भेज दिया गया। मैंने देखा कि ईश्वर है और वह निर्दोष को अन्याय से छुटकारा दिलाने में सक्रिय सहायता देता है।
(पं. केशवलाल शर्मा मुखरैया मुरार)
अभी पाँच वर्ष की बात है। एक उदय कुमार नामक नवयुवक नीमच के हाई स्कूल में पढ़ते थे। उनके पिता डिप्टी इन्सपेक्टर थे। उदय कुमार बुरी संगति में पड़े और जुआ, शराब आदि कुकर्मों में फँस गये। उनको बहुत समझाया, लेकिन व समझाने वाले का मार तथा धमकी से जवाब देने लगे। आखिर उनको स्कूल छोड़ना पड़ा। जब पिता जी को यह हाल मालूम हुआ तो उनने भी बहुत समझाया, जब कुछ असर न हुआ तो खर्चा देना बन्द कर दिया। खर्चा न मिलने से उदय कुमार की बदमाशियाँ और अधिक बढ़ गई। उनने आठ-दस पक्के बदमाशों का संगठन किया और चोरी, डाके पर उतर आये। एक दिन एक शराबी व्यक्ति को उन्होंने लूटा और उसके पास जो कुछ था सो ले लिया। उदय कुमार सब माल लेकर भागने को तैयार हुए। लेकिन ठीक मौके पर साथियों ने आ पकड़ा और अच्छी तरह से पीट कर बेहोश कर दिया और इनके घर ले जा कर इनके शरीर को बड़ी निर्दयता से चीरा और फिर उसमें चूना भर दिया। जो कुछ निर्दयता की कमाई थी, वह सब ले गये। अन्त में पता लगने पर वारंट के जरिये आये और 6 आदमियों को ढाई-2 साल की सजा हुई। उदय कुमार की 1 वर्ष की कैद हुई। अपील में थोड़ी ही सजा काट कर छूट गये।
जेल से आने के बाद उदयकुमार की दशा में बड़ा परिवर्तन हो गया। वे अपने पापों पर सच्चे दिल से पश्चाताप करने लगे। आखिर आत्म ताड़ना से दुखी होकर आत्महत्या के लिए तैयार हो गये। मरने से पहले वह गुरु- पूर्णिमा के दिन एक महात्मा के पास पहुँचे, वह स्थान उज्जैन से 10-11 मील दूर है। महात्मा जी के उपदेशों से प्रभावित होकर उदयकुमार वहीं रह कर तपस्या करने लगे। तब से अब तक वे मौन धारण किये हुए हैं। जंगली जीवों से ऐसा प्रेम है कि सिंहादि भयंकर जीवों पर यों ही सहज में हाथ फेरा करते हैं। वहाँ के लोगों का कहना है कि हमने महाराज को सोते नहीं देखा। जब से वहाँ गये हैं, तब से फिर बाहर कहीं नहीं गये। घर वालों ने वापिस लाने की कोशिश की पर वे नहीं आयें।
सदुपदेशों में विचित्र शक्ति है। महात्मा जी के उपदेशों ने एक बिगड़े हुए लड़के को सच्चा तपस्वी बना दिया।
(श्री रामकृष्ण वर्मा लखनऊ)
यों तो सत्य को मैं पहले से मानता चला आ रहा हूँ, परन्तु अन्धकार में था, धर्म का मार्ग मेरी समझ में कुछ स्पष्ट रूप से नहीं आया था। दैवयोग से पूना के सैसून अस्पताल में अखण्ड-ज्योति से मेरा साक्षात्कार हुआ और बड़े मनोयोग के साथ इसे पढ़ने लगा। इससे मेरे सारे भ्रम और अज्ञानों का निवारण हो गया। अब तत्परता के साथ सत्य धर्म का पालन कर रहा हूँ। इससे मुझे कोई कठिनाई या हानि दिखाई नहीं पड़ती, वरन् दिन-दिन आत्मोन्नति होती जा रही है और हृदय में बड़ी शान्ति रहती है।
सत्य के अवलम्बन का ऐसा ही प्रभाव है। सत्य को ग्रहण करने से ही जीवन सार्थक बन सकता है।
(ले. श्री ल. ना. दुबे अध्यापक, सेन्धवा)
मैंने अपना बचपन ऐसे आधे दर्जन शिक्षक महोदयों की छत्रछाया में पार किया है, जिनके आतंक से हर समय चित्त भयभीत रहता था। हम लोगों का लिखने व घोटने का इतना अभ्यास घर के लिये दिया जाता कि उसकी चिन्ता में ही दिन रात घुलते रहते। सुबह स्कूल जाने में एक हिचकिचाहट, आतंक, भय, कँपकँपी और महान् आस्तिकता को भावों का आविर्भाव होता। मन में प्रार्थना करते जाते:-
“बजरंगबली मेरी नाव चली,
जरा बल्ली कृपा भी लगा देना।”
रास्ते में राम मन्दिर पड़ता था, बड़े भक्ति भाव से भगवान की पंचायतन मूर्ति को प्रणाम करके कहते थे, हे प्रभो आज और बचा देना। काम इतना अधिक होता था कि उसे पूरा करना कठिन था। बहुत कुछ काम तो चालाकी से निकल जाता था, क्योंकि मास्टर साहब को बहुत कापियाँ जाँचनी होती थीं, वे सरसरी निगाह डालते थे, उनकी इस कमजोरी से लाभ उठाने का हम प्रयत्न करते। कुछ भी हो मास्टर साहब का भय उक्त बुराइयों के साथ साथ भव भय हारी भगवान का स्मरण अवश्य कराता था।
क्रमशः माध्यमिक शिक्षण की ओर अग्रसर हुए, वहाँ भी हेड मास्टर साहब बलवन बादशाह के द्वितीय संस्कार ही मिले, जिधर आंखें घूम गई उधर ही सन्नाटा। हम लोगों ने जी तोड़ परिश्रम किया और उसका सुन्दर फल भी मिला, किन्तु पेट्रोल के स्टाकिस्ट को जैसे आग की एक चिनगारी का भय हमेशा बना रहता है, उसी प्रकार हम लोगों को भी उनके ज्वालामुखी के प्रकट हो जाने का क्षोभ अहिर्निशि बना रहता था। ऐसी परिस्थिति में हनुमान चालीसा, बजरंग वाण आदि स्तोत्रों का स्वाध्याय किया जाता था। अन्ततोगत्वा सत्साहित्यावलोकन द्वारा क्रमशः परमात्मा की नवधाभक्ति की रूपरेखा को समझने लगे। इस भूमिका के साथ ही शिक्षण शास्त्र व मनोविज्ञान के अध्ययन ने मेरे अपने मन को आध्यात्मिक तत्वों की ओर आकर्षित किया। इधर जीविकोपार्जन के साथ गृहस्थी का शकट खींचने लगा। ‘दुख में सुमिरन सब करें, के अनुसार भगवान के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध होता गया और स्वाध्याय एवं सत्संग के द्वारा मैं अपने दैनिक ब्रह्म कर्म में यथाशक्ति प्रवृत्त हुआ।
इस प्रकार मास्टर का भय अन्ततः मेरे लिए धर्मप्रेरक सिद्ध हुआ।
(ले.- श्री पं. द्वारिकाप्रसाद जी शर्मा नागपुर)
मैं बाल्यावस्था में तो बहुत ही सीधा था, किन्तु युवावस्था में संगतिवश देखा−देखी चालाकी व कपट व्यवहार सीख गया और अन्याय तथा असत्य व्यवहार भी करने लगा। जिसके फल स्वरूप मुझे पर्याप्त दंड भुगतना पड़ा। जिससे मन में बड़ी ग्लानि हुई, चिन्ता और पश्चाताप से बहुत दिन तक हृदय में अशान्ति रही।
अब जब कभी असत्य व्यवहार का अवसर आता है, तो पिछली घटना-दंड और पश्चाताप सामने आ जाते हैं और अपने को सँभाल लेता हूँ। दंड में पाप शोधन की बड़ी शक्ति हैं।
(ले.- श्री अविनाशचन्द्र खरे, सिघनी)
मेरा फुफेरा भाई बीमार था। उसके लिए दूध लेने पास के गाँव में जाना पड़ता था। रास्ते में गाँव का कब्रिस्तान पार करना पड़ता था। एक दिन दूध लेकर लौटते समय एक आश्चर्यजनक घटना हो गई। कब्रिस्तान में एक पीपल का झाड़ था, मैंने देखा पीपल के झाड़ के आस पास आग जल रही हैं और आग के आस- पास बहुत से नंगे मनुष्य नाच रहे हैं। मैंने सुन रखा था कि कब्रिस्तान में दूध लेकर जाने से भूत अधिक सताते हैं। उस समय मेरे पास दूध भी था, मैं डरा शायद वे भूत हों। मैं गायत्री का जप कर आगे बढ़ा। पीपल के झाड़ के पास पहुँचा तब देखा कि आग भी नहीं है और वे मनुष्य या भूत भी नहीं हैं। किन्तु वहाँ चमकती हुई हजारों आँखें पड़ी हुई हैं। मैं इस दृश्य को देखकर घबरा गया। थोड़ी देर बाद वे आँखें यकायक गायब हो गई। इसके बाद फिर वही पहले वाला दृश्य दिखाई देने लगा। इस घटना से मैं बहुत डर गया और जैसे-तैसे जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता हुआ घर पहुँचा।
इससे पहले मैं भूत-प्रेतों को न तो मानता और न उनके अस्तित्व पर विश्वास करता था। पर इस घटना ने मुझे विवश कर दिया कि वास्तविकता की जानकारी प्राप्त करूं। कई जानकार सज्जनों से पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि अधर्ममय जीवन बिताने वाले मनुष्यों को भूत-प्रेत की योनि मिलती है। उन्हें बुरा भोजन मिलता है। इसलिये दूध आदि सात्विक भोजनों को देखते ही उनकी स्वादेन्द्रिय विह्वल हो उठती हैं। किन्तु सदिच्छापूर्वक दिया हुआ भोजन ही उन्हें मिल सकता है। भूत-प्रेत दीखते तो है नहीं, जो कोई उनकी मन की बात को जानकर सदिच्छा से कुछ दे, ऐसा तो उनके कुटुम्बी जन श्राद्ध द्वारा ही कर सकते हैं। जब भूतों की इच्छा पूरी नहीं होती तो वे डराने धमकाने पर उतारू हो जाते हैं।
मैं सोचता हूँ क्यों मनुष्य ऐसे अधर्म कार्यों को करता है, जिससे उसे प्रेत योनि मिलती है और साधारण से भोजन के लिए इतना अतृप्त और लालायित रहना पड़ता है।
(ले.- श्री दुलीचंद एच. पाटीदार, बुरहानपुर)
मैं यहाँ एक प्रसिद्ध छापेखाने का प्रबंधकर्ता हूँ। नगर के और नगर से बाहर के बहुत से गणमान्य पंडितों, विद्वानों, सेठों, नेताओं, वकीलों, डाक्टरों तथा सभ्य कहलाने वाले नागरिकों से अनेक अवसर मुझे भेंट करने के लिये मिलते हैं। इन भेंटों में जहाँ कई लाभ होते हैं, वहाँ एक बात बहुत बुरी तरह खलती भी है कि लोग बातचीत करने की तमीज का बहुत ही कम ख्याल करते हैं।
“वार्तालाप का ढंग“- जीवन की प्रधान कला है। किसी आदमी का प्रभाव दूसरों के ऊपर उसी प्रकार का होता है जैसे ढंग से वह बातचीत करता है। यह कला छोटों को बड़ा और बड़ों को छोटा बना सकती है, किन्तु कितने लोग हैं जो अपनी इस महत्वपूर्ण शक्ति का सदुपयोग करते हैं?
देखता हूँ कि लोग यह चाहते हैं कि हमारे साथ दूसरे लोग सभ्यता और नम्रता का व्यवहार करें। किन्तु वे स्वयं दूसरों से वैसा व्यवहार नहीं करते। वे सोचते हैं कि हमारे पद या विधा वैभव का आदर करें और उसी के लिए नम्रता बरतें परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि भौतिक वैभव से खुशामद तो मिल सकती है पर आदर नहीं मिल सकता है। जो व्यक्ति दूसरों के साथ सभ्यता और नम्रता का व्यवहार करेगा उसे ही सच्चा आदर प्राप्त हो सकेगा।
कटुता, दुर्व्यवहार, अहंकार, असभ्यता और टुच्चेपन के साथ बातचीत करने वाला व्यक्ति झूठमूठ अपना बड़प्पन दिखाता है, पर असल में वह दूसरों की निगाह में बहुत ही नीचा गिर जाता है। इसी प्रकार अनावश्यक गप्पों में और उपेक्षा में दूसरों को बहुत देर बिठाये रखने में जो लोग अपना और दूसरों का समय बर्बाद करते हैं, वे अपने साथ और दूसरों के साथ बड़ा भारी अन्याय एवं अपकार करते हैं।
मैं बहुत तर्क, प्रमाण और अनुभवों के आधार पर अपना यह अनुभव सर्वसाधारण के सामने प्रकट कर रहा हूँ कि मनुष्य के महत्व को ऊँचा उठाने और नीचा गिराने में “बातचीत की कला” का प्रमुख स्थान है।
(श्रीमंगलचंद भंडारी, हि. सा. विशारद, अजमेर)
दिसम्बर मास में कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी। सन्ध्या हो चुकी थी। बाहर दरवाजे पर एक भिखारी रोटी माँग रहा था। यों तो बहुत से भिखारी नित्य आते हैं, पर आज के याचक की वाणी में कुछ विशेष आकर्षण था। उसे देखने के लिये मुझे घर से बाहर आने को विवश होना पड़ा। दरवाजा खोल कर देखता हूँ कि एक अस्थि पंजर नवयुवक भिक्षुक सामने खड़ा है और रोटी की याचना कर रहा है। एक-एक हड्डी दिखाई पड़ रही थी, तो भी उसके चेहरे से ऐसा प्रतीत होता था कि यह पेशेवर भिखारी नहीं है, वरन् कोई विपत्ति का मारा है।
मैंने उस भिखारी को प्रेम से पास बिठा लिया और उसकी इस दशा का कारण पूछा। पर मेरे बहुत कहने पर तैयार हो गया। उसने कहना आरम्भ किया -
“मेरा जन्म एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। इकलौता होने के कारण लाड़-प्यार वश मैं बालकपन में कुछ पढ़-लिख न सका। किशोर अवस्था आते ही माता-पिता का परलोक वास हो गया। मैं अकेला रह गया। बिना पढ़ा होने के कारण व्यापार की कुछ देख−रेख न कर सका। मुनीमों की बन आई। वे लूट करने लगे। इधर मेरे कई नये मित्र उत्पन्न हुए, उन्होंने ऐश-आराम की कीचड़ में घसीट लिया। दुकान की ओर से मेरा मन बिल्कुल फिर गया। जवानी के मजे लेता हुआ मित्रों के साथ इधर उधर फिरने लगा। तिजोरियाँ खाली हो गई, जायदाद से ज्यादा कर्ज चढ़ गया, मुनीम लोग दुकान को खोखली करके चले गये। कर्जदारों ने जायदाद को नीलाम करा लिया। ऐसी दशा में मित्र लोग भी किनारा कर गये। उनने अच्छी तरह बोलना भी छोड़ दिया। मैं लाचार था, दो-तीन वर्ष में ही अपनी सारी सम्पदा गँवा कर दर-दर का भिखारी हो गया। बिना पढ़ा होने से कोई अच्छी नौकरी मिली नहीं। अभ्यास न होने और लज्जा के कारण छोटी मंजूरी कर न सका। कोई मार्ग न था, घर छोड़ कर निकल पड़ा और देश परदेश भीख माँगता हुआ किसी प्रकार जीवन निर्वाह कर रहा हूँ। यही मेरी अपनी कथा है।”
भिखारी की आँखों में आँसू भर आये थे, मेरा भी हृदय छलक पड़ा। माता-पिता का वह लाड़-प्यार जो बालकों को अशिक्षित एवं अयोग्य रहने देता है कितना घातक है, यह देख कर मुझे बड़ा दुख हुआ। साथ ही उन मित्र कहलाने वाले डाकुओं पर क्षोभ आया, जो खाते-पीते घरों के बालकों को फँसाने के लिए अपना जाल ताने फिरते हैं और अपने स्वार्थ के लिए उन्हें बिलकुल बरबाद कर देते हैं।
भिक्षुक भिक्षा लेकर चला गया, पर मेरे मन पर यह अमिट प्रभाव छोड़ गया कि भले घरों के बालकों को नष्ट करने वाली दो ही बातें हैं-
(1) माता-पिता का अनावश्यक लाड़ प्यार।
(2) दुष्ट मित्रों की संगति। इसके द्वारा लाख के घर खाक हो जाते हैं।
(श्री रामरक्षपालजी वैधराज, डालमिया दादरी)
मैंने अपने जीवन में दो मन्त्रों का आश्रय लिया है, जिससे अनेक विपत्तियों से उद्धार हुआ है। मेरे पूज्य पितामह जी ने कहा था कि जिस समय तुझे कोई क्लेश, दुःख, आपत्ति होवे, उस समय इनका विधि पूर्वक जाप करना। सब कष्ट, दुःख नष्ट होकर कामना सिद्ध होगी। तब से जिस - जिस समय मुझे कोई कष्ट हुआ, तभी मैंने इसका अनुभव किया और सफलता मिली। यदि मेरे पूज्य पितामह जी मुझे सम्पत्ति दे जाते, तो उससे इन विपत्तियों में से मुक्त होना असम्भव था, जैसा कि उनके उपदेशानुसार उन दो मन्त्रों की सहायता से दुख-मुक्त होता हूँ। इनके आश्रय पर आगे भी सब कष्टों को पार करने का मुझे साहस हैं।
वह दो मन्त्र निम्नलिखित हैं:-
1.कार्मण्य दोषो पहत स्वभावः पृच्छामि त्वाँ धर्म संमूढ़ चेतः। यच्छेयः स्यान्निश्चितं ब्र हि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि माँ त्वाँ प्रपन्नम्॥
-गीता. अध्याय 2/7
2. कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणात क्लेशनाशाय, गोविन्दाय नमोनमः॥
-श्रीमद्भागवत् 10/73
नियमानुसार साधन विधि तो विस्तृत है और वह इन थोड़ी पंक्तियों में नहीं लिखी जा सकती, फिर भी इन मन्त्रों का साधारण पाठ करना भी बहुत लाभदायक हैं। गीता के श्लोक का जाप करने से हृदय का बल बढ़ता है और साहस उत्पन्न होता है तथा कष्ट निवारण के लिए क्या करना चाहिए, उसका उचित उत्तर ईश्वर की ओर से आत्मा को मिल जाता है।
दूसरे मन्त्र में भगवान का नाम स्मरण और कष्ट निवारण की प्रार्थना है। सच्ची प्रार्थना को परमात्मा सुनते हैं और भक्त की इच्छा पूरी कर देते हैं।
(श्री बालेश्वर सिंह, अरक, शाहाबाद)
मैं छः-सात साल का था, मेरे चाचाजी तीन बजे रात से ही भजन गाने लगते। मैं उठ बैठता और श्रद्धा से सुना करता। वे गाते न अघाते और मैं सुनते न अघाता। इसका मुझ पर बड़ा भारी असर पड़ा। मेरा घर ही मेरे लिए धर्म की प्रारम्भिक पाठशाला सिद्ध हुआ और चाचा जी ही मेरे आदि गुरु। मैं भी निर्जन मैदान में निकल जाता और प्रेम में मस्त हो कर घण्टों तक गाया करता। आँखें छलक पड़ती, हृदय पुलकित हो जाता।
तेरह-चौदह साल की अवस्था हुई। मैं स्कूल में पढ़ता, किन्तु बाहरी पुस्तकें पढ़ने तथा एकाँत सेवन से अधिक आनन्द अनुभव करता। गीता का अध्ययन किया और जीवन की अनेक गुत्थियाँ सुलझ गईं। धार्मिक पुस्तकें पढ़ने का मैं आदी हो गया और उसके लिए रात-रात भर जागा करता।
सन् 1939 की बात है। मुझे गाँव छोड़कर शहर में आना पड़ा। यहाँ पर एक घटना ने मेरे जीवन को, मेरी विचारधारा को और भी परिवर्तित किया। मेरी एक मित्र से घनिष्ठता इतनी बढ़ी कि वही मेरा सब कुछ हो गया, उसी के लिए जीना, उसी के लिए मरना। कुछ दिन यों ही गुजरे।
एक वर्ष बाद उसका मन मुझ से उचट गया। आना, जाना, बोलना, चालना सभी कुछ बन्द।
मन में अशान्ति का कोलाहल मचा रहता। जीवन पहाड़ सा प्रतीत होने लगा। रात का समय था, चार दिन बिना खाये हो गये थे। नींद का पता तक नहीं। आँखें पावस का मेघ बन रही थीं। दो बजे, थोड़ी देर को आँख लग गई। मैंने सुना, कोई कह रहा था- ‘नादान! प्रेम के आदि भण्डार परमेश्वर को छोड़कर, नाशवान शरीर के मोह में उलझा फिरता है। उठ, मोह को त्याग और प्रेम को पहचान।” मैं चौंक कर उठ बैठा। वे अज्ञात शब्द मेरे मस्तिष्क में गूँजने लगे, विचारों में घोर परिवर्तन हो गया।
मित्र से फिर स्वभावतः मिलन हो गया। पर अब विरह नहीं सताता। अब वियोग में भी संयोग का अनुभव करता हूँ। जिधर देखता हूँ प्रेममय परमात्मा की ही चलती फिरती प्रतिमाएँ नजर आती हैं। विरह और शोक का नाम नहीं, चारों ओर आनन्द ही आनन्द का सागर लहराता नजर आता हैं। अब-
हुई दया उसकी अब, मन से निकल गई जड़ता है।
जहाँ देखता हूँ जल-थल में, वही दीख पड़ता है॥
(श्री शिवकुमारजी अग्रवाल, नजीबाबाद)
मेरे एक मित्र मुझे अपना निजी अनुभव सुनाया करते हैं, वे बताते हैं कि- “जीवन के आरम्भिक दिनों में मेरी आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी, परन्तु चालाकियाँ कूट-कूट कर भरी हुई थीं। घर में जो पैसा मिलता, उसे मित्र मण्डली में खुले हाथों उड़ा देता। आखिर इस तरह कितने दिन काम चलता? पैसे का अभाव अखरने लगा, मैंने एक साहूकार के यहाँ पच्चीस रुपया मासिक पर नौकरी कर ली। सेठ जी सीधे-साधे व्यक्ति थे, उन्होंने मेरे ऊपर विश्वास कर के प्रमुख कार्यकर्ता का भार सौंप दिया। मुझे मनचाहा खर्चा करने का अवसर मिल गया।”
“परन्तु बेईमानी ज्यादा दिन छिपती नहीं है। जब भण्डा फूटने लगा, तो मैं वहाँ से भाग खड़ा हुआ। स्त्री-पुरुष सब बिलखते रह गये। मुझे जान बचाने के लिए भागना आवश्यक था। पैसा जितना चुराया था, वह फिजूल-खर्ची में उड़ गया। अपने पल्ले बेईमानी, बदनामी, पाप और विश्वासघात बँध गये। दर-दर की ठोकरें खाता, इधर-उधर छिपता फिरता था और सेठ जी के सर्वनाश करने, मित्रों को धोखा देने के कुकृत्यों को स्मरण करके बिलख-बिलख कर रोता, अपनी नीचता पर बड़ी लज्जा आती और आत्मा-हत्या को जी चाहता।”
“ऐसे अनिश्चित जीवन से तंग आकर साधु बनने की इच्छा से निर्जन वन की ओर चल दिया और वहीं घास-पात खाकर रहने लगा। एक दिन एक वृद्ध संन्यासी से मेरी भेंट हुई, उन्होंने मेरे मन की दशा जानी और अपने साथ ले गये। कई दिनों उन्होंने नाना प्रमाण और उदाहरणों से अधर्म के दोष और धर्म के गुण बताये। उन्होंने उपदेश दिया कि तुम धर्मपूर्वक जीवन बिताओ और संसार में आनन्दपूर्वक रहो। उनके अमृतमय उपदेशों से मेरी काया पलट गई और अब पुराने दुर्गुणों को छोड़ कर धर्म पूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा हूँ।”
मित्र के इस महत्वपूर्ण अनुभव से मुझे विश्वास होता है कि- (1) अधर्म करने वाला कितना ही चतुर क्यों न हो, एक दिन उसके पाप का भण्डा अवश्य फूटता है, तब उसे अपनी चतुराई दुखों की जननी ही प्रतीत होती है। (2) किसी व्यक्ति का पिछला जीवन कितना ही बुरा क्यों न हो, पर यदि वह भविष्य में धर्म पर चलें तो फिर भी आनन्द और प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता है।
(पं. श्री राधेमोहन जी मिश्र वैद्य, बहराइच)
मेरे बाबा मुझे अत्यधिक प्यार करते थे। उनका प्रेम इतना अधिक था कि बिना मुझे कुछ खिलाये, वे स्वयं कुछ न खाते थे। चौदह वर्ष तक उनका इतना स्नेह प्राप्त करने के कारण मुझे भी वे प्राणप्रिय हो गए थे। इतना स्नेह बन्धन जुड़ जाने के पश्चात् अकस्मात उनका स्वर्गवास हो गया। इस समय मेरी अवस्था 14 वर्षों की थी, यह हृदयविदारक दृश्य मुझसे देखा न गया। विरह वेदना से विह्वल होकर मैं घर से भाग निकला।
घर छोड़कर मैं सुदूर अज्ञात देश के लिए दौड़ा जा रहा था, विलाप और करुणा से आँखें बरस रही थीं। पैर चल रहे थे, पर उनकी दिशा अनिश्चित थी। मार्ग में दैव योग से एक महात्मा जी मिल गये, नाम था उनका स्वामी ईश्वरानन्द जी महाराज। उन्होंने मुझे प्रेमपूर्वक अपने पास बिठाया और अपने अमृतमय उपदेशों से बताया कि “हम सभी प्राणी यात्री हैं। सब की मंजिल अलग-अलग है, नाशवान वस्तुओं के लिए शोक न मानना चाहिए और अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए कर्त्तव्य लक्ष पर चलते रहना चाहिए।” इन उपदेशों को विस्तारपूर्वक समझा कर स्वामी जी चले गये। मैं प्रभावित होकर घर लौट आया।
स्वामी जी की उस भेंट को बहुत समय व्यतीत हो गया, पर वही उपदेश मेरे जीवन की आधारशिला बन गए हैं। शरीर चिकित्सा कार्य करता है, पर मन आध्यात्मिक शोध में लगा हुआ है।
सत्संग की महिमा अपार है। महान आत्माओं का सत्संग एक क्षण भर में जीवन दिशा को आश्चर्य ढंग से बदल देता है। बाबा की मृत्यु से शोकसंतप्त हृदय वाली दशा और आज की सत्य धर्मावलम्बी विचारधारा की तुलना के बीच जो जमीन आसमान का अन्तर देखता हूँ, उसका श्रेय उन स्वामी जी के सत्संग वाले क्षणों को ही दिया जा सकता है।
(पं. प्रसादीलाल शर्मा ‘दिनेश’ कराहल)
मैं गरीब घर में उत्पन्न हुआ और गरीब ही बना हुआ हूँ। धनाभाव के कारण उच्च शिक्षा प्राप्त न कर सका, पर धर्म पर दृढ़ रहा हूँ। मेरे सहपाठी उच्च शिक्षा प्राप्त करके ऊँचे पदों पर पहुँचे, किन्तु मुझे लोकल बोर्ड की नौकरी को ही जीविका का आधार बनाना पड़ा। गरीबी ने मेरी आध्यात्मिक उन्नति में सदैव सहायता की और विचारों को ऊँचा उठाया एवं रामाष्टक आदि कई पुस्तकों की रचना करने में समर्थ हुआ। मैंने एक बार एक सोरठा बनाया, जिसका अन्तिम पद था- ‘दुनिया पाप समान।’ यह पद बनाया ही था कि भीतर से एक प्रबल प्रेरणा हुई कि तुम्हारा यह विचार अनुचित है। तुम भी तो दुनिया में ही हो, बड़े-बड़े महात्मा भी तो दुनिया में ही हैं। फिर यह पाप समान कैसे हो सकती है? दो दिन तक इन्हीं विचारों में मग्न रहा। दूसरे दिन संध्या समय मैं एक घाट के सामने की पटिया पर बैठा हुआ था कि एक और अबोध बालक आकर मेरी भूल को सुधार गया और अंतर्धान हो गया।
मेरे मन को भक्ति की ओर से सन्तुष्टता प्राप्त न हुई। मन का भाव धर्म की ओर झुका और जनता के आत्मकल्याण के लिए इस जंगली पठार भूमि में एक सत्संग एवं हरिकीर्तन मण्डल की स्थापना की। धर्मचर्चा करना आरम्भ कर दिया, ईश्वर की कृपा से 60, 70 आदमी मंडल में काम कर रहे हैं और नियमित रूप से भजन, कीर्तन, कथा, सत्संग आदि कार्य बड़े ही उत्साह के साथ चल रहे हैं। हमारे साथी जो उच्च पदों पर हैं, इनमें से कई एक महानुभावों ने अधर्म की ओर प्रवृत्ति झुकाई, जिसके कारण आज वे अनेकानेक कष्टों में फंसे हुए हैं।
जो हो, मुझे अपनी गरीबी पसंद है, क्योंकि उसी ने मुझे धर्म पर आरुढ़ रखा है।
(श्री पं. जगन्नाथ प्रसाद शर्मा प्रधान अध्यापक, बाय)
मैं.................मिडिल स्कूल में बहुत अच्छी तरह कार्य कर रहा था, मुझे अपने सहकर्मियों से कोई द्वेष न था, पर वे एक बात से ऐसा ख्याल करने लगे कि यह व्यक्ति हमसे खिलाफ है, मैं उनकी व्यर्थ ताश, चौपड़बाजी में शरीक न होता था और खुशामद पसन्द भी न था, विशेष लिख नहीं सकता, क्योंकि राजनैतिकता आने का डर है ऐसा व्यर्थ विचार करके तीन व्यक्तियों ने मेरा तबादला दाँते का करा दिया जो एक खराब सी जगह समझी जाती है, मेरे लिए दाँता नरायने से भी अच्छा रहा और उन तीन व्यक्तियों में से एक पदच्युत हुआ, एक का लड़का और दूसरे की स्त्री देहान्त 6 मास के अन्दर हो गया। व्यर्थ के द्वेष का बीज बोने का फल ऐसा ही हुआ करता है।
..........स्कूल का हैडमास्टर पुराने ख्याल का कूप मंडुक के से विचार का व्यक्ति था, जिसको अपनी योग्यता पर कतई विश्वास नहीं था, मुझे स्वामी जी के विचारानुसार कि ‘बुरा करने वाले का भी भला करो, एक दिन वह अवश्य पश्चाताप के साथ तुमसे मिलेगा।’ उससे बिलकुल द्वेष न रखता था, पर वह मेरी योग्यता पर मन ही मन कुढ़ता रहता था, मैं उचित कार्य के लिए भी कहता तो उसे अस्वीकार करता था और व्यवहार भी उसका पक्षपात लिए हुए था, कई महीनों पश्चात् मेरे भी कुछ द्वेषपूर्ण विचार हो गये थे, पर क्रियात्मक नहीं, वह क्रियात्मक रूप से भी तरह-तरह के दोष लोगों के सामने तथा सरकार में करने लगा और मुझे नीचा दिखाने तथा हानि पहुँचाने का पूर्ण प्रयत्न करने लगा। इस कार्य में सहायक 2, 3, नीच वृत्तियों के मनुष्य भी थे, जिनकी वह संगति किया करता था।
ईश्वर न्यायकारी है, ग्राम में एक ऐसा उपद्रव मचा कि गाली-गलौज तो कई दफा हुई, पर दो दफा तो पिटते-पिटते बचे और अन्त में साथियों सहित जुर्माने के भागी बने। सच है बुराई का बुरा फल है, भलाई का भला फल है, बुराई जो करेगा बुरा फल क्यों न पावेगा।
(श्री भगवान सिंह गौतम हैड मास्टर सितलहा)
आज से 12, 13 साल पूर्व की बात है, मैं दीपमालिका की छुट्टी में अपने परम मित्र श्री लाल छत्रधारी सिंह जी आमिन के पास भेट करने गया, उस वक्त मैं नवा गाँव के स्कूल में था जो आमिन से करीब 35 मील की दूरी पर है। वहाँ जाकर मैं दस्त की बीमारी से बीमार हो गया। बहुत अधिक दस्त आते थे, जिससे मैं बहुत ही कमजोर हो गया। जब छुट्टी के दिन समीप आ गये थे, तो मैं चलने का विचार करने लगा, मेरे मित्रों ने कहा कि इस दशा में भला आप कैसे जा सकते हैं, अभी ठहरिये अच्छे होने पर मैं सवारी द्वारा आपको पहुँचा दूँगा। मैंने कहा कि कल स्कूल खुलेगा मेरा पहुँचना बहुत ही जरूरी है। मित्रों के आग्रह से उस वक्त ठहर गया, परन्तु कुछ देर बाद जब मेरे मित्र लोग इधर-उधर हो गये, तब मैं बिना किसी से कहे सुने चुपके चल दिया, परन्तु बीमारी के कारण चलना बहुत ही कठिन था, थोड़ी दूर जाने के बाद एक दस्त फिर हुआ और अब चलने की हिम्मत न रही। तब मैं मन ही मन “हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।” का जप करते धीरे-धीरे चलने लगा। अब मेरी तबियत अच्छी जान पड़ने लगी और मैं भगवान की महती अनुकम्पा से सकुशल 35 मील की यात्रा पैदल करके स्कूल पहुँच गया। मार्ग में मुझे कुछ भी तकलीफ नहीं हुई, मैं उस वक्त 1 मील भी चलने योग्य नहीं जान पड़ता था, परन्तु न मालूम कैसे 35 मील पैदल चला गया और मार्ग में किसी प्रकार का कष्ट नहीं हुआ। यह परमात्मा की अनुकम्पा के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है।
(श्री धूमसिंह वर्मा, समौली)
एक बार मैं जबरदस्त बीमार हुआ, बचने की आशा न रही थी। मैं प्रभु से प्रार्थना कर रहा था कि हे रक्षक, सर्वाधार, जो आपने मुझे इस बीमारी में से बचा दिया तो अपना जीवन धर्म प्रचार में लगाऊँगा। मेरी आन्तरिक इच्छा थी कि किसी प्रकार अब की बार बच जाऊँ तो जीवन को परमार्थ में प्रवृत्त कर दूँगा। ईश्वर ने मेरी प्रार्थना सुन ली और मैं बच गया। अब मैं अपनी प्रतिज्ञानुसार जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। धर्म प्रचार मेरा कार्य है। जहाँ जाता हूँ, जिससे मिलता हूँ, हर जगह धर्म चर्चा करना मेरा काम है। मनुष्यता के सद्गुणों को, ईश्वरभक्ति, सत्य, प्रेम, दया, उदारता, परोपकार, साहस, बहादुरी, मानवता, ब्रह्मचर्य, सदाचार, पाखंड खंडन आदि मेरे प्रिय विषय हैं। इनके प्रचार में अपनी सुधि-बुधि भूल जाता हूँ और तन्मयता के साथ लगा रहता हूँ। पहले मेरे सम्बन्धियों को मेरा कार्य पसन्द न था, परन्तु पीछे मेरी दृढ़ता देखकर उन्हें भी सहमत होना पड़ा। अब वे भी विरोधी नहीं रहे हैं।
अनेक घटनाओं के आधार पर मुझे यह विश्वास हो गया है कि जीवन में धर्म ही सार है और जो व्यक्ति तुच्छ स्वार्थों से ऊँचे उठ कर धर्म में पैर बढ़ाते है, उन्हीं का जीवन धन्य है। ईश्वर की कृपा उन्हीं को प्राप्त होती है, जो धर्म मार्ग का अवलम्बन करते हैं।
(ले. श्री लक्ष्मीनारायण गुप्त ‘कमलेश’, मौदहा)
किसी महापुरुष का कथन है- प्रार्थना की छोटी सी क्रिया भी महान् फल देने वाली होती है। उससे बहुत लाभ होता है। कठोर तपस्या अथवा बाह्य क्रिया-कलाप से पाप और अज्ञान का समूल नाश नहीं हो सकता। प्रार्थना से ही हमारा सारा मैल धुल सकता है और हमारे सारे पाप निर्मूल हो सकते हैं। शास्त्रों में जितने प्रकार के प्रायश्चित कहे गये है, प्रार्थना उन सब में अधिक बलवान् और समर्थ है। निर्मल और आसक्ति प्रबल होने पर भगवान् से की गई प्रार्थना का उत्तर भी अवश्य मिलता है। इसी सम्बन्ध में प्राप्त अनुभव हम यहाँ रख रहे हैं।
गत् जून, 1942 के 26 तारीख की ही बात है। राठ (हमीरपुर) निवासी मेरे मित्र श्रीहर प्रसाद जी दात्रे की बारात कानपुर गई थी। बारात की व्यवस्था के लिए प्रायः एकाध नौकर सेवा-सम्बन्ध में नियुक्त कर दिया जाता है। उसी भाँति एक आदमी बारात की सब काल देख-रेख तथा सेवा-सुश्रूषा करने के लिए नियुक्त कर दिया गया। दूसरे दिन उस व्यक्ति ने जनवासा से एक बक्स की (जिसमें लगभग दो हजार रुपये का सामान-आभूषण आदि थे) चोरी कर ली। कुछ देर बाद चोरी का पता चला और खोज की जाने लगी। पुलिस में भी रिपोर्ट की गई और विशेष प्रकार से जाँच जारी हो गई। अचानक इतने रकम की चोरी हो जाने पर सभी को दुःख हुआ। दात्रे जी के पिता बड़े ही दृढ़ विश्वासी और संयमी हैं, उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना करना आरम्भ किया कि, चोरी में गया सामान मिल जावे। इधर दात्रे जी भी लगभग दो घंटा एकान्त में बैठे प्रार्थना करते रहे।
इसके दो-तीन घण्टे बाद ही वह व्यक्ति (जो चोरी कर ले गया था) सर पर बक्स रक्खे हुए वापस ले आया। देखने में वह बहुत भयभीत मालूम पड़ता था। उसने बहुत विनय के साथ कहा- “मेरा अपराध क्षमा हो, मैं यह बक्स चुरा ले गया था, मेरी नीयत खराब हो गई थी। घर ले जाकर मैंने ज्यों ही इसका ताला तोड़ना चाहा, त्यों ही मानो किसी ने मेरा गला घोंटना आरम्भ कर दिया, मैं व्याकुल हो गया, वह तकलीफ मुझे अब भी हैं। यह बक्स सँभालिये और मुझे बचाइये।” उसका शरीर काँप रहा था। यह दशा देखकर सब को बड़ा आश्चर्य हुआ। बक्स का ताला करीबन टूटा हुआ था, खोलकर देखा गया, तो उसमें सब सामान ठीक था।
पुलिस ने चोरी करने वाले को गिरफ्तार कर मामला चलाया और मजिस्ट्रेट ने उसे सच्चे बयान देने पर बरी कर दिया।
प्रार्थना तथा आत्मशक्ति सम्बन्धी विश्वास उन्हें ‘कल्याण’ के ‘ईश्वराँक’, ‘अखण्ड ज्योति’ और ‘पर-काया प्रवेश’ पुस्तक पढ़ने से हुआ है।
(श्री रायसाहब नारायण प्रसाद जी, हजारी बाग)
1- एक सज्जन अमीर खानदान के थे। जितने लोग उसमें थे, सब के सब कंजूस थे।
परन्तु ये बहुत दानी थे, जो कोई उनके दरवाजे पर जाता, उसका आदर-सत्कार करते थे। उन्होंने अपनी हैसियत से ज्यादा दान किया, इनके लड़के बहुत अच्छे पदों पर है, तथा हर तरह से खुशहाल हैं और उस वंश के और लोगों की वर्तमान अवस्था बहुत साधारण है।
2- एक सज्जन अति उदार हृदय के थे। पास में तो बेचारे के धन अधिक नहीं था, किन्तु अन्तःकरण बहुत बड़ा था। मुहल्ले में किसी पर्व पर या विवाह आदि उत्सवों पर चट पहुँच जाते और बड़े आदमियों के ऐसा खर्च करके उन लोगों की सहायता करते थे। अभी हाल ऐसा है कि उनके लड़के लोग पिता की अपेक्षा अधिक खुशहाल हैं।
3- एक मित्र कहीं रेल पर जा रहे थे। संयोगवश किसी जौहरी का जवाहिरों का छोटा सा बन्डल, जो छूट गया था, इनके हाथ लग गया। यह घर ले आये। छः महीने के अन्दर पागल हो गए और अन्त काल तक पागल ही रहे और उनके लड़के लोगों को भी अवस्था अति साधारण हो गई।
4- एक सज्जन अपने माता-पिता को किसी प्रकार की सहायता नहीं करते और उनकी स्त्री अपने पति और अपने लड़के लोगों का ही ख्याल करती थी। सास-ससुर का कभी भी कुछ भी सेवा नहीं करती थी। यहाँ तक कि जब उनके पिता मरे, तो उनको श्राद्ध भी करने देना नहीं चाहती थी। अन्त में उनकी मृत्यु कम उम्र में ही दुःख के साथ हुई और सब धन नष्ट हो गया। स्त्री का देहान्त बहुत दुःख भोग कर हुआ। दस-पन्द्रह वर्ष तक गठिया की बीमारी से दुःखित रही।
5-एक पुरुष किसी अमीर आदमी के यहाँ नौकरी करते थे। जिनकी कोई सन्तान नहीं थी। अचानक उनकी मृत्यु हो गई। ये रातों-रात उनका धन चुरा कर अपने यहाँ ले आये। कुछ दिन के बाद इनकी भी मृत्यु हो गई और जब तक जीवित रहे, सुखपूर्वक नहीं रह सके। इनका लड़का अभी जीवित है और गठिया की बीमारी से पीड़ित है। चल-फिर नहीं सकता है।
(श्री इन्द्रचन्द्र भूरा, सिवनी)
एक समय हमारे घर विपुल संपदा, बंगला, मोटर, घोड़ा गाड़ी, नौकर-चाकर सभी कुछ थे। पन्द्रह साल की उम्र में मैंने पढ़ना छोड़ दिया और अपने दिन मौज-मौज में काटने लगा। पिता जी से जितने पैसे माँगता, मिल जाते। खूब तो सिनेमा देखा, खूब सिगरेट के धुँए उड़ाये, खूब घूमा और खूब शौक किये। वक्त काटने के लिए एक-दो काम सीखने में भी कुछ समय लगाया, पर मन उधर न लगा। पैसा-खर्च, पैसा-खर्च, दो ही बातों का मुझे ध्यान रह सका। लक्ष्मी-सुख शान्ति की देवी हैं। कुपात्रों के यहाँ अधिक समय तक वे नहीं ठहरतीं, जब जाने को होती है, तो यों ही चली जाती हैं। समय प्रवाह के साथ लक्ष्मी जी भी बह गईं। हमें निर्धनता ने आ घेरा। मित्रों ने साथ छोड़ दिया, सम्बन्धी बुरी निगाह से देखने लगे, पिता जी का कोप भाजन बन गया। चारों ओर से हिकारत बरसने लगी।
ठोकर लगने के बाद होश आता है, अथवा यों कहना चाहिए कि ईश्वर होश में लाने के लिए ठोकर लगाता है। अपनी पिछली भूलों का जो परिणाम सामने आया, उससे सिसक-सिसक कर रोने लगा, पश्चाताप की आग में मेरा जी जलने लगा। मन की वेदना किसके आगे प्रकट करता?
अनुभव ने मुझे होशियार बना दिया, अब मेरे सारे व्यसन छूट गये है और मामूली पूँजी से सोने, चाँदी की दुकान चलाता हूँ। गृहस्थी के बोझ ने किफायतशार और आवश्यकताओं ने उद्यमी बना दिया है। अब मैं पिछली गलतियों से शिक्षा लेता हूँ और उन शिक्षाओं की सहायता से आगामी जीवन का निर्माण करता हूँ। स्वार्थी दुनिया के प्रपंचों में उलझने की अपेक्षा एकान्त सेवन और आत्म चिन्तन मेरे प्रिय विषय बन गये हैं।
गत जीवन की घड़ियाँ मुझे निरंतर शिक्षा दिया करती हैं कि (1) फिजूल खर्ची का चस्का लगना और (2) फिजूल खर्ची के लिए धन मिलना, यह मनुष्य के सब से बड़े दो दुर्भाग्य हैं। जिस अभागे को यह दोनों ही मिल गये हैं, उसके अन्धकारमय भविष्य की ईश्वर ही रक्षा कर सकता है।
(श्री जगन्नाथ राव नायडू, नागपुर)
तारीख 29 जून को मैं स्टेशन से घर जा रहा था। यहाँ पर छोटी लेन का भी प्लेटफार्म है, यहाँ एक स्त्री, एक 13 साल की बालिका तथा दो और छोटे बच्चे बैठे थे। जब मैं उधर से निकला, तो वे लोग ऐसे बात किये, जैसे कुछ पुरानी पहचान हो। कहने लगे- हमें सदर पहुँचा दो या रास्ता बतला दो। मैंने उन्हें दो रास्ते बतलाये और कहा इधर से भी जा सकते हो और इस दूसरे रास्ते से भी जा सकते हो। बाई ने कहा- दो बात मत बोलो, हम भूल जाएंगे। मुझे अपनी भूल प्रतीत हुई। अपरिचित आदमी को दो बातें नहीं बतानी चाहिए। इससे वह गड़बड़ में पड़कर भूल कर सकता है। मैं कुछ दूर चलकर सीधे रास्ते पर उन्हें पहुँचा आया।
जब वापिस लौटा तो मुझे लगा कि मानव जाति को एक ही प्रकार का रास्ता बताने की आवश्यकता है। विद्वानों ने अलग-अलग रास्ते बता कर दुनिया को भ्रम में डाल दिया है। यदि साम्प्रदायिक उलझनें पैदा करने की बजाय सत्य, प्रेम, न्याय का एक ही सच्चा धर्म समस्त संसार को सिखाया जाये, तो हम सब लोग भी हेलमेल के साथ उसी तरह रह सकते हैं, जैसे गायें और हिरन प्रेम पूर्वक अपने झुण्ड में रहते हैं।
एक दिन एक हिन्दू लड़का स्टेशन पर मुझे मिला। वह छत्तीसगढ़ की बोली में पूछने लगा- “राजनन्द गाँव को गाड़ी कब जावेगी। मैं एक मुसलमान के साथ आया हूँ और गरीबी के कारण मुसलमान हो जाऊँगा।” मेरे मन में उस के ऊपर दया आई और उसे अपने घर ले जाकर रखने एवं भोजन, वस्त्र की व्यवस्था करने की सोचने लगा। मैंने अपने संदेहों को निवारण करने के लिए उसकी बारीक परीक्षा की, तो भेद खुल गया कि वह ठग है और दयालु व्यक्तियों को ऐसे ही बहानेबाजी से ठगा करता हैं। इस ठगी में उसे सफलता मिली है, इस लिए पेशे की तरह इस बहानेबाजी को अपनाये हुये हैं
मुझे लगा कि दया-धर्म बहुत उत्तम है, परन्तु बिना परीक्षा किये कुपात्रों की सहायता करना, दुनिया में पापों की ओर अधिक वृद्धि करना है।
‘अखंड ज्योति’ का अगला अंक भी-
‘अनुभव अंक’ होगा।
राजनैतिक हलचलों के कारण कई लेखकों के चित्रों के ब्लॉक बनकर दिल्ली से न आ सके, इसलिए कई महत्वपूर्ण लेख अगले अंक के लिए रोक लेने पड़े हैं। इस प्रकार अखण्ड ज्योति का सितम्बर का अंक भी अनुभव अंक का उत्तरार्द्ध होगा।
-सम्पादक
(श्री निरंकार देव सेवक)
इस अखिल ब्रह्माण्ड में बिखरे पड़े हैं प्राण मेरे॥
प्राण मेरे सूर्य मंडल में प्रभा बने जगमगाते।
प्राण मेरे शून्य के शशि तारकों में झिलमिलाते॥
प्राण की मदिरा पिये दिन-रात पृथ्वी झूमती सी-
वायु बन कर प्राण मेरे व्योम को सिर पर उठाते॥
है हुई उत्पन्न मुझसे ही सकल हलचल जगत की-
विश्व की चैतन्यता ही प्राण की पहचान मेरे॥
इस अखिल ब्रह्माण्ड में बिखरे पड़े हैं प्राण मेरे॥
डडडड अपने सरित सर सागरों में देखता हूँ।
डडडड अपने विपिन गिरि गह्वरों में देचाता हूँ।
डडडड में लाख चौरासी बना बन्दी पड़ा मैं-
डडडड व्योम जलिल चर नरों में देखता हूँ॥
डडडड आरंभ से ही हर दिशा में, हर तरफ से-
डडडड झंकार आती सुन रहे हैं कान मेरे॥
इस अखिल ब्रह्माण्ड में बिखरे पड़े हैं प्राण मेरे॥
दीन-दुखियों की व्यथा डडडड मेरे हृदय की।
चिर वियोगिनि की कथा डडडड ना मेरे हृदय की॥
है सबल का विश्व साथ डडडड दुर्बल का न कोई-
मानवों की यह प्रथा डडडड वेदना मेरे हृदय की।
व्ँस कभी पाया न सुख डडड मैं अमर सहचर दुखों का-
सिसकियाँ भरते इसी से, अश्रु सिंचित गान मेरे॥
इस अखिल ब्रह्माण्ड में बिखरे पड़े हैं प्राण मेरे॥
सभ्यतायें लुट चुकी हैं, उच्च उन्नति के शिखर पर।
जातियाँ सोई अनेकों जागरण के गीत गा कर॥
आज के नृपराज संभव हैं बने कल के भिखारी-
पी सका अमरत्व का विष कौन किस्मत का सिकंदर?
है सृजन विध्वंस मेरे, भाग्य की लिपि में लिखे से-
खूब देखे हैं समय ने, सब पतन उत्थान मेरे॥
इस अखिल ब्रह्माण्ड में बिखरे पड़े हैं प्राण मेरे॥
*समाप्त*