सदुपदेशों को ध्यानपूर्वक सुनो!

तुम पेट को भोजन देते हो, पर देखो कान को भी भोजन दे देना। पेट भूखा रहेगा तो शरीर क्षीण होगा और कान भूखे रहेंगे तो बुद्धि मन्द हो जायेगी। श्रेष्ठ पुरुषों के अभिवचन सुनने का जब अवसर आवे तो अन्य कार्यों को छोड़कर भी वहाँ पहुँचो, क्योंकि उनके वचन तुम्हें वह वस्तु दे सकते हैं, जो रुपया-पैसा की अपेक्षा हजारों गुनी मूल्यवान होगी।

जो लोग जीभ से अच्छा खाने में तो कुशल हैं, पर कानों से सदुपदेश सुनने का आनन्द नहीं जानते, उन्हें बहरा ही कहना चाहिये। ऐसों का जीना और मर जाना एक समान है।

जिन्होंने बहुत सदुपदेश सुने हैं इस पृथ्वी पर देवता रूप हैं। धर्मात्मा मनुष्यों की शिक्षा एक सुदृढ़ लाठी के समान है जो सहारा देती रही है, और बुरे अवसर पर गिरने से बचा लेती है, अशिक्षित लोग भी धर्मात्माओं के सत्संग से उतनी शक्ति प्राप्त कर लेते हैं, जिसमें अपने को संभाल सकें और विपत्ति के समय पैरों पर खड़े रहें।


अखण्ड ज्योति के नियम

अखण्ड ज्योति का वार्षिक चन्दा 1 रुपये मनीआर्डर से भेजना चाहिये। वी.पी. मंगाने से 1 रुपये से अधिक देने पड़ते हैं। मूल्य में कमी करने के लिये पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिये ग्राहक नहीं बनाये जाते।

पाठकों को जनवरी से ग्राहक बनाना चाहिये, बीच के किसी मास में चंदा भेजने वालों को जनवरी से उस मास तक के पिछले अंक भेज दिये जावेंगे।

अखण्ड ज्योति हर महीने की ठीक 20 तारीख को निकल जाती है। न मिले तो डाकखाने के उत्तर सहित 15 दिन के अन्दर ही लिखना चाहिये।

सन् 40 के छः अंक तथा सन 41 के कुल अंक मौजूद हैं। जो मंगाना चाहे 502 रुपये प्रति अंक के हिसाब से मंगा सकते हैं।

पुस्तकों का मूल्य 1 रुपया है। चार पुस्तकों से कम मंगाने वाले को कोई कमीशन नहीं दिया जाता है। चार से अधिक पुस्तकें मंगाने पर चौथाई कमीशन मिलता है। डाक खर्च हर हालत में ग्राहक के जिम्मे है। प्रति पुस्तक पर 11 रुपया का कमीशन मिलता है, किन्तु 1 रुपया पोस्टेज लगता है। इस प्रकार कमीशन काट कर और पोस्टेज जोड़ कर हर पुस्तक के लिये 11 रुपया भेजना चाहिये।

हर पत्र के साथ अपना पूरा पता और ग्राहक नम्बर अवश्य लिखना चाहिए। इसके बिना उत्तर भेजने में विलम्ब हो सकता है। इसके लिए जवाबी कार्ड या टिकट भेजना चाहिये।

सब प्रकार के पत्र व्यवहार का पता-

मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा।


एडवोकेट, हाईकोर्ट इलाहाबाद क्या कहते हैं?

मैंने अपने जीवन में पहली बार ही आधुनिक पद्धति से औषधियां तैयार करने वाले सब संचारक कंपनी लिमिटेड मथुरा के कारखाने को देखा। जितनी स्वच्छता और तत्परता से यहाँ पर औषधियां तैयार करके संग्रह की जाती हैं, उसे देखकर मैं आश्चर्य में रह गया। औषधियां सुयोग्य वैद्य की अध्यक्षता में तैयार होती हैं। कंपनी ने अकथनीय सफलता प्राप्त की है। यदि आयुर्वेदिक औषधियां तैयार करने की ऐसी अन्य कंपनियाँ हमारे यहाँ होती, तो हमारे लिये एक सौभाग्य का विषय होता। मैं कंपनी की भविष्य में अधिक सफलता और पं. क्षेत्रपाल जी शर्मा के दीर्घ जीवन की कामना करता हूँ।

-एन. उपाध्याय, एडवोकेट


मनुष्य को देवता बनाने वाली पुस्तकें

जो ज्ञान युगों के प्रयत्न से मिलता है- उसे हम अनायास ही आपके सन्मुख उपस्थित करते हैं।

यह पुस्तकें बाजारू किताबें नहीं हैं। उनकी एक-एक पंक्ति के पीछे गहरा अनुभव और अनुसंधान है। विनम्र शब्दों में हमारा दावा है कि इतना खोजपूर्ण अलभ्य साहित्य इतने स्वल्प मूल्य में अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकता।

1. मैं क्या हूँ?- आत्मा का प्रत्यक्ष प्रदर्शन करने के कुछ सरल साधन। मू. 1 रुपया

2. सूर्य चिकित्सा विज्ञान- सूर्य की प्रचंड रोगनाशक शक्ति द्वारा वैज्ञानिक ढंग से कठिन रोगों की चिकित्सा। मूल्य 1 रुपया

3. प्राणचिकित्सा विज्ञान- मनुष्य के अंदर गजब की विद्युत शक्ति है। उसके द्वारा समस्त रोगों का इलाज। विदेशों में इस विधि से बड़े-बड़े अस्पताल चल रहे हैं। मूल्य 1 रुपया

4. परकाया प्रवेश- मैस्मरेजम के ढंग पर आत्मशक्ति को दूसरे के शरीर में प्रविष्ट करके उसे इच्छानुसार चलाने की साधना। मूल्य 1 रुपया

5. स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्भुत विद्या- अध्यात्मिक सरल साधनों द्वारा तन्दुरुस्त और खूबसूरत बनने के अद्भुत उपाय। मूल्य 1 रुपया

6. मानवीय विद्युत के चमत्कार- शरीर की बिजली से कैसे-कैसे आश्चर्यजनक कार्य होते हैं इसका विस्तृत वैज्ञानिक विवरण। मूल्य 1 रुपया

7. स्वर योग से दिव्य ज्ञान- स्वरोदय विद्या द्वारा गुप्त और भविष्य की बातों को जान लेने की रहस्यपूर्ण साधना। मूल्य 1 रुपया

8. भोग में योग- शीघ्र पतन, स्वप्न दोष, प्रमेह, नपुँसकता आदि विकारों को योग साधनों से दूर करने और मनचाही स्तम्भन शक्ति प्राप्त करने की गुप्त विधियाँ। मूल्य 1 रुपया

9. बुद्धि बढ़ाने के उपाय- जिन लोगों को मस्तिष्क से काम करना पड़ता है या जो स्मरण शक्ति बढ़ाकर बुद्धिमान बनना चाहते हैं उनके लिए यह कल्प वृक्ष के समान है। मूल्य 1 रुपया

10. धनवान बनने के गुप्त रहस्य- बड़े-बड़े कुबेरों द्वारा कार्य रूप में आई हुई ऐसी विधियाँ हैं जो आपको भी धनवान बना सकती हैं। मूल्य 1 रुपया

11. पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि- मन चाही संतान प्राप्त करने के सारे रहस्य इस पुस्तक में खोल कर रख दिये हैं। मूल्य 1 रुपया

12. वशीकरण की सच्ची सिद्धि- दूसरों को अपने वश में करने के लिये बिलकुल सच्चे और हजारों वार आजमाये हुए प्रयोगों का वर्णन। मूल्य 1 रुपया

13. मरने के बाद हमारा क्या होता है?- मृत्यु के उपरान्त प्राप्त होने वाले स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, प्रेत योनि, मृतकों का साक्षात्कार, उनकी सहायता प्राप्त करना आदि बातों पर अनुभवपूर्ण वर्णन। मूल्य 1 रुपया

14. जीव जन्तुओं की बोली समझना- मूक जीव जन्तुओं की भी स्वतंत्र भाषा है और वे भी हमारी ही तरह बातचीत करते हैं। उसे समझने का महत्वपूर्ण विधान। मूल्य 1 रुपया

नोट- चार या अधिक पुस्तकें लेने पर चौथाई कमीशन दिया जाता है। हर पुस्तक पर एक आना के हिसाब से पोस्टेज लगता है, जो खरीदार को देना होता है। इस प्रकार कमीशन काटकर और पोस्टेज जोड़ कर 1 रुपया प्रति पुस्तक के हिसाब से मूल्य भेजना चाहिए। चार से कम पुस्तकें मंगाने वाले सात आना प्रति के हिसाब से भेजें।

पता- मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा।


सतयुग आ रहा है!

स्वर्ग युग-सत्ययुग, नवीन युग, द्रुत गति से दौड़ता हुआ आ रहा है, यह असंदिग्ध भविष्य सूक्ष्म दृष्टि से ही नहीं स्थूल नेत्रों से भी दिखाई पड़ रहा है। विगत शताब्दियों में मानव जाति ने इतना पाप कमाया है कि उसके भारी बोझ से आज गर्दन टूटी जा रही है। स्वार्थ और लिप्सा के मद में उन्मत्त होकर मनुष्य ने यह भुला दिया कि वह क्या था, क्या है और आगे क्या होना है। जीवन को भस्मी-भूत समझकर प्रभु की न्याय सत्ता स्वीकार करने से इनकार किया गया और नास्तिकता के आसुरी प्रलोभन में ललचा कर इन्द्रिय लालसा को तृप्त करने के लिए कदम बढ़ाया गया।

‘मैं अधिक लूँगा, दूसरों की मुझे क्या परवाह’ इस मनोवृत्ति को जब जड़ विज्ञान की नास्तिकता ने प्रोत्साहन दिया तो इंसान के अन्दर बैठा हुआ शैतान अट्टहास करने लगा। पापों की पैशाचिक आकाँक्षाएं इस सीमा तक बढ़ी कि नीति और न्याय के दर्शन दुर्लभ हो गये। राजनीति के नाम पर मनुष्य सात-सात समुद्र पार करके, अनेक कष्ट उठाता हुआ सुदूर देशों में पहुँचा और वहाँ अपने शोषण की सुदृढ़ व्यवस्थाएं की, धर्म के नाम पर दूसरे निर्दोषों की गरदन पर दाँत गढ़ा कर उनकी धमनियाँ का भरपूर रक्त पिया, ऐसे अनेकानेक संगठित षड्यंत्रों की ओर जब मानव बुद्धि पिल पड़ी तो सर्वत्र अनैतिकता की सत्ता स्थापित हो गई। प्रचार के बल पर धर्म को अधर्म और अधर्म को धर्म साबित किया जाने लगा। थोड़े से सशक्तों ने अपनी महत्वाकांक्षा के लिए अपने से निर्बलों की कमजोरी का अनुचित लाभ उठाया और उनकी छाती पर चढ़ बैठे। इसके समर्थन में नाना प्रकार के राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक कानून गढ़े गये। बेचारी सार्वभौम मानवता को ऐसे-ऐसे रस्सों से जकड़ा गया कि विश्व की जनशक्ति मूक बधिर, पंगु, अशक्त और असहाय हो गई। गुलाम देशों की प्रजा के समान स्त्रियों के मनुष्योचित अधिकारों का अपहरण करके शैतान अपने अट्टहासों से बारम्बार आकाश को गुँजित करने लगा। बेकारी, गरीबी, अशिक्षा, निर्बलता और अयोग्यता को रस्सियों से मनुष्यता को कस कर एक कौने में पटक दिया गया और कलिकाल निर्द्वन्द्व होकर ताण्डव नृत्य करने लगा। इंसान पैदा होते थे और जीते भी थे, पर यह दोनों ही कार्य नीरस हो गये। आत्मा का परमात्मा के पुत्र का जब पृथ्वी पर अवतार होता था तो प्रकृति में एक उल्लास की लहर दौड़ती थी, पर अब तो इन जीवित मृतकों से भू-भार ही बढ़ने लगा। असहायावस्था की विकृति की संड़ाद से चारों ओर दुर्गन्धि ही दुर्गन्धि वायुमण्डल में फैल गई। मनुष्य जीवन के हर पहलू में दुराचार, छल, कपट, धोखा, भय, अन्याय का बोलबाला हो गया। मनुष्य की खाल ओढ़कर घूमने वाले भेड़ियों से पृथ्वी भर गई और उनके आपसी संघर्ष से गगन भेदी चीत्कारें गूँजने लगी। मनुष्य ने अपना देवत्व त्याग दिया और शैतान की निर्द्वंद्व उपासना करने लगा। पाप के भार से पृथ्वी, की पीठ टूटने लगी।

पिता ने अपने पुत्रों को, परमात्मा ने आत्मा को, राजा ने राजकुमारों को इसलिए भेजा है कि सृष्टि की सुव्यवस्था रखो, इस वाटिका को सुरम्य बनाओ। इतना अधिकार उसे नहीं दिया गया है कि सर्वत्र अराजकता फैला दे और हरे-भरे लता-वृक्षों में खड़े-खड़े आग लगवा दे। ऐसी ही अव्यवस्था के समय के लिए शंभु का तीसरा नेत्र सुरक्षित है वे नहीं चाहते कि सृष्टि में पाप बढ़े। शरीर में फोड़े उठें पर जब वे बढ़ते हैं तो निर्दय डाकु की तरह वे चाकू घुसेड़ कर मवाद को निकाल डालना भी जानते हैं, भले ही रोगी हाय-हाय करता हुआ फड़फड़ाता रहे और वेदना से विह्वल होकर छटपटावे।

आत्मा की अखण्डता ऐसी है कि एक व्यक्ति के पापों का फल दूसरों को भी भोगना पड़ता है। हर एक का पवित्रतम कर्त्तव्य है कि पड़ौसी यदि अनीति मार्ग पर हो तो उसे जिस प्रकार भी हो सके उसे रोके, यदि नहीं रोकता तो पड़ौसी के घर में आग लगाने पर उपेक्षा करने वाले व्यक्तियों को भी दण्ड भोगना पड़ता है। आग पड़ोसी के साथ उसके घर को भी जला देती है क्योंकि वे दोनों घर आपस में सम्बद्ध थे। आत्मा की अखंडता के कारण एक के पाप दूसरों को भोगने पड़ते हैं। इस प्रकार कुछ व्यक्तियों द्वारा फैलाये हुए पापों का फल आज समस्त सृष्टि भोग रही है। महायुद्ध का राक्षस कराल डाढ़ों से अक्षेणियों सेनाएं चबाये जा रहा है। शेष जीवित प्राणी उसे राक्षस के मुँह से निकलने वाली जाज्वल्यमान लपटों से झुलसे जा रहे है। आर्थिक कष्ट से लेकर मृत्यु वेदना तक सहन करनी पड़ रही है। मानो कलि की करतूतों का समस्त सृष्टि से बदला लिया जा रहा हो।

रुद्र का तृतीय नेत्र अपनी कोप ज्वालाओं से जहाँ प्रचण्ड संहार कर रहा है, वहाँ विष्णु की सान्तत्वना पूर्ण भुजाएं भी उठ रही है। जगत पिता अपने करुण नेत्रों से संदेश देते हुए मानव से कह रहे हैं-’पुत्र! अब ऐसी भूल मत करना। तुझे संसार में सत्य प्रेम और न्याय के सुमधुर फल चखने के लिए भेजा गया है। न कि इस वाटिका में आग लगाने के लिए। पाप के बहकावे में अब न आना। दण्ड सहकर तुम्हारे पाप निवृत्त हो गये हैं। अब अपने कर्त्तव्य धर्म को समझो। तुम इन्द्रिय रत कीड़े नहीं हो, मेरे परमप्रिय राजकुमार हो। पिछली भूल का प्रायश्चित करो और नवीन सत्य युग का निर्माण करो।’ मनुष्यता दण्ड शोधित होकर अपनी भूल को स्वीकार करती हुई प्रभु के संदेश को श्रद्धापूर्वक सुन रही है और भूत के अनुभव से भविष्य की आधारशिला रख रही है। इस प्रकार आज की प्रसव वेदना में से एक नवीन रत्न उद्भूत हो रहा है उसका नाम होगा- सत्ययुग। उसका आगमन हमें प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है।


अवतार का सच्चा स्वरूप

(सत्यनारायण ही निष्कलंक हैं)

हमारा निश्चित विश्वास है कि अब सत्य का युग बहुत ही निकट आ गया है और उस युग का प्रवर्तक अवतार बहुत ही शीघ्र प्रकट होने वाला है। इस अवतार को बहुत दिनों से ‘निष्कलंक’ नाम दिया जा रहा है। यह नाम ठीक है, क्योंकि सत्य ही निष्कलंक है। कलंकित वही होगा, जो मिथ्या है। सत्य तो त्रिकाल में भी कलंकित नहीं हो सकता। इसलिये निश्चय ही जिसे निष्कलंक कहा जायेगा, वह सत्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं होगा। इस अवतार को कोई-कोई सत्यनारायण के नाम से भी पुकारेंगे। पूर्व समयों में भी जब सत्यनारायण के अवतार हुए हैं, तो उनके चित्र इस प्रकार के बनाये गये हैं, जिनके एक हाथ में कमल-पुष्प है और दूसरे में गदा। तत्वज्ञानियों की दृष्टि से इस अलंकारिक रूप की व्याख्या दूसरी तरह से होगी। कमल-पुष्प प्रेम का सूचक है और गदा न्याय की प्रतिनिधि है। अखण्ड सत्य जब क्रीड़ा के साथ संयुक्त हो जाता है, तो उसे एक से तीन बनना पड़ता है।

ईश्वर, जीव, प्रकृति यह तीन वस्तुएँ पृथक्-पृथक् दिखाई पड़ती हैं, पर यथार्थ में उनका उद्भव एक ही स्थान से है। सत, रज, तम की त्रिगुणमयी सृष्टि का स्रोत एक ही है। इन्हीं तत्वों को हम आधुनिक भाषा में सत्य, प्रेम, न्याय, इन नामों से कह सकते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश यह भी उसी त्रैत की प्रतिमा है। राम, सीता और लक्ष्मण का आध्यात्मिक अर्थ सत्य, प्रेम और न्याय से किया जा सकता है। केवल एक पदार्थ से बहुत का कार्य नहीं चलता, तब उसके विभाग हो जाते हैं। भगवान सत्य इस सृष्टि का कार्य प्रेम और न्याय के साथ चलाते हैं। हमारे दो हाथ हैं, दो आँखें हैं, दो कान हैं, दो नथुने है। यह दो साधन भगवान सत्य के भी हैं-एक प्रेम दूसरा न्याय। यह त्रिगुणमयी सृष्टि का संतुलन ठीक रखने के लिये है। इस तीन तार के यज्ञोपवीत को ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण अपने अंधों पर धारण करते हैं, जिससे कि वे जीवन में हर घड़ी इन तीन महान तत्वों को स्मरण रखें।

तन तीनों तत्वों का पृथक्-पृथक् आगे के तीन लेखों में विवेचन किया जाता है। आशा है कि इससे पाठक अवतार का ठीक-ठीक स्वरूप पहिचान जायेंगे।


सत्यनारायण की झाँकी

(अखण्ड आत्मा, अखण्ड जीवन, अखण्ड जगत)

सत्य क्या है?- पाठकों को जानना चाहिए कि इस सृष्टि का आदि मूल, कर्ता, परमेश्वर सत्य है। विश्व के कण-कण में सर्वत्र यह सत्य तत्व व्याप्त हो रहा है। जीव उसी महान सत्य सूर्य का प्रतिबिम्ब है, घड़ों में भरा हुआ आकाश है, अग्नि की चिनगारी है, पानी की बूँद है। देखने में जीव अलग-अलग प्रतीत होते हैं, संसर्ग भेद से छोटे-बड़े एवं भले बुरे प्रतीत होते हैं, पर यथार्थ में ऐसी बात नहीं है। यथार्थ में यह विभिन्न आत्माएँ परमात्मा के ही प्रतिबिंब मात्र हैं। इस विश्व में एक ही पदार्थ हैं, या तो सब अपना है या सब पराया है। या तो सम्पूर्ण को ‘मैं’ कहना होगा या ‘तू’। मैं तू दो भेद नहीं रह सकते। जब तक द्वैत है, तभी तक बंधन है। आत्मा की विश्वव्यापी आत्मीयता जब प्रज्ज्वलित हो जाती है, तो सारी गुत्थियाँ सुलझ जाती हैं, बंधन से सहज ही छुटकारा मिल जाता है। आत्मा अखण्ड है, जीवन अखण्ड है, जगत अखण्ड है। इन तीन तत्वों का ज्ञान प्राप्त करके हम भगवान सत्य का दर्शन कर सकते हैं, आत्मा और परमात्मा एक हैं। इस तत्व का मनुष्य जैसे-जैसे अनुभव करता जाता है, वैसे-वैसे वह परम पद के निकट पहुँचता जाता है। ईश्वर हमसे दूर नहीं है, मुक्ति बिलकुल पास है, पर उसका ठीक स्थान न जानने के कारण इधर-उधर ढूँढ़ते बहुत दिन हो गये और उसके अभाव में वह बहुत दुःख अनुभव करता रहा। जब एक दिन उसे पता चला कि कण्ठा तो मेरे गले में ही बंधा हुआ था, पर मैं उसे भूल गया था। स्मृति आते ही उसका भ्रमजन्य दुःख दूर हो गया। बिजली के निगेटिव और पॉजिटिव तार आस-पास रहते हुए भी जब तक एक दूसरे को छूते नहीं, तो बिजली पैदा नहीं होती और उससे बत्ती जलना, पंखा चलना आदि कुछ भी काम नहीं होता। इसी प्रकार परमात्मा की सत्ता की झाँकी जब आत्मा के अन्दर की जाती हैं, तो वह पापी जीवन रहकर उन गुणों से परिपूर्ण हो जाता है, जो परमात्मा में है। बिजली के दोनों तार एकत्रित होते ही जैसे प्रचण्ड शक्ति-स्रोत फूट पड़ता है, ठीक वैसे ही आत्मा और परमात्मा की एकता का जिस घड़ी बोध होता है ‘सोऽहम्, शिवोऽहम्’ की हुँकार करता हुआ जिस घड़ी आत्मा का सिंह दहाड़ता है, उस समय पाप-ताप, कल्मष, कषाय, राग-द्वेष, शोक-संताप, सारे के सारे पशु दुम दबाकर भाग जाते हैं, फिर उनका ढूँढ़ने पर भी पता नहीं लगता। सूर्य को देखकर अंधेरा जैसे पलायन कर जाता है, उसी प्रकार आत्मा की ‘सच्चिदानंदोऽहम्’ दहाड़ सुनकर भव बंधन टूक-टूक हो जाते हैं। अखण्ड आत्मा का बोध ऐसा ही चमत्कारपूर्ण है।

‘अखण्ड जीवन’ का विज्ञान यह है कि आत्मा का एक ही जीवन है, जो निरन्तर अबोध गति से चल रहा है। मृत्यु नाम की कोई वस्तु आत्मा को छू भी नहीं सकती, समयानुसार वस्त्र बदलने पड़ते हैं। हमारा वास्तविक जीवन असंख्य वर्षों का हैं और यह जीवन अभी बहुत समय तक इसी प्रकार चालू रह सकता है। कपड़ा कोई दस वर्ष में बदल जाना है, कोई सौ वर्ष में। अखण्ड जीवन पर विश्वास करने से हम मृत्यु-दुःख से छूट जाते हैं। फिर वह स्वाभाविक वस्तु प्रतीत होती है, उससे डरने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता। अखण्ड जीवन का विश्वासी व्यक्ति इस क्षणभंगुर शरीर के लिये अनर्थों का सम्पादन नहीं कर सकता। उसे वस्त्र की अपेक्षा शरीर की चिन्ता होगी। कपड़े के लिये शरीर का नाश उसके द्वारा नहीं होगा। ऐसा व्यक्ति अच्छी तरह समझ जाये कि वर्तमान न तो मेरा शरीर है और न वर्तमान जीवन मेरा जीवन है। आत्मा का जीवन अब तक इतना हो चुका है कि इसकी गणना लाख-करोड़ वर्षों में नहीं की जा सकती। चौरासी लाख योनियोँ के कितने चक्कर न जाने अब तक हो चुके हैं और न जाने कितने अभी और करने होंगे इस वास्तविक जीवन में आज का जीवन तो ऐसा है जैसे दिन में एक मिनट। एक मिनट के सुख के लिये दिन भर का दुःख कौन सहेगा? इसलिये अखण्ड जीवन में विश्राम करने वाला बहिर्मुखी वृत्ति छोड़कर अन्तर्मुखी हो जायेगा और महान जीवन का हर घड़ी ध्यान रखता हुआ वर्तमान के क्षणिक सुख और अनन्त दुख का विचार करके पाप-कर्मों से बचा रहेगा। इस प्रकार सहज ही उसका जीवन निष्पाप वृत्तियों से भर जायेगा।

‘अखण्ड जगत’ का तत्वज्ञानी जानता है कि जड़ पदार्थ अपने स्थान पर रहेंगे, वे चैतन्य के साथ जुड़ नहीं सकते। जिस प्रकार जड़ तत्व भी अखण्ड है। सोना, चाँदी आदि धातुएं, जमींदारी, जागीर आदि भूमि खण्ड, मोटर, गाड़ी आदि वाहन षट् रस भोजन, सुन्दर, असुन्दर शरीर यह सभी वस्तुएं जगत के जड़ तत्वों के स्वरूप हैं। पंच भूत अखण्ड है। इनकी अनुभूतियाँ से हर्ष-शोक प्राप्त भले ही कर लें पर यह अपने नहीं हो सकते। क्योंकि जड़ सत्ता से खण्डित होकर चैतन्य में जुड़ने की शक्ति इनके अन्दर नहीं है। धन-दौलत को कोई अपना साथी नहीं बना सकता। चाँदी-ताँबे के टुकड़े इसी पृथ्वी के साथ पैदा हुए हैं और इसी के साथ तक रहेंगे। अब तक हमारे जैसे अगणित जीव उन पर अपना अधिकार जमाकर तथा छोड़ते-छोड़ते हुए चले गये। फिर हम कैसे उन्हें स्थायी रूप से अपना बना सकते हैं। स्त्री पुत्रों के शरीर भी भौतिक तत्वों के हैं। ऐसे शरीर रूपी बबूले इस विश्व सागर के अंतर्गत क्षण-क्षण में करोड़ों उत्पन्न होते और नष्ट होते हैं। अज्ञानी लोग बबूले के उठते समय खुशी से नाचते हैं और टूटते ही शिर धुन-धुन कर रोते हैं, ज्ञानवान प्रभु की इस विचित्र कारीगरी को देखकर प्रसन्न होता है और नाश-निर्माण की लीला को रसपूर्वक देखता है। जगत के जड़ और नाशवान स्वरूप को वह ठीक दृष्टि से देखता और इसकी अखण्डता पर विश्वास करता हुआ मोह जंजाल में नहीं फंसता। इसके विपरीत अखण्ड जगत तत्व के अपरिचित व्यक्ति जड़ पदार्थों को अपना समझकर जेब में भरना चाहता है। पर्वत को मुट्ठी में और सागर को चुल्लू में भरना चाहता है पर भला ऐसा कैसे हो सकता है। जब दुष्पूर तृष्णा के सामने असंभवता की असफलता उपस्थिति होती है और वह मोह जनित दुख शोक से छटपटाने लगता है। जगत को अखण्ड समझने न समझने का यही भला-बुरा फल प्राणी भोग रहे हैं और उसी से बंध मोक्ष प्राप्त कर रहे हैं।

सत्य नारायण के इस त्रिविधि स्वरूप को समझने से आत्मा को अविलम्ब परमात्मा की प्राप्ति होती है और वह ईश्वर दर्शन का लाभ उठाता हुआ परम पद का अधिकारी हो जाता है।


प्रेम में परमेश्वर

(अखण्ड प्रवाह, अखण्ड आत्मीयता, अखण्ड यज्ञ)

भगवान सत्यनारायण के हाथ में प्रेम रूप कमल पुष्प और दूसरे हाथ में न्याय रूप गदा अवस्थित है। पुष्प की उपमा प्रेम से बहुत सोच समझ कर दी गई है। निर्दोष, पवित्र, सुन्दर कोमल, सुगंध, चित्ताकर्षक गुणों वाला पुष्प दिखाई पड़ते ही हृदय में एक गुदगुदी पैदा करता है, बरबस चित्त चाहता है कि उसे जी भर कर देखें, पास रखें और स्पर्श करें। प्रकृति की आध्यात्मिक चेतना का पुष्प ही प्रतिनिधित्व करते हैं, वे इस बात की सूचना देते हैं कि हमारे पीछे महत्व पूर्ण फल इसी डंठल पर आ रहे हैं और उन फलों के अंतर्गत हमारे जैसे अनेकानेक पुष्प में फसल खिलाने की क्षमता होगी। संसार में कोई ऐसा नहीं है जिसे पुष्प प्रिय न हो, क्योंकि उसके अन्दर मिठास का बड़ा भारी भण्डार छिपा पड़ा है। देखने में मिठास, सूँघने में मिठास, चारों ओर उनमें मिठास ही मिठास है। मधु-मक्खियाँ तो इस सूक्ष्म मिठास को स्थान रूप में भी ले आती हैं, फूलों को चूस-चूस का शहद से अपने छत्ते भर लेती हैं।

प्रेम चैतन्य आत्मा के सर्वोत्तम गुणों का प्रतिनिधित्व करता है। जड़ वस्तुओं का यह नियम है कि वे खिंचकर आपस में एक दूसरे से मिलने का प्रयत्न करती हैं, धूलि में मिले हुए धातुओं के कण आपसी आकर्षण शक्ति के बल से खिंच-खिंच कर एक स्थान पर इकट्ठे होने शुरू होते हैं और एक दिन बड़ी खानें जमा हो जाती हैं। यह आकर्षण शक्ति चैतन्य तत्वों में और भी तीव्र होती है। जड़ तत्वों को देखिए उनका जीवन एक दूसरे को कुछ दान करने और प्रेम से निकटस्थ होने के लिए हर घड़ी क्रियाशील हो रहा है। नाले-नदियों के साथ अपने को आत्मसात् कर देने के लिए दौड़ रहे हैं और नदियाँ सागर की ओर भागी जा रही हैं। इनमें से कोई अपने संकुचित स्वार्थ में तल्लीन नहीं है, वरन् अपने से अधिक के साथ तल्लीन होकर ‘अधिकस्य अधिकतम फलम्’ का लाभ उठाने के लिए उद्योगशील है। जब पानी के छोटे-बड़े सभी स्रोत समुद्र के लिए सर्वतोभावेन दौड़ते हैं तो समुद्र भी उसी नीति का अनुसरण करता है। बादलों को वह अपनी सम्पत्ति देता है ओर वे प्रेमी बादल उस भार को अपने कंधे पर लादकर सृष्टि के ऊपर बरसा देते हैं, इस प्रकार उन नदी-नालों का तारतम्य यथावत जारी रहता है। यह अखण्ड प्रवाह जिस दिन खंडित हो जायेगा, उसी दिन संसार में त्राहि-त्राहि मच जावेगी। अपनी योग्यताओं को जड़ जगत में कोई अपने लिए नहीं रोके रखता वरन् पवित्र हृदय से दूसरों के देने के लिए निरन्तर उद्योगशील रहता है। आत्मा सबसे चैतन्य तत्व है, यह आकर्षण उसमें सबसे अधिक है। दूसरों के पक्ष में अपने क्षणिक स्वार्थ को त्यागकर उसके साथ आत्मसात होने का उसमें ईश्वर प्रदत्त स्वभाव शाश्वत काल से चलता आता है। एक मनुष्य दूसरे को अपनी योग्यतायें सदैव देता है। घर-घर में देखिए माता-पिता अपनी सन्तान के लिए कितना आत्म त्याग करते हैं। पति, पत्नि आपस में कितने उदार दानी होते हैं। यह अखण्ड प्रवाह सृष्टि को सुव्यवस्थित रखे हुए हैं। जिस दिन आत्मदान की शृंखला टूट जायेगी, उसी दिन प्रलय के दृश्य उपस्थित हो जायेंगे।

अखण्ड आत्मीयता प्रेम की दूसरी सीढ़ी है। संसार में विभिन्न आकृति के प्राणी दृष्टिगोचर होते हैं फिर भी उनकी आत्मीयता अखण्ड है। पराया इस दुनिया में कुछ नहीं, सब अपना है, या अपना कुछ नहीं सब पराया है, चाहें जैसे कहिए भाव एक ही है। परिवार का सबसे बड़ा और उत्तरदायी वृद्ध पुरुष सारे परिवार को सुव्यवस्थित रखने की अपनी जिम्मेदारी को समझता है। इसलिए उसे अपना ध्यान बहुत ही कम रहता है। और कुटुम्ब वालों की समस्याएं सुलझाने में सारी शक्ति खर्च करता है। वह बीमार है दवा चाहिये। उसे स्कूल जाना है फीस चाहिये। उसका विवाह है कपड़े चाहिये आदि सब किसी का ध्यान रखता है और यथावत सारी व्यवस्था करता है। इस प्रकार सारी सृष्टि के साथ आत्मीयता जोड़ लेने से दूसरों का सुख-दुख अपना सुख-दुख बन जाता है। वह जानता है कि सारी जाति एक ही सूत्र में बंधी हुई है, जब तक संसार में पाप बढ़े हुए हैं तब तक मेरा भी छुटकारा नहीं हो सकता। हम में से हर एक इस उत्तरदायित्व से बंधा हुआ है कि पड़ोसियों की शाँति और सुव्यवस्था में अधिक से अधिक सहयोग दें। जो अपने इस कर्त्तव्य को भूलकर दूसरों को पाप पंक में फंसने देता है, वह स्वयं ही उसके लिये उत्तरदायी बनता है और उसका फल भोगता है। किसी के पड़ोस में आग लगे और वह खड़ा-खड़ा देखता रहे तो कुछ देर बाद वह अग्नि उसके घर की तरफ बढ़ेगी और पड़ोसी के समान उसे भी वैसे ही जला देगी। दैवी दुर्घटनाएं ऐसी ही सार्वभौम पापों का परिणाम होती है। जब संसार में पाप अधिक बढ़ते हैं तो उनकी दुर्गन्धि से अखिल आकाश भर जाता है फिर उसकी प्रतिक्रिया से जब दुर्भिक्ष, भूकम्प, महामारी, युद्ध आदि दैवी दुर्घटनाएं होती हैं तो उसका फल सभी को भोगना पड़ता है। बहुत से निर्दोष व्यक्ति भी इस चक्र में पिस जाते हैं। वास्तव में वे निर्दोष नहीं है, क्योंकि एक के पापों का फल दूसरों को भी भोगना पड़ता है। पिता का कर्ज जब पुत्र से वसूल कर लिया जाता है तो भाई के अपराध का दण्ड भाई को भी दिया जा सकता है। प्रभु ने हमें अपना राजकुमार बनाकर इस सृष्टि में सुव्यवस्था रखने के लिये भेजा है। यदि हम अपना कर्त्तव्य भुला दें और पाप-तापों को बढ़ने दें तो पिता के दरबार में हमें वैसे ही दोषी ठहराया जायेगा, जैसे भागी हुई सेना के सेनापति को अपमानित किया जाता है। जिसके बगीचे में पेड़ों की दुरवस्था हो रही हो, अच्छे पेड़ सूख रहें हों और कटीले झाड़-झंखाड़ बढ़ रहे हों, उस माली को उसका मालिक कभी अच्छी दृष्टि से नहीं देखेगा। परमात्मा को प्रसन्न करने का यही तरीका है कि हम उसकी फुलवारी को हरा-भरा रखें और अधिक से अधिक सुन्दर बनाने में अपनी सारी शक्ति लगा दें। दूसरों को अपना समझकर हम उन्हें एक प्रकार से खरीद लेते हैं, जिसे हम अपना समझते हैं वह अवश्य ही हमें अपना समझेगा। इस प्रकार जितना ही हम प्रेम सम्बंध अधिक बढ़ाते हैं उतना ही खुदगर्जी को दूर करके अपनी महत्ता का अभ्यास बढ़ाते हैं। परमात्मा से प्रेम करने का यही तरीका है कि उसकी चलती-फिरती प्रतिमाओं से प्रेम करें। जो चैतन्य नर नारायणों की सेवा करना छोड़कर जड़ पदार्थों के टुकड़ों पर सिर पटकता फिरता है, उसकी बुद्धि को जड़ ही कहा जायेगा। दूसरों को अपना समझना और उनके साथ आत्मीयता का व्यवहार करना इसमें धर्म का सारा मर्म छिपा हुआ है।

प्रेम का तीसरा स्वरूप है अखण्ड ब्रह्मयज्ञ। साधारण शुभ-कर्मों में और यज्ञ में यह अन्तर है कि साधारण कामों को तो सब लोग स्थूल नेत्रों से देख लेते हैं और उसकी भलाई-बुराई का मोटी बुद्धि से निर्णय कर लेते हैं पर यज्ञ के संबंध में ऐसी बात नहीं है। अग्निदेवों को यह कहा जाता है पर केवल वे ही यज्ञ नहीं है, दूसरे यज्ञ भी है। गीता में ज्ञान, यज्ञ, ब्रह्म-यज्ञ, जप-यज्ञ अनेक प्रकार के यज्ञ बनाये गये हैं। हाँ अग्निहोत्रों से यज्ञ के वास्तविक स्वरूप का निर्माण किया जा सकता है। अग्नि में बहुमूल्य सामग्री को हवन करना स्थूल बुद्धि वालों की दृष्टि में एक प्रकार का व्यर्थ काम है, इसमें उन्हें शायद ही कुछ लाभ प्रतीत हो। परन्तु विवेकवान तत्वदर्शी जानते हैं कि इससे अधिक लाभप्रद और कोई कार्य शायद ही हो। हवन किये हुए पदार्थ सूक्ष्म होकर उच्चरित मंत्रों की सद्भावना के साथ मिश्रित होकर अखिल आकाश तत्व में व्याप्त हो जाते हैं और सृष्टि के अगणित, जीवों को नाना प्रकार के सुख पहुँचाते हैं। इस प्रकार एक रुपये की हवन सामग्री से संसार का जितना लाभ हो सकता है, वह स्थूल प्रकार के हजारों रुपये के लाभ से अधिक है। पर इस महत्व को समझने वाले बहुत ही कम होते हैं। इसी प्रकार शुभ संकल्पों का यज्ञ इतना उच्च कोटि का है कि इसकी समता में बड़े-बड़े सेवा उपकार और दान पुण्य तुच्छ है। सदैव शुभ विचारों की सामग्री जीवन यज्ञ में होमने का ब्राह्म यज्ञ विश्व के सम्पूर्ण यज्ञों में ऊँची से ऊँची कोटि का है। विचार एक मूर्तिमान पदार्थ है, जो भाप की तरह उड़ता है और बादलों की तरह बरसता है। जब हमारे मस्तिष्क में से कोई भला या बुरा विचार निकलता है, तो वह आकाश में उड़ जाता है और इधर-उधर घूमता फिरता है। रेडियो स्टेशन से ब्रॉडकास्ट की हुई लहरें उन स्थानों पर साफ-साफ सुनाई देती है, जहाँ रेडियो सैट लगे हुए हों। इसी प्रकार वे विचार उन लोगों के मस्तिष्कों से टकराते हैं, जिनके मन में कुछ-कुछ वैसे ही भाव उठ रहे हों। यदि हम सदैव भले विचार करते हैं तो वे विचार उन लोगों को बहुत बड़ा प्रोत्साहन देंगे, जो भलाई करने की बात कुछ-कुछ सोचते हैं। विचारों का कभी नाश नहीं होता और उनकी दौड़ने की शक्ति इतनी तेज है कि कुछ ही क्षण में पृथ्वी के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँच जाते हैं। कोई व्यक्ति सत्य मार्ग पर चलने का विचार करता है, उसी समय आपका किसी अन्य समय में फैलाया हुआ विचार उसके पास पहुँचता है- उसे दुगना उत्साहित कर देता है। फलस्वरूप वह शुभ कर्म करता है और आगे के लिए भी उसी मार्ग का अभ्यासी हो जाता है। उसके प्रयत्न से अन्य लोगों का ऐसे ही उपकार होता है, यह बेल बढ़ती है और संसार में दैवी सम्पत्ति का विकास होता है। धर्म की उन्नति होती है, दुनिया में सुख शाँति बढ़ती है। इतना बड़ा काम आपके उस छोटे से विचार से ही हुआ था, इसलिए उसका बहुत बड़ा पुण्य फल आपको मिलेगा।

स्वयं सदैव शुभ विचार करना, सत्य, प्रेम, न्याय, उदारता, सहानुभूति, दया आदि की भावनायें मन में धारण करना और ऐसे ही विचार दूसरों के मन में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भरने के प्रयत्न करते रहना ब्रह्मयज्ञ है। अखण्ड शब्द इसके साथ में इसलिए जोड़ा गया है कि कभी शुभ और कभी अशुभ कभी भले, कभी बुरे विचार करने से उतना लाभ नहीं होता। जैसे भले विचार संसार का कल्याण करते हैं, वैसे ही बुरे विचार अनिष्ट भी करते हैं। कभी कष्ट कभी अनिष्ट, कभी पूरब को कभी पश्चिम को, यह तो कोई अच्छी बात नहीं हुई। इसलिए जो कार्य करना चाहिए, उसमें न तो ढील होनी चाहिए और न उपेक्षा। जैसे हम रोज शौच जाते हैं, स्नान करते हैं, भोजन करते हैं, सोते हैं वैसे स्वयं अच्छे विचार करें और दूसरों को अच्छे उपदेश दें। विचारों की अनन्त शक्ति का अनुभव करें और उनके प्रचार करने का जब भी अवसर मिले, तभी प्रयत्न करें। घर का, बाहर का, परिचित, अपरिचित, विद्वान, मूर्ख किसी से भी वार्तालाप करने का अवसर मिले तभी उससे सत्य प्रेम और न्याय की चर्चा करें। उसे बुराइयाँ छोड़ने और भलाइयाँ सीखने की सलाह दें। इस सुधार द्वारा हम उसके साथ सच्चे प्रेम का परिचय दे सकेंगे। किसी को मिठाई दी जाय, तो वह समझेगा कि इसने मुझ से प्रेम किया। किन्तु ब्राह्मण इस मूर्खता को पहचानता है और वह मिठाई के द्वारा नहीं, विचार के द्वारा उसे ठोस लाभ पहुँचाना चाहता है। दुनिया यज्ञ का महत्व नहीं समझती, न समझे, पर एक आध्यात्मिक व्यक्ति को उसके अन्दर बड़ा भारी लाभ दृष्टिगोचर होता है। हम अखण्ड ब्रह्म यज्ञ को निरन्तर चालू रख कर प्राणी मात्र के साथ सर्वोच्च कोटि का प्रेम प्रदर्शन करते हुए अपना कल्याण कर सकते हैं।

प्रेम की तीन अंगी उपासना कर, इस त्रिवेणी में जब हम आत्मा को स्नान करावेंगे, तब पुण्य-पूत दृष्टि द्वारा परमेश्वर की सन्निकटता प्रत्यक्ष दिखाई देगी।


न्याय तुला का संतुलन

(अखण्ड शक्ति, अखण्ड समता, अखण्ड शमन)

भगवान सत्य के एक हाथ में पुष्प और दूसरे में गदा है। गदा का तात्पर्य न्याय से है। अब हमें न्याय तत्व पर गंभीरता पूर्वक विचार करना होगा और देखना होगा कि जिस अन्याय के कारण प्राणिमात्र चीत्कार कर रहे हैं और जिसकी क्रूर पीड़ा से सृष्टि की अन्तरात्मा कराह रही है, वह अन्याय कहाँ से उत्पन्न होता है और उसका मूल उद्गम स्थान कहाँ है?

विशिष्ट मनन के पश्चात प्रतीत होता है कि अन्याय की जननी अशक्ति है। अत्याचारी उतना बड़ा पापी नहीं है, जितना कि अशक्त। प्रभु ने अनन्त शक्तियों का भण्डार मनुष्य को देकर उसे इस भूमंडल पर निर्भयता के साथ विचरण करने के लिए भेजा है। उसके अन्दर इतना तेज एवं पराक्रम परिपूर्ण है कि कोई उसकी ओर आँख उठाकर नहीं देख सकता। जो व्यक्ति अपनी ईश्वरदत्त सत्ता को गंवा देता है, वह अवश्य ही बड़ा भारी पापी है। इस पाप के फल से उसे छुटकारा नहीं मिल सकता। प्रकृति अपने कठोर नियमों के अनुसार उसे उसी क्रम से कूट-कूट कर दण्ड देती है, जिस क्रम से कि उसने अपनी सामर्थ्यों को नष्ट किया होता है। जो जितना निर्बल है, उसे उतना ही यह प्रकृति अधिक सतावेगी। रोना, चिल्लाना, गाली देना, बुरा बताना, व्यर्थ है, इससे कुछ होना जाना नहीं है। भेड़ के बालों को एक गड़रिये से बचा लिया जाय, तो दूसरा काट लेगा। इसलिये रीछ बनना होगा, जिसके बालों की तरफ दृष्टि उठाने की भी किसी की हिम्मत न पड़े। ‘शक्ति’- यह हर प्राणी का जन्म-सिद्ध अधिकार है। आध्यात्मिक, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक दृष्टि से हमें बलवान होना चाहिए। शक्ति की आराधना करके समर्थ बनना चाहिए। आत्मस्वरूप को पहचान कर, आत्म विश्वास और आत्म गौरव की भावनाएं हृदय में कूट-कूट कर भरना, शरीर को निरोग और बलवान बनाना, मन को सुसंस्कारित, सुव्यवस्थित, विद्वान, विचारवान और सुलझा हुआ बनाना, धन कमाने एवं उसका सदुपयोग करने के स्रोतों को पहचानना और खोलना, सामाजिक रूढ़ियों और कुरीतियों को हटाकर जन समाज में सुदृढ़ संगठन पैदा करना, राजनैतिक स्वाधीनता प्राप्त करना, अन्तर्राष्ट्रीय बन्धु भाव प्रचलित करना, यह सब कार्य एक शक्ति पैदा करते हैं। देखने में यह विभिन्न दशाओं की शक्तियाँ भिन्न-भिन्न प्रतीत होती हैं, पर यथार्थ में एक ही शक्ति के विभिन्न स्वरूप हैं। उसी अखण्ड शक्ति की उपासना करना मनुष्य का सबसे प्रथम कर्त्तव्य है। शक्ति प्राप्त किये बिना तो हम मनुष्य भी नहीं कहला सकते। अवतार-प्रेमियों को चाहिए कि सबसे प्रथम शक्ति की आराधना करें और बल को बढ़ावें।

सब आत्माएं समान हैं। विश्व में कोई प्राणी न छोटा है और न बड़ा। सब समान हैं, स्वतंत्र हैं, स्वावलंबी है। बेशक, इनमें से किसी की योग्यता और शक्ति अधिक होती है, उसी दृष्टि से उसकी आवश्यकताएं भी बढ़ी हुई होती हैं। हाथी का भोजन घोड़े से अधिक है, ढ़ाक के पौधे से नींबू के पौधों को अधिक पानी चाहिए। यह स्वाभाविक विषमताओं की स्वाभाविक पूर्ति हुई। मनुष्य को भी उसकी योग्यता भेद से कुछ अधिक सुविधाओं की आवश्यकता होती है। संसार में सब दृष्टियों से पूरा-पूरा साम्यवाद नहीं हो सकता, क्योंकि ये अस्वाभाविक है। परन्तु मनुष्य के कुछ स्वाभाविक अधिकार हैं, जो उसे प्राप्त होने ही चाहिए। स्त्रियों और अछूतों के साथ हिन्दू जाति में वह मानवोचित व्यवहार ठीक तरह से प्रयोग नहीं किया जाता। गरीबी और अमीरी का भेदभाव इतना बढ़ जाता है कि, एक तो अनुचित महत्ता प्राप्त करता है कि दूसरा अनुचित हीनता स्वीकार करता है। दास-दासियों को पशुओं की तरह सम्पत्ति समझना, उन्हें खरीदना, बेचना ऐसी ही जघन्य विषमता है। रंग-भेद, शासक और शासित जातियों का अधिकार भेद, इसी प्रकार की हेय असमानता है, जिसका विरोध होना चाहिए। विद्वान, मूर्ख, सदाचारी-दुराचारी, सुर-असुर इनमें भेद होना चाहिए। परन्तु किसी को उसके प्रारंभिक अधिकार से वंचित न करना चाहिए। प्राचीन काल में युद्ध के समय यदि शत्रु की तलवार टूट जाती थी, तो विरोधी उस पर तब तक प्रहार नहीं करता था, जब तक कि वह पुनः तलवार प्राप्त न कर ले। स्त्रियों पर हाथ उठाना यों पाप है कि वे मुकाबला करने की उतनी ही क्षमता नहीं रखती। निर्बलों को बलवान लोग इसलिए क्षमा कर देते थे कि वह उनकी टक्कर का नहीं है। अंधे, रोगी, अपाहिज और बोझ से लदे हुए मुसाफिरों के लिए, राजा को भी हटकर सड़क खाली करनी पड़ती थी, हर एक नागरिक को राजा की समालोचना करने और राज्य कार्यों में हस्तक्षेप करने का पूरा-पूरा अधिकार था। एक अशिक्षित धोबी ने राम जैसे उच्चकोटि के शासक के शासन में अपनी बुद्धि के अनुसार जो दोष पाये थे, वे निर्भयता पूर्वक प्रकट किये। नागरिकता का हर मनुष्य को समान अधिकार है और मानवीय जन-सिद्ध सत्यों में हर एक व्यक्ति को समानता प्राप्त होनी चाहिए। वैसे अपने कर्मों के अनुसार ऊंच-नीच बनना यह अपनी स्वतंत्र योग्यता का फल है, किन्तु मानवता का समान अधिकार सब को प्राप्त होना चाहिए। यह आद्य और अखण्ड समता स्वयं प्राप्त करना और दूसरों को देना आवश्यक है। न्याय का संदेश है कि इस अखण्ड समता का सर्वत्र प्रचार होना चाहिए।

न्याय का तीसरा चरण है अखण्ड शमन। संसार तीन तत्वों का बना हुआ है। सत और रज से बनी हुई सृष्टि के लिए सत्य और प्रेम का व्यवहार पर्याप्त है, किन्तु तामसी तत्वों के लिए न्याय दण्ड की गदा चाहिए। दण्ड का अस्त्र काम में लाये बिना सृष्टि का संतुलन ठीक नहीं रह सकता। माली पौधों को खाद पानी से भरा पूरा रखता है, पर साथ ही खुरपी और कैंची भी तेज किये रहता है। जिस पौधे की डालियाँ टेढ़ी-मेढ़ी चलीं, कि उसने कैंची से उन्हें काटा। जो पौधा निर्बल, अशक्त और रोगी हुआ, उसे उखाड़ कर फेंका। निकम्मे झाड़-झंखाड़ तो उसकी खुरपी के नीचे हर घड़ी पिसते रहते हैं। शाम को उखाड़े हुए घास-पात के इकट्ठे रखे गये ढेर को देख कर कोई अल्प बुद्धि वाला, अनायास ही कह सकता है कि यह माली बड़ा अन्यायी है। छोटी सी बात के लिए इसने इतने पौधों का नाश कर डाला। पर माली जानता है कि उसका कार्य सद्वस्तु की वृद्धि करना और असद् वस्तु को काम करना है। वह दृढ़तापूर्वक इसे ही करेगा, इस कार्य में वृद्धि और विनाश जो होता है, उसकी ओर वह ध्यान नहीं देता। भगवान राम और कृष्ण के सामने ऐसी ही समस्याएं उपस्थित थीं। एक सीता दुखी होगी, या राम और सीता दो दुखी होंगे इसके लिए रावण जैसे विक्षन और उसके इतने बड़े कुटुम्ब को क्यों मारा जाय? एक के बदले लाख की हत्या क्यों हो? ठीक इसी तरह का सवाल कृष्ण के सामने उस समय आया, जब अर्जुन ने गाँडीव पटक कर कहा- ‘इतनी बड़ी सेना और स्वजन, सम्बंधी, गुरु आचार्य, बन्धु-बान्धवों का संहार करने पर हमें जो सुख मिलेगा, उसकी मैं इच्छा नहीं करता और मैं युद्ध नहीं करूंगा।’ किसे कितनी पीड़ा होगी, यह पैमाना गलत है। सत्य यह है कि सत् की वृद्धि और असत् का विनाश होना चाहिए, फिर भले ही कोई भी लोग सुखी होते हों, कोई भी दुखी होते हों। रावण या कौरवों के कुल का नाश न करने से अनीति बढ़ती, पाप-कर्म करने वालों को प्रोत्साहन मिलता और अकेले राम सीता या पाण्डव ही दुखी न होते, वरन् संसार के बहुत से भले पुरुषों को संकट झेलना पड़ता। इसलिए एक के बदले अनेक को, या अनेक के बदले एक को दण्ड मिलता हो, तो उसमें विचलित न होना चाहिए।

सर्प का विष बढ़ेगा। पवित्र हृदय का प्रेमी ठाकुर जब देखता है कि फोड़ा निर्बल होता जाता है तो वह निर्दयता पूर्वक उसमें चाकू घुसेड़ देता है और सड़े हुए माँस को काटकर अलग फेंक देता है ताकि वह विकृत भाग स्वस्थ अंग को भी रोगी न कर दे, एवं बीमार को इस पीड़ा के उपरान्त राहत मिल जाय।

कई बार प्रश्न उठता है कि दंड के योग्य शक्ति न होने पर किस प्रकार वैसा किया जा सकता है। हमें समझना चाहिये कि विरोध और असहयोग के दो सर्व सुलभ तरीके ऐसे हैं जिनसे बड़े से बड़े दुष्टों को बहुत अंशों में झुकाया जा सकता है। इससे ऐसी भूमिका तैयार होती है जो किसी न किसी प्रकार उसे बहुत जल्द नीचा झुका देती है। इन अस्त्रों का महत्व जिसने समझा है वे समझते हैं कि इनमें कितनी प्रचण्ड शक्ति भरी हुई है। और निर्भय तथा व्यापक विरोध प्रचार से धूर्तों के पाँव कैसे उखड़ जाते हैं कारण यह है कि दुष्ट व्यक्ति चाहे जैसा सशक्त प्रतीत होता है पर वास्तव में उस के अन्दर पाप का साम्राज्य होने के कारण कायरता ही भरी रहती है। घर के मालिक का एक लड़का भी जब खाँसने लगता है तो चोर को भागते ही बनता है। पाप के अन्दर इतनी निर्बलता होती है कि सच्चे विरोध ओर असहयोग को वह सहन नहीं कर सकता। इसलिये किसी के पापों को छिपाने या सहन करने की अपेक्षा उसे प्रकाश में लाना चाहिये किन्तु यदि समझा देने से ही उसके सुधर जाने की आशा हो तो उसे इस प्रकार का दंड देने की आवश्यकता नहीं है। अन्याय का विरोध करना सत्य का ही एक अंग है। दुष्टता के विरोध में कष्ट सहन करना पड़ता है। कष्ट सहने से डरना न चाहिये और तप समझ कर सहर्ष स्वीकार करना चाहिए।


Quotation

जिन विचारों का कोई उद्देश्य ही नहीं है उन सब को त्याग देना चाहिये।


दूसरों पर दया करो

(ऋषि तिरुवल्लुवर)

महान पुरुषों के पास पैसा नहीं होता और न वे उसकी इच्छा करते हैं क्योंकि दया से लबालब भरा हुआ हृदय उनके पास कुबेर के भण्डार की तरह मौजूद रहता है। कहते हैं कि इस दुनिया में गरीब का कोई ठिकाना नहीं। निश्चय समझो परलोक में उनका कोई ठिकाना न होगा जिनके मन में दया नहीं है। दरिद्र मनुष्य एक दिन सम्पन्न हो सकता है परन्तु वह भिखमंगा इसी तरह दर-दर पर दुत्कार खाता फिरेगा जिसका हृदय दया से रहित है सत्य को कौन प्राप्त करेगा? ईश्वर के दर्शन कौन करेगा? वह जिसके हृदय में दया है। निर्दय मनुष्य तो अपाहिज है, वे अपनी बगल में रखे हुए उत्तमोत्तम पदार्थों को भी न ले सकेंगे। अरे ओ निर्दइयों, ठहरो! दूसरों को सताने से पहले जरा सोचो तो सही कि जब इसी तरह तुम भी सताये जाओगे तब तुम्हारी क्या दशा होगी? हाय! मनुष्य दया धर्म का परित्याग करके क्रूरता और पाप के पथ पर आरुढ़ क्यों होते हैं? क्या वे इतना भी नहीं जानते कि इन दुष्ट कर्मों का फल उन्हें जन्मान्तरों तक घुट-घुट कर भुगतना पड़ेगा। धरती माता साक्षी है कि नारकीय यंत्रणाएं पापियों के लिये ही हैं, दयालुओं के लिये नहीं।

जिनके हृदय में दया है वे अन्धकार में न भटकेंगे। इसलिए हे आँख वालो। देखो और अपने मन में दया को स्थान दो। दूसरों के साथ दयालुता का व्यवहार करो।


Quotation

झूठा आदमी अन्त में सिवाय अपने और किसी को धोखा नहीं दे सकता।


उपसंहार और चेतावनी

(नवधा भक्ति का तत्व ज्ञान)

गत जनवरी माह के अंक में सविस्तार यह बताया जा चुका है कि सतयुग के आगमन के साथ-साथ निष्कलंक सत्यनारायण का अवतार होगा। भगवती ज्ञानगंगा स्वर्गलोक से पहले भगवान शंकर के मस्तक पर उतरी थीं। पीछे भूलोक में प्रवाहित हुई। इसी प्रकार भगवान सत्यनारायण पहले आत्म-ज्ञानी और पूर्व संस्कारों के कारण आध्यात्म भूमिका में जागृत हुए मनुष्यों के मस्तिष्क में उतरेंगे। पीछे धीरे-धीरे उनका प्रभाव संसार में प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होने लगेगा। भगवान का स्वरूप और कार्यक्रम होगा यह पिछले तथा इस अंक में सविस्तार से वर्णन हुआ है।

सत्य, प्रेम और न्याय में से प्रत्येक के तीन-तीन विभाग करके एक ही सत्य को नौ रूपों में प्रदर्शित किया गया है।

सत्य- 1. अखण्ड आत्मा 2. अखण्ड जीवन 3. अखण्ड जगत?

प्रेम- 1. अखण्ड प्रवाह 2. अखण्ड आत्मीयता 3. अखण्ड यज्ञ।

न्याय- 1. अखण्ड शक्ति 2. अखण्ड समता 3. अखण्ड शमन। इनकी विस्तृत विवेचना यहाँ की जा रही है।

याद रखिये कि जो बात जैसी सुनी या देखी है उसे वैसा ही कह देना यह सत्य की बड़ी लंगड़ी-लूली व्याख्या है। कई बार, ऐसा सत्य पाप हो सकता और असत्य में पुण्य रह सकता है। ‘वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति’ ऐसा शास्त्र का मत है। विवेकपूर्वक की हुई हिंसा यदि हिंसा न मानी जायेगी तो विवेक के साथ धर्म बुद्धि से बोला हुआ झूठ भी झूठ न होगा। इसी प्रकार अविवेकपूर्वक जो अन्धाधुँध सत्य बोला जायेगा वह भी सत्य नहीं कहा जा सकेगा। सेना के गुप्त भेदों को प्रकट कर देने वाला सत्य-वक्ता न्यायालय में पापी ठहराया जायेगा और दण्ड का भागी बनेगा। इसलिये ‘सत्य बोलना’ केवल इतनी सी छोटी शिक्षा तो छोटे-छोटे बालकों के लिये हैं जो मिट्टी खा लेते हैं ओर कहते हैं कि हमने मिट्टी नहीं खाई। अखण्ड-ज्योति के पाठक अब वैसे बालक नहीं हैं। यदि ‘सत्य बोलिये’ इतना सा संदेश दिया जाय तो यह उनका अपमान करना होगा। ‘सत्य को पहचानिये’ आज का संदेश यह है। सत्य की शोध करना, सत्य के अन्वेषण में प्रवृत्त होना, सत्य का मनन करना और असत्य में से सत्य ढूँढ़ लेना यह कार्य है जो अवतार के भक्तों को करना होगा। प्रेम शब्द की व्यापकता महान है। सिनेमाबाज, छैल-छबीले लड़के, प्रेम के नाम पर व्यभिचार के जो गीत गाते फिरते हैं वह प्रेम नहीं है, यौन आकर्षण तो एक भौतिक प्रतिक्रिया है, जैसे भूख लगने पर रोटी की तरफ मन खिंचता है। कोई बालक रोटी खाने के लिये मचल रहा है तो यह नहीं कहा जा सकता है कि उसे रोटी के प्रेम की व्याकुलता है। यह मचलना तो उसकी शारीरिक भूख और जिह्वा इन्द्रिय की लोलुपता का सूचक है। प्रेम का अर्थ है- ‘आत्मा की वह तीव्र उदारता, जो अपने स्वत्वों को दूसरों के पक्ष में त्याग करने के लिये निस्वार्थ भाव में हर घड़ी व्याकुल रहती है।’ दूसरों को लाभ पहुँचाने के लिये छटपटाने वाली परोपकार की त्याग वृत्ति में प्रेम के दर्शन किये जा सकते हैं। अपने सुख, सौभाग्य, भोग, साधन के प्राप्त होने में प्रसन्न और नष्ट होने में दुखी होते समय लोग नाहक बेचारे प्रेम शब्द को काँटों में घसीटते हैं। इसी तरह न्याय शब्द का अर्थ सब को बराबर समझना नहीं है। जीव की उपयोगिता की दृष्टि से उसका स्थान नियुक्त करना और उसके मानवोचित अविकारों को देने में समयानुसार अधिक से अधिक उदारता का परिचय देने में तत्पर रहना न्याय की यह छोटी सी झाँकी है। अन्याय का कारण अशक्तता है। अन्याय की सृष्टि करने वाला वह व्यक्ति है जो निर्बल है, वही अत्याचार और अत्याचारियों का बाप है, इसलिये दुनिया में से अन्याय मिटाने का एक ही तरीका है और वह यह है कि हर आध्यात्मिक व्यक्ति शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, आर्थिक और राजनैतिक दृष्टि से बलवान बने। बलवान व्यक्ति ही अपने ऊपर और दूसरों के ऊपर होने वाले अन्याय को रोक सकता है। इसलिये शक्ति की उपासना करके बलवान बनने में न्याय की महत्ता छिपी हुई है। इस प्रकार सत्य, प्रेम और न्याय की त्रिगुण सृष्टि के अंतर्गत संपूर्ण सुधार आ जाते हैं, जिनकी आज संसार को आवश्यकता है। इन तीनों की पृष्ठ भूमि पर खड़े होकर हम सत्य का दर्शन कर और करा सकते हैं।

संक्षेप में सत्यनारायण की नवधा भक्ति हमें करनी होगी। यह नौ खण्ड इस प्रकार होंगे-

सत्य- 1. अखण्ड आत्मा 2. अखण्ड जीवन 3. अखण्ड जगत।

प्रेम- 1. अखण्ड प्रवाह 2. अखण्ड आत्मीयता 3. अखण्ड यज्ञ।

न्याय- 1. अखण्ड शक्ति 2. अखण्ड समता 3. अखण्ड शमन।

इस नवधा भक्ति द्वारा भगवान निष्कलंक सत्यनारायण का प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं और अपना जीवन सफल बना सकते हैं।


Quotation

जो मनुष्य दूसरे की सहायता के लिये आत्म त्याग करना जानता है, खुद कष्ट सह कर दूसरों को सुख पहुँचाता है, वह बुद्धिमान है, उसे उसकी इस बुद्धिमानी का भरपूर फायदा मिलेगा। सज्जन स्वभाव का एक भी व्यक्ति इस पृथ्वी पर भूखा नंगा नहीं देखा जाता।


मनुष्यता की झाँकी

एक बार एक नदी की बाढ़ में एक परिवार बहा जा रहा था। नदी के किनारे खड़े हुए एक धनी ने दर्शकों को संबोधित करते हुए कहा-इस परिवार को कोई बचा दे तो उसको मैं सौ रुपया इनाम दूँगा। एक गरीब नवयुवक कूद पड़ा, उसने जान को हथेली पर रख कर उन बहते हुए आदमियों को किनारे पर लगा दिया। धनी उसे रुपया देने लगा तो गरीब युवक ने कहा-’मैं अपने मनुष्यत्व को सौ रुपये में नहीं बेचता, मैंने अपना कर्त्तव्य पालन किया है। रुपयों की इन बेचारों को जरूरत है, इसलिये आप वह इन्हें ही दे दीजिये।’ आस्ट्रेलिया में एक बार हैजा फैला जिसमें बहुत आदमी मरने लगे। लोग डर के मारे एक दूसरे के पास नहीं जाते थे। सड़क पर एक लाश को ठेले पर रख कर कोई व्यक्ति फेंकने ले जा रहा था। आस्ट्रेलिया का राजा फ्राँसिस जब उधर से निकला तो उसने कहा-’मेरे प्रजाजन का उचित अन्त्येष्टि संस्कार होना चाहिये’ और वह स्वयं कब्रिस्तान में उसकी क्रिया-क्रम करने पहुँचा। सन् 1862 में वरकिन हैड नामक जहाज समुद्र में डूबा। उसमें 472 पुरुष और 166 स्त्री बच्चे थे। कप्तान ने नावों में स्त्री बच्चों को बिठा कर समुद्र में उतार दिया। और कप्तान सहित सब पुरुष वीरता पूर्वक जहाज के साथ डूबे गये उनमें से एक ने भी ऐसा आग्रह न किया कि हमें नावों पर बिठा दिया जाय।

सेना नायक सर राल्फ एक युद्ध स्थल में घायल होकर मृत्यु शय्या पर पड़े हुए थे। उनके आराम के लिये एक सिपाही का कम्बल सिर के नीचे लगा दिया गया। जब उन्हें होश आया और सिर के नीचे कम्बल देखा जो पूछा कि यह कम्बल किसका है? उन्हें बताया गया कि वह 41 नम्बर पलटन के डकंनराय सिपाही का है। सर राल्फ अन्तिम साँस ले रहे थे, पर उसने अपने दुःख की परवा न करते हुए हुक्म दिया कि इसी क्षण इस कम्बल को ले जाओ और उस सिपाही के पास पहुँचा दो, क्योंकि वह बेचारा इस कड़ाके की सर्दी में सिकुड़ रहा होगा।


दूसरों के लिए आत्मत्याग

(ले. श्री रामकृष्ण वर्मा, देहली)

तप और ब्रह्मचर्य की महिमा गाते-गाते कोई वेद-पुराण नहीं थकता। इन महान महत्त्वों का रहस्य मूढ़मति वाले कामी और कुटिल व्यक्ति नहीं जानते, पर महर्षि दधीचि ने इसे जाना था। उनका सारा जीवन तप और ब्रह्मचर्यमय ही रहा था। ब्रह्मचर्य के बिना इन्द्रिय लिप्सा शाँत नहीं होती और इन्द्रिय लिप्सा के बिना मन का संयम होना कठिन है। तप का उद्देश्य दुर्भावनाओं को नष्ट करना है। तपस्वी और ब्रह्मचारी व्यक्ति की आत्मा चंचलता त्याग कर ब्रह्म-परायण हो जाती है, यही तो मुक्ति का मार्ग है। महर्षि दधीचि ने पिण्ड और ब्रह्माण्ड के कल्याण के लिए इसी साधना को उचित समझा था। वे भगवती के तट पर ऐसी ही आध्यात्मिक साधना में संलग्न थे।

ईश्वरीय सृष्टि में अनादिकाल से कुछ ऐसा नियम चला आता है कि प्राणियों पर यदा-कदा विपत्तियाँ आती रहती हैं, इसके कई कारण हैं। मनुष्य में धैर्य और साहस आता है, सहन शक्ति बढ़ती है, उन्नति करने के लिए शक्ति में तीव्रता उत्पन्न होती है, अनुभव बढ़ता है, पापों का बोझ कटता है और भी न जाने कितने-कितने लाभ होते है। सुख की अपेक्षा दुख के लाभ हजार गुने अधिक है, इसलिये प्राणियों के न चाहने पर भी प्रभु इस कड़वी दवा को उन्हें पिला ही देते हैं, विपत्तियों आ ही जाती हैं। उस युग में देवताओं पर भी विपत्ति आई। वृत्तासुर के नेतृत्व में असुरों ने देवताओं पर हमला बोल दिया आसुरी शक्ति सदा ही दैवी शक्ति के मुकाबले में प्रबल दिखाई पड़ती है। इस बार देवताओं को हारना पड़ा, वे अपने त्राण के लिए उपाय सोचने लगे।

तत्त्वदर्शियों ने निर्णय किया कि आसुरी वृत्तियों का विनाश तप और ब्रह्मचर्य से बने हुए शस्त्र से ही कर सकते हैं। इसलिए तप और ब्रह्मचर्य की धातुओं से शस्त्र बनाना चाहिये। सब की दृष्टि महर्षि दधीचि के ऊपर जम गई। अपने समय के यही तो सर्वश्रेष्ठ तपस्वी एवं ब्रह्मचारी प्रख्यात थे। उनकी अस्थियों के द्वारा ऐसा वज्र बन सकता था जिससे भयानक से भयानक असुरों का सर्वनाश हो सके। महर्षि उस गोष्ठी में उपस्थित थे। उन्होंने दिव्य दृष्टि से देखा कि देवताओं की जिह्वायें बंद हैं, फिर भी नेत्र याचना की दृष्टि से उनकी ओर लगे हुए हैं। महर्षि ने परोपकार में अपना शरीर तक दे डालने का वह अक्सर आया देखा, तो प्रसन्नता की एक हलकी रेखा उनके होठों पर दौड़ गई। त्याग, सेवा और परोपकार के अवसर बड़े भाग्य से प्राप्त होते हैं। प्रभु को जिन आत्माओं का कल्याण करना होता है, उन्हें ही परोपकारिणी बुद्धि प्रदान करते हैं। दधीचि ने अपने भाग्य को सराहा कि मुझे शुभ कर्म और परोपकार के लिये अपनी अस्थियाँ देने का अवसर अनायास ही प्राप्त हुआ। गौओं को माँस चटा कर ऋषि ने अपनी अस्थियाँ देवताओं को दान दे दीं।

तप और ब्रह्मचर्य से निर्मित हुई उन हड्डियों का वज्र बना और उस वज्र से वृत्तासुर समेत सारे असुरों का संहार हुआ। सुरों की जय और असुरों की पराजय होना ध्रुव सत्य है। प्रभु की पवित्र दृष्टि में शैतानी साम्राज्य कायम नहीं रह सकता। सृष्टि के क्रमागत नियम के अनुसार दुष्टों का विनाश होता है, वह इस बार भी हो गया। परन्तु सब से महान, उच्च आदर्श एवं स्फटिक की तरह निर्मल एक वस्तु तब से लेकर अब तक चमकती हुई चली आ रही है, वह है दधीचि की प्रबल कीर्ति। ‘दूसरों के लिए आत्मत्याग।’ अहा! कितनी महान तत्व है यह। इसका मर्म दधीच जैसे बिरले ही महापुरुष समझते हैं और जो समझ लेते हैं वे अमर हो जाते हैं।


अवतार कैसा होगा?

(हृदयों में विचार उत्पन्न होंगे)

निश्चय ही इस बात को महत्व नहीं देना चाहिये कि किस शरीर में ईश्वरीय अंश की विशिष्ठ कलाएं स्वीकार की जायेंगी, क्योंकि स्वीकार करना जनता की इच्छा के ऊपर होता है। वैसे एक काल में एक उद्देश्य को पूरा करने के लिए कई-कई अवतार एक साथ प्रकट होते हैं, राम के समय में परशुराम अवतार मौजूद थे, भरत और लक्ष्मण की आत्माएं भी वैसी ही उच्च कोटि की थी, हनुमान में भी बढ़ा-चढ़ा देवी अंश था। कृष्ण के समय पाण्डव उसी कार्य को पूरा करते थे। बुद्ध और महावीरों के असंख्य सहायक उस समय मौजूद थे, इन सब में दिव्य अंश वर्तमान थे। अवतार मल मूत्र की गठरी में नहीं, वरन् एक विशेष भावना में होता है। यह भावना अचानक, बड़ी तीव्र गति से जब बढ़ती है तो उसके कर्ता को चमत्कारी महापुरुष समझा जाता है, वास्तव में ईश्वरीय इच्छा का उस समय के लोग अनुकरण मात्र करते हैं और महत्त्व प्राप्त करते हैं। इन एक कालिक अवतारों में जो सर्वश्रेष्ठ होता है उसे प्रधानता मिलती है। वैसे वह सब कार्य उस अकेले का नहीं होता। अन्य आत्माओं की शक्ति भी उतनी ही और कई बार उससे भी अधिक लगती है, तब कहीं जाकर वह उद्देश्य पूरा होता है। राक्षसों का नाश करने में राम के अन्य साथियों की क्षमता थी, उसे भुलाया नहीं जा सकता। लंका का नाश करने में क्या वानर योद्धाओं ने कुछ नहीं किया था? क्या लक्ष्मणजी की वीरता तुच्छ थी? अहिरावण के यहाँ कैद हुए राम-लक्ष्मण को छुड़ाने वाले हनुमान को क्या कुछ नहीं समझा जायेगा? गोवर्द्धन उठाने में ग्वालों का सहयोग उपेक्षणीय था? महाभारत के धर्मयुद्ध में क्या अकेले कृष्ण ही विजेता थे? वास्तविकता यह है कि एक समय में अनेक अवतार होते हैं और उन सब की संघ शक्ति से भौतिक परिवर्तन होते हैं। सूक्ष्म परिवर्तन कारिणी आद्य शक्ति है, वह आद्य शक्ति जो देवकी के गर्भ से कंस को सचेत करने के लिए उत्पन्न हुई थी, किन्तु कंस ने शिला पर पटककर उसे मार डाला था। वह आद्य शक्ति अन्तःकरण की प्रेरणा है, अवतार से पूर्व हर एक के हृदय में एक प्रकार की सनसनाहट लिए हुए आध्यात्मिक पुकार उठती है, वह चेताती है कि बस, अब हद हो चुकी। ठहरो, रुको, सोचो, और गलती का संशोधन करो, मैं ईश्वरीय प्रेरणा लेकर आई हूँ, मेरा स्वागत करो। किन्तु हजारों कंस युग वाणी को शिला पर पटक कर मार डालते हैं, आत्मा की आवाज को कुचल देते हैं और नृशंसतापूर्वक अपने पिछले व्यापार को जारी रखते हैं। वास्तव में यह आद्य शक्ति अवतार की पूर्व सूचना दुंदुभी है, जो आकाश में, अन्तर्लोकों में, बहुत पहले से सावधान होने के लिए, कुहराम मचाती है। जो इस वाणी को नहीं सुनना चाहते और ईश्वरीय संदेश की अवहेलना करते हैं वे आने वाले अवतार की तलवार से टुकड़े-टुकड़े कर दिये जाते हैं।

‘जब किसी प्रकट शरीर में अवतार होगा तो उसकी आज्ञा मानने लगेंगे।’ इस प्रतीक्षा में बैठे रहने वाले उस अंधे के समान है जो सोचता है कि जब सूरज दिखाई देगा तब चारपाई छोड़ कर उठ बैठूँगा। आँखों के बिना उसे सूरज नहीं दीखता है, यह उसकी इच्छा रही कि हमेशा चारपाई पर ही पड़ा-पड़ा मर जाय या उठ बैठे। अवतार को इसके जीवनकाल में पहचानने वाले बहुत ही कम होते हैं, अधिकतर तो वह विरोधी दिखाई देता है, क्योँकि लोगों को जो पुरानी सड़ी गली आदतें पड़ी हुई है, उन्हें वह छुड़ाने के लिए ही तो आया है। शत्रुओं को प्रकाश से चिड़ होती है और उसे पानी पी-पी कर कोसते हैं। जब वह चला जाता है तो पछताते हैं कि हाय, सूर्य भगवान उदय हुए थे पर हम अज्ञान वश उन्हें गालियाँ ही देने में लगे रहे।

शरीरधारी अवतार को आँखों से देखकर उसके पीछे-पीछे चलने की इच्छा रखने वाले अक्सर धोखा खाते हैं। उन्हें कोई दूसरा ही ठग बहका ले जाता है। हो सकता है कि ईश्वर के बदले उन्हें शैतान की पूजा करनी पड़े, क्योंकि हीरे की अपेक्षा नकली काँच का हीरा बहुत चमकता है और फेरी वाले उसे घर पर दिखाने के लिए भी ले आते हैं, किन्तु असल हीरे के लिए जौहरी के घर जाकर बड़ी कठिनाई से परखा जा सकता है। नकली हीरे तो विसातियों की दुकानों पर ढेर के ढेर चमकते हुए आप देख सकते हैं। इस भ्रमपूर्ण अवस्था में से निकलना उन्हीं के लिए संभव है, जो माँस के नेत्रों की अपेक्षा अन्तःकरण की दिव्य दृष्टि पर अधिक विश्वास करते हैं। मूर्खों के लिए मोर-मुकुट पीताम्बर काँछ कर नाचने वाले लड़के ही साक्षात कृष्ण हैं, किन्तु एक ज्ञानी पुरुष भगवान की झाँकी ज्ञानपूर्वक दिव्य दृष्टि द्वारा करता है। खूबसूरत और बलवान शरीर वाले किसी प्रतापी नेता का अनुगमन करने की प्रतीक्षा करने वालों को उनकी इच्छित वस्तु क्या कभी प्राप्त भी हो जायेगी? यह बड़े भारी संदेह से भरी हुई बात है।

थियोसॉफिकल सोसाइटी के आचार्य और श्रीमती एनी बीसैण्ट के वरद पुत्र श्री कृष्ण मूर्ति को कुछ समय पूर्व अवतार घोषित किया गया था। सचमुच उनकी आत्मा में कुछ ईश्वरीय कलाएं अनुभव भी की गई पर श्री कृष्ण मूर्ति ने अंध विश्वासियों को उनकी भ्रान्त धारणाओं के संबंध में बुरी तरह लताड़ डाला। उन्होंने नाच कूदकर मगन होने वाली भक्त मण्डली की ओर भवें तरेरीं और कहा ‘क्या आप ईसामसीह के अवतार हैं?’ ऐसा प्रश्न करने वाले एक शिष्य पर लाल पीले पड़ते हुए कहा-

‘अगर मैं कहूँ कि मैं मसीहा हूँ तो तुम मेरा पन्थ कायम कर लोगे और यदि मैं कहूँ कि मैं मसीहा नहीं हूँ तो तुम कोई दूसरा पन्थ कायम कर लोगे। इसलिए तुम वास्तव में सत्य के प्रेमी नहीं हो वरन् उस पात्र से प्रेम करते हो जिसमें सत्य रखा गया है। तुम पानी पीकर प्यास नहीं बुझाना चाहते वरन् यह जानना चाहते हो कि जिस बर्तन में वह रखा गया है उसे किसने बनाया है। मित्रो? अगर मैं कहूँ कि मैं मसीह हूँ और दूसरा कोई कहे कि मैं नहीं हूँ तो आप क्या करेंगे? इसलिए नाम या पद के फेर में मत पड़ो, इसका कुछ भी महत्व नहीं है। तुम जल को पान करो, बशर्ते कि वह शुद्ध हो। मैं कहता हूँ कि मैं जो जल तुम्हें दे रहा हूँ, वह शुद्ध है, मैं जो मरहम लगाता हूँ वह शाँति दायक है। पर तुम पूछते हो कि ‘मैं क्या हूँ?’---- मैं सब कुछ हूँ, क्योंकि मैं जीव हूँ, आत्मा हूँ।’

विश्ववंद्य महात्मा गाँधी को कई लोग अवतार समझते हैं, और उनके नाम पर गाँधीवाद नामक पंथ चलाना चाहते हैं। इस संबंध में महात्मा जी ने अपनी स्थिति बहुत ही स्पष्ट कर दी है। वे कहते हैं-’यदि गाँधीवाद के नाम पर’ मेरा कोई पृथक पंथ चलाया गया तो इससे मुझे बड़ा दुख होगा। परलोक में मेरी आत्मा रुदन करेगी कि हाय! मेरे अनुयायियों ने यह क्या अनर्थ किया। इससे पहले के ही पंथ बहुत है, अब और बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है।’

शास्त्रों में एक स्थान पर ऐसा उल्लेख है कि जो कहता है कि ‘मैं ब्रह्म को जानता हूँ।’ वह नहीं जानता और कहता है कि ‘नहीं जानता’ वह भी मिथ्या कहता है। इसी प्रकार जो यह घोषित करे कि ‘मैं अवतार हूँ’ असल में वह अवतार नहीं है। और जो कहता है कि मैं अवतार नहीं हूँ, वह भी झूठ बोलता हैं, क्योंकि जीव के ईश्वरीय अंश होने से इन्कार नहीं किया जा सकता। इस प्रश्न को सुलझाना बहुत कठिन है कि कौन अवतार है कौन नहीं? क्योंकि परशुराम जैसे अवतारी भी यह नहीं जान सके थे कि राम अवतार हैं। फिर साधारण लोगों की तो बात ही क्या है। हमें इस पचड़े से दूर रहना चाहिए और स्थूल अवतार की अपेक्षा सूक्ष्म अवतार का दिव्य दृष्टि से दर्शन करने का प्रयत्न करना चाहिए।

आज शक्ति अवतार ले चुकी है। उनकी तुमुल ध्वनि अदृश्य लोक में गूँज रही है। भक्त लोग इसे प्रसन्न होकर सुन रहे हैं और उसके स्वागत की तैयारी में जुटे हुए हैं। अवतार का प्रचण्ड तूफान अब आने ही वाला है, वह जीवों के हृदयों में कुहराम पैदा करेगा और अन्तःकरणों को मथ डालेगा। जो उस ईश्वरीय दूत को अपने हृदय में स्थान देंगे। वे यश के भाजन बनेंगे, अपनी अमर कीर्ति दुनिया में छोड़ जायेंगे। हनुमान, अंगद की तरह उनको सच्चा जीवन फल प्राप्त होगा। जो उस प्रचण्ड शक्ति का विरोध करेंगे, कालनेमि और रावण, राहु की तरह पिसकर चूर-चूर हो जायेंगे।

विश्वव्यापी असत्य रूपी असुर को मिटाने के लिए भगवान सत्यनारायण प्रकट होने वाले हैं। सत्य ही कलंक रहित है, इसलिए उसे निष्कलंक भी कह सकते हैं। यह निष्कलंक सत्य मय भावनाओं की अवस्था में प्रकट होगा। यह प्रेम और न्याय का प्रचार करेगा। दुनिया में से घृणा, द्वेष, दम्भ, पाखण्ड और स्वार्थ की हस्ती को मिटा देगा। सब लोग भाई-भाई की तरह गले मिलकर रहेंगे। एक दूसरे को प्यार करेंगे। अपनी कमाई में संतुष्ट रहना, अपने सुख से बढ़कर दूसरों का सुख समझना, धर्म का प्रमुख अंग समझा जायेगा। ऐसा सतयुग लाने के लिए भगवान सत्यनारायण निष्कलंक रूप में शीघ्र ही पृथ्वी पर प्रकट होने आ रहे हैं। सजग हो जाओ।

घड़ी में, घन्टे और मिनट को सुइयाँ एक ही धुरी से बंधी हुई है। मिनट की सुई घूमती हुई जब घन्टे वाली के पास पहुँचती है, तो दोनों आपस में मिल जाती है। जीव और ईश्वर आपस में सम्बद्ध हैं और जब उपयुक्त अवसर आता है, तभी दोनों आपस में मिल जाते हैं।


रामकृष्ण परमहंस के उपदेश

कच्ची दवा जैसे स्प्रिट में घुल जाती है, उसी तरह ईश्वर में घुल जाओ।

जिस तरह एक ही बीज से वृक्ष पर नारियल खोपड़ा और गिरी निकलती है, ऐसे ही ईश्वर से स्थावर, जंगम, आधिभौतिक, अध्यात्मिक सृष्टि रची गई है।

जैसे पानी पर खींची हुई लकीर थोड़ी देर भी नहीं ठहर सकती है, उसी तरह सज्जनों का क्रोध शीघ्रातिशीघ्र गायब हो जाता है।

जैसे सफेद वस्त्र में काला निशान हो जाने से बुरा मालूम होता है, उसी तरह सज्जन मनुष्य कोई बुरा काम कर डाले तो उसकी सज्जनता में हानि पहुँचती है।

जैसे चीनी और बालू को मिला देने से चींटी केवल चीनी को ही खाती है, उसी तरह ज्ञानी मनुष्य के दुराचारों की तरफ ध्यान न देकर ज्ञान ही प्राप्त करना चाहिए।

पिचकारी एक मालूम पड़ती है पर उसके भीतर का डंडा अलग है। शरीर को मनुष्य समझा जाता है, पर वास्तव में आत्मा उससे अलग है।

दाद को जितना-जितना अधिक खुजाओगे, उतनी ही उसमें खुजली अधिक बढ़ेगी। विषयों को जितना अधिक भोगोगे, भोगेच्छा उतनी ही अधिक तीव्र होगी।

बरसात का पानी ऊंची जगह पर न ठहर कर बहकर नीची जगह पर आ जाता है। उसी तरह ईश्वर की कृपा अहंकारियों पर न होकर नम्रों पर ही होती है।


पत्थर मारने का बदला

(श्री मंगलचन्द जी भंडारी, अजमेर)

राजभवन के समीप ही एक जामुन का पेड़ था। पाँच-छः बालक पत्थर मार-मार कर जामुन गिरा रहे थे। जामुनों के प्रलोभन में उन्हें इतना ध्यान तक न था कि पत्थर किसी राहगीर के न लग जावें। लेकिन इतना ज्ञान अवश्य था कि जिसके निशाने से जामुन गिरते थे वही उन्हें उठाता था। यानी अपने-अपने निशाने के पत्थर का वे पूरा-पूरा ध्यान रखते थे। एक लड़के का निशान चूक गया और वह पत्थर राजभवन से निकलते हुये राजा साहब के सिर में लगा, उनका सिर फट गया और खून बहने लगा।

बदमाश! बदतमीज! बेहूदा! अपराधी! चारों ओर से यही शब्द सुनाई पड़ने लगे। अपराधी के अलावा शेष सब बालक भय के मारे भाग चुके थे। वहाँ खड़ा था सिर्फ अपराधी-10,11 वर्ष का एक बालक। राजा के नौकरों ने उसे पकड़ लिया और रस्सी से बाँध दिया।

सेवक लोग दौड़े, तुरन्त ही ठाकुर को लाया गया। ठाकुर ने शीघ्र ही उस जगह के खून प्रवाह को रोक पट्टी बाँध दी। कुछ ही समय बाद राजा को कुछ शाँति मिली और क्रोध कम हुआ। तब राजा ने अपने सेवक से अपराधी को उपस्थित करने को कहा।

सेवक लोग उस बंधे हुये अपराधी बालक को लेकर राजा के सम्मुख उपस्थित हुये। राजा ने आँखें निकालते हुये उस बालक से पूछा- क्यों मेरे सिर में पत्थर मारा था? बालक ने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया-राजन? हम पाँच-छः बालक पत्थर मारकर जामुन खा रहे थे, इसी बीच अचानक मेरा पत्थर आपके सिर में आ लगा था, मैंने जान-बूझ कर आपके सिर में पत्थर नहीं मारा है।

राजा कुछ देर मौन रहा, फिर लड़के के नाम एक गाँव लिख कर, उसके पिता को बुला कर दे दिया। सब लोग आश्चर्य से चकित रह गये। जहाँ कि वह दण्ड आदि देने की सोच रहे थे, वहाँ उन्होंने उसे एक गाँव दिया देखा, तो उनके आश्चर्य की सीमा न रही। अन्त में मंत्री ने साहस करके पूछा- श्रीमान! आपको पत्थर मारने पर आपने उसे एक गाँव इनाम दे दिया, जहाँ कि कुछ दण्ड आदि देना चाहिए था। इसका क्या कारण है?

राजा ने गंभीरता से प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि- जब एक निर्जीव जामुन का पेड़ पत्थर मारने पर मीठे-मीठे जामुन देता है तो मैंने भी अपने मनुष्यत्व का ख्याल कर मेरे पास गाँव थे उनमें से एक गाँव इस बालक को पत्थर मारने पर दे दिया, क्या मैं एक जामुन के पेड़ से भी कम हूँ? यदि वृक्ष अपने सताने वाले को बदले में मधुर फल दे सकता है तो क्या मैं वैसा नहीं कर सकता?


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निस्सन्देह आदमी का आस्तित्व उसके कामों से अथवा उसकी सफलताएं उसके विचारों से जुदा नहीं है। ये सब उसके विचारों के अनुकूल ही हैं। आत्म-ज्ञान के बिना आदमी वृद्धि अथवा प्रगति नहीं कर सकता।

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जो आदमी अपने अन्तःकरण के संकेतों से काम लेते रहते हैं, उनकी विवेक शक्ति अथवा भले बुरे के पहिचानने की शक्ति बढ़ती रहती है।

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तुम्हें अपने प्रत्येक उद्देश्य की खूब-छान-बीन करनी चाहिये और इस काम में तुम्हें तब तक लगे रहना चाहिये, जब तक अपने उद्देश्य के बारे में यह विश्वास न हो जाय कि इसका भाव ठीक है।

ब्रह्मचर्य सम्बंधी-


सतयुगी विचार

(पं. जगन्नाथ राव नायडू, नागपुर)

जब मन में जननेन्द्रिय को तृप्त करने की आकाँक्षा उत्पन्न होती है तो सब इन्द्रियाँ उसकी तृप्ति के लिए प्रयत्न करने लगती है। मेरे विचार से सब इन्द्रियों में जननेन्द्रिय मुख्य है, इसलिये गृहस्थ सम्बंधी घनिष्ठता में या जाति बिरादरी में माता, बहिन या पुत्री की पवित्र भावनाएं ध्यान में रखकर चलना ठीक होता है। जब पवित्र दृष्टि-कोण द्वारा जननेन्द्रिय का संयम हो जाता है तो अन्य इन्द्रियों का नियम पर चलना आसान है।

मेरे काका के यहाँ तिजोरी है, मुझे वहाँ जाने की मनाई नहीं है। अगर मैं उस तिजोरी को अपनी आँख से देखता हूँ और सोचता हूँ कि अच्छी कारीगरी से बनी है तो वह चोरी नहीं है, या सब के सामने हाथ से छूकर उसके रंग पालिश की बड़ाई करता हूँ, तो भी चोरी नहीं है। चोरी तो वह है जब तिजोरी के अन्दर रखे हुए धन पर जी ललचाता है और उसे लेने के लिए दुर्बुद्धि उत्पन्न होती है। जब मन आँख को कहता है कि कोई देखता न हो अकेले में चलना और हाथ को कहता है कि हथौड़ा होशियारी से चलाना, कोई सुन न ले।

निश्चय ही जब जननेन्द्रिय की तृप्ति के विचार मन में आते हैं तो सारी इन्द्रियाँ कुमार्ग पर चलने लगती हैं। पति-पत्नी में भी संयम की जरूरत है। न्याय और नीति का अनुसरण करने पर बहुत जल्द संयम का अभ्यास हो जाता है। निर्धारित मर्यादा के अतिरिक्त स्त्री मात्र में माता बहिन या पुत्री की भावनाएं रखना ब्रह्मचर्य के लिए बहुत ही उत्तम उपाय है। क्योंकि इन भावनाओं के कारण कुदृष्टि उत्पन्न ही नहीं होती, यदि हो भी जाय तो आत्मा के प्रबल धिक्कार के कारण मनुष्य तुरन्त ही संभल जाता है।

लम्बे-चौड़े उपदेश देने और दिखावे या प्रदर्शन के लिए ‘बगुला भगत’ बनने से कुछ लाभ न होगा। हम अपने को छोड़कर संसार में और किसी को धोखा नहीं दे सकते। इसलिए यही सब उचित है कि ढोंग, पाखण्ड या बगुलापन को छोड़कर अन्दर से सफाई कर डालें। मानव जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त करने के लिए मन का संयम आवश्यक है। मन का संयम जननेन्द्रिय को नियमानुवर्ती बनाये बिना नहीं हो सकता। इसलिए सत्य धर्म के हर एक जिज्ञासु का कर्त्तव्य है कि वह ब्रह्मचर्य सम्बंधी सतयुगी विचारों की अपने हृदय में स्थापना करे और नियम मर्यादा के अतिरिक्त स्त्री जाति को माता, बहिन या पुत्री की दृष्टि से देखें।


ओउम् सत्य की जय

(चरणदास की वाणी)

साँच बिना साधू नहीं, कबहूँ न मिलि हैं राम।

साँच बिना गति ना लहै, पावै ना निज धाम॥

सत-2 सुख सौं बोलिये, और सत ही चलिये चाल।

सत ही मन में राखिये, सो सत ही रहिये नाल॥

साँचे कूँ ग्रह ना लगै, साँचे कूँ नहिं दाग।

साँचे शाप न लगही, सब दुख जावैं भाग॥

बड़ी तपस्या साँच हैं, बड़ा वरत है साँच।

जाँसौं पाप सभी जरैं, लगैं न दिव की आँच॥

जाका वचन मुड़ै नहीं, साँचे सब व्यवहार।

चरण दास त्रैलोक्य में, कभी न आवै हार॥

सतवादी को पति है साँच। ताको लगै न दिवकी आँच।

साँची चोर चुराया घोड़ा। परमेश्वर ताका रंग मोड़ा॥

साँच प्रताप अचम्भा भया। और चोर चोरी सूँ गया॥

औरो साँच प्रताप अनन्त। सब ही जानै साधू सन्त॥

लाख बात का एक ही जोड़। साँचा पुरुष सबन सिरमोड़॥

साँचे की पदवी बड़ी, दुष्ट साधु के माँहि।

दौनों ही स्तुति करैं, निन्दक कोऊ नाँहि॥


सत्य योग की साधना

(प्राचीन योग विद्या का नवीन संस्करण)

सत्य धर्म का प्रचार और कुछ नहीं योग साधन का आरंभ है। योग विद्या को सर्वसुलभ रूप में जन-साधारण के सामने इस तरह उपस्थित किया जा रहा है। समयानुकूल थोड़ा सा हेर-फेर करने से जनता की नवीनता प्रिय मनोवृत्ति का इस ओर झुकाव होगा, इसलिये पुरानी बात को नये रूप में सर्व-साधारण के सामने उपस्थित किया जा रहा है।

राजयोग के आरंभिक साधन यम और नियम है। इन्हीं को सत्य, प्रेम, न्याय के साँचे में ढालकर अवतार की तरह बनाया गया है। पाठक इसकी विवेचना नीचे दिये हुए क्रम से कर सकते हैं।

यम

अहिंसा- अखण्ड आत्मीयता (प्रेम)

सत्य- अखण्ड जीवन (सत्य)

अस्तेय- अखण्ड समता (न्याय)

ब्रह्मचर्य- अखण्ड शक्ति (न्याय)

अपरिग्रह- अखण्ड प्रवाह (प्रेम)

नियम

शौच- मुक्ति, (परम पद)अवतार के दर्शन।

संतोष- अखण्ड यज्ञ (प्रेम)

तप- अखण्ड शमन (न्याय)

स्वाध्याय- अखण्ड जगत् (सत्य)

ईश्वर प्रणिधान- अखण्ड आत्मा (सत्य)

इस प्रकार लौट फेर का इस सत्य साधन में यम नियमों को ही स्थान दिया गया है। समय परिवर्तन के अनुसार उनके क्रम में थोड़ा फेर और व्यवस्था में थोड़ा विस्तार कर दिया गया है।

शौच के लिये इस साधना में कोई स्थान इसलिये नहीं दिया गया है कि साधना नहीं वरन् साधन है। शौच का अर्थ पाप तापों को हटाकर आत्मा के निर्मल स्वरूप का दर्शन करना है। शौच रूपी ध्येय जैसे-जैसे प्राप्त होता जाता है, वैसे ही वैसे परम पद, मुक्ति, मोक्ष निकट आता जाता है। जब पूर्ण शौच प्राप्त हो जाता है, तो आत्मा बिलकुल निर्मल और निष्पाप हो जाता है। यही तो मुक्त अवस्था है। आत्मा तो सत् चित् आनंदस्वरूप नित्य और मुक्त है। कषाय-कल्मषों के अशौच ने उसे अपवित्र कर रखा है। शौच प्राप्त होते ही आत्मा परमात्मा में मिल जाता है, इस प्रकार शौच को साधना नहीं वरन् साध्य, ध्येय, लक्ष समझकर इस नवधा भक्ति से ऊपर रखा है। यों भी कहा जा सकता है कि शौच के अंतर्गत यह सारी साधना है।

विज्ञ पाठकों को यह बताने की जरूरत नहीं है कि जैसे शौच के अंतर्गत सारे यम-नियम हैं, वैसे ही यम-नियमों के अंतर्गत राज योग के अन्य छः अंक है। आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि यह छः अंग इसी साधना के अंतर्गत इस प्रकार आ जावेंगे-

आसन- ब्रह्मचर्य अखण्ड शक्ति (न्याय)

प्राणायाम- ब्रह्मचर्य अखण्ड शक्ति (न्याय)

प्रत्याहार- अपरिग्रह अखण्ड प्रवाह (प्रेम)

धारणा- स्वाध्याय अखण्ड जगत (सत्य)

ध्यान- सत्य अखण्ड जीवन (सत्य)

समाधि- ईश्वर प्रणिधान अखण्ड आत्मा (सत्य)

आसन और प्राणायाम शरीर को स्वस्थ रखने और उसकी शक्ति बढ़ाने के लिये हैं, इसलिये दोनों ब्रह्मचर्य के अंतर्गत आ जाते हैं। प्रत्याहार में दुर्वासनाओं को इकट्ठा करना, रोक कर उन्हें दूर रखना होता है, जो अपरिग्रह की व्याख्या में आ जाता है। धारणा में तर्क, प्रमाण, श्रद्धा आदि साधनों द्वारा तत्वज्ञान पर सुदृढ़ निष्ठा जमानी होती है, यही कार्य स्वाध्याय का है। ध्यान में इष्टदेव के माध्यम द्वारा उच्च से उच्च आध्यात्मिक गुणों की प्रतिमा की समीपता की जाती है। सत्य, अखण्ड जीवन के अंतर्गत भी आध्यात्मिक गुणों की सर्वोच्च कल्पना करते हुए उसकी सन्निकटता स्वीकार करते हैं। संसार में वास्तविक सत्य क्या है, इसे ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं जान सकता। पर हम अपनी बुद्धि के अनुसार आध्यात्मिक गुणों की पवित्रतम कल्पना कर सकते हैं, उसे सत्य कहते हैं। इसलिये ध्यान सत्य का ही एक भाग है। समाधि, ईश्वर में तल्लीन होना, आत्मा का परमानन्द उपलब्ध करना, एक ही बात है। आत्मा-परमात्मा एक ही वस्तु है, केवल दो नामों से ही उसे पुकारते हैं। परमात्मा ध्यान में तल्लीन होने की समाधि ईश्वर प्रणिधान कहाती है।

राज योग की एकान्त साधना का कर्मयोग में परिवर्तन करने का यह सत्य योग है। अथवा यों कहिये कि राज योग की आत्मा कर्मयोग के वस्त्र पहनकर सत्य योग के नवीन रूप में संसार में अवतार ले रही है।

(आँखों देखी सत्य घटना)-


कल्कि भगवान को दो वर्ष की कैद

(ले. श्री हरिश्चन्द्र जी मित्तल धामनौद)

करीब 6 महीने की बात होगी। मध्य भारत के हल्कर राज्य में मानपुर नामक ग्राम में एक कुम्हार और कुम्हारिन रहते थे, वे लगभग दो वर्ष से भगवद्भक्ति किया करते थे। कुम्हार प्रतिदिन तक मिट्टी की मूर्ति बनाता, दिन भर पूजन करने के पश्चात प्रातःकाल जल में विसर्जित करके नवीन मूर्ति का निर्माण करता था। इस प्रकार दो वर्ष बीत गये। एक दिन वहाँ के लोगों से उसने कहा कि आज रात को स्वयं भगवान कल्कि के मुझे दर्शन हुए है और मेरे आग्रह से उन्होंने इस मास की पूर्णिमा को सब लोगों को दर्शन देना निश्चित किया है। पहले तो इसकी बात किसी ने नहीं मानी, किन्तु जब उस कुम्हार ने प्रतिज्ञा की कि यदि पूर्णिमा के दिन भगवान दर्शन नहीं देवेंगे, तो मैं जीते जी चिता में भस्म हो जाऊंगा। लोगों को विश्वास हो गया और थोड़े ही दिनों में यह बात सारे मध्य भारत में फैल गई। पूर्णिमा के 2-3 दिन पहले से ही लोगों ने मानपुर में आना शुरू किया और पूर्णिमा के दिन तक तो लगभग 5000 आदमी इकट्ठे हो गये। कुओं का पानी खुट गया, गाँव के हलवाइयों और सौदागरों ने लोगों से दुगुने-तिगुने पैसे वसूल किये।

पूर्णिमा के दिन 12 बजे तक जटाजूट धारी पुरुष उस कुम्हार के घर में से निकला, उसके मस्तक पर त्रिपुण्ड, गले में रुद्राक्ष की मालायें, शरीर पर विभूति और कमर में बाघ चर्म लपेटे हुए था। उसने आते ही घोषित किया कि मैं कल्कि हूँ और आप लोगों को दर्शन देने के लिये आया हूँ। जनता ने उस पुरुष को उठाकर गाँव भर में फिराया, ताकि लोग उसके दर्शन अच्छी तरह से कर सकें, किन्तु इसी बीच में किसी ने उसे पहिचान लिया और वह चिल्ला उठा-’अरे यह तो भगवान नहीं, कालीकिराछ वाले बाबा जी है।’ सारी जनता को विश्वास हो गया और उसको पुलिस हिरासत में दे दिया।

कोर्ट में मुकदमा दाखिल हुआ, जिसमें उस बाबाजी को दो वर्ष की सजा हुई और कुम्हार रिहा कर दिया गया। जनता का 2 लाख के करीब रुपया खर्च हुआ और नतीजा कुछ भी नहीं मिला।


Quotation

सुन्दरी आकृति सुन्दर मुँह की अपेक्षा सुन्दर है। किन्तु सद्व्यवहार सुन्दर आकृति से भी अच्छा है। वह मूर्तियों और चित्रों से भी अधिक आनन्द देता है यह सारी ललित कलाओं में सर्वश्रेष्ठ कला है।

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अपने शरीर मन्दिरों में परमात्मा को अधिष्ठित करो।


सत्ययुग और परलोक ज्ञान

(परलोक विद्या के आचार्य श्री बी.डी. ऋषि, बंबई)

प्रचलित जागतिक अस्वस्थता के समय हर एक व्यक्ति सत्ययुग की यानी अच्छे काल की आकाँक्षा करता है, सत्ययुग का आना का संभव निश्चित करने के लिये पुराण के वचन उद्धृत किये जाते हैं, कोई अन्य प्रमाण बतलाते है। कोई शास्त्राधार से इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयत्न करते हैं। मानवी उत्कण्ठानुरूप इस प्रकार के उद्योग होना स्वाभाविक है और सब के इच्छानुसार यदि सत्ययुग का आरंभ शीघ्र ही संसार में होगा तो समस्त जनता सुख और शाँति का लाभ उठायेगी।

विद्यमान स्थिति का विचार करने से वह स्पष्ट होगा, किन्तु उसका कारण लोभ, धर्म का अभाव, आसुरी सम्पत्ति तथा मरणोत्तर अवस्था का अज्ञान ही है। केवल ऐहिक जीवन का ख्याल करने से मनुष्य अहंकारी तथा दुराचारी बनता है। चार्वाक मतानुसार उसकी वृत्ति ‘यावज्जीवेत सुर्ख जीवेत्’ इस वचनानुसार बनती है, भौतिक दण्ड नीति से बचकर कोई कर्म करने को वह सिद्ध रहता है, ऐसे जड़वादी लोगों के धार्मिक वचनों का महत्व प्रतीत नहीं होता, केवल प्रत्यक्ष जगत के अतिरिक्त अन्य अदृश्य अवस्था को वह अविश्वसनीय मानते हैं। दुर्भाग्य अवस्था को वह अविश्वसनीय मानते हैं। दुर्भाग्य से तथा धर्म ग्लानि से ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है। शिक्षण प्रणाली भी इन्हीं विचारों से कलुषित हुई है। बहुत से नेता प्रच्छन्न या प्रकट रीति से स्वर्ग या नरक आदि स्थिति को यानी मरणोत्तर अस्तित्व को केवल काल्पनिक समझते हैं। श्रद्धा से जो इन बातों पर विश्वास रखते हैं, उन्हें भी इसकी यथार्थ कल्पना नहीं रहती केवल आत्मा का अमरत्व मान्य करने से मरणोत्तर स्थिति का ज्ञान नहीं हो सकेगा।

कई स्थानों पर नया युग निर्माण करने की ध्वनि सुनने में आती है, किन्तु उसके प्रवर्तकों के विचार देखकर उस युग में क्या होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। उन लोगों की दृष्टि से उस युग में धर्म का नाम न रहेगा। लोग केवल ऐहिक सुखों में मग्न रहेंगे, ईश्वर का अस्तित्व मिटा दिया जावेगा और समस्त प्राचीन संस्कृति का लोप होगा। यह विचार प्रणाली दो घोर कालों के समीप आने की द्योतक है। हमारे नेता भी राष्ट्र के भावी आयोजन करते समय केवल आर्थिक उन्नति का ही विचार करते हैं, जिस योजना में केवल आर्थिक सुधार पर जोर दिया जाता है वह चिरकाल तक नहीं रह सकती और न उससे लोगों का असली कल्याण होगा। प्राचीन मुनियों ने मनुष्य जाति के लिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ऐसे चार ध्येय निश्चित किये हैं, उनमें से केवल एक को ही प्राप्त करने के प्रयत्न से लोगों में सुख शाँति न रहेगी, इन तत्वों की उपेक्षा करने से ही समस्त संसार आपत्ति में पड़ा है। यह सब जड़वाद का परिणाम है, यह ही मानव जाति का प्रथम श्रेणी का शत्रु है, उसको नष्ट करने से लोगों को जीवन के उद्देश्य का यथार्थ आकलन होगा। जड़वाद का इतना प्रचार हुआ है कि श्वेत वर्णीय हजार लोगों में उससे एक भी बचा हुआ मिलना मुश्किल है। ऐसा ‘लंदन के लाईट’ नामक साप्ताहिक से एक प्रसिद्ध लेखक ने प्रकाशित किया है।

इस जड़वाद को नष्ट करने को परलोक ज्ञान ही अनुपम उपाय है। कारण यह प्रत्यक्ष प्रयोग द्वारा सिद्ध हुआ है, उससे मरणोत्तर अस्तित्व की यथार्थ कल्पना आ सकती है। सदाचार का क्या फल मिलता है। दुराचार का क्या दुष्परिणाम होता है, साधारण मनुष्यों को मृत्यु के पश्चात क्या अनुभव आते हैं इत्यादि जटिल और महत्वपूर्ण बातों पर इस ज्ञान से प्रकाश पड़ता है, पाश्चिमात्य संशोधकों ने इन बातों के बारे में इतना ज्ञान संग्रहित किया है कि, उनकी कुछ पुस्तकें पढ़ने से पाठकों को स्वल्पावकाश में बहुत ज्ञान प्राप्त हो सकेगा, सुखी आत्मा के मरणोत्तर अनुभव दुखी मनुष्यों के कष्ट आत्मघात की क्लेश, दुराचारी की पीड़ा इत्यादि हर मनुष्य को जानने लायक बातें परलोक गत व्यक्ति के संदेशों से विदित हो सकेंगी, इस ज्ञान से जड़वाद खंडित होकर मनुष्य को अपने जीवन का हेतु समझ सकता है, इसी से यह स्थापित होता है कि हमारा ऐहिक जीवन अन्य जीवन की तैयारी के लिये है। हम इस भौतिक जगत में जिस रीति से अपना जीवन व्यतीत करेंगे, उसी के अनुसार हमें मरणोत्तर अवस्था में स्थिति प्राप्त होगी, यह केवल कवि कल्पना अथवा श्रद्धा का विषय नहीं है, इस लोक की अपेक्षा परलोक का जीवन बहुत दीर्घकालीन है, यहाँ सामान्यतः अधिक से अधिक मानवों आयुष्य सौ बरस का रहता है, किन्तु परलोक-निवास का समय इससे कई गुना अधिक है, वह हर एक के कर्मों पर निर्भर रहता है।

पुरातन अन्धकारों ने परलोक की तरफ लोगों का चित्त कई रीति से आकर्षित किया था, वही कार्य परलोक ज्ञान द्वारा अन्य प्रकार से हो रहा है, उसी के प्रसार से समस्त आपत्तियों का मूल जो जड़वाद है, उस पर कुठाराघात होकर संसार से सुख शाँतिमय सत्ययुग आरंभ होगा, उसका सामीप्य अथवा दूरता-जनता के सहकार्य पर अवलम्बित रहेगी।


सतयुता में पुत्रियों का स्थान

(श्रीमती विष्णुकुमारी देवी सिन्हा, लखनऊ)

आज यह आवाज सर्वत्र गुँजित हो रही है कि ‘प्राचीन रूढ़िवादी प्रथाओं को नष्ट करके नवीन युग की स्थापना होगी और उसमें सत्य के आधार पर नवीन व्यवस्था, संस्कृति एवं प्रथाओं का निर्माण किया जायेगा।’ यह आवाज आज के धुरन्धर, बड़े-बड़े विद्वान, देशोद्धारक श्रेणी के माननीय पुरुषों की है। इसी आधार पर अनेक सुधार हो चुके हैं। जैसे कन्याओं को पढ़ाना, स्त्रियों को स्वतंत्र व हर निकालना, विधवा-विवाह तथा सिनेमा आदि में कार्य करना आदि-आदि। परन्तु पद-दलित मातृजाति की वास्तविक दुर्दशा, आर्थिक प्रश्न की ओर भी ध्यान देना चाहिए, ऐसा सोचना हमारे लिए स्वाभाविक है। पैतृक सम्पत्ति पर अधिकार न होने के कारण बहुत समय से ढोल और पशुओं को श्रेणी का व्यवहार पतिगृह में होते रहने के कारण भारत की नारी आज बहुत असहाय हो गई है। उसकी मानवोचित सभी स्वाधीनताएं अनेक प्रकार से छीन ली गई थी जो कि अब भी है। इस संसार के सुरम्य उपवन में केवल पुरुष ही स्वतंत्रता पूर्वक टहल सकते हैं, स्त्रियों को तो अपने पिंजड़े में से झाँकने की मनाई अब भी है। जो कुछ हुआ या हो रहा है वह सब पुरुषों की आज्ञानुसार ही हो रहा है। कितने हैं जो अपने घरों में लड़कों की तरह लड़कियों के स्वास्थ्य और शिक्षण का ध्यान रखते हैं? पराये घर का कूड़ा समझकर भार रूप से अभिभावक कन्याओं को पालते हैं और जैसे तैसे इस भार को दूसरों के ऊपर डालकर निश्चिन्त हो जाते हैं। पति के घर पहुँचने पर उसके कान, नेत्र ओर मुख को भी बन्द कर दिया जाता है। इस प्रकार आदि से अन्त तक कार्यक्रम ऐसा रहता है जिसमें उसको शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, व्यावहारिक और जीवनयापन संबंधी सारी योग्यताएं नष्ट हो जाती हैं। उनके लिए आध्यात्मिक विकास एवं मानवीय महान लक्ष की ओर अग्रसर होना तो दूर रहा, भोजन वस्त्र जैसी प्रारंभिक आवश्यकताओं के लिए भी परमुखापेक्षी बनकर रहना होता है, जबकि गृह संचालक जैसे महान कार्य का समस्त भार उन पर है।

दुर्भाग्य से यदि उनका प्रधान संरक्षक से वियोग हो जाय या वह परित्यक्त कर दे, तो दूसरे अभिभावकों की भी सहायता की आशा नहीं रहती अभागे और परित्यक्त पुरुष स्वावलंबन के साथ जीवन निर्वाह कर सकते हैं, किन्तु धर्म पर आरुढ़ रह कर अभागिनी महिलाओं के लिए जीवनयापन करना बाहर के पुरुषों के कारण कठिन है। इन दुखद परिस्थितियों में यदि बालकों के लालन-पालन का भी बोझ उन पर हो, तब तो कष्टों का कोई ठिकाना ही नहीं रहता। मातृजाति को इतनी असहाय, अपंग और अशक्त बनाकर पुरुष जाति ने बड़ी भारी क्रूरता और भूल की है। साम्राज्यवादी राष्ट्रों को कोसा जाता है कि उन्होंने स्वार्थ के लिए बहुत जन समुदाय को अपना गुलाम बना रखा है। परन्तु देखा जाय तो आधी जनसंख्या स्त्री जाति, इस भारत देश के, पुरुष साम्राज्यवाद की शिकार है। इंसाफ के दिन परमात्मा की कचहरी में पुरुषों को इसका उत्तर देना होगा, वे अपने कुकर्मों के दंड से बच नहीं सकेंगे।

हमारे देश में स्त्रियों को उनके मानवोचित अधिकारों से वंचित रखने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी गई है। उन्हें सर्वथा असहाय बनाकर ही संतोष नहीं किया गया है वरन् ऐसा भी प्रयत्न किया गया है कि वे आपत्ति के समय तिल-तिल कर जलें और तड़प-तड़प कर मरें। ‘उत्तराधिकार से वंचित रखना’, ऐसी ही एक पैशाचिक क्रूरता है। पिता की सम्पत्ति पर पुत्रों का ही अधिकार होने की प्रथा जाति में इस प्रकार व्यवहारित होती है कि स्त्रियाँ न तो अपने पिता की संपत्ति में से हिस्सा पा सकती हैं और न पति के में से। जब किसी घर में पुत्र नहीं होता तो कोई लड़का गोद रखने के लिए ढूंढ़ा जाता है या दूसरी शादी की जाती है ताकि वह उस सम्पत्ति का अधिकारी बन सके। लड़कियों का दर्जा इतना कम है कि वे दूर के गोद रखे हुए लड़के या अन्य कुटुम्ब, परिवार वालों की अपेक्षा कम उत्तराधिकारिणी समझी जाती हैं। पतिगृह में भी ऐसे ही दाव-पेंच चलते हैं। दुर्भाग्यग्रस्त महिलाओं की सहायता वर्तमान लंगड़े-लूले कानून द्वारा बहुत ही कम हो पाती है। वे बेचारी निकट सम्बंधियों के चंगुल से अपनी अधिकार रक्षा नहीं कर पाती और ठीक तौर से पति या पिता उत्तराधिकार प्राप्त नहीं कर पाती।

सतयुग के निर्माण के लिये आवश्यक है कि ‘वर्तमान युग में पुत्रियाँ ही पैतृक सम्पत्ति की उत्तराधिकारिणी हों।’ लड़के तो पर्याप्त शिक्षा-दीक्षा प्राप्त कर ही लेते हैं और स्वतंत्र होने के कारण पौरुष से अर्थोपार्जन कर सकते हैं किन्तु लड़कियाँ ऐसा करने में स्वभावतः अशक्त हैं, इसलिए पैतृक धन पर उन्हीं का उत्तराधिकार होना चाहिये। आरंभ में कुछ शताब्दियों तक जब तक कि समस्त मातृ जाति को असहायावस्था से बाहर न निकाला जाय तब तक तो पूरा ही उत्तराधिकार उन्हें प्राप्त हो। पुनः पुत्र और पुत्रियों में बराबर विभाजन हो सकने की प्रणाली प्रचारित की जानी चाहिए।

आशा है कि सतयुग के इच्छुक और रूढ़िवादी प्रथाओं के विनाशक, सत्य के आधार पर इस व्यवस्था के प्रति कि पुत्रियाँ उत्तराधिकार प्राप्त करें, न्याय की यह प्रबल पुकार है कि अविलम्ब पुरुष जाति पुत्रियों के प्रति उत्तराधिकार का प्रथम पालन करें, तभी वास्तविक ‘सत्ययुग‘ हो जायेगा।


Quotation

सद्व्यवहार से ही पुरुष वास्तविक पुरुष बन सकता है। इस पर यह और बढ़ाना उपयुक्त ही होगा कि स्त्रियाँ भी सद्व्यवहार से वास्तविक स्त्रियाँ बन सकती हैं।

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जब तुम एक ऐसी आत्मा को देखते हो जिसके समस्त काम शाही, प्रतिभापूर्ण और गुलाब के फूलों के समान आनन्ददायक हैं, तब तुम्हें परमात्मा का धन्यवाद करना चाहिये कि ऐसी बातें हो सकती हैं और वर्तमान में हैं।


हार-जीत

(श्री दरबारीलाल जी सत्य भक्त)

(रामचन्द्र जी की सवारी निकल रही है)

हिन्दू नेता- ‘भाइयों? मस्जिद आ रही है, यह नमाज का समय है, इसलिये वहाँ पहुँच कर बाजे बन्द करके हम सब लोग खड़े रहें और कुछ ध्यान करें।’

दूसरा हिन्दू- ‘क्या नमाज में भी शामिल होना पड़ेगा?’

हिन्दू नेता- ‘होना पड़ेगा नहीं, होना चाहिए। नमाज भी तो ईश्वर का ध्यान हैं।’

(2)

(मस्जिद में मुसलमान खड़े हैं)

मौलवी- ‘भाइयों! मालूम होता है, हजरत रामचन्द्र जी की सवारी आ रही है। अच्छा तो थोड़ी देर रुक जायें, सवारी निकल जाने पर नमाज पढ़ी जाय।’

मौलवी- ‘सभी वक्त अल्लाह का है, उसमें चूकने का क्या काम? और नमाज के वक्त भजन हो जाय तो नुकसान भी क्या है? अल्लाह तो नमाज भी समझता है और भजन भी। इसलिए अल्लाह के पास अगर नमाज के वक्त भजन पहुँच जाय तो अल्लाह नाखुश न होगा।’

(3)

(जुलूस मस्जिद के पास आ जाता है। मुसलमान मस्जिद से निकल कर जुलूस के सामने आ जाते हैं, बाजे वगैरह बन्द कर सब शाँत होकर खड़े हो जाते हैं)

मौलवी- ‘भाइयों, आप लोग शाँत क्यों हो गये? भजन वगैरह होने दीजिए, हम भी शामिल हो जायें।’

हिन्दू नेता- ‘यह तो नमाज का समय है, इस समय तो हम शाँत रहकर नमाज में शामिल होना चाहते हैं।’

मौलवी- ‘पर चालू भजन को रोककर नमाज में शामिल होना क्या अच्छी बात है? आप भजन चालू रखिये। नमाज आज देर से होगी।’

हिन्दू नेता- ‘पर इससे फायदा ही है, मीठा खाने के बीच में चटनी का स्वाद मीठे का जायका बढ़ा देता है, भजन के बीच में नमाज आ जाने से भजन का जायका बढ़ जायेगा।’

मौलवी- अच्छा भाई, आप जीते हम हारे।

(4)

(सब मिलकर नमाज में शामिल होते हैं, नमाज होने के बाद हिन्दू-मुसलमान मिलकर भजन गाते हैं, आरती करते हैं और जुलूस आगे बढ़ता है। जाते समय में बात-चीत होती है)

हिन्दू नेता- मौलवी साहिब, आज हमारी ही पूरी जीत रही।

मौलवी- नहीं भाई, पूरी जीत के लिए दूसरे को पूरा हारना पड़ता है। यहाँ तो हम दोनों ही जीते और हम दोनों ही हारे।

हिन्दू नेता- क्या आप इसमें किसी की पूरी जीत और किसी की पूरी हार नहीं देखते?

मौलवी- देखता हूँ! इसमें अल्लाह की पूरी जीत है और शैतान की पूरी हार है।

-नई दुनिया।


तीन विश्वस्त भविष्यवाणियाँ

(1)

ईसाई धर्म पुस्तक ‘मत्ती रचित सुसमाचार’ पर्व 24 में लिखा है कि ‘चौकस रहो कि कोई तुम्हें न भरमाए। क्योंकि बहुतेरे मेरे नाम से आकर कहेंगे कि मैं मसीहा हूँ और बहुतों को भरमायेंगे। तुम लड़ाइयों की चर्चा सुनोगे, देखो, घबराना मत क्योंकि इनका होना अवश्य है। पर उस समय अन्त न होगा, क्योंकि जाति पर जाति और राज्य पर राज्य चढ़ाई करेगा और जगह-जगह अकाल पड़ेंगे और भुँमिडोल होंगे। तब बहुतेरे ठोकर खायेंगे और एक दूसरे को पकड़वायेंगे और एक दूसरे से वैर रखेंगे। बहुत से झूठे नये उठ खड़े होंगे और बहुतों को भरमायेंगे। अधर्म बढ़ने से बहुतों का दम ठण्डा हो जायेगा, पर जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा उसी का उद्धार होगा। स्वर्ग के राज्य (सतयुग) का यह सुसमाचार इसी समय सारे जगत में प्रचार किया जायेगा।’

‘तब जो यहूदियों में होंगे पहाड़ों पर भाग जायें। जो कोठों पर होंगे वे अपना सामान लेने के लिए नीचे न उतर सकेंगे, जो खेत में होंगे वे अपने कपड़े लेने के लिए पीछे न लौट सकेंगे। गर्भवती और दूध पिलाती औरतों की दशा हाय-हाय, बड़ी कष्टकर होगी। उस समय ऐसा भारी क्लेश होगा कि जगत के आरंभ से न अब तक हुआ है और न कभी होगा यदि वे दिन घटाए न जाते तो कोई प्राणी न बचता। पर चुने हुओं के कारण वे दिन घटाए जायेंगे।’

‘जब तुम इन सब बातों को देखो तो मान लो कि वह (अवतार) निकट है वरन् द्वारा ही पर है। आकाश और पृथ्वी टल जायेंगे पर मेरी दृष्टि कभी न टलेगी।’

(2)

कुछ दिन पूर्व सुप्रसिद्ध दानवीर सेठ जुगल किशोर जी बिड़ला ने अखबारों में एक समाचार प्रकाशित कराया था। उसमें अवधूत केशवानन्द जी का परिचय इस प्रकार करवाया गया था कि वे इस समय करीब 70 वर्ष के प्रतीत होते हैं, दिन में एक बार दही आदि फलाहार लेते हैं। कोई सेवक या शिष्य साथ नहीं रहने देते। सर्दी की ऋतु में उत्तरकाशी के पास बर्फ के पहाड़ों के बीच आधी रात के पश्चात गंगा की धारा में खड़े जप करते हैं और गर्मी की ऋतु में ऋषिकेश के निकट जलते हुए पत्थरों पर सूर्य के सामने खड़े होकर जप करते हैं। यह पिछले 30-40 वर्षों से इसी प्रकार तपस्या करते देखे गये हैं। केवल एक कोपीन धारण करते हैं।

सेठ जुगलकिशोर जी बिड़ला ने स्वयं उनके दर्शन किये हैं और दूसरे विश्वसनीय महानुभावों से बहुत कुछ सुना है।

यह सिद्ध योगी हिन्दू जाति की वर्तमान दुर्दशा से बड़े दुखी हैं और इस संबंध में अपना विश्वास प्रकट करते हैं कि-’अभी कुछ दिनों तक हिन्दू जाति की विपत्ति और बढ़ेगी। संवत् दो हजार के लगभग संसार में भयंकर अशाँति फैलेगी, उसकी वजह से आरंभ में हिन्दू जाति को भी घोर कष्ट उठाने पड़ेंगे। उसके पश्चात एक ऐसी आत्मा प्रकट होगी जो दुख शोकों का निवारण कर देगी।’

(3)

श्रीस्वामी रामतीर्थ जी ने सतयुग के संबंध में एक बड़ी ही महत्वपूर्ण भविष्यवाणी की थी, पाठकों को उस पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिये।

‘केवल स्वयं अथवा कुछ मनुष्यों को साथ लेकर मैं पूर्ण निश्चय करता हूँ कि दस वर्ष के अन्दर भारतवर्ष में सत्यता का पूर्ण रूप से प्रचार कर दूँगा और भारतवर्ष से मोहान्धकार तथा अन्य कमजोरी को निकाल कर बाहर करूंगा। बीसवीं सदी के प्रथम माघ में भारतवर्ष पूर्व काल से कहीं अधिक उन्नति व सम्मान के शिखर पर होगा। मेरे इन शब्दों को सर्वत्र प्रचारित किया जाय।’


अवतारों की पलटन

(पाठक बुद्धि पर जोर दें और सोचें)

हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, बौद्ध तथा अन्यान्य धर्म ग्रंथों से विदित होता है कि सम्वत् 2000 के लगभग कोई अवतार होने वाला है। इस अवसर से लाभ उठाने के लिये अनेकों व्यक्ति लालायित हो रहे हैं। ढोंग का दुनिया में बोल-बाला है। बहुत से कलियुगी कृष्ण और मसीह बरसाती मेढ़कों की तरह उपज कर टर्राने लगे हैं। इन अवतार वेष धारियों में हर एक अपने को बड़ा साबित करने की कोशिश कर रहा है।

दर्जनों मुसलमान अब तक अपने को कृष्ण होने की घोषणा कर चुके हैं। हैदराबाद के मौलाना मोहम्मद सद्दीक दीनदार अपने को कल्कि अवतार बताते हैं। इस संबंध में उन्होंने एक पुस्तक ‘सरबरे आलम’ भी प्रकाशित की है। सर आगा खाँ को उनके अनुयायी हिन्दू-मुसलमान कल्कि अवतार मानते हैं, इस संबंध में गुजराती में बहुत सा साहित्य छपा है। पिछले कुम्भ के मेले पर लाहौर के एक खाँ साहब ने खूब पर्चेबाजी की थी और लाहौर का पता छपाते हुए बताया था कि यही मुसलमान सज्जन कल्कि अवतार हैं, अब हिन्दुओं को इन्हीं का कहना मानना चाहिये। दिल्ली में एक मुसलमान शंकर अवतार होकर प्रकट हुआ था उसने गौ-माँस खाना पुण्य घोषित किया था, जनता के विरोध करने पर इसे दिल्ली से हटाया गया था। मेहर बाबा के अवतार होने की बात प्रसिद्ध है, साँईखेड़ा के धूनी वाले दादा के संबंध में ‘प्रमाण केशव’ नामक पुस्तक छपी है। जिसमें उनको कल्कि बताया गया है। थियोसोफिकल सोसाइटी की ओर से प्रचार किया जाता है कि महाशय कृष्णमूर्ति में हजरत ईसा की आत्मा है। कलकत्ता के प्रसिद्ध गोविन्द भवन के महन्त श्री हीरालाल जी गोयन्दा का अपने को कृष्ण बता कर लोगों के साथ खूब रास रंग करते थे। पीछे किसी ??? के सतीत्व भंग का भंडा-फोड़ हुआ। सिन्ध की ओम् मण्डली के कर्त्ता दादा लेखराज अवतार बशर्ते उन्होंने अनेक स्त्रियों को पतियों से अलग करा के अपनी सेवा में रख छोड़ा है। इस प्रकार न जाने कितने सज्जन कल्कि अवतार बने फिर रहे हैं।

इसके अलावा अवतार के चेला-चाँटों की तो बरात ही घूम रही है। धौलपुर के एक बाबा जी को अवतार सभा का प्रेसीडेन्ट और देवर्षि नारद का अवतार कहा जाता है। इटावा जिले के एक गाँव में रहने वाले कोई पारसनाथ नागी सज्जन अपने को अवतार का प्रधानमंत्री लिखते हैं और प्रहलाद का अवतार होने की घोषणा करते हैं, इनके प्रतिद्वन्द्वी एक और प्रहलाद जन्मे हैं यह बाबा सुलतान सिंह नामक पंजाबी साधु हैं। अच्छा हो इन दोनों में से एक सज्जन किसी और का अवतार बन जायं जिससे आपस का झगड़ा आपस में ही निपट जाय।

साढ़ौरा (अम्बाला) निवासी श्री बधावाराम जी सैनी कहते हैं कि जब मैं रेलवे में गार्ड था तो भगवान ने एक दिन मेरा रूप बना कर गाड़ी चलाई ये कहते हैं कि अमुक दिन भगवान जन्म लेंगे और मैं पुरुष से स्त्री शरीर बदल कर ‘राधा’ बन जाऊंगा वह तिथि निकल चुकी है पर यह सज्जन अभी जैसे के तैसे बैठे हैं। मुहल्ला खखरा पीलीभीत के श्रीयुत् भगवानदास जी कायस्थ दिव्य-वाणी नामक पर्चा बाँटते थे कि अवतार हो गया। फजलकों (पंजीकरण) के पण्डित राजनारायण शास्त्री ने छपाया था। सम्भल में सम्वत् 1981 में कल्कि भगवान जन्म चुके हैं। परशुराम जी उन्हें शस्त्र विद्या सिखाने के लिये महेन्द्र पर्वत पर उठा ले गये हैं, अब वे सम्वत् 1999 में ऋषियों सहित बंगाल में प्रकट होंगे। स्वामी प्रणवानन्द के सम्बंध में एक पुस्तक छपी कि ‘भगवान स्वयं श्री स्वामी प्रणवानन्द के शरीर में अवतीर्ण हुए हैं। श्री कमल मुनि कहते हैं कि मुझे कल्कि भगवान ने दर्शन दिया है। श्रीमती गंगा बाई का कथन है कि मैं अवतार को देख चुकी हूँ। अभी इसी आश्विन कृष्णा 30 को कुरुक्षेत्र सूर्य ग्रहण के मेले में अनेक सज्जन यह घोषणा करते पाये गये कि वे स्वयं अवतार हैं या अवतार से उनका कुछ संबंध है। प्रयाग के इसी कुँभ में कई अवतारधारियों के एजेंटों के अड्डे पहुँचे थे।

ऊपर कुछ थोड़े से उदाहरण जो हमने सुने हैं, लिखे हैं। इसके अतिरिक्त हर जगह तलाश करने पर अवतार या उसका भाई, भतीजा मिल सकता है। पाठकों को बुद्धि पर जोर देकर सोचना चाहिये कि यह सब अवतार कैसे हो सकते हैं। यदि कदाचित अवतार हो भी गया तो इनमें से एक ही होगा यह सारी की सारी पलटन कैसे हो सकती है। यदि एक सच भी बोलता हो तो बाकी सब झूठे ठहरते हैं। इस संबंध में कुछ निर्णय करने से पूर्व अखण्ड ज्योति के पाठकों को जरा बुद्धि पर भी जोर देना चाहिये।


Quotation

तुम्हें न तो आदमियों की बुराइयों तथा असफलता की नकल करनी चाहिये, न उनकी त्रुटियों की बराबरी करने या उनसे बढ़ने का प्रयत्न करना चाहिये ओर न उनकी बुरी आदतों की नकल करनी चाहिये।

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दूसरे आदमियों से अपने प्रति जिस व्यवहार की तुम आशा करते हो वैसे ही व्यवहार तुम उनसे करो, यही महान नियम है और यही महात्माओं का उपदेश है।

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जो आदमी अपने मन को परमात्मा पर न्यौछावर कर देता है, उस आदमी के मन का संबंध उसके समस्त कार्यों से हो जाता है और वह अवश्य ही कभी न कभी विशेष ज्ञान तथा शक्ति के राजमार्ग पर पहुँच जाता है।


यह दावानल कैसे बुझेगा?

(महात्मा गाँधी)

केवल बातों से वर्तमान युद्ध का यह दावानल शाँत थोड़ा ही होने वाला है? अपने आप तो वह किसी रोज शाँत होगा ही। परन्तु इसका अर्थ यह हुआ कि उसके शाँत होने के पहले यादव संहार होगा। यादव लोग एक दूसरे से लड़ मरे और पृथ्वी का भार हलका हुआ। दावानल धधकता ही रहे, इससे तो बेहतर यह है कि वह यादव संहार के जरिये शाँत हो जाय। परन्तु ऐसी इच्छा कोई नहीं करेगा। इच्छा तो ऐसी करनी चाहिए कि सर्वनाश होने के पहले इस दावानल को कोई न कोई प्रबल अहिंसात्मक प्रयोग से शाँत किया जाय।

हमारे धर्म ग्रंथों में हम पढ़ते हैं कि प्राचीनकाल में जब कोई बड़ी विपत्ति या उपद्रव से बचने के लिए सामान्य उपाय बेकार हो जाते थे, तब लोग तपश्चर्या करते थे यानी सचमुच जलते थे। इन बातों को मैं दंत कथा नहीं मानता। तपश्चर्या के अनेक प्रकार होते हैं। मूढ़ मनुष्य भी तपश्चर्या कर सकता है। आज भी ऐसे लोग पाये जाते हैं। ज्ञानी भी तपश्चर्या करते हैं। तपश्चर्या का अर्थ समझ लेना पाश्चात्य शास्त्रों ने तपश्चर्या करके ही तो आविष्कार किये। तपश्चर्या सहज जगत में जाकर अपने आस-पास धूनी लगाकर बैठने से नहीं होती। ऐसी तपश्चर्या में तो निरी मूढ़ता भी हो सकती है। इसलिए तपश्चर्या का विस्तृत व ठीक अर्थ करना चाहिए।

यह संभव है कि ऐसे तपस्वी बहुत कम हों-इतने कम हों कि उनके काम का कोई परिणाम न निकले लेकिन मैं तो कह चुका हूँ कि-’यदि एक ही व्यक्ति प्रायः पूर्णतया अहिंसक हो तो वह दावानल को बुझाने की सामर्थ्य रख सकेगा।’


कचितस कुँज


कचितस कुँज

(श्री यदुवंशलाल चन्द्र तिलाठी)

प्रश्न

अरे, यह कैसा है व्यापार?

आज खिली थी कोमल कलिका,

कितनी थी उसमें मादकता,

फाँक रही है धल अभी वह-

कहाँ गई उसकी चंचलता?

जीवन के ही पीछे तो है,

मौत सजाये थार॥ अरे.॥

कभी किसी दिन इस उपवन में,

छाया था बसन्त का राज।

आते नहीं विहंग अब इसमें,

गाती नहीं कोकिला आज॥

हंसने के पीछे क्या रहता,

र ने का अधिकार? ॥ अरे.॥

युग सुधार

(श्री सोमनाथ नागर, मथुरा)

मन में ले चिंता भार वहन करते हैं।

कल्पना सदा उर में अशुद्ध भरते हैं॥

कलिकाल बड़ा है विकट यही डरते हैं।

पापों का चिंतन धार पाप करते हैं॥

कह दिया सहज बस धर्म यही इस युग का।

लो नाम न कलियुग बीच आज सतयुग का॥

मन में आती है आज क्राँति का पथ लूँ।

युग परिवर्तन की ऊंची सत्य शपथ लूँ॥

युग परिवर्तन तो नित्य हुआ करता है।

जब सदाचार का ज्ञान हृदय भरता है॥

सुविचार हृदय में आये-सतयुग आया।

प्रभु आदेशों से पूर्ण धर्म पथ पाया॥

बस रोको मन का यंत्र न आगे बढ़ना।

कुविचारों को ला पुनः न कलि में पड़ना॥

हो विश्व सुखी यह परम कामना मन की।

स्वीकार करो यह विनय नाथ निज जन की॥


पौराणिक सतयुग में देर है।

(श्री रामदयाल जी गुप्ता, नौगढ़)

विभिन्न मतों का अनुशीलन करने से मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि पुराणों में वर्णित सतयुग तो अभी दूर है, पर कुछ समय के लिए अच्छा समय जरूर आवेगा। जो करीब-करीब सतयुग के ही समान होगा। सूरदास के प्रसिद्ध पद में कहा गया है कि-’अस्सी वर्ष को सतयुग आवे, धर्म की बेली बढ़े।’ इसमें कुछ थोड़े समय के लिए ही सतयुग के आगमन का उल्लेख है। अखण्ड-ज्योति के पिछले किसी अंक में पं. भोजराज जी शुक्ल ने लिखा था कि जैसे दिशोत्तरी दशा में सब ग्रहों की अंतर्दशाएं आती हैं इसी प्रकार एक युग को अन्य युगों की भी अंतर्दशाएं बरतती हैं, संभव है इसी प्रकार कुछ समय के लिए नवीन युग आवे और पुनः वह पुराना समय बरतने लगे।

कल्याण सम्पादक श्री हनुमान प्रसाद जी पोद्दार ने एक बार लिखा था कि इस दुनिया रूपी शरीर में दुष्टजन रूपी घाव बढ़ गये हैं। उन घावों को मिटाने के लिए आपरेशन हो रहे हैं ताकि शरीर स्वस्थ हो जावे। दुष्टजनों का संहार होने पर दुनिया में कुछ समय शाँति रहेगी। यह शाँति सतयुग के समान होगी पर वास्तविक सतयुग अभी दूर है।

ऐसे ही अन्य लोगों के विचार हैं कि कुछ समय के लिए ही नवीन युग आवेगा। पर पौराणिक सतयुग में तो अभी देर है।


Quotation

जिस प्रकार झाड़ियों पर अंजीर तथा बबूलों पर आम नहीं लग सकते, ठीक उसी प्रकार दुर्बल मन से दृढ़ चरित्र पैदा नहीं हो सकता।


युद्ध से आत्म-रक्षा का उपाय

(मनुष्यों को कुरान शरीफ का संदेश)

व मा ऽकाऽना रब्बुका लियुह्लि कल् कुरा वि जुल्मिब्व अहलुहा ऽमुस्लहू न्॥

सूरये हूद मं. 3 पारा 12 रु. 10

अर्थ-’और तेरा पालन कर्ता ऐसा नहीं है कि नगरियों को बल पूर्वक नष्ट करे (ऐसी अवस्था में जब कि) लोग वहाँ के नेक हों।’

महायुद्ध की विभीषिका हमारे चारों ओर जीभ लपलपा रही हैं, ऐसे समय में स्वभावतः पाठक के हृदयों में अनिष्ट की आशंका काँपती होगी। ऐसे समयों के लिए कुरान की उपरोक्त आयत बहुत ही धैर्य बंधाने वाली है। उसका आदेश है कि यदि हम नेक बनें और अपनी आत्मा को पवित्र बना लें, तो निस्संदेह अपनी नगरियों को बलपूर्वक नष्ट होने से बचा सकते हैं, इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। कुम्हार के जलते अवे में बिल्ली के बच्चों को जीवित रखने वाला हमें भी बचा सकता है। सीता जी अग्नि की लपटों में से बिना किसी प्रकार की क्षति के बाहर आती हैं, तो यह भी संभव है कि सत्य के उपासक व्यक्ति इस होली जैसे दावानल में से प्रह्लाद की तरह हंसते हुए निकले। ईश्वर हमारी रक्षा कर सकता है, वह पालनकर्ता हमारी नगरियों को नष्ट न होने देगा, बशर्ते लोग नेक बनें।

विपत्ति पास है और संकट निकट है, फिर भी धैर्य धारण करना चाहिये। क्योंकि परीक्षित ने सात दिन का अवसर पाकर बहुत कुछ कर लिया था, गणिका और अजामिल को तो कुछ क्षण ही प्राप्त हुए थे। हम लोग पापी हों, पिछला जीवन कितना ही बुरा रहा हो पर आज ही हमें प्रभु की शरण में जाना चाहिये, पिछले बुरे कर्मों के लिए क्षमा माँगते हुए आगे से ईश्वराराधन, आत्मशुद्धि, पवित्र आचरण एवं सत्य, प्रेम, न्याय, की उपासना में प्रवृत्त हो जाना चाहिए। सच्चे हृदय से शरण में आये हुए जनों का भगवान तिरस्कार नहीं करते और उनके पिछले पापों पर ध्यान न देकर तुरन्त ही गोद में उठा लेते हैं। ऐसे निष्काम शरणागतों की रक्षा और योगक्षेम की जिम्मेदारी उन प्रभु के ही कंधों पर ही पड़ जाती है।

प्रभु नहीं चाहते कि हमारी सुरम्य नगरियाँ बलपूर्वक नष्ट हो, अल्लाह को यह पसंद नहीं है कि उसका यह गुलज़ार चमन वीरान हो जाय। परन्तु जब मनुष्य अपनी मर्यादाओं को छोड़कर पापों में प्रवृत्त होता है और शैतान की उपासना करता है, तो उसका प्रतिफल मिलना आवश्यक हो जाता है। बढ़े हुए पापों को नष्ट करने के लिए जो निष्ठुर प्रतिकार करना पड़ता है, उसमें सदोषों के साथ निर्दोष भी पिसते हैं। इस विनाशलीला से बचने के लिए हमें उसी की छाया में अपना डेरा डालना होगा जो इस विभीषिका से हम सब को बचाने की पूरी-पूरी क्षमता रखता है और जिसकी दृष्टि मात्र से विपत्तियों के बड़े-बड़े बादल सहज में ही उड़ जाते हैं।

अखण्ड ज्योति के पाठक युद्ध या विपत्ति के बुरे से बुरे समाचार सुनकर भी घबरावें नहीं वरन् धैर्य धारण करें और दृढ़तापूर्वक, आज ही इस क्षण ही भगवान सत्यनारायण की शरण में अपने को अर्पण कर दें। पाप भावनाओं को छोड़कर अपने हृदय को पवित्र बना लें। नेक बनने का निरन्तर प्रयत्न करते रहें। इस प्रकार हमारी नेकी, हमारे शरीर, कुटुम्ब, परिवार, नगर तथा देश की रक्षा करेगी और अल्लाह बलपूर्वक हमें नष्ट न होने देगा।


केवल चिकित्सा-चन्द्रोदय सात भाग से

आयुर्वेद-आचार्य परीक्षा पास की और स्वर्ण-पदक प्राप्त किया।

एकलव्य और गुरु द्रोणाचार्य का उदाहरण

श्रीमन् महोदय श्री 108 पूज्य वैद्य राज जी, साष्टाँग दण्डवत्!

‘मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि मैं आपका शिष्य होऊं तथा श्रीमान के आयुर्वेदिक ज्ञान से अपने को कृत्कृत्य करूं। मैं हृदय से सदैव आपको ही अपना गुरु मानता हूँ, कारण सन् 1922 से मैं आयुर्वेदिक का अभ्यास कर रहा हूँ। और इसका श्रीगणेश श्रीमान की लिखी पुस्तक चिकित्सा चन्द्रोदय के द्वितीय संस्करण से आरंभ होता है और उसी की सहायता से अखिल भारत विद्वत् सम्मेलन से स्वर्ण पदक परीक्षा में बैठ कर 80 विद्यार्थियों के साथ आयुर्वेदाचार्य की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की है तथा पूर्ण सफलता से काम कर रहा हूँ। उपरोक्त परीक्षा में समस्त परचे चरक, सुश्रुत, वाग्भट्ट, शारंगधर, माधव, निदान, चक्रदत्त, रसरत्न समुच्चय इत्यादि में से बनाये गये थे। प्रथम परचे जब सामने आये और उक्त पुस्तकों के नाम देखे तो हृदय संसक्ति हुआ कि मैंने यह पुस्तकें देखी तो है नहीं, फिर किस प्रकार उत्तर दूँगा, किन्तु जब प्रश्नों को समझा तो वही विषय था, जो नित्य आपकी पुस्तकों में देखा करता था। अतएव भगवान का ध्यान करके लिखने लगा तो हरि इच्छा से 80 विद्यार्थियों में सर्वप्रथम आकर स्वर्ण-पदक सम्मान प्राप्त किया।

इस प्रभु के चमत्कार को देखकर स्वयं परीक्षकगण कहते थे कि, आपकी तरफ से यह आशा न थी। कारण साथियों में से अधिकाँश उन्हीं संस्कृत पुस्तकों को सैंकड़ों बार पढ़कर परीक्षा में सम्मिलित हुए थे, किन्तु उन महान ग्रंथों में जो गूढ़ विषय है, उनको न समझने के कारण उन्हें असफल होना पड़ा। स्वयं परीक्षक श्री शास्त्री विद्यासागर, कव्यतीर्थ, साहित्याचार्य, महामहोपाध्याय, विश्वविद्यालय दक्षिण हैदराबाद प्रोफेसर हरिहर द्विवेदी जी ने स्वर्ण-पदक प्रदान करते समय यह कहा कि, हम नहीं जानते थे कि संस्कृतज्ञों के मध्य में एक हिन्दी जानने वाला इस पदक का भागी होगा, अतः यह सब सम्मान भगवन् आप ही का है। अब अन्तिम इच्छा यही है कि जो ऊपर प्रगट कर चुका हूँ, दया कर स्वीकार कीजिये। आज्ञा पाते दास सेवा को उपस्थित होगा तथा जो आयुर्वेद के गूढ़ विषय मेरी बुद्धि से परे हैं, उनकी व्याख्या गुरु-मुख से सुन अपने को कृतार्थ करूंगा, तथा गुरु-भार से उऋण हो अपने कर्त्तव्य का पालन करूंगा। वह एकलव्य और द्रोणाचार्य का उदाहरण है।

आज्ञाकारी-

हरिदास एण्ड कम्पनी आयुर्वेदाचार्य कु. मुहताबसिंह शास्त्री

गली रावलिया, मथुरा। य़ह्. रुड्डद्धह्लड्डड्ढ स्द्बठ्ठद्दद्ध स्द्धड्डह्यह्लह्द्ब

रियासत चंदाबारा, पोस्ट जलेसर, जिला मथुरा।


जीवन का गीत!


जीवन का गीत

(ले. श्री रामावतार जी शुक्ल)

जीवन की यह रागिनी नयी, पर जीवन गीत पुराना है।

युग युग से मैं घूमता विकल, युग युग से अलख जगाता हूँ।

प्रति पल पाकर वेदना नयी, मैं हृदय गलाये जाता हूँ।

आती मीठी सी याद कभी, आता कोई उन्मान कभी-

अपनी टूटी सी वीणा में, मैं रह रह तान मिलाता हूँ।

बोलती हृदय की मधु पीड़ा, अपना यह नया तराना है।

जीवन की यह रागिनी नयी, पर जीवन गीत पुराना है॥

(2)

आते कितने रोकने राह, रुकता फिर नहीं गीत मेरा।

अपना कहने को विक्ल कई, कहता कुछ फिर अतीत मेरा।

हूँ गायक अपने मानस का, मैं स्वयं सुनूँ अपना गाना-

मैं नित्य नया ही गाता हूँ, स्वर होता फिर पुनीत मेरा॥

ठोकरें नई मिलती प्रति जण, उनसे पूरित यह गाना है।

जीवन की यह रागिनी नयी, पर जीवन गीत पुराना है॥

(3)

फूलों को अगर सुनाता मैं, शूलों से मिलती सीख मुझे।

मरु की रेती में भटक भटक मिलती अभाव की भीख मुझे।

कोई पथ का स्वामी नहीं, कारवां अकेला जाता है-

पग पग पर मिलती जाती है, उपहार रूप में चीख मुझे॥

मैं गायक हूँ अपने मन का, मुझको अपना ही गाना है।

जीवन की यह रागिनी नयी, पर जीवन गीत पुराना है॥

-विश्वामित्र।

*समाप्त*