ईमानदारी को मत छोड़ना!

तुम्हारा मन जब ईमानदारी को छोड़ कर बेईमानी की तरफ चलने लगे तो समझना कि तुम्हारा सर्वनाश निकट आने वाला है। बेईमानी से पैसा मिल सकता है पर देखो, सावधान रहना! उस पैसे को छूना मत!! क्योंकि वह आग की तरह चमकीला तो है पर छूने पर जलाये बिना रह नहीं सकता। क्या तुमने किसी बेईमान की सन्तान को फलते-फूलते देखा है? ईमानदारी से चाहे थोड़ी ही सम्पत्ति भले ही कमाई जाय पर वह कई पीढ़ियों तक कायम रहेगी और बढ़ती रहेगी, जबकि बेईमानी का पेड़ आँधी के एक ही झोंके में उखड़ जाता है। वह एक दिन अवश्य उन्नति करेगा, जो दूसरों के लाभ को अपने ही लाभ की तरह देखता है। यह मत समझो कि ईमानदार को भोंदू और गरीब को अकर्मण्य समझा जायगा। मूर्ख ही ऐसा ख्याल कर सकते हैं। विवेकवानों की दृष्टि में न्यायशील और ईमानदार आदमी ही बड़ा समझा जाएगा। फिर वह चाहे भले ही गरीब है।


VigyapanSuchana

दुनिया खौलते कढ़ाव में उबल रही है!

चारों ओर हाहाकारी ज्वाला जल रही हैं, खून के दरिया वह रहे हैं, महामारी का ताण्डव हो रहा है; रहे बचे भूख ही ज्वाला में जले जा रहें है। हर आदमी आगामी कल को सशंकित और भयभीत नेत्रों से देख रहा है। न जाने भविष्य का निष्ठुर दानव किस पर क्या कहर ढा दे, इस आशंका से मनुष्यों के कलेजे धक-धक कर रहे हैं।

यह निष्ठुर परिस्थिति क्यों उत्पन्न हुई?

आगामी घड़ियों में क्या होने वाला है! कितने दिन अभी क्या कष्ट सहने होंगे? इस खूनी तूफान का अन्त कैसे होगा? इन सब महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर आध्यात्मिक महापुरुषों को दिव्य-दृष्टि से प्राप्त हुआ है।

उसको सर्व साधारण पर प्रकट करने के लिए -

‘अखंड-ज्योति’ का महत्वपूर्ण विशेषाँक 1 जनवरी 43 को प्रकाशित होगा!

“संवत् 2000 अंक”

इस विशेषाँक की एक-एक पंक्ति पढ़ने योग्य, समझने योग्य और मनन करने योग्य होगी। यह अंक अपूर्व और अद्भुत गुप्त बातों की जानकारियों से परिपूर्ण होगा। विचारवान् व्यक्तियों के लिए यह अंक प्राण-प्रिय हुए बिना न रहेगा।

कागज के इस घोर अकाल में पृष्ठ संख्या थोड़ी ही बढ़ाई जा सकेगी, साधारण अंक से यह सवा या ड्यौढ़ा ही होगा, पर इतने ही पृष्ठों के अन्दर गागर में सागर भर दिया जायगा।

1 जनवरी सन् 1943 की उत्सुकता पूर्वक प्रतीक्षा कीजिए!

मैनेजर-’अखण्ड-ज्योति’ मथुरा।

देवेन मनसा सह

-श्रुति

दिव्य मन के साथ रहा कीजिए

क्या आप इस संसार में सर्व श्रेष्ठ मित्र खोज रहें हैं?

-यदि हाँ; तो-

अपने मन को दिव्य-निष्पाप बना लीजिए, वही सर्व श्रेष्ठ मित्र है।


प्रीति की रीति


प्रीति की रीति

(श्री मैथिलीशरण जी गुप्त)

दोनों ओर प्रेम पलता है!

सखि, पतंग भी जलता है, और दीपक भी जलता है।

शीश हिलाकर दीपक कहता,

बन्धु, वृथा ही तू क्यों दहता,

पर पतंग पड़ कर ही रहता,

कितनी विह्वलता है।

दोनों ओर प्रेम पलता है॥ 1॥

बचनकर हाय, पतंग मरे क्या,

प्रणव छोड़ धरे बचा,

जले नहीं तो मरा करे क्या,

क्या यह असफलता है।

दोनों और प्रेम पलता है॥ 2॥

कहता है पतंग मन मारे,

तुम महान मैं लघु, पर प्यारे,

क्या न मरण भी हाथ हमारे?

शरण किसे छलता है?

दोनों ओर प्रेम पलता है ॥ 3॥

दीपक के जलने में आली,

फिर भी है जीवन की लाली,

किन्तु पतंग भाग्य लिपि काली,

किस का वश चलता है?

दोनों ओर प्रेम पलता है ॥ 4॥

जगती वणिग्वृत्ति है रखती,

उसे चाहती, जिससे चखती,

काम नहीं, परिणाम निरखती,

मुझे यही खलता है।

दोनों ओर प्रेम पलता पलता है॥ 5॥

-साकेत


संयुक्ताँक

पाठकों को विदित होगा कि अखबारी कागज पर इन दिनों सरकारी कठोर नियंत्रण है। जितना कागज खरीदने का लाइसेन्स हमें मिला हुआ है, व्यापारी उससे एक कागज भी अधिक नहीं देते। हर महीने कागज का खर्च का हिसाब हमें चीफ कन्ट्रोलर साहब के यहाँ शिमला भेजना पड़ता है। कागज का खर्च कम से कम किया जाय, ऐसी सरकारी इच्छा है, तदनुसार आवश्यकता से बहुत कम कागज इन दिनों दिया जा रहा है, ऐसी दशा में हमें भी कुछ कम पन्ने देने के लिए विवश होना पड़ा। कन्ट्रोल कानून के अनुसार पन्नों के हिसाब से अखबार का मूल्य रखने का हुक्म है। उस हुक्म को तोड़ने पर जेल जाना हो सकता है। कन्ट्रोल का आदेश है कि दो पैसा प्रति फार्म के हिसाब से अखबार का मूल्य रखा जाय। इस हिसाब से वर्तमान पृष्ठ संख्या के अनुसार अखण्ड ज्योति का मूल्य कम से कम एक रुपया बारह आना वार्षिक अवश्य रखना चाहिए। किन्तु हमारी ऐसी इच्छा नहीं है, इतने ही मूल्य में ड्योढ़े सवाये पृष्ठ देने की बात हम सदैव सोचा करते हैं। मूल्य बढ़ाना इस बुरे वक्त में उचित नहीं, न बढ़ाने पर सरकारी कानून टूटती है, इस द्विविधा में एक नया हल निकाल लिया गया है। हम अक्टूबर, नवम्बर का सम्मिलित अंक निकाल रहे हैं। अर्थात् 12 की बजाय 11 अंक ही इस वर्ष दे रहे हैं, एक अंक कम मिलेगा, इसके बदले में नये वर्ष के उपलक्ष में 1 रु. मूल्य की एक पुस्तक भेंट दे देंगे। इस तरह पाठकों को दो आने मूल्य के एक अंक के बदले में छः आने मूल्य की पुस्तक मिल जायगी। वे भी घाटे में न रहेंगे, हमारा मूल्य न बढ़ाने और पृष्ठ कम न करने की इच्छा भी पूरी हो जायगा। सरकारी आज्ञा भी भंग न होगी और बीस तारीख को जो अंक मिलना था, वह हर महीने की पहली तारीख को भी निकल जाया करेगा। बीस तारीख को बहुत लेट निकलता है, यह भी शिकायत किसी को न रहेगी। अंग्रेजी महीने के पहले हफ्ते में ही अंक सब के पास पहुँच जाया करेगा। इस तरह न तो साँप ही मरेगा और न लाठी ही टूटेगी ।

विशेष परिस्थितियों में विवश होकर ही हमें यह अंक अक्टूबर-नवम्बर का सम्मिलित अंक निकालना पड़ा है। आशा है कि पाठक इसके लिए उदारता पूर्वक क्षमा करेंगे और किसी प्रकार का दुर्भाव मन में लावेंगे।


दस लेख मालाएँ

इस अंक से दस लेख मालाएं आरम्भ की जा रही है। अगले अंकों में क्रमशः इन लेख मालाओं के अंतर्गत मानव जीवन से सम्बन्ध रखने वाले प्रायः सभी आवश्यक विषयों पर प्रकाश डाला जायगा। यह लेख एक विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखे जा रहे हैं, जैसा कि सत्य शोधक के लिए आवश्यक है। सत्य को नंगे रूप में पाठको के सामने विचारार्थ रखने की हमारी बहुत दिनों से इच्छा थी, पर भय यह होता था कि साम्प्रदायिक अन्य परम्पराओं के विवेक रहित अनुयायी उसे हजम कर सकेंगे या नहीं? तीन वर्ष तक स्वतन्त्र विचारों की शिक्षा देकर पाठकों से अखण्ड ज्योति यह आशा करती है कि वे उस मनोभूमि को प्राप्त कर चुके होंगे, जिस पर खड़ा होने वाला सत्य को सुनने, समझने और धैर्यपूर्वक उस पर विचार करने की योग्यता रखता है। हमारा यह कथन नहीं है कि फिरके बन्दी के- साम्प्रदायिकता के-विचारों को इसी समय छोड़ दिया जाय। इस लेख माला को आरम्भ करते समय हमारा इतना ही विनम्र निवेदन है कि इन्हें पढ़ते समय अपने को “सत्य की खोज करने वाले निष्पक्ष मनुष्य” मात्र समझते हुए इनका अध्ययन करें और उन पर इसी दृष्टि से विचार करें। यदि पाठक ऐसा करने में समर्थ हुए तो उन्हें भूमण्डल के समस्त आध्यात्म शास्त्र के अन्वेषकों-वैज्ञानिकों की शोधों का परिचय प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। यह लेख विश्व भर की वर्तमान समय की सर्वश्रेष्ठ विभूतियों की खोजो के सारांश होंगे। भोजन कुछ गरिष्ठ जरूर है, साम्प्रदायिक संकीर्णता की मन्दाग्नि वालों को इसे हजम करने में कुछ कठिनाई होगी। तो भी हमारा विश्वास है कि अन्ततः हमारा यह प्रयास प्रत्येक पाठक के लिये उपयोगी ही होगा। निष्पक्ष सत्य शोधक एवं धैर्यवान जिज्ञासु के दृष्टिकोण से इन लेख मालाओं को पढ़ने का पाठकों से हमारा विशेष रूप से अनुरोध है।


Quotation

राक्षसों की सम्पत्ति घृणा है। मनुष्यत्व का चिन्ह क्षमा है और प्रेम देवताओं का स्वभाव है।

*****

जल से शरीर शुद्ध होता है। सत्य से मन, भक्ति और पुण्य से आत्मा, ज्ञान से बुद्धि पवित्र होती है।


चित्रगुप्त का परिचय

(1)

नयन्ति नरकं नूनं मात्मानो मानवान् हताः।

दिव्यं लोकं च ते तुष्टा इत्यूचुर्मन्त्र वेदिनः॥

-पंचाध्यायी

(नूनं) निश्चय से (हताः) हनन की हुई (आत्मानः) आत्माएँ (मानवान्) मनुष्यों को (नरकं) नरक को (नयन्ति) ले जाती हैं (च) और (तुष्टा) संतुष्ट हुई (ते) वे आत्माएँ (दिव्यं लोकं) दिव्य लोक को ले जाती हैं (इति) ऐसा (मन्त्र वेदिनः) रहस्य को समझने वालों ने (प्रोचुः) कहा है।

उपरोक्त श्लोक में कहा गया है कि हनन की हुई आत्मा नरक को ले जाती है और संतुष्ट हुई आत्मा दिव्य लोक प्रदान करती है। श्लोक में इस गुत्थी को सुलझा दिया गया है कि स्वर्ग-नरक किस प्रकार मिलता है? गरुड़ पुराण में इस सम्बन्ध में एक आलंकारिक विवरण दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि यमलोक में चित्रगुप्त नामक देवता हर एक जीव के भले बुरे कर्मों का विवरण प्रत्येक समय लिखते रहते हैं। जब प्राणी मर कर यमलोक में जाता है, तो वह लेखा पेश किया जाता है और उसी के आधार पर शुभ कर्मों के लिए स्वर्ग और दुष्कर्मों के लिये नरक प्रदान किया जाता है। साधारण दृष्टि से चित्रगुप्त का आस्तित्व काल्पनिक प्रतीत होता है, क्योंकि पृथ्वी पर अरबों तो मनुष्य ही रहते हैं, फिर साथ ही तथाकथित चौरासी लाख योनियों में से अनेक तो मनुष्य जाति से अनेक गुनी बड़ी हैं, इन सब की संख्या गिनी जाय, तो इतनी अधिक हो जायगी कि हमारे अंकगणित की वहाँ तक पहुँच भी न होगी। फिर इतने असंख्य प्राणियों द्वारा पल पल पर किये जाने वाले कार्यों का लेखा दिन रात बिना विश्राम के कल्प-कल्पांतरों तक लिखते रहना एक देवता के लिए कठिन है। इस प्रकार चित्रगुप्त का कार्य असंभव प्रतीत होता है, इस कथानक को एक कल्पना मान लेने पर चित्रगुप्त का अस्तित्व भी संदिग्ध हो जाता है।

आधुनिक शोधों ने उपरोक्त अलंकारिक कथानक में से बड़ी ही महत्वपूर्ण सचाई को ढूँढ़ निकाला है, डॉक्टर फ्राइड ने मनुष्य की मानसिक रचना का वर्णन करते हुए बताया है कि जो भी भले या बुरे काम ज्ञानवान् प्राणियों द्वारा किये जाते हैं, उनका सूक्ष्म चित्रण अन्तः चेतना में होता रहता है, ग्रामोफोन के रिकार्डों में रेखा रूप से गाने भर दिये जाते हैं। संगीत शाला में नाच, गान हो रहा है और साथ ही अनेक बाजे बज रहे हैं, इन अनेक प्रकार की ध्वनियों का विद्युत शक्ति से एक प्रकार का संक्षिप्त एवं सूक्ष्म एकीकरण होता है और वह रिकार्ड में जरा सी जगह में रेखाओं की तरह अंकित होता जाता है। तैयार किया हुआ रिकार्ड रखा रहता है, वह तुरन्त ही अपने आप या चाहे जब नहीं बजने लगता वरन् तभी उन संग्रहीत ध्वनियों को प्रकट करता है, जब ग्रामोफोन की मशीन पर उसे घुमाया जाता है और सुई की रगड़ उन रेखाओं से होती है। ठीक इसी प्रकार भले और बुरे जो भी काम किये जाते हैं, उनकी सूक्ष्म रेखाएं अन्तः चेतना के ऊपर अंकित होती रहती हैं और मन के भीतरी कोने में धीरे-धीरे जमा होती जाती हैं। जब रिकार्ड पर सुई का आघात लगता है, तो उसमें भरे हुए गाने प्रकट होते हैं, इसी प्रकार गुप्त मन में जमा हुई रेखाएं किसी उपयुक्त अवसर का आघात लगने पर ही प्रकट होती हैं। भारतीय विद्वान् ‘कर्म रेख’ के बारे में बहुत प्राचीन काल से जानकारी रखते आ रहे हैं। “कर्म रेख नहीं मिटे, करो कोई लाखन चतुराई” आदि अनेक युक्तियाँ हिन्दी और संस्कृत साहित्य में मौजूद हैं, जिनसे प्रकट होता है कि कर्मों की कोई रेखाएं होती है, जो अपना फल दिये बिना मिटती नहीं। भाग्य के बारे में मोटे तौर से ऐसा समझा जाता है कि सिर की अगली-मस्तक वाली हड्डी पर कुछ रेखाएँ ब्रह्मा लिख देता है और “विधि का लिखा को भेटन हारा।” उन्हें मिटाने वाला कोई नहीं है। डॉक्टर यीवेन्स ने मस्तिष्क में भरे हुए ग्रे मैटर (भूरा चर्बी जैसा पदार्थ) का सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों की सहायता से खोज करने पर वहाँ के एक-एक परमाणु में अगणित रेखाएँ पाई हैं, यह रेखाएँ किस प्रकार बनती हैं इसका कोई शारीरिक प्रत्यक्ष कारण उन्हें नहीं मिला, तब उन्होंने अनेक मस्तिष्कों के परमाणुओं का मुकाबला करके यह निष्कर्ष निकाला कि अक्रिय, आलसी एवं विचारशून्य प्राणियों में यह रेखाएँ बहुत ही कम बनती हैं, किन्तु कर्मनिष्ठ एवं विचारवानों में इनकी संख्या बहुत बड़ी होती है। अतएव यह रेखाएँ शारीरिक और मानसिक कार्यों को संक्षिप्त और सूक्ष्म रूप से लिपिबद्ध करने वाली प्रमाणित हुई।

भले बुरे कार्यों का ग्रे मैटर के परमाणुओं पर यह रेखांकन (जिसे प्रकट के शब्दों में अन्तः चेतना का संस्कार कहा जा सकता है) पौराणिक चित्रगुप्त की वास्तविकता को सिद्ध कर देता है। चित्रगुप्त शब्द के अर्थों से भी इसी प्रकार की ध्वनि निकलती है। गुप्त चित्रगुप्त मन, अन्तः चेतना, सूक्ष्म मन, पिछला दिमाग, भीतरी चित्त शब्दों के भावार्थ को ही चित्र गुप्त शब्द प्रकट करता हुआ दीखता है चित्त शब्द को जल्दी में लिखने से चित्र जैसा ही बन जाता है। संभव चित्र बिगड़ कर चित्र बन गया हो या प्राचीन काल में चित्र और चित्त एक ही अर्थ के बोधक रहे हों। कर्मों की रेखाएं एक प्रकार के गुप्त चित्र ही हैं, इसलिए उन छोटे अंकनों में गुप्त रूप से-सूक्ष्म रूप से- बड़े-बड़े घटना चित्र छिपे हुए होते हैं, इस क्रिया प्रणाली को चित्रगुप्त मान लेने से प्राचीन शोध का समन्वय हो जाता है।

यह चित्रगुप्त निस्संदेह हर प्राणी के हर एक कार्य को हर समय बिना विश्राम किये, अपने बही में लिखता रहता है। सब का अलग-अलग चित्र गुप्त है, जितने प्राणी हैं, उतने ही चित्रगुप्त हैं, इसलिये यह संदेह नहीं रह जाता कि इतना लेखन कार्य किस प्रकार पूरा हो पाता होगा। स्थूल शरीर के कार्यों की सुव्यवस्थित जानकारी सूक्ष्म चेतना में अंकित होती रहे, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं हैं। पौराणिक चित्रगुप्त एक है और यहाँ अनेक हुए’ यह शंका भी कुछ गहरी नहीं हैं, दिव्य शक्तियाँ व्यापक होती हैं, पाठक जानते हैं कि प्राण तत्व एक है, उसके अंश विभिन्न व्यक्तियों में दृष्टिगोचर होते हैं। आत्मा और परमात्मा में व्यष्टि और समष्टि का ही भेद है, बाकी दोनों पदार्थ एक ही हैं। घटाकाश-मठाकाश का ऐसा ही भेद है। इन्द्र, वरुण, अग्नि, शिव, यम आदि देवता बोधक सूक्ष्मतत्व व्यापक समझे जाते हैं। जैसे बगीचे की वायु, गंदे नाले की वायु, आदि स्थान भेद से अनेक नाम वाली होते हुए भी मूलतः विश्व व्यापक वायुतत्त्व एक ही है, वैसे ही अलग-अलग शरीरों में रह कर अलग-अलग काम करने वाला चित्रगुप्त देवता भी एक ही तत्व है।

यह हर व्यक्ति के कार्यों का लेखा किस आधार पर, कैसा, किस प्रकार, कितना, क्यों लिखता है यह अगले अंक में बताया जायगा, तदुपरांत तीसरे लेख में उस लेख के आधार पर स्वर्ग-नरक का विवरण और उनके प्राप्त होने की व्यवस्था पर प्रकाश डाला जायगा।

कहानी-


अपराध और दण्ड

(श्री मंगलचन्दजी भंडारी, अजमेर)

एक बार एक ही अपराध के चार अपराधी पकड़ कर राजा के सामने उपस्थित किये गये। राजा ने एक को बिना कुछ कहे छोड़ दिया, दूसरे को लानत मलामत देकर छोड़ दिया, तीसरे को दस बेंतों की सजा दी और चौथे को काला मुँह करे गधे की सवारी पर शहर में चारों और घुमवाया।

दूसरे दिन दरबार के एक सरदार ने पूछा-महाराज! एक ही अपराध के व्यक्तियों को अलग प्रकार की सजा क्यों? राजा में कहा तुम्हारे प्रश्न का उत्तर पीछे दूँगा। पहले तुम एक काम करो, नगर में जाकर पता लगाओ कि वे चारों क्या कर रहे हैं। सरदार राजा की आज्ञानुसार पता लगाने के लिए चल दिया।

उसने देखा कि जिसे बिना कुछ कहे छोड़ दिया था वह एक उच्च घराने का युवक था, शर्म के मारे उसने आत्महत्या कर ली। दूसरा जिसे लानत मलामत की गई थी, वह भी सुशिक्षित घर का था लज्जा के मारे शहर छोड़ कर दूसरी जगह चला गया। तीसरा जिसे बेंत लगे थे मध्यवृत्ति का व्यक्ति था, आत्मग्लानि के कारण लोगों से मुँह छिपाये रहता था, अपराध करना बिलकुल छोड़ दिया था और अब भलमनसाहत से गुजारा चला रहा था। चौथा जिसे गधे पर घुमाया गया था, निर्लज्जता पूर्वक बाजार में ऐंठा-ऐंठा फिर रहा था और फिर उसी अपराध की तैयारी में प्रवृत्त था।

चारों का हाल सरदार ने राजा से कह सुनाया तब राजा ने कहा-मेरे दण्ड में जो अन्तर था, वह अपराधियों की मनोभूमि के अनुरूप था। दंड देने का उद्देश्य बदला लेना नहीं, वरन् सुधार करना है। रोगों की स्थिति देखकर दवा की मात्रा करने वाला वैद्य अन्यायी नहीं वरन् क्रियाकुशल कहा जाता है।

हरि चर्चा लेख-माला-


नास्तिक भी उपासना करें

नास्तिकैरपि कर्तव्योपासना परमात्मनः।

जीवन पतनं याति यतोह्याराधनाँ बिना॥

-पंचाध्यायी।

(नास्तिकैः) अनीश्वरवादियों को (अपि) भी (परमात्मनः) परमात्मा की (उपासना) उपासना (कर्तव्या) करनी चाहिए (यतोहि) क्योंकि (आराधनाँ) आराधना के (बिना) बिना (जीवनं) जीवन (पतनं) पतनावस्था को (याति) प्राप्त होता है।

पंचाध्यायी के उपरोक्त श्लोक में दिव्य सत्ता की-ईश्वर की-उपासना को आवश्यक बताया है। यहाँ प्रारम्भ में ही अनेक सन्देह उठ खड़े होते हैं। गणना की जाय, तो संसार में इस समय एक तिहाई से भी अधिक जन-संख्या ऐसी होगी, जो ईश्वर का आस्तित्व मानने से ही इन्कार करती है। विज्ञान कहता हैं कि-”कसौटी पर वर्तमान ईश्वर का ढाँचा खरा नहीं उतरा। विभिन्न सम्प्रदायों, पैगम्बरों और भक्त-जनों ने ईश्वर का जैसा वर्णन किया है, वह परीक्षा के समय अवास्तविक प्रमाणित हुआ। ईश्वरीय चमत्कारों की अनेक गाथाएं जो विभिन्न देश-जातियों में प्रचलित हैं वे अतिरंजित, आलंकारिक एवं काल्पनिक ठहराई जा चुकी हैं। भजन-मग्न सज्जनों की शारीरिक और मानसिक परीक्षण करने पर उनमें कोई विशेषता, महत्ता उपलब्ध नहीं हुई है, जिसके आधार पर भजन मगन होने की उपयोगिता स्वीकार की जा सके।”

वर्तमान युग के भौतिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक विज्ञान को ही ऐसी आशंका हुई हो, सो बात नहीं है। यह सन्देह बहुत प्राचीन काल से विद्यमान है। श्रुति, शेष, शारदा, ऋषि, मुनि सब ने ईश्वर का यथासंभव वर्णन किया है, पर अन्त में वे “नेति” “नेति” कह कर चुप हो गये। “इतना ही नहीं, अभी और है।” इस स्वीकारोक्ति का भाव यह है कि-हमें उसकी पूरी जानकारी नहीं हमारा जो ज्ञान है वह अधूरा है। मन, वाणी, बुद्धि से अतीत, अगम, अगोचर अबेद्य बताकर शास्त्रकार अपनी मर्यादा को निष्कपट भाव से प्रकट कर देते हैं। प्रचण्ड तार्किक ‘न्याय कुसुमाँजलि’ कार ने ईश्वर को तर्कों द्वारा सिद्ध करने का प्रयत्न किया है, पर उनने भी यह स्वीकार कर लिया है कि इस बहाने कुछ हरिचर्चा कर रहे हैं, ईश्वर को सिद्ध करने का हमारा दावा नहीं है।’ साँख्यकार ने भी स्वीकार किया है-- ‘ईश्वरासिद्धेः’ अर्थात् ईश्वर साबित नहीं हो सकता। देवताओं के गुरु बृहस्पति के मत से जो परिचित हैं, वे जानते हैं कि अपने युग के यह अद्वितीय विद्वान् नास्तिक थे। चार्वाक मत उन्हीं की प्रेरणा से प्रचलित होने की चर्चा पुराण में उपलब्ध होती है।

आज इस तर्क युग में जबकि बुद्धि संगत तत्वों को ही आश्रय मिल रहा है, हर एक विचारवान व्यक्ति इस सोच-विचार में पड़ा हुआ है कि सचमुच ईश्वर कुछ है भी या यों ही एक हौआ बना चला आता है। ऐसी दशा में हम किसी व्यक्ति को ‘बाबा वाक्यं प्रमाणम’ मानकर सन्तोष कर लेने के लिये नहीं कह सकते। ईश्वर है या नहीं? है तो कौन है? कहाँ है? कैसा है? इस सम्बन्ध में तर्क और प्रमाणों से परिपूर्ण चर्चा पाठक इसी लेखमाला के अंतर्गत अगले अंकों में पढ़ेंगे। इस समय तो हमें केवल यही बताना है कि इस पेचीदगी के होते हुए भी पंचाध्यायी ईश्वर उपासना को आवश्यक क्यों बताती है। जब एक वस्तु के होने में ही सन्देह है, तो उसकी उपासना की बात कहना किस प्रकार युक्ति संगत हो सकता है।

उपरोक्त श्लोक में ईश्वर उपासना का आदेश मनुष्य मात्र के लिए है। मनुष्य मात्र में अनीश्वरवादी भी आ जाते हैं, फिर सार्वभौम व्यवस्था तो वहीं हो सकती है, जिसे दोनों पक्ष स्वीकार करें। इसलिए हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस श्लोक की विवेचना करनी होगी, जिसे अनीश्वरवादी भी स्वीकार करते हों। असंख्य में तो यह आदेश उन्हीं लोगों के लिए है, जो उपासना नहीं करते। करने वाले तो करते ही हैं, उनके लिए तो कहना ही कुछ नहीं हैं ‘पढ़ने जाना चाहिए’ यह उपदेश उन्हीं बालकों के लिए हैं, जो पढ़ने नहीं जाते, जो परिश्रम से पढ़ रहे हैं, उनके लिए तो यह शिक्षा कुछ विशेष महत्व नहीं रखती, क्योंकि वे तो पहले से ही उस पर अमल कर रहे हैं। अनीश्वर वादियों को उन्हीं के दृष्टिकोण से उपासना की उपयोगिता बताना यहाँ अधिक उपयुक्त होगा।

ईश्वर उपासना का मानसिक विश्लेषण करते हुए, मनःशास्त्र के विशेषज्ञ डॉ. एटकिसन ने लिखा है कि “भक्त के मन में भगवान् के सम्बन्ध में अपनी मनोभूमि के अनुसार एक दिव्य कल्पना चित्र होता है, उस चित्र में तन्मय होने के प्रयत्न को उपासना कहते हैं।” यह कल्पना चित्र हर व्यक्ति के पृथक होते हैं, इसीलिए श्री विवेकानंद जी कहा करते थे, हर व्यक्ति का एक अलग ईश्वर है। जो आधुनिक विद्वान देवताओं का अर्थ सन्त पुरुष नहीं करते, उनका कहना है कि पुराने समय में भारत की आबादी जब तेतीस करोड़ थी, हर व्यक्ति के मन में ईश्वर सम्बन्धी धारणा एक दूसरे से कुछ न कुछ भिन्नता लिये हुए होती है, इसलिए किसी कवि ने तैंतीस करोड़ स्वतंत्र देवताओं की बात कह कर हर, इसी आधार पर उनका अलंकारपूर्ण विस्तृत वर्णन कर दिया था, तभी से हिन्दू जाति में तैंतीस करोड़ देवताओं की मान्यता को आश्रम मिला।

आइए, कुछ ईश्वर भक्तों को बुलावें और उनकी मानसिक स्थिति को जाँचें। एक हिन्दू को लीजिये, भारतीय वेष-भूषा में सुसज्जित, पूर्ण स्वस्थ, सुन्दर, सद्गुण, दयालु, न्यायी, सर्व शक्तिवान देवता की मूर्ति का मन ही मन ध्यान करता है। कृष्ण, राम, विष्णु, शंकर आदि के सुन्दर चित्र जो बाजार में बिकते हैं, उन्हीं से मिलती जुलती किसी मूर्ति की रचना उसने अपने मस्तिष्क के अंतर्गत कर रखी है। अब एक मुसलमान को लीजिए उसके मन में खुदाबन्द करीम का ऐसा चित्र है, जो चौथे आसमान में फरिश्तों के कन्धों पर रखे हुए तख्त पर बैठा है, लम्बी सफेद दाढ़ी, सुथना, टर्की टोपी, अचकन या ऐसी ही कुछ पोशाक है, गुणों में हिन्दू के राम के समान यह भी सर्वशक्तिवान है। एक ईसाई को लीजिए, उसका गौड पूरा साहब बहादुर है, रंग का गोरा चिट्टा, कोट पतलून पहिने हुए है। इसी प्रकार हब्शियों का ईश्वर नंग-धड़ंग, काला-कलूटा, मोटे होठ वाला होगा। यदि बैल ईश्वर ध्यान करता हो, तो उसका ईश्वर एक अच्छा साँड होगा, इसी प्रकार यदि अन्य पशु-पक्षी ईश्वर का ध्यान करने में समर्थ होंगे, तो वे अपनी ही विचार मर्यादा के अंतर्गत ईश्वर की रचना करते होंगे।

एक वैज्ञानिक इन सब मानस चित्रों की विभिन्नता पर विचार करता है, तो वह समझ जाता है कि यह सब चित्र वास्तविक ईश्वर के नहीं हैं, क्योंकि सभी लोग जब उसे एक और सब व्यापक मानते हैं, तो यह आकृति भेद क्यों हैं? या तो सभी के ध्यान में दाढ़ी और टर्की टोपी वाला ईश्वर होना चाहिए या फिर बंशी बजाने वाला ही। पृथकता इस बात की घोषणा करती है कि यह रचना मानवीय कृति है। इसकी पुष्टि इसलिये भी हो जाती है कि गुण, कर्म, स्वभाव और विश्वास भी इन ईश्वरों के अलग-अलग पाये जाते हैं। खुदाबन्द करीम कुर्बानी की गायों को चट कर जाते हैं पर भगवान कृष्णा इस पर दुखी और नाराज हो जायेंगे। हबसी का खुदा पीली चिड़िया का अण्डा पाकर आशीर्वाद देता है, पर बौद्धों का उपास्यदेव, इसे स्वीकार न करेगा। ईश्वरीय धर्म पुस्तकें वेद, कुरान, बाइबिल, तौरित, धम्मपद, जिन्द अवेस्ता में जो धर्मोपदेश हैं, वे एक दूसरे से बहुत अंशों में विरुद्ध पड़ते हैं। यह सब प्रमाण इस बात के हैं, कि भक्तों का उपास्य देव एक कल्पित प्रतिमा है, जिसका निर्माण वह अपने ज्ञान, मर्यादा, आवश्यकता, इच्छा और कामना के आधार पर करता है। हाँ एक बात में यह सब ईश्वर समान हैं, कि वे भक्त से अधिक सशक्त हैं और उन ईश्वरों में वह सब योग्यतायें मौजूद हैं, जिनकी कामना भक्त अपने लिए करता है।

इस मनोविश्लेषण के उपरान्त यह जानना आसान हो जाता है कि, यह वस्तु क्या है। बीमारी के लक्षण मालूम हो जाने पर उसके कारण का परिचय प्राप्त करना कुछ विशेष कठिन नहीं रह जाता। लार्ड टाटनहम का मत है कि -”भक्त भगवान के जिस रूप का ध्यान करता है, वास्तव में वह उसका आदर्श है, मनुष्य क्या बनने का प्रयत्न कर रहा है, यह उसके उपास्यदेव की आकृति, स्वभाव और शक्ति के आधार से जानना चाहिए। इष्टदेव से जितना अधिक प्रेम होगा, प्रगति उसी गति से होगी।” उनका तात्पर्य यह बताने का है कि जाने या अनजाने में जिस मूर्ति की उपासना मनुष्य करने लगता है, उसकी मानसिक चेतना उसी साँचे में ढलती चली जाती है। गीता का भी यही मत है-’प्रेतों को भजने वाले प्रेतों को, देवताओं को भजने वाले देवताओं को और मुझे भजने वाले मुझे प्राप्त होते है। यह कथन भी उसी भाव का द्योतक है।

जो व्यक्ति जिस वस्तु को प्राप्त करना चाहता है, पहले उसका एक नक्शा बना कर तैयार करता है। इंजीनियर कोई बड़ी वस्तु बनाते हैं, तो उसका एक मॉडल बनाते हैं, व्यापारी नया व्यापार करते समय उसकी रूपरेखा बनाता है, सरकारें विधान बनाती हैं, बजट पास करती है, नेता योजना बनाते हैं, तब उसके अनुसार काम होता है। विद्यार्थी जब निश्चय कर लेता है कि मुझे वैद्य बनना है, तब वह आयुर्वेद की पुस्तकें लाकर पढ़ना आरम्भ करता है। यदि वह निश्चय न करें कि मुझे क्या बनना है, और यों ही आज आयुर्वेद, कल मुनीमी, परसों लुहारी, अगले दिन सुनारी सीखे, जब जो मन में आये वह करे, तो उसका प्रयत्न निष्फल चला जावेगा और कुछ भी लक्ष प्राप्त न कर सकेगा। यात्री आज पूरब, कल पश्चिम परसों दक्षिण को नहीं चलता, वरन् एक लक्ष बनाकर उसी पर कदम बढ़ाता है और निर्धारित योजना के अनुसार आगे बढ़ता जाता है।

ध्यानावस्था में जिस ईश्वर का प्रेमपूर्वक ध्यान करके उसमें तन्मय होने की भावना की जाती है, उसका मनोवैज्ञानिक रहस्य यह है कि भक्त वैसा ही बनना चाहता है, जैसा कि भगवान की प्रतिमा उसके मस्तिष्क में हैं। श्रीकृष्णचन्द्र का हथौड़ों से गठा हुआ शरीर, कामदेव को लज्जित करने वाला सौंदर्य, कुवलियापीड़ हाथी को पछाड़ने वाला बल, असाधारण बुद्धि, योगेश्वर पदवी का तत्वज्ञान, सब कुछ करने में समर्थ, यही सब योग्यतायें उस ध्यान चित्र के अन्तराल में निहित होती हैं, जिनका ध्यान करने वाला भी धीरे-धीरे वैसा ही बनता जाता है। गीता कहती है-’जो जैसा चिन्तन करता है, वह वैसा ही हो जाता है।” सर स्काट ने कहा-’यदि मुझे यह मालूम हो जाय कि अमुक व्यक्ति की भावना क्या हैं, तो मैं बता दूँगा कि आगे चल कर वह क्या होगा।” भृंग के सत्संग से कीड़े का भृंग बन जाने की जो किंवदंती प्रचलित है, वह कहाँ तक ठीक है अभी यह नहीं जाना जा सका पर शत-शत मुखो से मनःशास्त्र के पण्डितों ने यह स्वीकार किया है कि, जो जैसा ध्यान करता है, वह वैसा ही हो जाता है। दिव्य गुणों से सम्पन्न कृष्ण का तीव्र संवेदना के साथ ध्यान करने वालों की योग्यतायें उसी प्रकार की बनने लगेंगी यह एक असंदिग्ध मनोवैज्ञानिक सचाई है, जिससे कोई इन्कार नहीं कर सकता।

अनीश्वरवादी अपने विश्वास न बदलते हुए भी ईश्वर उपासना से किस प्रकार आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त कर सकते हैं, इसकी चर्चा हम अगले अंक में करेंगे।

कहानी-


अहं ब्रह्मास्मि

(श्री हरिश्चन्द्र जी मीतल, कुँजरोद)

एक ब्राह्मण शिवजी को ब्रह्म मानकर मन्दिर में उनकी मूर्ति को पूजने नित्य जाया करता था, एक दिन वह पूजा कर रहा था कि एक चूहा निकला और मूर्ति पर चढ़ कर पूजा की सामग्री खाने लगा। ब्राह्मण ने सोचा, यह चूहा शिवजी से बड़ा है, इसलिए मुझे इसी को ब्रह्म मानना चाहिए। दूसरे दिन से वह चूहे की पूजा करने लगा। एक दिन उस चूहे को एक बिल्ली पकड़ कर खा गई, अब वह ब्राह्मण उन बिल्ली को ही ब्रह्म समझ कर पूजने लगा। कुछ दिन बाद एक मोटा ताजा कुत्ता दृष्टि बचा कर उस बिल्ली पर चढ़ दौड़ा और कई जगह से उसका माँस नोच ले गया। तब तो देवता जी को यह मानने के लिए विवश होना पड़ा कि कुत्ता बड़ा ब्रह्म है। अब तो कुत्ते का पूजन-अर्चन होने लगा।

नित्य के मधुर मिष्ठान्न मिलने से कूकर ब्रह्म की दाढ़ लापक गई और वे मौका पाकर भोजनालय के भीतर भी धावा बोलने लगे। इन हरकतों से ब्राह्मणी बुरी तरह चिड़ी हुई थी, एक दिन उसने मोटा डंडा लेकर कुत्ते की अच्छी तरह मरम्मत कर डाली। ब्राह्मण देवता कोठरी में बैठे यह दृश्य देख रहे थे, उनकी दार्शनिक बुद्धि ने यह निष्कर्ष निकाला कि कुत्ते से बलवान मेरी स्त्री है, इसलिए अब से वही ब्रह्म समझी जानी चाहिए। दूसरे दिन से देवी जी पर अक्षर, पुष्प चढ़ने लगे। ब्राह्मणी को सन्तोष हुआ कि चलो इसी बहाने अब यह घर तो रहा करेंगे। उसने आज्ञा दी कि-”देखिए देवताजी, मैं ब्रह्म हूँ, ब्रह्म की आज्ञा पालन करना आपका कर्तव्य है। देखिये, घर में कुत्ते, बिल्ली बहुत आने लगे हैं, आप इन्हें घर में न घुसने दिया करे, यह आदेश मैं आपको करती हूँ।”

ब्रह्मा की आज्ञा को न मानना पाप है। स्त्री की आज्ञानुसार ब्राह्मण देवता बड़ी सावधानी से बिल्ली और कुत्तों की रखवाली करने लगे। एक दिन एक कुत्ता किसी प्रकार घर में घुस आया। ब्राह्मण को जब पता चला, तो उन्होंने पास पड़ी हुई ईंट कुत्ते के खींच कर मारी। संयोगवश ईंट कुत्ते को तो लगी नहीं पास बैठी हुई उनकी स्त्री के सिर में लगी। माथा फूट गया, खून की धार बहने लगी।

ब्राह्मण को स्त्री की चोट का तो कुछ रंज न हुआ, पर ब्रह्म निरूपण करने लगे। मेरे द्वारा स्त्री का भी सिर फूट सकता है, इसलिए उससे तो मैं ही बड़ा हूँ। अब मैं अपने को ही ब्रह्म समझा करूंगा। दूसरे दिन से वे चारों ओर यही घोषणा करते फिरने लगे-’अहं ब्रह्मास्मि, अहं ब्रह्मास्मि, मैं ब्रह्म हूँ, मैं ब्रह्म हूँ।

अदृश्य विवेचन लेख माला-


चमत्कारी शक्तियाँ

जीवोऽनन्तबलोपेतः पितालौकिक शक्तिनाम्।

वर्तते तस्य सन्त्येताः दास्यश्च ऋद्धि सिद्धयः॥

-पंचाध्यायी।

(जीवः जीव) (अनन्तबलोपेतः) अनन्त बल से युक्त (अलौकिक शक्तियाँ) अलौकिक शक्तियों का (पिता) पिता (वर्तते) है (च) और (एताः) ये (ऋद्धि सिद्धयः) ऋद्धि सिद्धियाँ (तस्य) उसकी (दाम्यः) दासिनाँ (सन्ति) हैं।

शास्त्र का यह कथन बहुत ही अनुभवपूर्ण है कि “जीव अनन्त बल वाला और अलौकिक शक्तियों का पिता है। ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ उसकी दासी है।” सचमुच हमारी मानसिक रचना ऐसी अद्भुत है कि उसकी सम्भावनाओं के सम्बन्ध में बहुत ही कम जानकारी प्राप्त की जा सकी है जितनी जानकारी मिली है, वह ऐसी है कि अपने अलौकिक चमत्कारों से आश्चर्यचकित कर देती है।

अष्ट सिद्धियों नव निद्धियों की मान्यता योग शास्त्र के अंतर्गत है। पातंजलि ने योग के चमत्कारों पर प्रकाश डालते हुए साधन पाद के सूत्रों में बताया है कि अमुक अवस्था में पहुँचे मनुष्य से हिंसक पशु भी वैर त्याग देते हैं, उसके निकट गाय और सिंह एक घाट पानी पीते हैं, वह जो कुछ भी कह दे वही वाणी सत्य हो जाती है, सम्पूर्ण रत्न धन सम्पदा उसके सामने उपस्थित रहते हैं, मनमाना बल हो जाता है, अपने और दूसरों के जन्म जन्मान्तरों का वृत्त जान पड़ता है, उसके शरीर के काट डालने पर भी पीड़ा नहीं होती आत्म दर्शन करता है, वशीकरण में निपुण हो जाता है, इन्द्रियाँ दूरदर्शी हो जाती हैं, बहुत दूर के वृत्तान्त को कानों सुनाई पड़ते हैं, दूरस्थ वस्तुओं को आंखें देखती हैं, नाक सूँघती है, जिह्वा चखती है? शरीर भाप के समान हलका होकर के कहीं भी उड़ जा सकता है, पानी पर चल सकता है, वेश बदल सकता है, चाहे जितना छोटा या बड़ा बन सकता है, सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास का प्रभाव नहीं पड़ता प्राण रोक कर यथेच्छ काल तक जीवित रह सकता है, गड़ी हुई, छिपी हुई या अदृश्य वस्तु उसे दिखाई पड़ती हैं, भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान होता है, जीव जन्तुओं की या अन्य भाषा-भाषियों की बोली समझ पड़ती है, दूसरे के मन की बातें मालूम हो जाती हैं, मृत्यु को जान लेता है, ग्रहों, नक्षत्रों, तथा ब्रह्माण्ड की गतिविधि के बारे में जानकारी हो जाती है, सिद्ध आत्माओं से साक्षात्कार करता है, पाँचों तत्व आज्ञाकारी बन जाते हैं, शाप और वरदान देने की शक्ति आ जाती है, जो चाहे सो घटना घटित कर सकता है। यह सब किस प्रकार होता है, इसका कुछ संकेत योग दर्शन के विभूति पाद में किया गया है।

संसार के समस्त देशों में ऐसी जन श्रुतियाँ और लिखित भाषाएं उपलब्ध होती हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में वहाँ कुछ व्यक्ति ऐसे रहे हैं, जो असाधारण शक्तियों से सम्पन्न थे, वे व्यक्ति ऐसे काम कर सकते थे, जो और लोगों के लिए बड़े आश्चर्य से भरे हुए, अनहोने एवं असाधारण हों। यह सब गाथाएं निरी कपोल कल्पनाएं नहीं हैं, हो सकता है कि कहीं-कहीं कुछ अतिरंजित वर्णन भी हो, पर इनका कुछ न कुछ आधार अवश्य है। शृंखलाबद्ध इतिहास का अध्ययन करने से ऐसी सच्चाइयां सामने आ जाती हैं, जिनमें अलौकिकताएं स्वीकार करनी ही पड़ती हैं। अब तक कुछ ऐसे ध्वंसावशेष प्राप्त होते हैं, जिनके गर्भ में दैवी चमत्कारों की गाथाएं दबी पड़ी हैं।

उन्नीसवीं सदी में हमारा यह नवविकसित बालक -भौतिक विज्ञान - यह साबित नहीं कर सका था कि कोई ऐसी अदृश्य शक्ति है, जिसके द्वारा मनुष्य की साधारण मर्यादा से बड़े काम हो सकते हैं। इसलिए चारों ओर यह घोषणा की जा रही थी कि, अलौकिक वाद निरर्थक है, मिथ्या है, पाखण्ड है। कुछ दम्भी व्यक्ति जीविकोपार्जन के लिए यह सब मन गढ़न्त कहानी रचते हैं। चूँकि भौतिक विज्ञान ने नित नये आविष्कारों के निर्माण का ताँता बाँध कर अपनी प्रामाणिकता को सिद्ध किया और आध्यात्मिक वाद का ह्रास हो जाने से चमत्कारी प्रमाण चाहे जहाँ उपलब्ध न हो सके। यह दोनों संयोग एक साथ ही आ मिले, इसलिए अदृश्य शक्तियों के खंडन में कोई विशेष बाधा न रही। भौतिक विज्ञान का साहस यहाँ तक बढ़ा कि उसने ईश्वर की बात तो दूर, आत्म-तत्व तक का आस्तित्व मानने से इनकार कर दिया। कहा जाने लगा- ‘बोलता पुरुष’ कुछ नहीं, पंचतत्वों से बने हुए शरीर में एक शक्ति वैसे ही उत्पन्न हो जाती है, जैसे ताँबे और जस्ते के तारों को एक विशेष विधान के साथ मिला देने के कारण अनेक कार्य करने वाली बिजली बन जाती है। उपरोक्त मत की पुष्टि करते हुए, कुछ मनुष्य की आकृति के यन्त्र भी बने हैं, जो बिजली की शक्ति से कुछ-2 मनुष्य जैसे कार्य भी कर लेते थे। ऐसे युग में स्वाभाविक ही था कि जन साधारण को विज्ञानवादियों का मत स्वीकार्य होता। एक स्वर से आलौकिकवाद को कल्पना की उड़ान या “पाखंड घोषित किया जाने लगा। किसकी हिम्मत थी जो ‘विजयी’ विज्ञान के विरुद्ध जबान खोलता। जो लोग अलौकिकता का अनुभव करते थे, वे भी बेचारे अपना मजाक उड़वाना नहीं चाहते थे, इसलिए उनने भी मौन रहना ही उचित समझा। विज्ञान युग ने चारों ओर विजय पताका फहरा दी कि हमने अन्धविश्वासों को उखाड़ कर फेंक दिया। अब कोई देवी, देवता, सिद्ध, योगी, भैरव, बैताल अपना आस्तित्व प्रकट करने का साहस न करेगा।

सचाई आखिर सचाई ही है। उसके अन्दर आत्म-जीवन की मात्रा इतनी होती है कि पत्थर को भी तोड़ कर बाहर निकल आती है। एक ओर यह सिद्ध किया जा रहा था कि संसार में दैवी शक्ति कुछ नहीं हैं दूसरी ओर आँखों के सामने ऐसी घटनायें घटित होती हुई, उपस्थित हो रही थीं, जिनका समाधान करने वाला कोई उत्तर देने में विज्ञान ने अपने को असमर्थ पाया। सर आलीवर लाज, सर कोनन डायल, कर्नल विकलेण्ड आदि प्रसिद्ध तथा प्रतिष्ठित महानुभावों ने अनेक और अत्यन्त आश्चर्यजनक जिनके घटनाओं का प्रत्यक्ष अनुभव करने के उपरान्त तत्सम्बन्धी प्रचण्ड तार्किक विवेचना की और अन्त में इस निश्चय पर पहुँचे कि -’दृश्य जगत् के अतिरिक्त कुछ ऐसी अदृश्य सत्ताएं भी काम करती हैं, जो ज्ञानवान् हैं, विचार बुद्धि रखती हैं, और मनुष्य की अपेक्षा असंख्य गुनी शक्तिशालिनी हैं। यह सत्ताएं कभी-कभी किन्हीं विशेष मनुष्यों पर कारणवश आकर्षित होती हैं और उसे अद्भुत प्रसंगों का अनुभव कराती है।” थियोसोफिकल सोसायटी की जीवनदात्री श्रीमती एनी बेसेण्ट एक समय नास्तिकता के विचार रखती थी, किन्तु प्रत्यक्ष प्रमाणों ने इस बात के लिए विवश कर दिया कि वे अपने विचारों को बदल डाले। श्रीमती बेसेन्ट अदृश्य शक्तियों पर इतना अधिक विश्वास करता थीं कि यदि कोई भारतीय होता, तो उसे घोर अन्ध विश्वासी की उपाधि दे दी जाती। उनके तत्वावधान में एक अंग्रेजी पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसका हिंदी अनुवाद दैवी सहायता’ के नाम से छपा है। इस पुस्तक में ऐसी ही कतिपय प्रत्यक्ष घटनाओं के संस्मरण हैं, जो अदृश्य देवताओं और गुप्त सिद्धियों की मान्यता को प्रमाणित करती हैं।

अगले अंक में क्रमशः हम पाठकों को यह बताने की कोशिश करेंगे अब आलौकिक वाद अन्धविश्वास नहीं रहा है वरन् वैज्ञानिक परीक्षणों से प्रयोग शालाओं में उसकी भी सचाई स्वीकार कर ली गई है। देवी, देवता, सिद्ध, वेताल, अप्सरा, चामुण्डायें अब उपहास की बात नहीं रह गई हैं और न ऋद्धि-सिद्धियाँ कल्पना की उड़ान है। जीव अत्यन्त शक्तिवाला है वह अनेक अलौकिकताओं का पिता है, स्वेच्छा से वह देवी देवताओं का, छाया, पुरुषों को किस प्रकार किस विज्ञान से अपने वश में कर लेता है इन सब रहस्यों की जानकारी पाठक इन्हीं पंक्तियों में हर मास प्राप्त करते रहेंगे।

‘प्रारब्ध’ लेख माला-


आकस्मिक सुख-दुख

दैविकं दैहिकं चापि भौतिकं च वथैव हि।

आयाति म्वयमाहूतो दुःखानामेष संचयः॥

-पंचाध्यायी।

(दैविकं) दैविक (अपिच) और (दैहिकं) दैहिक (तथैव हि) उसी प्रकार (च) और (भौतिकं) भौतिक (दुःखानाँ) दुखों का (एव) यह (संचयः) समूह (स्वयभाहूतः) अपने आप बुलाया हुआ (आयति) आता है।

अनेक बार ऐसे अवसर आ उपस्थित होते हैं जो प्राकृतिक नियमों के बिलकुल विपरीत दिखाई देते हैं। एक मनुष्य उत्तम जीवन बिताता है पर अकस्मात् उसके ऊपर ऐसी विपत्ति आ जाती है मानो ईश्वर किसी घोर दुष्कर्म का दण्ड दे रहा हो। एक मनुष्य बुरे से बुरे कर्म करता है पर वह चैन की बंशी बजाता है सब प्रकार के सुख सौभाग्य उसे प्राप्त होते हैं। एक निठल्ले को लाटरी में जुआ से या कहीं गढ़ा हुआ धन मिल जाता है किन्तु दूसरा अत्यन्त परिश्रमी और बुद्धिमान मनुष्य अभाव में ही ग्रसित रहता है। एक व्यक्ति स्वल्प परिश्रम में ही बड़ी भारी सफलता प्राप्त कर लेता है दूसरा घोर प्रयत्न करने और अत्यन्त सही तरीका पकड़ने पर भी असफल रहता है। ऐसे अवसरों पर ‘प्रारब्ध’ ‘भाग्य’ आदि शब्दों का प्रयोग होता है। इसी प्रकार महामारी, बीमारी, अकाल मृत्यु, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बिजली गिरना, भूकम्प, बाढ़ आदि के दैवी प्रकोप भी भाग्य-प्रारब्ध कहे जाते हैं। आकस्मिक दुर्घटनायें, मानसिक आपदा, वियोग आदि वे प्रसंग जो टल नहीं सकते इसी श्रेणी में आ जाते हैं।

यह ठीक हैं कि ऐसे प्रसंग कम आते है, प्रयत्न से उलटा फल होने को-आकस्मिक घटना घटित हो जाने के अपवाद चाहे कितने ही कम क्यों न हों, पर होते जरूर हैं। और वे कभी-कभी ऐसे कठोर होते हैं कि उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसे अवसरों पर हममें से साधारण श्रेणी का ज्ञान रखने वाले बहुत ही भ्रमित हो जाते हैं और ऐसी-ऐसी धारणा बना लेते हैं जो जीवन के लिए बहुत ही घातक होती हैं। कुछ लोग तो ईश्वर पर अत्यन्त कुपित होते हैं, उसे दोषी ठहराते हैं और भरपूर गालियाँ देते हैं, कई तो नास्तिक हो जाते हैं कहते हैं कि हमने ईश्वर का इतना भजन पूजन किया पर उसने हमारी कुछ भी सहायता नहीं की ऐसे ईश्वर को पूजना व्यर्थ है, कई महानुभव लाभ की इच्छा से साधु संत देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। यदि संयोग वंश इसी बीच में कुछ हानिकर प्रसंग आ गये तो उस पूजा के स्थान पर निन्दा करने लगते हैं। ऐसा भी देखा गया है कि ऐसे आकस्मिक प्रसंग आने के समय ही यदि घर में कोई नया प्राणी आया हो, कोई पशु खरीदा हो, बालक उत्पन्न हुआ हो, नई बहू आई हो तो उस घटना का दोष या श्रेय उस नवागन्तुक प्राणी पर थोप दिया जाता है यह नया बालक बड़ा भाग्यवान हुआ जो जन्मते ही इतना लाभ हुआ, यह बहू बड़ी अभागी आई कि आते ही सत्यानाश कर दिया इस श्रेयदान या दोषारोपण के कारण कभी-2 घर में ऐसे दुखदायी क्लेश कलह उठ खड़े होते हैं कि उनका स्मरण होते ही रोमांच हो जाता हैं। हमारे परिचित एक सज्जन के घर में नई बहू आई उन्हीं दिनों घर का एक जवान लड़का मर गया। इस मृत्यु का दोष बेचारी नई बहू पर पड़ा। सारा घर यही तानेजनी करता- यह बहू बड़ी अभागी आई है आते ही एक बलि ले ली। कुछ दिन तो इन अपमानों को बेचारी निर्दोष लड़की विष के घूँट की तरह पीती रही पर जब हर वक्ता का अपमान, घर वालों का नित्यप्रति का दुर्व्यवहार सहन न कर सकी तो मिट्टी का तेल छिड़क कर जल मरी। बेचारी निरपराध विधवाओं को अभागी, कलमुँही, डायन की उपाधि मिलने का एक आम रिवाज है। इसका कारण भाग्यवाद के सम्बन्ध में मन में जमी हुई अनर्थमूलक धारणा है। सही बात को न समझने के कारण लोगों के हृदयों में ऐसे ऊट पटाँग विश्वास घर जमा लेते हैं, अनेक व्यक्ति तो भाग्य की वेदी पर कर्तव्य को भी बलि चढ़ा देते हैं उनका विश्वास होता है कि इस जीवन में जो भी हानि-लाभ होगी वह भाग्य के अनुसार होगी। अब जो कर्म किये जा रहे हैं उनका फल अगले जन्म में भले मिले पर यह जीवन तो प्रारब्ध के रस्सों में ही अकड़ा हुआ है। जब उपाय करने, प्रयत्न या उद्योग करने की बात चलती है तो वे यही कहते हैं जो भाग्य में लिखा होगा सो होगा, ब्रह्मा की लकीर को कौन मेट सकता है, जो ईश्वर को करनी होगी वह होकर रहेगी, होनी बड़ी प्रबल है इन शब्दों का प्रयोग वास्तव में इसलिये है कि जब आकस्मिक दुर्घटना पर अपना बस नहीं चलता और अनहोने प्रसंग सामने आ खड़े होते हैं जो मनुष्य का मस्तिष्क बड़ा विक्षुब्ध, किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। सामने कोई दोषी तो दिखाई नहीं पड़ता पर आघात लगने के कारण दोष आता ही है। आवेश में बुद्धि ठिकाने नहीं रहती संभव है कि वह दोष किसी निर्दोष पर बरस पड़े और अनर्थ उपस्थित कर दे। इसलिये उस क्षोभ को शान्त करके किसी प्रकार सन्तोष धारण किया जा सके। परन्तु हम देखते हैं कि आज अनेक व्यक्ति उस आपत्तिकाल के मनसमझाव को कर्तव्य के ऊपर कुल्हाड़ी की तरह चलाते हैं। होते-होते यह लोग उद्योग के विरोधी हो जाते हैं और अजगर और पक्षी की भाँति उपमा देकर भाग्य के ऊपर निर्भर रहते हैं। यदि यह सज्जन बड़े-बूढ़े हुये तो अपने प्रभाव से निकटवर्ती अल्पज्ञान वाले तरुणों और किशोरों को भी इसी भाग्यवाद की निराशा के दलदल में डाल देते है।

पाठक समझे होंगे कि आकस्मिक घटनाओं के वास्तविक कारण की जानकारी न होने से कैसी-कैसी अनर्थ कारक ऊट पटाँग धारणायें उपजती हैं और वे लोगों के मनों में जब गहरी घुस बैठती हैं तो जीवन प्रवाह को कैसा उलटा, विकृत एवं बेहूदा बना देती हैं। मनुष्य जाति ‘कर्म की गहन गति’ को चिरकाल से जानती है, और उसके उन कारणों को जानने के लिये चिरकाल से प्रयत्न करती रही है। उसके कई हल भी अब तक तत्वदर्शियों ने ढूँढ़ निकाले हैं। पंचाध्यायीकार ने उपरोक्त श्लोक में ‘गहना कर्मणोगतिः’ पर प्रकाश डालते हुये यह बताया है कि यह दैविक, दैहिक और भौतिक घटनायें, तीन प्रकार के आकस्मिक सुख-दुख, संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण कर्मों के आधार पर होते हैं। दूध एक नियत समय में एक विशेष प्रक्रिया द्वारा घी बन जाता है इसी प्रकार विविध कर्म भी तीन प्रकार के फलों को उत्पन्न करते हैं। वे आकस्मिक घटनायें किस तरह उत्पन्न करते हैं इसका पूरा, विस्तृत, एवं वैज्ञानिक विवेचन जानने के लिए पाठकों को अगले अंक की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

धर्म तत्व निरूपण लेखमाला-


सच्चिदानन्द की आराधना

धर्म तत्व निरूपण लेखमाला

अस्तित्वं सत्तु चिज ज्ञानं सुखं च देह चेत सोः।

आनन्द इति प्रख्यातस्तानेवाभिलषन् समः॥

उपासते धर्म लोकः सच्चिदानन्द रुपिणम्॥

-पंचाध्यायी।

(सत्) सत् (तु) तो (अस्तित्वं) अस्तित्व अर्थ वाची है (चित्) चित् पद (ज्ञानं) ज्ञानार्थवाची है (च) और (आनन्दः) आनन्द पद (देह चेत सोः) शरीर और मन के (सुखं) सुख अर्थवाची है (इति प्रख्यातः) यह प्रसिद्ध है (तानेव) उन्हीं को (अभिलाषन्) चाहता हुआ (समः) सम्पूर्ण (लोकः) लोक (सच्चिदानन्दं रुपिण) सच्चिदानन्द रूपी (धर्म) धर्म की (उपासते) उपासना करता है।

वैसे तो धर्म शब्द नाना अर्थों में व्यवहृत होता हैं पर दार्शनिक दृष्टि से धर्म का अर्थ स्वभाव ठहरता है। अग्नि का धर्म गर्मी है अर्थात् अग्नि का स्वभाव उष्णता है। हर एक वस्तु का एक धर्म होता है जिसे वह अपने जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त धारणा किये रहती है। मछली का प्रकृतिधर्म जल में रहना है, सिंह स्वभावतः माँसाहारी है। हर एक जीवित एवं निर्जीव पदार्थ एक धर्म को अपने अंदर धारणा किये हुये है। धातुएं अपने-अपने स्वभाव-धर्म के अनुसार ही काम करती हैं। धातु-विज्ञान के जानकार समझते हैं कि अमुक प्रकार का लोहा इतनी आग में गलता है और वह इतना मजबूत होता है, उसी के अनुसार वे सारी व्यवस्था बनाते हैं। यदि लोहा अपना धर्म छोड़ दे कभी कम आग से गले कभी ज्यादा से, इसी प्रकार उसकी मजबूती का भी कुछ भरोसा न रहे तो निस्सन्देह लोहकारों का कार्य असम्भव हो जाय। नदियाँ कभी पूरब को बहें कभी पश्चिम को, अग्नि कभी गरम हो जाय कभी ठंडी, आप सोचिये कि दुनिया कितनी अस्थिर हो जाय। परन्तु ऐसा नहीं होता विश्वास का एक-एक परमाणु अपने नियम धर्म का पालन करने में लगा हुआ है कोई तिल भर भी इधर से उधर नहीं हिलता। धर्मरहित कोई भी वस्तु इस विश्व में स्थिर नहीं रह सकती।

बहुत काल की खोज के उपरान्त मनुष्य का मूल धर्म मालूम कर लिया गया है। जन्म से लेकर मृत्यु तक सम्पूर्ण मनुष्य अपने मूलभूत धर्म का पालन करने में प्रवृत्त रहते हैं। आपको यह सुनकर कि कोई भी मनुष्य धर्मरहित नहीं हैं आश्चर्य होता होगा इसका कारण यह है कि आप मनुष्यकृत रीति-रिवाजों, मजहबों, फिरकों, प्रथाओं को धर्म नाम दे देते हैं, यह सब तो व्यवस्थायें हैं जो वास्तविक धर्म से बहुत ऊपर की उथली वस्तुयें हैं, आपको वास्तविकता का पता लगाने के लिए एक सत्य शोधक की भाँति बहुत गहरा उतर कर मनुष्य स्वभाव का अध्ययन करना होगा।

यह पहले ही बताया जा चुका है कि धर्म का अर्थ स्वभाव है। स्वभाव मनुष्यकृत नहीं होता वरन् ईश्वर प्रदत्त होता है। जिस योनि में जैसी शिक्षा प्राप्त करनी होती है उसकी मर्यादायें चारों ओर से खिंची हुई होती हैं, जिससे नौसिखिए कुछ भूल न कर बैठे। स्कूल के छात्र खेल के घण्टे में जब गेंद खेलते हैं तो अध्यापक उन्हें एक मर्यादित क्षेत्र बता देता है कि इस भूमि में गेंद खेलो, वैसे अपनी बुद्धि के अनुसार खेलने हारने-जीतने में खिलाड़ी लोग स्वतन्त्र हैं अध्यापक उसमें हस्तक्षेप नहीं करता पर क्षेत्र जरूर मर्यादित कर देता है, फील्ड छोड़ के सड़क पर फुटबाल उछालने की वहाँ व्यवस्था नहीं है। इसी प्रकार मनुष्य की कुछ स्वाभाविक मर्यादाएं हैं, जिनके अन्दर वह भले-बुरे खेल खेलता है। यही स्वाभाविक मर्यादाएं दार्शनिक दृष्टि से धर्म कहलाती हैं। धर्म के अंतर्गत क्षेत्र में ही मनुष्य के सारे काम होते हैं, इसमें पाप पुण्य क्या है, और किस प्रकार है, इसकी विवेचना तो हम अगले अंकों में करेंगे। इस समय तो मूलभूत धर्म के बारे में, ईश्वर प्रदत्त स्वाभाविक मर्यादा के सम्बन्ध में चर्चा की जा रही है, जिसे जानकर यह निश्चय किया जा सके कि हमें यह मानव देह क्या शिक्षा प्राप्त करने के लिए मिली है।

मनुष्य क्या करने में लगा रहता है, इसका गहरा निरीक्षण करके आध्यात्मिक तत्ववेत्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि ‘सच्चिदानन्द’ की उपासना में मानव प्राणी हर घड़ी लगा रहता है, एक पल के लिए भी इसे नहीं छोड़ता और न इसके अतिरिक्त और कुछ काम करता है, पाठक अधीर न हों कि सच्चिदानन्द की उपासना तो बिरले ही करते हैं, यदि बिरले ही करते तो वह बात स्वाभाविक धर्म न रह जाती, फिर उसे मनुष्यकृत मानना पड़ता है। अगली पंक्तियों में यही बताया जा रहा है कि किस प्रकार प्रत्येक मनुष्य सच्चिदानन्द की उपासना करता हुआ अपने धर्म कर्तव्य को पालन करने में लगा हुआ है।

सत् का अर्थ अस्तित्व, चित्त का अर्थ ज्ञान और आनन्द का अर्थ सुख है। अपने आस्तित्व की उन्नति में अपने ज्ञान की वृद्धि में, अपने सुख को बढ़ाने में ही सब लोग लगे हुए हैं, मनोविज्ञान शास्त्र में फ्राँसीसी पंडित सारेन्सस ने मानव प्रवृत्तियों का विश्लेषण करते हुए बताया है कि 1. शरीर और मन का सुख प्राप्ति करने, 2. आत्मरक्षा, 3. अपने को सब के सामने प्रकट करने, 4. बड़प्पन पाने, 5. समूह इकट्ठा करने, 6. गुप्त विषयों को जानने, 7. विपरीत योनि से (पुरुष स्त्री से और स्त्री पुरुष से) घनिष्ठता रखने, 8. साहस करने की इच्छाओं प्रेरित होकर ही मनुष्य अनेक प्रकार के कार्य करता है। अर्थात् मनुष्य को जितने भी कार्य करते हुए देखते हैं वे सब इन्हीं इच्छाओं के फल मात्र होते हैं। इन आठ वृत्तियों का विभाजन हम इस प्रकार किये देते हैं:-

आस्तित्व उन्नति के अंतर्गत- 1. रक्षा 2. अपने को प्रकट करना (कीर्ति) 3. बड़प्पन करना।

ज्ञान वृद्धि के अंतर्गत-1. गुप्त विषयों का जानना, 2. समूह इकट्ठा करना।

आनन्द बढ़ाने के अंतर्गत- 1. शरीर और मन का सुख, 2. साहस 3. विपरीत योनि से घनिष्ठता।

अब विचार कीजिए कि मनुष्य के समस्त कार्य इस सीमा में आ जाते हैं कि नहीं हिंसक, दस्यु, आक्रमणकारियों से, आपत्ति से, बचने के लिए लोग घर बनाते, बस्तियों में रहते, शस्त्र रखते, डरते, छिपते, भागते, वैद्यों, डाक्टरों के पास जाते, राज्य का निर्माण करते, देवी-देवताओं की सहायता लेते, युद्ध करते तथा अन्यान्य ऐसे प्रयत्न करते हैं, जिससे आत्मरक्षा हो, अधिक दिन जियें, मृत्यु से दूर रहें। कीर्ति के लिए लोकप्रिय बनना, फैशन बनाना, विज्ञापन कराना, अपना ढंग विशेष प्रकार का बनाना, भाषण देना, अपने विचार छापना, लोगों का ध्यान खींचने वाले शब्द अथवा प्रदर्शन करना आदि कार्य किये जाते हैं। गौरव के लिए नेता बनना अपने संरक्षण में छोटे लोगों को लेना, ओहदा प्राप्त करना, संपत्तिवान, बलवान बनना, राज्य सम्पत्ति पाना, गुरु बनना, अपने को पदवीधारी, ईश्वर भक्त, धर्म प्रचारक प्रकट करना आदि कृत्य होते हैं। इस प्रकार आत्मरक्षा, कीर्ति और गौरव प्राप्त करके आत्म विश्वास, आत्म सन्तोष, आत्म उन्नति का उद्योग किया जाता है।

विद्याध्ययन, सत्संग, स्वाध्याय, साधना अन्वेषण, आविष्कार, खोज, परीक्षण, वादविवाद, यात्रा, समारोहों में सम्मिलित होना, नवीन वस्तुओं का देखना, इस श्रेणी के कार्य गुप्त विषयों की जानकारी के लिए होते हैं। समाज में रहना, मित्र बढ़ाना, संगठन में बंधना, दल बनाना, कम्पनी खोलना, साझा करना आदि कार्यों के द्वारा मनुष्य दूसरों की योग्यताओं की जानकारी प्राप्त करना एवं उनकी सामूहिक अनुभूतियों के आधार पर अपनी ज्ञान चेतना में वृद्धि होने के लाभ उठाना चाहता है। इस प्रकार रहस्यान्वेषण को अपना प्रिय विषय बनाकर हम अल्पज्ञता से सर्वज्ञता की ओर बढ़ना चाहते हैं। अपने संसार के और अदृश्य विषयों के रहस्य से परिचित होने के लिए ज्ञान की तीव्र पिपासा को जीव अपने अन्दर धारणा किये हुए है। शिक्षालय, योग साधनाएं, प्रयोगशालाएं, पुस्तकें, समाचार पत्र, रेडियो, मनुष्य की इसी महान मानसिक क्षुधा के निवारणार्थ-ज्ञानवृद्धि के निमित्त प्रयत्न कर रहे हैं।

स्वादिष्ट भोजन, शीतोष्ण निवारण के प्रयत्न, वस्त्र, कोमल बिस्तर, सवारी, सेवक आदि शरीर सुख के लिए तथा खेल, तमाशे, नाच रंग, गीत, नाच आदि मनोरंजन के लिए होते हैं। त्याग, दान, अद्भुत कार्य, कष्टों का मुकाबला आदि वीरता के कार्य साहस प्रदर्शित करने के लिए हुआ करते हैं, पुरुषों का स्त्रियों के सम्बन्ध में और स्त्रियों का पुरुषों के सम्बन्ध में अनेक मार्गों से अधिक दिलचस्पी लेना भी सर्वत्र देखा आता है, यह खिंचाव भी आनन्ददायक समझा जाता है। शरीर सुस्थिर, दीर्घजीवी, आनन्दी एवं उन्नतिशील बनने की क्षमता वाला रहे और मनोरंजन से चित्त हलका होकर उर्ध्वगति प्राप्त करने की सामर्थ्य अपने अन्दर धारण किये रहे, इसलिए अन्तः चेतना स्वयमेव ऐसा प्रयत्न कर रही है कि शरीर और मन की प्रसन्नता नष्ट न होने पावे।

पाठक सब ओर भली प्रकार दृष्टि दौड़ा कर देख लें, सत्-आस्तित्व की उन्नति, चित्त-ज्ञान की वृद्धि आनन्द-शरीर और मन की सुख साधना में भी सब लोग प्रवृत्त मिलेंगे, कोई भी व्यक्ति इस कार्यक्रम से पृथक-सच्चिदानन्द की उपासना से विरक्त दिखाई न पड़ेगा। इस तरह जब हम गम्भीर दृष्टि से मनुष्य के स्वभावजन्य मूलभूत धर्म की खोज करते हैं, तो ‘सच्चिदानन्द की उपासना’ इसी तत्व को प्राप्त करते हैं।

इस धर्म का पालन तो सब करते हैं, इसी मर्यादा के अन्दर अपना जीवन क्रम जारी रखे हुए हैं, इतना जान लेने के उपरान्त पाठकों को यह समझना होगा कि इस खेल में खिलाड़ी लोग कहाँ? किस प्रकार? क्यों? भूल करके हार जाते हैं-पाप के भागी बन जाते हैं, अगले अंक में आप इन पंक्तियों में यही चर्चा पढ़ेंगे।


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कोयल आम्र-पीयूष पीकर भी घमंड नहीं करती है। मूर्ख मण्डूक नालों के गंदे जल को पाकर ही गर्जना करने लगता है।

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मन की अभिलाषा तप करने से पूर्ण होती है। वृद्धों की सेवा से बुद्धि बढ़ती है। मित्र अधिक करने से सुख प्राप्त होता है। धर्म पर दृढ़ रहने से स्वर्ग मिलता है।

लोक सुख लेखमाला-


गृहस्थ में संन्यास

औदार्य त्याग सेवानाँ प्राप्नुते व्यवहारतः।

ग्रहस्थे आश्रमे नूनं संन्यासस्य फलं नरः॥

-पंचाध्यायी

(नरः) मनुष्य (नूनं) निश्चय से (औदायं त्याग सेवानाँ) उदारता त्याग और सेवा के (व्यवहारनः) व्यवहार से (ग्रहस्थे आश्रमे अपि) ग्रहस्थ आश्रम में भी (सन्यासस्य) संन्यास के (फलं) फल को (प्राप्नुते) प्राप्त होता है।

“त्याग सेवा और उदारता का व्यवहार करने से गृहस्थ में संन्यास का फल प्राप्त होता है।” इन शब्दों के अंतर्गत पूर्ण सत्य का ऐसा अमृत तत्व छिपा हुआ है कि यदि हम लोग उसे समझ लें तो अपनी वर्तमान परिस्थितियों को ही स्वर्ग समान आनन्ददायक बना सकते हैं। देखा जाता है कि हमारे घर क्लेश कलह, कपट, छिद्रान्वेषण, अविश्वास और असन्तोष से भरे रहते हैं। बहू की सास, ननद, देवरानी, जिठानी से नहीं पटती। भाई-भाई में अनबन रहती है। सास को देखिये तो वह बहू-बेटों का रोना रोती मिलेगी। पिताजी अपने बेटों को कुपुत्र घोषित करते फिरते हैं। लड़के समझते हैं पिताजी की बुद्धि सठिया गई है। घर में बुजुर्गों का आदर सत्कार तो दूर रहा जहाँ अपमान न होता हो वहीं सौभाग्य समझना चाहिए। पैसे के सम्बन्ध में आपापूती का बोलबाला रहता है, जिसके हाथ जो पड़ता है उसे हथियाने की कोशिश करता है, कुटुम्ब के सम्मिलित धन में से चुरा कर अपना निज संग्रह करना, अपनी कमाई का एक अंश अपने लिए बचा लेना, हिसाब को उलटा-सुलटा बताना इस प्रकार के आचरण अक्सर हमारे कुटुम्बियों में देखे जाते हैं। कहने को तो सम्मिलित खानपान रहता है पर घर के चतुर व्यक्ति बाजार में जाकर चुपचाप अपनी इच्छाओं को तृप्त करते हैं। कुटुम्बियों की दृष्टि बचा कर जो पैसा कमाया है वह ससुराल से स्त्री को मिला, मैंने अमुक प्रकार अतिरिक्त परिश्रम से कमाया, कह कर निजी अधिकार में कर लिया जाता है। एक ओर तो कमाने वालों की यह मनोवृत्ति होती है, दूसरी ओर न कमाने वाले या कम कमाने वाले वैसी सुविधा प्राप्त नहीं कर पाते, इनमें से कोई-कोई तो अपने भोले होने के कारण साधारण व्यवहार से भी वंचित रह जाते हैं, नतीजा यह होता है कि वे मन ही मन कुढ़ने, जलने-भुनने, लगते हैं। भले ही वे कारणवश मुँह से विरोध प्रकट न करें पर अन्तर में इतना घोर असन्तोष धारण किये रहते हैं जिसकी ज्वाला में प्रेम का रस सहज ही सूख जाता है। ऐसे कितने घर हैं जिसमें सम्मिलित कुटुम्ब के सब सदस्य आपस में सच्चा प्रेम करते हों, एक दूसरे पर जान देते हों, और कोई किसी से असन्तुष्ट न हो।

सौ में से नब्बे पिचानवे घर ऐसे मिलेंगे जो कहने को तो सम्मिलित कुटुम्ब गिने जाते हैं पर उनकी आन्तरिक व्यवस्था में घोर अराजकता फैली हुई होती है। गृह-युद्ध है ज्वालामुखी भीतर ही भीतर सुलगता रहता है और इस बात की सदैव आशंका बनी रहती है कि कहीं भयंकर विस्फोट न हो जाय, नाशकारी गदर न मच जाय, आये दिन ऐसे समाचार कानों से टकराया करते हैं कि अमुक भाई-भाइयों में मारपीट हो गई अमुक व्यक्ति अपनी स्त्री को लेकर अलग हो गया, अमुक लड़का अपने पिता को बुरी-बुरी गालियाँ दे रहा है, अमुक सास बहुओं में खूब बजी, अमुक विधवा भाग गई, अमुक पति-पत्नी में देवासुर संग्राम मचा हुआ है। आत्महत्याओं में तीन चौथाई से अधिक भाग गृह जीवन से दुखी व्यक्ति होते हैं, साधु संन्यासियों में मुश्किल से पाँच फीसदी ऐसे मिलेंगे जो सच्चे स्थायी हैं, अन्यथा तो पारिवारिक जीवन की कटुता ही प्रायः उन्हें एकाकी जीवन बिताने के लिये प्रोत्साहित करती है। अखबार के पन्ने खोलते ही “गुमशुदा की तलाश” का एक-दो विज्ञापन दिखाई पड़ जाता है, उसमें लिखा होता है कि “अमुक लड़का घर से भाग गया है, जो उसे तलाश करके घर पहुँचावेगा, उसे मार्ग व्यय के अतिरिक्त इतनी रकम इनाम दी जायगी।” यह गुमशुदा भगोड़े अक्सर पारिवारिक जीवन से असंतुष्ट होकर भागते हैं। व्यभिचार की जो लहर बड़ी तेजी से बढ़ती चली आ रही है, उसकी तह में भी ऐसे ही कारण होते हैं, जिनके कारण असंतुष्ट व्यक्ति व्यभिचार करने पर उतारू हो जाता है।

सम्मिलित कुटुम्ब’ वास्तव में एक बड़ा ही उच्च आदर्शमय जीवन है। विश्वबन्धुत्व की-लोक सेवा की-वैरागी जीवन की-संन्यास की मुक्ति साधना की-आरंभिक तपोभूति इस प्रथा को निस्संकोच कहा जा सकता है। दूसरे देशों में लड़का सयाना होते ही बहू को साथ लेकर पक्षी की तरह अलग घोंसला बना लेता है और माता-पिता से अपना सम्बन्ध त्याग देता है। कहते हैं कि-”न्यारा पूत पड़ौसी जैसा!” माँ-बाप से अलविदा होकर लड़के ने अपनी गृहस्थी अलग बसा ली, फिर उनके बीच एक बहुत ही पतला-लोक दिखावे का सम्बन्ध सूत्र रह जाता है। आज पाश्चात्य देश पृथक कुटुम्ब प्रथा के सुखों और सुविधाओं को भली प्रकार प्रकट करते हैं, वे साबित कर देते हैं, कि जितना ही छोटा कुटुम्ब होगा, उतना ही वह सूखी स्वतन्त्र एवं उन्नतिशील होगा। भौतिक दृष्टि से उनकी बात मानने में हमें कोई आपत्ति नहीं हैं, एक दूसरे पर गुर्राने वाले कबूतरों का भरा दरबार सदा दुख-दारिद्र का ही घर बना रहेगा, जब कि एक-एक जोड़ा तीतर आनन्द की किलकारियाँ मारता फिरता है और अपना गौरव प्रकट करने का अवसर पाता है। हमारे बुद्धिमान पूर्वज इन लाभों से अपरिचित नहीं थे, जिन सुख और सुविधाओं को आज नवीन सभ्यताभिमानी महानुभाव पृथक कुटुम्ब के पक्ष में रख रहे हैं, उन्हें भारतीय सुखदर्शी भली भाँति समझते थे। परन्तु उन्होंने “बड़ी के लिए छोटी का त्याग“ की महत्वपूर्ण नीति को अपना कर अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया। आपके पास चाँदी की एक भारी सिल हो, परन्तु रास्ते में उससे भी भारी सोने की सिल पड़ी मिल जाए, उस सुनसान मार्ग में साथी कोई हो नहीं, तो निश्चय ही आप चाँदी को फेंक कर सोना ले चलना पसन्द करेंगे। कम लाभ का व्यापार होते हुए भी यदि अधिक लाभ का व्यापार प्राप्त होता हो तो निश्चय ही चतुर व्यापारी पहले व्यवसाय को छोड़ कर अधिक लाभ का रोजगार ग्रहण करता है। पृथक कुटुम्ब बसने में सुविधाएं हैं पर वे इतनी नहीं हैं, जितनी कि सम्मिलित कुटुम्ब में।

संघशक्ति की प्रबलता को वे लोग जानते हैं, जो 1 और 1 मिल जाने पर 11 बन जाने का अनुभव कर चुके हैं। प्राणी की शारीरिक और मानसिक रचना ऐसी अद्भुत है कि जितने अधिक लोग एक समूह में बढ़ते जाते हैं, उसके अनुपात से दस गुनी शक्ति बढ़ जाती है। एक आदमी यात्रा करने में थकान का अनुभव करता है, पर दो व्यक्ति साथ-साथ चलें, तो थकान नहीं व्यापती, उत्साह बना रहता हैं और दूना काम हो जाता है। चले दोनों अपने-अपने पावों से, पैसा दोनों ने अपना-अपना खर्च किया। दोनों के स्वार्थ अलग-अलग हैं, परन्तु केवल कार्यक्रम में एकता हो जाने के कारण यात्रा की सुविधाएं कई गुनी बढ़ गई। सिनेमा, सरकस एक दिन आप अकेले अकेले चुपचाप चले जाइये और देख आइये, दूसरे दिन दो मित्रों के साथ जाइये, फिर पहले दिन के मनोरंजन का मुकाबला कीजिए, दोनों में कई गुना अन्तर मिलेगा। पैसा सब ने अपने-अपने पास से खर्च किया, देखा भी अपनी-अपनी अलग आँखों से, परन्तु एक की खुशी दूसरे की खुशी में मिल कर कई गुनी हो गई। इस प्रकार खुशी का फव्वारा फूट निकला। बड़ी सेना में सम्मिलित सैनिक की, सहभोज में भोजन करने वाले की, सामूहिक प्रार्थना करने वाले की, प्रसन्नता, आशा और स्फूर्ति कितनी होती है, इसका अनुमान वे लोग नहीं कर सकते जो अकेले या थोड़े लोगों के बीच रह कर गुजारा करते हैं। सामूहिक आश्रम में एक ऐसी विद्युत के प्रत्येक व्यक्ति के आन्तरिक आनन्द को मानसिक विकास को कई गुना बढ़ा देता है। यह ठीक है कि मियाँ-बीबी की जोड़ी मौज से रह सकती है, परन्तु जो स्वर्गीव आनन्द भाई, बहिन, भावज, भतीजे, चाचा, चाची, माता, पिता, दादी तथा छोटे-छोटे बाल बच्चों के भरे−पूरे घर में आता है, भला ‘अकेले-शूकरें’ लोगों को कहीं स्वप्न में भी प्राप्त हो सकता है?

लेकिन वह स्वर्गीय आनन्द तभी प्राप्त हो सकता है, जब त्याग, सेवा और उदारता का उसमें भरपूर समावेश हो, अन्यथा दुख दारिद्र से भरा अंधेरा कबूतर खाना ही वह कुटुम्ब रहेगा। अगले अंक में पाठक पढ़ेंगे कि उपरोक्त तीन महान आदर्शों को कितनी सुगमतापूर्वक गृहस्थ जीवन में व्यवहृत किया जा सकता है और घर की तपोभूमि में योग साधना करते हुए संन्यास का अमर फल प्राप्त किया जा सकता है।


‘द’ ‘द’ ‘द’

(पं. रामनगीना शर्मा, रसूलपुर)

एक बार देव, मनुष्य और असुर तीनों भाई प्रजापति ब्रह्माजी के पास धर्मोपदेश ग्रहण करने के लिये गये। पितामह ने तीनों को सत्कारपूर्वक बिठाया। सब से पहले उन्होंने देवों को बुलाया तथा और कुछ ने कह कर केवल ‘द’ का उपदेश दिया। फिर ब्रह्माजी ने पूछा वत्स! मेरे उपदेश का अर्थ समझे? देवों ने कहा - हाँ, पूज्य! समझे, आपने सूत्र रूप से ‘द’ शब्द कह कर हमें दमन का-इन्द्रिय संयम का-उपदेश दिया है। प्रजापति ने प्रसन्न होकर कहा-तुमने मेरे उपदेश का ठीक ही अर्थ समझा।

अब मनुष्यों की बारी आई। उन्हें एकान्त में ले जाकर ब्रह्माजी ने ‘द’ का उपदेश दिया और पूछा कि मेरे कथन का तात्पर्य समझे। मनुष्यों ने कहा-आपने हमें ‘द’ का मन्त्र देते हुए ‘दान’ का आदेश किया है। प्रजापति ने हर्षपूर्वक कहा-ठीक है बेटा, तुम्हारे लिए मेरे कथन का यही तात्पर्य है।

अन्त में असुर बुलाये गये। इन्हें भी ब्रह्माजी ने ‘द’ का उपदेश दिया और पूछा कि इस सूत्र का क्या भावार्थ समझे? असुरों ने उत्तर दिया भगवान् आप हमें ‘दया’ का उपदेश कर रहे है। पितामह ने उनके अर्थ को भी ठीक बताया और उसी का पालन करने का विशेष रूप से आग्रह किया।

वृहदारण्यक के उपनिषद् की उपरोक्त कथा का तात्पर्य यह है कि धर्म तत्व ‘द’ शब्द में समान एक ही है, पर अधिकारी भेद से उसके पालन में कुछ अन्तर होता है। जिस व्यक्ति में जो त्रुटियाँ हैं, वह उन्हें दूर करने के लिए उसी दिशा में प्रयत्न करे। धर्म का यही मूलभूत सिद्धान्त है।

जीवन-विज्ञान लेख माला-


हम आगे बढ़ रहे हैं!

उन्नतिः क्रमशोलोके जीव धर्मः सताँमतः। उपर्यारुह्यनीचैः सः प्राप्नुँहि पूर्णताँ सदा॥

सम्पूर्णां सहजत प्राप्ताँ योग्यताँ धारयत्यलम्॥

-पंचाध्यायी

(लोके) संसार में (क्रमशः) क्रम से (उन्नतिः) विकास करना (सताँमतः) सज्जनों से स्वीकृत (जीवधर्मः) जीव का धर्म है। (सः) वह (नीचैः) नीचे से (उपरि) ऊपर को (आरुह्म) चढ़कर (सदा) हमेशा (पूर्णताँ) पूर्णता को (प्राप्नुँ) प्राप्त करने के लिए (सहज प्राप्ताँ) स्वाभाविक (सम्पूर्णां) सम्पूर्ण (योग्यताँ) योग्यता को (अलं) पर्याप्त मात्रा में (धारयति) धारणा करता है।

सृष्टि के समस्त पदार्थों के जीवन क्रम पर दृष्टि डालने से पता चलता है कि हर एक पदार्थ आरम्भ में छोटा होता है। पीछे वह बढ़ता ओर विकसित होता हुआ आगे बढ़ रहा है। अंकुर-अंकुर से नन्हा सा पौधा, नन्हे से पौधे से बड़ा पौधा, अन्त में वृक्ष। रज-वीर्य के अत्यन्त छोटे कण-गोली के बराबर माँस पिण्ड-गर्भ-बालक-किशोर-अन्त में तरुण पुरुष। परमाणु-अणु-टुकड़ा-अन्त में बड़ा पदार्थ। वर्णमाला सीखने वाला विद्यार्थी-ऊंची कक्षाओं का छात्र-अन्त में विद्वान। जिधर भी दृष्टि दौड़ाकर हर पदार्थ छोटे से बड़ा बनता हुआ दिखाई पड़ेगा। इससे प्रतीत होता है कि जीवन का विकासक्रम ‘लघु से महान’ बनने की आधारशिला पर स्थित है।

पूर्वीय विज्ञान और पाश्चात्य विज्ञान दोनों ही इस प्रश्न पर एकमत हैं। भारतीय आचार्यों का मत है कि “चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात् जीव मनुष्य शरीर को प्राप्त करता है।” योनियों में स्वेदज, उद्भिज, अंडज, जरायुज, क्रमशः एक के बाद दूसरी कक्षा की योग्यता और शक्ति बढ़ती जाती है। स्वेदज जीवों में जितना ज्ञान और विचार है उसकी उपेक्षा उद्भिजों की योग्यता बढ़ी हुई होती है। इसी प्रकार यह योग्यता बढ़ते-बढ़ते शरीरों की बनावटों में अन्तर होने लगता है और अन्त में मानव शरीर प्राप्त हो जाता है। मनुष्य, सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, वह मंजिल की सबसे आखिरी सीढ़ी पर खड़ा हुआ है। जहाँ जीव को पहुँचना है वह स्थान मनुष्य शरीर के बिलकुल निकट है।’ पाश्चात्य विकासवादी पंडित डार्विन भी अपना मत इसी प्रकार प्रकट करते हैं उनका कहना है कि अल्प चेतन एकेन्द्रिय प्राणियों की चेतना बढ़कर मछली, मेंढक, गिरगिट, गिलहरी, न्योला, बिल्ली, कुत्ता आदि में विकसित होता हुआ बन्दर से मनुष्य बना है। भारतीय अवतारों ने क्रम पर विवेचना करते हुए कुछ विद्वानों ने उससे भी विकासवाद की पुष्टि की है। हिन्दुओं के दस अवतार प्रसिद्ध हैं। उनमें से आरम्भ के यह हैं 1. मत्स्य 2. कूर्म 3. वाराह 4. नरसिंह 5. वामन। अनुमान लगाया जाता है कि आरम्भ में मछली जैसे जीव फिर कछुए जैसे, इसके बाद उन्नति करते-करते सुअर की आकृति के तदुपरान्त अधकचरे मनुष्य आधे आदमी जैसे नरसिंह हुए होंगे। पीछे बौने-अल्प योग्यता वाले-मनुष्य हुए होंगे। हो सकता है कि शारीरिक दृष्टि से वे वर्तमान मनुष्यों की अपेक्षा कुछ सबल रहे हों पर बौद्धिक दृष्टि से बौने वामन-छोटे अवश्य रहे होंगे। ऐसे ही अन्य आधार भी जीवन विकास के सम्बन्ध में प्राप्त हो सकते हैं। पाश्चात्य अनुसन्धानों से तो सोलह आना इसी मत का समर्थन होता है जीवन नीचे से ऊपर की ओर तुच्छता से महानता की ओर बढ़ रहा है। आध्यात्मवादी भी मानते हैं कि आत्मा बढ़ते-बढ़ते परमात्मा हो जाता है।

यहाँ एक सन्देह उठ खड़ा होता है कि योनियों की असमानता के कारण कोई प्राणी तो बहुत आनन्द में रहते होंगे और कुछ उनके लिए तरसते होंगे। जैसे कबूतर हवा में उड़ने का आनन्द ले सकता है पर कछुए के लिए वह कहाँ रखा हैं? बन्दर तो मधुर फलों का स्वाद लेता है पर मेंढक के लिए वह कहाँ है? मनुष्य षट्रस व्यंजन खाता है पर गधे को घासपात खाकर गुजारा करना पड़ता है। इसी प्रकार जीवों का कार्यक्रम बौद्धिक मर्यादा आदि में भी विषमता होती है, शरीरों का छोटा बड़ा होना इन्द्रियों की न्यूनाधिकता का अन्तर है ही। पाप पुण्य की दृष्टि से भी अन्तर है ही। कोयल अपने बच्चों को कौओं से पलवाने के लिए धूर्तता करती है। माँसाहारी पशु पक्षी अपने से छोटे जीवों को निर्दयतापूर्वक खा जाते हैं। ऐसी असमानता और विभिन्नता को देखकर बुद्धि सहज ही बड़ी भ्रमित हो जाती है और प्रश्न उपस्थित होता है कि ईश्वर की पुण्य रचना में ऐसी असमानता क्यों हैं? यदि सभी प्राणी समान योग्यता के होते, कोई जीव जन्तु माँसाहारी न होता तो विश्व की व्यवस्था कितनी सुन्दर होती।

हमें जानना चाहिए यह असमानता न तो भयंकर है न बुरी और न असह्य। हमारी स्थूल दृष्टि से यह अन्तर जैसा असाधारण दिखाई देता है तात्विक दृष्टि से देखने पर वह यथार्थ वैसा नहीं है। यदि कोई अशिक्षित आदमी एक स्कूल में पहुँच जाय और एक ही समान बालकों में से किसी को गणित, किसी को भूगोल, किसी को भाषा किसी को दस्तकारी पढ़ता देखकर नाराज हो और कहे कि यह कैसा अविवेकी मास्टर है जो किसी से कुछ काम करा है किसी को कुछ शिक्षा दे रहा है किसी को कुछ। अज्ञानी की दृष्टि से स्कूल की यह असमानता मास्टर को अविवेकी ठहराती है, लेकिन एक सुविज्ञ व्यक्ति जानता है कि यह बालक जब अफसरी के योग्य होंगे तब उन्हें दस्तकारी, हिसाब भूगोल, सुलेख आदि सभी की आवश्यकता पड़ेगी। इसलिये विभिन्न विषयों को धीरे-धीरे, पचता-पचता पढ़ने के लिए अलग पुस्तकें, अलग-अलग कक्षायें, नियत करनी पड़ती हैं। योनियाँ स्वतन्त्र कक्षाएँ हैं। जिनमें अलग-अलग विषयों की शिक्षा मिलती है और क्रमशः ऊँची कक्षा में चढ़ते जाते हैं। एक योनि के जीवधारी के काम दूसरी के कामों से असंबद्ध मालूम पढ़ते हैं तो भी उनमें आपसी तारतम्य रहता है। पहाड़े याद करने वाले बालक और ज्योमेट्री के प्रश्न करने वाले के काम में भले ही भिन्नता और कभी कभी विपरीतता मालूम पड़े पर यथार्थ में एक का दूसरे से सम्बन्ध है। ज्योमेट्री के छात्र ने यदि एक दिन पहाड़े याद न किये होते तो आज जिस कार्य को वह कर रहा है न कर सकता।

चींटी और हाथी की तुलना शरीर की लम्बाई-चौड़ाई के अनुसार करते हुए तुच्छता महानता का निर्णय करना उचित न होगा। चींटी अपने शरीर की पुस्तक द्वारा भार वाहन, वस्तु छेदन, संचय वृत्ति, संघ बद्धता, सहयोग, आदि की शिक्षा प्राप्त कर रही है। जो आगे चलकर अफसरी के वक्त, मानव जीवन में काम देगा। हाथी अपने शरीर की कक्षा में सहनशीलता, स्वामिभक्त, गंभीरता, इन्द्रिय संयम, सबलता, आदि पढ़ रहा है, बिना इसके भी तो अफसरी में काम न चलता। सिंह फाड़ खाना सीखता है ताकि मानव जीवन में अन्यायों को नोंच डालने की क्षमता प्राप्त हो जावे, लोमड़ी चालाकी पढ़ती है ताकि अफसरी के वक्त, मानव शरीर प्राप्त करने के समय-चतुरता पूर्वक जीवन समस्याओं को हल कर लिया करे। हिरन अपनी कक्षा में दौड़ने की और खरगोश आत्मरक्षा की योग्यता संग्रह करता है। इस प्रकार विभिन्न योनियों में अलग प्रकार की शिक्षाएं प्राप्त करता हुआ क्रमशः विकसित हो कर मनुष्य शरीर में आता है और उन सब कक्षाओं की शिक्षा में इतना ज्ञान प्राप्त कर लेता है कि हजारों लाखों जीव जन्तुओं से एक मनुष्य का पलड़ा भारी बैठता है। हजारों विद्यार्थियों की तुलना में एक प्रोफेसर अधिक बुद्धिमान ठहरता है।

इन्द्रिय सुख की दृष्टि से कोई जीव आगे पीछे नहीं है। बन्दर को फल जितने सुस्वादु लगते हैं, उतने ही मधुर ऊंट को नीम के पत्ते लगते हैं राजा अपनी रानी से जितना प्रसन्न हैं, महतर अपनी महतरानी से भी उतना ही प्रसन्न है। इस प्रकार पशु-पक्षी भी वैसा ही आनन्द अनुभव करते है, शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श का सुख सबको मिलता है। जो जीव जिस योनि में हैं, जैसे साधन प्राप्त करता है उसी के अनुसार उनकी इन्द्रियाँ होती हैं ताकि वही परिस्थिति उसके लिए आनन्ददायक बन जाय। बेशक अन्य योनियाँ विवेक दृष्टि से मनुष्य से नीची हैं पर इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वे दुखी हैं, अभावग्रस्त हैं या, निष्प्रयोजन जीवन व्यतीत कर रही हैं। मनुष्येत्तर प्राणियों को भोग योनि मानना भ्रम है। जीवनमुक्त और देवता लोग भवबाधित मनुष्यों को नीची कोटि का समझे यह तो ठीक है पर यदि वे हमें भोग योनि मानें तो वह अन्याय होगा। सभी जीव अपनी-अपनी दशा में सुखपूर्वक है यही कारण है कि सबको मृत्यु बुरी लगती है। सभी अपनी-अपनी कक्षा के अनुसार ज्ञान की योग्यताओं की शिक्षा प्राप्त करते हुए लघुता से महानता की और, अपूर्णता से पूर्णता की ओर, बन्धन से मुक्ति की ओर, बढ़ते चले आ रहे हैं। निस्सन्देह जीवन का लक्ष ‘विकास’ है। ईश्वरीय प्रेरणा से बलात् प्रेरित हुए जीव इसी महान यात्रा के पथ पर दौड़ते हुए चले जा रहे हैं।

जीवन क्यों आरम्भ हुआ? जीवन यात्रा किस प्रकार आगे बढ़ रही है? क्या जीव नीच योनियों के लिए फिर उलटा लौट सकता है? जब बहुत शिक्षायें प्राप्त करके मनुष्य योनि प्राप्त हुई है तो भी अनेक पापी क्यों दृष्टिगोचर होते हैं? ऐसे अनेक प्रश्न पाठकों के मन में उत्पन्न हुए होंगे यह हम जानते है। अगले अंकों में जीवन विज्ञान की उन गूढ़ गुत्थियों पर हम प्रकाश डालेंगे पाठक उसकी प्रतीक्षा करें।


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स्वर्ग और नरक में वही भेद हैं कि स्वर्ग का व्यक्ति अपने पास की चीज को सर्वथा देने के लिए तैयार रहता है। और नरक वाला दूसरों की वस्तु को भी हजम करने की इच्छा रखता है।

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विद्या, धर्म की रक्षा के लिये होती है न कि धन एकत्र करने के लिये ही। जिसने विद्या के होते हुये केवल धन कमाया और अपनी नामवरी गँवा दी वह उस मनुष्य के समान है जिसने इकट्ठे किये हुए अन्न में आग लगा दी हो।

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ओछों की संगत नहीं करनी चाहिए। वह जलते हुए कोयलों के समान है। जलते समय गर्म होने की वजह से शरीर जलता है और जब वह ठंडा हो जाता है तो काला दिखाई देता है।

मानसिक विवेचन लेख माला-


जानते हैं, पर मानते नहीं हैं!

अग्राह्यं मनसोयत्तद्धीरपि स्वीकरोति न।

जिज्ञासायाः प्रकाशेण जायते सत्यदर्शनम्॥

-पंचाध्यायी।

(यत) जो (मनसः) मन का (अग्राह्यं) अस्वीकार है (तत्) उसे (धीः) बुद्धि (अपि) भी (न) नहीं (स्वीकरोति) स्वीकार करती (जिज्ञासायाः) जिज्ञासा के (प्रकाशेण) प्रकाश से (सत्यं दर्शनं) सत्य का दर्शनं (जायते) होता है।

‘जानते हैं, पर मानते नहीं’ इस उक्ति को चारों ओर चरितार्थ होते हुए देखा जाता है। लेखनी और वाणी द्वारा उपदेश दिये जाते हैं, पर उनको स्वीकार करने वाले-अमल में लाने वाले-बहुत ही कम दिखाई देते हैं। तर्क, मनन और विवेचन में किसी बात को ठीक मान लिया जाता है, तो भी लोग ग्रहण करने को तैयार नहीं होते। कहते हैं कि विचारों से जीवन निर्माण होता है, पर विचार होते हुए भी आचरणों में अन्तर देखा जाता है। एक पंडित कथा कहते हुए बड़े बलपूर्वक यह उपदेश करता है कि धर्म पूर्वक जीवन बिताना चाहिए, परन्तु उसका निजी जीवन दुराचार से भरा हुआ देखा जाता है। पुजारी जी ईश्वर की पूजा करते हैं और उसे सर्वज्ञ मानते हैं, यदि कोई सर्वज्ञता के विरोध में कोई कुछ कहे, तो लड़ने को तैयार हो जाते हैं, परन्तु स्वयं चोरी करने के आदी हैं, मन्दिर में आई हुई पूजा की वस्तुओं को ही चुरा लेते हैं। मन्दिरों में बहुमूल्य वस्तुओं की चोरियों के समाचार अक्सर मिलते हैं, इन घटनाओं में प्रायः उन्हीं ईश्वर-सेवकों की करतूतें होती हैं। मन्दिरों के दरवाजे पर दर्शनार्थी लोग जूते उतार जाते हैं, आये दिन उनकी चोरियाँ होती रहती हैं। इस मथुरा नगरी में रहने के कारण हम भली प्रकार जानते हैं कि उनमें कितना हाथ ईश्वर के घर के मन्दिर के-द्वारपालों का होता है। यह देखकर बड़ी हैरत होती है कि धर्ममय जीवन की रट लगाने वाले पंडित स्वयं क्यों दुराचार में लिप्त हैं? और ईश्वर को सर्वज्ञ कहने वाले मन्दिरों के कर्मचारी चोरी क्यों करते हैं? राज दरबारों की स्थापना शान्ति और व्यवस्था के लिए-अपराध निवारण के लिए हुई हैं। एक राज कर्मचारी जानता है कि मेरा कर्तव्य अपराधों का निवारण करना है परन्तु कौन नहीं जानता कि रिश्वतों की कितनी भरमार हैं। अज्ञानी व्यक्ति अपराध करे, तो एक बात समझ में भी आती है कि बेचारा जानता न होगा, इसलिए गलती कर गया होगा, पर भली प्रकार जानने बुझने वाले, उस व्यवस्था का समर्थन करने वाले भी जब विपरीत आचरण करते हैं, तो बड़ा विस्मय होता है कि आखिर यह बात क्या है?

आचार और विचार में विरोध रखने वाले हमें ऐसे अनेक सज्जनों के संपर्क में आने का अवसर प्राप्त होता रहता है। उनमें से कोई-कोई महानुभाव हृदय खोल कर भी वार्तालाप करने की कृपा कर देते हैं। तब यह स्पष्ट हो जाता है कि जिन उत्तम सिद्धान्तों और आदर्शों को वे कहते हैं या जानते हैं वे उनके मस्तिष्क की सजावट मात्र हैं, उन विचारों ने उनके हृदय को स्पर्श नहीं किया है। हृदय उस बात को नहीं मानता, जिसे जिह्वा कहती है या मस्तिष्क धारणा करता है। हमारे पास अक्सर ऐसे सज्जन आया करते हैं, जो किसी विषय पर वाद-विवाद करते है। कभी-कभी हमारे विचार प्रश्नकर्ता के मत के विपरीत होते हैं। अनेक दृष्टिकोणों से, अनेक तर्कों से, अनेक प्रमाणों से, उन पर अपने विचार प्रकट करते हैं। विवाद की दृष्टि से उन्हें यह बात माननी पड़ती हैं, क्योंकि वे उसका खंडन नहीं कर सकते, नहीं फिर भी हम देखते हैं कि उस दाँता किट-किट का कुछ प्रभाव नहीं होता। “पंचों की आज्ञा सिर माथे पर परनाला जहाँ का तहाँ रहेगा।” उनकी मान्यता में विवाद में परास्त होने के कारण कुछ अन्तर नहीं आता। मथुरा तीर्थ में दूर-दूर के ख्याति नामा धर्माचार्य पधारते रहते हैं। वे लोग प्रायः अखण्ड ज्योति में पधारने की कृपा करने हैं, निजी वार्तालाप के सिलसिले में कभी-कभी सार्वजनिक विषयों पर चर्चा चल जाती है, “धर्म के नाम पर मन्दिर मठों में केवल कर्मकाण्ड के आडम्बर के लिए हिन्दू जाति का करोड़ों रुपया प्रति मास व्यय होता है, यदि यह शक्ति गौ रक्षा, विद्या प्रचार, धर्म प्रसार जैसे शास्त्रानुमोदित कार्यों में लगे तो कितना अच्छा हो।” हमारे इस कथन का खंडन करने को तो उनके पास कुछ नहीं होता, इसलिए चुप हो जाते हैं, और उपेक्षा के साथ प्रसंग को टाल देते हैं। इसी प्रकार और भी बहुत प्रकार के लोग ज्ञान चर्चा आरम्भ करते हैं, उनके मत के विरुद्ध जो बात होती है, उसे सुन तो लेते हैं, हमारे आदर की दृष्टि से या तर्क की निर्बलता से चुप भी हो जाते हैं, पर यह बातें उनके गले नहीं उतरतीं, जो उनकी मान्यता के विपरीत कही जाती हैं। ब्रिटिश राजनीतिक यह जानते तो हैं कि भारत का स्वाधीन होना उचित है, पर वे इसे व्यवहार में नहीं लाते। और अपने वर्तमान व्यवहार का समर्थन करने के लिए ऐसे तर्कों की रचना करते हैं, जिन्हें सुन कर अवाक् रह जाना पड़ता है।

देखा गया हैं कि, तर्क, प्रमाण, उपदेश और वादनुवाद का प्रभाव कुछ अधिक संतोषजनक नहीं होता। एक अशिक्षित व्यक्ति लोभ के कारण अधर्म का सहायक बन जाता है, तब हम सोचते हैं कि विद्या के अभाव के कारण ऐसा हुआ। पर जब एक वकील की झूठे मुकदमें को लड़ाते और उसके पक्ष में अनेक झूठे गवाह सिखा पढ़ा कर-मस्तिष्क की सारी शक्ति लगा कर-झूठे को सच्चा बनाने का तर्क करते देखते हैं, तो ख्याल होता है कि ग्रेजुएट होकर, कानून की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त भी यह वहीं हैं, जहाँ वह लोभी अशिक्षित था। यह दोनों शिक्षित-अशिक्षित, सत्य की दृष्टि से एक समान ही ज्ञान वाले हैं। भेद इतना ही है कि एक का कार्य अक्षर ज्ञान के अभाव में भद्दा और गँवारू है, उसकी बुराई सब पर नग्न रूप में प्रकट हो जाती है, किन्तु वकील अपने कार्य को अक्षर ज्ञान के आधार पर चमकीले आचरण में रखे रहता है। यदि वकील से यह कहा जाय कि झूठे मुकदमें लड़ाकर न्याय की हत्या और असत्य की उन्नति में सहायता क्यों करते हो? तो वह आपको ऐसे-ऐसे लच्छेदार कारण बता सकता है कि उसकी बुद्धि की प्रशंसा ही करनी पड़ेगी। कितने ही सिद्धान्त और तर्क ऐसे घड़ लिये जाते है, जिनका सत्य से कोई सम्बन्ध नहीं, केवल व्यक्तिगत कारणों से उनकी प्रतिष्ठापना की गई हैं कहते हैं कि वृद्धावस्था में दाँत उखड़ जाने से एक व्याकरणाचार्य के मुख से विद्वानों की सभा में ‘पुँशुँ’ शब्द के स्थान पर ‘पुँछु’ शब्द निकल गया, इस पर उनका मजाक हुआ। उन्होंने फिर ‘पुँछु’ शब्द को ही सही सिद्ध करने की ठानी और ‘सारस्वत’ नामक एक पृथक व्याकरण ग्रन्थ केवल इसी लिए तैयार कर दिया। एक व्यक्ति एक बात चाहता है, यदि उसमें समझदारी है, तो ठीक, नहीं या तो अपनी चाहना के पक्ष में प्रमाण इकट्ठे कर लेता है या स्वयं गढ़ लेता है। इस तरह बेचारे तथाकथित ज्ञान-विज्ञान की इधर से उधर दुर्गति होती फिरती है। सत्य प्रेम और न्याय के स्थायी सुख शान्ति वाले सिद्धान्त एक कोने में पड़े रहते हैं, किन्तु अनीतिवान और स्वार्थी लोग अपनी विचारधारा को अनेक मार्गों से पुष्ट करते हुए आगे चलते जा रहे हैं।

पंचाध्यायी का यह श्लोक इसी गुत्थी पर प्रकाश डालता है, जिसे हृदय नहीं मानता, उसे मस्तिष्क स्वीकार नहीं कर सकता। कहते हैं कि चिकने घड़े पर पानी की बूँद नहीं ठहरती। हृदयगत धारणा के ऊपर शुष्क विचारों का कोई अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। महात्मा गाँधी और कस्तूरबा गाँधी जैसी दिव्य आत्माओं का निकट सम्बन्धी-पुत्र-हीरालाल गाँधी-उनसे प्रभावित नहीं होता। कारण यही है कि जिसे हृदय नहीं मानता, उसे बाहर के विचारों द्वारा मनवाया नहीं जा सकता। जिद्दी, हठी, दुराग्रही, मूढ़, जड़, अनुदार, रूढ़िवादी, पोंगापंथी, लकीर के फकीर शब्द उन्हीं लोगों के लिए व्यवहृत होते हैं, जिनकी हृदयगत भूमिका किन्हीं विश्वासों पर अत्याधिक कठोरतापूर्वक जम जाती है और अन्य प्रकार के विचार- “यथा सराय भरी निरखि, पथिक आपु फिरि जायं,” के अनुसार कुछ प्रभाव नहीं करते। उसके लिए कोई भी ज्ञान, विचार, उपदेश, कारगर नहीं होता। उन्नति के स्रोतों को चारों ओर से रोककर वे एक ऐसी अँधेरी कोठरी में बैठ जाते हैं, जहाँ बाहरी प्रकाश की पहुँच नहीं हो पाती।

सत्य के शोधक का, वास्तविकता के जिज्ञासु का ब्रह्म प्राप्त करने के इच्छुक का, यह सर्वप्रथम कर्त्तव्य है कि हृदय की मूढ़ता को हटाकर उसे इस योग्य बनावे, जिस पर सत्य का प्रकाश पड़ सके। बिना इसके कोई भी व्यक्ति अक्षर ज्ञान या तर्क उपदेशों के आधार पर विवेकवान नहीं बन सकता। हृदय किन कारणों से मूढ एवं दुराग्रही हो जाता है और किन प्रक्रियाओं से उसे निर्मल, कोमल एवं सत्य को ग्रहण करने वाला बनाया जा सकता है, इसकी चर्चा अगले अंक में करेंगे।


सच्चा और अच्छा व्यापार

(ऋषि तिरुवल्लुवर)

आदमी मर जाता है, उसके साज सामान महल, तिवारे टूट फूट जाते हैं, परन्तु कीर्ति ऐसी वस्तु हैं जो युगों तक जीवित रहती है। जिसने सर्वस्व देकर यश कमाया उसने बहुत अच्छा व्यापार किया। बरसाती फूँस को बेचकर एक पक्का कोठा खरीद लेना बुद्धिमानी है। वे महान आत्मा हैं, जो अपना जीवन उज्ज्वल कीर्ति कमाने में लगाते हैं, उन अभागों के पैदा होने से क्या लाभ जो जीवन भर पेट भरते रहे और अन्त में कुत्तों की मौत मर गये। आदमी की सबसे बड़ी असफलता और बेइज्जती यह है कि वह अपने पीछे ऐसी कोई बात न छोड़ जाय, जिसके लिए लोग उसकी सराहना करे और बार बार स्मरण करें। वे जीवित रहेंगे जो पवित्र जीवन बिताते हैं और उज्ज्वल कीर्ति का सम्पादन करते हैं, जिन्हें अपने भविष्य की चिन्ता नहीं और स्मार्क का परिधि से आगे कुछ नहीं देख सकते, वे मुर्दे हैं, भले ही वे साँस लेते हों या खाते पीते और चलते-फिरते दिखाई देते हों। मूर्ख लोग धन जमा करके रख जाते हैं, ताकि पीछे वाले चन्द लोग खाएं और खुश रहें। कितना अच्छा होता, यदि वह अपने सामने ही सत्कार्यों में उसे लगाता, ताकि वह श्रेष्ठ भूमि में उगता और अपनी छाया में असंख्य प्राणियों को शाँति देता।

बेवकूफ उसे कहते हैं, जो फायदे की चीज को फेंक देता है और हानि करने वाली वस्तुओं को अपनाता है। जो कड़ुई और अनर्गल बातें अपनी जिह्वा से बकते हैं, उन्हें बेवकूफ के अलावा और और क्या कहा जाय? कोई आदमी कितना ही पढ़ा-लिखा और चतुर क्यों न हों, पर यदि वह भलाई को छोड़कर बुराई अपनाता है, तो उसे पहले सिरे का मूर्ख समझना चाहिए।

वर्णाश्रम धर्म लेखमाला-


जन्म और जाति

लोकस्तु जन्मना सर्वः शूद्र एवाभिजायते। संस्कारैरभिजायन्ते पश्चात्सर्वे द्विजातयः॥

-पंचाध्यायी।

(जन्मना) जन्म से (तु) तो (सर्वः) सम्पूर्ण (लोकः) संसार (शूद्रः) शूद्र (एव) हि (अभिजायते) होता है। (पश्चात्) बाद में (संस्कारैः) संस्कारों से (सर्वे) सब लोग (द्विजातयः) द्विज (अभिजायन्ते) होते हैं।

शास्त्र का अभिमत है कि जन्म से तो सभी वर्ण शूद्र होते हैं, किन्तु पीछे संस्कारों से द्विज बन जाते हैं। द्विज शब्द ही इस अर्थ का बोधक है कि इस व्यक्ति का दो बार जन्म हुआ है। मामूली हिन्दी पढ़े-लिखे व्यक्ति भी जानते हैं कि ‘द्वि’ अर्थात् दो बार ‘ज’ अर्थात् जन्म, जिसका दो बार जन्म हो वह द्विज। षोडश संस्कारों की भारतीय प्राचीन प्रथा के अंतर्गत यही रहस्य छिपा हुआ है कि पशु को मनुष्य बनाने के लिए उसकी आरम्भ से ही देखभाल रखी जाय। आज गर्भाधान, सीमन्त, पुँसवन, नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन आदि संस्कारों का चिन्ह पूजा मात्र कहीं-कहीं दृष्टिगोचर होती है, परन्तु पूर्व काल में ऐसा न था। बालक के गर्भ प्रवेश करने से पूर्व ही माता-पिता इस बात की चिन्ता करते थे कि इसे अपने परिश्रम द्वारा सुसंस्कृत द्विज बनावें, क्योंकि वे जानते थे कि यदि ऐसा न किया जा सका, तो बालक शूद्र का शूद्र ही रह जायगा। जन्म से तो मनुष्यों की एक ही जाति है, पर उसका श्रेणी विभाजन कर्मों के अनुसार होता है। घोड़ा, गधा, गाय, भैंस, कबूतर, बतख, मोर आदि की अलग-2 जातियाँ इसलिए हैं कि उनकी आकृति, बनावट, खुराक, कार्य, रुचि में अन्तर है। गधों की शारीरिक बनावट अन्य पशुओं से एक अलग प्रकार की है, इसलिए उनकी एक स्वतन्त्र जाति हुई। इसी प्रकार अन्य पशु पक्षी भी अपनी-अपनी शरीर रचना के आधार पर एक विशेष जाति वाले कहलाते हैं। संसार के सम्पूर्ण मनुष्यों की शरीर रचना एक ही प्रकार की है, इसलिए वे सब मनुष्य जाति के ही कहला सकते हैं। उपभेदों की बारीकी में यहाँ हम नहीं आना चाहते, जैसे अरबी, तुर्की आदि घोड़े और नागौरी, मद्रासी आदि बैलों में उपभेद होते हैं। आर्य, मंगोल आदि उपभेद मनुष्यों में भी हैं, किन्तु उपभेदों के कारण मूल जाति में कोई अन्तर नहीं आता। स्थान भेद के कारण साँपों के रंग रूप में अन्तर आ सकता है, उनका उपभेद हो सकता हैं, पर जाति तो सर्प ही रहेगी। काले, पीले, लाल, भूरे सभी प्रकार के मनुष्यों की एक जाति रहेगी।

यह मानने में भी कुछ आपत्ति नहीं है कि, प्रकृत रूप से मनुष्य एक प्रकार का पशु ही है। वाशिंगटन के वैज्ञानिक ब्रेविन ने अपने तत्वाधान में कुछ मानव शिशुओं को एकान्त स्थान में इस प्रकार पाला कि बाहरी दुनिया के बारे में वे कुछ न जान सकें। यह बालक बड़े होने पर जब जवान हुए, तो आहार, निद्रा, भय, मैथुन आदि पशु तुल्य योग्यताओं के अतिरिक्त और उन्हें कुछ भी ज्ञान न था। सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, आध्यात्मिक, राजनैतिक आदि किसी नियम के बारे में वे कुछ भी नहीं जानते थे। अफ्रीका से एक बार एक मादा भेड़िया दो मनुष्य बालकों को उठा ले गई, उस ने उन्हें मारा नहीं, बल्कि अपना दूध पिला कर बड़ा कर लिया। एक शिकारी ने उस मादा भेड़िये को मार कर उन मनुष्यों को पकड़ा। विचारवानों की एक समिति ने अनेक प्रकार परीक्षा की, पर उन्हें मानवोचित ज्ञान से सर्वथा अपरिचित पाया। हाँ, उनने अपनी भेड़िया दाई से जो सीखा था, उसे जानते थे-हाथ और पाँवों के बल भेड़ियों की तरह वे चलते थे, जीवित जानवरों को हाथ और दाँतों की सहायता से मार कर खा जाते थे। असभ्य, जंगली और अशिक्षित लोगों की सन्तानें भी करीब-करीब अपने निकटस्थ समाज की मर्यादा में ही न्यूनाधिक ज्ञान रखती है। जंगली भील का लड़का अपने कुटुंबियों के समान शिकार मारने की योग्यता तो ज्यादा या कम मात्रा में रख सकता है, पर बौद्ध दर्शन शास्त्र के बारे में उसका ज्ञान बिल्कुल शून्य होगा, क्योंकि उस प्रकार के वातावरण का संस्कार उस तक नहीं पहुँचा। ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत अब भी ऐसी अनेक व्यक्ति पाये जाते हैं, जो यह नहीं जानते कि उनका राजा कौन हैं, कारण इस तरह की चर्चा उन तक पहुँच नहीं पाई। मनुष्य में अनुकरण शक्ति, समझने की शक्ति, तर्क शक्ति, विकास शक्ति अद्भुत हैं, पर उसका विकास तो तभी हो सकता है, जब उस विषय का बाह्य ज्ञान प्राप्त हो। अन्यथा कैसी ही तीव्र बुद्धि वाला व्यक्ति क्यों न हो, अपरिचित विषय में जानकारी प्राप्त नहीं कर सकता। यह हो सकता है कि जीवनोपयोगी समस्याओं को सुलझाने की निरन्तर इच्छा होने से मनुष्य बिना बाह्य सहायता के भी कुछ आविष्कार करे, पर वह बहुत ही अधूरे होंगे और बड़ी धीमी गति से आगे बढ़ेंगे। शरीर को सर्दी-गर्मी से बचाने की गुत्थी को सुलझाते हुए पत्ते, वृक्षों की छाल, पशु चर्म, बालों का नमदा, कपास का गद्दा, रस्सियों का जाल बनाते-2 आधुनिक वस्त्रों तक पहुँचने में करोड़ों वर्षों का लम्बा जमाना व्यतीत हो गया, पचासों पीड़ियाँ इस आविष्कार के बारे में सोचती रहीं, तब एक व्यवस्थित चीज़ पा सकी। इस तरह का क्रमिक विकास हो सकता है, पर जितना ज्ञान आज मनुष्य समाज को उपलब्ध है, वह शिक्षा के द्वारा ही स्वल्प काल में प्राप्त किया जा सकता है। बिना सामाजिक सहायता के अकेला मनुष्य यदि ज्ञान प्राप्त करना चाहे, तो उसे असम्भव ही कहा जायगा।

हमारा तात्पर्य यह कहने का है कि मनुष्य जन्म से ही कुछ ज्ञान लेकर नहीं आता, वरन् जिस समाज में रहता है, वैसे ही संस्कारों से प्रभावित हो कर निर्माण करता है। कसाई का बालक पशु वध देखकर विचलित नहीं होगा, पर ब्राह्मण का बालक उस रक्तपात को देख कर घबरा जायेगा। यदि एक ही माता के दो बालकों को अलग-अलग रख कर एक को माँसाहार कराया जाय और दूसरे को माँस से घृणा कराई जाय, तो दोनों वैसे ही बन जायेंगे। एक योरोपियन व्यक्ति अपनी कुमारी बहिन या बेटी को उसके अन्तरंग मित्रों के साथ देखकर बुरा नहीं मानेगा, परन्तु भारतीय व्यक्ति होकर मरने मारने पर उतारू हो जायगा कारण वह है कि दोनों ने अपने 2 विचारों का निर्माण विपरीत परिस्थितियों में किया हैं, इसलिए उनके विश्वास और भाव भी भिन्न हैं। यदि स्वभावतः ही सब को ज्ञान होता, तो सब लोगों के एक से ही विचार और विश्वास होते, परंतु ऐसा होता नहीं। हम देखते हैं कि मनुष्यों में आपसी मतभेद बहुत है। सभी पक्ष अपनी-2 मान्यता को ठीक समझते हैं। इस पेचीदगी पर मनोवैज्ञानिक विधि से दृष्टिगत करने पर प्रतीत होता है कि बालक आरम्भ में एक गीली मिट्टी के गोले के समान होता है, उसे अपने चारों और जैसा ढांचा मिल जाता है, वह उसी में ढल जाता है। उसके विचार और विश्वास वैसे ही बन जाते हैं और यह सब उसे इतने प्रिय एवं अभ्यस्त हो जाते हैं कि, सभ्यता तथा संस्कृति का ऊँचा नाम देकर उनकी रक्षा करता है। अनेक सभ्यता और संस्कृतियों की दुहाई हम चारों ओर सुनते हैं, इससे प्रतीत होता है कि ये वस्तु प्राकृतिक नहीं हैं, परन्तु पीछे बनी हुई हैं। यदि ईश्वर प्रदत्त होती, तो जैसे सब घोड़े घास खाते हैं, वैसे ही सब लोगों के विचार एक ही समान होते।

जन्म से सब शूद्र हैं- यह एक सच्चाई है, जिसे निष्पक्ष नेत्रों से हम अपने चारों और बिखरी हुई देख सकते हैं। एक सी मानसिक योग्यता वाले दो बालकों में से एक को घसियारे के यहाँ छोड़ दिया जाय और दूसरा पण्डित के यहाँ रहे, तो बड़ा होने पर पण्डित की संरक्षता वाला शास्त्री हो जायगा, किन्तु गसियारा बेचारा उन्नति करने पर भी लकड़हारा ही हो सकता है। परिस्थितियों से, शिक्षा से, प्रभाव से, वातावरण से, संगति से, मनुष्य का निर्माण होता है इस सत्य को भारतीय तत्व वेत्ता पूर्व काल से ही स्वीकार करते आ रहे हैं, इसलिए उन्होंने जन्म काल से पूर्व से ही उस बालक पर संस्कार डालने की ओर सतर्कतापूर्वक व्यवस्था बनाई थी। जिसका बालक कुसंस्कारी हो जाता था, उसके माता-पिता, शिक्षक एवं अभिभावकों को लज्जित होना पड़ता था। कुपुत्र से माता कहती थी-”मेरी कोख लजाई” पिता कहता था-”मेरा नाम डुबोया।” इन शब्दों में वे स्वीकार करते हैं कि हमने बालक को सुसंस्कृत करने में लज्जाजनक भूल की है। यदि बालक की भूल समझी जाती, तो माता कहती ‘तूने अपने को लज़ाया’ पिता कहता-’तूने अपना नाम डुबोया’ परन्तु ऐसा नहीं कहा जाता, क्योंकि सचाई को अन्ततः स्वीकार करना ही पड़ता हैं।

बालक जब तक कि स्वयं विचारशील नहीं हो जाता, अपनी भलाई-बुराई नहीं समझने लगता तर्क नहीं करने लगता, अपनी जिम्मेदारी अनुभव नहीं करने लगता, तब तक उस का निजी स्थायित्व स्वीकार नहीं किया जाता। नाबालिगों को राजदरबार में शूद्र माना जाता है, उनकी बुद्धि को कच्ची और नासमझ माना जाता है। नाबालिग के हाथ के दस्तावेज सही नहीं माने जाते। सम्पत्ति, विवाह, वोट, जमानत के मामलों में उसे अछूत समझा जाता है। जैसे मन्दिर में शूद्रों का पदार्पण नहीं होता, वैसे ही जहाँ समझदारी का प्रसंग हैं, विवेक विचार का विवेचन है, वहाँ नाबालिग को अन्त्यज घोषित कर दिया जाता है। ठीक भी है, बिना परिपूर्णता आये, बिना विश्वस्तता का प्रकटीकरण हुए, क्योंकर उत्तरदायी कार्यों का बोझ उसे दिया जा सकता हैं?

पाठक समझ गये होंगे कि ‘जन्म से जब शूद्र हैं’ कहने का क्या अभिप्राय है। पत्थर पड़ा हुआ है, जब तक संस्कारित होकर वह मूर्ति न बन जाय, कौन उसकी पूजा करेगा? बिना मोती की सीप को जौहरी क्यों खरीदेगा? बिना ज्ञान, बुद्धि, चरित्र और योग्यता के कौन मनुष्य द्विज कहा जायगा? यदि द्विज कहा भी जाय तो कागज के हाथी के समान उपहास का ही साधन बनेगा। निःसन्देह जन्म से तो गीली मिट्टी के समान सभी मनुष्य ज्ञान रहित शूद्र हैं, पीछे वे जिस साँचे में ढलकर ये बाहर निकलते हैं, जिन संस्कारों से परिपूर्ण होते हैं, उन्हीं के अनुसार पद पाते हैं।

शूद्र को द्विज बनाने वाले संस्कार क्या हैं और वे किस प्रकार एक ही आकृति वाले प्राणियों को चार वर्णों में विभक्त कर देते हैं, इसका विस्तृत परिचय पाठकों को अगले अंक में मिलेगा।


ईश्वर और जीव

(श्री लक्ष्मीनारायण जी गुप्त कमलेश’ मौदहा)

एक पुरुष ने एक महात्मा से प्रश्न किया कि ‘आप लोग कहते हैं-ईश्वर और जीव में भेद नहीं हैं, दोनों एक ही आत्मा हैं। तब फिर ईश्वर में जो सर्वव्यापक गुण हैं, वे जीव में क्यों नहीं हैं?

महात्मा ने प्रश्न सुनकर कहा-हमको, प्यास लगी है और गंगाजल की ही हर पीते हैं। गंगा जी हमारी कुटी से दो मील के फासले पर है, प्रथम तुम जाकर गंगाजी से जल तो ले आओ। असली गंगाजल ही लाना, कूप का जल न लाना। जब हम गंगाजल पान कर लेंगे तब तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देंगे।

यह पुरुष महात्मा की तूँबड़ी लेकर गंगा जी से जल भर लाया और महात्माजी के सामने रखकर कहा-’लीजिये, गंगाजल को मैं भर लाया हूँ। महात्मा तूँबड़ी के जल को देखकर कहने लगे-’यह तो गंगाजल नहीं हैं।’

उसने कहा - ‘यह गंगाजल ही है।’

महात्मा ने कहा -’हम कैसे विश्वास करें, कि यह गंगाजल ही है?

वह पुरुष गंगाजल की पुष्टि में कसमें खाने लगा। महात्मा ने कहा-’तुम तो सच कहते हो, परन्तु गंगाजी में पचासों नावें चलती हैं, हजारों जल जीव बसते हैं, बड़ी-बड़ी लहर उठती हैं और करोड़ों मछलियाँ रहती हैं, लाखों मनुष्य जिसमें स्नान करते रहते हैं, उनमें से तो एक भी इसमें नहीं दीखता हैं। सैकड़ों पर्वत, वृक्ष तथा नगर एवं ग्राम उसके किनारे पर हैं, किन्तु यहाँ कुछ भी नजर नहीं आता, तब हम कैसे जान लें कि यह गंगाजल ही है!’ उस पुरुष ने कहा-’वह बड़ा भारी गंगाजी का प्रवाह है, जिसके किनारे पर हजारों नगर और पर्वतादि हैं, यह थोड़ा सा उसी प्रवाह का हिस्सा है, इसमें वह सब कैसे रह सकते हैं? मैं जो लाया हूँ, वह गंगाजल ही है और जो माधुर्य उस बड़े प्रवाह में है वही इसमें हैं, अन्तर केवल यही है कि गंगाजी की भाँति सब दृश्य इसमें उपस्थित नहीं हो सकता!’

महात्मा ने कहा-यही तेरे प्रश्न का उत्तर है। इसी तरह तू ईश्वर और जीवात्मा में घटा लें। जीवात्मा की उपाधि अन्तःकरण है, वह छोटी सी उपाधि है और ईश्वरात्मा की उपाधि माया है वह सारे ब्रह्माण्ड में फैली हुई है। ईश्वरात्मा गंगाजी के बड़े प्रवाह के समान है और जीवात्मा इस छोटी तूँबड़ी के जल को तरह। इसी कारण ईश्वर में सर्वत्रतादिक धर्म रहते हैं, जीवात्मा में नहीं रहते, परन्तु सुखरूपता दोनों में बराबर ही है, नियत्व और चेतनात्वादिक धर्म भी दोनों में बराबर ही हैं। इसी से सिद्ध होता है कि, जीवात्मा और ईश्वरात्मा का बिलकुल भेद नहीं है।

तुमको दूसरा कोई अच्छी सलाह दे, तो तुम्हारा सुनना व्यर्थ है। तुम किन्तु अपनी आत्मा की सलाह से ही काम करते रहो, कभी धोखा नहीं खाओगे।


Quotation

तुम इस बात की चिन्ता न करो, कि तुम्हारे विषय में कोई दूसरा व्यक्ति क्या कहता है। तुम्हें इस बात में ध्यान देने की आवश्यकता है कि तुम्हारे विषय में तुम्हारी ही क्या सलाह है। हर एक मनुष्य खुद ही उचित और अनुचित निर्णय कर लेता है।

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विषयी ही बन्धन में है और त्यागी ही मुक्त है। आलस्य ही घोर नरक है। तृष्णा को त्याग देना ही स्वर्ग है।


मूर्खों से पराजय

(महात्मा शेखसादी)

अगर कोई बुद्धिमान मूर्खों के साथ किसी विषय पर वाद विवाद करे, तो उसे अपनी इज्जत की आशा त्याग देनी चाहिए। अगर कोई मूर्ख किसी अक्लमन्द को हरा दे तो आश्चर्य न करना चाहिए, क्योंकि मामूली पत्थर भी तो मोती को तोड़ डालता है। जिस समय एक ही पिंजरे में कोयल के साथ कौआ हो, उस समय यदि कोयल न गावे, तो आश्चर्य की क्या बात है? यदि कोई हरामजादा किसी बुद्धिमान पर जुल्म करे, तो बुद्धिमान को चाहिए कि कुपित और शोकार्तन हो। अगर एक निकम्मा पत्थर बेशकीमती सोने के प्याले को तोड़ दे, तो बेशकीमती सोने की कम कीमत न हो जायगी।

अगर कोई अक्लमन्द कमीनों की मंडली में पड़कर उन पर अपने उपदेशों का असर न डाल सके अथवा उनका प्रशंसा भाजन न बन सके, तो इसमें आश्चर्य की कौन सी बात है? बीन की आवाज, ढोल की आवाज को दबा नहीं सकती, किन्तु बदबूदार लहसुन अम्बर की खुशबू को परास्त कर देता हैं। मूर्ख को अपनी ऊँची आवाज का घमण्ड हुआ, क्योंकि उसने गुस्ताखी से एक अक्लमन्द को घबरा दिया।

अगर एक रत्न कीचड़ में गिर पड़े, तो भी वह वैसा ही नफीस बना रहता है और यदि गर्द आसमान घर चढ़ जावे, तो भी अपनी असली नीचता को नहीं छोड़ता। लियाकत बिना तालीम के और तालीम बिना लियाकत के बेकार है। शक्कर की कीमत गन्ने से नहीं हैं, किन्तु उसकी अपनी खासियत से है। कस्तूरी वह है, जो आप खुशबू दे न कि अत्तार के कहने से। अक्लमन्द अत्तार के डिब्बे के समान है, जो चुप रहता हैं, लेकिन गुण दिखाता है, मूर्ख नट के ढोल के समान है, जो शोर बहुत करता है, पर भीतर से पोला है। अन्धों के बीच सुन्दरी कन्या और काफिरों के घर में कुरान की जो गति होती, वही गति बुद्धिमान की मूर्खों में होती है।


समय का स्वरूप

एक सुसज्जित चित्रशाला में एक धनी व्यक्ति ने प्रवेश किया। उसे कुछ चित्र खरीदने थे। अपनी रुचि के अनुकूल चित्र तलाश करने के लिए वह चित्रशाला में टाँगे हुए एक-एक चित्र को ध्यानपूर्वक देखते हुए आगे बढ़ने लगा।

आगे जाकर उसने एक विचित्र प्रकार के मनुष्य का चित्र देखा, उसका चेहरा बालों से ढका हुआ था और पैरों, में बड़े-बड़े पंख लगे हुए थे।

धनी व्यक्ति ने आश्चर्य के साथ चित्रशाला के मालिक से पूछा- ‘यह अद्भुत प्रकार का चित्र किसका है?

चित्रकार ने कहा- यह तस्वीर ‘अवसर’ की है।

उसने पूछा- तो इसका चेहरा बालों से छिपा हुआ क्यों है?

चित्रकार ने उत्तर दिया- इसलिये कि जब यह लोगों के सामने आता है, तो वे इसे पहचान नहीं पाते।

दर्शक ने पूछा- अच्छा, और इसके पाँवों में पंख क्यों लगे हुए हैं?

चित्रकार ने उसे बताया इसलिए कि यह अधिक देर ठहरता नहीं और जल्दी ही चला जाता है। एक बार यदि यह उड़ जाय तो फिर देवता भी इसे नहीं पकड़ सकते।

अवसर सचमुच ऐसी ही वस्तु है। जीवन में अनेक अवसर हम अज्ञान और आलस्यवश उसकी उपेक्षा करते रहते हैं। समय को न तो हम पहचानते हैं और न उसे पकड़ते हैं, तदनुसार केवल असफलता ही हाथ रह जाती है।


कवि से


कवि से

ले.-श्रीयुत् ‘अंचल’

शोषित शापित मानव स्वर मय, होता किस जागृति में उठ करे?

(1)

किस की उज्ज्वल हलचल में जग, जन-जन करते हुँकार अभय।

कब तरस-तरस मरने वाले, हँस हँस जीते निश्चिन्त अजय॥

आजीवन मधु ऋतु में न मिला, जो वह तूफानों में पाते।

कब वर्ग-चेतना की ज्वाला जलती, कब दो युग टकराते?॥

कब फोड़ अगति के मस्तक को, आह्वान प्रगति का सुन पढ़ता।

कब आती जीवन में आँधी, कब जाती जीवन से जड़ता॥

संघर्ष करेंगे कवि देखो, ये भूखे अधनंगे जर्जर।

शोषित शापित मानव स्वर मय, होता किस जागृति में उठ करे?

(2)

उस जागृति पौरुष की दीक्षा, उच्चार उसी पागलपन का।

विद्रोह उसी उगते खूनी रवि, मण्डल किरणों के तन का॥

आँको कवि! लक्ष-लक्ष ये स्वत्वों के हित बलिदान तरुण।

इन ममता के अंगारों का, आँको यह निर्यातन दारुण॥

यह जीवन का काला कुरूप-वैषम्य, गरीबी, बेकारी।

संस्कृति के तन पर कोटि-कोटि, ये पीव-युक्त फोड़े भारी॥

वह आँव उठे तो यह भी फटेंगे, कवि! लपटों में आकर।

शोषित शापित मानव स्वर मय, होता किस जागृति में उठ करे?

(3)

जिस बेचैनी से युग बनता, इतिहास बनाता जो करबट।

जिन नूतन कर्म-शिखाओं में, परिवर्तन की मिलती आहट॥

जिस एक प्रभाती में कटते, छूँछ सपने पुँसत्व रहित।

जो ध्वंसमयी भैरवी विकल, करती तन का लोहू कुण्ठित॥

ये प्राण धरोहर अस्थिजाल, अवरुद्ध, विवश क्षय से बेकल।

मानव की मौन समस्या के, ये अर्थहीन टुकड़े निर्बल॥

ये कैसे किसी अदृश्य महा दानव के चूसे चिर कातर।

शोषित शापित मानव स्वर मय, होता किस जागृति में उठ करे?

*समाप्त*