युग प्रभात (कविता)

(श्री प्रफुल्लचन्द्र पट्टनायक)

तुम फटा काल निशि दूर हुई,

रवि आया मंगल ध्वज फहरा।

बदले उलूक फड़फड़ा पंख,

उड़ गया किधर हँस उठी धरा॥

खोला नवयुग ने आरुण पलक,

गया रच नव नव गीत छन्द।

पाया मानव ने आत्मिक बल,

उठ गये जगत से मीत बन्ध॥

(2)

युग युग के बंधन छिन्न हुए,

मानव जो व्याकुल भीत त्रस्त।

फिर अभय उसे वरदान मिला,

बह उठा जो पड़ा मोह ग्रस्त॥

चल पड़ा देख स्वच्छन्द बात,

गाते पद कोमल सर सर सर।

लाया प्राणों में मधुर गन्ध,

किस वन उपवन तरु से भर भर॥

(3)

इस नील व्योम से गूँज उठा,

ओंकार प्रणव का महा मन्त्र।

लग गयी वन्हि हो गये क्षार,

संस्कृति नाशक विज्ञान यन्त्र॥

स्वागत हे नव युग सत्य रूप,

हे चिर मंगलमय स्नेह सिन्धु।

हे दया क्षमामय ताप हरण,

अज्ञान तिमिर के शरद इन्दु॥

-संघर्ष


कारण-कार्य विवेचन

सम्प्रति विश्व में इतस्ततः यह उद्घोष हो रहा है, कि निकट भविष्य में युग परिवर्तनार्थ विश्वाधार जगद् गुरु का आविर्भाव होने वाला है। जिसका सम्बोधन यथा विधि अध्यात्मकों ने अध्यात्मविद्या से, नैयायिकों ने नीति सिद्धान्तों से, तत्वज्ञों ने तात्विक विवेचन से और गणितज्ञों ने गणित के प्रमाणों से प्रस्तुत सत्युगाँक में बड़ी खूबी के साथ कराया है।

मेरा अपना भी यह अभिमत है कि अनेक जन्मों में लौकिक और पारलौकिक बहुशः अनुभवों से परिपक्व और पूर्ण होकर जीव पूर्णता की ओर जाता है। जिन विशिष्ट बातों को वह एक जन्म में सीखने से वंचित रहता है, उन्हें उत्तर जन्म में सीखता है और अन्ततः उस कक्षा में जा पहुँचता है, जहाँ सीखना बिलकुल शेष नहीं रह जाता। उस स्थिति में उसका संसार में आना और कार्य सम्पादन करना, उसकी एकान्त इच्छा पर या ईश्वराज्ञा, पर अवलम्बित रहता है।

ऐसे ही कैवल्य प्राप्त या मुक्त पुरुष गुरुजन रूप से संसार का व्यवस्थापन करते हैं। क्योंकि कभी कभी संसार की अव्यवस्थित और अप्रयोजनीय अवस्था के परिवर्तनार्थ वे पार्थिव शरीर भी धारण करते हैं और उचित तथा अनुचित का सम्पादन कर पुनः अपने लोक को प्रयाण कर जाते हैं।

इसके अतिरिक्त जब कि कार्य-सृष्टि में ऐसा असन्तुलन परिलक्षित होता है, जो उक्त महान आत्माओं द्वारा सम्यक् रूप से निवारित नहीं हो सकता, तब कारण स्वरूप परब्रह्म परमेश्वर को अपनी विशेष शक्ति नियोजित कर सृष्टि को सन्तुलित करना अनिवार्य हो जाता है। इसीलिये जगनिवास, जगदीश्वर को निज व्यवस्थापक गुण का सन्तुलन कार्य करना पड़ता है। उसी कर्त्ता आद्यशक्ति और व्यवस्था कर्त्तव्य गुण सम्पन्न विग्रह को बुद्धिमान अवतार रूप से अभिहित करते हैं। उसकी पूजा−अर्चा में निरत रहते हैं, जो कि हमारे कल्याणार्थ सर्वथा उचित भी है।

क्योंकि सृष्टि के सचराचर प्राणियों का यह स्वभाविक गुण है कि वे उपरोक्त ईश्वरीय-व्यवस्थापक गुण के अनुसार अपने अपने आत्मजों को जब कभी संकटापन्न अवस्था में देखते और अनुभव करते हैं, जो कि उनके पक्ष में अनिवार्य होता है, तब वे स्वयं उन्हें अपनी अपनी बुद्धिबल आदि गुणों के अनुसार संकट से बचाते हैं।

यह समग्र सृष्टि परम पिता परमेश की आत्मज हैं, क्योंकि वह सब में आत्म रूप से विद्यमान है। अतः जब सृष्टि अपनी संरक्षा करने में अक्ष्य और असमर्थ सिद्ध होती है। तब परम प्रभु परमात्मा को अपने पारमात्मिक गुणों का विशेष रूपेण प्रयोग करना पड़ता है।

कहने का प्रयोजन नहीं कि प्रस्तुत अंक का कलेवर इस विषय के ऊहापोहात्मक निबन्धों से परिपूर्ण है और उनके द्वारा जिज्ञासुओं को इस विषय की मानसिक ठोस भोजन पूर्ण सामग्री अनायास प्राप्त होती है।

अब प्रश्न यह है कि युग परिवर्तन क्या है? ‘युग‘ परिस्थिति सूचक काल या समय को कहते हैं। व्यवस्थित परिस्थिति सूचक समय कलियुग और सुव्यवस्थित परिस्थिति सूचक समय सतयुग कहलाता है।

जब सृष्टि में आसुरी संपदा विलुप्त होने लगती है, अथवा आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य जो परपीड़ा में ही अपना मंगल सोचते, कर्त्तव्य कार्य में प्रवृत्त होना और अकर्त्तव्य से निवृत्त होना जानते ही नहीं, अगणित संख्या में बढ़ जाते हैं, उनमें सुव्यवस्थापक गुण बाह्य और अन्तर की शुद्धि तथा सत्य भाषण आदि की प्रभावना नहीं रहती। द्वेष, ईर्ष्या, घृणा, अभिमान आदि कुप्रवृत्तियां उन्हें अपना लक्ष्य बेध बना लेती हैं, तो वे नाना प्रकार के मारात्मक और सृष्टि संहारक कार्यों का अनुष्ठान करते हैं।

ऐसे ही असंयत और अव्यवस्थित काल को कलियुग और जब विभ्रान्त तथा विपर्यस्त जीवों को इन आसुरी सम्पदा वालों का निधन देख कर वास्तविक चैतन्य लाभ हो जाता है, निर्बल बलवानों के दया पात्र होकर उचित संरक्षता प्राप्त करते हैं और सर्वत्र सब अवस्थाओं में प्रेम, परोपकार, न्याय, संवेदना प्रभृति गुण उत्कर्ष पाते हैं, उस स्वर्ण के समय को ही सतयुग कहते हैं।

अतएव मनुष्य मात्र को उपरोक्त लोकोत्तर गुणों के प्रगटीकरण द्वारा अपने में देश और काल की हित सम्वर्द्धना के नाते पात्रता उत्पन्न करना चाहिये। आसुरी वृत्तियों के शमन और दैवी-वृत्तियों के सेवन का ही दूसरा नाम-सतयुग का आवाह्न कर्म है, मानव इसका हृदयंगम करते हुए साधना पथ में अपने को उत्तरोत्तर अग्रसर होने दें, यही कामना है। शुभमस्तु।

- ऋषिराम शुक्ल।


भक्तों! मैं आ रहा हूँ!

(संसार को ईश्वरीय सत्ता का अमर सन्देश)

“घबराओ मत, मैं आ रहा हूँ,” सुनिए, अन्तरिक्ष को चीरती हुई यह दिव्य आकाशवाणी कितनी साफ सुनाई दे रही है। जिनके कान हों, वे सुनलें। दिशाएं उसकी हुँकारों से गूँज रही हैं, तूफान की तरह सनसनाता हुआ, आँधी की तरह चीत्कार करता हुआ, मेघों की तरह गड़गड़ाहट सुनते हो, पर अवतार के आगमन की हुँकार क्यों नहीं सुनते हो।

अदृश्य लोक से एक प्रवाह उमड़ता हुआ चला आ रहा है। जिनके आँखें हों वे देखलें। सुमेरु पर्वत की तरह आकाश में बड़े-बड़े विशालकाय बादल उठते हुए चले रहे हैं। यह अवतार के आगमन की सूचना है। दिग्गज चिंघाड़ रहे हैं, महीधर काँप रहे हैं, इन्द्र का आसन विचलित हो गया है, आकाश से तड़तड़ाते हुए तारे टूट रहे हैं, भगवती भागीरथी की आयु समाप्त हो गई, आज तो रुधिर के नदी नाले उफान लेते हुए उमड़ रहे हैं। नर मुण्डों को अपने कराल दांतों से कड़-कड़ चबाता हुआ महाकाल, व्योम-भेदी अट्टहास कर रहा है। बहुत दिनों के पीछे - एक युग पश्चात ऐसा अवसर उसे मिला है न ? द्वापर के अन्त में अठारह अक्षौहिणी सेना को उदरस्थ करने के पश्चात अब तक भूख बुझाने का ऐसा अवसर उसे नहीं मिला था। चिर प्रतीक्षा के बाद इस युगान्त में फिर उसे अवसर मिला है, तृप्ति की कैसी ऊर्ध्व डकारें ले रहा है। चामुण्डायें खप्पर भर-भर कर रुधिर पान कर रही है। इस कुहराम को चीरती हुई प्रकाश की एक दिव्य किरण हम तक आ रही है। वह चुपके चुपके कानों में पड़ती है- “घबड़ाओ मत, वह आ रहा है। “

आ रहा है। हाँ हाँ, वह आ रहा है। पाप तापों से तब की तरह जलती हुई वसुन्धरा की छाती को ठण्डी करने के लिए अवतार आ रहा है॥ भगवान भूतनाथ अपनी चतुरंगिणी सेना को लेकर स्वागत की तैयारी में जुटे हुए हैं। सफाई का काम जोरों से हो रहा है। गौरीवल्लभ ने आनन्द से विभोर होकर अपना तीसरा नेत्र खोल दिया है और कल्प-कल्पान्तरों से भरे हुए कालकूट की कुछ बूँद नीलकंठ में से निकाल कर इस पाप पंक के ऊपर छिड़क दी है, ताकि बढ़े हुए झाड़-झंखाड़ जल भुन जायें और कटीली भूमि साफ हो जाये। भूख, रोग, शोक, युद्ध ऐसे कितने ही वीरभद्र अपने आकाशचुम्बी फावड़े लेकर जुटे हुए हैं, ताकि सब और सफाई हो जावे। क्योंकि अवतार आ रहा है। स्वागत के लिए सफाई तो बहुत ही जरूरी है।

मरघट में अपने प्रिय-जन की अंत्येष्टि किया करके उपस्थित जनों में वैराग्य का भाव उदय होता है। सदियों से पली हुई तामसी सभ्यता की आज अंत्येष्टि हो रही है। चिता धू धू कर जल रही है, उसकी लपटें सूर्य चन्द्र तक पहुँचने का प्रयत्न कर रही हैं। चिनगारियाँ उड़-उड़ कर चारों और व्याप्त हो रही हैं। बैठे और खड़े हुए, जागते और सोये हुए, निकटवर्ती और दूर पड़े हुए, सभी तक यह चिनगारियाँ उछट-उछट कर पहुँच रही हैं। सभी को झुलसना पड़ रहा है, किसी की देह फफोलों से खाली नहीं है। अपनी इस चिर-पोषित प्रेमिका तामसी-सभ्यता को भस्म-सात करके विश्व की अन्तरात्मा में वैराग्य का उदय हो रहा है। आज का प्रज्ज्वलित मरघट मानो लाठी लेकर सिखा रहा है कि-आग से खेलने वालो, सावधान! बस बहुत खेल चुके, अब सँभल जाओ। तुम्हें होश में लाने वाला आ रहा है। अवतार आ रहा है।

बेचारा इन्सान, हाड़ माँस की गठरी में बँधा हुआ खिलौना, तारे तोड़ना चाहता है, चन्द्रमा से खेलना चाहता है, काल को पाटी से बाँधना चाहता है, कर नहीं पाता। भैंस को घास चरने के लिए भेजा है केशर के खेतों को खाने के लिए नहीं। जब वह घास को छोड़ कर वाटिका की सुरम्भ हरियाली को चर जाने के लिए चलती है, तब वाटिका का माली चिल्लाता है- “खबरदार! टांगे पैर न बढ़ाना, मैं आ रहा हूँ। “ आज भी कोई हमसे यह कह “बस, बहुत हो चुका। अब मैं आ रहा हूँ।”

आने वाला आ रहा है- वह सचमुच ही आ रहा है। क्योंकि वह अपनी प्रतिज्ञा मैं आप बँधा हुआ है साधुता का पारत्राण करने और दुष्टता के नाश करने की उसकी जिम्मेदारी है। इससे भी और बुरा समय भला फिर कब आवेगा, जिसकी प्रतीक्षा में वह बैठा रहे। अब धर्म का अन्त हो चुका है, प्रतीक्षा की वेला व्यतीत हो चुकी है। पाप और पशुता की वेदना से पीड़ित जगतजननी आद्यशक्ति, हिरण्यगर्भ के समक्ष उत्पन्न हुई, नयनों में से जल वर्षा रही है। प्रभु! उसे आश्वासन देते हुए कह रहे हो- “मैं आ रहा हूँ। स्वार्थ और असत्य का साम्राज्य मिटाने के लिए, प्रेम और सत्य की कलाएं भूलोक में भेज रहा हूँ। अपनी त्रैलोक्य मोहिनी वेणु को यही से निनादित करके प्रबुद्ध आत्माओं में स्फुरणा पैदा करता हूँ। मुक्तों को प्रीति और बद्धों को प्रतीति कराने के लिए प्रकाश की सुनहरी आभा प्रगटाऊँ। हे आद्यशक्ति! रुदन मत करो। मैं प्रतिज्ञा को भुलाऊँ नहीं। जाओ, पृथ्वी पर कह दो कि- मैं आ रहा हूँ।”

‘मैं आ रहा हूँ। यह दिव्य वाणी आज सर्वत्र गुंजित प्रतीत होती है। नद, नाले, वृक्ष, पर्वत, सरिता, सागर, पशु, पक्षी सब से एक ही प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है, “मैं आ रहा हूँ।” जब हृदय पर हाथ रखते हैं, तो ‘लप’ ‘उप’ की आवाज सुनाई नहीं देती, वरन् एक दूसरा ही वाक्य समझ में आता है- मैं आ .... ता हूँ। नेत्र बन्द करके मानसलोक झाँकी करते हैं, तो दूर- क्षितिज के पार, मधुर मुरली बजाता हुआ, मन्द मुसकान के साथ वही नट-नागर नीचे उतरता आता दिखाई देता है। वह हाथ के इशारे से हमें आदेश देता है।- मैं। आ आ रहा हूँ। भक्तों! घबराओ मत, मैं आ रहा हूँ।


कलियुग का घातक भ्रम

(एक यूरोपियन विद्वान का दृष्टिकोण)

हिन्दुस्तान में रहते हुए मुझे एक लम्बा अरसा हो गया। इस बीच में मैंने हिन्दू धर्म ग्रन्थों का बड़ी रुचि के साथ मनन किया है और कितनी ही बातें ऐसी पाई हैं, जो अन्य धर्मों की पुस्तकों में मिलना मुश्किल हैं, हिन्दू धर्म को मानव धर्म कहा जा सकता है। यह एक आचार शास्त्र है, जो मजहबों की बनिस्बत कही ऊँचा है। सनातन वैदिक धर्म इतना परिपूर्ण है कि उसमें दोष निकालना बहुत कष्ट साध्य है।

मनुष्य को उसके ईश्वरत्व का बोध कराने, आत्मा को निरंतर उन्नतिशील बनाने और आशा, उत्साह एवं स्फूर्ति उत्पन्न करने वाली शिक्षाओं से हिन्दू धर्म भरा पूरा है। क्या वेद, क्या उपनिषद्, क्या दर्शन, क्या अन्य शास्त्र सब में ऐसे प्रवचनों का भंडार भरा हुआ है, जो आत्म शक्ति को प्रेरणा देकर मनुष्य को कर्तव्य धर्म पर लगाने वाले हैं, जहाँ कहीं भविष्य कथन का प्रसंग आया है, वहाँ भी ऐसा ही आश्वासन दिया गया है कि बुराई के बढ़ते ही उसका नाश कर दिया जायेगा। अधर्म की झन्डियों को अधिक नहीं बढ़ने दिया जायेगा।

भारतीय खगोल विद्या का एक बार मैं अध्ययन कर रहा था, तो उसमें युगों का प्रसंग आया। मैंने समझा कि यह एक माप दंड है और जैसे हजार, लाख, करोड़ शब्दों के अंतर्गत एक नियत संख्याओं का बोध होता है, वैसे ही समय की लम्बी अवधि को व्यवहार में सुगम करने की वजह से युगों का पैमाना बनाया गया है। इस गणित परिपाटी से मुझे प्रसन्नता ही हुई।

बहुत दिनों बाद कुछ पुस्तकों में मैंने ऐसा उल्लेख पाया कि ‘वर्तमान समय में कलियुग है और इस कलियुग में बुराइयों का ही साम्राज्य रहेगा। भलाई के तीन पाँव टूट जायेंगे और लँगड़ी लूली किसी कोने में पड़ी सड़ती रहेगी। इस युग में शैतान का राज्य होगा, लोग झूठ बोलेंगे, चोरी करेंगे, आपस में लड़ेंगे-भिड़ेंगे, बीमार रहेंगे, गुलाम रहेंगे मतलब यह है कि सिर्फ बुराइयाँ ही बुराइयाँ दिखाई देंगी और उस कलियुग नामक किसी भूत पिशाच का राज रहेगा, जो ईसाई धर्म में वर्णित शैतान की तरह है। यह ‘कलियुग‘ भले आदमियों को भी पकड़-पकड़कर पाप कर्मों में लगा देगा, अच्छे कामों को जबरदस्ती मिटा देगा और धर्म की उन्नति न होने देगा।” इस तरह तो मैं इसे किसी लेखक की सनक समझता रहा, पर जब कई बड़ी बड़ी पुस्तकों में भी यही बातें पढ़ी, तो मैं बहुत झुँझलाया कि हिन्दू धर्म जैसे विशुद्ध प्रेरक विज्ञान में यह गड़बड़ कहाँ से आ मिली?

शंका का निवारण करने के लिए मैंने अपने कई संस्कृतज्ञ मित्रों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि कलियुग में शैतानी राज होने की बात बहुत मशहूर है, उसका बहुत प्रचार हुआ है और आम तौर से जनता यह विश्वास करती है कि इन दिनों कोई भला काम नहीं हो सकता ईश्वर की इच्छा है कि अब बुराइयाँ ही बुराइयाँ रहेगी, धर्म की कोई पूँछ न रहेगी। यह खयालात सिर्फ जाहिलों और अन्धविश्वासियों के ही नहीं हैं, बल्कि पढ़े-लिखे ज्ञानी और पण्डित भी इस बात पर यकीन करते हैं।

इस समाधान से मेरे दिल को बहुत चोट पहुँची और अब तक यह नहीं समझ सका हूँ कि हिन्दूधर्म के मूलभूत सिद्धान्तों से बिलकुल विपरीत, बिलकुल अनमिल, यह सत्यानाशी धारणा कहाँ से घुस पड़ी और वे कौन लोग थे जिन्होंने धर्म ग्रन्थों तक में इस बात को शामिल कर लिया। मनोविज्ञान शास्त्र का मैं पण्डित तो नहीं हूँ पर बहुत कुछ इस सम्बन्ध में जानने का मेरा विनम्र दावा है। संसार की सभी जातियों की वहबूदी और नेस्ती के कारणों का मैंने अध्ययन किया है, इस आधार पर मैं कह सकता हूँ कि सर्वत्र एक ही नियम काम में आया है आता रहेगा कि ‘मनोवृहित के कारण उत्थान पतन होता है। -”जहाँ के लोगों के दिमागों में उठने-चलने, बढ़ने और महत्व प्राप्त करने के संकल्प होते हैं, वे ऊँचे उठते जाते हैं। किन्तु जिस देश या जाति में निराशा, उदासीनता, हतोत्साह, भाग्यवाद, आलस्य और भविष्य के अन्धकारपूर्ण होने के विश्वास होते हैं, उसे पतन के गड्ढ़े में गिरना पड़ेगा, चाहे वह कितने ही उन्नत स्थान पर स्थित क्यों न हो।

मैंने यह भी देखा है कि जब किन्हीं समर्थ लोगों को यह आवश्यकता हुई है कि दूसरों को अपने वश में रक्खें, तो उन्होंने सर्वत्र उन्हें, उन्हीं के मानसिक बन्धनों में बाँधा है। क्योंकि बलात् किसी को अधिक समय तक बन्धन में नहीं रखा जा सकता। यदि कोई पशु स्वेच्छा से बन्धन स्वीकार न करे, तो उसे केवल जबरदस्ती से आधीन नहीं रखा जा सकता। शूद्रों और दासों को इसलिए बन्धित रखा जा सका है कि, पहले उनकी मनोवृत्ति में दासता घूँसा दी गई है। पुरुष जाति ने स्त्रियों के मन में भी इसी प्रकार भाव घुसाये हैं। कई देश अब भी ऐसे पाये जाते हैं, जहाँ यह कार्य सफल नहीं हुआ है, वहाँ स्त्रियाँ पुरुषों के समान काम करती हैं और कही-कहीं तो बिल्कुल उलटा है। पुरुष तो घर का काम काज स्त्रियों की तरह करते हैं और स्त्रियाँ राज-दरबार बहादुरी, कमाई तथा लड़ाई के काम करती हैं। वहाँ की स्त्रियों में पुरुषत्व और पुरुषों में स्त्रीत्व का स्वभाव पाया जाता है।

इस मनोवैज्ञानिक सत्य, कलियुग की निराशा जनक भावना और करीब एक हजार वर्ष की भारतीय पराधीनता को जब में एक स्थान पर रख कर एक साथ विचार करता हूँ, तो ऐसा प्रतीत होता है कि हिन्दू जाति की नसों में इस जहरीले विष की पिचकारी किसी बड़े भारी कूटनीतिज्ञ द्वारा दी गई होगी, जो हिन्दुस्तानियों को बहुत लम्बी मुद्दत तक पराधीन रखना चाहता होगा। हो सकता है कि इस भावना को फैलाने में कोई बड़ा भारी गुप्त षड़यंत्र छिपा हुआ हो और उसे धर्म-ग्रन्थों का आश्रय मिल जाने के कारण अब तक पहचाना न जा सकता हो।

मेरे सन्देह की पुष्टि इस बात से भी होती है कि कलियुग में पतन ही पतन होने की चर्चा केवल उन्हीं पुस्तकों में पाई जाती है, जो एक हजार वर्ष से कम समय की ही लिखी हुई सिद्ध होती हैं। हिन्दु सभ्यता के प्राचीन ग्रंथों में युगों का उल्लेख तो है, पर उसका वर्णन काल-माप की तरह ही किया गया है। जैसे साल, छमाई, महीना, पक्ष, सप्ताह आदि है, उसी प्रकार युग भी एक गणना के बोधक है। ऐसा पूर्व कालीन ग्रन्थों से विदित होता है।

चार लाख बत्तीस हजार वर्ष का कलियुग होगा और इतने दिन तक अन्धकार रहेगा। यह विचार-धारा अत्यन्त ही झूठी, बेहूदी, बुद्धि रहित और खतरनाक है। यदि वर्तमान पीढ़ी ने बौद्धिक क्रान्ति करके इन आत्मघाती ख्यालों को जड़मूल से उखाड़ कर न फेंका, तो भविष्य बड़ा ही दुखपूर्ण बना रहेगा। क्योंकि परिस्थितियाँ वैसी ही सामने आती हैं, जैसा कि लोगों का विश्वास होता है।

ज्योतिष गणित के हिसाब से तो वह युग-काल बिल्कुल गलत है। क्यों कि ज्योतिष के अनुसार सृष्टि के आदि से अब तक 6 मन्वन्तर और 28 चतुर्युगी व्यतीत हो चुकी हैं। 72 चतुर्युगी का एक मन्वन्तर होता है॥ इस प्रकार 6 मन्वंतरों में 32 चतुर्युगी और इस सातवें वैवस्त्रत मन्वन्तर में 28 चतुर्युगी, इस प्रकार वर्तमान कल्प में 460 चतुर्युगी व्यतीत हो चुकी है। पृथ्वी की आयु करीब एक करोड़ वर्ष मानी जाती है। युगों का क्रम इस प्रकार है कि - कलियुग से दूना द्वापर, तीन गुना त्रेता और चार गुना सतयुग होता है। गत 460 चतुर्युगी यदि एक करोड़ वर्ष में बाँटी जायँ, तो एक चतुर्युगी 21739 वर्ष की होती है। चतुर्युगी में दसवाँ भाग कलियुग का है, इसी तरह कलियुग 2173 वर्ष का हुआ। विक्रमी संवत् से यदि कलियुग का आरंभ माना जाये, तो वह समाप्त होने को है। क्योंकि पृथ्वी की आयु अधिक से अधिक एक करोड़ वर्ष कूती गई है। वह इससे कम ही होगी, तो यह 171 वर्ष भी कम हो जावेंगे। दूसरे यह वर्तमान चतुर्युगी भी समाप्त होने को है, इसका भाग कम करने पर भी यह वर्ष घटेंगे। तीसरे युग के आरम्भ और अन्त भाग में सन्धि के लिए कुछ वर्षों छोड़नी पड़ती हैं। इस हिसाब से भी वह एक सौ के करीब वर्ष घटाने पड़ेंगे। मेरा ज्योतिष-विद्या सम्बन्धी ज्ञान कम है, इसलिए यदि कोई गणितज्ञ ठीक-ठीक हिसाब लगावेंगे, तो उन्हें मानना पड़ेगा कि वर्तमान कलियुग विक्रम संवत् दो हजार से अधिक का किसी प्रकार नहीं हो सकता। कदाचित कोई यह भी मानता हो कि कलियुग बुरा युग है, तो भी उसे जानना चाहिये कि एक दो वर्ष में इस युग का भी अन्त हो रहा है।

गणित सम्बन्धी यह हिसाब तो अनायास ही मैंने लिखा है, पर मेरा इसके ऊपर कुछ विशेष आग्रह नहीं है। मेरा आग्रह तो तथ्य बात पर है। कोई भी स्वतन्त्र और उन्नतिशील देश यह नहीं मानता कि हम कलियुग में पड़े हुए हैं और हमारा भविष्य अन्धकार पूर्ण है फिर भारतवासी ही इस सत्यानाशी मान्यता को अपनी छाती से क्यों चिपकाये रहें। अब समय आ गया है कि नई पीढ़ी इस बौद्धिक गुलामी का जूता उतार कर दूर फेंक दे और अपने को श्रेष्ठ, समर्थ एवं सतयुगी स्वीकार करें, तभी तो श्रेष्ठता, सामर्थ्य और सतयुग को प्राप्त किया जा सकेगा।


कलियुग बीत गया

(स्व श्री परमहंस राजनारायणजी षट्शास्त्री)

मनुस्मृति के अध्याय 1, श्लोक 67-70 में चारों युगों की आयु कलियुग से लेकर क्रम पूर्वक इस प्रकार आती है - 4800, 3600, 2400, 1200 मेघातिथि ने भूल में पड़कर सतयुग 4800 वर्षों का समझा, तो उसी हिसाब से त्रेता 3600 का, द्वापर 2400 वर्षों का और कलियुग 1200 वर्षों का हुआ। इनने सोचा होगा कि कलियुग तो मुझ तक ही कई हजार वर्षों का व्यतीत हो चुका है, फिर यह 1200 वर्षों का नहीं हो सकता। तब उनने श्रीमद्भागवत् के स्कन्ध 12, अध्याय 2 के इस 34 वें श्लोक को देखा होगा,

दिव्यव्दानाँ सहस्रान्ते चतुर्थेतु पुनः कृतम।

भविष्यति यदा नृणाँ मन आत्म प्रकाशकम्।

इसका शब्दार्थ यह है कि - “चार हजार दिव्य वर्षों के अन्त के अर्थात् चार हजार दिव्य वर्षों में (कलियुग बीता) फिर सतयुग आयेगा जो मनुष्यों के मन और आत्मा में प्रकाश करेगा।”

इस श्लोक में दिव्य शब्द आया है। मेघातिथि ने इसका अर्थ देवता कर डाला और अभी तक प्रायः सभी पण्डित लोग ऐसा ही अर्थ करते रहे हैं। चूँकि एक मानुषी वर्ष के बराबर देवताओं का एक दिन होता है, यह विचार करके मेघातिथि ने भ्रम से 1200 वर्षों का कलियुग समझा और उन्हें देववर्ष मानकर उनको 360 से गुणा करे 432000 बना दिया और कलियुग की इतनी अवधि लिख दी जो सर्वथा मिथ्या है। ‘दिव्य’ शब्द का अर्थ देवता तीन काल में भी नहीं हो सकता। पहिले मैं इसके प्रमाण देता हूँ। देखो ऋग्वेद 2/164/46

‘इन्द्रं मित्रं वरुणमग्नि माहुः रथो दिव्यः ससुपर्णो गरुत्मान’ अर्थात् - अग्नि रूप सूर्य को इन्द्र मित्र वरुण कहते हैं। वही दिव्य, सुपर्ण, गुरुत्मान है।

यह मंत्र निरुक्त दैवत काण्ड 7/18 में भी आता है। वहाँ दिव्य शक्ति की व्युत्पत्ति यह की गई है - “दिव्यों दिविजोः” अर्थात् जो दिवि में प्रकट होता है, उसे दिव्य कहते हैं। दिवि ‘द्य, को कहते हैं। नैघण्टुककाणड में दिनल के 12 नाम लिखें हैं, उनमें धु शब्द भी दिन का वाचक है, अब दिव्य का अर्थ यह हुआ कि - ‘जो दिन में प्रकट होता है। “ और यह प्रत्यक्ष है कि दिन में सूर्य ही प्रकट होता है। अतः दिव्य सूर्य का नाम है।

ऋग्वेद 1/16/3/10 मन्त्र - ‘ईर्मान्ताँसः सिलिक .............दिव्य मज्मश्रः।” का “अक्ष्वों अग्निर्देवता” अर्थात् आग का घोड़ा (सूर्य) है। इसमें भी सूर्य का वर्णन है। इस मंत्र पर निरुक्त ने दिव्य शब्द की व्युत्पत्ति दिव्या दिविजों की है। बात वही है। जो दिन में प्रकट होता है, वह दिव्य सूर्य है और यह भी स्पष्ट लिखा है कि- “अस्तयादितयस्तुति” अर्थात् इस नाम से सूर्य की स्तुति है। वेद में दिव्य नाम सूर्य का है, देवता को दिव्य कदापि नहीं कहते। यह दो बड़े प्रमाण वेद के हैं।

व्याकरण से भी दिव्य शब्द का अर्थ देवता नहीं बनता। दिव् धातु में “स्वोर्थेयत” प्रत्यय लगाने से दिव्य शब्द बनता है। इसकी व्युत्पत्ति यह हुई - “दिवि भवं दिव्यनु” अर्थात् जो देवि में प्रकट होता है, वह दिव्य है और दिनों में सूर्य ही प्रकट होता है। अतः दिव्य केवल सूर्य ही को कहते हैं। दिवि धु को कहते हैं और धु दिन का नाम है। देवता शब्द दूसरे “देवातल” आदि सूत्रों से बनता इस कारण ही दिव्य और देवता शब्दों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है। दिव्य शब्द और देवता शब्द बनाने के रूप ही अलग-अलग हैं।

कुल्लूक भट्ट ने तो अपनी मनुस्मृति से 171 की टीका करते हुए पूरा खंडन किया है कि “एतस्य श्लोकस्यादो यदे तन्मानुषम् चतुर्युग परिगणितम् एतछवोनाँ युग मुच्यते।” अर्थात् चारों युग मनुष्यों के हैं, इनके बराबर देवताओं का एक युग होता है।

मेघातिथि ने चारों युगों की देवताओं के युग और उनके वर्षों को देव वर्ष लिखा है, जिसका खण्डन कुल्लूक भट्ट 500 वर्ष पहले ही कर चुके हैं। पंडित लोग आंखें बन्द करके मेघातिथि के पीछे चल पड़े, उन्होंने कुल्लूक भटट के खण्डन पर ध्यान नहीं दिया और अब तक प्रायः सब पंडित ऐसा ही मान रहें हैं।

अब विचार की बात यह है कि मेघातिथि ने उलटा हिसाब लगा कर कलियुग को 1200 वर्षों का लिखा है और दिव्य शब्द का अर्थ देवता करके 1200 के 360 से गुणा कर कलियुग को 432000 वर्षों का लिख डाला, परन्तु दिव्य शब्द का अर्थ किसी प्रकार से भी देवता नहीं हो सकता, तब कलियुग के 1200 वर्ष ही रहे और कलियुग की आयु 1200 वर्ष नहीं क्योंकि पंचाँगों के अनुसार ही कलियुग की अब तक 5000 वर्षों से अधिक व्यतीत हो रहे हैं। इस बात से ही स्पष्ट रूपेण सिद्ध हो जाता है कि मेघातिथि ने कलियुग की जगह सतयुग समझ लिया था। वास्तव में सतयुग 1200 वर्षों का होता है, त्रेता 2400 का, द्वापर 360 का और कलियुग 4800 वर्षों का है। यह अब समाप्त हो रहा है। भागवत् के श्लोक में 4000 वर्ष कलियुग के बताये हैं, सन्धया सन्ध्याँस के 800 वर्ष है, इस प्रकार 4800 वर्ष हुए।

एक शंका का उत्तर।

बाल्मीकि रामायण बाल काण्ड अ. 4 में श्लोक 97 में लिखा है।

दर्श वर्ष समस्राणि दश वर्ष षतानि च।

रामो राज्य मुपासत्वा ब्रह्म लोके शामिष्यति॥

अर्थ - “भगवान राम 11 हजार वर्ष तक राज करके ब्रह्मलोक में जायेंगे।” इसके आधार पर बहुत से पंडित यह शंका उठाते हैं कि जब त्रेतायुग 2400 वर्षों का हुआ तो भगवान राम ने 11000 वर्ष तक कैसे राज किया है, उन्हें जानना चाहिए कि वर्ष कई प्रकार के होते हैं। 1 दिव्य वर्ष 360 दिनों का है, जिसका विस्तार किया जा चुका है, एक सौर वर्ष 365 दिनों का है। सूर्याब्द या सूर्य वर्ष 24 घंटों का अर्थात् सूर्य उदय होने से अगले सूर्य उदय होने तक का है। प्राचीन समय में यही वर्ष बहुत प्रचलित था। एक चन्द्र वर्ष तिथियों के हिसाब से 354 दिनों का है। एक नक्षत्र 52 घड़ियों का होता है। भगवान् राम के राज के 11 हजार वर्ष सूर्य वर्ष थे।

देखो वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड सर्ग 73 श्लोक 5-

अप्राप्त यौवनं वाले पंच वर्ष सहस्रकम्।

अकाले काल मापन्नं मम दुःखाय पुत्रकम्॥

अर्थात् भगवान् राम के राज में एक ब्राह्मण का बालक 5 हजार वर्ष की आयु में मर गया था, वह ब्राह्मण उस बालक की लाश भगवान राम के सामने लाकर शिकायत करता है कि यह 5 हजार वर्ष का बालक आपके राज में जवान हुए बिना ही कैसे मर गया है ?

इस श्लोक पर प्रसिद्ध रामाभिरामी टीकाकार ने लिखा है कि - ‘पंच वर्ष सहस्रकं वर्ष शब्दोत्र दिन पर कि चिन्नयूनं चतुर्दश वर्ष मिर्त्यथ।” अर्थात् “पाँच हजार वर्ष कुछ कम चौदह वर्षों के बराबर हुए यह अर्थ है।” इसी प्रकार भगवान् राम के राज्य के 11 हजार वर्ष (सूर्य वर्ष है) अर्थात् 30 वर्ष 6 मास और 20 दिनों ही राम ने राज्य किया था। इसी प्रकार वर्षों की विभिन्नता का ठीक ज्ञान न होने के कारण पंडित लोग सब वर्षों को दिव्य वर्ष (360 दिन) मानने लगते हैं। कलियुग के चार लाख बत्तीस हजार वर्ष का मानने में भी यही गलती हुई है।


महाभारत में सतयुग

ततस्तुमुल संघाते वर्तमान युगक्षये।

द्विजाति पूर्वको लोकः क्रमेण प्रभविष्यति॥

दैवःकालान्तरे ऽन्यास्मिन्युनर्लोकं विवृद्धये।

भविष्यति पुनर्देवमनुकूलं यदृच्छया॥

यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्य बृहस्पती।

एक राशौ समेष्यन्ति प्रपत्सयति तदा कृतम्॥

कल वर्षी च पर्जन्यों नक्षत्राणि शुभानिच।

क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामयम्॥

(महाभारत, बन पर्व अध्याय 190 श्लोक 88,89,90,91)

“वर्तमान युग के समाप्त होने के समय बड़ी कठोर घटनाएं घटेंगी। और उत्तम वर्ण वाले मनुष्यों की धीरे-धीरे उन्नति होने लगेगी। कुछ समय पश्चात दैव की इच्छा से लोक की वृद्धि करने वाला समय फिर आ जायेगा। जब तिष्य में चन्द्र, सूर्य और बृहस्पति एक राशि पर समान अंशों में आवेंगे तो सतयुग फिर आरम्भ हो जायेगा। फिर यथा समय वर्षा हुआ करेगी, सब लोग स्वस्थ और प्रसन्न रहेंगे।”

उपरोक्त पंक्तियों में “तिष्य” शब्द आया है। इसके दो अर्थ होते है पौष मास या पुष्य नक्षत्र। पौष का अर्थ स्वीकार करने वालों के मत से कुछ वर्ष पर्व यह आ चुका है और सतयुग आरम्भ हो गया है। पुष्य नक्षत्र मानने वालों के मत से यह योग श्रावण कृष्णा अमावस्या संवत् 2000 में आ रहा है। तब कलियुग समाप्त होकर सतयुग का आरम्भ होगा।


Quotation

“आत्म ज्ञान, आत्म सम्मान और आत्म संयम ही मनुष्य को महती शक्ति की ओर ले जाते हैं।”


श्रीमद्भागवत और सतयुग

कलियुग कब से आरम्भ हुआ। इसके सम्बन्ध में भगवान के दूसरे अध्याय में वर्णन है।

यदा देवर्षयः सप्तमघासु विचरन्ति हि।

तदा प्रवृत्तस्तु कलिर्द्वादशाब्द शतात्मकः॥31॥

यदा मघाभ्यो यास्यन्ति पूर्वाषाढ़ा महर्षयः।

तदा नन्दात् प्रभृत्येष कलिवृद्धिगमिष्यति॥32।

यस्मिन कृष्णो दवं यातस्तास्मिन्नेंव तदाहनि।

प्रतिपन्नं कलियुगमिति प्राहुः पुराविदः॥ 33॥

अर्थात् जब सप्तऋषि (तारागण) मघा नक्षत्र पर आये थे तब कलियुग का आरम्भ हुआ और सप्तऋषि पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में आ चुकेंगे तो बारह सौ वर्षों में कलियुग राजा नन्द के समय में वृद्धि को प्राप्त हो जायेगा जब भगवान् कृष्णा अपने धाम को पधारे, उसी समय से कलियुग चल पड़ा।

सप्तऋषि तारागण वर्तमान समय से कृतिका नक्षत्र पर है। एक नक्षत्र पर इनके 100 वर्ष रहने का प्रमाण है। मघा में जब यह थे तो कलियुग का आरम्भ हुआ। अब तक यह एक बार सत्ताइसों नक्षत्रों पर घूम चुके हैं। इस प्रकार मघा से रेवती तक 18 एक बार का पूरा चक्र 27 और कृतिका तक 3 अर्थात् कुल 48 नक्षत्र घूम चुके एवं 4800 वर्ष कलियुग को सम्वत् 2000 में श्रावण कृष्णा अमावस्या को पूरे हो जाते हैं।

कलियुग समाप्त होने का ठीक-ठीक समय निम्न श्लोक से प्रकट हो जाता है -

यदा चनद्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्य बृहस्पती।

एक राशौ समेष्यन्ति तदा भवति तत् कृतम्॥

भागवत् 12-2-24

अर्थात् जिस समय चन्द्रमा, सूर्य, और बृहस्पति एक ही समय पुष्य नक्षत्र में प्रवेश करते हैं। एक राशि में आते है तो कलियुग समाप्त होकर सतयुग आरम्भ होता है, यह योग संवत् दो हजार की श्रावण कृष्णा अमावस्या तदनुसार 1 अगस्त सन् 43 में आ रहा है।

श्रीधरी टीका में ऐसा प्रश्न उठाया गया है कि ऐसा योग बीच-बीच में भी आता है, परन्तु यह ठीक नहीं, क्योंकि गत 4800 वर्ष में कभी भी ऐसा योग नहीं आया।

कलियुग के वर्ष संख्या पूरी हो जाने तथा सतयुग के आगमन का योग भी उसी समय आने से दोनों बातें एक साथ हो जाती हैं। निश्चय ही यह युग परिवर्तन का समय है।

एक सन्त कबीर की वाणी।

साँच बराबर तप नहीं, झूँठ बराबर पाप।

जाके हिरदे साँच है, ताके हिरदे आप॥

साँच बिना सुमिरन नहीं, भय बिन भक्ति न होय।

पारस में पड़दा रहै, कंचन किहि विधि होय॥

साँचे को साँचा मिलै, अधिका बढ़े सनेह॥

झूँठे को साँचा मिलै, तब ही टूटे नेह॥

सहब के दरबार में साँचे को सिर पाव।

झूठ तमाचा खायेगा, रंक्क होय या राव।

झूठी बात न बोलिये, जब लग पार बसाय।

कहो कबीरा साँच गहु, आवागमन नसाय॥

जाकी साँची सुरति है, ताका साँचा खेल।

आठ पहर चोंसठ घड़ी, हे साँई सो मेल॥

कबीर लज्जा लोक की, बोले नाहीं साँच।

जानि बूझ कंचन तजै, क्यों तू पकड़े काँच॥

सच सुनिये सच बोलिये, सच की करिये आस।

सत्य नाम का जप करो, जग से रहो उदास॥

साँच शब्द हिरदै गहा, अलख पुरुष भरपुर।

प्रेम प्रीति का चोलना, पहरै दास हजूर॥

साँई सों साचा रहो, साँई साँच सुहाय।

भावै लम्बे केस रख, भावै मूड मुड़ाय॥


ज्योतिषी ‘शेरो’ की भविष्यवाणी

(खगोल विद्या द्वारा सतयुग की पुष्टि)

विलायत के प्रकाण्ड ज्योतिषी शास्त्री मि. शेरो विश्व के कौने-कौने में ख्याति प्राप्त कर चुके हैं, उनकी भविष्य-वाणियाँ इतनी सत्य होती हैं कि इस युग के भौतिकवादी और नास्तिकों को भी दाँतों तले उंगली दबानी पड़ती है। उन्होंने महारानी विक्टोरिया की मृत्यु, दक्षिण अफ्रीका की लड़ाई, जर्मन युद्ध आदि की घटनाएँ बहुत दिन पहले ज्यों की त्यों बता दी थी। लार्ड किचनर के सम्बन्ध में उन्होंने सन् 1887 में बता दिया था कि- “वे 1914 में किसी महायुद्ध का उत्तरदायित्व अपने ऊपर उठावेंगे और इसी युद्ध में 66 वर्ष की आयु में मर जावेंगे और मृत्यु भी उनकी लड़ाई के मैदान में नहीं, समुद्र में डूब कर होगी।” आखिर यह भविष्यवाणी भी सच होकर ही रही।

इन्हीं ज्योतिषाचार्य मि. शेरो ने सन् 1925 में ‘वर्ल्ड प्रिडिक्शन’ नामक एक पुस्तक लिखी है, जिसमें संसार की राजनैतिक घटनाओं के सम्बन्ध में बड़ी महत्वपूर्ण भविष्य-वाणियाँ की हैं।

अपनी उस पुस्तक में लिखते हैं कि- “खगोल विद्या का सूक्ष्म निरीक्षण करने पर दृष्टिगोचर होता है कि, सूर्य अपने स्थान पर से हटता जा रहा है। इसका वास्तविक कारण सूर्य का हटना नहीं हैं, वरन् यह है कि पृथ्वी की धुरी अपनी जगह से बराबर खिसकती आ रही है। इस धुरी के हटने का प्रभाव संसार की आबोहवा पर बहुत अधिक पड़ता है। ध्रुवों की जगह में परिवर्तन होने के कारण भूकम्प आते हैं और समुद्रों की गहराई में असाधारण अन्तर आ जाने से संसार के मानचित्र में बड़ा भारी परिवर्तन हो जाता है।”

“अगले 50 वर्षों में अटलाँटिक महासागर की तलों में बहुत फर्क पड़ जायेगा और उसके फलस्वरूप अमेरिका की बहुत सी भूमि तथा आयरलैंड, इंग्लैंड, स्वीडन, नार्वे, डेन्मार्क, रूस, जर्मनी एवं फ्रांस के उत्तरी भाग इतने ठण्डे हो जावेंगे कि, वहाँ मनुष्यों का निवास करना कठिन होगा। दूसरी ओर भारत, चीन, अफ्रीका, मिश्र आदि देश जो इस समय आमतौर से गर्म समझे जाते हैं, मध्यम आबोहवा वाले बन जायेंगे। अतएव इन देशों की सभ्यता में बड़ी भारी उन्नति होगी और ये देश संसार भर में प्रधान बन जावेंगे। अटलाँटिक समुद्र में एक बड़ा टापू निकल पड़ेगा, जिससे अफ्रीका की भी बहुत अधिक उन्नति होगी। फिलिस्तीन, मिश्र और उनके निकटवर्ती देश संसार भर की सभ्यता और व्यापार के केन्द्र बन जावेंगे।

“उपरोक्त परिवर्तनों से पूर्व संसार में एक बड़ा भारी भयंकर युद्ध अवश्य होगा। इस युद्ध में विश्व का बहुत संहार होगा। पर इस संहार के कारण लोगों की विचारधारा पलट जायगी और सत्य, प्रेम एवं न्याय के सिद्धान्तों का प्रचार होने लगेगा। राजनैतिक लूट खसोट बन्द हो जायगी और सब मिलकर एक ऐसा विश्व-व्यापी संघ कायम करेंगे, जिससे आपस में प्रेम-भाव की वृद्धि होगी, सुख, शान्ति सुरक्षित रहेगी और धर्म की विजय ध्वजा फहरायेगी।


Quotation

परमात्मा-परमात्मा चिल्लाने वाले आदमी धर्मात्मा न समझे जावेंगे, वरन् परमात्मा के आदेशों को अपने अमली जीवन में परिणत कर दिखाने वाले ही धर्मात्मा माने जावेंगे।

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अपने आप को तुच्छ समझना ही आत्म-पतन है, वास्तव में यह आत्महत्या का ही एक भेद है।


सतयुग कैसे आवेगा?

(समय परिवर्तन की भावी रूपरेखा)

अब कलियुग समाप्त होकर सतयुग आरम्भ हो रहा है, ऐसा अनेक तर्कों, प्रमाणों, युक्तियों, अनुभवों और भविष्यवाणियों से प्रकट है। पापों का नाश होकर धर्म का उदय होगा। अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि सतयुग कैसे आवेगा यह कार्य एक दिन में पूरा नहीं हो जावेगा, वरन् इसके लिए कुछ समय लगेगा। यह समय एक सौ वर्ष का हो सकता है। कई महात्माओं का विश्वास है कि संवत् बीस सौ से लेकर इक्कीस सौ तक यह परिवर्तन कार्य पूरा हो जायेगा। इस एक शताब्दी में कलियुग के अस्त और सतयुग के आरम्भ की सन्ध्या रहेगी। बुराई क्रमशः घटती जायेंगी और भलाई क्रमशः बढ़ती जायेगी। यह भी सम्भव है कि इस बीच में कभी-कभी पाप कर्मों के कुछ बड़े-बड़े कार्य दीख पड़ें। क्योंकि जब दीपक बुझने को होता है, तो उसकी लौ एक बार जोर से बढ़ती है, फिर वह बुझ जाती है। रोगी मरने से पूर्व जोर की हिचकी लेता है और प्राण त्याग देता है। सूर्योदय से पूर्व जितना अँधेरा होता है, उतना रात्रि के और किसी भाग में नहीं होता। वर्षा से पहले बड़े जोर की गर्मी पड़ती है या यों कहिये कि अधिक गर्मी पड़ना ही वर्षा का कारण होता है। जब चींटी के पर आते हैं, तो कहते हैं बस, अब बेचारी का अन्त आ गया। गरदन कटते समय बकरा जितना शोर मचाता और पाँव पीटता है, उतना जीवन भर में कभी भी नहीं करता। कलियुग की गर्दन अब सत्य की छुरी से कटने जा रही है, हो सकता है कि वह इन अन्तिम दिनों में खूब चिल्लाये, फड़फड़ाये और पाँव पीटे। संवत् दो हजार समाप्त होते ही एकदम सतयुग फट नहीं पड़ेगा और न यह धरती आसमान बदल जायेंगे। सब यही रहेगा। मनुष्य भी यही रहेंगे। डरना या घबराना न चाहिए , यह कल्पान्त नहीं है, युगान्त है। इस समय युद्धों, महामारियों और दुर्भिक्षों का जोर रहने से जनसंख्या घट जायेगी, पर प्रलय नहीं होगी। गत महायुद्ध में जितने मनुष्य मरे थे, इस युद्ध में उससे अधिक मरेंगे पर यह संहार रुपये में दो आने भर, अष्टमाँश से अधिक न होगा। इतनी जन संख्या घटने बढ़ने से सामूहिक दृष्टि से कोई बड़ा भारी अनिष्ट नहीं समझना चाहिए। यह कमी अगली एक शताब्दी में ही पूरी हो जायगी।

सतयुग आरम्भ में स्वः लोक में आवेगा, फिर भुवः लोक में तत्पश्चात् भूलोक में दृष्टिगोचर होगा। स्वः लोक का अर्थ मन, भुवः लोक का अर्थ वचन, भूः लोक का अर्थ कर्म है। सब से प्रथम जनता के मनों में शुभ संकल्पों के प्रति आकर्षण उत्पन्न होगा। बुरे कर्म करने वाले भी सत्य की प्रतिष्ठा करेंगे, आदतों के कारण कोई चाहे चोरी करता रहे, पर उसका मन अवश्य ही धर्म की महत्ता को समझेगा। कुकर्मी लोग मन ही मन पछताते जायेंगे और कभी-कभी एकान्त में दुखी हृदय से भगवत् प्रार्थना करते रहेंगे कि हे प्रभो हमें सद्बुद्धि दो, हमें दुष्ट कर्मों के पंजे से छुड़ाओ। दूसरों को शुभ कर्म करते देख कर मन में प्रसन्नता होगी। ज्ञान चर्चा सुनने को जी चाहेगा। छोटे बालक भी हरि कथा, कीर्तन और सत्संग से प्रेम करेंगे। घर और कमरे आदर्श वाक्यों, आदर्श चित्रों से सजाये जायेंगे, फैशन में कमी हो जायेगी, बाबू लोग मामूली पोशाक पहनने लगेंगे, प्रभुसत्ता और ऐश्वर्य प्राप्त लोगों की भोगों से अरुचि होकर धर्म में प्रवृत्ति बढ़ेगी। मन ही मन लोग सत्य-नारायण की उपासना करेंगे, झूठ और पाखण्ड देख कर मन ही मन चिढ़ेंगे।

असत्य द्वारा चाहे अपना ही हित होता है, पर लोग उससे घृणा करेंगे। सत्य पक्ष द्वारा यदि अपना अहित हुआ हो तो भी बुरा न मानेंगे। जब इस प्रकार के लक्षण दिखाई देने लगें तो समझना चाहिए कि सतयुग स्वःलोक में ब्रह्म लोक आ गया। पूरा सतयुग तो कभी भी नहीं आता क्योंकि सृष्टि की रचना सत, रज, तम तीनों गुणों से हुई है। यदि एक भी गुण समाप्त हो जाये तो सृष्टि का ही नाश हो जाये। युगों में तत्वों की न्यूनाधिकता हुआ करती है। सतयुग के आरम्भ में सत् की अधिकता होगी। स्वःलोक में मनों में, मस्तिष्कों में, सत की झाँकी मिलेगी। कहीं-कहीं वचन और कर्म में भी दिखाई देगा, पर बहुत कम। वचन और कर्म तो वैसे ही रहेंगे। स्वः लोक में सतयुग का आगमन उच्च आध्यात्मिक भूमिका में जागृत हुए मनुष्यों को दिखाई देगा, सर्वसाधारण को उसको पहचानना कठिन होगा।

स्वः लोक में नीचे उत्तर कर जब सत् युग भुवः लोक में आवेगा तो मन और वचन दोनों में सत्यता प्रकट होने लगेगी। केवल मन में ही सत्य के प्रति आदर न रहेगा वरन् वाणी से भी प्रशंसा होने लगेगी। आजकल जैसे धर्म के लिए कष्ट उठाने वाले और तपोनिष्ठ लोगों को मूर्ख कहा जाता है, उस समय वैसा न कहा जायेगा। तब खुले आम सत्कर्मियों की प्रशंसा की जायेगी। लेखनी और वाणी से प्रेम और प्लेट-फार्म द्वारा सत्य का खूब प्रचार होगा। यद्यपि करने वालों की अपेक्षा कहने वाले ही उस समय भी अधिक होंगे, पर कोई- कोई अपने विचारों को कार्यरूप में भी प्रकट करेंगे। उपदेश करने वालों की संख्या में वृद्धि होगी। धार्मिक पत्र-पत्रिकाओं को आदर मिलेगा। मामूली व्यापारिक काम-काजों में भी सत्य को स्थान मिलेगा। दुकानदार और ग्राहक “एक दाम” की नीति पसन्द करेंगे। झूठे, चुगलखोर, बकवादी, गप्पी जगह-जगह दुत्कारे जायेंगे। तब चालाकी की बातें करने वाले बुद्धिमान नहीं मूर्ख समझे जायेंगे। सत्यवक्ताओं का समाज में आदर होगा। आत्म-ज्ञान सम्बन्धी पुस्तकें खूब छपेंगी, उनके पढ़ने पढ़ाने का क्रम बढ़ेगा। कठोर, अप्रिय, उद्धत, अश्लील वचन बोलना क्रमशः कम होता जायेगा और विनय, नम्रता, मधुरता लिये हुए बातें करने का प्रचार बढ़ेगा। अश्लील गालियों के विरोध में ऐसा आन्दोलन होगा कि यह प्रथा बिलकुल बन्द हो जायेगी।

भूः लोक में जब सतयुग उतरेगा तो दृश्य ही दूसरे दिखाई देंगे। सत्य, प्रेम और न्याय को आचरण में प्रमुख स्थान मिलेगा। आजकल झूठ बोलने का रिवाज समाज की बिगड़ी हुई दशा के कारण है, जब समाज की आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, शारीरिक और मानसिक दशाएं सुधर जावेंगी, तो झूठ बोलने से कुछ प्रयोजन न रहेगा। मनुष्य जीवन की सभी आवश्यकताएं जब सरलतापूर्वक पूर्ण हो जाती हैं, तो झूठ के विरोध में हो जायेगा, इसलिए बलात् सब को सत्य का मार्ग ग्रहण करना होगा। हर काम को करते समय मनुष्य सोचेगा, इसमें प्रेम और न्याय है या नहीं। कर्म और अकर्म की तब एक ही कसौटी होगी, वह यह है कि- किया जाने वाला कार्य प्रेम और न्याय से पूर्ण है या नहीं। अपने हित की अपेक्षा जब दूसरे के हित को अधिक न्याय में रखने की मनोवृत्ति बन जायगी तो सच्चा सतयुग प्रकट होगा। राजगद्दी का प्रश्न आवेगा तो उसे भरत राम को और राम भरत को देना चाहेंगे। कैकेयी की प्रसन्नता के लिए कौशल्या अपने पुत्र को खुशी खुशी वन जाने की आज्ञा देगी। सुमित्रा आज्ञा कहेंगी कि हे लक्ष्मण, तुम्हारे लिए अवध वहीं है जहाँ राम रहें। इसलिए बड़े भाई के साथ वन को जाओ। सीता जी अपने को कष्टों के कारकों में घिसटाना पसन्द करेगी, किन्तु पति की सेवा का लोभ न त्यागेंगी। उस सतयुग में ऐसे परिवार हो जायेंगे। भाई, माता, विमाता, पत्नी, इस प्रकार के प्रेम सूत्रों में बँधे होंगे। राजा प्रजा को पुत्र के समान समझेंगे। जब प्रजा कहेगी कि हम राजा की ऐसी पत्नी पसन्द नहीं करते, जिसे कलंकित समझा जाता है, तो राम अपनी छाती पर पत्थर बाँध कर और सीता कलेजे को वर बनाकर प्रजा की इच्छा पर अपने को तिल-तिल करके विरह वेदना की भट्टी में जलाने के लिए भी तत्पर हो जायेंगे। प्रजा के लिए राम का यह सर्वोत्कृष्ट त्याग है, भावना की दृष्टि से देखा जाये, तो इस त्याग की उपमा इतिहास में मिलना कठिन है। जब भूलोक में सतयुग आ जायगा, तो ऐसी घटनाओं का मिलना भी कठिन न होगा। एक दो नहीं, हर जगह अनेक घटनायें ऐसी घटित होंगी, जिनमें प्रेम और न्याय का ऊँचा आदर्श झिलमिल करता हुआ दिखाई देगा। फिर भी दुष्ट-कर्मी थोड़ी बहुत मात्रा में बने रहेंगे, क्यों कि प्रकृति त्रिगुणमयी है।

लोकों की सूचना आयु के हिसाब से भी मिलेगी। बालकपन सात्विकी अवस्था है। युवा राजसी और वृद्धावस्था तामसी। भू लोक का सतयुग पहले 25 वर्ष से कम उम्र के, प्रथम अवस्था वाले किशोर बालकों में उतरेगा। 25 वर्ष से कम अवस्था वालों के हृदयों में सब से अधिक सत्य की प्रेरणा होगी। उनके निर्मल जल में किसी वस्तु की परछांई साफ-साफ दिखाई देती है। इन नवयुवकों के हृदय में स्वभावतः श्रद्धा और भक्ति होगी। वे कलियुगी बड़े उम्र वालों के क्रोध के भाजन बनेंगे, डाट-फटकार और दुख-दण्ड सहेंगे पर युग का प्रभाव उन्हें विचलित न होने देगा। प्रहलाद की तरह वह बालक बड़े दृढ़, निर्भीक और सत्यनिष्ठ होंगे, ध्रुव की तरह ये तपस्या करेंगे और हकीकतराय की तरह प्राणों को तुच्छ समझेंगे, पर सत्य की ही रट लगावेंगे। असुरों के घरों में से ऐसे देव बालकों की सेना की सेना निकल पड़ेगी और संसार को आश्चर्य से चकित कर देगी। ये सतयुग की पहली तिहाई में ही दिखलाई देने लगेगा। संवत् दो हजार ले लेकर संवत् 2033 तक इन बालकों का ही प्रचंड आन्दोलन रहेगा यद्यपि कर्म में बहुत ही कम परिवर्तन दिखाई देगा। कोई कोई मूर्ख इसे बालक्रीड़ा समझ कर उपहास करेंगे और बालकों के हृदय परिवर्तन को कुछ महत्व न देंगे, पर उन्हें शीघ्र ही अपनी भूल प्रतीत हो जायेगी।

जब सतयुग भुवः लोक में उतरेगा तो सत्य का प्रकाश बढ़ेगा और तरुण पुरुषों को 25 से 50 वर्ष की आयु वालों को भी इसमें सम्मिलित होना पड़ेगा, वे सत्य, प्रेम और न्याय का विरोध करने का साहस न करेंगे एवं वाणी द्वारा उसका समर्थन करने लगेंगे। बालक और तरुण मिल कर इस आन्दोलन का नेतृत्व करेंगे। मन और वचन में सत्य गुठित हो जावेगा। किन्तु कर्म फिर भी अधूरे रहेंगे। मरणोन्मुख कलियुग बार बार जीवित हो जायेगा। उसकी चिता में से बार बार दुखदायी चिनगारियां उड़ेंगी, कभी कभी तो सतयुग के आगमन पर लोगों को अविश्वास तक होगा, पर भविष्य उनके भ्रम का निवारण कर देगा। सत्य की हमेशा विजय ही होती है।

वृद्ध लोग अपने पुराने धुराने, सड़े गले, गंदे, सन्दे विचारों की चहारदीवारी में ही बन्द पड़े-पड़े बड़बड़ाते रहेंगे। आरम्भ में वे बालकों के हृदय परिवर्तन का उपहास करेंगे, जब तरुण भी उनके पक्ष में आ जावेंगे, तो वे अपने स्वभाव के कारण उनका विरोध करेंगे, किन्तु अन्त में युग का प्रभाव उन पर भी पड़ेगा। मृत्युलोक में जब सतयुग आवेगा, तो उन्हें भी अपने विचार बदलने पड़ेंगे और असत्य को तिलाँजलि देकर सत्य की शरण में आ जावेंगे। कलियुग जब बिलकुल ही निर्बल हो जायगा, तो वृद्धों की भी मनोदशा बदल जायेगी।

फिर वे अधिक उम्र के कारण अर्ध विक्षिप्त न होंगे, रोग शोगों के घर न रहेंगे। अपमान के स्थान पर सर्वत्र उनका मान होगा। “साठा सो पाठा” वाली उक्ति कहावत चरितार्थ होगी। आज जैसे वृद्धों को ‘रिटायर्ड’ कह कर एक कोने में पटक दिया जाता है, तब ऐसा ना होगा। उस समय वयोवृद्ध अपने सद्ज्ञान के कारण बहुत ही उन्नत दशा में होंगे, सतयुग का मर्म समझ जायेंगे और अपने पुत्र-पौत्रों को सत्य- मार्ग में प्रवृत्त होने का उपदेश देंगे। सम्वत् 2100 में यह पूरा हो जायेगा। उस समय सतयुग भूः लोक में प्रकट हुआ समझा जायेगा।

स्त्रियाँ बुद्धि जीवी नहीं होतीं, उनमें भावना ही प्रधान है। इसलिए वे सतयुग के आगमन की चर्चा को आश्चर्य के साथ सुनेंगी। उनके कान पुराने संस्कारवश इस बात को स्वीकार न करना चाहेंगे, पर हृदय में भीतर ही भीतर कोई उन्हें प्रेरणा करता हुआ प्रतीत होगा कि यह सब सत्य है। सतयुग अब आ गया है। स्त्रियों का सतीत्व, पतिव्रत जागृत रहेगा। उनका हृदय दया, क्षमा, करुणा और प्रेम से भर जायेगा। पति और पुत्रों के लिए बहुत आत्म त्याग करेंगी। दीन-दुखियों को देख कर उनके हृदय पसीज जावेंगे। ऐसी स्त्रियाँ बहुत देखने में आवेंगी, जो पुरुषों के कठोर होते हुए भी दान, धर्म में श्रद्धा रखेंगी। सत्य, प्रेम और न्याय की भावना स्त्रियों में बड़ी आसानी से प्रविष्ट हो जायेगी और वे पुरुषों की अपेक्षा जल्दी सतयुगी बन जावेंगी।

ऐसा नहीं है कि आयु के उपरोक्त प्रतिबन्ध सभी पर लागू हों। यह तो साधारण श्रेणी के अचेतन जीवों की बात कही गई है। जागृत, नैष्ठिक, उन्नत और जिनको भगवान ने इसी निमित्त भेजा है एवं जिनके भाग्य में सतयुगी अवतार बनना लिखा है वे बहुत पहले, सतयुग के आदि में ही, सम्वत् दो हजार के आसपास से ही वरन् इससे भी बहुत पूर्व सावधान हो जायेंगे और नवीन युग के स्वर्ण रथ को स्वर्ग से भूमण्डल पर लाने के लिए अपना सर्वस्व त्याग कर उस रथ में जुत कर सूर्य के सप्तमुखी घोड़ों के समान कार्य करेंगे। सतयुग तो आने ही वाला है, वह किसी के रोकने से किसी भी प्रकार रुक नहीं सकता, पर इस स्वर्ण अवसर से लाभ उठाने का, अपनी कीर्ति को अमर कर जाने का सौभाग्य उन्हें ही मिलेगा, जो बड़े भाग्यवान हैं, जिन पर ईश्वर की विशेष कृपा है। शेष तो यहाँ ही कुत्तों की मौत मरेंगे और पीछे अपनी भूल पर सिर धुन-धुन कर पछताते रहेंगे।


मथुरा का भविष्य

(परमहंस राजनारायण जी षट्शास्त्री)

सम्वत् 1992 विक्रम तक यमुना जी की शेष आयु 4538 वर्ष है। अब श्री यमुना जी का पुण्य तथा महात्म्य रहेगा और हरिद्वार की जगह ब्रजधाम (मथुरा तथा वृन्दावन) को सतयुग का तीर्थ माना जायेगा।

सतयुग का तीर्थ पुष्कर था, त्रेता का नैमिषारण्य था, द्वापर का कुरुक्षेत्र था और कलियुग का तीर्थ गंगा थी, सो उसके पुण्य की आयु सम्वत् 1956 में समाप्त हो चुकी है। अब सतयुग का तीर्थ यमुना है, जिसके किनारों पर पूर्ण ब्रह्म भगवान कृष्णचन्द्र बालकपन से खेलते फिरते थे, अब आगे जितने पर्व, कुम्भ इत्यादि आएं, वह सब मथुरा वृन्दावन में ही होने चाहिए।

शहर देहली और मथुरा एक बार फिर उन्नति के शिखर पर पहुँचेंगे।

कथा-


सतयुगी वीर

(जिसका कोई नहीं न था, उसका वह हुआ)

करीब दो सौ वर्ष पुरानी बात है, ऊतरीय वर्जीनिया (अमेरिका) के जंगल में कुछ लोग बैठे हुए दोपहर का भोजन कर रहे थे। इतने में किसी स्त्री की हृदय विदारक चीत्कार सुनाई दी उसकी वाणी में बड़ा मार्मिक हाहाकार था। क्या घटना घटी? यह जानने के लिए वे लोग भोजन छोड़कर झाड़ियों को चीरते हुए आवाज की तरफ दौड़े। नदी के किनारे पहुँच कर उन्होंने देखा कि कुछ लोग एक तरुणी को पकड़े खड़े हैं और वह छूट कर नदी में कूदने का बेतहाशा प्रयत्न करती हुई चीख रही है।

इस दल ने उन लोगों से कारण पूछा तो पकड़ने वालों में से एक ने कहा इस नदी में इस का बालक गिर पड़ा है और देखिए वह बीच धार में बहा जा रहा है। यह कूद कर उसे बचाना चाहती है, पर नदी का प्रवाह इतना प्रचंड है कि कूदते ही यह भी अपने बालक की भाँति इसी में डूब कर मर जायगी।

उस हाहाकार करती हुई स्त्री की दृष्टि इन नव आगन्तुकों पर पड़ी उसने देखा कि इन में एक षोडस वर्षीय युवा साहस और उदारता की साक्षात मूर्ति की तरह खड़ा हुआ है। स्त्री ने एक ही साँस में कह डाला अहा! यह सज्जन अवश्य मेरी सहायता करेंगे। मेरा बच्चा-आह, मेरा बच्चा-अब वह जल मग्न हुआ ही चाहती है। अरे, कोई इसे नहीं बचा सकते हो क्या?”

सबके चेहरों पर उदासी छायी हुई थी। उस सन्नाटे को भंग करते हुए उस षोडस वर्षीय युवा ने अपने कपड़े उतार कर फेंक दिए और सर्प की तरह प्रचंड वेग से फुफकारती हुई बहने वाली उस नदी में धड़ाम से कूद पड़ा। माता ने ठण्डी साँस लेकर कहा धन्य है प्रभो! यह मेरे बच्चे को बचा लेगा। आह! मेरे प्यारे बच्चे मैं तुम्हें इस तरह डूबते हुए कैसे देख सकती थी?

किनारे पर खड़े हुए सब लोग उस युवक की ओर बड़ी चिन्ता के साथ देख रहे थे। भँवरों की भरमार, जगह जगह नुकीली चट्टानें, सनसनाता हुआ जल प्रवाह, झागों का उफान, यह एक अनाड़ी तैराक को निगल जाने के लिए काफी थे। फिर भी उसने कुछ भी परवाह न की और तीर की तरह पानी को चीरता हुए उस बालक के पास जा पहुँचा। लड़का दो बार डूबा, पर उसने किसी प्रकार उसे पकड़ ही लिया। यह दृश्य देखा तो माता के हर्ष की सीमा न रही। वह पागल की तरह विभोर हो गई, आँखों से हर्ष के आँसू प्रवाहित हो उठे।

जिस नदी में नाव चलना असम्भव समझा जाता था, उसे पार करता हुआ सकुशल किनारे पर आ गया। कृतज्ञता से माता का कंठ रुद्ध हो गया मानो वह मूक भाषा में उसे आशीर्वाद दे रही थी- “परमेश्वर तुम्हें इसका उचित पुरस्कार देंगे।”

आप जानते हैं, यह युवक कौन था और आगे क्या हुआ? सुनिये, वह एक अनाथ, वे घर बार और पेट के लिये इधर उधर खाक छानते फिरने वाला लड़का था, और अन्त में यह अमेरिकन जनता का उद्धारक और राष्ट्रपति हुआ। इसका नाम था -”जार्ज वाशिंगटन।”


Quotation

अपने निज की शक्ति को अपने व्यवहारों से प्रकट करो। मनुष्य को अपना जीवन अपने ही विचारानुसार ढालना चाहिये।

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व्यक्तित्व युक्त आदमी सदा अपने मन पर काबू रखते हैं और अपने आप को अपनी मानसिक अवस्थाओं के वशवर्ती नहीं होने देते।


हरिवंश पुराण में सतयुग

(ले. पं. श्यामबिहारी लाल, रस्तोगी बिहार शरीफ)

शस्य चौरा भविष्यन्ति तथा चैला पहारिणः।

भक्ष्य भोज्या पहारश्च करण्डा नाँश्च हारिणः॥ 22

चौरा श्चौरस्य हन्तारो हन्ता हर्तु भविष्यति।

चौरे श्चौर क्षये चापि कृते क्षेमं भविष्यति॥23॥

लोग अन्न, वस्त्र, तथा खाने पीने की चीजों को भी चुराने लगेंगे। चोर आपस में ही चोरी करेंगे, और एक दूसरे को मारेंगे, इस प्रकार जब चोरों से चोरों का नाश होगा तब शान्ति होगी। उस समय-

निःसारे क्षुभित लोके निष्क्रिये कन्तर स्थिते।

नराः श्रयिष्यन्ति वनं कर भारं प्रपीड़िता॥24॥

दुनिया के लोग अपने को निःसार और बेकार समझ कर दुखित होंगे और क्या करें क्या न करें सोचेंगे ठीक इसी समय प्रजा पर इतने अधिक टैक्स जायेंगे की प्रजा दुखित होकर वन को चली जायेगी और सारी प्रजा -

कृत्रनं वा हिम वल्पार्श्व कूलं च लवणाँ भसाँ।

अरन्येषु च वत्स्यन्ति नरा म्लेच्छग्गौःसह॥32।

सम्पूर्ण हिमालय के बगल में, या लवण सागर के तट पर वनों में मनुष्य म्लेच्छगणों के संग निवास करेंगे उस समय संसार में इतने कम लोग रहेंगे कि -

नैव शून्या न चा शून्या भविष्यति वसुँधरा।

गौप्तार चाणय गोप्तारः, प्रभविष्यन्ति शास्त्रिणः॥33

न तो ‘पृथ्वी खाली हो गई’ यह कहा जा सकेगा और न यही कहा जा सकेगा कि पृथ्वी में काफी मनुष्य हैं, उस समय इतने व्यक्ति ही मौजूद रहेंगे, जितने हिमालय के तट पर तथा वनों में रह सकें क्योंकि सभी व्यक्ति तो महायुद्ध इत्यादि के कारण काल के गाल में रहेंगे जो थोड़े से व्यक्ति रह जायेंगे वे ही वनों में और हिमालय के बगल में रहेंगे। इनमें भी जो शस्त्रधारी होंगे वे कुछ रक्षक होंगे और कुछ सताने वाले। वन में भी इन मनुष्यों को -

कीट मूषक सर्पाश्च घर्ष मिष्यन्ति मानवान्।

क्षेमंसंभिक्ष मारोग्यं सामम्त्रयं वापि वन्धुषु॥

उदेशतो नर श्रेष्ठे भविष्यन्ति युग क्षये॥

कीट मूषक सर्प मनुष्यों को सतायेंगे, क्षेम, सुभिक्ष, आरोग्य, बन्धुओं में ममता, यह सब किसी न किसी मतलब से होंगे उस समय के वन और हिमालय वासी गण-

मृगैर्तैमत्सय विहंगश्च श्वापदै सर्प कीटकैः॥

मधु शाक फ र्लै मूर्लै वर्तयिष्यन्ति मानवाः॥34।

चीरं पर्ण च वहुलं वल्कलान्यधिना निचः।

स्वयं कृतानि वत्स्यन्ति यथा मुनि जनास्तथाः।35॥

मृग, मछली, विहंग, श्रखपद, कीट, मधु शाक, फल, मूल इन से अपनी आजीविका करेंगे और चीर अनेक प्रकार के वर्ण बक्कल आदि यह सब मुनि जनों के समान धारण करेंगे -

भविष्यति तदात तेजाँ रोगै रैर्निद्रय सक्षयः।

आयुः प्रक्षय सं रोधा द्विषादः प्रभविष्यति॥41॥

सुश्रुषवो भविष्यन्ति साधुना दर्शनेरताः।

सत्यं च प्रति पश्यान्त व्यवहारोप संक्षयात्॥42।

भविष्यन्ति च कामानाम लाभार्द्धम शीलिनः।

करिष्यन्ति च संकोचं रवपथ्य क्षय पीड़िताः॥43॥

एवं श्रुशुजनो दाने सत्य प्राणा निरक्षणे।

चतुष्पादः प्रवृत्त श्च धर्मः श्रेयोऽभियत्यते।44।

तेषाँ लब्धानुमाना नान् गुणोषु परिवर्तताम्।

स्वादु किंम्बिति विज्ञाय धर्म एवं वदिष्यति।45।

यथा हानि क्रमात्प्राप्ता तथा वृद्धि क्रमागता।

प्रगृहीत यतो धर्मे प्रवत्स्यन्ति कृतयुगत्॥46॥

उस समय से ही रोगों से उन की इन्द्रियों का क्षय होगा और आयु क्षय के संरोध से परम विषाद को प्राप्त होंगे उन्हें साधुओं के टहल और दर्शन की इच्छा होगी और साधुओं से उपदेश ग्रहण करेंगे, रोगी रहने के कारण सभी प्रकार के व्यवहार बन्द हो जाने के कारण सत्य वचन को बोलने लगेंगे। काम के न होने से धर्मशील हो जायेंगे आयु क्षय और रोग होने के डर से दुराचार को करने में संकोच करेंगे और दान करने लगेंगे प्रिय और सत्य बोलने के कारण जब वे सेवा भाव को अख़्तियार करेंगे तब धर्म चारों और से आ पहुंचेगा तब उन के मन में यह बात पैदा होगी कि अधर्म करना बुरा है, और धर्म करना बहुत अच्छा है तब सब कोई धर्म का उपदेश करेंगे और स्वयं धर्म ही पर चलेंगे जिस क्रम से क्रमशः करके धर्म की इतनी हानि हुई है, वैसे ही क्रम क्रम करके धर्म की वृद्धि होगी और जब सब धर्मी हो जायेंगे तब वही सतयुग कहा जायेगा। और जब सतयुग और धर्म दानों आ पहुँचेंगे तो सुख सम्पत्ति आप ही आ जायेंगी इसी प्रकार सारा संसार सुखी और सतयुगी होगा।


सतयुगी मित्र

(मित्र का मित्र के लिए आत्मयोग)

सिसली द्वीप का राजा डायोनीसियम अपने क्रोधी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध था। एक बार पीथियस नामक युवक से अपराध बन पड़ा राजा ने उसे फाँसी का हुक्म सुना दिया। यह युवक अपने कारोबार के सिलसिले में सिसली रहता था पर वास्तव में वह यूनान का निवासी था। पीथियस ने राजा से प्रार्थना की कि मृत्यु से पूर्व मुझे अपनी मातृभूमि को एक बार देख लेने की इच्छा है। राजा ने उत्तर दिया कि - क्या भरोसा है कि तुम वापिस लौट आओगे। यदि तुम कोई अपना जमानतदार इसी फाँसी की कोठरी में छोड़ जाओ तो जा सकते हैं। नियत तिथि तक वापिस न आये तो तुम्हारे बदले उसे फाँसी लगा दी जायेगी। राजा जानता था कि मृत्यु से डरकर किसी भी आदमी का भाग जाना बहुत सम्भव है इसलिए इसे ऐसा कोई जमानतदार नहीं मिलेगा। इस प्रकार बात को टालने की यही सब से अच्छी शर्त है।

उत्तर को सुनकर युवक हताश हो गया वह जानता था कि ऐसा जमानतदार मिलना असम्भव है। वह पथराई हुई आँखों को नीची किए हुए पैर के अंगूठे से जमीन कुरेद रहा था कि दर्शकों में से एक व्यक्ति राजा के सामने उपस्थित हुआ। उसने कहा- मैं पीथियस का जमानतदार हूँ मुझे इसकी जगह बन्द करवा दीजिए। राजा को बड़ा अचम्भा हुआ, पर वह वचनबद्ध था। जमानतदार डेमन को कारागार में बाँध दिया गया और पीथियस को छोड़ते हुए उससे कह दिया गया कि एक महीने के अन्दर तुम्हें आ जाना चाहिए, नहीं तो ठीक आज के दिन डेमन को फाँसी दे दी जायेगी।

धीरे धीरे एक महीने पूरा हो गया और वह दिन आ पहुँचा जिस दिन सन्ध्या समय फाँसी दी जाने वाली थी। डेमन जानता था कि पीथियस सच्चा मित्र है, वह ईमानदारी को प्राणों से अधिक कीमती समझता है। प्रतिज्ञा करते करते सारा दिन बीत गया, डेमन को बाँधकर वध स्थल पर पहुँचा दिया गया। उसके गले में रस्सी बाँधी जा रही थी कि तीर की तरह दौड़ता हुआ पीथियस वहाँ आ पहुंचा। उसने दूर से ही चिल्ला कर कहा- ठहरिये, मैं आ गया। अधिकारी ठहर गये। वह बहुत जोर से हाँफ रहा था। पीथियस ने कहा “समुद्री तूफान ने मेरी नाव को इतनी देर लगादी। ईश्वर को धन्यवाद है कि मैं अपने वचन का पालन करने में समर्थ रहा। लीजिये, अब मैं मरने को तैयार हूँ।”

मित्रों की सच्ची मित्रता का आदर्श देखकर राजा का हृदय पिघल गया। उसने दोनों को मुक्त कर दिया और प्रार्थना की आप लोग मुझे भी अपना तीसरा मित्र बना लीजिए। सच्चे मित्र से बढ़कर और कोई मूल्यवान वस्तु इस संसार में नहीं है।


काँग्रेस और सतयुग

(ले. श्यामबिहारीलालजी रस्तोगी विहार शरीफ)

पाठकों को शायद यह जानकर आश्चर्य हो कि काँग्रेस का प्रोग्राम (कार्यक्रम) सतयुग लाने का था और है।

काँग्रेस का मुख्य ध्येय आरम्भ से ही यह रहा है कि सत्य, अहिंसा और प्रेम के मार्ग पर चल कर स्वराज्य प्राप्त करना। काँग्रेस के सर्वेसर्वा पूज्य महात्मा गाँधी जी ने स्वराज्य कैसा होना चाहिए इसकी व्याख्या करते हुए कहा था-

“स्वराज्य में राजा से लेकर प्रजा तक एक भी अंग अविकसित रहे ऐसा नहीं होना चाहिए, उसमें कोई किसी का शत्रु न हो सब अपना काम करें, कोई निरक्षर न रहे, उत्तरोत्तर सब के ज्ञान की वृद्धि होती जाये, सारी प्रजा में कम से कम बीमारियाँ हों, कोई भी दरिद्री न हो। परिश्रम करने वाले को बराबर काम मिलता रहे उससे जुआखोरी, मद्यपान, और व्यभिचार न हों, वर्ग विग्रह न हो धनिक अपने धन का उपयोग विवेक पूर्वक कर सकें- भोग विलास की वृद्धि करने में अथवा अतिशय संचित करने में नहीं। यह नहीं होना चाहिए कि मुट्ठी भर धनी मीनाकारी के महलों में रहे और हजारों अथवा लाखों लोग हवा और प्रकाश से रहित कोठरियों में।”

उपरोक्त इस व्याख्या पर यदि आप ध्यान देंगे तो आप को पता चलेगा कि संसार की ऐसी अवस्था सतयुग में ही होती है, इससे यह भली-भाँति स्पष्ट होता है कि महात्माजी जो कुछ भी कह रहे हैं, सतयुग आगमन के उद्देश्य से। आचार्य श्री जे. वी. कृपलानी जी का कथन है-

‘राजनैतिक डाक्टरों ने ठीक निदान नहीं किया था और उन्हें उस असल रोग का पता नहीं था जिससे देश को तकलीफ हो रही थी। रोग का कारण केवल राजनैतिक अधिकारों का आकस्मिक ह्रास ही नहीं था, क्योंकि ऐसा ह्रास तो प्रतिकूल संयोगों के मिल जाने से उस राष्ट्र का भी हो सकता है जो स्वस्थ और निरोग है। असल कारण तो राष्ट्र की जीवात्मा का दौर्बल्य था। एक मात्र राजनैतिक पराधीनता से ही हम नहीं गिरे बल्कि नैतिक, आध्यात्मिक तथा अन्य अनेक क्षेत्रों में हमारा पतन हो गया। इसलिए अगर देश को बचाना है तो यह काम केवल राजनैतिक प्रभुता को स्थानान्तरित करने भर से चाहे वह कितना भी महत्वपूर्ण न हो, नहीं हो सकता। इसका आधार अवश्य किसी भावना पर होना चाहिए, किसी ऐसे तत्व पर जो जीवन के मूल में परिवर्तन करने वाला हो इस प्रकार आन्दोलन आध्यात्मिक तथा आदर्शमय तो होगा ही।”

“गाँधीजी काँग्रेस के जरिये जिस आध्यात्मिक क्रान्ति को लाना चाहते हैं वह यही है। गाँधीजी की योजना में सत्य और अहिंसा केवल धार्मिक रूढ़ी भर ही नहीं हैं उन्हें तो राष्ट्र के जीवन तथा उसके चेष्टाओं में गूँथना होगा। बुराइयों से सफलतापूर्वक असहयोग करने के निमित्त पारस्परिक सहयोग की शिक्षा लेनी पड़ेगी। यह बिल्कुल सम्भव है कि गाँधीजी के समान या उनसे भी बड़ा दिमाग वाला व्यक्ति पैदा हो जाये और इन सिद्धान्तों को विभिन्न सिद्धान्तों और सुधार की योजनाओं में लागू करदे, लेकिन जब तक इन सिद्धान्तों को सिलसिले में लाने का इसमें अच्छा तरीका खोजा या काम में लाया नहीं जाता है तब तक तो गाँधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम ही मैदान में अड़े रहेंगे।”

उपरोक्त बयान से यह स्पष्ट हो जाता है कि महात्माजी के सभी कार्य संसार में आध्यात्मिक क्रान्ति करने के लिए सतयुग लाने के लिए हैं, इस के लिये वह आध्यात्मिक और आदर्शमय आन्दोलन चलाना चाहते हैं।


विभिन्न धर्मों की मान्यता

सिख धर्म के आचार्य श्री गुरु गोविन्दसिंह जी महाराज ने अपने दशम ग्रन्थ साहेब में तथा और भी कई जगह कलियुग की समाप्ति का समय सम्वत् 2000 लिखा है। इस सम्वत् को अपनी बीसा सम्वतु कह कर पुकारा है।

जरदस्त पैगम्बर के खलीफा जामारय ने अपनी पुस्तक “जामास्यनामा” में लिखा है जब सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति कर्क राशि पर आवेंगे, तब एक महान आत्मा प्रकट होगी वह दुनिया भर में न्याय और आनन्द फैला देगी। दुनिया पाप कर्मों को करना छोड़ देगी। यही योग श्रीमद्भागवत् में कलियुग समाप्ति के लिए दिया गया है। जो सम्वत् दो हजार में पड़ता है।

जार्ज बाबेरी जो मिश्र की प्राचीन गुप्त विद्याओं के विशेषज्ञ समझे जाते हैं, भविष्यवाणी कर चुके हैं कि 24 सितम्बर सन 1936 से नवीन युग प्रारम्भ हो जायेगा।

तिब्बत के लामा योगी विश्वास करते हैं कि अब शीघ्र ही ‘चवाल युग‘ (सतयुग) प्रारम्भ होगा और असत्य के ऊपर सत्य की विजय होगी।

यहूदी धर्म ग्रन्थों में ऐसे उल्लेख मिलते हैं, जिससे इन्हीं दिनों ‘मुएरगजर युग‘ (सतयुग) आरम्भ होने वाला है।

जापानी बौद्धों का विश्वास है कि सन् 1936 ई. से ‘अबतिरी’ (सतयुग) आरम्भ हो गया।


योरोपीय विद्वान और सतयुग

इस समय दुनिया की जो कठोर शिक्षा मिल रही है, उसके फलस्वरूप मनुष्य की आंखें खुलेंगी और वह अपनी भूल का अनुभव करता हुआ सत्य और न्याय की ओर झुकेगा। मानवजाति को दुष्ट मनोवृत्तियों का परित्याग करके सत्य के परिपूर्ण एक नई व्यवस्था कायम करनी पड़ेगी। -पोप पायस

निस्संदेह नवीन संसार का निर्माण आध्यात्मिकता के आधार पर ही होगा। असंख्य जनता का विश्वास है कि अब परमात्मा का अवतार प्रकट होने ही वाला है। -वैलड्रोन स्मिथस

एक महान प्रकाश के लिए हमको तैयार हो जाना चाहिए। इस अवसर के आने में अब अधिक देर नहीं है। -रेवेंडर मेलगर्ड

मैंने मिश्र देश की एक बहुत प्राचीन और सुप्रसिद्ध मीनार पर यह लिखा हुआ पढ़ा है कि शीघ्र ही एक हजार वर्ष के लिए सतयुग आने वाला है।

- पादर वाल्टर वेन

(लन्दन के संडे एक्सप्रेस पत्र से)

सन् 1943 में कलियुग समाप्त होकर सतयुग आरंभ होगा। -लंदन के प्रसिद्ध ज्योतिषी शेरो

“इस समय हम एक ऐसी घड़ी में से गुजर रह हैं, जब कि वर्तमान सभ्यता का नाश होता है, इसके पश्चात् नवीन आनन्ददायक सभ्यता का आरम्भ होना है।” -फ्राँस के प्रसिद्ध ज्योतिषी रोम्याँ रोला

‘योरोपीय सभ्यता नाश होने जारी रही है, उसका स्थान एशियाई सभ्यता लेगी।

-जनरल लुडैन औफ

कलियुग अगस्त सन् 1941 को समाप्त हो जाने वाला है।

- श्रीमती एनीवीसेन्ट

अब कलियुग समाप्त होने में ज्यादा देर नहीं है और हम में से कितने ही नये युग को अपनी आँखों से आरम्भ होते देखेंगे। - ब्लैवेटस्की

(सीक्रेटड कृरिन)


सदा कलियुग, सदा सतयुग

(हर समय हर एक युग उपस्थित रहता है।)

समय विभाग की दृष्टि से युगों के समय अलग-अलग हैं, पर धर्माधर्म की दृष्टि से सदा कलियुग रहता है और सदा सतयुग। प्रति दिन भी युग बदलते हैं। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में सतयुग आरम्भ होता है, मध्याह्न काल से त्रेता लगता है, सूर्य अस्त होते ही द्वापर आरम्भ हो जाता है और आधी रात बाद कलियुग की तूती बोलती है। आयु के भी इसी प्रकार चार विभाग हो सकते हैं। छल छिद्रों से रहित, राजा दोषों मुक्त बालपन की अवस्था सतयुग है, कर्म-उत्साह, आनन्द की जवानी को त्रेता कह सकते हैं, खसती उम्र, कुछ ढिलमिल पन, उत्साह की कमी यह द्वापर की सूचक है, चारपाई पर खों खों करते हुए मृत्यु की राह में पड़े रहने का समय कलियुग है। तुरीय अवस्था सतयुग, जागृति त्रेता, स्वप्न द्वापर, और सुषुप्ति को कलियुग कह सकते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र चारों वर्णों पर क्रमशः चारों युगों को घटा सकते हैं। ज्ञानियों को सतयुगी, कर्मवीरों को त्रेतायुगी व्यवहार बुद्धि वालों को द्वापरी और अज्ञान अन्धकार में पड़े हुए जीवों को कलियुगी कहने में कुछ हर्ज नहीं। इसी प्रकार जीवन के विभिन्न अवसरों पर युग प्रभाव के विभिन्न स्वरूप हम देखते रहते हैं। यह प्रकट करते हैं कि सब युग हर समयों में जीवित रहते हैं और यथा अवसर प्रकट हो जाते हैं।

प्राचीन युगों के इतिहास पर दृष्टिपात करने से हर युग में उसके अतिरिक्त दूसरे युगों के मौजूद रहने के प्रमाण भी बहुतायत से मिलते हैं। सतयुग में हिरण्यकश्यपु जैसे राक्षस मौजूद थे, जिन्होंने पृथ्वी पर बड़ी भारी अनीति फैलादी थी, धरती माता गौ का रूप बनाकर भगवान के पास पहुँची थी और तब अत्यधिक पाप का समन करने के लिए भगवान को अवतार धारण करना पड़ा था। भस्मासुर जैसे असुर सतयुग में थे, जिसके वध के लिए स्वयं शंकर जी को प्रपंच करना पड़ा। पाप थोड़े अंशों में हो सो बात नहीं। देवताओं से असुर किसी प्रकार कमजोर नहीं थे, वरन् कहना चाहिए कि उसकी शक्ति कुछ अधिक ही थी। आये दिन देवासुर संग्राम हुआ करते थे। हमेशा बेचारे देवताओं का पक्ष गिरता हुआ रहता था, वे बार बार भाग कर हिमायत के लिए कभी विष्णु को, कभी ब्रह्मा को, कभी किसी को कभी किसी को लिवा कर लाते, तब कहीं पार पड़ती। ब्रह्माजी से अपनी काम वासना सहन न हुई, तो सगी पुत्री के साथ रमण करने के लिए दौड़े, पुत्री बेचारी शर्म के मारे स्वर्ग को भागी, ब्रह्मा जी भी साथ-साथ ही दौड़े फिरे। इन्द्र ने ऋषि की पत्नी अहिल्या से दुराचार किया और कर्मों का फल पाया, चन्द्रमा की नीयत गुरु पत्नी के साथ बिगड़ गई। वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ब्रह्मर्षि इतने तपस्वी होते हुए भी एक दूसरे की जान के ग्राहक बने रहे॥ विश्वामित्र ने तो वशिष्ठ के निरपराध छोटे छोटे बालकों का ही गला कतर डाला। कश्यप के आधे बेटे सुर थे आधे असुर। दक्ष राजा में तो इतनी ईर्ष्या थी कि उसने अपने दामाद योगिराज शंकर को उचित यज्ञ भाग देना बन्द कर दिया, शिवजी को पत्नी सती की थोड़ी भी सहनशीलता न हुई, उनके जरा से अपमान के बदले पिता का यज्ञ विध्वंस करने के निमित्त आत्म हत्या ही कर डाली। शिवजी भी किसी से कम थोड़े ही थे, स्वसुर का फौरन ही तो सिर उतरवा लिया। वे अपने पुत्र तक से तो चूके ही नहीं जरा सी भूल हुई कि बालक गणेश के कंठ पर कुल्हाड़ा धर बजाया, बेचारे बच्चे का सिर अलग था, तो धड़ अलग। माता की ममता न मानी तो शिव को भी झुकना पड़ा। गणेश के सिर पर हाथी का सिर चिपकाया। गंगावतरण की कथा जिन्होंने पढ़ी है, वे जानते हैं कि उस समय सतयुग में इतने जोर का अकाल पड़ा था कि मनुष्यों को भोजन तो दूर, पानी की बूँद प्राप्त करना भी कठिन हो गया था। उपस्ति ऋषि को तो चाण्डाल के झूठे उर्द खाकर प्राण बचाने पड़े थे। तब भागीरथ जी तप करके गंगा को लाये थे। अधिक इतिहास इन पंक्तियों में नहीं लिखा जा सकता, पर स्थाली पुलाक न्याय से यह सिद्ध है कि सतयुग में भी कलियुग के दृश्य दिखाई पड़ते थे।

अब त्रेता की बात लीजिए। उसमें सतयुग भी था और कलियुग भी। जनक जैसे कर्मयोगी, हरिश्चन्द्र जैसे सत्यनिष्ठ, दधीचि जैसे त्यागी, शिवि जैसे दानी मौजूद थे, पर साथ ही क्रूर कर्मों और नर पिशाचों की भी कमी न थी। लंका के असुर ऐसे बलवान थे कि उन्होंने देवताओं की सारी सम्पदा छीन कर अपने घर में रख ली थी। मद्यप, माँसाहारी दस्यु घातक, सभी दुर्गुण उनमें थे, राम जब वन गमन में गये हैं, तो उन्होंने हड्डियों के पर्वत जमा देखे हैं। राम ने वहाँ के निवासियों से पूछा है कि यह कैसे पर्वत हैं, तो वनवासियों ने उन्हें बताया है कि - भगवन् राक्षसों ने वनवासी ऋषियों को मार डाला है, यह उन्हीं के अस्थि पिंजर पड़े हुए हैं। ऐसे ऐसे अन्याय उस समय होते थे स्वयं राम की अयोध्या में उनकी द्विमाता कैकेयी और उनकी दासी मंथरा की करतूत सब को विदित है राम जब लंका विजय करके घर आये तो कहते हैं कि एक धोबी ने एक विरोधी आन्दोलन किया कि बेचारी निर्दोष सीता को घर से बाहर निकलना पड़ा। यह त्रेता के दो भले और दो बुरे पहलू हैं भरत का अपने भाई के साथ एक प्रकार का व्यवहार था, तो सुग्रीव और विभीषण का अपने भाइयों के साथ दूसरी प्रकार का। त्रेता में भी हमें दुरंगी दुनिया दिखाई पड़ती है।

द्वापर को लीजिए। राजा मोरध्वज अपने पुत्र को चीर देते है, कर्ण अपने शरीर के टुकड़े दान कराता है, भीष्म जीवन भर ब्रह्मचारी रहते हैं दूसरी और कौरव पक्ष के लोग बड़े बड़े लोमहर्षक कुकर्म करते हैं कंस की अनीति का भला कुछ ठिकाना था, फिर नारद को तो देखिए कैसा सत्य और धर्म से भरा उपदेश देने पहुँचे। ‘बहिन के सब बालकों को मार डाला। अच्छा पथ प्रदर्शन किया, ऋषि जी ने , रक्षा का बड़ा अच्छा मार्ग बताया न? गुरु हो तो ऐसे हों। ब्रह्मा जैसे वयोवृद्ध देवता का बछड़े चुराना, इन्द्र का नाराज होकर सारे ब्रज को जल से डुबाना, उनकी देव बुद्धि का परिचय देता है। कृष्ण की रास लीला, चीर हरण, सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ रखना इन सब लीलाओं का गुप्त रहस्य हर किसी की समझ में नहीं आ सकता। ऐसा था वह द्वापर। आज की भ्रूण हत्याएं करने वाली कुलटाएं अपने कर्मों को कुन्ती का उदाहरण देकर ढकना चाहती हैं। आज के राजनीतिक धर्मराज युधिष्ठिर के ‘नरोवा कुँजरोवा’ वाक्य की पुनरावृत्ति करने में कुछ दोष नहीं मानते।

फिर वर्तमान समय में ठहरा कलियुग, इस युग में तो पाप ही पाप होने चाहिए, धर्म के सारे हाथ, पैर टूट जाने चाहिए, सत्स और प्रेम का कहीं दर्शन भी न होना चाहिए। किन्तु पूर्ण रूप से यह बातें भी फलितार्थ नहीं हो रही है। प्राणी मात्र पर दया का अमृत बरसाने वाले भगवान बुद्ध और संसार को अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले भगवान महावीर इसी कलियुग में हुए हैं। प्रेम का अवतार ईसा इसी युग में प्रकट हुआ। सूर, तुलसी, मीराबाई ने भक्ति की अविरल सरिता इसी युग में बहाई है। कबीर, नानक, समर्थ गुरु रामदास, सन्त ज्ञानेश्वर, नरसी, बन्दा वैरागी को गुजरे अभी ज्यादा दिन नहीं बीते। जिसके होठों का दूध भी नहीं सूखा, वह वीर हकीकत राय धर्म के लिए दीवार में जिन्दा चिन जाता है, और हँसता हुआ माता पिता से कहता है, आप लोग दुखी मत हूजिए, मुझे हर्ष पूर्वक धर्म की वेदी पर बलिदान होने दीजिए, उस अबोध बालक को देखकर, देखने वालो का धैर्य छूट जाता है, पर वह विचलित नहीं होता। पूरन भक्त धर्म के विरुद्ध पथ पर पैर न रख कर एक अंधी सुन्दरी का प्रस्ताव ठुकरा देता है और खुशी शूली का दंड सहता है। महात्मा सुकरात विष का प्याला पीते हैं, देवी जौन चिता में जलती है, ईसा मसीह हँसता हुआ क्रूस पर चढ़ता है। यह घटनाएं सतयुग की नहीं, इसी कलियुग की है। लोकमान्य, तिलक, महात्मा गाँधी, ऋषि टॉलस्टाय, जार्ज वाशिंगटन, डॉ. सनयात, सेन, महात्मा कार्लमार्क्स इसी युग की तत्वदर्शी आत्मा हैं।

हम अपने आस पास ही नजर दौड़ावें तो ऐसे अनेक महानुभावों को पा सकते हैं, जिन्हें सतयुगी कहा जा सके। एक सच्चे आलोचक की दृष्टि से देखा जाय तो बुरे से बुरे जीव में भी पाप की अपेक्षा धर्म अधिक है। चूँकि पाप बुरी और अस्वाभाविक चीज है, इसलिए उसका थोड़ा होना भी अधिक और आश्चर्यजनक प्रतीत होता है। इसलिए हमें इस समय बुराइयाँ अधिक दिखाई देती हैं, किन्तु तत्वतः ऐसी बात नहीं है। सत से जब तम का अंश प्राणी में अधिक हो जायेगा, तो वह पाव भर आटे में तीन पाव नमक की रोटी की तरह स्थिर न रह सकेगा। एक दार्शनिक का कथन है कि “दुनिया में कालापन अधिक है, पर सफेदी से अधिक नहीं। जिस दिन दुनिया में धर्म की अपेक्षा पाप अधिक बढ़ जायेगा, उस दिन वह पृथ्वी मनुष्यों के रहने योग्य न रहेगी।”

मेरा मन्तव्य इतना ही है कि हर युग में दूसरे युग भी वर्तमान रहते हैं और वे किसी मनुष्य की स्वाधीनता में हस्तक्षेप नहीं करते। कलियुग में भी धर्म की उन्नति होने और सत्कर्मों के बढ़ने में कुछ भी प्रतिबंध लगा हुआ नहीं है।


अवतार का ठीक समय

आज की विषम स्थिति में प्रभु का आना आवश्यक है।

अब ठीक यह समय अवतार होने का है। सृष्टि का संतुलन बहुत ही ऊँचा नीचा हो गया है। मानव जीवन की स्वाभाविक स्थिति बहुत ही विकृत हो गई। सरल जीवन कठिन और कंटकाकीर्ण बना हुआ है। प्रकृति की दी हुई वस्तुओं पर दूसरों का अनुचित कब्जा है। लोगों को स्वाभाविक आवश्यकताओं की पूर्ति से वंचित रहना पड़ता है। संसार में जीवन यापन के लिए आवश्यक वस्तुओं की कमी नहीं है, पर व्यवस्था ऐसी गड़बड़ है कि एक ओर तो असंख्य व्यक्ति भूखे तड़प तड़प कर प्राण दे रहे हैं। दूसरी ओर अन्न राशि को अग्नि की भेंट इसलिए किया जा रहा है कि पैसे वालों की इच्छानुसार भाव रहें। एक ओर बेकारी और गरीबी के चक्र में दुनिया पिस रही है , दूसरी ओर अमीरों के खजाने तूफानी वेग से बढ़े जा रहे है। सामाजिक जीवन और भी पेचीदा हो गया है। बाल विवाह, वृद्ध विवाह, कन्या विक्रय और क्रय, अपहरण, बलात्कार, तलाक, दुराचार आदि कारणों से दांपत्ति जीवन का स्वर्गीय आनन्द नष्ट हो गया है और उसके स्थान पर नारकी कलह एवं मनोमालिन्य उठ खड़ा हुआ है। मनुष्य-मनुष्य के बीच भाईचारे का प्रेम सम्बन्ध टूट गया है। काले, गोरे, दास, मालिक, गरीब, अमीर, ऊँच, नीच, छूत, अछूत, के बीच में इतनी गहरी खाई है कि एक दूसरे से बहुत दूर पड़ गये हैं। एक ही पिता की संतान, अपने भाई की छाया पड़ने से भी अपवित्र हो जाती है। हमारे अहंकार, हमारे अन्धकार! तेरा नाश हो।

स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने के स्थान पर फैशन का शैतान विराजमान है। सिर से पैर तक फैशन से लदे हुए, अनावश्यक, अपवित्र और हानिकर टीमटाम के द्वारा रोगों का आशीर्वाद प्राप्त हो रहा है। इन्द्रिय लिप्सा से अन्धे होकर लोग शरीर के ईश्वर दत स्वतों को गला रहे हैं। आँखें गड्ढ़े में धँसी हुई, मुख सूखा हुआ, हंड्डियों का ढोल मात्र धारण किये हुए बाबू लोग इधर से उधर घूमते दिखाई देते हैं चुरुट का धुआँ फक फक फूँकते हुए नकली आँखों की सहायता से देखने वाले ये युवक जीते तो हैं, पर यदि इनकी जिन्दगी को भी जिन्दगी कहेंगे, तो मौत किस चीज को कहा जायेगा। रोगों का घर, व्याधियों का मन्दिर शरीर बना हुआ है। जो कमाते हैं डाक्टरों के बिल में चुका देते हैं, गरम पानी (चाय) से बासी रोटियाँ (बिस्कुट) खाना बस यही इनके भाग्य में बदा है। असली दूध दही मिलना मुश्किल हो रहा है। औसत आयु 20-22 वर्ष रह गई है। मक्खियों की तरह पैदा होते हैं और मच्छरों की तरह मर जाते हैं। बालकपन की पूँछ से बुढ़ापा जुड़ा आता है।

राजनीति अब धर्म-नीति नहीं रही है, उसे कूट नीति बनना पड़ा है। संधियाँ, वायदे, वचन, लोकहित, विश्व-कल्याण यह सब बात उपहासास्पद समझी जाती है। झूठ, फरेब कपट, स्वार्थ-साधन, जिस प्रकार भी होता हो वही राजनीति है। हम देख रहे हैं कि राजनीति के करणधार अपने विरोध को बुरा सिद्ध करने के लिए धर्म और न्याय की दुहाई देते हैं, पर उनके अपने व्यवहार में धर्म और न्याय को जरा भी स्थान देने के लिए तैयार नहीं होते। जनहित की संघ शक्ति शासन सत्ता आज चन्द लोगों का हित साधन करती हैं और अधिकाँश भूखे, नंगे लोग उनके भार से दबे हुए कराहते हैं।

धर्म के स्थान को पाखण्ड ने ग्रहण कर लिया है। अशिक्षित, आलसी, चोर, डाकू, लम्पट, शूद्र, पाखण्डी आज धर्म गुरु बने हुए हैं। कायर, प्रमादी, हरामी और व्यसनी भिखमंगे लाखों की संख्या में साधु संन्यासी बने हुए जनता को पथ भ्रष्ट करते फिर रहे हैं। अपना बड़प्पन प्रकट करने, पैर पुजाने, शिष्य बनाने और भिक्षा प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई कार्य धर्म गुरुओं का प्रतीत नहीं होता। सिद्धान्त और उपदेश उनकी जिह्वा तक ही है। पर उपदेश में कुशल हैं, किन्तु कुछ भी कष्ट सहन का प्रसंग आ जायं तब तो उनकी नानी ही मरती है।

आध्यात्म-ज्ञान! बस, यहाँ तो पूरी अराजकता है। अन्ध श्रद्धा, अज्ञान, भ्रम, उन्माद, हठधर्मी, यही अध्यात्मतत्त्व की चार दीवारी है। आज कपिल और कर्णादि हमें दिखाई नहीं देते, जो अपने तर्क और अनुभव की कुल्हाड़ी से भ्रम जंजालों की कटीली झाड़ियाँ को काट दें और आध्यात्म तत्व को अन्धकार में से उबारकर किनारे तक पहुँचा दें।

सभी दिशाओं में अव्यवस्था का साम्राज्य छाया हुआ है। इस अशान्ति की मरुभूमि में से दो पिशाच पैदा हुए हैं (1) स्वार्थ (2) असत्य। हर मनुष्य अपने स्वार्थ के साधन में प्रवृत्त है, इसके लिए वह बुरे से बुरे काम, नीच से नीच कुकर्म करने को तैयार है। पुरुष रुपयों के बदले अपनी कन्या का माँस तराजू से तोल कर वृद्ध और रोगी कुत्तों को बेचने लगे और स्त्रियाँ सतीत्व का व्यापार करने लगीं। चोरी, दगाबाजी, विश्वासघात, ठगी ऋण मारना, हत्या, कौन सा ऐसा जघन्य कार्य है जिसे मनुष्य अपने स्वार्थ साधन के लिए नहीं करते। पति पत्नी और पिता पुत्र का रिश्ता स्वार्थ की आधार शिला पर स्थापित होने लगे है। मनुष्य भेड़िये की तरह जीभ निकलकर दूसरों का रक्तपान करने के लिए इधर-उधर दौड़ता फिर रहा है। तृष्णा के मारे अन्धा हो रहा है अपना पराया उसे कुछ सूझ नहीं पड़ता। स्वार्थ और असत्य के पिशाचों ने मनुष्य जाति को अपनी मोहिनी में फाँस लिया है और संसार को अपनी उंगली के इशारे पर नचा नचा कर इस देव दुर्लभ भूमि को मरघट बनाये हुए है। अब दुनिया इस शोकानी चक्र में पड़ी-पड़ी व्याकुल हो रही है। अनाचार के बोझ से दबी हुई वसुन्धरा प्रार्थना कर रही है कि हे नाथ! अब मुझ से सहा नहीं जाता। भगवान उसकी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए शीघ्र ही प्रकट होने की तैयारी कर रहे हैं।


इस्लाम और सतयुग

(चौदहवीं सदी में कयामत का आगमन)

‘माला बुद कब्लुत कयामत’ नामक एक अरबी पुस्तक में कयामत आने के पूर्व चिन्ह इस प्रकार बताये गये हैं- “निद्रा के अतिरिक्त जागृत अवस्था में किसी को शान्ति न मिलेगी। पूर्व वाले पश्चिम के प्रशंसक बनेंगे। स्त्रियाँ पुरुषों की बराबरी करेंगी। सोने से लोहा मूल्यवान होगा। चाँदी जैसी एक और धातु निकल आवेगी। हाट बाजार में बैठ कर खाना बुरा न समझा जायेगा। स्त्रियाँ जाल पर्दा छोड़ कर बाहर फिरेंगी। लोग दिन चढ़े तक सोया करेंगे। पक्षियों की तरह आकाश में उड़ना संभव होगा। अपने विचारों को जरा सी देर में दूर देशों को भेज देना सुगम होगा। खाने के लिए लोहे के हाथ होंगे चारपाइयाँ भी लोहे की होंगी। सवारियाँ ऐसी होगी जिनमें जान न होगी पर हजारों मील की यात्रा बहुत शीघ्र कर लेगी। माता-पिता का आदर न रहेगा, धर्म न रहेंगे और सूरज सवा नेजे पर आ जायेगा जिसकी रोशनी सब पसंद करेंगे।”

यह सभी बातें आज दिखाई दे रही हैं। बिजली की बत्तियों के द्वारा सूरज सवा नेजे पर आ गया है, जिसे? सब पसंद करते हैं।

मक्के के हमीदिया पुस्तकालय में “अल्कश्फ वल्कत्मफी मार्फत पुस्तक रखी हुई है। उसमें लिखा हुआ है कि “जिस समय फुट, कलह और व्यभिचार बहुत बढ़ जावेंगे तब एक पुरुष आवेगा। यह आध्यात्मिक शक्तियों से पूर्ण होगा। वह अग्नि के अस्त्रों को बेकार कर देगा। वह हर जगह विजय प्राप्त करेगा। उसे अपनी सेना कहीं ले जाने की आवश्यकता न होगी। आत्मशक्ति ही उसके लिए पर्याप्त होगी। दुनिया उसकी बात मानेगी। वह संसार को स्वर्ग बना देगा और बूढ़ों को जवान कर देगा।”

इसी प्रकार का विवरण ‘इमामें आखिकज्जमा’ ग्रन्थ में भी मिलता है।

इस्लाम धर्म की पुस्तकों के अनुसार संवत् 2000 के करीब कयामत आवेगी, कयामत का तात्पर्य यही समझना चाहिये कि “कोई पापी न रहेगा।” मदीने की प्रसिद्ध पुस्तक ‘मकसूम बुखारी’ में ऐसा उल्लेख है कि “हिजरी सन् की चौदहवीं शताब्दी की दूसरी तिहाई में कयामत होगी और हजरत मेंहदी प्रकट हो जायेंगे।”

प्रत्येक शताब्दी की एक तिहाई 33 वर्ष 4 मास की होती है दूसरी तिहाई 66 वर्ष 8 मास की हुई। संवत् दो हजार विक्रमी की श्रावण अमावस्या को हिजरी सन् 1363 के रजब महीने की 28 तारीख पड़ती है। इस प्रकार यह हिसाब भी हिन्दू धर्म पुस्तकों के अनुसार संवत् दो हजारी में कलियुग समाप्त होने के मत का समर्थन करता है।

योगी वहाउल्लाह ने एक स्थान पर कहा है-

“भूपतियों! एक सूत्र में बंध कर रहो। क्योंकि प्रेम से ही कलह का अन्धड़ शान्त हो सकता है और गरीब सुख शान्ति से रह सकते हैं अब वह समय पास ही है शीघ्र ही एक महान मनुष्य जाति का निर्माण होगा। और वह आपसी घृणा को छोड़ कर विश्व बन्धुत्व के सिद्धान्तों में बँध जायेगी।”


Quotation

मनुष्य को अपना महत्व समझ लेने दो, फिर वह सब वस्तुओं को अपने पैरों के नीचे कर लेगा, अपने बस में कर लेगा।

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तुम ऐसी किसी भी वस्तु को नहीं बता सकते जो ज्ञान से परे हो, तुम कभी यह मत सोचो कि कोई भी काम तुम्हारी शक्ति से बाहर है तीव्र इच्छा वाले आदमी के वास्ते कुछ भी असम्भव नहीं है।


लोक वाणी

(“आवाज ए खलक को, नक्कारे खुदा समझो”)

उलट पलट की घोषणा।

“भविष्य में भारत को जिस विपुल तथा विराट् कार्यों का भार अपने ऊपर लेकर खड़ा होना पड़ेगा, उसकी सूचना स्वरूप सारे संसार में एक विचित्र प्रकाश का होना आरम्भ हो गया है। आगामी 30-40 वर्ष के भीतर संसार में एक विचित्र प्रकार का परिवर्तन होगा, सारी बातों में उलट पलट हो जायगी। उसके बाद जो नया जगत् तैयार होगा, उसमें भारत की सभ्यता ही संसार की सभ्यता होगी। भावी भारत का काम केवल भारत के लिए ही नहीं बल्कि समूचे संसार के लिए है। “

-योगी अरविंद घोष सन् 1918

अब कलियुग का अन्त हो रहा है और जीर्ण शीर्ण विचारों का ध्वंस हो रहा है। अब वह समय आ पहुँचा जबकि उन्नति और विकास के कार्यों को आरम्भ किया जाये ठीक यही समय आने वाले सतयुग की तैयारी करने का है।

-महात्मा अरविन्द घोष

(घशद्दड्ड ड्डठ्ठस्र द्बह्लह्य शड्ढद्भद्गष्ह्ल पुस्तक से)

मैं विश्वास करता हूँ कि निकट भविष्य में वह शुभ युग आने वाला है, जिसे राम राज्य कहना चाहिए।

-महात्मा गाँधी

मनुष्य जाति की अब अधिक अवनति नहीं होगी। ईश्वर की ऐसी इच्छा प्रतीत होती है कि अब संसार का पुनर्निर्माण हो और सब लोग धर्म कर्तव्यों का पालन करें।

-महामना मालवीय।

आज हम अँधेरे जमाने में होकर गुजर रहे हैं तो भी आने वाला कल उज्ज्वल है। हमें दिखाई दे रहा है कि भविष्य सूर्य की तरह प्रकाशवान् और चन्द्रमा की तरह शान्तिदायक होगा।

-माननीय राजगोपालाचार्य।

संशयात्माओं से मैं। पूछता हूँ कि यदि प्रकृति के गर्भ में सत् तत्व नहीं हैं तो प्राणघातक संघर्ष और विश्वव्यापी दारुण वेदना में से मनुष्यों को क्यों गुजरना पड़ रहा है? बीमारी के समय पीड़ा होती है यह इस बात का सबूत है कि स्वास्थ्य ही सत्य है। हमारा शरीर इस सत्य सिद्धान्त को मानता है इसलिए घोर प्रतिकार करके बीमारी को हटा बाहर निकालता है। यदि रोग के असत्य होने पर भी पीड़ा उत्पन्न न करता तो यह प्रकृति की भूल होती, पर ऐसा नहीं हैं। जब रोग प्रविष्ट हो जाता है तो सत् तत्व शरीर को प्रेरणा करता है कि दारुण दुख का खतरा लेकर भी वह असत् को हटा दे और तदुपरान्त सत- स्वास्थ्य को प्राप्त करें। आज सब तरफ युद्ध की बीमारी फैल रही है। मैं पूछता हूँ कि यह युद्ध कौन करा रहा है? इसका उत्तर है- प्रकृति के अन्तराल में छिपी हुई सत तत्व की वह सार्वभौम सत्ता जिसे कलि कल्मषों द्वारा हमने दबाया एवं अपमानित किया है।

-रवीन्द्रनाथ टैगोर।

मनुष्य समाज के उद्धार के लिए समय-समय पर इस देश और दूसरे देशों में भी महान् आत्माएं पैदा होती रही हैं। ऐसी आत्माओं को लोग अवतार कहते हैं। यह अवतार किसी एक विचारधारा भावना के प्रतिनिधि होते हैं इस युग में जिस भावना ने अवतार लिया है उसका नाम है- “समानता”। (स्शष्द्बड्डद्य द्गह्नह्वड्डद्यद्बह्लब्) उस भावना का प्रतिनिधित्व करते हुए अनेक आत्माएं प्रकट हो रही है। आइए। इस भावना रूप अवतार का सन्देश हम सुनें और उसका अनुसरण करें। ऐसा करने से मनुष्य समाज का जीवन पलट जायेगा और दुनिया मनुष्यों के लिए रहने के अधिक उपयुक्त हो जायेगी।

- पं. जवाहरलाल नेहरू।

भगवान को ऐसी पामर हालत में हमें नहीं रखना है। इसलिए वह हमारी सलामती हमसे छीन लेना चाहता है। कभी बाढ़ आती है, कभी भूचाल, कभी अकाल पड़ता है, की कभी बारिश की जगह धूप बरसती है। जहाँ धूप चाहिए वहाँ की घास सड़ने लगती है। प्लेग इन्फ्लुएंजा, हैजा, युद्ध हमारे पीछे पड़े हुए हैं। इसके मानी यही है कि भगवान् हमारा जीवन लम्पटता से बचाना चाहते हैं। हमसे कुछ न कुछ पुरुषार्थ कराना चाहते हैं। अगर हम इसके लिए मानसिक तैयारी करें तो भगवान् का संकल्प चरितार्थ करने का सौभाग्य हमें प्राप्त होगा। नहीं तो भगवान का दिया हुआ आखिरी मौका खो बैठने वाली जाति की जो दुरवस्था होती है, उसके लिए हमें तैयार रहना होगा। भगवान तो हमें अपने तरीके से जागृत करना चाहते हैं वह हमें जीवन क्रान्ति की शिक्षा दे रहे है। इससे हमारी नींद टूट जायेगी, आदतें सुधर जायेंगी, अपनी निज शक्ति को हमें अनुभव होगा और हम आजाद होकर दुनिया की कुछ सेवा कर सकेंगे। यह सब समय पर इतनी ही हमारी प्रार्थना हो सकती है, जिससे हमारी नींद टूटे। हमारी सब शक्तियों से हमें परिचय हो और हम अपने व्यक्तित्व को ग्रहण कर सकें। -काका लालोकर

सूरदार का प्रसिद्ध पद।

अरे मन धीरज क्यों न धरे॥

मेघनाथ रावण को बेटा से पुन्में जन्म धरे।

पूरब पश्चिम उतर दक्षिण प्रदेश काल पर॥

अकाल मृत्यु जगमाही व्यते बहुत मरे।

एक- एक को ऐसा नहीं वीट करे॥

एक सहसत्रा नौसे से, योग परे।

सहस वर्ष लो सतयुग बीते, बेलि बढ़े॥

नीति धरम सुख, आनन्द उपजे पुनि जग दशा फिरे। सूरदास यह हरि की लीला टारे नाहिं टरे॥


सत्य का प्रकाश

(ऋषि तिरुवल्लुवर)

मैंने इस दुनिया में बहुत वस्तुएं देखी है और बहुत अनुभव किया है परन्तु ऐसी कोई चीज मुझे नहीं मिली जो सत्य से बढ़ कर हो। दुनिया में बहुत तरह के प्रकाश को ही प्रकाश कहते हैं, कदापि मिथ्या भाषण न करना, मनुष्य यदि इस धर्म को पालन करता रहे तो फिर उसे अन्य धर्मों का पालन करने की क्या आवश्यकता है? शरीर पानी से शुद्ध हो सकता है, पर मन की पवित्रता बिना सत्य भाषण के नहीं हो सकती। जिसका हृदय सत्य से पवित्र है, वह अन्य हृदयों पर शासन करेगा। वह श्रेष्ठ दानी हैं और महान् तपस्वी है, जो सदैव सत्य परायण है। सिद्धियाँ उसके चरणों में लोटती फिरेंगी। मनुष्य की इससे बढ़कर और क्या कीर्ति हो सकती है कि उसे सत्यवादी कहा जावे।

सचाई वह है जिसके साथ मृदू भाषण और हित कामना भी हो। ऐसी सचाई जिससे दूसरों को हानि पहुँचती हो उससे तो वह झूठ अच्छा जिससे दूसरों का हित होता है। जिस बात को कहने में तुम्हारा मन झिझकता है, जिसका कहना अनावश्यक समझते हो या जिससे मिथ्यात्व का होता है, उसे मत कहो क्योंकि झूठ बोलने से हमारी ही आत्मा तुम्हें श्राप देंगी।


Quotation

आत्म विश्वास रखो, क्योंकि इससे प्रत्येक हृदय स्पन्दित होता है।

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मनुष्य ही स्वयं अपना प्रबंधक है। जो आत्मा मनुष्य को ईमानदार और पूर्ण बना सकता है, वही समस्त प्रकाश पूर्ण जगह सारे भाग्य पर राज्य करता है। उसके लिए कोई बात समय से पहले या पीछे ही होती।


अवतार का उद्देश्य

(अवतार क्यों और किस लिए होते हैं)

जब कि आत्मा परमात्मा का अमर पुत्र है और स्वेच्छा से अपने पिता की लीला भूमि में विचरण कर रहा है तो उसे अवतारी कहने में कुछ हर्ज नहीं है। इस दृष्टि से हर मनुष्य अवतार है। यदि ऐसा मानने में कुछ अड़चन हो तो महान् नेताओं को अवतार मानने में तो कुछ हर्ज है ही नहीं। मनुष्यों की लघुता महता उनकी आत्मिक योग्यता के ऊपर निर्भर है, जिसने परमात्मा का जितना अधिक भाग अपनी आत्मा में भर लिया है, वह उतना ही श्रेष्ठ है, पूजनीय है। क्योंकि उसमें परमात्मा की कलाएँ अधिक हैं। हिन्दू धर्म के अवतारों की कलाओं का भी उल्लेख है। परशुराम में 3, राम में 12, कृष्ण में 16 कलाएं बताई जाती हैं, इसका तात्पर्य है कि यह लोग आपस में एक दूसरे से छोटे बड़े भी थे। कलाओं की न्यूनाधिकता सिद्ध करती है कि यह लोग पूर्ण परमात्मा नहीं थे, इनमें कुछ न्यूनता थी। ठीक ही है शरीर धारी में कुछ न कुछ न्यूनता होती है, जब तक अविनाशी आत्मा जन्म मरण के चक्र में झूल रही है तब तक उसमें कुछ न कुछ त्रुटि ही प्रतीत होती है। अवतार और पूर्ण परमात्मा में जो अन्तर है वह यहाँ प्रगट हो जाता है।

सर्व व्यापक परमात्मा यदि एक ही स्थान पर एकत्रित हो जाये तो उसके सर्व व्यापकत्व में दोष आता है। जिस प्रकार अग्नि तत्व सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है और यथा अवसर वह चिंगारी दीपक की लौ या धू धू जलती प्रचण्ड अग्नि शिखा के रूप में प्रकट होती रहती है, वैसे ही परमात्मा संज्ञा के अंश जीव अपने पिता की कलाएँ लेकर आवश्यकतानुसार प्रकट होते हैं। जब जाड़े की ऋतु आती है तो गाँवों में झोपड़ी झोपड़ी के आगे अलाव जलते नजर आते हैं। बढ़ी हुई सर्दी से सृष्टि की रक्षा करने के लिए जाड़े के दिनों में थोड़ी थोड़ी कलाओं के असंख्य अग्नि अवतार प्रति दिन होते है। अंधियारे पक्ष में दीपकों के अवतार बढ़ जाते हैं, किन्तु गर्मी आते ही अग्नि की और उजाले पक्ष में दीपकों की आवश्यकता घट जाती है, इसलिये उसके अवतार भी कम हो जाते हैं। तब लोहे की एक बड़ी राशि गलानी होती है तो सैकड़ों मन कोयलों की एक बड़ी भारी भट्ठी जलानी पड़ती है, उसी प्रकार महान् कार्यों को पूरा करने के लिए परमात्मा की अधिक कलाएँ लेकर कुछ दिव्य आत्माएँ अवतीर्ण होती हैं परमात्मा अपनी सृष्टि का संतुलन ठीक रखना चाहता है, इसलिए समय समय पर अलग अलग प्रकार के अवतार भेजता है। इनके कार्य यद्यपि एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होते हैं पर वास्तव में एक ही वस्तु के कई रूप हैं जो स्थूल दृष्टि से देखने पर ठीक ठीक समझ में नहीं आते। ऋतुओं का परिवर्तन सर्दी, गर्मी और वर्षा कार एक दूसरे से विपरीत स्वरूप देख कर मूर्ख लोग इस असमंजस में पड़ जाते हैं कि ऐसा विपरीत अकारण क्यों होता है? पर सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर यह विपरीत कार्य केवल समय की आवश्यकता को पूरा करने के लिए ही होते हैं और जब उनका कार्य समाप्त हो जाता है तो अन्तर्धान होकर दूसरे रूप में प्रकट होते हैं अवतारों के कार्य एक दूसरे के विपरीत प्रतीत होते हैं। भगवान बुद्ध और अवतारी शंकराचार्य के सिद्धान्त में पूरा पूरा विरोध है, ऐसा ही जैसा माघ की सर्दी में और वैशाख की गर्मी में। पर वास्तव में यह विरोध नहीं है, जब हिंसा, हत्या और पाखण्ड का जोर था तब बुद्ध ने अवतार लिया, जब संन्यास, अकर्मण्यता और नास्तिकता बढ़ गई तो शंकराचार्य को प्रकट होना पड़ा। सृष्टि का संतुलन रहना आवश्यक है। जिन जीवों की प्रजनन शक्ति अधिक होती है वे मरते भी तेजी से हैं, क्योंकि अनावश्यक वृद्धि की इस संसार में गुंजाइश नहीं है। पेट में कब्ज हुई कि कै, दस्त हुए, खून में खराबी आई, कि फोड़ा फुन्सी हुई, काट छाँट की कैंची हमेशा सिर पर लटकती रहती है। हमारा माली बहुत होशियार है, वह जरा भी झाड़ झंकार बढ़ने नहीं देता। बगीचे की शोभा उसे अभीष्ट है, इसलिए जरूरत के मुताबिक खोदने, खाद देने, सींचने, घास पात को नराने, उसे निकम्मे पेड़ों को उखाड़ने में जरा भी देर नहीं करता। पापों के बढ़ते ही, वह अपने खुरपी कुदाली सँभालता है और काट छाँट कर संतुलन ठीक कर देता है। इसी पुनरुद्धार मरम्मत परिवर्तन के बोलचाल की भाषा में युग परिवर्तन या क्रान्ति कहते हैं। जिस कुदाली के द्वारा यह कार्य सम्पन्न होते हैं, उसे दुनिया पूजती है क्योंकि वह अवतार है। अवतार की पूजा होनी ही चाहिये।

रामचन्द्रजी ईश्वर के विशिष्ट अवतार हैं, यदि त्रेता में लोगों को ऐसा विश्वास होता तो रामायण की कथा दूसरी ही प्रकार लिखी जाती। क्या कैकयी उन्हें वनवास दिलाती? क्या दशरथ पुत्र शोक में मरते? क्या रावण सीता को चुराता? बालि विरोध करता? निशाचर युद्ध करते? क्या लंका का सर्वनाश होता? तब इनमें एक भी बात न होती। भगवान जो घट घट में विराजमान है रावण के हृदय में जरासी प्रेरणा कर देते। बाल्मीकि की तरह वह भी तो सुधर सकता था, फिर इतनी गड़बड़ इकट्ठी करने की क्या जरूरत थी? लेकिन ऐसा हुआ नहीं? किसी ने उन्हें नहीं जाना। हनुमान और सुग्रीव ने बारबार परीक्षा की हनुमान ब्राह्मण का रूप बनाकर पहुँचे, सुग्रीव ने ताड़ के सात पेड़ों को जड़ से कटवा कर विश्वास किया, जिनका सम्बन्ध जन्म जन्मान्तरों से था व तक अड़चन में पड़े तो अन्य साधारण व्यक्तियों की तो बात ही क्या? असली में बात यह है कि अवतार की बात तब तक प्रगट नहीं हो सकती जब तक कि वह अपने उद्देश्य में सफल न हो जाय, या उसकी यह लीला समाप्त न हो जाये। सुखान्त अवतारों को सफलता के बाद पूजा जाता है और दुखान्त अवतारों को इनकी मृत्यु के पश्चात। राम को लंका विजय के बाद अवतार माना गया तो ईसा को क्रूस पर चढ़ने के बाद। यदि ईसा को जीवित दशा में ही अवतार मान लिया जाता तो क्या उसका खास शिष्य केवल 30/- के लिए उसे पकड़वा कर मरवा देता। अवतार का महत्व उसके छिपे रहने में ही है। जब तक पता नहीं चलता कि किसी की हार−जीत होगी तभी युद्ध होता है, यदि इस बात की पक्की धारणा हो जाये कि अमुक पक्ष की ही जीत होगी तो दूसरा पक्ष फिर विरोध न करेगा।

आध्यात्मिक तत्व के आचार्य इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि प्रभु की प्रेरणा से जो दिव्य आत्माएँ भू भार को हटा कर तात्कालिक संतुलन ठीक करने के लिए अवतार लेती हैं वे अलौकिक चमत्कार नहीं दिखातीं वरन् अपनी आत्मशक्ति का प्रचंड प्रयोग करके अदृश्य वातावरण को शुद्ध करती हैं। बाजीगरी के खेल दिखाने से पापी मनुष्य कुछ डर तो अवश्य जायेंगे पर अपनी चाल न छोड़ेंगे, वे अवतार का सामना न करेंगे और इधर-उधर घात सोचेंगे। जितने भी अवतार हुए हैं उनका निज का जीवन बड़ी कठिनाइयों से भरा हुआ है। कृष्ण को जीवन भर युद्ध संघर्ष, कलह, अपमान विद्रोह सहने पड़े और अन्त में बहेलिये के तीर का मर्मान्तक आघात सहना पड़ा। राम ने क्या क्या कष्ट नहीं सहे। ईसामसीह और मुहम्मद का जीवन ऐसी ही विघ्न−बाधाओं से भरा हुआ है। यह बातें प्रकट करती हैं कि अवतारों को उसके जीवन काल लोग जान ही नहीं पाते। बहुत बार तो कई अवतार तक को अपनी दिव्य दृष्टि का स्वयं पता नहीं चलता और जब उन्हें अचानक यह प्रतीत होता है कि मैं थोड़े से प्रयत्न से बड़ी भारी सफलता प्राप्त मिल रही तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता। कहीं उसे अपने अन्दर भरी हुई विशेष कलाओं का ज्ञान होता है, रूस का उद्धारकर्ता लेनिन एक साधारण प्रतिभा का व्यक्ति था। जब वह अपने अज्ञात वास में पड़ा हुआ मृत्यु के दिन गिन रहा था तो उसने अचानक यह समाचार पढ़ा कि रूस में राज्य क्रान्ति हो गई और वह जिस सुनहरे स्वप्न को देखा करता था वह अचानक ही पूरा हो गया। युवराज गौतमबुद्ध एक मामूली से गृहस्थ थे उन्हें क्या पता था कि मैं संसार के कल्याण के लिए आया हूँ। भरी जवानी में जो राज महलों के शाही आनन्द लूट रहा था वह शायद ही कभी सोचता हो कि मुझे संन्यासी बनकर एक ईश्वरीय महान कार्य पूरा करना है।

हर मनुष्य अवतारी है यदि वह अपने सम्बन्ध में विचार करें और अपने महत्व का समुचित उपयोग करे तो ईश्वर अपनी इच्छा पूरी करने का उत्तर दायित्व उसे सौंप सकता है। आप बोझ को उठावेंगे जिसे कि अवतारों को उठाना पड़ता है तो आप भी अवतार बन सकते हैं ईश्वर की सभा में बीड़ा पड़ा हुआ है और वह अपने पुत्रों से पूछ रहा है कि क्या तुम से कोई अवतार की जिम्मेदारी ले सकता है? आप अपना हृदय टटोलिए और यदि साहस हो तो आगे को हाथ बढ़ा दीजिए।


सतयुगी अदालत

(मोहन राज भण्डारी “राज” अजमेर)

सिकन्दर महान् अपनी दिग्विजय के सम्बन्ध में एक बार अफ्रीका पहुंचा। उसकी इच्छा हुई कि मनोरंजन के लिए कुछ दिनों जंगली जातियों का रहन सहन देखने के लिये भ्रमण किया जाय। वह सरदारों की एक टुकड़ी के साथ अन्य प्रदेश में निकल पड़ा। घूमते-घूमते वह एक ऐसे प्रान्त में पहुँचा जहाँ के लोग बड़ी शान्ति से रहते थे और लड़ने झगड़ने का नाम भी न जानते थे। सिकन्दर वहाँ ठहर गया। अपने ग्राम निवासियों को बुलाया और पूछा कि तुम लोगों में या कभी झगड़ा नहीं होता? क्या तुम्हें राज दरबार की जरूरत नहीं पड़ती? ग्रामीणों ने उत्तर दिया कभी कभी झगड़ा हो जाता है उसका पंचायत से फैसला कर लेते हैं। आज भी एक पंचायत है आप उस में शामिल हो सकते हैं।

रात को पंचायत बैठी। एक वृद्ध पुरुष ऊँचे स्थान पर बैठकर न्यायाधीश का काम करने लगा। सिकन्दर दर्शक की तरह एक ओर बैठ गया। झगड़ा यह था कि एक व्यक्ति ने दूसरे से कुछ जमीन ले ली। सौदा हो जाने के बाद उस जमीन में कुछ गड़ा हुआ धन निकला। खरीदने वाला बेचने वाले को वह धन लौटा रहा था उसका कहना था कि मैंने तो जमीन मोल ली थी, न कि यह धन। बेचने वाला कहता था उस भूमिखंड का सारा उत्तरदायित्व मैंने बेच दिया था। मेरा अपना कोई धन उसमें नहीं था, फिर मैं क्या जानूँ यह धन कैसा है, मैं इसे ग्रहण नहीं कर सकता।

दोनों की बातें सुनने के बाद वृद्ध पुरुष चुप हो गया और बहुत देर तक फैसले का मार्ग ढूँढ़ता रहा। अन्त में उसने उन दोनों से पूछा तुम्हारे कोई सन्तान है? “खरीदने वाले ने कहा मेरी एक लड़की है, बेचने वाले ने कहा मेरे एक लड़का है। वृद्ध ने फैसला किया कि तुम अपनी लड़की का विवाह इसके लड़के से कर दो और उस धन को दहेज में दे दो। दोनों ने फैसले को सहर्ष स्वीकार कर लिया और झगड़ा मिट गया। सिकन्दर इससे आश्चर्य चकित रह गया, उसकी समझ में उस प्रान्त की शान्ति का कारण आ गया। जहाँ मनुष्य एक दूसरे के लिए त्याग करते हैं, अपने सुख को धर्म और प्रेम पर न्यौछावर करते हैं, वहीं शान्त रह सकते हैं अन्यथा स्वार्थान्ध होकर मनुष्य नाना प्रकार के कलह कृत्य करता रहता है।

कृतयुग-कल्पना


(विद्याभुषण पं. मोहन शर्मा, विशारद, पूर्व सम्पादक -”मोहिनी”)

इस सुविशाल जगतीतल में उस परम स्वरूप परमात्मा को मानव स्वभाव ने अनन्त रूपों में अनुभव किया और इसीलिए उसके नाम पर अनन्य धर्म, पन्थ, मत-मतान्तर आदि की सृष्टि होती गई अब तक संसार व्यापी गणना द्वारा जिन प्रमुख धर्मों और मजहबों को प्रगति गामी तथा अस्तित्व सम्पन्न माना गया है, उनकी समवेत संख्या 96000 के लगभग है। इनमें 800, अकेले भारत वर्ष में ही प्रचलित हैं और शेष का आँकड़ा भारतेतर अन्य देशों से सम्बन्धित है। इन तमाम धर्मों के धर्म शास्त्रों और विधि व्यवस्थाओं का विवेक किसी एक व्यक्ति के पक्ष में सम्भव नहीं पर संसार प्रसिद्ध कुछ धर्मों के सम्बन्ध में लोगों ने अध्ययन पूर्वक अपने-अपने निर्णय कायम किये हैं। उनके आधार पर निर्विरोध स्वीकार करना पड़ता है, कि संसार के कतिपय प्रमुख धर्म, जहाँ ईश्वर के ईश्वरत्व के लिये अपनी कोई कसौटी रखते हैं, वहां काल और युगों की योजना को भी उनमें अपनी-अपनी गणित या लेखे जोखे के अनुसार मान्य दिया गया है। यद्यपि भिन्न धर्मों की युग योजना और युगों की संख्या में साम्य दिखाई नहीं देता पर एक “कृतयुग“ जैसे सत्य धर्म की प्रतिष्ठा के श्रेष्ठ युग का कई ने प्रबल रूप से समर्थन किया है। अर्थात् एक युग ऐसा अवश्य माना है, जिसमें वेद विद्या के धनी सनातन धर्मावलम्बियों के प्राथमिक ‘सतयुग‘ जैसी सत्य विकासी घटनाएं घटित होती हैं।

धर्म ग्रन्थों और काल गणना सम्बन्धी आधुनिक साहित्य का परिकलन करने से यह निर्विवाद तय है, कि प्रथम कृतयुग- 1728000 वर्षों का होता है। इस युग में मनुष्यों की बुद्धि, सत्य और शुद्ध रूप हो जाती है,-वे युगीय भावना से प्रणोदित होकर सत्य व्रत धारण करते और सत्याचरण को यथा सर्वस्व मान कर देह यात्रा चलाते हैं कृतयुग आरम्भ होने के पूर्व दुष्ट दृष्टि, पापाचारी और दुर्बल जनों का एकान्त लोप हो जाता है अरण्य में दावानल सुलगने पर जिस भाँति वहाँ का क्षेत्र एक दम स्वच्छ और परिष्कृत हो जाता है, उसी भाँति कृतयुगी वातावरण प्रसारित होने के पूर्व पृथ्वी अपने युग व्यापी बोझ को हलका और कम वजन हुआ अनुभव करती है। मनुष्य और प्रकृति के लीला विलास में तब ‘सत’ को प्रधानता स्थान पाती है, जिससे सत्य, धर्म और आयु मर्यादायें बढ़ोतरी को प्राप्त होती हैं। इस युग में सत्य-धर्म- मर्यादा पालक रूप से भगवान नर देह में आते है, उनके पुण्य अवतरण से नवीन युग धर्म की स्थापना होकर सृष्टि से दुख, शोक, रोग, आदि कल कल्मष का एकान्त विनाश और तिरोभाव हो जाता है। नर भूमि, देवताओं की आवास स्थली का रूप ग्रहण करती है।

जैन ग्रन्थों में चतुर्थ काल को कृतयुग जैसा बताया गया है। यद्यपि हमारे युगीय क्रम और जैनों के काल क्रम में आकाश पाताल का अन्तर है, पर दोनों की काल घटनाएं सत्य के असल स्वरूप को इंगित कराती है। जैन ग्रन्थों के मतानुसार चतुर्थ काल में युग प्रवर्तक महान विभूतियों के आगमन से सृष्टि पंच-आश्चर्य पूर्ण होती है। यह पंच आश्चर्य, संसार को युग परिवर्तन का जीवित सन्देश देते हैं इनका सार्वत्रिक रूप से आभास हुए बिना, युग धर्म बदलने के विश्वास को महत्व नहीं दिया जाता। अतः जैनत्व के अनुसार मानना पड़ेगा कि अनति दूर भविष्य में, जैसी कि कृतयुग आगमन-संबंधी चर्चा आज देश में चल पड़ी है, सत्य के प्रतिनिधि रूप से ऐसा कोई भी काल या नवीन युग जल्द ही आने वाला नहीं है। क्योंकि सृष्टि में कही भी पंचाश्चर्यों की अद्यावधि झलक तक नहीं दिलाई देती। यदि संवत् 2000 के बाद आधुनिलाकृतयुग वादी लोगों की कृतयुगीय कल्पना भाग्य से फलीभूत हो रहे तो उस अवस्था में जैनियों के उक्त शास्त्रोक्त सिद्धान्त की फिर कोई कीमत नहीं रहेगी इधर गये 10 वर्षों में संसार के उज्ज्वल भविष्य को लेकर देश विदेश के ज्योति विज्ञानियों ने अनेक प्रकार से आशा जनक और आश्चर्य पूर्ण कथन किये हैं और कई भविष्य वाणियाँ काल क्रत की कसौटी पर खरी और सत्य भी उतरी हैं। साधारण बुद्धि से विचार करने और संसार की साम्प्रतिक गति विधि को देखते हुए जान पड़ता है कि अनागत काल में एक संसार व्यापी परिवर्तन अवश्य होकर रहेगा। आज की जागतिक उथल पुथल कल की शान्ति का साम्राज्य का निर्देश कराती है महायुद्ध की विभीषिका और मानव की दानवी प्रेरणाएं मानों पुकार-पुकार कर कह रही है कि संसार आज के अन्यथा प्रयोगों और आचरणों से त्रस्त हो उठा है। उसकी संरक्षा के लिए शान्ति का महा मन्त्र पढ़ाने वाली किस महा महिमशाली विभूति का आगमन हो जिससे आज का युग धर्म- सत्य धर्म में बदल जाए, प्राणी मात्र सुख, शान्ति और स्वच्छन्दता में रमण करने लगें, अतिवृष्टि अनावृष्ट, दुष्काल और रोग मरी आदि का नाम शेष हो जाये।

कृतयुग-कल्पना उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त हो रही है। सदाचार, शिष्टाचार और सत्य के समर्थक कृतयुग लाने के लिये मनुष्यों की सत्योन्मुखी बुद्धि को न्योता दे रहे हैं। सत्य परायणता और सत्याचरण ही वास्तविक जीवन है। जीवन और जीवन की सार्थकता चाहते हैं, वे सत्य धर्म की उपासना करें। सत्य धर्म मनुष्य को ईश्वरोन्मुख बनाता है, दूसरे शब्दों में सत्य ही भक्ति और मुक्ति है। अतः सत्य के धारण और सेवन द्वारा मनुष्य पहले अपने को अधिकारी और पात्र बनावें- तब कृतयुग कल्पना का सत्य कार्य के परिणत होना दुःसह और दुष्कर नहीं है। ईश्वर कृतयुग वादियों की कृतयुग कल्पना सफल करें, जिससे आज का दुख रूप संसार सुख रूप हो जावे। एवमस्तु।

कुरान शरीफ और हदीस में


अवतार और युग परिवर्तन

(ले. श्यामबिहारी लाल रस्तोगी बिहार शरीफ)

जिस प्रकार हिन्दुओं के धर्म ग्रन्थों में कलियुग को हटा कर सतयुग लाने वाले कल्कि भगवान की और ईसाइयों में लोहयुग को हटा कर (Golden age) स्वर्ण युग या स्वर्ग का राज्य स्थापित करने के लिए ईसा मसीह के आने की बात लिखी है, उसी प्रकार इस्लाम की मजहबी किताबों में भी यह लिखा है कि शैतानी राज्य को हटा कर रहमानी जमाना या खुदा का राज्य स्थापित करने के लिये आने वाले ईमाम मेंहदी के प्रकट होने के पहले कैसी घटनायें होंगी। इसी बारे में कुछ बात नीचे दी जाती है -

1- वखसफ ल क्रमो जोमयें अशम्सो बल क्रमो।

-कुरान शरीफ।

यानी - दरसने गाशी दोकाराँ खाहद बूद।

अजपये मेंहदीयो दज्जाल निशाँ खाहद बूद।

-एक शायर।

यानी - इननाले मेंहदीएना आयतने लभतकुना,

भुँजौ खल्कसमाँ वतिबर्ल्अज इयन्नकसे।

फुलक्रमो ले अव्वले लैलतीम् मीर रमजाना,

वतनकसे श शम्सो फि नस्फ ीन मिन हो॥

-महम्मद साहब (हदीस दार कुतनी)

भावार्थ-(जो प्रायः तीनों का एक ही है) हमारे मेंहदी के लिये कई निशान हैं। जब से कि जमीन और आसमान खुदा ने पैदा किया है, यह निशान किसी और मामूद और रसूल के वक्त में जाहिर न हुये। इनमें से एक यह है कि मेंहदी मामूद के जमाने आने और करीबी होने पर रमजान के महीने में चाँद का ग्रहण उसकी तेरहवीं तारीख में होगा और सूरज का ग्रहण (कुसुफ) उसके दिनों में से बीच के दिनों में होगा यानी उसी रमजान के 28 वीं तारीख को तब वह चौदहवीं सदी होगी। इसके पहले कभी ऐसा वाक्य जहूर में नहीं आयेगा।

2- व एजल एसारो उत्तलत। -कुरान शरीफ।

भावार्थ- उटनियों की सवारी नहीं रहेगी।

3- प एजस सो हो फौ नौ शेरत्। -कुराशरीफ।

भावार्थ- छपी हुई वस्तुएँ फैलाई जायेंगी।

4 - व एजल वेहारो फु ज्जेरत्। -कुराशरीफ।

भावार्थ- जब नहर निकाले जायेंगे।

5 - व एजन नुफसी जव्बेजत्। -कुराशरीफ।

भावार्थ- जब दूर दूर में रिश्तेदारियों होगी।

6 - व इममेन करीयातिन इल्ला नहलो मुहले।

कुहा कबला यौमिल कयामह वमो अज्रेबूहा।

भावार्थ- कोई ऐसी बस्ती नहीं, जिसको हम कयामत से कुछ मुद्दत पहले हेलाक नहीं करेंगे या किसी हद तक अजाव वारिश नहीं करेंगे।

शैतानी जमाने का खात्मा होकर रहमानी जमाना आने के समय या इमाम मेंहदी के आने के समय सब से पहली बात रमजान के महीने में दो ग्रहणों का होना है। रमजान के महीने में इधर चौदहवीं सदी के बीच में सिर्फ सन् 1312 मुताबिक विक्रमी सम्वत् 1950 में ही रमजान के एक ही महीने में दोनों ग्रहण यानी फाल्गुन शुक्ल 15 को 7 बजे कर 39 मिनट पर चन्द्र ग्रहण और चैत्र कृष्णा अमावस्या शुक्रवार को 3 बजे दिन में सूर्य ग्रहण हुआ जब से यह ग्रहण हुआ है, तभी से इमाम मेंहदी के शीघ्र प्रकट होने की सम्भावना की जाने लगी और रहमानी जमाना निकट भविष्य में ही आने वाला है और इमाम मेंहदी आ रहे हैं, इस बात की डंके की चोट घोषणा करने वाले मिरजा गुलाम अहमद क्रादमानी जैसे व्यक्ति जनता के सामने आ गये हैं। और उसी समय से दुनिया के अन्दर हर तरफ उलट-पलट परिवर्तन होने के आसार दीख पड़ने लगे। नये -नये आन्दोलन, नये नये विचार, नये नये आविष्कार, नये नये कार्य, महायुद्ध, अकाल, प्लेग, महामारी का श्रीगणेश होता गया। गत महायुद्ध एवं वर्तमान महासमर तथा भविष्य में होने वाले महायुद्ध परिवर्तन करने और रहमानी जमाना नजदीक लाने के लिए ही हुए थे और हो रहे हैं और होंगे।

दूसरी बात है, ऊंटनियों की सवारी का नहीं रहना है। वर्तमान समय में कितने व्यक्ति ऊंटनियों की सवारी से काम लेते हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं। खास अरब में भी जहाँ ऊंटनियों की सवारी के बिना यात्रा ही नहीं की जा सकती थी, वहाँ भी ज्यादा से ज्यादा दूर तक मोटर पथ का प्रबन्ध किया गया है। सिर्फ थोड़े हिस्से बच गये हैं, जिन्हें ऊंटनियों की सवारी पर पार करना होता है। इससे यह मालूम होता है कि इमाम मेंहदी के प्रकट होने या शैतानी जमाना का खात्मा होकर रहमानी जमाना आने में अब थोड़ा ही समय है।

आजकल अखबारों के विज्ञापनों की जिधर देखिए, उधर ही भरमार ही भरमार है। किसी बात को जनता में भली भाँति प्रचारित करने के लिए छपे हुए ट्रेक्ट, पुस्तकें, विज्ञापनों, पत्र पत्रिकाओं इत्यादि का एक खास महत्व हैं। आज के बीस वर्ष पूर्व मेरी इस छोटी सी साहित्य- प्रेमहीन नगरी में सिर्फ एक ही प्रेम था, जो कि बमुश्किल अपना खर्च पूरा करता था लेकिन आज चार प्रेस अनवरत रूप से चल रहे हैं और पाँचवे प्रेस की आवश्यकता मालूम पड़ती है। जब कि एक अशिक्षित नगरी की यह हालत है, तो जहाँ शिक्षा और साहित्य प्रेम का बोलबाला है, वहाँ का क्या हाल होगा, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है और यह कहा जा सकता है कि कुरानशरीफ की तीसरी बात-छपी हुई वस्तुएं फैलाई जायेंगी, बिलकुल ही ठीक उतरी है और इससे हम इस नतीजे पर पहुँचते है कि अब सतयुग आगमन में देर नहीं है।

आये दिन की नित्य मुसीबतें दो देशों को मिलाने वाली पनामा इत्यादि नहरें रेल पथ की सुविधा के कारण दूर के शहरों में शादियाँ इस बात के स्वतः प्रमाण हैं कि कुरान और हदीस के अनुसार निकट भविष्य में ही सतयुग आ रहा है।


चमत्कार को नमस्कार

(बुद्धिहीनों की प्रमुख कसौटी)

बुद्धिहीनों की एक ही प्रमुख कसौटी है कि वे गिरह की अकल न होने की वजह से चमत्कार को नमस्कार करते हैं। दुनिया के धूर्त और चालाक आदमी अन्धी भेड़ों की इस कमजोरी का भरपूर फायदा उठाते हैं। नये-नये जाल, फरेब, धोखे, षड़यन्त्र, झूठ प्रचार, मिली भगत आदि अनेक जरियों से तिल को ताड़ बना कर खड़ा कर देते हैं। पहले वे ढोंग और आडम्बर का चमकीला जाल खड़ा करते हैं, फिर उसमें भोली-भाली चिड़ियों को फंसा कर मजे में हलाल करते हैं।

संसार के पिछले इतिहास पर नजर डाली जाय तो उपरोक्त पंक्तियों की सत्यता के प्रमाण पग पग पर भरे हुए मिल जाते हैं। गाँव-गाँव में ऐसे देवी देवता पूजे जाते हैं, जो अप्रसन्न होने पर दण्ड देते, बीमार कर देते है या कुछ और उपद्रव करते हैं। यदि किसी से कहा जाय कि किसी ऐसे देवता की पूजा करो, जो हमारा हानि लाभ कुछ नहीं करता तो शायद कोई उसे पूजने को तैयार न होगा। पिछले दिनों जितने सिद्ध महंत पूजे हैं, उनके पीछे भी किसी अलौकिक चमत्कार का पुछल्ला जरूर बाँधा गया है। कई मजहब तो इसलिए चल पड़े कि उनके प्रवर्तक चमत्कारी समझे जाते थे। फिर किसी को क्या जरूरत थी कि उनके सिद्धान्तों के बारे में पूछ-ताछ करे। इस प्रकार अनेकों पंथ, अनेकों गिरोह, अनेकों अवतार, अनेकों पूजा संस्थान अब तक बने हैं। इनमें से कितने ही पाखंड अब तक फल फूल रहे हैं।

इतिहास के तत्वज्ञों का कहना है कि यह चमत्कारी षडयन्त्र मनुष्य के अविकसित मस्तिष्क की उपज है। जब वह तर्क और युक्तियों से दूसरों को प्रभावित करने में असमर्थ होता है तो ऐसे प्रसंग गढ़ता है, जिनके कारण जनता की सम्पूर्ण बुद्धि ही मोहित हो जावे और तर्क वितर्क करने, सोच विचार में पड़ने की आवश्यकता छोड़ कर अन्धाधुन्ध अनुयायी बन जावे। दुनिया का प्राचीनतम इतिहास ऐसी ही चमत्कारी घटनाओं से भरा हुआ है। सभी मजहबों की पुरानी किताबें ऐसी कथाएं वर्णन करती है जो साधारण जीवन में असंभव है। हिन्दुओं के मत्स्यावतार, कूर्मावतार, वाराहवतार आदि बहुत पहले हैं, इसके उनके चमत्कार अधिक है। जैसे जैसे समय बीतता गया वैसे ही वैसे इन असंभव घटनाओं की मिलावट क्रमशः कम होती गई। भगवान राम के चरित्र में चमत्कार कम है, वे मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में हमारे सामने आते हैं। कृष्णा के अवतार में भी पहले अवतारों की अपेक्षा अलौकिकता कम है। भगवान बुद्ध के इतिहास में तो वह बहुत ही कम हो गई है और अब तो समय ने उसका विरोधी वातावरण तैयार कर दिया है। अब से सौ वर्ष पहले किसी साधु फकीर को बाजीगरी करतब करते देखते थे, तो लोग उसके पाँवों पर नाक रगड़ते थे, पर आज तो उसकी माया को मिनटों में ताड़ लिया जाता है और ऐसी खिल्ली उड़ाई जाती है कि बेचारे के पैर टिकना मुश्किल हो जाते हैं।

यों तो अन्धी भेड़ों का अभी बीज नाश नहीं हुआ है। महात्मा गाँधी तक के बारे में लोग कहते सुने जाते हैं कि वे जेल में भी बन्द रहते हैं और बाहर भी घूमते हैं, अभी हिन्दुस्तान में है तो अभी विलायत में दिखाई देते है। जिन्हें चमत्कारों की चर्चा में ही आनन्द आता है, उनकी कल्पना-शक्ति उन्हें मुबारक रहे। पुराने समय में उनके भाई बन्धुओं ने एक से एक बढ़ कर विचित्र कल्पनाएं की थी। अब वे अपने सन्तोष के लिए वैसा कर सकते हैं। चमत्कार- चर्चा के बिना जिनकी तृप्ति नहीं होती, उनके लिए वर्तमान समय में भी बहुत बड़ा क्षेत्र मौजूद है। तिलस्मी और ऐय्याशी के उपन्यास बाजारों में खूब बिकते हैं, उन से मन बहला सकते हैं। परन्तु वह बड़ा ही अनर्थ होगा कि उस बालवृति को मनुष्य जाति के भाग्य निर्माण में रोड़ा बना कर खड़ा कर दिया जाय। अब मनुष्य जाति से उतनी बाल बुद्धि की आशा नहीं की जाती है।

निश्चय ही अब या अब से आगे कोई व्यक्ति चमत्कारों की पीठ पर खड़ा होकर महान नहीं बन सकता। आधुनिक भौतिक विज्ञान ने मनुष्य जाति की बड़ी बड़ी कठिन कल्पनाओं को भी प्रकट करके दिखा दिया है और आगे इससे भी अधिक चमत्कारी विज्ञान प्रकट होने वाले हैं जादूगरों और बाजीगरों के वे वे करतब हमने देखे हैं जो कुछ शताब्दी पूर्व होते तो वे ईश्वर की करामात ही समझे जाते। ऐसे बड़े बड़े धर्म संघों के भयंकर भण्डा फोड़ हो चुके हैं, जिनमें मिली भगत का बड़ा भारी षडयन्त्र रच कर जनता को खूब लूटा खसोटा जाता था अब कोई चमत्कारी प्रपंच फल फूल नहीं सकता। जो व्यक्ति ऐसा समझते हों कि कलंकी अवतार बड़ी भारी बाजीगरी करता हुआ प्रकट होगा, तो उन्हें गिरह बाँध लेना चाहिए कि ऐसा अवतार कल्पान्त तक अब नहीं होगा।

वर्तमान बुद्धि ने यह स्वीकार किया है कि अवतार संसार का कल्याण करने के लिए आते हैं और उनकी महत्ता सचाई, प्रेम न्याय में होती है। उनका चरित्र आदर्श होता है। वे ऐसे कार्य करते हैं जिससे विश्व में शान्ति स्थापित हो। गत दो हजार वर्षों से दुनिया ने इस बात पर स्वीकृति की मुहर लगादी है कि हमें चमत्कारी नहीं आदर्श आत्मा चाहिए। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर के चरणों पर दुनिया ने माथा टेक दिया। किसी ने उनसे नहीं पूछा कि तुम विमान में बैठ कर स्वर्ग से उतरे हो या नहीं? उनके आदर्शों के कारण उन्हें अवतार का पद दे दिया गया। भगवान ईसा ने उस मूर्खता की एक और कड़ी तोड़ डाली। पिछले समय में सफल और विजेताओं के गले में ही जय माला पहनाई जाती थी। पर संसार ने अपनी भूल अनुभव की और उस पराजित सताये हुए, फाँसी पर टाँगे हुए के चरणों पर भी श्रद्धाँजलि चढ़ा दी। अब तो अवतार के लिए विजेता होने की भी शर्त नहीं रही। जहर का प्याला पीने वाले सुकरात को हम सिर आँखों पर रखते हैं। लोक हित के कार्यों में बलिदान हुई आत्माओं के पदचिह्नों पर आज की पीढ़ी अपने अश्रु बिन्दु टपकाती हुई मानवोचित कृतज्ञता प्रकट करती है।

इस युग के अवतारी पुरुष बाजीगरी नहीं करेंगे और न सफल होने की शर्त उन्हें माननी होगी। सत्य सिद्धान्त, आदर्श चरित्र, लोक कल्याण का प्रयत्न, बस इन्हीं तीन कसौटियों पर अवतारी आत्माओं को परखा जायेगा और जो जितनी खरी होगी, उसका उसी अनुपात से अधिकाधिक आदर होगा। ऐसे अवतारी पुरुष, आज मौजूद हैं और आगे होने वाले हैं। सत्य सिद्धान्तों के आधार पर संसार में उनका उतना ही आदर होगा, जितना कि किसी समय चमत्कारी कल्पनाओं के आधार कोई महापुरुष पूजनीय माने गये थे।


Quotation

सत्य पर डटे रहो, न्याय-युक्त काम को करते हुए कभी लज्जित मत होओ। जिस बात को तुम न्याययुक्त समझते हो, उसी का निश्चय करो और फिर उस पर जम जाओ!

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मनुष्य स्वयं ही अपना पथ-प्रदर्शक है। जो आत्मा मनुष्य को ईमानदार और पूर्ण बना सकती है वही समस्त प्रकाश पूर्ण प्रभाव और सारे भाग्य पर राज करता है। उसके लिए कोई बात समय से पहले या पीछे नहीं होती।

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आत्म विश्वास रखो, क्योंकि इसी बिजली के तार से प्रत्येक हृदय स्पन्दित हो रहा है।


सतयुग कब तक आवेगा?

(पं. श्याम बिहारी लाल रस्तोगी, बिहार शरीफ )

बार-बार महायुद्ध और विपत्तियां आकर परिवर्तन का होना सृष्टि के प्रकृति के नियमानुकूल है। बहुत से लोग यह विचारते हैं कि यह परिवर्तन आनन फानन में हो जायेगा लेकिन यह बात नहीं है। यदि परिवर्तन स्वभाविक रीति से होने दिया जाये तो ये कार्य आठ सौ वर्षों में पूरा होगा क्यों कि कलियुग से सतयुग होने के लिए सृष्टि काय यह नियम है कि यदि प्रयत्न न किया जाये तो आठ सौ वर्ष होगा और यदि परिवर्तन के लिए प्रयत्न किया जाये तो यह कार्य परिवर्तन आठ पहर में भी हो सकता है।

शास्त्र पुराणों के पाठक जानते हैं, और शास्त्रों में भी लिखा है, कि जब कलियुग के 221 वर्ष शेष रहेंगे तब कल्कि भगवान प्रकट होकर सतयुगी धर्म की स्थापना करेंगे और उसके आठ सौ वर्ष बाद सतयुग का आरम्भ होगा लेकिन ऐसा तब होता जबकि कलियुग अपनी पूरी आयु 432000 वर्ष व्यतीत करता। उस समय यदि प्रयत्न किया भी जाता तो मुमकिन था की पूरी सफलता न मिलती, लेकिन यहाँ तो कलियुग पाँच ही हजार वर्ष में समाप्त हो रहा है, यह दो तरह से पता चलता है, एक तो यह समय होने वाली जितनी भी बातें लिखी गई हैं, दूसरे कतिपय विद्वानों का यह भी कहना है कि यदि एक ही महीने में सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण दोनों हो जायें तो कलियुग की आयु दस हजार वर्ष घट जाती है, पर उस महीने में जिस में चन्द्र या सूर्य कोई सा भी ग्रहण हो अलग महीनों में होने पर सौ ही वर्ष कलियुग की आयु घटती है, पर हाँ यदि उसी महीने (ग्रहण वाले महीने में) सोमवारी अमावस्या पड़ जाये तो आयु नहीं घटती, इस प्रकार से यदि पाँच हजार वर्षों के बीच में 42 बार भी इससे कम एक ही ऐसे महीनों में जिसमें सोमवारी न हुई हो चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण दोनों पड़े हों तो इस हिसाब से 42(10000=420000 चार लाख बीस हजार वर्ष कलियुग की आयु समाप्त हुई। बाकी रह गये 12 हजार। पाँच हजार बीत चुके अब शेष रहे सात हजार यदि अलग अलग ऐसे महीनों में जिसमें सोमवारी न पड़े 70 बार भी पाँच हजार वर्षों में चन्द्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण हुए हो तो 70(100=7000 इस हिसाब से कलियुग की आयु समाप्त हो जाती है, यदि कोई ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता इस विषय के श्लोक उद्धृत कर सकें और यह हिसाब लगाकर बतला सकें कि कब-कब ग्रहण अब तक पाँच हजार वर्षों के बीच में हुए है तो यह ठीक-ठीक बतला दिया जा सकता है कि कब और किस दिन सतयुग आवेगा। उर्दू में एक पुस्तक ऐसी छपी है, जिसमें कब कब ग्रहण हुए और भविष्य में कब कब होंगे इसका वर्णन है, परन्तु खेद है कि वह पुस्तक गोलमाल हो गई और अभाग्यवश न तो उसका नाम ही याद पड़ता है और न प्राप्ति स्थान का पता ही। यदि किन्हीं सज्जन के देखने में यह पुस्तक आई तो वह कृपा कर नाम और पते से मुझे अवगत कराये।


Quotation

उपरोक्त बातों से पाठकों को भली भाँति पता चल गया होगा कि कलियुग की आयु समाप्त हो चुकी ऐसी अवस्था में यदि लोग ईश्वर भजन की ओर विशेष रूप से झुकें और शुभ कर्म एवं दुष्ट कर्मों को हटाने का प्रयत्न किया जाये तो बहुत शीघ्र सफलता मिल सकती है और सतयुग कुछ ही वर्षों में उपस्थित हो सकता है।

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आत्म तिरस्कार सम्बन्धी प्रत्येक विचार व्यक्तित्व की शक्ति के मूल का नाशक लुटेरा तथा रोग है।

एक विश्वस्त कथा के आधार पर -


पृथ्वी के खम्भ

(ले. रामनारायण श्रीवास्तव “हृदयस्थ”)

कैलाश के शुभ शिखर पर भूत भावन शंकरजी शान्त भाव से बैठे हुए श्री पार्वतीजी के प्रति साँसारिक जीवों के पाप और ताप की चर्चा कर रहे थे, कलियुगी अनेक वीभत्स दृश्यों का चित्रण करते हुए शिवजी कहने लगे अब तो धरातल पर पाप ही विशेष रूप से दिखाई दे रहा है।

माता गौरी शंकित और खिन्न भाव से बोली कि हे प्रभो, अब तो यह पृथ्वी रसातल को जाने वाली ही समझो? इसके ऊपर एक एक पाप का भार असह्य है। शिवजी ने कहा अभी ऐसा तो नहीं है। अधिक न सही तो एक एक सती, सूरमा प्रत्येक छोटे से छोटे गाँव में भी मिलेगा, और उन्हीं ऐसे अनेक सुदृढ़ स्तम्भों के सहारे पृथ्वी टिकी हुई है। वे बोली कि देवेश ! संसार को इस भीषण प्रगति में भी अपने यतीत्व, सतीत्व और शौर्यत्व को अचुत्य बनाये रहने वाले मानवी देवों का दर्शन भी मेरे लिये विशेष शान्ति का कारण होगा।

घर में तीन प्राणी थे, दो भाई और बड़े भाई की स्त्री। दरिद्री नारायण का यह छोटा सा परिवार जनता की दृष्टि में दीन, हीन, निरक्षर एवं दुर्भाग्य का प्रतीक था, कारण रोज-रोज की मेहनत मजदूरी और कृषि कर्म में एक दिन का विश्राम भी उन के भूखे रह जाने का निश्चय था। किन्तु उनकी कल्पना में उन्हें कोई अभाव नहीं था वे अपने को पूर्ण सुखी मानते थे।

दोनों भाइयों के मानस क्षेत्र में पवित्रता, साहस, शौर्य, धैर्य, और क्षमा का चरम विकास था, और कर्त्तव्यशीलता तो उनमें विधाता ने कूट कूटकर भरी थी, दोनों सहोदर तो थे ही। पत्नी में पतिव्रत की प्रतिभा और कर्तव्य पालन में दृढ़ता, ये दो विशेष गुण थे, स्त्री जाति में जहाँ यह गुण होते हैं वहाँ अन्य अपेक्षित गुणों का उदय होना अधिकाँश में सम्भव है।

एक दिन भगवान् शंकर पार्वतीजी सहित साधु वेश में जगती के तापों से झुलसते हुए जीवों को अपने उपदेशामृत से शाँति वितरण करने के लिये चल दिये, विचरण करते करते जब संध्या का समय हुआ तो पार्वती जी बोली कि नाथ! यदि आप स्वीकार करें तो आज इस ग्रामीण प्रदेश में ही विश्राम कीजियेगा। ठीक है, ऐसा कहकर शिवजी पास ही की एक छोटी सी बस्ती की ओर चल दिये, संयोगवश उन्हीं दरिद्र नारायण के यहाँ इनके रजनी विश्राम का सुयोग लगा। अतिथियों को आदर सहित ठहरा कर राम मनोहर भीतर गये और अपनी स्त्री से बोले कि दो मेहमान आये हुए हैं उनके खाने के लिए क्या करोगी? उसने कहा कि तुम्हें मालूम है आज तीन दिन से लला (तुम्हारे भाई) की आँखें आ जाने के कारण तुम्हारा मजूरी से ही काम चल रहा है। फिर थोड़े से घी के बिना सूखे आटे से अतिथियों का सत्कार कैसे हो सकेगा। दो थालियों में से एक थाली ले जाकर किसी बनिया के यहाँ डालकर घी ले आओ तो काम बन जावेगा। पत्नी के आदेशानुसार ही अतिथियों का सत्कार किया गया, फिर सब सो रहे।

राधेलाल की आँखों में दर्द बड़े जोर से हो रहा था, और वह मारे वेदना के आते स्वर में अम्मा, भाभी, दादा, आदि नामों से पुकार रहा था, राम मनोहर की स्त्री जाग पड़ी और राधे के पास जाकर बोली, लला, आज तो तुम बुरी तरह रो रहे हो, आँखों को दाब कर सो जाओ। राधे बोला भाभी कैसे दाबूँ, किसी करवट चैन नहीं। तब तो भाभी उसकी आँखों को अपने वक्षस्थल से दबा कर (माता जिस प्रकार पुत्र को रोने से चुपाती है) शाँत करने का उपक्रम करने लगी। कुछ देर इस आनन्द मय वात्सल्य प्राण तत्व का आश्रय पाकर राधे को चैन मिला, और सो गया। भाभी भी यह सोच कर कि थोड़ी देर में इसकी नींद उचट न जाये, उसके साथ ही पड़ रही। अंतिम पहर की शाँति दायिनी वायु के झकोरों से उसे भी नींद आ गई,

राम मनोहर प्रातः 4 बजे उठे और देखा, मेरी स्त्री राधे के साथ सोई हुई है, वे हल और बैलों को लेकर खेतों में जुताई करने के लिये चल दिये, सोचा, रोज की तरह यह सवेरे उठकर मेरे लिये खाना बनाकर ले ही आयेगी, खेत इसे मालूम हैं अभी क्यों जगाऊँ।

राम मनोहर के जाने के पश्चात भगवान शंकर महारानी शिवा से कहने लगे कि देखो, यती और सती दोनों की संयम पराकाष्ठा को। कलियुग के अंतर्गत यह सतयुग का साक्षात चित्रण। चलो, अब दोपहर को राम मनोहर के शौर्यत्व को देखना। हल चलाते हुए हलवाहे की टकटकी बराबर गाँव की ओर लगी रही, लेकिन आज ठीक दोपहर होने को आया वह अभी तक कलेउ (भोजन) लेकर नहीं आई, जब सब के बैल हलों में से छूटने लगे तो राम मनोहर ने भी अपने बैलों को चरने के लिए छोड़ दिया, और घर के लिये चले आये।

घर आकर राम मनोहर ने देखा, दोनों देवर और भावी उसी अचेत अवस्था में पड़े सो रहे हैं। उन्होंने सोचा रात भर इसकी आँखों में दर्द होने के कारण यह भी न सो सकी होगी, सोने दो। जगाना ठीक नहीं, चौका आदि ठीक ठाक कर के राम मनोहर ने नहाया, फिर रोटी बनाई खाई। तब वे उन्हें जगाने को पहुँचे, ठीक उसी समय महादेवजी पार्वती को लेकर इस क्षमा स्वरूप शूरवीर को देखने के लिये आये। राममनोहर अत्यन्त शाँत भाव से स्त्री को जगा कर कह रहे थे कि अब उठ बैठो तो मैं रोटी खाकर फिर खेतों पर चला जाऊँ, चौका सूना रहेगा। राम मनोहर की स्त्री उठी और अपने स्वामी से अपने देर तक सोते रहने की माफी माँगने लगी, उसकी भाषा में भी भोलापन था। राधे की आँखें भी अब कुछ कुछ ठीक ठीक थीं, उठकर दोनों भाइयों ने थोड़ा बहुत भोजन किया और अपने आवश्यक कामों में लग गये।

महारानी पार्वती जी कहने लगी, धन्य है प्रभो? वास्तव में यही है पृथ्वी के खम्भ इसी प्रकार सभी मानव समुदाय का हृदय निष्पाप हो जाये तो निःसंदेह कलियुग नहीं, सतयुग ही कहा जाएगा।


काम करो! काम करो!!

(ले. श्री मंगलचंद भंडारी “मंगल” विशारद, अजमेर)

एतरेह ब्राह्मण में कहा गया है कि-

कलिः शयानों भवति, संजिहानस्तु द्वापरः।

उतिष्ठन्त्रेता भवति, कृतं सम्पद्यते चरन्।

चरैवेति, चरैवेति, चरैवेति॥

अर्थात्- सोते रहना ही कलियुग है। ऊँघते रहना ही द्वापर है। उठ बैठना त्रेता है और कार्य में लग जाना सतयुग है। इसलिए काम करो, काम करो, काम करो।

युगों की यह परिभाषा बहुत ही ठीक जान पड़ती है। जब हम अज्ञान के अंधकार में पड़े हुए आलस्य और भ्रममय जीवन व्यतीत करते हैं, तो वह। कलियुग है। जब हम अपनी दशा का निरीक्षण करते हैं, भूल पर पछताते हैं, आगे की सुधि लेते हैं, कर्तव्य का सम्मान करते हुए ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील होते है, तो वह द्वापर है। जब कर्तव्य धर्म का पालन करने के लिए कमर कस कर खड़े हो जाते हैं। विघ्न बाधाओं की परवाह न करते हुए, साहस के साथ आगे को कदम बढ़ाते हैं बुराई का घृणा पूर्वक परित्याग करते हुए सत्य रूपी सूर्य का दर्शन करने की तैयारी करते है, तो वह त्रेता हुआ। जिस समय कर्तव्य, धर्म को पूरा करने के लिए मनुष्य बेचैन हो जाता है। सत्य के सामने प्राणों को भी तुच्छ समझता है। आलस्य, जड़ता और अज्ञान का परित्याग करके धर्म का पालन करता है विषय विकारों से मन को हटा कर आत्मा और परमात्मा की ओर झुकता है, तब समझना चाहिए कि सतयुग का उदय हो रहा है।

युगों का यह प्रभाव सम्पूर्ण देश और जातियों में सदैव देखने में आता है। कुछ लोग कलियुग में पड़े हुए हैं, तो कुछ द्वापर में पदार्पण कर रहे हैं। कोई त्रेता तक पहुँच चुका है, तो किसी ने सतयुग में पदार्पण कर दिया है। यह सब युग सदैव वर्तमान रहते हैं, जिसकी जैसी इच्छा होती है, रुचि के अनुसार चुन लेता है। हाट में सभी तरह की चीजें बिक रही हैं जिसके जी में जो आवे खरीद सकता है। बेशक हाट में गाजर मूली ढेरों है और केशर कस्तूरी कम, पर चाहने वाले को तो उसकी इच्छित चीज मिल ही सकती है। चाहे कोई सा भी देश काल क्यों न हो, सत्पथगामी के लिए अपना आचरण करने की सदैव सुविधा है।

युग शब्द समय का सूचक नहीं, हमारी समझ से तो वह मनोदशा का परिचय कराता है। अज्ञानी और अधर्मरतों को ही कलियुगी जीव कहा जा सकता है। जिनकी आत्मा जागृत हैं वे क्यों कलियुगी कहे जाएंगे? सतयुग एक दिव्य आदर्श है, जो लोग उस शुभ समय को देखने की इच्छा करते हैं वे इस ऋषि वचन को अपनाते हैं कि चरैवेति, चरैवेति, चरैवेति, अर्थात्- काम करो! काम करो!! काम करो!!! सतयुग अपने आप दौड़कर हमारे पास कभी भी नहीं आवेगा, उसके प्राप्त करने के लिए हमें भगीरथ प्रयत्न करना पड़ेगा। उद्योगी पुरुषों को ही लक्ष्मी मिलती है और उद्योगी ही सतयुग का आनन्द लेते हैं, इसलिए सत् धर्म की ओर बढ़ो ज्ञान प्राप्ति का प्रयत्न करो, नवीन युग लाने का उद्योग करो। काम करो! काम करो!! काम करो!!!


प्रसव की वेदना

(वर्तमान दुखद स्थिति में स्वर्णयुग की झाँकी)

‘कष्ट’ का दार्शनिक अर्थ है -”सुख की पूर्व सूचना” एक तत्वदर्शी का अनुभव है कि जब देवताओं की पृथ्वी पर विशेष कृपा होती है तो वे अकाल, भूकम्प रोग, युद्ध आदि भेजते हैं जिससे कि विश्व की सुप्त सात्विक शक्तियाँ पुनः जागृत हो जावें और संसार में सुख शान्ति की वृद्धि हो। परमात्मा जिसे कष्ट दे रहे हों, समझना चाहिये कि कोई अदृश्य सत्ता इसका आपरेशन करने में जुटी हुई है। माता को जब सन्तान सुख प्राप्त होने को होता है तो उसे कुछ समय पूर्व प्रसव वेदना सहनी पड़ती है। कुएं में जब पानी कम रह जाता है तो उसे खोदकर गहरा करते हैं ताकि अधिक पानी हो जावे। चाकू जब भोथरा हो जाता है तो उसे पत्थर पर घिसा जाता है ताकि उसकी धार तेज हो जावे। सोने के टेढ़ा मेढ़ा टुकड़ा जब आभूषण बनने को होता है तो सब से प्रथम उसे भट्टी में तपना पड़ता है। लोहा घन की चोट सहे बिना हथियार की शकल में नहीं आता। पत्थर से पूजनीय मूर्तियाँ तब बनती है तब छैनी की लाखों चोट उस पर पड़ लेती हैं। मिट्टी के बर्तन अबा में पक कर पक्के होते हैं। फूल सुई से छिदने के बाद देवताओं के गले में पड़ने लायक हार बन जाता है। चन्दन जब घिसा जाता है तब सिर पर लगाने के काम आता है। कपड़ा पत्थर पर चोटें खा कर उजला होता है। बीज पहले स्वयं गल जाता है तब वृक्ष बनता है। कहाँ तक कहें संसार में कोई भी ऐसा सुख नहीं है जो बिना कष्ट के प्राप्त होता हो। कष्ट एक क्रिया है तो सुख उसका मधुर फल।

परिवर्तन काल हमेशा ऐसे ही आता है जब कुछ दुख हो। जब ऋतुएं बदलती हैं तो लोग अस्वस्थता का अनुभव करते हैं। क्वार और चैत्र के महीने में दो विरुद्ध ऋतुएं आपस में मिलती हैं फलस्वरूप उन दिनों फसली बुखार आदि बीमारियाँ फैलती हैं। मनुष्य एक शरीर छोड़कर दूसरा ग्रहण करता है तो उसे स्वयं मृत्यु कष्ट सहना पड़ता है दूसरों को बिछोह कष्ट राज क्रान्तियाँ, धार्मिक परिवर्तन समाजिक हेर फेर यह बड़े उत्पातों को अपने साथ लाते हैं, कितने ही दोषी और निर्दोष व्यक्ति इनके चक्र में पिस कर चूर चूर हो जाते हैं। जब पेट में बहुत खराबी इकट्ठी हो जाती है तो उलटी या दस्तों की बीमारी पैदा होती है, खून खराब हो जाने पर फोड़े फुन्सी निकल पड़ते हैं। तात्पर्य यह है कि हर परिवर्तन के आगे आगे एक तूफान आता है, जैसे बरात में आगे आगे घोड़े होते हैं। उस प्रकार क्रान्ति संध्या में कष्ट और वेदना का अस्तित्व रहता है। इन कष्टों को हम प्रसव वेदना कह कर पुकार सकते हैं।

कलियुग का अन्त और सतयुग का आरम्भ होने जैसा महान परिवर्तन क्या यों ही बिना किसी कष्ट के हो जायेगा? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता जितना बड़ा कार्य होता है उसी के अनुरूप वेदना भी अवश्य होती है। कल्पान्त में महाप्रलय होती है। मन्वन्तर के अन्त में खंड प्रलय होती है और युगान्त में प्रलयवत् दृश्य उपस्थित होते हैं। नाश की पीठ पर ही निर्माण की आधार शिला रखी जाती है।

सैंकड़ों वर्ष पूर्व से यह कहा जा रहा था कि संवत् दो हजार के आस पास कोई बड़ा विग्रह उत्पन्न होगा जिस के पश्चात् युग परिवर्तन होगा। यह घड़ी किसी से टाली न जा सकी। बड़े बड़े शान्ति प्रिय लोगों के प्रयत्न निरर्थक हुए। आज से 25 वर्ष पूर्व एक महायुद्ध हुआ था, और महामारी में असंख्य लोग मरे थे अन्य तरीकों से भी बड़ा नाश हुआ था। महाकाल ने एक हलकी लात मार कर दुनिया को सावधान किया था, पर वह चेती नहीं। इसलिये अब दूसरा आपरेशन करना पड़ा है। यह पहले की अपेक्षा बहुत भयंकर है। अभी तो इसका आरम्भ ही है, अन्त तक बहुत विनाश कर देगा और दुनिया के कान अच्छी तरह ऐंठ देगा कि खबरदार! आगे ऐसी गलती मत करना और सीधे रास्ते पर चलना। चाबुक खाकर जैसे अड़ियल घोड़ा अपनी हठ छोड़ देता है वैसे ही इस दुनिया को भी अपनी हरकतें दुरुस्त करनी होंगी।

कलिकाल में हुए पापों के लिये सभी सृष्टि जिम्मेदार है, क्योंकि मनुष्य जाति समाजजीवी होने के कारण अपने पड़ौसी के पापों की भी उत्तरदायी होती है। चोर चोरी कर रहा हो और दूसरा व्यक्ति चाहे वहाँ खड़ा है उसका विरोध न करे तो वह भी कानूनन दोषी ठहराया जाता है और दंड का भागी बनता है। आपके पड़ौसी बुरे कर्म करें और आप उन्हें पत्थर की आँखों से देखते रहें तो आप निर्दोष नहीं कहे जा सकते। पिछले युग में जो अधर्म पाप और दुष्ट कर्म हुए हैं उनके करने वाले तो सजा पावेंगे ही साथ ही समष्टि रूप से एक सूत्र में बंधी हुई होने के कारण समस्त सृष्टि भी दंड प्राप्त करेगी। आज वही दंड मिल रहा है। भिन्न भिन्न प्रकार की आपदाएं इस समय मनुष्य जाति पर आ रही हैं, यह हमारे पिछले कर्मों का दण्ड है। अब भगवान चाहते हैं, कि पूर्व पापों का दण्ड भोग कर वह शुद्ध हो जाये और भविष्य में नवीन व्यवस्था का आनन्द भोगें।

वर्तमान समय के अनेकानेक कष्ट एक प्रकार की प्रसव वेदना है, जिसके पश्चात् छाती को ठंडी करने वाला पुत्र रत्न प्राप्त होगा। इस रत्न का नाम होगा -’सतयुग‘।


अवतार कैसे होगा?

(अवतार के प्रकट होने का कार्यक्रम)

पतित पावनी भगवती गंगा का जब अवतार हुआ था- स्वर्ग से जब वे भूलोक पर उतरी थीं तो उन्होंने भागीरथ को इच्छापूर्ण वरदान देते हुए भी यह पूछा था कि मैं किस प्रकार भूलोक पर पहुँचूँ? स्वर्ग और पृथ्वी के बीच में बड़ा भारी अन्तर है, इतनी दूरी से जब में उतरुंगी तो भूमि मेरा वेग सहन न कर सकेगी। मैं जहाँ गिरूंगी वहाँ इतना बड़ा गड्ढा हो जायेगा कि समुद्र भी उसकी तुलना में छोटे प्रतीत होंगे। फिर तुम जिस भूखण्ड की शान्ति के लिए मुझे ले चलना चाहते हो वह भी जलमग्न हो जायेगा और और तुम्हारा उद्देश्य पूरा न हो सकेगा।

भागीरथ बड़ी चिन्ता में पड़े। क्योंकि भगवती का कथन अक्षरशः सत्य था। स्वर्ग से एक दम पृथ्वी पर कूदना खतरनाक है। इसकी प्रतिक्रिया बड़ी भयानक हो सकती है और लाभ के स्थान पर हानि का परिणाम मिल सकता है। गंगा को पृथ्वी पर उतरना तो था ही, उन्होंने भागीरथ की चिन्ता निवारण करते हुए भूतनाथ शिव के पास जाने की सलाह दी। भागीरथ, शंकर जी के पास पहुँचे और सारा वृत्तांत कह सुनाया। शिवजी ने स्थिति की महत्ता को समझा तो यह निश्चय किया कि जब गंगा उतरेगी तो उन्हें अपने शीश पर लेंगे और फिर कैलाश पर उतारेंगे, तदुपरान्त धीरे धीरे तपो भूमियों में होते हुए आगे बढ़ने देंगे, अन्त में तो वह छोटे मोटे नदी नालों को अपने में मिलाती हुई आगे चली जायेगी। खारी जल और अभिमानी समुद्र उनके स्वागत के लिए न उठेगा तो न सही भगवती अपनी सहज उदारतावश उस अचेतन का भी कल्याण करने के लिए स्वयं उसके पास तक चली जावेगी। इसी निश्चित योजना के अनुसार कार्य करके शिवजी की सहायता से गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा गया।

कथा के अलंकारिक रूप में रहस्यमय तत्व यह छिपा हुआ है कि ज्ञान गंगा एक दम स्थूल प्रकृति पर कार्य रूप में प्रकट होती हुई दिखाई नहीं दे सकती। क्योंकि भलाई और बुराई के बीच में बहुत फासला है, यह फासला धीरे धीरे दूर करना होता है। एक सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी का क्रम पार करके चढ़ना उतरना आसान है। इसके विपरीत छलाँग मार कर चढ़ना या चौकड़ी मार कर कूदना दोनों ही खतरनाक हैं, इससे इच्छित फल की प्राप्ति नहीं होती। यदि कोई वेदान्ती ज्ञान को एक दम व्यवहार में ले आवे तो वह करीब करीब पागल बन जायगा मैं ब्रह्म हूँ, सम्पूर्ण जगत ब्रह्म है, जीव मात्र ब्रह्म है इस सत्य सिद्धान्तों को यदि एक दम कोई व्यवहार में लावे तो कुत्ते सुअरों के पाँवों पर लोटता फिरेगा डाकू और हत्यारों का भी विरोध न करेगा, टट्टी घर को मंदिर समझता हुआ उनकी आरती उतारेगा या इसी प्रकार के और उद्धत कार्य करेगा। आचरण शास्त्र में मानव नीति का एक सर्वोत्तम श्लोक है कि

मातृवत् परदारेषु पर द्दव्येषु लोष्टवत्।

आत्मवत् सर्व भूतेषु योपश्यति सपश्यतः।

पराई स्त्रियों को माता के समान, पराये धन के ठीकरी के समान और अपने समान सब प्राणियों को समझना इसमें धर्म का सारा तत्व निहित है पर कोई मूर्ख इन्हीं सिद्धान्तों को ज्ञान भूमिका में उतारे बिना एक दम कर्म कर्म में परिणित कर दे तो उसे जेल खाने ही जाना पड़ेगा या बाजार में जूतों से पिटता फिरेगा। ठीकरी को तो यों ही उठा कर फेंक देते है जरा पराई थैली को तो नाली में पटक कर देखिये। सिंह, सर्प, व्याघ्र आदि को जरा आत्मवत् समझिए तो सही देखिए कैसा मजा आता है भगती गंगा को पहले शिवजी ने अपनी जटाओं में उतारा फिर कैलाश पर और तदुपरान्त पृथ्वी पर, आप ज्ञान गंगा को पहिले अपने मस्तिष्क में उतारिए, फिर वचन में तदुपरान्त कर्म में।

सत्य नारायण भगवान अपने निष्कलंक रूप को पहले पहले ब्रह्म लोक में प्रकट करेंगे। मनुष्य के मस्तिष्क में शुद्ध ज्ञान के प्रति आकर्षण पैदा होगा, उनकी रुचि ईश्वर और आत्मा की ओर झुकेगी, धर्म और ज्ञान की चर्चा में आनन्द प्राप्त होगा, तदुपरान्त भगवान स्वर्ग लोक में उतर आवेंगे। ज्ञान गंगा शिव की जटाओं में से कैलाश पर पदार्पण करेगी। लोक में मनो भावना वाणी द्वारा भी व्यक्त होती दिखाई देगी। सर्वत्र एक ही ध्वनि सुनाई देगी सत्यमेव जयते नानृतम सर्वत्र एक दूसरों को यही उपदेश करेंगे “असतो मा सद्गमय” असत्य की ओर नहीं सत्य की ओर चलिए। सत्य के विचारों का प्रचार जोरों से होने लगेगा। जब भगवान पृथ्वी पर उतर आवेंगे जब गंगा आगे बढ़ने लगेंगी तो गन्दे नदी नाले भी दौड़ कर उनमें मिल जायेंगे। भगवान गुह, शबरी, अहिल्या आदि का कल्याण करने के निमित्त स्वयं पैदल चल कर उन तक पहुँचेगी। खरे, निंदनीय और अभिमानी सागर को पवित्र करने के लिए गंगा स्वयं उस तक पहुँचेगी। पृथ्वी के दुष्ट कर्मी मनुष्य समय के प्रचंड प्रवाह को देख कर स्वयं बदल जावेंगे, जो जड़ बुद्धि वाले नहीं बदलेंगे उन्हें समय प्रवाह स्वयं हठात् परिवर्तित कर देगा। मन और वचन में दबी हुई अग्नि बहुत दिन दबी हुई नहीं रहेगी। जब पृथ्वी के अन्तःकरण में छिपी हुई अग्नि फूटती है, तो ज्वालामुखी प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। मन और वाणी में आया हुआ सत्य कार्य रूप में प्रकट होता है, तो आचरण भी सत्य के होते लगते हैं। जब सूक्ष्म सत्मय स्थूल रूप में भी प्रकट होने लगे तब समझना चाहिए कि निराकार परमात्मा साकार हो रहा है।

यह विश्वास करने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं, कि अब भगवान प्रकट होने वाले हैं। संवत् दो हजार से लेकर सौ वर्ष के अन्दर निष्कलंक भगवान पूर्ण रूप से अवतार ले लेंगे। लीला धारी नटवर पहले बाल गोपालों में क्रीड़ा करेंगे, बड़े होने पर तरुण तपस्वियों, श्रद्धालु भक्तों को प्रत्यक्ष सहायता देंगे और पूर्ण होने पर सत्य का शासन स्थापित कर देंगे। इस प्रकार प्रभु का यह अवतार होगा। एक हाथ से प्रेम का सुगन्धित पुष्प और दूसरे में न्याय की गदा लिए हुए भगवान् सत्य रूप निष्कलंक इस पृथ्वी पर दृश्य और अदृश्य प्रकट होंगे दृश्य उनके लिये जिनके विवेक की आँखें है। अदृश्य उनके लिए जिनको सभी नारकीय यातनाएं और सहनी हैं, रावण की तरह अपना सर्वनाश करने के पश्चात भगवत् शरण में आना है। भगवान दिखाई सबको देंगे, किसी को सुग्रीव की तरह प्रारम्भ में ही उनका स्वरूप देखने को मिलेगा। कोई बालि की तरह वाणविद्ध होकर भूमि पर लोटते हुए प्रणाम करेंगे।

बोलो निष्कलंक भगवान की जय!


सुविचार और कुविचार

(पी. जगन्नाथ राव नायडू, नागपुर)

हृदय के अन्दर स्वार्थपरता और त्याग भावना में सदैव युद्ध होता रहता है। स्वार्थ कहता है कि सब कुछ अपने लिए ही लेना चाहिए, अपने लिए संग्रह करना चाहिए और खुद ही सारी शौक मौज की सामग्रियों का उपभोग करना चाहिए। त्याग भावना कहती है कि संसार हमारा नहीं परमात्मा का है, इस लिए इसकी चोरी नहीं रखवाली करना चाहिए। चौकीदार और माली बनाकर हमें भेजा गया है इसलिए इस वाटिका की रखवाली और सिंचाई करना ही हमारा कर्तव्य है।

यह दोनों विचार मन में बड़े वेग से उठते हैं और आपस में टकराते हैं। कभी एक प्रबल हो जाता है कभी दूसरा। जब मनुष्य दुर्भावनाओं से ग्रसित हो तो समझना चाहिए कि इस समय यह कलियुगी है और जब त्याग भावनाओं का जोर हो तो जानना चाहिए कि अब यह व्यक्ति सतयुगी है।


बाइबिल और सतयुग

(यहूदियों संबंधी भविष्य वाणी की सत्यता)

ईसाइयों की धर्म पुस्तक बाइबिल में कुछ ऐसी भविष्यवाणियाँ हैं, जो इस समय सत्य होती हुई प्रतीत होती हैं। यहूदियों के सम्बन्ध में इस ग्रन्थ में बहुत कुछ वर्णन है। एक स्थान पर कहा गया है कि -”परमात्मा ने यहूदियों को आदेश किया है तुम यदि धर्म पर चलोगे तो सुखी रहोगे अन्यथा कठोर दण्ड पाओगे। यदि इस पर भी न सुधरे तो ईश्वर उनके निवास स्थानों को बरबाद कर देगा और वहाँ शत्रुओं का निवास हो जायेगा। अन्त में ठोकरें खाते जब “सात समय” (स्द्गक्द्गठ्ठ ह्लद्बद्वद्गह्य) व्यतीत हो जायेंगे तो परमात्मा फिर उनकी सुधि लेगा और इकट्ठे करके उनके देश में बसा देगा यहूदियों की प्राचीन मातृभूमि फिलिस्तीन है, वहीं उनका पवित्र तीर्थ जेरुशलम है। यह देश पहले बहुत दिनों से तुर्की के पास था और अरब लोगों से भर गया था। गत् महायुद्ध में वह अंग्रेजों के कब्जे में आ गया। मित्र राष्ट्रों की सलाह से गत दशाब्दी में वहाँ यहूदियों को बसाना निश्चय किया गया और फिलिस्तीन को यहूदियों की मातृभूमि घोषित कर दिया गया। वहाँ अब तक लाखों की तादाद में यहूदी लोग बस चुके हैं।

क्या यह घटना, बाइबिल की उसी भविष्य वाणी से संबंध रखती है, जिसका उल्लेख बाइबिल में किया गया है? ‘सात समय’ व्यतीत होने पर यह घटना होने वाली थी विचारना चाहिए कि क्या वह ‘सात समय’ वर्तमान काल ही है। ईसाई धर्म के आचार्य मानते हैं कि 360 दिन का मनुष्य वर्ष होता है और 360 वर्षों का एक देव वर्ष या ‘समय’ होता है। इस प्रकार 360 (7=2520 वर्ष व्यतीत होने पर सात समय व्यतीत हो जाएंगे।

यह भविष्यवाणी ‘ओल्ड टेस्टामेण्ट’ की है जो ईसा से बहुत पूर्व की है। उसकी गणना के हिसाब से यहूदियों को पहला दण्ड ईसा से 589 वर्ष पूर्व दिया गया था। इसलिए पहला समय उसी वक्त माना जायेगा। और सात समय करीब 1931 ई. में समाप्त हो जाता है। इन्हीं दिनों यहूदी दूर दूर से आकर अपनी चिरकाल से छूटी हुई मातृ भूमि में बसने आरम्भ हुए हैं।

‘सात समय’ का निर्णय दूसरे तरीके से भी होता है। बाइबिल में यह भी बताया गया है, कि सात समय समाप्त होने पर बड़ा भारी युद्ध होगा। सर्वत्र हाहाकार मच जायगा, दुनिया त्राहि त्राहि करने गलेगी। दुर्भिक्ष, महामारी, भूकम्प आदि की प्रबलता रहेगी। खून खच्चर से धरती की पीठ रंग जायेगी।

अन्त में कहा गया है कि यह कठिन समय व्यतीत हो जाने के उपरान्त सुख शान्ति की बेला आवेगी, धर्म का राज्य होगा और सब लोग शान्ति का जीवन व्यतीत करेंगे। प्रतीत होता है कि अब वही समय आ पहुँचा है।


Quotation

किसी विद्वान का कथन है कि विश्वास रखने वाले आदमी के वास्ते सब कुछ सम्भव है।

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अपने विश्वास को शीघ्र ही दृढ़ निश्चय का रूप देकर उसे असली रूप देने का भी प्रयत्न करना चाहिए।

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इमर्सन का कथन है कि अच्छे और दृढ़ निश्चय करने वाला आदमी ही अच्छा है।

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अपवित्र विचार आदमी को बरबाद कर देते हैं। जिस आदमी का मन गन्दे विचारों में पड़ता है, उसे आगे बढ़ने की आशा कदापि न करनी चाहिये व्यक्तित्व प्राप्ति के इच्छुकों को कुकर्म की इच्छा नहीं करनी चाहिये, नहीं तो उन्हें इसका भयंकर मूल्य देना पड़ेगा।


तप कीजिए।

तप से ही इच्छित फल की प्राप्ति होती है। पूर्वकाल में साधारण मनुष्यों ने तप करके बड़े बड़े महत्व प्राप्त किये थे। रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद ने अपने शीश तक को तिलाँजलि देकर चिरकाल तक एकनिष्ठ तप किये थे, तब कहीं उन वरदानों को प्राप्त किया था, जिनके कारण वे इतने प्रतापी बने। भस्मासुर ने कितना प्रचण्ड तप किया था, हिरण्यकश्यप तप के बल से ही अमर बना फिरता था। पार्वतीजी ने उग्र तप करके शिव से विवाह किया। विश्वामित्र साधारण राजा से बढ़कर ब्रह्मर्षि के पद तक तप द्वारा पहुँचे। भागीरथ तप द्वारा गंगा को पृथ्वी पर लाये। आज भी जितने श्री- सम्पन्न और प्रतापी पुरुष दृश्यमान हो रहे हैं, वे पूर्व तप के कारण ही सुख भोग रहें हैं, गीता में कहा है कि -”धीनाना श्रीमताँगेहे याग भ्रष्टों भिजायते।”

कल्याण मार्ग तप ही है। ध्रुव ने तप करके परमपद को पाया था, शिवजी तपोबल से ही कण्ठ में कालकूट धारण किये हुए है। शेषजी तप की शक्ति से पृथ्वी का भार उठाये हुए हैं। बड़े बड़े महान् कार्यों की बात छोड़कर छोटे से छोटे साधारण व्यापारिक एवं व्यवहारिक कार्यों पर ध्यान दिया जाय तो प्रतीत होता है कि तपस्वी कृतकार्य होते हैं और आलसी दुर्भाग्य का रोना रोते हैं। उद्योग, प्रयत्न, लगन का नाम ही तप है। यह तप जितनी श्रद्धा और निष्ठा के साथ होता है, उतनी ही सफलता की अधिक सम्भावना रहती है।

जितना महान् कार्य पूरा करना हो, उतना प्रचण्ड तप करने की आवश्यकता होती है। जब कृष्णावतार हुआ था, तो देवता लोग ग्वाल-बालों के रूप में आ छिपे थे, सुर बालाओं ने भगवान का लीलामृत पान करने के लिए गोपियों में जन्म लिया था। गोपियों के पति जब उन्हें समझाते थे कि, कृष्ण के रास मण्डल में जाने से हमारी कुल कानि घटती है, गृहस्थी के काम काज में हानि होती है, घर वाले नाराज रहते थे, पर गोपियों ने किसी की परवाह न की। क्योंकि वे साधारण स्त्रियाँ नहीं थी, उनका कर्तव्य लोकेतर था, वे साधारण औरतों की अपेक्षा उच्च आत्माएं धारण किये हुए थीं, इसलिए उनने अपने जन्म धारण का मूल उद्देश्य ध्यान रखा और अनेक आपत्तियां सहती हुई भी ब्रज बिहारी से पृथक् न हुईं। रामावतार में अनेकों बानर अपना कामकाज छोड़ कर लंका के युद्ध में बिना किसी वेतन, पुरस्कार, लोभ लालच या इच्छा के प्राणों का मोह त्याग कर लड़ने के लिए पहुँचे थे। उन बानरों के भी स्त्री बच्चे होंगे, कुटुम्ब परिवार होगा, व्यापार व्यवसाय होता होगा, प्राणों का मोह होगा, किन्तु इन सब मोह ममताओं को उनने तिलाँजलि दे दी और लाल बुझक्कड़ जिसे ‘आगा पीछा सोचना’ कहते हैं, उसको मस्तिष्क में रत्ती भर भी स्थान नहीं दिया। कारण यह था कि वे बानर साधारण विटप बिहारी नहीं थे, उनकी आत्मा जागृत थी, व दिव्यात्मा अपना जीवन धन्य करने और भू भार हरने के लिए आये थे। उस समय भी अनेकों बानर ऐसे होंगे, जो युद्ध का नाम सुनते ही गश खाते होंगे और अनेकों गोपियाँ ऐसी होंगी जो कृष्ण के नाम से भी घबड़ाती होंगी।

अब युग परिवर्तन का समय आ रहा है। अवतार के स्वागत की तैयारियाँ हो रही है। क्या इसका स्वागत, सत्कार, अर्चन करने के लिए कोई भी दिव्य आत्माएं इस पुण्यभूमि में मौजूद नहीं है? बरात की अगवानी तैयारी के लिए जब इतनी तैयारी की जाती है, राजा के आगमन पर जब इतनी सजावट की जाती है, तो क्या नवयुग और परमात्मा सत्ता के पधारने के समय कुछ भी उत्सव न होगा? आप यह कह कर छुट्टी नहीं पा सकते कि हम अकेले क्या कर सकते हैं, जो सब करेंगे वह हम भी करने लगेंगे। सब की प्रतीक्षा देखना आपको शोभा नहीं देता। क्योंकि जिन पाठकों के हाथ में यह लेख होगा, उनमें ही अधिकाँश देवता रहें होगे। साधारण मूर्ख जनता अन्धी भेड़ों के समान होती है। जब दिन फैल जाता है, तब वह जागती है। किन्तु ब्रह्मवेत्ता यह कह कर छुट्टी नहीं पा सकते कि सब जगेंगे तब हम भी जाग जायेंगे, उन्हें ब्राह्ममुहूर्त में जगना होगा और सूर्योदय से पूर्व उठ कर सन्ध्या वंदन में प्रवृत्त होना होगा। जो जितना ही जागृत है, उसका उतना उत्तरदायित्व अधिक है। परमात्मा ने कृपा पूर्वक जिनके हृदयों में अधिक विवेक दिया है उसका कारण यह है कि उनमें दैवी अंश अधिक है। राष्ट्र रक्षा का उत्तरदायित्व मामूली घसखोदों की अपेक्षा सैनिकों और सेनापतियों पर अधिक है। लड़ाई में कोई देश हार जीत जाये, तो मामूली घसखोदों की अपेक्षा सैनिकों और सेनापतियों की निन्दा प्रशंसा अधिक होती है। जिनके हृदयों में दैवी प्रेरणा का आभास आता है, जो अन्तःकरण में ईश्वर की वाणी सुनते हैं, जिनका आत्मा सत्य नारायण की ओर आकर्षित है, वह अच्छी तरह समझलें कि यह अकारण ही नहीं है। आत्मा की छोटी सी स्फुरण को तुच्छ मत समझिए, उसका निरादर मत कीजिए यह युगवाणी है और ईश्वरीय संदेश है। जगदीश्वर अपनी प्रेरणा उन्हीं आत्माओं में करते हैं, जो इसकी पात्र होती हैं।

यदि आपकी आत्मा सत्य, प्रेम और न्याय का सन्देश सुनाती हो और ऐसा प्रतीत होता हो, तो भगवान हाथ पकड़ कर आपको अपने महान् उद्देश्य की पूर्ति का सन्देश वाहक बनाना चाहते हैं, तो हे पाठक! भूल मत करना! आलस्य और प्रमाद की उलझन में मत पड़े रहना, वरन् गोपियों की तरह सब बन्धनों को छोड़ कर मुरली की मधुर तान सुनते ही दौड़ पड़ना और पुकारना “नाथ! मैं तुम्हारा हूँ ! तुम्हारे आदेश को पूरा करने आया हूँ। तुम्हारी वाणी की ध्वनि पर थिरकता हुआ आता हूँ। प्रभो, मेरा कुछ नहीं है, जो कुछ है तुम्हारा ही है। तुम्हारी वस्तु तुम्हें सौंपने में मुझे कुछ हर्ज नहीं है। आप अवतरित हो रहे है मुझे आपकी बधाई बाँटने में आनन्द है। आप मेरे घर आ रहे हैं, मैं आपकी सूचना सर्वत्र पहुंचायें देता हूँ।”

इस पाप ताप परितप पृथ्वी पर अब सत्य धर्म की स्थापना होगी। हाहाकारी वेदना से जलते हुए प्राणियों को सन्तोष की साँस लेने का अवसर मिलेगा। इस गंगावतरण के स्वागत के लिए हे नान्दीगणें! प्रसन्न हो जाओ। इस कृष्ण जन्म के लिए हे बाल गोपालो! उत्सव मनाओ। उस रामावतार के लिए हे देवताओं! पुष्प बरसाओ। हे जागृत आत्माओं! इस आगामी युग का सन्देश दूत बना कर प्रभु ने तुम्हें इस भूतल पर भेजा है। अपना कर्तव्य पालन करो। प्रभु की इच्छा पूरी होने दो। लोभ मोह के बन्धनों में अपने को जुटा दो। इस एक ही कार्य में लग जाओ। भगवान् सत्य आप की जय हो, भगवान प्रेम आपकी जय हो, भगवान न्याय आप की जय हो। ऐसी ध्वनि पृथ्वी के कौने कौने में गुँजित करने में लग जाओ। यह कर्तव्य की पूर्ति एक महान तप है। हे भागीरथों! तप में प्रवृत्त होओ, जिससे स्वर्गीय सुरसरि इस भूलोक पर शीघ्र ही प्रकट होकर मृत प्राणियों के मुख में अमृत टपका दे। तपस्वियों! यह कार्य के तप के द्वारा ही पूरा होगा। इसलिए उठो तप में प्रवृत्त हो जाओ।


सतयुग सम्पादक का परिचय

वेद मूर्ति श्रीमान पं. ऋषिराम जी शुक्ल लक्ष्मी और सरस्वती दोनों के ही वर पुत्र हैं। आत्म विद्या की खोज और चर्चा का विषय आप के जीवनेतिहास में नयी घटना नहीं है। प्रौढ़ावस्था से ही आप आत्मा की पुकार सुनने के लिए आतुर रहे और अब उतरती अवस्था में स्वाभाविकतया आपके पूर्व पुराने विचार परिपक्व होकर अध्यात्मिक मार्ग के पथिकों को सुस्वादु फल दे रहे हैं। प्रस्तुत ‘सतयुग‘ अंक आपकी कल्याण कारिणी मनोवृत्ति का शोषक और प्रकाशक है।

आप के पूर्वजों में पं. नैनसुख जी दीवान, ऊँच गाँव, जिला उत्राव (संयुक्त प्रान्त) के अधिवासी थे। घटनावश जब वह नागपुर आये तो उनके शौर्य वीर्य के प्रति आकृष्ट होकर महाराज भोसले ने उन्हें दीवान पर नियुक्त किया था। कालान्तर में उनकी बुद्धिमता और परिश्रम शीलता का विशेष परिचय या दरबार ने उन्हें वैतूल जिलार्न्तगत 84 गाँवों का इलाका जागीर के रूप में प्रदान किया जो वर्तमान में शाहपुर (वैतूल) C.P के नाम से प्रसिद्ध है।

यह इलाका माफी जागीर के रूप में दिया गया था और महाराज भोसले के राजत्वकाल तक आरम्भिक अवस्था में ही कायम रहा। आगे कालक्रम से इसमें अनेक परिवर्तन होते रहे और अब वह जागीर न रह कर माल गुजारी करार दे दी गई तथा गाँव भी संख्या में मात्र 57 रह गये हैं।

श्रीमान पं. ऋषिरामजी इसी प्रतिष्ठित घराने के वर्तमान मुख्य प्रतिनिधि और स्वत्वाधिकारी हैं। इनके पूर्व पुरुष जिस भाँति अपने वीरत्व और वदान्यता आदि गुणों में अद्वितीय थे उसी भाँति वंशानुक्रम के अनुसार आप में भी उनका प्रादुर्भाव हुआ है। आप भारद्वाज गोत्रोत्पन्न, शुक्ल वंशीय कान्य कुब्ज ब्राह्मण हैं। पूर्वजों की कीर्तिलता के बीच आपने अपनी उज्ज्वल कीर्ति का जो नया वितान ताना है, उसने इस घराने की प्रतिष्ठा में चार चाँद लगा दिए हैं।

पुस्तक प्रेम आपकी नस नस में समाया है, विद्वानों और गुणी जनों को देख कर आप उत्फुल्ल हो उठते हैं। दुखी और अपाहिजों के लिए स्वदेश और स्वभाषा उन्नति के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सात्विक दान के नाम पर आपकी मुट्ठियाँ सदैव पर्यन्त खुली रहती हैं। आत्म विज्ञापन के भाव का अभाव होने से भले ही संवाद पत्रों की दुनिया आप को न जानती हो पर कितने ही पत्रकार और विद्वान जन आप में अटूट अनुराग रखते हैं।

अध्यात्म विषय में आपकी प्रीति और प्रतीति दोनों हैं। आपका कथन है कि “जब तक देश पुनः आत्मविद्या की ओर यधावित नहीं होगा तब तक इसके बन्धनों की प्रच्छन्नता नाम शेष नहीं हो सकती पूर्व के अध्यात्मिक सूर्य का एक बार फिर भूतल व्यापी प्रकाश होकर रहेगा और वह स्वर्ण संयोग विश्वास और भावना के एक दम निकट है” ऐसे उच्च भावों के आप पोषक हैं।

राम रूपी सत्य और रावण रूपी असत्य के भेद को सम्यक् रूपेण अनुभव कर आप सत्य अर्थात् ब्रह्म स्वरूप के एकान्त पुजारी और प्रचारक ‘सत्युगाँक’ के सम्पादन और सहायता का गुरु भार ग्रहण कर देखा जाये तो आपने राम रूप सत्य का ही समर्थन किया है। आप कहते हैं सतयुगी भावना के पोषण से ही मानव सतयुगी आचरण पर कटिबद्ध होगा और तब ‘सतयुग‘ का प्रवर्तन होने में क्षण काल विलम्ब नहीं हो सकता।


Quotation

पवित्र आदमी की शक्ति अपार है। उसे कौन माप सकता है। वह अनन्त है, वह ईश्वरीय लाल है, पवित्रता ही व्यक्तित्व प्राप्ति का राज मार्ग है।

खुशखबरी!!!

अब तो संस्कृत से कोरे, केवल हिन्दी जानने वाले आयुर्वेद-परीक्षा पास कर सकते हैं।

चिकित्साचन्द्रोदय प्रथम भाग

आयुर्वेद-विद्या पीठ प्रयाग की उत्तमा-परीक्षा में शामिल!

चिकित्साचन्द्रोदय 7 भाग

भारतीय विद्वत्परिषद, अजमेर की वैद्य, वैद्यभूषण, कविराज और भिषगाचार्य-

परीक्षा में मुकर्रर!

अब क्यों चूकते हो?

जब कि प्रयाग ओर अजमेर वगैरह अनेक स्थानों में

चिकित्साचन्द्रोदय

पढ़ कर परीक्षा दी जा सकती है। अनेक लोग चिकित्साचन्द्रोदय 7 भाग पढ़ कर आयुर्वेद की कितनी ही परीक्षाओं में पास हो गये। आयुर्वेदाचार्य-परीक्षा में कई विद्यार्थी संस्कृत में परीक्षा देने वालों से ऊँचे नम्बरों से पास हुए।

गुरु या उस्ताद की जरूरत नहीं!

अगर आप हिन्दी मिडिल या नार्मल परीक्षा पास हैं, तो शोक से बिना किसी उस्ताद के चिकित्साचन्द्रोदय पढ़िये और अजमेर की भारतीय विद्वत परिषद से लिखा-पढ़ी कीजिये। आपको परीक्षाओं की पुस्तकें मालूम हो जावेंगी। आप निस्सन्देह डिग्री प्राप्त कर लेंगे, बड़ी आसानी से ऊँची से ऊँची परीक्षा में कामयाब होंगे।

कीमत

चिकित्साचन्द्रोदय 1 ला भाग 3)

“ 2 रा भा ग5)

“ 3 रा भाग 4)

“ 4 था भाग 4)

“ 5 वाँ भाग 5)

“ 6 ठा भाग 3)

“ 7 वाँ भाग 10)

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35/-)

नोट- एक साथ 7 भाग खरीदने से 6/-) कमीशन मिलेगा। यानी 28/-) लगेंगे।

1/-) पैकिंग चार्ज होगा। कुल 29/-) लगेंगे।

पता-हरिदास एण्ड कम्पनी, मथुरा।


सत्य की टेर


सत्य की टेर

(ले. श्री वियोगी हरि)

(1)

इस मन्दिर में भी मिलेगा खुदा,

कुछ अन्दर इश्क की आग भी हो।

उस मस्जिद में भी मिलेगा तुम्हें,

मन मोहन से अनुराग भी हो॥

वह हाजिर है हर के दिल में,

उसे चाहने की चित्त-चाह भी हो।

मिललो उस पीव से राह तो है,

पर दर्द भरी कुछ आह भी हो॥

(2)

वह नाथ बड़ा या अनाथ बड़ा,

यह भेद कोई बतलादे जरा।

उस मालिक का वो इशारा हमें,

दुख दर्द भरा जतलादें जरा॥

पर पीर का कोई कृपा करके,

गुरु मन्त्र हमें सिखलादे जरा।

वह सूरत कृष्णा की आँसुओं में,

दुखियों के हमें दिखलादे जरा॥

(3)

मुझे वेद पुरान कुरान से क्या,

मुझे सत्य का पाठ पढ़ा दे कोई।

मुझे स्वर्ग या मुक्ति की चाह नहीं,

मुझे त्याग का रंग चढ़ा दे कोई॥

मुझे धर्म अधर्म से क्या करना,

मुझे प्रेम का प्याला पिलादे कोई।

मुझे मन्दिर मस्जिद जाना नहीं,

मुझे राम रहीम मिलादे कोई॥

(4)

मत मेल न हो मत भेद ही हो,

पर प्रेम में मेल मिलाय करो।

इस मैल भरे मचले मन को,

मत खेल खुदी का खिलाया करो॥

अपराधियों को भी सदा प्रभु से,

तुम दान दया का दिलाया करो।

पर पीर की प्यास लगी जो जिसे,

उसे प्यार का प्याला पिलाया करो॥

(5)

दिल खोल दिया ही लुटाया करो,

दुख दर्द का दान दिया न करो।

तुम वेद पुरान की ओट में हाय

ईमान की जान लिया न करो॥

उस बाप के नाम पर भाइयों का,

तुम नाहक रक्त पिया न करो।

कुरबानी खुदी की करो सरकार,

खुदाई का खून किया न करो॥

(6)

पुजती हो गरीब की आह जहाँ,

कहते हों जिसे सब प्रेम मही।

मेरी काशी वही मेरा काबा वही,

मेरा स्वर्ग वही मेरा धाम वही॥

दिखता हो अनाथ के आँसुओं में,

दिलदार जो दीन दुखी का सही।

मेरा अल्ला वही, मेरा बुद्ध वही,

मेरा राम वही, मेरा श्याम वही॥

*समाप्त*