आपत्तियाँ उन पर आती हैं जो आपत्तियों से डरते हैं। जो विपत्ति से घबराते नहीं, वरन् उसका स्वागत करने को सदैव तैयार रहते हैं वह उनके पास भी नहीं फटकती। दूसरे लोग भले ही समझते रहे कि उस पर आपत्ति आई हुई है पर वह स्वयं उस स्थिति में भी प्रसन्न रहता है। जो सौभाग्य में खुशी से नहीं नाचते वे दुर्भाग्य के समय रोते भी नहीं। जो सफलता पर उछलता है वही असफलता पर सिर धुनता है। विचारशील मनुष्य समझता है कि कठिनाइयाँ एक प्रकार का व्यायाम है जिनका निर्माण इस लिए किया गया है कि इनके द्वारा मनुष्य अपनी उन्नति कर सके। जिसने अपने को ऐश आराम का गुलाम नहीं बना लिया है वह विपत्ति को सृष्टि का एक नियम समझेगा और उसे देखकर जरा भी विचलित न होगा। बहादुर वह है जो विपत्तियों के समूह को देखकर भी नहीं डरता और एक योद्धा की तरह उनका मुकाबला करता है।
किसी कठिनाई से मत डरों। भय और व्यग्रता को छोड़कर हर परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए तैयार रहो। जब कोई संकट आवे तो हँसते हुए उसका सामना करो। स्मरण रखो, संकट के समय मुसकराहट से बढ़कर और कोई सहायक नहीं हो सकता।
जो ज्ञान युगों के प्रयत्न से मिलता है-उसे हम अनायास ही आपके सन्मुख उपस्थित करते हैं।
यह पुस्तकें बाजारू किताबें नहीं हैं। उनकी एक-एक पंक्ति के पीछे गहरा अनुभव और अनुसंधान है। विनम्र शब्दों में हमारा दावा है कि इतना खोजपूर्ण अलभ्य साहित्य इतने स्वल्प मूल्य में अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकता।
1. मैं क्या हूँ?- आत्मा का प्रत्यक्ष प्रदर्शन करने के कुछ सरल साधन। मू. 1 रुपया
2. सूर्य चिकित्सा विज्ञान- सूर्य की प्रचंड रोगनाशक शक्ति द्वारा वैज्ञानिक ढंग से कठिन रोगों की चिकित्सा। मूल्य 1 रुपया
3. प्राणचिकित्सा विज्ञान- मनुष्य के अंदर गजब की विद्युत शक्ति है। उसके द्वारा समस्त रोगों का इलाज। विदेशों में इस विधि से बड़े-बड़े अस्पताल चल रहे हैं। मूल्य 1 रुपया
4. परकाया प्रवेश- मैस्मरेजम के ढंग पर आत्मशक्ति को दूसरे के शरीर में प्रविष्ट करके उसे इच्छानुसार चलाने की साधना। मूल्य 1 रुपया
5. स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्भुत विद्या- अध्यात्मिक सरल साधनों द्वारा तन्दुरुस्त और खूबसूरत बनने के अद्भुत उपाय। मूल्य 1 रुपया
6. मानवीय विद्युत के चमत्कार- शरीर की बिजली से कैसे-कैसे आश्चर्यजनक कार्य होते हैं इसका विस्तृत वैज्ञानिक विवरण। मूल्य 1 रुपया
7. स्वर योग से दिव्य ज्ञान- स्वरोदय विद्या द्वारा गुप्त और भविष्य की बातों को जान लेने की रहस्यपूर्ण साधना। मूल्य 1 रुपया
8. भोग में योग- शीघ्र पतन, स्वप्न दोष, प्रमेह, नपुँसकता आदि विकारों को योग साधनों से दूर करने और मनचाही स्तम्भन शक्ति प्राप्त करने की गुप्त विधियाँ। मूल्य 1 रुपया
9. बुद्धि बढ़ाने के उपाय- जिन लोगों को मस्तिष्क से काम करना पड़ता है या जो स्मरण शक्ति बढ़ाकर बुद्धिमान बनना चाहते हैं उनके लिए यह कल्प वृक्ष के समान है। मूल्य 1 रुपया
10. धनवान बनने के गुप्त रहस्य- बड़े-बड़े कुबेरों द्वारा कार्य रूप में आई हुई ऐसी विधियाँ हैं जो आपको भी धनवान बना सकती हैं। मूल्य 1 रुपया
11. पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि- मन चाही संतान प्राप्त करने के सारे रहस्य इस पुस्तक में खोल कर रख दिये हैं। मूल्य 1 रुपया
12. वशीकरण की सच्ची सिद्धि- दूसरों को अपने वश में करने के लिये बिलकुल सच्चे और हजारों वार आजमाये हुए प्रयोगों का वर्णन। मूल्य 1 रुपया
13. मरने के बाद हमारा क्या होता है?- मृत्यु के उपरान्त प्राप्त होने वाले स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, प्रेत योनि, मृतकों का साक्षात्कार, उनकी सहायता प्राप्त करना आदि बातों पर अनुभवपूर्ण वर्णन। मूल्य 1 रुपया
14. जीव जन्तुओं की बोली समझना- मूक जीव जन्तुओं की भी स्वतंत्र भाषा है और वे भी हमारी ही तरह बातचीत करते हैं। उसे समझने का महत्वपूर्ण विधान। मूल्य 1 रुपया
नोट- चार या अधिक पुस्तकें लेने पर चौथाई कमीशन दिया जाता है। हर पुस्तक पर एक आना के हिसाब से पोस्टेज लगता है, जो खरीदार को देना होता है। इस प्रकार कमीशन काटकर और पोस्टेज जोड़ कर 1 रुपया प्रति पुस्तक के हिसाब से मूल्य भेजना चाहिए। चार से कम पुस्तकें मंगाने वाले सात आना प्रति के हिसाब से भेजें।
पता- मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा।
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः
यह आत्मा निर्बलों को प्राप्त नहीं होता!
इस संसार में दुर्बलता सब से बड़ा महा घोर पातक है
-इसलिए-
कमजोर सर्वत्र नारकीय यंत्रणाएं भोगते देखे जाते हैं।
वर्ष 3 सम्पादक-आचार्य श्रीराम शर्मा अंक 09
ले. श्री सागर सिंह जी
जीवन का यह ध्येय नहीं हैं।
(1)
किसी तरह भी चलते जाना,
किसी तरह भी जलते जाना,
विष भी पीकर शंकर बनना-
केवल मधु ही पेय नहीं हैं।
जीवन का यह ध्येय नहीं हैं।
(2)
अटल हिमालय भी टल जाये;
दिनकर ज्योतिहीन हो जाये;
पथ पर रुकने से बढ़कर-
इस जीवन में कुछ हेय नहीं है।
जीवन का यह ध्येय नहीं है।
(3)
आत्म विवशता से घबरा कर;
आँखों में आँसू छलका कर;
जग की मूल आत्म रक्षा है-
भीख माँगना प्रेय नहीं है।
जीवन का यह ध्येय नहीं है।
भारतवर्ष धर्मप्राण देश है, बहुत प्राचीन काल से यहाँ धर्म को जीवन का प्रमुख अंग माना जाता रहा है। कारण यह है कि हमारे तत्वदर्शी पूर्वज जानते थे कि मानव जीवन की चतुर्मुखी उन्नति का केन्द्र धर्म ही है। जब संसार के अन्य भागों में मनुष्य जंगली जीवन व्यतीत कर रहे थे, तब धर्म की धारणा के कारण ही हमारा देश विश्व की मुकुटमणि बना हुआ था। शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक उन्नति की सर्वोच्च श्रेणी पर भारतवासी पहुँचे हुए थे। स्पष्ट ही धर्म का पालन एक प्रत्यक्ष व्यापार है, जिसका सुफल अविलम्ब प्राप्त होता है। धर्म का ध्रुव निश्चित फल सुख है। दूसरे शब्दों में यों कह सकते हैं कि जिस मार्ग पर चलने से लौकिक और पारलौकिक सुख मिलता है, उसे धर्म कहते हैं।
जब हम अपनी दुर्दशा पर विचार करते हैं तो हमें यह देखने के लिये बाध्य होना पड़ता हैं कि कहीं हमने धर्म का परित्याग तो नहीं कर दिया है, जिससे, दीनता, दासता, अज्ञान और दुखों की चक्की में पिसते हुए छटपटाना पड़ रहा हैं। चिकित्सा से पहले रोग का निदान आवश्यक होता है।
गणितज्ञों ने हिन्दू जाति की धार्मिक अवस्था पर गहरी खोज की है और हिसाब लगा कर बताया है कि संध्या, पूजा, जप, कीर्तन, तीर्थयात्रा कर्मकाण्ड, संस्कार, मन्दिर दर्शन कथा श्रवण, शास्त्र पठन, धार्मिक शिक्षा के निमित्त सर्वसाधारण का जो बहुत सा समय खर्च होता है और साधु, सन्त, पुरोहित, पुजारी उपदेशक, धर्म संस्थाओं तथा धर्म स्थानों के कर्मचारी आदि का जो पूरा समय खर्च होता है, इस सारे समय को जोड़ कर इसका औसत तीस करोड़ हिंदुओं पर फैलाया जाय तो हर छोटे-बड़े के हिस्से में पौने तीन घंटे का समय पड़ता है। निद्रावस्था को छोड़ कर शेष समय का यह करीब पाँचवाँ भाग है। इसी प्रकार उपरोक्त कार्यों एवं व्यक्तियों के ऊपर करीब 2 अरब 96 करोड़ रुपया प्रति वर्ष व्यय होता है। इसकी औसत हर हिन्दू के ऊपर डेढ़ पैसा प्रति दिन पड़ता है। देश की औसत आमदनी दो आना रोज है। इस तरह सारी आमदनी का पाँचवाँ भाग धर्म के लिये खर्च किया जाता है। एक शब्द में यों कह सकते हैं कि हम लोग अपनी सम्पूर्ण शक्ति का पाँचवाँ भाग धर्म के निमित्त इस समय भी लगाते हैं।
पाँचवाँ भाग बड़ी भारी शक्ति है। अन्य देशों में फौजी तथा भीतरी सम्पूर्ण व्यवस्था के लिये मजबूत सरकारें अपने देश की आमदनी का दसवें से भी कम भाग खर्च करती है। कहते हैं कि इस समय युद्ध में लगे हुए राष्ट्रों में सब से अधिक खर्च करने वाला देश जर्मनी अपनी राष्ट्रीय आय का पाँचवाँ भाग युद्ध एवं राज्य व्यवस्था में खर्च कर रहा है। यों समझिए कि यदि हिन्दू जाति को जर्मनी के समान किसी बड़े भीषण रोमहर्षक युद्ध में संलग्न होना पड़ता तो उस समय अधिक से अधिक इतना ही खर्च करना पड़ता जितना आज भी हम लोग धर्म के लिये कर रहे हैं। अमेरिका आदि कुबेर समान धनी देशों के ईसाई मिशन संसार भर में अपना मजहब फैलाने के लिए बहुत बड़ी धनराशि व्यय करते हैं, पर वह भी हमारे व्यय की अपेक्षा कम है। जितने पैसे से दर्जनों यूनीवर्सिटी, पचासों कालेज, सैकड़ों हाईस्कूल, हजारों पाठशालायें चल सकती हैं, उतना पैसा एक-एक पर्व पर पुण्य लाभ के निमित्त यहाँ खर्च होता है। जितनी पूँजी से उद्योग धन्धे आरम्भ करके अधपेट खाने वाले गरीब मनुष्य और भूख की ज्वाला से तड़फ-तड़फ कर प्राण देने वाले बालकों को रोजी दी जा सकती है, इतना पैसा प्रति वर्ष मन्दिरों के सजाव, शृंगार, भोग, भक्ति में खर्च हो जाता है।
औसत आमदनी दो आना प्रति दिन में से अधिक से अधिक पाँचवाँ भाग भी परोपकार के लिये निकाला जा सकता है। भोजन, वस्त्र, आवागमन, दवादारु तथा अन्य जीवनोपयोगी आवश्यकताओं को किसी प्रकार जैसे-तैसे पूरा करते हुए पाँचवे भाग से अधिक समय एवं शक्ति को परमार्थ के लिए लगाने की आशा भला कौन निर्दय कह सकता है। निस्सन्देह हिन्दू जाति इस गई गुजरी दशा में भी धर्म के लिए जितना त्याग कर रही है, उसका उदाहरण संसार में अन्यत्र कहीं भी मिल सकना कठिन है।
इतना होते हुए भी हम दिन-दिन नीचे गिरते जा रहे हैं। शास्त्र कहता हैं कि “धर्मोरक्षति रक्षित;” धर्म की रक्षा करने से अपनी रक्षा होती है। हम धर्म की रक्षा कर रहे हैं, पर धर्म हमारी कुछ भी रक्षा क्या नहीं करता? इस गम्भीर प्रश्न ने आज तीस करोड़ हृदयों में खलबली पैदा कर दी है। देश के विचारवान व्यक्ति इस पेचीदगी से बहुत ही चिन्तित हो रहे हैं। जब गुत्थी सुलझती नहीं, तो विवश होकर हमारे नौनिहाल उसे ढोंग, पाखंड, जालसाजी, धोखेबाजी, भ्रमपूर्ण कल्पना आदि नामों से सम्बोधन करते हैं और उसके विरुद्ध बगावत का झंडा बुलन्द करते हैं। हम देख रहे हैं कि भारत की भावी पीढ़ी धर्म के विरुद्ध तूफानी बगावत को साथ में ला रही है और उस प्रचण्ड बवंडर में सम्भव है कि आर्य सभ्यता के प्राचीन गौरवमय सिद्धान्त भी बह जाएं। टर्की में कमालपाशा ने अपने देश की सम्पूर्ण परम्पराओं को कुचल डाला। रूस में धर्म का बिलकुल बहिष्कार कर दिया, कौन जानता है कि हमारे देश के नौजवान अपने समय के धर्म की निरर्थकता, नपुँसकता और निरुपयोगिता से झुँझलाकर उसे चूर-चूर नौकर डालेंगे।
अखंड ज्योति के जीवन का प्रधान उद्देश्य ‘धर्म की सेवा’ है। यह धर्म की पूजा के लिये ही प्रकट हुई है और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए इसे जीवित रहना है। जिसका प्राण ही धर्म में पिरोया हुआ हो, वह अपने ईष्ट पर इस प्रकार की आपत्ति आते देखकर, उसे लाँछित और तिरस्कृत होते देखकर, मार्मिक वेदना का अनुभव करती है “प्रत्येक व्यक्ति धार्मिक बने” यह उपदेश करने के साथ हम धर्म के वर्तमान स्वरूप में शोधन भी करना चाहते हैं। हम अनुभव करते हैं कि सदियों की पराधीनता गरीबी और अज्ञान ने धर्म के वास्तविक स्वरूप को बहुत ही विकृत, दोषपूर्ण, एवं जर्जरित कर दिया है, अनेक छिद्रों के कारण उसका वर्तमान स्वरूप छलनी की तरह छिरछिरा हो गया है, जिससे राष्ट्र की उच्चतम सद्भावनाओं के साथ डाली हुई पञ्चमाँश शक्ति नीचे गिर पड़ती है और छलनी में दूध दुहने वाले के समान केवल पश्चात्ताप और निराशा ही प्राप्त होती है।
सद्भावना से प्रेरित होकर आत्मोद्धार के लिए जो लोकोपकारी कार्य किये जाते हैं, वे धर्म कहलाते हैं।” धर्म की इस मूलभूत आधार शिला के ऊपर हमें देश काल की स्थिति के अनुसार नवीन कर्मकाँडों की रचना करनी होगी। दूध रखने के लिये छेदों वाले बर्तन को हटाना होगा, जिसमें से कि सारा दूध चू कर मिट्टी में मिल जाता है। ईश्वर की सच्ची उपासना उसकी चलती फिरती प्रतिमाओं से प्रेम करने में है। परमार्थ की वेदी पर अपने निजी तुच्छ स्वार्थों को बलिदान करना धर्म हैं। धर्म और ईश्वर की सच्चे अर्थों में पूजा करने वाले व्यक्तियों का कार्य-क्रम वर्तमान परिस्थितियों में अपने आस-पास छाये हुए अज्ञान और दारिद्र के घोर अन्धकार को दूर हटाना होगा। अविद्या के कारण हमारी कौम अंधेरे में टकराती फिर रही है, दरिद्रता के कारण हमारा देश पशुओं से भी गया बीता दयनीय जीवन बिता रहा है। जिसके हृदय में धर्म हैं, उसके हृदय में दया करुणा और प्रेम के लिये स्थान अवश्य होगा। जो व्यक्ति धर्म के नाम पर माला तो सारे दिन जपता है, पर बीमार पड़ौसी की सेवा के लिये आधा घंटा की भी फुरसत नहीं पाता, हमें संदेह होगा कि वह कहीं धर्म की विडम्बना तो नहीं कर रहा है।
हम प्रत्येक धर्मप्रेमी से करबद्ध प्रार्थना करते हैं कि धर्म के वर्तमान विकृत रूप में संशोधन करें और उसको सुव्यवस्थित करके पुनरुद्धार करें। धर्माचार्यों और आध्यात्म शास्त्र के तत्वज्ञानियों पर इस समय बड़ा भारी उत्तरदायित्व है, देश को मृत से जीवित करने का, पतन के गहरे गर्त में से उठाकर समुन्नत करने की शक्ति उनके हाथ में है, क्योंकि जिस वस्तु से-समय और धन से-कौमों का उत्थान होता है, वह धर्म के निमित्त लगी हुई हैं। जनता की श्रद्धा धर्म में है। उनका प्रचुर द्रव्य धर्म में लगता है, धर्म के लिये छप्पन लाख साधु संत तथा उतने ही अन्य धर्मजीवियों की सेना पूरा समय लगाये हुए है। करीब एक करोड़ मनुष्यों की धर्म सेना, करीब तीन अरब रुपया प्रतिवर्ष की आय, कोटि-कोटि जनता की आन्तरिक श्रद्धा, इस सब का समन्वय धर्म में है। इतनी बड़ी शक्ति यदि चाहे तो एक वर्ष के अन्दर-अन्दर अपने देश में रामराज्य उपस्थित कर सकती है, और मोतियों के चौक पुरने, घर-घर वह सोने के कलश रखे होने तथा दूध दही की नदियाँ बहने के दृश्य कुछ ही वर्षों में दिखाई दे सकते हैं। आज के पददलित भारतवासियों की सन्तान अपने प्रातः स्मरणीय पूर्वजों की भाँति पुनः गौरव प्राप्त कर सकती है।
अखंड ज्योति धर्माचार्यों को सचेत करती है कि वे राष्ट्र की पंचमाँश शक्ति के साथ खिलवाड़ न करें। टन-टन पों-पों में, ताता थइया में, खीर-खाँड़ के भोजनों में, पोथी पत्रों में, घुला-घुला कर जाति को और अधिक नष्ट न करे, वरन् इस ओर से हाथ रोककर इस शक्ति को देश की शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक, मानसिक शक्तियों की उन्नति में नियोजित कर दें। अन्यथा भावी पीढ़ी इसका बड़ा भयंकर प्रतिशोध लेगी। आज के धर्माचार्य कल गली-गली में दुत्कारे जायेंगे और भारत-भूमि की अन्तरात्मा उन पर घृणा के साथ थूकेगी कि मेरी घोर दुर्दशा में भी यह ब्रह्मराक्षस कुत्तों की तरह अपने पेट पालने में देश की सर्वोच्च शक्ति को नष्ट करते रहे थे। साथ ही अखंड-ज्योति सर्वसाधारण से निवेदन करती है कि वे धर्म के नाम पर जो भी काम करें उसे उस कसौटी पर कस लें कि “सद्भावनाओं से प्रेरित होकर आत्मोद्धार के लिये लोकोपकारी कार्य होता है या नहीं।” जो भी ऐसे कार्य हों वे धर्म ठहराये जावें इनके शेष को अधर्म छोड़ कर परित्याग कर दिया जाय।
देश के प्रत्येक निवासी का ध्यान इस और आकर्षित होना राष्ट्रीय जागरण का प्रथम चिन्ह होगा कि हमारी सामूहिक शक्ति का सर्वोच्च पंचम भाग किन कार्यों में? किस प्रकार? और किनके द्वारा और विवेक क्यों व्यय होता है? इसका क्या परिणाम निकलता है? इसमें क्या दोष आ गये हैं और उनमें क्या सुधार हो सकता है? हिन्दू जाति के कल्याण का प्रथम मार्ग यह है कि वह अपनी नाड़ियों का पाँचवाँ भाग रक्त अपव्यय होने से बचावे और उसका सदुपयोग करके शक्ति संपादित करे।
सुकरात-
यूनान के संत सुकरात कहा कहते थे कि “यह पेड़ और आरण्य मुझे कुछ नहीं सिखा सकते, असली शिक्षा तो मुझे सड़कों पर मिलती है।” उनका तात्पर्य यह था कि दुनिया से अलग होकर एकान्त जीवन बिताने से न तो परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है और न आत्मोन्नति हो सकती है। अपनी और दूसरों की भलाई के लिए संत पुरुषों को समाज में भरे बुरे लोगों के बीच में अपना कार्य जारी रखना चाहिये।
संत सुकरात जीवन भर ऐसी ही तपस्या करते रहे। वे गलियों में, चौराहों पर, हाट बाजारों में, दुकानों और उत्सवों में बिना बुलाये पहुँच जाते और बिना पूछे भीड़ को संबोधित करके अपना व्याख्यान शुरू कर देते। उनका प्रचार तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों और अनीतिपूर्ण शासन के विरुद्ध होता, उनके अन्तःकरण में सत्य था। सत्य में बड़ी प्रभावशाली शक्ति होती है। उससे अनायास ही लोग प्रभावित होते हैं।
उस देश के नवयुवकों पर सुकरात का असाधारण असर पड़ा, जिससे प्राचीन पंथियों और अनीतिपोषक शासकों के दिल हिलने लगे, क्योंकि उनके चलते हुए व्यापार में बाधा आने की संभावना थी। सुकरात को पकड़ लिया गया, उन पर मुकदमा चला जिसमें दो इल्जाम लगाये गए। 1. प्राचीन प्रथाओं का खंडन करना, 2. नवयुवकों को बरगलाना। इन दोनों अपराधों में विचार करने के लिये न्याय सभा बैठी, सभासदों में से 220 की राय छोड़ देने की थी और 281 की राय मृत्यु दंड देने की हुई। इस प्रकार बहुमत से मृत्यु का फैसला हुआ। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि वह देश छोड़ कर बाहर चले जायँ या व्याख्यान देना, विरोध करना बन्द कर दे तो मृत्यु की आज्ञा रद्द कर दी जायेगी।
सुकरात ने मुकदमे की सफाई देते हुए कहा-”कानून मुझे दोषी ठहराता है। तो भी मैं अपने अन्तरात्मा के सामने निर्दोष हूँ। दोनों अपराध जो मेरे ऊपर लगाये गये हैं, मैं स्वीकार करता हूँ कि वे दोनों ही मैंने किये हैं और आगे भी करूंगा। एकान्त सेवन करके मुर्दे जैसा बन जाने का निन्दित कार्य कोई भी सच्चा संत नहीं कर सकता। यदि मैं घोर स्वार्थी या अकर्मण्य बन कर अपने को समाज से पृथक कर लूँ और संसार की भलाई की तीव्र भावनाएँ जो मेरे हृदय में उठ रही हैं, उन्हें कुचल डालूँ तो मैं ब्रह्म हत्यारा कहा जाऊंगा और नरक में भी मुझे स्थान न मिलेगा। मैं एकान्तवासी, अकर्मण्य और लोक सेवा से विमुख अनुदार जीवन को बिताना मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक समझूंगा। मैं लोक सेवा का कार्य बन्द नहीं कर सकता, न्याय सभा के सामने मैं मृत्यु को अपनाने के लिये निर्भयतापूर्वक खड़ा हुआ हूँ।”
संसार का उज्ज्वल रत्न, महान दार्शनिक संत सुकरात को विष का प्याला पीना पड़ा। उसने खुशी से विष को होठों से लगाया और कहा-”स्वार्थी एवं अनुपयोगी जीवन बिताने की अपेक्षा यह प्याला मेरे लिये कम दुखदायी है।” आज उस महात्मा का शरीर इस लोक में नहीं है, पर लोक सेवा वर्ग का महान् उपदेश उसकी आत्मा सर्वत्र गुँजित कर रही है।
महादेव गोविन्द रानाडे-
काँग्रेस के मद्रास अधिवेशन में सम्मिलित होने के लिए श्री महादेव गोविन्द रानाडे रेल के फर्स्ट क्लास में जा रहे थे। आगे शोलापुर स्टेशन पर वे अपना सामान वहीं छोड़ कर पास के डिब्बे में डॉक्टर भाण्डारकर से बातचीत करने चले गये। इसी समय एक अंग्रेज आया। फर्स्ट क्लास में एक हिन्दुस्तानी का सामान देख कर साहब बहादुर ने उसे फौरन उठवा कर नीचे फिंकवा दिया और खुद उस डिब्बे में बैठ गया।
माननीय रानाडे को इसका पता चला, तो उनने लाचार होकर अपना सामान डॉक्टर भाण्डारकर के डिब्बे में रखवा लिया और जगह की कमी के कारण रात को बड़े कष्ट के साथ गुजारा।
दूसरे दिन यह घटना माननीय गोपाल कृष्ण गोखले को मालूम हुई, उन्हें यह बहुत बुरा लगा। उन्होंने रानाडे जी से कहा आप हाई कोर्ट के चीफ जज हैं, एक मामूली अंग्रेज का ऐसा अभद्र व्यवहार आपको सहन नहीं करना चाहिए। सरकार से उसके खिलाफ लिखा पढ़ी करके आप सहज ही उसे सजा दिला सकते हैं। इस पर रानाडेजी ने कहा- मि. गोखले, वास्तव में हम भारतीय इसी के अधिकारी हैं कि हमारे बड़े से बड़े व्यक्ति के साथ विदेशी लोग ऐसा ही अपमानजनक बर्ताव करें। आप देखते नहीं कि हमारे देश में हम उच्च वर्ण के लोग अछूतों के साथ कैसा मनुष्यता से रहित बर्ताव करते हैं। जब हम एक जाति के और एक सी पराधीन स्थिति के लोग आपस में पशुता का व्यवहार करते हैं, तो भिन्न जाति और भिन्न स्थिति के लोग हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करें तो क्या अनुचित है? अपने देश की आसुरी अस्पृश्यता का, स्मरण आने पर माननीय गोखले का सिर लज्जा से नीचा हो गया।
सर जगदीश चन्द्र बोस-
बेतार के तार यन्त्र के निर्माता बंगाल के संसार प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर जगदीशचन्द्र बोस इस बात पर विश्वास करते हैं कि बुरे से बुरे व्यक्ति को सद्व्यवहार द्वारा सुधारा जा सकता है।
सर बोस के पिताजी भगवानचन्द्रजी डिप्टी कलक्टर थे और चोर डाकुओं को पकड़वाने का कार्य भी उन्हें करना पड़ता था। एक बार एक खतरनाक डाकू को उन्होंने पकड़वाया, अदालत ने उसे जेलखाने की कड़ी सजा दी।
जब यह डाकू जेल से छूट कर आया, तो वह जगदीशचन्द्र के पास गया और कहने लगा-”सुविधापूर्वक खर्चे न चलने के कारण मुझे अपराध करने पड़ते हैं। यदि आप मेरा कोई काम लगवा दें, तो मैं उत्तम जीवन व्यतीत कर सकूँगा।”
जगदीश अपनी दयालुता के लिए प्रसिद्ध है। उनने उस डाकू को बिना अधिक पूछताछ किये अपने पास एक अच्छी नौकरी पर रख लिया। उस दिन से कभी भी उस डाकू ने कोई अपराध न किया और मालिक के कुटुम्ब पर आई हुई आपत्तियों के समय उसने अपने प्राणों को खतरे में डाल कर भी उनकी रक्षा की।
स्वभावतः कोई व्यक्ति बुरा नहीं है। बुरी परिस्थितियां मनुष्य को बुरा बनाती है। यदि उसकी परिस्थितियां बदल दी जाय, तो बुरे से बुरे व्यक्ति को भी अच्छे मार्ग पर चलने वाला बनाया जा सकता है।
सिकन्दर-
सिकन्दर महान् अपनी दिग्विजय करता हुआ प्रचंड वेग से भारत में बढ़ता आ रहा था। उसकी सैन्य शक्ति इतनी अधिक थी कि मार्ग में आने वाले राजा को या तो संधि करनी पड़ती या पीठ दिखा कर भाग जाना पड़ता। इसके अलावा मृत्यु को छोड़कर और कोई चारा न था।
एक बार उसे एक छोटे से भारतीय राजा से मुकाबला करना पड़ा। संयोग से उसका नाम भी सिकन्दर था। यह छोटा सिकन्दर भी बड़ा वीर था। बड़े सिकन्दर की अजेय सेना का ज्ञान रखते हुए भी वह पराधीन बनने को तैयार न हुआ, निदान युद्ध ठन गया।
सिकन्दर महान ने अपने दूत के द्वारा छोटे सिकन्दर के पास सन्देश कहलवा भेजा कि या तो मुझसे संधि कर लो, वरना पीठ दिखा कर ‘सिकन्दर नाम को कलंकित न करना। छोटे सिकन्दर ने युद्ध करने का ही उत्तर दिया।
लड़ाई हुई। अधिक शक्ति के सामने थोड़ी सी सेना का बस न चला। छोटा सिकन्दर वीर गति को प्राप्त हो गया। महान सिकन्दर ने अपने शिविर में यह समाचार सुना कि हमारे सेनापतियों ने उस छोटे राजा को मार गिराया, तो वह उठ खड़ा हुआ और वहाँ पहुँचा जहाँ राजा का मृतक शरीर पड़ा हुआ था।
महान सिकन्दर ने शाही सम्मान के साथ उस राजा की अर्थी के कंधा लगाया और उस स्थान पर एक बड़ा स्मारक बनवाया, जहाँ सोने के अक्षरों में लिखवाया गया था-
“इसने सिकन्दर नाम की गौरव रक्षा की”
राजा राम मोहनराय-
सन् 1811 की बात है, राजा राम मोहनराय के बड़े भाई जगमोहनराय की मृत्यु हो गई। उस समय विधवा को भार रूप समझ कर उसके जीवन भर के खर्चों से छुटकारा पाने के लिये धर्मध्वजी लोगों ने सती प्रथा का चारों ओर बोल-बाला कर रखा था। जगमोहनराय के विवाहिता स्त्री को कुटुम्बियों ने पति के साथ सती होने के लिये बढ़ावा दिया, वह बेचारी किसी प्रकार तैयार हो गई।
चिता में आग लगाई गई। अग्नि की कराल लपटों का जब उस अबोध बाला से स्पर्श हुआ तो उसका धैर्य टूट गया। वेदना से व्याकुल हो कर वह चिता में से जलती-बलती हुई बाहर दौड़ी, पर इससे तो धर्मध्वजियों की नाक ही कट जाती। कुटुम्बियों ने बाँस मार-मार कर उसका सिर तोड़ दिया और उस अधजली को फिर चिता में झोंक दिया। ‘सती’ की आर्त वाणी उपस्थित लोगों को सुनाई न पड़े, इसलिये बड़े जोर-जोर से बाजे बजाने की व्यवस्था नियत परम्परा के अनुसार हो रही थी।
राममोहनराय उस समय छोटे ही थे। उन्होंने धर्म के नाम पर शैतान को ताण्डव नृत्य करते देखा तो आँखों में खून के आँसू उतर आये। वह मनुष्य ही क्या जिसकी भुजायें अनीति को देखकर न फड़क उठे। भावज की नृशंस हत्या को देखकर राय की छाती में ज्वालामुखी बल उठा, उन्होंने चिता की परिक्रमा करके श्मशान भूमि में ही प्रतिज्ञा की कि-” जब तक इस नर हत्या की नृशंस प्रथा का अन्त न कर लूँगा तब तक चैन से न बैठूँगा।”
सब लोग जानते हैं कि राजाजी ने सती प्रथा बन्द कराने के लिये अथक परिश्रम किया। देश भर में आन्दोलन करके लोकमत तैयार किया और सरकार पर प्रभाव डालकर इस हत्याकाँड को रोकने का कानून बनवा दिया। भावज के सती होने से 19 वर्ष के अन्दर वह प्रथा उन्होंने बन्द करा दी, इस बीच में एक भी दिन ऐसा न गया, जब उन्होंने प्रतिज्ञा पालन के लिये कुछ प्रयत्न न किया हो।
सच्ची लगन रखने वाले वे व्यक्ति जो अपने अन्दर मनुष्यता के गुण धारण किये हुए हैं, निस्सन्देह अपनी प्रतिज्ञा को पूरा कर ही लेते हैं और ईश्वर उनके कामों में भरपूर सहायता देता है।
ग्रीस का ऋषि ईसप-
जनता में ज्ञान प्रसार करना जिसने अपना उद्देश्य बना लिया था और जो अपने इसी ध्येय पर हँसते 2 बलिदान हो गया वह ईसप ग्रीस देश के लिडिया प्रान्त में ईसा से कोई छः सौ वर्ष पूर्व पैदा हुआ था।
वह गुलाम जाति में पैदा हुआ था, उसके माता पिता क्रीत दास थे। ईसप ने प्रतिभा और साहस के कारण गुलामी से मुक्ति पाई और साधारण नागरिक की भाँति जीवन यापन करने लगा।
दुनिया में बहुत-बहुत बड़े और महत्वपूर्ण-धर्मकार्य हैं, किन्तु ज्ञान दान से बढ़कर आज तक और कोई भी बड़ा काम तलाश नहीं किया जा सका है। इमारतें, कुआं, तालाब, धर्मशाला, मन्दिर कुछ समय बाद गिर जाते हैं, दिया हुआ दान कुछ समय उपरान्त समाप्त हो जाता है, स्मारक और कीर्ति स्तम्भ गिर कर टूट फूट जाते है, भोजों में दिया गया अन्न दूसरे दिन विष्ठा हो जाता है, वाहवाही के काम को दस दिन बाद भुला दिया जाता है। इन अस्थिर कार्यों का फल भी क्षणिक और बहुत थोड़ा होता है, किन्तु ज्ञान दान तो महान वस्तु है। उसकी तुलना इनमें से किसी के साथ नहीं हो सकती, क्योंकि ज्ञान के ऊपर ही संसार की शान्ति, सुव्यवस्था, धर्माचार एवं परलोक सुख निर्भर है। ईसप ने इस महत्व को समझा और उसने सारे सुख साधनों से मुँह मोड़ कर ज्ञान का प्रचार करना अपना जीवन ध्येय बना लिया।
वह उपदेशपूर्ण कहानियाँ गढ़ता था। वे कहानियाँ इतनी प्रभावशाली होती थीं कि राजा और प्रजा पर तीर की तरह असर करती थी। जिस वार्तालाप के साथ ईसप की छोटी-छोटी कहानियाँ जुड़ जातीं, वह इतना प्रभावशाली हो जाता कि उसके द्वारा दूसरे के मन पर गहरी छाप पड़ती। ईसप अपनी निर्भीकता के लिए प्रसिद्ध था, उसने बिना किसी भेद-भाव के सबल और निर्बल, सत्ताधारी और असहाय, राजा और प्रजा के साथ इन कहानियों का उपयोग किया और जुल्म-ज्यादतियों के खिलाफ आवाज उठाई।
छोटे-छोटे उदाहरण, उक्तियाँ और कथानक ऐसे प्रभावशाली होते हैं कि बात की बात में लोगों की मनोदिशा को उलट देते हैं। जुल्मों से डरी हुई जनता को सावधान रहने, असहयोग करने और जैसे भी बन सके बदला लेने की भावना को उन कहानियों ने ऐसा जागृत कर दिया कि सर्व साधारण का साहस कई गुना बढ़ गया और मनमानी करने वालों का दबदबा फीका पड़ने लगा।
यह बात वहाँ के सत्ताधारी सहन न कर सके। उन्होंने प्रजा को भड़काने, अधर्म फैलाने आदि नाना प्रकार के दोष ईसप पर लगाये, प्रजा में से भी गिरह की अकल न रखने वाले, अपना हित अनहित न पहिचानने वाले बहुत से मूढ़ प्रजाजन भी उन जालिमों के साथ हो लिये। राजा और प्रजा पक्ष दोनों और से उस पर दोषारोपण किया जाने लगा। वह बन्दी बनाया गया और अदालत में उपस्थित किया गया। न्यायाधीश ने उसे पहाड़ पर से ढकेल कर मार डालने का हुक्म दिया। ईसप को पर्वत की ऊँची चोटी से गिरा दिया गया। नीचे पहुँचते-पहुँचते उसका शरीर टुकड़े-टुकड़े हो गया।
ईसप का शरीर मर गया, पर उसकी अन्तरात्मा जीवित रही। कुछ समय पश्चात समस्त ग्रीस में ईसप के सिद्धान्त स्वीकार किये गये। उसकी कहानियाँ बड़े आदर के साथ कही और सुनी जाने लगी। दो शताब्दियों के उपरान्त उस देश ने अपने देश की उस विमल विभूति को पहचाना, तब कहीं उसका समुचित आदर हुआ। उस देश के विद्वानों ने अपने इतिहास में से सात महापुरुषों को ढूँढ़ निकाला और उनकी प्रतिष्ठापूर्वक मूर्तियाँ स्थापित की। इन सप्त ऋषियों में ईसप भी एक था।
ईसप की नीति कथायें समस्त संसार की भाषाओं में अनुवादित हुई हैं। भारत में भी उसकी अनेक कथाएँ प्रचलित है। इनमें से कुछ छोटी-छोटी कथाएँ अखण्ड-ज्योति के पाठक भी अगले अंकों में पढ़ते रहेंगे।
गोखले-
एक बार पूना में प्लेग का भयंकर प्रकोप हुआ। लोग घर वालों तक को छोड़-छोड़ कर भाग गये। उस समय दयार्द्र हृदय महात्मा गोपाल कृष्ण गोखले ने रात-दिन रोगियों की सेवा एवं सुश्रूषा की। आपकी अपूर्व सेवा देखकर तत्कालीन लाट ने कहा था-”प्लेग के दिनों में जहाँ बाप बेटा तक एक दूसरे को बीमारी की दशा में छोड़ कर भाग जाते हैं, ऐसे वक्त में गोखले ने विकट साहस का परिचय दिया है। छोटे-छोटे मकानों में घुसकर प्लेग पीड़ियों के पास पहुँच कर उनकी सेवा-सुश्रूषा करना अपूर्व साहसी व्यक्ति का ही काम है।”
आशुतोष मुकर्जी -
सर आशुतोष मुकर्जी का सरकारी क्षेत्रों में बड़ा मान था। अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के इस गणितज्ञ विद्वान एवं प्रतिष्ठित शिक्षाशास्त्री से ऊँचे ओहदे के अँगरेज अफसरों में अक्सर मिलना जुलना होता रहता था। बंगाल के गवर्नर महोदय से भी उनकी बहुत बार भेंट हुआ करती थी।
उन दिनों अँग्रेजी शासन भारत में नया-नया ही कायम हुआ था। इसलिए अंग्रेज लोग अपनी जातीय श्रेष्ठता का सिक्का भारतीयों के मन पर जमाने के लिये बड़े सचेष्ट रहते थे। इस समय इस नियम का कड़ाई से पालन होता था कि अंगरेज अफसरों से भेंट करते समय सरकारी कर्मचारियों को सूट-बूट की अंगरेजी पोशाक पहननी चाहियें। इच्छा से या अनिच्छा से सभी को यह नियम पालन करना पड़ता था।
परन्तु सर मुकर्जी दूसरी ही धातु के बने हुए थे। जातीय स्वाभिमान उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ था। उनकी अपनी पोशाक कुर्ता, धोती थी। इसी वेश में सरकारी अफसरों से मिलते थे। इस कारण इनमें सभी हाकिम नाराज रहते थे। इस नाराजी के कारण उन्हें जो ऊँचे पद मिलने चाहियें थे वे न मिल सके। मित्र लोग उनसे पूछा करते थे कि आप अपनी बात को छोड़कर हाकिमों के प्रिय पात्र क्यों नहीं बन जाते? इस पर वह यही उत्तर देते कि ऊँचे पद और विपुल संपदा से भी जातीय स्वाभिमान ऊँचा है। जब अंग्रेज लोग अपनी पोशाक को इतना महत्व देते हैं कि दूसरी जाति वाले विवश होकर उनकी पोशाक पहनें तो क्या हम इतने हीन हैं जो पैसे के लिये अपनी जातीय वेशभूषा भी मालिकों की इच्छानुसार बदल दें?
छत्रपति शिवाजी-
बीजापुर का सुलतान महाराज शिवाजी को फूटी आँखों से भी नहीं देखना चाहता था। इस काँटे को निकालने के लिए उसने अपने प्रधान सेनापति अफजल खाँ को पाँच हजार अश्वारोही सेना के साथ भेज दिया। अफजल रास्ते के गाँवों को लूटता खसोटता मंदिरों को गिरा-गिरा कर मस्जिदें बनाता हुआ शिवाजी के किले की तरफ बढ़ा।
सुल्तान ने हुक्म दिया था कि अगर शिवाजी को जिन्दा ही पकड़ कर मेरे सामने हाजिर किया जायगा तो मैं बहुत बड़ा इनाम दूँगा। इनाम के लालच से अफजल के मुँह में पानी भर आया था। वह किसी भी षड़यंत्र से शिवाजी को जिन्दा पकड़ना चाहता था। उसके लिये उसने एक युक्ति यह की कि अपने दल के एक ब्राह्मण दूत को शिवाजी के पास भेजा कि सेनापति तुम से सन्धि करना चाहते हैं, इसके लिये बुला रहे हैं।
दूत की बातें सुन कर शिवाजी सारा मर्म समझ गये और जैसे के साथ तैसा व्यवहार करने की व्यवस्था कर डाली। बीच बगल में एक शिविर खड़ा किया गया, जहाँ से दोनों दलों की सेनाएँ दूर थीं। मिलन के लिये यही स्थान नियत किया गया। अफजल ने अपने सिपाही छिपा रखे थे कि जैसे ही शिवाजी पास आवे उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाय।
शिवाजी ने हाथ में लोहे का गुप्त हथियार ‘बाघनख’ हाथ में छिपाया और मिलने के लिये चल दिये। खाली हाथ अकेले शिवाजी को आते हुए देख कर अफजल बहुत प्रसन्न हुआ और उनका स्वागत करने लगा। स्वागत पूरा भी न होने पाया था कि शिवाजी लपकते हुए उसके पास पहुँचे और पेट में बाघनख घुसेड़ कर अफजल खाँ की आंतें निकाल ली। छिपे हुए सिपाही जब पकड़ने के लिए दौड़े, तो उनको भी यमपुर पहुँचा दिया गया।
शिवाजी का सिद्धान्त था कि पाजी को किसी भी नीति से उसके कर्मों का फल चखा दिया जाय, तो वह धर्म है। जैसे के साथ तैसा व्यवहार करने को वे अधर्म नहीं मानते थे।
सुरेन्द्रनाथ बनर्जी-
राष्ट्रीय महासभा के प्रारंभिक काल के प्रमुख कर्णधार सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी बहुत ही सुलझे हुए विचारों के नेता थे। जब राष्ट्र निर्माण की ठोस योजना पर कभी गम्भीर विचार विमर्श होता, तो वे सदैव यह कहा करते थे। “सुदृढ़ स्वास्थ्य ही वह नींव है, जिसके ऊपर सुदृढ़ राष्ट्र खड़ा हो सकता है।” उनका विश्वास था कि सब से अधिक रचनात्मक कार्य यह है कि देश वासियों को उत्तम स्वास्थ्य बनाने की शिक्षा दी जाय। कसरत, व्यायाम, लाठी, तलवार आदि के द्वारा शारीरिक शक्तियों को विकसित किया जाय। क्योंकि उत्तम शरीर में उत्तम मस्तिष्क का और उत्तम मस्तिष्क में उत्तम आत्मा का निवास हो सकता है। इन्हीं उत्तमताओं के आधार पर किसी महान राष्ट्र का निर्माण हो सकता है। शारीरिक उन्नति के बिना कोई भी उन्नति आगे नहीं बढ़ सकती।
वृद्धाबद्ध में सर बनर्जी के सारे बाल पक गये थे, दाढ़ी सूत की तरह सफेद हो गई थी, फिर भी वे हजार काम छोड़ कर कसरत नित्य करते। अपने व्यक्तित्व से जिस किसी को भी उसने प्रभावित किया, उस पर यह छाप अवश्य डाली कि शरीर को बलवान बनने के लिए स्वास्थ्य के नियमों का बड़ी सावधानी से पालन करें।
(महात्मा गाँधी)
महासभा (काँग्रेस) के अधिवेशन को एक दो दिन की देर थी। मैंने निश्चय किया था कि महासभा के दफ्तर में यदि मेरी सेवा स्वीकार हो, तो कुछ सेवा कर के अनुभव प्राप्त करूं। जिस दिन हम आये, उसी दिन नहा धोकर महासभा के दफ्तर में गया। श्रीभूपेन्द्र नाथ बसु और श्री घोषाल मन्त्री थे। भूपेन्द्रबाबू के पास पहुँच कर कोई काम माँगा। उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा-’मेरे पास तो कोई काम नहीं हैं। पर शायद मि. घोषाल तुम को कुछ बतावेंगे, उनसे मिलो।’
मैं घोषाल बाबू के पास गया, उन्होंने मुझे नीचे से ऊपर तक देखा। कुछ मुसकराये और बोले-मेरे पास कारकुन का काम है- करोगे? मैंने उत्तर दिया-’जरूर करूंगा। मेरे बस भर सब कुछ करने के लिए आपके पास आया हूँ।’ कुछ स्वयं सेवक उनके पास खड़े थे। उनकी ओर मुखातिब होकर कहा-’सच्चा सेवा भाव इसी को कहते हैं। देखते हो इस नवयुवक ने क्या कहा?’ फिर मेरी ओर देख कर कहा-”तो लो यह चिट्ठियों का ढेर और मेरे सामने पड़ी है कुर्सी, उसे ले लो। देखते हो न, सैकड़ों आदमी मुझ से मिलने आया करते हैं। अब मैं उन से मिलूँ या ये लोग फालतू चिट्ठियाँ लिखा करते हैं, इन्हें उत्तर दूँ? पास ऐसे कारकुन नहीं कि, जिनसे मैं यह काम ले सकूँ। इन चिट्ठियों में बहुतेरी तो फिजूल ही होंगी। पर तुम सब को पढ़ जाना, जिनकी पहुँच लिखना जरूरी हो, उनकी पहुँच लिख देना और जिनके उत्तर के लिए मुझ से पूछना हो, पूछ लेना।’ उनके इस विश्वास पर मुझे बड़ी खुशी हुई।
श्री घोषाल मुझे पहचानते न थे। नाम-ठाम तो मेरा उन्होंने बाद में जाना। चिट्ठियों का जवाब आदि का काम तो बहुत आसान था। उन सब को मैंने तुरन्त निपटा दिया। घोषाल बाबू खुश हुए। उन्हें बात करने की आदत थी। मैं देखता था कि वह बातों में बहुत समय लगाया करते थे। मेरा इतिहास जानने के बाद तो मुझे कारकुन का काम देने की उन्हें जरा शर्म मालूम हुई। पर मैंने उन्हें निश्चिन्त किया।
“कहाँ मैं और कहाँ आप। आप महासभा के पुराने सेवक, मेरे नज़दीक तो आप बुजुर्ग हैं। मैं ठहरा अनुभवहीन नवयुवक। मुझ पर तो आपने अहसान ही किया है। क्योंकि आगे चल कर मुझे महासभा में काम करना है। उसके काम काज को समझने का आपने अलभ्य अवसर मुझे दिया है।” मैंने कहा।
“सच पूछो तो यही सच्ची मनोवृत्ति है। परन्तु आज कल के नवयुवक ऐसा नहीं मानते। पर मैं तो महासभा को उसके जन्म से पहचानता हूँ। उसकी स्थापना करने में मि. ह्यूम के साथ मेरा भी हाथ था”-घोषाल बाबू बोले।
हम दोनों में खासा सम्बन्ध हो गया। दोपहर को खाने के समय वह मुझे साथ रखते। घोषाल बाबू के बटन भी बेरा लगाता। यह देख कर ‘बेरा’ का काम मैंने खुद ले लिया। मुझे वह अच्छा लगता। बड़े बूढ़ों की ओर मेरा बड़ा आदर रहता था। जब वह मेरे मनोभावों से परिचित हो गये, तब अपनी निजी सेवा का सारा काम मुझे करने देते थे। बटन लगवाते हुए मुँह मिचका कर मुझे कहते, “देखो न महासभा के सेवक को बटन लगाने तक की फुरसत नहीं मिलती। क्योंकि उस समय भी वे काम में लगे रहते हैं।” इस भोले-पन पर मुझे हँसी तो आई, परन्तु ऐसी सेवा के लिए मन में अरुचि बिल्कुल न हुई। उससे जो लाभ मुझे हुआ उसकी कीमत आँकी नहीं जा सकती।
थोड़े ही दिनों में मैं महासभा के तन्त्र से परिचित हो गया। बहुत से अगुआओं से भेट हुई। गोखले, सुरेन्द्रनाथ आदि योद्धा आते जाते रहते। उनका रंग-ढंग मैं देख सका। महासभा में समय जिस तरह बर्बाद होता था, वह मेरी नजर में आया। अंग्रेजी भाषा का दौर-दौरा भी देखा। इससे उस समय भी दुःख हुआ था, मैंने देखा कि एक आदमी के करने के काम में उससे अधिक आदमी लग जाते थे और कुछ जरूरी कामों को तो कोई भी नहीं करता था।
मेरा मन इन तमाम बातों की आलोचना किया करता था। परन्तु चित्त उदार था-इसलिए यह मान लेता कि शायद इससे अधिक सुधार होना असम्भव होगा। फलतः किसी के प्रति मन में दुर्भाव उत्पन्न न हुआ।
जिस मनुष्य की अच्छे कर्म के लिए निन्दा होती है, वह बड़ा भाग्यवान है। किन्तु जो अपने भले कर्मों के बदले में धन्यवाद या किसी फल की आशा करता है। वह महा अभागा है। क्योंकि वह सुकर्मों का मूल्य चाहता है। जिस मनुष्य की उसने भलाई की हो, उसे सुखी देखने की प्रसन्नता ही उसके लिए पूर्ण पुरस्कार है।
-वियोगी हरि।
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प्रेम सदा सहिष्णु और मधुर है। प्रेम में ईर्ष्या, आत्मश्लाघा, गर्व, अशिष्ट आचरण, स्वार्थ, क्रोध और अधर्म के लिए कोई स्थान नहीं है।
-महात्मा ईसा।
(श्री धर्मपाल सिंहजी, रुड़की)
ता0 9 अगस्त को तमाम रात बड़े जोर की वर्षा होती रही, जिसमें बहुत से मकान गिर गये। मेरा अभी कुछ जीवन शेष रह गया था, यह ईश्वर की मर्जी है, वह प्रत्येक घटना द्वारा अपना प्रेम सौंप रहे हैं। उन्होंने मुझे यह नसीहत की थी-अभागों! देख, जीवन क्षणभंगुर है। दुनिया में न भूल। मेरी तरफ ध्यान दे। मैं वास्तव में उनको भूल जाता हूँ, पर वे करुणाकर, वे दीनानाथ-सर्वव्यापक, हरदम, हर घड़ी परछांई की भाँति रक्षा कर रहे हैं।
यहाँ से ग्राम जाते समय एक बरसाती नाला पड़ता है। उसमें पानी कुछ विशेष नहीं होता, पर इस लगातार वर्षा के कारण पानी कई फर्लांग की चौड़ाई में चल रहा था। प्रथम तो मेरा मन वापस लौटने को करने लगा, फिर बच्चों को देखने के लिए पार उतरना सोचा। घाट से एक फर्लांग नीचे जहाँ नाला बहुत चौड़ा था, उतरने के लिए गया। अचानक एक बहुत गहरे गड्ढे में मेरा पाँव फिसला और साथ ही मैं नीचे गहरे गर्त्त में चला गया। पानी की धार तेज थी और गहराई बहुत अधिक। मैं डूब गया और पानी पीने लगा। इस सुनसान में सर्वथा अकेला था, वर्षा हो रही थी। मैं डूबा-डूबा अनुभव कर रहा था कि, अब जीवन समाप्त है-भगवान् याद आये। चन्द मिनट में कुछ सुध−बुध न रही और मैं डूब गया।
थोड़ी देर बाद मैं अचानक अपने आप को किनारे पर पड़ा देखता हूँ। गहरे पानी में से निकाल कर इस प्रकार सुरक्षित रूप से मुझे कौन इस प्रकार सुरक्षित रूप से मुझे कौन रख गया? इसका उत्तर मैं क्या दूँ? अपरम्पार महिमामय परमात्मा की करुणामय कृपा का ही यह एक चमत्कार अनुभव करता हूँ।
(पं. जवाहरलाल नेहरू)
चौरीचौरा काण्ड के बाद हमारे आन्दोलन के एकाएक मुल्तवी किये जाने से मेरा ख्याल है, गाँधी को छोड़ कर काँग्रेस के बाकी तमाम नेताओं में बहुत ही नाराजगी फैली थी। मेरे पिताजी जो उस वक्त जेल में थे, उन पर बहुत ही बिगड़े थे कुदरतन् नौजवान काँग्रेसियों को तब यह बात और भी ज्यादा बुरी लगी थी। हमारी बढ़ती हुई उम्मीदें धूलि में मिल गई। इसलिए उनके खिलाफ इतनी नाराजगी का फैलना स्वाभाविक ही था। आन्दोलन के मुल्तवी किये जाने से जो तकलीफ हुई, उससे भी ज्यादा तकलीफ मुल्तवी किये जाने के जो कारण बताये गये, उनमें तथा उन कारणों से पैदा होने वाले नतीजों से हुई। हो सकता है कि चौराचौरा एक खेदजनक घटना हो, वह थी भी खेदजनक और अहिंसात्मक आन्दोलन के भाव के बिलकुल खिलाफ, लेकिन क्या हमारी आजादी की राष्ट्रीय लड़ाई कम से कम कुछ वक्त के लिए महज इस लिए बन्द हो जाया करेगी कि कहीं बहुत दूर के किसी कोने में पड़े गाँव में किसानों की उत्तेजित भीड़ ने कोई हिंसात्मक काम कर डाला? अगर इस तरह अचानक खून-खराबे का यही अटल नतीजा होता है, तब तो इस बात में कोई शक नहीं कि अहिंसात्मक लड़ाई की विद्या और उसके मूल सिद्धान्त में कुछ कमी हैं, क्योंकि हम लोगों को इसी तरह की किसी न किसी अनचाही घटना के न होने की गारंटी करना और गैर मुमकिन मालूम होता था। क्या हमारे लिए यह लाजमी है कि आजादी की लड़ाई में आगे कदम रखने से पहले हम हिन्दुस्तान के तीस करोड़ से भी ज्यादा लोगों को अहिंसात्मक लड़ाई का उसूल और उसका अमल सिखावें और यही क्यों हममें से कितने हैं जो यह कह सकते हैं कि पुलिस से बहुत ज्यादा उत्तेजना मिलने पर भी हम लोग पुरी तरह शान्त रह सकेंगे? लेकिन अगर हम इसमें कामयाब भी हो जाय, तो जो भड़काने वाले एजेन्ट और चुगलखोर वगैरह हमारे आन्दोलन में आ घुसते हैं और या तो खुद ही कोई मारकाट कर डालते हैं या दूसरों से करा देते हैं, उनका क्या होगा? अगर अहिंसात्मक लड़ाई के लिए यही शर्त रही कि वह तभी चल सकती है, जब कहीं कोई जरा भी खून खराबी न करे, तब तो अहिंसात्मक लड़ाई हमेशा असफल ही रहेगी।
हम लोगों ने अहिंसा के तरीके को इसलिए मंजूर किया था और काँग्रेस ने भी इसीलिए उसे अपना साधन बना लिया था कि हमें यह विश्वास था कि वह तरीका कारगर है। गाँधी जी ने उसे मुल्क के सामने महज इसी लिए नहीं रखा था कि वह सही तरीका है बल्कि इसलिए भी कि हमारे मतलब के लिए वह सब से ज्यादा कारगर था।
-मेरी कहानी
गौरा ग्राम में एक देवतादीन नामक ब्राह्मण रहते थे। वे बचपन में तो बहुत ही दरिद्र घर में उत्पन्न हुए थे। पर जब बड़े हुए तो लेन-देन के व्यापार में रुपये वाले हो गये। जिस गरीब भाई को एक रुपया भी कर्ज में दे आते, तो उसका बीसों वर्ष तक पीछा नहीं छोड़ते। उस रुपये का सूद बढ़ा कर उसको गड़बड़ी में डाल देते और बदले में बेगार करवाते, हल जोतवाते, उनके बच्चों से पशु चरवाते इसी प्रकार आस पास के गाँवों में प्रायः करके दीन-दरिद्र लोगों को ही अपना ऋणी बनाते, जिससे कि उनके साथ वंचकता करने में कुछ भी कठिनाई नहीं पड़ती थी। इस व्यवसाय के द्वारा बहुतों का तो घर छीन लिया, अनेकों की डिगरी करा कर माल व बगिया ले लिये, बहुतों के खेतपात लेकर निहत्था कर दिया। इसी प्रकार कुछ वैभव बढ़ जाने पर गाँव के मुखिया बन बैठे। अब इनके यहाँ पुलिस और रियासत के हाकिमों की सगे रिश्तेदारों की सी सेवा-सुश्रूषा होने लगा। इससे इनका शासन दीन-दुखियों पर और भी अधिक बढ़ गया। जिसको चाहते उस को निरपराध ही पकड़वा कर मनमाना अत्याचार करते।
परमात्मा अनीति को अधिक नहीं बढ़ने देता। पूर्व सुकर्मों का फल समाप्त होते ही करनी आगे आने लगी। तीन साल तक लगातार प्रति वर्ष अग्नि-काण्ड होते रहे, जिससे बहुत सम्पत्ति स्वाहा हुई। अठारह वर्ष का विवाहित लड़का चिरस्थायी राजरोग का शिकार बना, जिस पर बहुत धन व्यय हुआ। दूसरा लड़का 12 वर्ष का था, उसकी झूला पर से गिरने के कारण जीभ कट गई। देवतादीन को आम वात ने घेरा, एक वर्ष तक चारपाई सेवन करके काल के गाल में चले गये। कुछ ही दिन बाद बड़ा लड़का जो राजरोग से पीड़ित था, मर गया। तत्पश्चात् छोटा लड़का भी संप्रहणी रोग से पीड़ित होकर पंचत्वगामी हो गया।
सम्प्रति उनके घर की यह हालत है कि जिन चौपालों में बैठ कर वे मित्रों के साथ माँ बाप मदिरा का पान करते थे वेश्याएं नचाते थे उन की दीवारें गिरी हुई पड़ी हैं। जिस द्वार पर नौबत बजती थी, वहाँ पर अब कुत्तों के चबाने से बचे हुए हाड़ दृष्टिगोचर हो रहे हैं। घर की औरतें फटे पुराने कपड़े पहन कर मजदूरी का काम करने जाती है।
ऐसी घटनायें ढूँढ़ने पर हर जगह मिल सकती हैं, पर वैभव के मद में अंधे हुए मनुष्य उस ओर से आंखें बन्द कर के अन्याय का मार्ग ही पकड़े रहते हैं और अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के गले पर छुरी चलाते रहते हैं। यदि यह लोग अनीति से होने वाले हानिकर परिणामों पर सोचें, तो निस्सन्देह उन्हें अपना हाथ रोकना पड़ेगा।
(पं. श्रीराम शर्मा, ज्योतिर्विद्, किरताण, हिसार)
यों तो मैं कभी-2 कीर्तन में शामिल हो जाता था, पर नियमबद्ध नहीं था। एक दिन उधर से रात्रि के समय जा रहा था, तो देखता हूँ कि ऊपर के कमरे में कीर्तन की आवाज सुनाई दे रही है। मैं भी ऊपर चला गया और देखा कि भगवान कृष्ण की प्रतिमा पर पुष्पों के हार चढ़े हुए हैं और पास में भक्तों की प्रतिमायें शोभायमान है। उस कीर्तन के अधिष्ठाता मेरे सुयोग्य मित्र कुँ. बनवारीलालजी आजाद थे। कुँ. साहब के विचार कीर्तन के विरुद्ध थे। इस परिवर्तन का कारण मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया-
“अभी दस दिन हुए, बद्रीनारायण, केदारनाथ की यात्रा करके आया हूँ। वहाँ रास्ते में एक दिन मैं और पं. इन्द्रसेनजी स्नान के बाद भगवान् चैतन्य महाप्रभु का कीर्तन करने लगे, तो यकायक क्या देखते हैं कि एक महात्मा खड़ाऊ पहिने और एक हाथ में कमंडल और दूसरे में माला जपते हुए आ रहे हैं। हम दोनों ने उनको आते देख कर दूर से ही दौड़ कर साष्टाँग प्रणाम किया। उनके मुख से एक ही शब्द निकला ‘ओऽम्’ और वे जरा सी देर में आँखों से ओझल हो गये। हम हैरान रह गये कि वे कहाँ गये, बहुत ढूंढ़ने पर भी कहीं पता न चला। उस समय से मुझे ऐसा विश्वास हो गया है कि भगवान के भजन कीर्तन में विशेष महिमा है, इसके आधार पर ऊँची-ऊँची आत्माओं की कृपा प्राप्त हो सकती है। इसीलिए अब मैं कीर्तन का अत्यन्त प्रेमी बन गया हूँ।
कुँ. साहब के इन विचारों को सुनकर कीर्तन में मेरा विश्वास और भी अधिक दृढ़ हो गया है।
(पं. प्रसादीलाल शर्मा ‘दिनेश’ कराहल)
मैं आज 18 वर्ष से पटवारी हूँ और इस पटवारगिरी की दशा में मैंने अपनी सरकारी मासिक आय से पृथक अन्याय से घूस में कितना ही धन उपार्जन किया और बेचारे दीन-दुखिया की आत्माओं को दुखाया।
परिणाम यह हुआ कि मेरे दो नौजवान ज्येष्ठ भ्राताओं की अनायास ही अकाल मृत्यु हो गई, जो सारी गृहस्थी के भार को उठाने वाले थे। उनकी मृत्यु के पश्चात् मैं अकेला ही सारी गृहस्थी के भार को उठाने वाला रह गया और वह सब धन भी मुकदमाबाजी में नष्ट हो गया एवं अनेक विपत्तियों से ऐसा घिर गया कि जीवन से ऊबकर आत्म हत्या करने के लिए तैयार हो गया। इसके लिए कुछ विष पदार्थों का भी संग्रह कर लिया।
उसी दिन दैवयोग से मेरे हल्के के एक ग्राम में एक खाकी महात्मा पधारे। उनसे मेरा सत्संग हुआ, उन्होंने मेरी दुर्दशा देखकर कहा-’बेटा! यह सब तेरे अन्याय से धन कमाने का फल है। यदि तू आज ही यह निश्चय कर ले कि मैं अन्याय से धन उपार्जित न करूंगा और दीनों की यथाशक्ति सहायता करूंगा, तो भगवान तेरा कल्याण करेंगे।”
मैंने उसी समय हाथ में तुलसीदल लेकर परमात्मा की सौगन्ध खाई कि अब कदापि अन्याय से धन प्राप्त न करूंगा। 10 साल बीत गये, मैं न्याय की कमाई खाता हूँ और नियम पूर्वक भगवान का भजन करता हूँ। इस समय मेरे तीन पुत्र हैं तथा भाइयों के सामने से भी अच्छी हालत में हूँ। निस्सन्देह अधर्म का धन पारे की तरह फूट कर निकल जाता है और धर्म का थोड़ा धन भी वट बीज के समान फल-फूल कर विशाल बन जाता है।
(पं. गंगाचरण शर्मा गोरमी)
सन् 1896 की बात है। श्रावण की पूर्णिमा रात हो चुकी थी, पानी न बरसने के कारण लोगों के मुंह सूख चुके थे, मवेशियों को चारा तक पैदा न हुआ था जो कुछ शाखा खड़ी थी वह भी सूख चुकी थी। अकाल का स्पष्ट भान हो रहा था, जनता में त्राहि-2 मची हुई थी।
हमारे गाँव के कुछ लोगों के हृदय में हरि कीर्तन करने की प्रेरणा हुई। गौतम ऋषि जी के मन्दिर पर हरि कीर्तन होना आरम्भ हुआ। कुछ लोगों ने इसका उपहास भी किया। कई लोगों ने इसे पानी बरसने की कामना में भी परिणत कर दिया। कुछ व्यक्ति निष्काम भाव से भी प्रेमपूर्वक एकत्रित हुए।
पन्द्रह दिन अखंड कीर्तन होते-होते इसी बीच में पानी बड़े जोर से बरसने लगा। यहाँ तक कि कीर्तन होने की जगह पर शाया करना पड़ा। सर्वत्र आनन्द छा गया। लोगों को भगवत्कृपा पर पूर्ण विश्वास हुआ। वास्तव में हरि कीर्तन की महिमा अपार है। इससे बड़े-बड़े विघ्न दूर हो जाते हैं।
-हृदय को शुद्ध करो। एक-एक दोष चुन-चुन कर निकाल दो। सद्गुणों को ढूंढ़-2 कर हृदय में बसाओ। तुम्हारा हृदय देवपुरी बन जायगा। देवता वही है जिसके हृदय में दैवी गुण भरे हैं।
-महात्मा गाँधी।
-जिस विद्या से लोग जीवन संग्राम में शक्तिमान नहीं होते, जिस विद्या से मनुष्य के चरित्र का विकास नहीं होता और जिस विद्या से मनुष्य परोपकारी, प्रेमी और पराक्रमी नहीं बनता, उसका नाम विद्या नहीं है।
-स्वामी विवेकानंद।
(सा. र. अमरनाथ शर्मा ‘अमर’, द्वाराहाट)
पृथ्वी पर हर एक जीव सुख की इच्छा करता है। पशुओं का तो देह सुख ही एक मात्र लक्ष्य है, पर प्राणि-जगत् के राजा सभ्य मनुष्य भी इस विषय में उन से बहुत बढ़े-चढ़े नहीं हैं। हम बहुधा शारीरिक सुख तथा मानसिक सुख को ढूँढ़ते फिरते हैं पर जो सब से उत्तम सुख है, उस आध्यात्मिक सुख की हमें खबर ही नहीं है। हमारे जितने भी कार्य हैं, उनमें जड़ सुख पाने की एक इच्छा छिपी रहती है। हम स्थूलदर्शी मनुष्य बाहरी वस्तुओं से ही सुख पाने की इच्छा रखते हैं। क्या बाहरी वस्तु किसी को सुख दे सकती है? इस जगत् में हमारे सुख के सामान बाहर नहीं, भीतर हैं। अर्थात् सुख पाने के लिए बाहर ढूँढ़ना वृथा है। हिन्दू शास्त्र भी इस बात का प्रमाण देते हैं कि, बिना मन का तत्व-निर्णय किये बाह्य जगत् के सुखों की कोई आशा नहीं। इसलिए मन का तत्व जानना और उस पर पूरा अधिकार जमा लेना अत्यंत आवश्यक है, मन को जीत लेने से ही हम संसार को जीत लेंगे।
बाह्य उपद्रवों का अन्त नहीं है, एक को मिटाओ तो दूसरा आ खड़ा होता है। चित्त की अवस्था एक सी नहीं रहती, कहाँ तक उसके पीछे पड़े रहें? जब हिरन के शरीर में कस्तूरी पैदा हो कर वन को अपनी महक से भरपूर कर देती है, तब हिरन उन्मत्त की भाँति उस गन्ध का पता लगाने को इधर-उधर दौड़ता फिरता है। फिर दौड़ने पर भी क्या वह उस वास का भेद जान जाता है? उसे तो साफ मालूम होता है कि वह अपूर्व महक बाहर की किसी वस्तु से आती होगी।
मनुष्य के लिये भी सुख की, आनन्द की खान भीतर ही है। उसकी झलक बाहर भी दिखाई देती है, पर वह केवल झलक ही है। शास्त्र का कथक ठीक ही है कि यदि सत्य वस्तु, ब्रह्म या परमात्मा का रूप जानना हो, तो हमें अपने चित्त को क्षण भर के लिए स्थिर बनाना पड़ेगा इसे साधन धर्म का अंग कहते हैं। इसलिये स्थायी सुख प्राप्ति के लिये हमें धर्म का आश्रय लेना पड़ेगा। धर्म ही हमें वर्तमान मुहूर्त के क्षणिक सुख के बदले भविष्य में होने वाले अक्षय सुख का मार्ग बताता है। हमें परम मित्र की भाँति विपत्तियों में दिलासा देकर कहता है कि-”थोड़ा धीरज धरो, ऐसा दिन नहीं रहेगा।” हम आशा लिये प्रयत्न करते हैं और दुःख से उत्तीर्ण हो जाते हैं, जब हिंसा द्वेष की प्रबल आग हमारे दिल में धधकती है, तो धर्म ही हमारा ध्यान इस बात पर आकृष्ट करता है कि, जिन पर हम कुपित हुए, वे तो हमारे भाई हैं, इतना ही नहीं वे और हम एक ही आत्मा हैं। स्थिर होकर मनन कर, वह बात सत्य ही जँचती है, जिससे चित्त शान्त हो जाता है।
कौन कह सकता है कि धर्म की सेवा फलदायक नहीं होती? यदि हम हम सत्य और धर्म को अपने जीवन का कर्णधार बना लें, तो मजे से जन्म मृत्यु से पार हो सकते हैं। तब संसार हमारे लिये डरावनी जगह नहीं रहती हैं। दृष्टि साफ हो जाने से हम देखते हैं कि यह तो खेलने का विस्तृत मैदान है, जहाँ परमात्मा ही नाना वेश धरे खेल रहे हैं।
(श्री पं. रामेश्वरानन्द जी शर्मा)
सुना करता था- हिमालय में सवा लाख पर्वत और सवा करोड़ गंगा है। इस वर्ष उत्तराखण्ड के बद्रीनाथ, गंगोत्री, उत्तर काशी आदि अनेकानेक तीर्थों की अमृतमयी यात्रा करते हुए मैंने देखा है कि, सचमुच असंख्य आकार-प्रकार के पर्वत और अनेक रूप धारिणी गंगायें इस पुण्य प्रदेश में बह रही हैं, जिनका जल भगवती के समान ही पवित्र है और उसमें स्नान करने से वैसी ही आत्मशक्ति का आविर्भाव होता है। गणना करने पर यदि उन शैल-श्रृंखलाओं की संख्या सवा लाख और इन कल−कल वाहिनी पुण्य धाराओं की संख्या सवा करोड़ हो, तो कुछ आश्चर्य नहीं है।
उत्तराखण्ड के दुर्गम तीर्थों की यात्राओं में जो महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अनुभव मुझे हुए हैं, उनका वर्णन करने का आज अवसर नहीं हैं, वह तो फिर कभी पाठकों के सामने उपस्थित किये जावेंगे, आज तो एक ऐसी बात की चर्चा इन पंक्तियों में करूंगा, जो सर्व साधारण के लिए उपयोगी है।
यहाँ के निवासी पर्वतीय लोग, नवीन सभ्यता से अभी विशेष परिचित नहीं हुए हैं, उन तक बीसवीं सदी की मायावी लहरें अभी नहीं पहुँची हैं। इसलिए यह लोग गरीबी में रहते हुए सन्तोष करते हैं और अपनी कड़ी मेहनत की कमाई से रूखा-सूखा खाकर, बेफिक्री की नींद में सो जाते हैं। यह लोग अभी लोभ के वशीभूत नहीं हुए हैं, इसलिए चोरी, उठाईगीरी का चलन उधर नहीं हैं। हम लोग चौड़े में अपना सामान खुला छोड़ देते हैं, मगर क्या मजाल है कि एक पाई भी गुम हो जाय। यह लोग फैशन के गुलाम नहीं है, शरीर ढ़कने के लिए जरूरत भर कपड़े पहन कर काम चला लेते हैं। उन्होंने अपनी जरूरतों को बढ़ाया नहीं हैं, वरन् बहुत सीमित रखा है। इसलिए झूठ बोलने, दम्भ करने, मायाचार या छल−कपट का उनमें प्रवेश नहीं हुआ हैं। ऐसा प्रतीत होता हैं, मानों सत्य और सादगी वर्तमान युग की आसुरी सभ्यता के भय से इस पर्वतीय प्रदेश में आकर छिप रही हो।
इस पुण्य प्रदेश के निवासियों और बम्बई आदि के सभ्यताभिमानी नागरिकों की स्थिति पर तुलनात्मक दृष्टि से देखता हूँ, तो अनुभव करता हूँ कि यह असभ्य, अशिक्षित उन सभ्य शिक्षितों की अपेक्षा हजार गुने सुखी और लाख गुनी सन्तुष्ट हैं और सच्ची मनुष्यता का जीवन व्यतीत करते हैं।
सादगी, जरूरतों को कम रखना, परिश्रमशीलता और ईमानदारी के आधार पर ही मानव-जाति में सच्ची सुख शान्ति की स्थापना हो सकती हैं। इस पाठ को इन अशिक्षित पर्वतीय बन्धुओं से शिक्षित और सभ्य संसार सीख ले, इसी में उसका कल्याण है।
-जो कुछ काम करो, पूरे उद्योग और उत्साह से करो। उद्योग, उत्साह और धीरज बड़ी भारी शक्ति हैं।
-महामना मालवीय।
(ले. श्री द.वा. विपट, गोहद।)
आपसे जुदा हुए हमें काफी समय हो चुका है, किन्तु एक भी दिन ऐसा नहीं जाता, जिस दिन आपकी याद न आती हो, याद आते ही हम आपके निकट पहुँच कर आपके दर्शन करते हैं, आपको आनन्दपूर्वक देख कर हमें संतोष होता है और दुःख देखकर कष्ट होता है, किन्तु हम दोनों समय भगवान् से प्रार्थना करते हैं कि आप के सुख में वृद्धि हो तथा कष्ट का क्षय हो, कितनी अचम्भे की बात है कि हम तो आपको देखने के इच्छुक होते है और अपने विचारों को कार्यरूप में परिणित करते हैं, किन्तु आप लोग हमको भूत कह कर पुकारते हो तथा हमारा प्रभाव आप पर न हो इस हेतु भगवान् से प्रार्थना करते हैं। क्या भगवान् आपका ही है, हमारा नहीं है। भाइयों ऐसा मत समझो भगवान् को जैसा आपका है, वैसा ही हमारा है। ईश्वर की कृपा से सारे जगत का ज्ञान हो सकता है, किन्तु यह बात कार्यरूप में परिणित पाने के लिये ईश्वर के अनुकूल कठिन तपस्या करना पड़ती है, तब गत बुरे संस्कार नष्ट होकर प्राणी सदैव ब्रह्मानन्द में मग्न रह सकता है, उसके आनन्द में ऐसा मस्त होता है, फिर आपकी याद आ ही नहीं सकती न शुभ संदेश देने की आवश्यकता प्रतीत होती है। हमारे संस्कार अभी उतने ऊंचे न होने के कारण भी आपको यह संदेश दिया जा रहा है और साथ में यह भी बताया जाता है कि आप लोग जैसे हमको भूत समझ कर दूर रहना चाहते हैं, उसी प्रकार हम भी आप से दूर रहना चाहते हैं, क्योंकि अपना ही मुख तो काँच में दीख सकता हैं, किन्तु विश्व प्रेम कहता है कि किसी डर की आशंका से ऐसा करना उचित नहीं हो सकता। इससे तो अपनी कमजोरी प्रतीत होती है। ब्रह्मचारी लोगों को गृहस्थ-स्थिति का क्या अनुभव हो सकता है, जिसने शक्कर खाई न हो, वह उसका स्वाद कैसे वर्णन कर सकता है और शक्कर का छोड़ना, उसका सही क्योंकर कहा या जा सकता है। तात्पर्य यह है कि वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति के हेतु परमेश्वर ने जीव का संग पकड़ लिया, उसी प्रकार जीवात्मा को चाहिये कि वह सदैव यह समझे कि मैं परमेश्वर के साथ हूँ और वह हमेशा मेरे साथ हैं। मेरा हर कार्य वह देखता है किन्तु किसी भी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता। जीव जैसा कार्य करता है, उसका फल उसे मिलता रहता है। भाइयों! गुरु महाराज ने दिया हुआ समय पूर्ण होने को है, उससे अधिक मैं ठहर नहीं सकता। आपने मुझ पर बड़ी कृपा की, इसमें वृद्धि होती रहे, इस शुभ कामना के साथ संदेश को सम्पूर्ण करता हूँ।
जो मनुष्य अपने सुकर्मों का मूल्य चाहता है, तो जिस मनुष्य की उसने भलाई की हो, उसके लिये उसे सुखी देखने की प्रसन्नता ही पूर्ण पुरस्कार है।
-वियोगी हरि।
(ले.श्री मुरलीधर प्रसादसिंह ‘मदन’ सैदपुरी)
मैं अन्दाजन अठारह-उन्नीस वर्ष का हूँगा। उस समय मैं मैट्रिकुलेशन में छपरे पढ़ता था। वहीं अपने स्कूल के छात्रावास में तीव्र ज्वर से पीड़ित हो गया। तीन-चार रोज तक बुखार में बेहोश पड़ा रहा। उसके बाद ज्वर कुछ उतरा और मुझे पथ्य मिला। पथ्य मिलते ही मैं घर के लिये रवाना हुआ। घर पहुँचने पर एक दो दिन के बाद फिर ज्वर हो आया। ज्वर जल्दी हटता नहीं था। कई दिन बीत गये। अपने अध्ययन में अधिक बाधा देख तबियत बेचैन होने लगी। अपने वस्त्र बदल कर श्री कृष्ण जी की प्रार्थना करने लगा। प्रार्थना मैंने लगभग पन्द्रह मिनट तक की। प्रार्थना से मैंने श्री कृष्णचन्द्र जी से याचना की कि ज्वर मेरा जल्दी हट जाय और मेरे कर्म का भोग्य अभी बाकी हो, तो स्कूल से अवकाश मिलने पर मेरे कर्त्तव्य के भोग्यानुसार ज्वर-यातना मुझे मिले। प्रार्थना करने के बाद से धीरे-2 ज्वर मेरा कम होने लगा और दूसरे दिन बुखार एकदम गायब हो गया। स्वस्थ होने पर अध्ययनार्थ मैं छपरे चला गया। पुनः ग्रीष्मावकाश में कठिन-ज्वर से पीड़ित हुआ। एक सप्ताह बाद अपने आप बुखार उतर गया और मैं चंगा हो गया।
(श्री ‘लक्षमनजी’, मैनपुरी)
नगर कीर्तन का जुलूस स्थानीय श्री एक रसानंद आश्रम से गाँधी पार्क तक आ गया था। उत्सव का दृश्य बड़ा ही मनोहर था। सब से आगे श्री स्वामी नारदानन्दजी की सवारी थी। पीछे-पीछे अनेक महात्माओं की सवारियाँ थी। इसी पावन समय में अचानक एक हाथी जिस पर श्री स्वामी जी बैठे हुए थे, बिगड़ गया और चिंघाड़ मारने लगा। चिंघाड़ का शब्द सुनते ही गाड़ियों में जुते हुये भैंसे हजारों मनुष्यों की भीड़ में भागने लगे। दर्शकों की घबराहट का ठिकाना न था। हर एक व्यक्ति यही सोच रहा था कि न जाने क्या आपत्ति आवेगी, कितने मरेंगे और न जाने कितने घायल होंगे।
“धर्म की जय” के चारों ओर नारे लग रहे थे। परमात्मा से सभी की यह प्रार्थना थी कि हे भगवान्! किसी प्रकार इस संकट का निवारण हो जाय।
अव्यवस्था कुछ देर में शान्त हो गई, गड़बड़ पर काबू प्राप्त कर लिया गया। पता लगाया कि इस दुर्घटना में कितने मरे और कितने घायल हुए, तो पता चला कि न तो एक भी मरा है और न एक भी घायल हुआ है। इस सुसम्वाद से उपस्थित जनता को बहुत आनन्द हुआ और सभी को यह विश्वास हो गया कि “धर्म की जय’ होती है।
जिस मनुष्य की अच्छे कर्म के लिए निन्दा होती हैं, वह बड़ा भाग्यवान् है। किन्तु जो अपने भले कर्मों के बदले में धन्यवाद या किसी फल की आशा करता है, वह महा अभागा है।
(श्री सत्यप्रकाश जी बंसल, हापुड़)
आयरलैण्ड के महात्मा गोल्डस्मिथ अपनी उदारता और दयालुता के लिए प्रसिद्ध थे। अनेक दीन-दुःखियों को उनके द्वारा गुप्त सहायता प्राप्त होती रहती थी।
एक दिन एक गरीब स्त्री जिसका पति और पुत्र बीमार पड़ा था, बहुत दुखी हुई। घर में अन्न का एक दाना तक न था। बीमारी अच्छी हो चली थी, पर पथ्य के लिए दूध तक का कोई प्रबन्ध न था। पड़ोसियों ने बताया कि इस प्रकार के प्रसंगों में गोल्डस्मिथ नाम के हकीम बड़ा ही अच्छा इलाज करते हैं।
स्त्री गोल्डस्मिथ के पास पहुँची और कहा-हकीम जी! मेरे घर में बीमारी है, कृपा करके उन्हें देखकर दवा दारु कर दीजिए। गोल्डस्मिथ बड़े आदमी थे, पर ये बिना किसी घमंड के उस स्त्री के साथ चल दिये। देखा कि टूटी-फूटी झोपड़ी में यह दुखी परिवार दरिद्रता के कारण नाना प्रकार के कष्ट उठा रहा है। उनका हृदय दया से भर गया। उनने इन दुखियों से कहा-मेरा आदमी खुद आकर तुम्हें दवा दे जायगा।
दो घंटे बाद गोल्डस्मिथ का नौकर दवा की एक छोटी डिबिया स्त्री को दे गया। उसके ऊपर एक कागज चिपका हुआ था, “जरूरत के मुताबिक इस दवा को काम में लाइये।” घर के तीनों व्यक्ति उत्सुकता से उस डिब्बी को देखने लगे। खोली तो उसमें दस गिन्नियाँ रखी हुई थी। सब के चेहरे पर प्रसन्नता दौड़ गई। इस पैसे से उनने अपना स्वास्थ्य पाया और व्यापार किया। कुछ दिन में वे लोग बड़े धनवान हो गये।
उस परिवार ने अपनी पुरानी टूटी झोपड़ी को सुरक्षित रखा और पास ही एक बहुत बड़ा महल बनवाया। उन दोनों के बीच में महात्मा गोल्डस्मिथ की मध्य मूर्ति और दस गिन्नियों की डिब्बी अत्यन्त सुन्दर भव्य मन्दिर में प्रदर्शनार्थ रखी गई। झोपड़ी पर लिखा हुआ था-”गोल्डस्मिथ की दवा खाने से पहले।” महल के दरवाजे पर लिखा हुआ था-”गोल्डस्मिथ की दवा खाने के बाद।” बीच में वह दवा की डिब्बी रखी हुई थी जिसमें दस गिन्नियाँ थी।
आयरलैण्ड के उस स्थान को देखने के लिए हर साल हजारों यात्री दूर-दूर से जाते हैं और अनुभव करते हैं कि एक महात्मा की छोटी सी सहायता से व्यक्तियों का कितना कल्याण होता है और वह उदारता किसी प्रकार अनन्त काल के लिये उसका सच्चा स्मारक बन जाती है।
सूखे पेड़ धैर्य रखने से हरे भरे हो जाते हैं। अधीर कुत्ता मारा-मारा फिरता है, पर धैर्यमान हाथी मन भर भोजन पाता है। सफलता का सब से बड़ा साधन धैर्य है इसे कभी मत भूलो।
-भर्तृहरि।
(श्री मंगलचन्द भंडारी, अजमेर)
गत जनवरी मास की बात है, मैं अखण्ड ज्योति कार्यालय मथुरा से विदा होकर अजमेर आ रहा था। रेल में ज्यादा भीड़ थी, प्रायः आगे से ज्यादा यात्री खड़े-खड़े ही आ रहे थे। इसी तरह मुझे भी बैठने को स्थान न मिला और खड़ा ही रहना पड़ा। जबकि हम सब खड़े-खड़े ही आ रहे थे एक आदमी उस डिब्बे की एक सीट को घेरे हुए पड़ा था। बड़े रौब से सो रहा था, कोई उठाता और पैर समेटने के लिये कहता तो वह बहुत बिगड़ता और बुरी तरह फटकार लगा देता। यात्री चुप हो जाते। कई स्टेशनों तक यह हालत जारी रही।
आगे चलकर डिब्बे में टिकट चैकर महोदय आये। सब के टिकट जाँचते-2 वे उसके पास भी पहुँचे और सोते से जगा कर टिकट माँगा। टिकट उन हजरत के पास था नहीं, इधर-उधर की बातें बनाने लगे। छह आदमियों की जगह पर सोकर बिना टिकट चलने वाले इस बदमाश की हरकत पर चैकर बाबू को बड़ा गुस्सा आया, उनने सबके सामने उसकी करारी मरम्मत कराई और जेल में भेजने के लिये पुलिस के हवाले कर दिया।
उस घटना ने मुझे एक मनोवैज्ञानिक रहस्य सिखाया, वह यह कि जो ज्यादा अकड़ता है और सब से टेढ़ा-टेढ़ा बोलता है, समझना चाहियें कि इसके अन्दर चोरियाँ और बदमाशियाँ भरी हुई हैं और पेट में भरे हुए उन्हीं सड़े हुए दुर्गुणों की बदबू रूपी कटु शब्द उसके मुख में से निकल रहे हैं। सज्जन पुरुष सदैव नम्रतापूर्वक व्यवहार करते हैं।
(श्री सोमनाथ जी नागर, मथुरा)
एक बार जब मैं लगभग 12 वर्ष का था, अपने ताऊ जी के यहाँ अजमेर गया हुआ था। एक दिन ताऊ जी के साथ स्टेशन पर गया। ताऊ जी किसी कार्यवश वहाँ रह गये और मुझ से घर लौटने को कहा। वहाँ से लौट कर मैं आ रहा था कि बड़े डाकखाने के सामने के तिराहे से मार्ग भूल कर दूसरी सड़क पर चल दिया। दस-पाँच कदम ही आगे बढ़ा था कि मुझे एक आवाज मालूम पड़ी कि मेरी मातृ भाषा (गुजराती) में कोई कह रहा है- ‘अरे तिमने क्या जाय छै’ (अरे उधर कहाँ जाता है)। मैंने मुड़ कर देखा, कोई नहीं था, मेरी भूल मुझे मालूम पड़ी और वापिस तिराहे पर आकर अपने घर आ गया। रास्ते में इस पर विचार किया और अब तक अनुभव करता हूँ कि वह ईश्वर की आवाज थी।
भूले हुए लोगों को सन्मार्ग पर लाने के लिए ऐसी ही आकाशवाणी ईश्वर हर एक के लिए किया करता है, किन्तु कैसे दुःख की बात है कि लोग उस पर ध्यान न देकर उलटे मार्ग पर ही चलते जा रहे हैं।
(ले.-राजकुमार हरभगत सिंह जी भंडरा, स्टेट)
मेरा अटल विश्वास है कि जहाँ धर्म है, वहाँ यश है, जहाँ अधर्म है, वह क्षय है। मेरे जिले में कई दैवी संपत्तियां हैं, जो सत् पर आरुढ़ रह कर अपना वैभव बढ़ा चुके हैं तथा बढ़ा रहे हैं। इसी तरह अधर्म से नाश होता हुआ भी देखता हूँ। मेरी 43 वर्ष की आयु इस संसार में गत हो चुकी है। बचपन से ही सत्संगति में रहा। मैट्रिक में पढ़ता था, तब भी अच्छी संगति थी। मादक द्रव्यों की बात तो दूर, कभी पान, तम्बाकू तक का भी सेवन नहीं करता। प्रातः चार बजे उठना, ईश्वर भजन में लीन हो जाना, सूर्योदय से पूर्व नदी पर स्नान के लिए पहुँचना और आसन, प्राणायाम, हवन, जप आदि से निवृत्त होकर 8 बजे घर आना और गृह कार्यों में लग जाना। दोपहर को आधे घन्टे और शाम को ढाई घंटे फिर भजन करना। रात को सामूहिक प्रार्थना करना, यह मेरा नित्य नियम है। 12 साल से यह कार्यक्रम नियमित रूप से चल रहा है।
नियमित धार्मिक कार्यों का अत्युत्तम फल में सदैव अनुभव करता हूँ। आपत्तियाँ, कष्ट और चिन्ताओं से मैं बचा रहता हूँ। सभी कार्य यथाविधि सरलतापूर्वक चलते रहते हैं। चारों ओर दिव्य आनन्द की लहरें दौड़ती दृष्टिगोचर होती है। दुख रूप असत्य का परित्याग कर देने से सुखरूप सत्य शेष रह जाता है। जो सत्य धर्म पर आरुढ़ हैं, ईश्वर उनके लिए सुख−शांति की व्यवस्था करता है। इस सिद्धान्त पर विश्वास करता हुआ मैं उसकी सचाई का पूरी तरह अनुभव करता हूँ।
(पं. श्रीशंकर लाल जी व्यास ‘महेश’ कविरत्न)
एक बार मैं घोड़े की सवारी से किसी गाँव को जा रहा था, रात्रि हो जाने से रास्ता भूलकर एक बीहड़ जंगल में फंस गया। उस घने अन्धकार में यत्र-तत्र शृंगाल, भालू आदि जंगली जानवरों के शब्द सुनाई देने लगे।
दिशा-भूल होने से मार्ग सूझ नहीं पड़ता था, घोड़े से उतर कर उसकी बागडोर हाथ में ले पैदल ही पैदल रास्ता तय करता हुआ भ्रमण करने लगा। कोसो फिरने पर भी पगडंडी का कोई पता नहीं चलता था और न किसी गाँव का चिन्ह ही कहीं प्रतीत होता था। जिधर देखो उधर जंगल ही जंगल दिखाई देता था। आगे चला तो एक गहरा नाला सामने आ गया जिसमें जल की सनसनाती हुई तीव्र धारा बह रही थी। सब प्रकार हताश होकर वहीं बैठ गया और प्रभु की प्रार्थना करने लगा।
ऐसे घोर समय में निराशा को चीरती हुई आशा की एक किरण दिखाई दी। कुछ दूरी पर अचानक मोटर की सर्च लाइट जैसी रोशनी चमकी और फिर वह विलुप्त हो गई। मैं उठ खड़ा हुआ और उसी ओर चल दिया। देखा तो वहीं से सड़क जा रही है, मैं उस पर चलकर अपने गाँव पहुँच गया। तब मैंने समझा कि पथ भूले मानवों को सन्मार्ग पर लाने वाली दैवी सहायता अवश्य प्राप्त होती है।
क्रोध से विक्षुब्ध होने पर दांतों को पीस, पैरों को पटक तथा शरीर को कम्पित कर अपनी आत्मा को शाँति देने का प्रयास शाँति नहीं है, क्रोध का संताप है। उनके लिये उदारता ही प्रशान्त सागर है, जो अशुद्ध जल को भी अपने में मिलाकर शुद्ध कर देता है।
-स्वामी रामतीर्थ।
(डॉ. रामकरन सिंहजी वैद्य, जफारपुर)
मैं कुछ दिनों तक बुरी वासनाओं में पड़ कर भटकता रहा, दैवयोग से मेरे यहाँ एक महात्मा का आगमन हुआ। उन्होंने मेरे आत्मा का सारा भेद इस भाँति मुझ से कहा कि मेरा हृदय कम्पित हो गया। मैंने उनके चरणों में गिर कर अपने इन पापों के उद्धार का उपाय पूछा। उन्होंने मुझे धर्म पर चलने और ईश्वर का भजन करने का उपदेश दिया। मैं तब से उसी के अनुसार आचरण कर रहा हूँ।
कुछ दिनों पश्चात् मेरे कर्त्तव्य में फिर कुछ ढिलाई आने लगी। इसी समय एक घटना ने मुझे सचेत कर फिर ठीक मार्ग पर लगा दिया। वह घटना सन 1939 में हुई। मैं अकेला रात के समय एक स्थान से आ रहा था कि अचानक सामने किसी ने आकर कहा-”ठहरो, मैं भी साथ चलूँगा।” आँख उठाकर देखा तो सामने करीब 10 गज लम्बा काले वर्ण का एक भयंकर मनुष्य खड़ा था। उसे देखकर मैं घबराया और आंखें बन्द कर के वहीं बैठ गया एवं गायत्री मन्त्र का जप करने लगा। दस मिनट बाद मैंने आंखें खोली, तो देखा वही महात्मा जी सामने खड़े हँस रहे हैं। उनको देख कर मुझे धैर्य बँधा और चरण पकड़ कर पूछने लगा कि-”प्रभो! यह क्या भयानक दृश्य प्रकट हुआ, इसका भेद मुझे बतलाइये?” महात्माजी ने कहा-”बेटा! यह जो काली मूर्ति तुझे दिखाई दी यह पाप था, मैं धर्म हूँ। तेरा मन फिर नीचे गिर रहा था, इसलिए पाप ने प्रकट होकर इच्छा प्रकट की कि मैं तेरे साथ चलूँगा। किन्तु तूने मुझ धर्म का स्मरण किया, इसलिए तेरे सामने खड़ा हूँ और बारबार समझाता हूँ कि, पाप के पंजे से बच, यह बड़ा भयंकर है। जिसके साथ यह हो लेता है, उसका सर्वनाश करके ही छोड़ता है।” इतना कह कर वे अदृश्य हो गये। मैं भयभीत और घबराया हुआ भागा, पीछे मुड़ कर देखने की हिम्मत न होती थी, डेढ़ फर्लांग रास्ता जैसे-तैसे पार कर के गाँव में पहुँचा।
तब से मैं बहुत सावधान हूँ और पाप से बचता हुआ, धर्म मार्ग पर चलने का निरन्तर प्रयत्न करता रहता हूँ।
(श्री सच्चिदानन्द मिश्रा, जमालपुर)
करीब आठ-दस वर्ष की बात है। एक संभ्रांत कुल की कन्या की शादी हुई। पतिगृह जाते समय उसके पास यथेष्ट आभूषण नहीं थे। समय के फेर से उस समय उसके घर की हालत अच्छी नहीं थी। उसके मकान के बगल में ही एक मुन्शीजी का मकान था। बगल में रहने से काफी घनिष्ठता हो गई थी। मुन्शीजी बड़े ही उदार हृदय के थे, उनकी पत्नी भी वैसी ही थी। कन्या का पिता मुन्शीजी के घर गया। उसने उनके सामने अपनी फरियाद पेश की। इज्जत की बात थी, बिना कुछ आना-कानी किये, मुन्शी जी ने अपनी स्त्री के आभूषण उन्हें दे दिये। उन्हें पहना कर कन्या को पति-गृह भेज दिया गया।
करीब तीन महीने बाद वह पतिगृह से लौटी। वह सभी लोगों से भेंट करने के पश्चात् मुन्शी जी के घर भी गई। कुशल मंगल पूछने के पश्चात् मुन्शी जी की पत्नी ने अपने आभूषणों की इच्छा प्रकट की। पर लड़की ने देने से इन्कार कर दिया। मुन्शी जी की पत्नी को यह बहुत बुरा मालूम हुआ। उन्होंने क्रोध में आकर बलपूर्वक अपने आभूषण छीन लिए। बात आगे बढ़ी। लड़की ने प्रतिकार लेने की ठानी। उसका पिता अफीम सेवन करता था। एक दिन मौका देखकर उसने मुन्शी जी के पाँच छः वर्षीय लड़के को मिठाई में मिला कर अफीम खिला दी। थोड़ी ही देर में उसकी हालत खराब होने लगी। बच्चे को अस्पताल में भरती कराया गया। बचने की कोई आशा न थी। बहुत उपचार करने पर वह होश में आया। पूछे जाने पर उसने सच्ची-सच्ची बातें कह दी। मामला संगीन हो गया। पुलिस कन्या को गिरफ्तार करने के लिए उसके मकान पर पहुँची, कन्या के पिता ने गिड़गिड़ाते हुए मुन्शी जी के सामने करबद्ध प्रार्थना की कि किसी प्रकार हमारे कुल की लाज बचा लीजिए। साधु हृदय मुन्शी जी ने झूठा बयान लिखा कर मामले को शान्त करा दिया।
थोड़े दिन बाद उस लड़की को एक सन्तान हुई, किन्तु वह कुछ ही दिन जीवित रह कर मर गई। इसके बाद उसके माँ बाप की मृत्यु हुई। अन्त में वह स्वयं भी इस लोक की लीला समाप्त कर निम्न पंक्ति को अक्षरशः चरितार्थ करते हुए सदा के लिए चली गई-
“रहा न कुल कोउ रोवन हारा”।
उसी समय से हमारी यह धारणा पक्की हो गई कि दुनिया की कोई भी शक्ति अधर्म के बल पर किसी को सताती है, तो देवी कोप से जल कर वह स्वयं भी सदा के लिए मिट जाती है।
(डॉ. शिवरत्नलालजी त्रिपाठी, गोला गोकरननाथ)
गोला गोकरननाथ से चार मील दूरी पर एक ऐसे पुरुष रहते हैं, जो पूरे कानून के पुतले हैं। पढ़े-लिखे तो नाम मात्र के हैं, पर वकील भी उनकी कानून दानी से घबराते हैं। जन्म भर यही काम रहा कि चलते-फिरते लोगों को फँसा देना, झूठा मुकदमा कायम करा देना, जाली कागजात लिखवा देना इत्यादि। फलस्वरूप पिछले साल इनकी स्त्री गत हो गई। भाई मर गया, लड़के का एक पैर काट डाला गया, सम्पत्ति नष्ट हो गई, वे इस समय महान दुःखी जीवन व्यतीत करते हुए, यह कहावत चरितार्थ कर रहे हैं:-
“जो काहू कलपाइ है, सो कैसे कल पाहि।”
(2)
मेरे एक मित्र ने मुझ से अपनी राम कहानी कही कि-”लड़कपन में मेरी शादी एक अच्छे खानदान में सुशील कन्या के साथ हुई थी। मैंने उसकी कदर न करके उसे त्याग दिया। फिर मेरा दूसरा विवाह भी न हुआ। अन्त में एक बदसूरत नाक कटी स्त्री मिली। अब उसके तीन लड़के तथा एक लड़की है, मगर वह अब भी किसी सूरत में भी मेरे काबू में नहीं आती है। न लड़कों को पढ़ने के लिए जाने देती है न किसी मेहमान को घर में दाखिल होने देती है। मैं सख्त परेशान हूँ, न दिन को चैन न रात को। कभी-कभी तो खुदकुशी करने की इच्छा होती है, पर यही सोच कर रुक जाता हूँ कि पूर्व पत्नी को निर्दोष होते हुए भी त्याग देने का ईश्वर मुझे दण्ड दे रहे हैं। मुझे यह भोगना ही पड़ेगा।”
(श्री ‘अमर जी’ तालबेहट)
बचपन से ही मैं सोचा करता था कि मैं विद्वान और धर्म प्रचारक बनूँगा। वे विचार धीरे-धीरे दृढ़ होते गये। विद्या पढ़ने में अत्यधिक रुचि रहती, विद्वान बनने की तीव्र लालसा से अध्ययन में अत्यधिक श्रम करने लगा। सुना करता था कि ईश्वर सच्ची लगन को पूरा कर देते हैं। रामायण में पढ़ा था कि “जेहि कर जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलत न कछु सन्देहू।” परन्तु अपनी तत्कालीन परिस्थितियों के कारण मन में यह आशंका उठती रहती कि न जाने सफल हो सकूँगा या नहीं।
अब मैं युवावस्था में पदार्पण कर रहा हूँ और देखता हूँ कि बचपन की अभिलाषाएं सफल होने जा रही हैं। हिन्दी और संस्कृत का माध्यामिक अभ्यास कर चुका हूँ। पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कविताएं बराबर प्रकाशित होते रहते हैं। ज्ञान का प्रकाश दिन-दिन बढ़ता जाता है। गत वर्ष एक हारमोनियम खरीद लिया है। बजाने का अभ्यास चल रहा है। दिखाई पड़ता है कि निकट भविष्य में धर्म प्रचार करने का कार्य-क्रम बनेगा।
संस्कृत विद्यालय पिछले दिनों से बिना किसी आर्थिक सहायता के चल रहा है। अन्य प्रगतियाँ भी यथाविधि जारी है है। मुझे प्रोत्साहित करने वाले साधन इन विकट परिस्थितियों में भी कहीं न कहीं से जुट ही जाते हैं। इससे प्रतीत होता है कि ईश्वर मेरी बचपन की मनोवाँछाओं का पूरा करने वाले हैं। मेरा यह विश्वास दिन-दिन दृढ़ होता जाता है कि सच्ची लगन की पूर्ति अवश्य ही होकर रहती है।
(श्री स्वामी विवेकानन्द जी महाराज)
एक बार मैं अमेरिका की एक सड़क पर जा रहा था तो, एक सभ्य पुरुष ने छड़ी से मेरा साफा उछाल दिया। मैंने उनसे पूछा- ‘आप जैसे सभ्य पुरुष ने यह कष्ट क्यों उठाया? उसने कहा-’भला, आपने यह विचित्र वेश क्यों धारण किया है? मैंने उत्तर दिया-’मैं बहुत दिनों से इस देश की सभ्यता की प्रशंसा सुनता था, इसी से इसको देखने की इच्छा से आया था, यहाँ की सभ्यता का पहला पाठ आपने मुझे पढ़ाया। इस पर वह सज्जन बहुत लज्जित हुए और अपनी गलती पर खेद प्रकट करते हुए क्षमा माँगने लगे।
गलती करने वाले पर एक दम आग बबूला हो जाने की अपेक्षा यदि नम्रता, धैर्य और गम्भीरता पूर्वक उसे समझाया जाय तो उसका हृदय परिवर्तन कराया जा सकता है।
(ऋषिकल्प दादा भाई नौरोजी)
भोजन के अनन्तर मुझे थोड़ी शराब पीने की पुरानी आदत थी, एक दिन भोजन से उठने पर मैंने देखा कि घर में शराब नहीं है। इसलिए दुकान से शराब लेने चला। पर दुकान पर पहुँचते ही मुझे बड़ी लज्जा मालूम हुई कि एक निंद्य पदार्थ की आदत का इतना गुलाम हो गया हूँ। उसी समय मैंने शराब न पीने की प्रतिज्ञा की और फिर कभी उसे छुआ तक नहीं।
(स्व. श्री ईश्वरचन्द्र जी विद्यासागर)
एक सज्जन हाथ में छोटा सा बैग लिए हुए कुली की तलाश कर रहे थे, कोई कुली न मिला, तो उन्होंने मुझे मामूली पोशाक का व्यक्ति समझ कर पुकारा और कहा-”हमारा सामान ले चलेगा?” मैंने बिना कुछ कहे उसका बैग सिर पर रख लिया। उन्होंने कहा, हमें-”ईश्वर चन्द्र विद्या सागर के घर जाना है। तूने उनका घर देखा है?” मैंने कहा-हाँ बाबू जी देखा है, मैं आपको वहीं पहुँचा दूँगा। जब मैं उन्हें ले आया, तो चार पैसे हाथ पर रखते हुए कहा- ले यह तेरी मजदूरी है। अब जरा विद्यासागर जी को घर से बुला दे। मैंने उनके पैसे वापिस कर दिये और कहा-बाबू जी मुझे ही-ईश्वर-चन्द्र विद्या सागर’ कहते हैं। इतना सुन कर वह बहुत लज्जित होने लगे और क्षमा माँगने लगे। मैंने कहा-इसमें क्षमा माँगने की क्या बात है। मेरा बड़प्पन तो सादगी में ही है।
-उदयपुर के महाराजा साहब ने मुझसे कहा-”स्वामी जी, आप मूर्ति पूजा का खण्डन छोड़ दें और यहाँ की महादेव जी की गद्दी के महन्त बन जावें। इस गद्दी की लाखों रुपये की सम्पत्ति है।” मैंने हँस कर उत्तर दिया-”राजन, आप कहते हैं, सो तो ठीक है। पर मेरे सिद्धान्त और स्वतन्त्र विचार पैसे के ऊपर निछावर नहीं हो सकते। मेरे जीवन का उद्देश्य महन्तों की गद्दी को हटाना है न कि महन्त बनना।”
-महर्षि स्वामी दयानन्द जी सरस्वती।
जो आत्मा पर विजय पाता है और इच्छाओं, भय और क्रोध का दमन करता है, वहीं सबसे अधिक बलशाली है।
-अफलातून।
(ले.-श्री रामकृष्ण जी परमहंस)
मेरी स्त्री को मेरे संन्यासी हो जाने से रंज हुआ और वह तीस चालीस मील पैदल चलकर दक्षिणेश्वर मेरे पास आई। मैंने उसका बड़े भक्ति भाव से आदर किया और उसके चरणों पर गिर कर कर कहा-”माता! तुम्हारा पति राम-कृष्ण तो मर गया। यह नवीन रामकृष्ण है, जो संसार की समस्त स्त्रियों को माता समझता है।” स्त्री पर मेरे हृदय गत भावों का सच्चा प्रभाव पड़ा। वह बोली-”मेरी भी यही इच्छा है कि मैं अपने को आपके अनुरूप बनाने का प्रयत्न करूं। मैं केवल यही चाहती हूँ कि आपकी सेवा में और ईश्वर भजन में अपना काल यापन करूं।” वह मुझे गुरु भाव से मानती हुई मन्दिर में रहने लगी। हम दोनों की यह भली भाँति समझ में आ गया कि दृष्टिकोण में परिवर्तन हो जाने से मनुष्य की मृत्यु होकर नवीन जन्म होता है, भले ही पुराना शरीर जीवित बना रहे।
-मेरा मजहब हक परस्ती (स्वत्व पूजा) है। मेरी मिल्लत कौम परस्ती है। मेरी इबादत खलक परस्ती है। मेरी अदालत, मेरा अन्तःकरण है। मेरी जायदाद, मेरी कलम है। मेरा मन्दिर मेरा दिल है। मेरी उमंगे सदा जवान है।
-पंजाब केशरी लाला लाजपतराय।
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यथार्थ विजय आत्मा पर विजय पाना है। और उसके बिना विजयी मनुष्य केवल दूसरे प्रकार का दास ही है।
-सेन्टपाल।
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जिस क्षण कोई मनुष्य दासत्व ग्रहण करता है, उसी क्षण उसकी आधी योग्यता नष्ट हो जाती है।
-मेक्स्विनी।
(सतयुग से उद्धृत)
(1)
वर्तमान काल की ग्रह गणना से ज्ञान होता है कि संसार में विनाश काल उपस्थित होने वाला है। आकाश में जैसी ग्रह स्थिति 5000 वर्ष पूर्व महाभारत युद्ध के महा विनाश से पूर्व आई थी, वैसी ही अब उपस्थित हो रही है। अर्थात् इसी आषाढ़ मास में शनि द्वारा रोहिणी शकट का भेदन, श्रावण कृष्णा अमावस्या से भाद्रपद कृष्ण अमावस्या पर्यन्त एक मास में सूर्य चन्द्र के 3 ग्रहण और आगे आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष की अमावस्याओं को पाँच-पाँच ग्रह एकत्र हो रहे हैं। नभमंडल में होने वाले इन ग्रह नक्षत्र जन्य उत्पातों के परिणाम से स्पष्ट ज्ञात होता है कि समस्त संसार में घनघोर संग्राम, महामारी, भूकम्प, अनावृष्टि, अतिवृष्टि, दुर्भिक्ष आदि भाँति-भाँति के संकटों से असंख्य प्राणी काल के गाल में समा जावेंगे। भौतिक विज्ञान के विनाश की यह पूर्व सूचना है।
जिन-जिन देशों में यह ग्रहण दृष्टिगोचर होंगे, उन-उन देशों में अत्यन्त अनिष्ट फल दिखाई देगा। राजनीति में विलक्षण रीति से उलट फेर हो, प्रजा सत्तात्मक राज्य स्थापित करने के लिये जनता का विशेष आग्रह हो, संसार में षड़यन्त्र, हत्या, उत्पन्न हों, पन्द्रह दिन के अन्तर से एक साथ तीन ग्रहणों का होना समस्त संसार के लिए ही महान अनिष्टसूचक है।
-ज्योतिषी हरदेव शर्मा त्रिवेदी, सोलन
(2)
रोहिणी शकट भेद योग वैसे तो शनि के एक राशिचक्र के परिभ्रमण में आ जाता है, परन्तु जिस प्रकार राहु के सहयोग की इसमें आवश्यकता होती है, वह प्रायः संगति न होने के कारण जो भीषणता-जैसा रौद्र रूप इसमें होना चाहिये वह नहीं होता। इस बार के शकट भेदन में जो भीषणता है वह भयानक है। दुर्भाग्यवश राहु का सहयोग भी उसमें हो गया है और इसी के निकट लगे हुए 2-3 ग्रहणों का लगातार आ जाना तथा अक्टूबर में पाँच छः ग्रहों का समागम हो जाना असाधारण चिन्ताजनक वातावरण का उत्पादक है। इन योगों का परिणाम जगत भर में होगा, खास कर ग्रहणों का दुष्परिणाम तो विदेशों में ही अधिक होगा। रोहिणी शकट भेद संसार के लिये दुष्परिणामकारी है, इसलिये इसका फल तो ग्रहणों के साथ और भी अत्यन्त कटु हो जायगा।
खगोलिक परिवर्तनों के महान परिणाम प्रदर्शक आचार्य बाराहमिहिर तो इस महान कुयोग के लिए बारह साल तक बारिश न होने की भयानक बात कह डालते हैं और समस्त भूमंडल को राख की ढेरी से भरा, हड्डियों के पर्वतों से व्याप्त हो जाने की सूचना करते हैं। श्मशान की तरह जगत भर में औघड़ों का साम्राज्य हो जायगा, यह उनका अभिमत है। सागर अपनी मर्यादा को लाँघ कर प्रलयंकर बन जायगा। इस प्रकार इस दृष्टि से समुद्रों में अरबों समयों की सम्पत्ति समाप्त हो रही है और लाखों के प्राणों की जल समाधि भी। किन्तु यह तो केवल शनि के कारण ही होती रही है। जब शनि को लेकर यह रोहिणी शकट भेद योग आ रहा है, तब भविष्य कथन के लिये कल्पना की गति कुण्ठित ही समझिये। भीषणता के स्वरूप को समझना भी सहज संभव नहीं है।
अक्टूबर में जिस समय पाँच-छः ग्रहों की युति होने जा रही है, तब तक शायद भारतवासी बौद्धिक कल्पना तरंगों पर और इधर-उधर विहार कर लें किन्तु अक्टूबर से भारत में भी शिव का प्रलयंकर रौद्र रूप अकल्पित और आकस्मिक प्रकट होगा और उसकी लपटों से खून की नदियाँ, नर कंकालों के पर्वत और भस्म भार दबे हुए वैभवपूर्ण नगर प्रसाद फर जन पद हो जायं तो आश्चर्य का कारण ही नहीं। ज्योतिष की शास्त्रीयता पर अविश्वास रखने वाले अविश्वास को और भी दृढ़ करके भावी विधानों की इन पूर्व सूचनाओं को नोट कर रखें।
-ज्योतिर्विद् पं. सूर्यनारायण व्यास, उज्जैन।
(श्री दरबारीलाल जी ‘सत्य भक्त’)
सागर पाठशाला में चौके का विचार तो रखा जाता था, जो कि थोड़ा बहुत समझ में आता था, पर वहाँ जो ब्राह्मण अध्यापक थे उनका चौका पंथ बिलकुल समझ में नहीं आता था। हमारे नैयायिक जी मैथुल देश के निवासी थे। वहाँ ब्राह्मण लोग माँस, मछली का शाक, केंचुए, झींगुर आदि बरसाती कीड़ों का अचार तक खाते थे। हमारे नैयायिक जी ने जलचरों के वनस्पति सूचक नाम रख छोड़े थे। जैसे मछली को वे जल सेम कहते थे। इसी प्रकार जल तोरई, जल ककड़ी आदि बहुत से नाम थे। ऐसे सर्वभक्षी पंडित जी चौके का बड़ा विचार करते थे। मुझे कभी-कभी उनके चौके में लकड़ी ले जानी पड़ती थी। एक दिन लकड़ी ले जाते समय मेरा पैर चौके की किनार के कुछ भीतर पड़ गया। उस समय उनकी रसोई बन रही थी, पर मेरा पैर पड़ने से सब रसोई अशुद्ध हो गई। मुझे काफी गालियाँ खानी पड़ी। मुझे इन सब बातों के रंज की अपेक्षा इस बात का आश्चर्य अधिक था कि पेट में तो मुर्दा माँस तक चला जाता है, उस से मुँह और पेट अशुद्ध नहीं होता और चौके में मेरा पैर पड़ जाने से सब अशुद्ध हो गया। इतने बड़े नैयायिक जी इतना न्याय क्यों नहीं समझते?
(महात्मा टॉलस्टाय की डायरी)
जिस प्रकार मेरा जीवन व्यतीत हुआ है, उसी प्रकार अन्य बहुत से मनुष्यों का भी हुआ होगा। मैं हृदय से इस बात की खोज में था कि मैं नेक तथा अच्छा मनुष्य बनूँ किन्तु मैं युवावस्था तथा विषय−वासनाओं के आधीन था। जब मैंने दूसरों को अपने नेक बनने की हार्दिक इच्छा प्रकट की तो लोगों ने मेरी हँसी उड़ाई और मुझको घृणा की दृष्टि से देखा। किन्तु जब मैंने पाशविक वृत्तियाँ प्रकट की तो लोगों ने मेरी प्रशंसा की। मैंने साँसारिक वासनाओं विषयभोग, क्रोध, घमंड, बदला आदि का बड़ा मान देखा। जब मैंने इस विषय में अपने पूर्वजों का अनुकरण किया तो मुझे प्रतीत हुआ कि लोग मुझ से प्रसन्न हैं और मैं कोई नई या अनोखी बात नहीं कर रहा हूँ। मेरी चाची जो वास्तव में बड़ी नाजुक महिला थीं, मुझ से कहा करती थी कि मैं तुम्हारी भलाई के लिये सब से अधिक इस बात की इच्छुक हूँ कि तुम्हारा किसी विवाहित स्त्री से अनुचित सम्बन्ध हो जाय। जब मैं अपने जीवन भर के उस समय पर दृष्टि डालता हूँ तो मुझे बड़ा कष्ट तथा अत्यन्त घृणा होती है। मैंने युद्धों में नर हत्या की, जुआ खेला, दुराचारिणी स्त्रियों से सम्बन्ध रखा, लोगों को धोखा दिया, मिथ्या भाषण, लूट-मार मद्य पान, निर्दयता आदि सब कुछ किया, शायद ही संसार का कोई ऐसा बुरा कर्म होगा जो मुझसे बचा होगा। इस पर भी मैं दूसरे मनुष्यों की दृष्टि में भद्र समझा जाता था।
आसुरी शक्तियाँ जब अपने पूर्व सुकर्मों का भोग समाप्त करके नष्ट होने को होती हैं तो उनका अन्तिम समय बड़ा ही विकराल होता है। दीपक जब बुझने को होता है तो एक बार बड़े प्रबल वेग से चमकता है और फिर सदा के लिये शाँत हो जाता है। चींटी अपने अंतिम समय में पंख उपजाती है और सुदूर आकाश पर अपना आधिपत्य जमाने की इच्छा करती हुई काल के गाल में चली जाती हैं। हर वस्तु का अन्तिम समय दुखदायी होता है। खास तौर से असुर वृत्ति तो अपनी मृत्यु से पूर्व बड़ी ही विकराल हो जाती है। अन्तिम दिनों में रावण के अत्याचार असह्य हो उठे थे, उसके कर्मचारियों ने ऋषियों को मार-मार कर अस्थियों के पर्वत जमा कर दिये थे, देवताओं को बाँध बाँध कर कारागार भर दिया था। किसी की हिम्मत उसके विरुद्ध एक शब्द कहने की न थी क्योंकि बड़े-बड़े सुभट शूरमा उसके साथ थे। उसकी शक्ति को देखकर दिक्पाल काँपते थे। रावण के अन्यायों से संसार में सर्वत्र हाहाकार मच गया था। कोई भी व्यक्ति चैन से न बैठ पाता था, आशंका से सभी के हृदय हर वक्त धड़कते रहते थे।
ऐसे विकट समय में त्रेता युग के विचारवान ऋषियों का संघ एकत्रित हुआ और उद्धार का उपाय सोचने लगा। आध्यात्म दृष्टि से विचार करके सब ने निश्चय किया कि रक्त दान किये बिना इस भीषण आपत्ति का निवारण न होगा। एक घड़ा मंगाया गया। ऋषियों ने अपने अस्थि-पिंजर शरीरों में से अधिक से अधिक खून निकाला और उस घड़े को भर दिया। खून से भरा हुआ घड़ा एक खेत में गाढ़ दिया गया। कथा है कि राजा जनक ने वह खेत जोता तो वही घड़ा सीताजी के रूप में प्रकट हुआ। कुछ साल उपरान्त सीता के कारण ही वह रावण रामचन्द्रजी द्वारा समूल नाश कर दिया गया, उसकी सोने की लंका जल बल कर भस्म हो गई। कारागार से देवता मुक्त हुए और संसार को सुख शान्ति देने वाला राम राज्य स्थापित हो गया।
भारतीय तत्ववेत्ता ऋषि तपस्वी सदा से यह अनुभव करते रहे हैं कि जब असुरत्व अत्यन्त विकराल रूप धारण करके संसार को ग्रस जाने का प्रयत्न करता है, दोषी-निर्दोष का न्याय-अन्याय का विचार छोड़कर असत्य और दमन के बल पर अपनी सर्वभक्षी लालसाओं को पूर्ण करने के लिये आकुलता पर उतर आता है, तब उसका नाश बहुत ही निकट समझना चाहियें। इसी प्रकार वे ऋषि लोग यह भी अनुभव करते रहे हैं कि असुरत्व का विनाश करने के लिये रक्तदान सर्वोच्च अस्त्र है। रावण को वह रक्त का भरा हुआ घड़ा ले डूबा। वृत्तासुर का वध दधीचि ऋषि की हड्डियों के वज्र से हुआ। त्रेता के ऋषियों का सुनिश्चित मत था कि आत्मत्याग के साथ धर्म के लिए किया हुआ रक्त दान बड़े से बड़े संकट को निवारण करने की शक्ति रखता है।
तिनकों के संग्रह से बने हुए रस्से से हाथी तब बाँधे जाते हैं, मानव जाति के ऐक्य से संसार के सारे काज सरते हैं।
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चरित्र की दृढ़ता दो बातों से प्रकट होती है-इच्छा शक्ति और आत्म संयम। इसलिये इसमें दो बातों की आवश्यकता है, दृढ़ विचार और उस पर पूर्ण अधिकार।
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स्वाभिमान, आत्मज्ञान और आत्मसंयम केवल यही तीनों जीवन को उच्च बना सकते हैं।
अखण्ड ज्योति का अगला अंक दस दिन लेट निकलेगा!
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कारणवश अक्टूबर का अंक 20 ता. को न निकलकर 30 अक्टूबर को निकलेगा। पाठक नोट कर लें कि अगला अंक दस दिन लेट प्रकाशित होगा।
डाकखाने में खो जाने के कारण अंक न पहुँचने की शिकायत एक सप्ताह प्रतीक्षा करने के बाद भेजनी चाहियें। यहाँ से हम दो बार जाँच करके अंक भेजते हैं, फिर भी कभी-कभी किन्हीं सज्जनों के अंक रास्ते में खो जाते हैं। ऐसी दशा में डाकखाने के उत्तर सहित दुबारा भेजने के लिए हमें लिखना चाहिये। यदि वह अंक बचा होता है, तो हम दुबारा भी भेज देते हैं।
-सम्पादक
‘नाम-माहात्म्य’ (वाणी-अंक) श्री वृन्दावन भजनाश्रम से निकलने वाले भगवन्नाम-प्रचारक मासिक पत्र का यह पाँचवें वर्ष का विशेषाँक हैं। पत्र का वार्षिक मूल्य दो रु. है, इस अंक का मूल्य डेढ़ रु. है। इस पत्र के स्थायी सम्पादक श्री दानबिहारी-लाल शर्मा ‘शरण’ एवं श्री रामदास शास्त्री, सा. रत्न हैं। इस अंक के संपादक श्रीब्रजभूषण गनेरी वाला ‘चन्द’ हैं। इस विशेषाँक में सैकड़ों प्राचीन पूज्य महात्माओं की वाणियाँ उनकी जीवन झाँकी एवं उनके चित्र हैं। वर्तमान महात्माओं की वाणियों का भी इसमें समावेश है। गीता, पुराण, उपनिषद् आदि से वाणियों का सुन्दर संकलन हुआ है। वास्तव में यह अंक धार्मिक एवं साहित्यिक दोनों दृष्टियों से अपूर्व है। धार्मिक जनता को तो अवश्य ही इसे अपनाना चाहिये। ऐसे महंगाई के युग में इतना सुन्दर एवं उपादेय अंक निकालने के लिये सम्पादक एवं प्रकाशक बधाई के पात्र हैं। तिरंगे टाइटिल द्वारा आभूषित इस प्रायः दो सौ पृष्ठ के विशेषाँक का हम अत्यधिक प्रचार चाहते हैं।
अखंड ज्योति के ज्ञान यज्ञ में जिन महानुभावों ने निस्वार्थ भाव से ग्राहक बनाने की सहायता दी है, उनके प्रति अखंड ज्योति के कार्यकर्ता आन्तरिक कृतज्ञता प्रकट करते हैं और अन्य प्रेमीजनों से आशा करते हैं कि इस नवयुग-अनुष्ठान में अपनी शक्ति भर सहायता करें।
इस मास के सहायकों की शुभ नामावली-
(1) श्री चुन्नीलाल जी राज पुरोहित, डोमर। (2) श्री रामजीलाल शर्मा, नीमच केण्ट। (3) द्विवेदी भेरुलाल ईश्वरलाल शर्मा, धामली। (4) श्री शालीगराम रघुवरदयाल आढ़ती, तिलहर। (5) पं. चिन्तामणि पाँडेय, लखनऊ। (6) वि. रामस्वरूप जी ‘अमर’, तालवेहट। (7) पं. रामेश्वर दयाल ‘दिग्धर’ गोरमी। (8) श्री छविलाल सेठ, दमोह। (9) श्री लक्ष्मीनारायण गुप्त ‘कमलेश’ मौदहा। (10) श्री भगवानसिंह जी गौतम, अध्यापक सितलहा। (11) श्री पूर्णशंकर रावल, डूँगरपुर स्टेट। (12) श्री रामलाल जी मलिक, कराची। (13) मास्टर धनीराम जी हैड जावर, ग्वालियर। (14) श्री रूपचन्द जी हैड मास्टर मुल्तान। (15) श्री नरसिंहदास चितलाग्या, राजनाँद गाँव।
(ले-श्रीयुत अंचल)
ओ प्रकाश के पिंड! कारवाँ अन्धकार का बढ़ता!!
अपनी बाती आप जला कर तुम न मिटो एकाकी।
कोटि-कोटि मिट्टी के ये कोरे पुतले हैं बाकी!!
स्नेह भरा है, केवल तुमसे माँग रहे चिनगारी।
एक तुम्हारी भरी लपट के ये कब से अधिकारी।
इन्हें जलाओ ये अपनों का आँचल फोड़ उठें तो।
धूल और झंझा का भय क्या नव किरणें फूटें तो॥
बनें शिराएँ आज लयवती एक महाधारा सी।
तरु तरु की फुनगी-फुनगी पर शिखा लाल तारा सी॥
एक पलायन है, वे जो नीरव जलने के हामी।
और प्रगति को पूज साधना कहते वे प्रतिगामी॥
किन्तु तुम्हारी लौ युग-युग के दलित वर्ग की वाणी।
जिसकी हुँकृति में तनते चिर शोषित शापित प्राणी॥
जीकर ही क्या हुआ न यदि मानव का मूल्य बढ़ाया।
मर कर ही क्या मिला न यदि जन-जागृति ने बल पाया॥
किसी अलख प्रियतम की पूजा के उपकरण न बनकर।
आज ज्योति में ज्योति मिला तुम बनो क्राँति के रहवर॥
मूल्य उसी के बुझने का जिससे जग-जग पथ पाते।
गृद्ध वृत्ति के जगती में संपाती मिटने आते॥
वे मन्दिर के दीप उन्हें पूजा का थाल सजना।
किसी देवदासी का अर्चन पत्थर तक पहुँचाना॥
किन्तु तुम्हें मानव के दुखवे दिल में आग लगाना।
तेजी से नाशोन्मुख जग का सच्चा रूप दिखाना॥
नवयुग ये कर्तव्य तुम्हें देकर दोनों अति भारी।
महाक्राँति की आज तुम्हारे बल पर किये तयारी॥
ओ प्रकाश के पिंड! करवाँ अन्धकार का बढ़ता!!
-’विद्यार्थी’