मैं तो सत्य को ही ग्रहण करूंगा!

सत्-चित् आनन्द स्वरूप आत्मा को इसलिए इस भूलोक में नहीं भेजा गया है कि असत्य के अज्ञानान्धकार में भटकता रहे अथवा वासनाओं के जाल में, भ्रमों के जंजाल में जकड़ा हुआ फड़फड़ाता रहे। ईश्वर ने आपकी सत्य शिव और सुन्दर आत्मा को इसलिए अवतार दिया है कि असत्य से बच कर सत्य को ग्रहण करे और अपनी बुद्धिमत्ता का समुचित पुरस्कार पावे।

आप अपने गौरव को स्मरण कीजिए और असत्य के अँधेरे में रहने से इन्कार कर दीजिये। हे ज्योतिस्वरूप अखंड आत्मा! आप सत्य हैं, इसलिए इस विश्व में से सत्य तत्वों को ही चुन लीजिए। माया के बन्धनों में मत बँधिये, असत्य वस्तुओं को पहचानते रहिए और जब वे आपके पास लुभाने के लिये आवें तो खिलखिला कर हँस पड़िये और कहिए-हे भ्रम में भटकाने वाले प्रलोभनों! मैं तुम्हारे असत्य बन्धनों में नहीं बँध सकता हूँ। मैं यात्री हूँ-सत्य की शोध करता हुआ महान् यात्रा कर रहा हूँ। मुझे, इतनी फुरसत नहीं है कि इन झूठे खिलौनों से खेलने में समय बर्बाद करूं। मैं सत्य हूँ, इसलिए मैं तो सत्य को ही ग्रहण करूंगा।


क्या आपकी रुचि धर्म मार्ग में है?

यदि ‘है’-

तो स्मरण कीजिए कि यह किस प्रकार हुई?

अपनी उन स्मृतियों को, जिन्होंने आप को ईश्वर और आत्मा की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया है, लिख भेजिए। इन्हें अगस्त की अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित किया जायगा।

अखण्ड-ज्योति का अगस्त अंक-

“अनुभवांक” होगा।

उसमें पाठकों के धार्मिक अनुभव रहेंगे। आपको अपने जीवन में यदि कुछ आध्यात्मिक अनुभव हुए हैं धर्म के मार्ग पर प्रेरित करने वाली कोई घटना हुई हो, विचारों में परिवर्तन होने के जो कारण उत्पन्न हुए हों, उन्हें संक्षेप में तथा सरल भाषा में लिख कर भेज दीजिए। अगस्त का अंक ऐसे ही अनुभवों से भरा-पूरा होगा।

हम निमन्त्रण देते हैं-

हर एक पाठक अपनी स्मृतियाँ छपने के लिए भेजें, जो कहानी की तरह मनोरंजक और प्रवचन की तरह शिक्षाप्रद हों!

लेख 14 जुलाई से पूर्व ही आ जाने चाहिएं, इसके बाद आने वाले लेख स्थान न पा सकेंगे।

आप आज से ही अपने जीवन की धार्मिक घटनाओं का स्मरण करना आरम्भ कीजिए, और इसी सप्ताह अपनी रचना संक्षेप में लिख कर भेज दीजिए।

सम्पादक-

‘अखण्ड-ज्योति’ मथुरा।

असतो मा सद्गमय

......श्रुति

असत्य की ओर नहीं; सत्य की ओर चलिए!

आप अपनी आत्मा का कल्याण चाहते हैं

तो

असत्य के अज्ञानान्धकार में से निकल कर सत्य के दिव्य प्रकाश में आइए

वर्ष 2 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक 09


Kavita

ओ मानव मन! जाग


(रचियता-श्री. खूबचन्द जैन “पुष्कल” सीहोरा)


रचियता-श्री. खूबचन्द जैन “पुष्कल” सीहोरा

ओ भव वन में भ्रमते प्राणी! क्षुधाकुलित और जल के प्यासे !

देख रहा है कब से तू नित इस जग के यह खेल तमाशे॥

मिटा चुका, फल फूल ढेर पर अब तक भी तू अघा न पाया।

केवल तन की शक्ति बढ़ाने तूने निज व्यापार बढ़ाया॥

जिसको तू मेरा कहता है अरे हुए क्या वे भी तेरे।

आने वाले चले गये हैं तो भी क्या है होश न तेरे॥

इस जग के उस पार पहुँचने का तेरे इस तन में बल है।

तेरे अस्थि-पंजरों में तो छिनी हुई वह शक्ति अतुल है॥

श्वासों का ये कच्चा धागा न जाने कब टूट जायेगा।

फिर जिसका तू रक्षण करता वह तन कब क्या काम आयेगा॥

जीवन दिन है अतः उजाले में तू झट सन्मार्ग पकड़ ले।

मृत्यु निशा आने के पहिले अरे! पथिक, तू शीघ्र संभल ले॥

ओ मानव मन! जाग काल सन्मुख है तेरे।

कौन भरोसा है जीवन का न जाने क्या हुआ सबेरे॥


सत्य आन्दोलन क्या है?

लोग पूछते हैं कि अखंड ज्योति द्वारा आरंभ किया हुआ ‘सत्य’ आन्दोलन क्या है, इसका उद्देश्य, मर्म और कार्यक्रम क्या है? कितने ही ऐसे पक्ष उपस्थित किये जाते है, जिनमें इसे एक आदर्शवाद बताया जाता है, और कहा जाता हैं कि यह संसार की पेचीदा गुत्थियों को नहीं सुलझा सकता। जब कि राजनैतिक दावपेचों का सब जगह बोल बाला है, तब बेचारा। ‘सत्य’ कहाँ टिक सकेगा? राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और शारीरिक समस्यायें भला सत्य के आधार पर कैसे सुलझ सकती है?

इस प्रकार के सन्देह उठने का कारण यह है कि शैतानी सभ्यता की चमचमाहट ने हमारी आंखों को ऐसे चौंधिया दिया है कि हमें वस्तुस्थिति ठीक प्रकार दिखाई नहीं पड़ती। ‘सत्य’ आन्दोलन अव्यवहारिक और काल्पनिक आदर्शवाद नहीं है, यह ऐसा प्रचंड और शक्तिशाली तत्व है, जो संसार की सारी उलझी हुई गुत्थियों को सुलझा सकता है। इस आन्दोलन का मर्म मनुष्य का दृष्टिकोण भौतिक जगत से हटा कर आध्यात्मिक बनाना है। जानना चाहिये कि आध्यात्मिकता, गाँजे बाज और हरामखोर भिख-मंगों का पेशा नहीं हैं, वरन् मनुष्य जीवन की सब से प्रथम और अनिवार्य आवश्यकता है। पशु से मनुष्य बनाने वाली वस्तु आध्यात्मिकता ही है। शास्त्रों में कहा गया है कि ब्रह्माण्ड की कुँजी पिंड के अन्दर है। हर व्यक्ति अपने लिए एक अलग संसार बनाता है जो उसके अन्दर होता है। वास्तव में संसार बनाता है और उसकी रचना उस पदार्थ से करता है जो उसके अन्दर होता है। वास्तव में संसार बिल्कुल जड़ है, उसमें किसी को सुख दुःख पहुँचाने की शक्ति नहीं है। मकड़ी अपना जाला खुद बुनती है और उसमें विचरण करती है। हम अपने लिए अपना संसार स्वतंत्र रूप से बनाते है और जब चाहें उसमें परिवर्तन कर लेते है।

एक व्यक्ति क्रोधी है, उसे प्रतीत होगा कि सारी दुनिया उससे लड़ती झगड़ती है, कोई उसे चैन से नहीं बैठने देता, किसी में भलमनसाहत है ही नहीं, जो आता है उससे उलझता चला आता है। एक व्यक्ति झूठ बोलता है-उसे लगता है कि सब लोग अविश्वासी है सन्देह करने वाले है, किसी पर भरोसा ही नहीं करते। एक व्यक्ति नीच है, वह देखता है कि सारी दुनिया घृणा करने वालों, घमंडियों, स्वार्थियों से भरी हुई है, किसी में सहानुभूति है ही नहीं। एक व्यक्ति निकम्मा और आलसी है, उसे मालूम होता है कि दुनिया में काम है ही नहीं, सब जगह बेकारी फैली हुई है व्यापार नष्ट हो गया। नौकरियों नहीं है, लोग बहुत काम लेकर थोड़ा पैसा देना चाहते है। एक व्यक्ति बीमार है-उसे दिखाई पड़ता है कि दुनिया में सारे भोजन अस्वादिष्ट, हानिकर और नुकसान पहुँचाने वाले है। इसी प्रकार व्यभिचारी, लम्पट, मूर्ख, अशिक्षित, कंजूस, सनकी, गँवार, पागल, भिखारी, चोर तथा अन्याय मनोविकारों वाले व्यक्ति अपने लिए एक अलग दुनिया बनाते हैं। वे जहाँ जाते हैं, उनकी दुनिया उनके साथ जाती है।

बनावट और छल कुछ ही क्षणों में खुल जाते हैं और मनुष्य को असली रूप प्रकट होने में देर नहीं लगती। जहाँ उसका गुण, कर्म, स्वभाव प्रकट हुआ, बनावट का पर्दा फटा कि उनकी दुनिया उनके सामने आकर खड़ी हो जाती है। इसी प्रकार विद्वान, साधु कर्मनिष्ठ, उत्साही, साहसी, सेवा भावी, उपकारी, बुद्धिमान् और आत्मविश्वासी लोगों की दुनिया अलग होती है। बुरे व्यक्तियों को जो दुनिया बुरी मालूम होती थी वही अच्छे व्यक्तियों के लिए अच्छी बन जाती है। फिर जड़ पदार्थों की अनुभूतियों के बारे में तो कहना ही क्या? दो व्यक्तियों के पास एक-एक हजार रुपये हैं। एक व्यक्ति का मन दूसरी तरह का है वह रुपयों को जमीन में दबा कर रखता है, कहीं चोर न आ जाय इसलिए रात भर जागता है, कोई इस स्थान को भाँप न ले इसलिए चिन्तित रहता है, सन्देह करता है कि घर का कोई अविश्वासी आदमी रुपयों लेने के लिए उसे जहर देकर न मार डाले। इसके विपरीत दूसरा आदमी इन रुपयों से एक कारखाना खोलता है, उसमें काम करने वाले मजदूरों से प्यार करता है उन्हें रोटी देता है, मजदूर उस पर जान देते हैं। सब लोग हँसी-खुशी का जीवन बिताते हैं दोनों व्यक्तियों पर धन एक सा ही है पर एक के लिए वह चिन्ता, विपत्ति, आशंका और भय के हेतु बना हुआ है दूसरे को प्रसन्नता दे रहा है। वास्तव में रुपये बेचारे जड़ हैं, वे न तो किसी को सुख दे सकते हैं और न दुःख, मनुष्य एक प्रकार का कुम्हार है जो वस्तुओं की मिट्टी से अपनी इच्छानुसार बर्तन बनाता है। दुनिया किसी के लिये दुःख का कारण हैं किसी के लिए सुख का हेतु हैं। वास्तव में दुनिया कुछ नहीं है। अपनी छाया ही संसार के दर्पण में प्रतिबिम्बित हो रही है।

‘सत्य’ आन्दोलन मनुष्यों में प्रेरणा करता है कि अन्तर में मुँह डालो। अपना दृष्टिकोण बदलो, अपना और दुनिया का स्वरूप समझो अपने को अच्छा बना डालो, बस सारी दुनिया तुम्हारे लिए अच्छी बन जाएगी। तुम सत्यनिष्ठ बनो, दुनिया तुम्हारे साथ सत्य का आचरण करेगी। तुम प्रेम करो, दसों दिशाओं में तुम्हारे ऊपर प्रेम की वर्षा होगी। न्याय पर आरुढ़ हो तो, तुम्हारे सामने अन्याय खड़ा न रह सकेगा। सत्यवादी अपने को सुधारता है, दूसरों को व्यक्तिगत सुधार करने के लिए कहता है। जो लोग इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लेते हैं वे जीवन मुक्त हो जाते हैं। बन्धन उन्हें बाँधते नहीं, वरन् वह अपने लिए जैसी चाहता है वैसी स्थिति स्वयं उत्पन्न कर लेता है। फटे चिथड़ों में लिपटा हुआ साधु राजगद्दी का आनन्द लूटता है, जिन काम, क्रोध, लोभ मोह के बन्धनों में जकड़ी हुई दुनिया त्राहि त्राहि करती है, सत्य का शोधक उनके वास्तविक स्वरूप का अनुभव करता है और दुख और सुख में समान रूप से खड़ा मुस्कराता रहता है। सत्य धर्म का गुप्त रहस्य यह है कि हर व्यक्ति अपने को सुधारे और दूसरों के साथ मनुष्य के कर्तव्य पालन करे जिससे उसके वैसी ही स्वर्गीय दुनिया बन जावे जैसा कि वह स्वयं है।

शायद आप राजनीतिज्ञ हैं और स्वतन्त्रता चाहते हैं शायद आप समाज सुधारक हैं और समाज में क्रांतिकारी सुधार करना चाहते हैं, शायद आप धर्म प्रचारक हैं और दुनिया को धर्मात्मा बनाना चाहते हैं, शायद आप अर्थशास्त्री हैं और गरीबों को अमीर बनाना चाहते हैं, शायद आप एकतावादी हैं और साम्प्रदायिक एकता स्थापित करना चाहते हैं आप अपने उद्देश्य पूरे करने के लिए बड़ी-2 योजना बनाते हैं और कार्य आरंभ करते हैं, आपका आन्दोलन थोड़ा चलकर बन्द हो जाता है। क्या आपने विचार किया कि ऐसा क्यों होता है? कारण यह है कि आप गधों को रथ में जोतते हैं और उस रथ को विमान की तरह उड़ने की आशा करते हैं आप भूल जाते हैं कि जिनके ऊपर रथ चलाने का भार डाला जा रहा है वे गंधें हैं, पिट-कुटकर जरा-जरा घिसटना उनकी आदत है, यह बेचारे रथ को कहाँ ले पहुँच सकते हैं। महात्मा गाँधी कहते हैं कि स्वराज्य के लिए मुझे मुट्ठी भर सच्चे कर्मनिष्ठ चाहिएं। मालवीय जी कहते हैं हमें धर्म पर प्राण देने वाले कर्मवीर चाहिएं, चाहे वे थोड़े ही क्यों न हों। हर क्षेत्र में उन मनुष्यों की आवश्यकता है जो मनुष्यता से पूर्ण हों। चाहे बल, विद्या, बुद्धि, हममें न हो पर यदि मनुष्यत्व है, सत्यनिष्ठा है आत्मनिर्भरता है, तो अन्य सारे गुण आज नहीं तो कल आ जाएंगे और यदि न भी आ जावें तो कोई काम लटका न रहेगा। इसके विपरीत जिसमें सत्यनिष्ठा नहीं है, वह अपने बल, बुद्धि और विद्या का दुरुपयोग करेगा जिसका दृष्टिकोण भौतिक है, जो आत्मा और परमात्मा पर विश्वास नहीं करता वह किसी कार्य में सच्चा नहीं रह सकता। इन्द्रिय तृप्ति और भौतिक सुख जिसका उद्देश्य हो ऐसा व्यक्ति पत्ते-पत्ते पर डोलेगा और संकुचित स्वार्थ से उसकी दृष्टि ऊँची न उठ सकेगी। ऐसी जनता भली किस प्रकार की सफलता प्राप्त कर सकती है?

मनुष्य का अपना उद्धार इसमें है कि वह सत्यनिष्ठ बने, क्योंकि आत्मचेतना के अनुसार ही अपने लिए भले या बुरे संसार की रचना होती है। देश, जाति और विश्व की छोटी से लेकर बड़ी तक समस्त समस्याएं और गुत्थियाँ इसी एक कुँजी से खुल सकती हैं कि लोग आत्मवान् बनें, आत्म निर्भरता सीखें। सत्य धर्म का एक मात्र मर्म यह है कि मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य बने। आत्मा में परमात्मा की ज्योति जगमगावे। यह सम्पूर्ण उन्नतियों का मूल मन्त्र है इसलिए इसका स्थान सर्वोपरि है। मूल को सींचने से जैसे पत्ते हरे-भरे हो जाते हैं वैसे ही सत्यधर्म का प्रसार होने से मानव जाति के सद्गुण विकसित होंगे और जो कठिनाइयाँ बेचैन किये हुए हैं वे बड़ी सुगमता से दूर हो जाएंगी। इसलिए सब प्रकार के सुधारकों को अखण्ड ज्योति एक प्रोग्राम देती है कि वे सत्यधर्म का प्रसार करे हर व्यक्ति को सत्यनिष्ठ बनावे।


प्रेम और कृतज्ञता

(ऋषि तिरुवल्लुवर)

निस्वार्थ भाव से, बदला न पाने की इच्छा से और अहसान न जताने के विचार से जो उपकार दूसरों के साथ किया जाता है उसके फल की समता और तीनों लोग मिलकर भी नहीं कर सकते। बदला पाने की इच्छा रहित जो भलाई की गई है, वह समुद्र की तरह महान है। कोई मनुष्य किसी आवश्यकता से व्याकुल हो रहा है, उस समय उसकी मदद करना कितना महत्वपूर्ण है, इसे उस व्याकुल मनुष्य का हृदय ही जानता है। जरूरतमंदों को एक राई के बराबर मदद देना उससे बढ़ कर है कि बिना जरूरत वाले के पल्ले में एक पहाड़ बाँध दिया जावे। किसी को कष्ट में से उबारना, जन्म जन्मान्तरों के लिए अपना पथ निर्माण करना है।

जिसने तुम्हारे साथ भलाई की है उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट करो। सहायता का मूल्य वस्तु के मूल्य से मत नापो, वरन् उसका महत्व अपनी आवश्यकता को देखते हुए नापो कि उस समय यदि वह मदद तुम्हें न मिलती तो तुम्हारा क्या हाल होता। उनका अहसान मत भूलो जिन्होंने मुसीबत के समय तुम्हारी मदद की थी। उपकार को भूल जाना नीचता हैं पर उन्हें क्या कहें जो भलाई के बदले बुराई करते है? वे मनुष्य बड़े अभागे हैं जो उपकारों का बदला अपकार से देते हैं। संसार के समस्त पापियों का तो उद्धार होगा पर कृतघ्न का कभी कल्याण न हो सकेगा।

धरती माता से उस दिन मनुष्यों का बोझ न उठाया जा सकेगा जिस दिन कि सब लोग अपनी श्रेष्ठता को छोड़ कर नीच बन जावेंगे। आदमी की चमड़ी में क्या खूबसूरती है? सुन्दर तो उसके कर्म हैं। सत्यप्रियता, निष्कपटता, श्रेष्ठ आचरण, सद् व्यवहार और उदारता यही पाँच स्तम्भ हैं जिनके ऊपर श्रेष्ठ आचरण का भवन खड़ा किया जाता है।


सत्य की अनन्त शक्ति

(महात्मा गाँधी)

सत्य शब्द की उत्पत्ति सत् से हुई है। सत् का अर्थ है होना। तीनों काल में, एक ही रूप में अस्तित्व एक मात्र परमात्मा का ही है। जिस सज्जन ने ऐसे सत्य की भक्ति करके उसे अपने हृदय में सदा के लिये स्थान दे दिया है, उसे सौ करोड़ बार मेरा नमस्कार हैं। इस सत्य की सेवा करने के लिये मैं जी जान से कोशिश कर रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि उसके लिये हिमालय की चोटी से कूद पड़ने की हिम्मत मुझ में है। फिर भी मैं उससे बहुत दूर हूँ। ज्यों-ज्यों मैं नजदीक पहुँचता जाता हूँ त्यों त्यों मुझे अपनी शक्ति का ज्ञान अधिकाधिक होता जाता है और त्यों-त्यों यह ज्ञान मुझे नम्र बनाता जाता है। हाँ अपनी निर्जीवता को न जानना और अभिमान रखना संभावनीय है। परन्तु जो जानता है, उसका गर्व दूर हो जाता है। मेरा तो कभी का दूर हो गया तुलसीदास जी ने अपने को शठ की उपमा दी है। उसका मर्म मैं ठीक-ठीक समझ सकता हूँ, यह मार्ग शूरवीरों का है, कायरों का यहाँ काम नहीं जो चौबीसों घंटे प्रयत्न करता है। खाते पीते बैठते, सोते, सूत कातते हुए, जो केवल सत्य का ही चिंतन करता है, वह अवश्य सत्यमय हो जाता है और जब किसी के अन्दर सत्य का सूर्य संपूर्णतः प्रकाशित होता है, तब वह छिपा नहीं रहता। तब उसे बोलने बतलाने या समझाने की जरूरत नहीं रहती या उसके बोल में इतना बल होता है, इतना जीवन भरा होता है कि उसका असर लोगों पर तुरन्त होता हैं। ऐसा सत्य मुझ में नहीं। हाँ, इस मार्ग में अलबत्ता मैं विचरण कर रहा हूँ। अतएव ‘रुख नहीं वह रेड प्रधान’ की तरह मेरी यह दीन दशा हैं।

सत्य में प्रेम होता है। सत्य में अहिंसा है, ब्रह्मचर्य अस्तेय आदि का समावेश हो जाता है। पाँच यम तो केवल सुविधा के लिये बनाये गए हैं। सत्य को जान लेने के बाद जो हिंसा करता है, वह सत्य का त्याग करता है। सत्य को जान लेने के बाद जो व्यभिचार करता है, वह तो मानो सूर्य के रहते हुए अंधेरे ही हस्ती को मानता है। ऐसे शुद्ध सत्य का पूरी तरह पालन करने वाला एक मनुष्य भी इस वर्ष के अन्त में पहले निकल आवे, तो स्वराज्य मिले बिना नहीं रह सकता, क्योंकि उसका कहना सबको मानना ही पड़े। सूर्य का प्रकाश किसी को बताना नहीं पड़ता। सत्य स्वयं प्रकाशवान है। और स्वयं सिद्ध है। ऐसा सत्य आचरण इस विषमकाल में कठिन तो है, पर असंभव नहीं। यदि कुछ ही लोग कुछ ही अंश में सत्य के आग्रही हो जाएं, तो भी स्वराज्य प्राप्त कर लें। ऐसे सत्य के सख्त आग्रही अगर हम कुछ लोग ही हो जाएं, तो भी स्वराज्य मिल जाय, पर हम सच्चे हैं। सत्य के बदले सत्य का ढोंग नहीं काम दे सकता। भले ही रुपये में एक आना हो पर सच्चे। इस थोड़े बहुत सत्य में कोई भी भूले चूके, जाने अनजाने में वाणी के असत्य का समावेश तो हरगिज न करें। मेरी तो यह महत्वाकाँक्षा है कि इस धर्म के यज्ञ में हम सब लोग सत्य का सेवन करने वाले हो जाएं।


Quotation

जो स्त्री पुरुष अपनी शारीरिक संस्कार की उपेक्षा करते हैं, शारीरिक उन्नति की तरफ से बेपरवाह रहते हैं वे कभी महत्व को नहीं प्राप्त कर सकते।

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मन को दृढ़ बनाने की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी कि शरीर की पुष्टि के वास्ते भोजनों की जरूरत है।


सत्य स्वरूप आत्मा

(पवित्र अविनाशी और निर्लिप्त आत्मा मैं हूँ)

अखंड आत्मा, अखंड जीवन और अखंड जगत के महान तत्व ज्ञान का मंथन करने पर वेद वाणी उत्पन्न होती है कि-”पवित्र अविनाशी और निर्लिप्त आत्मा मैं हूँ।” यही सत्य धर्म का प्रथम सूत्र है। इस सूत्र की विस्तृत व्याख्या करने पर यह प्रतीत होगा कि आत्मा के सम्बन्ध में वास्तविकता की जानकारी प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि उसके बिना जीवन यात्रा का ठीक स्वरूप ही सामने नहीं आता। कोई उद्देश्य ही स्थिर नहीं होता और हम परिस्थितियों के प्रवाह में उधर उधर उड़ते फिरते हैं। सत्य को हृदयंगम किये बिना किसी बात पर सुस्थिरता नहीं हो सकती और सुस्थिरता के बिना शान्ति का मिलना असंभव है।

“मैं पवित्र अविनाशी और निर्लिप्त आत्मा हूँ” इस महान सत्य को स्वीकार करते ही मानव जीवन का दृष्टिकोण बदल जाता है। वह परिस्थिति के भव बन्धन में बन्धा हुआ इधर उधर नाचता नहीं फिरता, वरन् अपने लिए वैसे ही संसार का जान बूझ कर निर्माण करता है, जैसा कि वह पसंद करता है। असल में यह आत्म-सम्मान, आत्म-विश्वास और आत्मपरायणता का मार्ग है। यदि आप अपना सम्मान करते हैं, अपने को आदरणीय मानते हैं अपनी श्रेष्ठता और पवित्रता पर विश्वास करते हैं तो सचमुच वैसे ही बन जात हैं। योग शास्त्र पुकार-पुकार कर कहता है कि जो समझता है कि मैं शिव हूँ, जो समझता है कि मैं जीव हूँ, वह जीव है।’ मोटी कहावत है कि “लड़के का नाम घर से रखा जाता है।” अपने लड़के का नाम यदि आप बुरा रखेंगे, तो यह आशा रखना व्यर्थ है कि बाहर वाले उसे किसी अच्छे नाम से पुकारेंगे। मनोविज्ञान शास्त्र साक्षी है कि जिन बालकों को उनके माता पिता अध्यापक या अभिभावक सदा मूर्ख बेवकूफ , नालायक आदि कह कर उसे अपमानित और लाँछित किया करते हैं उस बालक के लिए बड़े होकर महत्व प्राप्त करना कठिन है। मनुष्य गीली मिट्टी के समान है, जो संस्कारों द्वारा भला या बुरा बनाया जाता है। हमारा बाह्य मस्तिष्क जिस प्रकार के विश्वास अपने अन्दर धारण करता है, पिछला गुप्त मस्तिष्क उसे किस प्रकार स्वीकार करके सूचना चेतना में ग्रहण कर लेता है, इसका मर्म मैस्मरेजम और हिप्नोटिज्म के जानकार भली प्रकार समझते हैं। जो व्यक्ति बार बार अपने सम्बन्ध में बुरे विचार करेगा, हीनता और तुच्छता के भाव रखेगा, वह निःसंदेह कुछ समय में वैसा ही बन जायगा। मैं नीच हूँ पापी हूँ, दुष्ट हूँ, कुकर्मी हूँ, नरकगामी हूँ, आलसी हूँ, अकर्मण्य हूँ, तुच्छ हूँ, दास हूँ,असमर्थ हूँ, दीन हूँ, दुखी हूँ, इस प्रकार के मनोभाव रखने का स्पष्ट फल यह होता है कि हमारे जीवन की अन्तः चेतना उसी ढांचे में ढल जाती हैं और रक्त के साथ दौड़ने वाली विद्युत शक्ति में ऐसा प्रवाह उत्पन्न हो जाता है, जिसके द्वारा हमारे सारे काम काज ऐसे होने लगते हैं, जिनमें उपरोक्त भावनाओं का प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखाई देने लगता है। आत्मतिरस्कार करने वालों के कामों का देखकर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह नीच वृत्ति का, अकर्मण्य, आलसी, दान दीन और अपाहिज है। अपने आप का तिरस्कार करने वाले आत्म हत्यारे अपना यह लोक भी बिगाड़ते हैं और परलोक भी। उनकी उन्नति के स्रोत रुक जाते हैं और दीनता की सड़ी हुई कीचड़ में कीड़ों की तरह बुजबुजाते रहते हैं। यह कीड़े सदैव दुख दरिद्र से घिरे रहेंगे। उनका उद्धार परमात्मा से भी न हो सकेगा, क्योंकि कृपा करके उन्हें कीचड़ से बाहर कोई निकाल भी दे तो वे फिर अपने उन्हीं पूर्व संस्कारों की नाली में।


सद्ज्ञान

महर्षि उद्दालक आरुणि का पुत्र श्वेतकेतु चौबीस वर्ष तक गुरु-गृह में रह कर चारों वेदों का पूर्ण अध्ययन करके घर लौटा, तो उसने मन ही मन विचार किया कि मैं वेद का पूर्ण ज्ञाता हूँ, मेरे समान कोई पंडित नहीं है, मैं सर्वोपरि विद्वान और बुद्धिमान हूँ। इस प्रकार के विचारों से उसके मन में गर्व उत्पन्न हो गया और वह उद्धत एवं विनयरहित होकर बिना प्रणाम किये ही पिता के सामने आकर बैठ गया। आरुणि ऋषि उसका नम्रता रहित उद्धत आचरण देख कर जान गये कि इसको वेद के अध्ययन से बड़ा गर्व हो गया है। तो भी उन्होंने उस अविनय पुत्र पर क्रोध नहीं किया और कहा-हे श्वेतकेतु! तू ऐसा क्या पढ़ आया है, जिससे अपने को सब से बड़ा पंडित समझता है और इतना अभिमान में भर गया है। विद्या का स्वरूप तो विनय से खिलता है। अभिमानी पुरुष के हृदय में सारे गुण तो दूर चले जाते हैं और समस्त दोष अपने आप उसमें आ जाते हैं। तूने अपने गुरु से यह सीखा हो, तो बता कि ऐसी कौन सी वस्तु है कि जिस एक के सुनने से बिना विचार की हुई सब वस्तुएँ सुनी जाती हैं, जिस एक के विचार से बिना विचार की हुई सब वस्तुओं का विचार हो जाता हैं। जिस एक के ज्ञान से नहीं जानी हुई, सब वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है।” आरुणि के ऐसे वचन सुनते ही श्वेतकेतु का गर्व गल गया। उसने सोचा मैं ऐसी किसी वस्तु को नहीं जानता, मेरा अभिमान मिथ्या हैं। वह नम्र होकर विनय के साथ पिता चरणों पर गिर पड़ा और हाथ जोड़ कर कहने लगा- भगवान्, जिस एक वस्तु के श्रवण, विचार और ज्ञान से सम्पूर्ण वस्तुओं का श्रवण, विचार और ज्ञान हो जाता है, उस वस्तु को मैं नहीं जानता। आप उस वस्तु का उपदेश कीजिए। आरुणि ने कहा-हे सौम्य ! जैसे कारण रूप मिट्टी के कार्य रूप घड़ा, बर्तन आदि समस्त वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है और पता लग जाता है कि घट आदि कार्य रूप वस्तुएं सत्य नहीं हैं, केवल वाणी के विकार हैं, सत्य तो केवल मिट्टी ही है। जैसे सोने का ज्ञान होने से आभूषणों का और लोहे का ज्ञान होने से औजार, हथियार का मर्म समझ में आ जाता है कि आभूषण, औजार आदि सत्य नहीं हैं, वरन् सोना या लोहा ही सत्य है, इसी तरह का वह ज्ञान है।

श्वेतकेतु ने विस्तारपूर्वक उस ज्ञान को वर्णन करने के लिए कहा तो महर्षि आरुणि ने कहा कि हे सौम्य! सावधान होकर सुन। “आरम्भ में केवल एक ही सत् ब्रह्म था, उसने संकल्प किया कि मैं एक से बहुत हो जाऊँ ओर वह अदृश्य से दृश्य संसार बन गया। समस्त जगत उस परमात्मा का ही स्वरूप है। हे श्वेतकेतु ! तत्वमसि, वह परमात्मा तू ही हैं। हे सौम्य ! जैसे-जैसे समुद्र का पानी बादल, वर्षा, नदी आदि में घूमता हुआ पुनः समुद्र में मिल जाता है, वैसे ही ये जीव भी सत् में से निकल कर नाना योनियों में घूमते हुए उस सत् में ही मिल जाते हैं। हे पुत्र ! जैसे वृक्ष के पत्तों को हानि होने से वह सूख नहीं जाता, इसी तरह शरीरों की क्षति होने से जीव मृत्यु को प्राप्त नहीं होता। जीव कभी भी नहीं मरता, यह सत् आत्मा तू ही है।

उपरोक्त कथा में उपनिषद्कार का तात्पर्य यह बताने का है कि आत्म ज्ञान ही सम्पूर्ण ज्ञानों का पिता है। ब्रह्म को जाने बिना चाहे जितना ज्ञान संपादन कर लिया जाय, सब मिथ्या है। उससे तनिक भी सुख और शान्ति उपलब्ध न होगी। अनेक प्रकार के ऐश्वर्य और भोगोपभोग इकट्ठे होने से चिन्ता, बेचैनी और कृष्णा की ही वृद्धि होगी। पाप, ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार ही पल्ले बंधेंगे। इस प्रकार आत्मज्ञान के बिना जो भी विद्या बुद्धि प्राप्त होगी, जो भी सुख सम्पदा एकत्रित होगी, वह केवल बन्धन एवं क्लेश को उत्पन्न करने वाली ही होगी। श्वेतकेतु चारों वेद पढ़ कर आया, तो वह अहंकार से ग्रसित हो गया और पिता जैसे पूजनीय देव के सम्मुख भी अविनय पूर्ण उद्धत आचरण करने लगा। नहुष को जब इन्द्र पद प्राप्त हुआ, तो वह कामासक्त होकर ऋषियों को पालकी में जोतने से भी न हिचका। रावण ने विज्ञान का आचार्यत्व प्राप्त किया, तो पृथ्वी पर अनाचार का झंडा गाढ़ दिया। हिरण्यकश्यपु न अपने को ही ईश्वर घोषित कर दिया। सृष्टि के आदि से अब तक का इतिहास साक्षी है कि आत्मज्ञान के बिना, ब्रह्म विद्या को प्राप्त किये बिना, कोई व्यक्ति सच्चा मनुष्य नहीं बन सकता। क्योंकि जीवन के सारे कार्य उसी दृष्टिकोण के अनुसार होते हैं, जिन्हें कि मनुष्य जीवन के मूल सिद्धान्त के रूप में स्वीकार कर लेता है। जीवन को ‘भस्मीभूत’ समझ कर ऋण कृत्वा घृनं पिवंत’ की नीति अपनाने का सिद्धान्त अपना कर आज का मनुष्य पिशाच बन गया है। इस पिशाचत्व से मानवता को मुक्त करने के लिए सब से अधिक आवश्यकता ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने की है।

एक कथा है कि धुन्धकाली जब पूर्व कर्मों के कारण पिशाचत्व को प्राप्त हुआ, तो उसके भाई ऋषि गोकण बहुत दुखी हुए। उन्होंने भाई का उद्धार करने के लिए अनेकानेक उपाय किये, पर उसका उद्धार किसी प्रकार न हुआ। अन्त में उन्होंने निश्चय किया कि पिशाचत्व की मुक्ति के लिये ब्रह्मज्ञान देना चाहिए। अतएव उन्होंने श्रीमद्भागवत का तत्वज्ञान उसे दिया। उस ज्ञान को प्राप्त करने से सात दिन में ही धुन्धकाली का पिशाचत्व छूट गया और वह देव स्वरूप में प्रकट होकर भाई के प्रति कृतज्ञता प्रकट हुआ। सुरपुर में (श्रेष्ठ व्यक्तियों के साथ में) रहने का अधिकार हो गया। मानवता के ऊपर पिशाचत्व की जो अंधेरी छाया है वह तब तक नहीं हट सकती, जब तक ब्रह्मज्ञान का सूर्य उदय नहीं होता। मनुष्य के व्यक्तिगत और समाज के सामूहिक जीवन में सुख शान्ति कायम करने का एक ही उपाय है, वह यह कि व्यक्ति अपने अस्तित्व के सम्बन्ध में, अपने जीवन के सम्बन्ध में और अपने लिए काम आने वाली वस्तुओं के सम्बन्ध में ठीक-ठीक जानकारी रखे और उस सुस्थिर जानकारी के आधार पर जीवन यापन सम्बन्धी एक मजबूत नीति की व्यवस्था करे, अपना एक ठोस दृष्टिकोण बनावे। हवा के साथ इधर उधर न उड़ने फिरे, वरन् सिद्धान्तों के लिए उद्देश्यपूर्ण जीवन जिये। इस ब्रह्म ज्ञान को अपनाते ही मनुष्य के देवत्व का उदय होता है और उन देवताओं के बढ़ने से ही यह लोक देव पुरी बन जावेगी, जिस समय ऐसे उद्देश्य जीवों मनुष्यों की संख्या बढ़ेगी, तब उस कोण को ही सतयुग के नाम से पुकारा जायगा।


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विद्वत्ता एक अच्छी चीज है और हर एक आदमी के हृदय में उसको प्राप्त करने की तीव्र आकाँक्षा होनी चाहिए, किन्तु दृढ़ व्यक्तित्व प्राप्ति के वास्ते यह अकेली काफी नहीं होती, इसके साथ-2 संस्कार भी होना चाहिये।

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यदि आप दृढ़ व्यक्तित्व पाने की इच्छा रखते हैं, यदि अपने जीवन को प्रभावशाली बनाना चाहते हैं, तो अपने मन को सच्चे रूप से संस्कृत तथा शिक्षित बनाओ।

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हर आदमी का जीवन पूर्ण रूप से उसके मन से ही पैदा होता है।


क्या सत्य, क्या असत्य

मोटे तौर से जो बात जैसी सुनी है उसे वैसी ही कहना ‘सत्य’ कहा जाता है। किन्तु सत्य की यह परिभाषा बहुत ही अपूर्ण और असमाधानकारक है। सत्य एक अत्यन्त विस्तीर्ण और व्यापक तत्व है। वह सृष्टि निर्माण के आधार स्तंभों में से सर्वप्रधान है। सत्य भाषण उस महान सत्य का एक अत्यन्त छोटा अणु है, इतना छोटा जितना समुद्र के मुकाबले में पानी की एक बूँद।

सत्य बोलना चाहिए, पर सत्य बोलने से पहले सत्य की व्यापकता और उसके तत्व ज्ञान को जान लेना चाहिए क्योंकि देश, काल और पात्र के भेद से बात को तोड़ मरोड़ कर या अलंकारिक भाषा में कहना पड़ता है। धर्म ग्रन्थों में मामूली से कर्मकाण्ड के फल बहुत ही बढ़ा चढ़ा कर लिखे गये हैं। जैसे गंगा स्नान से सात जन्मों के पाप नष्ट होना, व्रत, उपवास रखने से स्वर्ग मिलना, गौ दान से वैतरणी तर जाना, मूर्ति पूजा से मुक्ति प्राप्त होना, यह सब बातें तत्व ज्ञान की दृष्टि से असत्य हैं, क्योंकि इन कर्मकाण्डों से मन में पवित्रता का संचार होना और बुद्धि का धर्म की ओर झुकना तो समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि इतनी सी मामूली क्रियाओं का इतना बड़ा फल कैसे हो सकता है। यदि होता तो योग, पक्ष और तप जैसे महान साधनों की क्या आवश्यकता रहती? टके सेर मुक्ति का बाजार गर्म रहता। अब प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या वह धर्म ग्रंथ झूठे हैं? क्या उन ग्रन्थों के रचयिता महानुभावों न असत्य भाषण किया है? नहीं उनके कथन में भी रत्ती भर झूठ नहीं है और न उन्होंने किसी स्वार्थ बुद्धि से असत्य भाषण किया है। उन्होंने एक विशेष श्रेणी के अल्प बुद्धि के, अविश्वासी, आलसी और लालची व्यक्तियों को, उनकी मनोभूमि परखते हुए एक खास तरीके से अलंकारिक भाषा में समझाया है। ऐसा करना अमुक श्रेणी के व्यक्तियों के लिये आवश्यक था, इसलिये धर्म ग्रन्थों का वह आदेश एक सीमा में सत्य ही है।

बच्चे के फोड़े पर मरहम पट्टी करते हुए डॉक्टर उसे दिलासा देता है। बच्चे! डरो मत, जरा भी तकलीफ न होगी। बच्चे उसकी बात पर विश्वास कर लेता है, किन्तु डॉक्टर की बात झूठी निकलती है। मरहम पट्टी के वक्त बच्चों को काफी तकलीफ होती है, वह सोचता है कि डॉक्टर झूठा है, उसने मेरे साथ असत्य भाषण किया। परन्तु असल में यह झूठ बोलना नहीं है।

अध्यापक बच्चों को पाठ पढ़ाते हैं, गणित सिखाते हैं समझाने के लिए उन्हें ऐसे उदाहरण देने पड़ते हैं, जो अवास्तविक और असत्य होते हैं, फिर भी अध्यापक को झूठा नहीं कहा जाता।

जिन्हें मानसिक रोग हो जाता है या भूत प्रेत लगने का वहम हो जाता है, उनका ताँत्रिक या मनोवैज्ञानिक उपचार इस प्रकार करना पड़ता हैं जिनसे पीड़ित का वहम निकल जाय। भूत लगने पर, भुतहे ढंग से उसे अच्छा किया जाता है, यदि वहम बता दिया जाय तो रोगी का मन न भरेगा और उसका कष्ट न मिटेगा तान्त्रिक और मनोविज्ञान के उपचार में प्रायः नब्बे फीसदी झूठ बोल कर रोगी को अच्छा करना पड़ता है, परन्तु वह सब झूठ की श्रेणी में नहीं ठहराया जाता।

राजनीति में अनेक बार झूठ को सच सिद्ध किया जाता है। दुष्टों से अपना बचाव करने के लिए झूठ बोला जा सकता है। दम्पत्ति अपने गुप्त सहवास को प्रकट नहीं करते। आर्थिक, व्यापारिक या अन्य ऐसे ही भेदों को प्रायः सच-सच नहीं बताया जाता।

कई बार सत्य बोलना भी निषिद्ध होता है। काने को काना और लंगड़े को लंगड़ा कह कर संबोधन करना कोई असत्य भाषण थोड़े ही है। फौजी गुप्त भेदों को प्रकट कर देने वाला अथवा दुश्मन को अपने देश की सच्ची सूचना देने वाला भी अपराधी समझा जाता है और कानून से उसे कठोर सजा मिलती है। भागी हुई गाय का पता कसाई को बता देना क्या सत्य भाषण हुआ?

इस प्रकार बोलने में ही सत्य को मर्यादित कर देना एक बहुत बड़ा भ्रम है, जिसमें अविवेकी व्यक्ति ही उलझे रह सकते हैं। सच तो यह है कि लोक कल्याण के लिये देश, काल और पात्र का ध्यान रखते हुए नग्न सत्य की अपेक्षा अलंकारिक सत्य भाषण से ही काम लेना पड़ता है। जिस वचन से दूसरों की भलाई होती हो, सन्मार्ग को प्रोत्साहन मिलता हो वह सत्य है। कई बार हीन चरित्र वालों की झूठी प्रशंसा करने पर वे एक प्रकार की लोक लाज में बँध जाते हैं और स्वयंमोहन विद्या के अनुसार अपने को सचमुच प्रशंसनीय अनुभव करते हुए निश्चयपूर्वक प्रशंसा योग्य बन जाते हैं। ऐसा असत्य भाषण सत्य कहा जायगा। किसी व्यक्ति के दोषों को खोल-खोल कर उससे कहा जाय तो वह अपने को निराश, पराजित, और पतित अनुभव करता हुआ वैसा ही बन जाता है। ऐसा सत्य असत्य से भी बढ़कर निन्दनीय है।

भाषण सम्बन्ध सत्य की परिभाषा होनी चाहिए कि जिससे लोक हित हो, वह सत्य और जिससे अहित हो वह असत्य है। मित्र धर्म का विवेचन करती हुई रामायण उपदेश देती हैं कि-’गुण प्रकटै अवगुणहिं दुरावा” यहाँ दुरोध को, असत्य को, धर्म माना गया है। आप का भाषण कितना सत्य है कितना असत्य, इसकी परीक्षा इस कसौटी पर कीजिये कि इससे संसार का कितना हित और कितना अहित होता है। सद्भावनाओं की उन्नति होती है या अवनति, सद्विचारों का विकास होता है या विनाश। पवित्र उद्देश्य के साथ निस्वार्थ भाव से परोपकार के लिए बोला हुआ असत्य भी सत्य है और बुरी नीयत से, स्वार्थ के वशीभूत होकर पर पीड़ा के लिए बोला गया सत्य भी असत्य हैं। इस मर्म को भली भाँति समझ कर गिरह बाँध लेना चाहिए।

वास्तविक और व्यापक सत्य ऊँची वस्तु है। वह भाषण का नहीं, वरन् पहिचानने का विषय है। समस्त तत्वज्ञानी उसी महान तत्व की अपनी अपनी दृष्टि के अनुसार व्याख्या कर रहे हैं। विश्व की रंगस्थली, उसमें नाचने वाली कठपुतलियां, नचाने वाला तंत्री तत्वतः क्या हैं, इसका उद्देश्य, और कार्य कारण क्या हैं, इस भूल भुलैयों के खेल का दरवाजा कहाँ हैं। यह बाजीगरी विद्या कहाँ से और क्योंकर संचालित होती है? इसका मर्म जानना सत्य की शोध हैं। ईश्वर, जीव, प्रकृति के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करके अपने को भ्रम बंधनों से बचाते हुए परम पद प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ना मनुष्य जीवन का ध्रुव सत्य है। उसी सत्य को प्राप्त करने के लिए हमारा निरंतर उद्योग होना चाहिए।


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किसी आदमी के चरित्र बल को उसके उन प्रयत्नों से नहीं मापना चाहिए, जो कि वह दबाव पड़ने पर करता है, वरन् उसके साधारण व्यवहार से ही उसके चरित्र बल को जाँचना चाहिए।

सच्चा संन्यासी

दुर्वासा की तपस्या अत्यन्त उग्र थी, उनके शुभ कर्म इतने प्रसिद्ध थे, उनका तेज इतना प्रख्यात था कि लोक में सर्वत्र उनका आदर होता, उनकी आज्ञा उल्लंघन करने की किसी को हिम्मत न होती, क्योंकि सब जानते थे कि इसका अर्थ अपने आपको विपत्ति में डालना है। तेजस्वी दुर्वासा चक्रवर्ती राजा की तरह परिभ्रमण करते थे।

अम्बरीष राजा न तो उतने प्रसिद्ध थे और न वैसे तेजस्वी, तो भी अपने कर्तव्य धर्म पर दृढ़ थे। कीर्ति उन्हें प्राप्त नहीं थी और न वे संन्यासी तपस्वियों की तरह पूजनीय थे, तो भी उनका अन्तःकरण पवित्र था, सत्य और धर्म को हृदयंगम करके अपने राज महल को ही उन्होंने तपोभूमि बना लिया था।

एक बार ऋषि दुर्वासा अम्बरीष के यहाँ शिष्यों समेत ठहरे। उस दिन एकादशी थी। सब लोगों का उपवास था। दूसरे दिन द्वादशी थी। धर्म शास्त्र का ऐसा नियम था कि द्वादशी को प्रदोष के दिन अमुक समय तक पारण कर लेना चाहिए, उपवास को समाप्त कर देना चाहिए। किन्तु द्वादशी के दिन दुर्वासा नदी किनारे भ्रमण करने के लिए चले गये। राजा बड़े धर्म संकट में पड़े। अतिथि ब्राह्मण को भोजन कराये बिना स्वयं भोजन करना अनुचित है उधर प्रदोष का पारण न करने से धर्म का विधान टूटता है। बहुत सोच विचार करके राजा ने खिन्न होकर कुछ थोड़ा सा जल पान कर लिया।

थोड़ी देर में दुर्वासा लौट कर आये। उन्हें मालूम हुआ कि राजा ने मुझे भोजन कराये बिना ही भोजन कर लिया है, तो उनके क्रोध का ठिकाना न रहा, राजा से कारण पूछे बिना और सफाई माँगे बिना ही दुर्वासा आग बबूला हो गये और शिर के बालों में से आत्म तेज की एक कुपित मूर्ति निकाल डाली। उस राक्षसी को दुर्वासा ने आदेश दिया कि हे मेरी कोप शक्ति ! जो इस ब्राह्मण का अनादर करने वाले राजा के पीछे पड़ जा और इसे घुला-घुला कर मार डाल। यह तान्त्रिकी मारण शक्ति राजा के पीछे होली और उसका विनाश करने लगी।

अम्बरीष बड़े दुखी हुए, क्योंकि वे निर्दोष थे अकारण ही उन्हें यह दण्ड क्यों मिले, वे भगवान से करुण पुकार करने लगे। हे नाथ अकारण यह अत्याचार क्यों? मुझ निर्दोष के ऊपर यह मारण मन्त्र क्यों चलाया जा रहा है। अन्तरिक्ष में राजा की पुकार सुनी गई। ईश्वर की सृष्टि में यह नियम है कि निर्दोष पर किया हुआ जुल्म लौट कर जालिम को ही खाता है। आज भी यही हुआ परमात्मा की इच्छा से वह भावना मूर्ति लौट पड़ी और दुर्वामा को ही खा जाने के लिये दौड़ी। अब तो दुर्वासा का बुरा हाल था, वे अपना बचाव करने के लिए दशों दिशाओं में भागने लगे। जो मिलता उसी से बचाव का उपाय पूछते।

अपने ही जाल में उलझे हुए दुर्वासा छुटकारे का उपाय करते-करते थक गये, उनकी उत्पन्न की हुई राक्षसी उनका ही पीछा कर रही थी, अन्त में वे ब्रह्मा के पास पहुँचे और गिड़गिड़ा कर रक्षा का उपाय पूछने लगे। ब्रह्मा ने कहा- “हे तपस्वी तुम्हारी रक्षा केवल अम्बरीष ही कर सकते हैं। जिसके ऊपर अत्याचार किया गया है, वही यदि क्षमा कर दें, तो पाप से छुटकारा मिल सकता है, अन्यथा दुष्टता का दण्ड भोगे बिना छुटकारा नहीं मिल सकता।”

दुर्वासा अम्बरीष के पास वापिस पहुँचे और उनसे क्षमा माँगने लगे। राजा ने कहा-भगवन् आप चले गये, किन्तु आपको भोजन कराने के लिए उस दिन से अब तक मैं तो उपवास किये हुए बैठा हूँ। मेरे मन में आपके प्रति कोई दुर्भाव नहीं हैं, क्योंकि मैं सबको आत्म भाव से देखता हूँ, सबकी कठिनाइयों को समझता हूँ। आप भोजन करके मुझे कृतार्थ कीजिए। मैं अन्तःकरण से ऐसी कामना करता हूँ कि वह तान्त्रिकी मारण शक्ति शान्त हो जाय और हम में से किसी का अहित न करे।

राजा की प्रार्थना के साथ ही वह शाप शक्ति शान्त हो गई। दुर्वासा की जान में जान आई। अब उनका गर्व गल गया था और अनुभव कर रहे थे कि वनों में कठोर तपस्या करने से, तेजस्वी होने, प्रस्थान होने नेता बनने से जो महत्व प्राप्त होता है, वह मामूली गृहस्थ जीवन बिताने से भी प्राप्त हो सकता हैं। मैं दुर्वासा संन्यासी हूँ। पर अम्बरीष गृहस्थ हैं। फिर भी उसकी योग्यता मुझ से ऊँची है वह मेरी अपेक्षा अधिक महान हैं। कर्तव्य धर्म को पालन करने से हर मनुष्य परम पद को प्राप्त कर सकता है, फिर चाहे वह किसी वश में क्यों न हो और कोई भी पेशा क्यों न करता हो।


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तुम्हारे जीवन के जो क्षण व्यतीत हो रहे हैं, उनको सादे और मीठे, पवित्र और सुन्दर, श्रेष्ठ और आशायुक्त उच्च और दृढ़ महत्वाकाँक्षा पूर्ण, प्रेममय विचारों से भरो।

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एक भी दिन अपनी ज्ञान राशि में कुछ न कुछ वृद्धि किये बिना मत व्यतीत होने दो कि तुमने अपनी मानसिक तथा आध्यात्मिक शक्तियों में कुछ उन्नति की है।

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आदमी का जैसा मन होता है, वैसा ही उस का बाह्यरूप होता है, वास्तव में मन ही आदमी को बनाता है।


सत्य की आराधना

(यजुर्वेद अध्याय 32 के सूत्र)

इन्द्रः सत्य योनिः।

परमेश्वर सत्य का प्रवर्तक है।

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य एक इद्धव्यश्चपणीनाम्।

वह एक ही सब मनुष्यों को पूजने योग्य है।

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वेनस्तत्प श्यन्सिद्दितं गुह्यसत्

बुद्धि में रहने वाले उस सत्य ब्रह्म को ज्ञानी देखता है।

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प्रजा पतिः प्रजवा संरक्षणः।

प्रजा पालक, प्रजा के साथ मिलकर रहता है।

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अतो धर्माणि धारयन्।

वह शाश्वत सत्य नियमों का धारण करता है।

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तत्र तंतु पममेष्ठी ततान।

जगत में परमात्मा ने एक ही सूत्र को फैलाया है।

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अप तम्य द्दतं तमो व्यावृत्तः स पाम्मना।

उसका अज्ञान नष्ट हुआ और वह पाप से छूट गया, (जिसने ईश्वर की उपासना की।)

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इन्द्रस्य युज्यः सखा।

जीवात्मा का योग्य मित्र वह ही है।

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सदा पश्यंति सूरयः।

ज्ञानी ही सदा सत्य देखते हैं।


ऋण से सच्ची मुक्ति।

तीन कर्ज चुकाते जाओ!

हम तीन तार का यज्ञोपवीत पहनते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि हमारे कन्धे पर देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण का भार रखा हुआ है। इसे चुकाना आवश्यक है, यदि न चुकायेंगे तो कर्जदार बने रहेंगे और वारंट द्वारा पकड़ पकड़ कर इसी कैद खाने में डाले जावेंगे। तीन सत्ताओं द्वारा तीन तत्व प्राप्त करके हमने जीवन यात्रा आरंभ करने योग्य क्षमता पाई है। मानव जीवन की सारी महत्ता और सरसता इन्हीं तत्वों के आधार पर है। इनके अभाव में हम केवल पशु रह सकते थे।

पशु और मनुष्य के बीच में जो अन्तर हैं वह यह है कि (1) मनुष्य आत्मकल्याण का मार्ग जानता हैं और उसमें प्रवृत्त होने की योग्यता रखते हैं। (2) मनुष्य स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ का महत्व समझता है। (3) मनुष्य जो वस्तु प्राप्त करता है उसका बदला चुकाने की इच्छा करता है। पशुओं में यह तीनों बातें बहुत ही अल्प मात्रा में होती हैं। जीवन में यह दैवी तत्व जितने अधिक बढ़ते जाते हैं उतना ही मनुष्यत्व का विकास होता जाता है। आत्म चेतना, दैवी-ईश्वरीय सत्ता का अंश है, परमार्थ इच्छा ऋषि सत्ता का भाग है और ऋण प्रतिशोध पितृ सत्ता की देन है। इस प्रकार हम आत्म चेतना को देव ऋण, परमार्थ इच्छा को ऋषि ऋण और ऋण प्रतिशोध आकाँक्षा को पितृ ऋण कह सकते हैं।

आत्मचेतना उत्पन्न करके ईश्वर ने हमें अपने खजाने की सारी कुँजियाँ दे दी हैं। आत्मा के अन्दर इतनी चमत्कारिक बहुमूल्य शक्तियाँ भरी पड़ी हैं कि उनमें से कुछ का भी यदि ठीक प्रकार उपयोग किया जाय तो ऐसी अद्भुत सफलताएँ मिल सकती हैं, जिन्हें देख कर दुनिया हैरान रह जावे। अष्ट सिद्धि, नव सिद्धि का खजाना अपने अन्दर है, योग के अपरिचित चमत्कार तंत्र विज्ञान की अलौकिक करामातें यह सब अपने अन्दर ही तो भरा हुआ है। इसकी कुछ बूँदें पाकर रावण, हिरण्यकश्यप, सहस्रबाहु सरीखे वाममार्गी और राम, कृष्णा, बुद्ध सरीखे दक्षिण मार्गी इस संसार में अपना प्रताप प्रकट कर चुके हैं। मोची का मुसोलिनी, आवारे का हिटलर बन जाता इसी शक्ति का छोटा सा प्रताप है। मनुष्य को करीब करीब ईश्वर की बराबर योग्यता दी गई है और उसका प्रयोग करने या न करने की पूरी पूरी आजादी देकर परमात्मा ने उसे बड़ा गौरवपूर्ण पद प्रदान किया है। यदि आध्यात्मिक योग्यता प्राप्त न हुई होती तो हम भी कीड़े मकोड़े से तुच्छ होते और लोक-परलोक का आनन्द लाभ करने से वंचित रह जाते। ईश्वर की यह कितनी बड़ी अनुकम्पा हमारे ऊपर है, इस कृपा के लिए हमें ऋणी होना चाहिए और देव ऋण को सदैव स्मरण रखना चाहिए।

संसार इतना परमार्थी है उदार और देने वाला है कि उसकी कृपा का परिचय एक एक पग पर प्राप्त होता है। जन्म लेते ही माता का पवित्र और निर्मल प्रेम तैयार मिलता है वह कितने कष्ट सह कर पालन पोषण करती है, अपने शरीर का रस निचोड़ कर पिलाती है और अन्त समय तक अपनी शीतल छाया से अलग नहीं होने देती। पिता हमारे लिए नाना प्रकार की उपयोगी वस्तुएँ इकट्ठी करते हैं, बहिन खिलाती है, स्कूल के साथी बड़ा प्रेम करते हैं, अध्यापक शिक्षा देते हैं, विवाह होने पर धर्मपत्नी सेवा सुश्रूषा करती है, सेवक आज्ञा में खड़े रहते हैं, दुकानदार हमारे लिए नाना प्रकार की उपयोगी वस्तुएँ देते हैं, गौएँ, घोड़े, बैल, कुत्ते अपनी सेवाओं में आनन्द देते हैं, प्रकृति माता के दान का तो कुछ अन्त ही नहीं, इस प्रकार हम जिधर भी दृष्टि उठा कर देखते हैं, उधर ही संसार को दान देता हुआ, परमार्थ करता हुआ, उपकार में प्रवृत्त देखते हैं, संसार ने हमें इतना अधिक दिया है कि उसकी उदारता के लिए सहज ही मस्तक नत हो जाता है। परमार्थ की यह ऋषिसत्ता हमारे अधूरे और लँगड़े लूले जीवन को पूर्ण और प्रसन्न बनाने में कितना परिश्रम के साथ निरन्तर लगी रहती है, उसका आभार मानना आवश्यक है। कौन अभागा ऋषि ऋण को स्वीकार करने से इन्कार कर सकता है।

दुनिया हम से जो लेती है, वह हमें ज्यों का त्यों लौटा देती है। भूमि में जो बीज बोया जाता है वह उग आता है, दुकानदार को पैसा देते ही वह बदले की वस्तु दे देता है, मजदूर श्रम कर देता है, अध्यापक शिक्षा दे देता है, जिसके लिए, जब, जैसा, जितना काम किया जाता है, उसका फल निस्संदेह देर या सवेरे में प्राप्त हो ही जाता है। पूर्वजों से प्राप्त हुई वस्तु आगे वालो को देना यह क्रम-सृष्टि के आदि से चला आता है। प्रपितामह ने पितामह का पोषण किया था, उन्होंने अपने पुत्र का पोषण किया, पिता जी ने हमारा पोषण किया है, तो हमें अपने बच्चों का करना होगा। यह शृंखला केवल बच्चे उत्पन्न करने तक ही सीमित नहीं हैं और न केवल जन्म देने वाले को ही पितृ कहा जायगा। जिन महानुभावों द्वारा हमें आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक और साँसारिक दान प्राप्त होते हैं, वे सभी हमारे पितृ हैं। इन पितृों ने अपने पितृों से जो पाया था, वह हमें दिया, अब हमारा भी कर्तव्य है कि जितनी योग्यता, शक्ति, बुद्धि, विद्या, संपत्ति आदि प्राप्त की है, उसे अपने आगामी संपत्ति के लिए छोड़ जावें। जिस प्रकार, सभी प्रकार की योग्यता देने वाले महानुभाव हमारे पितृ हैं, उसी प्रकार हमारी संतति भी हमसे पिछड़ी हुई जन प्रकार की प्रेरणा देकर उनका किन्हीं अंशों में कुछ निर्माण कर सकता है वे सभी हमारी संपत्ति कहलावेंगे। बेटे-बेटी को संपत्ति कहना यहाँ उस आध्यात्मिक विवेचना में अप्रासंगिक होगा। ऋण प्रतिशोध, पितृ से प्राप्त वस्तु की संपत्ति को देने का क्रम अत्यन्त महत्व का है। हमें इसे चालू रखना होगा। अपने पितृ ऋण को भली भाँति हृदयंगम करना होगा।

कंधे पर रखा हुआ तीन तार का यज्ञोपवीत हमें बार बार सचेत करता हैं कि कंधे पर रखे हुए तीन कर्जों को चुकाने में भूल न करो। इन्हें चुकाये बिना न कोई व्यक्ति उऋण हो सकता हैं न ईमानदार कहला सकता है और न छुटकारा पा सकता है। इसलिए विवेकवान मनुष्य का कर्तव्य है कि इन ऋणों को चुकाने में जरा भी भूल न करे। ‘अखण्ड ज्योति’ द्वारा प्रसारित ‘सत्य आन्दोलन’ का मन्तव्य है कि मनुष्य तीन ऋणों से वाण प्राप्त करके मुक्ति का अधिकारी बने। सत्य, प्रेम, न्याय की त्रिवेणी से उन ऋणों की उऋणता हो सकती है। दैव ऋण का सत्य द्वारा, ऋषि ऋण का प्रेम द्वारा, पितृ ऋण का न्याय द्वारा परिशोध हो सकता है। ईश्वर की कृपा से सत्य का जागरण हमारी आत्मा चेतना से होता है हमें चाहिए कि उस संदेश को दूसरे लोगों तक पहुँचावें। विश्व का ऋषि तत्व निस्वार्थ भाव से हमारे ऊपर पग पग पर कृपा करता हुआ अपना प्रेम प्रदर्शित करता हैं। हमें चाहिए कि संसार के अन्य प्राणियों को अपने प्रेम का अमृत चखावें। पितृ गुण हमें अपनी संपदा प्रदान करते हैं, हमें चाहिए कि न्यायपूर्वक संसार की वस्तु संसार को लौटा दें।

ईश्वर के सम्मुख हमें उसका दूसरा ऋण चुकाने के लिये उपस्थित होना चाहिए और प्रार्थना करना चाहिए कि हे परमात्मन्! आपने मेरी आत्मा में अमूल्य खजाना भर देने की कृपा की है, मैं आपके प्रयत्न को व्यर्थ न करूंगा, इस खजाने को खोलूँगा और काम में लाऊँगा। पिता अब आप से दूर न भटकूँगा, वरन् आपकी शान्तिप्रदशरण में विश्राम करूंगा। अपनी आत्मा के सम्मुख हमें विश्व के ऋषितत्व का ऋण चुकाने के लिए उपस्थित होना चाहिए और प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि-’हे मेरी आत्मा में बैठे हुए ऋषि तत्व ! मुझे विश्व का प्रेम प्राप्त होता हैं, मैं विश्व के कण कण से प्रेम करूंगा। मैं प्राप्त करता हूँ, इसके बदले में दूँगा। देना मेरा धर्म होगा ‘त्याग‘ को मेरे जीवन क्रम में प्रमुख स्थान रहेगा।

संसार के सम्मुख हमें उसका पितृ ऋण चुकाने के लिए उपस्थित होना चाहिए और उसे विश्वास दिलाना चाहिए कि-हे पितृ ! आपके ऋण का प्रतिशोध करूंगा, आपने मुझे दिया है मैं आपको दूँगा। न्याय की शृंखला को भंग न करूंगा। अपने को निर्बल बना कर अपना अनावश्यक भार आप पर न डालूँगा। अन्याय पूर्वक किसी को उसके अधिकार से वंचित न करूंगा। भूतल पर से अनीति मिटाने के लिए तप करूंगा, धर्म युद्ध में प्रवृत्त रहूँगा। हे पितृ, आपने मेरे साथ न्याय किया हैं, मैं अपनी संतति के साथ न्याय करके ऋण का प्रतिशोध करूंगा।

सत्य, प्रेम और न्याय की भावनाओं को हृदयंगम करने और उसके अनुसार आचरण में प्रवृत्त होने पर हम देव ऋण ऋषि ऋण और पितृ ऋण से छुटकारा पाते हैं और जीवन मुक्त होकर परम पद पाने के लिए स्वतन्त्र हो जाते हैं।


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सायंकाल अपने इष्ट भविष्य की कल्पनाओं के विचारों में मस्त रह कर व्यतीत करना चाहिए, उस समय अपने को उसी हालत में ख्याल करो कि जिसका तुम्हारा हृदय उत्कट इच्छा करता है।

कथा-


सच और झूठ

(महात्मा शेखवादी)

किसी अपराधी को एक बादशाह ने फाँसी का दंड दिया। कैदी कहीं दूर देश का रहने वाला था, उसकी भाषा भी दूसरी थी।

कहावत मशहूर है कि- ‘मरता क्या न करता’ कैदी जब अपनी जिन्दगी से निराश हो गया, तो उसने राजा को अपनी भाषा में खूब गालियाँ सुनाईं और अपने जी के गुबार निकाले।

राजा ने उसकी बेवकूफी को सुनकर कैदी की भाषा जानने वाले एक सरदार से पूछा कि- यह क्या कह रहा है?’

सरदार बड़ा विचारवान, दयालु और उदार था, उसने उत्तर दिया-जहाँपनाह ! कैदी की बकझक का मतलब यह है कि-’बन्दों के साथ सलूक करने वालों के साथ खुदा रहम करता है, सो हे महाराज, मुझे माफ कर दीजिए, अल्लाह की रहमत आप पर होगी।’ इस पर बादशाह को दया आई और उसने कैदी की जान बख्श दी।

इतने में उस कैदी की भाषा जानने वाला एक दूसरा सरदार भी उठ खड़ा हुआ। उसने बादशाह में कहा-’हुजूर, पहला सरदार झूठ बोल रहा है। कैदी ने वह बातें नहीं कहीं, जो आपको बताई जा रही हैं। उसने तो आपको जी भर के मन मानी गालियाँ दी हैं।’

राजा एक क्षण को दो परस्पर विरोधी बातों को सुनकर विचार में डूब गया। फिर उसने, उस सत्यवक्ता सरदार से कहा-”तुम्हारी सचाई से मैं उस सरदार की झुठाई को ज्यादा पसन्द करता हूँ। क्योंकि उसने एक आदमी की जान बचाने के लिए भले इरादे से वह बात कही थी। पर तुम तो अपना मर्तबा बढ़ाने के लालच से एक आदमी का खून कराने वाली बात कह रहे हो।”

बुद्धिमानों ने कहा है कि- जिस सचाई को कहने सुनने से बुराई बढ़े, उससे वह झूठ लाख दर्जे अच्छा है, जिससे भलाई पैदा होती हो और नेकी की नसीहत मिलती हो।

कथा-


सच्ची तीर्थ यात्रा

एक बार देवताओं में आपसी विवाद उठ खड़ा हुआ कि हममें से कौन बड़ा और किसकी पूजा सब से पहले होनी चाहिए। सब अपने अपने को बड़ा बताते थे और अपनी ही पूजा पर जोर देते थे। झगड़ा जब बहुत बढ़ा, तो सब लोग मिलकर ब्रह्माजी के पास गये और कहा आप हमारा न्याय कर दीजिए कि हममें से कौन बड़ा है?

ब्रह्माजी ने सब की बात ध्यानपूर्वक सुनी और कहा, कहने मात्र से किसी की बात नहीं मानी जा सकती, मैं आप लोगों की परीक्षा करूंगा कि सचमुच आप में से कौन बड़ा है। देवता परीक्षा देने को तैयार हो गये।

ब्रह्माजी ने कहा-आप लोग पृथ्वी के समस्त तीर्थों की यात्रा कर आइये, फिर मैं देखूँगा कि किसने अधिक पुण्य कमाया है, जिसका पुण्य अधिक होगा, उसे बड़ा पद प्रदान किया जायेगा। आज्ञा पाते ही सब देवता अपने अपने वाहनों पर चढ़कर तीर्थ यात्रा के लिए चल दिए।

गणेशजी ने सोचा-भौतिक पुण्य बेचारे जड़ हैं वे किसी को क्या पुण्य फल दे सकते हैं। पुण्य का स्त्रोत तो आत्मा के अन्दर है। यदि आत्मा में परमात्मा को स्थापित किया जा सके, तो सारे तीर्थ घर बैठे ही प्राप्त हो सकते हैं। तीर्थों का फल भी तो भावना के अनुकूल ही होता है। अश्रद्धालुओं को तो तीर्थों से रंच मात्र भी लाभ नहीं मिल सकता। अधिक विचार करने पर गणेश जी को इन्हीं विचारों में सत्यता प्रतीत हुई, उन्होंने अन्तःकरण में परमात्मा की मूर्ति स्थापित की और सच्चे हृदय से उन्हें तीर्थ मान कर मन ही मन में परिक्रमा कर ली। वे अपने स्थान पर बैठे रहे, उठ कर एक कदम भी तीर्थों की ओर न चले।

देवता गण तीर्थ यात्रा समाप्त करके लौट-लौट कर आने लगे। गणेश जी सब से पहले बैठे हुए थे। ब्रह्माजी ने तीर्थ यात्रा का विवरण पूछना आरम्भ किया, सब लोग अपनी यात्रा का वर्णन करने लगे। अन्त में गणेश जी ने कहा- मैंने देखा कि सब से बड़ा तीर्थ आत्मा की पवित्रता है, मैं आत्म शोधन में लगा रहा हूँ और एक कदम भी हट कर कहीं नहीं गया हूँ।

ब्रह्माजी ने कहा- गणेश जी ने ही सच्ची तीर्थ यात्रा की है, तुम लोग तो मिट्टी, पत्थरों और नदी नालों पर सिर पटकते फिर हो। मैं गणेशजी को सब से बड़ा घोषित करता हूँ। शुभ कार्यों में उन्हीं की पूजा सब से प्रथम हुआ करेगी।


सच्चाई को अपनाओ

(कुरान की शिक्षा)

या अय्युहल्ल जीना आमनू अलयकुम

अन्फु साकुम्............विमाकुन्तम् तथा मलून।

(सरयू माइदा 2/7।14।5)

हे विश्वासियों ! तुम अपना ध्यान रखो। जब तुम सत्य मार्ग पर हो तो कोई भी भ्रम में रहे तुम्हारी हानि नहीं कर सकता। तुम सब को अल्लाह की जोर जाना हैं। वह तुमको जो कुछ तुम कर रहे हो, सब बता देगा।

लय्सऽल विर्रा अन्तुवल्लू वुजूह कुम्....................

व उला इकाहु मुऽल् मुत्तकून्।

(सरयू बकर 1/2।22)

धर्म इसी में नहीं है कि नमाज में अपना पूरब की ओर फेर लो, अथवा पश्चिम की ओर फेर लो, वरन् वास्तविक शुभ कार्य तो उन लोगों के हैं, जो अल्लाह, मृत्यु, धर्म पुस्तक और अवतारों पर ईमान लाये। जिन्होंने संबन्धियों, अनाथों, निर्धनों, यात्रियों तथा भिखमंगों को धन दिया अपने वचन को पूरा किया, तथा सताए जाने पर संकट काल में दृढ़ रहे। यही लोग हैं, जो सच्चे निकले और सदाचारी हैं।


आकर्षण की सच्चाई

(पं. जगन्नाथ राव नायडू, नागपुर)

एक व्यक्ति ने सुन रखा था कि “एक समान वस्तुएँ एक दूसरे की तरफ खिंचती हैं। भलों के पास भले और बुरों के पास बुरे जमा हो जाते हैं। आकर्षण का नियम इतना व्यापक है कि रुपये को देखकर रुपया भी खिंचता है।”

उस आदमी को रुपयों की बड़ी जरूरत थी। उसने बड़ी कठिनाई से एक-एक पैसा करके एक रुपया इकठ्ठा किया। जब रुपया हो गया, तो उसे लेकर बैंक में पहुँचा। खजाने की खिड़की के पास वह खड़ा हुआ और रुपये को ऊँचा करके खजाने के रुपयों को दिखाने लगा, ताकि वे आकर्षण के नियम के अनुसार खिंच कर बाहर चले आवें और यह उन्हें ले ले।

वह सारे दिन रुपये को ऊँचा किये रहा और खजाने के रुपयों को इशारे से बुलाता रहा, पर कुछ परिणाम न निकला। एक भी रुपया बाहर न आया। फिर भी वह निराश न हुआ, क्योंकि जो कुछ सुना था वह प्रमाणिक व्यक्ति से सुना था। दूसरे दिन नई आशा से फिर बैंक में पहुँचा और अधिक प्रयत्न से खजाने के रुपयों को अपने रुपये के पास बुलाने लगा।

उसने सोचा शायद दूर से आकर्षण शक्ति काम नहीं करती, इसलिए अपने रुपये को रुपयों के उस ढेर के पास पहुँचा दूँ। खिड़की में से उसने हाथ लम्बा किया, ताकि उसका रुपया ढेर के निकट पहुँच जाय पर अकस्मात उसके हाथ में से रुपया छूट गिरा और उसी ढेर में मिल गया। गिरने की आवाज होते ही खजांची का ध्यान उधर गया। खजांची ‘चोर चोर’ चिल्ला पड़ा। सिपाही दौड़ पड़े और उसे पकड़ लिया।

चोर से कारण पूछा गया, तो उसने सच सच सारी बात कह सुनाई। सुनने वालों ने समझ लिया कोई भोला भाला आदमी है, चोरी करने का इसका इरादा नहीं था। सब लोग उसकी बात पर हँसने लगे।

हँसने वालों में से एक बुद्धिमान ने कहा-

भाई, तुमने जो बात सुन रखी थी, वह बिलकुल सच थी। देखो तुम्हारा रुपया आकर्षण शक्ति से खिंच कर उस ढेर में मिल गया न? तुम्हें यह और जानना चाहिए कि बड़ी ताकत वाला छोटी ताकत वाले को खींच लेता है।

यदि तुम दुष्टों के गिरोह में मिलोगे, तो दुष्ट बन जाओगे और साधुओं की संगति में बैठो तो साधु बनोगे। जब तक तुम में थोड़ी सी सामर्थ्य है तब तक दूसरों को अपने ढांचे में नहीं ढाल सकते खुद ही उनमें मिल जाओगे।

नये सुधारों को लोक सुधार से पहले सत्संग करके बल प्राप्त करना चाहिए।


रामकृष्ण परमहंस के उपदेश

-जिस तरह लोहे को कई बार गरम करने पर मुलायम हो जाता है, तो उसको चाहे जिधर मोड़ने से हथियार बना लेते हैं। उसी प्रकार मनुष्य भी आपत्तियों की आग से तपाने पर तथा दुनिया की मार खाने पर स्वच्छ हाथ बनता है और भगवद् भक्त हो जाता है।

-वर्षा का जल जब कि मकान की छत पर गिर कर पनालों द्वारा पृथ्वी पर गिरता है तो वह पानी आता तो आकाश से है। किन्तु पनालों द्वारा नालों में चला जाता है। इसी प्रकार सदृश्य देशों का प्रचार साधु करते हैं, किन्तु वह ईश्वर से ही प्राप्त होते हैं।

-पानी को पुल के नीचे से बहने में कोई बाधा नहीं होती है। उसी तरह त्यागी के हाथ से धन चलता रहता है। उसे इकठ्ठा करने की कोई चिंता नहीं रहती है।

कथा-


सत्य की विजय होती है।

एक व्यक्ति बड़ा ही कंजूस, पापी और दुष्ट स्वभाव का था उसने अनीति के साथ बहुत सा पैसा इकट्ठा किया और अपने बेटे को चोरी करने की कला में खूब निपुण कर दिया। समयानुसार जब वह व्यक्ति मरने लगा तो अपने बेटे को बुला कर उसने कहा पुत्र अब तो तुम स्वयं सब बातें जान गये हो, पर मेरी एक शिक्षा है उसे ध्यान रखना, वह यह है कि कभी कथा वार्ता में, भजन कीर्तन में, साधु संग में न बैठना न उनकी बात सुनना। पुत्र ने पिता की आज्ञा मान ली पिता ने शरीर त्याग दिया।

पिता की तरह पुत्र भी चोरी का पेशा करने लगा। एक रात का वह चोरी करने जा रहा था कि मार्ग में भागवत कथा होती हुई दिखाई दी, नियत स्थान पर जाने के लिए और कोई रास्ता न था। चोर कुछ देर तो विचार करता रहा कि क्या करूं न करूं अन्त में कथा श्रवण के पाप से बचने के लिए कानों में उंगली लगाई और आगे चल दिया। कुछ ही कदम चला था कि अकस्मात पैर में काँटा चुभ गया, काँटा निकालने के लिए कानों में से उंगलियाँ निकालनी पड़ीं। इसलिये उसे कथा की बातें सुनाई पड़ने लगीं चोर ने उन सुनी हुई बातों को भुलाने की पूरी कोशिश की, पर दो बातें उसे याद हो गईं -

(1) देवताओं की छाया नहीं होती, (2) सत्य की सदा जीत होती है।

कथा श्रवण और काँटे की पीड़ा पर झुँझलाता हुआ चोर आगे चल दिया। उसने आज राजमहल में सेंध लगाई और खजाने में से बहुत सा द्रव्य चुरा लिया। चोरी किया हुआ धन सुवर्ण और जवाहरात बहुत थे, उसे ले जाने के लिए उसने राजा का ही एक ऊँट लिया और उस पर सारा बोझ लाद कर पहरेदारों की निगाह बचाता हुआ गुप्त मार्ग से अपने घर आ गया। राजा का ऊँट पहचाना जा सकता था और चोरी खुल सकती थी इसलिये चोर ने उसे काट डाला और शरीर के टुकड़ों को घर में गहरा गड्ढा खोद कर गाड़ दिया।

दूसरे दिन सवेरा होते ही राजा को सूचना मिली कि खजाने में से बड़ी जबरदस्त चोरी हो गई। चोरी किस प्रकार हुई इसकी भारी खोज बीन की जाने लगी। पशुशाला का एक ऊँट गायब मिला। खजाने के पास ऊँट लादने के निशान मौजूद थे इसलिए यह अनुमान कर लिया गया कि चोर ऊँट पर लाद कर चोरी का माल ले गया है। राजा ने चोर का पता लगाने वाले को बहुत सा इनाम देने की घोषणा की और गुप्त पुलिस की भी स्त्री दूतियों को यह कार्य खास तौर से सौंप दिया गया।

गुप्त पुलिस की स्त्री दूतियों में एक बुढ़िया प्रकार के कामों की खोज लगाने में बड़ी ही प्रवीण थी। उसने विचार किया कि चोर राजा के ऊँट को यों ही छोड़ नहीं सकता क्योंकि ऐसा करने से चोर के नगर को मालूम करके सारे नगर की तलाशी लेने पर चोरी पकड़ी जा सकती है, इसलिए चोर ने जरूर उस ऊँट को मार कर कहीं गाड़ दिया होगा। इसी अनुमान के आधार पर वह दूती भेष बदल कर घर से निकल पड़ी। और घरों में जाकर स्त्रियों के सामने रोती पीटती कि मेरा बेटा बीमार है उसके लिए ऊँट का सड़ा हुआ माँस बताया है, न मिलेगा तो बेटा मर जायगा। हाय क्या करूं, कहाँ जाऊँ ?

स्त्रियाँ उसकी बात सुनती, पर ऊँट का माँस कहाँ से देती बेचारी अपनी लाचारी प्रकट करके चुप हो जाती। दूती गाँव-गाँव नगर नगर में फिरने लगी । एक दिन वह चोर के घर जा पहुँची चोर की स्त्री भोली थी बुढ़िया के रोने पीटने पर उसे दया आ गई और गड्ढे में से निकाल कर थोड़ा सा ऊँट का माँस दे दिया। बुढ़िया खुशी से फूली न समाती थी। उसने दरवाजे पर एक काला निशान लगा दिया ताकि वह दूसरे दिन उस घर को पहचान सके और प्रसन्न होती हुई लौट गई।

चोर के घर का पता तो लग गया, पर दूती को अभी यह बात और मालूम करनी थी कि धन उसी के घर में है या कहीं दूसरी जगह रखा हुआ है। राजा को पूरी और पक्की सूचना देने पर ही पूरा इनाम मिलता, इसलिए दूसरे दिन भी जाँच जारी रखने का निश्चय कर लिया।

उस दूती ने काला रंग देह पर पोता, बाल फैलाए और भयंकर रूप बनाकर भैंसे पर चढ़कर उस चोर के घर रात को 12 बजे पहुँची और दरवाजे पर खड़ी होकर हुँकार देने लगी। चोर बाहर आया, दूती ने कहा- दुष्ट ! तू मुझे जानता नहीं, मैं भवानी दुर्गा हूँ। तू राज महल से इतनी बड़ी चोरी कर लाया, पर मेरे लिए एक बलि भी न दी अब मैं तुझे ही खा जाऊँगी।’

चोर धमकी में आ गया। वह गिड़गिड़ा कर देवी के पैरों पर गिर पड़ा और कहने लगा- भगवती, चोरी का धन अभी ज्यों का त्यों घर में गढ़ा हुआ है, मैंने उसे छुआ भी नहीं, पहिले आपकी बलि दे दूँगा तब उसमें हाथ लगाऊँगा, गलती के लिए माफ कर, कल ही आपके मन्दिर में नौ बकरों की बलि चढ़ा दूँगा। देवी खुश होती हुई वापिस लौट चली।

देवी के चले जाने के बाद चोर को शक हुआ कि कहीं यह कोई भेदी तो नहीं हैं, जो दुर्गा का भेष बना कर आया हो। इसी समय उसे ध्यान आया कि कथा में मैंने सुना था कि देवताओं की छाया नहीं होती। अपना सन्देह निवारण करने के लिए वह उसी तरफ लपका जिस ओर कि देवी गई थी। आधे फर्लांग दौड़ कर वह देवी के पास पहुँच गया और देखा कि उस की छाया मौजूद है। चोर को निश्चय हो गया कि यह भेदी है। उसने उस देवी को पकड़ लिया और मार कर ऊँट के साथ ही गाढ़ दिया।

मुद्दतें बीत गईं, चोरी का कोई पता न चला, एक दूती भी गायब हो गई। राजा को बड़ी चिन्ता हुई कि ऐसा भयंकर चोर यदि राज्य में रहेगा तो प्रजा की अत्यन्त हानि होगी, इसलिए उसने इनाम की मर्यादा बहुत अधिक बढ़ा दी। घोषणा की गई कि जो कोई उस चोर को पकड़ कर दरबार में हाजिर करेगा, उसे आधा राज्य दिया जायेगा और राजकुमारी विवाह दी जावेगी।

चोर एक भीषण विपत्ति में से बचा। उसे रह रह कर याद आ रहा था कि कथा सत्संग का एक टुकड़ा मैंने सुना था कि देवताओं की छाया नहीं होती, उसी टुकड़े ने मेरे प्राण बचा दिये, वरना उस दूती द्वारा पकड़वा दिया जाता और राजा मुझे कुत्तों से नुचवा कर मार डालता। अब वह सोचने लगा कि सत्संग में जो दूसरी बात सुनी थी, उसकी भी परीक्षा करनी चाहिए।

“सत्य की विजय होती है” इस उपदेश की वास्तविकता जाँचने के लिये वह सीधा राजदरबार में पहुँचा और राजा से कहा-श्रीमान्! यह चोर आपके सामने उपस्थित है, इसने ही चोरी की थी। उसने सारा हाल कह सुनाया।

राजा विचारमग्न हो गया। उसने सोचा ‘सत्य की विजय होती है’। इस उपदेश ने जब चोर को इतना प्रभावित किया कि अपनी जान जोखिम में डाल कर अपराध कबूल करने के लिये मेरे सामने उपस्थित हुआ है, तो मुझे भी अपने सत्य की रक्षा करनी चाहिये। राजा ने चोर का अपराध माफ कर दिया और अपने वचनानुसार उसे बेटी विवाहते हुए आधा राज्य दहेज में दे दिया।

चोर को प्राण-दंड के स्थान पर इतना बड़ा पुरस्कार क्यों मिला? राज्य भर के सब लोग इस प्रश्न को आपस में एक दूसरे से पूछते थे। विचारवान् और बुद्धिमान इसका यही एक उत्तर देते थे कि “सत्य की विजय होती है।”


सत्य धर्म और पंच महायज्ञ

(ज्ञान की अग्नि में कर्मों की आहुति दीजिए)

शास्त्रों में पंच महायज्ञों की बड़ी महिमा वर्णन की गई है और मनुष्य जाति को आदेश किया गया है कि नित्य पंच यज्ञ करने चाहिए। नित्य कर्म विधि में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। आइये उनके सम्बन्ध में कुछ गम्भीर विवेचना करें और विचार करें कि सत्य धर्म के अनुयायियों को इनका पालन करना चाहिए ।

पंच यज्ञ यह है (1) ब्रह्म यज्ञ (2) पितृ यज्ञ, (3) देवयज्ञ (4) भूत यज्ञ (5) अतिथि यज्ञ। अग्नि में या भूमि पर अन्न के छोटे छोटे बीस किनके डाल देने का चिन्ह पूजा इस बात का स्मरण कराने मात्र को ऐ अतीत स्मृति है कि किसी जमाने में आर्य लोग पंच यज्ञों को करने में कितने सतर्क थे कि नित्य इन कर्तव्यों को यथाशक्ति पूरा करते थे और उन्हें किए बिना अन्न तक गृहण न करते थे हमें उन यज्ञों के महान मन्तव्यों में गहरा घुस कर यह देखना होगा कि क्या वे सत्य धर्म की पूर्ति करते हैं। विचार करने पर पता चलता है कि इनके द्वारा न केवल सत्य मार्ग की पुष्टि होती है वरन् उसका पूरा-पूरा कार्यक्रम भी मिल जाता है।

पंच यज्ञों में सत्य प्रेम न्याय की पूरी व्यवस्था सन्निहित है ब्रह्म यज्ञ सत्य का पर्यायवाची है। परमात्मा का चिन्तन, आराधन अन्वेषण यही तो ब्रह्म यज्ञ है। एकान्त होकर ईश्वर जीव प्रकृति के सम्बन्ध में अखण्ड आत्मा, अखंड जीवन अखंड जगत के सम्बन्ध में निदिध्यासन, भजन आदि करना ब्रह्म यज्ञ ही तो ठहराया जायगा।

प्रेम के अंतर्गत पितृ यज्ञ और देव यज्ञ दो यज्ञ आते हैं। पितृ यज्ञ का भावार्थ यह है कि जो वस्तु अपने पूर्वजों से ली है वह आगे वालों को देना। यह बहुत ही संकुचित बात है कि पिता ने हमें उत्पन्न किया तो हमें भी संतान उत्पन्न करनी चाहिए या श्राद्ध तर्पण के भौतिक चिन्ह पूरा करके संतुष्ट हो जाना चाहिए। पितृ का अर्थ पूर्वज है। संसार के अनेक प्राणियों ने हमें विभिन्न रूपों में अनेक वस्तुएँ दी हैं। रहने का घर फर्नीचर विद्या ज्ञान आदि असंख्य पदार्थ असंख्य ज्ञान और अज्ञान प्राणियों से प्राप्त होते हैं। यह सभी हमारे पितृ हैं। इन पितृओं के उपहार का बदला तभी चुकाया जा सकता है जब जिस प्रकार उन्होंने उदारतापूर्वक अपनी वस्तुएँ हमें दी हैं उसी प्रकार हम दूसरों को दें। बिना किसी स्वार्थ की भावना के एवं बिना किसी विज्ञापन के संसार हमें दे रहा है हमें भी चाहिए कि अपनी शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक कमाई को पहले दान करें पितृ में लगावें तत्पश्चात जो यज्ञ अवशिष्ट बचे उसे अपने काम में लावें। यह दान वृति तभी जागृत हो सकती है जब हम विश्व बन्धुत्व की भावनाएँ अपने मन में धारण करें आत्मियता को बढ़ाएं अहम भाव का प्रसार करें अपने आदमी को ही देने की इच्छा होती है कहावत है कि ‘अन्धा बाँटे रेवड़ी फिर-फिर घर को ही देय।’ देने का कार्य आत्मीयता के साथ है इसलिए पितृ यज्ञ प्रेम के दो अंगों में अखण्ड प्रवाह और अखण्ड आत्मीयता को पूरा करता है।

देव यज्ञ देवताओं को प्रसन्न करना पुष्ट करना भोजन देना पूजा करना, उन्नत करना कहलाता है। मनुष्य, दानव और देवताओं में आकृतियों का नहीं विचारों का अन्तर है। एक मनुष्य चाहे तो दानव भी बन सकता है और देवता भी। उसकी आकृति तो वही रहेगी पर विचार में अन्तर हो जायगा। दैवी भावनाओं को बढ़ाने से संसार में देवत्व की पुष्टि होती है। यही तो देव यज्ञ है। अखंड देव यज्ञ का तात्पर्य यह है कि आप निरंतर शुभ संकल्प करें उच्च मानवीय गुणों को अपने मन में स्थापित करें और दूसरों को सन्मार्ग पर चलने का उपदेश करें। प्रेम का तृतीय चरण अखंड यज्ञ यही उपदेश करता है कि हमें निरन्तर शुभ विचार करते रहने चाहिए और दूसरों के हृदयों में पवित्र विचार भरने का प्रयत्न करना चाहिए। इसी से संसार में देवत्व पुष्ट होगा।

जिस प्रकार प्रेम के अंतर्गत पितृ यज्ञ और देव यज्ञ का समावेश था, उसी प्रकार न्याय के अंतर्गत भूत यज्ञ और अतिथि यज्ञ आते हैं। कीड़े मकोड़े कुत्ते आदि मूक निर्बल और असहाय प्राणियों को आप कुछ दीजिए यह भूत यज्ञ की आन्तरिक भावना है। विचार करना चाहिए संसार के निर्बल प्राणियों को हम क्या दें जिससे कि उनका वास्तविक उपकार हो सके। निर्बलों को कोई भौतिक पदार्थ देने से उनकी सेवा नहीं हो सकती भिखमंगे को एक मुट्ठी अन्न दिया तो उस दिन के उसके आलस्य में वृद्धि होगी और दूसरे दिन फिर उसका कार्यक्रम ज्यों का त्यों। वह दान उसके आलस्य को कुछ क्षण के लिए प्रोत्साहित भले कर दे किन्तु उसकी ठोस सेवा नहीं कर सकता। यदि अधिक दे दिया जाय तो उस पर और दूसरी आपत्ति आवेगी, बलवान उसे मारेंगे और उस दी हुई वस्तु को छीन लेंगे। इसलिए निर्बलों के साथ सब से बड़ा उपकार यही हो सकता है कि उन्हें बलवान बनावें। शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक बल जिस मनुष्य में होगा उन्हें किसी की कृपा के टुकड़े प्राप्त करने की जरूरत न होगी। आप अपने शरीर से कुटुम्ब जाति देश विश्व की कुछ सेवा करना चाहते है। तो उन्हें शक्ति का पाठ पढ़ाइए, स्वावलम्बन सिखाइए आत्मविश्वास पैदा कीजिए और उनके कण-कण को शक्ति सम्पन्न बनाने का उद्योग कीजिए। शक्ति प्रदान करना ही निर्बलों की सब से बड़ी सेवा है। इससे बड़ा उपकार उनके साथ और कुछ नहीं हो सकता। भूत यज्ञ का संदेश है कि आप प्राणियों के लिए न्याय की व्यवस्था कीजिए; उन्हें अखंड शक्ति के मार्ग पर प्रवृत्त कीजिए।

नर यज्ञ न्याय के दूसरे और तीसरे चरण का पोषण करता है। नर यज्ञ को अतिथि यज्ञ भी कहा जाता है। अतिथि वह है, जो अनायास ही आ जावे, जिससे हमारा कोई स्वार्थ न हो, तो भी उसकी सेवा करे भोजनादि से सत्कार करे। दुनिया में ऐसी कोई स्वार्थ पूर्ण प्रथा प्रचलित है कि हमारा मुँह तोड़ने की और बदला लेने की शक्ति रखता है, उसे तो समान गिनते है बाकी अन्य लोग जो कितने भी उपयोगी और श्रेष्ठ क्यों न हों, उन्हें अपने से नीचा, हीन, तुच्छ, समझते हैं। गोरे और काले का रंग भेद प्रसिद्ध है। गौरी जातियाँ कालों को नीच समझती है। काले भी अपने से कालों को तुच्छ समझते हैं। सवर्णों और अछूतों का भेदभाव प्रसिद्ध है। इनका बिलकुल सीधा अर्थ यह है कि जो थप्पड़ का जवाब घूँसे से नहीं दे सकता उसे नीच समझा जाता है यह बड़ी ही आसुरी और पशुतापूर्ण दुष्ट विचारधारा है। अतिथि यज्ञ इस शैतानी मनोभावना को हटा कर ईश्वरीय चेतना को स्थापित करता है। किसी व्यक्ति से हमारा कोई बदला नहीं है वह हमारा तुरन्त ही कुछ बदला नहीं दे सकता तो भी उसके साथ समता का, भलमनसाहत का, मनुष्यता का, पूजा व्यवहार का करना चाहिए और उसकी समुचित आवभगत करनी चाहिए यहाँ यह भ्रम नहीं करना चाहिए कि रोटी तोड़ हराम खाऊ आलसियों को मुफ्त में चराना चाहिए। अतिथि यज्ञ की भावना यह है कि जिन लोगों के बलवान होने के कारण हम उचित स्थान नहीं देते उन्हें मनुष्यता के नाते समानता का स्थान देना चाहिए। निर्बलों को बलवान बनाना चाहिए और बलवानों को निर्बलों के साथ मनुष्यता का व्यवहार करना चाहिए। यह संदेश न्याय के द्वितीय चरण का है। अखंड समता का प्रसार करने से अतिथि यज्ञ का आधा भाग पूरा होता है। इस यज्ञ का आधा भाग तब पूरा होता है जब आप अतिथियों, निर्बलों की यथाविधि पूजा अर्चना करते हैं। उन्हें भोजन कराते हैं, उनके लिए कुछ त्याग करते हैं। कुछ कष्ट सहते हैं अतिथि को जिस बात का कष्ट है उसे वह देना चाहिए। भोजन,जल आदि की आवश्यकता पूरी करनी चाहिए। महान मानव धर्म के कर्तव्य में यह बात यों घटेगी कि निर्बलों को सब से बड़ी आवश्यकता न्याय दिलाने की है। जिन लोगों ने उनके अधिकार छीन रखे हैं या जो उन्हें सताते हैं उनसे न्याय दिलाना चाहिए। जिनके मुँह हराम लगा हुआ है वे आसानी से निर्बलों के अधिकार उन्हें देने के लिए तैयार नहीं होते। उन्हें न्याय पर लाने के लिए बल प्रयोग की आवश्यकता होती है। जोंक या कानखजूरा किसी से चिपट जाता है तो वह आसानी से नहीं छूटता उसे छुड़ाने के लिए संड़ासी से पकड़ कर बलपूर्वक खींचना पड़ता है जो लोग अनुचित रूप से दूसरों के हकों का अपहरण कर रहे हैं जिन्हें स्वार्थ का कानखजूरा चिपक गया है उन्हें बल प्रयोग किये बिना निर्विकार नहीं बनाया जा सकता है इसके प्रयत्नकर्ता को कुछ संघर्ष में आना पड़ता है और संघर्ष से कष्ट होता है। इस कष्ट को तप समझ कर प्रसन्नतापूर्वक अपनाना अतिथि यज्ञ का आधा भाग पूरा करना है। अतिथि की आवश्यकता को स्वयं कष्ट सह कर पूरा करना इस मन्तव्य की सतयुगी व्याख्या यह है कि निर्बलों को न्याय दिलाने के लिए निस्वार्थ भाव से प्रसन्न करना और उसके लिए जो कष्ट सहना पड़े उसे खुशी-2 सहना। न्याय का तीसरा चरण अखण्ड तप यही सन्देश देता है। अतिथि यज्ञ की पूर्ति इसी प्रकार होती है।


सन्मार्ग की शिक्षा

(बाइबिल की वाणी)

जो अपने मुँह की चौकसी करता है सो अपने प्राण की रक्षा करता है। पर जो गाल बजाता है उसका नाश हो जाता है।

-भजन संहिता 13। 3

धर्मों पेट भर खाने पाता है पर दुष्ट भूखे ही रहते हैं।

13। 21

अन्याय के बड़े लाभ से न्याय से थोड़ा ही प्राप्त करना उत्तम है।

16। 8

जो दूसरे के अपराध को ढांप देता है सो प्रेम का खोजी ठहरता है, पर जो बात, चर्चा बार बार करता है सो परम मित्रो में भी फूट करा देता है। एक घुड़की समझ वाले के मन में जितनी गढ़ जाती है उतना सौ बार मार खाना मूर्ख के मन में नहीं गढ़ता।

17(9।10)

चोरी छिपे की रोटी मनुष्य को मीठी तो लगती है पर पीछे उसका मुँह कंकड़ों से भर जाता है।

20।17

बड़े धन से अच्छा नाम अधिक चाहने योग्य है तथा सोने चाँदी से औरों की प्रसन्नता उत्तम है।

22 /1

सम्मति को सुन ले और शिक्षा को ग्रहण कर ताकि तू अन्त काल में बुद्धिमान ठहरे ।

19/20

जो अपने मुँह को वश में रखता है सो अपने प्राण को विपत्तियों से बचाता है। जो अभिमान से रोष में आकर काम करता है। उस का नाम अभिमान अहंकारी, ठट्ठा करने वालों में पढ़ा जाता है।

21 /23-24

जो अपने लाभ के निमित्त कंगाल पर अंधेर करता और धनी को जो भेंट देता, वे दोनों केवल हानि ही उठाते हैं।

22/16


असतो मा सद्गमय

वेद भगवान आदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! असत्य की ओर नहीं, सत्य की ओर चलो। असत्य के अन्धकार में मत भटको, सत्य के प्रकाश में आओ ओर वास्तविकता का निरीक्षण करो। तुच्छ विषय वासना इंद्रिय लिप्सा और तृषा तृष्णा की ओस चाटने से तृप्ति नहीं मिल सकेगी। दुख दुर्भाग्य की ज्वाला जलती रहेगी और तिलतिल करके आपको जलाती रहेगी। उस जलन में झुलसते हुए हर घड़ी रोना पछताना क्रुद्ध होना झुँझलाना और सिर धुनना होगा । भवसागर में अनेक दुखों का भंडार भरा हुआ दिखाई देता है, उसका कारण यह है कि हम सत्य की शीतल सरिता का किनारा छोड़ कर असत्य के रेगिस्तान में जा पहुँचे हैं और उस तवे सी जलती हुई बालू में पाँव डालने से जो कष्ट होता है। उसे सहते समय ऐसा ख्याल करते हैं कि सारे संसार में ऐसी ही जलती हुई रेत भरी हुई है।

परमात्मा की पुण्य कृति को असत्य, वासना माया, पाप भवसागर कहना अनुचित है। परम पिता ने अपने प्राण प्रिय पुत्रों के लिए सुख सौभाग्य की ही रचना की है उसने संसार को ऐसी सुन्दर कारीगरी के साथ बनाया है कि इसके अणु-अणु में सत्य प्रेम और न्याय की त्रिवेणी बह रही है। ईश्वर सत् चित आनन्द स्वरूप है, इसलिए उसने सत्य शिव और सुन्दर सृष्टि की रचना की है। भूमंडल पर मानव प्राणी को इतनी सुन्दर सामग्री प्रदान की गई है, कि कई बार देवता भी इस शरीर को प्राप्त करने के लिए ललचाते हैं और स्वयं भगवान को जब आनन्द का उफान आता है तो मानव शरीर में ही अवतार के रूप में निराकार से साकार होते हुए इस भूलोक में प्रकट होते हैं।

दुख क्या है, असत्य का परिपाक ही दुख है। दूध कढ़ाई में पकते-पकते खोया बन जाता है। जीवन की कढ़ाई का बड़ा हुआ असत्य धीरे धीरे दुख बनता रहता है। जब जिसे जहाँ दुख दारिद्र दिखाई पड़े तब तिसे तहाँ असत्य के छिपे हुए दानव को ढूँढ़ निकालने का प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि सत्य के साथ दुख एक पल भी ठहर नहीं सकता। जीवन को आनन्दमय बनाने का एकमात्र साधन सत्य है। सत्य को पहचान हृदयंगम करना और आचरण में लाना एक कला है, जो मृत को सजीव करती है। और बीहड़ बन में हरियाली उत्पन्न करती है। जो व्यक्ति असली अर्थ में मानव जीवन का स्वर्गीय आनन्द भोगना चाहता है। उसे सत्य की शोध करनी चाहिए सत्य को प्राप्त करना चाहिए ।

आप निकृष्ट पतित और अतृप्त जिन्दगी जीना स्वीकार मत कीजिए आप अज्ञान और असत्य की अंधेरी कोठरी में कैद होने से इन्कार कर दीजिए इन्द्रिय लिप्सा, स्वार्थ भावना, तृष्णा अनीति के बन्धनों में बँधने के लिए तैयार मत होइए क्योंकि यह सब आपके लिए बड़े ही शर्म और अपमान की बात होगी सम्राटों के सम्राट परमात्मा का महान राजकुमार मनुष्य असत्य पदार्थों की अस्पृश्य नालियों में स्नान करे, यह कैसी लज्जा और लानत की बात है। आप अपने गौरव को ऊँचा रखिए, अपने और अपने पिता के सम्मान को उन्नत रखिए ।

आत्मा सत्य है, जीवन सत्य है, जगत सत्य है, आप इन सब में से सत्य अंश को ग्रहण करके हंस की तरह असत्य रूप पानी को छाँट कर अलग कर दीजिए । असत्य के मायावी जंजाल से दूर रहिए सत्य के आनंदित लोक में शान्तिपूर्वक विचरण कीजिए और जीवन का सच्चा फल प्राप्त कीजिए। वेद भगवान आपका युगों से पथ प्रदर्शन कर रहे हैं वे आदेश करते हैं। असली मा सद्गमय’ हे मनुष्य! असत्य की ओर नहीं सत्य की ओर चलो। पाठकों! अन्धकार की ओर नहीं प्रकाश की ओर चलो।


सत्य-शोधक के साथ

मेरे बहुमूल्य चौदह दिनों की स्मृति ।

(श्री मुँशीराम गुप्ता, हिसार, पंजाब )

गत दो वर्षों से अखंड ज्योति पत्रिका का निरंतर स्वाध्याय करते रहने के कारण मेरे मन में असाधारण श्रद्धा उत्पन्न हो गई थी। यों तो मैं अनेक ग्रन्थों का स्वाध्याय और अनेक श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग करता रहा हूँ, पर अखंड ज्योति के लेखों में जो समाधानकारक आनंद आता था वह बड़ा ही संतोषजनक होता था। वह ज्ञान तृप्ति का आनन्द श्रद्धा में बदलता गया और एक दिन मन की तरंग से विवश होकर मैं अपने व्यापारिक झंझटों को यों ही अधूरा छोड़ कर हिसार से मथुरा चल पड़ा और अखंड ज्योति कार्यालय में आदरणीय सम्पादक जी की सेवा में जा उपस्थित हुआ।

छोटा सा आठ रुपये मासिक किराये का दफ्तर जिसमें अपने ढंग की अनोखी सादगी विराज रही थी बड़ा ही पवित्र और शान्तिमय प्रतीत होता था। अखबार के बड़े कारखाने की मैं कल्पना कर रहा था। और समझता था कि सम्पादक जी का कोई बड़ा सा आडम्बर होगा किन्तु यहाँ कल्पना से विपरित निकला। दो छोटे कमरों में दो मेजों पर काम हो रहा था, विभिन्न भाषा और दर्शनों के पश्चात हजार ग्रन्थों का जिसने पारायण किया है दर्शन शास्त्र और धर्म विज्ञान के मूल तत्वों का मंथन करने में जिसने चौथाई शताब्दी तक तय किया है, ऐसा व्यास जैसा तत्वज्ञानी कृष्ण सा कर्मवीर और बुद्ध सा प्रचारक यह प्रसन्नमुखी मुद्रा धारण किये खादी के धवल वस्त्र पहने कृशकाय किन्तु तेजपुँज युवक गंभीर लेखन कार्य में निमग्न था। असाधारण सादगी से परिपूर्ण आचार्य श्रीराम शर्मा को पहचानने में मुझे कुछ भी कठिनाई न हुई। सहज ही मेरा मस्तक श्रद्धा से नत हो गया।

चौदह दिन केवल चौदह दिन-मैं मथुरा ठहर सका इस बीच में जीवन की गूढ़ समस्याओं पर जिस सरल और सुबोध ढंग से आचार्य जी ने उपदेश किये उनको भली भाँति मैंने समझा और अन्तरात्मा ने स्वीकार कर लिया कि संसार की विषम पेचीदगियों का यही कारण निदान और निराकरण है जो अखंड ज्योति बताती रहती है सांप्रदायिक द्वेष भावना अपने पराये का भ्रम दूसरों के बुरे स्वभावों पर आने वाले क्रोध यह सभी मुझे व्यर्थ अनुभव हुए क्योंकि आत्मा की महानता और श्रेष्ठता का अनुभव होते ही सांसारिक कुविचारों की तुच्छता स्पष्ट हो जाती है। ईश्वर प्राप्ति और योग साधना, घर गृहस्थी के बीच रह कर किस प्रकार हो सकती है इसका मर्म जानकर मुझे बहुत ही सन्तोष हुआ। अन्यान्य शंकाओं का समाधान प्राप्त करते हुए भी अतीव शान्ति उपलब्ध हुई। मैं सदैव से सत्संग का प्रेमी रहा हूँ और अनेक महापुरुषों के चरण स्पर्श करके कृताकार्य हुआ हूँ पर इस विलक्षण आत्मा में जो दिव्य विभूति मैंने पाई, वह अन्यत्र बहुत ही कम देखने में आती है। पूर्वीय और पाश्चात्य तत्वज्ञान का धुरन्धर विद्वान वज्र की तरह कठोर कर्मनिष्ठ यन्त्र की तरह निरन्तर कार्य में लगा रहने वाला बालक की तरह निष्कपट एवं सरल पुष्प की तरह पवित्र यह निर्धन धर्म प्रचारक अपने ढंग का एक अनोखा पुरुष है जिसकी सादगी सरलता निराभिमानता और सहृदयता देखते ही बनती है।

इसी अप्रैल को वे 14 दिन मुझे स्वर्गानुभव की तरह भली प्रकार याद हैं शायद उन्हें आगे भी भूल न सकूँ। क्योंकि इन दिनों में मैंने बहुत कुछ पाया है। सुना करता था कि पूर्व काल में लोक कल्याण के लिए ऋषि महर्षि निर्जन वनों की कन्दराओं में योगाभ्यास किया करते हैं मैंने देखा कि बृज भूमि के पुण्य क्षेत्र में एक छोटी सी भाड़े की कुटी में एक गृहस्थ योगी लोक कल्याण के लिए प्रचंड तपस्या कर रहा है। मामूली व्यक्तियों की तरह तो भी उसमें कृशकाय अस्थि पिंजर में ज्ञान यज्ञ का एक महान अश्वमेध रचा हुआ है। आडंबर और ढ़ोंगों को पूजने वाली दुनिया शायद इस सादगी पसन्द सन्त को न पहचान सके, परन्तु निःसंदेह कुचवाचन की कीचड़ में बिलखते हुए और अज्ञान के अन्धकार में भटके हुए प्राणियों को ऐसी ही आत्माएं सन्मार्ग पर प्रवृत्त करेंगी।

नवीन युग का निर्माण करने के लिए भागीरथी तपस्या में संलग्न इस महापुरुष का अखंड ज्योति सम्पादक का, आचार्य श्री राम शर्मा का हार्दिक अभिनन्दन करता हुआ मैं अपनी सहज श्रद्धा को प्रकट करना अपना पुनीत कर्तव्य समझता हूँ।


राम राज्य या सत् युग

(तुलसीकृत रामायण से)

राम राज बैठे त्रैलोका।

हरषित भये गये सब शोका॥

बैर न कर काहू सन कोई

राम प्रताप विसमता खोई ॥

वरणाश्रम निज-निज धरम, निरत वेद पथ लोग।

चलहिं सदा पावहिं सुरत, नहि भय शोक न रोग॥

दैहिक दैविक भौतिक तापा।

राम राज काहुहि नहि व्यापा॥

सब नर कारहि परस्पर प्रीति।

चलहि स्वधर्म निरत श्रुति रीति ॥

चारिहु चरन धरम जग माही।

पूरि रहा सपनेहु अद्य नाहीं॥

राम भगति रत नर अरु नारी।

सकल परम गति के अधिकारी ॥

अल्प मृत्यु कवनेहु नहिं पीरा ।

सब सुन्दर सब विरुज सरीरा॥

नहि दरिद्र कोउ दुखी न दीना।

नहि कोउ अबुध न लच्छन हीना॥

सब निर्दभ धर्म रत पुनी।

नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥

सब गुनज्ञ पंडित सब ज्ञानी ।

सब कतृज्ञ नहिं कपट सयानी॥

एक नारि व्रत रत सब झारी ।

ते मन वच क्रम पति हितकारी ।

फूलहिं फलहि सदा तरु कानन

रहहि एक संग गज पंचानन॥

खग मृग सहज बैर विसराई।

सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥

कूजहि खग मृग नाना वृंदा ।

अभय चरहि बन करहि अनंदा॥

सस-सम्पन्न सदा रह धरनी ।

त्रेता भइ सतयुग की करनी ॥

कथा -


सत्यनिष्ठ बालक

अपने शयनागार में सोये हुए महाराज छत्रपति शिवाजी के निकट पहुँचकर वह बालक तलवार का प्रहार करने ही वाला था कि सेनापति तानाजी ने उसे देख लिया और लपककर उसका हाथ पकड़ लिए और धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया।

धमाका सुन कर महाराज शिवाजी जाग पड़े। देखा कि तानाजी द्वारा एक बालक पकड़ा हुआ है जो उन्हें मारने के लिए किसी प्रकार शयनागार में घुस आया था। पकड़ा हुआ बालक-निर्भीकतापूर्वक खड़ा हुआ था। शिवाजी ने उससे पूछा- तुम कौन हो? और यहाँ किस लिए आए थे? बालक ने कहा- मेरा नाम मालोजी है और मैं आपकी हत्या करने के लिए यहाँ आया था। महाराज ने पूछा- तुम नहीं जानते हो कि इसके लिए तुम्हें क्या दण्ड मिलेगा ?

जानता हूँ महाराज! मृत्यु दण्ड, बालक ने उत्तर दिया।

तो इतना जानते हुए भी तुम मेरी हत्या करने क्यों आये? क्या तुम्हें अपने प्राणों का मोह नहीं था, मालो! शिवा जी ने उससे पूछा।

बालक ने अपनी सारी कथा कह सुनाई उसने कहा- मेरे पिता आपकी सेना में नौकर थे वे एक युद्ध में मारे गए। पीछे राज्य से हम लोगों को कोई सहायता न मिली अब हम माँ बेटे कष्ट से जीवन काट रहे हैं। माँ तो कई रोज से बीमार पड़ी है घर में अन्न का एक दाना भी न होने के कारण हम लोगों को कई फाके हो गये। बालक की आँखें छलक आईं। उसने वृत्तान्त को जारी रखते हुए कहा “मैं भोजन की तलाश में घर से बाहर निकला था कि आपके शत्रु सुभागराय ने मुझे बताया कि शिवाजी कितनी निष्ठुर हैं, जिसकी सेवा में तेरे पिता जी की मृत्यु हुई। वही अब तुम्हारी कुछ फिक्र नहीं करता । इसलिए तुझे शिवाजी से बदला लेना चाहिए यदि तू उन्हें मार आवेगा। तो मैं तुझे बहुत सा धन दूँगा । यह बात मुझे उचित प्रतीत हुई और आपकी हत्या के लिए चला आया।

तानाजी ने कहा- दुष्ट तेरे कुकृत्य से महाराष्ट्र का दीपक बुझ गया होता, अब तू मरने के लिए तैयार हो जा’

‘तैयार हूँ ‘ मृत्यु से मैं बिलकुल नहीं डरता। पर एक बात चाहता हूँ कि मृत्यु शैय्या पर पड़ी हुई माता के चरण स्पर्श करने की एक बार आज्ञा मिल जाय। माता के दर्शन करके सबेरे ही वापिस लौट आऊँगा। बालक ने उत्तर दिया।

शिवाजी ने कहा - यदि तुम भाग जाओ और वापिस न आओ तो ?

बालक ने गम्भीरतापूर्वक उत्तर दिया मैं क्षत्रिय पुत्र हूँ वचन से नहीं लौटूँगा। महाराज ने मालो को घर जाने की आज्ञा दे दी।

दूसरे दिन सवेरे ही मालो जी दरबार में उपस्थित था, उसने कहा महाराज मैं आ गया अब मृत्यु दण्ड के लिए तैयार हूं।

शिवाजी का दिल पिघल गया। ऐसे चरित्र वान बालक को दण्ड दूँ। न मुझ से यह न होगा। महाराजा ने बालक को छाती से लगा लिया और कहा तेरे जैसे उज्ज्वल रत्न ही देश और जाति का गौरव बढ़ा सकते हैं। मालो तुझे मृत्यु दण्ड नहीं सेनापति का पद प्राप्त होगा। तेरी सत्यनिष्ठा को सम्मानपूर्ण गौरव से पुरस्कृत किया जायगा।


सच्ची वर्ण व्यवस्था

(आध्यात्मिक रुचि के अनुसार विभाजन)

धर्म शास्त्रों में अलग-अलग तरह के लोगों के लिये अलग-2 तरह की शिक्षाएं दी गई हैं। कहीं नरकों के कठोर चित्रण चौरासी लाख योनियों में पड़ने का कष्ट ईश्वरीय दंड आदि का भय दिखलाया गया है। कहीं ईश्वर की कृपा से धन सन्तान ऐश्वर्य, सुख स्वर्ग मोक्ष आदि मिलने का प्रलोभन है और कहीं आत्मा के सच्चिदानंद स्वरूप में आत्मारमण करने का समाधि आनंद एवं परमपद प्राप्त करने का तत्व ज्ञान है। लोग समझते हैं कि शास्त्र में यह परस्पर विरोधी अनेक तरह के उपदेश हैं, परन्तु विचारपूर्वक देखने से इस अनेकता में एकता छिपी हुई दिखती है। अधिकारी भेद के कारण अलग-अलग कर्मोंपदेश किये जाते हैं। पशुओं को केवल दंड द्वारा ही काम में लगाया जा सकता है। लाठी लेकर ही कोई भेड़ों के झुण्ड को इधर से उधर को हाँक सकता है। उन्हें प्रेमपूर्वक समझाया जाय कि आप लोग कृपा करके सीधी सड़क पर चलिए शायद भेड़ें उसका कुछ अर्थ न समझ सकेंगी। और न उसके अनुसार आचरण करेंगी मनुष्यों में बहुत से इसी पशु संज्ञा के हैं जो केवल नियंत्रण और बल प्रयोग द्वारा ही सत्मार्ग पर चलाये जा सकते हैं चोर डाकू गुँडे आततायी बिना दंड और भय के सीधे रास्ते पर चलेंगे ऐसी आशा नहीं की जा सकती।

मध्यम श्रेणी के लोगों को उनका हित-अहित समझाकर प्रेम द्वारा उनसे हृदय स्पर्श करके ऊँच नीच का मर्म बता कर ठीक रास्ते पर लाया जा सकता है उन्हें यदि भय या दंड दिया जायगा तो विरोधी हो जाएंगे एवं सुधरने के बजाय और बिगड़ेंगे। उनके लिए तो प्रेम ही अस्त्र है। पारिवारिक झगड़ों को दंड से नहीं प्रेम से सुलझाया जा सकता है।

जो विचारक है उच्च मनोभूमि के हैं जिन की आत्मा प्रबुद्ध है उनके लिए संकेत भी पर्याप्त हैं एक इशारे से वे अपनी भूल समझ सकते हैं। और बिना एक पल का विलम्ब लगाए सावधान हो सकते हैं।

वस्तुतः सत्य एक ही है पर अधिकारी भेद से उसका तीन-तीन तरह उपयोग होता है इसलिए सत्य प्रेम और न्याय के तीन नामों से उसे संबोधन कहना पड़ता है। देखना चाहिए कि कौन विद्यार्थी किस कक्षा में पढ़ता है, उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए बाल कक्षाओं के छोटे-छोटे बालक अध्यापक के डर से सब काम करते हैं। यदि आधे घंटे के लिए अध्यापक उठ कर चला जाय तो वे पढ़ना लिखना बन्द कर देंगे और स्कूल के सारे नियम तोड़ कर हो हल्ला मचाने लगेंगे अध्यापक उन्हें धमकाता है और भय दिखाकर व्यवस्था में रखता है ऐसे व्यवहार मिडिल कक्षा के किशोर बालकों के साथ नहीं होता। अध्यापक उन्हें समझाता है कि पढ़ने में तुम्हारा क्या लाभ है और न पढ़ने में क्या हानि है प्रेमपूर्वक समझाने से यह विद्यार्थी ठीक आचरण करने लगते हैं, गुरु को उन्हें पीटने की आवश्यकता प्रायः नहीं पड़ती। कालेज के छात्रों से उनके प्रोफेसर दूसरी तरह का व्यवहार करते हैं उन्हें बराबरी का समझते हैं उनके सम्मान का ध्यान रखते हैं और आशा करते हैं कि अपनी शिक्षा के लिए वे स्वयं। ही बहुत प्रयत्नशील होंगे। लेक्चर देने के बाद प्रोफेसर इस बात की चिन्ता नहीं करता कि छात्र पढ़ रहें हैं या नहीं क्योंकि उसे विश्वास है कि ये जवान लड़के अपनी भलाई-बुराई समझने लगे हैं।

विभिन्न मनुष्य विभिन्न प्रकार के व्यवहार के अधिकारी होते हैं। कोई सत्य से सुधर सकता है कोई प्रेम से और कोई न्याय दंड से। इसी प्रकार सत्यधर्म के अनुयायियों को अपने लिए अलग प्रकार का मार्ग चुनना होता है। हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था इसी चुनाव की बोधक है। जिन की रुचि जिस विषय में है वह उसे स्वीकार कर सकता है। सत्य के उपयुक्त जिनकी मनोभूमि है वे ब्राह्मण हैं जिनके मन में प्रेम भरा हुआ है वह वैश्य हैं और जो न्यायशक्ति में दिलचस्पी लेते हैं वे क्षत्रिय हैं। यह वृत्तियां एक दिन में नहीं बन जाती हैं पुराने प्रारब्ध कर्मों, संचित विश्वासों और बहुत दिनों के ज्ञान एवं अज्ञान संस्कारों के कारण यह ब्राह्मणत्व वैश्यत्व और क्षत्रियत्व दृढ़ होता है। बहुत बार जो मनुष्य जिस घर में जन्मा है उसमें वैसी ही गुण होते हैं। बहुत बार संस्कारों की प्रबलता के कारण जन्म और क्रम के स्वभाव में अन्तर होता है। इनमें प्रधानता जीव के स्वभाव और संस्कार को ही दी जाती है। गणिका के गर्भ से उत्पन्न हुए वशिष्ठ, अज्ञात पति से गर्भ धारण करने वाली जाबाला का पुत्र सत्यकाम, सूर्पकार के घर उत्पन्न हुए रामानुज, क्षत्रिय के घर जन्मे हुए विश्वमित्र और गौतम बुद्ध यह सब अपने संस्कारों के कारण ब्राह्मण हुए। इसी प्रकार ब्राह्मण के घर जन्मे हुए द्रोणाचार्य कृपाचार्य एवं परशुराम क्षत्रिय कहलाये। वैश्यों के वर्ण परिवर्तन की भी कथायें प्राप्त होती हैं।

सत्य, प्रेम और न्याय में से जिसमें हमें विशेष रुचि हो और जिस योग्य मनोभूमि हो हम उसके अनुसार अपना वर्ण चुन सकते हैं। भौतिक वर्ण यदि हमारा जन्मजात बना रहे तो भी कुछ हर्ज नहीं जन्मजात वर्ण का वंश या समाज समझा जा सकता है आध्यात्मिक वर्ण अपने संस्कारों की प्रबलता एवं रुचि आकर्षण के अनुसार चुना जा सकता है। जैसे बहुत से लड़कों के दो नाम होते हैं एक माता-पिता का प्यार का नाम दूसरा स्कूल के रजिस्टर में दर्ज नाम उसी प्रकार यदि हम अपने दो वर्ण रखें तो कोई हर्ज नहीं है एक भौतिक वर्ण दूसरा अध्यात्मिक वर्ण जो जिस वर्ण को स्वीकार करे वह उसी के अनुसार आचरण करे और दूसरों को आचरण करने के लिए उत्साहित करे। तीनों सड़कें आगे चल कर एक ही चौराहे पर पहुँचती हैं। किसी एक को अपना अवलम्ब बना कर हम अन्तिम लक्ष तक पहुँच सकते हैं।

पाठक पूछेंगे कि तीन वर्ण तो यह हुए चौथा वर्ण क्यों छोड़ दिया गया? इस सम्बन्ध में हमारा मत है कि जैसे अँधेरा कोई वस्तु नहीं है प्रकाश न होने को ही अँधेरा कहते हैं और जीवन का अभाव मृत्यु कहलाती है उसी प्रकार उपरोक्त तीन गुणों का, तीन वर्णों के धर्म का अभाव ही शूद्र है। जिस व्यक्ति की मनोभूमि बिलकुल ही जड़ हो जो सत्य प्रेम न्याय में से किसी को न तो जानता है और न उसके प्राप्त करने का प्रयत्न करता है वह शूद्र है। शूद्रत्व मनुष्यता का अभिशाप है। किसी मनुष्य को अपने को शूद्र कहते हुए लज्जित होना चाहिए क्योंकि यह शब्द करीब-करीब पशुत्व का बोधक है आरम्भ में सभी मनुष्य जब ज्ञान से रहित हैं तो शूद्र कहलाते हैं। किन्तु जब ज्ञान में प्रवेश करते हैं तो उस पुराने आध्यात्मिक चोले को उतारकर फेंक देते हैं तीन वर्णों को द्विज या द्विजन्मा कहते हैं अर्थात् उन्होंने पुराने शूद्रत्व को उतार कर फेंका और मानवीय उच्चता का शरीर प्राप्त कर लिया दीक्षा लेकर और तीन तार का यज्ञोपवीत कन्धे पर धारण करके शूद्र द्विज बनते हैं। आध्यात्मिक द्विजत्व प्राप्त करना हर मनुष्य का कर्तव्य है, जो उस ओर ध्यान नहीं देता उस शूद्र का जीवन सर्वथा धिक्कारने योग्य है।


VigyapanSuchana

(अखंड ज्योति का अगला अंक)

“न्याय अंक” होगा

पृष्ठ संख्या इतनी ही पर सामग्री अमूल्य

20 जुलाई की प्रतीक्षा कीजिए!


ईश्वर की खोज


ईश्वर की खोज

डॉ. राम नरेश त्रिपाठी

मैं ढूँढ़ता तुझे था जब कुँज और बन में।

तू खोजता मुझे था तब दीन के वतन में॥

तू आह बन किसी की मुझको पुकारता था।

मैं था तुझे बुलाता संगीत में भजन में ॥ 1॥

मेरे लिये खड़ा था दुखियों के द्वार पर तू-

मैं बाट जोहता था तेरी किसी चमन में।

बन कर किसी के आँसू मेरे लिये बहा तू-

आँखें लगी थी मेरी तब यार के बदन में । 2।

बाजे बजा बजा के मैं था तुझे रिझाता -

तब तू लगा हुआ था पतितों के संगठन में।

मैं था विरक्त तुझसे जग की अनित्यता पर-

उत्थान भर रहा था तब तू किसी पतन में । 3।

बेबस गिरे हुओं के तू बीच में खड़ा था-

मैं स्वर्ग देखता था झुकता कहाँ चरन में।

तूने दिये अनेकों अवसर न मिल सका मैं-

तू कर्म में मगन था मैं व्यस्त था कथन में । 4॥

हरिचंद और ध्रुव ने कुछ और ही बताया-

मैं तो समझ रहा था तेरा प्रताप धन में।

मैं सोचता तुझे था रावन की लालसा में-

पर था दधीचि के तू परमार्थ रूप तन में । 5॥

तेरा पता सिकन्दर को मैं समझ रहा था-

पर तू बसा था फरहाद कीहकन में।

क्रीसस के हाथ में था करता विनोद तू ही-

तू अन्त में हँसा था महमूद के रुदन में । 6॥

प्रहलाद जानता था तेरा सही ठिकाना-

तू ही मचल रहा था मंसूर की रटन में

आखिर चमक पड़ा तू गाँधी की हड्डियों में

मैं था तुझे समझता सुहराव पीलतन में। 7॥

कैसे तुझे मिलूँगा जब भेद इस कदर है-

हैरान हो के भगवन् आया हूँ मैं शरन में।

तू रुप है किरन में सौंदर्य है सुमन में-

तू प्राण है पवन में विस्तार है गगन में। 8॥

तू ज्ञान हिंदुओं में ईमान मुसलिमों में-

है प्रेम क्रिश्चिन में तू सत्य है सुजन में ।

हे दीनबन्धु ! ऐसी प्रतिभा प्रदान कर तू-

देखूँ तुझे दृगों में मन में तथा वचन में। 9॥

कठिनाईयों दुखों का इतिहास तो सुयश है-

मुझको समर्थ कर तू बस कष्ट के सहन में।

दुःख मैं न हार मानू सुख में तुझे न भूलूँ -

ऐसा प्रभाव भर दे मेरे अधीर मन में॥10॥

*समाप्त*