आशा, विश्वास और उन्नतिशील से विघ्न-बाधा सर्वदा दूर रहती है और उपस्थित कठिनाई भी पराजित होती है।
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उद्यत दृढ़ और स्थिर विचारों के सामने काई की भाँति सारे विघ्न हट जाते हैं।
दूर की न सोचने वाला लालची नष्ट हो जाता है और जो कहता है कि मुझे नहीं चाहिए, उसे बहुत मिलता है। जिसे न्याय और अन्याय का ज्ञान है, जो लेने योग्य और न लेने योग्य का भेद समझता है, ऐसे श्रेष्ठ पुरुष का घर ढूँढ़ती-ढूँढ़ती लक्ष्मी स्वयं उसके पास पहुँच जाती है। पारा कितना लुभावना है, फिर भी कोई उसे पचा नहीं सकता है। अधर्म की कमाई भली मालूम पड़ती है पर उसका पचना लोहे के चनों जितना कठिन है। पाप को कोई नहीं पचा सकता, इसलिए अधर्म का धन खाने की इच्छा मत करो। लोभ का पारा ऐसा है कि इसमें अच्छे-अच्छे समझदार मनुष्य फँस जाते हैं और उस जाल में जैसे-जैसे फड़फड़ाते हैं वैसे ही वैसे और अधिक फँसते जाते हैं। लालच मनुष्य से कौन सा बुरा काम नहीं करा सकता? किन्तु उदार विचार वाला मनुष्य दूसरों को अपना समझता है और उनके धन को विराना नहीं मानता। आत्मीयता की भावनाएं उसके मन में प्रवेश पा लेती हैं, वह थोड़े में गुजारा कर लेता है और कहता है- बस, मेरे लिए इतना ही पर्याप्त है, मुझे और कुछ नहीं चाहिए।
आध्यात्मिक परीक्षाएँ
अखण्ड ज्योति कार्यालय ने अब तक ???? पुस्तकें प्रकाशित की हैं, वह एक प्रकार ???? कोर्स है। इस कोर्स का जिन्होंने अध्ययन कर लिया है वे अपने विषयों की परीक्षाएँ देकर उपाधि सहित प्रमाण पत्र प्राप्त कर सकते हैं। यह शिक्षा इस प्रकार से विभाजित है।
सूर्य चिकित्सा
उपाधि- (1) सूर्य चिकित्सा विशारद।
(2) D. C. S. (डॉ. आफ ओमोपैथिक ????
प्राण चिकित्सा
उपाधि- (1) प्राण विद्या विशारद।
(2) P. M. D. (डॉ. आफ पर्सनल मैगनेटिज्म)
परोक्ष ज्ञान
उपाधि- (1) दैष्श। (2) D. D. (डॉक्टर आफ डिविन्टी)
अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए उत्तर के लिए टिकट भेजते हुए पत्र व्यवहार करना चाहिये।
व्यवस्थापक- ‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय, मथुरा।
अखण्ड ज्योति के नियम
(1) अखण्ड ज्योति का वार्षिक चन्दा 1/- मनी आर्डर से भेजना चाहिए। बी.पी. मंगाने से 1/- अधिक देने पड़ते हैं। मूल्य में कमी करने के लिए पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिए ग्राहक नहीं बनाये जाते।
(2) पाठकों को जनवरी से ग्राहक बनना चाहिये, ???? के किसी मास में चन्दा भेजने वालों को जनवरी ???? उस मास तक के पिछले अंक भेज दिये जावेंगे।
(3) अखण्ड ज्योति हर महीने की ठीक 20 तारीख को निकल जाती है। न मिले तो डाक के उत्तर सहित 15 दिन के अंदर ही लिखना चाहिये।
(4) सन् 40 के छः अंक तथा सन् 41 के कुल अंक मौजूद हैं। जो मंगाना चाहे ???? प्रति अंक के हिसाब से मंगा सकते हैं।
(5) हर पत्र के साथ अपना पूरा पता और ग्राहक नम्बर अवश्य लिखना चाहिए। इसके बिना उत्तर भेजने में विलम्ब हो सकता है। उत्तर के लिए जवाबी कार्ड या टिकट भेजना चाहिए।
मैनेजर- अखण्ड ज्योति, मथुरा।
एडवोकेट हाईकोर्ट, इलाहाबाद
क्या कहते हैं?
मैंने अपने जीवन में पहली बार ही आधुनिक पद्धति से औषधियां तैयार करने वाले सुख संचारक कम्पनी लिमिटेड मथुरा के कारखाने को देखा। जितनी स्वच्छता और तत्परता से यहाँ पर औषधियां तैयार करके संग्रह की जाती हैं, उसे देख कर में आश्चर्य में पड़ गया। औषधियां सुयोग्य वैद्य की अध्यक्षता में तैयार होती हैं। कम्पनी ने अकथनीय सफलता प्राप्त क हैं। यदि आयुर्वेदिक औषधियां तैयार करने की ऐसी अन्य कंपनियां हमारे यहाँ होती तो हमारे लिए एक सौभाग्य का विषय होता। मैं कम्पनी की भविष्य में अधिक सफलता और पं. श्रेत्रपाल जी शर्मा के दीर्घ जीवन की कामना करता हूँ।
एन. उपाध्याय एडवोकेट।
ता. 23/12/41
जो ज्ञान युगों के प्रयत्न से मिलता है- उसे हम अनायास ही आपके सन्मुख उपस्थित करते हैं।
यह पुस्तकें बाजारू किताबें नहीं हैं। उनकी एक-एक पंक्ति के पीछे गहरा अनुभव और अनुसंधान है। विनम्र शब्दों में हमारा दावा है कि इतना खोजपूर्ण अलभ्य साहित्य इतने स्वल्प मूल्य में अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकता।
1. मैं क्या हूँ?- आत्मा का प्रत्यक्ष प्रदर्शन करने के कुछ सरल साधन। मू. 1 रुपया
2. सूर्य चिकित्सा विज्ञान- सूर्य की प्रचंड रोगनाशक शक्ति द्वारा वैज्ञानिक ढंग से कठिन रोगों की चिकित्सा। मूल्य 1 रुपया
3. प्राणचिकित्सा विज्ञान- मनुष्य के अंदर गजब की विद्युत शक्ति है। उसके द्वारा समस्त रोगों का इलाज। विदेशों में इस विधि से बड़े-बड़े अस्पताल चल रहे हैं। मूल्य 1 रुपया
4. परकाया प्रवेश- मैस्मरेजम के ढंग पर आत्मशक्ति को दूसरे के शरीर में प्रविष्ट करके उसे इच्छानुसार चलाने की साधना। मूल्य 1 रुपया
5. स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्भुत विद्या- अध्यात्मिक सरल साधनों द्वारा तन्दुरुस्त और खूबसूरत बनने के अद्भुत उपाय। मूल्य 1 रुपया
6. मानवीय विद्युत के चमत्कार- शरीर की बिजली से कैसे-कैसे आश्चर्यजनक कार्य होते हैं इसका विस्तृत वैज्ञानिक विवरण। मूल्य 1 रुपया
7. स्वर योग से दिव्य ज्ञान- स्वरोदय विद्या द्वारा गुप्त और भविष्य की बातों को जान लेने की रहस्यपूर्ण साधना। मूल्य 1 रुपया
8. भोग में योग- शीघ्र पतन, स्वप्न दोष, प्रमेह, नपुँसकता आदि विकारों को योग साधनों से दूर करने और मनचाही स्तम्भन शक्ति प्राप्त करने की गुप्त विधियाँ। मूल्य 1 रुपया
9. बुद्धि बढ़ाने के उपाय- जिन लोगों को मस्तिष्क से काम करना पड़ता है या जो स्मरण शक्ति बढ़ाकर बुद्धिमान बनना चाहते हैं उनके लिए यह कल्प वृक्ष के समान है। मूल्य 1 रुपया
10. धनवान बनने के गुप्त रहस्य- बड़े-बड़े कुबेरों द्वारा कार्य रूप में आई हुई ऐसी विधियाँ हैं जो आपको भी धनवान बना सकती हैं। मूल्य 1 रुपया
11. पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि- मन चाही संतान प्राप्त करने के सारे रहस्य इस पुस्तक में खोल कर रख दिये हैं। मूल्य 1 रुपया
12. वशीकरण की सच्ची सिद्धि- दूसरों को अपने वश में करने के लिये बिलकुल सच्चे और हजारों वार आजमाये हुए प्रयोगों का वर्णन। मूल्य 1 रुपया
13. मरने के बाद हमारा क्या होता है?- मृत्यु के उपरान्त प्राप्त होने वाले स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, प्रेत योनि, मृतकों का साक्षात्कार, उनकी सहायता प्राप्त करना आदि बातों पर अनुभवपूर्ण वर्णन। मूल्य 1 रुपया
14. जीव जन्तुओं की बोली समझना- मूक जीव जन्तुओं की भी स्वतंत्र भाषा है और वे भी हमारी ही तरह बातचीत करते हैं। उसे समझने का महत्वपूर्ण विधान। मूल्य 1 रुपया
नोट- चार या अधिक पुस्तकें लेने पर चौथाई कमीशन दिया जाता है। हर पुस्तक पर एक आना के हिसाब से पोस्टेज लगता है, जो खरीदार को देना होता है। इस प्रकार कमीशन काटकर और पोस्टेज जोड़ कर 1 रुपया प्रति पुस्तक के हिसाब से मूल्य भेजना चाहिए। चार से कम पुस्तकें मंगाने वाले सात आना प्रति के हिसाब से भेजें।
पता- मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा।
इस विपत्ति की घड़ी में
द्वापर के अन्त में शमीक ऋषि ने जब राजा परीक्षित को यह संदेश भेजा कि शृंगी ऋषि के शाप को तक्षक के काटने के कारण सात दिन में उसकी मृत्यु हो जायगी, तो राजा सावधान हो गया और उसने अपना लोक परलोक सुधारने के लिए आध्यात्मिक अनुष्ठान किया। विपत्ति भी उसके लिए कल्याण कारी हुई, उसे मनुष्य से देवता बना गई।
आज जब कि संसार में त्राहि-त्राहि मची हुई है और प्रलय की घनघोर घटाएं भारत की देहरी से टकरा रही हैं, हर एक जागृत आत्मा का कर्त्तव्य है कि वह सजग हो जाय। आज कलयुग के अन्त में अखण्ड ज्योति संसार के नाम एक सन्देश भेजती है कि-भूत काल में मनुष्य जाति ने जो दुष्कर्म किये हैं उनका फल उन लोगों को इस लिए भुगतना पड़ेगा , कि सब एक सूत्र में बँधें हुए हैं-एक के पाप का दूसरा भी जिम्मेदार है। किसे कितना कष्ट भुगतना पड़ेगा, यह ईश्वर जाने, पर हर एक को सावधान अवश्य हो जाना चाहिए।
अखण्ड ज्योति की आध्यात्मिक मिशन जोर जोर से खतरे का घन्टा बजा रहा है कि- खतरे की घड़ी पास है, इस विपत्ति के समय शीघ्र से शीघ्र जो काम करने का है, वह यह है कि आप सर्वतो भावेन सत्य नारायण की शरण की शरण अपने को समर्पित कर दें। बालक की तरह सत्य के अंचल में अपने को छिपा लें जहाँ कि गैस बम कुछ भी असर नहीं कर सकते। नित्य प्रभु की प्रार्थना करना, बुराइयाँ त्याग कर भलाई अपनाना और शक्ति संग्रह करना यह कार्य आज से ही प्रारम्भ हो जाने चाहिए। सर्वभौम वातावरण को पवित्र बनाने के लिए आध्यात्मिक ब्रह्म यज्ञ की आवश्यकता है। शुभ विचार करना ही ब्रह्म यज्ञ है।
“अखण्ड ज्योति” ब्रह्म-यज्ञ का प्रसार कर रही है!
आप अखण्ड ज्योति का प्रचार कीजिए!!
(मास्टर उमादत्त जी सारस्वत कविरत्न, बिसवाँ)
(1)
“ अवतार न लेते प्रभु! क्यों?”
कह दोष मुझे देते हो।
यह व्यर्थ कल्पना कैसी?
हाँ,। तुम्हीं नहीं चेते हो॥
हैं ‘दशरथ’ कहाँ दिखाओ।
मत दोषी मुझे बनाओ।
(2)
यदि हिरण्यकश्यप कोई
हैं कष्ट तुम्हें पहुँचाते।
प्रह्लाद-समान न क्यों तुम,
तो सत्याग्रह कर जाते।
राणा प्रताप बन जाओ।
मत दोषी मुझे बनाओ।
(3)
हैं अगणित कंसासुर अब,
वसुधा पर मैंने माना।
पर नहीं चाहते तुम ही
मुझको ही आज बुलाना।
हैं कितने ‘नन्द’ बताओ।
मत दोषी मुझे बनाओ॥
(4)
जब पड़ती तुम्हें जरूरत
मैं शक्ति-रूप धर आता!
‘गोखले -पटेल -जवाहर’
या गाँधी हूँ प्रकटाता।
कुछ तुम तो कर दिखलाओ।
मत दोषी मुझे बनाओ।
पिछले दो अंकों में यह सविस्तार बताया जा चुका है कि अब नवीन युग की सुनहरी बेला प्रारम्भ होने वाली है। समय एक बड़ी जबरदस्त करवट ले रहा है। इस करवट के साथ ऐसे-ऐसे परिवर्तन होंगे जिसकी कि इस समय कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह उलट-पुलट केवल राजनैतिक तक ही सीमित न समझनी चाहिए, वह तो एक बाह्य चिन्ह मात्र होगी। वास्तव में इस समय बौद्धिक क्रान्ति होनी जा रही है। सड़ी-गली विचारधाराओं से चिपकी हुई मनुष्य जाति को ईश्वरीय सत्ता की ओर से एक नवीन सन्देश प्राप्त हो रहा है। यह सन्देश भयानक घटनाएं तो घटित कर ही रहा है, साथ ही एक नवीन व्यवस्था भी कायम करने के लिये प्रयत्नशील है। यह नयी व्यवस्था मनुष्य का जीवन व्यतीत करने के सम्बन्ध में नया दृष्टिकोण उपस्थित करेगी। सदियों से हम लोग तुच्छ स्वार्थों को अपना ध्येय मानकर अनर्थ करते रहे हैं। “मैं लूँगा, दूसरे को न दूँगा” की नीति से कलह के बीज बोये और उन पर रक्तपात के फल आये। यह नीति आज इस सीमा तक बढ़ गई है- इतनी व्यापक हो गई है कि संसार चौथाई शताब्दी भी चैन से व्यतीत नहीं कर सकता। एक के बाद दूसरा महायुद्ध सिर पर आ गरजता है। बलवान व्यक्ति निर्बलों को सताता है, किन्तु उस बलवान को भी चैन नहीं क्योंकि आखिर उससे भी बलवान कोई सत्ता है, जो ठीक उसी प्रकार बलवान को दण्ड देती है, जैसा कि उसने निर्बलों को दिया था। इस छीना-झपटी की नीति के कारण छोटे से लेकर बड़े तक, निर्बल से लेकर बलवान तक किसी को चैन नहीं। कुकर्म और दण्ड, अत्याचार और दुःख, एक दूसरे से बंधे हुए हैं। इनके ताने-बाने में उलझा हुआ संसार बेचैनी और पीड़ाओं से बुरी तरह चीत्कार कर रहा है।
अन्तरिक्ष से एक सत्ता ऐसे समय में कहती है कि उलटा चलने का यही परिणाम है। मनुष्य की नीति होनी चाहिये- “मुझे नहीं चाहिए, आप लीजिए।” यही नीति है, जिसके आधार पर सुख और शान्ति का होना सम्भव है। “मैं लूँगा, आपको नहीं दूँगा।” की नीति को कैकेई ने अपना कर अयोध्या को नरक बना दिया था। सारी नगरी विलाप कर रही थी। दशरथ ने तो प्राण ही त्याग दिये। राजभवन मरघट की तरह शोकपूर्ण हो रहा था। राम जैसे निर्दोष तपस्वी को वनवास ग्रहण करना पड़ा। किन्तु जब ‘मुझे नहीं चाहिए, आप लीजिए’ की नीति व्यवहार में आई तो दूसरे ही दृश्य उपस्थित हो गये। राम ने राज्याधिकार को त्यागते हुए भरत से कहा- बन्धु, तुम्हें राज्य सुख प्राप्त हो, मुझे यह नहीं चाहिए। सीता ने कहा- नाथ, ये राज्यभवन मुझे नहीं चाहिए, मैं तो आपके साथ रहूँगी। सुमित्रा ने लक्ष्मण से कहा- “जो पै राम सीया वन जाहीं। अवध तुम्हार काम कछु नाही।” पुत्र! जहाँ राम रहें वहीं अयोध्या मानते हुए उनके साथ रहो। कैसा स्वर्गीय प्रसंग है। भरत ने तो इस नीति को और भी सुन्दर ढंग से चरितार्थ किया। उन्होंने राजपाट में लात मारी और भाई के चरणों से लिपट कर बालकों की तरह रोने लगे। भाई! मुझे नहीं चाहिए, इसे तो आप लीजिए। राम कहते है- भरत मेरे लिए तो वनवास ही अच्छा है। राज्य-सुख तुम भोगो। त्याग के इस सुनहरी प्रसंग में स्वर्ग छिपा हुआ है, एक परिवार के कुछ व्यक्तियों ने त्रेता को सतयुग में परिवर्तित कर दिया। सारा अवध राज्य सतयुगी रंग में रंग गया। वहाँ के सुख सौभाग्य का वर्णन करते-करते वाल्मिकी और तुलसीदास अघाते नहीं हैं।
अब ‘मैं लूँगा’ की नीति रूपी निशा समाप्त होकर ‘आप लीजिए’ की सुनहरी प्रभात होने वाली है। प्रभु ने मनुष्य को इसलिए इस पृथ्वी पर नहीं भेजा है कि वे एक दूसरे को लूट खाएं और आपस में रक्त की होली खेलें। बालकों को यह सत्यानाशी खेल खेलते हुए पिता अधिक देर तक नहीं देख सकता। वह अब उनका हाथ रोकेगा और बतायेगा की मूर्खों! तुम्हारा काम यह नहीं है जो कर रहे हो। अब उलटी चाल को छोड़ो और सीधी चलो। यह सीधी चाल यह है कि हर व्यक्ति “मुझे नहीं चाहिए, आप लीजिए।” की नीति ग्रहण करें। इस नीति के आधार पर विश्व की वह पेचीदा गुत्थी जिन्हें सुलझाने में आज बड़े-बड़े ऊँचे दिमाग असमर्थ है, बात की बात में सुलझ जावेंगी और शान्ति सुव्यवस्था का मार्ग, जो इस समय बहुत ही कंटकाकीर्ण प्रतीत होता है, बहुत आसानी से हो जायेगा। सतयुग हमें यही एक मंत्र देता है। इस मंत्र का अनुष्ठान करके हम सतयुग को बुला सकते हैं।
देश-देशान्तरों में फैले हुए अखण्ड-ज्योति के हजारों पाठक-पाठिकाओं से हमारा अनुरोध है कि वह सतयुग को समीप लाने के लिये तपस्या करने में जुट जावें। अपनी आवाज जहाँ तक पहुँच सकें, वहाँ तक सत्य, प्रेम और न्याय का सन्देश पहुँचावें। स्वयं सत्य के उपासक बनें और दूसरों को बनावें। अपने जीवन को उदार एवं पवित्र बनाते हुए दूसरों को सन्मार्ग पर प्रवृत्त करने का प्रयत्न करें। अपने जीवन में इस नीति को स्वीकार कर लें, कि “मुझे नहीं चाहिए, आप लीजिए।” इसी नीति की शिक्षा पड़ोसियों को दें। इस प्रकार यह भूमण्डल शीघ्र ही स्वर्ग के सतोगुणी प्रकाश से भर जायेगा। उस शुभ घड़ी को निकट लाने के लिए समस्त बन्धुगण प्रयत्न करें, ऐसा आज हमारा विनम्र अनुरोध है।
बाहर से जो ईंधन डाला जाता है, वह भीतरी आत्मशक्ति को शनैः शनैः जगाने में समर्थ होता है। साधनावस्था में सत्संग जितना ही अधिक होता है, उतना ही मंगल होता है।
पहले आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये, तत्पश्चात् ऊर्ध्व प्रकृति या पराप्रकृति का रहस्य समझने में तन्मय होना चाहिए। मन रूपी क्षेत्र में शक्ति का संचार होने से ही इस परा प्रकृति के रहस्य का ज्ञान होता है।
कर्म की गति के पहले की अपेक्षा कुछ शिथिल हो जाने की भी बहुत बड़ी सम्भावना रहती है और वह शिथिल हो भी सकती है, किन्तु इससे कोई हानि नहीं हो सकती। स्थिर स्थायी कर्म से तो सत्य और महान शक्ति की उत्पत्ति होती है, हम कर्म का त्याग करने के लिये नहीं कह रहे हैं। अतः सब कर्म छोड़ देने पर भी कर्म, त्याग, पूर्ण सहनशीलता के धारण करने की शक्ति का रहना आवश्यक है।
ध्यान करते समय बैठे रहने पर चिन्ता-प्रवाह जब कम हो जायें, तब इस ओर पूरी शक्ति लगानी चाहिए। ऐसा करने से भीतर से शान्ति उत्पन्न होगी और इस शान्ति से ज्ञान के प्रकाश से मानव परिपूर्ण हो जायेगा।
पहले अपने को सारी चिन्ताओं से रहित कर दो, मन और बुद्धि को बिल्कुल खाली कर देने से एक स्तब्ध शान्त भाव आता है। उस समय ऊपर से एक आदमी बिल्कुल स्पष्ट रीति से बात कहना प्रारम्भ कर देता है। जो कुछ कहना होता है, वही वह कहता है, जो कुछ करने का काम होता है, वही वह करता है।
जो संन्यासी आचार-विचार, कर्तव्याकर्तव्य और पाप-पुण्य की अवहेलना कर मदोन्मत्त और पिशाच सदृश आचरण करता है, उसी सर्व धर्म त्यागी पुरुष को हम श्रेष्ठ कहते हैं, परमहंस कहते हैं।
अग्ने व्रत पते’ व्रतं चरिष्यामि,
तच्छ केयं तन्मे राध्यताम्।
इदमहमनृनात् सत्यमुपैमि॥
अर्थ- (वा.यजु.1-5)
“हे नियमों के पालक अग्ने! मैं नियम का पालन करूंगा। उसका पालन करने के लिये मैं समर्थ होऊँ। उसमें मुझे सिद्धि प्राप्त हो। मैं इस असत्य को छोड़कर सत्य को स्वीकार करता हूँ।”
हे अग्ने! तेजस्वरूप परमात्मन्! अब तक मैं नियमों से अपरिचित था, या परिचित होकर भी उनके पालन करने में प्रमाद करता था। मोह मदिरा में उन्मत्त होकर मैंने आपकी व्यवस्था को पहचानने की कोशिश नहीं की थी, या पहचान कर भी भुला दिया था। अब आगे से ऐसा न करूंगा। हे प्रभो! आज से मैं नियम-बद्ध होने की प्रतिज्ञा करता हूँ। आगे से आपके नियमों को पहचानूँगा और उन पर चलने का प्रयत्न करूंगा।
मैं इस असत्य को छोड़कर सत्य को स्वीकार करता हूँ। यह सत्य स्वीकार करने की भावना ही सत्य बनने की प्रथम सीढ़ी है। अब मैं अनुभव करूंगा कि आत्मा अखण्ड है। जीवन अखण्ड है, जगत अखण्ड है। नाथ! आपका ही तो वरद पुत्र हूँ, मेरा ‘अहम’ आपकी ही अखण्ड-ज्योति की एक विनम्र चिनगारी है, मैं क्षुद्र जीव नहीं हूँ, नीच या दुष्ट कर्मी कीड़ा नहीं हूँ, आपके पवित्र तेज से पोषण पाता हुआ मेरा आत्म भी पवित्र है, संसार में आप ही व्याप्त हैं। सम्पूर्ण विश्व आपकी प्रभा से आलोकित हो रहा है, सो हे उद्धारक! आपकी विश्वव्यापी विभूति को मैं प्रणाम करता हूँ।
मेरे अन्दर आपकी ही ज्योति जगमगा रही है, मैं आत्मा के अन्दर झिलमिलाते हुए आप परमात्मा का श्रद्धापूर्वक दर्शन करता हूँ। आपको, परमात्मा को, आपके तेज आत्मा को, एक ही दृष्टि से देखकर दोनों की एक समान पूजा-उपासना करूंगा। आत्मा के रूप में जब आप हर घड़ी मेरे साथ हैं, तो हे नाथ! हर घड़ी आपकी पूजा करूंगा। हर क्षण आपकी उपासना में तल्लीन रहूँगा। आपकी आज्ञा को मानूँगा। आपके नियमों को स्वीकार करूंगा। मैं जानता हूँ कि पवित्र कर्मों से ही आपकी उपासना हो सकती है। मैं जानता हूँ कि धर्म का आचरण करते देखकर ही आप प्रसन्न होते हैं। प्रभो! आपके मन्दिर को, इस शरीर को, सब प्रकार भीतर-बाहर से पवित्र रखने का मैं प्रयत्न करूंगा। कुकर्म रूपी चाण्डालों से आपके इस मन्दिर की रक्षा करूंगा। आप साक्षी रूप से देखते रहिए, मैं ऐसे काम न करूंगा जिससे मेरे अन्दर बैठे हुए, हे परमात्मन्, आपको लज्जित होना पड़े। आत्मा अखण्ड है, इसलिये मैं भी अखण्ड रहूँगा। प्रभु मैं आपका ही हूँ, आपके साथ ही चिपटा रहूँगा।
हे अग्ने! सत्य के दूसरे चरण को भी मैं स्वीकार करता हूँ। जीवन नाशवान् है, असत्य को त्याग कर अखण्ड जीवन की सत्यता पर विश्वास करने की प्रतिज्ञा करता हूँ। मैं अनादि काल से हूँ और अनादि काल तक रहूँगा। आपने मुझे यह अखण्ड जीवन प्रदान किया है। हाय! मैं कैसा अभागा हूँ, जो शरीर छूटने तक के, कपड़े बदलने तक के, थोड़े से समय को जीवन मान लेता हूँ और एक शरीर के लिये, एक कपड़े के लिये अपने वास्तविक जीवन को खतरे में डाल लेता हूँ। एक पल के सुख के लिये वर्ष भर दुःख उठाने वाले मूढ़ की तरह मैं शरीर के लिये कुकर्म करके महान जीवन को नष्ट करता हूँ। जब मैंने भ्रमवश शरीर को जीवन माना, तो माया में लिप्त होकर पतित हो गया। अपने स्वर्णिम सिंहासन को छोड़कर नाली की कीचड़ में लोटने लगा, पर हे विभु! आज उस असत्य भ्रम को त्याग कर सत्य को स्वीकार करता हूँ। जीवन को नश्वर नहीं अखण्ड मानूँगा। शरीर कपड़े हैं, इनको अब दूसरे रूप में न समझूँगा। हे व्रतपते! अब मैं व्रत का आचरण करूंगा।
हे रुद्र! जब मैं चैतन्यता के पद से पतित होकर अब पंचभूतों के रेत में गधे की तरह लोटने लगा, तो उन्हीं को अपनी समानता का समझने लगा। सिंह का बच्चा भेड़ों में पल कर अपने को भेड़ समझने लगा था। मैंने अपने को जड़ मान लिया। रुपया-पैसा, भूमि, जायदाद, वस्त्र-आभूषण, तथा प्राणियों के शरीरों को मैं स्थिर मानता हूँ और जब वे नष्ट हो जाते हैं, तो बिलख-बिलख कर रोता हूँ। मित्र परिजनों के शरीरान्त होने पर छटपटा जाता हूँ और आत्महत्या करने को तत्पर होता हूँ। हे परमात्मन्! अज्ञानवश मैं जड़-चैतन्य का भेद करना भूल गया, इसलिए मोह की रस्सियों में बँधा-बँधा बिलख रहा हूँ। जड़ पदार्थ नाशवान हैं। वे स्वभावतः एक-एक करके नष्ट होते रहते हैं। हर लहर को उठता देखकर खुशियों से उछलता हूँ, और हर बबूले को फूटता देखकर धाड़ मारकर रोता हूँ। इस हँसने-रोने की विडम्बना में मेरी आँखें सूज गई हैं और गला सूख गया है। तृष्णा के पर्वत और दुःखों के तूफान मेरे चारों ओर घूम रहे हैं। भय के मारे मेरी धमनियाँ बैठी जा रही हैं। मेरा अज्ञान प्रेत-पिशाच का विकराल रूप धारण करके मुझे ही उँगलियों पर नचा रहा है। क्षण में हँसने और क्षण में रुलाने की उसकी बाजीगरी मेरे लिये एक पहेली बन गई है। इस निविड़ बन्धन में से आप मेरा परित्राण कीजिए। जड़ को चैतन्य समझने की, नश्वर को अमर समझने की, अलग रहने वाले को साथी मानने की, मैंने भूल की है, जड़ तत्व आत्मा के साथ रहेंगे, ऐसा मैं मानता रहता हूँ। इसलिए जीवन सौंदर्य को गंवा कर सिर धुन-धुन कर रुदन करता फिरता हूँ। आज मैंने सच्चाई को समझ लिया है। जड़ जगत आत्मा का साथी नहीं हो सकता। वह जहाँ का तहाँ पड़ा रहता है और अपने अकाट्य नियमों के अनुसार बदलता रहता हैं, अब मैंने ये भली-भाँति हृदयंगम कर लिया है। इसलिए मैं असत्य को छोड़कर सत्य को स्वीकार करता हूँ और जगत अखण्ड है, इस सच्चाई को मान्य करता हूँ।
हे अग्ने! हे नियमों के पालक! एक बार फिर प्रतिज्ञा करता हूँ कि अपने नियमों का पालन करूंगा। मैं असत्य को छोड़कर सत्य को स्वीकार करता हूँ। उसका पालन करने में मैं समर्थ होऊँ। उसमें मुझे सिद्धि प्राप्त हो ताकि अपने आत्मा में आपका दर्शन करता हुआ अपने परमपद का अधिकारी होऊँ।
जैसे चलनी से बारीक अन्न नीचे गिर जाता है और मोटा अन्न ऊपर ही रह जाता है। उसी प्रकार दुर्जन मनुष्य भलाई को छोड़कर बुराई ग्रहण कर लेते हैं।
जैसे कि एक स्त्री एक राजा से प्रेम करती है, तो वह एक भिक्षुक से कदापि नहीं कर सकती है। उसी तरह जिस जीवात्मा ने दिव्यानन्द की चुसकी ले ली, तो उसे संसार के दूसरे सुख नहीं रुचते।
जो मनुष्य मूली खाता है, उसके मुँह से मूली की महक निकलती है। इसी तरह मनुष्य के हृदय में जो होता है वही उसके मुँह से निकलता है।
जैसे तालाब से काई को हाथ से हटाने में फिर उसी जगह आ जाती हैं और किसी खप्पच इत्यादि से हटाने में दे तो फिर उसी जगह नहीं आ जाती है। उसी तरह माया यदि किसी प्रकार दूर कर दी जाये, तो उसकी फिर से इच्छा होती है, परन्तु हृदय भक्ति और ज्ञान से भर लिया जाये, तो वह फिर नहीं आ सकती, निश्चय ही इस तरह करने से ईश्वर के दर्शन हो ही जाते हैं।
गाय का दूध उसके सब शरीर में व्याप्त होता है। परन्तु अगर चाहो कि उसके सींगों से निकाल लिया जाये तो ऐसा नहीं कर सकते, दूध स्तनों से ही निकलता है। उसी तरह ईश्वर सब जगह मौजूद है किन्तु मिलता है पवित्र मन्दिरों में ही।
इदमुच्छेयो अवसान मागाँ शिवे में द्यावा पृथिवी अभूताम्। असपत्राः प्रदिशो में भवन्तु, नवैत्वाँ द्विष्यों अमयं नो अस्तु॥ - अथर्व.
अर्थ:- “अब यही कल्याणकारक है कि मैं अब समाप्ति पर आ जाऊँ, द्वेष परम्परा को विराम दूँ, अतः हे शत्रु, तेरे साथ मैं तो द्वेष करना छोड़ ही देता हूँ। गौ और पृथ्वी भी मेरे लिये अब कल्याणकारी हो जावें, सभी दिशाएं मेरे लिये शत्रुरहित हो जायें, मेरे लिये अब अभय हो जायें।”
हे प्रभो! अब मैं समाप्ति के मार्ग पर आता हूँ। अपने द्वेष-द्वन्द्वों को समाप्त कर रहा हूँ। स्वार्थ- साधना और इन्द्रिय-लिप्सा के लिये बहुत भोगों की इच्छा करता था, बहुत संग्रह करता था, अब उसकी समाप्ति करता हूँ। अपने लिये दूसरों की वस्तु छीनने की नीति का परित्याग करता हूँ।
हे विश्वेश्वर! प्रेम का प्रथम नियम मैंने जान लिया है। विश्व के समस्त जड़ चेतन पदार्थ अपनी वस्तु दूसरों को दे रहे हैं। मुझे जीवनोपयोगी समस्त सुविधाएं दूसरों से प्राप्त हो रही हैं। लेन-देन का अखण्ड प्रवाह सर्वत्र चल रहा है। मैं भी अब इस धर्म का पूरी तरह पालन करूंगा। जिस प्रकार लेने में प्रसन्नता अनुभव करता हूँ। वैसी ही देने में भी करूंगा। जो कमाऊँगा, उसे खुशी-खुशी दूसरों को भी दूँगा। अपने निमित्त जमा करने की नीति को समाप्त करता हूँ। लेने की अपेक्षा देने को अधिक महत्वपूर्ण अनुभव करूंगा।
हे परमात्मन्! मैं आपकी ही एक चिंगारी हूँ। आप विश्व के कण-कण में व्याप्त हैं, इसलिये यह समस्त ब्रह्माण्ड आपका ही स्वरूप है, अथवा मुझे यह समझना चाहिये कि विश्व मेरा ही है। अब मैं जो कुछ करूंगा, विश्व हित की दृष्टि से करूंगा। अपने संकुचित ‘अहम’ भाव का विस्तार करूंगा। विश्व के समस्त प्राण मेरे हैं, उनमें शान्ति एवं सुव्यवस्था कायम रखने के लिए सत्धर्म का प्रसार करूंगा। जैसे अपने प्रिय परिवार की हित-कामना में दत्तचित्त रहता हूँ, वैसे ही समस्त प्राणियों को अपना समझता हुआ उनके कल्याणार्थ पौरुष करूंगा। द्वेष किससे करूं? बदला किससे लूँ? विरोध किससे करूं? सभी जीव तो आपकी प्रतिमाएँ हैं, सब प्राणियों में मेरी आत्मा झलक रही है, फिर किसी से द्वेष करके अपनी आत्मा-हत्या के समान दुष्परिणामों का भागी क्यों बनूँ? अब मैं समझ गया हूं कि दूसरे से द्वेष करना अपने से द्वेष करना है। इसलिये हे जगन्निवास! अब किसी से द्वेष न करूंगा। मैंने निश्चय कर लिया है कि द्वेष की परम्परा को विराम दूँगा। हे मेरे शत्रुओं! मैं तो तुम्हारे साथ द्वेष करना छोड़ ही देता हूं, तुम छोड़ो या न छोड़ो, यह तुम्हारी इच्छा।
हे ब्रह्म! अब मैंने ब्रह्म यज्ञ को सर्वोत्तम धर्म स्वीकार किया है। सदैव परोपकार, दया, उदारता, त्याग, करुणा, सहानुभूति की भावनाओं को हृदयंगम करूंगा। जब कोई पाप-वासना मेरे मन में आवेगी, तो उसे तुरन्त ही हटा दूँगा। मनोविज्ञान शास्त्र के पण्डितों से मैंने यह समझ लिया है कि मानस-पाप और मानस-पुण्य का वैसा ही फल मिलता है, जैसा कि प्रत्यक्ष कर्मों का। इसलिये अपने मन में सदैव परोपकार और पर-सेवा के भाव भरता रहूँगा। हृदय को शुद्ध रखूँगा, आचरणों को पवित्र बनाऊँगा। दूसरों को सदैव शुभ मार्ग पर चलने की सलाह दूँगा। अपने, मित्रों को, परिचितों को, अपरिचितों को, पवित्र, उच्च आचरण वाला बनाने का निरन्तर प्रयत्न करूंगा। इस प्रकार उस ब्रह्म ज्ञान को अखण्ड रूप से जारी रखूँगा, इस कर्तव्य में कभी प्रमाद न आने दूँगा। हे वरुण! मैंने कल्याण का मार्ग अपना लिया है। इसलिये गौ और पृथ्वी भी मेरे लिये अब कल्याणकारी हो जावें। मैंने प्रेम धर्म को अपना लिया हैं। इसलिये सर्वत्र मुझे मित्र ही मित्र दृष्टिगोचर हों। सभी दिशाएं मेरे लिये शत्रु रहित हो जावें। प्रेम को ग्रहण कर अब मैं निर्भय हो गया हूँ, इसलिये विश्व में मेरे लिये अब सर्वत्र अभय का साम्राज्य हो जाये।
न्याय का धर्म युद्ध
इन्द्र बर्धन्तो अप्तुरः। कुण्वन्तो विश्वं आर्यम्। अपघ्नन्तों अराव्णः। ऋग. 9-63-5
अर्थ- “जीवन को तुरन्त ही प्रेरणा दो। ईश्वर की महिमा गाओ। विश्व को आर्य बनाओ और कंजूस दुष्टों को नष्ट करो।”
हे आत्मन! जीवन को तुरन्त ही प्रेरणा दीजिये। मेरा जीवन चिरकाल से अशक्त, मूर्च्छित, निराश, अनुत्साह और आलस्य से ग्रसित हो रहा है। सड़ी-गली अन्ध-परंपराएं मेरे आध्यात्मिक विकास के मार्ग में पर्वत की तरह बाधक बनकर खड़ी हुई हैं। समय बदलना है, पर मेरे विचार साथ-साथ नहीं बदलते। वर्तमान की आवश्यकताओं पर स्वतन्त्र दृष्टि से विचार करने की प्रथा को छोड़कर भूतकाल की किन्हीं सड़ी-गली विचार धाराओं से ही चिपका रहता हूँ। मेरे इस निकम्मेपन से कुढ़कर समय ने मुझको बड़े करारे तमाचे लगाये हैं। प्रगतिशील आत्माओं को जो प्रसाद मिला करता है, उससे मैं सर्वथा वंचित रह गया, और संसार में आलसी, अकर्मण्य, कायर, मृतक आदि नामों से पुकारा गया। हर कोई मेरे ऊपर मनमाने अत्याचार करने को तैयार रहता है। इसलिये हे इन्द्र! मेरे जीवन को तुरन्त ही प्रेरणा दीजिए। मेरी धमनियों में उत्साह और स्फूर्ति की बिजली फूँक दीजिए, मुझे शक्तिशाली मार्ग पर लगा दीजिए, जिससे मैं बलवान बन जाऊँ। अब मैं शरीर को बलवान बनाऊँगा, मन को बलवान बनाऊँगा। संगठन का बल एकत्रित करूंगा। अपने समान विचारों वालो का एक मजबूत संगठन करके सम्मिलित सह-शक्ति उत्पन्न करूंगा। अखण्ड शक्ति की आराधना करूंगा। जिससे मेरी आत्मा का तेज सूर्य की तरह चमके। जिससे सताने की बात तो दूर, सताने का विचार करने की भी किसी की हिम्मत न पड़े। शक्ति से ही संसार में न्याय स्थिर रह सकता है, इसलिये सर्वतोभावेन शक्ति का सम्पादन करूंगा। मैंने निश्चय कर लिया हैं कि अब निर्बलों का नहीं बलवानों का जीवन बिताऊँगा और हे ईश्वर! आपकी महिमा गाऊँगा। आत्मा का तेज सब पर प्रकट करूंगा। मनुष्य कितना शक्तिशाली है, आत्मा में कितना बल है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण संसार के सामने रखूँगा।
हे समदर्शी! समस्त विश्व आपकी ही कृति है, इसलिये यह पुण्यपूत है। इसमें घृणा से देखने योग्य कोई प्राणी नहीं है। कोई मनुष्य अशिक्षित है, अज्ञानी है, अशक्त है, अयोग्य, निर्धन है, इसलिये वह छोटा नहीं हो जाता। प्राणी मात्र के समान अधिकार हैं, इसलिये किसी से घृणा न करूंगा, और न किसी को छोटा समझकर उसे अपमानित या तिरस्कारित करूंगा। जो गिरे हुये हैं, उन्हें उठाऊँगा, सम्पूर्ण विश्व को आर्य बनाऊँगा। किसी का अधिकार अपहरण न करूंगा, अपनी शक्तियों को निर्बलों की वस्तु का अपहरण करने में कदापि न लगाऊँगा, किसी का हक न छीनूँगा, अन्याय का पैसा न छीनूँगा, असमानता को मिटा कर समता की स्थापना के लिये उद्योग करूंगा, सब श्रेष्ठ हैं, हर एक को उनकी श्रेष्ठता प्रदान करूंगा। जिन्होंने अपना आर्यत्व खो दिया है, उन्हें वे देने-दिलाने के लिये अपनी समस्त शक्तियाँ लगाकर प्रयत्न करूंगा। सब प्राणियों में श्रेष्ठता उत्पन्न करके ही तो सच्ची समता स्थापित करने में सफल बनूँगा।
हे रुद्र! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि दुष्ट कंजूसों को नष्ट करूंगा, क्रोध, द्वेष, पाखण्ड, छल, झूठ आदि दुर्गुण बड़े ही दुष्ट हैं। स्वार्थ, तृष्णा, लोभ के बराबर कंजूस इस पृथ्वी पर कौन है? इन दुष्टों को कभी क्षमा न करूंगा, जब देखूँगा तभी युद्ध करूंगा। अपने अन्दर पाऊँगा, तब तो लड़ूंगा ही, पर जब दूसरों में इन्हें देखूँगा तब भी चुप न बैठूँगा। चुप कैसे बैठ सकूँगा? यह दुष्ट कंजूस मेरे भाई के घर पर आक्रमण करें और मैं कुछ न करूं, यह कैसे हो सकता है? यद्यपि मैं प्रेम का पुजारी हूँ, पर अविवेकपूर्ण मोह को नहीं चाहता। रोगी को अविवेकी लोग मोहवश पूड़ी-मिठाई खिलाकर रोग बढ़ा देते हैं, किन्तु चतुर डॉक्टर रोगी से सच्चा प्रेम रखने को कड़ुई-कड़ुई दवा पिलाता है, यदि उसके घाव सड़ रहे होते हैं तो आवश्यकतानुसार नश्तर भी चुभा देता है। मैं भी अपने भाइयों के शरीरों में से पाप रूपी रोगों को भगाने के लिये कड़ुई दवा या तेज नश्तर प्रयोग करने में हिचकिचाऊँगा नहीं। कठोर कर्तव्य को देखकर विचलित न हूँगा। इस सम्बन्ध में अर्जुन का आदर्श और गीता का उपदेश मैंने हृदयंगम कर लिया है। अव्यावहारिक और मिथ्या अहिंसा की आड़ में अपनी कायरता को न छिपाऊँगा, दस्युओं और तस्करों की दरगुजर न करूंगा, दुष्टों और धूर्तों को निर्भयतापूर्वक कोलाहल न मचाने दूँगा, अपने को खतरे में डालकर भी दानवों से लड़ूंगा। हे अग्ने! मूक मानवों का प्रतिनिधित्व करता हुआ मैं आत्मा, शैतानी अनात्म शक्तियों से जूझूँगा। न्याय की रक्षा के लिये, निर्दोषों को बचाने के लिये तेजस्वी वीर पुरुष की भाँति शक्ति दण्ड को धारण करके आततायियों को सुमार्ग पर लाऊंगा। अन्याय के विरोध मेरा विरोध और असहयोग सदैव जारी रहेगा। जुल्म के खिलाफ मेरी आवाज सदा ऊँची रहेगी। ‘अखण्ड-शमन’ मेरे जीवन की प्रधान नीति रहेगी। इसके लिये कष्ट सहूँगा, तप करूंगा, दुःख उठाऊँगा, पर न्याय तुला का सन्तुलन ठीक रखने के लिये हे हिरण्यगर्भ! दुष्ट कंजूसों को नष्ट करूंगा, आप मुझे मेरे मार्ग में सहायता दीजिये।
हे भगवान! आपके सम्मुख उपरोक्त दीक्षा मंत्रों को निवेदन करता हूँ। सतयुगी बनने के लिये मेरी यह आन्तरिक प्रार्थनाएं हैं। आप यथाक्रम मुझे ऐसी शक्ति देते जाइए, जिससे मैं इस पथ पर निरन्तर बढ़ता चलूँ। चाहे मेरे कदम धीरे-धीरे बढ़ें, पर हर कदम दृढ़तापूर्वक उठे। हे सत्य! आप मेरी आत्मा को दीक्षित कर दीजिए, मुझे बल दीजिए, मेरे हाथ पकड़कर इस सत्य-पथ पर खींचते ले चलिये, जिससे मैं जीवन का चरम उद्देश्य पूरा कर सकूँ। हे यम! मेरी प्रार्थना स्वीकार कीजिए। मुझे अनियमित से नियमित बना दीजिए।
(तुलसी-कृत रामायण से)
बड़े भाग मानुष तन पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन गावा॥
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा।
पाइ न जेहि परलोक सँवारा॥
दोहा- सो परत्र दुख पावई, सिर धुनि-धुनि पछिताइ।
कालहि, कर्महि, ईश्वरहि, मिथ्या दोष लगाइ॥
एहि तन कर फल विषय न भाई।
स्वर्ग स्वल्प अन्त दुखदाई॥
नर तन पाय विषय मन देही।
पलटि सुधा ते शठ विष लेही॥
ताहि कबहूँ भल कहहि न कोई।
गुँजा ग्रहइ परस मनि खोई॥
आकर चारि लच्छ चौरासी।
योनि भ्रमत यह जिव अविनाशी॥
फिरत सदा माया कर प्रेरा ।
काल, कर्म, सुभाव गुन घेरा॥
कबहुँक करि करुना नर देहि।
देत ईश बिनु हेतु सनेही॥
करन धार सद्गुरु दृढ़ नावा।
दुर्लभ साज सुभग तनु पावा॥
दोहा- जो न तरइ भवसागर, नर-समाज अस पाइ।
सो कृत निंदक मंदमति, आतम हन गति जाइ॥
जो परलोक इहौ सुख चहहू।
सुनि मम वचन हृदय द्दढ़ गहहू॥
सुलभ सुखद मारग यह भाई।
भगति मोर पुरान श्रुति गाई॥
भगति सुतन्त्र सकल सुख खानी।
बिनु सत्संग न पावइ प्रानी॥
पुण्य पुँज बिनु, मिलइ न सन्ता।
सत संगति संसृति कर अन्ता॥
(श्री सोमनाथ जी नागर, मथुरा)
एक व्यक्ति अपना सर्वस्व परोपकार में लगाकर संन्यासी हो गया और निर्मल चित से तप करने लगा। ईश्वर के यहाँ से ऐसी व्यवस्था हुई कि उसी तपोभूमि में एक देवदूत नित्य पहुँचता और बहुमूल्य सुस्वादु भोजनों का थाल उन्हें दे आता। इस प्रकार उसकी तपनिष्ठा का योगक्षेम अदृश्य सत्ता ने अपने ऊपर उठा लिया।
एक दूसरा व्यक्ति जो ये सब देखा करता था, उसने सोचा कि मैं भी संन्यासी हो जाऊँ, तो मुझे भी ऐसे ही व्यंजन खाने को मिला करेंगे, वह अपने घर गया और सारा कारोबार लड़कों को सँभलवा, गेरुए कपड़े पहनकर, उन्हीं संन्यासी की बगल में तप करने बैठ गया।
यथासमय भोजन देने वाला देवदूत आया। आज उसके हाथ में दो थाल थे। एक में तो उस पुराने साधु के लिये वही बहुमूल्य भोजन थे, दूसरे थाल में दो सूखी रोटियाँ थीं, यह नये साधु के सामने रखकर वह चला गया। नये साधु ने पहले दिन कुड़कुड़ाते हुये उसे खाया। मन में सोचने लगा, जब हम दोनों एक सा काम करते हैं तो फल भी एक सा मिलना चाहिये, शायद आज देवदूत से भूल हो गयी होगी, कल वह जरूर बढ़िया थाल लावेगा। कल आया, किन्तु फिर वही दो सूखी रोटी, अब तो उसका धैर्य टूटने लगा, एक दिन और गम खाया, तीसरे दिन भी जब वही दो सूखी रोटी देखी, तो नया साधु आग बबूला हो गया, उसने बड़े क्रोध के साथ गरज कर देवदूत से कहा- “क्या रे! जब हम दोनों एक ही तरह का काम करते हैं, तो यह दो तरह का भोजन हम लोगों को क्यों देता है?”
देवदूत ने नये साधु को साँत्वना देते हुये बड़े नम्र शब्दों में कहा -”भगवन्! यह फल संचित कर्मों के अनुसार मिल रहा है। यह पुराने साधु महानुभाव अपना सारा धन-धान्य परोपकार में लगा चुके हैं, इसलिये इनके खाते में बहुत जमा है। उसी में से मैं ले आता हूँ, और इन्हें दे जाता हूँ। आपने तो जीवन-भर में एक बार एक आदमी को बड़े अहंकारपूर्वक एक सूखी रोटी दान दी थी, सो उसी की ब्याज से बढ़कर कुछ रोटियाँ जमा हो गयी हैं। यह सब दो-चार रोज में समाप्त हो जायेंगी, तो आपको यह सूखी हुई रोटियाँ भी मिलना बन्द हो जायेगा। आप मेरे ऊपर क्रोध न करें। मैं तो निर्दोष हूँ। जिसका जैसा जमा है, उसे वैसा ही लाकर दे देता हूँ।”
अब नये साधु को चेत हुआ। वह समझता था कि वेश बना लेने या काम की नकल करने से वैसा ही फल मिलता है, पर अब उसने जाना कि नकल करने से परमेश्वर को ठगा नहीं जा सकता। जो जितना देता है, वह उतना ही पाता है। उत्तम फल तभी मिलता है, जब उसके अनुरूप कार्य किया जाये, दिये बिना मिलना असम्भव है, अपनी भूल पर वह बार-बार पछताने लगा।
दूसरे दिन जब फिर दो रोटियाँ आईं, तो उसने विनयपूर्वक दूत से पूछा- ‘अब मेरे खाते में कितनी रोटियाँ जमा हैं?’ उसने उत्तर दिया ‘दस’। साधु ने कहा- ‘तो मैं अपना खाता जमा नहीं रखना चाहता। मेरी सब रोटियाँ एक साथ लाकर दे दीजिए।’ देवदूत ने उसकी बात स्वीकार कर ली, और उसकी कुल दस रोटियाँ एक साथ लाकर दे दी। साधु ने उनमें से एक टुकड़ा भी न खाया, और गरीब भूखे-प्यासों को उन्हें बाँटने के लिये चल दिया। उसने दसों रोटियाँ बाँट दी और स्वयं भूखा रह कर सो गया। क्योंकि आज वह समझ गया था कि खुद खा-पीकर मौज उड़ाने का अर्थ अपनी संचित कमाई को समाप्त करना है और परोपकार में त्याग करना अपनी पूँजी बढ़ाना है। पूँजी को खर्च न करके उसे बढ़ाने की उसकी इच्छा सब प्रबल हो गयी थी, इसलिये भोग के स्थान पर त्याग उसने स्वीकार किया। दूसरे दिन देवदूत फिर पहुँचा, आज उसने पुराने साधु के थाल से कुछ ही घटिया थाल नये साधु के सामने रखा। इसे देखकर वह समझ गया कि देने में कितना बड़ा रहस्य छिपा हुआ है। उस दिन से वह देवदूत द्वारा प्राप्त होने वाले भोजन में से जीवन निर्वाह के लिये कम से कम और सस्ती से सस्ती सामग्री अपने लिये लेता और शेष परोपकार में दान दे देता, इस क्रम से धीरे-धीरे उसकी पूँजी ईश्वर के खाते में दिन-दिन बढ़ने लगी और दिन-दिन वह अपार सुख भोग का अधिकारी होता गया।
पाठक! आप भी नये साधु की तरह अपनी पूँजी बढ़ाने का प्रयत्न करें- “कम से कम अपने लिये लेना, और अधिक से अधिक दूसरों को देना” इस नीति को अपनावें, तो एक दिन ईश्वर के खाते में आपकी बड़ी भारी पूँजी जमा हो जायेगी और अनायास ही अपार ऐश्वर्य प्राप्त कर लेंगे।
(वेद का अमर सन्देश)
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि, आत्मा एव अभूत् विजानतः। तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वं अनु-पश्यतः॥
- (वा0 यजु0 40/5)
जिस समय सब प्राणियों को ज्ञानवान मनुष्य एक ही आत्मा समझने लगता है, उस समय मोह कहाँ? और शोक कहाँ? क्योंकि उस समय वह एकत्व का दर्शन करता है।
केवलाघाँ भवति केवलादी।
(ऋग॰ 10/119/6)
अपने आप अकेला खाने वाला निस्सन्देह पापी है।
संगच्छभ्वं संवद्धवं संवो मनाँसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥
(ऋग0 10/191/2)
अर्थ:- हे मनुष्यों! मिल कर चलो, मिलकर बोलो, तुम्हारे मनों के भाव समान हों। जैसे तुम्हारे पूर्वज विद्वान समान ज्ञान रखते हुये काम करते थे, वैसे ही तुम भी करो।
समानो मंत्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्। समानं मंत्र मभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥ (ऋ॰ 10/191/3)
अर्थ:- हे मनुष्यों! तुम्हारे विचार समान हों। तुम्हारी सभा एक हो, तुम्हारे मन और चित्त एक से हों। मैं तुम्हें एक सा उपदेश देता हूँ, मैं तुम्हें सब कार्य मिलकर करने का आदेश करता हूँ।
समानी व आकूतिः समानाहृदया निवः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥
(ऋ॰ 10/191/4)
अर्थ:- हे मनुष्यों! तुम्हारे संकल्प समान हों। तुम्हारे हृदय एक हों। तुम्हारे मन एक हो, जिससे कि तुम प्रसन्नतापूर्वक परस्पर मिले-जुले रहो।
सहृदयं सामनस्य मविद्वेषं कृष्णोमित्रः।
अन्योऽन्यमभिहर्यत वत्सं जातमिनाघ्न्या॥
(अधर्व0 3/30/1)
अर्थ:- हे मनुष्यों! मैं तुम्हें समान हृदय वाला, समान मन वाला, और एक-दूसरे से द्वेष न करने वाला, रहने का उपदेश करता हूँ। जैसे गौ उत्पन्न हुए अपने बच्चे के पास दौड़ी आती है, वैसे ही तुम भी एक-दूसरे के पास प्रेम से जाओ।
ज्यायस्वन्तश्चितिनो मावियौष्टि संसाधयन्तः सधुराश्चरन्त। अन्योऽन्यस्मैं वल्गुवदन्त एत सध्री चीनान् वः संमनसस्कृणोमि॥
(अथर्व0 3/30/5)
अर्थ:- गुणों में बड़े बनते हुये, ज्ञान को बढ़ाते हुये, एक-दूसरे को प्रसन्न करते हुये, मिलकर कार्यभार उठाते हुये, एक-दूसरे को मीठी वाणी बोलते हुये चलो। मैं तुम्हें आपस में मित्रता करने वाले,मिलकर बैठने वाले और एक मन रखने वाले, रहने का उपदेश करता हूँ।
(1)
काम ही स्मारक है।
किसी युग का इतिहास, उस युग के राजाओं का या सेनापतियों का इतिहास नहीं कहा जा सकता। सैंकड़ों युद्धों से मानव जाति की कोई भलाई नहीं होती। सच्चा इतिहास महापुरुषों के चरित्रों से पूर्ण रहता है, जिन्होंने भावी सन्तान के लिये उत्तम उदाहरण उपस्थित किये हैं। वैस्टमिनस्टर के गिरजे में एक कब्र के ऊपर लिखा हुआ है- “इसके नीचे इस गिरजे और नगर को बनाने वाला ‘क्रिस्टोफर रेन’ सो रहा है। वह जनता की भलाई के लिये 90 वर्ष तक जीवित रहा। यदि तुम उसका स्मारक देखना चाहते हो, तो उसकी कृतियों की सुन्दरता देख लो।”
(2)
पराजय में विजय
नील नदी के पास युद्ध का मोर्चा पड़ा हुआ था। अपने कप्तानों के सामने नेलसन ने लड़ाई का नक्शा पेश किया। उसे देखकर कप्तान वेरी को बड़ी भारी प्रसन्नता हुई। उसने कहा- ‘अगर हमारी ही विजय हुई, तो संसार हमें कितना आदर देगा?’
नेलसन से चुप न रहा जा सका। उन्होंने कहा- “अगर’ के लिये कोई गुँजाइश नहीं है। विजय निश्चय ही हमारी होगी। हाँ, यह सवाल दूसरा है कि उस विजय की कथा को कहने-सुनने वाला हम में से कोई बचेगा या नहीं?’
सारे विचार-विनिमय के बाद जब सेनानायक विदा होने लगा, तो नेलसन ने गम्भीर दृढ़ता के साथ कहा- ‘कल इस समय तक या तो मुझे विजय प्राप्त होगी या वैस्टमिनस्टर के चर्च में मेरी लाश को दफना दिया जायेगा।’ जिस युद्ध में अन्य अधिकारी पराजय की आशंका कर रहे थे,उसी में एक साहसी आत्मा विजय का प्रादुर्भाव करती है।
(3)
चलो! आगे बढ़ो!
इंजीनियर बहुत प्रयत्न कर रहे थे और अपना-अपना चातुर्य दिखाने में व्यस्त थे। नेपोलियन ने उनसे पूछा- ‘क्या सेन्ट बरनार्ड की घाटी का रास्ता पार करना सम्भव है?’
इंजीनियरों ने कुछ झिझकते हुये कहा- ‘हाँ, कदाचित हम उसे पार कर सकेंगे।’
‘कदाचित’ शब्द के गर्भ में महान कठिनाई और असफलता की छाया झाँक रही थी, पर नेपोलियन इससे जरा भी विचलित नहीं हुआ। उसने विघ्नों की उपेक्षा करते हुये दर्पपूर्वक कहा- ‘सिपाहियों’! आगे बढ़ो!
आस्ट्रिया और इंग्लैंड के बुद्धिमान लोग उपहास करते थे कि नाटा लड़का किस प्रकार 60 हजार सेना और हजारों मन युद्ध-सामग्री को लेकर महान ऑल्प्स पर्वत को पार कर जायेगा? किन्तु पर्वत के दूसरी ओर उसके दो साथी अपनी सेनाओं सहित विपत्ति में फँसे हुये थे, ऐसे समय में वह चुप कैसे बैठ सकता था?
कठिनाइयों से लड़ते-लड़ते नेपोलियन का कलेजा व्रज हो गया था। वह बिना इंजीनियरों की सफलता की प्रतिक्षा किये हुए, गगनचुम्बी ऑल्प्स पर चढ़ दौड़ा और सेना सहित उसे पार कर गया।
(कुरान शरीफ की शिक्षा)
खुज़िल अ़फ्वा और अमुर्बिऽल् उर्फि व अ़ अ़रिज़ अ़निऽल् जाहिलीन्।
-सूरये अअराफ 2/9/24
पूर्णतः क्षमा कर शुभ कर्मों की आज्ञा दे तथा भूलों से दूर रहे।
या अय्युहऽल्लजीना आमनुऽऽत्तक़ु ऽऽल्लाहा व कून् ऽ मअस्सादिकीन् ॥
-सूरये तौवा 2/11/15/4
हे विश्व वासियों! अल्लाह से डरते रहो और सच्चों के साथ रहो।
बल अज्रुऽल आखिरति ख़य रुल्लिल्लजीना आमन् ऽव काऽनू ऽ यत्तकून्।
-सूरये यूसुफ 3/13/8
और अन्तिम दिवस का परिणाम उन लोगों के लिए उत्तम है, जिन्होंने विश्वास किया और जो संयम से रहे।
अल्ल जीना आयनूऽव अमिलु ऽ स्सालिहाति तूषा लहु व हुस्नु म आव्।
-सूरये रआद 3/13/4/5
जिन्होंने विश्वास किया और सुकर्म सम्पादन किया, उनको प्रशंसा है और उनका स्थान ऊँचा है।
व अकीमुऽस्सलाता व आतु ऽज्ज़काता वऽर्क ऊऽम अ़र्गऽकिईन।
-सूरये बकर 1/1/6
प्रार्थना करो तथा दान दो और जो मनुष्य झुकते हैं उनके साथ तुम भी झुका करो।
व ऽस्तईनऽबिस्सब्रि व स्सलाति, .................व अन्न हुम इलय्हि राजिऊन्।
-सूरये बकर 1/1/6
और सन्तोष, सहनशीलता और नमाज का आश्रय ग्रहण करो। निस्सन्देह यह कठिन काम है, परन्तु उन लोगों के लिये कठिन नहीं, जिनके अन्तःकरण नम्र हैं और जिनके समक्ष यह विचार रहता है कि उन्हें अपने परिपालक से मिलना है और उसी की ओर लौटकर जाना है।
बला मन् कसवा सय्यिअतव्य अहाऽतत् बिही रुती अतुहूँ फउला इका अस्हाबुन्नारि हुम् फीहा ख़ालिदून्।
-सूरये बकर 1/1/10
वास्तविक बात तो यह है कि जिन्होंने कुकर्म कमाये और जो अपने पाप परिधि में आ गये, ऐसे ही लोग फलतः नारकी हैं, वह सदा नरक ही में रहेंगे।
व ल्लज़ीना आमनू व आमिलुस्सा लिहाति उला इका अस्हाबुल् जन्नति, हुम फीहाऽखालिदून।
-सूरये बकर 1।1।10
जिन लोगों ने धर्म पर विश्वास किया और शुभ कर्म किये, ऐसे ही मनुष्य बहिश्ती हैं, वह सदा बहिश्त में वास करेंगे।
व अक़ीमुस्सलाता व आतुज्ज़काता.................विमाऽत अलूमा वसीर।
-सूरये बकर 1।1।13
और प्रार्थना करते रहो एवं दान देते रहो। जितनी भलाई अपने लिये संचय करके पहले भेज दोगे, उतनी ही अल्लाह के यहाँ मिलेगी। निस्सन्देह जो कुछ भी तुम कर रहे हो, अल्लाह देख रहा है।
अपनी मूर्खता का ज्ञान हो जाना ही विद्वता से लाभ उठाना है।
(बाइबिल की वाणी)
(भजन संहिता अध्याय)
धन्य हैं वे जो न्याय पर चलते हैं और हर समय धर्म के काम करते हैं।
106/3
जिनका भला करना चाहिए, यदि तुझे शक्ति रहे तो भला करने से न रुकना। यदि तेरे पास देने को कुछ हो तो अपने पड़ौसी से कहना कि- ‘जा कल फिर आना, कल मैं तुझे और दूँगा।’ जब तेरा पड़ौसी तेरे पास बेखटके रहता है तब उसके विरुद्ध बुरी युक्ति न बाँधना। जिस मनुष्य ने तुझसे बुरा व्यवहार न किया हो, उससे अकारण मुकदमा खड़ा न करना। उपद्रवी पुरुष के विषय में डाह न करना और न उसकी सी चाल चलना।
4/27/31
तू भले मनुष्यों के मार्ग में चल और धर्मियों की बाँह पकड़े रह, क्योंकि सीधे लोग ही देश में बसे रहेंगे और खरे लोग ही उनमें बने रहेंगे। दुष्ट लोग देश में से नाश होंगे और विश्वासघाती उसमें से उखाड़े जायेंगे।
2/20, 22
हे मेरे पुत्र! यदि तू बुद्धिमान हो तो विशेष करके मेरा ही मन आनन्दित होगा और जब तू सीधी बातें बोले तब मेरा मन हुलसेगा। तू पापियों के विषय मन में डाह न करना।
23/17
सच्चाई को मोल लेना पर बेचना नहीं। बुद्धि, शिक्षा और समझ को मोल भी लेना।
23/23
जो अपने अपराध छिपा रखता है, उसका कार्य सफल नहीं होता। पर जो उनको मान लेता है, और छोड़ भी देता है, उस पर दया की जाती है।
28/13
जो सीधाई से चलता है, वो बचाया जाता है, पर जो टेढ़ी चाल चलता है, सो अचानक गिर पड़ता है। जो अपनी भूमि को जोतता-बोता है, उसका पेट भरता है, पर जो निकम्मे लोगों की संगति करता है, सो दरिद्रता से घिरा रहता है।
28/18, 19
हे मेरे पुत्र! यदि पापी लोग तुझे फुसलाएं तो उनकी बात न मानना। यदि वे कहें कि- “ हमारे संग चल, हम खून करने के लिए घात लगायेंगे” ‘हम निर्दोषियों की ताक में रहेंगे, हम अपने घरों को लूट से भर लेंगे, तू हमारा साझी हो जा” तो हे मेरे पुत्र! तू उनके संग मत चले जाना, वरन् उनकी डगर में पाँव भी न धरना।
1/10, 15
पृथ्वी पर जो पवित्र लोग हैं सोही आदर के योग्य हैं और उन्हीं से मैं प्रसन्न रहता हूँ।
16/3
सबसे अधिक अपने मन की रक्षा कर, क्योंकि जीवन के निकास उसी से होते हैं। टेढ़ी बात बोलने से परे रह, तेरी आँखें सामने की ही ओर लगी रहें, न तो दाहिनी ओर मुड़ें और न ही बाईं ओर। अपने पाँव को बुराई के मार्ग पर रखने से रुका रह।
4/23, 27
धन्य हैं वे मनुष्य जो दुष्टों की युक्ति पर नहीं चले और न पापियों के मार्ग पर खड़े हुए, न उपहास करने वालों की संगति में बैठे हों।
1/1
जिन आदमियों के हृदय पवित्र हैं, वे धन्य हैं, क्योंकि वे अवश्य परमात्मा के दर्शन करेंगे।
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ईश्वर प्राप्ति का मार्ग न किसी धर्म विशेष में परिमित है और न वह किसी क्रियाकाण्ड में मिलता है। यह तो मानवी आत्मा की उन गहराइयों में विद्यमान है, जोकि सब धर्मों, पुरोहितों और क्रियाकाण्डों से मुक्त हैं।
कथा-
(श्री स्वामी विवेकानन्द जी)
एक राजा जंगल में शिकार खेलने गया, वहाँ उसे एक साधु मिले। कुछ समय तक साधु का संग करने पर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने साधु को कुछ देना चाहा। साधु ने कहा- मैं अपनी स्थिति से पूर्ण रूप से सन्तुष्ट हूँ, खाने के लिये ये वृक्ष मुझे यथेष्ट फल देते हैं, ये रमणीय पवित्र सलिला नदियाँ मुझे आवश्यकतानुसार जल प्रदान करती हैं, और सोने के लिये तो पहाड़ों की गुफाएं बनी ही हैं। तुम राजा हो या सम्राट मुझे तुमसे कुछ भी लेना नहीं है। सम्राट ने कहा- भगवन्! मुझे पवित्र करने और मेरा जीवन सफल करने के लिये कुछ लीजिए और कृपा पूर्वक एक बार मेरी राजधानी में पदार्पण कीजिए।
बहुत कहने-सुनने पर साधु ने सम्राट के साथ उसके नगर में जाना स्वीकार कर लिया। साधु बादशाह के महल में पहुँचे। वहाँ चारों ओर हीरे, पन्ने, मोती, माणिक आदि जवाहरात और सोने, चाँदी के पदार्थ पड़े थे, और भी बहुत सी अद्भुत बहुमूल्य वस्तुएं थीं, सभी और ऐश्वर्य और वैभव के चिन्ह दिखाई देते थे। वहाँ पहुँचने पर सम्राट ने साधु से कहा- “महाराज’ आप तनिक विश्राम कीजिए, इतने मैं प्रार्थना कर लेता हूँ,’ यह कहकर राजा एक कोने में जाकर प्रार्थना करने लगा- “प्रभो मुझे और भी अधिक ऐश्वर्य, और भी अधिक सन्तान तथा और भी अधिक राज्य प्रदान कीजिए।’ इतना सुनते ही साधु उठ कर जाने लगे। राजा ने पीछे से दौड़कर पूछा- महाराज! कहाँ जा रहे हैं, मेरी सेवा स्वीकार किए बिना कैसे लौट रहे हैं? साधु ने राजा की ओर से मुख फिरा कर कहा- “भिखारी! मैं तुझ भिखारी से भीख नहीं माँगता, तू मुझे क्या दे सकता है, तू तो स्वयं ही भीख माँगता है।”
वास्तव में राजा की प्रार्थना प्रेम की भाषा में नहीं थी। यदि भगवान से ऐसी प्रार्थना की जा सकती हो तो फिर प्रेम और दुकानदारी में भेद ही क्या रह गया? अतएव प्रेम का सर्वप्रथम यही लक्षण है कि उसमें क्रय-विक्रय नहीं है, प्रेम तो सदा दिया ही करता है, वह कभी लेता नहीं, प्रेम दाता है, ग्रहीता नहीं है। भगवान का भक्त कहता है कि - भगवान चाहे तो मैं अपना सर्वस्व उनके अर्पण कर सकता हूँ, परन्तु उनसे मैं कुछ भी लेना नहीं चाहता। इस जगत की कोई भी वस्तु मुझे नहीं चाहिए, मुझसे प्रेम किए बिना रहा नहीं जाता, इसीलिए प्रेम करता हूँ, इस प्रेम के परिवर्तन में उनसे किसी प्रकार की कृपा, भिक्षा नहीं चाहता। ईश्वर सर्वशक्तिमान है या नहीं, यह जानने की मुझे कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि मैं न तो उससे कोई शक्ति चाहता हूँ और न उसकी किसी शक्ति का विकास ही देखना चाहता हूँ, वह मेरे प्रेम का भगवान है। बस, इतना जान लेना मेरे लिये बहुत है। इसके अतिरिक्त मैं और कुछ भी जानना नहीं चाहता।
दुर्बलता और असावधानी से सत्य का अनुसरण करने वाला एवं दृढ़ता और सचेतता से असत्य के अनुयायी से किसी प्रकार सम्बन्ध नहीं।
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वीर हृदय की दृढ़ इच्छा सहस्रों का सिर नवा देती हैं। एक दृढ़ प्रतिज्ञ दुर्बल बौना युद्ध का फल बदल सकता है और वह भागते हुए भीमाकार मनुष्यों को लौटकर फिर लड़ने को उद्यत कर देता है।
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हमारे जीवन का उद्देश्य केवल इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाना है। दृढ़ मनुष्यों के लिये सर्वदा ही सुअवसर और सुभीता है।
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दृढ़ प्रतिज्ञ और सत्य प्रकृति पर ही संसार चक्र चलता है।
(संत कबीर)
झूठे सुख को सुख कहैं, मानव हैं मन मोद।
खलक चबेना काल का कछु मुख में कछु गोद॥
मालिन आवत देखिकर कलियाँ करि पुकार।
फूले-फूले चुन लिये, कालि हमारी बार॥
पानी केरा बुदबुदा यही हमारी जान।
एक दिना छिप जायेंगे, तारे ज्यों परभात॥
कबीर यह जग कुछ नहीं, क्षण खाग क्षण मीठ।
कालि जु बैठी माडिया, आज मसाँणाँ दीठ॥
मरता-मरता जग मुआ, औसर मुआ न कोइ।
कबीर ऐसे मरि मुआ, जो बहुरि न मरना होइ॥
वैद मुआ, रोगी मुआ, मुआ संकल संसार।
एक कबीरा ना मुआ, जिनका राम आधार॥
हम घर जारा आपना, लिया मुराड़ा हाथ।
अब घर जारो तास का जो चले हमारे साथ॥
कालि करन्ता अबहि करि, अब करता सो हाल।
पाछे कछु न होइगो, जौ सिर आवे काल॥
कीचड़ भाटा गिर पस्या कछू न आयो हाथ।
पीसत-पीसत चाबिया सोई बिवह्या साथ॥
कबीर जन्त्र न बाजई, टूटी गये सब तार।
जन्त्र विचारा क्या करें, चले बजावन हार॥
यहु जीव आया दूर से, भजौं सी जासी दूर।
बीच मार्ग में रमि रहा, काक रहा सिर पूर॥
काची काया मन अथिर थिर थिर काम करंत।
क्यों क्यों नर निधड़क फिरै, त्यों त्यों काल हसंन॥
बेटा जाया तो का भया, कहा बजावै थाल।
आना-जाना है रहा, ज्यों कीड़ी का नाल॥
कौड़ी- कौड़ी जोरि कै जोरे लाख करोर।
चलती बार न कछु, मिल्यो लई लँगोटी तोर॥
परभात तारे खिसै, त्यों यह खिसै शरीर।
पैं दुइ अक्षर नहिं, खसहि सौ गति रह्यौ कबीर॥
हाड़ जलै ज्यों लाकड़ी, बाल जलैं ज्यो घास।
सब जग जलता देखके, भयो कबीर उदास॥
(श्री दरबारी लाल जी ‘सत्य भक्त’)
मैंने कहा- मेरे पास अटूट धन है, करोड़ों की आमदनी है, हजारों नौकर हैं, एक से एक बढ़कर महल हैं, सैकड़ों विद्वान मेरे गीत गाते हैं, मेरी तारीफ में बड़े-बड़े पत्रों में बड़े-बड़े लेख निकलते हैं, मैं बड़ा आदमी हूँ।
उसने कहा- ‘न’! तू तो लक्ष्मी का वाहन हो सकता है।
मैंने कहा- मैं विजेता हूँ, मैं पूरा सम्राट हूँ। दुनिया के बड़े-बड़े मुल्कों को मैंने जीता है, मेरे नाम से बड़े-बड़े मुल्क थर्राते हैं, बड़ों-बड़ों की जान मेरी मुट्ठी में है, मैं जिसका चाहूँ उसका सिर उड़ा दूँ, मैं बड़ा आदमी हूँ।
उसने कहा- न! तू तो कसाई हो सकता है।
मैंने कहा- मेरी घर-घर में पूजा होती है, मेरे दर्शनों के लिये लोग दौड़े आते हैं, मेरे चरणों को चूमते हैं, मेरी हर एक बात श्रद्धा से सुनते हैं, नीति की अनीति और अनीति की नीति मनवाना मेरे हाथ में है, सब मुझे जगत गुरु कहते हैं, मैं बड़ा आदमी हूँ।
उसने कहा- न! तू तो गौ मुख व्याघ्र हो सकता है।
मैंने कहा- मैं कलाकार हूँ, जहाँ पहुँच जाता हूँ, बड़ी भीड़ लग जाती है, चारों तरफ से वाह-वाह होने लगती है, राजा-महाराजा, धन, कुबेर, अधिकारी, बहादुर, सब मुझे चाहते हैं, मेरी तरफ ताकते हैं, मैं बड़ा आदमी हूँ।
उसने कहा- न! तू वह सड़ी मिठाई हो सकता है जिस पर अनेक तरह की मक्खियाँ भिनभिनाया करती हैं।
मैंने कहा- मैं किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता, लोगों को अपने जाल में नहीं फँसा सकता, उन्हें लुभा नहीं सकता, मेहनत करके अपनी रोटी कमा लेता हूँ, कभी-कभी किसी की सेवा कर पाता हूँ, जो सत्य मुझे मिला है वह हजारों में एकाध है। थोड़ा बहुत समझ पाता हूँ, लोग मुझे अपनी इच्छा के अनुसार नचवाना चाहते हैं, पर मैं नहीं नाच पाता। संतोष, मेहनत और ईश्वर का भरोसा ही मेरी पूँजी है। मैं गरीब हूँ। बहुत मामूली आदमी हूँ।
उसने कहा- तू आदमी है, सच्चा आदमी है। इसीलिये बड़ा आदमी है। ।
नई दुनिया।
कथा-
(पी. जगन्नाथ राव नायडू, नागपुर)
एक बार नरक लोक के अधिपति से स्वर्ग लोक के अधिपति की भेंट हुई, दोनों में बहुत देर तक विभिन्न विषयों पर वार्तालाप होता रहा। अन्त में नरक अधिपति ने अपने कष्ट का रोना रोते हुये कहा- भगवन्! क्या कहूँ, मेरे नरक में तो रोज भीड़ की भीड़ आती है, बड़े-बड़े पातकी आते हैं, इन्हें ऐसे-ऐसे निर्दयतापूर्ण कठोर दण्ड देने पड़ते हैं कि मेरा भी कलेजा काँपने लगता है। वे पापी लोग भूलोक की तरह यहाँ नरक में आकर भी उपद्रव करते हैं और उनकी व्यवस्था करने में मुझे बड़ी माथा-पच्ची करनी पड़ती है। इसी रगड़े-झगड़े में क्षण भर की फुरसत नहीं मिलती। हर घड़ी जी जला करता है।
स्वर्ग के अधिपति ने सहानुभूति प्रदर्शित की और अपना अनुभव बताया कि भाई, हमारे यहाँ तो ऐसा बखेड़ा नहीं है। एक तो वैसे ही थोड़े मनुष्य आते हैं, जो आते हैं, वे ऐसे सभ्य और सद्गुणी होते हैं कि सब व्यवस्था अपने आप चलती रहती है। हमें कुछ खटपट नहीं करनी पड़ती। आनन्द से दिन व्यतीत करते हैं।
वार्तालाप के पश्चात् दोनों अपने-अपने स्थानों को चले गये। नरक के अधिपति के मन में यह बात तीर की तरह चुभी कि मैं इतना परिश्रम करता हूँ और स्वर्गपति आराम से दिन बिताता है। इसके लिये कोई उपाय ढूँढ़ना चाहिए कि मैं भी इसी प्रकार सुखपूर्वक दिन व्यतीत करूं, इस ढूँढ़-खोज में बहुत दिन व्यतीत हो गये। एक दिन नारद जी उधर आ निकले, उन्होंने नरकाधिपति को चिन्ताग्रस्त देखकर इसका कारण पूछा। उन्होंने अपने मन की सारी बात कह दी कि महाराज! नरक की भीड़ कम हो तो मुझे चैन मिले।
नारद जी को उनके दुख पर दया आई, और कहा- इतनी सी बात के लिये दुखी होने की क्या आवश्यकता है। मैं एक बहुत ही सरल उपाय बताता हूँ जिससे बात की बात में आपका कष्ट मिट जायेगा। नरक के सब निवासियों से कहिए कि वे ऊँचे स्वर से हरि-कीर्तन करें। बस, वे सब जरा सी देर में स्वर्ग चले जायेंगे और आपका नरक खाली हो जायेगा। धर्मराज ने नारद को यह उपाय बताने के लिये बहुत धन्यवाद दिया और उसी दिन सारे नरकवासियों को वह मन्त्र बता दिया। अब तो उच्च स्वर से हरि-कीर्तन होने लगा और स्वर्ग से विमान आ-आकर उन्हें वैकुण्ठ लोक को ले जाने लगे। संध्या होते होते सारा नरक खाली हो गया। केवल एक व्यक्ति रह गया, जो इस कीर्तन में शामिल नहीं हुआ था। यमराज की मनोवाँछा पूरी हुई और वे उस एक बन्दी को अपने पास ही रखकर आनन्द करने लगे।
जब नरक के सारे बन्दी स्वर्ग में पहुँचे तो वहाँ भारी भीड़ लग गई। नारकीय व्यक्ति अपने दुर्गुणों के कारण नन्दन वन को भी नरक बनाने लगे। चारों ओर कलह, क्लेश, उत्पात, अनाचार के दृश्य दिखाई देने लगे। सुरपुर में कोलाहल मच गया। इस उपद्रवी भीड़ को सँभालने के लिये देवता गण बड़ा प्रयत्न कर रहे थे, फिर भी उन्हें सफलता प्राप्त नहीं होती थी। एक को समझाते थे, तो दूसरा उत्पात मचाता था। जिस प्रकार पहले यमराज दुखी थे, उसी प्रकार अब धर्मराज की बेचैनी बढ़ गई। स्वर्ग नरक के रूप में परिणत हो गया, क्योंकि सुन्दर स्थान को नहीं, वरन् संस्कृत व्यक्तियों की निवास-भूमि को स्वर्ग कहा जाता है। आखिर वह अव्यवस्था कब तक चलती। उसका उपाय करना ही पड़ा। जैसे जापान के सम्राट ने अब सिंगापुर का नाम अपने अधिकार बल से ‘सोलन’ रख दिया है, वैसे ही हिज एक्सीलेन्सी इन्द्र महाराज ने एक आर्डीनेन्स निकाल कर घोषित कर दिया कि आज से यह स्वर्ग नरक कहलावेगा और नरक का नाम स्वर्ग होगा। वर्तमान स्वर्ग के मूल निवासियों को यहाँ से स्थानान्तरित किया जाता है। इस प्रकार नारकीय व्यक्ति नरक में ही रहे और स्वर्गीय आत्माएं स्वर्ग में पहुँचाई गईं।
कथा का इतना भाग सुन चुकने पर पाठकों को एक जिज्ञासा अभी बनी रही होगी कि वह एक व्यक्ति तो हरिकीर्तन में शामिल नहीं हुआ था? और लौट-फेर की व्यवस्था में उसे अनायास ही स्वर्ग क्यों प्राप्त हो गया?
सुनिए, वह व्यक्ति जानता था कि ईश्वर न तो तमाशबीन है, जिसे नाच कूद कर खुश किया जा सके और न दरबारी सरदार है, जिसको तारीफों के पुल बाँध कर इनाम हासिल किया जा सके। ईश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता, वह हर एक के आचरण की परीक्षा करता है और उसी के अनुसार फल देता है। चूँकि मैंने नरक में रहने योग्य काम किये है, इसलिये मुझे अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ेगा। टके सेर मुक्ति खरीदने वालों की ओर उसने ध्यान नहीं दिया और एक निष्ठा से सत्य पर आरुढ़ रहा। वीरतापूर्वक उसने अपने को अपराधी स्वीकार किया और दण्ड भोगने से कायरों की भाँति डरा नहीं। यही सद्गुण थे, जो उसके नरक काल में भी स्वर्गीय ही बनाये हुये थे और जब नाम पलट कर नरक का स्वर्ग हुआ तब भी वह स्वर्गीय ही बना रहा। दुख-सुख यथा नियम सबको सहन करने पड़ते है। पर जो उच्च आचरण वाला है, उसके लिये नरक भी स्वर्ग है और जो पतित स्वभाव के हैं, वे स्वर्ग को भी नरक बना लेते हैं।
(महात्मा गाँधी)
ईश्वर के सहस्र अर्थात् अनेक नाम हैं, अथवा यों कहिए कि वे नामहीन हैं। जो नाम हमको अच्छा मालूम हो, उसी नाम से हम ईश्वर को भजें, उसकी प्रार्थना करें। कोई उसे राम नाम से पहचानते हैं, तो कोई कृष्ण नाम से, कोई उसे रहीम कहते हैं, तो कोई गौड। यह सब एक ही चैतन्य को भजते हैं, परन्तु जिस प्रकार सब तरह का भोजन सबको नहीं रुचता, उसी तरह सब नाम सबको नहीं रुचते। जिसका जिससे सह्वास होता है, उसी नाम से वह ईश्वर को पहचानता है और वह ईश्वर अन्तर्यामी सर्वशक्तिमान होने के कारण हमारे हृदय के भावों को पहचान कर हमारी योग्यता के अनुसार हमको जवाब देता है। अर्थात् प्रार्थना या भजन जीभ से नहीं वरन् हृदय से होता है। इससे गूँगे, तोतले, मूढ़ भी प्रार्थना कर सकते हैं। जीभ पर अमृत किस काम का? कागज के गुलाब से सुगन्ध कैसे निकल सकती है? इसलिये जो सीधे तरीके से ईश्वर को भजना चाहता हो, वह अपने हृदय को मुकाम पर रखे। हनुमान की जीभ पर जो राम था वही उनके हृदय का स्वामी था और इसी से उनमें अपरिमित बल था। विश्वास से जहाज चलते हैं। विश्वास से पर्वत उठाये जाते हैं। विश्वास से समुद्र लाँघा जाता है। इसका अर्थ यह है कि जिसके हृदय में सर्वशक्तिमान ईश्वर का निवास है, वह क्या नहीं कर सकता? वह चाहे कोढ़ी हो, चाहे क्षय का रोगी हो, जिसके हृदय में राम बसते हैं, उसके सब रोग सर्वथा न हो जाते हैं।
(सतयुग की मनोवैज्ञानिक विवेचना)
मनुष्य को स्वभावतः अपने भविष्य के सम्बन्ध में दिलचस्पी है। वह यह जानने के लिये उत्सुक रहता है कि कल का दिन मेरे लिये कैसा होगा? चूँकि मनुष्य सुख और शान्ति को चाहता है, इसलिये ऐसे भविष्य की कल्पना करता है, जिसमें सुख-शान्ति की सामग्री मौजूद हो। बड़े-बड़े दार्शनिकों और अग्रसोचियों ने आगामी समय के सुनहले स्वप्न देखने में अपनी बहुमूल्य शक्तियों को लगाया है। संसार के साहित्य में ऐसी हजारों पुस्तकें मौजूद हैं, जिनमें आगामी समय की सुखद कल्पना की गई है। दार्शनिक, वैज्ञानिक, डॉक्टर, कवि, व्यापारी, धर्म-प्रचारक ऐसे भविष्य लोक में विचरण करते हैं, जिसमें उनकी आकांक्षाएं पूरी होंगी। भक्त सोचता है कि एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा, जब मैं भगवान के दर्शन करूंगा, धर्म-प्रचारक विश्वास करता है कि किसी दिन समस्त संसार मेरे विचारों का अनुयायी हो जायेगा। डॉक्टर सोचता है मेरी इस दवा से अमुक बीमारी का नामोनिशान न रहेगा। लोभी समझता है कि मेरे पास बहुत धन जमा हो जायेगा। कल का दिन अधिक सुन्दर होगा, ऐसी मान्यता हर प्राणी करता है।
इसी सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य जाति हजारों वर्ष से एक ऐसे युग की कल्पना करती आ रही है, जिसमें वे सब बातें अनायास ही प्राप्त हो जायेंगी, जिन्हें प्राप्त करने की वह इच्छा करता है। जैसा स्वास्थ्य, जैसा धन, जैसा समाज, जैसा वातावरण उत्तम से उत्तम दशा में सोचा जा सका है, उन सब का सम्मिलित एकत्रीकरण कर के एक युग की कल्पना की गई है और उस युग का नाम ‘सतयुग‘ रखा गया है।
मनुष्य खुद सताया जाने से डरता है और चाहता है कि कोई मुझे न सतावे, न दुःख दे और न अप्रिय व्यवहार करे। इसी इच्छा को सतयुग में आरोपित करके समझता है कि उस समय कोई मुझे न सतावेगा, अकेले मुझ तक ही उस स्थिति का लागू होना ठीक नहीं मालूम पड़ता, इसलिये ‘मुझे की सीमा’ बढ़ाकर ‘सब तक’ करदी जाती है। तदानुसार “सब लोग हिल-मिल कर रहेंगे” ऐसी मान्यता बनानी पड़ती है। हम अपनी चोरी होने देना, स्त्री का व्यभिचारिणी होना, पुत्र की मृत्यु हो जाना, धन कमाने में बहुत परिश्रम करना, निर्बल एवं रोगी बनना तथा ऐसी ही अन्य कष्टकारक परिस्थितियों को पसन्द नहीं करते। अतएव ऐसे समय का सुनहला स्वप्न देखते हैं, जब ऐसी एक भी बात न हो, जिसे हम दुखदायक समझते हैं।
परन्तु क्या ऐसा युग वास्तव में हो भी सकता है, यह विचारणीय प्रश्न है। इतिहास, पुराणों का गम्भीर दृष्टि से अवलोकन करने पर ऐसा कोई भी समय उपलब्ध नहीं होता है। जब सर्वत्र सम्पूर्ण अंशों में मनुष्य जाति उन आदर्शों का पालन करती रही हो। कहते हैं कि पुरुष के साथ पाप की सृष्टि हुई, आदम के साथ शैतान पैदा हुआ और सत् के साथ असत् जन्मा। इस त्रिगुणमयी प्रकृति का संगठन ही इस ढंग से हुआ है कि भलाई के साथ बुराई भी जरूर रहेगी। सतयुग में भी दुष्टों, दुराचारियों, पापी और अधर्मियों के होने के प्रमाण मिलते है। जब वे बहुत बढ़ गये, यहाँ तक कि असुर लोग देवताओं से ताल ठोंक कर लड़ने को तैयार हो गये और संघर्ष में देवताओं से भी भारी बैठे, तो भगवान को उनका संहार करने के लिये जन्म धारण करना पड़ा। असल में यह मृत्यु लोक कर्तव्य भूमि है, यहाँ जीव परिश्रम करके उन्नति की ओर चलने का प्रयत्न करते हैं, गिरते-पड़ते वे नित्य अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ते जाते हैं। जब पूर्ण हो जाते है, तो परमपद को प्राप्त कर लेते हैं, मुक्त हो जाते हैं।
एक दार्शनिक का कथन है कि “मनुष्य अपूर्ण है।” सतयुग के जीवधारी पूर्ण रहे होंगे, यह आदर्श की दृष्टि से एक अच्छा विचार है। पर समीक्षक की तरह परीक्षा करने पर यह विचार सत्य प्रतीत नहीं होता है। निश्चय ही महान मन में समय-समय पर एक विशेष प्रकार की लहरें आती हैं, जिन्हें ‘जमाने की खूबी’, ‘युग-धर्म’ आदि नामों से पुकारते हैं। किसी समय में ठंडी हवा चलती है तो किसी में गरम, पर कभी भी एक का लोप नहीं हो जाता। केवल मात्रा में न्यूनता-अधिकता हो जाती हैं। कभी भले स्वभाव में वृद्धि होती है कभी बुरे में, एक के बाद दूसरा आता है। दिन के बाद रात्रि और रात्रि के बाद दिन का क्रम है। काल का परिवर्तन ‘चक्र सदैव घूमता रहता है। यह ज्वार-भाटा समुद्र में आते हैं पर पानी के गुणों में कोई अन्तर नहीं होता।
मेरा विश्वास है कि पूर्ण सतयुग कभी न तो हुआ है और न आगे हो सकता हैं। बारह वर्ष घूरे में गढ़ी रहने पर भी टेढ़ी रहने वाली कुत्ते की पूँछ की तरह यह दुनिया, इसी प्रकार टेढ़ी रहेगी। इस पाठशाला में सदैव अधूरे ज्ञान के ही विद्यार्थी पढ़ने आवेंगे। एम.ए. पास कर लेने के बाद इस पाठशाला के फर्श पर पढ़ने की उन्हें जरूरत न रहेगी। कलियुग में करने पर भी कुछ नहीं हो सकता और सतयुग में सब कुछ अपने आप ही हो जावेगा, ऐसा मानना वास्तविकता से आंखें बन्द कर लेने के समान है।
अज्ञान ही असत् (कलियुग) और ज्ञान ही सत् (सतयुग) है। मनुष्य अपने लिये कलियुग या सतयुग स्वयं निर्माण करता है, उसके लिये उसे लाखों वर्ष प्रतीक्षा करने की कुछ भी जरूरत नहीं है। हम क्यों सोचें कि लाखों करोड़ों वर्ष बाद जब सतयुग आवे तब हमें आनन्ददायक स्थिति प्राप्त होगी। उद्योगियों की तरह हमें तो अपना युग अपने हाथ चलाना है। इसके लिये वेद हमें स्पष्ट आज्ञा दे रहा है। ‘असतो मा सद्गमयं’ असत् की ओर नहीं सत् की ओर चलो। कलियुग में मत पड़े रहो, सतयुग का उपयोग करो, अज्ञान और अधर्म को त्याग कर धर्म और ज्ञान की उपासना करो।
(ले. ऋषि तिरुवल्लुवर)
ऐसा मत सोचिये कि इस संसार में दुख ही दुख हैं, तुम यहाँ भी स्थायी सुख प्राप्त कर सकते हो, यदि अपनी अतृप्त तृष्णाओं का परित्याग कर दो। यथार्थ में सबसे बड़ी आपत्ति तृष्णा है, वह न तो कभी शाँत होती है और न शिथिल पड़ती है। कामनाएँ पूर्ण होने पर भी सन्तोष नहीं होता, वरन् पहले से भी और अधिक प्यास बढ़ती है। कहते हैं कि मनुष्य अपूर्ण है किन्तु यदि वह अपनी वासनाएँ छोड़ दे तो इसी जीवन में पूर्ण हो सकता है।
तृष्णा एक बन्धन है जो आत्मा को जन्म-मरण के जाल में जकड़े हुए है, जिसे साँसारिक वस्तुओं की तृष्णा हरदम सताती रहती है, भला वह भव-बन्धनों से किस प्रकार पार हो सकेगा? प्रपंच का फेरा तभी तक है जब तक कि विभिन्न प्रकार की इच्छाओं ने प्राणी को बाँध रखा है। जिन्हें मुक्ति की आकाँक्षा है, जिन्हें पूर्ण सत्य की खोज करनी है, उनके लिये सर्वोत्तम साधन यह है कि अपनी इच्छा को वश में करें। इस संसार में सन्तोष से बढ़कर और कोई धन नहीं है, स्वर्ग में भी कोई संपदा इसकी समता नहीं कर सकती। कोई मनुष्य देखने में कितना ही स्वाधीन क्यों न प्रतीत हो पर वह बेचारा वास्तव में एक कैदी के समान है, चाहे वह कितना ही बड़ा धनी क्यों न हो, भिखारी से ही उसकी तुलना की जा सकती है।
यदि तुम संसार में कुछ श्रेष्ठ कर्म करना चाहते हो तो आवश्यक है कि तृष्णा और वासनाओं का परित्याग कर दो। कर्म करो, अपने कर्तव्य में त्रुटि मत रखो, परन्तु फल के लिये प्यासे मत फिरो। जो करेगा उसे मिलेगा। किन्तु जो पाने के लिये व्याकुल फिरेगा उसे आपत्तियों के पहाड़ सिर पर उठाने पड़ेंगे। जो चाहता है कि स्वर्ग का राज मेरे पाँवों तले पड़ा रहे उसे चाहिये कि अपनी तृष्णा का परित्याग कर दे।
कथा-
(डॉ. शिवरतनलाल त्रिपाठी, गोला गोकरननाथ)
किसी जंगल में एक महात्मा रहते थे। अपने शिष्यों को पढ़ा देना और योगाभ्यास करना यही महात्मा का नित्य कार्य था। उदर पोषण के लिये कन्द मूल फल तथा नदियों का स्वच्छ जल पीकर ही सन्तुष्ट रहते थे। वल्कल वस्त्र, तृण शैया, फूस की झोंपड़ी में विश्राम, इस प्रकार सन्तोष, धैर्य और शान्ति की साक्षात मूर्ति महाराज योगीराज थे।
परन्तु महाराज का एक शिष्य बड़ा ही चपल था। उसके हृदय में बार-बार विविध विचारों की तरंगें उठती थी। साँसारिक भोग-विलासों की कल्पना में उसका मन रात्रि-दिवस उलझा रहता और योग में न लगता था। आखिर मन की कल्पना को कार्यरूप में करने की ठानी और गुरु जी से कहने लगा कि “महाराज आप तो सदा वन में पड़े रहते हैं, कभी-कभी नगर की भी सैर किया कीजिये। बीसियों राजे महाराजे आपके शिष्य बनेंगे, सब में नाम होगा, राजमहलों तथा नगर की शोभा को हम शिष्य लोग भी देख लेंगे।” योगीराज यह सुनकर कहने लगे “ भाई मुझे तो अवकाश नहीं है, हाँ, तू चाहे तो नगर में जा सकता है।” चेला कहने लगा कि “महाराज आपको अवकाश क्यों नहीं, यहाँ बैठे आप-रात दिन योग-अभ्यास ही तो करते रहते हैं, दो चार दिन को चलिये घूम आवें, हर वक्त का भजन किस काम का।” यह सुन महात्मा हँस दिये और चेले से कहा कि “ भाई मैं तो जाता नहीं, तू जैसा चाहे वैसा कर।”
चेला अकेला ही नगर की सैर को चला। बाजार की शोभा देखता-देखता गली-कूँचों को चला। इधर-उधर महलों की शोभा देखता फिर रहा था कि एक अट्टालिका पर निगाह पड़ी, देखता क्या है एक युवती खड़ी बाल सुखा रही है। बस उसे देखते ही लोट-पोट हो गया कामदेव के बाण से वेधित होकर, छटपटाने लगा, परन्तु करता क्या, बेबस था।
सायंकाल समीप जान आश्रम को लौटा। गुरु जी महाराज ने चेहरा देखते ही जान लिया कि बच्चा माया का शिकार बन गया है। बोले कहो, क्या दशा है? चेला गिर पड़ा और कराहता हुआ कहने लगा कि महाराज छाती में दर्द होता है। गुरु जी ने हँस कर कहा क्या नजर का काँटा हृदय में लग गया, सच-सच बता? गुरु जी से झूठ बोलकर परलोक न बिगाड़। गुरु जी के यह वचन सुन चेले ने लज्जा से सिर झुका लिया। फिर गुरु जी के आग्रह पर सारा असली वृत्तांत कह सुनाया, तब गुरु जी ने चेले को आश्वासन देते हुये कहा कि घबराओ मत, यह कितनी बड़ी बात है, तुम पता बताओ वह स्त्री यही उपस्थित होगी। चेले ने सब पते बताये। गुरु जी ने अपने दूसरे चेले के हाथों एक पत्र उस स्त्री के पति के नाम लिखकर भेज दिया। उस शिष्य ने स्त्री के पति को, जो कि एक सेठ था, पत्र दिया। पत्र में लिखा था कि हमारे ऊपर विश्वास कर अपनी स्त्री को इस रात के लिये आश्रम में भेज दो, उसके पतिव्रत धर्म के हम पिता के समान रक्षक हैं।
महात्मा को दूर-दूर तक सब जानते थे, उन पर सबको पूरा विश्वास था, सेठ अपनी स्त्री सहित उपस्थित हो गया। महात्मा जी सेठ को अलग बैठा कर स्त्री को ले शिष्य के पास पहुँचे और कहने लगे ले भाई! यह देवी मौजूद है, तू जो चाहे सो कर, परन्तु इतना ध्यान रख कि प्रातःकाल सूर्य निकलते ही तेरा देहान्त हो जावेगा, रात्रि के थोड़े से घण्टे ही तेरे जीवन के हैं। स्त्री को महात्मा जी ने पहिले ही समझा दिया था कि पुत्री घबड़ाना मत। तुम्हारे धर्म पर आँच नहीं आयेगी, थोड़ी देर का माया जाल है। स्त्री बैठी रही। इधर मृत्यु के भय से चेला चिन्ता में डूब गया और उसके हृदय से सारी काम-वासना काफूर हो गई। रह-रह कर यही सोच सता रही थी कि प्रातःकाल होते ही काल का कलेवा बन जाऊंगा। बस सारी रात बीत गई, प्रातःकाल होते ही गुरुजी आ पहुँचे। चेले ने चरण छुये। गुरुजी ने कहा, कहो भोग-तृष्णा को भुला चुके? चेला कहने लगा- कैसा भोग और कैसा विलास, मैं तो सारी रात चिन्ता में रहा हूँ। गुरु जी ने कहा कि मूर्ख तुझे तो रात्रि भर का समय दिया था फिर क्यों न कुछ कर सका। मुझे तो यही पता नहीं है कि मृत्यु कब आ जाये। फिर किस प्रकार योगाभ्यास छोड़कर सैर-सपाटे को निकलूँ, मृत्यु के स्वागत के लिये ही मैं हर समय तैयार बैठा रहता हूँ।
याद रख, भोग-विलास में फंसे रहना और परलोक की तैयारी न करना भूल है। यह नर तन इस लिये ही मिला है कि मुक्ति प्राप्त की जाये। परन्तु भोग विलास में फँसा हुआ मनुष्य सोचता रहता है कि अन्त में भजन कर लूँगा। इसी प्रकार टालते-टालते मृत्यु आ जाती है और हम तैयार नहीं हो पाते। मनुष्य यदि यह विचार सदा रखे कि मृत्यु आने वाली है तो फिर भोग में लिप्त नहीं हो सकता। चेला यह सुनकर चरणों में गिर पड़ा। गुरु जी ने कहा कि उठ, अब तू अमर हुआ। यदि तू भोग में फंसता तो ब्रह्मचर्य से गिर जाता, यही तेरी धार्मिक मृत्यु होती। अब तूने मृत्यु चिन्ता के कारण भोगों से उदासीनता दिखाई है, इसलिये स्थिर होकर योगाभ्यास कर और मृत्यु के मुकाबले को तैयार रह।
यह बाह्य पदार्थ मनुष्य को भुलावे में डालने वाले हैं और यदि मनुष्य मृत्यु का भय हृदय में रखे (जिसके आने का अनिश्चित समय है) तो मन को स्थिरता प्राप्त होगी और आप सुगमतापूर्वक पूर्णानन्द की ओर बढ़ जावेंगे तथा सारे पाप यूँ ही देखते रह जावेंगे। वेद कहते हैं कि -भस्मान्त शरीरम् बस मृत्यु को सदा याद रक्खो। “गृहत इव केशेपु मृत्युनाधर्माचरेत” अर्थात् मृत्यु बाल (चोटी) पकड़े हुये है, ऐसा समझ कर (शीघ्र) धर्म को करो।
‘मेस्टर हान्ट’ इस शब्द का उच्चारण करते ही एक पत्थर जैसे कड़े सीने वाले, हाथी सी मोटी गर्दन के, सात फुट लम्बे, ढाई मन भारी, दुर्दान्त प्रकृति और क्रूरकर्मा मनुष्य का बोध होता है, जो गोरे रंग का राक्षस समझा जाता था। कहते है कि जब वह चलता है तो धरती हिलती है, मुक्का मार दे तो एक मजबूत साँड को बिठा दे, लाल आँखें देख कर बाघ भी डर जायें, आहट पाकर कुत्ते भौंकना बन्द कर दें, माताएं उसका नाम सुनकर बच्चों को गोद में छिपा लें, ऐसा था वह भीमकाय और क्रूरकर्मा ‘हान्ट’।
व्याघ्र के समान स्वतंत्र गति से वह सर्वत्र विचरण करता था। दुबले-पतले मनुष्य उसका रास्ता छोड़कर अलग हट जाते थे, महिलाएं अपने सतीत्व की आशंका से एक ओर छिप बैठती थीं। मेस्टर हाण्ट इंग्लैंड के ग्राम में धनी-मानियों को डरा-धमका कर अपना खर्च चलाता था, वैसे तो जंगली पशुओं का शिकार करने से भी उसे अच्छी आमदनी हो जाती थी।
आप समझते हैं कि क्या ऐसे हिंसक पशु के हृदय में भी प्रेम-रस की कुछ बूँदें होंगी? वे हों चाहे न हों, पर ऐसी भी एक स्त्री थी जो उसे प्यार करती थी और उसके प्रणय-सूत्र में आबद्ध हुई थी। हाण्ट की धर्मपत्नी बड़ी ही सुशील-स्वरूपवती और सदाचारिणी थी, वह उसके अत्याचार सहती पर धर्म से विचलित न होती। किन्तु पशु के लिये मानवता का कोई महत्व नहीं। हाण्ट की दृष्टि में वह तुच्छ थी, तुच्छ ही नहीं उपेक्षणीय भी थी। यह उपेक्षा यहाँ तक बढ़ी कि हाण्ट एक पड़ौस की दुराचारिणी स्त्री पर आसक्त हो गया और अपनी स्त्री को तरह-तरह से सताने लगा। इन चतुर्मुखी वेदनाओं ने उस भद्र महिला को रोग शय्या पर डाल दिया और वह आखिर कुछ दिन में घुल-घुल कर मर ही गई।
पत्नी की मृत्यु का हाण्ट को मक्खी मरने के बराबर भी दुख नहीं हुआ। अन्त्येष्टि के दूसरे ही दिन वह दुराचारिणी पड़ोसिन उसके घर की मालकिन बन कर आ गई। सब को यह कार्य बड़ा दुखद प्रतीत हुआ, पर किसी में साहस न था कि उससे कुछ कहता। हृदय से सब उसे बुरा कहते थे, पर जिह्वा में कुछ कहने का दम न था।
दूसरे विवाह को हुए एक महीना व्यतीत हो चुका है। पति-पत्नी एक ही शय्या पर लेटे हुए थे और अर्द्ध-निद्रा में अचेतन पड़े हुए थे। इसी समय बन्द खिड़की को थप-थपाने की सी आवाज हुई। दोनों ने समझा कोई कुत्ता, बिल्ली होगा और चुप पड़े रहे। जब बार-बार खड़-खड़ होने लगी तो कारण जानने की इच्छा हुई। हाण्ट अलसाया हुआ पड़ा था। उसने स्त्री से कहा- उठ देख तो कौन खिड़की को खड़खड़ा रहा है। स्त्री उठी और दरवाजा खोलकर बाहर देखा। जो दृश्य उसने देखा, उससे उसकी घिग्घी बँध गई और भयभीत होकर बेतरह चिल्लाने लगी।
‘क्या है? क्यों चिल्लाती है?’ हाण्ट ने चारपाई पर पड़े-पड़े ही कर्कश स्वर से पूछा। पत्नी के होशो-हवास गायब थे। वह आपे से बाहर हो रही थी। उसने घिघियाते हुये कहा- देखते नहीं आपकी पूर्व-पत्नी खड़ी हुई है। अब तो हाण्ट का पारा और चढ़ गया, उसने गरजते हुए कहा- ‘देखता हूँ तेरा सिर! गधों की तरह खड़ी खड़ी बक-बक कर रही है। चल हट उधर से, दरवाजा बन्द कर और सीधे से इधर चली आ। अब की बार कुछ बका तो मुँह कुचल दूँगा।’ दोनों तरफ से प्रताड़ित स्त्री भयभीत शावक की तरह पति के पास लौट आई। उसका कलेजा धकधका रहा था और पाँव पत्तों की तरह काँप रहे थे।
स्त्री का यह हाल देखकर पति का मन कुछ पसीजा। मामला क्या है, यह जानने के लिये वह उठा और दरवाजे पर पहुँचा। अब तो उसकी भी आँखें स्थिर रह गईं और माथा चकरा गया। सचमुच उसकी पूर्व स्त्री सामने खड़ी हुई थी, रत्ती भर भी तो कोई फर्क उसमें दिखाई नहीं पड़ता था। लाल-लाल अंगारे की आँखें उसको जल रही थीं, मानो दो जलती हुई लौह-शलाकाएं उसे भस्म करने के लिये लपलपा रही हैं। जिस हाण्ट ने कभी यह नहीं जाना था कि भय किस चिड़िया का नाम है, वह आज चूहे की तरह सकपका रहा था। वह अधिक देर इस स्थिति में खड़ा न रह सका और एक चिंघाड़ मारता हुआ बेहोश हो गया।
हो हल्ला सुनकर पड़ौसी इकट्ठे हो गये। उसे उठाकर बिस्तर पर डाला गया और दवा-दारु की गई। इस पर भी उसकी दशा में कुछ अन्तर नहीं आया। पूरे पाँच महीने तक वह रोग-शय्या पर पड़ा रहा। ‘ अरे यह तो मेरी ही स्त्री है। अरे प्रिय तू यहाँ क्यों?’ ऐसे शब्दों को वह दिन भर दुहराता और बड़बड़ाता रहता। सारे दिन उसकी आँखों में से आँसू और मुँह से हाय का प्रवाह जारी रहता। जैसे-जैसे दिन बीतते हाण्ट का हृदय बदलता गया।
पाँच महीने की बीमारी में उसका शरीर बिल्कुल घुल गया था और साथ ही हृदय का कषाय आँसुओं की राह बह कर निकल गया। अब वह पुराना पिशाच हाण्ट नहीं रहा था, वरन् दयालु और सदाचारी हाण्ट बन गया था। विपत्ति में एक ऐसी खूबी है, जो मनुष्य का हृदय पवित्र कर देती है। हाण्ट को भी प्रकृति के इस नियम ने बदल ही दिया। वह मरा नहीं, उसकी पतिव्रता पूर्व-पत्नी का रोष शान्त हो गया और उसे अभय-दान देकर वापिस लौट गई, हाण्ट अच्छा हो गया। अब उसके पुराने सारे स्वभाव जड़-मूल से नष्ट हो गये थे। अपनी नगरी का सर्वश्रेष्ठ नागरिक इस समय वही था। अब उसे लोग आदर के साथ पुकारते थे ‘त्राता हाण्ट’। सचमुच अब वह एक निस्वार्थ परोपकारी संत हो गया था, यह उसकी मृत पूर्व-पत्नी की ही कृपा थी।
(श्री पं. रामेश्वरनन्द शर्मा, लाल बाग, बम्बई)
तम्बाकू पीने की लत मुझे बचपन में ही लग गई थी। आगरे में जमुना किनारे साधुओं की संगति करके इस आदत को मैंने प्रसाद की तरह पाया और कुछ ही समय में गाँजा तथा चरस की भी चिलमें चूसने लगा। भंग भवानी का भी सेवन चलने लगा। इस प्रकार अपने हाथों अपने धर्म-कर्म और स्वास्थ्य में आग लगाता हुआ समय बिताने लगा।
मुख में दुर्गन्ध आना, दृष्टि में निर्बलता, भूख में कमी, कफ खाँसी का आक्रमण, बुद्धि का भ्रष्ट होना यह तम्बाकू के वरदान हैं, जो उसकी उपासना करता है, उन्हें यह सब सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। मैंने जब यह वरदान पाये तो अपनी घर फूँक तमाशा देखने की नीति पर होश आया। बार-बार विचार करने लगा कि पैसा और समय बर्बाद करके इस घातक आदत से पुजारी मैं क्यों बना हुआ हूँ। आप्त पुरुषों के वचनों का अध्ययन किया तब तो गफलत से बेदार होने लगा। बड़ों को तम्बाकू पीते देखकर छोटे बच्चे या छोटी बुद्धि वाले इस आदत को सीखते हैं और यह दुर्गुण छूत की बीमारी की तरह एक से दूसरों में फैलता है। इस प्रकार एक तम्बाकू पीने वाला उन अनेक लोगों के पतन के लिए भी उत्तरदायी और पाप का भागी ठहरता है। दूसरों का बहुत अधिक धन, समय और स्वास्थ्य इस बुरी लत के पीछे जो नष्ट होता है इसका बहुत बड़ा भार हमारे ऊपर है, क्योंकि हमारी देखा-देखी हमारा आदर्श मानकर अनेक छोटे लोग इस सत्यानाशी आदत के चंगुल में फँसते हैं। यह सब सोचते-सोचते मैं व्याकुल हो गया और एक दिन निश्चय किया कि - “तम्बाकू पीने का आज से परित्याग करता हूँ।”
मैंने सुना था कि तम्बाकू पीना छोड़ने में बड़ा कष्ट होता है। सचमुच वह बात ठीक निकली। जब तम्बाकू पीना छोड़ा तो नाना प्रकार के उदर विकार उत्पन्न होने लगे। कभी पेट फूलना, कभी टट्टी साफ न होती, कभी खट्टी डकारें आतीं। यह बड़ा पेचीदा सवाल है। अनेक डॉक्टर तम्बाकू को पेट की खराबी पैदा करने वाला बताते हैं, उसे छोड़ने से यह बात क्यों पैदा होनी चाहिए? यदि डाक्टरों का कथन सही है तो तम्बाकू छोड़ते ही पाचन शक्ति में उन्नति होनी चाहिए? फिर यह गड़बड़ी क्यों?
विचार करने और खोज करने पर पता चला कि- हम लोग मसाले और मिठाई का संयोग करके आवश्यकता से अधिक मात्रा में भोजन कर जाते हैं और फिर तम्बाकू की उत्तेजना से पेट में स्वाभाविक शक्ति के अनुसार भोजन हजम कराना है, तो उतनी ही मात्रा में खाना चाहिए, जितनी कि वास्तव में जरूरत है। वास्तविक जरूरत की पहचान यह है, कि भूख के अनुसार बिना मिर्च-मसालों का भोजन भी स्वादिष्ट लगता है। आवश्यकता से अधिक खाना हो तो चटपटापन, मिठाई आदि का उसमें समावेश करना होता। मैं इस गुप्त भेद को समझ गया और नमक, मिर्च, मिठाई आदि स्वादिष्ट मिलावटें छोड़कर सादा-सात्विक, हल्का और ताजा भोजन करने लगा। वजन की दृष्टि से प्रायः एक तिहाई भोजन अपने आप कम हो गया। पहले छः रोटी खाता था और बिना नमक का साग खाने पर चार रोटी से ही काम चल जाता। यही पेट की वास्तविक आवश्यकता थी। इतनी मात्रा आसानी से हजम होने लगी और पाचन क्रिया में धीरे धीरे उन्नति होने लगी। तम्बाकू छोड़ने से पेट के जो द्रव उठते थे, वे शान्त हो गये। करीब एक डेढ़ माह बाद जब पाचन क्रिया ठीक हो गई तो मैंने फिर नमक आदि खाना प्रारम्भ कर दिया।
पाठकों से मेरी प्रार्थना है कि वे यदि तम्बाकू पीते हों तो इस धन-धर्म नाशक आदत को छोड़ दें। यह कुछ कठिन नहीं है। मजबूत मन से दृढ़ निश्चय कर लेने पर इसे छोड़ देना सहज है। एक डेढ़ माह के लिये नमक मसाले और मिठाई छोड़ देने पर पेट फूलने आदि की शिकायतें मिट जाती हैं। मुझे अपने अनुभव के आधार पर विश्वास है कि जो सज्जन इस बुरी लत से छुटकारा पाने का संकल्प करेंगे, वे आसानी से कृतकार्य हो जावेंगे।
जिन लोगों को उदासीनता, चिन्ता और निराशा घेरे हुए हैं, किसी काम पर मन नहीं लगता, मन टूटता रहता है, उनके लिए निम्न अभ्यास बहुत उपयोगी होगा।
सूर्य अस्त के पश्चात् या सूर्य उदय के पूर्व किसी स्वच्छ और हवादार कोठरी में अकेले प्रवेश करो और आत्मचिन्तन और ईश्वर उपासना के लिए एक घन्टा उसी में बने रहो। बाहर का एक भी विचार इस समय मन में नहीं आना चाहिए। शरीर को ढीला करके किसी मुलायम बिछौने या आराम कुर्सी पर शान्तिपूर्वक बैठ जाओ। नेत्र बन्द करके अपने अन्तर हृदय का ही ध्यान करो, बाहरी बातों को इस समय बिल्कुल भुला देना चाहिए। शरीर और मन को स्थिर करके मन ही मन परमात्मा से प्रार्थना करो कि ‘हे प्रभो! मुझे ऐसी दिव्यदृष्टि प्रदान कीजिए जिससे मैं सर्वत्र आपके सत् चित् आनन्द स्वरूप का दर्शन कर सकूँ। आप विश्व में निरन्तर आनन्द और प्रसन्नता की वर्षा करते हैं। मुझे ऐसी योग्यता दीजिए कि उस सर्वव्यापी आनन्द रस का सदैव पान करता रहूँ।”
इस मन्त्र को धीरे-धीरे दस बीस बार मन में दोहराइये और हर एक शब्द पर अच्छी तरह से गौर करते जाओ। इसके उपरान्त कुछ देर के लिए बिल्कुल शान्त हो जाओ और भावना करो कि तुम्हारे अन्दर शान्ति, प्रसन्नता और प्रफुल्लता का समुद्र उमड़ रहा है और तुम उसमें प्रेमपूर्वक स्नान कर रहे हो। इस ध्यान में जब तक मन लगे तब तक करते रहो। कभी-कभी इस ध्यान से निद्रा सी आने लगती है। प्रेम और प्रसन्नता के पुनीत जल से समस्त विश्व को भरा हुआ देखने और उसी अमृत रस को खींचकर अपने में धारण करने की मानसिक साधना ऐसी है, जिसमें तत्क्षण आनन्द का प्रादुर्भाव होता है। ध्यान से उठने पर शान्ति मिलती है, चिंताएं चली जाती हैं और चेहरे पर प्रसन्नता की किरणें प्रस्फुटित होने लगती हैं।
प्रातःकाल के अभ्यास के अन्तिम भाग में जब प्रकाश फैल गया हो, एक बड़े से दर्पण के सम्मुख खड़े होकर अपना मुख उसमें देखिए। लगातार दस मिनट तक मौन भाव से अपनी छाया को विश्वास और सम्मान के साथ देखते रहिए। तदुपरान्त इस मन्त्र को धीरे-धीरे, हलके किन्तु विश्वसनीय शब्दों में कहिए। मानो तुम अपनी दर्पण वाली छाया से इन शब्दों को सुनिश्चित रूप से कह रहे हो। -”मैं तुम्हारी आत्मशक्ति के ऊपर, तुम्हारे ऊपर, पूर्ण विश्वास करता हूँ। तुम योग्य और कुशल हो। तुम्हारी शक्ति संपूर्ण परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर सकती है। तुम शांतिस्वरूप, प्रसन्नमुख और स्थिरचित्त हो। मैं देखता हूँ कि तुम्हारे चेहरे में प्रसन्नता की किरणें अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट होती आ रही हैं।”
इन शब्दों को तोते की तरह नहीं रटना चाहिए, वरन् आन्तरिक विश्वास के साथ अपनी छाया को समालोचना की तरह कहना चाहिए। कुछ देर इसी प्रकार उपरोक्त मन्त्र का पाठ करो। पीछे नेत्र बन्द करके अपने मानस लोक में दर्पण वाली छाया को देखे और भावना करो कि तुम्हारी छाया प्रसन्न शान्त और आनन्द स्वरूप है। चेहरे पर प्रफुल्लित का तेज विद्यमान है।
उपरोक्त अभ्यास से सचमुच प्रसन्नता का आविर्भाव होता है। उदासी, निराशा और मानसिक अवसाद इससे दूर होकर चित्त में दृढ़ता एवं उत्साह का संचार होता है। प्रसन्नता प्राप्त करने के इच्छुक इस साधना को कुछ दिन नियमपूर्वक करके देखें तो उन्हें संतोषजनक लाभ प्राप्त हो सकता है।
(ले. श्री त्रिलोकीनाथ मित्तल, मथुरा)
मानव, मानवता के प्रथम प्रहर से जीवन की अन्तिम घड़ियों तक एक बन्धन में उलझा हुआ है। वह उस उलझन में उलझा हुआ है, जिसमें इस नश्वर संसार के प्रत्येक जीवात्मा को उलझना होगा। यह उलझन केवल जीवात्मा तक ही परिमित नहीं, वरन् इसमें समस्त ब्रह्माण्ड भी स्वयं उलझा हुआ है। यह उलझन संयम ही है।
मानव जीवन में संयम पद-पद पर प्रतिध्वनित होता है, जीवन के प्रत्येक पहलू में संयम ही का महान् साम्राज्य है, वास्तविक जीवन स्वयं संयम से ओत-प्रोत है। जीवन के वास्तविक रूप में संयम की उपेक्षा न की जा सकेगी, इसे तो अपने जीवन का साथी बनाना ही पड़ेगा। नेत्रों के तारे के समान इसकी रक्षा करनी ही होगी।
जब हम जीवन की विवेचना करने बैठते हैं, तो आभास होता है कि वास्तविक जीवन स्वयं ही संयम के अंतर्गत है। ‘शोहदों’ का जीवन वास्तविक जीवन न कहा जा सकेगा। उनमें अभिलाषा का आश्वासन, संज्ञा-विहीन की चेतना, म्लान मानस का सम्मोहन मंत्र एवं संजीवनी सुधा का वरदान नहीं, उनमें जीवन का अलौकिक आदर्श नहीं, जीवन के जलनिधि में उन्होंने कितने ही चंचल चित्र बनाये और बिगाड़े होंगे। जीवन एक गम्भीर रहस्य है। वह सुललित, मृदुस्पर्शी, उत्फुल्लपाटल प्रसूनशैया नहीं, वह कम्पित मलयसागर की क्षणिक लहरें नहीं, सुतराम जीवन मनुष्यत्व एवं आदर्श की प्रदर्शिनी है।
इस नश्वर संसार का अणु-अणु द्विगुणित ध्वनि प्रतिध्वनित करता है कि इस संसार की प्रत्येक वस्तु संयमांतर्गत है। संयम की किंचित भी उपेक्षा कर किसी वस्तु की यथास्थान सहायता न की जा सकेगी। स्वयं पृथ्वी अपनी सत्य रेखाओं पर - जो संयम ही का रूप है, अवलम्बित है। अपने नियत स्थान से हट पृथ्वी संसार के ह्रास का कारण होगी, संसार की प्रत्येक वस्तु से उसका सम्बन्ध सदैव के लिये हट जाएगा। इसी प्रकार मानव जीवन में संयम की किंचित भी उपेक्षा कर मानव अपने जीवन के ह्रास का करण स्वयं ही बनेगा। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि संयम ही जीवन का आधार है। संयम के पालन हेतु हमें धर्म का आश्रय लेना होगा, जीवन को सुखी बनाने के लिये हमें धर्मबद्ध होना ही पड़ेगा, जीवन को सुख-शान्ति का गृह बनाने के लिये धर्म के स्तम्भों को पकड़-पकड़ कर चलना होगा। वे स्तम्भ हैं- धैर्य, सत्य, विद्या, अक्रोध, दम, अस्तेय, शौच, इंद्रिय-निग्रह, धृति एवं क्षमा। ये सभी धर्म अथवा संयम के प्रधान लक्षण हैं, पुनरपि इनमें से मुख्य दम, अस्तेय, इंद्रिय-निग्रह संयम के प्रधान कारण हैं। इनका त्याग संयम का त्याग होगा तथा इनका पालन ही संयम का पालन होगा। ये सब ही संयम के प्राण हैं तथा इनका ही पालनकर्ता वास्तविक संयमी कहलायेगा।
दुर्बलता और असावधानी से सत्य का अनुसरण करने वाला और दृढ़ता एवं सचेतता से असतय के अनुयायी किसी प्रकार संबन्ध नहीं रखता।
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वीर हृदय की दृढ़ इच्छा सहस्रों का शिर नवा देती है। एक दृढ़प्रतिज्ञ दुर्बल व्यक्ति युद्ध का फल बदल सकता है और वह भागते हुए भीमाकार मनुष्यों को लौटाकर फिर लड़ने को उद्यत कर देता है।
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हमारे जीवन का उद्देश्य केवल इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाना है। दृढ़ मनुष्य के लिये सर्वदा ही सुअवसर और सुभीता है।
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दृढ़ प्रतिज्ञ और सत्य प्रकृति पर ही संसार चक्र चलता है।
(मास्टर हरिदेव प्रसाद जी मधुवनी)
पाठक महानुभाव! अपने आपको अधम, नीच, पीड़ित, पापी या अभागा कहने का आपको कोई अधिकार नहीं है। आप तो अनन्त हैं। सर्व शक्तिमान हैं।
देखिये, एक दिव्य आत्मा ने ईश्वर से क्या ही अच्छा प्रश्न पूछा और जवाब भी बिल्कुल सही-सही पाया।
गुफ्तम चरा बेगानए? गुफ्ता कि तू दीवानये।
मन कीस्तम तू कीस्ती, दर खुद चरा भी नंगरी॥1॥
तू अष्वली ओ आखिरी, तू बातनी ओ जाहिरी।
तू कासिदी ओ मक्रसदी, तू नाजिरी ओ मंजरी॥2॥
अर्थ:- (1) -मैंने कहा- तू बेगाना (अन्य) क्यों बन गया? उसने उत्तर दिया- तू पागल हो गया है। मैं कौन हूँ, तू कौन है, यह अपने भीतर क्यों नहीं देखता है?
(2) तू ही आदि है, तू ही अन्त है। तू ही बाहर है, तू ही भीतर है। तू ही उपदेशक है, तू ही उपदेश है और तू ही देखने वाला और दर्शन योग्य है।
एक भक्त ने ईश्वर से उनका दर्शन करने के लिये अर्ज़ किया। इस पर खुदा ने क्या ही अच्छा कहा-
गुफ्तमश ख्वाहम कि बीनम मर तुरा ऐ नाजनी।
गुफ्त गर ख्वाही मरा बीनी, बरो खुद राब वी॥
अर्थ:- मैंने उस (यार) को कहा कि ऐ प्यारे! तुझको देखना चाहता हूँ। उसने उत्तर दिया कि यदि तू मेरे देखने की कामना रखता है, तो जा अपने आप को देख (जो तेरा वास्तविक स्वरूप है, वही मैं हूँ।)
और भी सुनिये। एक भक्त ईश्वर को तलाशने के बाद क्या कहते है:-
ऐ कि उमरे-दूरपये ओ मेदवीदम सू बसू।
नागहाँनिश याफ्तम् बादिल निशस्ता रूबरु॥
अर्थात्- मैं जो समस्त आयु उसके पीछे हर ओर दौड़ता फिरता था, मैंने एकाएक उसको हृदय में सम्मुख बैठा हुआ पाया।
इतना ही नहीं, और भी:-
बेहूदह चरा दरपये ओ मेगरदी,
विनशी अगर वो खुदास्त खुद में शायद।
भावार्थ:- उस (ईश्वर) के लिये तू व्यर्थ क्यों घूमता फिरता है। बैठ, (अपने को पहचान) अगर वह खुदा है, तो खुद आयेगा।
अन्त में मैं एक पहुँचे हुए फकीर का शेर लिख रहा हूँ। आपको मालूम हो जावेगा कि वस्तुतः हम हाड़ माँस के पुतले हैं, या अनन्त शक्ति के भण्डार।
अय आँ कि तू खुदा रा जोई हरजा।
चे तू खुदा नई? खुदाई ब खुदा।
अर्थ:-अय मनुष्य! तू हर स्थान पर ईश्वर को ढूँढ़ता है, क्या तू स्वयं ईश्वर नहीं है? ईश्वर की सौगन्ध, तू ही ईश्वर है।
शोक संवेदना
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रतिष्ठित सदस्य अजमेर निवासी श्री मंगलचन्द जी भण्डारी के छोटे भाई श्री सोहन राज जी भण्डारी का, एवं वाय (जयपुर) के प्रधानाध्यापक श्री जगन्नाथ प्रसाद शर्मा के सुपुत्र श्री सुरेन्द्र कुमार जी का स्वर्गवास हो गया। उपरोक्त दोनों बन्धुओं एवं उनके परिवार के दुख से हम अपनी संवेदना प्रकट करते हुए, दिवंगत आत्माओं की सद्गति के लिये ईश्वर से प्रार्थना करते हैं।
-सम्पादक।
बहुत से लोग योग की आध्यात्मिक साधनाओं द्वारा दिव्य शक्तियाँ प्राप्त करना चाहते हैं, पर उनमें से अधिकाँश को सफलता नहीं मिलती। कारण यह है कि वे सूक्ष्म कारण और लिंग शरीरों द्वारा उतना काम लेना चाहते हैं, जितना कि वे करने में असमर्थ होते हैं, जिस प्रकार भारी बोझा उठाने के लिये मजबूत शरीर चाहिए, उसी प्रकार गहन आत्मिक क्रियाओं को करने के लिये स्वस्थ शरीर की आवश्यकता है।
यह बात धर्म शास्त्रों द्वारा ही नहीं, विज्ञान द्वारा भी सिद्ध हो चुकी है कि स्थूल शरीर की भाँति मनुष्य के सूक्ष्म शरीर भी होते हैं और वे उसी तरह निर्बल, बलवान, स्वस्थ, रोगी, पूर्ण, अपूर्ण भी होते हैं, जैसे कि हमारा प्रत्यक्ष शरीर होगा। कई बार कोई बीमारी इन सूक्ष्म शरीरों तक पहुँच जाती है, तब उसका इलाज बहुत कठिन हो जाता है, क्योंकि दवा-दारु बाह्य शरीर तक ही अपना प्रभाव पहुँचाती है।
जिनका स्थूल शरीर निर्बल या रोगी है, उनके सूक्ष्म शरीर भी वैसे ही अपूर्ण बन जाते हैं। यदि मानसिक दुर्गुणों की भरमार हो तो देह के स्वस्थ होते हुए भी अन्तः शरीर विकार ग्रस्त हो जाते हैं। आध्यात्मिक साधनाओं में स्थूल शरीर को उतना परिश्रम नहीं करना पड़ता, जितना कि भीतरी शरीरों को। जब वे निर्बल-दुर्बल या जीर्ण-शीर्ण होते हैं तो अपने दैनिक कर्तव्यों को भी ठीक तरह पालन नहीं कर पाते, फिर योग साधना जैसे कठिन व्यायामों का करना तो उनके लिये दुरूह होता है। अभ्यासी प्रयत्न तो करता है, लेकिन जैसे एक छोटा बालक भारी पत्थर को नहीं उठा पाता, उसी प्रकार वह भी उस साधना को पूरा नहीं कर पाता और अपने मान सम्मान एवं निर्दोष बनने के लिये अभ्यास प्रणाली अथवा उस महा विज्ञान में दोष लगाता है।
इस प्रकार अधूरे विधान से काम न चलेगा। योग साधना जैसे महत्वपूर्ण विधान में पारंगत होने से पहले हमें उसके मूल आधार को सुदृढ़ करना होगा। महर्षि पतंजलि ने आरम्भ में यम नियमों का विधान किया है, जिसका तात्पर्य है, सबसे पहले शरीर और मन को स्वस्थ बनाना चाहिए, तदुपरान्त आसन प्राणायाम आदि के लिए आगे बढ़ना चाहिए।
देखने में आता है कि निर्बल और रोगग्रस्त लोग भी चुटकी बजाने जितनी देर में अपने को योगी बना लेना चाहते हैं, जब कृतकार्य नहीं होते तो अविश्वास करने लगते हैं, या दंभ पर उतारू हो जाते हैं, इन दोनों का ही परिणाम घातक होता है। इसलिये आवश्यक है कि हम सबसे पहले प्राकृतिक नियमों का पालन करके शरीर को स्वस्थ बनावें। आहार-विहार ठीक रखें, स्वस्थ वायु में भ्रमण करें और नियमपूर्वक व्यायाम करें। व्यायाम करने से न केवल हमारी माँसपेशियाँ मजबूत होती हैं, वरन् सूक्ष्म शरीरों में भी बल आता है। जब बाह्य शरीर बलवान होता है, तो आन्तरिक सत्ताएं भी निर्बल नहीं रहतीं। उसी दशा में योग साधना का सफल होना भी सम्भव है।
जो आत्मा की उत्पत्ति चाहते हैं वे पहले शरीर को उन्नत बनावें। जो स्वर्ग में धर्म की सम्पत्ति जमा करना चाहते हैं, वे शरीर में ब्रह्मचर्य की पूँजी जमा करें। जिन्हें सुख और शान्ति प्राप्त करने की इच्छा है, वे मन में से कुविचारों के पिशाचों को निकाल बाहर करें। इस प्रकार जब शरीर और मन स्वस्थ और बलवान बनने लगेगा, तो सूक्ष्म शरीरों की शक्ति प्रस्फुटित होगी और योग साधना में सफल होना कठिन न रहेगा।
हमें छलाँग मार कर नहीं सीढ़ी-सीढ़ी ऊपर चढ़ना चाहिए। योग की आध्यात्मिक साधना से पहले आवश्यक है कि अपने शरीर को स्वस्थ और बलवान बनावें।
सतयुग आन्दोलन का आरम्भ करने के लिये हम अखण्ड-ज्योति के पाठकों को आज विशेष रूप से आमंत्रित करते हैं। यह सूर्य की तरह स्पष्ट है कि भविष्य में शुभ समय आने वाला है। वह वर्तमान की बुराइयों का शोधन करके बुराई को हटा कर भलाई की नई व्यवस्था स्थापित करेगा। यह आने वाला समय किसी के रोके न रुकेगा। हमें प्रभु की उस महान इच्छा को पूरी होने देने के लिये अपना हिस्सा पूरा करना चाहिए। यदि रामचन्द्रजी को विश्वामित्र ऋषि शिक्षा न देते तो भी वे विद्वान हो जाते, पर उन्होंने अवसर को पहचाना और अपना भाग पूरा करके अपना जीवन सफल बना लिया। हनुमान, सुग्रीव, जामवन्त आदि की सहायता न मिलती तो भी रावण का नाश होकर राम-राज्य स्थापित होता ही, पर वे लोग अपना जीवन धन्य करने से वंचित रह जाते। भगवान कृष्ण के साथ ग्वाल-बालों का यश गान और कथा वर्णन होता है। यदि वे सहयोग देने में उपेक्षा करते तो भगवान का कार्य पूरा होता ही पर वे ही बेचारे अभागे रह जाते। गंगा जी आनी थी आई, पर भगीरथ का नाम अमर हो गया। जब तक भगवती भागीरथी रहेंगी तब तक भगीरथ भी रहेंगे।
अखण्ड-ज्योति के पाठक महानुभावों से हमारी यह गम्भीर प्रार्थना है कि वे सत्यनारायण के अवतार पर विश्वास करें। भविष्य में पाप घटेंगे और उनका स्थान पुण्य लेगा, यह बिल्कुल निश्चित है। मनुष्य सुस्थिर और विवेकपूर्ण जीवन व्यतीत करने को एक अदृश्य सत्ता द्वारा बाध्य किये जायेंगे। वर्तमान समय में जो भयंकर घनघोर घटाएं गरजती फिर रही हैं, वे जलते हुये ग्रीष्म को हरियाली वर्षा ऋतु में बदलने के लिए आयी है। इस समय डरने घबराने या आलस्य प्रमाद में व्यतीत न करना चाहिए, वरन् अवसर को पहचानते हुए भगवान सत्यनारायण के अवतार काल में अपने को धन्य बनाने के लिये प्रयत्न करना चाहिए। ‘सत्य’ आन्दोलन के सम्बन्ध में एक योजना पाठकों के सामने रखी जाती है।
सार्वदेशिक प्रचार करने के लिये एक बहुत ही प्राचीन और महत्वपूर्ण विधि यह है कि “एक व्यक्ति अपनी बात पाँच आदमियों से कहें। जिनमें कही जाए, वे भी उसी प्रकार अन्य पाँच आदमियों से कहें, फिर उनमें से हर एक पाँच-पाँच से कहें। बात कहते समय सुनने वाले को यह भी चेतावनी दे देनी चाहिए कि वह इस प्रचार चेन को तोड़ न दें, वरन् दूसरों से कहने व चेतावनी देने का क्रम जारी रखें।” इस समय सब से बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि आगामी शुभ समय की सूचना और उसके लिये क्या तैयारी करनी चाहिए, इस बात का सन्देश घर-घर में पहुँचा दिया जाए। यह कार्य इस प्रकार हो सकता है कि पढ़े लिखे लोग कागज के छोटे-छोटे पाँच टुकड़े लें और उन पर एक ओर चेतावनी और दूसरी ओर सन्देश लिखकर पढ़े-लिखे लोगों को दें और जो लें, उनमें से हर एक उसी प्रकार के पाँच पाँच पर्चे दूसरों को बाँटे। इस अमर बेल को बढ़ाने और दूर-दूर तक शीघ्रता पूर्वक फैलाने के लिए विशेष रूप से प्रयास करना आवश्यक है, पर्चे की एक तरफ इस प्रकार निवेदन लिखा हुआ होनी चाहिए-
सार्वदेशिक प्रचार करने के लिये एक बहुत ही प्राचीन और महत्वपूर्ण विधि यह है कि “एक व्यक्ति अपनी बात पाँच आदमियों से कहें। जिनमें कही जाए, वे भी उसी प्रकार अन्य पाँच आदमियों से कहें, फिर उनमें से हर एक पाँच-पाँच से कहें। बात कहते समय सुनने वाले को यह भी चेतावनी दे देनी चाहिए कि वह इस प्रचार चेन को तोड़ न दें, वरन् दूसरों से कहने व चेतावनी देने का क्रम जारी रखें।” इस समय सब से बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि आगामी शुभ समय की सूचना और उसके लिये क्या तैयारी करनी चाहिए, इस बात का सन्देश घर-घर में पहुँचा दिया जाए। यह कार्य इस प्रकार हो सकता है कि पढ़े लिखे लोग कागज के छोटे-छोटे पाँच टुकड़े लें और उन पर एक ओर चेतावनी और दूसरी ओर सन्देश लिखकर पढ़े-लिखे लोगों को दें और जो लें, उनमें से हर एक उसी प्रकार के पाँच पाँच पर्चे दूसरों को बाँटे। इस अमर बेल को बढ़ाने और दूर-दूर तक शीघ्रता पूर्वक फैलाने के लिए विशेष रूप से प्रयास करना आवश्यक है, पर्चे की एक तरफ इस प्रकार निवेदन लिखा हुआ होनी चाहिए-
निवेदन
इस की पीठ पर लिए हुए संदेश को पढ़िये, मनन कीजिए और उसके अनुसार आचरण कीजिए। तथा इसी प्रकार के दूसरे पाँच पर्चे लिखकर अन्य सज्जनों को दीजिए, ताकि वे भी आपकी ही तरह पाँच-पाँच लिखकर औरों को दें, सत्य-सन्देश की इस अमर बेल को फैलाने से आपको अमर फल मिलेगा। और इस अमर बेल को तोड़ देने से पाप के भागी होंगे।
इस की पीठ पर लिए हुए संदेश को पढ़िये, मनन कीजिए और उसके अनुसार आचरण कीजिए। तथा इसी प्रकार के दूसरे पाँच पर्चे लिखकर अन्य सज्जनों को दीजिए, ताकि वे भी आपकी ही तरह पाँच-पाँच लिखकर औरों को दें, सत्य-सन्देश की इस अमर बेल को फैलाने से आपको अमर फल मिलेगा। और इस अमर बेल को तोड़ देने से पाप के भागी होंगे।
पर्चे की दूसरी तरफ इस प्रकार का सत्य सन्देश लिखा हुआ होना चाहिए।
सत्य-सन्देश
बहुत शीघ्र सतयुग आने वाला है और भगवान सत्य नारायण अवतार लेंगे। इसलिए तीन काम आज से ही आरम्भ कर दीजिए।
1. सत्य को शोध कीजिए।
2. प्रेम का प्रसार कीजिए।
3. न्याय को स्वीकार कीजिए।
3. न्याय को स्वीकार कीजिए।
कागज की महंगाई के जमाने में बहुत बड़े पर्चे लिखने की जरूरत नहीं है। जितने स्थान में यह छपे हैं, उतने में ही या उससे कुछ अधिक बड़े कागज पर लिखना पर्याप्त है। कागज कुछ मजबूत हो तो अच्छा है, जिससे वह जल्दी ही खराब न हो जाए। पाँच की संख्या तो कम से कम और साधारण लोगों के लिए है। उत्साही और प्रेमी सज्जन पचास सौ या जितनी अधिक संख्या में वे फैला सके फैलावें। केवल लिखकर बाँट देना ही पर्याप्त नहीं है। इस सम्बन्ध में अच्छी तरह समझाना भी चाहिए और इस अमरबेल का पुण्य एवं महत्व सविस्तार बताना चाहिए। जो व्यक्ति पढ़े-लिखे नहीं हैं वे इस कार्य को वाणी द्वारा कर सकते हैं। जिन स्थानों में पाँच धार्मिक व्यक्तियों का संगठन हो सके, वहाँ सतयुग सभा बना लेनी चाहिए। एक इनका प्रमुख हो और अन्य सदस्य हों। मन्त्री आदि बहुत से पदाधिकारी चुनने की जरूरत नहीं है क्योंकि बहुत अधिकारी बनाने पर मनमुटाव, ईर्ष्या और नाना प्रकार के उपद्रव होने की आशंका रहती है। एक विचार के व्यक्तियों के एक संगठन में चाहे कितने ही थोड़े व्यक्ति क्यों न हों, पर वही संगठन अन्ततः बड़ा भारी, मजबूत और कामयाब प्रमाणित होता है, इसलिए सतयुग सभा का वह संगठन होना चाहिए। जहाँ चार-पाँच भी उत्साही सत्य प्रेमी हों उन सभाओं की स्थापना की सूचना अखण्ड-ज्योति में प्रकाशनार्थ भेज देनी चाहिए और उन्हें अखण्ड-ज्योति से सम्बन्धित कर लेना चाहिए। इन सभाओं के द्वारा अमरबेल का प्रचार किया जा सकता है, परन्तु एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह पर्चे छपाकर बाँटने से उद्देश्य की पूर्ति न होगी। लिखकर बाँटने में जो श्रम होता है, उसमें लिखने वाले के संस्कार दृढ़ होते हैं और लिखने में उसकी भावनाएं पर्चे में लिपट कर जाती हैं। जो दूसरे पर अधिक प्रभाव डालता है। सभाएं या विशेष रूप से प्रचार करने वाले महानुभाव अमरबेल योजना को छपाकर प्रचारित कर सकते हैं, पर आगे अन्य व्यक्तियों में व जनता में यह लिखकर ही प्रसारित होनी चाहिए।
सत्य के सन्देश जो अमरबेल में प्रचारित किये गये हैं, उनको कार्य-रूप में लाने के लिए इस प्रकार का कार्यक्रम अपनाना चाहिए।
सत्य की शोध करने के लिए- (1) नित्य कोई समय निकालकर आत्म चिन्तन (2) ईश्वर प्रार्थना (3) ‘मैं क्या हूँ’ पुस्तक में बताई हुई विधि से अखण्ड आत्मा, अखण्ड जीवन, अखण्ड जगत का ध्यान। मृत्यु से निर्भय रहते हुए तृष्णा वासनाओं को त्याग कर जीवनोद्देश्य को पूरा करने की दृष्टि से हर एक काम को करने की भावना जागृत करना।
प्रेम का प्रसार करने के लिये - (1) नित्य देने की आदत डालना (चाहे चींटियों को आटा, पक्षियों को पानी पिलाना जैसा छोटा काम ही क्यों न हो)। (2) दूसरों को अपने समान समझते हुए उनका दुख घटाने और सुख बढ़ाने के लिये प्रयत्न करना। अपना स्वार्थ छोड़कर दूसरों को लाभ पहुँचाना, इस दृष्टि से निस्वार्थ भाव से दूसरों के कोई काम अवश्य करना। (चाहे अमरबेल का प्रचार जैसा छोटा काम ही क्यों न हो)। (3) निरन्त शुभ संकल्पों का प्रसार करना, खुद अच्छे आचरण करना। जिससे भी बात करने का मौका मिले, उसी को कल्याणकारी शिक्षा, सलाह नम्र शब्दों में देना, दिन में कम से कम पाँच व्यक्तियों को सदुपदेश देने का नियम बना लेना, दीवारों पर शिक्षाप्रद वाक्य लिखना।
न्याय को स्वीकार करने के लिए-
(1) नित्य व्यायाम करना, कमर सीधी और निगाह ऊँची रखना, ‘स्वस्थ और सुन्दर बनने की विद्या’ पुस्तक के अनुसार निरोग बनना बनाना, हाथ में लाठी रखना। (2) दूसरों का आदर करना, किसी को तू कहकर न पुकारने की आदत डालना, गाली देना छोड़ना छुड़वाना, नीच, पापी और दुष्टों से घृणा न करके बीमार की तरह उनकी बुराई की चिकित्सा करना, किसी का हक कदापि न छीनना, न अपना छीनने देना। (3) दुष्टता और पाप के विरुद्ध धर्मयुद्ध करना। किसी व्यक्ति या समाज की अनुचित आज्ञाओं के सामने चाहे वह कितने ही बलवान द्वारा दी गई हों, सिर न झुकाना। उसका प्रतिकार करना कम से कम विरोध और असहयोग तो जारी ही रखना। सामाजिक कुरीतियों का मनसा, वाचा, कर्मणा, जैसे भी सम्भव हो, प्रतिरोध करना और उसके लिये जो कष्ट सहना पड़े, उसे तप रूप में सहर्ष स्वीकार करना, (चाहे वह शारीरिक विकारों को दूर करने के लिये उपवास जैसे छोटे काम से ही आरम्भ क्यों न किए जाएं)। सत् प्रेमी महानुभावों और सतयुग सभाओं को वह कार्य छोटा नहीं समझना चाहिए। देखने में यह कार्य मामूली प्रतीत होते हैं, लोगों की दृष्टि में यह तुच्छ प्रतीत होंगे, परन्तु तत्वतः ‘इनमें ऐसे-ऐसे रहस्य छिपे हुए जो बड़े-बड़े महान कार्यों के बीज हैं। इन छोटे से बीजों में से ‘बरगद के बड़े-बड़े शाखा प्रशाखाओं वाले वृक्ष उत्पन्न होकर अपनी छाया में अनेक प्राणियों को स्थान देंगे। इन कार्यों को छोटे न समझकर वर्तमान समय की सब से बड़ी आवश्यकताओं को पूरा करने वाला अनुभव करना चाहिए और इन कार्यों की पूर्ति में अविलम्ब जुट जाना चाहिए। इस छोटी से योजना के अंतर्गत परकल्याण का बहुत बहुत बड़ा मर्म है। पाठकों को उसे समझकर अविलम्ब इस ओर अग्रसर होना चाहिए।
(ले. - स्वामी रामतीर्थ)
ये लोक देखने मात्र है। अपनी स्वप्नावस्था में तुम एक भेड़िया देखते हो और डरते हो कि भेड़िया तुम्हें खा जायेगा। तुम डर जाते हो, किन्तु जिसे तुम देखते हो, वह भेड़िया नहीं है, वह तुम खुद हो। अतः वेदान्त तुम्हें बतलाता है कि जागृत अवस्था में भी मित्र या शत्रु तुम ही हो। तुम्हीं सूर्य हो और तुम्हीं वह सरोवर हो, जिसमें सूर्य प्रतिबिम्बित होता है। तुम्हीं दीपक और पतंगा हो। तुम्हारा जो घोर से घोर शत्रु है, वह शत्रु तुम हो, दूसरा कोई नहीं। ॐ उच्चारण करते समय उस दर्जे तक तुम्हें अपने चित्त को, इस तथ्य का अनुभव कराना होगा कि सम्पूर्ण द्वेष और कुभाव चित्त से समूल उखड़ जाये, बुद्धि से निकाल दिये जाये। पृथकता के इस विचार को साफ कर दो। मित्र या शत्रु का रूप और मूर्ति कोरा स्वप्न है। तुम्हीं मित्र हो और तुम्हीं शत्रु हो। कल तुमने जो बातें की थीं, क्या आज तुम्हारे साथ हैं? क्या वे स्वप्न नहीं हैं? वे चली गईं। कल की वस्तुएं कहाँ हैं? क्या वे चली नहीं गईं? इसी अर्थ में जाग्रत अवस्था का अनुभव भी स्वप्न है, स्वप्नावस्था का अनुभव स्वप्न है। असली खरी नगदी कठोर तत्व तो वास्तविक आत्मा के पीछे आधारभूत है, यह अनुभव करो।
केवल चिकित्सा-चन्द्रोदय सात भाग से
आयुर्वेद-आचार्य परीक्षा की और स्वर्ण-पदक प्राप्त किया।
एकलव्य और गुरु द्रोणाचार्य का उदाहरण।
श्रीमन् महोदय श्री 107 पूज्य वैद्य राज जी, साष्टाँग दण्डवत्!
“मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि मैं आपका शिष्य होऊँ तथा श्रीमान् के आयुर्वेदिक ज्ञान से अपने को कृत्कृत्य करूं। मैं हृदय से सदैव आपको ही अपना गुरु मानता हूँ कारण सन 1922 से मैं आयुर्वेदिक का अभ्यास कर रहा हूँ। और इसका श्रीगणेश श्रीमान् की लिखी पुस्तक चिकित्सा-चन्द्रोदय के द्वितीय संस्करण से आरम्भ होता है और उसी की सहायता से अखिल भारतवर्षीय विद्वत् सम्मेलन से स्वर्ण-पदक परीक्षा में बैठ कर 80 विद्यार्थियों के साथ आयुर्वेदाचार्य की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की है तथा पूर्ण सफलता से काम कर रहा हूँ। उपरोक्त परीक्षा में समस्त परचे चरक, सुश्रुत, बाणभट्ट, शारंगधर, माधव निदान चक्रदत्त, रस रत्न समुच्चय इत्यादि में से बनाये गये थे। प्रथम परचे जब सामने आये और उक्त पुस्तकों के नाम देखे तो हृदय सशंकित हुआ कि मैंने यह पुस्तकें देखी तो हैं नहीं, फिर किस प्रकार उत्तर दूँगा, किन्तु जब प्रश्नों को समझा तो वही विषय था, जो नित्य आपकी पुस्तकों में देख करता था। अतएव भगवान् का ध्यान करके लिखने लगा तो हरि इच्छा से 80 विद्यार्थियों में सर्वप्रथम आकर स्वर्ण-पदक ससम्मान प्राप्त किया।
इस प्रभु के चमत्कार को देखकर स्वयं परीक्षकगण कहते थे कि, आपकी तरफ से यह आशा न थी। कारण साथियों में से अधिकाँश उन्हीं संस्कृत पुस्तकों को सैकड़ों बार पढ़ कर परीक्षा में सम्मिलित हुए थे, किन्तु उन महान ग्रन्थों में जो गूढ़ विषय है, उनको न समझने के कारण उन्हें असफल होना पड़ा। स्वयं परीक्षक श्री शास्त्री विद्वासागर, काव्यतीर्थ, साहित्याचार्य महामहोपाध्याय, विश्वविद्यालय दक्षिण हैदराबाद प्रोफेसर हरिहर द्विवेदी जी ने स्वर्ण पदक प्रदान करते समय यह कहा कि, हल नहीं जानते थे कि संस्कृतज्ञों के मध्य में एक हिन्दी जानने वाला इस पदक का भागी होगा, अतः यह सब सम्मान भगवन् आप ही का है। अब अन्तिम इच्छा यही है कि जो ऊपर प्रगट कर चुका हूँ। दया कर स्वीकार कीजिये। आज्ञा पाते ही दास सेवा, को उपस्थित होगा, तथा जो आयुर्वेद के गूढ़ विषय मेरी बुद्धि से परे हैं, उनकी व्याख्या गुरु-मुख से सुन अपने को कृतार्थ करूंगा, तथा गुरु-भार से उऋण हो अपने कर्तव्य का पालन करूंगा। वह एकलव्य और द्रोणाचार्य का उदाहरण है।”
आज्ञाकारी-
हरिदास एण्ड कम्पनी आयुर्वेदाचार्य कुँ. मुहताबसिंह शास्त्रि
गलो रावलिया, मथुरा। Kr. Mahtab Singh Shastri
रियासत चंदावारा, पोस्ट जलेसर, जिला मथुरा।
विश्व-शाँति के पथ पर!
कौन बोला?
......................आज ससृत के शिखर से कौन चला?
प्रेम कविता, धर्म दृढ़ता, ज्योति जड़ता से समेटे।
पच्छिमी तंद्रित तमिस्रा, मृत्यु की चादर लपेटे॥
सृष्टि को ले सो रही थी।
और मानवता स्वयं जब, चेतना सी खो रही थी॥
तिमिर छलनाऐं छिपाये, चिर सजग षड़यंत्र का क्रम।
हँस सहज फैला रही थी, मधुर सपनों का सरल भ्रम॥
पूर्व में पिछले प्रहर किसने सुनहला द्वार खोला।
कौन बोला?
.......आज जागृति के शिखर से कौन बोला? ॥ 1॥
कौन अपने को नहीं भाता किसे प्यारा न अपना।
हो गया सबसे अधिक प्रिय बन चुका जो एक सपना॥
लुट चुका सर्वस्व जिसका।
विश्व की स्वाधीनता पर स्वर रहेगा उच्च किसका॥
सींखचों में पड़ समझता वह कि वह स्वतन्त्र क्या है?
बोल पिंजर जड़ बता होना कभी परतन्त्र क्या है?
उठ कि बन्दी कौर ने भी, चीर तीली, उर टटोला।
कौन बोला?
........आज परिणत के शिखर से कौन बोला?॥ 2॥
स्वार्थ के सिक्के जहाँ पर हाट हिंसा की लगी है।
और पशु की शक्ति की प्रभुता जहाँ पर जिंदगी है॥
हृदय अणु विज्ञान क्षण में।
पिघल, घुलकर नित्य बनते नव विषैले गैस रण में॥
यन्त्र में मस्तिष्क ने अपना नया आदर्श खोजा।
हो गई राष्ट्रीयता पर जग मनुजता एक बोझा॥
प्राण में मानव तुला, पर बोल किसने प्यार तोला।
कौन बोला?
........आज उन्नति के शिखर से कौन बोला? ॥ 3॥
-राष्ट्रवाणी ।
*समाप्त*