खबरदार! अन्य मत करना!

उन कार्यों को क्यों करते हो जिनके करने से न तो कीर्ति प्राप्त होती है और न लाभ मिलता है। जो मनुष्य इससे पाना चाहते हैं, ऊर्ध्व गति के इच्छुक है उन्हें ऐसे कार्यों से दूर रहना चाहिए जिससे कीर्ति में बट्टा लगने की आशंका हो। श्रेष्ठ पुरुषों की मैत्री सफलता दे सकती है, किन्तु आचरण की अपेक्षा तो मनोकामनाओं को ही पूर्ण कर सकने की क्षमता रखती है। खबरदार! कोई ऐसा काम मत करना जिसे सभी मनुष्य बुरा बताते और जिनके करने से माता-पिता को भी कलंकित होना पड़े। सूरत से कोई आदमी बुरा नहीं है। काला-पीला रंग भले बुरे की पहचान नहीं है। श्रेष्ठ पुरुष तो वह है जिसके आचरण श्रेष्ठ है।

अधर्म से धन कमा कर सम्पत्तिशाली बनने की अपेक्षा यही अच्छा है कि मनुष्य श्रेष्ठ आचरण करता हुआ गरीब बना रहे। जो पैसा दूसरों को रुला कर इकट्ठा किया जाता है। वह क्रन्दन कराता हुआ विदा होता है। निष्पाप नीति से जो धन प्राप्त किया जाता है। अन्त में वही सच्चा आनंद देगा। इसलिये भले आदमियों ! दया और न्याय से रहित पैसे को कभी छूने की कोशिश मत करना और खबरदार! किसी पर अन्याय का हाथ मत उठाना।

“अनुभवाँक” के लिए लेख भेजिये


सभी पाठकों से आवश्यक सूचना

पूर्व सूचना के अनुसार अखण्ड ज्योति का अगस्त का अंक अनुभवाँक होगा। इसमें सुविज्ञ पाठकों के धर्म मार्ग में प्रेरित करने वाले शिक्षाप्रद अनुभव छपने जा रहे हैं। पृष्ठ संख्या बढ़ाया जाना कठिन है तो भी यह अत्यन्त महत्वपूर्ण सामग्री होगी।

सभी पाठको को अपने अनुभव भेजने को निमन्त्रण दिया गया है। तदनुसार अनेक अनुभव बहुत ही ज्ञानवर्धक एवं शिक्षाप्रद आये हैं। परन्तु कितने ही पाठक हमारा तात्पर्य समझने में भूल कर गये हैं। कई ने तो साधु संन्यासियों के चमत्कार वर्णन किये हैं, कई ने अखंड ज्योति अथवा उसके सम्पादक की प्रशंसा भर दी है। कई ने अनुभव के नाम पर अपने सिद्धान्त लिख भेजे हैं। हम इन तीनों बातों में से एक भी नहीं चाहते। वरन् यह चाहते हैं कि व्यवहारिक जीवन में धर्म मार्ग पर चलने से क्या सुविधा होती है? और अधर्म अपनाने से किस प्रकार कष्ट सहना पड़ता है? इसकी पुष्टि में अपने या अपने मित्रो के साथ घटित हुई घटनाओं के संस्मरण भेजें।

जिन पाठको ने उपरोक्त मन्तव्य के विपरीत अनुभव भेजे हो, उन्हें वे अस्वीकृत समझ लें और नये लेख अविलम्ब भेज दें। जहाँ तक सम्भव हो जुलाई के अन्त तक अनुभव आ जाने चाहिए अन्यथा अगस्त के प्रथम सप्ताह तक तो अवश्य ही भेज दें। इसके बाद आये लेख स्वीकार न होंगे।

सम्पादक ‘अखंड ज्योति’ मथुरा


कृतज्ञता प्रकाशन

कागज के इस घोर दुष्काल में जब कि एक रिम के लिये चार-चार शहरों में घूमना पड़ता है और चौगुनी-पचगुनी कीमत देने से भी कागज मिलता नहीं। ऐसी दशा में अखंड ज्योति जैसे इसका अनुभव सहृदय पाठक स्वयं कर रहे है, यह देख कर हमें आन्तरिक प्रसन्नता होती है। अखंड ज्योति के ज्ञान यज्ञ का हर पाठक याज्ञिक है। इसलिए उनका कर्तव्य हो जाता है कि इस विपत्तिकाल में एक-एक दो-दो नये ग्राहक बढ़ा कर उस यज्ञ की जीवन रक्षा करें।

निम्न महानुभावों ने अखंड ज्योति की मूक याचना का अन्तःकरण में अनुभव करते हुए इस समय नये ग्राहक बढ़ाने में विशेष सहयोग दिया है। इसके प्रति हम अपनी आन्तरिक कृतज्ञता प्रकट करते हैं। और आशा करते है कि अन्य प्रेमी सज्जन भी इनका अनुकरण करेंगे।

इस मास ग्राहक बढ़ाने तथा आर्थिक सहयोग करने वाले सज्जों की शुभ नामावली

(1) श्री. मंगलचन्द जी भंडारी अजमेर। (2) श्री. मुन्शी राम जी, हिसार। (3) श्री. पी. जगन्नाथ राव नाइडू नागर। (4) श्री. राय साहब नारायण प्रसाद जी हजारी बाग। (5) श्री. लक्ष्मी नारायण जी कमलेश मोदहा। (7) श्री. हरि कृष्ण जी परसराम पुरिया डोमर। (7) श्री. बालगोविंद सी. पटेल अहमदाबाद। (8) श्री. रामरक्षपाल जी आड़तिया, चन्दोसी। (9) श्री. शंकरलाल व्यास महेश, कसराबद। (10) श्री. यैजूदास मिस्त्री सूरज पुरा, मुँगेर। (11) श्री. टा. श्याममनोहर अग्निहोत्री बीजापुर। (12) श्री. हरीरान जी यादव सीहोरा।


आपके कल्याण की बात!

अगर आप अपना मानव जीवन सफल बनाना चाहते हैं। तो भगवन्नाम प्रचारक मासिक पत्र नाम माहात्म्य पढ़िये इस वर्ष 1 अगस्त को इसका एक विशाल विशेषाँक “वाणी अंक” निकलेगा, जिसमें सैकड़ों प्राचीन महात्माओं की दिव्य कल्याणकारी “वाणियों “ का विशाल संग्रह होगा, जिसके पढ़ने से मनुष्य का जीवन पवित्र एवं शान्त हो जायेगा। चित्र भी अनेक हैं। जल्दी ग्राहक बन जाइये, रियायती मूल्य केवल 1-॥) एक रुपया आठ आना। आज ही मनीआर्डर द्वारा निम्न पते पर भेज दीजिये। अंक बड़ी सज धज से बढ़िया कागज पर छप रहा है। जल्दी कीजिए इस भीषण महंगी के युग में उपरोक्त विशेषाँक परिमित संख्या में ही छप रहे हैं, इससे आज ही 1-॥) भेजकर ग्राहक बन जायं।

पता- मैनेजर “नाम माहात्मय’

वृन्दावन यू. पी.।


ब्रजभारती

ब्रज-साहित्य मंडल की मासिक मुख-पत्रिका, प्राचीन और नवीन का संगम।

वार्षिक मूल्य 2) “ब्रज भारती “ में क्या है ? एक प्रति का =)

1- ब्रज के प्राचीन महत्वपूर्ण साहित्य की नवीनतम शोध।

2- अप्रकाशित ब्रज के ग्रन्थ- रत्नों का नवीनतम शोध।

3- ब्रज-भाषा और ब्रज-क्षेत्र की समस्याओं पर विचार।

4- ब्रज -साहित्य मंडल के साहित्य तथा जीवन का दिग्दर्शन।

5- ब्रज के ग्राम्य गीतों, कहावतों का मनोहर संग्रह।

यदि आप ब्रज के साहित्य, धर्म, इतिहास, जीवन संस्कृति और प्राकृतिक स्थलों से पूर्णतः परिचित होना चाहते हैं। तो ब्रज भारती के आज ही ग्राहक बनिये

इसके सम्पादक हैं:-

श्री जवाहरलाल चतुर्वेदी तथा श्री सत्येन्द्र

और इसके व्यवस्थापक है:

डॉ. विश्वपाल शर्मा।

पता - मैनेजर, ब्रजभारती, मथुरा।

बल मुपास्व

श्रुति -

सबसे प्रथम बल की उपासना कीजिए!

यदि आप जीवन को सुखमय बनाना चाहते हैं।

-तो-

शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक बल संग्रह कीजिए!


मुरझाये कुसुम के प्रति

मुरझाये कुसुम के प्रति

(श्री बल्लभ)

खेद करो मन कुसुम! हृदय में अपने मुरझाने का।

जाने कब से चला आ रहा क्रम आने जाने का॥

तुम न रहोगे, किन्तु तुम्हारी, सुरभि सदैव रहेंगी।

विश्व विलास तुम्हारा श्रम है। वह यह कथा कहेगी॥

वह रज जिसमें लोट-लोट कर, बने कुसुम तुम योगी।

अन्त समय में वही तुम्हारी, कोमल शय्या होगी॥

वह कंटक जिनमें विध-विध कर, थे प्रसून तुम खेले।

रोवेगें इस सरस गन्ध को, नाम तुम्हारा ले ले॥

हे उदार! मधु-दान तुम्हारा, कौन भूल जावेगा ?

मधुप-समाज विवश रो-रो कर, अमर गान गावेगा॥

कोटि कल्प से भी बढ़कर है, साधन यह दो दिन का।

अहा! यही सच्चा गौरव है, नश्वर जग जीवन का॥


रणक्षेत्र की पुकार

चलो, उठो खड़े होकर कमर कस लो, जिरह बख्तर पहनो और अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित हो जाओ। रणक्षेत्र से एक आह्वान हुआ है। सदियों से सोया हुआ मरघट आज प्रज्वलित होने के लिए बिलख रहा है। जवानी, वीरता, पौरुष और शौर्य की चुनौती देती हुई युद्ध की देवी पुकार रही है कि आओ, मेरे लालो ! अपना जौहर दिखाओ जिससे मैं अपनी कोख को सफल मान सकूँ।

जीवन निस्संदेह एक संग्राम है। वीर पुरुषों के लिए यह एक चुनौती है कि उठें और अपना गौरव सिद्ध करें। प्राचीन काल में एक रिवाज था। कि कोई महत्वपूर्ण कार्य आगे आता था तो उसे पूरा करने वाला तलाश करने के लिए राज दरबार में पान का बीड़ा रखा जाता था कि जो उस काम को पूरा करने की हिम्मत रखे वह इस पान को उठा कर खा ले। मानव जीवन ऐसा ही पान का बीड़ा है जिसे ईश्वर अपने सरदारों के सामने रखता है कि जिनकी इच्छा हो इसे स्वीकार कर लें जो आत्माएँ मानव जीवन के महान उद्देश्य को पूरा करने के लिए तैयार होती हैं, उन्हें यह दे दिया जाता है। स्कूलों में पुरस्कार रखे जाते हैं। कि जो परीक्षा में प्रथम उत्तीर्ण हो वह इस इनाम को पावे। व्यायामशालाओं में चुनौती रखी जाती है कि जो इतना लम्बा कूद जावे उसे यह पुरस्कार मिलेगा। फौज के सिपाहियों का बल बढ़ाने के लिए सेनानायक नकली लड़ाइयाँ लड़वाते हैं। सिपाहियों को नित्य की परेड और निशानेबाजी की कवायद कराना सेनापति इसलिये आवश्यक समझता है। कि इससे हमारी सेना की क्रियाशीलता और कुशलता बढ़ेगी। अखाड़ों में भारी-भारी मुगदर, डंबल, रस्से और पत्थर इसलिये रखे जाते हैं। कि जो इन्हें उठावें अपने शरीर को पुष्ट करते हुए निरोगता एवं सुदृढ़ता प्राप्त करें।

परमात्मा ने हमें जीवन एक चुनौती की तरह पान के बीड़े की तरह प्रदान किया है कि उसके बताये हुए लक्ष्यों को बेधें। यह लक्ष्य है अन्याय। दुनिया में बहुत से अन्याय दिखाई पड़ते हैं। बहुत सी बुराइयां दृष्टिगोचर होती हैं। पाप और पशुता की भरमार प्रतीत होती है। यह सब हमारे लिए लक्ष्य बेध उपस्थित है, इन्हें बेधने के लिए इन्हें परास्त करने के लिए, हमें जीवन मिला हुआ है। परमात्मा ने कभी तृप्त न होने वाली भूख और प्यास हमारे साथ लगा दी है, ताकि हम कर्तव्य धर्म को न भूल जावें। नित्य श्रम करें, नित्य विचार करें और पेट पालने के लिए जो समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें सुलझाने के बहाने अपनी शारीरिक और मानसिक योग्यताओं को घिस-घिस कर तेज करें। दुनिया में पाप पशुता और अन्याय की सृष्टि इसलिए की गई है कि हम लोग उनसे जूझे, लड़े हटावे और कर्मवीर कहलाते हुये विजय का मुकुट अपने मस्तक पर धारण करें। माता पिता अपने छोटे बालकों को दौड़ना सिखाते हैं। एक लक्ष्य नियुक्त करते हैं। और उंगली के इशारे से उस स्थान को छूकर हमारे पास वापस आओ। बालक दौड़ता है। वो इधर उधर देखता है। और उस दौड़ में अनमना होकर भाग लेता है। वह पीछे रह जाता है और पिता से अपमानित होता है, किन्तु जिस बच्चे ने जी तोड़ कर कोशिश की थी वह लक्ष्य को छूकर जल्दी वापिस आ जाता है। पिता उसकी पीठ ठोंकता है। और प्रोत्साहन देता है।

दुनिया में फैली हुई बुराइयाँ एक चुनौती है जो हमें ताल ठोक कर अपने से लड़ने के लिए ललकारती हैं। कायर और निकम्मे व्यक्ति इन बुराइयों को देख कर डरते, घबराते और काँपते हैं वे कभी ईश्वर को दोष देते हैं कि उसने यह बुराइयाँ क्यों बनाई कभी दुनिया को दोष देते हैं कि यह ऐसी घृणित है, कभी कुछ सोचते है, कभी कुछ कहते है। यह बहाने बाजी और झुँझलाना हमारी नपुँसकता का चिन्ह है। ईश्वर का इसमें कुछ भी दोष नहीं है। वह जीवों की तुच्छता से महानता की ओर ले जाना चाहता है, छोटे को बड़ा बनाना चाहता है, अपने पुत्र को सच्चा युवराज बनाकर उसे उत्तराधिकार प्रदान करने की यह सब तैयारियाँ हैं। ईश्वर कर्मनिष्ठ है, वह घोर कर्म में लगा हुआ है, उसकी सृष्टि का एक कण अहर्निश बिजली की तेजी से अपनी धुरी पर घूम रहा है। संपूर्ण ग्रह नक्षत्र, जड़ चैतन्य अपने कार्य में बिना एक पल की भूल किये हुए काम में लगे हुए हैं। चैतन्य तत्व का सर्वोपरि धर्म है कर्म करना। पिता की सर्वोपरि सम्पत्ति है कर्तव्य वह पुत्रों को भी कर्मनिष्ठ बना कर अपना सच्चा उत्तराधिकारी बनाना चाहता है। पिता के काम को पुत्र जितना अपनाता जाता है उतना ही वह उसका प्रीति भाजन और साझीदार बनता जाता है। कर्मयोगी क्रियाशील, कर्तव्य परायण कार्य कुशल बन कर अपने पिता का पद प्राप्त करना ही जीवन संग्राम का उद्देश्य है और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विरोधी, अरुचिकर, भारी, कष्ट कारक, एवं अप्रिय परिस्थितियाँ पैदा की गई हैं। आप यह मत समझिये कि शीत ऋतु आप का ठंड में मारने के लिए, गर्मी झुलसाने के लिए, वर्षा कपड़े भिगोने के लिए, भूख बेचैन करने कि लिए, कष्ट दुखी करने के लिए, पाप क्षुभित करने के लिए, अन्याय जी जलाने कि लिए उत्पन्न किये जाते हैं। वास्तव में इन सब की सृष्टि इसलिए की गई है कि इन सब से टकराते हुए अपने लिए आप मार्ग तलाश करें। बिना घिसे चाकू तेज नहीं हो सकता, बिना रगड़ के अग्नि उत्पन्न नहीं हो सकती, बिना संघर्ष के विकास नहीं हो सकता। विकास को जीवन तथा जीवन पतन को मृत्यु कहते हैं। यदि यह सब कठिनाइयाँ संसार में से उठाली जाएं तो जीवन नाम की कोई वस्तु ही शेष न रहेगी। सारा विश्व प्रलय की मृत्यु निद्रा में पड़कर सो जायगा। इसलिए संसार में फैली हुए अन्यायों को देखकर न तो डरिये, न घबराइये, न झुँझलाइए, न किसी पर दोषारोपण कीजिए वरन् ऐसा मानिये कि विश्व की व्यायामशाला में पाप के मुग्दर हमारे उठाने के लिए रखें हुए हैं। ताकि हम अपने को कर्मयोगी बनाते हुए परमात्मा के सच्चे उत्तराधिकारी बन सकें।

मनुष्य जीवन आपको चुनौती के पान की तरह दिया गया है। उस चुनौती को भूलिए मत। जीवन एक संग्राम है, समय रणक्षेत्र है, घड़ी की टिक-टिक करती हुई सैकिंड की सुई हमें याद कराती है और चिढ़ाती है माने वह सैकिंड कहती है कि मूर्ख मैं चल रही हूँ पर तू सो रहा है। साहस के साथ मानव का बीड़ा उठा कर आप अपनी प्रतिज्ञा को क्या इसी तरह अज्ञान की मस्ती में पूरा करेंगे? हाय हम उस ललकार तथा चुनौती को सुनते है और फिर मोह मदिरा की खुमारी में झूम जाते है।

इस मोह और अज्ञान को धिक्कारता हुआ जीवन का रणक्षेत्र हमें ललकारता हुआ चुनौती देता है। कि हे महान पिता के अमर पुत्र! उठ गाण्डीव को उठा और अन्याय अनाचार से जूझ कर अपना कर्तव्य पूरा कर! अन्तर्लोकों से आज हमारे लिए एक ही आवाज आ रही है उठो चलो, खड़े हो कर कमर कस लो, जिरह बख्तर पहनो और अस्त्र शस्त्र से सुसज्जित होकर रणक्षेत्र को चल पड़ो। मनके भीतर धंसी शरीर के हुई और बाहर खड़ी हुई अन्यान्य की सेना से डट डट कर युद्ध करो। यह धर्मयुद्ध तुम्हारे लिये सर्वथा करणीय है। इसमें तुम्हारी जीत ही जीत है।

हतोवा प्राप्तसि र्स्वग जित्वावा भोक्षसे महीम्।

तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय फृत निश्चयम्॥


शक्ति की उपासना

(वेदों का अमर सन्देश)

क्षिपो मृजन्ति। यजु.

पुरुषार्थी लोग ही पवित्र होते हैं और पवित्र करते हैं।

स्थिरै रंगै स्तुष्टुवाँसः यजु.

बलवान अवयवों द्वारा ईश्वर की उपासना करेंगे।

आ राष्ट्रे राजन्यः सूर इषव्यो अतिव्याधी महारथो जयताम्। यजु.

हमारे राष्ट्र में शुरलोक उत्तम प्रभावशाली वीर बने।

उग्राय तब से सुवृति प्रेरय- यजु.

श्रेष्ठ बल के लिए उत्तम भाषण और उत्तम कर्म करो।

आप्नुहि श्रेयाँ समति समं क्रम। अ. 1/11/2

अपने समान लोगों में आगे बढ़ और श्रेय को प्राप्त कर।

जाग वाँसः समिन्धते। यजु.

जागने वाले ही एक होकर प्रकाश करते हैं।

असश्चतः शत धारा अभिश्रियः यजु.

सतत प्रयत्न करने वाले को सैकड़ों प्रवाहों से यश प्राप्त होता है।

दृते दृंह मा, ज्योक्ते संदृशि जी व्यासम।

ज्योवते संदृशि जी व्यासम। यजु.

हे समर्थ परम दृढ़ परमेश्वर! मुझे दृढ़ बना दे। जिससे मैं तेरे संदर्शन में, तेरी ठीक दृष्टि में चिर काल तक जीता रहूँ।

अप्नस्वती मश्विना वाचमस्मे कृतं नी दस्ता वृषणा मनीषान। ऋग. 1/12-24

(अश्विना) हे दिव्य चिकित्सक (अस्त्रा) हमारी (वाचम) वाणी को (अप्नस्वतम) कर्म से युक्त (कृतम्) कर दो (दस्त्रा) हे पाप दूर करने वालो (वृषणा) सुख बरसाने वालो (नः) हमें (मनीषाम्) तीव्र बुद्धि (कृतम) प्रदान करो।

डत् तिष्ठ ब्रह्मणास्पते देवात यज्ञे न बोधय।

आयुः प्राणं प्रजाँ पशून् कीर्ति यजमानं च वर्धय।

अथर्व 1./63/1

(ब्राह्म पते) हे विशुद्ध ज्ञान के स्वामिन (उप तिष्ठ) उठ बैठो और हमारी सहायता के लिए हो जाओ (अज्ञेन) यज्ञमय परोपकारी जीवन द्वारा (देवान) विद्वानों को जगाओ। आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति और यज्ञ करने वाले लोगों को बढ़ाओ।

अनुहूतः पुनरेहि विद्वनुदश्नं पथः।

आरोहणामाकमणाँ जीवती जीवतोयतम॥

अथर्व 4/30/7

(अनुहूतः) मैं तुझे बुलाता हूँ (पुनः) फिर (आइहि) उठ कर आ। तू (पथः) जीवन मार्ग का (उद् अयनम्) चढ़ाई (आरोहणाम) ऊंचाई (उपक्रमणम) उपक्रमण कर तथा (जीवतः जीवतः) प्रत्येक जीवित प्राणी के (अयनम) जाति प्रकार को (विद्वन) जान।


शक्ति बिना मुक्ति नहीं

यह बात भली-भाँति हृदयंगम कर लेनी चाहिये कि शक्ति बिना मुक्ति नहीं। गरीबी से, गुलामी से, बीमारी से, बेईमानी से भव बाधा से तब तक छुटकारा नहीं मिल सकता, जब तक कि शक्ति का उपार्जन न किया जाय। आर्य जाति सदा से ही शक्ति का महत्व स्वीकार करती है और उसने शक्ति पूजा को ऊँचा स्थान दिया है, अनेक महापुरुषों ने तो शक्ति को ही सर्वोपरि धर्म मानकर शाक धर्म की स्वतन्त्र स्थापना की। पहले यह वैदिक धर्म का ही एक अंक था, पीछे मद्य माँस की वाममार्गी छाया इस पर पड़ने के कारण तिरष्कृत बन गया। शक्ति की अधिष्ठात्री देवी को दुर्गा, देवी, चंडी, काली, भवानी आदि नामों से पुकारा जाता है, यह असुरों से धर्म युद्ध करती है और उनका रक्त पान करके प्रसन्न होती है।

एक महात्मा का कथन है Right is might, therefore might is Right अर्थात् सत्य ही शक्ति है, इसलिए शक्ति ही सत्य है, अविद्या, अन्धकार और अनाचार का नाश सत्य के प्रकाश द्वारा ही हो सकता है। शक्ति की विद्युत धारा में ही वह शक्ति है कि वह मृतक व्यक्ति या समाज की नसों में प्राण संचार करे और उसे सशक्त एवं सतेज बनाये। शक्ति एक तत्व है, जिसका आह्वान करके जीवन के विभिन्न विभागों में भरा जा सकता है और उसी अंक में तेज एवं सौंदर्य का दर्शन किया जा सकता है , शरीर में शक्ति का आविर्भाव होने पर देह कुन्दन जैसी चमकदार, हथोड़े जैसी गढ़ी हुई, चन्दन जैसी सुगंधित एवं अष्टधातु सी निरोग बन जाती है, बलवान शरीर का सौंदर्य देखते ही बनता है। मन में शक्ति का उदय होने पर साधारण से मनुष्य कोलम्बस, लेनिन, गाँधी, सनयातसेन जैसी हस्ती बन जाते हैं और ईसा, बुद्ध, राम, कृष्ण, मुहम्मद के समान असाधारण कार्य अपने मामूली शरीरों के द्वारा ही करके दिखा देते हैं। बौद्धिक बल की जरा सी चिनगारियाँ बड़े-बड़े तत्व ज्ञानों की रचना करती है और वर्तमान युग के वैज्ञानिक आविष्कारों की भाँति चमत्कारिक वस्तुओं के अनेकानेक निर्माण कर डालती है, अधिक बल का थोड़ा सा प्रसाद हमारे आसपास चकाचौंध उत्पन्न कर देता है, जिन सुख साधनों के स्वर्ग लोक में होने की कल्पना की गई है, पैसे के बल से वे इस भूलोक में भी प्रत्यक्ष देखे जा सकते है और संगठन बल, अहः! वह तो गजब की चीज है। एक और एक मिलकर ग्यारह हो जाने की कहावत पूरी सचाई से भरी हुई है। दो व्यक्ति यदि सच्चे दिल से मिल जावें, तो उनकी शक्ति ग्यारह गुनी हो जाती है। सच्चे कर्मवीर थोड़े संख्या में भी आपस में मिल कर काम करें सो वे आश्चर्यजनक कार्य कर सकते हैं। कलयुग में तो संघ को ही शक्ति कहा गया है। निस्संदेह गुटबन्दी, गिरोह बन्दी, एका, मेल, संगठन एक जादू है, जिसके द्वारा सम्बन्धित सभी व्यक्ति एक दूसरे को कुछ देते हैं और उस आदान-प्रदान से उनमें से हर एक को बल मिलता है।

आत्मा की मुक्ति भी ज्ञान शक्ति एवं साधन शक्ति से ही होती है। अकर्मण्य और निर्बल मन वाला व्यक्ति आत्मोद्धार नहीं कर सकता और न ही ईश्वर को ही प्राप्त कर सकता है। लौकिक और पारलौकिक सब प्रकार के दुख द्वंद्वों से छुटकारा पाने के लिए शक्ति की ही उपासना करनी पड़ेगी। निस्संदेह शक्ति के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती अशक्त मनुष्य तो दुख द्वंद्वों में ही पड़े-पड़े बिलबिलाते रहेंगे और कभी भाग्य को, कभी ईश्वर को, कभी दुनिया को दोष देते हुए झूठी विडंबना करते रहेंगे। जो व्यक्ति किसी भी दशा में महत्व प्राप्त करना चाहते है, उन्हें चाहिये कि अपने इच्छित मार्ग के लिये शक्ति संपादन करे।

(1) सच्ची लगन और (2) निरंतर प्रयत्न यही दो महान् साधनाएँ हैं, जिनसे भगवती शक्ति को प्रसन्न करके उनसे इच्छित वरदान प्राप्त किया जा सकता है। आपने जो भी अपना कार्य बनाया हो जो भी जीवनोद्देश्य बनाया हो, उसे पूरा करने में जी जान से जुट जाइए सोते-जागते उसी के सम्बन्ध में विचार करते रहिए और आगे को रास्ता तलाश करते रहिए। परिश्रम। परिश्रम। घोर परिश्रम!!! आपकी आदत में शामिल होना चाहिये मत सोचिये कि अधिक काम करने से आपको थकान लगेगी। वास्तव में परिश्रम स्वयं एक चालक शक्ति है। जो अपनी बढ़ती हुई गति के अनुसार कार्य क्षमता उत्पन्न कर लेती है। उदासीन, आलसी और निकम्मे व्यक्ति दो घन्टा काम करके एक पर्वत पार कर लेने की थकान अनुभव करता है, किन्तु उत्साही उद्यमी और अपने कार्य में दिलचस्पी लेने वाले व्यक्ति सोने के समय को छोड़कर अन्य सारे समय लगे रहते है। और जरा भी नहीं थकते। सच्ची लगन दिलचस्पी, रुचि और झुकाव एक प्रकार का डायनेमो है, जो काम करने के लिए क्षमता की विद्युत शक्ति हर घड़ी उत्पन्न करता रहता है।

स्मरण रखिए कि आपका कोई भी मनोरथ क्यों न हो, वह शक्ति द्वारा ही पूरा हो सकता है। इधर-उधर बगलें झाँकने से कुछ भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा, दूसरों के भरोसे सिर भिगोने पर तो निराशा ही हाथ लगती है। अपने प्रिय विषय में सफल होने के लिये अपने पाँवों पार उठ खड़े हो जाइये, उसमें सच्ची लगन और दिलचस्पी पैदा कीजिए, एवं मशीन की तरह जी तोड़ परिश्रम के साथ काम में जुट जाइए अधीर मत होइए, शक्ति की देवी आपके साहस की बार-बार परीक्षा लेगी, बार-बार असफलता और निराशा की अग्नि में तपावेगी, तथा असली नकली की जाँच करेगी, यदि आप कष्ट कठिनाई, असफलता, निराशा, विलम्ब आदि की परीक्षाओं में उत्तीर्ण हुए, तो वह प्रसन्न होकर प्रकट होगी और इच्छित वरदान वरन् उससे भी कई गुना अधिक फल प्रदान करेगी।

एक बार, दो बार हजार बार इस बात को गिरह बाँध लीजिए कि शक्ति के बिना मुक्ति नहीं। दुख दरिद्र की गुलामी से छुटकारा शक्ति उपार्जन किये बिना कदापि नहीं हो सकता आप अपने लिए कल्याण चाहते हैं, तो उठिए शक्ति को बढ़ाइए बलवान बनिए अपने अन्दर लगन कर्मण्यता और आत्मविश्वास पैदा कीजिए जब आप अपनी सहायता खुद करेंगे, तो ईश्वर भी आपकी सहायता करने के लिए दौड़ा-दौड़ा आवेगा।


जिओ और जीने दो

मनुष्य इस विश्व का सर्वोच्च प्राणी है, निस्संदेह ईश्वर ने उसे इतना श्रेष्ठ, उच्च और महान इसलिये बनाया है कि वह एक आदर्श जीवन जी सके इतनी अत्यधिक सुविधा साधन सामग्री देकर एक उत्तम शरीर के साथ प्राणी इस लोक में भेजने में प्रभु का कुछ महान उद्देश्य छिपा हुआ है। मानसिक और आध्यात्मिक चेतना के असाधारण क्रियाशील तन्तुओं का निर्माण ऐसी अद्भुत कारीगरी के साथ हुआ है कि हम इन साधनों के सदुपयोग से पिता के समस्त अधिकारों को प्राप्त करने में समर्थ हो सकते हैं। जिस मानव की रचना पर परमात्मा ने इतना श्रम किया है, यदि वह पशुओं से कुछ भी ऊँची उपयोगिता सिद्ध न कर सके तो, यही कहा जायगा कि इतना श्रम निरर्थक गया।

इस देवदुर्लभ शरीर को पाकर हमें अपना गौरव प्रदर्शित करना होगा। सिंह कभी सड़े हुए माँस की ओर मुँह उठा कर नहीं देखता, क्या हम तुच्छ विषय भोगो की वेदी पर अपनी श्रेष्ठता को बलिदान कर देंगे? एक सम्राट क्या कभी भिखमंगों के सा आचरण करता है? हमें यह शोभा नहीं देता कि ऐसे कामों पर उतारू हों जो मनुष्य को कलंकित करते हैं। हंस प्यासा मर जायेगा पर दूध में से पानी छाँट देने का गुण न छोड़ेगा। हमें न्याय और अन्याय का अन्तर करके केवल न्याय को स्वीकार करना होगा। ताकि हमारी महत्ता सुरक्षित रहे। चकवा वर्ष दिन तक प्यासा मरता है पर सूखे हुए गले को स्वाति के जल से ही भिगोता है। हम गरीबी का जीवन बितावेंगे, कष्ट सहेंगे पर अन्याय से उपार्जित धन ग्रहण न करेंगे। भौंरा सुगन्धित पुष्पों के आस-पास रहता है। हम भी सज्जनों और सद्विचारों के बीच अपना स्थान बनावेंगे। मानव जीवन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ हमें इस बात के लिए बाध्य करती हैं कि ऐसा जीवन जियो जो जीने योग्य हो, जिससे हमारे पद के गौरव पर कलंक न आवे।

धिक्कार है इस जिंदगी पर जो मक्खियों की तरह पापों की विष्ठा के ऊपर भिनभिनाने में और कुत्ते की तरह विषय भोगो की झूठन बांटने में व्यतीत होती है। उस बड़प्पन पर धिक्कार है जो खुद खजूर की तरह बढ़ते है पर उनकी छाया में एक प्राणी भी आश्रय नहीं पा सकता। सर्प की तरह धन के खजाने पर बैठ कर चौकीदारी करने वाले लालची किस प्रकार सराहनीय कहे जा सकते है? जिनका जीवन तुच्छ स्वार्थों को पूरा करने की उधेड़ बुन में निकल गया हाय! वे कितने अभागे हैं सुर दुर्लभ देह रूपी बहु मूल्य रत्न इन दुर्बुद्धियों में काँच और कंकड़ के टुकड़ों के बदले बेच दिया, किस मुख से वे यह कहेंगे कि हमने जीवन का सदव्यय किया। इन कुबुद्धियों को तो अन्त में पश्चाताप ही प्राप्त होगा, एक दिन उन्हें अपनी भूल प्रतीत होगी। पर उस समय अवसर हाथ से चला गया होगा और धुन कर पछताने के अतिरिक्त और कुछ हाथ न रहेगा।

मनुष्य! जिओ और जीने योग्य जीवन जिओ। ऐसी जिन्दगी बनाओ जिसे आदर्श और अनुकरणीय कहा जा सके। विश्व में अपने ऐसे पद चिन्ह छोड़ जाओ जिन्हें देख कर आगामी संतति अपना मार्ग ढूँढ़ सके। आपका जीवन सत्य से, प्रेम से न्याय से, भरा हुआ होना चाहिए। दया सहानुभूति, आत्म निष्ठ, संयम, दृढ़ता उदारता आपके जीवन के अंग होने चाहिए। शारीरिक और मानसिक बल का संचय और उसका सदुपयोग यह प्रथम कर्तव्य है, जिस की ओर हर घड़ी दत्तचित्त रहना चाहिए। बिना इसके जीवन नहीं हो सकता।

न केवल उच्च जीवन स्वयं जियो वरन् दूसरों को भी वैसा ही जीवन जीने दो। परमात्मा का आत्मा के प्रति आदेश है कि जिओ और जीने दो अपनी निर्बलता है। वासना स्वार्थपरता एवं कुभावनाओं को हटा कर गौरवपूर्ण पद प्राप्त करो और सिर ऊँचा उठा कर जीने योग्य जिन्दगी जिओ और उस सात्विक शक्ति का प्रयोग दूसरे निर्बलों को जीवन की शक्ति प्रदान करने में करो। यह प्रक्रिया अत्यन्त ही नीच श्रेणी की होगी कि तुम स्वयं ऊंचे उठो पर दूसरों को नीचा दबाओ। स्वयं स्वतन्त्रता की इच्छा करो और दूसरों को बन्धनों में जकड़ो। यह तो अपने बल का दुरुपयोग करना होगा। दूसरों की छाती पर खड़े होकर ऊपर बढ़ने की भावना इतनी सत्यानाशी और नारकीय है कि इसके द्वारा विश्व का बहुत भारी अहित हुआ है। बलवान व्यक्ति जब जालिम का रूप धारण करता है तो वह प्रभु की इस सुरम्य वाटिका में निर्दय कुल्हाड़े का काम करता है। ऐसा क्रूर जीवन पिशाच ही बना सकता है, मनुष्य के लिए वैसा संभव नहीं है। जीने दो दूसरों को भी स्वतन्त्रतापूर्वक जीने दो। जो भूले भटके हों उन्हें राह पर लाओ पर खबरदार किसी के मूलभूत अधिकारों पर हस्तक्षेप मत करो। अमुक व्यक्ति अमुक परिवार में उत्पन्न हुआ है। इसलिये उसके मानवोचित अधिकार दबाये जाएं यह सोचना बड़ी ही निर्दयता होगी। एक सच्चा मनुष्यता का उपासक यह नहीं कह सकता कि स्त्रियों पर पुरुषों की अपेक्षा अधिक बन्धन लगाने चाहिए। शूद्रों के मानव अधिकारों का अपहरण करना चाहिए। ऐसी अनुदारता पाषाण हृदय में ही होना संभव है सत्य का प्रेमी न्याय का उपासक अपने अंतःकरण की ग्रंथियों को खोल डालता है। वह स्वयं उच्च जीवन जीता है, इसलिए दूसरों के जीवन की भी कद्र करता है। टुच्चा आदमी स्वयं सड़ी हुई नालियों की रूढ़ियों में बुजबुजाता हुआ गर्हित जीवन बिताता है, इसलिए वह दूसरों की भी टाँग पकड़ कर नारकीय पराधीनता में सड़ने के लिए पीछे घसीटता है। वह दूसरों को तुच्छ समझता है। क्योंकि स्वयं तुच्छता में पड़ा हुआ है, वह दूसरों से घृणा करता है, क्योंकि उसने स्वयं अपनी आत्मा को घृणित बना रखा है।

आप टुच्चे मत बनिये, आप बढ़ रहे हैं उन्नति के पथ पर चल रहे हैं, इसलिए दूसरों को भी बढ़ने दीजिये। आप अपनी आत्मा को मुक्त बनाने के लिये प्रयत्नशील हैं। इसलिए दूसरों को भी स्वतन्त्रता का आनन्द लेने दीजिए। स्वयं बढ़िये और दूसरों को बढ़ने के लिए प्रोत्साहन कीजिये। आप महान बनिये दूसरों में महानता लाने का प्रयत्न करिए। पाठकों ! तुम ईश्वर के राजकुमार हो, इसलिए वैसा जीवन जीओ जो राजकुमारों के योग्य है। संसार के प्राणी तुम्हारे भाई हैं इसलिए उनके साथ अच्छा ही व्यवहार करो जैसा एक भाई दूसरे के साथ करता है। जिओ, प्रसन्नता पूर्वक जिओ दूसरों को भी उसी तरह जीने दो।


कुफ्र के खिलाफ जहाद करो

(कुरान की शिक्षा)

कुतिबा अलय कुमुऽल किताऽलु बहुवा कुर्दुल्ल कुम्----बल्लाहु यऊलमु व अन्तुम् ला तऊलम्न्!

-सूरये वकर 1/2/27

हे ईमान वालो! जहाद (धर्म युद्ध) तुम्हारा कर्तव्य नियत किया गया है और वह तुमको अनुचित, अप्रतीत होगा, परन्तु आश्चर्य नहीं एक वस्तु तुमको अनुचित प्रतीत हो और वह तुम्हारे निमित्त श्रेयष्कर हो और इसमें भी आश्चर्य नहीं कि एक वस्तु तुमको भली प्रतीत हो और वह तुम्हारे हक में बुरी हो। जिसे अल्लाह जानता है, उसे तुम नहीं जानते।

या अय्युऽऽल्लजीना आमन् कातिलुऽऽ ल्लजीना -----वाऽअलम अन्नऽल्लाहा मअऽल मुत्तक़ीन।

-सूरये तोवा 2/11/16/7

हे विश्वासियों! अपने आस पास के काफिरों से लड़ो और चाहिए कि तुम में दृढ़ता प्रकट हो। याद रखो, अल्लाह उन लोगों का साथी है, जो संयमी हैं।

वस्साऽरिकु वस्साऽरिकतु फ़क्तऊ जजा अन् विमा कसबानकाल ऽम्मिनल्लाहि। वल्लाहु अजीजुन हकीम्।

-सूये माइरा 2/6/6/4

जो कोई स्त्री अथवा पुरुष चोर होवें, तो उनके हाथ काट डालो, यह अल्लाह की ओर से उनके दुष्कृत्य का दण्ड है और अल्लाह बली और बुद्धिमान है।


अन्याय का विरोध

(महात्मा गाँधी)

सत्य को स्वीकार करने वाला व्यक्ति किसी की भी न्याय विरुद्ध और अत्याचारी आज्ञा नहीं मान सकता। ऐसा सत्याग्रह केवल सरकार ही के साथ नहीं वरन् स्वजाति और देश बन्धुवों के साथ भी किया जा सकता है। और करना चाहिए। सरकार की ही तरह समाज भी अनेक अवसरों पर उल्टे और अनुचित मार्गों का अनुसरण कर बैठता है। उस समय उसके अन्याय का विरोध करना आवश्यक है। नियमभंग का कर्तव्य (Duty of Civil disobience) पुस्तक के लेखक थोरो ने इसी तरह स्वजाति के ही विरुद्ध सत्याग्रह किया था। वह अपनी जाति वालों के गुलामों का व्यापार करना अन्याय कार्य समझता था। इसलिए उनके उस काम का विरोध करना उसने अपना कर्तव्य समझा। मार्टिन लूथर अकेले ही सम्पूर्ण जाति के विरुद्ध खड़े होने में विचलित न हुए। यह उनके सत्याग्रह का ही फल है कि जर्मनी आज दिन स्वतन्त्रता का उपयोग कर रहा है। गलेलियों ने स्वाजाति का विरोध किया था। उसके बन्धु जिस समय उसे मारने के लिए तैयार हुए उस समय भी उसने निर्भय होकर उनको जवाब दिया। उसने कहा मुझे मारो या छोड़ो पर पृथ्वी घूमती है और जरूर घूमती है। आज हम उसके वचनों का वेद वाक्य के समान आदर करते हैं। कोलम्बस को अपने साथी खलासियों के साथ सत्याग्रह करना पड़ा था। बेहद घबराये हुए खलासियों ने उससे कहा था कि तुम हमारी बात मानकर जहाज को घर की और लौटा लो, नहीं तो हम तुम्हें गोली मारकर खतम कर देते हैं।

क्योंकि आज अमेरिका मिलने की कोई आशा नहीं है। धीरे से कोलम्बस ने उत्तर दिया- कुछ परवाह नहीं, मैं निर्भय हूँ। अभी कुछ दिनों तक और प्रवास करना होगा। अन्त में अमेरिका मिला और कोलम्बस अमर हुआ।

उस समय अन्याय की बात कर्तव्य है। इस कर्तव्य को पालन के वचने का सत्व की रक्षा कर सकता है।


दुष्टता का नाश हो

(बाइबिल की वाणी)

पृथ्वी के न्यायी उठ! घमंडियों को बदल दे।

भजन संहिता 96/2/

दुष्ट की भुजा तोड़ डाल और दुर्जन की दुष्टता का लेखा तब लौं लेता जा जब लौं वह बनी रहे।

भजन संहिता 10/15

जो बड़ा क्रोधी है उसे दंड भोगने दे। क्योंकि यदि उसे तू बचा ले तो फिर फिर बचाना पड़ेगा।

भजन संहिता 19/19

जो गड्ढा खोदेगा वह उसमें गिरेगा और जो पत्थर लुढ़कायेगा वह उसी पर लुढ़क कर आयेगा।

26/27

मैंने दुष्ट को बड़ा पराक्रमी और ऐसा फैलता हुआ देखा जैसा कोई हरा पेड़ अपने निज देश में फैले। पर किसी ने उधर से जाते हुए क्या देखा कि वह है ही नहीं और मैंने उसे ढूँढ़ कर भी नहीं पाया।

भजन संहिता 37/35/36


अहिंसा और हिंसा

अहिंसा को शास्त्रों में परम धर्म कहा गया है, क्योंकि यह मनुष्यता का प्रथम चिन्ह है। दूसरों को कष्ट, पीड़ा या दुःख देना निःसंदेह बुरी बात है, इस बुराई के करने पर हमें भयंकर पातक लगता है। और उस पातक के कारण नारकीय रारव यातनायें सहन करनी पड़ती हैं। बौद्ध और जैन धर्म तो अहिंसा को ही संपूर्ण धर्म मानते हैं। अन्य धर्मों में भी अहिंसा के लिए बहुत ऊँचा स्थान है।

ऐसे प्रधान धर्म का पालन करने के लिए यह आवश्यक है कि उसके तत्वज्ञान पर एक विवेचनात्मक दृष्टि डाली जाय। हमें जानना चाहिए कि हिंसा क्या है। और दूसरों को दुःख की व्याख्या क्या है। किसी को दुख न देने की मोटी कहावत तो इतनी स्थूल है कि उसका आचरण करने पर एक घंटे भी कोई प्राणी जीवित नहीं रह सकता और एक दिन भी ऐसी अहिंसा काम में आने लगे तो सृष्टि सर्वनाश ही समझना चाहिए। सिंह, व्याघ्र और सर्प, बिच्छुओं को दुख न देने की नीति ग्रहण की जाय तो सहस्रों निरपराध प्राणियों के प्राण संकट में पड़ते रहें। हत्यारे और डाकुओं को न सताया जाय, तो समाज की सुख, शान्ति ही चली जावें जुँए, चीलर, रक्तजुँए, खटमल आदि को पाल कर रखा जाय, तो चैन से बैठना मुश्किल हो जाय। मक्खी, मच्छर, पिस्सू, बीमारियों के कीड़े फसल के शत्रु कीड़े आदि को न सताया जाय तो जीवनयापन होना कठिन है। शरीर के हिलने जुलने साँस लेने पानी पीने भोजन करने में अनिवार्यतः हिंसा होती है। इससे चार भाई भी उपाय नहीं है।

मूढ़ता के कारण अज्ञानी व्यक्ति जिन कार्यों को अहिंसा माने लेते हैं। असल में वह एक भ्रम मात्र है। जीवित पदार्थों में निरन्तर परिवर्तन हो रहा है कहा गया है कि जीवो जीवस्य भोजनम शाक अन्न दूध जल, वायु से जीवित प्राणियों को खाकर हम भी जीवित रहते है। ऐसी अनिवार्य हिंसा जो स्वाभाविक है,वह हिंसा नहीं कही जा सकती। अमुक शाक खाने में हिंसा हो जायगा या मुख पर पट्टी बाँधे बिना साँस लेने से हिंसा हो जायेगी। ऐसी सनक के लिए अपना समय और शक्ति बर्बाद करना व्यर्थ है क्योंकि यह अनिवार्य है। ढकोसले बनाने पर भी उसका बचाव नहीं हो सकता। मुँह पर पट्टी बाँध लेने से भी जीव पेट में पहुँचेगा, यह न पहुंचेंगे तो वह खुद ही मर जायगा।

बड़े बुद्धिमान, ज्ञानवान, शरीरधारी प्राणियों को दुख देने, दण्ड देने या मार डालने या हिंसा करने के समय यह विचारना आवश्यक है। कि यह दुख किस लिए दिया जा रहा है। सब प्रकार के दुख को पाप और सब प्रकार के सुख को पुण्य नहीं कहा जा सकता। गरीब भेड़ों के खून के प्यासे भेड़ियों को मार डालना न तो पाप है और न सर्प को दूध पिलाना पुण्य है। हिंसा अहिंसा की परिभाषा कष्ट या आराम के आधार पर करना एक बड़ा घातक भ्रम है। जिसके कारण केवल पाप का विकास और धर्म का नाश होता है।

एक आप्त वचन है कि- वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति अर्थात्- विवेकपूर्वक की गई हिंसा हिंसा नहीं है। अविवेकपूर्वक दूसरों को जो कष्ट दिया गया है वह हिंसा है। जिह्वा की चटोरेपन के लोभ में निरपराध और उपयोगी पशु पक्षियों का माँस खाने के लिए उनकी गरदन पर छुरी चलाना पातक है, अपने अनुचित स्वार्थ की साधना के लिए निर्दोष व्यक्तियों की दुख देना हिंसा है। किन्तु निस्वार्थ भाव से लोक कल्याण के लिए तथा उसी प्राणी के उपकार के लिए यदि उसे कष्ट दिया जाय, तो वह हिंसा नहीं, वरन्, अहिंसा ही होगी। डॉक्टर निस्वार्थ भाव से रोगी की वास्तविक सेवा करने के लिए फोड़े को चीरता है, एक न्यायमूर्ति जज समाज की व्यवस्था कायम रखने के लिए डाकू को फाँसी की सजा का हुक्म देता है, एक धर्म प्रचारक अपने जिज्ञासु साधक आत्म कल्याण के लिए तपस्या करने के मार्ग पर प्रवृत्त करता है। मोटी दृष्टि से देखा जाय तो डॉक्टर का फोड़ा चीरना जज का फाँसी देना, गुरु का शिष्य को कष्ट में डालना, हिंसा और अधर्म जैसा प्रतीत होता है। पर असल में यह सच्ची अहिंसा है। गुण्डे बदमाशों को क्षमा कर देने वाला हरामखोरों का दान देन वाला दुष्टता को सहन करने वाला, देखने में अहिंसक प्रतीत होता है। पर असल में वह घोर पातकी हिंसक और हत्यारा है। क्योंकि अपनी बुज़दिली और हीनता को अहिंसा की बेड़ी में छिपाता हुआ असल में वह पाजीपन की मदद करता है। एक प्रकार से अनजाने में दुष्टता की जहरीली बेल को सींचकर दुनिया के लिए प्राणघातक फल उत्पन्न करने में सहायक बनता है। ऐसी अहिंसा को जड़बुद्धि के अज्ञानी ही अहिंसा कह सकते है असल में तो वह प्रथम श्रेणी की हिंसा है।

यह सोचना गलती है कि दुख देना हिंसा और आराम देना अहिंसा है। तत्वतः काम के परिणाम और करने वाले की नियत के अनुसार हिंसा अहिंसा का निर्णय होना चाहिये। तात्कालिक और क्षणिक दुख-सुख में दृष्टि को अटकाकर उससे उत्पन्न होने वाले परिणाम की ओर से आँखें बन्द कर लेना बुद्धिमानी न होगी। किये हुए कार्य के परिणाम का गंभीरतापूर्वक सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने के उपरान्त उसके उचित या अनुचित होने का निर्णय करना चाहिए और उसी के आधार पर उस कार्य को हिंसा या अहिंसा ठहराना चाहिये।

विवेकपूर्वक पालन की जाने वाली अहिंसा में दंड देने की, शस्त्र प्रहार करने की युद्ध और संघर्ष करने की गुंजाइश है। एक विचारवान व्यक्ति नेक नीयती, परोपकार और धर्म भावना से अहिंसा धर्म के अनुसार दुष्ट को जान से भी मार सकता है और इसके लिए वह बिलकुल निष्पाप रहेगा। किन्तु एक कायर, बुज़दिल, अकर्मण्य और अशक्त व्यक्ति यदि अपना गलती को छिपाने के लिए कष्ट से डरकर अन्याय सहन करे तो वह अहिंसक कदापि नहीं होगा, बल्कि उसे सच्चे अर्थों में पातकी की और हिंसक कहा जायेगा। वास्तव में कायरता और हिंसा एक ही वस्तु के दो स्वरूप हैं। दोनों की जननी स्वार्थ बुद्धि है। वीरता और उदारता अहिंसा है। जो परमार्थ बुद्धि के कारण उत्पन्न होती है।

कथा-


अन्यायी की पराजय

हेमकूट राज्य के राजकुमार जीमूत बाहन अपने मित्रों के साथ समुद्र तट पर भ्रमण करते हुए गोकर्ण पर्वत पर पहुँचे। उन्होंने गुफाओं के निकट अस्थियों के बड़े बड़े ढेर लगे देखे तो अपने मित्र मित्रावसु से पूछा कि यह हड्डियों के ढेर किस प्रकार लगे हुए हैं। मित्रावसु ने उत्तर दिया- राजकुमार! यह ढेर निर्दोष नागों की अस्थियों के है। गरुड़ की नाग वंश से पुरानी शत्रुता है, वे अपने बल के अभिमान में आकर दोषी या निर्दोष किसी नाग को पावे, उसका ही काम तमाम कर देते हैं। नाग निर्बल हैं, गरुड़ की शक्ति बढ़ी हुई है। बेचारे नाग गरुड़ के मुकाबले में ठहर नहीं पाते। इसलिए उन्होंने सब समझौता कर लिया है। बारी-बारी प्रतिदिन एक नाग गरुड़ के द्वारा वध होने के लिए इस पर आता है। और अपने प्राण देकर उनकी कोप ज्वाला को शान्त करता है।

जीमूत बाहन बड़े दयालु थे। दया से उनका हृदय ओतप्रोत था। निरपराध नागों का इस प्रकार दमन होता सुनकर इनका जी पिघल गया और करुणा से आँखें भर आई। राजकुमार के पास गरुड़ को परास्त करने की शक्ति न थी। फिर भी उनका क्षत्रिय अन्तःकरण अन्याय को सहन न कर सका। उसने निश्चय किया कि अन्याय के विरुद्ध अपने प्राण दे दूँगा। शास्त्र कहता है कि अन्याय से युद्ध करो। धर्म युद्ध में कभी पराजय नहीं होती, यदि अन्यायी को परास्त किया तो कीर्ति मिलती है। और स्वयं परास्त हुए तो स्वर्ग मिलता है। यह सोचकर राजकुमार ने निश्चय कर लिया कि नागों का पक्ष लेते हुए गरुड़ से धर्मयुद्ध करूंगा।

नाग माता विलाप कर रही थी कि हाय मेरे इकलौते बेटे शंखचूड़ को आज गरुड़ की कोप ज्वाला में अपना प्राण देना होगा। बेटे को छाती से चिपटाकर वह मर्म भेदी करुणा क्रन्दन कर रही थी, जिसे सुन-सुन कर जीमूत बाहन का कलेजा फटा जा था। राजकुमार ने निकट आकर कहा माता आपका विलाप मुझ से नहीं सुना जाता। आपके शंखचूड़ को बचाने के लिए मैं अपना प्राण देने को तैयार हूँ। आप अपने बेटे को अपने पास आनन्द से रखिए, आज मैं गरुड़ के अत्याचार का भोजन बनूँगा।

नाग माता अपने पुत्र के बदले में दूसरे के पुत्र को मरना स्वीकार करने के लिए किसी प्रकार तैयार न हुई। उसने स्पष्ट कह दिया हे दयालु नवयुवक, मैं मोहग्रस्त होकर इतनी स्वार्थान्ध नहीं हो गई हूँ कि शंखचूड़ के बदले तुम्हारे प्राण जाना स्वीकार करूंगी। मेरा पुत्र अपना कर्तव्य पालन करने से पीछे न हटेगा शंखचूड़ माता की पदरज सिरपर धरकर उठा और गोकर्ण पर्वत की प्रदक्षिणा देकर नियत स्थान के लिए चल दिया। जीमूत बाहन ने यह अच्छा अवसर देखा। नाग वेश बना कर शंखचूड़ से पहले ही गरुड़ के स्थान पर पहुंच गये। गरुड़ ने तुरन्त उस पर आक्रमण किया और अंग विदीर्ण करने लगे। लेकिन गरुड़ को आश्चर्य हुआ कि निर्बल नाग जैसे अपने कष्ट के समय धैर्य खोकर बुरी तरह रोते चिल्लाते हैं। वैसे यह आज का नाग क्यों नहीं चिल्लाता। गरुड़ जानते थे कि विपत्ति के समय धैर्य न खोने वाले और कष्ट आने पर विचलित न होने वाले वीर जिस जाति में पैदा हो जाते हैं। उस पर कोई बलवान अधिक समय तक अत्याचार नहीं कर सकता। आशंका से गरुड़ का मन भयभीत हो गया वे आज के शिकार को उलट कर देखने लगें।

इतने में शंखचूड़ आ पहुंचा। उसने अपने स्थान पर किसी दूसरे को देख कर पुकारा -अरे, अरे यह क्या अनर्थ हो गया। मेरी जगह उसी उपकारी के प्राण चले गये। गरुड़ बड़े असमंजस में पड़े, उन्होंने ध्यानपूर्वक देखा तो प्रतीत हुआ कि हेमकूट राज्य के महात्मा राज कुमार जीमूत बाहन ने दयार्द्र होकर परोपकार में अपने प्राण दे दिये।

महात्मा जीमूत बाहन का मृत शरीर भूमि पर पड़ा हुआ था, शंखचूड़ की आँखें बरस रही थी गरुड़ के कलेजे में हजार-हजार बिच्छू काटने की पीड़ा होने लगी। विश्व में ऐसी विभूतियाँ हैं, जो दूसरों की भलाई के लिए अपने प्राण दे देते हैं। एक मैं हूँ जो तुच्छ सी शत्रुता के कारण अनेक निर्दोषों का वध करता हूँ। गरुड़ खड़े न रह सके, पापी के सामने जब उसका वास्तविक चित्र आता है। जब वह आत्म निरीक्षण करता है। तो उसके पैर काँपने लगते हैं। गरुड़ आत्मधिक्कार की प्रताड़ना से व्याकुल होकर शिर धुनने लगे।

उन्होंने जीमूत बाहन का रक्त हाथ में लिया और पूर्वाभिमुख होकर सूर्य को साक्षी देते हुए प्रतिक्षा की कि भविष्य में अहंकार के वशीभूत होकर अन्याय करने पर उतारू न हूँगा। उस दिन से उन्होंने नागों के साथ अपना सारा बैर विरोध त्याग दिया।

जीमूत बाहन का मृत शरीर धूलि में लोट रहा था, परन्तु यथार्थ में यह उनका विजय सिंहासन था पुराना पापी गरुड़ मर गया था, शरीर वही था, पर अब उसमें परिवर्तित गरुड़ की पवित्र आत्मा निवास करने लगी थी।


धर्म युद्ध-महान तप

धर्म युद्ध करना एक प्रकार का तप है, जो हमारे पाप तापों को धोकर पवित्र कर देता है। यह अग्नि देखने में तीखी, झुलसाने वाली, कष्ट-कर और अप्रिय लगती है, पर अन्त में यही सब से हितकर सिद्ध होती है। सोना अग्नि में पड़ने के बाद अपनी प्रमाणिकता सिद्ध करता है, हथियार होता है। जीवन को धर्म युद्ध के तप में डाले बिना उसमें तीक्ष्णता, पवित्रता और महानता नहीं आ सकती। तप से ही वह तेज प्राप्त होता है, जिसके कारण मानव जीवन कुन्दन जैसा झिलमिलाता है। संघर्ष ही जीवन है। दो वस्तुओं के रगड़ने से गर्मी पैदा होती है। सत्संग से ज्ञान प्राप्त होता है, और युद्ध से महत्व प्राप्त होता है। जिसमें गति है वही जीवित है। शिथिलता और निष्क्रियता का नाम ही मृत्यु है। वे ही व्यक्ति जीवित कहे जायेंगे जो कर्तव्य क्षेत्र में सिपाही की तरह संग्राम करते हैं। जिन्होंने ढाल तलवार उतार कर रख दी वे मृतक नथओं में से साँस चलती रहे।

गीताकार ने जीवन को धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र की उपमा दी है। इसमें पाण्डवों को धर्म पक्ष की और कौरवों के, अधर्म पक्ष की सेनाएं मुकाबले में डटी हुई हैं। सुखाकाँक्षी मन अर्जुन मोह में पड़ कर कहता है, इस झंझट में पड़ने से मुझे क्या काम? युद्ध का काम अप्रिय है, इसमें ऐसे काम करने पड़ते हैं, जो देखने में कडुए और कठोर जान पड़े। अर्जुन इन कठोर कर्म से बच कर भिक्षा माँग खाने का सरल कार्य पसन्द करता है उसके मन में छिपी हुई कायरता लड़ाई तकरार से अलग रहने का तर्क करती है। मन की इस कमजोरी को आत्मा देखती है और उसकी विडम्बना के लिए धिक्कार देती है। भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते है -हे क्षत्रिय! तेरे लिए धर्म युद्ध से बढ़कर और कोई कर्तव्य नहीं है। यह सोच विचार मत करे, कि इस लड़ाई में कौन मारा जायगा, कितनी विधवाएँ होंगी, क्योंकि यह सब तो दुनिया में होता ही रहता है। धर्म युद्ध के बिना तो यह सब जीवित भी मृत हो जायेंगे। पृथ्वी पापों के भार से लद जायगी। इसलिए हे परन्तप! युद्ध में प्रवृत्त हो, इस में जीतने से तेरी कीर्ति है और मरने पर स्वर्ग लोक है। अर्जुन रूपी मन की समस्त बातूनी जमा खर्च को काटते हुए योगेश्वर ने उसे युद्ध में प्रवृत्त होने को बाध्य किया है। करते भी क्यों न, जिस दिन मन का क्षत्रिय धर्म नष्ट हो जायगा उस दिन यह पृथ्वी प्रलय की गोद में चली जायगी।

राम के सामने यह प्रश्न उपस्थित होता था कि एक सीता के लिए रावण के इतने बड़े वंश को नष्ट क्यों करूं? अर्जुन के सामने भी यही प्रश्न आया कि अपने साथ हुई अनीति के बदले में कौरवों की इतनी बड़ी सेना को क्यों मारूं? यदि राम या अर्जुन धर्म युद्ध न करते, तो बुराई की चिनगारी कुछ समय बाद ऐसी विकराल दानव बन जाती कि असंख्य सीताओं और असंख्य पाण्डवों को उसमें जलना पड़ता और उसका पातक इन धर्म युद्ध न करने वालों को लगता।

विकार, अधर्म, अनाचार से प्रतिक्षण युद्ध करना हमारा स्वाभाविक धर्म है। विरोध और असहयोग का ईश्वरीय आदेश है। नाक में गर्द गुवार जमते ही छींक आती है, जो उसे बाहर निकाल फेंकती है, पेट में मल मूत्र की अधिकता होती है, शरीर उसे अलग कर देता है, आँखें अपने विकार को कीचड़ के रूप में, इसी प्रकार नाक, कान, और मुँह में जो मैल जमा होता है, वह रेंट, कीट और थूक के रूप में बाहर निकलता रहता है। खून में विष जमा हो जाय तो शरीर की सैन्य शक्ति उबल पड़ती है और उसे फोड़े फुन्सियों के रूप में बाहर खदेड़ देती है, वैसे तो यह कार्य पसीने के रूप में हर वक्त होता रहता है। शरीर शास्त्री जानते हैं, कि रक्त के श्वेत कीटाणु बाहर के विजातीय पदार्थों, विषों तथा रोग कीटों से निरंतर लड़ते रहते हैं। जहाँ विकार पैदा हुआ कि यह धर्मवीर लड़ने पहुँचे। जिसके शरीर से यह श्वेत कीट नष्ट हुए तब से उसकी मृत्यु ही समझनी चाहिए। इसी प्रकार हमारा मानसिक धर्म है कि अपनी निज की तथा दूसरों की पाप वासनाओं से निरंतर लड़े। हर वक्त लोहा बजावें और शूरवीर सिपाही की तरह धर्म युद्ध में वीर गति प्राप्त करें जिसके मन से यह पाप विरोधिनी शक्ति निकल गई समझना चाहिए कि अब यह मानवीय चैतन्यता को त्याग कर पतित जड़ योनियों में गिरने जा रहा है। जिस देश या जाति की यह धर्म युद्ध भावना नष्ट हो गयी समझना चाहिए कि अब इसे गरीबी और गुलामी की नारकीय यंत्रणाएं सहनी पड़ेगी। संघर्ष जीवन है और अकर्मण्यता मृत्यु संग्राम स्वर्ग है और निष्क्रियता नरक। मनुष्य का स्वाभाविक कर्तव्य यह है कि वह पाप का हर घड़ी विरोध करे तभी तो धर्म को धारण करने में समर्थ होगा।

आप अपने जीवन को संग्राम समझिए। अपने आस-पास जहाँ कहीं भी पाप शत्रुओं को पावे उनका मूलोच्छेदन के लिए तत्पर हो जावें। हो सकता है इससे आपको उलझन, कष्ट, कठिनाई और आपत्ति का सामना करना पड़े। परंतु एक सच्चे शूरवीर का कर्तव्य यही है कि धैर्यपूर्वक उन्हें सहन करे साथ अंगीकार करें। विश्व की विपत्ति निवारण के लिए उस आपत्ति को अपने सिर पर ले लेना, दूसरों को खाने वाली राक्षमी से स्वयं ही लड़ पड़ना पहले दर्जे का धर्म कार्य है। धर्मयुद्ध महान तप है। इस तप को स्वीकार करने से हम विश्व की महान सेवा कर सकते हैं।


दुष्टों पर दया मत करो

(महात्मा शेखसादी)

दुष्टों पर दया करना सज्जनों के ऊपर जुल्म करना है। जालिम को माफ करना सताये हुओं पर जुल्म करना है। अगर तुम कमीनों के साथ मेलजोल रखोगे और उन पर मेहरबानी करोगे तो वे तुम्हारी हिमायत से अपराध करेंगे और तुमको उनके अपराधों में हिस्सेदार बनना पड़ेगा।

जो सख्श दुष्ट को मार डालता है वह दुनिया को उसकी दुष्टताओं से बचाता है और अपने को ईश्वर के कोप से छुड़ाता है क्षमा, प्रशंसा योग्य है, तथापि अत्याचारी जालिम के जख्म पर मरहम न लगाओ। जो साँप की जात को बख्शता है वह यह नहीं जानता कि मैं आदम की औलाद को नुकसान पहुँचाता हूँ।

एक जवान ने अपने पिता से पूछा आप बुद्धिमान है, अपने अनुमान से मुझे कुछ उपदेश दीजिये। उसने उत्तर दिया सीधेपन और भलमनसाहत से काम ले मगर इतना सीधा न बन कि लोग तेरा अपमान करें और भेड़िये के से तेज दांतों से तुझे काट खावें

अत्याचारी से बढ़कर अभागा और कोई नहीं है क्योंकि विपत्ति के समय कोई उसका दोस्त नहीं होता।

अगर पत्थर हाथ में हो और साँप पत्थर के तले हो उस समय पशोपेश करना और देर करना बेवकूफी है। चीते के तेज दांतों पर रहम करना भेड़ों पर जुल्म करना है।

भले आदमियों को दुष्टों की गुस्ताखी और लापरवाही की दरगुजर न करनी चाहिए क्योंकि इससे दो नुकसान होते हैं एक तो भलमनसाहत का अपमान होता है। और दूसरे मूर्खता को बढ़ावा मिलता है।

कथा-


गुरु की सीख

वह पठान बालक गुरु गोविन्द सिंह को प्राणों की तरह प्यारा था। बड़े लाड़ प्यार से सदा अपने पास उसे रखते थे। वह भी गुरु से वैसा ही स्नेह करता था। जैसा बालक अपने पिता पर करता है।

भक्त लोग कहा करते थे- “गुरु जी! आप यह क्या कर रहे हैं। सिंह का बच्चा बड़ा होने पर काटने ही दौड़ेगा।” गुरु जी हँस कर यह कहते हुए उनकी बात टाल देते - “फिर इसमें बुरा क्या है। सिंह को सिंह ही तो बना रहा हूँ।”

गुरु ने अपने जीवन का स्नेह पिलाकर उस पठान बालक को बड़ा किया। अब वह बड़ा हो चुका था। अठारहवाँ वर्ष समाप्त होते-होते जवानी का लहू उसकी नसों में दौड़ रहा था। गुरु जी के सभी लड़के मुसलमानों के खिलाफ युद्ध करते हुए एक-एक करके मर चुके थे यह पठान युवक ही अब उनकी आँखों का तारा था।

एक दिन युवक ने गुरु जी के चरण स्पर्श करते हुए कहा पिता जी कब तक आपके ऊपर भारी बनकर बैठा रहूँ अब मैं बड़ा हो गया हूँ आज्ञा दीजिए कि मैं उद्योग करके कुछ कमाऊँ।

गुरु जी की आँखों में उल्लास की एक बिजली दौड़ गई। उन्होंने उसे पुचकारते हुए कहा पुत्र! तुम जो कहते हो सो उचित ही है। पर अभी मुझे तुम्हें एक अन्तिम शिक्षा जो देनी है। कल प्रातः काल मेरे साथ एकान्त वन में चलना वहीं वह शिक्षाएँ दूँगा, जिसके लिए तुम्हें पाल कर इतना बड़ा किया हैं युवक ने उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर ली।

दूसरे दिन प्रातःकाल उस पठान युवक को साथ लेकर गुरु गोविन्द सिंह एकान्त वन में चलें। उन्होंने अपनी तलवार उतार कर उसके कंधे में डाल दी और एक नदी तट पर साल के एक विशाल वृक्ष के नीचे जा पहुंचे।

सघन वन की निस्तब्धता को चीरते हुए गुरु जी ने कहा बेटा इस स्थान को खोदो। उनके उँगली के इशारे से बताये हुए स्थान को युवक चुपचाप खोदने लगा। कुछ गहरा खोदने पर एक पत्थर निकला। जिस पर बहुत से लाल रंग के धब्बे लगे हुए थे युवक ने उस पत्थर को ले जा कर गुरुजी के सामने रख दिया।

उन्होंने कहा बेटा देखते हो इस पत्थर पर लाल निशान है, क्या तुम जानते हो कि यह निशान कैसे है? युवक ने उत्तर दिया- ‘पिता जी! मैं नहीं जानता।’

अच्छा तो सुनो! गुरुजी ने कहा यह तुम्हारे पिता के रक्त के दाग हैं। एक व्यक्ति ने तुम्हारे पिता को यहीं इसी स्थान पर तलवार से मारा था उसके रक्त से सना हुआ यह पत्थर मैंने इसलिए दवा कर यहाँ गाढ़ दिया था कि जब तुम बड़े होगे तो अपने पिता के हत्यारे का बदला लोगे। तुम्हें मैंने इसीलिये पाला है कि पिता के खून का बदला चुका कर पितृ ऋण से मुक्ति पाओ। बताओ क्या तुम्हारी धमनियों में पिता का रक्त है? पिता के हत्यारे से बदला लेने योग्य तुम्हारी भुजाओं में साहस है। बदला लेने के लिए व्याकुल स्वर्गस्थ पिता की आत्मा को उस हत्यारे के रक्त से तृप्त न करोगे ?

युवक की भुजाएं फड़कने लगी उसके नथुने फूलने लगे, क्रोध से आँखों में लाली झलक आई उसने कहा पिता जी अवश्य बदला लूँगा। आप उस हत्यारे का नाम तो बताइये, अब वह जीवित न रह सकेगा।

गुरु जी की बाछें खिल गई। उन्होंने कहा फिर विचलित तो न होगे? कुछ आगा-पिछा तो न सोचोगे ? सोचो तो पहले ही सोच लो नाम पूछने के बाद तो तुम्हें उस पर तलवार चलानी ही पड़ेगी। युवक ने भुजाएं ऊँची उठा कर शपथ खाई कि चाहे वह ईश्वर ही क्यों न हो, उसे जीवित न छोड़ूंगा, पिता जी आप उस दुष्ट का नाम शीघ्र ही बताइए।”

गुरु जी ने उसके सिर पर हाथ फिराते हुए आशीर्वाद दिया-’वत्स, तेरा कार्य पूरा हो। म्यान में से तलवार खींच, मैं ही वह हत्यारा हूँ, जिसने तेरे पिता ही हत्या की थी।

युवक के पाँवों के नीचे से जमीन निकल गई। म्यान में से खींची हुई तलवार जहाँ की तहाँ रह गई वह किंकर्तव्यविमूढ़ पाषाण शिला की तरह खड़ा रह गया। गुरु जी ने देखा कि लड़का शिथिल होने वाला है। उन्होंने ललकारते हुए कहा-कायर! शरीरों से रिश्ता जोड़ता है। अपनी प्रतिज्ञा को याद कर, कर्तव्य को याद कर, पिता की याद कर और तलवार को चलाने में क्षण भर की भी देर न कर।’

इस ललकार ने पठान रक्त में बिजली कौंधा दी, उसने यन्त्र चालित पुर्जे की तरह गुरु जी पर तलवार का प्रहार किया और उन्हें मरणासन्न दशा में छोड़ कर भाग गया।

संध्या तक गुरु जी वापिस न पहुँचे, तो शिष्यों को आशंका हुई वे पद चिन्हों को खोजते हुए उस स्थान पर पहुँचे। देखा कि गुरु जी मृत्यु के निकट की पहुँच चुके हैं। शिष्यों की आँखों में आंसू भर आये, उन्होंने पूछा-’प्रभो! आपने यह क्या किया? गुरुजी ने कहा-’पुत्रों! मैंने तुम्हें अपनी अन्तिम सीख दे दी।’ यह सीख मैंने रक्त के अक्षरों में लिखी, जिससे कि तुम लोग इसे भूल न जाओ और अपनी पितृ भूमि में रक्त पान करने वालों से भरपूर बदला ले लो।’ यह कहते-कहते गुरुजी ने अपनी आँखें बन्द कर लीं।

निविड वन के घने अन्धकार में शिष्यगण गुरु गोविन्दसिंह के मृत शरीर को पीठ पर लाद कर ले जा रहे थे, रात्रि की नीरस भयंकरता को चीरता हुआ बीच में कोई-कोई वन्यपशु बोल जाता था-मानो शिष्यों को बार-बार याद दिलाता हो कि गुरु वर को भूलना मत।


बन्दी की वेदना


बन्दी की वेदना

खोलो, मेरे बन्धन खोलो!

हाय! मौन बन अब न सताओ, बोलो, मुझसे बोलो।

वह प्रभात की स्वर्णिम रेखा नभ में नक्षत्रों का लेखा

रजत रश्मियों को कब देखा

देखा था, युग से बीते हैं, यह आकुलता तोला-

अब तो मेरे बन्धन खोलो!

पत्थर की इन दीवालों में विजडित लोहे के तालों में

व्यथितों की आहों-नालों में-

पलता हूँ, है यही दया बस ‘सो लो चाहे रो लो’-

कब तक?................कोई बन्धन खोलो!

मैं जग देखूँ जिय हुलसाऊं तट पर सन्ध्या गीत सुनाऊं

तन से मुक्त पवन छू पाऊं

चार पलों के लिये मुक्ति दो, पी लूँगा विष घोलो-

सुन लो कोई बन्धन खोलो!

-श्री द्विजेन्द्रनाथ मिश्र ‘निर्गण’


दुर्बलता का पातक

विश्व में जितने भी महानतम पाप हैं उनमें दुर्बलता का सबसे बड़ा पाप है। गौहत्या, ब्रह्महत्या, बालहत्या आदि बड़े-बड़े पापों का वर्णन किया जाता है, पर दुर्बलता उन सबसे बढ़कर है क्योंकि यह समस्त पापों की जननी है। अत्याचार करने वाला जितना पापी है उससे अधिक पातकी वह है जो अत्याचार सहता है। फारसी की कहावत है कि-”जालिम का बाप बुज़दिल” दुर्बलता में ऐसी उत्पादक शक्ति है कि वह जालिम को सात समुद्र पार से न्योत कर बुला लाती है। बेइन्साफी, कायरता की सहेली है। वह छाया की तरह पीछे फिरती है, जहाँ कमजोरी रहेगी वहाँ कोई न कोई बेइन्साफी करने वाला जरूर पहुँच जायगा।

भेड़ की ऊन देखकर सबका मन उसे लेने को करता है पर रीछ के बालों की ओर किसी को आँख उठा कर देखने की हिम्मत नहीं होती, गाय का दूध दुहने के लिए हर कोई तैयार रहता है पर बाघिन का दूध लेने की किसी की रुचि नहीं होती। बकरी का माँस प्यारा लगता है पर सिंह की ओर छुरी लेकर कोई नहीं चलता। जमींदार, साहूकार, पटवारी, दरोगा, दीवान आदि का जुल्म गरीब और भोले भाले लोगों पर ही होता है सशक्त और समझदारों के सामने तो उनकी नानी मर जाती है। बीमारी और अकाल मृत्यु का आक्रमण प्रायः दुर्बलों पर ही होता है। गुण्डे, उचक्के, ठग, बदमाशों की घात प्रायः कमजोरों पर ही चलती है।

यदि कोई दूसरा न सतावे तो स्वयं उनका आपा ही सताने लगता है। सुन्दर-सुन्दर भोग विलास की वस्तुएँ सामने रख दी जावें तो वे दूसरों को जहाँ प्रसन्नता का कारण होती थीं, उस बेचारे को दुख देने लगती हैं। खीर, पूआ, हलुआ पूड़ी, खाने पर या तो पेट फूल जाता है या दस्त लग जाते हैं। स्वरूपवती सुन्दर स्त्री उसको भार स्वरूप तिरस्कार करने वाली, और शत्रुवत प्रतीत होती है। गाना बजाना, सुनने से सिर में दर्द होता है और नाच तमाशा देखते-देखते आँखों में पानी भर आता है। रुपया पैसा हुआ तो चोर, दुश्मन, घाटे आदि का भय लगा रहता है और रात को पूरी नींद सोना हराम हो जाता है। क्रोध, झुँझलाहट, निराशा, चिन्ता, तृष्णा, अप्रसन्नता आदि के कारण स्वयं ही दुख पाता रहता है, व्यसन और बुरी आदतें अपने आप अपने से लगाता है और उनसे उत्पन्न होने वाले कष्टों को सहता है। कई बार तो ऐसे कष्ट चिपट पड़ते हैं जिनका कोई अस्तित्व नहीं होता। कल्पित शंका की डायन और भय का भूत मन में से अपने आप उपजते हैं और नाना प्रकार के उपद्रव करते हैं। रात में झाड़ी का भूत बन जाता है और कई बार उसके डर से प्राण तक निकल जाते देखे गये हैं। इस प्रकार एक नहीं अनेक आपत्तियाँ न जाने कहाँ-कहाँ से उत्पन्न होकर उसे दुख देने के लिए आ खड़ी होती हैं। यह विचारणीय प्रश्न है कि बेचारे गरीब और कमजोरों पर ही यह आपत्तियाँ क्यों आती हैं? ईश्वर इन गरीबों की सहायता क्यों नहीं करता? हमें जानना चाहिए कि ईश्वर को अपने सब पुत्र समान रूप से प्रिय हैं। वह किसी के साथ बेइन्साफी नहीं करता पर साथ ही किसी को पाप का दंड दिये बिना भी नहीं छोड़ता। ईश्वर ने मनुष्य को सम्पूर्ण योग्यताएं और शक्तियाँ देकर इस संसार में निर्भयतापूर्वक विचरण करने के लिए भेजा है। विश्व का कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं है जो उसे प्राप्त न हो सकता हो। ऐसा सर्वसंपन्न शरीर और मन देने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करे। जो व्यक्ति अपने शरीर और मन का दुरुपयोग करके उसको क्षीण एवं अशक्त बना लेता है वह एक प्रकार से ईश्वर की अमानत में खयानत करने वाला, उसे अपने दुष्कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ेगा। दुर्बल मनुष्य दो प्रकार से पापी हैं एक तो वह ईश्वर की अमानत में खयानत करता है, दूसरे अत्याचारियों को पैदा करता है। यदि उसमें विरोध करने की शक्ति हो तो अभ्यास उत्पन्न ही न हो, यदि हो तो वह कुछ ही क्षण जीवित रहकर मृत्यु के लिए विवश हो जाय।

मनुष्य का सबसे प्रथम धर्म यह है कि वह दुर्बलता को हटाता हुआ शक्ति संचय करे। शरीर को बलवान बनाना चाहिए, उसे निरोग और स्वस्थ रखने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए। यह कार्य कुछ भी कठिन नहीं है, वरन् प्राकृतिक धर्म होने के कारण अत्यन्त ही सरल है शरीर पर जुल्म करना यदि हम छोड़ दें तो वह अपने आप स्वाभाविक गति से निरोग और स्वस्थ रह सकता है। अखण्ड ज्योति कार्यालय की स्वस्थ और सुन्दर बनाने की विद्या’ नाम की पुस्तक जिन्होंने पढ़ी है वे भली भाँति जानते हैं कि शरीर अपने आप स्वस्थ बनने के लिए प्रयत्नशील रहता है। बीमार और कमजोर तो हम उसे मार-मार कर बनाते हैं। इसी प्रकार मन का स्वभाव अपने आप उन्नति करना है। मन को यदि रूढ़ियों, कुविचारों, स्वार्थ, भय, घृणा, लोभ, द्वेष और अहंकार के भार से न दबाया जाय तो वह अपने आप उन्नति करता हुआ सबल हो सकता है।

स्मरण रखिए दुर्बलता सबसे बड़ा पाप है। कुत्ते की जिन्दगी जीना और कीड़े की मौत मर जाना मनुष्यता का सबसे बड़ा अपमान है। आप अपने प्राथमिक धर्म को पहचानिए, सब काम छोड़ कर सबसे पूर्व दुर्बलता को हटाने में लग जाइये। क्योंकि यह राक्षसी जब तक अन्दर बैठी रह कर आप के शारीरिक और मानसिक बल को खाती रहेगी तब तक आप पनप न सकेंगे और दुनिया का आनन्द प्राप्त करना तो दूर, चैन से जीने योग्य स्थिति भी उपलब्ध न कर सकेंगे, मनुष्य के लिए ईश्वर की सबसे प्रथम आज्ञा है कि वह ‘निर्बलता’ को अलग हटावें, पाठकों आप यदि उन्नति के पथ पर बढ़ने को उत्सुक हैं तो सबसे प्रथम दुर्बलता का पाप भार अपने सिर पर से हटा कर दूर फेंकने का प्रयत्न करें।


पतित की आकाँक्षा


पतित की आकाँक्षा

माँ, कैसे कह दूँ, मानव हूँ,

सुध-बुध अपनी खोई मैंने,

इन हाथों से ही लहरों में,

अपनी नाव डुबाई मैंने।

रहा किसी दिन मैं भी मानव,

अब हूँ पशुता से भी नीचे,

स्वत्वहीन हूँ, सह लेता हूँ,

सब सुख-दुख निज आँखें मींचे।

बोल रहा हूँ मैं डर कर,

बोलूँ यह अधिकार कहाँ है?

सुख-दुख कहना, रोना आफत,

यह मनुआ लाचार यहाँ है?

अब सपने से मेरे वे दिन,

अब अपना जीवन का वैभव

आज बंधा हूँ मैं कफनी में,

जिन्दा ही मैं आज बना शव।

जीते जी मारना यह कैसा माँ,

यह दुर्गति सह न सकूँगा,

मुझ में दो जीने की ताकत,

मैं यों मुर्दा रह न सकूँगा।

-श्री कमलेश्वरी प्रसाद नायक।


अन्याय का निवारण

यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि न्याय की रक्षा शक्ति द्वारा ही हो सकती हैं। अन्याय तम से उत्पन्न होता है और तम सब से अधम तत्व होने के कारण प्रायः उच्च आध्यात्मिक प्रेरणाओं से प्रभावित नहीं होता। उसे दण्ड का भय ही काबू में रख सकता है। पशुओं से प्रार्थना करना बेकार है, वे न तो उसे समझ सकते हैं और न उस पर ध्यान दे सकते हैं। क्षमा को उत्तम धर्म कहा है, पर क्षमा तो यही कही जा सकती है जो बलवान व्यक्ति निर्बल पर करता है। असल में वह क्षमा भी एक प्रकार का दंड ही है। अपराध करने पर यदि बलवान, दंड नहीं देता, तो भी निर्बल के मन पर एक प्रहार होता है, जो शारीरिक चोट की अपेक्षा अधिक कारगर होता है। किन्तु यदि कोई निर्बल व्यक्ति बलवान आततायी को क्षमा करे तो वह केवल एक ठट्ठा की बात होगी। यह क्षमा कुछ नहीं अपनी अशक्ता को छिपाने का एक थोथा बहाना है। इस क्षमा का किसी पर कुछ असर नहीं हो सकता और न उसे धर्म ही कहा जा सकता है।

प्राणियों के अन्दर छिपी हुई पशुता के कारण अन्याय की सृष्टि होती है। इस पशुता पर नियंत्रण शक्ति द्वारा ही हो सकता है। हो सकता है कि आप अहिंसा धर्म के कट्टर अनुयायी हो और किसी को दंड देना पसन्द न करते हो, पर वह अहिंसा धर्म भी बल के द्वारा ही पालन हो सकता है। अशक्तता को छिपाने के लिये यदि अहिंसा का बहाना ढूँढ़ा जाय तो वह आत्मवंचना ही हो सकती है। बलवान व्यक्ति ही अहिंसक कहे जावेंगे। उनकी अहिंसा इसलिये सफल हो जाती है कि उनके पास शक्ति का स्त्रोत भरा पड़ा है। विरोधी को उसका भय रहता है कि कहीं इसका उपयोग मेरे ऊपर हो गया तो नष्ट हो जाऊँगा। शरीर बल, बुद्धि बल, सहायक बल, धनबल, आदि को देखकर विरोधी लोग अपने आप काँप जाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि सामने वाले में ताकत भरी हुई है, उसका एक झटका भर मुझे होश में ला सकता है। इसीलिए बलवान व्यक्ति कई बार शक्ति का बिलकुल प्रयोग न करके अहिंसक बना रहता है। बिना बल प्रयोग के भी उसके बहुत से कार्य सिद्ध हो जाते हैं। लाठी न मारने पर भी लाठी को हाथ में देख कर पशु को भय बना रहता है और उसके प्रदर्शन मात्र से डर कर ठीक रास्ते पर चलता है।

संसार त्रिगुणमय है। इसमें पाप, अधर्म और अन्याय भी रहता है। जब तक तम तत्व है तब तक पशुता और उससे उत्पन्न होने वाला अन्याय भी रहेगा। उसका जरा मूल से नाश नहीं किया जा सकता है, उसके कुप्रभाव से बचने का प्रबन्ध किया जा सकता है। शीत को मिटा देना कठिन है, परन्तु वस्त्र और अग्नि की सहायता से उसके कुप्रभाव से बचना आसान है। ग्रीष्म के जलते हुए ताप को शीतल नहीं किया जा सकता, पर छाया, जूता, छाता, पंखा आदि की सहायता से उसकी प्रचंडता से बचना सुलभ है। संसार में अन्याय को दूर भगा देना आसान है। संसार में बड़े-बड़े सिंह, व्याघ्र, सर्प पड़े हुए हैं, तो भी हम लोग इसके शिकार होने से बचे रहते हैं। इसी प्रकार अन्याय से बचे रहना संभव है, भले ही वह दुनिया में पूर्ण रूप से नष्ट न हो।

अशक्तता कमजोरी स्वयं वह पदार्थ है जिसके आस-पास कहीं न कहीं से अन्याय आ ही बैठता है। मिठाई के पास मक्खियाँ और चींटियां कहीं न कहीं से आ ही जाती हैं। मुर्दे का माँस देखते ही सुदूर आकाश में उड़ते हुए चील, कौए नीचे उतर आते हैं। इस प्रकार जहाँ कमजोरी होती वहाँ खून पीने के लिए दुष्टता हजार कोस से आ धमकेगी। भेड़ की ऊन काटने के लिए किसी न किसी गड़रिये की कैंची जरूर चलेगी।

हिंसक, चोर, लुटेरे, लुच्चे, गुण्डे, ठग और ढोंगियों को उत्पन्न करने वाली जननी ‘कमजोरी’ है। यह बात समझ लीजिये, अच्छी तरह गाँठ बाँध लीजिये, मस्तिष्क के आखिरी पर्दे पर लिख लीजिए कि अन्याय कमजोरी के कारण होता है।” आप बीमार हैं, बुद्धिहीन हैं, निर्धन हैं, अपमानित हैं, अछूत हैं, गुलाम हैं, विपत्तियों के मारे हैं, सताये हुए हैं, तो इस का एक मात्र कारण यह है कि आप कमजोर हैं।

‘कमजोरी’ एक बड़ा भारी गुनाह है। यही असली ब्रह्महत्या है। ब्रह्म हत्यारों को नाना प्रकार के नरकों में सड़ने के प्रमाण शास्त्रों में लिखे हुए हैं। आपको जो भी दण्ड मिल रहे हैं, जो भी दुख प्राप्त हो रहे हैं, वह सब निर्बलता के कारण हैं। निर्बलताएं जब तक हटाई न जायगी, तब तक किसी भी उपाय से कष्टों से निवृत्ति नहीं मिल सकती। कोई कृपापूर्वक उन कष्टों का निवारण भी कर दे, तो भी दूसरे क्षण दूसरे प्रकार का कष्ट आकर सताने लगेगा।

आप चाहते हैं कि हमारे साथ न्याय हो दूसरों के साथ न्याय हो। सताया जाना, बेईमानी और जोर जुल्म का बोलबाला न रहे। आपकी इच्छा पूरी हो सकती है, बशर्ते कि ‘शक्ति के उपासक बन जावें बलवान होने का प्रयत्न करें, निर्बलता जैसे-जैसे दूर होती जायेगा। फिनायल छिड़कते ही मक्खियों की भिनभिनाहट गायब हो जाती है, अपने में शक्ति का आविर्भाव होते ही दुष्टता पलायन करने लगेगी।

यदि आप शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कष्टों से पीड़ित हैं, तो इधर-उधर मत झाँकिये। कोई देवी-देवता, संत-महन्त, ग्रह नक्षत्र आपकी सहायता तब तक नहीं कर सकता, जब तक कि आप अपनी सहायता के लिए खुद ही अपने पाँवों पर न उठ खड़े हों। कष्टों का निवारण एक ही प्रकार से हो सकता है कि बलवान बनने में लग जावें। आप अपने शरीर को सुदृढ़ बनाइए मन को बलवान कीजिए, अच्छी आदतों को संपत्ति की तरह इकट्ठी कीजिए संगठन, एकता और मैत्री भाव बढ़ाइए। इस प्रकार दिन-दिन बल बढ़ता जायगा। मत सोचिए कि आप साधनहीन, अकेले ओर असहाय हैं, इसलिए कि आप साधनहीन, अकेले और असहाय हैं, इसलिए सशक्त कैसे बन सकेंगे। आपके अन्दर सर्वशक्तिमान आत्मा बैठा हुआ है। उठिए आत्मा को पहचानिए, शक्तिमान बनने की प्रतीक्षा कीजिए और बल की उपासना में लग जाइए। ईश्वर आपको सर्वतोमुखी उन्नति प्रदान करेगा और उसके तेज से अन्याय रूपी अन्धकार दूर भाग जायगा।


इस ढोंग से क्या फायदा?

(ऋषि तिरुवल्लुवर)

माथे पर चन्दन पोतने से क्या फायदा? जब कि मन में बुराइयों के ढेर जमा हो रहे हैं। बाहरी बनावट से कुछ काम न सरेगा जबकि दिल मक्कारियों की गठरी बना हुआ है। चेहरे को विशेष आकृति का बनाकर धर्मात्मा नहीं बना जा सकता है। ढोंग करना सज्जनों का काम नहीं, ठगों का व्यापार है। बाहर से उजला और भीतर से मैला मनुष्य उस गधे के तुल्य है जो शेर की खाल ओढ़े फिरता है, पर घरों पर चरता है। धर्मात्मा बनने वाला दुराचारी उस बधिक की तरह है कि जो जाल बिछा कर झाड़ियों के पीछे छिपा रहता है और भोली चिड़ियों को फँसाता है। अपवित्र मन को लेकर तीर्थ में जाने से कुछ लाभ न होगा।

मन में वासनायें भरी रहे और बाहर से त्याग का आडंबर करें, तो उससे क्या प्रयोजन? ढोंगी आदमी समझता है कि मैं दूसरों को खूब चकमा देता हूँ, परन्तु यथार्थ में वह अपने सिवाय और किसी को नहीं ठग सकता। जो दूसरों की दृष्टि में धर्मात्मा बनता है, पर अपनी दृष्टि में पापी है, वह अन्त समय बहुत पछतावेगा और कहेगा-हाय! मैंने अपने हाथों अपना नाश क्यों किया? जिनका हृदय पवित्र है, उन्हें आडम्बर की क्या जरूरत? अगर तुम्हारे हृदय में त्याग मौजूद है, तो न सिर घुटाने की जरूरत है और न जटा रखने की।

कथा-


न्याय का पालन

(श्री दरबारी लाल जी सत्य भक्त)

पुराने समय में भारत वर्ष मैं कल्याणी देवी नाम की एक विदुषी महिला रहती थी, उनके पति का नाम शारदा चरण था। वे राजपुरोहित थे, राजकोष की तरफ से उन्हें काफी धन मिलता था। दोनों बड़े मजे में रहते थे। पति-पत्नि का अधिकाँश समय व्यासंग में आराम से कट जाता था। कुछ दिन बाद राजदरबार में एक महर्षि आये। जिन्होंने अपने अनुभव और विचार से सरस्वती की उपासना की थी। उस समय के रिवाज के अनुसार दोनों में वाद हुआ और देश में कोई बड़ा विद्वान न होने से कल्याणी देवी मध्यस्था बनाई गई। कल्याणी देवी को यह बात जंची कि महर्षि का पक्ष ही सच्चा सिद्ध हुआ है। एक तरफ पति प्रेम था, दूसरी तरफ सत्य था, पर सत्य न्याय में बाधक न हुआ, इसलिए कल्याणी देवी ने महर्षि की ही विजय घोषित की।

राज्य का ऐसा नियम था कि जो राजपण्डित को जीत लेगा, वह राजपण्डित माना जायेगा। इसलिए महर्षि राज पंडित माने गये। परन्तु महर्षि ने जिनका नाम सत्य शरण था, कहा अगर शारदा चरण सत्य को स्वीकार कर मेरे पास दीक्षा ले लें तो मैं उन्हें ही राज पंडित बनाऊंगा। अभिमानी शारदा चरण ने यह बात स्वीकार न की और लज्जावश वे नगर छोड़कर जंगल में जाने लगें। कल्याणी देवी भी साथ चलने लगी। शारदा चरण ने कहा तुम्हें जंगल में चलने की कोई जरूरत नहीं है पराजय मेरी हुई न कि तुम्हारी।

कल्याणी ने कहा- मेरे देवता! नारी के पराजय होने की जरूरत नहीं है। पति की जय ही उसकी जय है, पति की पराजय ही उसकी पराजय है। फिर जो कुछ सीखा है, मैंने आप ही से सीखा है। आप मेरे पति भी हैं और गुरु भी।

शारदा चरण- यदि ऐसा था तो तुमने मेरी पराजय घोषित क्यों की?

कल्याणी- मैं आपकी पराजय घोषित कर रही हूँ, यह मुझे ख्याल ही नहीं आया। मुझे तो यही ख्याल आया कि सत्य के आगे मैं झुक रहीं हूँ। मैं अपना ही पराजय घोषित कर रही हूँ।

शारदा चरण- तो तुमने महर्षि के पास दीक्षा क्यों न ले ली, कदाचित महर्षि तुम्हें ही राजपंडित बना देते?

कल्याणी- राज पंडित बनने की अपेक्षा आपकी अनुचरी (पीछे चलने वाली) बनने में मुझे अधिक सुख है मेरा कर्तव्य भी यही है। धर्म की भी आज्ञा है।

लोगों के आवागमन से रहित एक जंगल में जाकर वे दोनों तपस्वी की तरह रहने लगे। जंगल के फल कन्दमूल आदि खाकर गुजर करते थे। बलकल पहिने थे। एक झोपड़ी बना कर रहते थे। झोपड़ी को स्वच्छ रखना उसके चारों तरफ जो आँगन बनाया गया था उसे साफ रखना फूलों की क्यारियों में पानी देना फल फूल लेने पति के साथ जाना, उन्हें अच्छी तरह पत्तों में सजा कर पति को परोसना, बचे हुए समय में तत्व चर्चा करना, काम करते समय भी हंसी विनोद से पति के चित्त को प्रसन्न रखना, वे सब काम कल्याणी देवी उत्साह से करती थी। कल्याणी देवी ने ही मुझे पराजित घोषित किया इस बात को लेकर शारदा चरण के मन में जो गल्प था, वह कल्याणी देवी की सेवा परायणता और प्रेमी जीवन से दूर हो चुका था और जब एक बार तीन दिन को शारदा चरण बीमार पड़ें तब कल्याणी देवी ने जो दिन रात अटूट सेवा की उससे शारदा चरण का मन बिलकुल पिघल गया और उसने रोते-रोते कहा कि तुम्हारी निष्पक्षता के कारण तुम्हारे प्रेम पर मुझे अविश्वास हुआ था। किन्तु उस भूल का अब मुझे गहरा पश्चाताप हो रहा है।

कल्याणी ने समझा मेरी तपस्या फल गयी। आज प्रेम की पूरी जय हुईं। उस जंगल में जब ये दंपत्ति स्वजन, परिजन, वैभव आदि से रहित जीवन बिता रहे थे, शारदा चरण के तीन दिन के लंघन के बाद जब कल्याणी देवी उन्हें पथ्य दे रही थी उसी समय मनुष्यों का कल-कल सुनाई दिया। कोई कह रहा था इधर-इधर। कल्याणी ने देखा वह एक ब्राह्मण कुमार है जिसे कि उनने उस दिन राज सभा में महर्षि के साथ देखा था। उसके पीछे ही बटुकों के साथ खुद महर्षि जी चले आते थे। कल्याणी ने उन्हें बैठने के लिए आसन देते हुए कहा महाराज हम गरीब लोग इस जंगल में आपका और क्या स्वागत कर सकते हैं?

महर्षि-बेटी, तुम्हारी इस गरीबी पर हजारों राज्य वैभव न्यौछावर किए जा सकते हैं। कीचड़ मिले पानी में शक्कर डालने से मिठास तो आयेगी पर वह शुद्ध जल की बराबरी न स्वाद में ही कर सकता हैं न स्वास्थ्य में ही। तुम्हें इस जंगल में जो सुख मिलता हैं वह राजाओं को भी न तो राज सिंहासन पर मिल सकता है, न रनिवास में। उसमें कितनी शक्कर पड़ी हो पर कीचड़ सारा मजा किरकिरा कर देता है। और उसमें जो रोगोत्पादक कीटाणु होते हैं। उनका विचार किया जाय तो दुख पहाड़ के आगे सुख कण सा ही दिखाई देगा।

कल्याणी ने विनयपूर्वक लज्जा के कारण सिर नीचा झुका लिया, किन्तु महर्षि कहते ही गये बेटी एक दिन तूने राज सभा में पति की पराजय घोषित की थी, किन्तु आज में अपना पराजय घोषित करने के लिए इस जंगल में आया हूँ।

कल्याणी ने कहा- महाराज, यह आपकी नम्रता है। उस दिन जो सत्य मालूम हुआ वह अपने विरुद्ध होने पर भी मैंने स्वीकार किया। अगर मैं ऐसा न करती तो मैंने सत्य की अवहेलना करके पति प्रेम के बदले पतिमोह का परिचय दिया होता। पति मोह से मैंने पति को भी खोया होता। पति प्रेम से आज दोनों को पाया है।

महर्षि- इसीलिए तो कहता हूँ कि उस दिन तेरी ही जय हुई थी, पर मेरी पराजय हुई थी।

कल्याणी- नहीं महाराज अगर आपकी जय न हुई होती तो उस दिन आपकी जय कभी घोषित नहीं करती मेरा क्या? मैं तो उस दिन मध्यस्थ थी। वादी-प्रतिवादी नहीं। इसलिए मेरी जय क्या और पराजय क्या ?

महर्षि- निःसन्देह उस दिन शब्द वाद में मेरी जय थी पर अर्थवाद में तेरी ही जय हुई।

प्रेम और मोह में क्या अन्तर है यह बात मैं जीवन भर शब्दों में ही कहता रहा हूँ। पर तूने उसे जीवन में उतार कर बताया। जीवन की परीक्षा में मैं उतना उत्तीर्ण नहीं हुआ जितनी तू हुई है। जिस दिन से तुम दोनों ने घर छोड़ा उस दिन से मैं और मेरे शिष्य गुप्त रूप से तुम्हारी गतिविधि पर बराबर ध्यान देते रहे हैं। कल जब शारदा चरण की बीमारी और तेरी सेवा परायणता के मुझे समाचार मिले तब तेरा पुण्य तेज मेरे लिए असहन हो गया और आज रोता हुआ उसी तरह मैं चला आ रहा हूँ जैसे कोई बाप अपने बेटी के लिए दौड़ा चला आ रहा हो।

इसी समय शारदा चरण धीरे-धीरे झोपड़ी में से आये और महर्षि की चरण वन्दना करके बोले गुरुदेव उस दिन शब्द से पराजित हुआ था, आज अर्थ से पराजित हो रहा हूँ इसलिए मैं आपको अपना गुरु मानता हूँ प्रेम और मोह का अन्तर तो कल्याणदेवी ने अपने जीवन से बतला दिया पर उस अन्तर को परखने वाले जगत में कहाँ है? आप उन्हीं पारखियों में से हैं। आपको गुरु बनाकर आज मैं कृतार्थ हो रहा हूँ।

महर्षि- बेटा, गुरु बना कर कोई शिष्य कृतार्थ नहीं होता, वह कृतार्थ होता है गुरु दक्षिणा देकर।

शारदाचरण- गुरुदेव आज मेरे पास क्या है जो आप को गुरु दक्षिणा मैं दूँ? फिर भी जो कुछ मेरे पास सर्वस्व कहलाने लायक हो वह आप माँग लीजिए।

महर्षि-एक दिन वादी बनकर मैंने तुम्हारा वह घर उजाड़ा था, आज यह घर उजाड़ता हूँ। गुरु दक्षिणा में तुम्हारी यह झोंपड़ी ले लेता हूँ।

कल्याणी- गुरुदेव ------------!

महर्षि- नहीं अब कुछ नहीं सुनूँगा। तुम लोग इसी समय मेरी झोपड़ी में से निकल जाओ अपने पुराने घर में चले जाओ। वहाँ तुम्हारा सारा वैभव तुम्हारी बाट देख रहा है। कुछ मुट्टी मेरा भी उसमें शामिल हो गया है।

कल्याणी- पर ये बीमार हैं गुरुदेव -

महर्षि -रहने दो तुम दोनों के लिए दो पालकियाँ तैयार है, जाने में कोई कष्ट न होगा।

कल्याणी की आँखों में आँसू निकल आये शारदाचरण ने भी आँखें पोंछी, महर्षि बड़ी कठिनता से आँसू पोंछ पाये। भरे गले को साफ करते हुए उनने कहा बेटी प्रेम और मोह में आकाश पाताल का अन्तर है। पर रंग−रूप में उनमें कैसी साधारण समानता है।

कल्याणी गला भर जाने से कुछ बोल न सकी उसने गुरुदेव के साथ कल्याणी को विदा किया जैसे बाप अपनी बेटी को विदा करता है।

‘सत्यामृत’

कथा-


नीच और ऊंच की पहचान

रूस के राजा एलेक्जेंडर अक्सर अपने देश की आन्तरिक दशा जानने के लिए वेश बदल कर पैदल घूमने जाया करते थे। एक दिन घूमते-घूमते एक नगर में पहुंचे। वहाँ का रास्ता उन्हें मालूम न था। राजा रास्ता पूछने के लिए किसी व्यक्ति की तलाश में आगे बढ़े।

आगे उन्हें एक हवलदार सरकारी वर्दी पहने हुए दिखा। राजा ने उसके पास जाकर पूछा महाशय, अमुक स्थान पर जाने का रास्ता बता दीजिए। हवलदार ने अकड़ कर कहा-”मूर्ख, तू देखता नहीं, मैं सरकारी हाकिम हूँ मेरा काम रास्ता बताना नहीं है। चल हट, किसी दूसरे से पूछ।” राजा ने नम्रता से पूछा-’महोदय, यदि सरकारी आदमी भी किसी यात्री को रास्ता बता दें तो कुछ हर्ज थोड़ी ही है। खैर, मैं किसी दूसरे से पूछ लूँगा। पर इतना तो बता दीजिये कि आप किस पद पर काम करते हैं?”

हवलदार ने और भौंऐ उठाते हुए कहा-”अंधा है क्या मेरी वर्दी को देख कर पहचानता नहीं कि मैं कौन हूँ।” एलेक्जेंडर ने कहा-शायद आप पुलिस के सिपाही हैं। ‘उसने कहा नहीं उससे ऊँचा।’

राजा- तब क्या नायक है?

हवलदार - उससे भी ऊँचा

राजा -हवलदार है?

हवलदार- हाँ अब तू जान गया कि मैं कौन हूं पर यह तो बता कि इतनी पूछताछ करने का तेरा क्या मतलब? और तू कौन है?

राजा ने कहा- मैं भी सरकारी आदमी हूँ सिपाही की ऐंठ कुछ कम हुई उसने पूछा क्या तुम नायक हो? राजा ने कहाँ नहीं उससे ऊँचा

हवलदार- तब क्या आप हवलदार?

राजा- उससे भी ऊंचा

हवलदार- दरोगा?

राजा- उससे भी ऊंचा

हवलदार- कप्तान?

राजा- उससे भी ऊंचा

हवलदार- सूबेदार?

राजा- उससे भी ऊंचा”

अब तो हवलदार घबराने लगा, उसने पूछा तब आप मन्त्री जी हैं? राजा ने कहा भाई बस एक सीढ़ी और बाकी रह गई है। सिपाही ने गौर से देखा तो सादा पोशाक में बादशाह एलेक्जेंडर सामने खड़े हैं। हवलदार के होश उड़ गये, वह गिड़गिड़ाता हुआ बादशाह के पाँवों पर गिर पड़ा और बड़ी दीनता से अपने अपराध की माफी माँगने लगा।

राजा ने कहा माफी माँगने की कोई बात नहीं है। मैं जानता हूँ कि जो जितने नीचे हैं। वह उतने ही अकड़ते हैं। जब तुम बड़े बनोगे तो मेरी तरह तुम भी नम्रता का बर्ताव सीखोगे। जो जितना ही ऊंचा है वह उतना ही सहनशील एवं नम्र होता है और जो जितना नीच एवं ओछा होता है, वह उतना ही ऐंठा रहता है।


जैसा बीज वैसा फल

अफ्रीका के दयार नोवा नगर में जगत प्रसिद्ध हकीम लुकमान का जन्म हुआ था। हब्शी परिवार में जन्म होने के कारण उन्हें गुलामों की तरह जीवन बिताने के लिए बाध्य होना पड़ा। मिश्र देश के एक अमीर ने तीस रुपयों में अपनी गुलामी करने के लिए लुकमान को खरीद लिया ओर उनसे खेती बाड़ी का काम लेने लगा।

यह अमीर बड़ा क्रूर और निर्दयी था वह जरा सी बात पर अपने गुलामों को बहुत सताता था। किन्तु बाहर से उसने धर्म का बड़ा आडम्बर रच रखा था। दिखाने के लिए वह ईश्वर की रट लगाता और खूब धर्म शास्त्र सुनता ताकि लोग उसे बड़ा धर्मात्मा समझें। अमीर का ख्याल था कि धार्मिक कर्मकाण्डों को करके ही मैं स्वर्ग का अधिकारी हो जाऊंगा।

एक बार मालिक ने हुक्म किया कि अमुक खेत में जाकर जौ बो आओ लुकमान उस खेत में गये और चने बो आये जब खेत उगा और मालिक ने चने के पौधे खड़े देखे तो वह बहुत नाराज हुआ और लुकमान से पूछा कि मैंने तो तुझे जौ बोने के लिये कहा था। तूने चने क्यों बो दिये लुकमान ने शिर झुकाकर नम्रता से कहा मालिक मैंने यह समझ कर चने बोये थे कि इसके बदले जौ उपजेंगे।

मालिक का पारा बहुत गरम हो गया। उसने गरज कर कहा- ‘मूर्ख कहीं दुनिया भर में आज तक ऐसा हुआ है कि चने बोये जायं और जौ उपजें?’

लुकमान और नम्र हो गये उन्होंने मन्द स्वर में कहा- ‘मालिक मेरा कसूर माफ हो। मैं देखता हूँ कि आप दया के खेत में हमेशा पाप के बीज बोते हैं और सोचते हैं कि ईश्वर मुझे अच्छे फल देगा। इसलिए मैंने भी सोचा कि जब ईश्वर के खेतों में पाप बोने पर भी पुण्य फल मिल सकते हैं, तो मेरे चने बोने पर जौ भी पैदा हो सकते हैं।”

अमीर के दिल में लुकमान की बात तीर की तरह गई उसने निश्चय किया कि अब मैं अपना आचरण करूंगा और शुभ कर्म करने में दत्त चित्त रहूँगा, क्योंकि बिना पुण्य फल प्राप्त नहीं हो सकता। अमीर को धन के उपदेश से बहुत शिक्षा मिली उसने उन्हें पूर्वक गुलामी से मुक्त कर दिया।

कथा -


वृद्धा की कुपित आत्मा

लन्दन से कोई 8 कोस दक्षिण की और एप्सम नामक एक छोटी सी बस्ती है। उसमें पिट पैलेस नामक महल में लार्ड टामस लिटेलटन रहते थे। लिटेलटन के पास आयरलैंड और इंग्लैंड में बड़ी भारी जमींदारी थी और धन धान्य से उनके खजाने भरे हुए थे। राज दरबार में उनकी पर्याप्त मान सम्मान प्राप्त था। धन वैभव यौवन और वासना का मद मिल कर एक ऐसा नशा आता है जो मनुष्य को पागल बना देता है। लिटेलटन को ईश्वर ने सुन्दर शरीर और अच्छा स्वास्थ्य दिया था। छोटा पात्र इस देन को हजम न कर सका उसका पेट ऊपर को उफनने लगा। यौवन और वैभव से मदान्ध होकर इन्होंने इंद्रिय लिप्सा को अपना ध्येय बना लिया। सुरा और सुन्दरी दो ही उनकी उपास्य देवियाँ थीं। ऐसे अनेक मित्रों का सहयोग उन्हें अनायास ही प्राप्त हो गया जो इन्हीं व्यसनों के प्रेमी थे। लार्ड महोदय पैसे को पानी की तरह बहाते हुए विलासिता में सराबोर रहने लगे। उन्होंने अगणित कुमारी और सती साध्वी महिलाओं को अपने जाल में फँसाने में पर्याप्त सफलता प्राप्त की। उनके मन यौवन पर असंख्य स्त्रियों का सतीत्व निछावर हो सका था। फिर भी वे कुँआरे ही बने हुआ थे। भाला जिसने मधु चूस कर फूल को फेंक देने की भौंरे जैसी नीति अपना ली हो, वह किसी को अपनी जीवन संगिनी क्यों बनाने लगा।

आयरलैंड में जहाँ लार्ड लिटेलटन की जमींदारी थी वहाँ एक गरीब वृद्धा स्त्री अपनी तीन लड़कियों के साथ टूटी-फूटी झोंपड़ी में रहती थी। उस विधवा वृद्धा ने अपने पति के मर जाने के बाद इन लड़कियों की बड़ी मुसीबतों के साथ हृदय के प्यार से सींच कर पाला था। वह गरीब थी फिर भी शहजादियों से अधिक अपनी लड़कियों पर प्यार करती थी। बड़ी कठिनाइयों से उन्हें पढ़ा-लिखा कर सुशिक्षित बनाया था। अब वे सयानी हुई थी जहाँ वे धर्म मर्यादा और सुख का जीवन व्यतीत करें। किंतु एक विचित्र षड़यंत्र ने बुढ़िया का हृदय चूर-चूर कर दिया।

लार्ड महोदय जब अपनी जमींदारी के सम्बन्ध में इस गाँव में गये, तो अद्वितीय रूप, यौवन सम्पन्न तरुणी कन्याओं को देखकर उनका मन बेकाबू हो गया। फिर क्या था, दलालों ने किसी न किसी प्रकार उन लड़कियों को फंसा लिया और उन्हें उस माकीय वासना की तृप्ति का साधन बनना पड़ा। वे बेचारी इंग्लैंड आ गई और ऐसी फंसी कि उस जीर्ण बुढ़िया माता को दर्शन देने तक कभी न पहुँची। बुढ़िया छाती पर पत्थर रख कर जैसे-तैसे दिन काटने लगी। वह सोचती थी शायद लार्ड महोदय एक लड़की से स्वयं पाणिग्रहण कर लेंगे ओर शेष को किसी भली जगह विवाह देंगे, किन्तु जब उसे यह पूरी तरह विश्वास हो गया कि लड़कियों को कुछ दिन बाद झूठी पत्तलों की भाँति फेंककर उनका भविष्य अन्धकारमय बना दिया जायगा तो बुढ़िया का हृदय हाहाकार कर उठा वह बीमार पड़ गई और लड़कियों का नाम रटती आँसुओं की अविरल धारा बहाती हुई लोक से प्रयाण कर गई।

जिस समय आयरलैंड में उस बुढ़िया का प्राणान्त हुआ था, उस समय लार्ड महोदय रात्रि की क्रीड़ा समाप्त करके सुख निद्रा में सो रहे थे। अचानक किसी शब्द को सुन कर उनकी नींद खुल गई उसने समझा कि शायद काँच की खिड़की के पास कोई पक्षी रहा है। फिर उन्होंने ध्यान से देखा तो मालूम हुआ कि पक्षी नहीं बल्कि सफेद कपड़े पहने एक वृद्धा स्त्री खड़ी हुई है। ये उठ बैठे और घूर-2 कर उसे पहचानने का प्रयत्न करने लगे। अब वे पहचान गये कि यह उन कुमारियों की माता है और लाल नेत्र निकाल कर बड़े क्रोध से उन्हें घूर रही है। अंगारे की तरह उसका चेहरा तेज तमतमा रहा है। लार्ड महोदय का कलेजा थर थर काँपने लगा,उनकी नसों में खून जमने लगा।

मूर्ति और अधिक निकट हो गई और गम्भीर स्वर से बोली-दुष्ट! तेरी मौत आ पहुँची, अब तू मरने को तैयार हो जा! लिटेलिटन ने आवेश में विह्वल होकर पूछा- ‘क्या मृत्यु? क्या मेरी मृत्यु? क्या मैं एक दो महीने में ही मर जाऊंगा? बुढ़िया ने दाँत पीसते हुए कहा-”एक दो महीने में नहीं, तीन दिन के अन्दर। देख, सामने वाली घड़ी में इस वक्त बारह बज रहे हैं परसों ठीक इसी वक्त आकर में तुम्हें ले जाऊंगी” इतना कहकर मूर्ति अदृश्य हो गईं।

भयभीत लिटेलटन विक्षिप्त की दशा में सन्न पड़े रहे। नौकर ने देखा कि उनके शरीर से बेशुमार पसीना बह रहा है, किसी प्रकार उन्हें सावधान करके उठाया गया। उन्होंने रात्रि की घटना सबको सुनाई पर मित्रो ने हंसी में उड़ा दिया। वे पार्लियामेण्ट की बैठक में गये और चर्चा में भी शामिल हुए, पर चित्त स्थिर न था। उनके मित्रों ने भ्रम समझकर उसे निवारण का यह उपाय किया कि घड़ी दो घण्टे तेज कर दी। जब रात्रि के दस बज रहे थे तो घड़ी ने बारह बजाए। लार्ड महोदय पूर्ण स्वस्थ थे, और प्रसन्नता से उछल पड़े कि वह केवल भ्रम था अब मेरा कुछ नहीं हो सकता। इस प्रकार प्रसन्न होते हुए वे शयन गृह में चले गये, मित्र बेखबर न थे। जैसे ही घड़ी ने दो बजाए और वास्तविक बारह बजे तो मित्र उनके कमरे में धीरे-2 घुसे। देखा कि उनका मृत शरीर पलंग पर पड़ा हुआ है।

यह घटना एक असाधारण व्यक्ति और पार्लियामेंट के सदस्य की है इसलिये उन दिनों इसकी सारे देश में चर्चा रही और पीछे इसे प्रामाणिक पुस्तकों में लेखबद्ध कर लिया गया।


न्याय जीवन का प्रथम सोपान

(लेखक- रा॰ कु॰ हरभतसिंहजी, भण्डरा स्टेट)

(अखंड शक्ति, अखंड समता, अखंड शमन )

भगवान सत्य के दूसरे हाथ में गदा है गदा का अर्थ अखंड शमन, अखंड समता, अखंड शक्ति, न्याय है। संसार तीन तत्वों का रूप है, सत, रज, तम, सत तत्व से बनी सृष्टि के लिए सत्य प्रेम, पर्याप्त है, पर तामस तत्व से बनी सृष्टि के लिए अखंड शमन. तप अर्थात् न्याय श्रेयस्कर है, न्याय के द्वारा ही तामस तत्व से बनी सृष्टि का रज, सत, अर्थात् प्रेम सत्य में बदल सकते हैं। यही न्याय दंड अस्त्र लेकर अखंड ज्योति सत्य शिव रूप होकर सृष्टि का कल्याण किया करते हैं उन्होंने अपने पुत्रों को तप रूप न्याय अर्थात् अखंड शमन का शस्त्र देकर सृष्टि में कर्त्तव्य करने की शिक्षा दी है।

वास्तव में तप रूप न्याय अर्थात् अखंड शमन इस जीवन का पहिला दरवाजा है इस दरवाजे से जाने से प्रेम और सत्य दो दरवाजे और मिलते हैं। प्रेम दरवाजे के पार होने से अखंड समता का दृश्य प्राप्त होता है, इससे सत्य का दरवाजा मिलता है, इसके मिलने से अखंड शक्ति का आभास होता है, यही अखंड शक्ति, अखंड ज्योति- अखंड सत्य है जो अन्तिम लक्ष्य है।

न्याय मार्ग द्वारा ही यह लक्ष्य सिद्ध होता है और यह लक्ष्य मिलने से जीवन आनन्दमय जीवन बन जाता है जिसे जीवन मुक्ति भी कह सकते हैं।


दुष्टों से प्रेम, दुष्टता से युद्ध

एक तत्वज्ञानी का उपदेश है कि ‘दुष्टों पर दया करो, किन्तु दुष्टता से लड़ मरो। दुष्ट और दुष्टता का अन्तर किये बिना हम न्याय नहीं कर सकते। अक्सर यही होता है कि लोग दुष्टता और दुष्ट को एक ही वस्तु समझ लेते हैं। और एक ढेले से दोनों को शिकार बना देते है।

बीमार और बीमारी एक ही वस्तु नहीं है। जो डॉक्टर बीमारी के साथ बीमार को भी मार डालने का इलाज करता है। उसकी बुद्धि को क्या कहे? एक बन्दर अपने मालिक को बहुत प्यार करता था। जब मालिक सो जाता तो बन्दर पंखा किया करता ताकि मक्खियाँ उसे न सतावें। जब तक वह पंखा झलता रहता मक्खियाँ उड़ती रहती, जैसी ही वह पंखा बन्द करता, कि मक्खियाँ फिर मालिक के ऊपर आकर बैठ जाती। यह देख कर बन्दर को मक्खियों पर बड़ा क्रोध आया और उसने उनको सजा देने का निश्चय किया। वह दौड़ा हुआ गया और सामने की खूँटी पर टँगी हुई तलवार को उतार लाया। जैसे ही मक्खियाँ मालिक के मुँह पर बैठी, वैसे ही बन्दर ने खींच कर तलवार का एक हाथ मारा। मक्खियाँ तो उड़ गई, पर मालिक का मुँह बुरी तरह जख्मी हो गया। हम लोग दुष्टता को हटाने के लिए ऐसा ही उपाय करते हैं। जैसा बन्दर ने मक्खियों को हटाने कि लिए किया था।

आत्मा किसी की दुष्ट नहीं है, वह तो सत्य, शिव और सुन्दर है, सच्चिदानन्द स्वरूप है। दुष्टता तो अज्ञान के कारण उत्पन्न होती है। यह अज्ञान एक प्रकार की बीमारी ही होती है। अज्ञान रूपी बीमारी को मिटाने के लिए हर उपाय काम में लाना चाहिए। परन्तु किसी से व्यक्तिगत द्वेष न मानना चाहिए। व्यक्तिगत द्वेष भाव जब मन में घर कर लेता है। तो हमारी निरीक्षण बुद्धि कुँठित हो जाती है। वह नहीं पहचान सकती कि शत्रु में क्या बुराई और क्या अच्छाई है। पीला चश्मा पहन लेने पर सभी वस्तुएँ पीली दिखाई पड़ने लगती हैं। इसी प्रकार स्वार्थपूर्ण द्वेष जिस मनुष्य के लिए घर कर लेता है, उसके भले काम भी बुरे प्रतीत होते हैं। और अपनी आँखों के पीलिया रोग को न समझकर दूसरे के चेहरे पर जो पीलापन दिखाई पड़ता है। उसे पाण्डु रोग समझकर उनका इलाज करने लगता है। इस प्रकार अपनी मूर्खता का दंड दूसरों पर लादता है। अपनी बीमारी की दवा दूसरों को खिलाता है। जालिम और दुष्ट क्रोधी और परपीड़क इसी अज्ञान में ग्रसित होते हैं। उनके मन में स्वार्थ एवं द्वेष समाया हुआ होता है, फलस्वरूप उन्हें दूसरों में बुराइयाँ ही बुराइयाँ नजर आती हैं। सन्निपात का रोगी दुनिया को सन्निपात ग्रसित समझता है।

आप दुष्ट और दुष्टता के बीच अन्तर करना सीखिए। हर व्यक्ति को अपनी ही तरह पवित्र आत्मा समझिये और उससे आन्तरिक प्रेम कीजिये। कोई भी प्राणी नीच, पतित या पापी नहीं है। तत्वतः वह पवित्र ही है। भ्रम अज्ञान और बीमारी के कारण वह कुछ का कुछ समझने लगता है। इस बुद्धि भ्रम का ही इलाज करना है। बीमारी को मारना है और बीमार को बचाना है।

इसलिये दुष्ट और दुष्टता के बीच में फर्क करना सीखना चाहिए। मनुष्य से द्वेष मत रखिये चाहे उनमें कितनी ही बुराइयाँ क्यों न हों आप तो दुष्टता से लड़ने को तैयार रहिये फिर वह चाहे दूसरों में हो चाहे अपनों में हो या चाहे खुद अपने अन्दर हो।

पाप एक प्रकार का अंधेरा है, जो ज्ञान का प्रकाश होते ही मिट सकता है। पाप को मिटाने के लिए कडुए से कडुआ प्रयत्न करना पड़े सो आप प्रसन्नता पूर्वक कीजिए, क्योंकि वह एक ईमानदार डॉक्टर की तरह विवेकपूर्ण इलाज होगा इस इलाज में लोक कल्याण के लिए मृत्युदण्ड तक की गुंजाइश है। किन्तु द्वेष भाव से किसी को बुरा समझना या उसकी भलाइयों को भी बुराई कहना अनुचित है। जैसे एक विचारवान डॉक्टर रोगी की सच्चे हृदय से मंगल कामना करता है। और निरोग बनाने के लिये स्वयं कष्ट सहता हुआ जी तोड़ परिश्रम करता है। वैसे ही आप पापी व्यक्तियों को निष्पाप करने के लिये साम, दाम, दंड, भेद, चारों उपायों का प्रयोग कीजिये, पर उस पापी से किसी प्रकार का निजी राग-द्वेष मत रखिये।


ईसप की नीति शिक्षा

(1)

पिता के मरने के बाद उसके भोले किन्तु उदार लड़के को खेती का सारा कारोबार सम्भालना पड़ा। लड़के ने देखा कि अंगूरों के हरे भरे खेतों के किनारे नागफनी के कटीली पौधे लगे हुए हैं। लड़के को यह उचित मालूम न हुआ कि अंगूरों के साथ कँटीली पौधे भी रहें, उसने तुरन्त ही सब नागफनी उखड़वा कर फेंक दी दूसरे दिन से ही जंगली पशु उस खेत में निधड़क आने लगे और एक पखवारा भी न होने पाया था कि सारे खेतों का उजाड़ कर गये। तब लड़के की समझ में आया कि अंगूरों की हिफाजत के लिए नागफनी की भी जरूरत है।

दण्ड की व्यवस्था हुए बिना दुष्टों से रक्षा नहीं हो सकती।

(2)

एक बच्चे ने बिच्छू को जरा सा छू लिया, इस पर बिच्छू ने उसे डंक मार दिया। बालक रोता हुआ अपनी माता के पास पहुँचा और कहने लगा देखो माँ मैन उस बिच्छू को कुछ भी नुकसान न पहुँचाया था, सिर्फ छू भर दिया था। इस पर ही उसने मुझे डंक मार दिया। माता ने कहा तुमने उसे छूकर छोड़ दिया, इसीलिए तो उसने काट ही खाया अगर देखते ही उसे मार डालते तो उसे काटने को मौका न मिलता।

दुष्ट को देखते ही उसका मुँह जला देना चाहिए।

(3)

प्यास के मारे घबराया हुआ एक कबूतर इधर-उधर उड़ रहा था। उसने बाजार में एक दुकान पर ठंडे मीठे शरबत का साइनबोर्ड लगा देखा उसे विश्वास हो गया कि यहाँ मुझे पानी मिल जायेगा। इसलिए वह उस दुकान पर उतरा। अभी वह तख्ते पर बैठने भी न पाया था कि दुकान वाले ने उसे पकड़ लिया और बावर्ची के सुपुर्द कर दिया।

निर्बल की कोई सहायता नहीं करता।

(4)

सृष्टि के आदि में जब सब जीव अपना अपना काम करने लगे तो मधुमक्खियों ने अपने छत्ते में मधु जमा करना आरम्भ किया। उस मधु को देवता लोग बहुत पसंद करते और नित्य छत्ते को निचोड़ ले जाते। मक्खियों के कार्य से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उनसे कहा वर माँगो। मधु मक्खियों ने कहा- भगवान हमें ऐसा डंक दीजिए जिससे मुफ्तखोरों को मजा चखा सकें। और अपनी कमाई की रक्षा कर सकें। ब्रह्मा जी ने उन्हें डंक दे दिया।

सीधे आदमी को हर कोई अनुचित रीति से सताता है।

(5)

एक आदमी को कुत्ते ने काट खाया। एक आदमी ने उसे सलाह दी कि अपने घाव के लहू में भीगी हुई रोटी कुत्तों को खिलाओ तो तुम्हारा घाव अच्छा हो जायगा। यह उपाय सुनकर वह आदमी हंस पड़ा और बोला इस उपाय को करने का मतलब है कि काटने वालों की संख्या और बढ़ाऊं?

जालिम को रिश्वत देकर अपना छुटकारा करने का अर्थ है कि अपने तथा दूसरों के ऊपर अधिक जुल्म कराने का निमन्त्रण देना।

(6)

जाड़ों के दिनों में एक किसान अपने घर लौट रहा था। रास्ते में उसने देखा कि एक साँप ठंड से अकड़ा पड़ा है। किसान को उस दया आई वह उसे उठाकर घर ले आया और आग के पास तपाने के लिये रख दिया। जब साँप की ठंड छूटी और शरीर में गर्मी आई तो वह किसान के बच्चे को काटने लपका।

किसान ने यह कहते हुए उस साँप का मुँह कुचल डाला कि दुष्ट के साथ भलमनसाहत करना बेकार है।


VigyapanSuchana

मनुष्य को देवता बनाने वाली पुस्तकें

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जो ज्ञान युगों के प्रयत्न से मिलता है-उसे हम अनायास ही आपके सन्मुख उपस्थित करते हैं।

यह पुस्तकें बाजारू किताबें नहीं हैं। उनकी एक-एक पंक्ति के पीछे गहरा अनुभव और अनुसंधान है। विनम्र शब्दों में हमारा दावा है कि इतना खोजपूर्ण अलभ्य साहित्य इतने स्वल्प मूल्य में अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकता।

1. मैं क्या हूँ?- आत्मा का प्रत्यक्ष प्रदर्शन करने के कुछ सरल साधन। मू. 1 रुपया

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13. मरने के बाद हमारा क्या होता है?- मृत्यु के उपरान्त प्राप्त होने वाले स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, प्रेत योनि, मृतकों का साक्षात्कार, उनकी सहायता प्राप्त करना आदि बातों पर अनुभवपूर्ण वर्णन। मूल्य 1 रुपया

14. जीव जन्तुओं की बोली समझना- मूक जीव जन्तुओं की भी स्वतंत्र भाषा है और वे भी हमारी ही तरह बातचीत करते हैं। उसे समझने का महत्वपूर्ण विधान। मूल्य 1 रुपया

नोट- चार या अधिक पुस्तकें लेने पर चौथाई कमीशन दिया जाता है। हर पुस्तक पर एक आना के हिसाब से पोस्टेज लगता है, जो खरीदार को देना होता है। इस प्रकार कमीशन काटकर और पोस्टेज जोड़ कर 1 रुपया प्रति पुस्तक के हिसाब से मूल्य भेजना चाहिए। चार से कम पुस्तकें मंगाने वाले सात आना प्रति के हिसाब से भेजें।

पता- मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा।

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बागी से


(ले. श्री स्वर्ण सहोदर)

क्रान्ति का तूफान लेकर चल, निकल सुकुमार बागी!

हाथ में ले प्राण, प्राणों में भरे अंगार आगी!!

आज का जग कर रहा है प्रेम से आह्वान तेरा;

इस तमिस्रा में प्रकट कर दे सुखद आ कर सबेरा;

जाग जाये विश्व सोया, गा मधुर ऐसी प्रभाती,

पा प्रभाकर की प्रभा छिप जायँ अणु गुण, दीप-बाती;

देख, अन्तर में जगत के किस प्रकार अशान्ति जागी!

क्रान्ति का तूफान लेकर चल, निकल सुकुमार बागी!!

द्वेष, हिंसा, स्वार्थ के विपरित भीषण रण मचा दे,

तू प्रमत्तत कृतान बन कर नाश का अभिनय मचा दे,

दुर्गा भौतिकवाद का दृढ़ तर खड़ा इसको ढहा दे,

हो रही कलुषित मनुजता, पाप-कल्मष धो बहा दे;

मानवों ने धर्म छोड़ा, सिन्धु ने मर्यादा त्यागी!

क्राँति का तूफान लेकर निकल सुकुमार बागी!!

शान्ति के सन्देश वाहक सृजन लेकर बन विधाता,

प्रेम त्याग मनुष्य तू स्वयं बन जन्म दाता

सुप्त मानव जाति में, जातीयता उसकी जगा दे,

विश्व से भय कलह , पापाचार दुख पशुता भगा दे,

माँग युग की पूर्ण कर बन एक हिस्सेदार भागी!

क्रान्ति को तूफान लेकर चल, निकल सुकुमार बागी!!

गत को आ, दिन नरक को तू स्वर्ग कर दे,

पतन में उत्थान ला, मृतप्राय में अमरत्व भर दे,

नाच निर्भय अखिल जग में, नाच रचना युक्त नर्तन,

आ उपस्थित हो युगान्तर व्याप्त कर ऐसा विवर्तन,

कृष्ण के अर्जुन! न रुक, बढ़ समर को बन कर विरागी!

क्रान्ति का तूफान ले कर चल निकल सुकुमार बागी!!

क्रान्ति का तूफान ले कर चल निकल सुकुमार बागी!!

*समाप्त*