प्रेम और मित्रता की कसौटी

उत्तम पुरुषों की मित्रता शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की तरह है जो प्रति दिन बढ़ती है, किन्तु नीचों का प्रेम कृष्ण पक्ष के समान है। मतलब निकल जाने के बाद उनका प्रेम घटने—दिन-दिन घटने लगता है। मित्रता का उद्देश्य मनोरंजक करना नहीं बल्कि यह है कि दो आत्माएं एक दूसरे को कुमार्ग से बचाती हुई सन्मार्ग पर लगावें। महान पुरुषों की मित्रता, धर्म शाखाओं के स्वाध्याय के समान है, तुम जितना ही उनके निकट संपर्क में आओगे उतनी ही महानताएं उनके अन्दर देखोगे। हँसी-दिल्लगी तो भाँड भी करते हैं पर क्या वे मित्र हुए? मित्र तो वह है जो हृदय के अंतःस्तल में आह्लाद का आविर्भाव करता है। हवा में किसी अंग का कपड़ा उड़ जाय तो हाथ तुरंत ही उसे ढ़कने को दौड़ता है, मित्र वह है जो कुमार्ग पर जाते हुए साथी को बचाने के लिए तत्पर रहता है। मित्र तो उसे ही कहना चाहिए जो बुराइयों की विपत्ति से बचाकर नेकी के कार्यों में प्रोत्साहित करता है।

आध्यात्मिक परीक्षाएँ—

अखण्ड-ज्योति कार्यालय ने अब तक जितनी पुस्तकें प्रकाशित की हैं, वह एक प्रकार का शिक्षा कोर्स है। इस कोर्स का जिन्होंने अध्ययन कर लिया है वे अपने विषयों की परीक्षाएँ देकर उपाधि सहित प्रमाण-पत्र प्राप्त कर सकते हैं।

सूर्य चिकित्सा

उपाधि—(1) सूर्य चिकित्सा विशारद।

(2) D.C.S. (डॉ. आफ क्रोमोपैथिक साइंस)

प्राण चिकित्सा

उपाधि—(1) प्राण विद्या विशारद।

(2) P.M.D. (डॉ. आफ पर्सनल मैगनेटिज्म)

परोक्ष ज्ञान

उपाधि—(1) दैवज्ञ। (2) D.D. (डॉक्टर आफ डिविनिटी)

अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिये उत्तर के लिये टिकट भेजते हुए पत्र व्यवहार करना चाहिये।

व्यवस्थापक—’अखण्ड-ज्योति’ कार्यालय, मथुरा

अखण्ड-ज्योति के नियम—

(1)अखंड ज्योति का वार्षिक चन्दा 1॥ मनीआर्डर से भेजना चाहिये। वी॰ पी॰ मंगाने से पैसे अधिक देने पड़ते हैं। मूल्य में कमी करने के लिये पत्र व्यवहार करना व्यर्थ है। एक वर्ष से कम के लिये ग्राहक नहीं बनाये जाते।

(2)पाठकों को जनवरी से ग्राहक बनना चाहिये, बीच के किसी मास में चंदा भेजने वालों को जनवरी से उस मास तक के पिछले अंक भेज दिये जावेंगे।

(3)अखण्ड ज्योति हर महीने की ठीक 20 तारीख को निकल जाती है। न मिले तो डाकखाने के उत्तर सहित 15 दिन के अन्दर ही लिखना चाहिये।

(4) सन् 40 के छः अंक तथा सन् 41 के कुल अंक मौजूद हैं। जो मंगाना चाहें प्रति अंक के हिसाब से मंगा सकते हैं।

(5)हर पत्र के साथ अपना पूरा पता और ग्राहक नम्बर अवश्य लिखना चाहिए। उत्तर के लिए जवाबी कार्ड या टिकट भेजना चाहिये।

मैनेजर- अखण्ड-ज्योति, मथुरा।

मैनेजर- अखण्ड-ज्योति, मथुरा।

चिकित्सा संसार में प्रतिष्ठा और विश्वासपात्र

सब से प्राचीन और विशाल भारतीय रसायनशाला एवं यन्त्रालय—

प्रसिद्ध भारतीय पेटेन्ट और श्रेष्ठ आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माता-

सुख संचारक कम्पनी लिमिटेड, मथुरा।

सुख संचारक कम्पनी लिमिटेड, मथुरा।

आपके पारिवारिक स्वास्थ्य की समस्या में हमारे सूचीपत्र से बड़ी सहायता मिलेगी। महिलाओं और बालकों के स्वास्थ्य और सौंदर्य के लिए, मानसिक और शारीरिक दुर्बलता तथा पुराने कठिन रोगों के लिए सस्ती, सुलभ, अद्भुत और प्रसिद्ध स्वदेशी औषधियों का व्यवहार कीजिये।

कृपया ‘अखण्ड ज्योति’ का उल्लेख करते हुए, बिना मूल्य सूचीपत्र के लिए

व्यवस्थापक—सुख संचारक कम्पनी लिमिटेड, मथुरा को लिखिये।


मनुष्य को देवता बनाने वाली पुस्तकें

जो ज्ञान युगों के प्रयत्न से मिलता है- उसे हम अनायास ही आपके सन्मुख उपस्थित करते हैं।

यह पुस्तकें बाजारू किताबें नहीं हैं। उनकी एक-एक पंक्ति के पीछे गहरा अनुभव और अनुसंधान है। विनम्र शब्दों में हमारा दावा है कि इतना खोजपूर्ण अलभ्य साहित्य इतने स्वल्प मूल्य में अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकता।

1. मैं क्या हूँ?- आत्मा का प्रत्यक्ष प्रदर्शन करने के कुछ सरल साधन। मू. 1 रुपया

2. सूर्य चिकित्सा विज्ञान- सूर्य की प्रचंड रोगनाशक शक्ति द्वारा वैज्ञानिक ढंग से कठिन रोगों की चिकित्सा। मूल्य 1 रुपया

3. प्राणचिकित्सा विज्ञान- मनुष्य के अंदर गजब की विद्युत शक्ति है। उसके द्वारा समस्त रोगों का इलाज। विदेशों में इस विधि से बड़े-बड़े अस्पताल चल रहे हैं। मूल्य 1 रुपया

4. परकाया प्रवेश- मैस्मरेजम के ढंग पर आत्मशक्ति को दूसरे के शरीर में प्रविष्ट करके उसे इच्छानुसार चलाने की साधना। मूल्य 1 रुपया

5. स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्भुत विद्या- अध्यात्मिक सरल साधनों द्वारा तन्दुरुस्त और खूबसूरत बनने के अद्भुत उपाय। मूल्य 1 रुपया

6. मानवीय विद्युत के चमत्कार- शरीर की बिजली से कैसे-कैसे आश्चर्यजनक कार्य होते हैं इसका विस्तृत वैज्ञानिक विवरण। मूल्य 1 रुपया

7. स्वर योग से दिव्य ज्ञान- स्वरोदय विद्या द्वारा गुप्त और भविष्य की बातों को जान लेने की रहस्यपूर्ण साधना। मूल्य 1 रुपया

8. भोग में योग- शीघ्र पतन, स्वप्न दोष, प्रमेह, नपुँसकता आदि विकारों को योग साधनों से दूर करने और मनचाही स्तम्भन शक्ति प्राप्त करने की गुप्त विधियाँ। मूल्य 1 रुपया

9. बुद्धि बढ़ाने के उपाय- जिन लोगों को मस्तिष्क से काम करना पड़ता है या जो स्मरण शक्ति बढ़ाकर बुद्धिमान बनना चाहते हैं उनके लिए यह कल्प वृक्ष के समान है। मूल्य 1 रुपया

10. धनवान बनने के गुप्त रहस्य- बड़े-बड़े कुबेरों द्वारा कार्य रूप में आई हुई ऐसी विधियाँ हैं जो आपको भी धनवान बना सकती हैं। मूल्य 1 रुपया

11. पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि- मन चाही संतान प्राप्त करने के सारे रहस्य इस पुस्तक में खोल कर रख दिये हैं। मूल्य 1 रुपया

12. वशीकरण की सच्ची सिद्धि- दूसरों को अपने वश में करने के लिये बिलकुल सच्चे और हजारों वार आजमाये हुए प्रयोगों का वर्णन। मूल्य 1 रुपया

13. मरने के बाद हमारा क्या होता है?- मृत्यु के उपरान्त प्राप्त होने वाले स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, प्रेत योनि, मृतकों का साक्षात्कार, उनकी सहायता प्राप्त करना आदि बातों पर अनुभवपूर्ण वर्णन। मूल्य 1 रुपया

14. जीव जन्तुओं की बोली समझना- मूक जीव जन्तुओं की भी स्वतंत्र भाषा है और वे भी हमारी ही तरह बातचीत करते हैं। उसे समझने का महत्वपूर्ण विधान। मूल्य 1 रुपया

नोट- चार या अधिक पुस्तकें लेने पर चौथाई कमीशन दिया जाता है। हर पुस्तक पर एक आना के हिसाब से पोस्टेज लगता है, जो खरीदार को देना होता है। इस प्रकार कमीशन काटकर और पोस्टेज जोड़ कर 1 रुपया प्रति पुस्तक के हिसाब से मूल्य भेजना चाहिए। चार से कम पुस्तकें मंगाने वाले सात आना प्रति के हिसाब से भेजें।पता- मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा।


कृतज्ञता प्रकाशन

अनेक सहृदय और विचारवान सज्जनों ने केवल निःस्वार्थ भाव से अखण्डज्योति की सहायता एवं सद्विचारों के प्रचार को कर्तव्य धर्म समझकर ग्राहक बढ़ाने में सहायता की है। इन महानुभावों का अखण्ड ज्योति हृदय से अभिवादन करते हुए कृतज्ञता प्रकट करती है एवं अन्य सज्जनों से आशा करती है कि ग्राहक बढ़ाने का प्रयत्न करके अखंड-ज्योति के महान मिशन की पूर्ति में सहायता करे।

नाम कितने ग्राहक बने

श्री भजनसिंह वर्मा, मारवाड़ जंक्शन 4

श्री मदनलाल शर्मा, मदन गंज, 2

श्री रतनचंद मनीलालजी, पालनपुर 4

श्री मुन्शीलाल गुप्ता, हिसार 3

पं॰ हृदयनारायण अवस्थी, कंचौसी 2

नाम कितने ग्राहक बने

श्री रामप्रसाद सिंह जी सिसहनी, गोडा 2

पं॰ जी॰ एम॰ शर्मा नैरोबी, अफ्रीका 2

श्री मोहनलाल मोहित सेन्ट पेयर,

मौरीसस द्वीप 2

पं॰ मन्नालाल शर्मा, बदनाबर 2

श्री जी॰ एन॰ सोलंकी, राजपुर 4

रसो वै सः


—श्रुति,

प्रेम ही परमात्मा है!

आप परमात्मा को प्राप्त करना चाहते हैं

—तो—


उसकी चलती-फिरती प्रतिमाओं से प्रेम कीजिए।

सुधा बीज बोने से पहले, कालकूट पीना होगा।

पहन मौत का मुकुट, विश्व हित मानव को जीना होगा॥


उसकी चलती-फिरती प्रतिमाओं से प्रेम कीजिए।

पथभ्रष्ट मानव


(ले॰-श्री नृसिंह पाठक “अमर”)


ले॰-श्री नृसिंह पाठक “अमर”

कलियों को मुसकाते देखा,

फूलों को हँसते देखा।

नदियों को इठलाते देखा,

झरनों को झरते देखा॥

देखा सूर्य चन्द्रमा आते,

हँसते—हँसते वारी वारी।

देखा तारों को छिटकाते,

झिलमिल रूप विभा न्यारी॥

देखा सागर को लहराते,

और ऊषा को मुसकाते।

देखा वसुन्धरा को हँसते,

सावन घन को बरसाते॥

किन्तु सृष्टि के रत्न मुकुट,

विधि के विधान की श्रेष्ठ कला।

मानव दल को देखा हमने,

चिंतित मूर्च्छित हृदय जला॥

चारों ओर घिरी है ज्वाला,

धू धू लपटें दौड़ रहीं।

बन्दी सम है तड़प रहे,

व्याकुलताएं क्या जायं कही॥

मधुर हास्य के बदले उनको,

आर्त्त नाद करते देखा।

हाय! सृष्टि सम्राटों को,

कर मल मल कर मरते देखा॥

उत्तर स्वर्ग से भूमण्डल पर ‘सत्’ की अमर ज्योति आती है।

वेणु बजाती सत्य, प्रेम की, सुमधुर न्याय गान गाती है॥

वेणु बजाती सत्य, प्रेम की, सुमधुर न्याय गान गाती है॥


प्रेम ही देश सेवा है।

वर्षों से पीड़ित, अपमानित तथा समस्त देशों से ठुकराई जाने वाली भारत माँ की आँखें उसके युवक पुत्रों पर हैं। हमें यौवन का उन्माद, सम्पूर्ण शक्ति और सम्पूर्ण सामग्री उसका सिर ऊँचा करने के लिए लगा देनी चाहिए। पर लगा क्या दें! हमारी भुजाओं में बल नहीं, हमारे पास आजकल के युद्ध उपकरण नहीं, शिक्षा नहीं, राजशक्ति नहीं, फिर हम किसके भरोसे आशा करें? हमारे पास आधुनिक बल कहाँ है! जिसके भरोसे हम जड़ विज्ञान से परिपूर्ण, स्वार्थपरता में मतवाली शक्तियाँ जो संसार को विनष्ट करते हुए हमारे देश की ओर मुँह बाये चली आ रही हैं, उनका मानमर्दन कर सकें।

भारत सदैव से आध्यात्मिक भावों एवं उपकरणों से परिपूर्ण रहा है और इस विकट समय में भी यह इतना आध्यात्मिक भाव रखता है कि पशुबल से मस्त शक्ति यों को उचित उत्तर दे सकें, अब वह समय आ गया है कि दुनिया को कुपथ से रोका जाय। यह समझ में नहीं आता और कहना भी कठिन है कि जिस प्यास से विश्व की आत्मा आज छटपटा रही है, जो चिनगारियाँ रक्त के छींटे देकर अनाथ और असहायों की अस्थियों के ईंधन में जलाई जा रही हैं। वह अग्नि तमाशा देखने वालों को कब तक अछूता छोड़ेगी, परन्तु इतना सत्य है कि मानवता के कलेजे में आग लग गई। वह छटपटा कर निराश होकर इधर-उधर दौड़ रही है। विनाश का आकर्षण इतना बढ़ गया है कि अपना पराया कुछ नहीं सूझता, क्या पशुबल में मस्त राष्ट्रों के पास कोई साधन है? ये बतलायेंगे भी तो वही जड़ विज्ञान की सामग्री जिससे वास्तविक रक्षा नहीं के बराबर होगी। भारत इस समय भी इसका अमोघ अस्त्र रखता है और वह है त्याग और सहानुभूति। परन्तु यह बात बिना प्रेम के उत्पन्न नहीं हो सकती अतः भारत के पास जो वर्तमान वातावरण में रक्षा विधान है, वह है “प्रेम”।

प्रेम जीवन का प्रसून है, प्रेम जीवन को जाग्रत और सुखदायी बना देता है। किसी कवि ने कहा है कि—

प्रेम गगन में साधु भाव की ऊषा जब उत्थित हो। सुखकर दुःख हर चेतनता मय नवजीवन जागृत हो। हृदय देश के मनमानस में शत दल सम पुष्पित हो। करुणारुण, दीनानुराग से, मधु पराग पूरित हो।

वास्तव में प्रेम जीवन में ऐसी ही वस्तु है पर आर्य-जाति पीड़ित है, आध्यात्मिक अभाव से नैतिक पतन और सामाजिक व्याधियों से इसको न अब ईश्वर का प्रेम है न ज्ञान से और न सत्य से प्रेम रहा है, इसमें प्रेम नहीं के बराबर रह गया है या यों कहिये कि प्रेम है रूढ़िवाद, मिथ्या अहंकार और छुआछूत से।

यदि हम में अपनी जाति और देश के प्रति प्रेम है तो हमें अपने जीवन को अपने मुर्दा और कायर समाज के अन्याय पर बलिदान करके प्रेम सुधार और स्वाधीन देश की आई हुई विपत्तियों से प्रेम करने के लिए सर्व शक्ति युक्त बनाने के लिए, संस्कार शक्ति की अनिवार्य आवश्यकता है। जब तक मनुष्य अपने निज के स्वार्थ का ही ध्यान रखते हों कुटुम्ब परिपालन करना ही जीवन का लक्ष्य बना रक्खा हो, समाज को एक दूर की बात समझ रक्खा हो तब तक समूहशक्ति होना भी असम्भव है। लाखों में से सैकड़ों मनुष्य तो ऐसे हों जो जाति और देश में मतवाले होकर देश और जाति के लिए बलिदान होने को तैयार हों, ऐसे न हों कि समाज और देश के वासी भूखे मर रहे हों और लाखों रुपया ब्याज के लिए और सहस्रों मन अन्न कोठों में अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए रख छोड़ा हो, तब भला देश और जाति की उन्नति की क्या आशा की जा सकती है।

यह तो सम्भव नहीं है कि देश के समस्त व्यक्ति इस प्रकार सच्चे देश प्रेमी और समाज प्रेमी बन जावें पर यह आवश्यक है कि ऐसे मनुष्यों की जितनी अधिक संख्या होगी उतनी देशोन्नति सुगम हो जावेगी, फिर यह भी आवश्यक नहीं है कि देश प्रेम के लिए सभी व्यक्ति युद्ध में पदार्पण करें, क्योंकि यह कार्य करने वाले यह काम करेंगे पर कोई सामग्री भी जुटायेगा? जिसकी जैसी इच्छा हो वैसी सहायता सप्रेम वह देश के लिए दे सकता है और अपना देश प्रेमी होने का परिचय दे सकता है।

देशोन्नति का शान्त समय चल रहा है, इसमें वीर बन कर आने वाले वीर बन कर आवें, धन देने वाले धन दें, सहानुभूति रखने वाले सहानुभूति रक्खें, प्रार्थना करें। परन्तु समस्त देशवासियों में देश प्रेम के भाव इस प्रकार हो जावें कि देश के लिए यथाशक्ति त्याग के साथ सेवा कर सकें, सब एक दूसरे का भला-बुरा समझते हुए किसी की वृथा निन्दा तथा अपवाद में न सम्मिलित होते हुए, प्रेम भाव से परस्पर सहयोग किया जावे और समान लक्ष्य की ओर निरन्तर पैर बढ़ाये जावें, तो ईश्वर कृपा से वह सुदिन अवश्य आयेगा कि देश समस्त विपत्तियों से मुक्त होकर विकास के मार्ग की ओर अग्रसर होगा।

ज॰ प्र॰ शर्मा।


मित्र के लिए आत्मत्याग!

अकबर के प्रधान सेनापति बैराम खाँ एक लड़ाई में बुरी तरह हार गये, उनकी सारी फौज तितर-बितर हो गई। बैराम खाँ भी जान बचाकर अपने साथी अब्दुल कासिम के साथ भागे।

दुश्मन के सिपाही इन दोनों को पकड़ने के लिए जी तोड़ कर कोशिश कर रहे थे। आखिर उन्होंने एक स्थान पर घेरकर इन दोनों को पकड़ लिया। सिपाही बैराम खाँ को मारना चाहते थे। परन्तु दोनों की शक्लें मिलती-जुलती होने के कारण वे ठीक-ठीक पहचान न कर सके। उन्होंने पूछा तुम में से बैराम खाँ कौन है। बैराम खाँ ने तुरन्त उत्तर दिया—मैं बैराम खाँ हूँ मुझे मार डालो।

अब्दुल कासिम ने सोचा सच्ची मित्रता प्रकट करने का यही अवसर है, उसने कड़ककर बैराम खाँ से कहा—क्यों रे गुलाम! तेरी इतनी हिम्मत, खबरदार अब अपने को बैराम खाँ कहा तो तेरी खैर नहीं। तू मेरी जान बचाने के लिये अपने को बैराम खाँ बता रहा है, पर मैं अकबर का प्रधान सेनापति होकर ऐसा अपमान नहीं सह सकता कि एक नाचीज सिपाही अपने को बैराम खाँ बतावे। तू मेरी जान बचाने के लिये झूठ बोल रहा है, पर मैं यह नहीं सुन सकता कि तू सेनापति है और मैं मामूली सिपाही हूँ।

बैराम खाँ कुछ कहने ही वाला था कि दुश्मन के सिपाहियों ने उसे एक तरफ धकेल दिया, उन्हें विश्वास हो गया कि यह कड़क कर बोलने वाला ही सेनापति है, उन्होंने तलवार से अब्दुल कासिम का सिर काट डाला और बैराम खाँ को छोड़ दिया।

सच्चे मित्र अपने मित्र को विपत्ति में से छुड़ाने के लिए ऐसे ही आत्मत्याग का परिचय देते हैं।


अनर्थ, स्वार्थ और परमार्थ।

हम देखते हैं कि दुनिया में स्वार्थ सर्व-प्रधान है। हर प्राणी सब से पहले अपने स्वार्थ को प्रधानता देता है, कोई व्यक्ति उस काम को करने के लिए तैयार नहीं होता, जिसमें उसे कुछ लाभ न हो। छोटे से लेकर बड़े तक जो भी काम हम करते हैं, पहले उसमें लाभ हानि का विचार कर लेते हैं तदुपराँत उसे करते हैं, मूर्ख से मूर्ख भी यह समझ कर किसी काम में हाथ न डालेगा कि इससे मुझे हानि होगी। सच तो यह है कि स्वार्थ की ऐसी बहुमूल्य कसौटी परमात्मा ने हमें दी है जिस पर कस कर हम जान लेते हैं कि कौन काम खरा है, कौन खोटा है? किसे करना चाहिये किसे न करना चाहिए। स्वार्थ जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता है, इसलिए उसका सदैव ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है।

पाठकों को यहाँ संदेह उत्पन्न हो सकता है, यदि स्वार्थ इतनी ही उत्तम वस्तु है तो उसे बुरा क्यों कहा जाता है, स्वार्थी से घृणा क्यों की जाती है, स्वार्थ परायण को धिक्कारा क्यों जाता है? हमें जानना चाहिए कि लोक और वेद में जिस स्वार्थ की निन्दा की गई है उसका नाम यथार्थ में ‘अनर्थ’ होना चाहिए। पूर्व आचार्यों ने विशुद्ध स्वार्थ को परमार्थ के नाम से पुकारा है। यह परमार्थ ही सच्चा स्वार्थ है। अनर्थ को स्वार्थ कहना भूल है, क्योंकि वास्तविक अर्थों में परमार्थ से ही स्वार्थ की पूर्ति होती है। अनर्थ को अपनाना तो आत्मघातक है, इसे किसी दृष्टि से स्वार्थ नहीं कहा जा सकता है।

स्वार्थ के दो भेद किये जा सकते हैं। एक अनर्थ दूसरा परमार्थ। एक किसान खेत को बड़े परिश्रम से जोतता है, रुपया खर्च करके गेहूँ लाता है और उस गेहूँ को मिट्टी में मिला देता है। इसके बाद महीनों उस खेत को सींचता रहता है। और रखवाली करता है। करीब एक वर्ष तक उसे निरन्तर उस खेत में कुछ न कुछ लगाना पड़ता है, कभी हल खरीदना पड़ा, कभी फावड़ा, कभी बैल लिये, कभी चरस लिया, नराई, निकाई आदि में परिश्रम लगा और निरन्तर चिंता करनी पड़ी, उसका ध्यान रखना पड़ा सो अलग। यह किसान परमार्थी है; वह जानता है कि इस समय जो त्याग कर रहा हूँ उसका बदला कई गुना होकर मुझे मिलेगा। सचमुच उसकी मेहनत अकारण नहीं जाती। खेत में एक दाने के बदले हजार दाने पैदा होते हैं, किसान प्रसन्न होता है और अपनी परमार्थ बुद्धि की प्रशंसा करता है। एक दूसरा किसान परमार्थ पसन्द नहीं करता, वह सोचता है कल किसने देखा है। आज का फल आज न मिले तो परिश्रम क्यों किया जाय? वह अपने गेहूँ को खेत में डालने से झिझकता है, कल पर उसका विश्वास नहीं, आज के गेहूँ की आज ही रोटी बना कर खा लेता है, खेत खाली पड़ा रहता है, फसल नहीं उगती, कटाई के समय जब परमार्थी किसान के कोठे अन्न से भर रहे हैं, यह बैठा-बैठा सिर धुनता है, वह अपने बीज को बोने से पहले ही खा चुका, अब उसे कुछ भी नहीं मिलने वाला है। आप समझे होंगे कि परमार्थ का मतलब कल की बात सोच कर आज का काम करना है और अनर्थ का मतलब कल की भलाई-बुराई का विचार छोड़कर आज के लिए आज का काम करना है।

वर्तमान के लिए भविष्य को भुला देने की नीति अनर्थ मूलक है। एक चटोरा व्यक्ति वर्तमान समय के स्वाद में लिप्त होकर जरूरत से ज्यादा खा जाता है, कुछ समय बाद पेट में दर्द शुरू होता है, डॉक्टर आता है, जितना लोभ किया था उससे अधिक खर्च हो जाता है। एक कामी पुरुष किसी तरुणी पर मुग्ध होकर अमर्यादित भोजन करता है, कुछ ही समय उपरान्त वीर्य रोगों से ग्रसित हो जाता है। इसके विपरित एक व्यक्ति जिह्वा पर संयम रखता है, कल की बात सोच कर आज के चटोरेपन को दूर हटा देता है, उसका मर्यादित भोजन स्वस्थ रहने और दीर्घ जीवन जीने के लिए सहायता करता है। इसी प्रकार एक ब्रह्मचारी गृहस्थ नियत मर्यादा में रति संयोग करता है, वह निरोग रहता है, बलवान संतान प्राप्त करता है और पुरुषत्व को सुरक्षित रखता है। पहले दो असंयमी व्यक्ति दुःखी होंगे, क्योंकि वे आज के लोभ में कल की बात भुला देते हैं। इसके विपरीत पिछले दो व्यक्ति आनन्द करते हैं, क्योंकि वे कल के लिए आज का काम करते हैं।

“हमें तो अपने मतलब से मतलब” की नीति को अपनाने वाले लोगों को स्वार्थी कहकर घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। वास्तव में वे स्वार्थी नहीं अनर्थी हैं, क्योंकि वे वास्तविक स्वार्थ को भूल गये हैं और सत्यानाशी अनर्थ को अपनाये हुए हैं। जो व्यक्ति पड़ौस में हैजा फैल जाने पर उसे रोकने का प्रयत्न नहीं करता, जो व्यक्ति समाज में दुष्टता उत्पन्न होने पर उसे रोकने के लिए नहीं उठता, जो व्यक्ति गाँव में लगी हुई आग को बुझाने की कोशिश नहीं करता, जो व्यक्ति असहायों की सहायता नहीं करता, वह केवल अनर्थ करता है। क्योंकि मुहल्ले का हैजा उसके घर में घुस कर बेटे की जान ले लेगा, फैली हुई दुष्टता उसकी खुद की छाती पर चढ़ कर एक दिन खून पीने के लिए तैयार हो जायगी, गाँव में लगी हुई आग कुछ घंटों बाद अपने छप्पर में आ पहुँचेगी, असहायों का शेष एक दिन राक्षस रूप धर कर अपनी डाढ़ों से हमारी शाँति को पीसने लगेगा। इस प्रकार “अपने मतलब से मतलब” रखने की लाला शाही नीति यथार्थ में धैर्य की नहीं, अनर्थ की नीति है। यह अनर्थ एक दिन उन्हें ले बैठता है। सिर्फ आटे की गोली को ही देखने वाली मछली अपनी जान से भी हाथ धो बैठती है।

पाप, दुष्कर्म, लालच, भोग आदि में तुरन्त ही कुछ आकर्षण और लाभ दिखाई पड़ता है, इसलिए लोग कबूतर की तरह दाने प्राप्त करने के लिए उनकी ओर दौड़ पड़ते हैं और जाल में फँस कर दुःसह दुख सहते और रोते चिल्लाते रहते हैं, किन्तु धैर्यवान पुरुष शुभ कर्मों में प्रवृत्त होता है और किसान की तरह आज कष्ट सहकर कल के लिये फसल तैयार करता है। वास्तव में पूरा पक्का स्वार्थी वह व्यक्ति है, जो हर काम को भविष्य के परिणाम के अनुसार तोलता है और धैर्य एवं गंभीरता के साथ उत्तमोत्तम कर्म करता हुआ अपने लोक और परलोक को उज्ज्वल बनाता है, इसे परमार्थी कहा जाता है। अविवेकी और मूर्ख वह है जो क्षणिक सुख की मृग-तृष्णा में भटकता हुआ इस लोक में निन्दा और परलोक में यातना प्राप्त करता है। यह स्वार्थ नहीं अनर्थ है। हम में से हर एक को यह बात भली-भाँति हृदयंगम कर लेनी चाहिए कि सच्चाई स्वार्थ में है। अनर्थ का तात्पर्य तो आत्महत्या ही हो सकता है। कुत्ता सूखी हड्डी को चबाता है, उसकी रगड़ से अपने मसूड़े में से जो खून निकलता है उसको पीकर समझता है कि मुझे इस हड्डी में से रक्त प्राप्त हो रहा है। अनर्थ की नीति को अपनाने वाले अपने मुँह में से खुद खून निकाल कर पीते हैं और उसमें प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। अपने रक्त पान का यह अनर्थ भी भला कोई स्वार्थ है? हमारा कर्तव्य है कि अनर्थ और परमार्थ का भेद पहचानते हुए सच्चे स्वार्थ को अपनावें।


Quotation

पक्षपात और तरफ दारी आदमी की आँखों को वास्तविकता की ओर से अन्धा कर देती है। जो आदमी ऐसे होते हैं, वे किसी चीज को उसके वास्तविक रूप में नहीं देख सकते।


दो प्रेम पारखी

बहुत प्राचीन काल की बात है। इस मथुरा नगरी में वासवदत्ता नामक एक वेश्या रहती थी। उसका रूप वैभव किसी महारानी से कम न था। देश-देशों के राजा उसके दरवाजे पर खाक छानने आते थे। जिस पर वह मुस्कुरा देती वही अपने को धन्य समझने लगता। ऐसी थी वह उर्वशी की अवतार वासवदत्ता।

एक दिन वह सोने-चाँदी से झिलमिलाते हुए रथ में बैठ कर नगर की सैर करने निकली। उसका वैभव कोई साधारण सा थोड़े ही था। जिस बाजार में उसकी दासी भी निकल जाती वह इत्रों की सुगंध से महक जाते। जब उसका झिलमिलाता हुआ रथ निकलता तो नगर निवासी अपना-अपना काम छोड़ कर सड़क के किनारे उसकी शोभा देखने खड़े हो जाते। उस दिन वह सैर को निकली थी। दर्शकों की भारी भीड़ सड़क के किनारे पंक्तिबद्ध होकर खड़ी थी। सब के मुख पर उसी के रूप वैभव की चर्चा थी।

नगर के एक पुराने खंडहर मुहल्ले की एक टूटी झोंपड़ी में एक युवक रहता था। नाम था उसका उपगुप्त। उसने गेरुए कपड़े नहीं पहने, फिर भी वह संन्यासी था। भिक्षा उसने नहीं माँगी, फिर भी आकाशी वृत्ति पर उसका भोजन निर्भर था। प्रेत की तरह घूमता, यक्ष की तरह गाता, बैताल की तरह कार्य करता और जनक की तरह कर्म योग की साधना करता। जन्म भूमि तो उसकी कहीं दूर देश थी, पर अब रहता यहीं था। बहुत कम लोग उसके बारे में कुछ जानते थे, पर इतना सब जानते थे कि यह आदर्शवादी युवक निर्मल चरित्र का है, ईश्वर भक्ति में लीन रहना और प्रेम का प्रचार करना इसका कार्य-क्रम है।

उस दिन उपगुप्त अपनी झोंपड़ी के दरवाजे पर बैठा हुआ तन्मय होकर कुछ गा रहा था। आत्म-विभोर होकर वह कुछ ऐसा कूक रहा था कि सुनने वालों के दिल हिलने लगे। मधुर स्वर के साथ मिली हुई आत्मानुभूति पुष्प के पराग की तरह फैलकर दूर-दूर तक के लोगों को मस्त बनाये दे रही थी।

वासवदत्ता की सवारी सन्ध्या होते-होते उस खंडहर मुहल्ले में पहुँची। गोधूलि वेला में उस दरिद्र उपनगर की झोंपड़ियों में दीपक टिमटिमाने लगे थे। वेश्या उन्हें उपेक्षा भाव से देखती जा रही थी कि उसके कानों में संगीत की वह मधुर लहरें जा पहुँची। वह कला की पारखी थी। इतना उच्च कोटि का गायन आज तक उसने न सुना था। उसकी आँखें वह स्थान तलाश करने लगीं। जहाँ से यह ध्वनि आ रही थी। सवारी धीरे 2 आगे बढ़ रही थी। स्वर क्रमशः निकट आ रहा था। आगे चलकर उसने देखा कि फूस की एक जीर्ण-शीर्ण झोंपड़ी का सुन्दर युवक आत्म विभोर होकर गा रहा है। वेश्या रथ में से उतर पड़ी, उसने निकट जाकर देखा कि देवताओं जैसे सुन्दर स्वरूप वाला एक भिक्षुक फटे चिथड़े पहने मिट्टी की चबूतरी पर बैठा है और बेसुध होकर गा रहा है। वेश्या ने कुछ कहना चाहा पर देखा कि यहाँ सुनने वाला कौन है। वह उलटे पाँवों वापिस लौट आई।

वासवदत्ता अपने शयन कक्ष में पड़ी हुई थी। बहुत रात बीत चुकी, पर नींद उसकी आँखों के पास न झाँकी। भिखारी का स्वर और स्वरूप उसके मन में बस गया था। इधर से उधर करवटें बदल रही थी पर चैन कहाँ? अब तक वह बड़े-बड़े कहलाने वाले अनेकों को उंगलियों पर नचा चुकी थी, पर आज जीवन में पहली बार उसने जाना कि ‘जी की जलन क्या होती है’। क्षण बीत रहे थे, उसका मन काबू से बाहर हो रहा था। युवक के चरणों पर अपने को समर्पण करने के लिए उसके सामने तड़फने लगे।

रात के दो बज चुके थे। वेश्या चुपचाप दासी को लेकर घर से बाहर निकल पड़ी। गली कूचों को पार करती हुई वह खंडहर मुहल्ले की उसी टूटी झोंपड़ी में पहुँची। युवक चटाई का फटा टुकड़ा बिछाये हुए जमीन पर सोया हुआ था। दासी ने धीरे से उसे जगाया और कहा- इस नगर की वैभवशालिनी अप्सरा वासवदत्ता आपके दर्शनों के लिये आई हैं।

उपगुप्त ने आँखें मलीं और चटाई पर बैठा हो गया। वासवदत्ता का ऐश्वर्य वह सुन चुका था। मुझ दरिद्र के यहाँ वह वैभवशालिनी आई है? क्यों आई है? मुझ से क्या प्रयोजन? एक बारगी अनेक प्रश्नों का ताँता उसके सामने उपस्थित हो गया? उसके मन में अविश्वास की भावना आई। कहीं स्वप्न तो नहीं देख रहा हूं? उपगुप्त बार-बार आँखें मल कर सामने खड़ी दो मूर्तियों को देखने लगा।

वासवदत्ता ने कहा प्यारे, सन्देह मत करो। बड़े-बड़े राजा-महाराजा जिसके चरणों पर लोटते हैं, वही वासवदत्ता आपको अपना हृदय समर्पण करने आई है। मेरा सारा वैभव आप के लिए समर्पित है। मैं आपकी दासी बनना चाहती हूँ। मेरे टूटे हुए दिल को जोड़ कर कृत-कृत्य कर दीजिए।

युवक को मानो साँप सूँघ गया हो, वह सन्न रह गया। उसने कहा--माता! तुम यह क्या कह रही हो। तुम्हारे मुख से यह कैसे शब्द निकल रहे हैं। मेरी आँखें स्त्री जाति को माता के ही रूप में देख सकती हैं। आपका पाप प्रस्ताव मुझे स्वीकार नहीं हो सकता।

वेश्या बोलने में बड़ी पटु थी। नाना प्रकार के तर्क और प्रलोभनों से उपगुप्त को प्रस्ताव स्वीकार कर लेने को समझाने लगी, परन्तु युवक टस से मस भी न हुआ। उसका जीवन एक साधना थी, उसमें इधर-उधर हिलने के लिए कोई गुँजाइश न थी। कोई प्रलोभन उसे डिगा न सका। वेश्या खिन्न होती हुई लौट आई।

एक अरसा बीत गया। वेश्या के शरीर में कोढ़ फूट गया। उसके अंग गल-गल कर गिरने लगे। अतुलित वैभव कुछ ही समय में न जाने कहाँ पलायन कर गया। उस पर मरने वालों में से कोई उधर आँख उठा कर भी नहीं देखता। यह दुरवस्था अधिक बढ़ी। उपचार के अभाव में उसके अंग सड़ने लगे। घावों में से कीड़े झरना आरम्भ हो गया।

ऐसी अवस्था में कौन उसके पास जाता; परन्तु उपगुप्त था, जो उसकी सेवा कर रहा था। दुर्गन्ध के मारे वहाँ जाने में नाक फटती थी, पर वह प्रसन्नता पूर्वक उसके घाव बाँधता, कपड़े धोता, मल-मूत्र उठाता। सगी माता की तरह उसने वेश्या की एकनिष्ठ सेवा की।

आज बीमारी बहुत बढ़ गई थी। वासवदत्ता मृत्यु के मुख में जा रही थी। उपगुप्त बैठा पंखा झल रहा था। रोगिणी ने अधखुले नेत्रों से उपगुप्त की ओर देखा और कहा—पुत्र! तेरा स्वर और संगीत मैंने जैसा परखा था, आज वैसा ही देख लिया। उपगुप्त ने उसके चरणों की धूलि मस्तक पर चढ़ाते हुए कहा—माता! तेरा सौंदर्य जैसा मैंने समझा था, आज तेरा पुत्र-भाव पाकर वैसा ही पा लिया।

उपगुप्त और वासवदत्ता आज इस लोक में नहीं हैं, पर मथुरा के निवासी जानते हैं कि वे दोनों सच्चे पारखी थे।


Quotation

घबड़ाना तथा शिकायत करना, अज्ञान और आध्यात्मिक अन्धकार के निश्चित चिह्न हैं।

*****

जब तक आदमी रुचियों और अरुचियों को अवसर देता है, ठीक तब तक उसका आत्मा स्वतन्त्रता से अपरिचित ही रहता है।


पिशाच प्रेमी या पागल

देखते हैं कि आजकल गली कूचों में प्रेम की आँधी सी आई हुई है। मुहब्बत के तूफान उड़ रहे हैं। सिनेमाबाज, मनचले, शौकीन फिल्म अभिनेत्रियों से प्रेम करते हैं, उनकी तस्वीरों को आँखों में छिपाये फिरते हैं। सूरत मन में बसी हुई है, उनके हाव-भाव और भाव-भंगी का ऐसा स्मरण करते रहते हैं मानो ये ही इनकी उपास्य देवता हैं। “प्रेम का घर हो प्रेम की छत हो” के गीत उनकी जबान पर गुनगुनाते रहते हैं, उन्हीं की प्रतिध्वनि उनके कानों में गूँजती रहती है।

देखते हैं कि गलियों में कमर लचकाकर चलने वाले छैल चिकनियाँ पराई बहिन-बेटियों पर कुदृष्टि डालते हैं। उन्हें बहकाकर पाप पंक में घसीटने का प्रयत्न करते हैं, मौका लगे तो उनका धन, धर्म ले भागते हैं। कलेजा थामे फिरते हैं, कोई नयन बाण से बिधा हुआ बनता है, किसी को इश्क का ज्वर है, किसी को मुहब्बत मर्ज। बुलबुल के तराने, सैयाद कफस, शमा, परवाना, कातिल, शमशीर दिल, छुरी और न जाने क्या-क्या उन्हें याद आता है। वेश्याओं के उपासक, दुराचारिणी स्त्रियों के गुलाम, यह रंगीले मनचले इधर से उधर मटर-गश्ती करते हैं और अपने को प्रेमी बताते हैं।

देखते हैं कि घासलेटी कथाकार, आशिक माशूकी के अफसाने कहने वाले, लैला मजनू के नवीन संस्करण तैयार करते हैं। भोगेच्छा को अनियंत्रित रूप से भड़काने के लिए प्रेम को बन्धन रहित बताते हैं। “काबू में जिसका दिल न हो-वह गरीब क्या करे?” का नारा इसलिए लगाया जाता है कि इनकी शोहदाई को छूट मिल जाय, दुनिया इन्हें निर्दोष समझे। चार मनचले मिले कि गन्दी-गन्दी चर्चा चली, खूबसूरत औरतों की चर्चा, अपने कुकर्मों का बढ़ा-चढ़ा वर्णन, इन्द्रिय सुख की अनर्गल कल्पनाएं करने वाले अपने को प्रेमी मानते हैं।

देखते हैं कि अबोध किशोर बालकों को लालच या बहकावे में डालकर उन्हें अपनी लिप्सा का साधन बनाने वाले मुहब्बत का दम भरते हैं। उन लड़कों को अपने ही जैसा पतित जीवन बिताने की शिक्षा देने वाले एवं उनका शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य नष्ट कर देने वाले यह कुकर्मी अपने कार्य में प्रेम की गन्ध ढूँढ़ते फिरते हैं!

देखते हैं कि रूप रंग की चटक-मटक पर लोभित होकर स्त्री-पुरुष इन्द्रिय-प्रेरणा से व्याकुल होते हैं, और एक दूसरे को पाने के लिए बेचैन रहते हैं, पत्र व्यवहार चलता है, गुप्त संदेश दौड़ते हैं, और न जाने क्या क्या होता है, प्रेम रस चखने में उनकी बड़ी व्याकुलता होती है और सोचते हैं कि हमारे यह कार्य प्रेम के परिणाम है।

देखते हैं कि बालकों को अमर्यादित भोजन करके उन्हें बीमार बनाने वाली माता बेटे के फोड़े को सड़ने देकर हड्डी गल जाने तक डॉक्टर के पास न ले जाने वाला पिता, भाई के अन्याय में सहायता करने वाला भाई, मित्र को पाप पंक में पड़ने से न रोकने वाला मित्र, बीमार को मनचाहा भोजन देने वाला अविवेकी परिचारक समझता है कि मैं प्रेमी हूँ, मैं दूसरे पक्ष के साथ प्रेम का व्यवहार कर रहा हूँ।

देखते हैं कि साँप को छोड़ देने वाले, चोर को सजा कराने का विरोध कराने वाले, अत्याचारी को क्षमा करने वाले, पाजी की हरकतें चुपचाप सह लेने वाले समझते हैं कि हमने बड़ी दया की है, पुण्य कमा रहे हैं, प्रेम का प्रदर्शन कर रहे हैं।

इन सब दृश्यों को जब हम देखेंगे तो अनुभव करेंगे कि ईश्वर का वेष बनाकर शैतान आ बैठा है, धर्म की आड़ में पाप बोल रहा है, गाय का चमड़ा ओढ़ कर भेड़िया विचरण कर रहा है। इन्द्रिय लिप्सा, व्यभिचार, पतन प्रोत्साहन, अन्याय वर्धन को यदि प्रेम कहा जायगा तो हम नहीं समझते तो पाप नाम की कौन सी चिड़िया इस दुनिया में शेष रहेगी।

प्रेम का अर्थ है त्याग और सेवा। सच्चा प्रेमी अपने सुखों की तनिक भी इच्छा नहीं करता वरन् जिस पर प्रेम करता है उसके सुख पर अपने को उत्सर्ग कर देता है। लेने का उसे ध्यान भी नहीं आता, देना ही एकमात्र उसका कर्तव्य हो जाता है। जिसके हृदय में प्रेम की ज्योति जलेगी वह गोरे चमड़े पर फिसल कर अपने चमारपन का परिचय न देगा और न व्यभिचार की कुदृष्टि रखकर अपनी आत्मा को पाप पंक में घसीटेगा। वह किसी स्त्री के रूप, रंग, चमक, दमक, हाव, भाव या स्वर कंठ पर मुग्ध नहीं होगा, वरन् किसी देवी में उज्ज्वल कर्तव्य का दर्शन करेगा तो उसके चरणों पर झुककर प्रणाम करेगा। स्त्रियों से प्रेम करने वाले के कमरे में अभिनेत्रियों के अधनंग चित्र नहीं होंगे वरन् सीता और सावित्री की प्रतिमायें विराजेंगीं। प्रेमी कमर लचकाकर गलियों में छैल चिकनियाँ बना हुआ न फिरेगा, वह माँ बहिनों को सती साध्वी बनाने के लिए उनमें धर्म प्रेरणा करेगा। उसकी जिह्वा पर आशिक-माशकों के गन्दे अफसाने न होंगे वरन् राम-भरत के प्रेम की चर्चा करता हुआ गदगद हो जायेगा। प्रेमी का दिल तो बेकाबू हो सकता है पर दिमाग मुट्ठी में रहेगा, वह दूसरों के सुख के लिए आत्मत्याग करने में अपने को बेकाबू करेगा, किन्तु किसी को पतन के मार्ग पर घसीटने का स्मरण आते ही उसकी आत्मा काँप जायगी। इस दिशा में उसका एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। अपने प्रेमपात्र को बदनामी, पतन, दुख, भ्रम और नरक में घसीटने वाला व्यक्ति किसी भी प्रकार प्रेमी नहीं कहा सकता, वह तो नरक का कीड़ा है जो अपनी विषय ज्वाला में जलाने के लिए दूसरे पक्ष को घसीटता है।

स्मरण रखिए प्रेम का लक्षण त्याग है। जब आप अपने सुख को दूसरों के ऊपर निछावर करते हैं तब आप प्रेमी हैं। जब आप अपने सुख के लिए दूसरे को पतन के मार्ग में खींचते हैं तब आप पिशाच हैं। जब आप दूसरों के सुधार के लिए स्वयं कष्ट सहते हैं, बुराइयाँ ओढ़ते हैं, तप करते हैं तब आप प्रेमी हैं। जब दूसरों के कुकर्म को यों ही अनियंत्रित गति से बढ़ने देते हैं, न तो उनको रोकते हैं, न विरोध करते हैं तब आप पागल बन जाते हैं। क्योंकि भविष्य की हानि-लाभ न सोचकर केवल आज पर ही ध्यान देने वाला पागल कहा जाता है। सन्निपात ग्रस्त को मिठाई खिलाकर उसकी बीमारी बढ़ा देने वाला पागल ही कहा जायगा। प्रेमी का धर्म है त्याग और सेवा। त्यागी और सेवक ही प्रेमी कहला सकता है। जो भोगेच्छा में जलता फिरता है वह पिशाच है और जो सुधार के लिए किसी को कष्ट देना नहीं चाहता एवं सेवा के लिए उद्यत नहीं होता वह पागल है।

प्रेमियों को अपना अन्तःकरण टटोलकर निर्णय करना चाहिए कि वे पिशाच हैं? प्रेमी हैं? या पागल हैं?


Quotation

प्रत्येक आदमी अपने विचारों के तंग अथवा विशाल चक्र में घूमता है।

*****

जो कुछ भी तुम अपने अन्तरात्मा में, मन में सोचते हो, वही तुम्हारे जीवन में बाहर प्रकट हो जायगा, और जब तक तुम्हारी विचारधारा में परिवर्तन न होगा तब तक तुम्हारा बाह्य आचार और नियम पालन साथ न देगा।

*****

जो एक उद्देश्य को अपने सामने रखता है, उसे सब वस्तुएँ प्राप्त हो जाती हैं।


प्रेम किससे करें?

संसार में कोई बाहरी वस्तु ऐसी नहीं है, जिससे प्रेम करके सुख प्राप्त किया जा सके। नश्वर संसार की हर एक वस्तु प्रतिक्षण बदलती हुई अपने परिवर्तन के लिए बड़ी सरपट चाल से दौड़ी जा रही है। पञ्च भौतिक पदार्थ जड़ हैं, इनमें अपनी निजी चेतना न होने के कारण उत्तर देने की क्षमता नहीं है। दीवार से प्रेम किया जाय, तो वह इसके लिए न तो भला मानेगी न बुरा और न किसी प्रकार का उत्तर ही देगी। रुपया, पैसा, गाड़ी-मोटर, मकान, जायदाद आदि से प्रेम करना ऐसा ही है, जैसा दीवार से प्रेम करना। इन वस्तुओं में उत्तर देने की कोई शक्ति नहीं है और न वे आपके प्रेम-द्वेष की कुछ परवाह करती हैं। पञ्च-तत्व निरन्तर परिवर्तन चक्र पर तीव्र गति से घूम रहे हैं। पैसा आज आपकी जेब में है, पर वह दस दिन बाद न जाने कहाँ से कहाँ पहुँचेगा। बढ़िया कपड़ा आज लिया है, वह कुछ महीने में जीर्ण-शीर्ण होकर नष्ट हो जायगा। संसार की एक भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो अधिक समय तक ठहर सके। देर सबेर में सब को पूर्ण रूप से बदल जाना है। आज का महल एक दिन खँडहर बने बिना न रहेगा। यदि इन वस्तुओं से प्रेम किया जाय, तो एक तो उधर से उत्तर न मिलने के कारण यह प्रेम एकपक्षीय और लँगड़ा रहेगा। दूसरे जब ये नाशवान् वस्तुएँ बदल जायेंगी, चली जायेंगी या नष्ट हो जायेंगी, तो उनके बिछोह का दुःख होगा। प्रेम में दुःख हो ही नहीं सकता। प्रेम तो आनन्द का अवतार है, जहाँ दुःख हो, वहाँ समझना चाहिए कि प्रेम के स्थान पर मोह का अड्डा जम गया है। जड़ पदार्थों से मोह ही हो सकता है और मोह का फल दुःख है। इसलिए समझना चाहिए कि उत्तर न देने वाली, परवाह न करने वाली, नष्ट होने वाली जड़ वस्तुएं हमारे प्रेम का पात्र नहीं बन सकती।

अब प्रश्न उठता है कि जीवित प्राणियों से प्रेम करना चाहिए? आमतौर से शरीरधारी प्राणियों के स्थूल शरीरों से ही स्नेह किया जाता है, किन्तु जिस कारण शरीरों से सम्बन्ध होता है वे कारण सदा स्थिर नहीं रहते, इसलिए स्नेह भी घट जाता है। युवक-युवती रूप-यौवन पर मुग्ध होकर एक दूसरे पर मरते हैं। जब जवानी ढल जाती है और बुढ़ापा आ घेरता है, तो यौवन की उन तरंगों का कहीं पता भी नहीं लगता। बालक माता का स्तनपान करता है और जीवन के लिए उस पर निर्भर रहता है, जैसे-जैसे उसके स्वार्थ माता के साथ कम होते जाते हैं, वैसे ही वैसे उसकी ममता भी घटती जाती है, अन्त में तरुण पुत्र अपनी वृद्धा माता की कुछ भी परवाह नहीं करता। न कमाने वाला पिता, निठल्ला भाई, असमर्थ मित्र, कुरूप और रुग्ण स्त्री किसे प्रिय लगते हैं। दूध देने वाली गाय, हल चलाने वाले बैल और सुन्दर घोड़े तभी तक प्रिय लगते हैं जब तक कि वे समर्थ हैं, असमर्थता आते ही उनसे पीछा छुड़ाने को जी चाहता है। जीवित प्राणियों के शरीरों से प्रेम करने में एक और व्यथा है कि जिन शरीरों से मोह बन्धन अधिक बँध जाता है, उनके विछोह पर बड़ी मर्मान्तक पीड़ा होती है। जिन्हें अपने प्रिय पात्रों का चिर बिछोह सहना पड़ा है, अपने कलेजे की हूक का अनुभव वही कर सकते हैं। विचारणीय बात है कि यदि प्राणधारियों के शरीरों से प्रेम करना उचित है, तो फिर उसमें यह विक्षेप क्यों उत्पन्न होता है असल में जिस प्रकार अन्य जड़ पदार्थ हैं, उस प्रकार प्राणियों के शरीर भी पंचभूतों से बने हैं। इनमें भी कोई पदार्थ ऐसा स्थिर और चैतन्य नहीं है, जो आत्मा का प्रेम पात्र बन सके।

बाहर का जड़ जगत् का कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं है जो तत्वतः प्रेम का अधिकारी हो। स्वभावतः बाहरी वस्तुओं से मोह हो सकता है; प्रेम नहीं। जड़ और चैतन्य का कोई जोड़ा नहीं। दोनों की भिन्नता हो ही नहीं सकती! प्रेम की ज्योति जगमगा रही है। उसे ही जागृत करके हम अपने अन्दर प्रेम की सरिता बहा सकते हैं। यह जानना चाहिए कि परमात्मा कोई पृथक वस्तु नहीं है। आत्मा के उच्चतम दशा में पहुँचकर जैसे सत् चित् आनन्द स्वरूप बन सकते हैं, जैसे महान् समर्थ, विशाल अन्तःकरण वाले उदार बन सकते हैं उस अपनी सर्वोच्च स्थिति की कल्पना ही ईश्वर है। अपने इस महान तथा विकसित रूप, जिसे आमतौर से ईश्वर के नाम से पुकारा जाता है, से ही प्रेम करना योग्य है। ईश्वर प्रेम का तात्पर्य यह है कि हम अपने वर्तमान अव्यवस्थित जीवन और उस ध्येय जीवन के बीच में एक ऐसी चुम्बक शृंखला बाँधते हैं जो दिन-दिन इन दोनों के बीच का अन्तर घटाती जाती है और अन्त में दोनों को मिलाकर एक कर देती है-आत्मा को परमात्मा बना देती है।

परमात्मा से प्रेम करना, अपने आत्मा से प्रेम करना ही सर्वश्रेष्ठ है, इसमें कभी किसी प्रकार का बिछोह, विकार या विरोध उत्पन्न नहीं होता। दिन-दिन यह बढ़ता जाता है और अन्त में मनुष्य सच्चा प्रेमी, सच्चा ईश्वर भक्त बन जाता है। सच्चा ईश्वर भक्त का रोम रोम प्रेम से परिपूर्ण हो जाता हैं, उसके मन वचन कर्म से प्रेम टपकता रहता है। क्योंकि उसके भीतर बाहर प्रेम ही प्रेम तो भरा हुआ है। देखने वाले देखते हैं कि वह हर प्राणी पर स्नेह की वर्षा कर रहा है त्याग और सेवा के लिए अपरिचित के साथ भी वैसे ही तत्पर रहता है मानो यह उसके सगे संबंधी हों। दूसरों का कष्ट देखकर उसकी आंखों में दया का झरना उमड़ पड़ता है। मोटी दृष्टि से देखने वाले समझते हैं कि यह व्यक्ति दूसरे लोगों से बड़ा भारी प्रेम रखता है, परन्तु सूक्ष्म दृष्टि वाले देखते हैं कि ईश्वर भक्त को किसी जड़ पदार्थ से ममता नहीं है, उसके अन्तर में जो अगाध प्रेम भरा हुआ है, उसको छूकर बाहर आने वाली बयार में वह गंध आती है। हमें आत्मा से प्रेम करना चाहिए, परमात्मा का भक्त बनना चाहिए, इसी से सच्चे प्रेमी बन सकते हैं और प्रेम का अमृत रस चखते हुए आत्मा की प्यास बुझाकर उसे तृप्त कर सकते हैं।


देशभक्त की अमानत

जापान का अमर शहीद मिचिजेन बड़ा ही प्रसिद्ध देशभक्त था। उसने प्रजा की सेवा के लिए अपने जीवन की बाजी लगा दी और जब तक जीया प्रजा की भलाई के कार्यों में लगा रहा। राजा को मिचिजेन के कामों में राजद्रोह की गंध आई। उसने इस देशभक्त को मरवा डाला।

मिचिजेन जब मरने लगा तो उसने अपने अभिन्न मित्र गेंजो को बुलाया और अपने एक-मात्र सात वर्षीय बालक को उसकी गोदी में डालते हुए कहा—मित्र, यह मेरी अमानत है—इसकी रक्षा करना। गेज्जो की आँखों से आँसुओं की धारा बह रही थी, उसने बालक को उठाकर छाती से लगा लिया और कहा—मैं सब प्रकार इसकी रक्षा करूंगा। गेंजो बालक को घर ले आये वे एक पाठशाला में अध्यापक थे। अपने सगे पुत्र की तरह उसे पास रखकर पढ़ाने लिखाने लगा।

राजा का कोप अभी शान्त नहीं हुआ था। उसे पता लगा कि अध्यापक गेंजो की संरक्षता में मिचिजेन का सात वर्षीय बालक मौजूद है। उसने इस बालक को भी मरवा डालने का निश्चय किया। सिपाही के हाथों गेंजो के पास राजा ने हुक्म भेजा कि “ परसों दिन के दस बजे मिचिजेन का लड़का स्कूल में हाजिर रहना चाहिए।”

हुक्म पाते ही गेंजो समझ गया कि अब बालक के लिये क्या होने वाला है। वह बड़े सोच विचार में पड़ा हुआ था कि उसी समय एक स्त्री अपने बालक को पाठशाला में भर्ती करने लाई। गेंजो के होठ खिल गये। यह बालक मिचिजेन के बालक से रंग रूप में बिल्कुल मिलता जुलता था। उसने तुरन्त ही उसे भर्ती कर लिया और निश्चय किया कि जब राजा के आदमी आवेंगे तो इसी बालक को आगे कर दूँगा।

नियत समय पर एक बड़ा अफसर जल्लादों को साथ लिए हुए पाठशाला आया। उसने अध्यापक से पूछा-’मिचिजेन का लड़का कहाँ है?’ गेंजो ने नये भर्ती हुए बालक की ओर उंगली उठा दी। अफसर ने भी कहा- ‘हाँ, यही बालक है, मैं इसे जानता हूँ।’ जल्लाद लड़के को उठा ले गये और एकान्त में ले जाकर उसका काम तमाम कर दिया। गेंजो कुछ समझ न सका कि यह नया बालक क्यों लाया गया और क्यों अफसर ने कहा कि-’मैं इसे जानता हूँ।’

अफसर अपने घर पहुँचा। उसकी स्त्री पत्थर का कलेजा किये बैठी थी। स्त्री ने पति से पूछा- “मिचिजेन का बालक बच गया?” अफसर ने कहा- “ हाँ बच गया, पर उसकी जगह तुम्हारा पुत्र चला गया।” माता की आँखों में से पुत्र प्रेम बह चला, उसने अंचल में मुँह छिपा कर कहा-”सो मैं जानती हूँ, मेरा बेटा परोपकार के लिए गया।”

अफसर ने जानबूझ कर अपने बालक को अपनी स्त्री के हाथों पाठशाला में भेजा था। वह जानता था कि ऐसा करने से मिचिजेन जैसे देश-भक्त का बालक बच सकता है। एक सच्चे देश सेवक की अमानत को बचाने के लिए अफसर को इतना करना आवश्यक मालूम हुआ था।


देश सेवा का मार्ग

प्लेटो ने एक स्थान पर लिखा है कि-’किसी देश का इससे अधिक सौभाग्य क्या हो सकता है कि उसमें श्रेष्ठ आचरण वाले स्त्री-पुरुषों का बाहुल्य हो।’ कवि वाल्ट व्हाइट मैन का कथन है कि-’किसी देश की महत्ता उसके ऊँचे भवनों, शिक्षालयों, सम्पत्ति कोषों से नहीं हो सकती। बलवान् और चरित्रवान् व्यक्ति ही अपने देश को महान बना सकते हैं। वह बड़ा ही भाग्यशाली राष्ट्र है, जिसके निवासी उच्च आचरण को अपना आदर्श मानते हों।’ जर्मनी के भाग्य विधाता हिटलर ने एक स्थान पर लिखा है-’हमारे देश को निर्बल स्वास्थ्य वाले धुरन्धर विद्वानों की अपेक्षा ऐसे व्यक्ति यों की अत्यधिक आवश्यकता है, जो भले ही कम पढ़े लिखे हों परन्तु वे स्वस्थ हों, सदाचारी हों, आत्मविश्वासी हों और दृढ़ इच्छाशक्ति वाले हों।’ नित्शे ने अपनी ईश्वर प्रार्थना में कहा था-’प्रभो! उच्च आदर्श वाले अधिक व्यक्ति यों को यहाँ उत्पन्न कर।’

देश की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम उच्च आचरण वाले, निर्भीक, साहसी, सदाचारी और स्वस्थ मनुष्यों की संख्या बढ़ावें। सुख, स्वराज्य, सुशासन तब तक किसी देश में स्थिर नहीं रह सकता, जब तक कि वहाँ के निवासी मानवोचित गुणों वाले न हों, वे मानवता का उत्तरदायित्व अनुभव न करते हों। निर्बलता, कायरता, भीरुता, छल, पाखंड और प्रवंचना का जब तक जोर रहेगा, तब तक दासता और दुर्भाग्य हमारा पल्ला नहीं छोड़ सकते। महात्मा गाँधी का कथन है कि “शारीरिक और मानसिक स्वस्थता की आवश्यकता जो लोग अनुभव करते हों और जो अपने को सब दृष्टियों से बलवान बनाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहें, ऐसे ही देश सेवकों की भारत माता को आवश्यकता है। हीन चरित्र वालों से देशोद्धार की भला क्या आशा की जा सकती है?’


ईमानदारी का फल

(श्री सोमनाथ जी नागर, मथुरा)

मनुष्य जीवन को ऊँचा और प्रभावशाली बनाने के लिए ईमानदारी का दृढ़ता से पालन करना अत्यन्त आवश्यक है। नेकनीयत मनुष्य में ईश्वरीय गुणों का समावेश होता है, उसका संतोष उसका सदा सहायक रहता है। नरपतराम जाति का वैश्य था, वह कुसंग से कोसों दूर रहना ही पसन्द करता था। खेती करके अपना निर्वाह करता था। एक बार उस प्रान्त में सूखा पड़ जाने से अन्न पैदा नहीं हुआ, अतः उसने परदेश जाकर नौकरी करने का निश्चय किया। बाल-बच्चों के निर्वाह का उचित प्रबन्ध करके वह चल दिया। अनेक नगरों में नौकरी ढूँढ़ी, परन्तु उसको उसकी इच्छानुसार ईमानदार मालिक नहीं मिला। उसने निश्चय किया कि नौकरी उसी के यहाँ करूंगा, जिसने कभी दूसरे की आँख में धूल न झोंकी हो।

जब उसे कोई अपने यहाँ नौकरी की जगह बतलाता तो वह उससे सवाल करता- क्या आपका ईमान अभी तक साबित है? लोग हँसते, पागल बतलाते और कहते-वाह! नौकरी करने चला है और ईमानदारी ढूंढ़ता है, थोड़ा बहुत तो सभी झूठ बोल जाते हैं या चोरी करते हैं। अन्त में पिछले तीन व्यक्तियों में से एक ने कहा भाई! वैसे तो मैं सदा सत्य बोलता रहा और पूरा तोलता रहा, किन्तु एक बार एक ग्राहक से भूल में चार पैसे अधिक वसूल किये और वह सारे उपयोग में आ गये, वहीं हमारा ईमान समाप्त हो गया। दूसरे ने कहा कि भाई! मैंने तो ईमानदारी पर ध्यान रक्खा, परन्तु कुछ समय तक अपने पड़ौसी की रक्खी हुई बुहारी में से नित्य ही भोजन के बाद दाँत कुरेदने को उस से बिना पूछे सींक ले लेता था, तभी मेरे ईमान में दाग लग गया। ‘सींक चोर सो पहाड़ चोर’ कहावत के अनुसार मैं ईमानदार नहीं हूँ। तीसरे साहूकार ने कहा-भाई! तुम मेरे यहाँ नौकरी करो, मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि मेरा ईमान अखण्ड है। अभी तक ईश्वर की कृपा से सत्य का पालन करता रहा हूँ। नरपतराम राजी हो गया। खुराक और एक रुपया महीना पर उसकी दुकान पर रहने लगा। कुछ दिन पीछे एक साहूकार उसके देश का वहाँ व्यापार करता हुआ आया, उससे घर के कुशल समाचार लेकर अपने कुशल पत्र के साथ वेतन में मिला हुआ एक रुपया अपनी स्त्री को देने के लिए दे दिया। साहूकार वहाँ से रवाना होकर एक राजधानी में गया, वहाँ मालूम हुआ कि राजा की कन्या बीमार है और औषधि के लिये पेठे के फल की जरूरत है, इस देश में पेठा मिलता नहीं। साहूकार ने नरपतराम के रुपये से मार्ग में ही एक पेठा खरीद कर रख लिया था। वह पेठा उसने राजा के पास भेज दिया। उसके बदले पुरस्कार में राजा ने दो हजार रुपये साहूकार के पास भिजवा दिये। वे रुपये साहूकार ने नरपत के पास भिजवा दिये। वे रुपये साहूकार ने नरपत के नाम जमा कर लिये, घर आकर वह रकम नरपत की स्त्री को सौंपने लगा, किन्तु वह डरी कि साहूकार कहीं कोई जाल तो नहीं फैलाता है, किन्तु साहूकार ने सब वृत्तान्त कह कर उसे विश्वास दिलाया और उस रुपये से उसका मकान बनवाया और उसके बच्चों के पढ़ने और निर्वाह का प्रबंध कर दिया। आनन्द के साथ एक वर्ष व्यतीत हुआ। नरपत भी नौकरी से छुट्टी लेकर घर को आया तो अपनी झोंपड़ी के स्थान में पक्का मकान खड़ा हुआ देख सुदामा की भाँति चकित रह गया और अपनी स्त्री को सुन्दर वेश-भूषा में देखकर भी संदेह में पड़ा, जब उसे सब कथा सुनाई गई, तब उसे भगवान सत्यनारायण के चमत्कार पर अटल विश्वास हुआ।


प्रेम से मुक्ति

क्या आपने कभी सोचा है कि मल-मूत्र की इस गठरी में बँधने के लिए यह सत्य, शिव, सुन्दर आत्मा क्यों रजामन्द हुआ? जन्म-मरण की इस दुखदायी ग्रन्थियों में उलझकर नाना प्रकार की यातनाएं सहने के लिये वह क्यों तत्पर हो गया? सुनिए, हड्डियों की इस अपवित्र ठठरी में बँधने के लिए वह इसलिये तैयार हुआ कि परमात्मा की पुण्य सृष्टि में प्रेम जो अमृत हिलोरें ले रहा है, उसका रसास्वादन करूं। इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को दौड़ती हैं, कान मधुर संगीत सुनना चाहते हैं, आँखें सुन्दर दृश्य देखना चाहती हैं, जिह्वा सुस्वादु भोजन चाहती है, स्पर्शेंद्रिय स्पर्श सुख चाहती है। इसी प्रकार आत्मा का भी एक विषय है, वह प्रेम के अमृत में गोते लगाकर अविरल आनन्द लूटना चाहती है। इसीलिये तो यह स्वर्ग अपवर्गों के सुख को छोड़कर इस भूलोक में अवतार लेती है। रीछ अपनी झाड़ी में से बाहर तब निकलता है, जब उसे शीतल वायु का आनन्द लाभ करने की इच्छा होती है, सर्प अपने बिल से बाहर ओस चाटने के लिए आता है, कोयल बसंत सुख लूटने आती है, खञ्जन पक्षी शरद ऋतु में देखे जाते हैं। उद्भिज जीव वर्षा ऋतु में प्रकट होते हैं, अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए ही हर कोई प्रेमी प्रकट होता है। आत्मा का भोजन प्रेम है। मछली जल में प्रसन्न रहती है, आत्मा का आनंद प्रेम में है। ईश्वर के राजकुमार अपने पिता के राज्य का सौंदर्य देखने के लिये भ्रमण करते हैं, प्राणधारी आत्मायें, परमात्मा की सृष्टि का प्रेम सौंदर्य निहारने आती हैं और इच्छित वस्तु को प्राप्त कर लेने पर अपने स्वस्थान को लौट जाती हैं।

हमारा जीवन बड़ा ही ऊबड़-खाबड़ अनिश्चित बेढंगा संघर्षमय, विपत्ति और असुविधाओं से घिरा हुआ, कष्टपूर्ण, श्रमसाध्य एवं अस्थिर है। यदि इसके अन्तरंग में कोई सुदृढ़ पृष्ठभूमि न होती तो सचमुच हमारा जीवन घृणित, व्यर्थ एवं त्याज्यनीय बन जाता है। कितने ही प्राणी ऐसा जीवन जीते हैं जिसकी अपेक्षा आत्महत्या सुखद है, किन्तु जीवन की समस्त बाधाएं विपत्तियों के बीच एक स्थिर आकर्षण है, जो जीव और जीवन को चुम्बक जैसे खिचाव से जकड़े रहता है। यह स्थिर सत्य है-’प्रेम’। प्रेम हमारे जीवन का मेरु-दण्ड है जिसके आधार पर संसार में ठहरना और समस्त कार्य-कला का वहन करना संभव हो सका है। प्राणी की मनोभूमि की जरा कल्पना तो कीजिए, जिसका अन्तःकरण प्रेम से सर्वथा शून्य है। ऐसी कल्पना यदि किसी प्राणी की मनोभूमि के बारे में की जा सके तो वह ग्रीष्म ऋतु की दोपहरी में धधकती हुई दावानल जैसी अनुभव होगी, जिसमें अपने को और दूसरों को भस्म कर देने का ही एकमात्र गुण होगा।

खूँखार हिंसक पशु भी प्रेम से रहित नहीं हैं, वे अपने बच्चों से कितना प्यार करते हैं, दम्पत्ति में कितना प्रेम होता है। डाकू , हत्यारे, चोर, व्यभिचारी भी किन्हीं अंशों में प्रेम के बिन्दु चाटते रहते हैं। अन्यथा वे विस्फोटक बम और तोप के गोले जैसे ही सर्वभक्षी बन जाते। किसी प्राणी में किन्हीं अन्य गुणों का अभाव होना संभव है पर यह हो नहीं सकता कि उसके अन्तःकरण में किसी के लिए कुछ भी प्रेम न हो। जैसे आग का गुण उष्णता है उसी प्रकार आत्मा का गुण प्रेम है। अविद्या की अँधेरी रात्रि में भी प्रेम के प्रकाश की कुछ किरणें विद्यमान रहती हैं, चाहे वे कितनी ही धुँधली और न्यून क्यों न हों।

निस्संदेह आत्मा प्रेममय है। उसे सुख अपने विषय में ही प्राप्त होता है। मछली को पानी में आनन्द है, इसके अतिरिक्त अन्य कहीं चैन नहीं। प्राणी का मन तब तक शान्ति लाभ नहीं कर सकता जब तक कि वह प्रेम में निमग्न न हो जाय। जब तक प्यास नहीं बुझती तब तक हम इधर-उधर भटकते हैं और जब ठंडा शीतल जल भर पेट पीने को मिल जाता है तो चित्त ठिकाने आ जाता है संतोष लाभ करके एक स्थान पर बैठ जाते हैं। सर्प का जब पेट भर जाता है तो वह अपने बिल में प्रवेश कर जाता है, बाहर घूमने की उसे कुछ जरूरत नहीं रहती, सीप समुद्र के ऊपर उतराती फिरती है, पर जब स्वाति की बूँद उसमें पड़ जाती है तो मोती को प्राप्त करके समुद्र की तली में बैठ जाती है। आत्मा प्रेम का आनन्द लूटने इस भूमण्डल पर आई है, अपनी प्रिय वस्तु को ढूँढ़ने के लिए इधर-उधर भटकती फिरती है। जिस दिन इसे इच्छित वस्तुएं प्राप्त हो जायेंगी, उसी दिन तृप्ति लाभ करके अपने परम धाम को लौट जायगी। भव-भ्रमण और मुक्ति का मर्म यही तो है।

हमें बार-बार जन्म इसलिए धारण करना पड़ता है कि प्रेम की प्यास बुझा नहीं पाते। मोह-ममता की मृग तृष्णा में मारे-मारे फिरते हैं। जिस दिन हमें सद्गुरु की कृपा से यह समझ आ जायगी कि जीवन का सार प्रेम है, उस दिन हम शाश्वत प्रेम को अपने अन्तःकरण में से ढूँढ़ निकालेंगे। हमारे अन्तःकरण में जिस दिन प्रेम भक्ति का अविरल स्रोत फूट निकलेगा, जिस दिन प्रेम नद में आत्मा स्नान कर लेगी, जिस दिन प्रेम का सागर हमारे चारों ओर लहराएगा, उसी दिन आत्मा को तृप्ति मिल जायगी और वह अपने भक्ति धाम को लौट जायगी।


माता या शत्रु?

(श्री दरबारीलाल जी सत्य भक्त )

एक नगर में एक विधवा स्त्री रहती थी, जिसका एक लड़का था। एक तो इकलौता बेटा, फिर दूसरा कोई सहारा नहीं, इसके अतिरिक्त मोहिनी मूढ़ भी काफी थी। इसलिये उसे अपने लड़के का गहरा मोह था। निरंकुश रहने से लड़का उद्दंड होने लगा। जब वह कोई बदमाशी करता और पड़ौसी उलाहना देते, तो वह लड़के के अपराध का विचार किये बिना पड़ोसियों से लड़ने लगती। अगर पड़ौसी इतना प्रभावशाली होता कि उससे लड़ना कठिन होता, तो लड़के को आँचल से ढ़क कर रोने लगती। इस प्रकार कहीं जीभ चला कर, कहीं आँसू दिखा कर वह पड़ौसियों को हरा देती और अपने लड़के पर आँच न आने देती। परिणाम यह हुआ कि लड़का चोर बदमाश और क्रूर हो गया और जवानी के प्रारम्भ से ही वह रंडीबाज़ी भी करने लगा। उसकी प्यारी वेश्या से जब एक दूसरे आदमी ने सम्बन्ध जोड़ा तो इसने उस आदमी का और वेश्या का खून कर दिया। जब सरकार से उसे मृत्यु दंड मिला और अधिकारियों ने जब दंड देने के समय उसकी अन्तिम इच्छा जानना चाही, तो उसने माता से मिलने की इच्छा प्रकट की। जब माँ उससे मिलने आई तब उसने माँ की नाक काट ली और कहा अगर तूने मेरी छोटी अवस्था में ही मोह में भूलकर मुझे उद्दण्ड न बनने दिया होता, पड़ौसियों के उलाहनों का विचार करके मुझे सुधारा होता तो आज मेरी यह दशा न हुई होती।

इस प्रकार मोह से मोहनी का जीवन भी बर्बाद हुआ, दूसरों की भी हानि हुई और उसका प्यारा लड़का भी जान से गया। सन्तान से प्रेम और वात्सल्य रखना चाहिए, मोह नहीं। मोह से अपना भी नुकसान होता है और सन्तान का भी जीवन बर्बाद होता है।

—सत्यामृत से


प्रेम की पाठशाला

आप प्रेमी बनना चाहते हैं, तो पवित्र प्रेम का अभ्यास पहले अपने घर से आरम्भ कीजिए। प्रेम की प्रारम्भिक पाठशाला अपना घर ही हो सकता है। घर से समस्त स्त्री-पुरुषों, बालक-बालिकाओं से निःस्वार्थ प्रेम करिए। फिर देखिये कि बदले में कितना अधिक प्रेम आपको प्राप्त होता है।

जानना चाहिए कि प्रेम का अर्थ है त्याग और सेवा। आप घर के हर व्यक्ति के पक्ष में अपने स्वार्थों को छोड़िए और जिसे जिस वस्तु की आवश्यकता है, उसे वह प्रदान कीजिए। वृद्ध जन आप से शारीरिक सेवा चाहते हैं, बालक आप के साथ हँसना-खेलना चाहते हैं, भाइयों को आपका आर्थिक सहयोग चाहिए, स्त्री को आपके स्नेहपूर्ण वार्तालाप की आवश्यकता है। जो जिस वस्तु को चाहता है, उसे वह प्रदान कीजिए, परन्तु ध्यान रखिए प्रेम कोई व्यापार नहीं है। एक हाथ से देकर दूसरे हाथ से माँगने की नीति प्रेमी को शोभा नहीं दे सकती। वृद्धजनों से आप आशा मत करिए कि वे आप की प्रशंसा करें ही। न भाइयों से यह चाहिए कि कमाऊ होने के नाते आप को कुछ अधिक महत्व दें। स्त्री यदि आप की इच्छानुकूल शुश्रूषा करने में असमर्थ है, तो उस पर झुँझलाइए मत, क्योंकि आप प्रेमी बनने जा रहे हैं। प्रेमी देकर माँग नहीं सकता।

दुनिया में सारे झगड़ों की जड़ यह है कि लोग देते कम हैं और माँगते ज्यादा हैं। हमें चाहिए यह कि दें बहुत और बदला बिलकुल न लेंगे या बहुत कम पाने की आशा रखें। यह नीति ग्रहण करते ही हमारे आस-पास के सारे झगड़े मिट जाते हैं। प्रेमी त्याग करता है—उस का त्याग बेकार नहीं जाता, वरन् हजार गुना होकर लौट आता है। झगड़ा करने पर जितना बदला मिलता है, उससे अनेक गुना उसे बिना माँगे मिल जाता है। कदाचित् कुछ कम भी मिले,तो प्रेम से उत्पन्न होने वाले आन्तरिक आनन्द के मुकाबले में वह कमी नगण्य है। निरन्तर देते रहने का स्वभाव जिन के हृदयों में स्थान कर लेता है, वह जानते हैं कि स्वर्गीय निर्धन आत्मायें हर्षान्दोलित करने में कितनी समर्थ हैं। त्याग की दैवी वृत्तियाँ हमारे आस-पास के वातावरण को स्वर्गीय सम्पदाओं से भर देती हैं।

त्याग के साथ-साथ सेवा भी होनी चाहिए। जिस व्यक्ति को जिस वस्तु की आवश्यकता है, उसे वही दी जाय। कौन क्या चाहता है, इसके आधार पर यह निर्णय नहीं हो सकता कि उसे वही वस्तु मिलनी चाहिए। सन्निपात का रोगी मिठाई माँगता है, पर मिठाई देना तो उससे दुश्मनी करना है। आप का कोई प्रिय-जन कुमार्ग पर चलता है और उस दुष्कर्म की पूर्ति में आप को सहायक बनाना चाहता है। यदि आप उसकी सहायता करने लगे, तो यह उसके साथ एक भयंकर अपकार होगा। आप को सुयोग्य सिविल सर्जन की तरह यह जाँच करनी होगी कि उसे वास्तव में क्या कष्ट है और उसका उपचार किस प्रकार करना चाहिए। हैजे की बीमारी में बड़ी भारी प्यास लगती है, पर सुयोग्य डॉक्टर बीमार को मनमानी मात्रा में पानी नहीं पीने देता। हो सकता है कि रोगी उस समय डॉक्टर से नाराज हो और उसके साथ अभद्र व्यवहार करे पर डॉक्टर प्रेमी है, इसलिए वह तात्कालिक प्रतिक्रिया की ओर खयाल नहीं करता और रोगी के दीर्घकालीन हित को अपने मन में रखता हुआ अपना कार्य आरम्भ करता है।

घर के जिन लोगों की मनोभूमि में जो त्रुटि देखें वह दूर करने के लिए प्रयत्नशील रहें। त्याग वृत्ति से उन्हें प्रसन्न रखने का प्रयत्न करें, पर कैंची से काट छाँट कर इन पेड़ों को सुरम्य बनाने का प्रयत्न करने में भी न चूकें, अन्यथा यदि उनकी कुभावनाओं को सिंचन मिलता रहा; तो वे एक दिन बड़े विकृत और कटीले झाड़ बन सकते हैं। प्रेम के दो अंगों को पूरी तरह हृदयंगम कीजिए—त्याग और सेवा, दान और सुधार। खेती को पानी की जरूरत है, पर नराई की भी कम आवश्यकता नहीं है। दोनों काम एक दूसरे से कुछ विपरीत जान पड़ते हैं, सहायता और सुधार का एक साथ मेल मिलता नहीं दीखता, यह कार्य बड़ा कठिन प्रतीत होता है, इसलिए प्रेम करना तलवार की धार पर चलना कहा गया है। प्रेमी का तलवार की धार पर चलना पड़ता है।

बच्चा अपने घर के आँगन में कला खेलना सीखता है। आप अपने परिवार में प्रेम की साधना आरम्भ कीजिए। शिक्षा और दीक्षा से अपने प्रियजनों के अन्तःकरणों में ज्ञान की ज्योति जलाइये, उन्हें सत् असत् का विवेक प्राप्त करने में सहायता दीजिए, परन्तु सावधान, यह कार्य गुरु की तरह आरम्भ न किया जाय, अहंकार का इसमें एक कण भी न हो, वरन् सेवा का दूध अहंकार की खटाई से फट जायगा। अहंकार पूर्वक उपदेश करेंगे, तो तिरस्कार और उपहास ही हाथ लगेगा। इसलिए जिसमें जो सुधार करना हो वह विनयपूर्वक उसे सलाह देते हुए कहिए या करिए। “धीरे धीरे, बार बार और सद्भावना से” ढाक को चन्दन और कौए को हंस बनाया जा सकता है। “अपने लिए कम और दूसरे को ज्यादा” इस नीति से भेड़ियों को कुत्ता और गधों को गाय बनाया जा सकता है।

आप प्रेम की महान साधना में प्रवृत्त हो जाइए! त्याग और सेवा को अपना साधन बनाइये, आरम्भ अपने घर से कीजिए। आज से ही अपनी पुरानी दुर्भावनाएं मन के कोने 2 में ढूंढ़ कर निकालिए और उन्हें झाड़ बुहार कर दूर फेंक दीजिए। प्रेम की उदार भावनाओं से अन्तःकरण को परिपूर्ण कर लीजिए और सगे सम्बन्धियों के साथ त्याग एवं सेवा का व्यवहार करना आरम्भ कर दीजिए। कुछ ही क्षणों के उपरान्त आप एक चमत्कार हुआ देखने लगेंगे। आप का यही छोटा सा परिवार जो आज शायद कलह-क्लेशों का घर बना हुआ है, आप को सुख शान्ति का स्वर्ग दीखने लगेगा। आपकी प्रेम भावनाएं आस-पास के लोगों से टकराकर आपके पास ही लौट आवेंगी और वे आनन्द के भीने-भीने सुगन्धित फुहार से छिड़क कर प्रेम के रंग में सराबोर कर देंगी। प्रेम की पाठशाला का आनन्द अनुभव कर के ही जाना जा सकता है। विलम्ब मत कीजिए, आज ही आप इसमें भर्ती हो जाइये।


Quotation

वह दिन धन्य है, जिस दिन एक आदमी यह अनुभव करता है कि वह स्वयं ही अपना रक्षक और भक्षक है, स्वयं उसमें ही उसके समस्त दुःखों और ज्ञानाभाव के कारण मौजूद हैं और स्वयं उसके अपने ही भीतर समस्त शान्ति तथा प्रकाश के स्रोत विद्यमान है।

*****

अपनी मानसिक अवस्थाओं को वश में करो, उत्तेजनाओं का शासन अस्वीकार कर दो।

*****

लगातार क्षमा माँगना या क्षमा माँगने जैसी सूरत बनाये रखना, रूढ़ियों और प्रथाओं का प्रभुत्व तथा शक्ति को स्वीकार करना है। इससे यह भी प्रकट होता है कि क्षमा-प्रार्थी आदमी भी समाज का गुलाम और रूढ़ियों का दास है।


वैराग्य और प्रेम

एक पुराना खयाल है कि “घर में प्रेम न करना चाहिये, स्त्री-बच्चों के प्रेम में फँस जाने से नरक मिलता है। “इस खयाल के अनुसार कई मनुष्य अपने ऊपर पड़े हुए गृहस्थ कर्तव्य को छोड़ कर भाग खड़े होते हैं और ईश्वर-भक्ति की रट लगाते हैं। कई नौजवान जो अपनी जिम्मेदारी निबाहने में नालायक साबित होते हैं, घर बार से मुँह मोड़ कर गेरुआ कपड़ा पहन लेते हैं और इधर-उधर भीख माँगते फिरते हैं। इनके आश्रित जो परिवार था, वह नाना प्रकार के कष्ट पाता हुआ बिलख-बिलख कर उन्हें कोसता है। पति रहित होकर स्त्री को अपमानित, अभावपूर्ण और अशान्तिमय जीवन व्यतीत करना पड़ता है। योरोप जैसे देशों में ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देना किसी अंश तक बहुत बुरा नहीं है, क्योंकि वहाँ स्त्री को दुबारा घर बसा लेने के छूट है। किन्तु भारतवर्ष में हिन्दू धर्म के अनुसार जहाँ स्त्रियों को इस प्रकार की स्वतंत्रता नहीं है, वहाँ उन्हें घुट-घुट कर मरने के लिये विवश करने वाला संन्यासी पति निश्चय ही प्रथम श्रेणी का अविवेकी है। स्वेच्छाचारिणी स्त्री को स्वतंत्र कर देना बात दूसरी है पर बेचारी अबला का एकमात्र अवलम्ब तोड़ देना बहुत ही बुरी बात है। इसी प्रकार जिन बालकों के भरण-पोषण एवं शिक्षा-दीक्षा का भार प्रभु ने सौंपा है, उस भार को एक ओर पटक कर ईश्वर की रट लगाने के लिए निकल पड़ना कैसी भक्ति है, यह समझ में नहीं आता। वृद्ध माता-पिता की सेवा, भाइयों की सहायता, स्त्री-पुत्रों का विकास, निकटवर्ती बान्धवों की सेवा यह सब त्याग कर धृष्टता पूर्वक गेरुए कपड़े पहन कर भिखारी बनने वाला व्यक्ति उस सेवक का उदाहरण बनता है जो अपने स्वामी के सौंपे हुए काम को तो तोड़-फोड़ कर चकनाचूर कर देता है और स्वामी का नाम जपने के लिए माला ले बैठता है। स्वामी किसी भी प्रकार उससे प्रसन्न नहीं हो सकता। भला ऐसे मूढ़ सेवक पर प्रसन्न हो भी कौन सकता है, जो कर्तव्य की तो कायरतापूर्वक उपेक्षा करता है और स्वामी को खुश करने की शेखचिल्ली जैसी अन्य युक्तियाँ सोचता है। रात को मालिक के घर की रखवाली के समय दुम दबाकर छिपा रहने वाला और दिन में मालिक के सामने दुम हिलाने वाला और पाँव चाटने वाला कुत्ता क्या कभी अपने स्वामी का प्रिय पात्र बन सकता है?

कि सी अत्यन्त महान कार्य को पूर्ण करने में गृह, कुटुम्ब, धन तथा प्राणों की बाजी लगा देना दूसरी बात है। विश्व सेवा का उच्चतम कार्य करने का किसी व्यक्ति में साहस हो और उस यज्ञ में आहुति देने के लिए अपनी प्राणप्रिय वस्तुओं को भी समर्पित कर देना दूसरी बात है। वह बहुत ऊँची और सराहनीय स्थिति है किन्तु साधारण जीवन बिताने में घर की अपेक्षा बाहर को महत्व देना, ईश्वर प्रेम के नाम आश्रित जनों को फाँसी पर टाँगना कायर-बुज़दिली, नपुँसकता और निकम्मेपन के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। ईश्वर ऐसा क्रूर और निर्दयी नहीं है जो मनुष्यों को यह आदेश करे कि तुम अपने साँसारिक उत्तरदायित्वों को छोड़कर मेरे सामने नाक रगड़ो।

ज्ञान से परिपूर्ण होकर मानसिक संन्यास ग्रहण करना और अपने जीवन को अधिक से अधिक लोगों की सेवा में लगा देना बहुत प्रशंसनीय कार्य है। ऐसी उच्चतम स्थिति जब परिपक्व हो जाय तो पके हुए फल की तरह डाली से टूट पड़ना सम्भव है। यही संन्यासी की दशा स्वाभाविक है। ऐसा संन्यासी बहुत काल पूर्व से अपनी साधना आरंभ करता है और अपने आश्रितों को मानसिक और भौतिक दृष्टि से ऐसा स्वावलम्बी बना देता है कि घर में रहने या घर छोड़ने में कुछ अन्तर नहीं रह जाता। उसे किसी कारणवश परिव्राजक बनना पड़े तो घर वालों को कष्ट नहीं होता। आवेश में आकर किंकर्तव्यविमूढ़ होकर किसी समस्या को सुलझाने में असमर्थ होने पर, गेरुआ कपड़ा पहनकर भिखारियों की श्रेणी में मिल जाना न तो ईश्वरभक्ति है, न मुक्ति साधना है, न त्याग है और न संन्यास है। यह तो एक प्रकार की आत्महत्या ही कही जायगी।

यह पुराना खयाल कि घर में प्रेम न करना चाहिये, केवल इस बात का बोधक है कि पारिवारिक ममता में इतना लिप्त न हो जाना चाहिये कि परमार्थ का ध्यान भी न रहे। मोह और ममता का विस्तार होना घातक है। स्त्री-बच्चों में कभी-कभी इसकी अति देखी जाती है, इस अति पर प्रतिबन्ध लगाने के लिये ही यह प्राचीन मत उपस्थित किया जाता है। वैराग्य, उदासीनता, निर्लिप्तता का भावार्थ मानसिक निष्काम भाव है। मन में विषयों का चिन्तन करता हुआ बाहर से त्याग का आडंबर करने वाला तो गीता के मत से मिथ्याचारी ही कहा जायगा। राजा जनक इतने बड़े योगी थे कि उनसे बड़े-बड़े ऋषि योगविद्या सीखने आते थे। गृहस्थ रह कर ही संन्यासी बनने का अभ्यास करना चाहिये। निष्काम भाव से कर्तव्य धर्म का पालन करते हुए निस्वार्थ प्रेम की स्थापना करनी चाहिये।

कर्तव्य भावना से प्रेम प्राप्त करने का हर प्राणी अधिकारी है, फिर यह कैसे उचित हो सकता है कि स्त्री-बच्चों के साथ सुस्नेह का परिचय न दिया जाय।


प्रेम का संघर्ष

(महात्मा गान्धी)

एक सत्यनिष्ठ व्यक्ति अपने आत्मबल या प्रेम से शत्रु को भी अपने वश में कर लेता है। मित्र मंडली में प्रेम की कसौटी नहीं होती। यदि मित्र-मित्र पर प्रेम करे तो इससे कोई नवीनतम नहीं है। वह गुण नहीं है, उसमें श्रम नहीं है परन्तु शत्रु के प्रति मित्रता रखने में ही प्रेम की कसौटी है, इसी में पुरुषार्थ है और इसी में सच्ची बहादुरी है। शासनकर्त्ताओं पर भी हम ऐसी दृष्टि रख सकते हैं। ऐसी दृष्टि रखने से हम उनके कामों का मूल्य जान सकेंगे और उनकी भूलों के लिए द्वेष के बदले प्रेम भाव से वे भूलें बता कर उन्हें दूर करने में समर्थ होंगे। इस प्रेमभाव में भय की गुजर नहीं। निर्बलता तो पास नहीं फटकती। निर्बल मनुष्य प्रेम का प्रकाश नहीं कर सकता। प्रेम तो शूर ही दिखा सकते हैं। प्रेम की दृष्टि से विकार को हटाकर हमें अपने शासनकर्त्ताओं को संदेह की दृष्टि से नहीं देखना चाहिये। यह भी मानिए कि वह सब काम पूरी नेकनीयती से करते हैं। प्रेमपूर्वक अपने द्वारा की हुई उनके कार्यों की परीक्षा इतनी शुद्ध होगी कि उसकी छाया उनके ऊपर पड़े बिना न रह सकेगी।

प्रेम लड़ सकता है। प्रेम को कितनी ही बार लड़ना पड़ता है। सत्ता के मद में मनुष्य अपनी भूलों पर दृष्टि नहीं रखता। उस समय सत्याग्रही बैठा रहता है। वह स्वयं दुख सहन करता है। सत्ताधीश की आभा का उनके कानूनों का सादर निरादर करता है और उस निरादर के परिणाम स्वरूप कष्ट, जेल, फाँसी इत्यादि सहन करता है। इस प्रकार आत्मा सुधरती है। वज्र के समान कठोर हृदय वाला भी आत्मबल की अग्नि में पिघल सकता है, यह अतिशयोक्ति नहीं, किन्तु गणित के अक्षरों के समान स्पष्ट है।


ईसप की नीतिशिक्षा

(1)

एक चींटी नदी के किनारे पानी पीने गई। वह अचानक लहरों के थपेड़े में पड़कर पानी में बहने लगी। एक कबूतर किनारे पर बैठा हुआ यह देख रहा था। उसने वृक्ष से एक पत्ता तोड़ कर डाल दिया। चींटी उस पर चढ़कर बहते-बहते किसी प्रकार किनारे पर जा लगी।

एक बार उस कबूतर को पकड़ने के लिए शिकारी ने जाल फैलाया। चींटी ने यह देखा और अपने ऊपर उपकार करने वाले के प्राण बचाने दौड़ी। कबूतर जाल में फंसने ही वाला था कि चींटी ने शिकारी के पैर में बड़े जोर से काट लिया। जिससे वह पैर पीटने लगा। आहट पाकर कबूतर उड़ गया और उसके प्राण बच गये।

उपकार का बदला अवश्य मिलता है।

( 2 )

एक लड़का कम चौड़े मुँह के बर्तन में हाथ डालकर उसमें रखी हुई मेवा पूरी मुट्ठी भरके निकालने लगा, पर बर्तन का मुँह छोटा होने के कारण मेवे से भरी हुई मुट्ठी बाहर न निकलती थी। लड़का रोने लगा। इस पर एक चतुर आदमी ने हँसकर कहा—यदि तुम मुट्ठी के आधे मेवे छोड़कर आधे लेने पर ही रजामंद हो जाओ तो अभी तुम्हारा हाथ निकल सकता है।

विपत्ति आने पर जो आधा छोड़ देता है वह बच जाता है।

( 3 )

शिकारी से प्राण बचाता हुआ एक हिरन अंगूरों की लताओं में छिपा रहा। शिकारी की आँखों से ओझल हुआ समझकर हिरन ने अंगूर की सारी पत्तियाँ चरलीं।

शिकारी जो उसे तलाश करता हुआ घूम रहा था, उधर आ निकला और हिरन को देखते ही मार लिया। मरता हुआ हिरन कह रहा था कि अपने आश्रय देने वाले के साथ जो कृतघ्नतापूर्ण व्यवहार करता है उसकी यही दुर्गति होती है।

( 4 )

एक सईस अपने मालिक के घोड़े का दाना चुरा लेता था और मालिक को वफादारी दिखाने के लिये उसे खूब मला करता था। दाना कम हो जाने पर घोड़ा दुबला होने लगा। एक दिन सईस ने घोड़े से पूछा—भाई, मैं चाहता हूँ कि तुम मोटे हो जाओ, बताओ मुझे क्या करना चाहिए। घोड़े ने उत्तर दिया—पीठ मलना कम करो और दाना बढ़ाओ।

किसी की वास्तविक सेवा करनी हो तो बातें बनाना कम करके कुछ ठोस सहायता करनी चाहिए।

( 5 )

एक हिरन अपनी भलमनसाहत के लिये बहुत प्रसिद्ध था। जंगल के सब जानवर उससे बहुत प्रसन्न रहते थे। एक बार वह बीमार पड़ा; तो जानवरों के झुँड के झुँड उसे देखने आने लगे। जो आता वही हिरन के सामने रखी हुई घास में एक मुँह खा जाता। इस प्रकार हिरन की सारी घास समाप्त हो गई और वह भोजन के अभाव में भूखा मर गया।

केवल सहानुभूति जताने वाले और कार्य रूप में कुछ सहायता न करने वाले मित्रों से भला किसको लाभ हो सकता है?

( 6 )

नासपाती और सेब के पेड़ आपस में झगड़ रहे थे। एक कहता था मैं सुन्दर हूँ, दूसरा कहता मैं।बड़बेरी के पेड़ ने नम्रता से कहा—जब तक मैं हूँ तब तक आपको विवाद करने की आवश्यकता नहीं है। मेरी अपेक्षा तो आप दोनों अधिक सुन्दर हैं।

अपने से निर्बल और दुखियों को देखकर अपनी दशा पर सन्तोष करना चाहिये।

कथा—


अखण्ड प्रेम

(श्री ॰ मंगल चंद भंडारी, अजमेर)

वे दोनों अनाथ बालिकाएँ लन्दन के पश्चिमी भाग की एक छोटी सी बस्ती में अपनी झोंपड़ी में रहती थी। अनाथ थीं तो भी वे साहसी थीं। अकेलापन उन्हें दुःख न दे सका। उन्होंने अपनी उन्नति जारी रखी। स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कृति सभी विषयों में वे दत्तचित्त रहीं। गरीब घराने की ये अनाथ बालिकाएँ जब वयस्क हुई तो सब की दृष्टि में वे सुगन्धित स्वर्ण के समान आकर्षक और आदरणीय बन गई। अद्वितीय रूप सौंदर्य और उच्च मानवीय गुणों से संस्कारित उनका स्वभाव सर्वत्र प्रशंसनीय बना हुआ था।

बड़ी का नाम था जेन और छोटी एनी। दोनों में तीन-चार वर्ष का फर्क था तो भी वे देखने में बिलकुल एक सी प्रतीत होती थी। जैसे उनका शरीर और रूप सौंदर्य एक सा था, वैसे ही उनका-हृदय भी उच्च गुणों में परिमार्जित एक ही प्रकार का था। दोनों में प्रेम इतना था मानो एक ही आत्मा ने दो स्वरूप धारण कर रखें हों।

समय की गति के साथ उनकी आयु बढ़ने लगी। अब वे बालकपन और किशोरावस्था को पार करके यौवन के क्षेत्र में पदार्पण कर चुकी थीं। जेन अपने धार्मिक अध्ययन में लगी हुई थी किन्तु ऐनी के मन में यौवन की मादक मदिरा छलकने लगी। उसका मन चार्ल्स नामक एक युवक की तरफ आकर्षित हुआ। युवक ऐनी के अनुरूप ही था। उच्च शिक्षा, उत्तम स्वास्थ्य और अन्य सद्गुणों के कारण ही समाज में वैसा ही आदरणीय था, जैसी कि वे दोनों बहनें। प्रतीत होता था कि ईश्वर ने यह जोड़ा बड़ी चतुराई के साथ अपने हाथों बनाया हो। दोनों का प्रेम बढ़ते एक दिन प्रणय संबंध में परिणत हो गया। ईश्वर की इच्छा दोनों अधिक दिनों तक सोने के दिन और चाँदी की रातें न देख सके। काल की कराल गति ने दोनों को एक दूसरे से अलग कर दिया। चार्ल्स सेना में भरती हो गया और शीघ्र ही एक घमासान युद्ध में सेना का अधिनायकत्व करने के लिए चला गया। ऐनी ने छाती पर पत्थर रखकर चार्ल्स को विदाई दी और एक सती साध्वी देवी की भाँति पति का नाम स्मरण करती हुई विछोह के दिन तपस्यापूर्वक बिताने लगी।

वैसे वह किन्हीं भोज उत्सवों में सम्मिलित नहीं होती थी पर उस दिन एक निकट सम्बन्धी के यहाँ दावत में उसे जाना पड़ा। ऐनी के कोकिल कंठ की वाणी सुनने के लिये अतिथियों का अत्यन्त आग्रह था। वह अनुरोध जब अत्यधिक बढ़ गया तो उससे इनकार करते न बन पड़ा।

ऐनी की उँगलियाँ पियानो पर नाचने लगीं। उसने एक बड़ा ही भावपूर्ण गीत गाया। सारी सभा चित्र लिखित सी मुग्ध हो बैठी थी, मानो उसकी स्वर लहरी में सब लोग तन्मय हो गये हों। उस गोष्ठी में एक अमृतमयी निर्झरिणी झर रही थी।

लेकिन अरे! यह क्या? गीत पूरा भी न होने पाया था कि अचानक बीच में ही एक व्यवधान आ उपस्थित हुआ। ऐनी मूर्तिवत् जड़ हो गई, मानो उसे काठ मार गया हो। हाथ पियानो पर था, मुँह खुला हुआ था और आँखें घबराई हुई। वह एकदम घबराई हुई विक्षिप्त सी दीखने लगी। उसकी यह दशा देखकर सब लोग घबरा गये और कारण जानने के लिए उसके पास दौड़े। सभा का रंग भंग हो गया।

ऐनी एक प्रकार का प्रलाप कर रही थी। बहुत समय के उपरान्त लगातार प्रश्न करने पर पता चला कि अचानक ऐनी को ऐसा दिखाई पड़ा कि उसके सामने चार्ल्स की छाया मूर्ति खड़ी हुई है। सैनिक वेश में सुसज्जित उसका पति मरणासन्न दशा में वहाँ आया है। छाती में ठीक दिल के पास एक बड़ा भारी जख्म हुआ है, जिसमें छल-छल रक्त की धारा प्रवाहित हो रही है। उसके सारे कपड़े खून में तरबतर हो रहे हैं। बड़ा कातर होकर वह ऐनी की ओर निर्निमेष दृष्टि से देख रहा है।

उपस्थित सज्जनों में से किसी ने इसे भ्रम बताया किसी ने स्वप्न। पर ऐनी हतबुद्धि होकर मूर्च्छा में गिर पड़ी, उसे विश्वास हो गया कि अवश्य ही यह घटना सत्य है। मूर्च्छित ऐनी को घर ले जाया गया और यथाविधि उसका उपचार आरम्भ किया गया। डॉक्टर लोग बराबर यह विश्वास दिला रहे थे कि यह सब भ्रम है। हमारी दवाओं से तुम बहुत शीघ्र स्वस्थ हो जाओगी, किन्तु ऐनी का हृदय हाहाकार कर रहा था।

चौथे दिन युद्ध क्षेत्र से एक बन्द लिफाफा आया। जेन उस सीलबन्द पत्र को बिना खोले ही ऐनी के पास ले गई। मूर्च्छित अवस्था में उसने एक बार आँखें खोलीं, देखा कि जेन के हाथ में एक लिफाफा है, जिसमें युद्धक्षेत्र की सील मुहर लगी है। उस लिफाफे के देखते ही ऐनी के मुंह से एक बड़ा ही हृदय विदारक चीत्कार निकला। मानों हजार छुरियों से किसी ने उसके ऊपर हमला किया हो। दूसरे ही क्षण उसके प्राण पखेरू उड़ गये। उसका मृत शरीर शय्या के ऊपर लुढ़क रहा था।

उपस्थित महानुभावों ने उस सील बन्द लिफाफे को खोला तो उसमें फौजी कर्नल ने लिखा था कि- “युद्ध क्षेत्र में मातृभूमि की महान सेवा करते हुए शत्रु की सनसनाती हुई गोली का हृदयलिंगन करके वीर चार्ल्स ने स्वर्ग प्रयाण किया।”


दुष्टों से भी प्रेम करो!

(बाइबिल की वाणी)

वैर से तो झगड़े उत्पन्न होते हैं, पर प्रेम से सब अपराध ढ़क जाते हैं। समझ वालों के वचनों में त्रुटि पाई जाती है, पर निर्बुद्धि की पीठ के लिये कोड़ा है।

10।12,13।

मत कह कि जैसा उसने मेरे साथ किया वैसा ही मैं भी उसके साथ करूंगा और उसके काम के अनुसार पलटा दूँगा।

24। 29।

जब तेरा शत्रु गिरे तब तू आनंदित न हो और जब वह ठोकर खाए तब तेरा मन मगन हो। कहीं ऐसा न हो कि यहोवा यह देखकर बुरा माने और अपना कोप तुझ पर उतारे।

24।17,18।

यदि तेरा बैरी भूखा हो तो उसको रोटी खिलाना और यदि वह प्यासा हो तो उसे पानी पिलाना क्योंकि इस रीति से तू उसके सिर पर अँगारे डालेगा और यहोवा तुझे इसका फल देगा।

24।21,22।

मूर्ख को उसकी मूढ़ता के अनुसार उत्तर न देना, ऐसा न हो कि तू भी उसके तुल्य ठहरे।

26। 4

यह मन ताको दीजिये, सुठि सेबक भल सोइ।

सिर ऊपर अवरा सहै, तऊ न दूजा होइ॥

प्रेम हजारी कापड़ा, तामें मैल न समाइ।

साखी काली काँवली, भावै तहाँ बिछाइ॥

प्रेम वियोगी तन विकल, ताहि न चीन्है कोइ।

तंबोली के पान ज्यों, दिन दिन पीला होइ॥

जिहि हिरदै हरि आइयाँ, सो क्यू छाँना होइ।

जतन जतन कर दाविये, तऊ उजाला होइ॥

—सन्त कबीर।


विश्व प्रेम का एक ठोस कार्य

संसार में मानव प्राणी की जो दुर्दशा हो रही है, उसे देखकर हृदय विचलित हो जाता है। बीमारी से शरीर क्षत-विक्षत हो रहे हैं, गरीबी के कारण आवश्यक वस्तुओं का अभाव दुःख दे रहा है, चिन्ता और कलह क्लेशों की दावानल में मानसिक शान्ति जली जा रही है। वियोग, विछोह, ममता-मोह अलग ही दुःख दे रहे है, पापों की ओर झुकाव होने से आपत्तियों के ज्वालामुखी चारों ओर चिनगारियाँ बरसा रहे हैं। अज्ञान और दारिद्र का नग्न नृत्य हो रहा है। बेचारी मानवता इन वेदनाओं की चिता में पड़ी हुई है। यह भूलोक मरघट बना हुआ है।

जगज्जननी वसुन्धरा की संतान, परब्रह्म परमात्मा के अमर युवराज, सच्चिदानंद आत्मा के प्रतिनिधि-मानव प्राणी इस प्रकार की व्यथा वेदनाओं में झुलसे और मैं खुश खड़ा निष्ठुर नेत्रों से उन्हें देखूँ, यह कैसे हो सकेगा। मैं प्रेम धर्म का अनुयायी हूँ, मेरे अन्तःकरण में दया का संचार हो रहा है, विश्व के दुखों को हलका करने के लिये मुझ से जितना बन पड़ेगा, अवश्य करूंगा। प्रभु की इस सुरम्य वाटिका के पौधों को हरा भरा करने के लिए अपना पसीना बहाकर सिंचन करूंगा। अपने आत्मीय स्वजनों, मानव बन्धुओं को विपत्ति में से निकालने के लिए यदि मेरा अन्तःकरण उल्लासित न हो तो उसमें और पाषाण में, अन्तर ही क्या रह जायगा? दया प्रेम और करुणा से भरा हुआ मानस लेकर आज मैं अपना कदम आगे बढ़ाऊँगा और अपनी संपूर्ण शक्ति यों को मानव जाति की सेवा में समर्पित करके उसे सुखी बनाने का व्रत ग्रहण करूंगा।

देखता हूँ सामने एक बीमार पड़ा हुआ है। उसकी सेवा करता हूँ, दवा-दारु का प्रबन्ध करता हूँ, सतत प्रयत्न से उसे अच्छा कर देता हूँ, लेकिन अरे यह क्या, अभी तो दस दिन भी बीतने नहीं पाये, वह फिर बीमार पड़ गया। बेचारा स्वास्थ्य के नियमों से परिचित न था, बीमारी से उठने के बाद कुपथ्य करने लगा, फिर बीमार पड़ गया। इसकी ऐसे तो रोज ही सेवा करनी पड़ेगी। मैं रोज अच्छा करूंगा यह फिर वैसा ही हो जायगा, इसे छोड़ू, चलूँ दूसरे की सेवा करूंगा।

यह सामने एक बड़ा दरिद्र भिक्षुक आ रहा है, उसकी सहायता करना मेरा कर्तव्य है। अपने लिए जो भोजन बनाया है, वह उसे खिला देता हूँ, बेचारे की भूख मिट जायगी, मेरी क्या है; मैं आज भूखा ही रह लूँगा। प्रसन्नतापूर्वक मैंने स्वयं भूखे रहकर अपना भोजन उसे करा दिया। पर अरे, मेरा प्रयत्न तो व्यर्थ रहा। कल मैंने स्वयं भूखे रहकर इसकी भूख मिटाई थी, यह तो आज फिर भूखा का भूखा है, यों जिन्दगी भर इसे कहाँ तक खिलाता रहूँगा, चलूँ दूसरे स्थान पर अपना कार्य आरम्भ करूं।

अरे, वह मनुष्य दूसरे दुष्ट द्वारा सताया जा रहा है, चलूँ इसे छुड़ाऊँ। इसके बदले की आपत्ति अपने सिर पर ले लूँगा, ओर इसे सताये जाने से बचा दूँगा। चलता हूँ, बलवान से लड़ता हूँ, विनय करता हूँ या किसी अन्य प्रकार से समझा-बुझाकर उस बेचारे निर्बल मनुष्य को दुष्ट के पंजे से छुड़ा देता हूँ। परन्तु उफ, मेरा प्रयत्न व्यर्थ ही गया। कल इसे एक जालिम के चंगुल में से छुड़ाया था, आज दूसरे का शिकार बन गया। यह तो इसका रोज का काम है, मैं कहाँ तक इसे बचाता फिरूंगा। यह तो जहाँ जायगा वहीं जुल्म का शिकार बन जायगा। भला मैं क्या कर सकता हूँ, चलूँ दूसरा कार्य करूं।

इस आदमी का धन चोरी चला गया है। बेचारा धाड़ मार कर रो रहा है, अच्छा इसे अपना धन दे दूँ, जिससे इसे संतोष हो जायगा। अच्छा इसका जितना धन गया है उतना इसे पास से देकर संतोष करा देता हूँ। अब तो यह प्रसन्न हो जायगा। अरे, यह क्या अभी चार दिन भी नहीं हुए, इसे अपना धन देकर संतुष्ट कर गया था, आज यह फिर क्यों उसी तरह रोता है, जरा पूछूँ तो कहता है कि आज मेरे घर की एक दीवार टूट गई। भाई, यह तो बड़ा बखेड़ा है, दुनिया की नाशवान चीजें तो रोज-रोज नष्ट होने वाली हैं, यह तो हर नाश पर रोवेगा। इसे संतोष कराना मेरे बस की बात नहीं है, चलूँ अपना रास्ता नापूँ।

इस बेचारे अभावग्रस्त को तो देखो, कितनी प्रार्थना के साथ एक पैसा माँग रहा है। अच्छा इसकी इच्छा पूर्ण करूंगा। चल भई, ऐसे एक पैसा क्या माँगता है, मेरे साथ चल जिस वस्तु की तुझे जरूरत हो मुझ से ले लिया करना। वह गरीब आदमी साथ चल देता है। पहले भोजन माँगता है, वह देता हूँ, फिर वस्त्र माँगता है वह देता हूँ, अब घर चाहिए, वह भी दिया, फिर स्त्री, नौकर-चाकर, घोड़ा, गाड़ी, धन, सन्तान, कीर्ति, भोग, विलास, वैभव, राजपाट आदि की माँगें क्रमशः उत्पन्न होती गई। अरे भाई, मैं तो मामूली आदमी हूँ। तेरी इच्छा तो रोज बढ़ती जाती है, मैं इन्हें कहाँ तक पूरा करूंगा। तेरी इच्छाएँ तो कभी पूरी होने वाली नहीं है। यह सब मेरे बस की बात नहीं है। तृष्णा तो सात समुद्रों को पीकर भी शान्त नहीं हो सकती।

इन दो व्यक्ति यों में झगड़ा हो रहा है, चलकर तय करा दूँ। अपनी सारी बुद्धि लगाकर उस समय मामले को निपटा देता हूँ, किन्तु दूसरे दिन वह विग्रह दूसरे रूप में उपस्थित हो जाता है।

एक व्यक्ति कोई अनुचित काम कर रहा है, आज उसे धिक्कार देकर समझा-बुझा कर अपने प्रभाव से या बलपूर्वक रोक देता हूँ। किन्तु कल वह फिर उसी प्रकार दूसरे कार्य करने पर उतारू है।

एक मनुष्य एक प्रकार के भ्रम में उलझकर अपने को दुखी बनाये हुए है। उस समय उस का वह भ्रम हटा देता हूँ पर दूसरे क्षण दूसरी सनक उस पर सवार हो जाती है। एक व्यवस्था चलाने के लिए कानून बनवाता हूँ पर लोग चुपके चुपके उसे तोड़ते हैं।

हे भगवान्! किस झंझट में फँस गया। मैं तो विश्व प्रेम की पवित्र भावनाओं से संसार की सेवा करने निकला था। इतने दिन बीत गये सारी शक्ति लगाकर दीन दुखियों का उद्धार करने का प्रयत्न करता हूँ, पर हाय! रत्ती भर भी सफलता नहीं मिलती। किसी के दुःख में जरा भी न्यूनता तो नहीं आती। प्रभो, यह कैसी विडम्बना है। आप ही कोई मार्ग दिखाइये, जिसमें लोक कल्याण का कोई ठोस कार्य कर सकूँ ।

अब मुझे सारी समस्या पर नये सिरे से विचार करना होगा। संसार के दुखों के कारण और उनको दूर करने के उपाय पर गंभीरतापूर्वक मनन करना होगा। अन्ततः सूक्ष्म बुद्धि से दूरदर्शिता के साथ जब सोचता है, तो एक नया प्रकाश पाता हूँ। मानव जाति के अनेकानेक कष्टों का कारण वे अभाव नहीं है जो प्रत्यक्षतः दिखाई पड़ते हैं। समस्त दुखों की जननी अविद्या है। बीमार को दवा से अच्छा नहीं किया जा सकता। यदि उसे निरोग बनाना है तो उसकी ज्ञान चेतना में यह बात बिठा देनी होगी कि किन उपायों से स्वास्थ्य ठीक रह सकता है। यदि वे बातें उसके मन में भर जायें तो वर्तमान बीमारी को बहुत ही अल्प समय में खोकर सदा के लिये निरोग और स्वस्थ बन सकता है। भिक्षुक को स्वावलम्बन का महत्व समझाकर उसे परिश्रमपूर्वक जीवन का उपार्जन करने के मार्ग पर प्रवृत्त कर दिया जाय तो उसकी रोज-रोज की अपमानित याचना से छुटकारा मिल सकता है। निर्बलों को बलवान बनने और बलवानों को दया करने की भावनाओं से भर दिया जाय, तो आये दिन होने वाले जुल्म सहज ही में मिट सकते हैं। कमजोर मनुष्य जब तक अन्याय का विरोध करने के लिए, स्वयं कुछ करने को तत्पर नहीं होते, तब तक उन्हें ईश्वर भी बेइन्साफी में पिसने से नहीं बचा सकता। दिन-दिन बढ़ने वाली तृष्णा और नाशवान वस्तुओं के विछोह की वेदना ज्ञान द्वारा ही दूर की जा सकती है, अन्यथा इनका निवारण किसी प्रकार हो ही नहीं सकता। इस आनी-जानी दुनिया में एक न एक वस्तु का विछोह नित्य होगा। आज भाई मरा तो कल बेटा मरने वाला है। आज धन गया तो कल घर फूटने वाला है, इनके लिए रोया जाय, तो निरन्तर रोते रहने पर भी शाँति नहीं मिलेगी। इन अवसरों पर केवल ज्ञान द्वारा ही धैर्य धारण किया जा सकता है। गये दिन आने वाले संकट, मनोविकार, पाप आकर्षण यह सब तात्कालिक प्रतिबन्ध से रोके नहीं जा सकते। इनका निवारण ज्ञान द्वारा ही होना सम्भव है। दुनिया को एक ही दुःख है ‘अज्ञान’ उसे सुखी बनाने का एक ही उपाय हो सकता है—’ज्ञान प्रसार’।

माना कि पीड़ितों को कुछ तात्कालिक सहायता की भी आवश्यकता होती है, पर उसका अन्ततः निवारण ज्ञान के द्वार ही होगा। आप किसी की उतनी सहायता रुपया-पैसा देकर नहीं कर सकते, जितनी कि उसे विषम स्थिति में से निकलने का पथ-प्रदर्शन कर के कर सकते हैं। मनुष्य के पास किसी चीज की कमी नहीं है। परमात्मा ने उसे अनंत शक्ति यों का खजाना सौंपकर इस लोक में भेजा है। उसके अन्दर ऐसी 2 योग्यताएं छिपी पड़ी हैं कि जिनके एक-एक कण का उपयोग कर के वह सम्राटों का सम्राट बन सकता है। ‘मैं उसे अमुक वस्तु दूँगा’ ऐसा सोचते समय आप अपनी आत्मा का विस्तार करते हैं। राजा को एक पैसा देकर, आत्मा को भौतिक वस्तुओं के टुकड़े देकर आप उसे क्या देते हैं? उन्हें इन टुकड़ों की जरूरत नहीं है। जरूरत केवल एक है; और वह यह कि मानव जाति के अन्तस्तल में सोई हुई महान शक्ति को जगाया जाय।

समुद्र लाँघते समय हनुमानजी अपनी अशक्ति अनुभव करते हुए बड़े दीन हो रहे थे, जामवंत ने उन्हें प्रोत्साहित किया कि —हे पवन पुत्र! आप में अकूत बल भरा हुआ है। हनुमानजी का सोया हुआ बल जाग पड़ा और वे एक ही छलाँग में समुद्र पार कर गये।

आज कोटी-कोटि हनुमान अपनी अशक्ति प्रकट करते हुए दीन वचन बोलते हैं और असफलता से तट पर बैठे-बैठे हाथ मलते हैं। इस समय ऐसे जामवंतों की जरूरत है, जो इन्हें इनके आत्मबल का उद्बोधन कराके आपत्तियों का समुद्र लाँघने के लिए तत्पर कर दे। मैं जामवन्त का कार्य करूंगा। संसार में ज्ञान प्रचार का महत्तम अश्वमेध यज्ञ करूंगा, जिससे स्वर्ग के देवता भी प्रसन्न हो जावें, इसी यज्ञ से वह अमृत वर्षा हो सकती है, जो जलते तवे के समान झुलसते हुए भूलोक में सुख शाँति की हरियाली पैदा कर दे।

मैं प्रेमी हूँ। विश्व-प्रेम मेरे रोम-रोम से छलक रहा है। विश्व के पीड़ित बन्धुओं को क्लेशमुक्त करने की मेरी आन्तरिक इच्छा है। यह कार्य ज्ञान प्रसार द्वारा होना ही संभव है। मैं जीवन का प्रत्येक क्षण ज्ञानयज्ञ की आहुति में समर्पित करूंगा, निरंतर सद्ज्ञान फैलाता रहूँगा और इस कार्य में अपने जैसे विचार रखने वाले अन्य सुहृदयों को आमन्त्रित करूंगा।


मंगल-कारक पुत्र

नारवे देश के अमर साहित्यिक

श्री व्जार्सन की एक कहानी का अनुवाद।

(अनुवादक-पं. जगन्नाथप्रसाद शर्मा, वाय)

नारवे के उपजाऊ इलाके में वह सब से खुशहाल किसान था। मामूली लोगों के बीच रहता और खेती-बाड़ी का साधारण सा काम करता, तो भी वह था महान्। भौतिक साधनों की दृष्टि से वह बड़ा नहीं था, पर सुदृढ़ सदाचार और परिमार्जित अन्तःकरण के कारण उसकी महानता थीलियस पर्वत के समान उच्च और वेरिस हिम प्रदेश की भाँति श्वेत थी। उस किसान का नाम था ‘थोर्ड ओवे रास’।

प्रभात की सुनहरी बेला में थेर्ड ने गिरजाघर में प्रवेश किया। पादरी ने उसके अभिवादन का उत्तर देते हुए सत्कार पूर्वक आसन दिया और शिष्टाचार के बाद आगमन का कारण पूछा।

किसान की मुख-मुद्रा प्रसन्नता से खिली जा रही थी। उसने कहा- “मेरे घर पुत्र उत्पन्न हुआ है, बतलाइए उसे वपतिस्मा के लिए कब लाऊँ?”

पादरी ने बपतिस्मा का समय निश्चित कर के पुत्र की प्राप्ति पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए उसे बधाई दी और आशीर्वाद दिया ‘ईश्वर करे यह बालक तुम्हारे लिए मंगल-कारक हो।’

नियत समय पर बालका बपतिस्माहुआ, पादरी को दक्षिणा मिली। सब लोग मंगल गान करते हुए अपने घरों को लौट गये। दिन जाते देर नहीं लगती। एक-एक करके सोलह वर्ष व्यतीत हो गये। थोर्ड आज फिर गिरजाघर पहुँचा।

पादरी ने उसे देखते ही पहिचान लिया और आवभगत करते हुए कहा- “मि. थोर्ड तुम्हारा शरीर निस्सन्देह सोने का शिला जैसा है। सोलह वर्ष बीत गये तुम्हारे शरीर में एक भी परिवर्तन दिखाई नहीं देता।”

थोर्ड ने मुसकराते हुए कहा- “सो तो आपकी कृपा है पिताजी, मैं अमीर नहीं हूँ, तो भी खुश रहता हूँ और आप यह तो जानते ही हैं कि प्रसन्न रहने वाला स्वस्थ ही रहता है।”

और भी इधर-उधर की बातें होती रहीं, अन्त में किसान ने कहा- “कल मेरे पुत्र का दीक्षा संस्कार आपको करवाना है, उसी के लिए निमंत्रण देने आया हूँ।

पादरी ने कृतज्ञता पूर्वक उसे स्वीकार कर लिया। दूसरे दिन दीक्षा हुई। दक्षिणा में दस डालर प्राप्त हुए। पादरी ने वही आशीर्वाद फिर दोहराया- “ईश्वर करे बालक तुम्हें मंगल कारक हो।”

दिन और बीते, आठ वर्ष का अरसा गुजरा, आज थोर्ड बहुत से साथियों के साथ हँसी के कहकहे लगाता हुआ गिरजा पहुँचा।

बिना आवभगत की प्रतिक्षा किये, थोर्ड ने दूर से ही अपना मन्तव्य कह सुनाया- पादरी साहब, मेरे लड़के का विवाह निश्चय हो गया है। यह देखिए भूरा टोप पहिने डडडड गुडमेण्ड खड़े हुए हैं, इन्हीं की सुलक्षिणी पुत्री स्टोर्लिउन के साथ शादी हुई है।

पादरी और थोर्ड की घनिष्ठता बढ़ी हुई थी। शादी के हर्ष समाचार से पादरी को हार्दिक प्रसन्नता हुई। उसने आगन्तुकों को एक छोटा सा प्रीतिभोज दिया। आज प्रीतिभोज में मित्रों के बीच थोड़े बहुत ही आनन्दित हो रहा था, मानो सुरभित फुलवारी में गुलाब जल का फव्वारा चल रहा है।

शुभ मुहूर्त में विवाह होने का निश्चय होना पड़ा—पादरी ने संस्कार का दिन नियत कर दिया। एक-एक प्याला चाय और पी गई। तदुपरान्त विवाह की तैयारी की चर्चा करते हुए सब लोग विदा हो गये।

नियत दक्षिणा से तिगुनी पाकर पादरी बहुत प्रसन्न हुआ। उसने तीसरी बार अपने उसी पुराने आशीर्वाद को फिर दुहराया—”ईश्वर करे यह बालक तुम्हारे लिए मंगलकारक हो।”

इस विधि का विधान बड़ा विचित्र है। कभी भी रंग में भंग होने की बड़ी अप्रिय घटनाएँ घटित होती हैं, जिनसे बुद्धि विचलित हो जाती है और मनुष्य विह्वल हो जाता है।

दो सप्ताह भी व्यतीत न होने पाये थे कि एक भयंकर दुर्घटना घटित हो गई। उस दिन शान्त सन्ध्या में थोर्ड अपने पुत्र के साथ नाव में बैठ कर झील को पार कर रहे थे। अचानक एक चट्टान से टकरा कर नाव उलट गई और दोनों उस अथाह जल राशि में निमग्न हो गये। पिता ही बच गया, पर पुत्र तैरने में कुशल न होने के कारण जल में गोते लेने लगा और कुछ ही क्षण में प्राण छोड़ दिया।

तैरती हुई लाश बाहर निकाली गई। छाती पर पत्थर रख कर पिता ने उसे देखा। आज से तीसरे दिन लड़के का विवाह होने वाला था, पर हाय! आज यह कैसा विवाह हो रहा है, घटनाक्रम बिलकुल पलट गया था, पर उसकी मुख मुद्रा नहीं बदली थी। हाहाकार की घड़ियों में भी मुसकराहट को वह चेहरे से चिपटाये हुए था।

श्मशान में लाश पहुँचाई गई। अंत्येष्टि क्रिया का शान्ति पाठ करने के लिए पादरी आया। उसने घुटने टेक कर मृतात्मा की सद्गति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। क्रियाकाण्ड पूरा करके पादरी लौट रहा था। उसके होठ बन्द थे, फिर भी भीतर ही भीतर कोई थोर्ड को आशीर्वाद दे रहा था-”ईश्वर करे यह बालक तुम्हारे लिए मंगल कारक हो।”

पुत्र की मृत्यु के उपरान्त पिता के हृदय में हाहाकारी तूफान उड़ने लगे। इन हाहाकारों ने उसके हृदय को मथ डाला। इस मन्थन ने उसके विचारों में बड़ा भारी परिवर्तन कर दिया। अब उसका दृष्टिकोण दार्शनिक बनने लगा। जीवन और मृत्यु की समस्या पर उसने नये सिरे से विचार आरम्भ किया। तत्व की शोध करते-2 उसने जाना कि नाशवान वस्तुओं पर ममता बढ़ाने से ही सम्पूर्ण दुखों की सृष्टि होती है। मानव जीवन का उद्देश्य दुःखों को उत्पन्न करना और उनमें उलझे रहना नहीं, वरन् अपना और पराया कल्याण करते हुए दुख द्वन्द्वों से छुटकारा पाना है।

दार्शनिकों की तरह आत्म तत्वों पर विचार करते हुए दिन पर दिन बीतने लगे। उसकी हँसी गम्भीरता में परिणत होने लगी।

एक वर्ष बीता, पुत्र के श्राद्ध का दिन आ पहुँचा। रात भर वह किसी गम्भीर गुत्थी को सुलझाने में लगा रहा। प्रातः काल होते ही श्राद्ध का कर्मकाण्ड करने के लिये गिरजे में पहुँचा।

पूजा पात्र और कर्मकाण्ड सामग्री के स्थान पर आज थोर्ड के हाथ में एक छोटी पोटली थी। उसे उसने पूजा की वेदी पर धरते हुये कहा—”पिताजी, मैंने अपना आधा खेत बेच दिया है, इस पोटली में उसी की कीमत है। मैं चाहता हूँ कि यह धन अज्ञान के बन्धनों में बँधे हुए कैदियों को ज्ञान का मुक्ति सन्देश देने के लिये लगाया जाय।

पादरी सुना करता था कि थोर्ड के किसान शरीर में देवदूत की आत्मा रहती है। आज उसने उसका दर्शन अपनी आँखों से कर लिया। पादरी का मस्तक उस देवता के सामने नत हो गया।

बाइबिल की पोथियाँ तैयार करने के लिए वह रुपया दे दिया गया। पादरी और थोर्ड पास पास कुर्सियों पर मौन भाव से बैठे थे। सहसा पादरी ने निस्तब्धता भंग करते हुए कहा—”मैं समझता हूँ कि आखिरकार वह पुत्र तुम्हारे लिए मंगल कारक सिद्ध हुआ।”

थोर्ड की बड़ी-2 आँखों से आँसुओं की दो बूँदें ढुलक पड़ीं, उसने स्वीकृति सूचक सिर हिलाते हुए उत्तर दिया-”हाँ मैं भी ऐसा ही समझता हूँ।”


मैं कौन हूँ?

(पं॰ रामकृष्ण शर्मा, जौन, जयपुर)

मैं संसार में एक रसायन के समान हूँ, मैं ईश्वर की तरह तमाम संसार में व्याप्त हूँ, यहाँ तक कि मैं एक दूसरा ईश्वर ही हूँ, संसार का कोई भी क्षेत्र मुझसे खाली नहीं है, यथा पारिवारिक जीवन, सामाजिकता, देश-सेवा, आध्यात्मिक इन सब में मेरी ही सत्ता है। बतलाइये पाठकगण मैं ऐसा कौन हूं?

मैं संसार की तमाम सूक्ष्म व स्थूल वस्तुओं में व्याप्त हूँ। संसार की दैनिक क्रियाशीलता मुझ ही पर निर्भर है, प्रत्येक प्राणी के प्रयोग की प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व मेरे द्वारा ही है, उनके प्रत्येक काम में किसी न किसी तरह अवश्य छिपा हुआ हूँ।

सृष्टि का सृष्टा मैं ही हूँ, मेरे ही द्वारा संसार की उत्पत्ति व पालन होता है, लौकिक व पारलौकिक तमाम कार्यों में मेरी सत्ता व्याप्त है मैं सृष्टि के आदि से अन्त तक रहता हूँ। ऐसा अनन्त, अगोचर, अविनाशी, सर्वगुण सम्पन्न, मैं कौन हूँ?

ईश्वर के महान भक्तों, सेवकों, उपासकों, को उनके इष्ट लक्ष्य से मिलाने वाला मैं ही हूँ, मेरी ही प्रेरणा से भगवान को गरुड़ छोड़कर गजेन्द्र मोक्ष के लिए पैदल भागना पड़ा था। उस समय स्वर्ग में भगवान का सिंहासन मैंने ही हिलाया था।

जो मुझे हमेशा अपने साथ रखते हैं, उनको संसार में मैं किसी भी तरह का दुःख नहीं पहुँचने देता, लेकिन जो मुझे नहीं भजते उनको स्वप्न में भी सुख नहीं मिल सकता। यह मेरी ही शक्ति का कारण है। बतलाइये ऐसी शक्ति युक्त मैं कौन हूँ?

संसार के सैकड़ों, हजारों, लाखों वीर पुरुष क्यों अपने देश पर अपनी जान गंवा देते हैं, क्यों वर्षों तक जेलों की भयंकर यातनाएँ भोगते हैं, क्यों अपने ऐश व आराम को लाखों वीर लात मार कर गोलियों की बौछार के सामने अपना सीना तानकर खड़े हो जाते हैं, यह सब में ही महान प्रेरणा व आकर्षण का कारण है।

संसार में पारिवारिक जीवन बिताने वाले मेरे ही द्वारा स्वर्ग के समान सुख का उपभोग करते हैं, और जब मेरा तिरस्कार करते हैं तो वही स्वर्ग−सुख नारकीय यातनाओं में परिवर्तित हो जाता है।

मेरे अन्दर अविरल अमृत का स्रोत रहता है, दो व्यक्ति यों के मन-मुटाव को मैं मेरे क्षण भर के उपदेश से मिटाकर उनको एक दूसरे का घनिष्ठ मित्र बना देता हूँ यह सब मेरे ही चमत्कार हैं, कहिये विचारिये मैं ऐसा कौन हूँ?

मेरी हाट विचित्र ढंग की है, मेरा भिक्षुक एक महान आशा के पास में बंधकर मेरी प्राप्ति के लिए पैरों पड़ता है; प्रार्थना करता है, शतशः प्रार्थनायें करता है। यह सब किसलिए? केवल मेरी प्राप्ति के लिए लेकिन ओह! कितनी कठिन है मेरी साधना। मेरी साधना के साधकों पर दुनिया की शक्ति ठिठक जाती है लेकिन जब तक तुम पुजारी न बनोगे, लाख यत्न करने पर भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकते, कहिए ऐसी हाट वाला मैं कौन हूँ?

दो प्रेमियों के विछोह पर उनको रुलाने वाला तथा मिलन पर प्रफुल्लित करने वाला मैं ही हूँ।

इतिहास पर दृष्टि डालिये सब कहीं, मैं ओत-प्रोत नजर आऊँगा। प्राचीन पूर्व पुरुषों के जीवन पर निगाह डालिए शबरी को दिनों तक रास्ता साफ कराने वाला, रामचन्द्र जी को झूँठे बेर खिलाने वाला, कृष्ण भगवान को बासी साग और सूखे चावल खिलाने वाला सीता और लक्ष्मण जी को रामचन्द्र के साथ करने वाला, गोपियों की पागल सी हालत कोई करने वाला, कहाँ तक लिखा जाय जिधर नहीं उधर मेरी ही माया है, इन सब का आदिकारण मैं ही हूँ। विचारिये पाठकगण ऐसा मस्त बनाने वाला मैं कौन हूँ?

वर्तमान में संसार के अन्दर ईश्वर के अमर पुत्र मानव का जो भयंकर संहार हों रहा है, यह मेरी उपेक्षा करने का फल है अब भी मैं डंके की चोट कहता हूँ कि अगर अब भी संसार की वह शक्तियाँ जिनके कारण से संसार रौरव नरक की यातनायें भोग रहा है, मुझे अपना लें, तो वह भयंकर संकट जो कालान्तर में आने वाला है न आ सकेगा और इससे मानव सुख की नींद सो सकेगा कहिए पाठकगण ऐसी-2 पंक्तियों पर आतंक रखने वाला मैं कौन हूँ?

मेरी ही प्रेरणा से प्रेरित होकर यह अंक आपकी सेवा में अवतरित हुआ है। पाठकगण अब तो आप बतलाइये कि ऐसा ढाई अक्षर का शब्द में कौन हूँ?

उत्तर- “प्रेम”


प्रेम की प्राप्ति

(श्री जगन्नाथ राव नायडू, नागपुर)

अनादि काल से अज्ञानावृत रहने के कारण जीव की स्वाभाविक रुचि ऐसी हो गई है कि वह सदैव घृणास्पद बातों को ही सोचा करता है। जिस समय चेतन (जीव) को ज्ञानरूप स्पर्शमणि का संसर्ग प्राप्त होता है, उस समय उसके अन्तःकरण में विप्लव सा हो जाता है। जीव के जन्म-जात संस्कार विरोधी संस्कारों से लड़ने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि साधक अपने को साधन शून्य देखकर घबड़ा जाता है। साधन में प्रवृत्त होना कठिन कार्य है। उनमें प्रवृत्त होने के पूर्व साधक को सत्संग के उसकी अपने साध्य में रुचि नहीं हो सकती। आवश्यकता है साध्य के प्रति रुचि तैयार करने की। जब रुचि तैयार हो जायगी, तो चाहे कितना हो दुःसाध्य साधन क्यों न हो, साधक घबड़ा नहीं सकता। मुझ से लोग प्रायः पूछा करते हैं कि बाबा साधन बताओ। मेरी समझ में नहीं आता कि वे दूसरे से साधन की बात क्यों पूछते हैं। जीव भगवान का कृपा पात्र अंश है, उसमें अनन्त शक्ति है। जिस प्रकार अज्ञान में उसने अपने आप प्रवेश किया है, उसी प्रकार ज्ञान में भी वह अपने आप प्रवेश कर सकता है, ज्ञान-ध्यान की बात किसी से पूछ कर नहीं जानी जाती, यह निरन्तर सत्संग से ही प्राप्त होती है। प्रारम्भ में निरन्तर सत्संग करते रहना चाहिये, साथ में भगवतनाम का जप भी आवश्यक है। भगवान के नाम की कृपा से जीव का अज्ञान नष्ट होता है और हृदय के स्वच्छ होते ही दिव्य प्रेम की प्राप्ति हो जाती है। यह प्रेम ही नामामृत, रूपामृत और लीलामृत का आस्वादन कराता है। प्रेम ही साध्य है और सत्संग ही साधन है, सत्संग के द्वारा आत्यन्तिक निवृत्ति तो होती ही है, साथ ही दिव्य भगवदीय प्रेम की प्राप्ति भी हो जाती है।


विश्व बन्धुत्व का उपदेश

(वेद का अमर सन्देश)

मित्रस्यमा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम। मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। मित्रस्य चक्षुषा समीक्षा महे।

यजु. 36।18

मुझे प्राणिमात्र मित्र की दृष्टि से देखें। अर्थात् कोई भी प्राणी मेरे से द्वेष न करे। वे मुझे मारें नहीं। मेरी मृत्यु से रक्षा करें, इसी प्रकार मैं भी प्राणिमात्र को मित्र की दृष्टि से देखूँ।

समानी प्रपा सहवोऽन्भागः समाने योषत्रे सहवो युनाज्मि। सम्यंचोऽग्नि सपर्य्यतारा नाभिमिवा भितः।

अथर्व 3।30।6

अर्थ- तुम्हारा पानी पीने का स्थान एक हो, अन्न का भोजन साथ-साथ हो, मैं तुम्हें एक साथ एक ही बन्धन में जोड़ता हूँ। जिस प्रकार पहिये की नाभि में आरे जुड़े होते हैं उसी पर आपस में मिलजुलकर परमेश्वर विद्वान ज्ञानी गुरु और यज्ञाग्नि की सेवा करो।

येन देवा न वियन्ति नोच विद्विषते मिथः। तत्कृण्मो ब्रह्मवोगृहे सन्तानं पुरुषेम्यः

अथर्व 3।30।4

जिस ज्ञान को प्राप्त करके विद्वानगण परस्पर विरोध, लड़ाई-झगड़े नहीं करते और नहीं परस्पर ईर्ष्या द्वेष ही करते हैं ऐसे उस ब्रह्मज्ञान को तुम्हारे घरों में पुरुष मात्र के लिए भेंट करते हैं।

यथा नः सर्व इज्जनोऽनमीवः संगमें सुमना असत्। यजु 33। 86

हम सब का व्यवहार इस तरह का हो कि जिससे सबके सब मनुष्य हमारे संग में रोग रहित होकर, उत्तम मान वाले, हमारे प्रति सद्भाव करने वाले हो जावें।


बन्दों के साथ सलूक करो।

(कुरान शरीफ की शिक्षा)

अपनी मुराद वे लोग हासिल करेंगे जो नेक काम करने की सलाह देते हैं और बुरे कर्मों से रोकते हैं।

-सूरे आलि इम्रान

अल्लाह के दोस्त वे हैं जो उसके बन्दों के साथ नेकी का सलूक करते हैं। जन्नत उन लोगों के लिए है जो तंगदस्ती में भी खैरात करते हैं, गुस्से को जब्त करते हैं, और लोगों के कसूर माफ कर देते हैं।

-सुरे आलि इम्रान

जो जिन्दगी भर बुरा काम करते रहे उनकी तोबा कबूल नहीं की जायगी।

-सूरे निसाअ

नेकी के काम करने वालों से खुदा की रइमत करीब ही है।

-सूरे निसाअ

जिन लोगों ने बुरे काम किये हैं उनको वैसा ही नतीजा मिलेगा। लेकिन जिसने भलाई की है उनको कुछ ज्यादा दिया जायगा।

-सूरे यूनिस

अल्लाह उन लोगों के साथ है जो दूसरों के साथ भलाई से पेश आते हैं और खुद परहेज (संयम) करते हैं।

-सूरे नहत

अल्लाह को वे पसन्द नहीं हैं जो ज्यादती करते हैं। इसलिए अपने हाथों को खंरेजी में मत डालो, दूसरों पर अहसान करो।

-सूरे बकर

ऐ ईमान वालो! सच बोलो और सच्ची गवाही दो। वह सच्ची गवाही चाहे तुम्हारे माँ-बाप और रिश्तेदारों के खिलाफ ही क्यों न पड़ती हो।

-सूरे निसाअ

अमानत वालों की अमानतें वापिस कर दो। और हर मामले का इन्साफ के साथ फैसला करो।

-सूरे निआस


प्रेम की व्यापकता

(ले.- श्री जगन्नाथ प्रसाद शर्मा)

प्रेम क्या है? प्रेम एक रसायन है, जो दो आत्माओं को पिघला कर एक स्वरूप बना देता है। जिसमें भिन्नता का भाव ही नहीं रहता। विज्ञानियों की भाषा में प्रेम का ही दूसरा नाम आकर्षण है, प्रेम की आत्मा का गुण है, इसका अलौकिक आनन्द ही आत्मा का सार है। हृदय को शुद्ध करने के लिए प्रेम से बढ़कर कोई वस्तु संसार में नहीं दिखाई देती।

संसार का कोई भी क्षेत्र इस प्रेम से रहित नहीं, ईश्वरीय ज्ञान, देश सेवा, पारिवारिक जीवन, राजनीति, कलाकौशल, सामाजिकता इत्यादि कोई भी कार्य प्रेम सम्राट की अनुमति बिना पूर्ण नहीं हो सकते। हाँ, यहाँ तक कहा जा सकता है कि इनमें से यदि प्रेम को निकाल दिया जावे तो इनकी सत्ता ही संसार में नहीं रह सकती और इन शुभ कार्यों का स्थान जघन्य प्रवृत्तियाँ ग्रहण कर लेंगी।

भगवद् प्राप्ति के विषय को लीजिये, जब तक हृदय की शुद्धि होकर भगवदीय प्रेम उत्पन्न नहीं होता, तब तक ऐसा कौन सा साधन है कि जिस से ईश्वर प्राप्ति हो जाय? ईश्वर प्राप्ति के कोई भी साधन जैसे नव प्रकार की भक्ति, अष्टाँग योग, ध्यान योग, तपयोग एवं अन्य साधनों में कौन सा साधन ऐसा है जो बिना प्रेम उत्पन्न हुए सफल हो सकता है, अतः भगवद् प्राप्ति के लिए अनन्य प्रेम का होना अनिवार्य है।

देश सेवा या देशोन्नति भी प्रेम की कृपा बिना पूर्ण होना असम्भव है। जब तक मनुष्यों के हृदय में देशानुराग जागृत न होगा, दीन और आर्त प्राणियों की आर्तनाद पर सहानुभूति न होगी, तब तक क्या यह आशा की जा सकती है कि देश के वीर नवयुवक देश की बलि वेदी पर जीवन बलिदान कर सकेंगे। देश का धनाढ्यवर्ग द्रव्य का मोह त्याग देश सेवा में अर्पण कर सकेगा, जन समाज अपनी वस्तुओं को देश सेवा में उपयोगी समझ कर देश के लिए त्याग सकेगा तथा देश को शुभकामना का लक्ष्य बना कर सहानुभूति प्रकट करेंगे और प्रार्थना कर सकेंगे। बिना देश प्रेम उत्पन्न हुए ऐसा होना नितांत असम्भव है।

पारिवारिक जीवन में जब तक प्रेम का साम्राज्य विद्यमान है, तब तक ही वह नन्दन कानून है, स्वर्गीय आनन्द का स्थान है, जब परिवार के एक मनुष्य के भी हृदय में प्रेम का अभाव हो जाता है तो पारिवारिक जीवन दिन प्रतिदिन क्षीण होता चला जाता है और एक दिन वह समय आ पहुँचता है जब स्वर्गीय सुख भीषण यातनाओं में परिणित हो जाता है। माता-पिता सन्तान के लिए कितने कष्टों का सामना करते हैं, क्या वह प्रेम का परिणाम नहीं है। भाई, भाई के लिए मित्र, मित्र के लिए अपना जीवन संकट में डाल देता है। क्या यह प्रेम के बिना सम्भव है? पति-पत्नि का घनिष्ठ सम्बन्ध क्या प्रेम का फल नहीं है, सफल पारिवारिक जीवन के लिए प्रेम का होना अनिवार्य है।

सामाजिक उन्नति और कला कौशल की उन्नति भी तब तक होना सम्भव नहीं जब तक इनके प्रति प्रगाढ़ प्रेम उत्पन्न न हो जाय, किसी भी कार्य को करने का विचार भी उत्पन्न जब होगा जब उसके प्रति प्रेम भावना का उदय होगा, संसार के महान आविष्कारक यदि आविष्कार की अपेक्षा करते तो क्या उनके कार्यों से संसार चकित हो सकता था, यहाँ तक कहा जा सकता है कि प्रेम संसार के समस्त पदार्थों में ईश्वर की तरह व्यापक है और प्रेम ईश्वर का ही दूसरा नाम है।


अन्तरंग समाचार

गत अप्रैल के अंक में पृष्ठ 31 पर जो ‘गुप्त निमन्त्रण’ छपा था। हर्ष की बात है कि जागृत और विचारवान सज्जनों ने “आज के समय की सब से बड़ी आवश्यकता” अनुभव करते हुए उसे स्वीकार किया है। जिन्होंने अभी तक अपने संकल्प नहीं भेजे हैं, उन्हें एक बार फिर इशारा किया जाता है कि बिना विलम्ब किये शीघ्र से शीघ्र अपने आवेदन यथाविधि भेज दें।

करीब चार सौ संकल्प पत्र आ चुके हैं, उनमें से गंभीर विचार विमर्श के पश्चात जिन्हें अन्तरंग गोष्ठी में सम्मिलित करने योग्य समझा गया है, उन्हें स्वीकार करके गोष्ठी में ले लिया गया है और सदस्यता के प्रमाण पत्र एवं दीक्षा की ‘सूचना पुस्तकें’ भेजी जा रही हैं, वर्णित उपदेशों को कार्य रूप में परिणित करने का अनुरोध है।

गुप्त साधन के अनुसार प्रेरित की हुई चैतन्य विद्युत लहरों को ग्रहण करते समय कई सदस्य कँपकँपी, रोमाँच, उष्णता अधिक अनुभव करते हैं। उन्हें चाहिए कि साधन का समय आरम्भ में पाँच मिनट रखें, फिर सहन शक्ति के अनुसार बढ़ावें। रोगी या निर्बलों को तीसरे दिन या सातवें दिन ही उस विद्युत प्रवाह को ग्रहण करना चाहिए।

उपवास से बचाया हुआ अन्न टिकट या पैसों के रूप में सार्वदेशिक सत्य प्रचार के लिए मथुरा भेजना चाहिए।

सदस्यों को चाहिए कि अपने परिचित और प्रियजनों को सत्य धर्म में प्रवेश करने का आग्रहपूर्वक अनुरोध करें। परन्तु गोष्ठी के बारे में हर किसी से चर्चा न करें। यह तो आध्यात्मिक और धार्मिक व्यक्तियों की वापसी और निजी योजना है, उसमें जागृत और आवश्यकीय व्यक्ति ही सम्मिलित किये जाने चाहिए।

गोष्ठी की सूत्र संचालक आत्माएँ अन्तरंग सदस्यों के लिये जो कृपापूर्वक प्रयत्न कर रही हैं। उनकी उपयोगिता समझना और लाभ उठाना हर किसी का काम नहीं है। इसे तो कुछ भाग्यवान ही प्राप्त कर सकेंगे। आश्चर्य नहीं कि अन्य लोगों तक यह छपी हुई सूचना भी न पहुँचे या पहुँचे तो उनका ध्यान ही इधर न आवे।

समालोचना-


‘प्रेम सन्देश’

ईश्वर प्रेम सम्बन्धी यह सचित्र मासिक पत्र पूज्य गोस्वामी बिन्दुजी महाराज की संरक्षता में वृन्दावन से प्रकाशित होना आरम्भ हुआ है, इसके सम्पादक सर्व पं. श्रीदान बिहारीलालजी शर्मा, सुरेशचन्द्र शर्मा, छबीलेलाल गोस्वामी, राजेन्द्र-मोहनजी कटारा हैं। वार्षिक मूल्य 2 रु.) एक प्रति का।) प्रकाशक- प्रेम धाम वृन्दावन।

प्रेम संदेश के दो अंक हमारे सामने हैं। इनके सभी लेख उच्च कोटि के विद्वानों द्वारा लिखे हुए एवं विवेचनापूर्ण हैं। सम्पादन बड़ी ही उत्तमता पूर्वक एवं मनोयोग के साथ हुआ है। श्री बिन्दुजी महाराज की संरक्षता में एवं पं॰ दान बिहारीलाल के परिश्रम के साथ निकलने वाले पत्र को जितना महत्वपूर्ण होने की आशा की जाती थी, यह अंक उसके सर्वथा अनुकूल हैं। पत्र सर्वथा संग्रहणीय है। प्रेम धर्म के प्रचारक अपने इस नवीन सहयोगी के चिरंजीव होने की हम हार्दिक कामना करते हैं।

औरतों को रोगों से बचाइये।


औरतों के तमाम रोगों का इलाज हर मौसम में किया जाता है।

मासिक धर्म की खराबी, प्रदर रोग, पानी पड़ना, गर्भाशय की खराबियाँ, गर्भस्राव रोग, प्रसूत रोग, हिस्टीरिया, योनि रोग, पैर जारी होना तथा बाँझपन वगैरह औरतों के हर तरह के नये, पुराने, साधारण और कठिन से कठिन रोग

श्रीमती चपलादेवी वैद्या के

इलाज से दूर हो जाते हैं।

याद रक्खें—

गर्भाशय और पेट के वे गुप्त रोग जिनको डॉक्टर आपरेशन करके भी ठीक नहीं कर सकते-

श्रीमती चपलादेवी वैद्या

औरतों के अनेक गुप्त रोगों को बिना आपरेशन के ही देशी इलाज से दूर कर देती हैं। अब तक हजारों औरतें लाभ उठा चुकी हैं।

लाखों औरतें जानती हैं कि—

चपलादेवी वैद्या, मथुरा शहर की सबसे पुरानी और मशहूर वैद्या हैं। वैद्याजी ने बाल्यावस्था ही से वैद्यक शास्त्र की शिक्षा पाई है और लगभग 15 साल तक स्वयं हजारों औरतों का इलाज करके औरतों के इलाज में अनुभव प्राप्त किया है।

दूर-दूर नगरों से श्रीमती चपलादेवी वैद्या से इलाज कराने बड़ी-2 धनी मानी, सेठानी और जमीदारिन आती हैं और आराम होकर जाती हैं।

एक बार आप किसी भी गुप्त या कठिन रोग से दुखी औरतों को जो सब तरफ से इलाज कराकर निराश हो बैठी हों, लाइये और चपलादेवी वैद्या के देशी इलाज का चमत्कार देखिये। भगवान ने वैद्याजी के हाथ में यश दिया है। जिस दुखी बहिन का इलाज वैद्याजी हाथ में लेती है उसे आराम हो जाता है।

विश्वास करें

यहाँ आपका पैसा वृथा नहीं जावेगा।

चपलादेवी वैद्या,

चपला भवन, कच्ची सड़क, मथुरा।


नवयुग की चुनौति


नवयुग की चुनौति

(श्री मैथली शरण जी गुप्त)

वह अतीत पुरखों का युग था उसका क्या कहना है।

सुनो किन्तु अपने ही युग में हम सबको रहना है॥

अपने युग को हीन समझना आत्म हीनता होगी।

सजग रहो! इससे दुर्बलता और दीनता होगी।

जिस युग में हम हुए वही तो अपने लिये बड़ा है।

अहो, हमारे आगे कितना कर्म क्षेत्र पड़ा है॥

जीर्ण वस्तुओं की ममता से घर ही कूड़ा होगा।

अहो आज का कुसुम हार भी कल का कूड़ा होगा॥

यदि मानस गोमुखी हमारी निरवधि नहीं झड़ेगी।

तो गर्तों में ही जीवन की धारा पड़ी पड़ेगी॥

विसत हो गया विगतों का युग, अपना तो प्रस्तुन है।

कितना नव्य भव्य तुम देखो यह अपूर्व अद्भुत है॥

अन्तरिक्ष के नहीं किन्तु हम उस वसुधा के वासी।

जिसके सरस गंध गुण के हैं आप अमर आश्वासी॥

यही हमारा प्रमुख देवता कभी न भूलो इसको।

कहो दूसरा देव कौन है आहुति दें हम जिसको॥

निरुत्साह से साहस शुभ है, जीवन एक समर है।

भव भंगुर है, रहे किन्तु यह आत्मा आप अमर है॥

बिगड़ गया यदि यही लोक तो क्या परलोक बनेगा।

कहाँ जायेंगे नारायण तब, जब नर लोक बनेगा॥

करने में तो मरने में भी है कल्याण स्वयं ही।

लौटो न तुम प्रमाण खोजने बनो प्रमाण स्वयं ही॥

आदर्शों की पूजा से ही पार नहीं पाओगे।

नहीं आप उनकी पद्धति पर जब तब तुम आओगे॥

मन में, वाणी में आकर ही धर्म न पूरा होगा।

किये बिना कोई भी अपना कर्म न पूरा होगा॥

वह महान, जो मार्ग दिखावे सबको ऊँचा चढ़कर।

कीर्ति छोड़ कर्तव्य करे जो वह उससे भी बढ़कर॥

मनुष्यत्व जन में ही रहना नहीं विशाल भवन में।

वह भी क्या कुछ दुर्लभ होगा जो तुम चाहो मन में॥

रही चुनौती आज हमारी अधिक कहूँ क्या तुमको।

नई सृष्टि के लिए प्रलय भी प्रेक्षणीय है हमको॥

*समाप्त*