क्या बताऊं कौन से संसार से मैं आ रहा हूँ।
जानता कुछ भी नहीं किस देश को फिर जा रहा हूँ॥
देखकर मुझ को अकेला वह अमा की रात आई।
दामिनी-कादम्बिनी के साथ वह बरसात आई॥
मधुर रस में डूब कर जब खिल गये ये कुमुद मेरे।
थिरकने-से लग गये बन बाग में के की घनेरे॥
पी रहे हैं प्राण कब से माधुरी की मधुर ज्वाला।
खेलता है वेदना से प्रेम यह कैसा निराला॥
सैर को निकला मुसाफिर प्राण का पाथेय लेकर।
बन गया बन्दी पिपासित नव सुधा का मूल्य देकर॥
प्रकृति का प्यासा पथिक बाजार में किस भाँति आया।
हास्य-क्रन्दन का गरल पीयूष का व्यापार पाया॥
नियति-परचालित तरी मँझघार में सब खेलने को।
आ गई है आज झंझाबात से हा खेलने को॥
आँख वाले पढ़ सकेंगे यह अमर इतिहास मेरा।
उधर है सन्ध्या खड़ी तो इधर है हंसता सबेरा॥
(श्री राम अयोध्या सिंह जी)
जीवन में कई अवसरों पर बड़ी विकट परिस्थितियाँ आती हैं। उनका आघात असह्य होने के कारण मनुष्य व्याकुल हो जाता है और अपनी विवशता पर रोता चिल्लाता है। प्रिय अप्रिय घटनाएं आती हैं और आती रहेंगी। जिस प्रकार वर्षा और धूप को हम नहीं रोक सकते उसी प्रकार इन्हें भी नहीं रोका जा सकता। न तो प्रिय बातों को रोक कर रखा जा सकता है और न अप्रिय को भगाया जा सकता है। राम को चौदह वर्ष बन में रहना पड़ा, सीता को विपत्ति सहनी पड़ी, हरिश्चन्द्र को चाँडाल की सेवा करनी पड़ी पाण्डव बनो में छिपते फिरे। इन महानुभावों की स्वयं अपनी बड़ी सामर्थ्य थी और उनके सहायकों, मित्रों, गुरुओं में तो और भी अधिक क्षमता थी, परन्तु वे विपत्तियाँ आईं और सहनी पड़ीं, कोई उन्हें टालने को समर्थ न हुआ।
कर्म भोग अथवा ईश्वर की इच्छा से ऐसे सुख दुख के प्रसंग हमारे जीवन में भी नित्य आते हैं। सुख पाकर हम प्रसन्न होते हैं पर दुखद अवस्थाओं में घबरा जाते हैं और किंकर्तव्यविमूढ़ होकर कभी कभी न करने योग्य कार्य कर डालते हैं। जिनका परिणाम उस मूल दुख से भी अनेक गुना दुखदायी होता है।
ऐसे अवसरों पर हमें विवेक से काम लेना चाहिए। ज्ञान के आधार पर ही हम उन अप्रिय घटनाओं के दुखद परिणाम से बच सकते हैं। ईश्वर की दयालुता पर विश्वास रखना ऐसे अवसरों पर बहुत ही उपयोगी है। हमारा ज्ञान बहुत ही स्वल्प है, इसलिए हम प्रभु की कार्य विधि का रहस्य नहीं जान पाते। जिन घटनाओं को हम आज अप्रिय देख समझ रहे हैं। वह यथार्थ में हमारे कल्याण के लिए ही होती हैं। माता बालक के फोड़े को चिरबा देती है बच्चा चिल्लाता है। पर माता उसका हित इसी में समझती है। बच्चा इसे नहीं समझता, वह माता पर कुपित होता है और घबरा जाता है, परन्तु माता यदि वैसा न करवाती तो वह तत्वतः बालक का हित नहीं करती।
हमें समझ लेना चाहिए कि अपने मोटे और अधूरे ज्ञान के आधार पर परिस्थितियों का असली हेतु नहीं जान पाते तो भी उसमें कुछ न कुछ हमारा हित अवश्य छिपा होगा, जिसे हम समझ नहीं पाते ! कष्टों के समय हमें ईश्वर की न्यायपरायणता और दयालुता पर अधिकाधिक विश्वास करना चाहिए। इससे हम घबराते नहीं और उस विपत्ति के हटने तक धैर्य धारण किये रहते हैं। “संतोष” करने का शास्त्रीय उपदेश ऐसे ही समयों के लिए है। कर्तव्य करने में प्रमाद करना संतोष नहीं वरन् आई हुई परिस्थितियों में विचलित न होना संतोष है। संतोष के आधार पर कठिन प्रसंगों का आधा भाग हलका हो जाता है।
आज चतुर्मुखी विपत्तियाँ हमारे चारों ओर छाई हुई हैं। इस अवसर पर व्याकुल होना घबराना धैर्य छोड़ना, चिंतित एवं दुखी होना उचित नहीं। दयामय प्रभु इस विषय वेदना के गर्भ में से सुख शान्तिमय अमृत पुत्र का नव युग का जन्म करेंगे। यह आशा करते हुए विपत्ति में भी संतोष करना चाहिए और अपने कर्तव्य धर्म पर दृढ़तापूर्वक अड़ा रहना चाहिए।
(योगी अरविन्द घोष)
हमारी भुजाओं में बल नहीं, हमारे पास युद्ध की सामग्री नहीं, शिक्षा नहीं; फिर हम किसकी आशा करें ? कहाँ वह बल है जिसके भरोसे हम लोग प्रबल शिक्षित यूरोपीय जाति को असाध्य को साधने के प्रयासी होंगे? पण्डित और विज्ञ पुरुष कहते हैं कि यह बालक की महान् दुराशा और ऊंचे आदर्श के मद में उन्मत्त विचारहीन लोगों का शून्य स्वप्न है। स्वाधीनता प्राप्त करने का एक मात्र मार्ग युद्ध ही है। पर उसमें हम लोग असमर्थ हैं, किन्तु क्या यह सत्य बात है कि केवल बाहुबल ही शक्ति का आधार है, अथवा शक्ति और भी किसी गूढ़ गंभीर वस्तु में है।
यह बात सब लोग स्वीकार करने के लिए बाध्य हैं कि केवल बाहुबल से कोई भी बड़ा काम संशोधित होना असंभव है। यदि दो परस्पर विरोधी समान बलशाली शक्तियों का सामना हो, तो जिसका नैतिक और मानसिक बल अधिक होगा, जिसका ऐक्य, साहस, अध्यवसाय, उत्साह, दृढ़ प्रतिज्ञा और स्वार्थ त्याग उत्कृष्ट होगा तथा जिसकी विद्या, बुद्धि, चतुरता, तीक्ष्ण दृष्टि, दूरदर्शिता और उपाय निकालने वाली शक्ति विकसित होगी, निश्चय उसी की जय होगी। इस तरह बाहुबल, संख्या, युद्ध सामग्री इन तीनों से हीन समाज भी नैतिक और मानसिक बल के उत्कर्ष से प्रबल से प्रबल प्रतिद्वन्दी को हरा सकता है। यह बात मनगढ़ंत नहीं है, इसका प्रमाण इतिहास के पन्ने पन्ने में लिखा है। अब इस पर आप यह कह सकते हैं कि बाहुबल की अपेक्षा नैतिक और मानसिक बल का गुरुत्व तो है, पर बाहुबल के बिना नैतिक बल और मानसिक बल की रक्षा कौन करेगा? यह तर्क बिलकुल ठीक है, किन्तु यह भी देखा गया है कि दो चिन्ता प्रणाली, दो सम्प्रदाय और परस्पर विरोधी दो दो सभ्यताओं का संघर्ष हुआ है तो उसमें उस दल की तो हार हुई है। जिसमें बाहुबल, राजशक्ति, युद्ध सामग्री आदि सब साधन पूर्ण यात्रा में मौजूद थे तथा उस दल की जीत हुई है जिसमें ये सब साधन आरंभ में नहीं थे। यह उलटा फल क्यों हुआ? “यतोधर्मस्ततोजयः” अर्थात् जहाँ धर्म है वहाँ जय है। किन्तु धर्म को पहचानने की शक्ति होनी चाहिए। अधर्म का अभ्युत्थान और धर्म का पतन स्थायी नहीं हो सकता।
बिना कारण के कार्य नहीं होता। जय का कारण शक्ति है। किस शक्ति में निर्बल पक्ष वालों की हार होती है, यह बात विचारणीय है। ऐतिहासिक दृष्टान्तों की परीक्षा करने पर हम यह बात जान सकेंगे कि आध्यात्मिक शक्ति के बल से वह अनहोनी बात हो सकती है, आध्यात्मिक शक्ति ही बाहुबल को कुचल कर मानव जाति को बतलाती है कि यह जगत भगवान का राज्य है न कि अन्य स्थूल प्रकृति का लीला क्षेत्र। पवित्र आत्मशक्ति का प्रसव करती है अर्थात् पवित्र आत्मा से शक्ति पैदा होती है। प्रकृति का संचालन परमात्म शक्ति (परमात्मा) का पैदा किया हुआ है। जिसका आध्यात्मिक बल बढ़ जाता है उसमें जीतने की सामग्री स्वयं ही उत्पन्न हो जाती है, विघ्न बाधाएं भी अपने आप ही हट जाती हैं और उपयुक्त समय आ विराजता है। कार्य करने की क्षमता भी स्वयं ही उत्पन्न होकर तेजस्विता हो जाती है। यूरोप इसी (आध्यात्मिक शक्ति) को पैदा करने के लिए प्रयत्न शील है। फिर भी उसे अभी इसमें पूरा विश्वास नहीं है और न उसके भरोसे पर काम करने की उसकी प्रवृत्ति ही है, किन्तु भारत की शिक्षा सभ्यता गौरव, बल और महत्व Soul Farce के मूल में आध्यात्मिक शक्ति है। जब जब लोगों को भारतीय महाजाति का विनाश काल निकट आया जान पड़ा है तब तब आध्यात्मिक बल ने गुप्त रीति से उत्पन्न होकर उप्र स्रोत में प्रवाहित हो मृत्यु के निकट पहुँचे हुए भारतीय को पुनर्जीवित किया है और सारी उपयोगी शक्तियों को भी पैदा किया है। इस समय भी उस आध्यात्मिक बल का प्रसबन बन्द नहीं हो गया है। आज भी उस अद्भुत मृत्युँजय शक्ति की क्रीड़ा हो रही है।
किन्तु स्थूल जगत की सारी शक्तियों का विकास समय के अनुसार होता है, अवस्था के उपयुक्त ही समुद्र में ज्वार और भाटे का न्यूनाधिक होता है। हम लोगों में यही हो रहा है। इस समय सम्पूर्ण भाटा है, ज्वार का समय आ रहा है महापुरुषों की तपस्या, स्वार्थ त्यागियों का कष्ट सहन, साहसी पुरुषों का आत्म समर्पण, योगियों की यौगिक शक्ति, ज्ञानियों का ज्ञान संचार और साधुओं की शुद्धता आदि आध्यात्मिक बल से उत्पन्न होती है। इधर कई वर्षों के कष्ट दुर्बलता और पराजय के फल से भारतवासी अपने में शक्ति को उत्पन्न करने की खोज करना सीख रहे हैं, किन्तु वह भाषण की उत्तेजना म्लेच्छों की दी हुई विद्या, सभा समिति की भाव संचारिणी शक्ति और समाचार पत्रों की क्षणस्थायी प्रेरणा से नहीं वरन् अपनी आत्मा की विशाल नीरवता में ईश्वर और जीव के संयोग से गंभीर अविचलित, अभ्रान्त, शुद्ध, दुःख सुख जयी, और पाप पुण्य वर्जित शक्ति से उत्पन्न है। वही महासृष्टि करणी, महा प्रलयंकारी, महा स्थिति शालिनी, ज्ञान दायिनी, महासरस्वती, ऐश्वर्य दायिनी, महालक्ष्मी, शक्तिदायिनी महा काली है। यही सहस्रों तेजों के संयोजन से एकीभूता चण्डी प्रकट होकर भारत का कल्याण तथा जगत का कल्याण करने में सफल होगी। भारत की स्वाधीनता तो केवल गौण-अप्रधान-उद्देश्य मात्र है। मुख्य उद्देश्य है-भारत की सभ्यता का, शक्ति दर्शन एवं संसार भर में उस सभ्यता के प्रचार और अधिकार का होना।
यदि हम आज पाश्चात्य साधनों के बल से, सभा समितियों के बल से, वक्तृता के जोर से, अथवा बाहुबल से, स्वाधीनता या स्वायत्त शासन प्राप्त कर लें तो वह मुख्य उद्देश्य कदापि सिद्ध नहीं हो सकता। भारतीय सभ्यता में आध्यात्मिक शक्ति है। उस आध्यात्मिक शक्ति से उत्पन्न किये हुए सूक्ष्म और स्थूल प्रयत्नों द्वारा स्वाधीनता प्राप्त करनी होगी। आज हमारी वह शक्ति अन्तर्मुखी हो रही है जिस समय वह शक्ति बहिर्मुखी होगी उस समय उसे कोई रोक ही नहीं सकेगा। तब वहीं त्रिलोक पावनी गंगा भारत को एवं समस्त भूमंडल को अपने अमृत स्पर्श से स्पर्श करती हुई नवीन युग स्थापित करेगी।
मैं किसी काम के परिणाम को देखकर ही उसकी नीति मत्ता निश्चित करता हूँ। यदि असत्य भाषण से अधिक लोगों का कल्याण होता हो तो उस समय सत्य को छिपा रखना मैं अपना कर्त्तव्य समझूँगा।
-लेस्लेस्टीफन,
मेरे झूठ बोलने से यदि प्रभु के सत्य की महिमा बढ़ती हो तो उस झूठ बोलने से मुझे पाप नहीं लगेगा।
-सेण्टपाल,
किसी कर्म की नीतिमत्ता कर्ता के उद्देश्य पर अर्थात् जिस बुद्धि से कार्य करता है, उस पर अवलम्बित रहती है।
-ह्यूम,
बहुतों का बहुत सुख हो, यही बात नीति की दृष्टि से न्याय और ग्राह्य है। इसी आदर्श पर चलना मनुष्य का कर्तव्य है।
(स्व. श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर)
मनुष्य समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ तभी हुआ, जब उसने सहयोग के नियम को स्वयं खोज निकाला। इस नियम से मनुष्य को एक साथ मिलकर आगे बढ़ने में बड़ी सहायता मिली। उसे फौरन ही मालूम हो गया कि एक साथ मिल कर उन्नति करने का नियम कृत्रिम नहीं, बल्कि स्वाभाविक है। अब तक सहयोग का यह विचार अलग अलग जातियों में उन्नति को प्राप्त हुआ है। इस सहयोग की बदौलत उन जातियों में शान्ति स्थापित रही है और अनेक प्रकार की बातें पैदा हुई हैं। इस संसार में कोई भी जाति दूसरी जातियों से अलग रह कर अपनी उन्नति नहीं कर सकती। या तो संसार की सब जातियाँ एक साथ जावेंगी। या एक साथ नाश को प्राप्त हो जावेंगी।
इस सत्य सिद्धाँत को संसार के सब बड़े बड़े लोगों ने स्वीकार किया है। उन्होंने जो कुछ उपदेश दिया है, उससे यही ध्वनि निकलती है, कि संसार की जातियाँ एक दूसरे से अलग होकर न रहें। इसीलिये हम देखते हैं, कि बुद्ध का धर्म केवल हिन्दुस्तान की सीमा के अन्दर न था। ईसामसीह का धर्म भी जेरुसलम की सीमा को पार कर गया था। क्या संसार के इतिहास के इस नाजुक जमाने में हिन्दुस्तान अपनी सीमाओं के ऊपर नहीं आ सकता? और एक बड़ा आदर्श संसार के सामने नहीं रख सकता? जिसमें कि भिन्न-भिन्न जातियों के बीच सहयोग और शान्ति का प्रचार हो? कमजोर विश्वास के आदमी शायद यह कहेंगे, कि जब तक हिन्दुस्तान मजबूत और दौलतमन्द न होगा, तब तक वह संसार की भलाई के लिये अपनी आवाज नहीं उठा सकता। लेकिन मैं इस पर विश्वास नहीं करता। यह समझना कि मनुष्य का बड़प्पन इस बात में है कि “उसकी साँसारिक शक्ति खूब बढ़ी चढ़ी हो और उसके पास खूब धन दौलत हो।” उसका अपमान करना है। जो लोग साँसारिक शक्ति से हीन और निर्बल हैं, उन्हीं में यह शक्ति है कि वे संसार को उस मिथ्या विश्वास से बचावे। यद्यपि भारतवर्ष गरीब और गिरी दशा में है तथापि वह संसार को विपत्ति से बचाने के योग्य हो सकता है।
सच्ची स्वतन्त्रता इस बात में नहीं है, कि मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए जो चाहे सो करे। सच्ची स्वतन्त्रता वही है जिसमें संसार भर का स्वार्थ सिद्ध हो। इसी तरह से जातियों की सच्ची स्वतन्त्रता इसमें है, कि वे संसार भर के स्वार्थ का ख्याल रखें। स्वतन्त्रता का जो विचार आजकल की सभ्यता में फैला हुआ है, वह अधूरा और कृत्रिम है। भारतवर्ष में सच्चा स्वराज्य तभी होगा, जब इसकी शक्तियाँ स्वतन्त्रता के इस कच्चे और वह आदर्श के विरुद्ध लगाई जायगी।
प्रेम की किरणों में वह स्वतन्त्रता और शक्ति है, जी सच्चे ज्ञान रूपी फल को पकाती हैं। पर जोश की आग हमारे लिये बेड़ियाँ ही बन सकती है। जो मनुष्य आत्मिक शक्ति प्राप्त करना चाहते हैं वह हमेशा पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिये उद्योग करता है। हमारी स्वतन्त्रता की आवाज इसी मोक्ष के लिये होनी चाहिए। जातीय आवश्यकताओं के नाम पर इस स्वतन्त्रता के रास्ते में रुकावटें डालना स्वयं अपनी जाति के लिए एक कैद खाना बनाना है क्योंकि जातियों के लिये मुक्ति का सच्चा रास्ता इसी में है कि मनुष्य मात्र एक ही उद्देश्य की ओर-सत्य की ओर बढ़ते जाय।
“जियो और जीने दो” यह सिद्धाँत ठीक है, परन्तु प्रकृति का यह नियम भी अटल है, कि उसी को जीवित रहने का अधिकार है जो अपनी जीवित रहने की योग्यता सिद्ध कर दे। योग्यता का ही अस्तित्व रहता है, यह सिद्धाँत नित्य और सत्य है।
-काण्ट
(ले.श्री प्रकाशजी एम. एल. ए.)
प्रकृति का वह अनिवार्य नियम है, कि जिसको आप जैसा समझते हैं कि वह आपको वैसा ही समझता है, भले ही आप उसे न जानते हों या आपको जानकर आश्चर्य और क्रोध आवे। जिसको आप छोटा समझते हैं, वह आपको वैसा ही समझता है। नागरिक कर्तव्यों और अधिकारों का ज्ञान अस्पृश्यता रूपी कलंक हम में से निकाल देना और सच्चा भ्रातृ-भाव हमारे बीच में फैलावेगा, वह हमको बतलायेगा कि जो बात अपने को बुरी लगती है, वही बात दूसरे को बुरी लगती है। जैसा व्यवहार हम दूसरों से चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार हम दूसरों से करें, सब चीजें चाहती हैं कि हमारे साथ सद्व्यवहार किया जाय, चाहे वे जड़ हों या चेतन। दुर्व्यवहार करने पर सभी वस्तुएं अपना बदला लेंगी। यदि भाई, नौकर, पड़ौसी, आदि चेतन जीवों से आप दुर्व्यवहार करते हैं तो अपना बदला लेते ही हैं। अचेत वस्तुएं भी ऐसा ही करती हैं। जूते के साथ दुर्व्यवहार कीजिएगा, उसे साफ नहीं रखिएगा तो वह काठ लेगा। छाते की फिक्र न कीजिएगा, उससे लापरवाही से पेश आइये, तो समय पर आप उसकी कमानी टूटी और कपड़ा कटा अर्थात् उसे बेकार पाइयेगा। यदि सुई की फिक्र न रखिएगा, तो किसी वक्त वह आपके शरीर में चुभ कर अपने अस्तित्व का माण आपको देगी। कार्यकुशल पुरुष सबके साथ सदा अच्छा और उचित व्यवहार करता है। इस कारण वह अपनी सब वस्तुएं, सब समय ठीक प्रकार से ठीक स्थान पर पाता है और सब चीजें उसकी सेवा करती हैं। उसका घर गन्दा नहीं रहता। उसके कपड़े मैले नहीं रहते। वह सदा चिड़चिड़ाया हुआ, घबराया हुआ, दूसरों पर अपना दोष लगाता हुआ, परेशान नहीं पाया जाता। उसका शरीर, उसकी आत्मा, उसका मस्तिष्क, सब स्वास्थ्य, स्थिर और प्रसन्न रहते हैं।
अपने नागरिक कर्तव्यों को न पालन कर हम देश की उन्नति में बाधा डाल रहे हैं। इसका प्रभाव हमारे आपस के प्रतिदिन के सम्बन्ध पर भी पड़ा है। जब हम मोची, दर्जी, धोबी आदि को कोई काम देते हैं तो हमें यह विश्वास नहीं रहता कि हम समय से काम कर देगा, न उसे विश्वास रहता है कि इस समय पर उसे दाम देंगे। इसी कारण परस्पर तकाजे पर तकाजा करते रहना पड़ता है। ऐसी दशा में समाज कैसे ठीक-ठीक चल सकता है? हालत यहाँ तक पहुँची है, कि यदि आप किसी को भोजन का निमन्त्रण दें और उन्होंने उसे स्वीकार भी कर लिया हो तो न आपको यह विश्वास रहता है कि वे आ जावेंगे तो भोजन मिल भी जायगा। काशी में यह कायदा है कि शादी विवाह के भोज की याद निमन्त्रित सज्जनों को लोग आखिर तक बारबार स्वयं जाकर या दूसरों को भेज कर दिलाया करते हैं और मेरा खुद अनुभव है कि गाँव, देहात में निमन्त्रण स्वीकार करने के बाद जब समय से पहुँच गया हूँ तब वहाँ खाना पकाना शुरू किया गया है। मेजबानों को आखिर तक शंका रही कि वह आयेगा या नहीं। जब समाज की यह दशा है, जब किसी भी काम के लिये हम किसी दूसरे पर विश्वास नहीं कर सकते-तब क्या समाज का संगठन हो सकता है ? क्या समाज की प्रगति सम्भव है?
देश की उन्नति इने गिने बहुत थोड़े लोगों पर निर्भर नहीं रह सकती। देश की उन्नति, देश की प्रगति, देश का अभ्युदय, देश की स्वतन्त्रता, साधारण से साधारण व्यक्तियों के अपने कर्तव्यों और अधिकारों की जिम्मेदारी ठीक तरह समझने पर ही निर्भर है।
-ग्रहस्थ गीता,
(श्री मनोरंजन प्रसाद, बी. एस. पी.)
हँसना और बराबर हँसते रहना सजीवता का लक्षण है। मनहूसियत मौत का नाम है। जो हँसता है, उसके पास बहुत बड़ी ताकत है। जो रोता है, वह मुर्दे से भी गया-बीता है। अगर जीवन में सजीवता चाहते हो तो खुलकर हँसा करो।
हँसना कभी बेकार नहीं हुआ करता। हँसना एक व्यवसाय है। इससे दोस्त-मित्र खुश हो जाते हैं। अपरिचितों को भी प्रसन्न करने के लिये हँसना एक अद्भुत मंत्र है। हँसना जीवन का प्रकाश है हँसने से मनुष्य की अन्तःशक्ति जाग उठती है। जितनी देर तक आदमी-हँसता रहता है, उतनी देर तक मृत्यु भागकर कहीं दूर चली जाती है। गरज यह कि आदमी जितना हँसता है, आयु उतनी ही बढ़ती जाती है। इसलिए, अगर दीर्घायु होना चाहते हो तो खूब हँसो, दीर्घ काल तक हँसो।
मुँह फुलाये चुपचाप बैठे रहना मृत्यु की प्रतीक्षा करना है। इससे मनुष्य की सक्रियता कम होती जाती है, रक्तप्रवाह बन्द होने लगता है और अंग अंग में शिथिलता आने लगती है। मनहूसियत घर-द्वार में, अपने पराये में, इर्द−गिर्द सर्वत्र मुर्दनी पैदा करती है। यह समस्त वायुमण्डल को मनहूस बना देती है। इसलिये, अगर इन तमाम इल्जामों से बचना चाहते हो तो खूब हँसो।
सुख में सभी हँसते हैं। दुख में हँसना बिरलों बहादुरों का काम हैं और, सच तो यह है कि सुख दुख के कारण आदमी प्रसन्न और चिन्तित नहीं होता, बल्कि प्रसन्नता के कारण सुखी और चिन्ता के कारण दुखी होता है। इसलिये, अगर सुखी रहना चाहते हो तो सदा प्रसन्न रहो और तमाम दुनिया से अलग होकर हँसा करो। हँसो और हँसकर चिन्ता का दरवाजा बन्द कर दो। फिर तुम्हें दुखी करने वाला ढूँढ़े भी कोई न मिलेगा।
हँसने का नाम धन है, रोने का नाम है निर्धनता। हँसना शरीर का धन है, आत्म का धन है, घर का धन है और समस्त समाज का धन है। युवकों का अपना कलाकार हैन्स ऐंडरेशन-खूब हँसा करता था और जिस रास्ते से वह चलता था वह रास्ता भी हँस उठता था। रावर्ट स्टीवेन्सन भी जिन्दगी भर हँसता रहा। उसका कहना है कि हँसना अँधेरी कोठरी में उजाला कर देता है। एक जगह वह कहता है-”मनहूस अगर तुम्हें सौ रुपये दे, तो भी उससे न मिलों। अगर कोई हँस मुख आदमी सौ रुपये खर्च करने पर भी मिले तो ढूँढ़ कर उससे मिलों। सौ रुपये खर्च करने की जरूरत नहीं। जहाँ कहीं रहो, हँसते रहो। फिर तो न मालूम कितने ही हँसने वाले मिल जायेंगे। सिंहासन पर रहो तब भी हंसो खानाबदोशी और मुफलिसी की हालत में रहो तो भी हंसो।
जिन्दगी बसर करने का सबसे सुन्दर तरीका है हँसना। जागों तब भी हंसो, सोओ तब भी हंसो जो काम करना हो उसे हंसकर शुरू करो बैठो तो हंसो और दोस्तों को हंसाते रहो, चलो और हंसते चलो हंसते-हंसते तुम बड़ी से बड़ी दरिया पार कर सकते हो, पहाड़ों की ऊंची से ऊंची चोटियों पर हंसी-खेल में ही चढ़ जा सकते हो।
कोई चीज किसी को दो तो हंसकर दो। इससे तुम्हारा तुच्छ उपहार भी बहुमूल्य हो जायगा यदि कोई मनुष्य तुम्हें कोई चीज़ दे तो उसे हंसकर स्वीकार करो। इससे तुम्हारा मान बढ़ जायगा और देने वाले का उत्साह भी दूना चौगुना हो जायगा।
अगर तबीयत में मनहूसियत आ गयी हो, भीतर की स्फूर्ति सो गयी हो, तो हंसने का अभ्यास करो यह अभ्यास एक दिन स्वभाव स्वरूप धारण कर लेगा। अगर तुम्हें हंसने का अभ्यास करते देख कुछ लोग हंसे तो इसमें क्या बुरा है? उनके साथ तुम भी हंसो।
रोज सवेरे उठो-सूरज निकलने के पहले। आइने में चेहरा देखो, उसे देखकर हंसो। पानी से मुँह धोकर आइने में चेहरा देखा और हंसों! चिड़ियों के चहकने से पहले ही तुम चहकना शुरू कर दो। शौचादि से निवृत्त स्नान करो। फिर कुछ हल्का जलपान कर पढ़ने के लिये बैठ जाओ। कुछ पढ़ो और फिर मनन करो। जो कोई काम करना हो, जवां मर्द की तरह करो। दिन में कई बार आइने में चेहरा देखो और हंसो। कोई चीज़ खाओ तो कुछ लोगों के साथ खाओ। खूब चबा चबाकर खाओ, बाँट-बाँटकर खाओ, हंस हंसकर खाओ अकेले खाने में कोई मजा न आयेगा। खाने के याद बैठकर हंसा करो। हंसना सबसे अच्छी कसरत है, सबसे बड़ी दया है।
तुमने महात्मा गान्धी को देखा होगा। सभा-मंच पर खड़े होते ही वे हंस पड़ते हैं और फिर भाषण समाप्त करते समय भी हंसते हैं। महात्माजी की बिनोद प्रियता लोक प्रसिद्ध है। पं जवाहरलाह नेहरू भी प्रायः हंसते नज़र आते हैं। सरदार पटेल बाबू राजेन्द्र प्रसाद और खान अब्दुल गफ्फार खाँ की विनोदप्रियता प्रसिद्ध है। सभी महापुरुष विनोदी होते हैं। विनोद के सहारे वे हंसते खेलते बड़े बड़े काम कर डालते हैं और एक दिन आता है जब वे आदर्श बन जाते हैं। प्यारे किशोरों, तुम्हीं पीछे क्यों रहोगे। विनोदी बनो और हंसो।
-किशोर
(समर्थ गुरु रामदास)
अपनी क्षुधा निवारण करने के उपरान्त बची हुई रसोई दूसरों को बाँट देनी चाहिये। इस प्रकार पहले अपने को ज्ञानवान बनाकर तब उस ज्ञान का वितरण दूसरे लोगों में करना चाहिए। तैरने वालों को चाहिए कि यदि कोई पानी में डूब रहा हो तो उसे डूबने न दें। उत्तम गुणों को अपने अन्दर धारण करने के उपरान्त उन्हें दूसरे लोगों में फैलाना कर्तव्य है। शरीर का सर्वश्रेष्ठ उपयोग परोपकार है वह देह धन्य है जो पराये काम आती है और जिससे किसी का अनिष्ट नहीं होता। दूसरों के दुख में दुखी होना, दूसरों के सुख में प्रसन्न होना पराये को अपना लेना, मधुर वचन बोलना, दुखी जनों को ढूँढ़ ढूँढ़ कर उनकी सेवा सहायता के लिये प्रस्तुत रहना यह साधुजनों का काम है। आलस्य को त्यागकर कर्तव्य परायण होना, थोड़ा और विवेकयुक्त बोलना क्रोध और मन्सर को त्यागकर विनति भाव से रहना यह सत्पुरुषों का स्वभाव है। वे साधु धन्य हैं जो अपने सद्व्यवहार से दुर्जनों को सुपथ पर आरुढ़ करते हैं स्वयं कष्ट सहकर दूसरों का उपकार करते हैं आपत्ति काल में धैर्य धारण करते हैं और आलोचकों को देखकर विचलित नहीं होते। उन्हीं का भजन सच्चा है और परमात्मा को तृप्त करने वाला है।
जो बोया जाता है वही उगता है इसलिए कर्कश वचन और कठोर व्यवहार के विष बीजों को नहीं बोना चाहिए। इस दुनिया में उत्तम गुण वाले सज्जनों की बड़ी आवश्यकता है ऐसे पुरुषों को मनुष्य जाति सदैव खोजती रहती है। श्रेष्ठ जनों को समूह बनाना चाहिये, संगठन करना चाहिए। अकेला आदमी क्या कर सकता है। इसलिए विवेकवान धर्मप्रचारक को चाहिये कि शिक्षित साथियों की सहायता से कल्याण के कार्य को बढ़ावे।
श्रुति कहती है कि “मरणं बिन्दु पातेन जीवनम् बिन्दु धारणात्” वीर्य रक्षा में ही मृत्यु है और वीर्य रक्षा में जीवन। वीर्य रक्षा के साथ हमारी सर्वतोन्मुखी उन्नति का द्वार खुलता है तो उसे नष्ट करने के साथ हानिकारक उद्रेक बढ़ते हैं।
ब्रह्मचर्य को नष्ट करने से आधि भौतिक, आधि दैविक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार की हानियाँ होती है। आधि भौतिक हानि यह है कि शरीर कमजोर हो जाता है, नेत्रों की दृष्टि निर्बल पड़ जाती है। पाचन क्रिया मंद होती है, फेफड़े निर्बल बनते हैं, सहन शक्ति घटती है। तेज नष्ट होता है और दुर्बलता के कारण देह में नाना प्रकार के रोगों का अड्डा स्थापित हो जाता है।
आधि दैविक हानियाँ यह हैं कि-मस्तिष्क पोला हो जाता है। बुद्धि मंद पड़ जाती है, स्मरण शक्ति का ह्मस होता है। सूक्ष्म विचारों को ग्रहण करने की शक्ति घट जाती है, विद्या सीखी नहीं जाती। अन्तः करण ऐसा मलीन हो जाता है कि, स्वार्थ, लोभ, कपट, पाप आदि के आक्रमणों का विरोध करने की उसमें क्षमता नहीं रहती, इच्छा शक्ति, ज्ञान मनुष्य साहस हीन, इन्द्रियों का गुलाम भयभीत, चिन्तित और हीन मनोवृत्ति का बन जाता है। ब्रह्मचर्य नष्ट करने से जो आध्यात्मिक हानि होती है वह तो बहुत ही दुखदायी है। आत्मा के स्वरूप को पहचानना, ईश्वर में परायण होना, धर्म कर्तव्यों पर बढ़ने के लिए कदम उठाना विषय वासना में रत मनुष्य के लिए क्या कभी संभव है ? ऐसे व्यक्तियों के लिए योग साधना एक कल्पना का विषय ही हो सकता है। कई असंयमी मनुष्य योग क्रियाओं में उलझे तो उन्हें तपैदिक, पागलपन या अकाल मृत्यु का सामना करना पड़ा।
ब्रह्मचर्य को नष्ट करना एक ऐसा अपराध है जिसका फल न केवल अपने को वरन् समस्त सृष्टि को भोगना पड़ता है। लम्पट व्यक्तियों के निर्बल वीर्य से जो संतान उत्पन्न होती है वह भी अपने पिता की कमजोरी विरासत में साथ लाती है। ऐसी सन्तान संसार के लिए भार रूप ही सिद्ध होती है वह अपने और दूसरों के कष्ट में ही वृद्धि करती रहती है। जीवों के श्रेणी उत्पादन का क्रम यही है कि उन्नत आत्माएं तेजस्वी पिताओं के वीर्य में प्रवृष्ट होकर जन्म धारण करती हैं और पाप योनियों में जाने वाली पतित आत्मायें निर्बल व्यक्तियों के वीर्य का आश्रय ग्रहण करके जन्म लेती हैं। जिस देश के मनुष्य लम्पट और दुर्बल होंगे वहाँ कुल को कलंक लगाने वाली, देश और जाति को लज्जित करने वाली संतान ही उत्पन्न होगी।
वीर्य स्खलित होने के बाद यदि गर्भ स्थापना में काम न आवे तो भी वह नष्ट नहीं होता। जल की सहायता से वह मोरियों में जाता है और वहाँ संतानोत्पादन का कार्य करता है। हैजा, तपेदिक, प्लेग, इन्फ्लुऐंजा, गर्दन तोड़ बुखार आदि नाना प्रकार के भयंकर रोगों के कीटाणु उससे उत्पन्न होकर असंख्य मनुष्यों तथा जीव जन्तुओं का संहार करते हैं।
इस प्रकार विवेकपूर्वक देखा जाय तो वीर्य नाश करने से सब प्रकार हानि है। अपना दूसरों का सत्यानाश करके नरक गमन से बचने के लिए हर मनुष्य का कर्तव्य होना चाहिए कि वह ब्रह्मचारी बने और शास्त्रोक्त मर्यादा के अतिरिक्त वीर्य की एक बूँद भी नष्ट न करने की दृढ़ प्रतिज्ञा कर ले।
जिस तरह छोटे 2 मच्छर बाँस की टहनियों में पानी की बूँद को चलती हुई देखकर उसमें घुस जाते हैं, किन्तु निकलना मुश्किल हो जाता है। उसी तरह संसार की चमक को देखकर अज्ञानी मनुष्य संसार के जाल में तो फंस जाता है। बड़ी सरलता से जाल में चला तो जाता है, परन्तु उसमें घुसने के बाद निकलना मुश्किल होता है।
(महात्मा गाँधी)
बाईस तेईस साल की उम्र में मुझे ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा हुई। मालूम हुआ कि वेदों का अभ्यास करने के लिए पन्द्रह वर्ष चाहिए, पर इसके लिए मैं तैयार नहीं था। मुझे मालूम हुआ- मैंने नहीं पढ़ा था कि गीता सब शास्त्रों का दोहन हे, कामधेनु है। मुझे बतलाया गया कि उपनिषद् आदि का निचोड़ 700 श्लोकों में आ गया है। थोड़ी संस्कृत की भी शिक्षा थी। मैंने सोचा कि यह तो सरल उपाय है मैंने अध्ययन किया और मेरे लिए वह बाइबिल, कुरान नहीं रही, माता बन गई। प्राकृतिक माता नहीं, ऐसी माता जो मेरे मर जाने पर भी रहेगी। उसके करोड़ों पुत्र और पुत्रियाँ बिना आपसी द्वेष भाव के उसका दुग्धपान कर सकते हैं। पीड़ा के समय वे माता की गोद में बैठ सकते हैं और पूछ सकते हैं कि यह संकट आ गया है। मैं क्या करूं? माता आपको उसका उत्तर दे देगी। अस्पृश्यता के संबंध में भी मेरे कितना हमला होता है, कितने लोग विपरीत हैं। मैं माता से पूछता हूँ क्या करूं? वेद आदि तो पढ़ नहीं सकता। वह कहती है, नवाँ अध्याय पढ़ ले। माता कहती है- “मैं तो उन्हीं के लिए पैदा हुई हूँ, मैं तो पतियों कि लिए हूँ।” इस तरह का आश्वासन वे ही पा सकते हैं जो सच्चे मातृभक्त हैं। जो सब उसी में से पान करना चाहते हैं वह उनके लिए कामधेनु है। कोई-कोई कहते हैं कि गीता बहुत गूढ़ ग्रन्थ है, लोक मान्य तिलक के लिए वह गूढ़ ग्रन्थ भले ही हो, पर मेरे लिए तो इतना ही काफी है। पहला दूसरा और तीसरा अध्याय पढ़ लीजिए बाकी में तो इसकी बातों को दुहराना मात्र है। इसमें भी थोड़े से श्लोकों में सभी बातों का समावेश है और सबसे सरल गीता माता में तीन जगह कहा है जो सब चीजों को छोड़कर मेरी गोद में बैठ जाते हैं उन्हें निराशा का स्थान नहीं, आनन्द ही आनन्द है।
गीता माता कहती है कि- पुरुषार्थ करो, फल मुझे सौंप दो। ऐसी मोटी-मोटी बातें मैंने गीता माता से पाई। मैं रोज-रोज उनसे कुछ न कुछ प्राप्त करता हूँ। इसलिए मुझे निराशा कभी नहीं होती। दुनिया कहती है कि अस्पृश्यता आन्दोलन ठीक नहीं, गीता माता कह देती है कि ठीक है। आप लोग प्रतिदिन सुबह गीता का पाठ किया करें। यह सर्वोपरि ग्रन्थ है। 18 अध्याय कण्ठ करना बड़े परिश्रम की बात नहीं। प्राणान्त के समय जब आँखें काम नहीं देती, केवल थोड़ी बुद्धि रह जाती है, तो गीता से ही ब्रह्म निर्वाण मिल जा सकता है।
मेरी समझ में गीता बहुत ही सरल ग्रन्थ है। जरूर ही इसमें कुछ मौलिक प्रश्न आते हैं, जिन्हें हल करना बेशक मुश्किल है, मगर गीता की साधारण शिक्षा को समझना कठिन नहीं। इसे सभी सम्प्रदाय प्रामाणिक ग्रन्थ मानते हैं इसमें किसी प्रकार की साम्प्रदायिकता नहीं है। थोड़े में यह संपूर्ण संयुक्त नीति शास्त्र है, यों तो यह दार्शनिक और भक्ति विषयक दोनों ही प्रकार का ग्रन्थ है। मैं अपनी यह सम्मति दुहराता हूँ कि हर हिन्दू लड़के और लड़की को संस्कृत जानना चाहिए मगर अभी तो कई जमानों तक करोड़ों आदमी संस्कृत से कोरे ही रहेंगे। केवल संस्कृत न जानने के कारण गीता की शिक्षा से वंचित रहना तो आत्मघात करना होगा।
बड़ा आदमी चाहे धन से हो चाहे पद से हो चाहे मान प्रतिष्ठा से हो उसका सब से बड़ा दुर्भाग्य यह है कि वह अंध और बहरा हो जाता है। वह अपनी आँखों से देख नहीं सकता। वह अपने कानों से सुन ही सकता। उसे अपने भक्तों, सेवकों या चाटुकारों की आँखों से देखना और उन्हीं के कानों सुनना पड़ता है। बड़ा आदमी बनने के पहले जितना ज्ञान वह पा सका था उतनी ही पूँजी से उसे अपना व्यापार चलाना पड़ता है बड़ा आदमी बनने के बाद तो सब उधार ही उधार उसे मिलता है। बड़ा आदमी बनना जितना अधिक सौभाग्य है उतना ही अधिक दुर्भाग्य है।
दरबारी लाल सत्य भक्त।
(लेखक- श्री परमेश्वर सिंह)
आजकल धूम्रपान करना अर्थात् बीड़ी, सिगरेट और चुरुट पीना सभ्यता का अंग हो गया है अथवा यों कहें कि यह भी एक फैशन में दाखिल हो गया है। विदेशों में इसका प्रचार अधिक है, परन्तु हमें उसकी आलोचना करनी नहीं, हमें तो वह दिखाना है कि गरीब भारतवर्ष में धूम्रपान का प्रसार किस गति से बढ़ रहा है और इसका कैसा अनर्थकारी प्रभाव हमारे देश के बच्चों, नव जवानों और विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। आप देश के किसी भाग में चले जाइये, सर्वत्र आप सिगरेट और बीड़ी का व्यापक प्रचार पायेंगे। सिगरेट कुछ कीमती होती है, चुरुट उससे भी अधिक कीमती होती है, इसलिए इन दोनों की जगह कुछ दिनों से बीड़ी ने ले रखी है। बीड़ी बनती है तम्बाकू की पत्तियों को काट-काटकर। इसी से यह जाना जा सकता है कि इस तम्बाकू का स्वास्थ्य पर कितना बुरा असर पड़ता है। यह बीड़ी, सिगरेट तथा व्यापक धूम्रपान का ही परिणाम है कि हमारे युवकों के अधरों की लाली कालिमा में बदल जाती हे, उनके कलेजे में दर्द उठा करता है, और जलन हुआ करती है और वे अकाल मृत्यु को प्राप्त होते जाते हैं।
वैज्ञानिकों का मत है कि पान, तम्बाकू, बीड़ी, सिगरेट, चुरुट, चाय, कोको आदि वस्तुएं विषैली होती हैं, इनमें कई प्रकार के भयंकर विष पाये जाते हैं, जिनमें निकाटाइन एकोलिन और पिपराइम मुख्य हैं। पहले प्रकार का विष संखिया से कहीं ज्यादा भयंकर है। यदि अधिक मात्रा में उसका व्यवहार किया जाय, तो मृत्यु एकदम निकट पहुँच जाती है।
यह तो वैज्ञानिकों का मत हुआ। डाक्टरों का मत यह है कि ऊपर कही गयी जहरीली वस्तुओं से तमाम रोग पैदा होते हैं। वे इस सिलसिले में कहते हैं कि- इन वस्तुओं में जो विष पाये जाते हैं, वे अजीर्णता, उदरामय, बालों का असमय में पकना, ज्ञान तन्तुओं को नष्ट करना, हृदय की गति मन्द करना, स्वर भंग, लकवा, मृगी, अपस्मार, धनुर्वात, नामर्दी, बम्ध्यात्वा आदि रोग पैदा करते हैं और अर्से तक इनका इस्तेमाल करने से स्मरण शक्ति, योजनात्मक शक्ति तथा व्यक्ति विशेष के लिये स्वाभाविक गुणों का नाश हो जाता है।
यूनों विज्ञान के पण्डित ने तो इन जहरीली चीजों से होने वाली हानियाँ बतलाते हुए कहा है कि ‘मस्तिष्क तथा स्नायु सम्बन्धी दुर्बलता की दृष्टि भी अधिक धूम्रपान से ही होती है। यही नहीं, संसार के सभी छोटे-बड़े चिकित्सकों का यह निर्विवाद मत है कि ‘तम्बाकू अधिक मात्रा में इस्तेमाल करने से अनेक प्रकार के रोग पैदा होते हैं, खासकर हृदय और कलेजे की बीमारियाँ तो इसके परिणाम स्वरूप पैदा होती हैं तम्बाकू मानसिक शक्ति भी नट कर देती है।
चूँकि युवावस्था के प्रतिनिधि छात्रों में भी यह बीमारी- हाँ, यही बीड़ियाँ पी पीकर मुँह से फिक फिक धुआँ फेंक कर मजा लेने की बीमारी- जबर्दस्त रूप धारण कर चुकी है और धीरे-धीरे उन्हें विनाश के उस कुण्ड में डालती जा रही हैं, जहाँ से उनके सन्त्राणका कोई मार्ग नहीं, इसलिए यहाँ यह बताना आवश्यक है कि किस प्रकार धूम्रपान के प्रभाव से तेज से तेज बुद्धि के छात्र को भी जीवन संग्राम में हार खानी पड़ी है। हमारे पास इस सम्बन्ध में जो आँकड़े हैं, उनसे यह पता चलता है कि बीड़ी-सिगरेट पीने वाला कोई भी छात्र परीक्षाओं में कभी सर्वोच्च स्थान नहीं प्राप्त कर सकता है। हावर्ड यूनिवर्सिटी का बिगत 90 वर्ष का इतिहास इस बात का साक्षी है कि उक्त यूनिवर्सिटी में इस बीच कोई भी धूम्रपान करने वाला छात्र किसी भी परीक्षा में सर्वप्रथम स्थान नहीं पा सका है।
इस दुर्व्यसन का मनुष्य, विशेषतया नौजवानों की बुद्धि पर ही घोर घातक प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि इससे नैतिकता पर भी गहरा आघात होता हैं। इसके ही प्रभाव का परिणाम होता है कि अच्छे विद्यार्थी भी बिगड़ जाते हैं और कुछ ही दिनों की धूम्रपान की आदत के परिणाम स्वरूप विनाशोन्मुख दिखाई पड़ते हैं। इसकी सत्यता का प्रमाण इस भारतवर्ष के अगणित स्कूलों और कालेजों में आप पा सकते हैं, और चाहे तो कोई प्रभाव इसका हो वह तो प्रकट है कि इसके सेवन से दीर्घ जीवन होना कठिन ही नहीं, असम्भव है। जो व्यसन के नाम पर घातक वस्तुओं का उपयोग करता है, वह अधिक दिनों तक कदापि जीवित नहीं रह सकता।
इस सिलसिले में यह बात देना अनुचित न होगा कि पाश्चात्य देशों में ऐसे अनेक महान् पुरुष हो गये हैं और आज भी विद्यमान हैं, जिन्होंने आजीवन बीड़ी सिगरेट आदि जहरीली चीजों का इस्तेमाल नहीं किया और वे दीर्घ काल तक स्वस्थ रहे और मरे भी सुन्दर स्वास्थ्य लिये हुए। जानकारों का यह कथन है कि जो तम्बाकू पीते या धूम्रपान करते वे ही नहीं, वरन् उनकी सन्तान भी दीर्घजीवन के सुख से वंचित रहती है।
लत बहुत बुरी चीज है। यह तो सभी जानते हैं कि बचपन की लत जीवन भर जारी रहती है और बचपन का अभ्यास आजीवन छूटने वाला नहीं है। इसलिये जो बच्चे अपने बाप दादों की देखा देखी तम्बाकू खाने और सिगरेट बीड़ी पीना सीख लेते हैं, वे आगे चलकर नष्ट हो जाते हैं। धूम्रपान की प्रथा पश्चिम से हमने सीखो और तम्बाकू खाना व पीना मुगलों के जमाने में भारतवासियों ने जाना, किन्तु हमें यह देखकर हर्ष होता है कि पाश्चात्य देशों ने इसका घातक प्रभाव अनुभव किया है और कहीं कहीं तो कानून बनाकर धूम्रपान निषद्धि घोषित कर दिया गया है। अभी हाल की बात है, चीन की सरकार ने इस प्रकार का कानून बना दिया है कि 20 वर्ष से कम उम्र के बालक धूम्रपान करे, यदि वे ऐसा करते पाये जायेंगे, तो उन्हें सख्त सजा मिलेगी वहाँ तो सिगरेट पीना या बेचना जुर्म करार दिया गया है। इसी प्रकार कनाडा तथा उत्तर अमरीका के कई प्रांतों की सरकारों ने भी यह घोषित कर दिया है कि 26 वर्ष के बालकों के हाथ सिगरेट बेचना जुर्म हैं। सैक्सनी के शिक्षा विभाग ने हाल ही में एक गश्ती चिट्ठी जारी कर स्कूल अधिकारियों को आदेश दिया है कि वे सोलह साल की उम्र के बालकों को यदि धूम्रपान करते पायें, तो उन्हें सख्त सजा दी जाय।
जागृति और सुधार के युग में, जब कि सभी राष्ट््र को सबल बनना का आरुढ़ हैं, भारत अपनी भी इस प्रश्न पर चुप्पी साधे हुए हैं। हालाँकि वह अच्छी तरह यह देख रहा है कि प्रतिवर्ष न जाने कितने नौजवान और बच्चे धूम्रपान की बेदी पर जीवन बलिदान कर रहे हैं और विनाश के मुँह में जा रहे हैं। सिगरेट आया है, तब से तो इसका प्रचार और भी ज्यादा बढ़ गया है, क्या शहर और क्या देहात, सर्वत्र बच्चों और युवकों के मुँह से धुआँ निकलने देखते हैं। विद्यार्थी तो इस दुर्व्यसनों को अपनाने के लिये चोरी तक किया करते हैं। इस दशा में सरकार और समाज पतियों का यकर्तव्य है, यह बतलाने की आवश्यकता नहीं है। 1632 अखिल भारतीय शिक्षा सम्मेलन ने इस बुराई पर प्रकाश डालते हुए सरकार का ध्यान इसको मिटाने के लिये कानून बनाने की और आकृष्ट किया था।
अब उपेक्षा करने का समय नहीं है। जिनका सार्वजनिक जीवन के साथ सम्बन्ध है वे अच्छी तरह जानते हैं कि बीड़ी, सिगरेट, चुरुट तथा तम्बाकू का स्वास्थ्य पर कितना घातक प्रभाव पड़ता है उनका यह कर्तव्य है कि इस व्यापक एवं विधातक बुराई को समूल नष्ट करने का प्रयत्न करें।
(1)
एक कुम्हार ने एक गधा खरीदा। पर उसने यह शर्त कर ली कि रुपया तब दूँगा जब खरीदे हुए गधे का स्वभाव पहचान लूँगा। बेचने वाला राजी हो गया। कुम्हार गधे को अपने बाड़े में ले गया और स्वतंत्रतापूर्वक रहने के लिए छोड़ दिया। उस बाड़े में जो गधा सबसे अधिक खाने वाला और आलसी था उससे यह नया गधा मिल गया। इस पर कुम्हार उसे खींचता हुआ उसके मालिक के पास लौटाने ले गया। मालिक ने पूछा-भाई, तुमने इतनी जल्दी इसका स्वभाव कैसे पहचान लिया ? इस पर कुम्हार ने कहा जिस गधे के साथ इसने हेल मेल बढ़ाया मैंने समझ लिया कि यह उसी का दूसरा भाई है।
मनुष्य की रुचि से उसका स्वभाव पहचाना जाता है।
(2)
एक गीदड़ आहार की खोज में इधर उधर घूम रहा था कि एक वृक्ष के खोखले में किसानों का कुछ खाने का सामान रखा हुआ मिल गया। गीदड़ ने स्वाद स्वाद में उसे इतना खा लिया कि उसका पेट फूल गया और खोखले से बाहर निकलना मुश्किल हो गया। पेट फूलने के दर्द फँस जाने के कष्ट और किसान के भय से खोखले में बैठा हुआ वह काँय, काँय कर रहा था कि एक दूसरा गीदड़ वहाँ आ निकला। उसने सलाह दी कि कुछ समय तक इसी खोखले में बैठकर उपवास करो। जब पेट का मोटापा कम हो जायगा तब बाहर निकल सकोगे।
अन्याय से बहुत धन इकट्ठा करने पर विपत्ति आती है और वह विपत्ति तभी दूर हो सकती है जब त्याग, दान और उपवास का कार्यक्रम अपनाया जाय।
(3)
एक ज्योतिषी रात के समय ग्रह नक्षत्रों की परीक्षा करने के लिए मुँह ऊपर को उठाकर इधर उधर घूमा करता था। एक बार वह इसी तरह चल रहा था तो गहरे गड्ढे में गिर पड़ा। उसका चिल्लाना सुनकर लोग इकट्ठे हुए और उसे बाहर निकाला गड्ढ़े में क्यों कर गिर पड़े यह पूछने पर ज्योतिषी ने सब हाल सुना दिया। इस पर लोगों ने उससे कहा-आकाश की बातें जानने से पहले आपको यह जानना चाहिए कि जमीन पर क्या है।
परलोक सुधारने से पहले इस लोक को सुधारने की भी चिन्ता करनी चाहिए।
(4)
एक बार देवदारु के वृक्ष ने ब्रह्मा से फरियाद की, कि भगवान्! मैं कितना उपकारी हूँ, दूसरों के उपकार के लिये सदैव तैयार रहता हूँ, परन्तु लोग इसका कुछ भी खयाल नहीं करते, उनकी कुल्हाड़ी सबसे अधिक मुझी पर चलती है। ब्रह्माजी ने उत्तर दिया-बेटा, तुम कुल्हाड़ी की चोट से बच सकते हो बशर्ते कि दूसरों के उपकार में लगने का अपना स्वभाव छोड़ दो।
परोपकार में प्रवृत्त रहने वालों को कष्ट सहन करने ही पड़ते हैं।
(5)
एक साँप ने अपने बच्चे से कहा ऐसा टेढ़ा-2 क्या चलता है? सीधा चल। बच्चे ने कहा-पिता जी, आपकी आज्ञा मानूँगा पर आप जरा वैसा चल कर तो दिखाइये।
दूसरों पर उपदेश का प्रभाव तब तक नहीं पड़ सकता जब तक कि अपना आचरण भी वैसा ही न हो।
(स्वर्गीय स्वामी सर्वदानन्द जी महाराज)
प्यारे प्रभु के दर्शन करने हैं तो मन मन्दिर की सफाई करो। तब देव अपनी सर्व शक्तियों से उसमें पधारेंगे। मन को निर्मल बनाने के लिए अपने में मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा आदि भावनाओं को जगाओ। अर्थात् सुखी पुरुषों में मित्रता, दुखियों पर करुणा-पुण्य आत्माओं पर हर्ष और पापियों पर उपेक्षा की भावना से चित्त निर्मल हो जाता है। मैत्री, करुणा और हर्ष से चित में उत्साह और शान्ति रहती है और पापियों की उपेक्षा करने से मनुष्य क्रोध से बच जाता है। इसके अलावा छल, कपट और स्वार्थादि दोषों को छोड़ दो, दोनों में स्वार्थ मुख्य है। इसके उदय होने से शेष सब अवगुण अपना बल बढ़ाते हैं। गुणों में मैत्री सबसे अधिक मूल्यवान है। इसके आने पर शेष सब गुण इसकी छाया मैं आ जाते हैं प्रेम प्रकाश है, स्वार्थ अन्धकार है, प्रेम उदार है स्वार्थ धोखे का बाजार है। प्रेम ने संसार को सुधारा स्वार्थ ने संसार को बिगाड़ा-प्रेम परमेश्वर से मिलाता है। स्वार्थ संसार के बंधन में गिराता है। इसलिए प्रेम सत्संग, स्वाध्याय द्वारा निष्कपट, सरल स्वभाव से अपने अन्तःकरण को पवित्र बनाओ अनेक जन्मों की परम्परा से जो बुरी वासनायें दृढ़ हो गई हैं उनको दूर करो, स्वार्थ को छोड़कर सच्ची प्रभु भक्ति साधारणतया, प्राणी मात्र की सेवा और विशेषतया मनुष्य मात्र की सेवा करो। इस प्रकार जो मल बुरे खोटे कर्मों के करने से बढ़ता है, विक्षेप जो पुरुषार्थ न करके केवल इच्छा करते रहने से मन को चंचल बनाता है और आवरण जो स्वाध्याय सत्संग के बिना बढ़ता है को दूर करके भगवान की कृपा को प्राप्त करो। यही एक सरल मार्ग है।
(संकलनकर्ता श्री धर्मपालसिंह जी, रुड़की)
-मूर्ख वास्तविकता को भूल जाता है और अपने नियत किए कार्य को छोड़ कर जीवन के मूल महत्त्व को भूलकर मालिकी गाठ ने लगता है। स्त्री का पति बनते हुए पुत्र का पिता बनते हुए नौकर का स्वामी बनते हुए, मनुष्य घमण्ड में ऐंठा जाता है। समझता है मानो मैं ही उसका बनाने वाला ब्रह्मा हूँ, पालन करने वाला विष्णु हूँ और नाश करने वाला शिव हूँ, पर उसकी मालिकी बात बात में धूल चाटती है।
-विवेक बुद्धि कहती है। नाशवान शरीर की क्षणिक लालसाओं को तृप्त करने की अपेक्षा स्थायी, अनन्त सच्चे आत्म सुख को प्राप्त करो। शरीर भले ही कष्ट में हो परन्तु सद्वृत्तियों द्वारा प्राप्त होने वाले सच्चे सुख को हाथ से न जाने दो ठीकरी को छोड़कर अशर्फी ग्रहण करो बहुत के लिए थोड़े का त्याग करो।
-अकसर धार्मिक विद्वान् भोगों को बुरा, घृणित और पापपूर्ण बताया करते हैं असल में उनके कथन का मर्म यह है कि इंद्रिय भोगों का दुरुपयोग करना बुरा है मध्यम मार्ग का अवलम्बन करना चाहिये अति और अभाव दोनों बुरे हैं।
-अपने लिए अपेक्षाकृत कम चाहना और दूसरों की सुविधा का ध्यान रखना यह मनोवृत्ति धर्म की आधार शिला है।
-हो सकता है कि अक्षर ज्ञान की दृष्टि से आप पीछे हों, परन्तु सद्बुद्धि तो परमेश्वर ने सबको दी है वह आपके पास भी कम नहीं है दीनता की भावना को आश्रय देकर आत्म तिरस्कार मत कीजिए।
(लेखक-श्री राधा कृष्णजी पाठक, सुपावली)
बात अधिक पुरानी नहीं है सुजान पुर में साधु शरण और मायापति नामक दो भाई अलग-2 रहते थे। साधु शरण बड़े संयमी, सदाचारी और परिश्रमी थे, इसके विपरीत मायापति दुराचारी, अपव्ययी और आलसी था। अपने दुर्व्यसनों में उसने अपने भाग की सारी पैतृक सम्पत्ति को उड़ा डाला। देव योग से साधु शरण अपनी पत्नी और छोटे बच्चे को छोड़कर परलोक वासी हो गये। अब तो मायापति की घात बन आई। उसने भाई की पत्नी और बालक को मार पीटकर घर से निकाल दिया और भाई की सारी सम्पत्ति पर कब्जा कर दिया।
माता घोर परिश्रम करके अपने पुत्र का पालन पोषण करने लगी। बालक बड़ा हुआ। उससे माता की कष्टकर दशा न देखी गई। अपनी नन्ही भुजाओं के बल पर कुछ कमाने की इच्छा से वह घर छोड़ कर बाहर चल दिया। कहते हैं कि सुकर्मी पिता की सन्तान दुख नहीं पाती। बालक पास के रेलवे स्टेशन पर मजदूरी करने पहुँचा। संयोगवश उस स्टेशन पर बम्बई के कोई बड़े सेठ बैठे थे। उन्होंने बालक के शरीर में एक सौम्य आत्मा का अस्तित्व देखा और उसे अपने साथ अच्छी नौकरी पर ले गया। बालक को पिता के सारे सद्गुण विरासत में मिले हुए थे। उसके गुणों ने सेठजी व उनकी पत्नि को पूर्णतः अपना बना लिया। वे निःसन्तान थे, इसलिये इस बालक को ही अपनी विशाल सम्पत्ति का उत्तराधिकारी बना कर स्वर्ग सिधार गये! बालक अपनी माता व पत्नी सहित उस करोड़ों की जायदाद का मालिक बनकर आनन्द पूर्वक जीवन यापन करने लगा।
इधर मायापति ने भाई की सम्पत्ति को भी थोड़े ही दिनों में उड़ा दिया। अन्त में उसे कोढ़ फूट निकला और प्रयाग में गंगा किनारे भिक्षा के दानों पर निर्वाह करने लगा। एक दिन वह बालक प्रयाग गंगा स्नान को गया, वहाँ अपने चचा की यह दुर्दशा देखी तो फूट-2 कर रोया और बहुत सा धन उन्हें निर्वाह के लिये दिया।
बहुत दर्शक उस दृश्य को देखने के लिये जमा थे। उन्होंने प्रत्यक्ष देखा कि धर्म आचरण और अधर्म आचरण का क्या फल होता है।
(ले. श्री रामशरण दासजी पिलखुआ)
एक बार श्री स्वामी अद्वेतानन्द जी महाराज ने प्रवचन करते हुए एक घटना सुनाई थी। वे कहते थे, कि हमने एक खजानची को देखा। पहले जब लोग उसका स्वभाव नहीं जानते थे। तब किसी ने उसे रुपया दिया। खजानची ने रुपया देने वाले से पूछा यह रुपया कैसा है? उसने कहा यह आपके ‘हक’ का रुपया है। खजानची ने रुपया वापिस देते हुए कहा-’हमारा हक कैसा? हमें तो तनख्वाह मिलती है, हम रिश्वत कभी नहीं लेंगे।’ उसने कभी किसी से रिश्वत नहीं ली। एक दिन कोई मनुष्य अपना काम ठीक होने पर उनके घर पर एक मटका ईख का रस दे आया। खजानची साहब उस समय घर पर थे नहीं, उनकी माता जी ने इसे ले लिया। जब खजानची साहब घर पर आये तो उन्हें रस आने की बात मालूम हुई। उन्होंने माताजी को समझाया कि-यह चीज तो हमें डुबो दे सकती है। किसी की चीज़ हम मुफ्त क्यों लें? उन्होंने उस रस को गरीब लोगों में बंटवा दिया और अपने काम में उसकी एक बूँद भी न लाये।
किसी का अनीतिपूर्वक धन ग्रहण करने की इच्छा न करके अपनी धर्म उपार्जित कमाई पर निर्वाह करने वाले सच्चरित्र व्यक्ति किसी महात्मा से कम नहीं है।
(ले-श्री रामकरण सिंह वैद्य, गोरखपुर)
सदाचार-श्रेष्ठ आचरण-अच्छा चालन चलन, यह मानव जीवन का बहुमूल्य खजाना है। सृष्टि के आदि काल से ऋषि मुनियों से लेकर आधुनिक विद्वानों तक यह बात स्वीकार होती आई है कि मनुष्य का गौरव इसमें हैं कि उसका आचरण श्रेष्ठ हो। भलाई, नेकी, उदारता, सेवा, सहायता, सहानुभूति से परिपूर्ण हृदय वाला व्यक्ति सदाचारी कहा जाता है, उसके बाह्य आचरण ऐसे होते हैं, जो दूसरों को स्थूल या सूक्ष्म रीति से निरन्तर लाभ ही पहुँचाते रहते हैं। वह एक भी कार्य ऐसा नहीं करता, जिससे उसकी आत्मा को लज्जित होना पड़े, पश्चाताप करना पड़े या समाज के सामने आँखें नीची झुकानी पड़ें।
मनुष्य चाहे जितना विद्वान् चतुर धनवान, स्वरूप वान, यशस्वी तथा उच्च आसन पर आसीन हो, परन्तु यदि उसका व्यवहार उत्तम नहीं तो वह सब व्यर्थ है, धूलि के बराबर है। खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा है, उस पर मीठे फल भी लगते हैं पर उससे दूसरों को क्या लाभ या धूप में तपा हुआ पथिक न तो उसकी छाया में शान्ति लाभ कर सकता है और न भूख से व्याकुल को उसका एक फल प्राप्त हो सकता है। जिसका आचरण श्रेष्ठ है वह किसी की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं धार्मिक उन्नति में जरा भी बाधा पहुँचाने वाला कार्य न करेगा वरन् उससे सहायता ही देगा।
आप अपने आचरणों को ऐसा रखिये, जिससे आपके माता पिता की कीर्ति में वृद्धि हो। आपको अपना मित्र कहते हुए दूसरे लोग गर्व अनुभव करें। छोटे लोग आपका उदाहरण सामने रख कर अपने आचरण को उसी साँचे में ढालने का प्रयत्न करें। स्मरण रखिए, सदाचार मानव जीवन का महान धन है। जो सदाचारी है, असल में वही सच्चा धनी है।
(ले-पं. रामदयालजी शर्मा, तिलहर)
अक्सर यह कहा जाता है कि-’माला जपने की क्या जरूरत है? मन से जप करना ही पर्याप्त है।’ यह ठीक है, कि जप का सीधा सम्बन्ध मन से ही है, यदि मन में जप की एकाग्र भावनाएं न हों तो केवल माला के मनके सरकाना कुछ अर्थ नहीं रखता। सिर खुजलाते रहना या ऐसा जप करते रहना, बराबर ही कहा जायगा।
लेकिन जो लोग सच्चे मन से जप करना चाहते हैं, उनके लिये माला एक उपयोगी और आवश्यक साधन है! घास खोदने वाला यदि चाहे तो उंगलियों से भी घास उखाड़ता रह सकता है, पर उसे अपना काम सुव्यवस्थित, जल्दी और सुविधापूर्वक करना है तो हंसिया या खुरपी की सहायता लेनी पड़ेगी। ठीक इसी प्रकार माला की जरूरत है। सब कोई जानते हैं कि चित्त का स्वभाव चंचल है स्वभावतः वह एक जगह पर नहीं टिकता। अभी यहाँ है तो अभी उड़कर कहीं दूसरी जगह चला जायगा। उसे एक जगह पर बराबर जोते रहने के लिये एक भौतिक प्रक्रिया की आवश्यकता है और वह प्रक्रिया माला के रूप में हम लोग प्रयोग करते हैं। शरीर की बाह्य क्रियाओं पर मन का कुछ न कुछ भाग अवश्य लगा रहता है। जैसे चाकू से कलम बनावे तो उसे मन किसी दूसरी कल्पना में जा सकता है, पर उसका अधिक भाग कलम बनाने की क्रिया में अवश्य उलझा रहेगा। इसी प्रकार केवल मन ही मन में जप करने पर चित्त दूसरी जगह उड़ जा सकता है। पर मुख से मन्त्र उच्चारण करने एवं हाथ से माला जपने की शक्ति न होने मन का कुछ न कुछ भाग भजन में जरूर उलझा रहेगा। पूर्ण अभ्यासियों को समाधि आनन्द लेते समय भले ही उसकी आवश्यकता न हो, परन्तु निश्चय ही आरम्भिक साधकों के लिये तो माला जपना आवश्यक है।
*समाप्त*