पानी जैसी जमीन पर बहता है, उसका गुण वैसा ही बदल जाता है। मनुष्य का स्वभाव भी अच्छे बुरे लोगों के अनुसार बदल जाता है। इसलिए चतुर मनुष्य बुरे लोगों का साथ करने से डरते हैं, लेकिन अच्छे व्यक्ति बुरे आदमियों के साथ घुल−मिल जाते हैं और अपने को भी वैसा ही बना लेते हैं। मनुष्य की बुद्धि तो मस्तिष्क में रहती है, परन्तु कीर्ति उस स्थान पर निर्भर रहती है जहाँ वह उठता बैठता है। आदमी का घर चाहे कहीं भी हो, पर असल में उसका निवास स्थान वह है जहाँ वह उठता बैठता है और जिन लोगों की सोहबत पसन्द करता है। आत्मा की पवित्रता मनुष्य के कार्यों पर निर्भर है और उसके कार्य संगति के ऊपर निर्भर है। बुरे लोगों के साथ रहने वाला अच्छे काम करे यह बहुत कठिन है। धर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, लेकिन धर्माचरण करने की बुद्धि सत्संग से ही उत्पन्न होती है। याद रखो कुसंग से बढ़कर कोई हानि नहीं और सत्संगति से बढ़ कर कोई लाभ नहीं।
पाठक, पहले इन पंक्तियों को पढ़ लें, तब आगे का पन्ना खोलें।
1- अगले वर्ष के ग्राहकों को ‘वशीकरण की सच्ची सिद्धि’ नामक छः आना मूल्य की महत्वपूर्ण पुस्तक पाठकों को उपहार देने का निश्चय किया गया है। यह भेंट वे ही प्राप्त कर सकेंगे, जिनका चंदा इसी दिसम्बर मास में प्राप्त होगा। पीछे सुविधा बन्द कर दी जायगी। देर करने वालों को गत वर्ष की भाँति इस वर्ष भी निराश होना पड़ेगा।
2- प्रायः सभी पाठकों का वर्ष जनवरी से शुरू होता है। बीच के महीनों में जो सज्जन ग्राहक बने थे, उन्हें जनवरी 42 से उस मास के पिछले अंक भी भेज दिये गये थे। अब केवल 96 ग्राहक ऐसे रह गये हैं, जिनका वर्ष बीच में ही समाप्त होगा। इन सज्जनों से प्रार्थना है कि या तो वे सन 42 के शेष पिछले अंक मंगाकर अपनी फाइल पूरी करलें या सन् 43 के शेष महीनों का चन्दा भेजें। इस प्रकार एक वर्ष की फाइल उनके पास पूरी हो जायगी और हमें भी इसी में सुभीता रहना है।
3- कागज का मूल्य आठ गुना महंगा हो गया है। पहले जिस किताब में दो पैसे का कागज लगता था, अब उसमें चार आने का लगता है। ऐसी दशा में मूल्य न बढ़ायें तो भी कमीशन देना बिलकुल बन्द कर देने के लिए हमें विवश होना पड़ रहा है एक मास का नोटिस इसके लिए दिया जा रहा है। जो सज्जन हमारी किताबें मंगाना चाहें वे दिसम्बर 42 में ही मंगालें। इस महीने में चौथाई कमीशन दिया जाया। जनवरी 43 से कमीशन देना बन्द कर दिया जायगा।
4- पुस्तकों पर चौथाई कमीशन मिलता है और डाक खर्च ग्राहक के जिम्मे होता है। इस प्रकार छह आने वाली पुस्तकों के कमीशन छह पैसे में से डाक खर्च एक आना कम हो जाता है और साढ़े पाँच आने देने पड़ते हैं। पुस्तक मंगाने वाले सज्जन छह आने की पुस्तकों के लिए साढ़े पाँच आने और पंचाध्यायी के लिए डडडड॥-भेजें।
5- अखंड ज्योति के सन् 40 के 6 अंक सन 41 के कुल 12 अंक व सन् 42 के कुल अंक मौजूद हैं, जो सज्जन मँगाना चाहें दो-आना फी अंक के हिसाब से मंगा सकते हैं। इन पर कमीशन नहीं दिया जाता किन्तु डाक व्यय कार्यालय ही लगा देता है।
6- जिन सज्जनों को अगले वर्ष ग्राहक रहना है उन्हें अपना चन्दा दिसम्बर मास में ही मनीआर्डर से भेज देना चाहिए, जिससे उपहार की पुस्तक प्राप्त हो सके। वी.पी. मंगाने में व्यर्थ ही ।-)अधिक देने पड़ते हैं। जो सज्जन ग्राहक न रहना चाहें वे हमारी प्रार्थना पर तीन पैसे अवश्य खर्च करें, अपने विचार की हमें सूचना अवश्य देदें।
7- पत्र व्यवहार करते समय या चन्दा भेजते समय अपना पूरा पता और ग्राहक नम्बर लिखना न भूलें।
मैनेजर-अखण्ड-ज्योति, मथुरा।
आत्मा को सत्य का साक्षात्कार कराने वाला नया प्रकाशन
‘अखण्ड ज्योति’ सम्पादक आचार्य श्रीराम शर्मा ने अपने अतुलित अध्ययन और गंभीर मनन के आधार पर इन सद्ग्रन्थों की रचना की है। इनकी एक पंक्ति में आध्यात्मिक तत्वज्ञान भरा हुआ है। यह रचनाएं इसी मास छप कर तैयार हुई हैं। पाठकों को इनकी एक-एक प्रति अवश्य मंगा लेनी चाहिए।
ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?
ईश्वर सम्बन्धी सम्पूर्ण शंकाओं का समाधान करते हुए इस पुस्तक में परमात्मा सम्बन्धी जानकारी के प्रत्येक पहलू पर प्रकाश डाला गया है। ईश्वर को कैसे प्राप्त किया जा सकता है? उसकी कृपा से क्या होता है? इन सब रहस्यों पर गंभीर विवेचना की गई है। मूल्य।-)
जीवन की गूढ गुत्थियों पर तात्विक प्रकाश।
जीवन की समस्याएं इतनी उलझी हुई हैं कि उन्हें सुलझाते हुए मनुष्य की बुद्धि चक्कर खा जाती है। हम कौन हैं? कहां से आये? किधर जा रहे हैं? आगे हमारा क्या होगा? जीवन का उद्देश्य क्या है? मृत्यु क्या है? पशु योनि कैसे मिलती है? ऐसी अनेकों गुत्थियाँ इस पुस्तक में बड़े ही सुन्दर ढंग से सुलझाई गई हैं। मू. ।-)
गहना कर्मणो गतिः
कर्म की गति बड़ी गहन है। भला करते बुरा फल और बुरा करते अच्छा फल मिलता हुआ देखकर लोगों की बुद्धि चक्कर खा जाती है। इस पुस्तक में उस समस्या को सुलझा कर दर्पण की तरह रख दिया है, जिससे कर्म फल की सारी समस्या भली प्रकार समझ में आ जाती है। मूल्य।-)
क्या धर्म? क्या अधर्म?
संसार में अनेक सम्प्रदाय, मत एवं धर्म प्रचलित हैं। एक मत किसी बात को धर्म बताता है, दूसरा उसी का खंडन कर देता है। इस विरोध की गुत्थी को सुलझाते हुए धर्म की ऐसी व्याख्या की गई है, जो हर एक व्यक्ति को मान्य हो। प्रथाओं में सम्प्रदायों, कर्मकाण्डों की उपयोगिता, अनुपयोगिता पर भी भली प्रकार मार्मिक चर्चा है। मूल्य।-)
पंचाध्यायी
यह आधुनिक युग की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक मानसिक शारीरिक एवं धार्मिक समस्याओं पर व्यवस्था देने वाली गीता है। भारत की दुरवस्था कैसे हुई? और भविष्य में नवीन भारत का निमार्ण कैसे होगा? इसमें इन प्रश्नों का ठोस उत्तर है। संस्कृत के सुचलित श्लोक, नीचे अन्वय सहित अर्थ, अच्छा कागज, सुन्दर जिल्द, इस पर भी मूल्य॥।) मात्र। नवीन युग की यह नवीन गीता हर धर्मप्रेमी के हाथ में होनी चाहिए।
मँगाने में जल्दी कीजिये! इस अलभ्य ज्ञान से एक घड़ी भी वंचित मत रहिये।
मैनेजर-अखण्ड ज्योति, मथुरा।
मृत्योर्मामृतं गमय
-श्रुति
मृत्यु की ओर नहीं; जीवन की ओर चलिए!
अविद्या ही मृत्यु और विद्या ही जीवन है!
-इसलिए-
अपने अविद्या पूर्ण विचारों को त्यागते हुए, हृदय में ज्ञान का प्रकाश धारण करिए।
वर्ष 2 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक 12
(ले.-श्री ‘रमण’)
झिलमिल झिलमिल कुछ जलता है।
तम से परिपूर्ण डगर मेरी, चलना भी है दुश्वार यहाँ।
पग-पग पर काटे मिलते हैं, दुश्मन सारा संसार यहाँ॥
प्यासी दुनिया के बीच हाय, युग से प्यासे मानव का दल -
कब मिली इसे तिरछी चितवन, इसकी किस्मत में प्यार कहाँ।
ठोकर खाता फिर सँभल-सँभल, गिरता, उठता फिर चलता है।
अपने हाथों से चिता सजा, उसे आग लगाने वाले को।
मधु है, अमृत है, कह कह कर, प्रिय जहर पिलाने वाले को॥
मैं ढूँढ़ रहा हूं किस युग से, आँखों में चिर अरमान लिए -
अपने अभाव से भरे हाय, दुख सपने सत्य बनाने को।
धूमिल बन सांसें उठती हैं, जब जीवन स्वयं पिघलता है।
लेकर प्राणों की अमर ज्योति अन्तर का दीपक जलता है
यह किसने कहा। मूर्ख अपनी, दुनिया के कर ले द्वार बन्द।
इस बाहर भीतर की हलचल में, मिट न सकेंगे अमर द्वंद्व॥
बाहर का दीपक ओर, यहाँ जितना प्रकाश उतना पाप तम है -
उतना ही प्रकाश से पूर्ण हृदय अन्तर का जितना पान मन्द॥
उर वातायन से झाँक, देख, राही कितना दुख सहता है -
जब सारी दुनिया फूँक रहा, अन्तर का दीपक जलती है।
झिलमिल झिलमिल कुछ जलता है।
इस अंक के साथ अखण्ड ज्योति का तीसरा वर्ष समाप्त हो रहा है। इन थोड़े से दिनों के भीतर अखण्ड ज्योति द्वारा जनता जनार्दन की जो सेवा हुई है, उसके लिये देश - विदेशों में एक स्वर से जितनी प्रशंसा की गई है, उसे सुनते हुए कानों पर सहसा विश्वास नहीं होता।
सत्य है हमारी अल्प शक्ति द्वारा इतने महान कार्य का होना निस्सन्देह आश्चर्य से परिपूर्ण है। चिन्तन करने पर एक ही बात प्रतीत होती है कि ईश्वरीय महान प्रेरणा का निमित्त बन जाने का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ है। भगवान राम को रावणवाद का नाश करना था पर बेचारे क्षुद्र बन्दर भी यश के भागी बन गये। कौरववाद का ध्वंस होना था पर पाण्डवों को अनायास ही कीर्ति मिल गई। इस युग में व्यापक रीति से फैले हुए असत्य, पाप, पाखण्ड एवं कुविचारों को भगवान नाश करने वाले हैं। निस्संदेह उसके स्थान पर सत्य की, धर्म की, प्रेम की तथा न्याय की स्थापना होगी। उसके अनेक साधनों में से प्रभु ने अखण्ड ज्योति को भी एक बनाया हो, तो कोई अचम्भे की बात नहीं है।
सत्य का प्रचार के लिए अखण्ड ज्योति द्वारा जो ज्ञान यज्ञ आरम्भ किया गया है, उसकी दिव्य सुगन्ध देश देशांतरों में व्यापक होती जा रही है। पच्चीसियों वर्ष निकलने वाले हिंदी के पत्र जिन प्रदेशों में पहुँच नहीं पाये थे वहाँ न जाने कैसे अखण्ड ज्योति की असाधारण प्रतिष्ठा हुई। तमिल तेलगू, कन्नड़ की प्रधानता वाले दक्षिण भारत में भी अखण्ड ज्योति का काफी प्रचार है, फिर मराठी, गुजराती, बंगला, उर्दू, गुरुमुखी भाषा भाषी प्रान्तों का तो कहना ही क्या। वहाँ तो और भी अधिक प्रचार है। हिन्दी न जानने वाले पाठक अखण्ड ज्योति मँगाते हैं और किसी हिन्दी पढ़े दुभाषिये से पढ़वाकर उसका भावार्थ समझते हैं। जिन प्रान्तों में हिन्दी बोली जाती है, उनमें से तो एक भी स्थान ऐसा नहीं बचा जिसमें ज्योति का प्रवेश न हुआ हो। हिन्दुस्तान से बाहर भी अनेक देशों में अखण्ड ज्योति मँगाई जाती है इतना विस्तार, इतना प्रचार, इतना आदर, इतनी लोकप्रियता कागज के पन्नों के कारण नहीं है। इससे अधिक चमक दमक की बढ़िया कागज पर छापने वाली अधिक पृष्ठों की अनेक पत्रिकाएं मौजूद हैं, वे अपना क्षेत्र इतना विस्तार न कर सकी। खराब कागज पर थोड़े पृष्ठों में, बुरी छपाई में छपते हुए भी इतनी लोकप्रिय हो रही है, इसका कारण ईश्वरीय प्रेरणा के अतिरिक्त और कुछ हमारी समझ में नहीं आता। कागज के दाम आठ गुने हो जाने के कारण सैकड़ों पत्रों की कमर टूट गई, सैकड़ों घाटे के प्राणघातक भार से दबकर मरे जा रहे हैं। अखण्ड ज्योति को गत वर्ष केवल तेरह सौ रुपये का घाटा रहा। उसमें से भी बहुत कुछ पूर्ति श्री मुँशीरामजी गुप्त हिसार, श्री पं. जगन्नाथ राव नायडू नागपुर, पं. ऋषिरामजी गुप्त शाहपुर, पं. जगन्नाथ प्रसाद शर्मा बाय, प्रभात धर्मात्माओं की गुप्त सहायताओं के द्वारा पूरा हो गया। सन् 42 अखबारों के लिए काल स्वरूप था, मृत्यु से लड़कर अखण्ड ज्योति जीवित रही, उपरोक्त सज्जनों की बिना माँगी आर्थिक सहायताएं प्राप्त हुई, उसके अतिरिक्त सैकड़ों सहृदय मित्रों ने अनेक मार्गों से उसका पोषण किया, इसे एक ईश्वरीय प्रेरणा के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है।
सन् 42 में प्रतिदिन औसतन 39 पत्र ऐसे आते रहे, जिनमें केवल धर्म चर्चा का प्रसंग रहता था। पत्र व्यवहार द्वारा इस सत्संग समागम में करीब पाँच हजार महानुभावों ने भाग लिया और उनके लिए करीब चौदह हजार पत्र यहाँ से भेजे गये। भारतवर्ष के कोने कोने में से करीब 700 महानुभाव केवल ज्ञान चर्चा के उद्देश्य से यहाँ पधारे, उनका यथा निधि समाधान किया गया। ‘सत्य का प्रचार’ यही एक कार्य उपरोक्त सारे परिश्रम के गर्भ में छिपा हुआ था। इस दशा में पर्याप्त सफलता प्राप्त हुई। पाँच सौ से ऊपर महानुभावों ने सत्य प्रतिज्ञा ग्रहण की। कई सौ कार्यकर्ताओं ने सत्य का विस्तार करने के लिए नित्य कुछ समय लगाना आरम्भ कर दिया है। अखण्ड ज्योति के हजारों पाठकों के कार्यों की सूची तैयार की जाए तो मालूम पड़ेगा कि कितने विशाल पैमाने पर सत्य का, प्रेम का, न्याय का, धर्म का विस्तार किया जा रहा है। नवयुग की स्थापना में हमारा यह कार्य एक बहुत छोटा अंश है तो भी जिन स्वल्प साधनों पर हम अवलम्बित है, उसे देखते हुए यह सब भी आशा से बहुत अधिक है।
अखण्ड ज्योति को दो मोर्चों पर लड़ना पड़ रहा है। हैवानियत और शैतानियत दोनों ही उसकी शत्रु हैं। पाप और पाखंड दोनों से उसे घृणा है। अधर्मी और धर्मध्वजी दोनों ही उसे अप्रिय हैं। हम चाहते हैं कि धर्म की स्थापना हो, सब लोग धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करें, त्याग, प्रेम, उदारता, भ्रातृत्व सेवा सद्भावना के पवित्र सूत्रों में भाई से भाई बँध जाए और सच्ची मनुष्यता का उदय हो। साथ ही हम यह भी चाहते हैं कि धर्म की आड़ में छिप कर बैठे हुए भेड़ियों का पर्दाफाश कर दिया जाए। आज का धर्म दुराचार, व्यभिचार, स्वार्थ, हरामखोरी, बदमाशी, कुविचार आदि घातक बुराइयों का आवरण मात्र रह गया है। इसे हटाना भी आवश्यक हैं। हमारी आँखें देख रही हैं कि पाजी से पाजी मनुष्य धर्म की पवित्र चादर को ओढ़े बैठे हैं और राक्षसी कुकर्मों को करते तथा कराते रहते हैं बेचारा ‘ब्राह्मण तत्व’ किसी कन्दरा में पड़ा सिसक रहा है और उसके स्थान पर ब्रह्म राक्षस की पैर पूजा हो रही है।
आज का धर्म सेवी वर्ग, ब्राह्मण वर्ण बड़ा ही नष्ट−भ्रष्ट हो रहा है। जो अपने को सर्वश्रेष्ठ मानव मुकुटमणि कहते हैं उनकी राजसी ठाट−बाट की महन्ताई, गद्दी, खजाने, हाथी, घोड़े, शिष्य समूह तथा रमणियों से भरा पूरा तो पाते हैं, पर सच्चा ब्राह्मण दीपक से ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलता। परमार्थ के लिये अस्थि दान करने वाले दधीचि, दिन रात प्रचार से निरत नारद, शिष्यों को अमर बना देने वाले वशिष्ठ, धर्म शास्त्रकार मनु, साहित्यिक युग निर्माता व्यास, अज्ञान का अन्धकार दूर करने वाले शंकराचार्य अब कहाँ हैं? उनके स्थान पर कान फूंके गुरु “हरे शिष्य धन पीर न हरई” की कहावत चरितार्थ करते हुए चारों ओर विचरण कर रहे हैं। अखण्ड ज्योति अज्ञान ग्रस्त-नीचे स्तर पर खड़े हुए धर्म के महत्व से अनभिज्ञ-पशुता से ग्रस्त लोगों को धर्म की ऊँची सीढ़ी पर चढ़ाना चाहती है और धर्म का पाखंड करके अपनी स्वार्थसिद्धि के निमित्त संसार में अधिक अँधेरा फैलाने वाले धर्मध्वजी महानुभावों को एक सीढ़ी नीचे उतारना चाहती है। दोनों के प्रेम के सुविस्तृत चबूतरे पर बराबर-बराबर खड़ा करके भाई को भाई के गले मिलाना चाहती है। पापी ऊंचे उठे पाखंडी नीचे उतरें। दोनों सत्य की पवित्र वेदी पर खड़े होकर मनुष्यता का प्रकाश प्रकट करें।
हमारे उपरोक्त विचार पापी और पाखंडी दोनों ही नापसंद करते हैं। दोनों अपने-अपने स्थानों पर चिपके रहना चाहते हैं। इसलिये दोनों ही मोर्चों पर अखण्ड ज्योति को लड़ना पड़ता है। मनुष्यता के उपासक, सत्य के प्रेमी ज्ञान के भक्त न्यायनिष्ठ और निष्पक्ष उदार हृदय वाले व्यक्ति ही हमारी नीति के समर्थक रह जाते हैं। कितनी प्रसन्नता की बात है कि हमारे समर्थकों की संख्या दिन-दिन बढ़ती जा रही है। सच्ची मनुष्यता के उपासक, सच्ची धर्म नीति को अपनाने वाले व्यक्तियों की संख्या में दिन-दिन असाधारण वृद्धि होती हुई हमें दृष्टिगोचर हो रही है। इस महान आध्यात्मिक मिशन को भला हम जैसे कमजोर व्यक्ति कैसे इतना अधिक आगे बढ़ा पाते, निस्संदेह इसके पीछे प्रबल ईश्वरीय प्रेरणा ही काम कर रही है।
अखबारों के ग्राहक बनते हैं, साल दो साल बाद वे उन्हें छोड़ देते हैं। परन्तु जिन पाठकों ने एक अखण्ड ज्योति को अपनाया, वे फिर उससे प्रथक न हुए। सैकड़ा पीछे, 90 से अधिक ऐसे ही हमारे पाठक है। कई सज्जनों ने लिखा है। कि अखण्ड ज्योति का चन्दा भेजने का प्रबन्ध न होने से बड़ी चिन्ता थी, पर अचानक ऐसी व्यवस्था हो गई कि पैसा आ गया और चिन्ता दूर हो गई। हमारे पाठक केवल पाठक नहीं हैं, वरन् अखण्ड ज्योति परिवार के सच्चे कुटुम्बी की भाँति अपना स्नेह रखते है और अखण्ड ज्योति के सत्य प्रचार के महान धर्म कार्य में क्रियात्मक सहयोग देते रहते हैं। इतना बड़ा एक समान विचारों वाला सुसंगठित परिवार इतने स्वल्प काल में बन जाना ईश्वरीय इच्छा के अतिरिक्त और क्या समझा जा सकता है।
हमारे ज्ञानचक्षु अपने चारों और ईश्वरीय दिव्य प्रेरणा को उमड़ता हुआ देखते हैं। सत्य- नारायण का नवयुग निर्माण रूपी पुण्य प्रवाह स्वर्ग से उतर कर भूमंडल पर आ रहा है। गंगा के समान एक बार वह पुनः इस भारत भूमि को पवित्र करके सौभाग्यशालिनी बनावेगा। अनेक दिव्य आशाओं और विश्वासों के साथ अखण्ड ज्योति अपना तीसरा वर्ष समाप्त करते हुए चौथे वर्ष में प्रवेश करती है। संवत् 2000 की रोमाँचकारी खण्ड प्रलय हमारे सामने है। ज्योति को कितने बड़े संकटों का सामना करना है, यह हम जानते हैं तो भी अपनी सत्यनिष्ठा, पाठकों की सद्भावना और ईश्वरीय सत्यप्रेरणा से तरंगित होकर आगे कदम बढ़ाते हैं। ईश्वर सबका मंगल करें।
पिछले अंक में पाठक पढ़ चुके हैं। कि हमारा गुप्त चित्र-अंतर्मन ही निरन्तर चित्रगुप्त देवता का काम करता रहता है। जो कुछ भले या बुरे काम हम करते हैं उनका सूक्ष्म चित्र उतारकर अपने भीतर जमा करता रहता है। सिनेमा के पर्दे पर मनुष्य की बराबर लम्बी चौड़ी तस्वीर दिखाई देती है पर उसकी फिल्म केवल एक इंच ही चौड़ी होती है। इसी प्रकार पाप पुण्य का घटना क्रम तो विस्तृत होता है पर उसका सूक्ष्म चित्र एक पतली रेखा मात्र के भीतर खिंच जाता है और वह रेखा गुप्त मन के किसी परमाणु पर अदृश्य रूप से जमकर बैठ जाती है। शॉर्टहैंड लिखने वाले बड़ी बात की थोड़ी सी उलटी सीधी लकीरों से इशारों से जरा से कागज पर लिख देते हैं। कर्म रेखा को ऐसा ही दैवी शॉर्टहैंड समझा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति के पाठकों को इतनी जानकारी से बहुत पहले हो चुकी होगी कि मन के दो भाग हैं एक बहिर्मन दूसरा अंतर्मन, बाहरी मन तो तर्क वितर्क करता है, सोचता है, काट-छाँट करता है, निर्णय करता है और अपने इरादों को बदलता रहता है पर अंतर्मन भोले भाले किन्तु दृढ़ निश्चयी बालक के समान है वह काट छाँट नहीं करता वरन् श्रद्धा और विश्वास के आधार पर काम करता है। बाहरी मन तो यह सोच सकता है कि पाप कर्मों की रेखायें अपने ऊपर अंकित न होने दूँ और पुण्य कर्मों को बढ़ा चढ़ा कर अंकित करूं, जिससे पाप का फल न भोगना पड़े और फल का भरपूर आनन्द प्राप्त हो। परन्तु भीतरी मन ऐसा नहीं है वह सत्यनिष्ठ जज की तरह फैसला करता है, कोई लोभ, लालच, भय, स्वार्थ उसे प्रभावित नहीं करता। कहा जाता है कि मनुष्य के अन्दर एक ईश्वरीय शक्ति रहती हैं, दूसरी शैतानी। आप गुप्त मन को ईश्वरीय शक्ति और तर्क, मन, छल, कपट, स्वार्थ, लोभ में रत रहने वाले बाह्य मन को शैतानी शक्ति कह सकते हैं। बाहरी मन धोखेबाजी कर सकता है, परन्तु भीतर मन तो सत्य रूपी आत्मा का तेज है। वह न तो मायावी आचरण करता है न छल कपट। निष्पक्ष रहना उसका स्वभाव है। इसीलिए ईश्वर ने उसे इतना महत्वपूर्ण कार्य सौंपा है। दुनिया उसे चित्रगुप्त देवता कहती है। यदि वह भी पक्षपात करता तो भला इतनी ऊँची जज की पदवी कैसे पा सकता था। हमारा गुप्त मन खुफिया जासूस की तरह हर घड़ी साथ-साथ रहता है और जो जो भले बुरे काम किए जाते हैं उनका ऐमालनामा अपनी खुफिया डायरी से दर्ज करता रहता है।
बाहरी दुनिया में मुलजिम को सजा दिलाने का काम दो महकमों के अधीन है एक पुलिस, दूसरा अदालत। पुलिस तो मुलजिम को पकड़ ले जाती है और उसके कामों का सबूत एकत्रित करके अदालत के सामने पेश करती है। फिर अदालत का महकमा अपना काम करता है, जज महाशय अपराध और अपराधी की स्थिति के बारे में बहुत दृष्टियों से विचार करते हैं वैसा फैसला करते हैं। एक ही जुर्म में आये हुए अपराधियों को अलग अलग तरह की सजा देते हैं। तीन खूनी पकड़ कर आये, इनमें से एक को बिलकुल बरी कर दिया, दूसरे को पाँच साल की सजा मिली, तीसरे को फाँसी हत्या तीनों ने की थी, पर सजा देते वक्त मजिस्ट्रेट ने बहुत बातों पर विचार किया। जिसे बरी कर दिया गया था वह मकान बनाने वाला मजदूर था छत पर काम करते वक्त पत्थर का टुकड़ा उसके हाथ से अचानक छूट गया और वह नीचे सड़क पर चलते हुए मुसाफिर के सिर में लगा, सिर फट गया, मुसाफिर की मृत्यु हो गई। जज ने देखा हत्या तो अवश्य हुई, पर मजदूर निर्दोष है उसने जानबूझ कर बुरे इरादे से पत्थर नहीं फेंका था, इसलिए उसे बरी कर दिया गया। दूसरा मुलजिम एक किसान था खेत काटते हुए चोर को ऐसी लाठी मारी कि वह मर गया। मजिस्ट्रेट ने सोचा चोरी होते देखकर गुस्सा आना स्वाभाविक है पर किसान की इतनी गलती है कि मामूली अपराध पर इतना नहीं मारना चाहिए था इसलिए उसे पाँच साल की सजा मिली। तीसरा मुलजिम एक मशहूर डाकू था। एक धनी पुरुष के घर में रात को घुस गया और उसका कत्ल करके धन-माल चुरा लाया, इसका अपराध जघन्य था इसलिये फाँसी की सजा दी गई। तीनों ही अपराधियों ने खून किया था, जुर्म का बाहरी रूप एक सा था, पर मजिस्ट्रेट सूक्ष्मदर्शी होता है, वह बाहरी काम को देखकर ही सजा नहीं दे डालता वरन् भीतरी बारीकियों पर भली प्रकार विचार करके तब कुछ फैसला करता है।
भीतरी दुनिया में गुप्त-चित्र या चित्रगुप्त पुलिस और अदालत दोनों महकमों का काम स्वयं ही करता है। यदि पुलिस झूठा सबूत दे तो अदालत का फैसला भी अनुचित हो सकता है। परन्तु भीतरी दुनिया में ऐसी गड़बड़ी की संभावना नहीं। अन्तःकरण सब कुछ जानता है कि यह कर्म किस विचार से, किस इच्छा से किस परिस्थिति में, क्यों कर किया गया था। वहाँ बाहरी मन को बयान या सफाई देने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि गुप्त मन उस बात के सम्बन्ध में स्वयं ही पूरी पूरी जानकारी रखता है। हम जिस इच्छा से, जिस भावना से जो काम करते हैं उस इच्छा से या भावना से ही पाप पुण्य का नाप होता है। भौतिक वस्तुओं की तोल नाप बाहरी दुनिया में होती है। एक गरीब आदमी दो पैसा दान करता है और एक धनी आदमी दस हजार रुपया दान करता है। बाहरी दुनिया तो पुण्य की तौल रुपये पैसे की गिनती के अनुसार करेगी। दो पैसा दान करने वाले की ओर कोई आँख उठा कर भी न देखेगा पर दस हजार रुपया देने वाले की प्रशंसा चारों ओर फैल जावेगी। भीतरी दुनिया में यह तौल नाप नहीं चलती। अनाज के दाने अंगोछे में बाँधकर गाँव में बनिये की दुकान पर चले जाएं तो वह बदले में गुड़ दे देगा पर उसी अनाज को इंग्लैंड की राजधानी लन्दन में जा कर किसी दुकानदार को दिया जाए तो वह कहेगा-महाशय। इस शहर में अनाज के बदले सौदा नहीं मिलता यहाँ पौड शिलिंग पैंस का सिक्का चलता है। ठीक इसी तरह बाहरी दुनिया में रुपयों की गिनती से, काम के बाहरी फैलाव से, कथा वार्ता से, तीर्थ यात्रा आदि भौतिक चीजों से यश खरीदा जाता है, पर चित्रगुप्त देवता के देश में यह सिक्का नहीं चलता, वहाँ तो इच्छा और भावना की नाप तौल है। उसी के मुताबिक पाप पुण्य का जमा खर्च किया जाता है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उकसा कर लाखों आदमियों को महाभारत के युद्ध में मरवा डाला। लाशों से भूमि पट गई खून की नदियाँ बह गई फिर भी अर्जुन को कुछ पाप न लगा, क्योंकि हाड़ माँस के बने हुये कितने खिलौने टूट फूट गये इसका लेख चित्रगुप्त के दरबार में नहीं रखा गया। भला कोई राजा यह हिसाब रखता है कि मेरे भण्डार में से कितने चावल फैल गये। पाँच तत्वों से बनी हुई नाशवान चीजों की कोई पूछ आत्मा के दरबार में नहीं है। अर्जुन का उद्देश्य पवित्र था, वह पाप को नष्ट करके धर्म की स्थापना करना चाहता था। बस वही इच्छा खुफिया रजिस्टर में दर्ज हो गई। आदमियों के मरने जीने की संख्या का कोई हिसाब नहीं लिखा गया। दुनिया में करोड़पति की बड़ी प्रतिष्ठा है, पर यदि उसका दिल खोटा है तो चित्रगुप्त के दरबार में भिखमंगा शुमार किया जायगा। दुनिया का भिखमंगा यदि दिल का धनी है तो उसे हजार बादशाहों का बादशाह गिना जायगा। इस प्रकार मनुष्य जो भी काम कर रहा है वह किस नीयत से कर रहा है वह नीयत, भलाई या बुराई जिस दर्जे में जाती होगी उसी में दर्ज कर ली जाएगी। सद्भाव से फाँसी लगाने वाला एक जल्लाद भी पुण्यात्मा गिना जा सकता है और एक धर्मध्वजी तिलकधारी पंडित भी गुप्त रूप से दुराचार करने पर पापी माना जा सकता है। बाहरी आडम्बर का कुछ मूल्य नहीं है, कीमत भीतरी चीज की है। सीप की कुछ कीमत नहीं, मोल तोल तो मोती का है। बाहर से कोई काम भला या बुरा दिखाई दे, तो उससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। असली तत्व, तो उस इच्छा और भावना में है, जिससे प्रेरित होकर वह काम किया गया है। पाप पुण्य की जड़ कार्य और प्रदर्शन में नहीं वरन् निश्चित रूप से इच्छा और भावना में ही है।
उपरोक्त पंक्तियों में बताया गया है कि हमारे प्राणों के साथ घुल−मिल कर रहने वाला चित्रगुप्त देवता बिना किसी पक्षपात के, बुरे भले कर्मों का लेख अन्तः चेतना के परमाणुओं पर लिखा करता है, उस अदृश्य लिपि को बोलबाल की भाषा में कर्म रेखा कहते हैं। साथ ही यह भी बताया जा चुका है कि पाप पुण्य का निर्णय काम के बाहरी रूप से नहीं, वरन् कर्ता की इच्छा और भावना के अनुरूप होता है। यह इच्छा जितनी तीव्र होगी, उतना ही पाप पुण्य भी अधिक एवं बलवान होगा। जैसे एक व्यक्ति उदास मन से किसी रोगी की सेवा करता है और दूसरा व्यक्ति दूसरे रोगी की सेवा अत्यन्त दया, सहानुभूति, उदारता एवं प्रेमपूर्वक करता है, तो बाहर से देखने में दोनों के काम एक समान भले ही हों, पर उस पुण्य का परिणाम भावना की उदासीनता एवं प्रेम तत्परता के अनुसार न्यूनाधिक होगा। इसी प्रकार एक भूखा व्यक्ति लाचार होकर चोरी करता है, दूसरा व्यक्ति मद्यपान के लिये चोरी करता है तो दोनों के पाप में निस्संदेह न्यूनाधिकता होगी। चोरी दोनों ने की है पर दुष्टता में न्यूनाधिकता के कारण पाप भी उसी अनुपात से होगा।
इस सम्बन्ध में एक और भी महत्वपूर्ण बात जान लेने की है कि हर व्यक्ति के लिये अलग-अलग कानून व्यवस्था है। रिश्वत के मामले में एक चपरासी, एक क्लर्क, एक मजिस्ट्रेट तीन आदमी पकड़े जाएं, तो तीनों को अलग- अलग तरह की सजा मिलेगी। संभव है चपरासी को डाट-डपट सुनाकर ही छुटकारा मिल जाए, पर मजिस्ट्रेट बर्खास्त हुए बिना नहीं रह सकता, क्योंकि उसकी बड़ी जिम्मेदारी है। एक असभ्य भील शिकार मार कर पेट पालता है, अपराध उसका भी है, परन्तु अहिंसा का उपदेश करने वाला पंडित यदि चुपचाप बूचर की दुकान में जाता हैं, तो पंडित को उस भील की अपेक्षा अनेक गुना पाप लगेगा। कारण यह है कि ज्ञान वृद्धि करता हुआ जीव जैसे-जैसे आगे बढ़ता चलता है वैसे ही वैसे उसकी अन्तः चेतना अधिक स्वच्छ होती जाती है। मैले कपड़े पर थोड़ी सी धूल पड़ जाए तो उसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु दूध के समान स्वच्छ धुले हुए कपड़े पर जरा सा धब्बा लग जाए, तो वह दूर से ही चमकता है और बहुत बुरा मालूम पड़ता है। छोटा बच्चा कपड़ों पर टट्टी कर देता है, पर उसे कोई बुरा नहीं कहता और न बच्चे को कुछ शर्म आती है, किन्तु कोई जवान आदमी ऐसा कर डाले तो उसे बुरा कहा जाएगा। और वह खुद भी लज्जित होगा। बच्चे ने और बड़े ने आचरण एक सा ही किया, पर उनके मानसिक विकास में अन्तर होने के कारण बुराई की गिनती कम ज्यादा की गई। इसी प्रकार अशिक्षित, अज्ञानी, असभ्य व्यक्तियों को कम पाप लगता है। ज्ञान वृद्धि के साथ-साथ भला बुरा समझने की योग्यता बढ़ती जाती है। सत् असत् का, कर्तव्य अकर्तव्य का, विवेक प्रबल होता जाता है, अन्तः करण की पुकार जोरदार बनती जाती है। इस प्रकार आत्मोन्नति के साथ साथ सदाचरण की जिम्मेदारी भी बढ़ती जाती है। हुक्मअदूली करने पर मामूली चपरासी को दो रुपया जुर्माना हो जाता है परन्तु फौजी अफसर हुक्मअदूली करे तो कोई मार्शल द्वारा गोली से शूट करा दिया जाएगा। ज्ञानवान, विचारवान और भावनाशील हृदय वाले व्यक्ति जब दुष्कर्म करते हैं तो उनका चित्रगुप्त उस करतूत को बहुत भारी पाप की श्रेणी में दर्ज कर देता है। गौदान से लोग वैतरणी पार कर जाते हैं, पर राजा नृग जैसा विवेकवान थोड़ी गलती करने पर ही नरक में पहुँचा। अज्ञानी व्यक्ति अपराध करे तो वह उतना महत्व नहीं रखता। किन्तु कर्तव्ययुक्त ब्राह्मण तो घोर दंड का भागी बनता है। राजा बनना सब दृष्टियों में अच्छा है, पर राजा की जिम्मेदारी भी सबसे ऊँची है। ज्ञानवानों का यह कठोर उत्तरदायित्व है कि सदाचार पर दृढ़ रहें, अन्यथा सात मंजिल ऊँची छत पर से गिरने वालों को जो कष्ट होता है उन्हें भी वही दुख होगा।
कर्मों का फल किस प्रकार मिलता है। इन्हीं पंक्तियों में पाठकों को अगले अंकों में यह रहस्य भी समझाया जाएगा।
हरि-चर्चा लेखमाला-2
पिछले अंक में यह बताया जा चुका है कि ईश्वर की जिस मूर्ति का भक्त लोग ध्यान करते हैं, वह अवश्य ही ध्यान करने वाले की योग्यताओं से अधिक सुसम्पन्न होती है। इष्टदेव चाहे अलग अलग क्यों न हों, पर वे सभी ईश्वर मनुष्य की अपेक्षा शारीरिक, मानसिक तथा साँसारिक दृष्टि से बहुत बलवान होते हैं। भगवान कृष्ण का कोई असली फोटो इस समय प्राप्त नहीं होता, इसलिये ध्यान करने के लिए जिन चित्रों की मानसिक स्थापना की जाती है, वह कल्पित ही मानने पड़ेंगे। एक ही देवता के अनेक भक्त अनेक मन में देवता का ध्यान करते हैं, पर सब की ध्यान मूर्ति में कुछ न कुछ अन्तर होता है। इससे भी प्रकट होता है कि यह ध्यान चित्र कल्पित हैं, यदि वह असली होते, तो सब भक्त एक ही समान मूर्ति का ध्यान करते।
अनीश्वरवादी महानुभाव यह न समझें कि इन कल्पित चित्रों का ध्यान करने से कुछ फायदा नहीं है। ईश्वर के नाम से ही जो बिदकते हैं, उन्हें इन ध्यान मूर्तियों को ‘ध्येय प्रतिमा’ नाम दे लेना चाहिये। मनुष्य उन्नति करना चाहता है। हर किसी की इच्छा होती है कि मैं सुन्दर, स्वरूपवान, स्वस्थ, बलवान, विद्वान, बुद्धिमान, तेजस्वी, प्रतापी ऐश्वर्यवान, असाधारण शक्तियाँ रखने वाला बनूँ। अब सोचना चाहिए कि सर्वतोमुखी उन्नति के मार्ग पर बढ़ने का कार्य किस प्रकार आरम्भ किया जा सकता है। कोई भी कार्यकर्ता तभी कार्य आरम्भ कर सकता है, जब अपने ध्येय की एक तस्वीर मन में खड़ी कर ले। सुनार एक साँचा तैयार करता है चाँदी पिघलाकर उसमें ढाल देता है, तब वैसा ही गहना बन जाता है। बिना साँचा बनाये रुपया ढालने की टकसाल का काम कैसे चलेगा। इसलिए मनुष्य जैसा बनना चाहता है, अपने को वैसा ढालने के लिए एक साँचा तैयार करना पड़ेगा। यह ‘ध्येय प्रतिमा’ या ईश्वरीय ध्यान मूर्ति वह साँचा ही तो है।
शब्द के पीछे एक चित्र जुड़ा होता है। जैसे वर्णमाला का अक्षर ‘ह’ उस पर आ की मात्रा ‘हा’ थ अक्षर पर ई की मात्रा ‘थी’ हाथी। यह दो अक्षर अपने आप कुछ अर्थ नहीं रखते। किसी हिन्दी न जानने वाले रूसी के सामने हाथी शब्द कहा जाए तो वह कुछ न समझेगा। पर हमारी मनोभूमि को यह पता है कि हाथी शब्द के पीछे एक विशालकाय जन्तु विशेष का चित्र जुड़ा हुआ है। इसलिए ‘हाथी’ शब्द को कहते ही वह विशालकाय जन्तु स्मरण हो जाता है। यदि यह चित्र सामने न आवे तो वह शब्द निरर्थक है। मनुष्य चाहता है कि मैं सुन्दर, सुडौल, ज्ञानवान, बुद्धिमान आदि बनूँ, इन इच्छित चित्रों के साथ ही एक-एक चित्र जुड़ा हुआ है। ‘सुन्दर’ शब्द कहते ही गोरा रंग, भरा हुआ गुलाबी चेहरा, रतनारे नयन, पतली नाक, मोती से दाँत स्मरण हो आते हैं। अर्थात् सुन्दर शब्द के साथ जो चित्र जुड़ा हुआ है, वह दिव्य नेत्रों के सामने नाचने लगता है। आन अपने में जो उन्नति देखना चाहते हैं, जिन जिन विशेषताओं की इच्छा करते हैं, उन सबका एक सम्मिलित चित्र अवश्य बन जाएगा। यदि इच्छा निर्बल हुई तो वह चित्र भी धुँधला, निर्बल, अस्थिर और उदासीन होगा। उन्नति की इच्छा जितनी ही प्रबल होगी, उतना ही चित्र अधिक स्पष्ट, सतेज, प्रकाशवान, स्थिर एवं उत्सुकतापूर्ण होगा। एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के बिछोह में है। वह प्रेमिका को अपने पास देखना चाहता है, उसकी यह इच्छा जितनी ही प्रबल होगी, उतना ही उसे प्रेमिका का ध्यान अधिक आवेगा। प्रेयसी की सलौनी मूर्ति आँखों के आगे ही खड़ी रहेगी। सच्ची लगन से ही किसी वस्तु की प्राप्ति होती है। मनुष्य यदि उन्नत दशा को प्राप्त होना चाहता है, तो यह कार्य यों ही लस्टम-पस्टम उदासीनता के साथ पूरा न होगा। वरन् दृढ़ विश्वास, सच्ची लगन प्रेममय उत्सुकता के साथ एक ध्येय प्रतिमा बनानी होगी। आकाँक्षा उस ध्येय को प्राप्त करने की लगन में लगी रहे और तन-मन से उसकी प्राप्ति का कर्तव्य करता रहे। कोलम्बस की आकाँक्षा भारत भूमि को तलाश करने के लिए व्याकुल हो रही थी और सर्वस्व की बाजी लगाकर उसका तन-मन जहाज का संचालन कर रहा था तब कहीं वह एक स्वर्ण भूमि को ढूँढ़ पाया। यदि यों ही बिना किसी तीव्र आकाँक्षा के बिना किसी ध्येय प्रतिमा के, समुद्र में जहाज चला देता, तो सफलता प्राप्त नहीं कर सकता था।
हमारे पूर्वजों ने अत्यन्त गहरे मानसिक तत्व ज्ञान के आधार पर ईश्वर की सुन्दर मूर्ति का ध्यान करने का पूजा विधान बनाया है। अपनी नाना प्रकार की उन्नति का बोध कराने वाली एक मनमोहक प्रतिमा का ध्यान करना आवश्यक है। इस प्रतिमा के साथ ईश्वर का पवित्र नाम जोड़ देने से यह विशेषता हो जाती है कि वह प्रतिमा केवल भौतिक-साँसारिक उन्नति तक ही सीमित नहीं रहती वरन् आध्यात्मिकता के साथ, सतोगुणी दिव्य वृत्तियों के साथ, भी सम्बन्धित हो जाती है। वह साँचा भौतिक और आध्यात्मिक दोनों उन्नतियों से युक्त हमारे भविष्य की रचना करता है। मनुष्य की मूलभूत प्रकृति उन्नति की ओर अग्रसर होने की है। कोई भी व्यक्ति उन्नति की इच्छा किये बिना रह नहीं सकता। इसलिए उन्नत भविष्य की एक रूपरेखा बनाना भी नितान्त अनिवार्य है। विष्णुलोक, गौलोक, स्वर्ग, बहिश्त, हेविन, आदि स्थान सम्बन्धी कल्पना है। तथा मुक्ति, स्वर्ग प्राप्ति आदि अवस्था सम्बन्धी कल्पनाएं उसी ध्येय अवस्था की बोधक हैं, जिसकी प्रायः हर व्यक्ति इच्छा किया करता है।
ईश्वर को निराकार मानने वाले जो सज्जन परमात्मा को एक विशेष मूर्ति में ही होना स्वीकार नहीं करते, उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे अपने मत को बदले बिना भी ध्येय प्रतिमा का ध्यान करने के लाभों के सम्बन्ध में विचार करें और उसके अन्दर जो बड़ा भारी लाभ छिपा हुआ है, उसे ग्रहण करें। अनीश्वरवादी महानुभाव कहा करते हैं कि हम पेशेवर धर्मध्वजी दुकानदारों के रिश्वती और खुशामदी खुदा को नहीं मानते। अच्छा बाबा, उसे मत मानो, पर अपना उत्तम भविष्य ढालने वाले साँचे को तो मानो। अच्छा ठहरो। कृष्ण को छोड़ो हम तुम्हें ही कृष्ण बनाए देते हैं। शरीर ढीला करके, आँखें बन्द करके पालती मार के एकान्त स्थान में बैठ जाओ। अपनी सूरत तो दर्पण में देखी ही होगी, उसका ज्ञान नेत्रों से ध्यान करो उसे उत्तम से उत्तम साँसारिक और आध्यात्मिक गुणों से सजा डालो। वर्तमान शरीर की सभी कमियों को हटा कर अपने लिए जैसा उत्तम से उत्तम शरीर चाहते हो, जैसे गुण चाहते हो, जैसी शक्तियाँ चाहते हो, उन सबसे अपनी तस्वीर की सजावट कर डालो। बस यही ईश्वर की तस्वीर हो गई, इसी का ध्यान किया करो। इस मूर्ति से तुम्हारा जितना प्रेम होगा उतना ही तुम भृंग कीट की तरह उस आदर्श प्रतिमा में तल्लीन होते जाओगे और वह आध्यात्मिक तल्लीनता इतनी महत्वपूर्ण सिद्ध होगी कि बहुत अंश में तो वे इच्छाएं इसी जन्म में अवश्य पूरी हो जायेंगी। मजाक की बात नहीं है, यह आध्यात्मिक ध्रुव सत्य है, हिरन के बच्चे में अधिक प्रेम होने पर जड़ भरत के दूसरे जन्म में हिरन होने की कथा महाभारत में मौजूद है। तुम्हारी आकाँक्षा जिस स्थिति को प्राप्त करने में पूरी तत्परता से जुड़ी हुई है, कोई कारण नहीं कि एक दो जन्मों में ही वह पूर्णता प्राप्त न हो जाए। ध्यान प्रतिमा की भक्ति का अतुलित प्रताप है। इस महान् सत्य को विज्ञान की कसौटी पर जितना-जितना अधिक कसा जाता है, उतना ही वह अधिक खरा साबित होता जाता है।
केवल ध्यान करने में कुछ नहीं होता, यह समझना भूल है। ध्यान आरम्भिक सीढ़ी है। आदर्श का निर्माण होते ही शरीर और मन सारी शक्तियों से उसे प्राप्त करने लग जाता है और दृश्य एवं अदृश्य लोकों से सफलता के लिए ऐसे ऐसे विचित्र साधन सूक्ष्म तत्वों की सहायता से जुटाने लगता है, कभी कभी तो वे सहायताएं चमत्कार जैसी जान पड़ती है। कई बार भगत लोग बड़े आलसी, दरिद्री, अकर्मण्य, दुर्गुणी तथा अवनति की ओर गिरते देखे जाते हैं। यह भगत लोग असल में भक्ति की झूठी विडम्बना करते हैं, उनका भगतपना पेट पालने का या सस्ती वाहवाही लूटने का एक जरिया है। सच्चा ध्यान योगी ईश्वर की पवित्र मूर्ति में अपने को तल्लीन कर देता है, अथवा यों कहिए कि आत्मोन्नति की जो सबसे ऊँची, सर्वगुण सम्पन्न ध्येय प्रतिमा बनाई है, उसके साथ तदाकार होने के लिये प्रेमपूर्वक विह्वल हो जाता है। भक्ति का सच्चा तत्व यही है। भक्ति का महाविज्ञान इतना सत्य है कि उसके प्रत्यक्ष परिणाम को चाहे जो अनुभव कर सकता है। आप कैसे बढ़ना चाहते हैं? उसका एक मजबूत नक्शा बनाकर उसमें सफल होने के लिए प्राण प्रण से तल्लीन हो जाइए। फिर कुछ ही दिनों में भक्ति का जादू देखिए, आपकी काया पलट हो जाएगी। काफिला कहीं का कहीं पहुँच जायगा। आपकी जीवन दशा में आश्चर्यजनक आत्मोन्नतिकारी प्रचण्ड विद्युत प्रवाह नस-नस में दौड़ने लगेगा। लालटेन के ऊपर जिस रंग का काँच लगा दिया जाए उसी रंग की रोशनी होने लगती है। जैसा जीवन ध्येय निश्चित हो जाता है उसी के अनुरूप शरीर के कार्य और मन के कार्य दिखाई देने लगते हैं।
पेशेवर भगत लोग ‘भक्ति’ का कैसा विकृत और नाशकारी रूप बनाये बैठे हैं, इस सम्बन्ध में पाठक स्वयं ही सब कुछ जानते हैं, उस गढ़ी हुई दुर्गन्धि को उखाड़ कर बदबू बढ़ाने की इस समय हमारी इच्छा नहीं। इन पंक्तियों में तो हमने भक्ति सच्चे तत्वज्ञान, ध्यान योग के गुप्त रहस्य पर प्रकाश डालते हुए यह बताने का प्रयत्न किया है कि अपने लिए निर्धारित किये हुए उच्च आदर्श एवं उन्नत भविष्य की ध्येय प्रतिमा बनना, मानसिक चित्र निर्माण करना, आवश्यक है। ईश्वर को मानने वाले या न मानने वाले सभी व्यक्तियों के लिए यह आवश्यक है कि ध्येय प्रतिमा का ध्यान किया करें। मनोविज्ञान शास्त्र की दृष्टि से यह व्यापार कल्पवृक्ष के समान मनोवांछाएं पूरी करने वाला सिद्ध होगा।
अग्नि की तीव्रता आग से शान्त नहीं हो सकती है। इसको ठण्डे जल की जरूरत है। इसी तरह क्रोधी का क्रोध भी शीतल शब्दों के प्रयोग से ही दूर हो सकता है। न कि भड़कीले शब्दों से।
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आपत्तियाँ आना नदी में बाढ़ आने के समान है। गम्भीर मनुष्य चट्टान की तरह दृढ़ हुआ करते हैं। जैसे चट्टान पानी टकरा-टकरा कर थोड़ी देर बाद ठहर जाता है। उसी तरह विपत्तियाँ भी गम्भीर मनुष्यों का सामना करके उन्हें कुछ भी हानि नहीं पहुँचा सकती।
अदृश्य विवेचन लेखमाला-2
तलाश करने पर ऐसी अनेक अद्भुत एवं आश्चर्यजनक घटनाएं हर प्रदेश में प्राप्त हो सकती है, जिनसे अलौकिकताओं का अस्तित्व सिद्ध होता है। भूत प्रेतों की करतूतों के परिचय अक्सर प्राप्त होते रहते हैं। देवी देवताओं का विग्रह अनुग्रह अक्सर दृष्टिगोचर हुआ करता है। इस देश में घटित होने वाली अलौकिक घटनाओं को अन्धविश्वास या पाखण्ड कहकर अक्सर हँसी में उड़ा दिया जाता है, परन्तु सत्य पर सदा के लिये पर्दा नहीं डाला जा सकता है। योरोप, अमेरिका जैसे विज्ञान उपासक देशों में निरन्तर ऐसे अवसर आते रहते हैं, जिनमें किसी अदृश्य प्राणी का हाथ होना सिद्ध होता है। इस विषय में बड़े बड़े जाँच कमीशन बिठाये गए हैं और उनकी रिपोर्टों में स्पष्ट रूप में स्वीकार किया गया हैं कि कई ऐसे अदृश्य प्राणी इस संसार में अवश्य मौजूद हैं जो मनुष्य इस कई गुनी अधिक शक्तियाँ रखते हैं और वे स्वेच्छानुसार मनुष्यों, को सहायता या बाधा पहुँचा सकते हैं।
कुछ दिन पहले की बात है, स्टेनफोर्ड नगर में एक सी॰ वेइली नामक लुहार रहता था, उसे कोई अदृश्य देवता सिद्ध था, जिसकी सहायता से अनेक अद्भुत वस्तुएं वह पल भर में मँगा देता था। मि. फोर्ड ने उस लुहार को आर्थिक आश्रय दिया और उसकी सचाई की परीक्षा के लिए एक बड़ी भारी सभा में उसे उपस्थित किया। दर्शकों ने लुहार से बड़ी विचित्र चीजें माँगी। लुहार ने क्षण भर में उन चीजों को मँगा दिया। इन चमत्कारों की चर्चा उस देश के ऊँचे लोगों तक पहुँची और वहाँ की सबसे बड़ी वैज्ञानिकों की सभा ने फोर्ड और वेइली को चुनौती भेजी कि यदि उनकी बातें सच है तो एक विशाल प्रदर्शनी में अपनी सचाई सिद्ध करें। फोर्ड ने वह चुनौती स्वीकार कर ली और मेल्बोर्न नगर की उस सबसे बड़ी प्रदर्शनी के सामने, जिसमें देश भर के प्रख्यात तार्किक, वैज्ञानिक, अन्वेषक और शोधक उपस्थित थे, देवता के करतब दिखाये और दर्शकों की माँगी हुई ऐसी-ऐसी वस्तुएं हाजिर कर दीं जिनके बारे में किसी को ख्याल तक नहीं था। दर्शकों में से एक ने टर्की देश का वह अखबार माँगा जो ठीक उसी समय वहाँ छप रहा हो। उसी क्षण वह अखबार हाजिर कर दिया। छपाई की स्याही भी सूखने न पाई थी कि हजारों मील उड़कर पल भर में वह अखबार आ गया। इन चमत्कारों को देखकर शीया पेरेली, काउण्ट बाउडी डिवेस्मे, प्रोफेसर फरल कमेर, जिग्नोर, वर्जीनिया पेगे प्रो॰ सोमी, डिगिस्टी नियानी सरीखे गणमान्य पुरुषों को यह बात मुक्त कण्ठ से स्वीकार करनी पड़ी कि इसमें रत्ती भर छल कपट नहीं है और यह किसी अदृश्य शक्ति का ही काम है।
एक फोर्ड या वेहली ही नहीं अनेक महानुभाव इन अदृश्य प्राणियों के अद्भुत कार्यों का प्रत्यक्ष अनुभव कर चुके हैं। आत्मा के न मानने वाले जड़ विज्ञान के अन्वेषकों में से भी जिन लोगों ने इस तत्व का अन्वेषण किया है उनमें से अधिकाँश को अपना अविश्वास छोड़ना पड़ा है। डार्विन का साथी कार्यकर्ता और साइन्स का अग्रिणी विद्वान, आलफ्रेड रसेल वालेस, इंग्लैंड की रायल सोसाइटी के सदस्य और फ्राँस की एकेडमी आफ साइन्स से स्वर्ण पदक प्राप्त एवं रेडियो मीटर आथियोस्कोप सरीखे यन्त्रों के आविष्कारक प्रोफेसर विलियम क्रुक्स, हाबर्ट कालेज के प्रोफेसर सर जेम्स, कोलम्बिया कालेज के प्रोफेसर हिर लोप, खगोल विद्या के आचार्य केमिल फ्लेमेरियोगा, आयरलैण्ड के वैज्ञानिक प्रो. वेरेट आदि अनेक महानुभावों को उनके अपने अनुभवों ने इस बात को मानने के लिए मजबूर कर दिया है कि दृश्य मनुष्यों की भाँति कोई अदृश्य प्राणी भी इस दुनिया में मौजूद है ओर वे यदा कदा साँसारिक कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं। अखण्ड ज्योति के पाठक पिछले अंकों में ऐसे अनेक विवरण पढ़ चुके है जिनमें प्रेतात्माओं के कार्यों का वर्णन है।
प्रेतों सम्बन्धी अनुभव इतने अधिक परिमाण में प्राप्त होते हैं कि विज्ञान के सम्मुख अब यह सवाल नहीं रहा है कि प्रेत होते हैं या नहीं। उनके अस्तित्व को प्रमुख विज्ञान परिषदों ने बिना किसी हिचकिचाहट के स्वीकार कर लिया है। आजकल जो मृतात्माओं के सम्बन्ध में शोधें हो रही हैं, वह प्रेतों की उत्पत्ति, क्रियाशीलता, रुचि, शक्ति एवं इच्छाओं से सम्बन्ध रखने वाली है। प्रेतों की कितनी किस्में कही जाती है जैसे भूत, प्रेत, जिन्न, मसान, बैताल, पीर, भैरव आदि। यह दो प्रकार के माने जाते है। छोटी योग्यता और नीच इच्छा वाले अदृश्य प्राणी भूत प्रेत कहलाते हैं और ऊँची शक्ति एवं उत्तम इच्छा वाले प्राणी देवी देवता कहे जाते हैं। भूत प्रेत अक्सर पूर्व जन्म की इच्छाओं से प्रेरित होकर अपना विग्रह अनुग्रह प्रकट करते हैं। किन्तु देवी देवताओं को तप साधना द्वारा वश में किया जाता है। योग दर्शन में जिन ऋद्धि-सिद्धियों का वर्णन किया है वे देवियाँ हर किसी पर अनुग्रह नहीं करती। वरन् तपस्वियों पर ही प्रसन्न होती हैं। योग साधना करने वाले तपस्वी तथा कठोर वाममार्गी, हठ अनुष्ठान करने वाले तान्त्रिक ही ऋद्धि सिद्धियों को धारण किये हुए देखे जाते हैं। इससे यह प्रतीत होता है कि भूत प्रेत चाहे भले ही किसी पर स्वेच्छा से विग्रह अनुग्रह करें पर ऊँची शक्ति वाले देवी देवता घोर आध्यात्मिक साधन करने वाले साधकों के ऊपर ही कृपा करते हैं सिद्ध लोगों के जीवन क्रम का रहन सहन का, आचार व्यवहार का परीक्षण किया जाए तो वे एक विचित्र ढंग के साँचे में अपने को ढले हुए मिलेंगे, साधारण व्यक्तियों से उनकी स्थिति बहुत ही भिन्न होगी। यह भिन्नता प्रकट करती है उनका जीवन साधनामय बना हुआ है। तपस्या के कारण देवताओं की कृपा उन्हें प्राप्त हुई है या देवता की कृपा प्राप्त करने के लिए वे तपस्या कर रहे हैं, बात चाहे जो भी हो परन्तु यह निर्विवाद है कि देवताओं की तपस्या से ही, इन सिद्धियों का अत्यन्त घना सम्बन्ध है इतिहास में भी ऐसे ही आख्यात मिलते हैं जिनमें तपस्या से प्रसन्न होकर किसी देवता का प्रकट होना और मनोवाँछा पूरी करना सविस्तार वर्णित है।
भूतों की बात हम छोड़ देते हैं क्योंकि उनके कार्यों का मूल हेतु प्राप्त हो गया है वे पूर्व जन्म की इच्छाओं से प्रेरित होकर कार्य करते हैं। परन्तु देवी देवताओं का यह स्वभाव बड़ा रहस्यमय है कि कोई दूसरा व्यक्ति घोर कष्ट सहन करे, कठोर आध्यात्मिक परिश्रम करे तो उन्हें बहुत प्रसन्नता होती है और अनायास ही उस साधक के वशवर्ती हो जाते है। विक्रमादित्य को ‘वीर’ सिद्ध थे। वे वीर उसकी आज्ञा में हर वक्त खड़े रहते थे। ऊपर बेइली लुहार के वश में अदृश्य प्राणी के होने का वर्णन है यह प्राणी मोटी दृष्टि में भूत प्रेत समझा जा सकता है, पर बारीक दृष्टि से देखने पर वह देवता कोटि में आता है, क्योंकि भूत प्रेत किसी के आज्ञानुवर्ती नहीं बनते, वे मन मौजी काम करते हैं किन्तु सिद्ध हुआ देवता सेवक की तरह हुक्म बजाता है। सिद्ध योगी एवं ताँत्रिकों के पास मनमौजी भूत नहीं, वरन् आज्ञाकारी देवता होते हैं। भूतों के तो विग्रह अनुग्रह दोनों ही अन्ततः हानिकारक सिद्ध होते हैं, किन्तु देवता का वश हो जाना एक बड़ी सफलता है। पाठकों को भूत और देवताओं में अन्तर भली प्रकार समझ लेना चाहिए। भूत अपनी ओर से आते हैं किन्तु देवता बड़े प्रयत्न से बुलाये जाते है। कभी कभी कोई भूत विशेष अनुग्रह करे तो देवता स्वभाव का थोड़ा बहुत परिचय दे सकते हैं पर उसकी यह कृपा अस्थिर एवं अनिश्चित ही होती है।
‘देव सिद्धि’ वास्तव में एक बड़ा भारी पौरुष है। अनेकों मनुष्यों को कुछ अंशों में कोई देवी देवता सिद्ध होते हैं, पर उसके सम्बन्ध में कुछ अधिक जानकारी नहीं रखते। अपने में कुछ विशेष शक्ति उन्हें प्रतीत होती है, कभी-कभी ऐसे भी अनुभव आते हैं कि किसी आवश्यक मौके पर अचानक ईश्वरीय सहायता प्राप्त होती है। असल में यह शक्ति एवं सहायता देवता की ही प्रेरित होती है। ईश्वर तो एक साक्षी तत्व है वह प्राणियों के दैनिक काम काज में हस्तक्षेप नहीं करता। अदृश्य सहायताएं एवं प्रेरणायें तो उन देवताओं से ही प्राप्त होती हैं। हर कोई जानता है कि जो जितना परिश्रमी, उद्योगी तथा तपस्वी होता है उसे उतनी ही ईश्वरीय सहायता मिलनी है कारण यह है कि उस व्यक्ति की तपस्या जितने परिमाण में होती है उसी अनुपात की देव कृपा प्राप्त हो जाती है।
दैनिक जीवन में अत्यन्त महत्वपूर्ण सहायता करने वाले यह देवता कौन हैं? कहाँ रहते हैं? क्या करते हैं? तपस्या से क्यों प्रसन्न होते हैं? वश में आने पर क्यों सेवक की तरह हुक्म बजाते हैं? पाठक इन सब गुप्त मर्मों को जानने के इच्छुक होंगे। हम वैज्ञानिक ढंग से, साइन्स की खोज के आधार पर और मनोविज्ञान शाखा के प्रामाणिक सिद्धान्तों के अनुसार उपरोक्त सब प्रश्नों का विस्तारपूर्वक उत्तर इन्हीं पंक्तियों में जनवरी के विशेषाँक के बाद फरवरी मास में देंगे।
(ऋषि तिरुवल्लुवर)
वे मनुष्य बड़े अभागे हैं जो विद्या पढ़ने से जी चुराते हैं। भिखारी को दाता के सामने जैसे तुच्छ बनना पड़ता है वैसे ही तुच्छ यदि तुम्हें शिक्षकों के सामने बनना पड़े तो भी शिक्षा प्राप्त करना ही कर्तव्य है। मनुष्य जाति के सच्चे नेत्रों के नाम हैं (1) अंक (2) अक्षर। जो पढ़ा लिखा है वही नेत्रवान् है, जिसने विद्या नहीं पढ़ी वह तो अन्धा है। उसके माथे में तो दो गड्ढ़े मात्र है नेत्र नहीं।
विद्वान पुरुष सुगन्धित पुष्पों के समान हैं, वे जहाँ जाते हैं वही आनन्द साथ ले जाते हैं। उनका सभी जगह घर है और सभी जगह स्वदेश है। विद्या धन है। अन्य वस्तुएं तो उसकी समता में बहुत ही तुच्छ हैं। यह धन ऐसा है जो अगले जन्मों तक भी साथ रहता है। विद्या द्वारा संस्कारित की हुई बुद्धि आगामी जन्मों में क्रमशः उन्नति ही करती जाती है और उनके जीवन उच्चतम बनते हुए पूर्णता तक पहुँच जाते हैं।
कुँए को जितना गहरा खोदा जाए उसमें से उतना ही अधिक जल प्राप्त होता जाता है। जितना अधिक अध्ययन किया जाय, मनुष्य उतना ही ज्ञानवान बनता जाता है। विश्व क्या है? और इसमें कितनी आनन्दमयी शक्ति भरी हुई है इसे वही जान सकता है जिसने विद्या पढ़ी है। ऐसी अनुपम सम्पत्ति को उपार्जन करने में न जाने क्यों लोग आलस्य करते हैं। आयु का कोई प्रश्न नहीं हैं, चाहें मनुष्य बूढ़ा हो जाए या मरने के लिए चारपाई पड़ा हो तो भी विद्या प्राप्त करने में उसे उत्साहित होना चाहिए क्योंकि ज्ञान तो जन्म जन्मान्तरों तक साथ जाने वाली वस्तु है।
जुटफान की रणभूमि में घोर युद्ध करते हुए फौज के प्रधान अफसर सर फिलिप सिडनी बुरी तरह घायल हुए। वे युद्ध में बहादुरी से लड़ रहे थे कि दुश्मन की एक गोली उनकी जाँघ में आ कर लगी। जिससे वहाँ की हड्डी के दो टुकड़े हो गये। घोड़े को लौटा कर वे अपने कैम्प में आये। घाव में से खून इतनी तेजी से निकल रहा था कि उनके बचने की कोई आशा नहीं थी।
कैम्प में पहुँचते-पहुँचते सर फिलिप घोड़े पर से गिर पड़े। मूर्छा से चेत हुआ तो उन्होंने इशारे से पानी माँगा। तलाश के बाद पानी लाया गया और फिलिप के हाथ में दे दिया गया। पानी होठों तक ही जाने पाया था कि उनके कानों में एक दूसरे सिपाही की आवाज आई जो दूर घायल पड़ा हुआ था और पानी-पानी चिल्ला रहा था।
फिलिप ने गिलास को अपने होठों से अलग हटा दिया और कहा इसे उस सिपाही को पिला दो। उनसे आग्रह किया कि आप अफसर हैं, आपका मूल्य एक साधारण सिपाही की अपेक्षा अधिक है। इसलिए आप ही पानी पीजिए। फिलिप ने कहा “मेरा मूल्य इसीलिए अधिक है कि मैं सिपाहियों को सच्चे दिल से प्यार करता हूँ और उनकी तकलीफ को अपनी तकलीफ से बढ़कर समझता हूँ। यदि यह बात मुझमें न रहे तो फिर किस प्रकार मुझे बड़ा कहा जाएगा।
“मुझे एक सिपाही से बड़ा समझा जाता है, इसलिए मेरा बड़प्पन इसी में है कि मैं इस पानी को सिपाही को दे दूँ। उनकी आज्ञानुसार वह गिलास सिपाही के पास पहुँचा दिया गया। सर फिलिप सिडनी कुछ क्षण उपरान्त स्वर्ग सिधार गये, पर उनका बड़प्पन अभी तक जीवित है।”
(संत कबीर)
तीरथ करि करि जग मुवा, डुबै पानी न्हाय।
यम नाम जप के बिना, काल घसीटा जाय॥ 1॥
काशी काठैं घर करै, पीवै निर्मल नीर।
मुकति नहीं हरिनाम बिन, यों कहें दास कबीर॥ 2॥
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मवा, पंडित भया न कोय।
एकै अक्षर प्रेम का, पढ़ै सो पण्डित होय॥ 3॥
यह सब झूठी बन्दगी बरियाँ पंच निवाज।
सोचै मारै झूठ पढ़ि, काजी करै अकाज॥ 4॥
कबीर माला काठ की, वहि समभावे नोहि।
मन न फिरावै आपना, कहा फिरावै मोहि॥ 5॥
माला पहरयाँ कुछ नहीं, गाँठ हृदय की खोइ।
हरि चरनन चित राखिये, तो अमरापुर होई॥ 6॥
केशन कहा बिगाड़ियो, जो मूड़ै सौ बार।
मन को कहे न मूँडिए जामें विषय विकार॥ 7॥
वैष्णव भया तो क्या भया, बूझा नहीं विवेक।
छापा-तिलक बनाय कर, दगध्या लोक अनेक॥ 8॥
तन को जागी सब करैं, मन को बिरला कोय।
सब विधि सहजै पाइये, जो मन जोगी होय॥ 9॥
पत्थर केरा पूतला, करि पूजै करतार।
इसी भरोसे जे रहे, ते बूढ़े काली धार॥10॥
जेती देखों आत्मा, तेते सालिगराम।
साधु प्रत्यक्ष देव हैं, नहिं पत्थर सूँ काम॥11॥
मन मथुरा दिल द्वारिका, काया काशी जानि।
दसवाँ द्वारा देहुरा, तहाँ ज्योति पहिचानि॥12॥
दुनियाँ मन्दिर देहरी, शीश नवावन जाई।
हिरदे भीतर हरि बसें, तू ताही सो लौ लाई॥13।
मुल्ला मुनारे क्या चढ़हि, साँई न बहरा होइ।
जा का तू बाँग देहि, दिल के भीतर सोइ॥14॥
वैष्णव हुआ तो क्या हुआ, माला मेलीं चारि।
बाहर कंचनवा रहा, भीतर भरी भँगारि॥15॥
शेख सबूरी बाहरी, क्या हज कावै जाय।
जाका दिल साबित नहीं, ताको कहा खुराई॥16॥
जीवन विज्ञान लेखमाला-2
जीव का निरन्तर विकास हो रहा है उसका अज्ञान हर घड़ी घट रहा है और ज्ञान की किरणें निरन्तर अधिक उज्ज्वल होती जा रही हैं। यहाँ एक कल्पना कीजिए। मान लीजिये कि एक जलता हुआ बिजली का बल्ब है। उसके ऊपर कपड़े के सैकड़ों पर्त चढ़े हुये हैं, सबसे ऊपर वाले पर्त को देखने पर भीतरी बल्ब का प्रकाश नहीं के बराबर दृष्टिगोचर होगा, किन्तु यह पर्त जैसे जैसे खुलते जाते हैं वैसे ही वैसे प्रकाश अधिक स्पष्ट होता जाता है। दो चार पर्तों का कपड़ा हटा देन पर भीतर की रोशनी हलकी हलकी किरणों से बाहर आने लगती है। जब सारे पर्त हट जाते हैं तो बल्ब अपने उज्ज्वल स्वरूप में निकल आता है। जीव का आरम्भिक जीवन अनेक पर्तों से लिपटी हुई प्रारम्भिक दशा में होता है। अन्त में अपने पर्तों को खोलता खोलता ज्योति स्वरूप हो जाता है। प्याज अनेक पर्तों से लिपटी होती है। एक के बाद एक पर्त उतारते जाइए तो प्याज की भीतरी भिंगी निकल आती है। यही जीवन क्रम है। योनियों की सीढ़ियों पर अज्ञान का एक एक पर्त उतरता जाता है और ज्ञान का प्रकाश बढ़ता आता है। आप तो समझिये कि जीवन एक पतंग की डोरी है। जीव रूपी पतंग आकाश में ऊँची चढ़ती जा रही है और लिपटी हुई जीवन की सुषुप्त डोरी खुल कर आकाश में उड़ती जा रही है। इसका एक सिरा परमात्मा रूपी बालक के हाथ में है वह चर्खी से लिपटी हुई डोरी को निरन्तर खोलता जा रहा है और एक दिन सारी डोरी को खोल कर पतंग को मुक्ति प्रदान कर देता है। एक बात और ध्यान रखनी चाहिए कि विकास क्रम में शारीरिक बल की अपेक्षा मानसिक चेतना प्रधान है। भैंसे की अपेक्षा बन्दर को ऊँचे दर्जे का विद्यार्थी समझा जाएगा भले ही शारीरिक बल में भैंसा अधिक हो पर बुद्धि में बन्दर ही प्रधान है। मनुष्य भी अन्य जीवों की अपेक्षा बल और विशालता में न्यून है पर बुद्धि का प्रकाश उसकी सृष्टि का सर्व शिरोमणि प्राणी बना देता है।
यह बात निश्चित है कि एक जन्म से दूसरा जन्म अधिक उज्ज्वल होगा। कोई भी प्राणी उलटी योनि के लिये नहीं चलता। हाँ मनुष्य योनि में ऐसे अपवाद हो सकते हैं। पर वे अपवाद कभी कभी और कदाचित ही होते हैं। बी. ए. का विद्यार्थी प्रायः छठवें सातवें दर्जे में नहीं उतारा जाता।यह हो सकता है कि कोई आलसी, प्रमादी या उद्दंड लड़का कई वर्ष एक ही कक्षा में पड़ा रहे और अपनी शैतानियों के लिए पिटता रहे। पर जो पुस्तक उसे अनिवार्यतः नित्य पढ़नी पड़ती है उसे भूल जाना कठिन है। यहाँ एक प्रश्न उपस्थित होता है कि कोई व्यक्ति पाप कर्म करता हुआ और पुण्य कर्म करता हुआ दिखाई पड़ता है। इसका क्या कारण है? इसका कारण यह है कि एक मनुष्य अभी अभी ही नीच योनियों में से निकल कर ऊपर आया है। दूसरा मनुष्य कई जन्मों से मनुष्य योनि में विचरण कर रहा है। जो व्यक्ति भेड़िया, व्याघ्र, सर्प, सियार, बिच्छू आदि की कक्षाओं में से अभी अभी निकला है, वह मनुष्य योनि में प्रवेश पाकर भी अपने उन पुराने संस्कारों में जागता देखा जाता है। स्वार्थी, चोर, दुष्ट, डाकू, हिंसक ऐसे ही व्यक्ति हैं। वे अपने पुराने संस्कारों को क्रमशः छोड़ते हुए आगे चलेंगे। भारतीय धर्म शास्त्र इसीलिए किसी से भी घृणा करने की आज्ञा नहीं देता। दसवीं कक्षा के छात्र को यह उचित नहीं कि वह तीसरे दर्जे के विद्यार्थी के अल्पज्ञान के लिए घृणा करे। एक दिन वह स्वयं ही तीसरे दर्जे में रहा होगा। आज वह दसवें दर्जे में है, तो भी एम. ए. के छात्र की दृष्टि में उतना ही छोटा होगा जैसा कि वह स्वयं आज तीसरे दर्जे वाले को छोटा समझ रहा है।
घृणा न करने का अर्थ यह नहीं है कि सेवा और सुधार से भी मुख मोड़ लिया जाए। बालक उत्पन्न होता है उसमें व्यावहारिक ज्ञान की कमी होती है कपड़े में टट्टी, पेशाब कर देने जैसे अप्रिय कार्य वह करता है, तो भी माता पिता उससे घृणा नहीं करते, वरन् उसको शुद्ध करने और ज्ञान बढ़ाने की सेवा सहायता करते हैं। अज्ञानियों, मूर्खों और पापियों को कुमार्ग से हटाकर सुमार्ग पर लाने का सतत् प्रयत्न करना आवश्यक है। उद्दंड बच्चे को कभी कभी चपत लगाने की जरूरत होती है। इस दृष्ट से उस दुष्ट को दण्ड भी दिया जा सकता है। सेवा और सुधार के लिए साम, दाम, दंड, भेद चारों में ही काम लिया जा सकता है। सुधार के लिए हिंसा की छूट है। अर्जुन को ऐसा ही अप्रिय सुधार करना पड़ा था। घृणा मूर्खता है और सेवा कर्तव्य है। इसलिए दुष्टों से घृणा की नहीं वरन् उनकी उन्नति के लिए सेवा का व्यवहार उसी प्रकार करना चाहिए जैसी समय की आवश्यकता हो।
यह बात यहाँ अच्छी तरह ध्यान रखने की है कि कोई जीव प्रायः नीचे की योनियों में नहीं लौटता, क्योंकि जितना ज्ञान उसने इकट्ठा कर लिया है उसे भूल नहीं सकता और भूले बिना छोटी योग्यता के शरीरों में उस प्राणी का निवास नहीं हो सकता। दस सेर पानी पाँच सेर के बर्तन में नहीं भरा जा सकता, बी. ए. का विद्यार्थी तीसरे दर्जे में नहीं उतारा जा सकता। मनुष्य को प्रायः कुकर्मों के दंड में नीच योनियाँ नहीं मिलती- अगला जन्म मनुष्य का ही होता है और विकास क्रम के अनुसार परिवार एवं वातावरण भी ऊँचा ही मिलता है, जिससे विकास क्रम न रुके। परन्तु पापों के दंड स्वरूप शारीरिक कष्ट मिलते हैं। अपवाद कभी कभी तब उपस्थित होते हैं, जब कोई जीव बहुत ऊँचा चढ़ कर अचानक बहुत नीचे की ओर खिसक पड़ता है। ऐसे प्राणियों के हथियार कुछ समय के लिए जब्त कर लिए जाते हैं और जड़ योनियों में कैद कर दिया जाता है। यह कैद इस लिए होती है कि वह उन मानव जीवन की अनुपयोगी आदतों को भूल जाए। यह दंड एक प्रकार का लम्बा बचपन है जिसमें पढ़ने की अपेक्षा भूलने की शिक्षा दी जाती है। अहिल्या के शिला हो जाने और पर्यक यक्ष के वृक्ष हो जाने की कथा इसी सत्य पर प्रकाश डालती है लेकिन ऐसा बहुत ही कम होता है। जेलखाने में कैदी पहुँचते तो हैं पर साधारण जनता की अपेक्षा उनकी संख्या बहुत ही कम होती है। इसी प्रकार मानव विकास का साधारण क्रम ऊपर को उठता हुआ ही जा रहा है। कैद से छूटने के बाद मनुष्य फिर अपने पुराने अधिकारों को प्राप्त कर लेता है, अपनी पिछली कमाई हुई सम्पत्ति का अधिकारी हो जाता है। अहिल्या का शिला जीवन समाप्त होते ही वह ऋषि पत्नी बन गई। इसी प्रकार यदि मनुष्य को कोई दण्ड योनि मिलती है, तो उससे छूटने के बाद वह फिर से अन्य योनियों में नहीं घूमता, वरन् सीधे अपने पिछले ज्ञान में जागृत होता है और जहाँ से मंजिल रुकी थी, वहीं से आगे के लिए आरम्भ हो जाती है। पिछला ज्ञान उसको ज्यों का त्यों मिल जाता है।
(क्रमशः)
लेखमाला-
पिछले अंक में बताया जा चुका है कि आकस्मिक सुख दुख हर व्यक्ति के जीवन में आया करते हैं। इससे सुर मुनि, देव, दानव कोई नहीं बचता। भगवान राम तक इस कर्म गति से छूट न सके। सूरदास ने ठीक कहा है-
कर्मगति टारी नाहि टरै।
गुरु वशिष्ठ पण्डित बड़ ज्ञानी,
रचि पाँच लगन धरै।
पिता मरण और हरण सिया को,
बन में विपति परै॥
वशिष्ठ जैसे गुरु के होते हुए भी राम कर्म गति को टाल न सके। उन्हें भी पिता का मरण, सिया का हरण एवं वन की विपत्तियाँ सहन करना पड़ी। वह विपत्तियाँ कहीं से अकस्मात् टूट पड़ती हैं, या ईश्वर नाराज होकर दुख दंड देता है, ऐसा समझना ठीक न होगा। ‘पंच् ध्यायी’ का निश्चित मत है कि सब प्रकार के दुख अपने ही बुलाने से आते हैं रामायण का मत भी इस सम्बन्ध में यही है
काहु न कोउ दुख सुखकर दाता।
निज-निज कर्म भोग सब भाता॥
दूसरा कोई भी प्राणी या पदार्थ किसी को दुख देने की शक्ति नहीं रखता। सब लोग अपने ही कर्मों का फल भोगते हैं और उसी भोग से रोते चिल्लाते रहते हैं। जीव की पूँछ से ऐसी कठोर व्यवस्था बँधी हुई है जो कर्मों का फल तैयार करती रहती है। मछली पानी में तैरती है उसकी पूँछ पानी को काटती हुई पीछे पीछे एक रेखा सी बनाती चलती है। साँप रेंगता जाता है और रेत पर उसकी लकीर बनती जाती है, जो काम हम करते हैं उनके स्वयं बोई हुई कटीली झाड़ी की तरह अपने लिए ही दुखदायी बन जाते है।
अब हम तीन प्रकार के कर्म, उनके तीन प्रकार के प्रभाव एवं तीन तरह के फलों की चर्चा आरम्भ करते हैं। सुख तो मनुष्य की स्वाभाविक स्थिति है। सुकर्म करना स्वभाव है इसलिए सुख प्राप्त होना भी स्वाभाविक ही है। कष्ट दुख में होता है। दुख से ही लोग डरते घबराते हैं, उसी से छुटकारा पाना चाहते हैं। इसलिए दुखों का ही विवेचन यहाँ होना उचित है। आरोग्यवर्द्धन शास्त्र और चिकित्सा शास्त्र दो अलग-अलग शास्त्र हैं। इसी प्रकार सुख दुख के भी दो अलग विज्ञान हैं। सुख वृद्धि के लिए धर्माचरण करना चाहिए जैसे कि स्वास्थ्य वृद्धि के लिए पौष्टिक पदार्थों का सेवन किया जाता है। दुख निवृत्ति के लिए रोग का निवारण करने के लिये उसका निदान ओर चिकित्सा जानने की आवश्यकता है। कर्म की गहन गति की जानकारी प्राप्ति करने से दुखों का मर्म समझ में आ जाता है। दुखों के कारण को छोड़ देने से सहज ही दुखों की निवृत्ति हो जाती है। आइए, अब हम दुखों का स्वरूप आपके सामने रखने का प्रयत्न करें।
दुख तीन प्रकार के होते हैं (1) दैविक (2) दैहिक (3) भौतिक। दैविक दुख वे कहे जाते हैं जो मन को होते हैं जैसे चिन्ता, आशंका, क्रोध, अपमान, शत्रुता, बिछोह, भय, शोक आदि। दैहिक दुख वे होते हैं जैसे रोग, चोट, आघात, विष आदि के प्रभाव से होने वाले कष्ट। भौतिक दुःख वे हैं जो अचानक अदृश्य प्रकार से आते हैं जैसे भूकम्प, दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, महामारी, युद्ध आदि। इन्हीं तीन प्रकार के दुखों की वेदना से मनुष्यों को तड़पता हुआ देखा जाता है। यह तीनों दुख हमारे शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कर्मों के फल हैं। मानसिक पापों के परिणाम से दैविक दुख आते हैं, शारीरिक पापों के फलस्वरूप दैहिक और सामाजिक पापों के कारण भौतिक दुख उत्पन्न होते हैं
दैविक दुख-मानसिक कष्ट, उत्पन्न होने का कारण वे मानसिक पाप हैं जो स्वेच्छापूर्वक तीव्र भावनाओं से प्रेरित होकर किये जाते हैं जैसे ईर्ष्या, कृतघ्नता, छल, दम्भ, घमण्ड, क्रूरता, स्वार्थपरता आदि इन कुविचारों के कारण जो वातावरण मस्तिष्क में घुटता रहता है उससे अन्तः चेतना पर उसी प्रकार का प्रभाव पड़ता है जिस प्रकार धुएँ के कारण दीवाल काली पड़ जाती है या तेल से भीगने पर कपड़ा गन्दा हो जाता है। आत्मा स्वभावतः पवित्र है वह अपने ऊपर इन पाप मूलक कुविचारी प्रभावों को जमा हुआ नहीं रहने देना चाहती, वह इस फिक्र में रहती है कि किस प्रकार इस गन्दगी को साफ करूं? पेट में हानिकारक वस्तुएं जमा हो जाने पर पेट उसको दस्त के रूप में निकाल बाहर करता है। इसी प्रकार तीव्र इच्छा से जानबूझ कर किये गये पापों को निकाल बाहर करने के लिये आत्मा आतुर हो उठती है। हम उसे जरा भी जान नहीं पाते किन्तु आत्मा भीतर ही भीतर उस पाप भार को हटाने के लिये अत्यन्त व्याकुल हो जाती है। बाहरी मन-स्थूल बुद्धि को उस अदृश्य प्रक्रिया का कुछ भी पता नहीं लगता पर अंतर्मन चुपके ही चुपके ऐसे अवसर एकत्रित करने में लगा रहता है जिससे वह भार हट जाए। अपमान, असफलता, बिछोह, शोक, दुख आदि प्राप्त हो, ऐसे अवसरों को वह कहीं न कहीं से एक न एक दिन, किसी प्रकार खींच ही लाता है ताकि उन दुर्भावनाओं का, पाप संस्कारों का-इन अप्रिय परिस्थितियों में समाधान हो जाए।
शरीर द्वारा किये हुए चोरी, डकैती, व्यभिचार, अपहरण, हिंसा आदि में मन ही प्रमुख है, हत्या करने में हाथ का कोई स्वार्थ नहीं है, वरन् मन के आवेश की पूर्ति है, इसलिये इस प्रकार के कार्य जिनके करते समय इन्द्रियों को सुख न पहुँचता हो, मानसिक पाप कहलाते हैं, ऐसे पापों का फल मानसिक दुख होता है। स्त्री-पुत्र आदि प्रिय जनों की मृत्यु, धन नाश, लोक निन्दा, अपमान, पराजय, असफलता, दरिद्रता आदि मानसिक दुख प्राप्त हैं, उनसे मनुष्य की मानसिक वेदना उखड़ पड़ती है, शोक सन्ताप उत्पन्न होता है, दुखी होकर रोता चिल्लाता है, आंसू बहाता है, शिर धुनता है। इससे वैराग्य के भाव उत्पन्न होते हैं और भविष्य में अधर्म न करने एवं धर्म में प्रवृत्त रहने की प्रवृत्ति बढ़ती है। देखा गया है कि मरघट में स्वजनों की चिता रचते हुए ऐसे भाव उत्पन्न होते हैं कि जीवन का सदुपयोग करना चाहिये। धन नाश होने पर मनुष्य भगवान को पुकारता है। पराजित और असफल व्यक्ति का घमण्ड चूर हो जाता है। नशा उतर जाने पर वह होश की बात करता है, मानसिक दुखों का एक मात्र उद्देश्य मन में जमे हुए ईर्ष्या, कृतघ्नता, स्वार्थपरता, क्रूरता, निर्दयता, छल, दम्भ, घमण्ड आदि की सफाई होना है। दुख इसीलिये आते है कि आत्मा के ऊपर जमा हुआ प्रारब्ध कर्मों का पाप संस्कार निकल जाए। पीड़ा और वेदना की धारा उन पूर्व कृत प्रारब्ध कर्मों के निकृष्ट संस्कारों को धोने के लिये प्रकट होती है।
दैविक-मानसिक कष्टों का कारण समझ लेने के उपरान्त अब दैहिक-शारीरिक-कष्टों का कारण समझना चाहिये। जन्मजात अपूर्णता एवं पैतृक रोगों का कारण पूर्व जन्म में उन अंगों का दुरुपयोग करना है। मरने के बाद सूक्ष्म शरीर रह जाता है। नवीन शरीर की रचना इस सूक्ष्म शरीर द्वारा होती है। इस जन्म में जिस अंग का दुरुपयोग किया जा रहा है, वह अंग सूक्ष्म शरीर में अत्यन्त निर्बल हो जाता है, जैसे कोई व्यक्ति अति मैथुन करता हो, तो सूक्ष्म शरीर का वह अंग निर्बल होने लगेगा, फलस्वरूप संभव है कि वह अगले जन्म में नपुँसक हो जाए। यह नपुंसकता केवल कठोर दंड नहीं है, वरन् सुधार का एक उत्तम तरीका भी है। कुछ समय तक उस अंग को विश्राम मिलने से आगे के लिये वह फिर सचेत और सक्षम हो जाएगा। शरीर के अन्य अंगों का शारीरिक लाभ के लिये पाप पूर्ण, अमर्यादित अपव्यय करने पर आगे के जन्म में वे अंग जन्म में ही निर्बल या नष्ट प्रायः होते हैं। शरीर और मन के सम्मिलित पापों के शोधन के लिये जन्म जात रोग मिलते हैं या बालक अंग-भंग उत्पन्न होते हैं। अंग भंग या निर्बल होने से उस अंग को अधिक काम नहीं करना पड़ता, इसलिये सूक्ष्म शरीर का वह अंग विश्राम पाकर अगले जन्म के लिये फिर तरोताजा हो जाता है। साथ ही मानसिक दुख मिलने से वह मन का पाप भार भी धुल जाता है
मानसिक पाप भी जिस शारीरिक पाप के साथ घुला मिला होता है, वह यदि राजदंड, समाज दंड या प्रायश्चित द्वारा इस जन्म से शोधित न हुआ तो अगले जन्म के लिये जाता है। परन्तु यदि पाप केवल शारीरिक है या उसमें मानसिक पाप का मिश्रण अल्प मात्रा में है, तो उसका शोधन शीघ्र ही शारीरिक प्रकृति द्वारा हो जाता है, जैसे नशा पिया-उन्माद आया। विष खाया मृत्यु हुई। आहार विहार में गड़बड़ी की, बीमार पड़े। इस तरह शरीर अपने साधारण दोषों की सफाई जल्दी-2 कर लेता है और इस जन्म का भुगतान इसी जन्म में कर जाता है। परन्तु गम्भीर शारीरिक दुर्गुण, जिनमें मानसिक जुड़ाव भी होता है, अगले जन्म में फल प्राप्त करने के लिये सूक्ष्म शरीर के साथ जाते हैं।
भौतिक कष्टों का कारण हमारे सामाजिक पाप हैं। सम्पूर्ण मनुष्य जाति एक ही सूत्र में बँधी हुई है। विश्वव्यापी जीव तत्व एक है। आत्मा सर्व व्यापी है। जैसे एक स्थान पर यज्ञ करने से अन्य स्थानों का भी वायुमण्डल शुद्ध होता है और एक स्थान पर दुर्गन्ध फैलने से उसका प्रभाव अन्य स्थानों पर भी पड़ता है। इसी प्रकार एक मनुष्य के कुत्सित कर्मों के लिये दूसरा भी जिम्मेदार है। एक दुष्ट व्यक्ति अपने माता पिता को लज्जित करता है, अपने घर कुटुम्ब को शर्मिंदा करता है। वे इसलिये शर्मिंदा होते हैं कि उस व्यक्ति के कामों से उनका कर्त्तव्य भी बँधा हुआ है। अपने पुत्र, कुटुम्बी, या घर वाले को अशिक्षित, सदाचारी न बनाकर दुष्ट क्यों हो जाने दिया? इसकी आध्यात्मिक जिम्मेदारी कुटुम्बियों की भी है। कानून द्वारा अपराधी को ही सजा मिलेगी परन्तु कुटुम्बियों की आत्मा स्वयमेव शर्मिन्दा होंगी, क्योंकि उनका गुप्त शक्ति यह स्वीकार करती है कि हम भी किसी हद तक इस मामले में अपराधी हैं। सारा समाज एक सूत्र में बँधा होने के कारण आपस में एक दूसरे की हीनता के लिये जिम्मेदार है। पड़ोसी का घर जलता रहे और दूसरा पड़ोसी खड़ा-खड़ा तमाशा देखे, तो कुछ देर बाद उस का भी घर जल सकता है। मुहल्ले के एक घर में हैजा फैले और दूसरे लोग उसे रोकने की चिंता न करें, तो उन्हें भी हैजा का शिकार होना पड़ेगा। कोई व्यक्ति किसी की चोरी, बलात्कार, हत्या, लूट आदि होती हुई देखता रहे और समर्थ होते हुए भी उसे रोकने का प्रयत्न न करे तो समाज उससे घृणा करेगा एवं कानून के अनुसार वह भी दंडनीय समझा जाएगा।
ईश्वरीय नियम है कि हर मनुष्य स्वयं सदाचारी जीवन बितावे और दूसरों को अनीति पर न चलने देने के लिये भरसक यत्न करे। यदि कोई देश या जाति अपने तुच्छ स्वार्थों में संलग्न होकर दूसरों के कुकर्मों को रोकने और सदाचार बढ़ाने का प्रयत्न नहीं करती हो उसे भी दूसरों का पाप लगता है। उसी स्वार्थपरता के सामूहिक पाप से सामूहिक दण्ड मिलता है। भूकम्प अतिवृष्टि, अनावृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी, महायुद्ध के कारण ऐसे ही सामूहिक दुष्कर्म होते हैं जिनमें स्वार्थपरता को प्रधानता दी जाती है और परोपकार की उपेक्षा की जाती है।
देखा जाता है कि अन्याय करने वाले अमीरों की अपेक्षा मूक पशु की तरह जीवन बिताने वाले भोले भाले लोगों पर दैवी प्रकोप अधिक होते हैं। अतिवृष्टि, अनावृष्टि का कष्ट गरीब किसानों को ही अधिक सहन करना पड़ता है। इसका कारण यह है कि अन्याय करने वाले से अन्याय सहने वाला अधिक बड़ा पापी होता है। कहते हैं कि ‘बुज़दिल जालिम का बाप होता है।’ कायरता में यह गुण है कि वह अपने ऊपर जुल्म करने के लिए किसी को न किसी को न्योत ही बुलाती है। भेड़ की ऊन एक गड़रिया छोड़ देगा तो दूसरा कोई न कोई उसे काट लेगा। कायरता, कमजोरी, अविद्या स्वयं बड़े भारी पातक हैं। ऐसे पातकियों पर यदि भौतिक कोप अधिक हो तो कुछ आश्चर्य नहीं? सम्भव है कि उनकी कायरता को दूर करने एवं स्वाभाविक सतेजता जगाकर निष्पाप बना देने के लिये अदृश्य सत्ता द्वारा यह घटनाएं उपस्थित होती हों। यह भौतिक दुर्घटनाएं सृष्टि के दोष नहीं हैं वरन् अपने ही दोष हैं अग्नि में तपा कर सोने की तरह हमें शुद्ध करने के लिये यह कष्ट बार बार कृपापूर्वक आया करते हैं और संसार को जोरदार चेतावनियाँ देकर सामाजिक निष्पापता बढ़ाने का आदेश दिया करते हैं।
दैविक, दैनिक, भौतिक दुखों की कुछ विवेचना ऊपर की पंक्तियों में की जा चुकी है। अब हम इसी लेखमाला के अंतर्गत यह बतावेंगे कि किस प्रकार के पाप पुण्यों का फल कितने कितने समय में मिलता है?
ले.-श्री दरबारीलाल जी ‘सत्यभक्त’
“पादरी! साहब ईश्वर की ताकत ज्यादा है या शैतान की?”
“भाई इसमें पूछने की क्या बात है? सभी जानते हैं कि ईश्वर की ताकत ज्यादा है।”
“कितनी ज्यादा है? “
“चौगुनी, अठगुनी, दसगुनी और क्या “
“जब ईश्वर की ताकत ज्यादा है, तब शैतान ईश्वर की हर चीज बिगाड़ कैसे देता है? “
“पादरी साहब क्षण भर चुप रहे, फिर बोले- तुम तो मूर्तिकार हो। एक अच्छी मूर्ति बनाने में तुम्हें कितने दिन लगते हैं? “
“महीनों लग जाते हैं। अच्छी मूर्ति को वर्ष भी लग जाता है। “
“अगर तुम उसे तोड़ना चाहो तो कितने वर्ष लगेंगे? “
“उसमें वर्ष की क्या जरूरत? एक सैकिंड में टूट जायगी। “
‘तो मेरे बेटे! बिगाड़ने से किसी की ताकत का अन्दाज नहीं लगता, ताकत का अन्दाज लगता है बनाने से। एक महात्मा एक आदमी को दस वर्ष में जितना सुधार पाएगा, एक दुरात्मा उसे महीनों और दिनों में उससे कई गुना बिगाड़ देगा। मैं समझता हूँ कि अब तू ईश्वर और शैतान की ताकत का अन्दाज लगा लेगा।
-नई दुनिया
धर्म तत्व निरूपण लेख माला-
वारणाय तु कष्टस्य स्थायिनो महतस्तथा।
स्वल्पं च स्वल्पकालीनं कष्टदानं न दोषकृत्॥
(महतः) महान् (तथा स्थायिनः) और स्थायी (कष्टस्य) कष्ट के निवारण के लिये (स्वल्पं) थोड़ा (च) और (स्वल्प कालीनं) स्वल्प कालीन (कष्टदानं) कष्ट देना (दोकृत) दोषकृत (न) नहीं होता।
अनेक बार मनुष्य के जीवन में ऐसे अवसर उपस्थित होते हैं जब यह धर्म संकट में पड़ जाता है। समाने दो ऐसे मार्ग आ जाते हैं जो दोनों ही अरुचिकर होते हैं, उनमें से किसी को भी करने की इच्छा नहीं होती, फिर भी ऐसी परिस्थिति सामने होती है कि एक को किये बिना गुजारा नहीं (1) एक ओर खाई दूसरी ओर खन्दक’ (2) ‘भई गति साँप छछूंदर केरी’ (3) ‘मुँह में भरा गरम दूध न पीते बने न उगलते’ (4) ‘मूसल निगलो या वृत्ति छोड़ो’ आदि अनेक कहावतें जन समाज में प्रचलित हैं जो यह सूचित करती हैं कि ऐसी द्विविधायें अक्सर सामने उपस्थित होती हैं और उनके हल ढूंढ़ने में बुद्धि विचलित हो जाती है।
धर्म ग्रन्थ, लोकमत, उदाहरण, अभिवचन और भावुकता के आधार पर कुछ निर्णय करते हुए मस्तिष्क चकरा जाता है। मान लीजिये कि एक सिंह गाँव में घुस आवे और ग्रामवासियों को खाने लगे, ऐसे समय में धर्मग्रन्थ टटोलने पर परस्पर विरोधी मन्तव्य प्राप्त होते हैं। एक स्थान पर लिखा होगा कि ‘किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करनी चाहिये’ सभी जीव ईश्वर के हैं, जिस प्राणी को हम बना नहीं सकते उसे मारने का हक नहीं है। दूसरे स्थान पर ऐसा लिखा होगा कि “आततायी को मार डालना चाहिये” दोनों ही व्यवस्था एक दूसरे के विरोध में है, धर्मग्रन्थ का अवलम्बन करने पर जो धर्म संकट उपस्थित हुआ, उसका निराकरण हो सकना बहुत कठिन है। मित्रों से पूछा जाए तो वे भी अपनी अपनी विचार मर्यादा के अनुसार उत्तर देंगे। जैनी मित्र से पूछें तो कहेगा-चाहे जो होता रहे सिंह पर हाथ छोड़ना चाहिये। वेदान्ती कहेगा-संसार मिथ्या है, स्वप्न समान है तुम तो देखते मात्र रहो। गीता धर्म वाला कहेगा-कर्त्तव्य पालन करो, आततायी को मारो सिंह है या गौर इसकी विवेचना मत करो। पीड़ित गाँव वासी सिंह को अविलम्ब मार डालने की पुकार करेंगे। इस प्रकार लोकमत भी एक नहीं मिल सकता, कबूतरखाने में तरह तरह की चिड़ियाँ अपनी अपनी बोली बोलती हैं, किसकी बात बुरी कही जाए किसकी अच्छी? कोई वस्तु चाहे कितनी अच्छी क्यों न हो उसके सब लोग समर्थक नहीं हो सकते। स्वराज्य जैसे सर्वोपयोगी जीवन तत्व के भी विरोधी आज अनेक भारतीय दृष्टिगोचर होते हैं। कसाई के कुत्ते अपने टुकड़े से अधिक उत्तमता और किसी वस्तु में नहीं देख सकते। इस प्रकार लोकमत भी किसी बात का सर्वसम्मति से समर्थन नहीं कर सकता चाहे वह कितनी ही उत्तम हो, वैसे ही बुरी से बुरी बात का पक्ष लेने वाले लोग मिल जाते हैं। उदाहरण तो किसी भी बात के अनुकूल मिल सकते हैं। साधारण मनुष्यों की बात छोड़िए, बड़े से बड़े में बुराइयाँ ढूँढ़ी जा सकती हैं ब्रह्मा जी अपनी पुत्री पर आसक्त होकर उसके साथ बलात्कार करने को तैयार हो गये, चन्द्रमा गुरुपत्नी पर डिग गया, इन्द्र का अहिल्या के साथ कुकर्म करना प्रसिद्ध है, विष्णु ने जलन्धर की स्त्री का छलपूर्व पतिव्रत भंग किया व्यासजी का मछुए की लड़की पर, विश्वामित्र का मेनका पर आसक्त होने का वर्णन मिलता है। रामायण पढ़ने वालो ने नारद मोह की कथा पढ़ी होगी कि वे भक्ति भाव छोड़कर किस प्रकार विवाह के लिये व्याकुल फिरे थे। राक्षसों का पक्ष समर्थन करने वाले एवं सहायक शुक्राचार्य और कौरवों के सहायक द्रोणाचार्य जैसे विद्वान थे, बालि को वामन भगवान ने छला, बालि को राम ने आड़ में छिप कर अनीतिपूर्वक मारा, इस प्रकार बड़े बड़ों में जहाँ दोष है, वहाँ अत्यन्त छोटी श्रेणी के व्यक्ति भी उच्च चरित्र का पालन करते देखे जाते हैं। इतिहास एक समुद्र है। इसमें हर बुरे भले कार्य के पक्ष में तगड़े उदाहरण मिल सकते हैं, फिर इनमें से किसका अनुकरण किया जाए? दुर्भिक्ष में अन्न न मिलने पर प्राण जान का संकट उपस्थित होने पर विश्वामित्र ने चाण्डाल के घर से माँस चुरा कर खाया था और उषस्ति ने अन्त्यज के झूठे उर्द खाकर प्राण रक्षा की थी, किन्तु विलोचन का ऐसा भी उदाहरण मौजूद है कि अभक्ष खाने का अवसर आने पर उसने प्राणों का परित्याग कर दिया था। इनमें से किसका पक्ष ठीक माना जाए किसका गलत यह निर्णय करना साधारण बुद्धि वाले व्यक्ति के लिए बहुत कठिन है। अभिवचनों का भी यही हाल है कि एक विद्वान एक सिद्धान्त का प्रतिपादन बड़े प्रचण्ड तर्कों से करता है किन्तु दूसरा उससे भी उग्र प्रमाणों द्वारा उस सिद्धान्त का खण्डन कर देता है। प्रजातन्त्र, कम्यूनिज्म, फासिज्म, पूँजीवाद आदि के प्रतिपादन में जो तर्क और आधार उपस्थित प्रतिपादन में जो तर्क और आधार उपस्थित किये जाते हैं, उसके बीच में से सचाई ढूँढ़ निकालना साधारण प्रजा का काम नहीं है। फिर भावुकता का तो कहना ही क्या ? आँखों के सामने जो असाधारण अनुभूति करने वाले प्रसंग आते हैं, उनसे तरंगित होकर हृदय एक प्रवाह में बह जाता है और छोटी घटना को भी अत्यन्त महान समझकर उसके निराकरण में बड़े से बड़ा कार्य करने को तैयार हो जाता है, फिर चाहे उतने ही कार्य में अनेक गुने महत्वपूर्ण कार्य छूट जावें। साम्प्रदायिक दंगे हमारे देश में आये दिन होते हैं, इनकी तह में कोई बड़ी भारी जटिल पेचीदगी नहीं होती है किन्तु भावुकता का प्रवाह होता है। मुसलमान सोचता है कि नमाज के समय बाजा बजाने से खुदाबन्द करीम की तौहीन होती है, हिन्दू सोचता है रामचन्द्रजी की बारात का बाजा बन्द हो जाना ईश्वर का अपमान है। दोनों पक्ष खुदा की तौहीन और ईश्वर का अपमान न होने देने के लिए छुरी कटार लेकर निकल पड़ते हैं और खून से पृथ्वी लाल कर देते हैं। तत्वतः बाजे के कारण, न तो ईश्वर का अपमान होता था और न खुदा की तौहीन, पर दोनों पक्ष अपनी अपनी भावुकता के प्रवाह में बह गये और छोटी घटना को ऐसा बड़ा समझने लगे मानों यही जीवन मरण का प्रश्न है। यदि भावुकता की उड़ान पर विवेक का नियन्त्रण होता तो वह रक्तपात होने से बच जाता। मुहम्मद गोरी अपनी सेना के आगे गायों का झुण्ड आगे करके बढ़ा, पृथ्वीराज ने गौओं पर हथियार चलाने की अपेक्षा पराजय होने की भावुकता अपना ली। चन्द गायें उस समय बच गई, पर आज उसी के फलस्वरूप मिनट-मिनट पर सहसा गायों की गर्दन पर छुरी साफ हो रही है। ईद की कुर्बानी पर एक गाय को लेकर दंगा हो जाता है पर सूखे माँस के व्यापार में जो अगणित गौवध होता है उसकी ओर किस की दृष्टि जाती है? इस प्रकार भावुकता के प्रवाह में सामने वाली छोटी बातों को तूल मिल जाता है और पीछे पीछे रहने वाली जीवन मरण की समस्या जहाँ की तहाँ उपेक्षित पड़ी रहती है।
उपरोक्त पंक्तियों में हमने यह बताने का प्रयत्न किया है कि धर्मग्रंथ लोकमत, उदाहरण, अभिवचन और भावुकता के आधार पर धर्म संकट का सही हल निकालने में बहुत ही कम सहायता मिलती है और गड़बड़ में पड़ जाने की आशंका अधिक रहती है। हो सकता है कि सामने वाले दो मार्गों में से छोटी बात बड़ी मालूम पड़े और बड़ी का महत्व छोटा समझ में आवे। जैसे बालक के फोड़ा निकल रहा है इसे चिरवाना आवश्यक है। आपरेशन के चाकू को देखकर बालक भयभीत होकर करुण क्रन्दन करता है, पिता की भावुकता उमड़ पड़ती है, वह बालक को अस्पताल से उठा कर यह कहता हुआ चल देता है, इतना करुण रुदन मैं नहीं देख सकता। घर आने पर फोड़ा बढ़ता है, सड़ने पर गल कर नष्ट हो जाता है, बालक का जीवन निरर्थक हो जाता है। यहाँ तत्व ज्ञानी की दृष्टि से पिता की वह भावुकता अनुचित ठहरती है, जिसके प्रवाह में वह आपरेशन के समय बह गया था। यदि उस समय उसने धैर्य, विवेक और दूरदर्शिता से काम लिया होता तो बालक की जिन्दगी क्यों बर्बाद होती? पिता की सदाशयता पर किसी को आक्षेप नहीं, उसने जो किया था अच्छी भावना से किया था, पर भावुकता की मात्रा विवेक से अधिक बढ़ जाने के कारण वह उचित मार्ग से भटक गया और अनिष्टकर परिणाम उपस्थित करने का हेतु बन गया। जब पिता अस्पताल से बच्चे को उठा कर लाया था तब वह चाहता तो अनेक ऐसे सूत्र, लोकोक्ति, उदाहरण, तर्क आर अभिवचन सहज ही एकत्रित कर सकता था जो उसके कार्य का औचित्य सिद्ध करने ही के पक्ष में होते।
सामने एक भला मार्ग हो और दूसरा बुरा तो यह निर्णय आसान है कि इस मार्ग पर चलना उचित है। पर जब दोनों ही मार्ग बुरे हैं तो क्या किया जाए? यह निश्चित करना कठिन है। इसी प्रकार अच्छे मार्गों में से किसे चुना जाए यह भी पेचीदा प्रश्न है। इन पेचीदा मार्गों को धर्म संकट कहते हैं। धर्म संकट की घनघोर अँधियारा में किस ज्योति के प्रकाश में सच्चा मार्ग प्राप्त किया जा सकता है, इस सम्बन्ध में फरवरी के अंक में प्रकाश डाला जाएगा।
ला तहसीनल्लजीना कतलू फीसबी लिल्लाहे आवाततन्।
उनको -जो ईश्वर के मार्ग पर बलिदान हुए हैं, मृतक मत समझ।
-सूरये इमान
या अय्युहऽन्नवियुह्रर्रिजल्
मुअमिनीना................विअन्न हुम् कउ- मुल्लाऽयफ्कहून्।
सूरये अन्फाल 250। 9। 5।
हे पैगम्बर! ईमान वालों को युद्ध के लिये उत्तेजित करो कि तुम में से स्थिर रहने वाले बीस भी होंगे तो वह दो सौ पर विजयी होंगे और यदि तुममें से सौ होंगे तो हजार काफिरों पर विजय प्राप्त करेंगे क्योंकि यह काफिर लोग धर्म को समझते ही नहीं।
अल् आना खफ्फफऽल्लाहु अन्कुम् व अलियाख अन्ना फी कुम जुअफऽन........ वल्लाहु मअस्मा बिरीन्
-सूरये अन्फल 2।10। 65
हे ईमान वालों! अब अल्लाह ने तुम पर से भार हलका किया और समझा कि तुम में निर्बलता है, अतः यदि तुम में से सौ सच्चे मनुष्य हों तो वह दो सौ पर विजयी होंगे और तुम में से हजार हों तो वे अल्लाह की आज्ञा से दो हजार पर विजयी होंगे। अल्लाह सच्चों के साथ है।
(राष्ट्रपति मौलाना अब्दुल कलाम आजाद)
जब धर्म एक होने के बजाय अगणित जत्थों और सम्प्रदाओं में बँट गया और हर जत्था केवल अपने को ही सच्चा और सबको झूठा बतलाने लगा तो अब इस बात का फैसला कैसे हो कि वास्तव में सत्य कहा हैं। कुरान कहता है कि वास्तविक सत्य तो सबके पास है, किन्तु व्यवहार में सबने उसे खो रखा है। सबको एक ही धर्म की शिक्षा दी गई थी और सबके लिये एक ही विश्वव्यापी आदेश था। लेकिन सबने वास्तविक तत्व को नष्ट कर दिया और ईश्वरीय पथ पर मिलजुलकर रहने के स्थान पर अलग-2 गिरोह बन्दियाँ कर लीं। अब प्रत्येक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय से लड़ रहा है और समझता है कि मुक्ति और कल्याण मेरी पैतृक सम्पत्ति है, दूसरों को इसमें कोई हिस्सा नहीं।
विविध धर्मों की इस गिरोहबन्दी का परिणाम यह हुआ कि परमात्मा के उपासना मन्दिर तक अलग हो गये। यद्यपि धर्मों के अनुयायी एक ही परमात्मा के मानने वाले हैं, तथापि यह संभव नहीं कि एक धर्म का अनुयायी दूसरे धर्म वालों के बनाये हुए उपासना मन्दिर में जाकर परमात्मा का नाम ले सके। इतना ही नहीं, बल्कि प्रत्येक सम्प्रदाय लोग केवल अपने ही उपासना मन्दिर को ईश्वर की उपासना का स्थान समझते हैं और दूसरे सम्प्रदाय के उपासना गृहों का उनकी नजरों में कोई आदर नहीं। यहाँ तक कि लोग धर्म के नाम पर दूसरों के उपासना गृहों को नष्ट तक कर डालते हैं। कुरान कहता है इससे बढ़कर अन्याय मनुष्य और क्या कर सकता है कि खुदा के बन्दों को उसकी पूजा करने से रोके और केवल इसलिए कि वे किसी दूसरे सम्प्रदाय में शामिल हैं या किसी उपासनागृह को केवल इसलिए गिरा दे कि वह हमारा नहीं, बल्कि दूसरे संप्रदाय वालों का बनवाया हुआ है।
थोड़े दिन के बीतने पर दुष्ट रहेगा ही नहीं और तू उसके स्थान को भली भाँति देखने पर भी उसको न पायेगा पर नम लोग पृथ्वी के अधिकारी और बड़ी शान्ति के कारण सुख मानेंगे।
भजन संहिता 37।10।11
कंगाल पर इस कारण अन्धेर न करना कि वह कंगाल है और न दीनजन को कचहरी में पीसना। क्योंकि यहाँ वो इनका मुकदमा लड़ेगा और जो लोग उनका धन हर लेते हैं वह उनका प्राण भी हर लेगा।
22। 22। 23,
ओछे और अनर्थकारी को देखो वह टेढ़ी बातें बकता फिरता है। उसके मन में उलटफेर की बातें रहती है वह लगातार बुराई गढ़ता है ओर रगड़ा झगड़ा उत्पन्न करता है। इस कारण उस पर विपत्ति अचानक आ पड़ेगी। वह पल भर में ऐसा नाश हो जायेगा कि कोई उपाय न रहेगा।
6।12।15
सुन, ईश्वर न तो खरे मनुष्य को निकम्मा जान कर छोड़ देता है और न बुराई करने वालों को संभालता है।
-अयूब 8।10
कुकर्मियों के कारण मत कुढ़। कुटिल काम करने वालों के विषय में डाह न कर क्योंकि वे घास की तरह मुर्झा जाएंगे।
-भजन संहिता 37। 1। 2
सतयुग में एक बार बड़ा भारी दुर्भिक्ष पड़ा। कई वर्ष तक लगातार वर्षा न होने के कारण अन्न बिल्कुल पैदा न हुआ। कुएँ और नदी तालाब सूख गये। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। पृथ्वी पशु पक्षियों से रहित दिखाई पड़ने लगी। भूख और प्यास से पीड़ित नर-नारी तड़प-2 कर प्राण त्यागने लगे।
राजाओं ने अपने खजाने खाली कर दिये। धनियों ने अपनी सम्पदायें लुटा दी। विभुक्षितों को बचाने के लिए सब ने अपनी शक्ति भर उद्योग किया, पर दैवी प्रकोप के आगे आखिर किस का, कब तक बस चलता। जब सब शक्ति हीन हो गये और दुर्भिक्ष का दानव विकराल रूप धारण करके, प्रजा को चबाने लगा, तो चारों दिशाओं में हाहाकार गूंजने लगा।
विपत्ति से छुटकारा पाने का उपाय ढूँढ़ने के लिए राजा ने एक बड़ी भारी सभा बुलाई, जिसमें उस समय तक जीवित सभी गणमान्य ऋषि ओर मनीषी एकत्रित हुए। बहुत सोच विचार के बाद ऋषियों ने निश्चय किया कि इन्द्र देवता कुपित हो गये है, उन्हें शान्त करने के लिए नरमेध यज्ञ होना चाहिए।
नरमेध यज्ञ क्या? प्रजा की इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए ऋषियों ने बताया कि पाप-पूर्ण कुविचारों से जब अदृश्य लोक भर जाता है तो उसकी प्रतिक्रिया से सभी सृष्टि पर नाना प्रकार की आपत्तियाँ आती हैं। उन्हें शान्त करने के लिए प्रबुद्ध। आत्माओं का उच्चकोटि का स्वेच्छा-त्याग आवश्यक है। कुछ दिव्य आत्माएँ पवित्रतम विचारों के साथ लोक कल्याण के लिए अपने को बलिदान कर दें, तो विकृत वातावरण शुद्ध हो सकता है, इन्द्र देवता सन्तुष्ट हो सकते हैं।
सब लोग चिन्ता में पड़े कि नरमेध यज्ञ के ‘बलि पशु’ कौन बनेगा? लोग कुत्ते की मौत आये दिन मरते थे पर धर्म के लिए प्राण देना तो बड़ा कठिन है। ऋषि ने खड़े होकर पूछा -आप लोगों में से कोई व्यक्ति अपने को यज्ञ में बलिदान करने के लिए देता है? सभा में सन्नाटा छाया हुआ था, ऋषि की याचना प्रतिध्वनित होकर वापिस लौट आई। दर्शकों और विचारकों की सभा में से किसी का मुँह न खुला। कार्यवाही दूसरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई।
सभा का कार्य समाप्त हो जाने के बाद एक ब्राह्मण युवक अपने विचारों में मग्न अपने घर पहुँचा। घर पर उसके वृद्ध माता-पिता भूख से तड़प रहे थे। प्यास के मारे उसके होंठ सूख रहे थे। युवक ने माता पिता के पैर छुए और कहा मैं अब जा रहा हूँ, सदा के लिए जा रहा हूँ, आप मुझे प्रसन्नतापूर्वक आज्ञा दीजिये। उसने सभा का सारा वृत्तान्त कह सुनाया कि किस प्रकार नरमेध यज्ञ की आवश्यकता बताई गई और उसके लिए एक यज्ञ-पशु का कार्य करने के लिये कोई उद्यत न हुआ। अब मैंने अपने प्राण देकर उस महान् कार्य की पूर्ति करने का निश्चय किया है।
माता-पिता का भूख प्यास के कारण होने वाला चीत्कार बन्द हो गया। उन्होंने अपनी धुँधली आँखों से अपने प्राणों से प्यारे पुत्र को देखा और उसे उठाकर छाती से लगा लिया। उनकी आँखों से आँसुओं का अविरल प्रवाह जारी था और गला रुँध रहा था। एकमात्र पुत्र की ममता उनका कलेजा नौंचे खा रही थी। पुत्र को चरण स्पर्श का उत्तर देते हुए पिता ने कहा-’बेटा, प्रसन्नतापूर्वक जाओ। यदि तुम्हारे बलिदान से असंख्य प्राणियों की तड़पती हुई आत्माओं को शान्ति मिलेगी,तो तुम बड़े भाग्यशाली हो, प्रसन्नतापूर्वक अपना बलिदान करो बेटा।
दूसरे दिन प्रातःकाल सभी की कार्यवाही पुनः आरम्भ हुई। ऋषि ने उठ कर पूछा-क्या यज्ञ न हो सकेगा? क्या आज भी कोई महानुभाव अपने को बलिदान करने के लिये तैयार होकर नहीं आये हैं? सभा मण्डल में भीड़ को चीरता हुआ एक दुर्बल, कृशकाय, गौर वर्ण युवक आगे बढ़ा। उसने कहा “यज्ञ होगा! अवश्य होगा। हाँ, मैं शतमन्यु शर्मा तैयार होकर आया हूँ।” सब लोग प्रसन्नता से तालियाँ बजाने लगे।
यज्ञ की तैयारियाँ होने लगीं। होता, उर्ध्वयु उद्गाता, ब्रह्मा सब अपना-2 कार्य करने लगे। एक विशाल मण्डप के बीच यज्ञ वेदिका बनाई गई। आहुतियों से अग्नि की लपटें आकाश का चुम्बन करने के लिये बढ़ने लगीं।
बलिदान की वेदी के निकट तेजस्वी शतमन्यु खड़ा हुआ था, प्रसन्नता से उसका चेहरा खिल रहा था। उसकी आहुति दी ही जाने वाली थी कि आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी। एक दिव्य-ज्योति ने प्रकट होकर कहा-’पुत्र’ शतमन्यु! मैं ही इन्द्र हूँ, तुम्हारे त्याग से बहुत प्रसन्न हूँ। जिस देश में तुम्हारे जैसे आत्मत्याग करने वाले मौजूद हैं, वह अधिक दिन दुखी न रहेगा। अब नरमेध की आवश्यकता नहीं रही, शीघ्र ही वर्षा होगी और दुर्भिक्ष मिट जायगा।’
ज्योति के अन्तर्ध्यान होते ही घनघोर घटायें उमड़ी और मूसलाधार वर्षा होने लगी। मरणासन्न प्राणियों में पुनः प्राण लौट आये, सर्वत्र शतमन्यु का यशगान होने लगा।
सतयुग के आदि में ऋषि के आदेश का उत्तर देते शतमन्यु ने कहा था ‘यज्ञ होगा।’ मैं तैयार हूँ।’ आज कलयुग के अन्त में अखंड पूछती है कि असत्य और पाप के कारण दुर्भिक्ष पीड़ित संसार को शान्ति देने के लिये, सत्य प्रचार करने के लिये, क्या कोई तेजस्वी युवक तत्पर न होंगे? क्या इस सत्य-यज्ञ का अनुष्ठान न हो सकेगा? नरमेध यज्ञ का महत्व समझने वाले कोई आत्मत्यागी नहीं है?
देखें कोई शतमन्यु यह कहने का साहस करता है कि ‘हाँ मैं हूँ।’ असत्य को मिटाने के लिये सत्य की बलिवेदी पर प्राण देने के लिये मैं तैयार हूँ। अखण्ड ज्योति के प्यारे कान ऐसे उत्तर सुनने के लिये गर्दन उठा उठा कर देख रहे है।
तुम को दूसरा कोई अच्छा सी सलाह दे, उसको सुनना तुम्हारा कर्तव्य है। परन्तु तुम अपनी आत्मा की सलाह से काम काज करते रहो, कभी धोखा नहीं खाओगे।
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जिसके हृदय में प्रेम है, वह निस्संदेह प्रभु के समीप है। क्योंकि ईश्वर भी प्रेम ही है।
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सोचो, यदि कोई एक दिन में 3 घंटे निरन्तर चलता रहता है, तो सात साल वह इतना चल लेगा, कि जितनी पृथ्वी की परिधि है।
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जो दूसरों के दुर्गुणों को कहता रहता है, वह अपने ही दुर्गुणों को कहता रहता है।
कुम्भकर्ण का कलियुगी भाई
(1)
कलकत्ते के एक मकान में बहुत लम्बे पाँवों के चिन्ह दिखाई पड़े हैं, जो नाप में 22 इंच के है। इसी प्रकार के चिन्ह सन् 1936 में जलपाई गुड़ी में दिखाई पड़े थे और उसके बाद एक अन्य स्थान में भी।
उस दिन बंगाली युवक अपने मकान में सो रहा था। रात में लगभग दो बजे उसने एक आवाज सुनी और वह जाग पड़ा। कमरे में उसे एक काली शक्ल दिखाई दी, जिसका सर छत से लगा हुआ था। युवक डरकर चारपाई से कूद पड़ा और जान बचाने के लिए दरवाजा खोलकर पड़ोस के एक मकान में भाग गया। सवेरा होने पर वह कुछ लोगों को लेकर, अपने कमरे में गया, तो उसने देखा कि सीमेन्ट के फर्श पर पैरों के चिन्ह बने हैं, जो 22 इंच लम्बे हैं।
कलकत्ता की खुफिया पुलिस के एक इन्सपेक्टर ने जो पाँव के निशान पहचानने के विशेषज्ञ है, इन चिन्हों के फोटो लिये हैं। ये चिन्ह दोनों पाँवों के हैं, जिनकी लम्बाई 22 इंच तथा चौड़ाई 7 इंच हैं। इन चिन्हों से कलकत्ते में बड़ी सनसनी फैल गई है और बहुत से मनुष्य उन्हें देखने आते हैं।
गाने वाली आत्माएं
(2)
वारसा के एक विशाल भवन के सम्बन्ध में एक बहुत ही अजीब किस्सा मशहूर है, यह भवन वारसा के पूर्वी भाग से स्थित है और सैंकड़ों वर्षों से खाली पड़ा है। कारण कि लोगों ने इस भवन को बसाने की कोशिश की, वे एक ही रात उस भवन में रहने के बाद मरे हुए पाये गये। अब उस भवन का यह हाल है कि लोग उसके पास निकलते हुए भी डरते हैं। पड़ोस के लोगों का कहना है कि रोजाना रात के साढ़े बारह बजे के बाद उस भवन से गाने की आवाज आती है और यह मालूम होता है कि बहुत से स्त्री पुरुष मिल कर गा रहे हैं। कहा जाता है कि यह भवन पुराने समय की किसी नर्तकी का है, जिसका कत्ल कर दिया गया था। उस दिन के बाद आज तक कोई मनुष्य उस मकान में नहीं रहा। लोगों का आम तौर से यही ख्याल है कि उस मकान की मालकिन की आत्मा प्रेत हो गई है और वहाँ रात को गाती है। उसके साथ ही और आत्माएं गाने आती हैं।
जिस तरह कि स्त्री कुटुम्ब का, अपने सास ससुर का आदर करती है और उनकी आवश्यकताओं को पूरा करती है, परन्तु अपने पति को अधिक प्यार करती है, उसी तरह तुम भी अपने इष्टदेव की आराधना करते रहो, किन्तु दूसरे देवों का भी सत्कार करते रहो, देव एक ही है।
जैसे केंचुली से साँप पृथक होता है, उसी तरह देह से आत्मा पृथक है।
पारे लगे हुए शीशे में जैसे मनुष्य अपना चेहरा देख लेता है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य से जिसने बल और पवित्रता की रक्षा की है, उसके अन्तःकरण में शक्तिशाली प्रभु की परछांई का दर्शन होता है।
समालोचना -
संगम (मासिक-पत्र) संपादिका- श्रीमती वीणा देवी सत्यभक्त वार्षिक मूल्य 211) रु॰।
प्राप्ति स्थान-सत्याश्रम, वर्धा सी॰ बी॰ श्री स्वामी सत्यभक्त की, हमारी दृष्टि में सच्चे संन्यासी सत्यशोधक युग निर्माता महापुरुष हैं। उनकी लेखनी और वाणी में हम उन तत्वों को देखते हैं जिनसे किसी राष्ट्र की काया पलट होती है। संगम, स्वामी जी के सन्देशों को जनता तक पहुँचाता है। पत्र उच्च कोटि की विचारधारा से परिपूर्ण है। ऐसे पत्रों की देश को आज बड़ी भारी आवश्यकता है।
मन और उसका निग्रह (सजिल्द) मूल्य 1 आना।
प्राप्ति स्थान- जनरल प्रिटिंग वकर्स लि॰ प्रिटिंग हाऊस, हौज कटरा, बनारस, छपाई सफाई बहुत सुन्दर। मानव जीवन की व्यवहारिक सफलता में मनोविग्रह का सर्वोपरि स्थान है। ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर श्री स्वामी शिवान्द जी महाराज का यह ग्रन्थ बहुत प्रामाणिक एवं अनुभवपूर्ण है। कठिन विषय को बड़ी ही सरलतापूर्वक समझाने में यह रचना सर्वथा सफल हुई है। आध्यात्मिक तत्वों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए बहुत ही महत्व की पुस्तक है।
सचित्र हठयोग-(सजिल्द) मू॰ 1 रु. आसनों के 38 चित्रों सहित।
प्राप्ति स्थान- जनरल प्रिटिंग वकर्स लि॰ प्रिटिंग हाउस, हौज कटरा, बनारस, छपाई सफाई बहुत सुन्दर। आसन, प्राणायाम बन्ध, मुद्रा एवं योगिक क्रियाओं द्वारा आधिभौतिक, आधि दैविक और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाने वाली अनुपम और प्रामाणिक पुस्तक है। इस एक ही पुस्तक से जो लाभ उठाया जा सकता है वह अन्य पुस्तकें बढ़कर भी नहीं उठाया जा सकता। पुस्तक के लेखक स्वयं एक महान योगी हैं। अपने विषय की यह अद्वितीय पुस्तक है।
संगीत सम्बन्धी पुस्तकें
1-संगीत संसार संगीत का विशाल ग्रन्थ दूसरी बार छापकर तैयार हुआ है। मू. 4/) 2- फिल्म संगीत (चार भाग) प्रथम भाग में 70, दूसरे में 72, तीसरे में 70 और चौथे में 70 गीतों की पूरी-पूरी स्वर लिपियाँ है। मूल्य प्रत्येक भाग 2/) रु.। 3-राग दर्शन-6- तिरंगे चित्रों सहित राग भौरव और उसके परिवार की स्वरलिपियाँ मू. 3) 4-संगीत पारिजातः पं. अहोबल का लिखा हुआ प्राचीन संस्कृति ग्रन्थ 500 श्लोकों की सरल हिन्दी टीका सहित मू 21) 5-तानसेन-संगीत सम्राट तानसेन की जीवनी, स्वरलिपियाँ और तानसेन का फिल्मी ड्रामा दिया गया है, मू. 2/) 6-म्यूजिक मास्टर-बिना मास्टर के हारमोनियम, तबला और बाँसुरी सिखाने वाली पुस्तक जिसके 8 संस्करण हो चुके है मू. 1) 7-अवैयों का मेला-तरह तरह के चुने हुए 500 गायनों का संग्रह मू. 1) गवैयों का जहाज -इसमें भी तबियत खुश कर देने वाले 400 गाने हैं 1) 9-पुष्पवाटिका-भजन, गजल, प्रार्थना, आरती, फिल्म -गीत इत्यादि 404 गाने मूल्य 1) महिला हारमोनियम गाइड -स्त्री व कन्याओं के लिए मनोहर गीतों सहित बाजा बजाना बताया गया है मू.।) 11-रुक्मणि मंगल-राधेश्यामी तर्ज में समस्त रुक्मणि मंगल की कथा 1) 12-गीता गायन-राधेश्यामी तर्ज में गीता की कथा मू. 11) ताल अंक-घर बैठे तबला बजाना सीखिये, मू. 21) संगीत मासिक पत्र भी बराबर निकल रहा है, 200 पृष्ठ के विशेषाँक सहित वार्षिक मू. 3) है।
दुनिया खौलते कढ़ाव में उबल रही है।
चारों ओर हाहाकारी ज्वाला जल रही है, खून के दरिया बह रहे हैं, महामारी का ताण्डव हो रहा है, रहे बचे भूख की ज्वाला में जले जा रहे हैं। हर आदमी आगामी कल को सशंकित और भयभीत नेत्रों से देख रहा है। न जाने भविष्य का निष्ठुर दानव किस पर क्या कहर ढा दे, इस आशंका से मनुष्यों के कलेजे धक-धक कर रहे हैं।
यह निष्ठुर परिस्थिति क्यों उत्पन्न हुई?
आगामी घड़ियों में क्या होने वाला है? कितने दिन अभी क्या क्या कष्ट सहने होंगे? इस खूनी तूफान का अन्त कैसे होगा? इन सब महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर आध्यात्मिक महापुरुषों को दिव्य-दृष्टि से प्राप्त हुआ है।
उसको सर्व साधारण पर प्रकट करने के लिए-
‘अखंड-ज्योति’ का महत्वपूर्ण विशेषाँक 1 जनवरी 43 को प्रकाशित होगा।
“ संवत् 2000 अंक”
इस विशेषाँक की एक-एक पंक्ति पढ़ने योग्य, समझने योग्य और मनन करने योग्य होगी। यह अंक अपूर्व और अद्भुत गुप्त बातों की जानकारियों से परिपूर्ण होगा। विचारवान व्यक्तियों के लिए यह अंक प्राण-प्रिय हुए बिना न रहेगा।
कागज के इस घोर अकाल में पृष्ठ संख्या थोड़ी ही बढ़ाई जा सकेगी, साधारण अंक से यह ड्यौढ़ा होगा। पर इतने ही पृष्ठों में गागर में सागर भर दिया जायगा।
1 जनवरी सन् 1943 की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा कीजिए।
नोट- यह उतना ही छपेगा जितने ग्राहक दिसम्बर में बन जावेंगे। क्योंकि कागज हमें उतना ही मिलता है जितने ग्राहक उस मास में होते हैं। इसलिए जिन्हें संवत् 2000 अंक लेने की इच्छा हो उन्हें अपना चन्दा दिसम्बर में ही भेज देना चाहिए।
मैनेजर- ‘अखंड-ज्योति’ मथुरा।
(श्री स्वामी सत्यभक्त जी महाराज वर्धा)
दुनिया अब नई बनाना।
यह जग हो गया पुराना॥
फैला है इसमें रूढ़ि जाल,
दुर्जन रूपी हैं विकट व्याल,
बंधक चलते हैं कुटिल चाल,
सज्जन होते बेहाल हाल,
पर हमको स्वर्ग दिखाना॥1॥
दुनिया अब नई बनाना॥
रोका जाता इसमें विकास,
है व्यक्ति पा रहा व्यर्थ त्रास,
बनना कायरता का निवास,
विद्वेष घृणा है आस पास,
हमको है प्रेम बढ़ाना॥ 2॥
दुनिया अब नई बनाना।
यद्यपि है मानव एक जाति,
पर घर घर में है जाति पाँति,
भाई का भाई है अराति,
जो था अघाति बन गया घाति,
सबको है हमें मिलाना॥ 3॥
दुनिया अब नई बनाना॥
नारी है अब अधिकार हीन,
है पशु समान अति हीन छीन,
मानवता पशुता के अधीन,
पशु बल में है सब न्यायलीन,
है यह अन्धेर मिटाना॥ 4॥
दुनिया अब नई बनाना॥
गौमुख। व्याघ्रों की कुटेक,
पिसते समाज सेवी अनेक,
है वहाँ अन्ध श्रद्धातिरेक,
कोसा जाता डट कर विवेक,
हमको विवेक फैलाना॥ 5॥
दुनिया अब नई बनाना।
लड़ते आपस में सम्प्रदाय,
है एक प्राण पर भिन्न काय,
करते हैं भाई का अपाय,
व्यय बढ़ा और घट रही आय,
सम भाव हमें बतलाना॥ 6॥
दुनिया अब नई बनाना।
मंदिर मस्जिद गिरजे अनेक,
मिलकर हो जायें एक नेक,
छोड़ें अपनी अपनी कुटेक,
जग जाये जनता का विवेक,
कोई भी हो न बिराना॥ 7॥
दुनिया अब नई बनाना॥
सौभाग्य सूर्य हो उदित आज,
दे हमें सत्य भगवान ताज,
भगवती अहिंसा का स्वराज,
सुखमय स्वतंत्र हो सब समाज,
सबका हो एक ठिकाना॥ 8॥
दुनिया अब नई बनाना॥
*समाप्त*