हे महाकाल!

(श्री स्वामी दरवारीलाल जी सत्यभक्त वर्धा)

हे महाकाल! तुम्हारी यह कैसी लीला है? आज लाखों आदमी निर्दयता से मारे जा रहे है, करोड़ों आदमी भूखों मर रहे हैं, उन्हें रात में सोने को भी जगह नहीं हैं, जीवनोपयोगी पदार्थों का ध्वंस हो रहा है मनुष्य मनुष्य को खाये जा रहा है, यह सब क्या है! तुम्हारी संहार लीला असमय में ही ऐसा प्रलयंकर रूप क्यों धारण कर रही है?

क्या कहते हो? यह मनुष्य के पापों का ही फल है? मनुष्य दल बाँधकर जब दूसरे मनुष्यों को देशों और वर्गों को चूस डालना चाहता है तब उसकी ऐसी ही दुर्गति होती है।

हे भयंकर! आदमियत पढ़ाने का तुम्हारा यह तरीका बड़ा निर्दय है पर क्या तुम समझते हो कि आदमी में इस प्रकार शैतानियत बढ़ाकर नंगा चित्र खींचकर तुम उसे दूर कर सकोगे? अभी तक तो ऐसा नहीं हुआ, शैतानियत बढ़ती ही जा रही है।

क्या कहते हो? जब तक आँच से लोहा गलेगा नहीं तब तक ढाला न जायगा! क्या इसीलिये मनुष्य जाति को इस प्रकार भट्टी में झोंके जाते हो। क्या मनुष्य जाति के भाग्य में और भी भयंकर विपदाएं वदी हैं? पर करोड़ों आदमी इतने में भी घबरा उठे है- उन्हें अभी भी यह सब असह्य है!

क्या कहते हो? जब वेदना असह्य होगी तब सब गल जायेंगे? क्या तभी अक्ल आयेगी? पर बहुतों को अक्ल आ चुकी है-वे गल भी गये हैं। अब तो थोड़े के पीछे बहुतों को गलना पड़ा रहा है।

ऐ! क्या कहते हो! बहुतों ने थोड़ों को छोड़ा नहीं है? तो क्या जब तक थोड़े न गलेंगे तब तक बहुतों को भी गलना पड़ेगा! हे न्याय मूर्ति! बात तो सच कहते हो। संसार पर शैतानियत का ताँडव करने वाले मुट्ठीभर लोग ही है, पर उनको उन लोगों का भी पीठ बल है जो उनकी शैतानियत से पिस रहे हैं। इन लड़ाकू स्वभाव के लोगों के पीछे उन मजबूरों, गरीबों तक का बल है जो खुद पूँजीवाद से कराह रहे हैं! पर दूसरे देशों के गरीबों को सताने में अपने नेताओं का साथ दे रहे हैं। तब तुम्हारा कहना ठीक ही है कि भस्म होकर भी बहुतों ने थोड़ों को छोड़ा नहीं है। पर हे शिव, ऐसे भी तो लोग हैं देश हैं जिनके न थोड़े न बहुत, किसी को पीसना नहीं चाहते है वे तो गले हुए हैं उन्हें भट्टी में क्यों डाल रक्खा है?

क्या कहा? वे कच्चा लोहा हैं? उनमें बहुत-सा भाग ऐसा है जिसे जलाकर नष्ट कर देना है। तो क्या उन्हें भी बहुत देर तक भट्टी में रहना पड़ेगा? हे शंकर यह क्या कहते हो? वे तो बहुत निर्बल हैं, दीन हैं, न्याय चाहते हैं। उन्हें यह दण्ड क्यों?

क्या कहते हो! निर्बलता का नाम या संयम नहीं है! ओह! तुम बड़े कठोर हो। पर मैं मानता हूँ कि तुम्हारे कहने में जरा भी झूठ नहीं है। निर्बल निर्बल नरों को चूसते हैं वहाँ हैवानियत है-संयम नहीं है। जब तक हैवानियत भस्म न हो जायेगी तब तक तुम उन्हें भी भट्टी में झोंके रहोगे। हे महादेव! तुम्हीं सत्य हो। जैसा समझो करो। तुम महाकाल हो, अनन्त हो। हम चार दिन के कीड़े तुम्हारी अनन्त गम्भीर, अनन्त उन्नति और अनन्त व्यापक नीति को क्या समझें! -संगम


Quotation

दिन भर के दुराचारों तथा बुरी आकाँक्षाओं से अलग रहना रात भर के भजन से ज्यादा अच्छा है।

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जिन्होंने शरीर को चकनाचूर कर डाला है। वह वीर नहीं कहलाते हैं। धन्य हैं वे वीर जो जितेन्द्रिय हैं।

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अपने साथ की हुई बुराई बालू पर लिखनी चाहिए और भलाई पत्थर पर।

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जो खुद ही अपना मालिक है वह दूसरों का भी बन जायेगा।

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जब स्वार्थ का अन्त समय आ जाता है तब क्लेश का भी अन्त समय होता है।


वह आ रहा है।

हमारी आंखें देखती है कि वह आ रहा है! ग्राह के फंदे से गज को छुड़ाने के लिए जैसे वह दौड़ा था वैसे ही शैतान के मुख में ग्रसित मनुष्यता को बचाने के लिए गरुड़ पर चढ़ा हुआ वह नटनागर तीर की तरह सन सनाता हुआ चला आ रहा है।

बस, बहुत हो चुका। मनुष्य को बड़ी करारी ठोकर लगी है। उंगलियां टूट गई हैं। घुटने फूट गये हैं और भेजे के बल ऐसा धड़ाम से गिरा है कि सिर में से खून की तलूली बन्ध रही है। मुद्दतों का खाया पिया निकल गया। मुद्दतों से पाली पोसी देह चकनाचूर हो गई। नस-नस में दर्द हो रहा है, चिल्लाने की भी ताकत नहीं रही अब तो वह असहायावस्था में पड़ा हुआ धीरे-धीरे कराह रहा है। अपना बल जिसके मद से वह पागल बना हुआ था और पर्वत को तृण समझता हुआ आकाश को अपनी मुट्ठी में लेने की तैयारी कर रहा था। आज वह बल चूर-चूर हो गया है। ग्राह से ग्रसित होकर गज का घमंड टूटा था, महायुद्ध की विनाश लीला ने मनुष्य का मद चूर कर दिया है। इन पंक्तियों के लिखे जाते समय तक संसार का बड़ा भारी विनाश हो चुका है और आगे और भी भयंकर त्रास होने वाला है। इस मर्मांतक के चोट से मनुष्य सिहर उठा है, उसकी आंखें अब खुली है और समझा है कि मैं चाहे जो करता रहूँ और उसकी कोई देखभाल न हो ऐसी बात नहीं है। बहुत उछलने वाला बालक जब माता की उपेक्षा करके अपने दुराग्रह पर जिद करता है तो माता उसे एक ठोकर खाने के लिए छोड़ देती है। अब वह चोट बहुत करारी लग चुकी है यह होश में ला देने के लिए कम नहीं है।

दयालु माता इस चोट के बाद चुप नहीं बैठी रहती वह दौड़ती है और पुत्र की मरहम पट्टी करती है। उसे पुचकारती है, छाती से लगाती है, दुराग्रह की हानि समझाती है और उपदेश करती है कि बेटा! अब ऐसा मत करना। सत्य को छोड़ कर असत्य की ओर, प्रेम को छोड़कर मोह की ओर, न्याय को छोड़कर अन्याय की ओर, जब मानव प्रवृत्तियाँ मुड़ी तो दिन दूने और रात चौगुने वेग से पतन के गर्त में गिरने लगी। आज वे उस स्थान पर आ पहुँची जहाँ अनंत होता है। ऊपर से गिरा हुआ पत्थर नीचे गिरता हुआ चला आता है और जब तक वह पतन मार्ग शेष रहता है तब तक वह क्रम जारी रहता है पतन मार्ग समाप्त होते ही नीचे के तल से वह टकराता है और एक बड़े शब्द के साथ चूर-चूर हो जाता है। आज असुरत्व अन्तिम सीढ़ी से टकरा कर मनुष्यता में विग्रह उपस्थित हुआ है।

विनायश्च दुष्कृताम् के अध्याय को पूरा करता हुआ, ‘धर्म संस्थापनार्थाय’ वह बड़े वेग से आ रहा है। मनुष्य दैवी तत्वों से बना हुआ है उसे देवता बनकर ही रहना है उसे देवता ही बन कर रहना होगा। कम से कम इस पुण्य भूमि भारती भगवती में तो वह देवत्व कायम ही रहेगा तेतीस कोटि देवताओं का यह सुरलोक पाप की पंक में पड़ा हुआ सड़ता नहीं रह सकता।

भगवान् सत्यनारायण आ रहे हैं। असुरता का शोधन करके सुरतत्व का निर्माण करने के लिए गरुड़ वाहन आज बड़े दूत वेग से भूमण्डल पर आ रहे हैं उनकी सुनहरी किरणों से दशाएं जगमगा रही हैं। ऊषा काल की मलय समीर जागृत आत्माओं को चैतन्य करती हुई उन्हें उठने का उद्बोधक कर रही हैं, और उस उद्बोधन से प्रभावित होकर ऋषि रक्त की असंख्य कर्मवीर आत्माएं उठ रही हैं और युग निर्माण की आधार शिला में अपने रक्त का पुण्य बलिदान देने के लिए प्रसन्न मुख खड़ी हुई है। लीलामय प्रभु की अलौकिक प्रतिभा भक्तजनों के अन्तर मनों में झाँक रही है और उन्हें विश्वास दिला रही है कि ‘धर्म’ संस्थापनार्थाय, मैं अविलम्ब आ रहा हूँ। विवेकवान आत्माएं श्रद्धापूर्वक दिव्य चक्षुओं से देख रही हैं, कि वह आ रहा है। सचमुच वह आ रहा है।


नव निर्माण कार्य

महाकवि होमर का कथन है कि “विनाश की पीठ पर नव निर्माण की आधारशिला रखी जाती है” एक वस्तु के नष्ट होने से ही उसके परमाणु दूसरी वस्तु बनाने में समर्थ होते हैं। नई तलवार बनाने के लिए किसी पुराने लोहे को अग्नि में तपाने और कूटने की क्रिया किये बिना काम न चलेगा। अंकुर उत्पन्न होने से पूर्व बीज का गलना आवश्यक है। तत्वदर्शी आत्माएं जानती हैं कि भविष्य में सुन्दर युग का निर्माण होने वाला है इसके लिए वर्तमान संसार को आग में गला कर तपाया जा रहा है हथौड़े की करारी चोटों से पीट पीट कर उसका नया स्वरूप बन रहा है। वर्तमान हाहाकारी परिस्थितियाँ बहुत अप्रिय एवं दुखद प्रतीत होती हैं तो भी इनके अन्तराल में एक सुखदायक भविष्य छिपा हुआ हमें दृष्टिगोचर होता है।

निस्संदेह संसार का यह ढांचा बिल्कुल बदल जाने वाला है जिसमें असत्य, लूट, छल, कपट, पाखंड, शोषण, घमंड, अपहरण, अत्याचार की प्रधानता है। इसके स्थान पर वह संसार बनेगा जिसमें कर्तव्य पालन, सेवा सद्भाव और भ्रातृत्व की प्रचुरता होगी। इस परिवर्तन कार्य का श्रेय ईश्वरीय अवतार को ही प्राप्त होगा। यहाँ भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं है। ईश्वर अवतार का अर्थ है “व्यापक सत्ता का एक ही स्थान पर प्रकट होना” हम नहीं समझते वरन् यह समझते हैं कि न्याय तुला का संतुलन ठीक करने के लिए, धर्म की ग्लानि का निवारण करने के लिए, दुष्कृतों का विनाश और साधुओं का परित्राण करने के लिए, एक ऐसा दिव्य आध्यात्मिक प्रचंड प्रवाह अदृश्य लोक में उत्पन्न होता है जिसमें संसार की सारी परिस्थितियों को बदल देने का बल होता है। उस ईश्वरीय प्रवाह को जागृत आत्माएं अनुभव करती हैं और तदनुसार कार्य करने के लिए उद्यत हो जाती हैं। रावण वध करने के लिए जो दिव्य आध्यात्मिक प्रवार लोक में उत्पन्न हुआ था उसमें असंख्य लोगों ने भाग लिया यद्यपि राम का कार्य सबसे ऊंचा गया और उन्हें ही अवतारी महापुरुष की उपाधि मिली तो भी वास्तव में वह कार्य अकेले राम ने ही नहीं कर लिया था, वरन् अनेक स्वार्थ त्यागियों का उसमें सहयोग था। कंस की दुर्नीति नष्ट करने का श्रेय कृष्ण को मिला तो भी अवतारी शक्ति की प्रेरणा से हजारों लोगों ने उस न्याय संतुलन में हाथ बटाया था। अमुक अवतारी महापुरुष ही युग परिवर्तन कर्ता था, या उसी ने धर्म स्थापना की ऐसा कहना उपयुक्त न होगा क्योंकि एक व्यक्ति फिर चाहे वह कितना ही महान क्यों न हो अन्य सहयोगियों की सहायता के बिना अपना काम पूरा नहीं कर सकता। इस बात को भली प्रकार स्मरण रखना चाहिए कि अवतार व्यक्तियों के रूप में नहीं वरन् एक प्रवाह, जोश, विचार परिवर्तन, उत्साह, उमंग के रूप में होता है। वह जोश ईश्वर निर्मित होने के कारण दिव्य अलौकिक एवं विशेष प्रभावशाली होता है, उससे असंख्य व्यक्ति प्रभावित होते हैं और अवतार की प्रेरणानुसार अधर्म को नष्ट करके धर्म स्थापना के लिए विशेष रूप से प्रयत्न करते हैं। अन्त में वह उद्देश्य पूरा होकर ही रहता है।

चारों ओर फैले हुए पाप पाखंड को नष्ट करने के लिए वर्तमान समय में जो ईश्वरीय अवतारी प्रेरणा अदृश्य लोक में उत्पन्न हुई है, उसका प्रभाव जागृत आत्माओं पर विशेष रूप से पड़ रहा है। जिसका अन्तःकरण जितना ही पवित्र है, जिसकी आत्मा जितनी ही निर्मल है वह उतना ही स्पष्ट रूप से ईश्वर की आकाशवाणी को, समय की पुकार को, सुन रहा है और अवतार के महान कार्य में सहायता देने के लिए तत्पर हो रहा है। समय की समस्याओं को वह ध्यान पूर्वक अनुभव कर रहा है और सुधार कार्य में क्रियात्मक सहयोग प्रदान कर रहा है। जिन लोगों की आत्माएं कलुषित है, पाप, अनीति और घोर अन्धकार ने जिनके अन्तःकरण को ढ़क रखा है, वे उल्लू और चमगादड़ की तरह प्रकाश देखकर चिढ़ रहे हैं। वे कुछ काल से फैली हुई अनीति को सनातन बताकर पकड़े रहना चाहते है। सड़े गले कुविचारों का समर्थन करने के लिए पोथी पत्र ढूंढ़ते हैं। किसी पुराने व्यक्ति की लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ यदि उन सड़े गले विचारों के समर्थन में मिल जाती हैं तो ऐसे प्रसन्न होते हैं मानो यह पंक्तियाँ साक्षात् ईश्वर ने ही लिखी हों। परिस्थितियाँ रोज बदलती हैं और उनका रोज नया हल ढूँढ़ना पड़ता है। इस सच्चाई को वे अज्ञान ग्रस्त मनुष्य समझ न सकेंगे और ‘जो कुछ पुराना सब अच्छा जो नया सो सब बुरे’ कहकर अपने अज्ञान और स्वार्थ का समर्थन करेंगे।

दीपक बुझने को होता है तो एक बार वह बड़े जोर से जलता है, प्राणी जब मरता हे तो एक बार बड़े जोर से हिचकी लेता है। चींटी को मरते समय पंख उगते हैं, पाप भी अपने अन्तिम समय में बड़ा विकराल रूप धारण कर लेता। युग परिवर्तन की संध्या में पाप का इतना प्रचंड, उग्र और भयंकर रूप दिखाई देगा जैसा कि सदियों से देखा क्या सुना भी न गया था। दुष्टता हद दर्जे को पहुँच जायगी, एक बार ऐसा प्रतीत होगा कि अधर्म की अखंड विजयदुन्द भी बज गई और धर्म बेचारा दुम दबा कर भाग गया, किन्तु ऐसे समय भयभीत होने का कोई कारण नहीं, यह अधर्म की भयंकरता अस्थायी होगी, उसकी मृत्यु की पूर्व सूचना मात्र होगी। अवतार प्रेरित धर्म भावना पूरे वेग के साथ उठेगी और अनीति को नष्ट करने के लिए विकट संग्राम करेगी। रावण के सिर कट जाने पर भी फिर नये उग आते थे फिर भी अन्ततः रावण मर ही गया। संवत् दो हजार के आसपास अधर्म नष्ट हो हो कर फिर जीवित होता हुआ प्रतीत होगा उसकी मृत्यु में बहुत देर लगेगी, पर अन्त में वह मर ही जायेगा।

तीस वर्ष से कम आयु के मनुष्य अवतार की वाणी से अधिक प्रभावित होंगे वे नवयुग का निर्माण करने में अवतार का उद्देश्य पूरा करने में विशेष सहायता देंगे। अपने प्राणों की भी परवा न करके अनीति के विरुद्ध वे धर्म युद्ध करेंगे और नाना प्रकार के कष्टों को सहन करते हुए बड़े से बड़ा त्याग करने को तत्पर हो जावेंगे। तीस वर्ष से अधिक आयु के लोगों में अधिकाँश की आत्मा भारी होगी और वे सत्य के पथ पर कदम बढ़ाते हुए झिझकेंगे। उन्हें पुरानी वस्तुओं से ऐसा मोह होगा कि सड़े गले कूड़े कचरे को हटाना भी उन्हें पसंद न पड़ेगा। यह लोग चिरकाल तक नारकीय बदबू में सड़ेंगे, दूसरों को भी उसी पाप पंक में खींचने का प्रयत्न करेंगे, अवतार के उद्देश्य में, नवयुग के निर्माण में, हर प्रकार से यह लोग विघ्न बाधाएं उपस्थित करेंगे। इस पर भी इनके सारे प्रयत्न विफल जायेंगे, इनकी आवाज को कोई न सुनेगा, चारों ओर से इन मार्ग कंटकों पर धिक्कार बरसेंगी, किन्तु अवतार के सहायक उत्साही पुरुष पुँगब त्याग और तपस्या से अपने जीवन को उज्ज्वल बनाते हुए सत्य के विजय पथ पर निर्भयता पूर्वक आगे बढ़ते जावेंगे।

अधर्म से धर्म का, असत्य से सत्य का, अनीति से नीति का, अन्धकार से प्रकाश का, दुर्गन्ध से मलयानिल का, सड़े हुए कुविचारों से नवयुग निर्माण की दिव्य भावना का घोर युद्ध होगा। इस धर्म युद्ध में ईश्वरीय सहायता न्यायी पक्ष को मिलेगी। पाँडवों की थोड़ी सेना कौरवों के मुकाबले में, राम का छोटा सा वानर दल विशाल असुर सेना के मुकाबले में, विजयी हुआ था, अधर्म अनीति की विश्व व्यापी महाशक्ति के मुकाबले में सतयुग निर्माताओं का दल छोटा सा मालूम पड़ेगा, परन्तु भली प्रकार नोट कर लीजिए, हम भविष्यवाणी करते हैं कि निकट भविष्य में सारे पाप प्रपंच ईश्वरीय कोप की अग्नि में जल-जल कर भस्म हो जायेंगे और संसार में सर्वत्र सद्भावों की विजय पताका फहरा वेगी।


दुर्दशा का अन्त

अनेक विद्वान, आध्यात्म तत्ववेत्ता, भविष्यदर्शी महानुभाव बहुत दिन पूर्व से ही यह कहते आ रहे हैं कि “सम्वत् 2000 में खण्ड प्रलय होगी। उस वर्ष संसार के ऊपर बड़ी बड़ी विकट आपत्तियाँ आवेंगी एवं बड़ा भारी जन संहार होगा, तत्पश्चात् नवीन युग की सतयुग की स्थापना होगी”।

उपरोक्त कथन से हम पूर्णतया सहमत हैं हमारा विश्वास है कि संवत् 2000 विक्रमी का वर्ष इतना महत्वपूर्ण है कि शायद अगले कई हजार वर्षों में इतना महत्वपूर्ण संवत् दूसरा न आवे। महायुद्ध का पूर्णतः अन्तिम निर्णय होने में तो अभी बहुत समय लगेगा परन्तु संवत् 2000 में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जावेंगी जिनके आधार पर अन्तिम निर्णय की भूमिका का भली प्रकार परिचय प्राप्त हो सकेगा। उलझी हुई गुत्थियाँ धीरे-धीरे सुलझने लगेंगी और यह पता चलने लगेगा कि इसका अन्त किस प्रकार होने वाला है। संवत् दो हजार के अन्त में आकाश साफ होने लगेगा और प्रभात के आगमन की पूर्व सूचना स्पष्ट रूप से प्राप्त होने लगेगी। इस वर्ष में तो कई बार परिस्थितियाँ पलटा खावेगी। कभी एक पक्ष कभी दूसरा पक्ष आगे पीछे बढ़ता दिखाई देगा, इस दरम्यान बुद्धि के मनुष्य कुछ ठीक-ठीक अन्दाजा न लगा सकेंगे, परन्तु वर्ष के अन्तिम दिनों में फैसले का अन्दाजा लगाना सर्वसाधारण के लिए भी सरल हो जायेगा।

संवत् 2000 में ही युद्ध का अन्त हो जायेगा ऐसा हम नहीं कहते। हमारी दृष्टि में यह कलह अभी आगे तक चलेगा। मित्र, शत्रु के रूप में और शत्रु मित्र के रूप में बदलते दिखाई देंगे। शान्ति के स्थानों में आग भड़केगी और आग उगलने वाले ज्वाला मुखी शान्त हो जावेंगे। लोगों को ऐसी ऐसी कई कठिनाइयों के बीच में होकर गुजरना पड़ेगा, जिसकी आज कल्पना भी नहीं की जा सकती। सोना, चाँदी, गोली, बारूद, तेल, कोयला, रसद, हथियार तथा मनुष्यों की बड़ी भारी क्षति होगी। साधनों के अभाव में थके हुए, परास्त देश प्रत्यक्ष रूप से पराजित, शान्त हो जायेंगे परन्तु उनके भीतर प्रतिहिंसा, क्षोभ तथा क्रोध की अग्नि धधकती रहेगी। यह अग्नि रह रह कर उभरेगी। शान्ति को भंग करके एक दम अशान्ति के चिन्ह प्रकट हो जाया करेंगे। जिन देशों की जीत होगी वह भी करीब-करीब पराजित से ही होंगे, क्योंकि हारे हुए देशों को काबू में रखने के लिये बलपूर्वक दमन की प्रणाली पर विशेष ध्यान देना पड़ेगा और उसमें उनकी शक्ति का बहुत अंश व्यय होता रहेगा। हो सकता है कि एक दो वर्ष में ही इस युद्ध की हार जीत प्रकट हो जाय, परन्तु वह स्थायी न होगी अक्सर अशान्ति, बगावत, खून खराबी, अव्यवस्था के उबाल आते रहेंगे और बार-बार संसार की शान्ति भंग होती रहेगी। शान्ति और व्यवस्था कायम करने में ही अत्यधिक शक्ति खर्च होती रहेगी। नव निर्माण का कार्य जहाँ का तहाँ अधूरा पड़ा रहेगा, क्योंकि शान्ति के बिना कोई नई व्यवस्था न तो स्थायी रूप से बन सकती है और न चल सकती है।

कौन पक्ष जीतेगा, इस प्रश्न का उत्तर देने की कोई आवश्यकता नहीं, केवल इतना ही कह देना पर्याप्त होगा कि निकटवर्ती फैसला जो कि शस्त्र बल से होगा, अस्थायी साबित होगा उसमें पूर्ण रूप से अधर्म का नाश न हो पावेगा और न पूर्ण रूप से धर्म की विजय होगी। यह कार्य अधूरा होगा। शस्त्रों का फैसला अस्थायी और धर्म का फैसला स्थायी होता है। शस्त्र विजय के साथ धर्म विजय की भी आवश्यकता है। संसार में सच्ची शान्ति शस्त्रों से नहीं वरन् ईमानदारी से होती है इस समय शक्ति के नशे में चूर होकर संसार शस्त्रों को प्रधानता दे रहा है, ईमानदारी का मूल्य उसकी समझ में न कुछ के बराबर है। बुद्धिमान लोग इसे भूल नहीं मानते, वरन् इसे अपनी बुद्धि, चातुरी, कूटनीतिकता मानते हैं। हमारा विचार है, कि शस्त्र की अपेक्षा ईमानदारी का बल अधिक है। महाप्रभु ईसा मसीह को सत्ता धारियों ने हथियार के बल से मिटा दिया था, परन्तु पीछे उन्हें पता चला कि हथियार से भी सत्य का बल अधिक है। आज शक्तिवान सत्ताधारी उसी भूल को फिर दुहरा रहे है। किसी भी प्रकार से जीत की लालसा मानवता को तिलाँजलि दे दी जाती है।

यह मनोभावनाएं जब तक काम करती रहेंगी। तब तक संसार में शान्ति कायम न होगी। बहुत ठोकरें खाने के बाद अभी वर्षों का बहुमूल्य समय खो देने के बाद बुद्धिमान लोग यह महसूस करेंगे, कि बारूद से नहीं सद्भावना से शान्ति कायम हो सकती है। जब विजयी और पराजित दोनों ही नाश, क्षोभ, क्रोध, उत्पात, खून खराबी और दमन से ऊब जायेंगे, तब वे भूल को महसूस करेंगे। बहुत कुछ खोने के बाद वे यह समझ पायेंगे कि लूट, आपा-पुती, शोषण और दमन की रीति बुरी है। झूठी-झूठी बातें प्रचारित करने से, बहकावे, और फुसलावे देने से, दूसरों को अपने पक्ष का नहीं बनाया जा सकता, वरन् हृदय परिवर्तन होने पर जो ईमानदारी का प्रत्यक्ष रूप से दिव्य दर्शन होता है, उसी के प्रभाव से परायों के दिल जीत कर उन्हें वे पैसे का और बिना हथकड़ी का गुलाम बनाया जा सकता है।

ऐसी सद्बुद्धि हमारे आज के राष्ट्रपतियों में देर से आवेगी। तब तक धरती माता रक्त से स्नान करती रहेगी। जिस दिन विवेकवान् मनुष्य हथियारों की अपेक्षा ईमानदारी को अधिक महत्व देंगे, उस दिन अन्तरिक्ष से उतरती हुई भगवती शान्ति देवी पृथ्वी पर प्रकट होगी। दोनों ही पक्ष जब थक जायेंगे तो निशस्त्रीकरण की आवश्यकता अनुभव करेंगे और विजय की अपेक्षा विश्व बन्धुत्व को महत्व देंगे। ऐसी भावनायें जब संसार में फैलने लगे तब समझना चाहिए कि सच्ची और स्थायी शान्ति का समय अब निकट आ गया।

सन् दो हजार में युद्ध अपनी भयंकरता पर रहेगा। इसके अन्तिम दिनों में अस्थायी विजय के चिन्ह प्रकट होने लगेंगे। उसके उपरान्त कुछ समय में महायुद्ध का निर्णय हो जायेगा। स्थूल दृष्टि से हथियारों का युद्ध समाप्त हो जावेगा, परन्तु क्रोध और प्रतिहिंसा की भावनाएं जीवित रहने के कारण सूक्ष्म युद्ध जारी रहेगा। इसके कारण कई वर्षों तक अशान्ति बनी रहेगी। साथ ही बीमारियों के प्रबल प्रकोप होंगे। भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़ आदि नाना प्रकार के देवी प्रकोपों से मनुष्य जाति का कष्ट बढ़ता रहेगा। अन्त में एक समय ऐसा आयेगा जब संसार के विचारशील मनुष्य मिलकर स्थायी शान्ति की मन्त्रणा करेंगे। जातिगत, देशगत, दलगत, तुच्छ, स्वार्थों को छोड़कर वे सम्पूर्ण मानव जाति की हित दृष्टि से कोई व्यावहारिक योजना बनायेंगे। सत्य और न्याय की प्रधानता रखने वाली भावनायें लोक में आदर प्राप्त करती हैं। इस सार्वभौम शान्ति की योजना का संसार में सर्वत्र आदर किया जायेगा। भ्रातृभाव, समता, सदाचार, प्रेम, ईमानदारी, न्याय के आधार पर विश्व हितकारी धर्म, नीति, ज्ञान, शिक्षा, समाज, शासन आदि की रचना होंगी। तब सतयुग दृष्टि गोचर होगा। इस कार्य में दस वर्ष भी लग जावें तो क्या उसे अधिक समय कहा जायेगा?

संवत् 2000 के बाद सतयुग आवेगा। इसका अर्थ यही लेना चाहिए, कि आगे के लिये उत्तम परिस्थितियाँ बनना आरम्भ हो जायेगा। आषाढ़ मास में दिन छोटा होना शुरू हो जाता है, परन्तु जिस दिन से दिन छोटा होना शुरू हुआ, उसके दूसरे ही दिन ऐसा नहीं हो सकता कि दिसम्बर की बराबर 10 घन्टे का दिन हो जायेगा। 14 घण्टे के दिन को 10 घन्टे का होने में प्रायः 6 महीने लग जाते हैं। इसी प्रकार संवत् 2000 के बाद श्रेष्ठ युग आने का बीजारोपण हो जायेगा और वह पौधा धीरे-धीरे बढ़ता हुआ अन्त में पल्लवित वृक्ष हो जायेगा। मनुष्य जीवन में जैसे एक घन्टे का कुछ विशेष महत्व नहीं है, वैसे ही विश्वव्यापी किसी भली बुरी व्यवस्था के कायम होने में पच्चीस पचास वर्ष भी अधिक नहीं है, सुन्दर आभूषण बनाने के लिए सोना लेकर सुनार बैठता है। कुछ समय में आभूषण बनकर तैयार हो जायेगा, परन्तु सुनार के सोना छूते ही वह नहीं बना जाता। सोने को गलाना, नये साँचे में डालना, खरादना, पालिस करना, यही सब जलाने, काटने, घिसने, ठोकने, पीटने के कार्य आरम्भ में होते हैं। सतयुग का निर्माण आरम्भ करते हुए परमात्मा भी वर्तमान सृष्टि की ऐसी ही ठोक पीट आरम्भ कर रहा है, जब तक आभूषण बिल्कुल साफ सुन्दर नहीं हो जाता, तब तक सुनार के औजार उस पर चोट करते ही रहते हैं। सर्वत्र पूर्ण रूप से सुव्यवस्था स्थापित होने तक संघर्ष, कष्ट और कठिनाइयों का दौर जारी रहेगा अवश्य ही धर्म युग प्रवर्तित होगा पर उसके आगमन से पूर्व हथौड़े की अनेक चोटें भी सहनी होंगी। केवल एक वर्ष कठिनाइयों में गुजारना है, ऐसा सोचने वाले अपने विचारों को बदल दें। इस निर्माण कार्य में अनेकों को बल पूर्वक नष्ट होना पड़ेगा और अनेकों को इस महान यज्ञ में अपनी स्वेच्छा आहुति देकर ईश्वरीय अवतार की इच्छा पूर्ण करनी होगी। तब कहीं क्रान्ति का समय उपस्थित होगा। उस उत्तम समय के लिए यदि दस वर्ष भी प्रतीक्षा करनी पड़े तो इतना समय इस महान कार्य के पूरा होने की तुलना में कुछ वर्णों के समान ही थोड़े प्रतीत होंगे।


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संसार में स्वार्थ के कारण सब झगड़े फैलते हैं। अगर इस संसार से स्वार्थ चला जाये तो यह अत्यन्त सुन्दर स्थान बन जायेगा।

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जो भाग्य के भरोसे पर बैठे हैं। प्रतीत होता है कि वे जीवन पर्यन्त बैठे रहेंगे।

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जब चोर चोरी के लिये मकान में आता है तो पहले निकलने का रास्ता देख लेता है। उसी तरह अगर तुम संसार से तथा साँसारिक चीजों से प्रेम करना चाहते हो तो इससे पहले वह रास्ता देख लो कि अगर तुम्हारा इनसे वियोग भी हो जाये, तो तुम्हारे हृदय में चोट न लगे।


युद्ध के बाद की दुनिया

पिछले लेखों में यह बताया जा चुका है कि गत शताब्दियों की सामाजिक, राजनैतिक, शारीरिक तथा मानसिक पापों का संशोधन करके संसार को निर्मल बनाने के लिये यह विपत्ति आई है। इसका उद्देश्य अव्यवस्था और अनीतियों को दूर करके नीति की स्थापना करना है। युद्ध चाहे कितनी ही जल्दी समाप्त हो जाय या कितना ही लम्बा चले पर इतना निश्चित है कि युद्ध का अन्तिम अन्त होने के उपरान्त एक विश्व व्यापी सतयुगी व्यवस्था का जन्म होगा।

इस व्यवस्था के मुख्य आधार यह होंगे (1) साम्प्रदायिक कलह का अन्त (2) पैसे का समुचित विभाजन (3) विश्व बन्धुत्व (4) शक्ति पर न्याय का नियन्त्रण (5) सदाचार को प्रोत्साहन (6) अधिकारों की रक्षा (7) अनिवार्य शिक्षा (8) सार्वभौम शासन (9) विज्ञान का सदुपयोग। इनकी रूपरेखा का मोटा ढांचा इस प्रकार समझना चाहिए।

(1) साम्प्रदायिक कलह का अन्त - शिक्षा की वृद्धि के साथ साथ सांप्रदायिक अन्धविश्वासों का अन्त हो जायेगा। यह लोगों की व्यक्तिगत मान्यता की चीज समझा जायेगा। उनको इस सीमा तक न बढ़ने दिया जायेगा कि एक दूसरे से उलझें या अपना दबाव दूसरे पर डालें। एक ही मानव धम्र की व्यापकता होगी। साधारणतः सब लोग एक ही धर्म को मानेंगे। व्यक्तिगत मत रखने की छूट होगी तो भी मजहबों को इतनी प्रधानता न मिलेगी कि दो व्यक्तियों को एक दूसरे से अलग कर दें। जैसे एक भाई कृष्ण उपासक दूसरा राम उपासक रहते हुए भी वे दोनों साथ-साथ एक घर में रहते हैं वैसे ही पति-पत्नी, पिता-पुत्र भिन्न मजहबों को पसन्द करते हुए भी प्रेम पूर्वक एक साथ रहेंगे। मजहब भेद के कारण व्यावहारिक जीवन पर कोई असर न पड़ेगा। इस प्रकार साम्प्रदायिक कलह का कोई कारण ही न रह जावेगा।

(2) पैसे का समुचित विभाजन- कोई आदमी आवश्यकता से अधिक व्यक्तिगत पूँजी जमा न करेगा। रोजगार हर आदमी को देने की जिम्मेदारी सरकार की होगी हर समर्थ आदमी को भोजन पाने के लिये परिश्रम करना पड़ेगा। व्यापार जनता की आवश्यकता पूरी करने के लिये होंगे धन एकत्रित करने के लिये नहीं। पैसा एक स्थान पर जमा न होकर सब लोगों तक पहुँचे ऐसी आर्थिक व्यवस्था बनाई जायेगी।

(3) विश्व बन्धुत्व - देश भक्त के नाम पर या जाति भक्ति के नाम पर, दूसरे देश या दूसरा जाति वालों के स्वार्थों का अपहरण न किया जायेगा। विदेशियों का शोषण करना, गुलाम बनाना, आक्रमण करना, संसार भर के सभी देशों को भाई चारे और समानता की दृष्टि से देखा जायेगा। देश भक्ति का अर्थ पड़ोसियों की अधिक सेवा ही रहेगा पर उसकी संकुचित सीमा न रहने दी जायेगी जिसके कारण अन्य देश जाति वालों के साथ अनीति का व्यवहार किया जाता है।

(4) शक्ति पर न्याय का निमंत्रण- आत्मोन्नति के लिए शक्ति बढ़ाने का अधिकार तो सब को होगा पर उन बुद्धि, शरीर, या पैसे की शक्तियों से दूसरों पर अन्याय करने का हक किसी को न होगा। अपने से कम शक्ति वालों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सताना, भ्रम में डालना, विवश करना, अपराध समझा जायेगा और उस अपराध को रोकने का राज्य की ओर से कठोर नियंत्रण किया जायेगा। बलवान को उच्छृंखल न होने दिया जायेगा। जिससे वह सेवा की बजाय शोषण में उसे लगावें।

(5) सदाचार को प्रोत्साहन -दूसरों की भलाई करने वाले परोपकारी, ज्ञानी, धर्म प्रचारक, वैज्ञानिक, शोध करने वाले, समाज सेवी, व्यक्तियों को राजकीय प्रोत्साहन प्राप्त होगा। भलाई, नेकी, ईमानदारी, परस्पर सहायता को कूट कूट कर मानव स्वभाव में भर देने के लिए शिक्षा के प्रत्येक सूत्र से काम लिया जायेगा। लोगों को सद्गुणी, सदाचारी, सेवाभावी, कर्तव्य परायण बनाने के लिए वातावरण तैयार किया जायेगा।

(6) अधिकारों की रक्षा- प्रत्येक मनुष्य को स्वतन्त्रता, समानता और सम्मान के साथ जीने का अधिकार है किन्तु स्वार्थी लोग अपने लाभ के लिए दूसरों के इस अधिकार का हनन करके नीच कोटि का जीवन बिताने के लिए बाध्य करते है। स्त्रियों के साथ, शूद्रों के साथ, भारतवर्ष में ऐसी ही अनीति ब्रती जाती है। विदेशों में भी अल्प ज्ञान और शक्ति वाले लोगों के साथ ऐसा ही व्यवहार होता है। यह अनीति बन्द कर दी जायेगी और लेखन सम्बन्धी, भाषण सम्बन्धी, आत्मोन्नति सम्बन्धी, स्वेच्छानुसार रहन सहन सम्बन्धी तथा कानून व्यवस्था में भाग लेने के नागरिक अधिकार सब लोगों को समान रूप से प्राप्त होंगे।

(7) अनिवार्य शिक्षा - अशिक्षित मनुष्य संसार के लिए भार रूप हैं मानसिक विकास की सुविधाएं शिक्षा के बिना प्राप्त नहीं हो सकती और न इस युग में अशिक्षित व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन समुन्नत हो सकता है। इसलिए समाज का यह कर्तव्य होगा कि हर व्यक्ति को कम से कम काम चलाऊ शिक्षा प्राप्त करने के लिए बलपूर्वक प्रेरित करें। अशिक्षित रहना कानूनन जुर्म बना दिया जायेगा। जो लोग स्वेच्छा से न पढ़ेंगे वे कैदखाने में पढ़ने के लिए बाध्य किये जावेंगे।

(8) सार्वभौम शासन - विश्व भर का एक संगठित राज्य होगा जो सब देशों को नीति मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करेगा और आन्तरिक शासन में तथा दूसरे देशों पर अनीति करने से सत्ताधारियों को रोकेगा। यद्यपि भाषा, संस्कृति और भौगोलिक दृष्टि से अलग अलग देशों की रचना रहेगी और उनका शासन भी वही के लोग करेंगे फिर भी सार्वभौम शासन का हर देश पर नियन्त्रण रहेगा जिससे कोई किसी को सता न सके।

(9) विज्ञान का सदुपयोग - विज्ञान द्वारा नित नये आविष्कार होते हैं। इनका उपयोग केवल मानव जाति की अधिक सेवा सुविधा के लिए ही किया जायेगा। चन्द लोगों के स्वार्थ साधन के लिए असंख्य लोगों के शोषण का कार्य जो आजकल यान्त्रिक आविष्कारों द्वारा हो रहा है वह न रहेगा। केवल उन्हीं आविष्कारों को प्रचलित रहने दिया जायेगा, जो सार्वजनिक लाभ के लिए सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर भी उपयोगी सिद्ध हो, हानिकारक यंत्र और आविष्कारों का प्रचलन न होने दिया जायेगा। उपरोक्त आधारों पर संसार की नई व्यवस्था रची जायेगी। कानून व्यवस्था, प्रथा, परिपाटी, संस्कृति, कला, शिक्षा का इस आधार पर निर्माण होगा जिससे चारों ओर ऐसे साधन जुट जावेंगे जो मानव जीवन की उन्नत, विकसित, सरल एवं प्रसन्नता मय बनाने में सहायक हों। अनीतियों और भ्रम पूर्ण धारणाओं के विरोध में ऐसा प्रचण्ड लोकमत तैयार होगा, जिसमें उनका एक क्षण के लिए भी जीवित रहना कठिन हो जायेगा। सब लोग सत्य, प्रेम, न्याय, सहानुभूति, सहायता एवं भ्रातृभाव के साथ सुखी सम्पन्न एवं सादा जीवन व्यतीत करेंगे। द्वेष, कलह, कपट, छल, दुराचार कही दिखाई भी न पड़ेगा। ऐसा सतयुग निकट भविष्य में शीघ्र ही आने वाला है। युद्ध की अन्तिम समाप्ति तक वर्तमान लोगों से बहुत लोग जीवित न रहेंगे पर जो रहेंगे वे उस स्वर्गीय समय का आनन्द प्राप्त करेंगे।


‘सत्य’ क्या है?

(भगवान वेदव्यास)

परत्र स्ववोध संक्रान्तये वागुक्ता सा यदि न वंचिता भ्रान्ता व प्रतिपत्ति बन्ध्या वा भवेदिति। एषा सर्वभूतोपकारार्थ प्रवृत्ता, न भूतोपघाताय। यदि चैवमप्यभिघीयमाना भूतोपघात परैव स्यान्न सत्यं भवेत् पापमेव भवेत्।

योग भाष्य 2/30

‘सत्य’ वह है, (चाहे वह वंचिता, भ्रान्ता और प्रति पत्ति बन्ध्या युक्त हो अथवा रहित) जो प्राणी मात्र के उपकारार्थ प्रयुक्त किया जाय न कि किसी प्राणी के अनिष्ट के लिए। यदि सत्यता पूर्वक कही गई यथार्थ बात से प्राणियों का अहित होता है - तो वह “सत्य” नहीं। प्रत्युत सत्या मास ही है और ऐसा सत्य भाषण असत्य में परिणत होकर पाप कारक बन जाता है। जैसे किसी गौ के अमुक मार्ग से जाने विषयक -गौ- घातक के पूछे जाने पर सत्य भाषी के यह कहने पर कि हाँ, गाय अभी अभी इस मार्ग से उधर को गई है। यह सत्य प्रतीत होने पर भी सत्य नहीं, प्रत्युत प्राणी घातक है। अतः आत्म रक्षार्थ एवं पर परित्राणार्थ अन्य उपायों के असंभव हो जाने पर असत्य भाषण करना भी सत्य ही है।


आश्चर्य पूर्ण भविष्यवाणियाँ

(लेखक- विद्याभूषण पं.मोहन शर्मा, विषारद, पूर्व सम्पादक ‘मोहिनी’)

आज का संसार हाहाकारमयी अवस्था में से गुजर रहा है, उसको देखते और अनुभव करते हुये मानव ने अन्तिम परिणाम के सम्बन्ध में बड़ी-बड़ी अटकलें लगाई हैं, इस एक बात के निर्णय के लिये विविध खोजों और भविष्य वाणियों के आधार पर आज नाना प्रकार की आश्चर्यमय और दिल दहला देने वाली बातें नित्य कही, सुनी और पढ़ी जा रही हैं। इन सब में सत्याँश और यथार्थता कहाँ तक कितनी है- इसका ठीक-ठीक जवाब तो आने वाला भविष्य और उसकी घटनाएं ही देंगी, परन्तु वर्षों से इस विषय में आशक्ति और दिलचस्पी रखने वाले जो सुनते और पढ़ते आ रहे थे उसका एक जीवित प्रमाण “वर्तमान महायुद्ध का तांडव नृत्य” आज हमारे सामने ही है और यह खण्डप्रलय जैसी दुर्घटना से कुछ कम नहीं है। अब तक करोड़ों मनुष्यों की इस महासंग्राम में आहुति पड़ चुकी है और इसके साथ ही साथ समग्र संसार में कठिनाइयों और दुखों का वेग उत्तरोत्तर वृद्धि ही पा रहा है। अतः आस्तिक मात्र के लिये यह मानने से कदापि इन्कार नहीं हो सकता कि इस भयंकर उथल पुथल के अनुष्ठान में विधातृ पुरुष! का अवश्य ही हाथ है और ऐसे दुर्निवार्य योग संसार में जीव मात्र के किसी भावी कल्याण को लेकर ही उपस्थित होते हैं। असत और कदाचार की बढ़ोत्तरी जब अपनी सीमा पार कर जाती है तब ही प्रसत रूपी अन्धकार को चीर कर सत्य सूर्य का दिव्यं लोक पृथ्वी भर में परिव्याप्त हो जाता है। प्रत्येक धर्म का प्राचीन इतिहास गौरव इसकी साक्षी करता है। इस भावी सत्योदय का आभास हमें संसार प्रसिद्ध ज्योतिविंदो की ज्योतिषक भविष्यवाणियों पर से भी कुछ-कुछ मिलता है, जिनमें से कुछ एक के आश्चर्यजनक उदाहरण पाठकों के लाभार्थ नीचे दिये जा रहे है। यद्यपि इनमें केवल युद्ध और खण्ड प्रलय जैसी भावी घटनाओं का उल्लेख आया है पर उनसे अन्तिम सुन्दर परिणाम की भी झलक मिलती है।

1-जगद्विख्यात श्वेताँग भविष्यवेत्ता नौस्ट्राडम का भविष्य कथन।

पंद्रहवीं शताब्दी के लगभग यूरोप में नौस्ट्राडम नामक एक महान ज्योतिष विज्ञानी पण्डित हो गया है, जिसने आगामी 7000 वर्षों के सम्बन्ध में प्रायः 100 भविष्यवाणियाँ की थी और जो प्रायः अब तक कालक्रम की कसौटी पर सत्य सिद्ध होती आ रही है। नौस्ट्राडम ने नैपोलियन बोनापार्ट महान के अभ्युदय और पतन का जैसा संकेत किया था, कालान्तर में वैसा ही हुआ। हिटलर के आगमन से संसार में महा विग्रह की ज्वालाएं फटने, फ्रान्स की मेजीनाट लाईन (किलाबन्दी) का असमय विध्वंस होने, बृद्धपेंता के आगमन और पुनः उनकी सत्ता लोप होने का उसका भविष्य कथन भी एक के बाद एक, सत्य होता चला आ रहा है वृद्धपेंता के आगमन की बात संसार के सामने ही है- अब इसके आगे क्या होगा- उसे भी दुनिया नौस्ट्राडम के इस भविष्य कथन से तौलकर देखेगी।

फ्रान्स की काया पलट के सम्बन्ध में उसने स्वलिखित भविष्यवाणियों में जिन घटनाओं का चित्रण किया था, वे आजतक बराबर घटित होती आई हैं, नौस्ट्राडम ने संसार के सुदूर भविष्य के सम्बन्ध में जो फलादेश वर्णन किया है, वह और भी आश्चर्यजनक तथा हृदय को कंपा देने वाला है। नौस्ट्राडम के कथनानुसार ‘सन् 1999 में एक भयंकर शत्रु उत्तर देशों का सम्राट आकाश मार्ग से योग्य रूप की धरणी पर अवतीर्ण होगा। इसकी भाषा, में सब ही विचित्र होंगे। हथियार आदि भी महाभयानक और संहारकारी होंगे। यह सम्राट उत्तर साइबीरिया की ओर से आवेगा। इसके बाद ही नौस्ट्राडम ने पेरिस के सर्वनाश और पतन की भी बात लिखी है। सन् 700 से संसार की पीठ पर महाप्रलय का ताण्डव नृत्य होगा और यह किसी महायुद्ध से नहीं वरन् भयंकर जल प्रलय से संसार का अन्त हो जायेगा। गोची का रेणु स्थल पुनः महा प्रशान्त समुद्र का रूप धारण करेगा। संसार का मानचित्र एकदम तब्दील हो जायेगा। आज जहाँ द्वीप समूह हैं, वहाँ समुद्र की लहरें गरजती लरजती दिखाई देंगी। जल के स्थान पर पृथ्वी और पृथ्वी के स्थान पर भयंकर जल पला वन का दुर्द्रश्य देखा जायेगा, परन्तु, नौस्ट्राडम ने यह कहा कि मानव जाति एकदम लुप्त प्रायः हो जायेगी बल्कि कुछ पुरुष इस महाप्रलय से भी जीते बचे रहेंगे और जो दुनिया को फिर से आबाद बनावेंगे।

2-हंगेरियन महिला ज्योतिषी बोरिस्का सिलवियर की भविष्यवाणी।

एक हंगेरियन महिला ज्योतिषी की, जिसने की सम्राट पच्चमजाँर्ज की मृत्यु और सम्राट अष्टम एडवर्ड के सिंहासन परित्याग की बिल्कुल ठीक भविष्यवाणी की थी, भविष्यवाणी है कि यूरोप की राजनैतिक अशान्ति शीघ्र ही परिसीमा पर पहुँच जायेगी और ऐसा महायुद्ध छिड़ेगा जो 1942 तक चलेगा। यह महिला मृत्यु, विनाश तथा दुनिया के रद्दोबदल की ऐसी भविष्यवाणी करती है कि दर्शकों और श्रोताओं को पूरा विश्वास हो जाता है हालांकि खुद उसे अपनी इस शक्ति का कोई मान नहीं है, वह तो केवल इतना जानती है कि किसी अद्भुत अज्ञात शक्ति के द्वारा वह भविष्य को जान जाती है। उसकी भविष्यवाणियाँ अक्सर कितनी सच होती हैं, यह सिद्ध करने के लिये वह संवाद पत्रों की कतरनों की एक बड़ी फाइल अपने पास रखती है।

3- प्रसिद्ध यूरोपीय दैवज्ञशीरो की भविष्यवाणी

“यूरोप की ईसाई जाति यहूदियों को पेलिस्टाईन में आबाद करेंगी जिसके कारण इस्लाम के रहनुमाँ ईसाइयों के सख्त खिलाफ हो जायेंगे। टर्की, रूस की सहायता से पैलिस्टाइन को पुनः अधिकृत कर लेगा। ईसाई और यहुदी कौमें एक होंगी और फिर आपस में जोरों से लड़ बैठेंगी। यह लड़ाई महायुद्ध का भयंकर रूप धारण करेगी। ब्रिटिश साम्राज्य पर जगह-जगह आक्रमण शुरू हो जायेंगे। इंग्लैण्ड भारत को स्वतन्त्र कर देगा पर मजहबी फिसाद तथा युद्ध से भारत तबाह हो जायेगा यहाँ तक कि हिन्दू, बौद्ध और मुसलमानों में बराबर-बराबर विभक्त हो जायेगा। इटली जर्मनी मिलकर फ्रान्स के विरुद्ध युद्ध का दावानल प्रज्वलित करेंगे। अन्त में इंग्लैण्ड और जर्मनी मित्र बन जायेंगे। रूस, चीन, और तातारी लोगों की विशाल रण वाहिनी तैयार करेगा। अमेरिका जापान और मेक्सिकों के युद्ध में जूझेगा। लम्बी जंग में ब्रिटेन को भारी से भारी क्षति होगी। लन्दन का बहुत सारा भाग और पूर्वी तट के अनेकानेक सुन्दर नगर हवाई आक्रमण से तहस नहस हो जायेंगे। ‘शीरो’ ने पृथ्वी के अंग भंग हो जाने के विषय में भी अत्यन्त विस्मय पूर्ण भविष्यवाणी की है। सन्-1965 के भीतर ही यह महान दुर्घटना होने का योग बताया है। प्रशान्त महासागर से लेकर पनामा, मेक्सिको, संयुक्त राज्य तथा केनेडा आदि भूभागों में भूकम्प का दौर शुरू होगा। इससे मार्किन संयुक्त राज्य अमेरिका के कई बड़े शहर जमींदोज हो जायेंगे।

उत्तरी अटलाँटिक महासागर में एक विशाल टुकड़ा निकल कर उत्तप्त जल धाराओं में परिणत हो जायेगा। अमेरिका के दीप समूह शीत प्रधान हो उठेंगे। इंग्लैण्ड, आयरलैण्ड, डेनमार्क, नार्वे, रूस, जर्मनी आदि में शीत का इतना प्रलय होगा कि इन देशों में मनुष्य जाति आबाद न रह सकेंगी। ‘शीरो’ ने अमेरिका और जापान के युद्ध के सम्बन्ध में भी लिखा है कि अमेरिका और जापान में ऐसा महासंग्राम छिड़ेगा जो वर्षों पर्यन्त जारी रहकर जन धन की अपार हानि का कारण होगा। अन्त में अमेरिका इधर मेक्सिकों पर कब्जा जमा लेगा और जापान के हाथ में सुदूर पूर्वी एशिया के गर्म मुल्क आ जायेंगे। बाद में चीन और जापान एक होकर पूर्व से सारी विदेशी कौमों को निकाल बाहर करेंगे, एशिया महाद्वीप का अधिक से अधिक भाग इन्हीं दो जातियों का भोग थल बन जायेगा।

4-मिश्र देश की प्राचीन मीनार पर लिखी हुई भविष्यवाणी

पदरी वाल्टरबेन ने इस भविष्यवाणी को पढ़कर एक लेख में खुलासा दिया है कि “शीघ्र ही सत्य के प्रचार और अभ्युदय का युग आने वाला है। इसके पहले एक संसारव्यापी महायुद्ध होगा जिसमें सारी दुनिया सम्मिलित हो जायेगी। मीनार पर यह भी लेख है कि यह युद्ध 1936 में आरम्भ होगा।”

5- वेजीलटिन की भविष्यवाणी।

स्पेन के एक साइन्स वेश्रामिस्टर जी वेजीलेटिन कहते हैं अब से छप्पन वर्ष में पृथ्वी समीपवर्ती ग्रहों से भिड़ जायेगी और इनके इतने पास पास हो जाने का फल यह होगा कि वह उन गैसों को जिन पर हमारे जीवन का आधार है नष्ट कर देंगे और लाखों जीव जन्तु कुछ ही घन्टों में मृत्यु का ग्रास हो जावेंगे और बाकी उन्मत अवस्था में जीवित रहेंगे।

6- स्वामी विवेकानन्द की भविष्यवाणी

श्री स्व स्वामी विवेकानन्द जी महाराज ने कुछ काल पूर्व निम्न आशय की भविष्यवाणी की थी -

मित्रों! मैं आपको यह शुभ संवाद सुनाता हूँ, इसे ध्यान पूर्वक सुनो तथा औरों को सुनाओ कि शीघ्र ही शुभ समय का आगमन होने वाला है। लोगों के दिल आशाओं से परिपूर्ण हो जायेंगे, द्वेष, विरोध, छल, कपट, स्वार्थ के स्थान पर, प्रेम मुहब्बत, त्याग, ईमानदारी, परोपकार, भाईचारे का बाहुल्य होगा। सद्ज्ञान की ऐसी उत्तम वर्षा होगी कि जनता के कुम्हलाये हुए दिल हरे हो जायेंगे। जब वर्षा होती है तो गंदे नदी नाले भी नवीन जल से भर जाते हैं। इसी प्रकार शान्ति युग में जो प्रेम धर्म की बाढ़ आवेंगी उसमें अधर्मी, अज्ञानी, अपराधी, स्वभाव के मनुष्य भी अपने दुर्गुणों को छोड़कर सद्गुणों को अपने अन्दर प्रसन्नता पूर्वक धारण करेंगे।


रामकृष्ण परमहंस के उपदेश

सीखते-सीखते समुद्र पार कर सकते हैं। इसी प्रकार ब्रह्मरूपी समुद्र में तैरने के लिये पहले बहुत से निष्फल प्रयत्न करने पड़ेंगे फिर पार हो सकोगे।

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अपने कार्य को सिद्ध करने के लिये बहुत से प्रयत्नों की जरूरत है। दूध में मक्खन है इस तरह चिल्लाने से मक्खन नहीं मिलेगा। दही जमाओगे, तब दूध चलाओगे, तब मक्खन मिला इसी तरह ईश्वर से मिलना है तो आध्यात्मिक साधनों का ज्ञान करते रहो। हे ईश्वर ! हे ईश्वर! कहने से क्या फायदा?

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भंग-भंग कहने से नशा नहीं चढ़ता है। भंग को पीसकर पानी में छानकर पीने से नशा चढ़ता है। हे ईश्वर! हे ईश्वर! कहने से कुछ नहीं ईश्वर की उपासना करते रहोगे तो लाभ होगा।

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मनुष्य का अहंकार दूर होते ही उसे मोक्ष मिलता है।

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जब एक पैना काँटा पैर में लग जाता है तो उसे वैसे ही दूसरे काँटे से निकाला जाता है। फिर दोनों को फेंक देते हैं। इसी तरह हमको सापेक्ष अज्ञान का नाश सापेक्ष ज्ञान होना चाहिए। जब मनुष्य को सर्वोच्च ब्रह्मा का बोध हो जाता है तो वह अज्ञान और ज्ञान दोनों द्वन्द्वों से रहित हो जाता है।

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अगर तुम माया के सच्चे स्वरूप को पहचान लोगे, तो वह तुम्हारे पास से ऐसे भाग जायेगी, जैसे मनुष्य को देखकर चोर भाग जाते हैं।


प्रलय की समीपता

कुछ दिन पूर्व ‘तेज’ अखबार में संसार के प्रसिद्ध ज्योतिषियों की एक सम्मिलित भविष्यवाणी छपी थी। वह इस प्रकार है -

“नवम्बर सन् 1941 ई. में एक स्याह सितारा निकलेगा, जो इस समय केवल दूर दर्शक यन्त्र से ही दिखाई देता है। ख्याल है कि मई सन् 1943 ई. को के पहले सप्ताह के बाद यह सितारा साफ तौर पर दिखाई देने लगेगा। अँधेरी रात में जब आकाश निर्मल होगा, तो उस समय तेज दिखाई देने वाले लोगों को ‘एलडीवेरिन’ अर्थात् लाल रोशनी वाले तारे की दाहिनी तरफ एक छोटा सा तारा चमकता हुआ दिखाई पड़ेगा। सन् 1944 के बहार के मौसम में यह तारा भली भाँति दिखाई देने लगेगा ओर धीरे-धीरे इसमें प्रकाश बढ़ना आरम्भ हो जायेगा। यहाँ तक कि जनवरी सन् 1953 ई. में जब हम आकाश की तरफ देखेंगे, तो हमको एक बहुत बड़ा रोशन सितारा मालूम होने लगेगा।

सन् 1935 ई. में इसका पूर्व की ओर आना आरम्भ होगा और धीरे-धीरे मेष राशि में प्रवेश करेगा और बृहस्पति के पास जा पहुँचेगा। इस समय इस सितारे में इतना प्रकाश बढ़ जायेगा कि बृहस्पति का प्रकाश भी इसके आगे मन्द हो जायेगा।

जनवरी सन् 1953 ई. से इस सितारे का आकार बड़े वेग से बढ़ने लगेगा। यहाँ तक कि बढ़ते-बढ़ते जुलाई सन् 1953 ई. कि यह चौदहवीं रात के चाँद के बराबर हो जायेगा। इसके बाद भी इसका आकार बढ़ता रहेगा और 1 अगस्त सन् 1953 को वह और भी बड़ा दिखाई देने लगेगा। यह सितारा बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ जाय तो उसके विनाशकारी लक्षण आरम्भ होंगे, जो इतने आश्चर्य जनक और भयानक होंगे कि जिनसे अब तक न तो संसार का काम, सुख और न आगे इससे अधिक विनाश की सम्भावना नहीं है। जुलाई सन् 1953 ई. के मध्य से समुद्र की लहरों की उथल-पुथल आरम्भ होगी और इस तूफान से न्यूयार्क स्पेन, फ्रांसिस्को और सब ही समुद्र के किनारे के नगरों में पानी की बाढ़ आयेगी और फिर भी समुद्र की लहरें बराबर बढ़ती रहेंगी। 1 अगस्त 1953 ई को यह लहरें समुद्र से 300 फुट ऊँची ही जायेगी और पानी की इस भयावनी दीवार के आक्रमणों से पृथ्वी का विनाश होने लगेगा, यहाँ तक कि वह सभी नगर जो समुद्र के पास स्थित हैं तबाह हो जायेंगे, कोई इमारत बाकी न बचेगी और न वहाँ के निवासी ही जीते जागते रह सकेंगे। जो लोग वहाँ से भागकर ऊँचे स्थानों पर जाना चाहेंगे, उनका भी यह पानी की बाढ़ पीछा करेगी क्योंकि पानी बराबर बढ़ता चला जावेगा।

अब यह सितारा आकाश में पश्चिम की ओर चलता हुआ दिखाई देगा और इसका आकार भी दिन पर दिन बड़ा होकर चाँद के आकार से दस गुना हो जायेगा, फिर यह सितारा पृथ्वी के पास आ जायेगा और फिर यह होगा कि नित्य दो बार समुद्रों से बहुत बड़ी लहरें उठा करेंगी, जो एक महाद्वीप को डुबो देंगी। यहाँ तक कि पहाड़ों की चोटियों के सिवाय सारी पृथ्वी पानी में डूब जायेगी वह लोग बड़े भाग्यशाली होंगे, जो कि पहाड़ की चोटी या किसी दूसरे स्थान पर जा पहुंचेंगे और जब 11 अगस्त को वह नीचे की और देखेंगे तो जहाँ तक उनकी दृष्टि जायेगी, पानी ही पानी लहराता हुआ दिखाई पड़ेगा और जब आकाश की ओर देखेंगे तो भयानक सितारा चमक रहा होगा। इस सितारे के उदय होने के बाद सूर्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा और सन् 1953 ई. में जब हम इस सूर्य की तरफ देखेंगे तो महाद्वीप का आकार घट जाने के कारण पृथ्वी से बहुत भोग पत्थर मालूम पड़ेगा, यहाँ तक कि 1 जनवरी 1954 ई को सूर्य का आकार आजकल के आकार से आधा दिखाई देने लगेगा। अब धीरे-धीरे इस प्रलयकारी बाढ़ का वेग घट जायेगा और फिर यह दशा होगी कि पानी कही इन अवस्था में न दिखाई दे, जिधर भी दृष्टि जायेगी बर्फ के तूमे ही देख पड़ेंगे।


Quotation

स्वर्ग का रास्ता बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है। धन तो संसार में बहुत से छोड़ जाते हैं, किन्तु नाम तो बिरला ही छोड़ता है।

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किसी दूसरे में दोष बतलाना स्वयं अपने दोषों का ही बतलाना है। लोग समझ लेते हैं कि यह अपने दोषों की दूसरों पर रखकर प्रकट कर रहा है।

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संसार दर्पण के सदृश है, वह तुम्हारे रोने पर रोता है और हँसने पर हँसता है।

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किसी को पीठ पर रखकर पार करने के बजाय तैरना सिखाकर, वह खुद पार हो जाया करें, ऐसा बना दिया हो तो बहुत ही अच्छा है।

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दूसरों के द्वारा तुम अपना आदर चाहते हो, तो पहले दूसरों का आदर करो।

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सूम से सीखो, कि वह श्रेष्ठ को तो पास में रखता है और सड़े गले को फेंक देता है।


महाराजा रणजीत सिंह की भविष्यवाणी

(सेठ रामशरणदास जी पिलखुआ)

हिन्दू महासभा के नेता श्री चन्द्रगुप्त जी बेदालंकार कुछ दिन हुए पिलखुआ पधारे थे। उस समय आपकी एक पुस्तक ‘हिन्दु हृदय की धधकती ज्वाला’ हमें मिली। उसमें पंजाब के महाराजा जी रणजीत सिंह की बड़ी सुन्दर भविष्यवाणी का वर्णन है, जिसका साराँश यह हैः-

“परम पूज्य वाद प्रातः स्मरणीय जी महाराजा रणजीत सिंह जी जीवित थे। एक दिन एक अंग्रेज एक नक्शे के साथ महाराजा के दरबार में उपस्थित हुआ। नक्शे में कुछ लाल रंग था बाकी में सफेद। पूछने पर अंग्रेज ने कहा कि जो भाग नक्शे में लाल है वह अंग्रेजों के अधीन हो चुका है, और जो सफेद है वह बाकी बचा है। फिर कुछ झिझक कर बोला - ‘लेकिन बाकी सफेद भी लाल हो जायेगा।’

इस समय श्री महाराजा के सेनापति शाम सिंह भी पास बैठे थे वह बोले- महाराज! क्या इस तलवार के होते हुए भी ऐसा हो जायेगा? महाराजा रणजीत सिंह ने कहा- हाँ इसके होते हुए भी।

उनको दुखी देखकर महाराज बोले शामसिंह इसके लिए दुखी होना व्यर्थ है। होनहार को कोई रोक नहीं सकता। इसमें संदेह नहीं, कि एक बार यह पूरा नक्शा लाल हो जायेगा। पर जब समय पलटेगा, तब फिर से बदल जायेगा, शामसिंह ने पूछा- “ऐसा समय कब आयेगा? महाराज ने उत्तर दिया कि इसके सम्बन्ध में ठीक ठीक तो कुछ कहा नहीं जा सकता पर मुझे ऐसा जान पड़ता है कि 100 वर्ष बाद हालत बदलेगी और यहाँ के निवासी अपना शासन आप सम्भालने योग्य हो जायेंगे। उस समय वे स्वभाग्य निर्णय का अधिकार पा सकेंगे -सतयुग से


अद्भुत भविष्यवाणी

सन् 1555 ई में नोस्त्रदामन ने एक पुस्तक प्रसिद्ध की थी, जिसका शीर्षक था, ‘माइकेल डी नोस्त्रदामस की शताब्दियाँ और सच्ची भविष्यवाणियाँ’ और जिसमें आश्चर्यजनक भविष्य कथनों का संग्रह था। ञ्जद्धद्ग हृद्गख्ह्य क्रद्गक्द्बद्गख् नामक एक नियत कालिक में उसका संक्षिप्त विवरण दिया है। आधुनिक विश्वव्यापी महासमर के सम्बन्ध में इसमें यों कहा है-

“1940 में हमारे सम्मुख एक भीषण संकट पूर्ण दशा उपस्थित होगी, जो 1944 तक प्रचलित होगी। इसी काल में अनेक शासन संस्थाएं मटियामेट हो जायेंगी और विशेष रूप से फ्रान्स में अवस्थित सरकार को भीषण क्षति उठानी पड़ेगी। 1940 में योरोप रणचन्डी की रंगभूमि में परिवर्तित बन जायेगा। जर्मनी एवं इटली में अधिनायकों या तानाशाहों का शासन प्रस्थापित होगा। फ्रान्स शत्रुदल से परास्त हो विरोधियों के चंगुल में फंस जायेगा”।

इस द्रष्टा के सम्बन्ध में उक्त मासिक पत्र में यह जानकारी दी गई है। फ्रान्स के सेंट रेमी नामक स्थान में नोस्त्रदामस का जन्म 1503 ई के दिसम्बर मास के 13वें दिनाँक को हुआ। इनके माता-पिता फ्रेंच-यहूदी वंश के थे। छुटपन से ही विज्ञान, दर्शन एवं वैद्यक शास्त्र में ये दिलचस्पी लेने लगे। वैद्य की योग्यता प्राप्त करने के उपरान्त शीघ्र ही प्लेग का बड़ा भारी प्रकोप हुआ और इन्हें पर्याप्त ख्याति मिल गई। इनका दावा था कि उस भीषण रोग से छुटकारा पाने का उपाय इन्हें विदित था, पर इनकी मृत्यु के उपरान्त वह सुगुप्त उपाय विलुप्त हुआ।

मिलान नामक नगर में सर्वप्रथम इन्होंने अपनी प्रेक्षणीय भविष्यवाणी के कथन का सूत्रपात किया। एक दिन ये नगरी में संचार कर रहे थे कि एक भिक्षुओं का दल इनके सम्मुख आ उपस्थित हुआ। उस दल में (स्नद्गद्यद्बफ् क्कद्गह्द्गह्लह्लद्ब) फैली पेरेत्ती नामक एक युवक संन्यासी था। वह निर्धन माता-पिता का पुत्र था और उस समय उसे तनिक भी प्रसिद्धि नहीं मिली थी। नोस्त्रदामस के साथियों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ, जब वे तुरन्त उस अज्ञात युवक संन्यासी के पैरों को पड़कर बड़े आदर व अभिवादन करने लगे। जब उनसे प्रश्न किया कि, एक साधारण व्रती के लिए उसने ऐसा आदर क्यों कर दर्शाया? तो उत्तर मिला मैंने भावी पोपमहोदय को प्रणाम किया है।’ प्रेक्षक एवं अन्य उपस्थित लोगों की राय हुई कि, वे पागल होकर ऐसी बातें कर रहे हैं। पर 1585 में पंचम सेक्टस पोप के नाते (क्कद्गह्द्गह्लह्लद्ब) पेरेत्ती की प्रस्थापना हुई।

असन्देह नोस्त्रदामस ने भूले की हैं, परन्तु हैं वे बहुत ही अल्प कचित पाये जाने वाले गलतियाँ छोटी स्वरूप की है, ऐसा प्रतीत होने में कोई देरी नहीं लगती है। उदाहरणार्थ, उनकी यह भविष्यवाणी कि अगस्त, 1939 में वर्तमान महासंग्राम का सूत्रपात होगा, कुछ ही दिनों से न्यून है। उनका यह भविष्य कथन भी अशुद्ध था कि, 1940 में स्विट्जरलैंड की राह से फ्राँस पर धावा किया जायेगा और जिस जर्मन तानाशाह की बदौलत समूचे योरप में रणचंडी का ताण्डव नृत्य शुरू होगा, उसको उन्होंने ‘हिस्टर’ (॥द्बह्यह्लद्गह्) नाम दिया है। वास्तव में यह है ‘हिटलर’।

वर्तमान महायुद्ध 1944 मैं समाप्त होगा, पर 1945 में पुनरपि फ्राँस एवं इटली के मध्य युद्ध छिड़ जायेगा। इस अवसर पर फ्राँस का नेता नूतन एवं प्रभावशाली नरेश होगा और इन्हीं की तेजस्विता के फलस्वरूप फ्राँस इटली को परास्त कर देगा। फ्राँस की सीमा राइन नदी तक विस्तृत हो जायेगी और वह इटली एवं स्पेन पर शासन प्रस्थापित करेगा।

1566 ई स. मैं जौलाई मास में रात्रि के समय उन्होंने अंतिम भविष्यवाणी की अपने सेवक से, जिसने रात्रि के समय प्रातःकाल तक शुभ रात्रि की आकाँक्षा प्रकट की, उगाहने कहा- नहीं जी, सूर्योदय के समय मैं यहाँ न रहूँगा। उसी रात्रि को निद्रा में उसने शरीर का त्याग किया। -वैदिक धर्म


लार्ड टेनसिन की भविष्यवाणी

सन् 1855 ई में इंग्लैण्ड के संसार प्रसिद्ध महाकवि लार्ड टेनसिन ने एक पद्य द्वारा वर्तमान महायुद्ध के सम्बन्ध में भविष्यवाणी की थी। वह आज बिल्कुल सच हो रही है। आज कल जिन हवाई जहाजों, वर्मो, गैसों का प्रयोग हो रहा है उनका सन् 55 में नाम भी न था फिर भी उस महाकवि ने अपनी दिव्य दृष्टि से भविष्य को ठीक-ठीक जान लिया था। नीचे वह पद्य भविष्यवाणी दी जा रही है।

स्नशह् ढ्ढ स्रद्बश्चश्चद्गस्र द्बठ्ठह्लश ह्लद्धद्ग द्धह्वह्लह्वह्द्ग

स्नशह् ड्डह्य द्धह्वद्वड्डठ्ठ द्गब्द्ग ष्शह्वद्यस्र ह्यद्गद्ग,

स्ड्डख् ह्लद्धद्ग क्द्बह्यद्बशठ्ठ शद्ध ह्लद्धद्ग ख्शह्स्र.

्नठ्ठस्र ड्डद्यद्य ह्लद्धद्ग ख्शठ्ठस्रद्गह्ह्य ह्लद्धड्डह्ल ख्शह्वद्यस्र ड्ढद्ग.

स्ड्डख् ह्लद्धद्ग द्धद्गड्डक्द्गठ्ठज्ह्य द्धद्बद्यद्य ख्द्बह्लद्ध ष्शद्वद्वद्गह्ष्द्ग,

्नह्द्दशह्यद्बद्गह्य शह् द्वड्डद्दद्बष् ह्यड्डद्यद्यह्य.

क्कद्बद्यशह्लह्य शद्ध ह्लद्धद्ग श्चह्वह्श्चद्यद्ग ह्लख्द्बद्यद्बद्दद्धह्ल स्रह्शश्चश्च

ष्ठशख्ठ्ठ ह्लद्धद्गद्बह् ष्शह्यह्लद्यब् ड्ढड्डद्यद्गह्य. द्बठ्ठद्द

स्ड्डख् ह्लद्धद्ग द्धद्गड्डक्द्गठ्ठह्य द्धद्बद्यद्य ख्द्बह्लद्ध ह्यद्धशह्वह्लद्बठ्ठद्द

ञ्जद्धद्गह्द्ग ह्ड्डद्बठ्ठद्गस्र ह्लद्धद्ग द्दद्धड्डह्यह्लद्यब् स्रद्गख्.

स्नह्शद्व ह्लद्धद्ग ठ्ठड्डह्लद्बशठ्ठज्ह्य ड्डद्बह्द्यब् ठ्ठड्डक्द्बद्गह्य,

द्दह्ड्डश्चश्चद्यद्बठ्ठद्द द्बठ्ठ ह्लद्धद्ग ष्द्गठ्ठह्लह्ड्डद्य ड्ढद्यह्वद्ग.

ञ्जद्बद्यद्य ह्लद्धद्ग ख्ड्डह् स्रह्ह्वद्व ह्लद्धह्शद्यद्यद्गस्र ठ्ठश द्यशठ्ठद्दद्गह्

्नठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ड्ढड्डह्लह्लद्यद्ग द्धद्यड्डद्दह्य ख्द्गह्द्ग द्धह्वह्द्यद्गस्र

ढ्ढठ्ठ ह्लद्धद्ग श्चड्डह्द्यद्बड्डद्वद्गठ्ठह्ल शद्ध द्वड्डठ्ठ ह्लद्धद्ग द्धद्गस्रद्गह्ड्ड-

ह्लद्बशठ्ठ शद्ध ह्लद्धद्ग ख्शह्द्यस्र.

ञ्जद्धद्गह्द्ग ह्लद्धद्ग ष्शद्वद्वशठ्ठ ह्यद्गह्वह्यद्ग शद्ध ह्लद्धद्ग द्वशह्यह्ल

स्द्धड्डद्यद्य द्धशद्यस्र द्धह्द्गह्लद्धह्वद्य ह्द्गड्डद्यद्वद्बठ्ठ द्बठ्ठ ड्डख्द्ग

्नठ्ठस्र द्मद्बठ्ठस्रद्यब् द्गड्डह्ह्लद्ध ह्यद्धद्ग ढ्ढ ह्यद्यह्वद्वड्ढद्गह्

रुद्गड्डश्चह्ल द्बठ्ठ ह्वठ्ठद्बक्द्गह्ह्यड्डद्य द्यड्डख्.

अनुवादः मैंने भविष्यकाल का स्वप्न देखा जहाँ तक कि मानवी आँख देख सकती हैं, मैंने जगत

की अद्भुत और अनुपम बातें देखी। देखा किः-

आकाश व्यापार सामग्री से भरपूर है और बड़े-बड़े व्यापारिक जहाज बहुमूल्य वस्तुएं जल्द-जल्द एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जा रहे हैं।

देखा कि “आकाश शोर गुल कुला हल और भिन्न-भिन्न शब्दों की गूँज से भर गया हैं और भीषण बम वर्षा हो रही है और देखा कि भिन्न-भिन्न देशों के वायुयान जो आकाश मण्डल में गुंथे हुए युद्ध में संलग्न एक दूसरे पर बम बरसा रहे है। जब तक उनकी लड़ाई समाप्त न हुई यह सब कुछ देखा परिणाम यह हुआ कि “अन्त में जंगी बाजे बन्द हो गये और लड़ाई के कपड़े (वर्दियाँ) लपेट कर रख दिये गये, आदमी आदमी बनकर बैठे। आपस में विचार करके उन्होंने संसार को मेल मिलाप और शान्ति का संदेश दिया जहाँ सबकी सम्मति से एक अंतर्राष्ट्रीय राज्य संगठन स्थापित हुआ और धरती माता उस समय सुख की नींद सोई।”

इससे प्रतीत होता है कि इस महायुद्ध के पश्चात् श्रेष्ठ युग आवेगा। लोग द्वेष, कलह, स्वार्थ, अपहरण, शोषण, अत्याचार आदि पापों को छोड़कर परस्पर प्रेमपूर्वक सत्य और न्याय का व्यवहार करते हुए रहेंगे जिससे यह पृथ्वी स्वर्ग के समान आनंददायक हो जावेगी। उस समय को सतयुग कहने में किसी को क्या आपत्ति होगी?


संवत् 2000 और युग परिवर्तन

(ले. श्री सत्यभक्त जी संपादक सतयुग)

इस समय संवत् 2000 ने काफी महत्व प्राप्त कर लिया है। कुछ भविष्यवक्ताओं की कृपा से जिनमें सच्चे और झूठे दोनों ही तरह के शामिल हैं सर्व साधारण में यह ख्याल फैल गया है कि संवत् 2000 में पृथ्वी की काया पलट हो जायेगी, अवतार प्रकट होगा और सर्वत्र सतयुग बढ़ने लगेगा, जिससे मनुष्य मात्र अत्यन्त सुख पूर्वक रहने लगेंगे।

मेरे विचार से भी संवत् 2000 में युग परिवर्तन की सम्भावना है, पर उसको लोगों ने जो बढ़ा हुआ काल्पनिक रूप दिया है वह भ्रमोत्पादक है। मेरा तो ख्याल है कि जो लोग 1 अगस्त 1943 को अवतार के प्रकट हो जाने और पूर्ण रूप से सतयुग का साम्राज्य कायम हो जाने का दावा करते हैं, उनको आठ महीने बाद ऐसी डींगें मारने का मौका न मिलेगा और शरमिन्दा होना पड़ेगा। मैं यह नहीं कहता कि इस तरह से सभी लोग धूर्त या स्वार्थी हैं, पर इतना तो कहना ही पड़ेगा कि वे बहुत भोले हैं और युग परिवर्तन जैसे गम्भीर विषय को समझने के लिये अयोग्य हैं।

मैंने अपनी सामान्य बुद्धि से तथा प्राचीन भविष्यवाणियों से सहायता लेकर इस विषय पर जितना विचार किया है उससे मुझे यही प्रतीत होता है कि संवत् 2000 एक बड़े महत्व का वर्ष होगा, जिसकी चर्चा इतिहास में सैकड़ों वर्ष तक होती रहेंगी। उसमें जो घटनायें होंगी उनसे युग परिवर्तन की सत्यता सब लोगों पर प्रकट हो जायेगी और यह निश्चित रूप से दिखलाई पड़ने लगेगा कि संसार का मौजूदा रूप अब कायम नहीं रह सकता।

पर यह कहना या ख्याल करना कि संवत् 2000 में सब लड़ाई झगड़े खत्म होकर सुख शान्ति का समय आ जायेगा कतई ठीक नहीं। यह कहना भी कि इस वर्ष में तमाम पापियों का नाश हो जायेगा और केवल धर्मात्मा ही बचे रहेंगे एक ख्याली पुलाव पकाना है। संवत् 2000 में युग परिवर्तन का क्या स्वरूप होगा इसके विषय में कुछ लोगों से बातें करते हुये मेरे दिमाग में एक उपमा आई थी।

वह यह कि संवत् 2000 में नये युग का आगमन उसी प्रकार होगा जिस प्रकार 25 दिसम्बर को बड़ा दिन माना जाता है। अगर किसी साधारण मनुष्य या स्त्री से 28 या 30 दिसम्बर को भी पूछा जाय कि क्या दिन बड़ा हो गया? तो वह कभी इसे ठीक न बतलायेंगे। वे लोग एक डेढ़ महीने बाद ही यह अनुभव कर सकते हैं कि दिन कुछ बड़ा हुआ है और मौसम में भी अन्तर पड़ने लगा है।

इसी प्रकार संवत् 2000 में वर्तमान स्थिति की गम्भीरता और भयंकरता अपनी चरम सीमा पर पहुँच जायेगी, जिससे अधिक बढ़ना सम्भव न होगा। पर इसके बाद भी बहुत समय तक संसार में मार काट और नाश के कार्य होते रहेंगे और कोई सुख की नींद न सो सकेगा। हम यह नहीं कहते कि वर्तमान योरोपीय महासागर अन्त तक इसी तरह चलता रहेगा या महंगाई एक ऐसा ही रूप बना रहेगा। नाश के और भी बहुत से रास्ते हो सकते हैं जिनको गिनाने की यहाँ जरूरत नहीं।

हमारा अनुमान है कि यह नाश का सिलसिला कम से कम पन्द्रह-बीस साल तक भिन्न-भिन्न रूपों में चलता रहेगा जिसके फल से पृथ्वी की आबादी बहुत कम हो जायेगी और किसी के मन में युद्ध का हौंसला शेष न रहेगा। उसके बाद नये सिरे से दुनिया का संगठन होगा जिसमें वर्तमान राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, सब प्रकार के विचार बदल जायेंगे और मनुष्यों में मौजूदा समय की अपेक्षा बहुत अधिक एकता और समानता उत्पन्न हो जायेगी। इस कार्य का संचालन ‘अवतार’ करेगा या कोई हमारे जैसा साधारण मनुष्य यह तो मैं नहीं कह सकता पर इतना मुझे दिखलाई पड़ता है कि उस समय तक यूरोपियन देशों की प्रधानता नष्ट हो जायेगी और उनकी जगह अमेरिका दुनिया का नेता माना जाने लगेगा। एशिया के प्रति उसका व्यवहार और आचरण भी योरोप वालों की बनिस्बत मित्रता और सहानुभूति का होगा और इसके फल से संसार में से बहुत समय के लिये आपस की कलह और युद्धों का अन्त होकर एक विश्व संघ की स्थापना हो सकेगी।


Quotation

स्वर्ण की अग्नि से और दृढ़ मनुष्य की विपरीत समय से परीक्षा होती है।


सन्तोष का फल मधुर है।

(श्री नारायण प्रसाद जी तिवारी ‘उज्ज्वल’)

किसी कसाई के यहाँ एक बकरा और कुत्ता था, बकरे को वह अच्छे स्थान पर बाँध कर नित्य हरी-हरी घास खिलाता, उसके रहने का स्थान साफ किया करता था। कुत्ते को सूखे रूखे टुकड़े दे दिया करता था। धूप, वर्षा, शीत का कष्ट सहन करते हुए, सूखे टुकड़े पाकर अपने मालिक की सेवा करता हुआ कुत्ता अपने मन में विचार करने लगा, मैं इतना कष्ट सहन कर मालिक की सेवा करता हूँ और बकरा जो कुछ भी सेवा नहीं करता उसे सुस्वाद भोजन मिला करते है। इस प्रकार के विचारों से ईश्वर के अस्तित्व अथवा उसके न्याय पर शंका होने लगी।

बकरा दिन-दिन मोटा होने लगा, जिससे कुत्ते की ईर्ष्या भी बढ़ने लगी। जब बकरा खूब तैयार हो गया तो कुत्ते ने देखा कि कसाई ने अपनी छुरी उसकी गर्दन पर फेर दी और माँस विक्रय कर जितना उस बकरे के लिए व्यय किया था, उससे कई गुना लाभ कमाया।

कुत्ते ने यह देखकर नास्तिक भाव से घृणा कर यह विश्वास किया कि ईश्वर न्यायी हैं, हराम की कमाई किसी दिन इसी प्रकार जान पर संकट लाती है। रूखी सूखी खाकर सन्तोष से जीवन व्यतीत करने का फल मीठा होता है।


सतयुग की अंतर्दशा

यह बात अनेक प्रमाणों से सिद्ध होती है कि संवत् 2000 में कलियुग को आरम्भ हुए 4400 वर्ष के करीब होते हैं। निर्णय सिन्धु में ऐसा उल्लेख है कि कलियुग में 4400 वर्ष समाप्त होने पर नया युग आरम्भ होगा।

चत्वार्पाब्द सहस्त्राणि चत्वार्याब्द शतानिच।

कलेर्यदागमष्यन्ति तदापूव युगाश्रिता॥

- निर्णय सिन्धु पूर्वार्द्ध

अर्थ- कलियुग के 4400 वर्ष चले जाने पर पहले युग के से अर्थात् द्वापर युग के से काम होने लगेंगे।

प्राचीन इतिहास में इस बात के अनेक प्रमाण मिल सकते हैं कि एक युग में दूसरे युग के अन्तर भी प्रचलित होते रहते हैं। सतयुग में हिरण्यकश्यप, त्रेता में रावण, द्वापर में कंस जैसे अधर्मी राजाओं के अनीति पूर्ण समय बहुत समय तक रहे हैं यद्यपि उन युगों का धर्म उत्तम था फिर भी बुरे लोगों की बाहुल्यता होने के कारण बुरा समय बढ़ने लगा। नियम है कि जैसे एक विंशोत्तरी दशा में अन्य ग्रहों की अंतर्दशा बढ़ती हैं एवं एक योगिनी दशा में अन्य अर्न्तदशाएं आती रहती हैं वैसे ही एक युग के अंतर्गत अन्य युगों के समय भी आते रहते हैं। चन्द्रमा एक राशि पर सवा दो दिन रहता है परन्तु इतने ही समय में सवा दो दो घन्टे की अनेक लग्न राशियाँ व्यतीत हो जाती हैं। इसी प्रकार भले युगों में बुरे और बुरे युगों में अनेक युगों के अन्तर समयानुसार बढ़ते रहते हैं।

महाभारत शान्ति पूर्व 69-79 में युधिष्ठिर से कहा हैः-

कालोवा कारण राशो राजा वा काल कारणम्।

इति ते संशयोयाभूद् राजा कालस्य कारणम्॥

अर्थात्- हे युधिष्ठिर तुम ऐसी दुविधा मत करो कि समय के भले बुरे होने से राजा अच्छे बुरे होते हैं या राजा के कारण समय भला बुरा हो जाता है वास्तव में राजा ही समय ही कारण हैं। जैसा राजा होता है वैसा ही समय बदल जाता है।

राजा कृतयुग सृष्टा त्रेताया द्वापरस्यच।

युगस्यच चतुर्थस्य राजा भवति कारणम्॥

कृतस्य कारणत् राजा स्वर्गमत्यन्त मश्रुते।

त्रेताया कारणत राजा स्वर्गंनात्यन्त मश्रुते॥

प्रवर्तनाद् द्वापरस्य यथा भाग मुपाश्रते।

कलेर्प्रवर्तना द्राजा पाप मत्यन्त मश्रुते॥

महाभारत शान्ति अ. 69

अर्थात्- सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग का निर्माण करने वाला राजा ही होता है। राजा चाहे जैसे युग उपस्थित कर सकता है, जिस राजा ने सतयुग का समय उपस्थित किया हो वह अत्यन्त स्वर्गन्तों पहुँचता है जिस राजा ने त्रेतायुग उपस्थित किया हो उसे साधारण स्वर्ग मिलता है। जिस राजा के आचरण से द्वापर युग उपस्थित हो वह जैसा करता है वैसा भोगता है परन्तु जिस राजा के कारण कलियुग के से आचरण होने लगे वह अत्यन्त पापी होता है।

उपरोक्त श्लोकों में यह स्पष्ट हो जाता है कि यद्यपि युगों की लम्बी काल गणना क्रम पूर्वक चलती रहती है तो भी बीच-बीच में राजा तथा जनता के सहयोग से अन्य युगों की अंतर्दशा भी उपस्थित होती रहती है। जो लोग काल गणना में भ्रम से फैली हुई रूढ़ि के अनुसार कलियुग के चार लाख बत्तीस हजार वर्ष का मानते हैं और अभी सत्युग को दूर समझते हैं उन्हें जानना चाहिए कि ऐसा होने पर भी ‘निर्णय सिन्धु’ के प्रमाण से सम्वत् 2000 के बाद अच्छे युग की अंतर्दशा का आगमन होगा ओर बुरा समय व्यतीत होकर श्रेष्ठ काल की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी।


1943 में विश्व-संग्राम समाप्त होगा?

क्या 1943 में विश्व में शान्ति स्थापित होगी? इसका जवाब ‘एस्ट्रालाजिकल मैगजीन’ बंगलौर के सम्पादक ने ‘हाँ’ में दिया है। ग्रहों की स्थिति से मालूम होता है, कि मंगल का जोर होने से नया साल संसार के लिये पीड़ादायक है। भीषण संग्राम होंगे, अकाल का राज्य रहेगा, भूकम्प, आँधी और तूफान का जोर रहेगा और भीषण नरसंहार होगा।

‘युद्ध’ का भविष्य क्या है? रूस को शायद दो मोर्चों पर लड़ना पड़े, मगर अन्त में उसकी विजय होगी। जर्मनी, इटली और यूरोप के अन्य देशों में गृह युद्ध होंगे व भीषणा दुर्भिक्ष पड़ेगा। जापान में नारकीय घटनाएं घटेंगी और उनका जापान के भविष्य पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। जापान की महत्वकाँक्षाओं पर तुषारापात रहेगा। मित्र राष्ट्र खोये अड्डों और देशों को पुनः विजय करके जय लाभ करेंगे। इस साल अनेक निर्णयात्मक युद्ध होंगे और इनमें मित्र राष्ट्रों का पलड़ा भारी रहेगा और विजयी होंगे और युद्ध से पीड़ित संसार में अन्त में शान्ति स्थापित होगी।

भारत का अगला साल कैसा गुजरेगा? अराजकता फैलेगी। राजनीतिक गति अवरोध को दूर करने के प्रयत्नों के सफल होने की संभावना कम है। राष्ट्रीय नेताओं के जेल से छूटने की आशा है। यह भी संभव है कि इस साल भारत को वास्तविक सत्ता प्राप्त हो जाये।

1943 का भविष्य

इस समय युद्ध, अकाल, बाढ़ और बीमारी अपना शिकार ढूँढ़ने में एक दूसरे से प्रतियोगिता कर रहे हैं। क्या समस्त संसार में 1943 के अन्दर शान्ति स्थापित होगी? इसका जवाब ‘एस्ट्रालाजिकल मेगजीन’ ने इस प्रकार दिया हैः-

ग्रहो की स्थिति

राजा चन्द्रमा

मन्त्री मंगल

शस्याधिपति शुक्र

धन्याधिपति बृहस्पति

मेघाधिपति मंगल

रसाधिपति सूर्य

निरसाधिपति शुक्र

सेनाधिपति मंगल

अर्धाधिपति मंगल

पश्त्राधिपति श्रीकृष्ण

इससे स्पष्ट है कि मंगल चार पदों का अध्यक्ष हैः- मन्त्री, मेघाधिपति, सेनाधिपति और अर्धाधिपति। सूर्य निम्न कक्षा में चला गया है। फलतः राजा और शासक नाममात्र के होंगे और वास्तविक शक्ति सेना के हाथ में होगी। चन्द्र राज्य परिवार का होते हुए भी नीच गृह के साथ पड़ा है। गृह राज्य के महत्वपूर्ण विभाग मंगल के पास है।

मंगल का प्रभाव

नया साल मकर लगन के साथ आरम्भ होता है। इसका फल संस्कृत ग्रन्थों के अनुसार यह होगा कि उत्तरीय देशों में महान विनाश होगा। राजा और राज्य परिवारों को कष्ट होगा पश्चिमी देशों में फसल अच्छी होगी। वर्षा ठीक न होगी। मंगल ही इस साल गृह राज्य का प्रधान मन्त्री और प्रधान सेनापति है। इस कारण इसका क्या नतीजा होगा यह सहज ही में अन्दाजा किया जा सकता है। मंगल खूनी लड़ाइयां, भूकम्प, ज्वालामुखी पहाड़ों का फटना, सामुद्रिक तूफान राजाओं में गलतफहमी का कारण होगा। अतः इस साल भयंकर रक्तपात होगा। सब गृह राहू और केतू के बीच में इस साल के शुरू में आये हैं और सूर्य का बुध के साथ होना अनिष्टकर है। नीरसाधिपति केन्द्र में है। अतः रुई, रेशम और धातुओं के व्यापार में कुछ सुधार होगा। गुड़, चीनी, नमक, मक्खन, बिनौला और महँगे होंगे और कही-कही अप्राप्य हो जायेंगे। अन्नों का भाव बहुत अस्थिर रहेगा और विनाशक ऊँचाई पर पहुँच जायेगा। वर्षा का मालिक इस साल मंगल है, इसलिये हवा ज्यादा चलेगी मगर वर्षा अपर्याप्त होगी।

मंगल का प्रभाव

मंगल के सेनापति होने से संसार भर में बुराई का जोर होगा। शस्य नष्ट हो जायेगा। राजाओं के बीच विकराल युद्ध होंगे। शुक्र चल अवस्था में है। अतः बुराई तेजी से फैलेगी। स्त्रियों की शिकायतें ज्यादा सुनाई देंगी। धर्म प्रचारकों की आवाज ज्यादा कमजोर पड़ जायेगी।

मृत्यु

बृहस्पति का शनि से तीसरे लगन में होना भी खराब है। इसका फल यह होगा कि लंका और विन्ध्याचल के बीच के देशों में लोगों की बहुत मृत्युएं होगी। भूमध्य रेखा और 20 दशांश के बीच अर्थात् दक्षिण भारत, लंका, वर्मा, हिन्द चीन, स्याम, मलाया, मिश्र, और फ्रेंच पश्चिमी अफ्रीका, वेस्टइण्डीज, पनामा नहर में बहुत मौतें होगी। अक्टूबर 1943 में दुर्भिक्ष, अन्न का अभाव और आतंक होगा।

मित्र राष्ट्र विजयी होंगे।

1940 में हमने कहा था कि मित्र राष्ट्र अन्त में बहुत मुसीबतें उठाकर विजयी होंगे। 1943 के शुरू में बृहस्पति चक्रगति होकर मई 1943 में कर्क राशि में प्रविष्ट होगा। इसलिये जब तक वृहस्पति सीधी चाल में नहीं आता तब तक मित्रराष्ट्रों को कुछ पराजयों का मुँह देखना पड़ेगा, लेकिन बृहस्पति के ठीक होते ही हालत सुधर जायेगी। 1943 ई अग्निकाण्डों, भूकंपों, विस्फोटों, सम्पत्ति और जीवन के विनाश के लिये प्रसिद्ध होगा। मंगल के सेनापति होने से लड़ाई का जोर रहेगा। फलतः आदमी बड़ी तादाद में मरेंगे। दुर्भिक्ष और बीमारी से भी लाखों आदमी मरेंगे। जनता उत्तेजित रहेगी और मजदूरों के झगड़े दुनिया भर में जोरों पर होंगे। अराजकता का सर्वत्र राज्य रहेगा और शान्त और गंभीर विचारों और सलाहों का निरादर होगा जंगलों, पुराने किले बन्दियों और रणक्षेत्रों में प्राणी की महान बलि दी जायेंगी दुर्भिक्ष से नागरिक लोग ऊब उठेंगे और भारी मुसीबतें उठायेंगे। बड़ी-बड़ी व्यापारिक फर्में दिवालिया हो जायेंगी और उनका नाम भी मिट जायेगा।

भारत में

भारत में अराजकता फैलेगी। राजनीतिक अवस्था अस्थिर रहेगी। प्रभावशाली लोगों द्वारा राजनीतिक गति अवरोध दूर करने के लिये प्रयास किए जावेंगे। मगर उनकी सफलता की आशा बहुत कम है। बृहस्पति के कर्म में प्रविष्ट होने के साथ भारत की हालत कुछ सुधर जायेगी और शायद राष्ट्रीय नेता जेलों से छूट जावें। गम्भीर, भावुक स्थितियों में से कुछ वास्तविक सत्ता मिल जायेगी। पाकिस्तान की आवाज और अधिक बुलन्द होगी, लेकिन कमी भी अस्तित्व में आयेगी।

पनडुब्बियों का उपद्रव

इंग्लैण्ड में लोग अधिक आशावान होंगे और अंग्रेज अपनी वीरता और धीरता से शत्रुओं पर विजयी होंगे। अटलाँटिक में पनडुब्बियों का उपद्रव बढ़ेगा। यूरोप भूखण्ड में बीमारी, अकाल और सख्त सर्दी का जोर रहेगा। जर्मनी, इटली और नाजी अधिकृत देशों में व्यापक गृह-युद्धों के होने की सम्भावना है। जर्मनी के लिये यह साल निश्चित रूप से खराब है। जर्मनी सेना को भारी क्षति पहुँचेगी। हिटलर का भाग्य सूर्य अस्त हो जायेगा।

संयुक्त राज्य अमेरिका

संयुक्त राज्य अमेरिका में व्यापक छल-कपट और षड़यन्त्र आदि का राज्य रहेगा। खोये अड्डों और देशों को पुनः लेकर मित्र राष्ट्र विजय लाभ करेंगे।

रूस का भविष्य

रूस के लिये यह साल अच्छा है। केवल दूसरी तिमाही में कुछ खराब समय उनका आ गया। रूसी फौजें बहुत बहादुरी दिखावेंगी। सम्भव है कि रूस को दो-दो मोर्चों पर लड़ना पड़े। मगर वह हमलावरों को पराजित कर देगा।

चीन और भारत

चीन जापानी आक्रमण को रोकेगा। चीन भारतीय मामलों में अधिक दिलचस्पी लेगा। यह भी सम्भव है कि इन दोनों देशों में और घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित होकर किसी किस्म की मैत्री हो जाय। संयुक्त राज्य से मदद अधिक मिलेगी।

जापान

जापान पर जोरों की बम वर्षा होगी। जापान की महत्वाकाँक्षाओं पर तुषारापात होगा। साइबेरिया में जापान की लड़ाई सम्भव है। जापान में नाटकीय घटनायें घटेंगी और इनके भविष्य के अगले बहुत सालों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।

निर्णयात्मक

इससे ख्याल है कि लड़ाई इस साल निर्णयात्मक रुख पकड़ेगी और नतीजा मित्र राष्ट्रों के पक्ष में होगा। एक से अधिक निर्णयात्मक लड़ाइयां होंगी और मित्रों की प्रभुता स्थापित होगी तथा वृहस्पति के कर्म छोड़ते ही युद्ध ग्रस्त संसार में शान्ति के आसार दिखाई देंगे।


अनेकता में एकता

(पी. जगन्नाथ राव नाइडू, नागपुर)

एक बढ़िया इत्र अनेक रंग, रूप और आकार प्रकार की शीशियों में भरा हुआ है लेकिन देखने वालों में से किसी को कोई शीशी पसन्द आती है और किसी को कोई। जिसे जो शीशी सुहावनी मालूम पड़ती है वह उसे खरीद लेता है। यहाँ तक तो सब ठीक है। इसके आगे बढ़कर वे ग्राहक जब शीशियों के आकार प्रकार की आलोचना शुरू करते हैं, तब अपनी अपनी शीशी की सब प्रशंसा करते हैं और उसकी खूबसूरती को बखानते हैं यहाँ तक भी किसी हद तक ठीक ही है।

परन्तु उस मूर्खता के लिए क्या कहा जाये, जब इत्र खरीदने वाले, एक दूसरे की शीशी को बुरा बताने पर उतर आते हैं। भर पेट निन्दा करते हैं और अपनी शीशी की अन्धभक्ति में दूसरे की को तोड़ फोड़ डालने के लिये उद्यत हो जाते हैं। जब एक सम्प्रदाय दूसरे से झगड़ता है तब प्रतीत होता है कि वे लोग सम्प्रदाय का वास्तविक तात्पर्य ही नहीं समझते। सभी धर्मों के मूल में एक ही महान सत्य विराजमान है। फिर लड़ाई झगड़े का क्या काम? शीशियाँ अपनी अपनी रुचि की पसंद की जा सकती हैं, सम्प्रदाय अपनी इच्छानुसार रखे जा सकते हैं परन्तु यह न भूल जाना चाहिए सब के अन्दर एक ही इत्र भरा हुआ है। मजहबों में जो फर्क दिखाई पड़ता है वह उनके बाहरी आवरण का है भीतर तो सब में एकता है। यदि इस मर्म को लोग समझ लें तो साम्प्रदायिक कलहों का अन्त होने में देर न लगे।


महात्मा जी के गुप्त वचन

(पं. चुन्नी लाल जी राजपुरोहित, सीहोड़)

कुछ दिन पूर्व मैं तीर्थ यात्रा के लिये गया था। काशी आदि तीर्थों में होता हुआ अयोध्या पुरी पहुँचा। भगवान राम की जन्म भूमि के दर्शनों का पुण्य फल लाभ करने के उपरान्त हम लोग वहाँ से लखनऊ आये। चार बाग से आगे चलकर एक सीता पुर जिला निवासी सज्जन से भेंट हुई। रास्ता चलते उनसे वार्तालाप छिड़ गया। परिचय पूछने पर मालूम हुआ कि उनका नाम रामामल तिवारी है और वे ताम सेन गंज के रहने वाले हैं। साधु संन्यासियों के प्रसंग में चर्चा करते हुये उन्होंने बताया कि यहाँ से 5 मील दूर बादशाह नगर के पास हनुमान गढ़ी है। वहाँ कई साधु ऐसे हैं जो सदैव खड़े रहते हैं। कभी बैठते नहीं। हमारी प्रबल उत्कंठा उनके दर्शन की हुई और हनुमान गढ़ी के लिये चल दिये।

मध्याह्न काल में हम लोग वहाँ पहुँचे और कई महात्माओं के दर्शन करके अपने भाग्य को सराहा। वहाँ एक बड़ी विचित्र घटना घटी वह यह कि एक महात्मा जी जिनके हम दर्शन कर रहे थे देखते देखते हमारी आँखों के सामने अन्तर्धान हो गये। हमारी उत्सुकता बढ़ी और आश्चर्यचकित होकर वही बैठ गये कि इसका रहस्य जाने बिना यहाँ से न जायेंगे। लौटना तो हमें उस दिन था पर अब तो ठहरना ही तय हुआ दिन के 10 बजे से रात के 9 बजे से उसी स्थान पर इस आशा से बैठें रहे कि उन महात्मा जी के फिर दर्शन करके ही यहाँ से उठेंगे।

जब रात्रि हुई 9 बजे तो वे अचानक उसी स्थान पर हमारी आँखों के सामने फिर प्रकट हो गये। उन्होंने पूछा- “तुम लोग यहाँ क्यों बैठे हो, दर्शन कर चुके थे फिर यहाँ रहने का क्या कारण है, जाओ यहाँ से चले जाओ,” हमने उनके चरण पकड़ लिये और कहा भगवन्! आप शंकर रूप हैं। हमें कुछ उद्देश्य दीजिए जिससे अपने जीवन को सफल बना सकें। उन्होंने कृपापूर्वक कई बातें हमें बताई जो सर्व साधारण के सामने प्रकट करने की नहीं हैं ‘अखण्ड ज्योति’ सम्पादक की जो प्रशंसा की उसके बारे में हम प्रकट करना नहीं चाहते उन बातों में सर्व साधारण के काम की एक ही बात थी वह यह कि भविष्य में नाना प्रकार की विपत्तियाँ मनुष्य जाति पर जायेगी। जनसंख्या बहुत घट आयेंगी। सम्वत् 2000 तक बहुत ही कष्ट संसार को रहेंगे। इसके पश्चात अच्छे समय का आगमन आरंभ हो जायेगा। धीरे-धीरे जमाना पलटेगा। पाप घटेगा और पुण्य बढ़ेगा। कुछ वर्षों में इतना परिवर्तन हो जायेगा कि सतयुग जैसा बढ़ने लगेगा। सब लोग सुख शान्ति का जीवन व्यतीत करेंगे।

दूसरे दिन मैं वहाँ से चला आया उन महात्मा जी के वचनों पर मुझे पूर्ण श्रद्धा है। उसी दिन से मैंने अखण्ड ज्योति का पता तलाश करके पत्रालाप करना आरम्भ कर दिया और सत्य ज्ञान को प्राप्त करने लगा। अब मुझे यह पूर्ण विश्वास हो गया है, कि निकट भविष्य में पापों का अन्त होकर पुण्य की प्रचुरता होगी।


कष्ट दान का उद्देश्य

(लेखक श्री रामदयाल जी गुप्त, कोसीकलाँ)

मिथला का राजा चित्र दत्त बड़ा धर्मात्मा था उसकी इच्छा रहती थी कि प्रजा में सदैव धर्म भावनाएं जागृत रहें, सब लोग धर्म कर्म में प्रवृत्त रहें। लेकिन प्रजा की दशा उस समय राजा की इच्छा के विपरीत थी। लोग चोरी, जारी, छल, कपट, अनीति, अन्याय का आचरण करने में अधिक रुचि लेने लगे। चारों ओर पाखण्ड और असत्य का प्रचार बढ़ने लगा।

अपनी प्रजा के ऐसे आचरण देखकर राजा को बड़ा दुख हुआ। उसने सोचा कोई ऐसा उपाय करना चाहिए कि लोक में फैली हुई पाप प्रवृत्ति मिट जाय और लोग धर्माचरण करते हुये सुख शान्ति का जीवन व्यतीत करें। राजा ने अपने प्रमुख अधिकारियों को बुलाया और उनकी सलाह से एक गुप्त मन्त्रणा तैयार कर ली।

दूसरे दिन राजा ने हुक्म दिया कि प्रजा के घरों में आग लगवा दी जाये। आज्ञा पाते ही सिपाही दौड़े और अनेक स्थानों पर आग लगा दी गई। अग्नि की लपटें आकाश को छूने लगी। शहर नगर और गाँवों में प्रलय के दृश्य उपस्थित होने लगे। चारों ओर हाहाकार मच गया प्रजा के बहुत से लोग एकत्रित होकर राजा के पास पुकार करने गये कि-”महाराज यह क्या हो रहा है? हमें इस प्रकार क्यों सताया जा रहा है?”

जो लोग पुकार करने गये थे राजा ने उन सबको पकड़वा कर जेल में बन्द करवा दिया और घोषित कर दिया कि कुछ दिन बाद इन्हें कोल्हू में पिलवा दिया जायेगा। इस भयंकर दण्ड को सुनकर प्रजा में त्राहि-त्राहि मच गई सब लोग ईश्वर को आर्त स्वर से पुकारने लगे। दुख में ऐसा गुण है कि उसके प्रभाव से अनायास ही मनुष्य ईश्वर को याद करता है और धर्म को संभालता है। सब जगह ईश्वर की पुकार होने ली। अधर्म अनीति के कार्य बन्द हो गये। दुख पड़ने पर शैतानी करना लोग भूल जाते हैं।

राजा को यह सब पता लगा। उसे मन ही मन बहुत सन्तोष हुआ। दूसरे दिन उसने यह घोषणा की कि ईश्वर ने मुझे स्वप्न में आदेश दिया है कि 6 महीने तक आग लगवाना और कोल्हू में पेलना स्थगित रखूँ। इसलिये अब पकड़े हुए कैदियों को 6 महीने बाद मर वाया जायेगा और तभी अग्नि काण्ड कराये जायेंगे।

प्रजा ने एक सन्तोष की साँस ली। 6 महीने का समय मिला था। इस समय को लोगों ने धर्म कर्मों द्वारा ईश्वर को प्रसन्न करने की तैयारियाँ की। क्योंकि राजा के कोप से 6 महीने के लिए ईश्वर ने ही बचाया है और उसी की कृपा से आगे भी संकट टल सकता है। घर-घर में भजन कीर्तन, पुण्य-दान, यज्ञ-तप होने लगे। अधर्मी प्रजा विपत्ति की एक ही ठोकर से धर्म की ओर मुड़ पड़ी।

6 महीने पूरे हुये। सब लोग नई घोषणा की प्रतीक्षा में थे। नियत समय पर राजा ने सन्देश दिया कि ईश्वर ने अब 6 महीने का समय और देने को कहा है। अब 6 मास पश्चात सारे देश को उजड़वाऊंगा और तभी कत्ले आम होगा। प्रजा ने सन्तोष की साँस ली। आशा की सुनहरी किरणें दिखाई देने लगी, सम्भव है ईश्वर की कृपा से यह संकट सदा के लिये टल जाये। इस आशा से अधिक ईश्वर भजन और अधिक धर्माचरण होने लगा।

पूरे एक वर्ष तक भयग्रस्त जनता ने धर्माचरण की ओर विशेष ध्यान दिया। जिससे वैसे उत्तम कर्मों की स्वभावतः आदत पड़ गई, बुरे कर्म करना छूट गया। राजा ने प्रजा को धर्मरत देखा तो उसे बहुत प्रसन्नता हुई। वर्ष के अन्त में उसने प्रजा को बुलाकर कहा-”तुम लोगों को असत् मार्ग से हटा कर सन्मार्ग पर लगाने को यह त्रास दिया गया था। अवश्य ही इसमें बहुत कष्ट उठाना पड़ा, परन्तु आगे उस कष्ट की अपेक्षा अनेक गुना लाभ भी तुम्हें प्राप्त होगा। पिछले वर्ष अग्नि काण्ड में जिसका जितना नुकसान हुआ था वह सब राज्य के खजाने से भरपाई कर लें जावें और जेल में पड़े हुये लोग अपना हर्जाना लेते हुये घर जावें।

प्रजा कुछ समय कष्ट में रही पर अन्त में उसे अपार लाभ हुआ। अधर्म के विष से पीछा छुड़ाकर धर्म का कल्पवृक्ष पाया। आज हमारे ऊपर विपत्तियाँ आई हुई हैं हो सकता है कि सम्राटों का सम्राट अपनी प्राणप्रिय प्रजा को धर्मात्मा और सुखी बनाने के लिये ही यह प्रपंच रच रहा हो।


पितृ श्राद्ध

राजा सगर के सौ पुत्र अपने दुष्कर्मों के कारण कपिल मुनि के कोप भाजन होकर जलकर भस्म हो गये और पाप परिणाम से नरक की दुखद यंत्रणाएं सहने लगे।

इन सौ नरकगामी राजकुमारों के भाई अंशुमान राजगद्दी पर बैठें पर वे सदैव इस चिंता में जलते रहे कि किस प्रकार अपने भाइयों का उद्धार करें। अंशुमान के पुत्र दिलीप भी अपने पितृ ऋण को भुला न सका। उसने पितरों के उद्धार के निमित्त घोर तपस्या की पर सफल मनोरथ न हो सका। दिलीप का पुत्र भागीरथ भी चुप न बैठा, पुरखों का उद्धार करना, उनके किये हुये पाप का प्रतिशोध करना आवश्यक था। अपने पूर्वजों की कलंक कालिमा को धोये बिना कोई सपूत कैसे चैन पा सकता है।

बताया गया कि सगर के सौ पुत्रों ने पृथ्वी पर जो पाप का बीज बोया है इसका कलंक तब छूट सकता है जब इस संसार पर भगवती गंगा जी लाई जायें। जिनके शीतल जल से उजाड़ खण्ड हरे हो जायें और प्यासे प्राणियों के सूखे कंठों को शीतलता प्राप्त हो। अभाव की पूर्ति का यही उपाय है कि जितनी हानि पूर्व काल में हो चुकी है उतना ही लाभ पहुँचा दिया जाय। पितरों के उद्धार का यही रास्ता है कि उनसे दुनिया का जो उपकार बन पड़ा हो वह सब पाई पाई चुका दिया जाये।

भागीरथ के हृदय में सच्चा पितृ प्रेम था, वे पितरों का श्राद्ध करके उनकी परलोकस्य आत्माओं को शान्ति लाभ करना चाहते थे इसलिए सुख वैभव छोड़कर शक्ति सम्पादनार्थ वे घोर तप करने लगे। तप में, संयम में, एकाग्रता में, लगन में, शक्ति का सारा केन्द्र छिपा हुआ है। यह भागीरथ ने जाना और एक महान कार्य को पूरा करने की तैयारी के लिये तप में प्रवृत्त हो गये। तप के बाद उनका पौरुष जागा और वे देवताओं की सहायता से भू-मण्डल पर गंगा जी को ले आये।

गंगा जी के आने से संसार का बड़ा उपकार हुआ। सगर सुतों द्वारा दुनिया में जितना अधर्म हुआ था उससे अधिक भागीरथ का धर्म हुआ। पितामहों के दुष्कर्म का परिमार्जन पौत्र के कार्यों द्वारा हो गया। पितरों की आत्माओं को स्वर्ग में शान्ति मिली, उनकी आन्तरिक जलन बन्द हो गई, कुम्भी पाक ही - आत्मवेदना की -कोठरी में घुटता हुआ जी सुस्थिरता अनुभव करने लगा। सच्चे पिंडोदक पाकर पितरों की आत्मायें आशीर्वाद देने लगी।

पूर्वजों की भूलों के परिणाम आज हमारा देश शैतान द्वारा पद दलित हो रहा है, पितृओं के कुविचारों के कारण हमारे समाज में नाना प्रकार के भ्रम पाखण्ड घुस पड़े हैं। जिनके पाप से आज हमारी जाति असंख्य कष्ट कठिनाइयों का अनुभव कर रही है। परलोकस्य पितृ अपनी संतति की ओर दृष्टि लगाये बैठे हैं कि कोई भागीरथ उपजे और देश जाति में सुव्यवस्था उत्पन्न करके हमें पिण्डोंदर प्रदान करे। चिन्ह पूजा करने वाले गोबर गणेश तो बहुत हैं पर सच्चा श्राद्ध करके पितृओं की अन्तरात्मा को शान्ति देने वाले भागीरथ दिखाई नहीं पड़ते।


ईश्वर प्राप्ति का सरल उपाय

(पं. राधे मोहन जी मिश्र बहराइच)

सरयू तट पर विराजमान स्वामी ओमानंद जी के समीप किसी गाँव का रामलाल नामक एक व्यक्ति आया। उसने स्वामी जी से करबद्ध प्रार्थना करते हुए कहा कि मुझे भी कुछ उपदेश दीजिये कि ईश्वर के दर्शन पा सकूँ स्वामी जी ने रामलाल से कहा- “ओ रामलाल! कृष्ण भगवान का ध्यान इस प्रकार करो कि भगवान कृष्ण पालथी मारे बाँसुरी हाथ में लिये हुये तुम्हारे हृदय कमल में बैठे हुए हैं, यह ध्यान करते हुये “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय” मन्त्र का मन में जप करो।” रामलाल ने कहा गुरुजी मैं मस्तक शून्य हूँ यह ध्यान मैं नहीं कर सकता और यह मन्त्र इतना बड़ा है जप भी मेरे लिये कठिन है। स्वामी जी ने कहा अच्छा घबराओ नहीं। मैं तुमको एक और सरल मार्ग बता रहा हूँ सुनो पद्मासन पर बैठकर भगवान कृष्ण की पीतल की मूर्ति लेकर अपने सामने रखकर उसी के प्रत्येक अंग को देखना और किसी ओर न देखना फिर नेत्रों को बन्द करके उसी का अनुभव करना। रामलाल ने स्वामी जी के पैरों को पड़कर कहा कि महाराज मैं इस आसन पर इतनी देर बैठकर ध्यान नहीं कर सकता, क्योंकि बैठने से बड़ा कष्ट होगा। यदि मैं अपने कष्ट का ध्यान करूं तो मूर्ति का ध्यान नहीं हो सकेगा। गुरु महाराज कोई इससे सरल उपाय बतलाने की कृपा कीजिये। स्वामी जी ने कहा कि अपने पिता के चित्र को सामने रखकर एकाग्र चित्त से देखिये। स्वामी जी आगे का और वाक्य पूर्ण भी न करने पाये थे कि वह बोल उठा कि स्वामी जी पिता का ध्यान मुझसे नहीं हो सकेगा, क्योंकि वे मुझे बहुत पीटते थे। मैं उनसे बहुत डरता था। यदि कही स्वप्न में भी देख लेता हूँ तो रात्रि काटना कठिन हो जाता है मेरे पैर काँपने लगते हैं प्रभू! कोई सरल उपाय बताइये जिसको मैं कर सकूँ। स्वामी जी कुछ विचार कर थोड़ी देर पश्चात् बोले कि रामलाल! अच्छा, यह बतलाओ कि तुमको कौन वस्तु सबसे प्रिय लगती है। वह बोला कि भैंस, क्योंकि उससे दूध-मक्खन तथा घी बहुत खाया है और यह मेरे आंखों के सामने नाचती रहती है। स्वामी ने कहा कि तुम उस कोठरी में जाओ और दरवाजा बन्द करके बैठ जाओ और उसी भैंस का ध्यान करो और किसी अन्य बात को न सोचना। वह बड़ा प्रसन्न हुआ और स्वामी जी की आज्ञानुसार कार्य आरम्भ कर दिया।

तीन दिन बीत गये खाना पीना छोड़कर उसी ध्यान में लीन हो गया। एक दिन स्वामी जी उसे ध्यान मग्न देखकर पुकारा “ओ रामलाल बाहर आओ कैसी दशा है? रामलाल ने कहा कि मैं कैसे बाहर आऊँ मेरे तो बड़े-बड़े सींगे हैं मैं वृहत काय वाली भैंस हो गया हूँ। तब स्वामी जी समझ गये कि अब एकाग्र चित्त वाला तथा समाधि योग्य हो गया। स्वामी जी ने पुनः पुकार कर कहा कि तुम भैंस नहीं हो तुम अपना ध्यान बदल दो, भैंस का नाम रूप भूल जाओ और भैंस के सत स्वरूप सत, चित्त आनन्द का ध्यान करो यही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है। रामलाल ने अपना मार्ग बदलकर स्वामी जी के उपदेशानुसार चलते हुए अपने जीवन लक्ष्य मुक्ति को प्राप्त किया। इस कथा से यह तात्पर्य निकलता है कि जो वस्तु प्रिय हो उसी का ध्यान करते हुए आगे बढ़ना चाहिए न कि मन को बलात् खींचकर किसी ध्यान में लगाना इससे मन टिकता नहीं है।

चिन्ता उन्मूलन प्रयोग

(श्री रामनरायण जी श्रीवास्तव “हृदयस्थ”)

साम्प्रत काल में प्रतिदिन उत्तरोत्तर आतंक एवं भविष्य चिन्ताओं का बाहुल्य बढ़ रहा है। मुमुक्षु तथा तत्वज्ञानी महानुभावों को छोड़कर अधिकाँश जन समुदाय आने वाले कल की करालना से दुखी है। इस मानसिक व्यथा का सफल उपचार दिव्य विभूतियों द्वारा पाकर भद्र पाठकों के समक्ष अनुभव की कसौटी पर कसने के लिये रखने का साहस करता हूँ, विश्वास है कि इससे हार्दिक शान्ति और अपूर्वनन्द की प्राप्ति होगी।

सूर्योदय से अनुमानतः दो घड़ी प्रथम शौचादि कृत्य से निवृत्त होकर किसी सुखकर एवं सुसाध्य आसन पर स्वस्थ बैठ जाइये, रीढ़ को जिसे सुषुम्ना नाड़ी का स्थान मानते है सीधी रखते हुये नेत्र बन्द करके मन ही मन (शब्दों से नहीं) ईश्वर के प्रति निम्नलिखित प्रार्थना यानी मूक चितवन कीजिये।

“हे परमपिता आप सर्व शक्तिवान तथा अन्तर्यामी हो, दया सागर होकर अपने प्रिय पुत्रों को मनचाही वस्तु देने वाले हो। हमें सद्ज्ञान दीजिये! गीता आदि सत् शास्त्रों का आदेश है कि यह विश्व तुम्हारी लीला मात्र है। इसका संचालन तुम्हारे भृकुटी विलास मात्र पर निर्भर है आपकी इच्छा के बिना पत्ता तक नहीं हिल सकता। अस्तु!

हम विश्वास करते हैं कि हमारी प्रत्येक क्रियाओं में आपकी इच्छाओं का समावेश है। अतएव हे परम पिता हमें सद्ज्ञान दीजिये! ताकि उचित कर्तव्य कर्म करते हुए, जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिये सजग रहकर शान्तिमय जीवन बितावें।”

उपरोक्त प्रार्थना के अनन्तर “हरे राम-राम” मन्त्र से एक माला (108 जप करें) (हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे) पश्चात् स्वात्मा का अनुभव करते हुए मूक चितवन द्वारा यह भावना करें कि “मैं पवित्र अविनाशी और निलिप्त आत्मा हूँ यह शरीर तो आवरण मात्र है इसके नाश होने पर मेरी मृत्यु नहीं होती। मैं संसार की समस्त नाशवान वस्तुओं से सर्वथा अलग हूँ और उस परब्रह्म परमात्मा का अमर पुत्र हूं- (आगे का श्लोक स्पष्ट उच्चारण करें)

यस्य नाम्नैव नश्यंति खेदा यं हरिं नेति गायन्ति वेदाः।

श्री विराऽव्यय करालं नौमि वंशीधर नन्दवालम्॥”

बन्धुवरो! इस प्रयोग साधन में आपको बीस मिनट से अधिक नहीं लगेंगे। इससे आपके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में क्या चमत्कारिक परिवर्तन होगा वह लिखने का नहीं, किंतु अनुभव का विषय है।


बाहुबल और ब्रह्मबल

द्वापर के आरम्भ में ब्रह्मावर्त देश में दंभोद्भव नामक एक प्रतापी राजा हुआ। वह बड़ा ही बलवान और तेजस्वी था। शारीरिक बल में वह ऐसा अद्वितीय था कि दूर-दूर उसके समान योद्धा दिखाई न पड़ता, जिसे लड़ने के लिये ललकारता वही भयभीत हो जाता और गिड़गिड़ा कर क्षमा माँग लेता।

जब तक ऊँट पहाड़ के नीचे होकर नहीं निकलता तब तक उसे पता नहीं चलता कि मुझसे भी कोई बड़ी चीज इस दुनिया में मौजूद है। बाहुबल के अभिमान में उन्मत्त होकर दंभोद्भव चारों दिशाओं में बिगड़े हुए हाथी की तरह दौड़ने लगा। जहाँ जाता वही यह घोषणा करता कि यदि पृथ्वी पर कोई योद्धा शेष है तो मुझसे लड़ने के लिये आगे आवें।

एक नगर में वह ऐसी ही विज्ञप्ति कर रहा था, कि एक वृद्ध विद्वान अपने श्वेत केशों को बिखेरे हुए राजा के सन्मुख पहुँचा। उसने नम्रतापूर्वक कहा- राजन! आपको पराक्रम प्राप्त हुआ है, इसके लिये ईश्वर को धन्यवाद कीजिये, पर ऐसे अभिमान भरे वचन मत बोलिये, कि मेरे समान इस पृथ्वी पर कोई नहीं है। आप नहीं जानते तो भी यह वसुन्धरा वीर विहीन नहीं है, इस पर एक से एक प्रतापी और शक्तिशाली मनुष्य पड़े हुए है।

वृद्ध की बातें सुनकर राजा को बड़ा क्रोध आया। उसने तड़क कर कहा- यदि कोई मेरे समान योद्धा है तो बताओ वह कहाँ है, यदि न बताओगे तो तुम्हें ही मुझसे लड़ना पड़ेगा और अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा।

राजा के दर्प पर हँसते हुए उस वृद्ध विद्वान ने कहा- मरने की तो मुझे कुछ चिन्ता नहीं है, पर तुम्हारी इच्छा पूर्ण करने के लिये मैं एक व्यक्ति को बताये देता हूँ, वह तुमसे युद्ध कर लेगा। गंध मादन पर्वत पर चले जाओ वहाँ नर-नारायण ऋषि तपस्या कर रहे हैं, वे तुम्हारी युद्ध की मनोकामना पूर्ण कर देंगे।

राजा गन्ध मादन पर्वत की ओर चल दिया। बहुत ढूँढ़ने पर वहाँ एक अस्थि-पिंजर मनुष्य तप करता हुआ पाया। राजा ने पूछा- आप ही नर-नारायण हैं क्या? यदि हैं तो मैं आपसे लड़ने आया हूँ। ऋषि ने दम्भोद्भव को स्नेह पूर्वक पास बिठाया और सिर पर हाथ फिराते हुए कहा- बेटा! तू निःसन्देह अजेय है। शरीर में कितना बल है, यह तो एक मामूली सी बीमारी में नष्ट हो सकता है। इसलिये बाहु-बल के लिये गर्व करना र्व्यथ है। तू हमारा उपदेश मान और अपने नगर को लौट जा। शारीरिक बल को आजमाने की मूर्खता करने से क्या लाभ?

ऋषि ने बहुत उपदेश दिया पर राजा की समझ में एक भी बात न आई। वह घमंड में चूर होकर बार-बार लड़ने के लिये ही ललकारने लगा। जब किसी तरह न माना तो नर-नारायण ने कहा- अच्छा राजा! अब तू लड़ने को तैयार हो जा। राजा उठकर खड़ा हो गया। ऋषि ने पास में पड़े हुए एक तिनके को उठाया और उसमें प्राण शक्ति फूँक कर उसे योद्धा बना दिया। राजा उस मंत्र प्रेरित तिनके से लड़ने लगा, परन्तु कुछ ही देर में उसका दम फूल गया और परास्त होकर जमीन पर गिर पड़ा। पागल बनाने वाला अभिमान क्षण भर में कपूर की तरह उड़ गया।

वही वृद्ध विद्वान इस अवसर पर पुनः आ उपस्थित हुआ, उसने कहा- बेटा दम्भोद्भव! तुमने देखा कि बाहुबल और ब्रह्मबल में कौन अधिक बलवान् हैं? शरीर, धन आदि के भौतिक बल बहुत ही अपूर्ण अस्थिर और नाशवान है, किन्तु ब्रह्मबल की तो थोड़ी सी किरणें पाकर भी एक तिनका अद्वत शक्तिशाली बन सकता है। इस लिए ही राजन! यदि तुम सच्चा बल प्राप्त करना चाहते हो तो बाहुबल का अभिमान छोड़कर ब्रह्मबल संचय करो।

राजा को अपनी मूर्खता समझ में आ गई। वह अभिमान छोड़कर नारायण शिष्यता में ब्रह्मबल प्राप्त करने के लिए तप करने लगा।


गरीबों के हक की छाती पर

अरब देश अच्छे घोड़ों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ नबोर नामक व्यक्ति के पास बहुत बढ़िया घोड़ा था, ऐसा घोड़ा उस समय दूर दूर तक दिखाई न पड़ता था।

नबोर के नगर में उसका एक दूसरा प्रतिद्वन्द्वी दहेर नामक अमीर रहता था। उसकी बड़ी इच्छा थी कि किसी प्रकार नबोर का घोड़ा मेरे हाथ लग जाये। दहेर ने उस घोड़े की काफी कीमत लगा दी और नबोर को कई लालच दिये तथा धमकाया भी पर नबोर किसी प्रकार अपना घोड़ा देने के लिए रजामन्द न हुआ।

जब सारे उपाय निष्फल हो गये तो दहेर ने एक चाल चली। वह बीमार परदेशी का रूप बनाकर उस रास्ते के किनारे पड़ रहा जहाँ से अक्सर मुँह अन्धेरे नबोर निकला करता था। दहेर ने सोचा नबोर अत्यन्त दयालु है उसे इसी प्रकार छला जा सकता है।

नित्य की भाँति नबोर मुँह अन्धेरे जब उस रास्ते से निकला तो दहेर ने बीमार का जैसा बड़ा दर्द मन्द स्वर बनाकर पुकारा- “भाई घुड़सवार, मेहरबानी करके मुझे शहर तक पहुँचा दो, मैं परदेशी हूँ, बीमार हूँ, कमजोरी के मारे मुझसे उठा भी नहीं जाता, तुम मेरी मदद न करोगे तो यही पड़ा पड़ा मर जाऊँगा।”

नबोर का दयालु हृदय पिघल गया। वह घोड़े से उतरा और बीमार को उठाकर अपने घोड़े पर बिठा दिया और खुद पैदल चलने लगा। कुछ ही कदम चले थे कि उस छल वेशधारी दहेर ने घोड़े को एड लगाई और लगाम को झटका देकर आगे बढ़ा दिया। अब नबोर की आँखें खुलीं। उसने देखा कि दहेर ने मुझे धोखा दिया और इस प्रकार जाल बनाकर मेरा घोड़ा छीन लिया।

दहेर घोड़े को बढ़ाने लगा। नबोर ने कहा- दहेर, तुम घोड़ा ले चुके, अब इसे छीन सकना मेरे लिए कठिन है। पर जरा ठहरो, मेरी एक बात सुनते जाओ। दहेर ने कुछ दूर पर घोड़ा खड़ा कर लिया और कहा - जो कहना है जल्दी कहो। नबोर ने कहा- “देखो, किसी से इस बात का जिक्र न करना कि तुमने किस छल से मेरा घोड़ा लिया। क्योंकि यदि कोई आदमी सचमुच बीमार या पीड़ित हुआ तो लोग उसे धोखेबाज समझकर उसकी सहायता न करेंगे। इससे बेचारे दर्दमन्दों का हक छिन जायेगा और उन्हें बहुत दुख उठाना पड़ा करेगा।”

दहेर की अन्तरात्मा रो पड़ी। उसने कहा- गरीबों का हक छीनकर घोड़ा लेना मुझे मंजूर नहीं है। वह जीन पर से उतर पड़ा और घोड़े की लगाम नबोर के हाथ में देते हुये कहा- भाई आज से आपको गुरु मानता हूँ, आपने मेरी आँखें खोल दी, मैं समझ गया कि दूसरे की वस्तु लेना बुरा है, पर गरीबों के हक की छाती पर खड़ा होकर कुछ लेना और भी बुरा है मैं भविष्य में ऐसा न करूंगा।

नबोर ने दहेर को छाती से लगा लिया और अपना घोड़ा उसे पुरस्कार में दे दिया।


वर्तमान संकट में हमारा कर्तव्य

विश्वव्यापी महायुद्ध से उत्पन्न हुई परिस्थितियों के कारण चारों ओर बेचैनी फैली हुई है। घबराहट, भय और आशंका से लोगों के हृदय बड़े व्याकुल हो रहे हैं। कइयों को रात भर नींद नहीं आती और सोचते रहते हैं कि क्या करें, कहाँ जावे? इस संकट के समय से उन्हें किसी महत्वपूर्ण बात का स्मरण नहीं आता वे केवल शरीर बचाने, परिवार बचाने और धन बचाने की चिन्ता करते हैं। भगदड़ ही एक मात्र उपाय दिखाई देता है। हम देखते हैं कि गाँव वाले शहरों को भाग रहे हैं और शहर वालों के माल असवाब गांवों के लिए लद रहे हैं। ग्रामीण धनवान समझते हैं कि लुटेरे उन्हें लूट लेंगे। चोर डाकू उनकी सम्पत्ति का हरण कर ले जावेंगे। शहर वालों का ख्याल है कि आक्रमण शहरों पर होने के कारण वहाँ उनकी सुरक्षा नहीं हो सकेगी। वास्तव में यह भगदड़ मृग तृष्णा के समान है जिसका परिणाम असफलता के सिवाय और कुछ न होगा। कहते हैं कि भाड़ में ठंडा कहीं नहीं। जिस बन में चारों ओर दावानल जल रहा है उसमें बचने के लिये यहाँ वहाँ ढूँढ़ना र्व्यथ है क्योंकि राष्ट्रीय विपत्ति के समय न तो शहर सुरक्षित है और न गाँव। भगदड़ में सिवाय खतरे के और कुछ नहीं है। रोगी, निर्बल और बच्चों को कम खतरे के स्थानों में रखना उचित है, परन्तु यह समझ में नहीं आता कि जवान, तंदुरुस्त और जीवित मनुष्य क्यों व्याकुल होते हैं।

विपत्ति के समय धैर्य खो देना या कर्तव्य क्षेत्र को छोड़कर घुड़दौड़ लगाना संकट को और अधिक पेचीदा कर देना है। सुविधा जनक प्रबन्ध कर लेना और पहले ही से सावधान हो जाना कोई बुरी बात नहीं है, परन्तु धैर्य गंवा कर दिन रात चिन्ता में जलना और भय एवं आशंका से बेत की तरह काँपते रहना बहुत ही अनुचित है।

शरीर और धन जैसी नश्वर वस्तुओं का असाधारण मोह करना एक प्रकार की नास्तिकता है। सत्य, धर्म ऐसे मौके पर हमें धैर्य प्रदान करता है और सलाह देता है कि उचित सुरक्षा का प्रबन्ध कर लेने के अतिरिक्त भगदड़ मचाने या दूसरों को भयभीत करने का कोई कारण नहीं है।

रोग, दुर्भिक्ष, युद्ध, देवी प्रकोप कोई भी संकट सामने आवे तो आप प्राण बचाने के भय से मत भागिए। शरीर और धन की अपेक्षा जीविका, अन्न जल, आमोद-प्रमोद मुद्दतों तक प्राप्त किया है उस पर विपत्ति आते ही आप छोड़ कर चल दें यह तो मनुष्यता को कलंकित करने वाला आचरण होगा। जिस नगरी से आपने पोषण पाया है आपत्ति के समय अपने को खतरे में डाल कर भी उसकी सेवा करना उचित है।

जिनके पास अन्यायोपार्जित धन है वे उसे शुभ कार्य में लगा दें अन्यथा तेजाब की शीशी की तरह आघात पड़ने पर वह स्वयं तो नष्ट होगा ही साथ में उसे भी ले बैठेगा जिसके पास रखा हुआ है जीवन यापन की साधारण आवश्यकताओं के अतिरिक्त जिनके पास अत्यधिक धन है उनको यह संदेश हृदयंगम कर लेना चाहिए कि उनके धन की सुरक्षा इसी में है कि अपने पड़ौसियों को संकट से बचाने में उसका सदुपयोग करें! इस प्रकार उनका पैसा नष्ट होने से बच जायेगा। पवित्र भावनाओं के साथ संकट के समय सहायता में जो धन लगाया जायेगा वह ज्यों का त्यों लौट आवेगा। इस लोक में और परलोक में उसका भुगतान पाई पाई से मिलेगा। सृष्टि के नियम इस बात के साक्षी हैं कि पवित्र भावनाओं के साथ जो त्याग किया जाता है उसका बीज सो गुना होकर लौटता है।

संकट के क्षणों में पग पग पर सहायता की पुकार होगी। धनिकों को चाहिए कि इस अवसर पर धन को जमीन में न गाड़े वरन् अपने भाइयों की सहायता के लिए थैलियों के मुँह खोल दें। हम जानते हैं कि जो धनिक इन पंक्तियों को पढ़ रहें होंगे उन्हें यह उपहासास्पद, उपेक्षणीय, व्यर्थ और मूर्खता पूर्ण प्रतीत होंगी, किन्तु हम कहें देते हैं कि एक दिन उन्हें पछताते हुए इन पंक्तियों की गम्भीरता स्वीकार करनी पड़ेगी, तब उनके हाथ से स्वर्ण अवसर निकल गया होगा। सम्पन्न व्यक्ति त्यागी, उदार पड़ौसियों के प्रति सेवा भावी बन कर अपने को और अपने परिवार को सुरक्षित रख सकते हैं अन्यथा अत्यन्त लोभियों को महात्मा गाँधी के शब्दों में ‘अपने चौकीदारों को ही जान का ग्राहक” होता हुआ देखने का अवसर आ सकता है हमारी धनिकों के लिये बार-बार यह सलाह है कि आपका हित इसमें है कि अनावश्यक धन को गाढ़ गाढ़ कर न रखें वरन् उसका उपयोग लोक कल्याण के निमित्त करें। फिर वे उन खतरों से सर्वथा सुरक्षित रह सकते हैं जो धन के कारण उनके सिर के ऊपर हर घड़ी मंडराते रहते हैं। जगत प्रखण्ड हैं। संसार की भौतिक वस्तुएं हमारे साथ चिपक नहीं सकती। बन्दर जब मुट्ठी को छोड़ देगा तो उसका सारा क्लेश कट जायेगा।

धन को नाश से बचाने का मार्ग ऊपर बताया गया तन तो बचाने का मार्ग यह है कि इसको ऐसे अवसर पर सार्थक करना चाहिए, दूर जंगलों में या छोटे गांवों में सम्भव है कोई अपने शरीर को बचाले पर ऐसा बचाव मानवोचित न कहा जायेगा। स्वजन बान्धवों, देशवासियों, को अकेला छोड़कर असहाय स्त्री बच्चों, घायल, पीड़ितों, दुखियों, लुटते रोते और बिलबिलाते हुये भाइयों की चीत्कारों की ओर से कान बन्द करके जो मनुष्य अपनी जान बचाने के लिए भागता है वह मनुष्यता से पतित होता है। प्लेग, इन्फ्लुऐजा, हैजा को हमने छोटे गांवों में फैलते देखा है और एक एक दिन में बीस बीस मुर्दों को मरघट में पहुँचाया है। हट्टे-कट्टे जवान बोलते चलाते मौत के मुँह में जाते देखे हैं किसे पता है कि हमें कितने दिन जीना है। हो सकता है कि लड़ाई से न सही बीमारी या अन्य दुर्घटना से ही चन्द दिन में विदा तैयारी हो जाय। हिन्दू शास्त्र की मान्यता है कि जब तक ईश्वर को हमें जीवित रखना है तब तक वज्र भी नहीं मार सकता और जब आयु पूरी हो जायेगी तो एक घड़ी भी बचना मुश्किल है। इन सब बातों पर विचार करने के उपरान्त एक स्वस्थ और जीवित मनुष्य का यही कर्तव्य होता है कि वह कर्तव्य की पुकार को खुले कानों से सुने और अपना स्थान दुखी पीड़ितों के बीच में बनावें जहाँ कि उसकी सेवाओं की आवश्यकता है। भगवान ने पुरुष को पुरुषार्थ इसलिए दिया है कि वह शूरवीर सिपाही की तरह कर्तव्य सेवा में डटा रहे चारों ओर भगदड़ मचाते हुए, प्राण रक्षा के लिए चूहे के बिलों में स्थान तलाश करते हुए लोगों को जब हम देखते हैं तो उनकी कायरता पर बड़ा दुख होता है। एक सच्चा नागरिक, एक सच्चा मनुष्य, एक सत्यधर्म का सच्चा अनुयायी अपने पड़ौसियों को विपत्ति में पड़ा हुआ छोड़कर अपनी जान बचाने के लिये नामर्द की तरह छिपने के लिए नहीं भाग सकता। सत्य का आदेश है कि हे कर्तव्य निष्ठ आत्मा! तेरा स्थान वहाँ है जहाँ से पीड़ितों की चीत्कारें सेवा सहायता के लिये तेरे पौरुष का आह्वान करती हैं। आत्मा प्रखण्ड है इसलिए आत्मा के नाश की चिन्ता मत करो, शरीर धन आदि जड़ पदार्थ भी अखंड है इसलिए उनकी नाश का भी चिन्ता मत करो। आप पवित्र अविनाशी और निलिप्त आत्मा हैं फिर घबराने, डरने और चिन्तित होने का क्या काम? निर्भय रहिए, निर्द्वन्द्व रहिए और निश्चिन्त रहिए। आज कर्तव्य आपको पुकारता है आप उसकी पुकार सुनिए और पुरुष की भाँति वहाँ पहुँचिए जहाँ आपके पौरुष को चुनौती दी जा रही है। यहाँ आपके पुरुषत्व का आह्वान किया जा रहा है।


मनुष्य को देवता बनाने वाली पुस्तकें

जो ज्ञान युगों के प्रयत्न से मिलता है, उसे हम अनायास ही आपके समाने उपस्थित करते हैं।

यह बाजारू किताबें नहीं है, इनकी एक एक पंक्ति चिर कालीन अनुभव के आधार पर लिखी गई हैं!!

(1) मैं क्या हूँ?- इस पुस्तक में आत्मा के स्वरूप, गुण धर्म, कर्म, स्वभाव का बड़ी सरल सुबोध भाषा में वर्णन किया गया है, जिससे आत्म ज्ञान की गंभीर जानकारी हो जाती है। साथ ही कुछ ऐसे सुगम साधन बताये गये हैं जिनकी दस-पाँच मिनट भी नित्य किया जाय तो सूर्य के समान तेजस्वी आत्मा का प्रत्यक्ष दर्शन होने लगता है। मूल्य 1 )

(2) सूर्य चिकित्सा विज्ञान- सूर्य किरणों की सहायता से कठिन से कठिन आसध्य रोग भी अच्छे हो सकते है, इस पुस्तक में सूर्य की किरणों में से आवश्यकीतत्व खींच की बिना कौड़ी खर्च की दवा तैयार करना, रोगों का निदान चिकित्सा आदि सब बातों पर विस्तार पूर्वक लिखा गया है। जिससे मामूली पढ़ा लिखा आदमी कुछ ही दिनों में घर बैठे डॉक्टर बन सकता है और सैकड़ों रोगियों को जीवन दान सकता है। मूश्यकीतत्व खींच की बिना कौड़ी खर्च की दवा तैयार करना, रोगों का निदान चिकित्सा आदि सब बातों पर विस्तार पूर्वक लिखा गया है। जिससे मामूली पड़ा लिखा आदमी कुछ ही दिनों में घर बैठे डॉक्टर बन सकता है और सैकड़ों रोगियों को जीवन दान सकता है। मूल्य)

(3) प्राण चिकित्सा विज्ञान- मनुष्य के शरीर में गजब की विद्युत शक्ति भरी हुई हैं। मैस्मरेजम के ढंग पर उस बिजली का प्रयोग करके समस्त रोगों का इलाज करने का विधि इस पुस्तक में बताई गई है। झाड़, फूँक की प्राचीन तन्त्र पद्धति की वैज्ञानिक विवेचना के साथ बोरीवीय विद्वानों ने इस विधि का निर्माण किया है, विदेशों में बड़े बड़े अस्पताल इस पद्धति चल रहे हैं। मूल्य)

(4) परकाया प्रवेश- प्राण शक्ति की साधना करने से एक मनुष्य का प्राण दूसरे शरीर में प्रवेश कर आता है मैस्मरेजम के ढंग पर अपनी आत्म शक्ति से दूसरों में प्रभावित करने, उन्हें अपना इच्छानुसार चलाने, बेहोश कर देने, विचार बदल देने की विद्या इस पुस्तक बताई गई हैस्त्र जो रहस्य जन्म भर योगियों की सेवा करने पर भी प्राप्त नहीं होते उन्हें इस पुस्तक में दर्पण की तरह खोलकर रख दिया गया है ।

(5) स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्धुत विद्या- कीमती बढ़िया भोजन करने पर भी शरीर बलवान नहीं कुरूपता नहीं जाती, किन्तु आध्यात्मिक साधनाओं द्वारा मन चाहा स्वास्थ्य और इच्छित सुन्दरता प्राप्त की जा सकती है। इस पुस्तक में इन आध्यात्मिक तथ्यों को समझाया गया है, जिनसे स्वास्थ्य और सौंदर्य को हर मनुष्य प्राप्त कर सकता है। मू॰)

(6) मानवीय विद्युत के चमत्कार- मनुष्य शरीर की बिजली से भी वैसे ही आश्चर्यजनक कार्य हो सकते हैं जैसे कारखाने की बिजली से होते हैं। शरीर की बिजली के बारे में ठीक ठीक जानकारी न रखने के कारण लोग भयंकर दुख भोगते हैं, यदि उनके उपयोग की विधि ज्ञात हो तो दीर्घ जीवन, निरोगता, मानसिक शान्ति, प्रफुल्लता, सद्बुद्धि आदि अनेक शारीरिक मानसिक लाभ प्राप्त हो सकते हैं। इस पुस्तक को पढ़ने से वे सब गुप्त बातें भली प्रकार समझ में आ जाती है

(7) स्वर योग से दिव्य ज्ञान- स्वरोदय विद्या भगवान शंकर द्वारा आविष्कारित है। इस विद्या की सहायता से भूत भविष्यत् वर्तमान की बातों को जानना खोई हुई वस्तुएं हानि, लाभ, सफलता, असफलता, मृत्यु-ज्ञान आदि सब बातों को ठीक ठीक जाना जा सकता है। इन विद्या के सहारे ज्योतिष के सारे काम हो सकते है।

(8) भोग में योग- प्रमेह, स्वप्नदोष, धातु का पतला होना शीघ्र पतन, नपुँसकता आदि सत्यानाशी रोगों को जड़ से खो देने की क्रियाएं इस पुस्तक में बताई गई है। जितना देर चाहें उतनी देर स्तम्मन शक्ति कायम रखने की ऐसी गुप्त विधियाँ इस पुस्तक में लिखी हैं जो हजारों रुपये को भी सस्ती है। गुप्त रोगों को दूर करने के लिये पुस्तक कल्पवृक्ष के समान है। इसमें बताई हुई विधियों से हजारों का भला हुआ है।

(5) बुद्धि बढ़ाने के उपाय- मनुष्य जीवन में बुद्धि का ही मूल्य है। धन, यश, ऐश्वर्य, विद्या, पद, सुख, स्वर्ग सब कुछ बुद्धि द्वारा ही प्राप्त होता है। इस किताब में वैज्ञानिकों के घोर अनुसन्धानों द्वारा आविष्कृत ऐसे बुद्धि एवं कमजोर मस्तिष्क वाला मनुष्य भी बुद्धिमान बन सकता है। उपाय सरल बहुत ही लाभदायक है।

(10) धनवान बनाने के गुप्त रहस्य- जिन उपायों को अवलम्बन करके गरीब आदमी बड़े बड़े धन कुबेर बन गये है वे ही उपाय इस पुस्तक में बताये गये हैं। गरीब से धनी बनने वाले अनेक व्यक्ति यों के उदाहरण भी इस किताब में है। धनी बनने क ी इच्छा रखने वालों के लिये यह बड़े काम की वस्तु है मू॰

(11) पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि- कुछ समय पूर्व ऐसा समझा जाता था कि पुत्र या पुत्री होना भाग्य ही बात है परन्तु परन्तु अब डाक्टरों ने अपने असंख्य परीक्षणों के बाद यह साबित कर दिया हैं, कि मनचाही सन्तान प्राप्त करना पूर्ण रूप से मनुष्य के हाथ में हैं। जो उपाय बहुत परीक्षाओं के बाद खरे उतरे है उन्हीं का संकलन इस किताब में है। मू॰)

(12) वशीकरण की सच्ची सिद्धि- इस किताब में जादू टोना नहीं है वरन् ऐसे सद्गुणों और स्वभावों की शिक्षा है जिनको अपनाने वाला मनुष्य सर्वप्रिय हो जाता है और दूसरे लोग उसके वे पैसे के गुलाम हो जाते हैं। भलमनसाहत, नेकी, ईमानदारी, नम्रता, त्याग, प्रेम द्वारा कठोर से कठोर हृदय वालों को भी कैसे अपने वश में किया जा सकता यही सब बातें इसमें हैं स्त्र

(13) मरने के बाद हमारा क्या होता है?- मृत्यु के उपरान्त प्राप्त होने वाले स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म प्रेत योनि आदि की सम्पूर्ण स्थिति परिस्थिति का विस्तृत निवारण इस किताब में है। प्रेतात्माओं से वार्तालाप करने की विधियाँ, भूतो से बचने की युक्तियाँ आदि बहुत महत्वपूर्ण बातें इसमें लिखी हुई है।

(15) जीव जन्तुओं की बोली समझना- मूक जीव जन्तुओं की भी स्वतन्त्र भाषा है। वे भी हमारी तरह आपस में वार्तालाप करते है। उस वार्तालाप को समझने के बहुत सी अज्ञात बातों का पता चलता है और अनेक रहस्य मय विषयों का ज्ञान हो जाता है, ऐसी किताब आज तक नहीं छपी।

(16) ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?- इस पुस्तक में ईश्वर बाद के प्रश्न पर दार्शनिक मनोवैज्ञानिक, तार्किक एवं धार्मिक दृष्टिकोणों से गम्भीर विवेचना की गई है। जिसे पड़ने से, ईश्वर, मन्दिर, भक्ति, पूजा, ध्यान

(17) क्या धर्म क्या अधर्म?- क्या धर्म इसी सांप्रदायिक कट्टरता को कहते हैं जिसके कारण आये दिन खून खराबी, दंगे फसाद होते रहते हैं और भाई से भाई अलहदा होता जाता है? यह प्रश्न प्रत्येक समझदार मनुष्य को बेचैन कर रहा है। इस पुस्तक में धर्मे, सम्प्रदाय, पैथ, प्रथा आदि धर्म के प्रत्येक पहलू पर आध्यात्मिक दृष्टि से तीव्र प्रकाश डाला है। जिससे धर्म का सच्चा स्वरूप सामने आ जाता है और धर्म के नाम पर फैले हुए अधर्म की मोल खुल जाती है। मू॰)

(18) गहना कर्मणो गतिः- भला काम करते बुरा फल और बुरा काम करते भला फल मिलते देखकर बुद्धि चक्कर खा लाती है निठल्लों को सुखी और परिश्रमी लोगों का जब दुखी देखा जाता है तो मन में बड़ी न्यमता उत्पन्न होती है। कर्मों का फल ईश्वर किस प्रकार देता है? पाप पुण्य का न्याय कौन करता है? ऐसी अनेक समस्याओं का इस किताब में ऐसी तरह हल किया गया है कि पढ़ने वाले को भली भाँति संतोष हो जाता है।

(19) जीवन की गूढ़ गुत्थियों का तात्विक प्रकाश- हम कौन है? कहाँ से आये है? किधर जा रहें है? मृत्यु क्या है चौरासी लाख योनियों में क्यों घूमना पड़ता है? मुक्ति क्या है? जीवन का आरम्भ, विकास और अन्त कैसे होता है। इसमें जीवन सम्बन्धी प्रश्नों का तात्विक दृष्टि से हल किया गया है। इस ज्ञान को जानने से जीवन का महत्व समझ में आ जाता है।

(20) पंचाध्यायी- यह आधुनिक युग की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, मानसिक शारीरिक एवं धार्मिक समस्याओं पर व्यवस्था देने वाली गीता है। हमारे देश की दुरवस्था कैसे हुई। और भविष्य में नवीन भारत का निर्माण कैसे होगा। इसमें इन प्रश्नों का ठोस उत्तर है। हजारों धर्म ग्रन्थों का उपयोगी सार एक ही स्थान पर एकत्रित है। संस्कृत के सुलमित श्लोकों के नीचे अन्वय सहित अर्थ दिये हुए है। नवीन युग की यह नवीन गीता हर धर्म प्रेमी के हाथ में होनी चाहिए।

नोट- कमीशन के लिए लिखा पड़ी करना बिलकुल व्यर्थ है। हाँ छः से अधिक किताबें लेने वाले पर डाक खर्च माफ होगा

पता- मैनेजर अखण्ड ज्योति, मथुरा।

*समाप्त*