शक्ति का दुरुपयोग न करो!

सूर्य में इतनी गर्मी मौजूद है कि उसके द्वारा यह पृथ्वी कुछ ही क्षणों के अन्दर जल-जल कर भस्म हो जाय, परन्तु क्या कभी उसने ऐसा किया है? क्या वह कभी अपनी महानता और मर्यादा को भंग करता है? संसार मैं अनेकानेक एक से एक ऊंची शक्ति सम्पन्न सत्ताएं मौजूद हैं पर वे कभी अमर्यादित नहीं होती। फिर तुम आपे से बाहर क्यों हुये जा रहे हो? जो शक्तियाँ और योग्यता आज तुम्हें प्राप्त हैं वे ईश्वर ने लोक सेवा और असहायों की मदद व उन्नति के लिए दी हैं न कि इस लिये कि उनसे असहाय लोगों को सताओ, उनके अधिकारों का हरण करो और अनीति बरतो। देखो, तुम्हारा अन्याय तभी तक चल सकता है जब तक सहन करने वाले मर्यादा के अन्दर हैं, हो सकता है कि तुम्हारे बहुत सताये जाने पर वे उबल पड़ें और वैसे ही क्रूर कर्म करने पर उतर आवें जैसे कि तुम स्वयं हो, तब क्या होगा? जरा विचार तो करो, तब तुम्हारा आज का बर्ताव तुम्हारे लिये कितना विषम घातक और दुखदाई परिणाम उपस्थित कर देगा।

इसलिए ठहरो! शक्तिशालियो! जुल्म करने से पहले एक घड़ी ठहरो! और विचार करो कि तुम्हारे जीवन का सर्वोत्तम उद्देश्य और उपयोग क्या है? ईश्वर ने शक्ति की रचना उन्नति और सेवा के लिये की है, शक्तिशालियो! जुल्म और अपहरण में उनका दुरुपयोग न करो।


मनुष्य को देवता बनाने वाली पुस्तकें

जो ज्ञान युगों के प्रयत्न से मिलता है- उसे हम अनायास ही आपके सन्मुख उपस्थित करते हैं।

यह पुस्तकें बाजारू किताबें नहीं हैं। उनकी एक-एक पंक्ति के पीछे गहरा अनुभव और अनुसंधान है। विनम्र शब्दों में हमारा दावा है कि इतना खोजपूर्ण अलभ्य साहित्य इतने स्वल्प मूल्य में अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकता।

1. मैं क्या हूँ?- आत्मा का प्रत्यक्ष प्रदर्शन करने के कुछ सरल साधन। मू. 1 रुपया

2. सूर्य चिकित्सा विज्ञान- सूर्य की प्रचंड रोगनाशक शक्ति द्वारा वैज्ञानिक ढंग से कठिन रोगों की चिकित्सा। मूल्य 1 रुपया

3. प्राणचिकित्सा विज्ञान- मनुष्य के अंदर गजब की विद्युत शक्ति है। उसके द्वारा समस्त रोगों का इलाज। विदेशों में इस विधि से बड़े-बड़े अस्पताल चल रहे हैं। मूल्य 1 रुपया

4. परकाया प्रवेश- मैस्मरेजम के ढंग पर आत्मशक्ति को दूसरे के शरीर में प्रविष्ट करके उसे इच्छानुसार चलाने की साधना। मूल्य 1 रुपया

5. स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्भुत विद्या- अध्यात्मिक सरल साधनों द्वारा तन्दुरुस्त और खूबसूरत बनने के अद्भुत उपाय। मूल्य 1 रुपया

6. मानवीय विद्युत के चमत्कार- शरीर की बिजली से कैसे-कैसे आश्चर्यजनक कार्य होते हैं इसका विस्तृत वैज्ञानिक विवरण। मूल्य 1 रुपया

7. स्वर योग से दिव्य ज्ञान- स्वरोदय विद्या द्वारा गुप्त और भविष्य की बातों को जान लेने की रहस्यपूर्ण साधना। मूल्य 1 रुपया

8. भोग में योग- शीघ्र पतन, स्वप्न दोष, प्रमेह, नपुँसकता आदि विकारों को योग साधनों से दूर करने और मनचाही स्तम्भन शक्ति प्राप्त करने की गुप्त विधियाँ। मूल्य 1 रुपया

9. बुद्धि बढ़ाने के उपाय- जिन लोगों को मस्तिष्क से काम करना पड़ता है या जो स्मरण शक्ति बढ़ाकर बुद्धिमान बनना चाहते हैं उनके लिए यह कल्प वृक्ष के समान है। मूल्य 1 रुपया

10. धनवान बनने के गुप्त रहस्य- बड़े-बड़े कुबेरों द्वारा कार्य रूप में आई हुई ऐसी विधियाँ हैं जो आपको भी धनवान बना सकती हैं। मूल्य 1 रुपया

11. पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि- मन चाही संतान प्राप्त करने के सारे रहस्य इस पुस्तक में खोल कर रख दिये हैं। मूल्य 1 रुपया

12. वशीकरण की सच्ची सिद्धि- दूसरों को अपने वश में करने के लिये बिलकुल सच्चे और हजारों वार आजमाये हुए प्रयोगों का वर्णन। मूल्य 1 रुपया

13. मरने के बाद हमारा क्या होता है?- मृत्यु के उपरान्त प्राप्त होने वाले स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म, प्रेत योनि, मृतकों का साक्षात्कार, उनकी सहायता प्राप्त करना आदि बातों पर अनुभवपूर्ण वर्णन। मूल्य 1 रुपया

14. जीव जन्तुओं की बोली समझना- मूक जीव जन्तुओं की भी स्वतंत्र भाषा है और वे भी हमारी ही तरह बातचीत करते हैं। उसे समझने का महत्वपूर्ण विधान। मूल्य 1 रुपया

नोट- चार या अधिक पुस्तकें लेने पर चौथाई कमीशन दिया जाता है। हर पुस्तक पर एक आना के हिसाब से पोस्टेज लगता है, जो खरीदार को देना होता है। इस प्रकार कमीशन काटकर और पोस्टेज जोड़ कर 1 रुपया प्रति पुस्तक के हिसाब से मूल्य भेजना चाहिए। चार से कम पुस्तकें मंगाने वाले सात आना प्रति के हिसाब से भेजें।पता- मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा।

वर्ष 3 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक 5


शाँति-किरण


शाँति-किरण (kavita)

नम विशीघ्र के ही विराम पर,

तो जग ने बालारुण देखा ॥

दुख का अनुभव ही तो बढ़कर,

बन जाता है सुख का लेखा॥

खण्डहरों पर ही तो इक दिन,

होता है वैभव का नर्तन ॥

जीवन की अन्तिम सीमा ही,

तो है नव जीवन की रेखा॥

मृग मरीचिका में ही तो,

मा ..! विनाश का है आराधन॥

पा न सके यदि पूर्ण खण्ड तू,

प्राप्त खण्ड को ही सुख से खा॥

(रचयिता—दिनकर प्रसाद शुक्ल “दिनकर” विशारद गोहद)


प्रार्थना से बल प्राप्त कीजिये।

बिजली के बारे में थोड़ी सी जानकारी रखने वाले जानते हैं, कि ऋण (नेगोटिव) और धन (पाजेटिव) दो प्रकार की धाराएं मिलकर स्फुरण उत्पन्न करती हैं, मनुष्य शरीर में यह दोनों प्रकार की धाराएं विद्यमान हैं और उन्हीं के आधार पर जीवन के सारे कार्यों का आँदोलन होता है।

किसी मनुष्य को देखकर उसके गुणों को जानकर हम आसानी से मालूम कर सकते हैं, कि उसमें किस धारा का बाहुल्य है। नेगेटिव को अनिश्चयात्मक और पाजेटिव को निश्चात्मक कहा जाता है। बाह्य प्रभावों से तुरन्त प्रभावित हो जाना और हर प्रकार की हवा के प्रवाह में बहने लगना यह अनिश्चयात्मक स्वभाव हुआ और अपने निश्चय पर दृढ़ बने रहना यह निश्चयात्मक स्वभाव कहा जाता है।

मनुष्यों के शरीरों की बनावट एक सी दिखाई देने पर भी उनमें छोटे बड़े का जो असाधारण अन्तर देखा जाता है, उसका कारण और कुछ नहीं, केवल इन धाराओं का मिलना और उनकी मात्रा की न्यूनाभिकता है। बेशक विद्या, बुद्धि, धन और बल का भी अपना स्थान है, पर इन चारों वस्तुओं की भी जो जननी है और अनेक प्रकार की योग्यताओं का जिसमें से उद्भव होता है, उनका वह केन्द्र इन विद्युत धाराओं में ही है।

जिस व्यक्ति का निश्चयात्मक भाव है, जिसके अन्दर धन विद्युत का बाहुल्य है, वह हर प्रकार की कठिनाइयों का मुकाबला करता हुआ, सुख-दुख को बराबर समझता हुआ, कर्त्तव्य पथ पर आरुढ़ रहेगा और मन को गिरने न देगा, किन्तु जो ऋण विद्युत वाला है, उस अनिश्चित स्वभाव के मनुष्य को अपना छोटा सा कष्ट पहाड़ के समान दिखाई देगा और जरा सी विपत्ति आने पर कि कर्त्तव्य विमुख हो जायगा। आज एक इरादा किया है। कल उसे बदल देगा और तीसरे दिन नया प्रोग्राम बना लेगा।

इस प्रकार की उन्नति और सफलता एवं पतन और विफलता के बीच इन्हीं ऋण-धन स्वभावों में निहित है। क्या व्यापार, क्या नौकरी, क्या राज स्वकीय धर्म सभी कामों में उत्साही पुरुष सन्तोषजनक फल प्राप्त करेगा। किन्तु निराशा और निर्बलता के चंगुल में फँसा हुआ व्यक्ति प्राप्त की हुई सफलताओं को भी गंवा देगा। इसलिये जो मनुष्य अपने जीवन को तेजस्वी और प्रतिभाशाली बनाना चाहते हैं, उनके लिये आवश्यक है, कि अपने अन्दर धन विद्युत की मात्रा में वृद्धि करें, इच्छा शक्ति को बढ़ावें।

बीमारी से बचने और उसे अन्ततः अच्छा कर लेने में भी यही नियम काम करता है। जिन्हें आत्म विश्वास है और इच्छा शक्ति के बलवान बनाये हुए हैं वे अपनी मानसिक दृढ़ता के द्वारा ही छोटे-मोटे रोगों को मार भगायेंगे और बीमारी से बचे रहेंगे। कदाचित् बीमार पड़े भी तो बहुत जल्दी अच्छे हो जायेंगे, जब कि निराशावाद मामूली अपनी बीमारी को अपने आप इतनी बढ़ा लेते हैं कि वही उनकी प्राण घातक तक बन जाती है।

जिस प्रकार लोग पैसा कमाना अपना कर्त्तव्य समझते हैं, उसी प्रकार उन्हें चाहिए कि इच्छा शक्ति निश्चयात्मक स्वभाव धन-विद्युत का भी बढ़ाने का प्रयत्न करें। पैसे के समान यह योग्यता आँखों से दिखाई नहीं पड़ती तो वह उसी के समान, बल्कि उससे भी अनेक गुना अधिक उपयोगी है।

स्वभाव की निर्बलता को दूर करने का सबसे उत्तम उपाय है—ईश्वर प्रार्थना करना। इसका अर्थ यह नहीं, कि हम कुछ शब्दों को तोते की तरह रटते रहें और एक नियमित कवायद करके उठ बैठे।

प्रार्थना हृदय के अन्तस्थल से होनी चाहिए, क्योंकि अदृश्य जगत् में से उपयोगी तत्वों को खींचने की चुम्बक शक्ति उसी स्थान में है। सच्चे हृदय से पूर्ण मनोयोग के साथ की हुई प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जा सकती, उसका फल अवश्य ही मिलेगा। प्रार्थना की वैज्ञानिक विवेचना यह है कि, वस्तु की हमें आवश्यकता है उसे अक्षय भण्डार से प्राप्त करना। प्रभु का अक्षय भण्डार अपने पुत्रों के लिये सदैव खुला हुआ है, उसमें से हर कोई अपनी इच्छित वस्तु मनमानी मात्रा में ले सकता है, बशर्ते कि वह लेना चाहे और लेने के लिये प्रयत्न करे। इस चाहने ओर प्रयत्न करने का नाम ही प्रार्थना है।

तुम्हें ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि—”प्रभो! हमें ऐसी शक्ति दीजिए जिसके द्वारा सत्य पालन और पाप का संहार कर सकें। आप सच्चिदानन्द हैं, हमें भी अपने समान बनाइये, जिससे अपना और दूसरों का कल्याण कर सकें” जब किसी के घर में चोर घुस आता है तो वह चोर से आत्म रक्षा करने के लिए लाठी आदि साधन ढूँढ़ता है, तदुपराँत उसे भगाने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार हमें अपनी त्रुटियों को हटाने और सर्वतोमुखी उन्नति प्राप्त करने के लिये प्रार्थना को अपनाना चाहिये।

जिन्हें निश्चयात्मक स्वभाव प्राप्त करने की इच्छा है, उन्हें चाहिये कि निष्ठापूर्वक ईश्वर की प्रार्थना करते रहें। विशुद्ध भाव से की हुई प्रार्थना इच्छित फल देने की परिपूर्ण योग्यता रखती है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।


Quotation

पृथ्वी को खोदते हैं, वह उनको भी आश्रय देती है, इसी तरह बुराई करने वाले के साथ भी तुम्हें भलाई ही करनी चाहिये।


योगी कार्य क्षेत्र में उतर रहे हैं।

(योगी अरविन्द घोष)

भारतवर्ष के ऋषि-मुनि और योगीगण जो गिरिकन्दराओं तथा निर्जन वनों में परमानन्द का चिन्तन करते हुए समय बिता रहे थे, वे अब भगवान् की प्रेरणा पाकर विश्व को सच्चे शान से आलोकित करने के लिये कार्यक्षेत्र में उतरे हैं। इसी से आज भूत, निर्जीव और प्राणहीन भारत फिर जाग उठा है। क्षीणकाय, दुर्बल शरीर, रक्त मज्जा हीन, भारत के सपूत, खाली हाथ बिना सहायता के अस्त्र शस्त्र हीन होते हुए भी आज संसार पर विजय प्राप्त करने के लिये कमर कस कर तैयार हुए हैं। संसार की मदान्य जातियाँ मद में चूर होकर भारत को तुच्छातितुच्छ समझ कर उसके अवहेलना करती थीं, पर आप इन थोड़े दिनों में ही समस्त संसार विस्मित और विस्फारित नेत्रों से भारत की ओर देख रहा है। भारतवर्ष की यह जाग्रति, स्वप्न नहीं है, मिथ्या नहीं है, भ्रम नहीं है, भारत वर्ष जाग उठा है, वह जागृति जितनी शीघ्रता से संपादित हुई है, उतनी ही स्थायी रहेगी।

यद्यपि भारतवर्ष के पास इस समय कुछ नहीं है, उसके पास उत्थान के कोई ठोस साधन नहीं हैं, फिर भी अपने तपोबल के सहारे पर वह सब कुछ कर लेगा। उनको ईश्वर पर भरोसा है, विश्वास है। यह विश्वास इस विश्व की जड़ बतलाने वालों की सीमा से सर्वथा दूर है और उनके लिए अगम्य है। भगवान् की सहायता से ही वह समस्त संसार को ज्ञान की दीक्षा देगा। भूतल के सिंहासन पर जनक, अजातशत्रु और कार्तवीर्य की भाँति अटल बैठकर संसार की समस्त जातियों का शासन करेगा और यह विश्व एक बार पुनः स्वर्ग हो जायगा।


Quotation

आकाश से बातें, संगमरमर के मन्दिर तथा पाषाण प्रतिमा तुम्हारे हृदय के दाह को नहीं मिटा सकती, उसके लिये देश के भूखे, प्यासे नारायणों और दुर्बल भिक्षुओं की सेवा करनी पड़ेगी।


ब्रह्मचर्य का तत्व-ज्ञान

चैतन्य प्राणियों की उत्पत्ति पर प्रकाश डालते हुए प्रश्ननोपनिषद् में बताया गया है कि सर्वप्रथम दो शक्तियों का आविर्भाव हुआ एक रति दूसरा प्राण। कात्यायन कबन्धी के प्रश्न का उत्तर देते हुए महर्षि पिप्पलाद ने बताया है, कि इन्हीं दो शक्तियों के संमिश्रण से चैतन्य जीवन विभिन्न आकार-प्रकार में निर्मित हुए। विद्युत विज्ञानवादी रति और प्राण शक्ति को “नेगेटिव” और “पाजेटिव’ कहते हैं। अध्यात्म वादी प्रकृति, पुरुष नाम देते हैं, मनोविज्ञान के अनुसार यह इच्छा और क्रिया कहे जाते हैं, योग शास्त्र में इन्हीं को ज्ञान, भक्ति कह कर पुकारा गया है, सारे जगत में सूर्य और चन्द्रमा इनकी प्रतिमूर्तियाँ हैं।

क्रम यह है कि रति द्वारा प्राण का आकर्षण होना चाहिए। जिस क्रम से रति शक्ति विकसित होती हो उसी क्रम से प्राण की धारणा होती है। घड़े में जितना स्थान है, उतना ही पानी भरना चाहिए, यदि घड़े के स्थान की परवाह न करके अन्धाधुन्ध पानी भरा जायगा, तो उससे विकृति उत्पन्न होगी और परिणाम हानिकर होगा। भक्ति की अपेक्षा ज्ञान अधिक होगा तो नास्तिकता बढ़ेगी, जितनी इच्छा है उससे अधिक क्रिया करनी पड़ेगी, तो करने वाला थक जायगा और कष्ट अनुभव करेगा। सृष्टि के सभी जीव इस नियम से परिचित हैं और उसका यथाविधि पालन करते हैं। रति संयोग के सम्पन्न में समस्त पशु पक्षी मादा की इच्छा का पालन करते हैं। सृष्टि का कोई प्राणी मादा की सम्भोग इच्छा के अतिरिक्त उस पर किसी प्रकार का दबाव नहीं डालता।

मादा की सम्भोगेच्छा बहुत ही स्वल्प और एक विशेष आवश्यकता होने पर प्रकट होती है। रा और विकास (Contraction & Expansion) के नियमों से मादा बंधी हुई है। फूलों की कलियाँ बन्द रहती हैं, अपनी सामर्थ्य बढ़ाने तक चुप रहती हैं, जब उनके भीतर संकोच की मर्यादा पूरी हो जाती है और रति का पर्याप्त संचय हो जाता है, तो वे अपनी रूप शक्ति का विकास करने के निमित्त खुलती हैं और प्राण रूप क्रिया शक्ति का संयोग होने पर फल पैदा करने के लिए फिर से संकोच कर लेती है। रति का उत्तेजन प्रकृत स्वभाव में उचित अवसर पर होता है और प्राण प्राप्त होते ही तुरन्त शान्त हो जाता है और अपना उद्देश्य पूरा करके पुनः शक्ति संचय करे वैसा ही अवसर आये बिना फिर जागृत नहीं होता। स्त्री की सम्भोगच्छा स्वाभाविक रूप से ऋतु काल में होते है, सो भी हर ऋतु में नहीं, यदि कोई शारीरिक या मानसिक कष्ट हो तो ऋतु होने पर भी रति का उत्तेजन नहीं होता।

मैथुन केवल स्त्री की रति उत्तेजन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए होना चाहिए। चटोरी लालसा द्वारा जैसे भूख न रहने पर भी सुस्वाद भोजनों के लिए मन चलता है, वैसे ही स्त्रियों को चटोरी काम वासना भी हो सकती है। इसकी सूक्ष्म दृष्टि से विवेचना करनी चाहिए और मानसिक विकार का निरोध करते हुए केवल स्वाभाविक आवश्यकता का ही आदर करना चाहिए। चटोरी भूख को पूरा करते रहने से शरीर रोगों का घर बन जाता है, वैसे ही जीवन की मूल भूत चेतना रति का दुरुपयोग होने से स्त्रियों का जीवन तत्व नष्ट होता है और मानव शरीर की अनेकानेक महत्ता से उन्हें सर्वथा वंचित रहना पड़ता है।

पुरुषों का अपना दृष्टिकोण पूर्ण ब्रह्मचारी रहने का होना चाहिए। उन्हें स्वेच्छा से वीर्य नष्ट करने का कोई अधिकार नहीं है। रति की तृप्ति के लिए प्राण प्रदान करने की उन्हें अनुमति मिली हुई है, इसका उपयोग दूसरे पक्ष की आवश्यकता पर निर्भर है। पुरुष का अपना निजी विचार दूर समय कठोर ब्रह्मचर्य के लिए रहना चाहिए, क्योंकि उसका यही कर्तव्य है।

यह समझना बड़ी भारी भूल है, कि यह शरीर का एक मल है और उसे निकालना ही चाहिए। यदि ऐसी बात होती तो मलमूत्र की तरह वीर्य के लिए भी कोई विशेष प्रक्रिया होती, किन्तु देखा जाता है कि शरीर में भी वीर्य के भण्डार नहीं भरे हैं। यह अमूल्य पदार्थ एक ने अदृश्य रूप से इस प्रकार छिपा हुआ है, कि बिना अत्यन्त आवश्यकता के इसका उपयोग न हो सके। उपनिषदों में रेतस शब्द ‘तज’ के अर्थ में उपयोग किया गया है। वीर्य एक चिकनी रसदार वस्तु नहीं है, वरन् जीवन का प्रत्यक्ष तेज है। आत्मा, आत्मा से उत्पन्न होता है, न कि शरीरस्थ मल मूत्रों से। रक्त, माँस हड्डी आदि धातुओं से यदि आप सन्तान उत्पन्न करना चाहते हैं तो यह नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें वीर्य तत्व नहीं है। वीर्य में आत्मा का तेजस है, प्राण है, चैतन्य है, इसीलिए तो वह सन्तान उत्पन्न कर सकता है। विचार तत्व को प्रकट करने के लिए मस्तिष्क एक साधन है। इस प्रकार आत्मा के चैतन्य तत्व का प्रत्यक्ष दर्शन वीर्य रूप में होता है।

वीर्य शरीर का एक भाग है, इसका खण्डन उन उदाहरणों से हो जाता है, जिनमें कि अन्धे पिता के नेत्रों वाली और अंग-भंग पिताओं के पूर्ण अंगों वाली सन्तान उत्पन्न होती है यदि वीर्य शरीर का ही एक भाग होता तो जो अंग पिता के शरीर में नहीं है वह बालक में भी न होने चाहिए थे। अंगों के नष्ट होने से आत्मा से वे भाग चले नहीं जाते, इसलिये वीर्य का तेज, पूर्ण अंग वाली सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ रहता है, मरे हुए व्यक्ति का वीर्य क्या किसी को गर्भ धारण करा सकता है? लसदार पदार्थ लकड़ी समान है आत्मा तेज की अग्नि जब उसमें सम्मिलित रहती है तब उसे प्रज्ज्वलित होने से क्रियाशीलता आती है।

आत्मतेज एक नेक शक्ति है, वह मानव जीवन को विकसित करने के लिए उत्तेजना देती है। हमें अनेक दिशाओं में प्रगति करनी होती है और उस सब के लिए शक्ति का प्रवाह वीर्य द्वारा होता है।

पर उद्गम केन्द्र “बिजली घर” में ही है। मनुष्य के सामने एक बड़ी यात्रा पड़ी हुई है, उसे ठीक तरह पूरा करने के लिए शरीर की मोटर में पेट्रोल भरा गया है, किन्तु हाय! कितने दुख की बात है कि हम लोग ऐसे बहुमूल्य पदार्थ को क्षण भर में तुच्छ स्पर्श सुख के लिये बर्बाद कर रहे हैं। मोटर के पेट्रोल को आतिशबाजी का तमाशा करने में फूँक रहे हैं। जो शक्ति हमें सर्वथा सुरक्षित रखनी चाहिये और स्वेच्छा से जिसकी एक बूँद भी स्पर्श सुख के लिए खर्च नहीं करनी चाहिये, उस बहुमूल्य पदार्थ को मानसिक विचारों की दियासलाई से जला कर नष्ट कर रहे हैं। हाय! हम अपने पाँव में अपने आप कुल्हाड़ी मारने का यह भयानक खेल क्यों खेल रहे हैं? अपनी चिंता के लिये अपने आप लकड़ियाँ क्यों इकट्ठी कर रहे हैं?


मादक दृव्यों से दूर रहो।

(महात्मा गाँन्धी)

सिगरेट, चाय, कहवा वगैरह जीवन के लिए कुछ जरूरी चीजें नहीं हैं। अगर जीते रहने के लिए चाय या कहवा जरूरी है तो यह अच्छा है कि इन्हें न पीकर सो जाया जाय। हमें इनका गुलाम नहीं बनना चाहिए। मगर सिगार पीना तो अफीम खाने जैसा है और सिगार में सचमुच ही भरा ही अफीम होता है। ये चीजें स्नायुओं पर असर करती हैं और फिर इनसे पीछा छुड़ाना असम्भव हो जाता है। अगर तुम सिगार सिगरेट, चाय, काफी आदि पीने की आदत छोड़ दो तो अपने आप ही देखोगे कि समय, और पैसे की कितनी बचत होती है और स्वास्थ्य की बरबादी कितनी रुक जाती है। टालस्टाय ने एक स्थान पर लिखा है कि कोई शराबी खून करने से तभी तक हिचक रहा था जब तक कि उसने सिगरेट नहीं पिया। मगर सिगरेट की फूँक उड़ाते ही वह उठ खड़ा हुआ और ‘मैं भी कैसा कायर हूँ’ कहता हुआ खून कर बैठा। टालस्टाय ने जो लिखा है अनुभव से ही लिखा है वे शराब से अधिक विरोध सिगरेट का करते हैं। मगर यह भूल मत करो कि शराब और तम्बाकू में शराब कम बुरी है। नहीं, तम्बाकू अगर तंतृक है तो शराब असुरों का राजा है! इनसे तो सब प्रकार बचना ही श्रेयस्कर है।


धर्म स्वीकार करने से पहले

(श्री स्वामी रामतीर्थ)

किसी धर्म को इसलिए अंगीकार मत करो कि वह सब से प्राचीन है। इसका सब से प्राचीन होना इस के सच्चे होने को कोई प्रमाण नहीं है। कभी-कभी पुराने से पुराने घरों को गिराना उचित होता है और पुराने वस्त्र अवश्य बदलने पड़ते हैं। यदि कोई नये-से-नया मार्ग या रीति विवेक की कसौटी पर खरी उतरे, तो वह उस ताजा गुलाब के फूल के सदृश उत्तम है जिस पर कि चमकती हुई ओस के कण शोभायमान हो रहे हों।

किसी धर्म को इसलिए स्वीकार मत करो, कि यह सब से नया है। सब से नई चीजें समय की कसौटी से न परखी जाने के कारण सर्वथा सर्व-श्रेष्ठ नहीं होती।

किसी धर्म को इस लिए मत स्वीकार करो कि उस पर विपुल जनसंख्या का विश्वास है, क्योंकि विपुल जनसंख्या का विश्वास तो वास्तव में शैतान अर्थात् अज्ञान के धर्म पर होता है। एक समय था कि जब विपुल जनसंख्या गुलामी की प्रथा को स्वीकार करती थी, परन्तु यह बात गुलामी की प्रथा के उचित होने का कोई प्रमाण नहीं हो सकता।

किसी धर्म पर इसलिये श्रद्धा मत करो कि उसे थोड़े से गिने-चुने लोगों ने माना हुआ है। कभी-कभी श्रवण जन-संख्या जो किसी धर्म को अंगीकार कर लेती है, (अज्ञान के) अन्धेरे में भ्राँत-बुद्धि होती है।

किसी वर्ग को इसलिये अंगीकार मत करो कि यह किसी त्यागी द्वारा अर्थात् ऐसे मनुष्य द्वारा प्राप्त हुआ है कि जिस ने सब कुछ त्यागा हुआ है, क्योंकि हमारी दृष्टि में कई ऐसे त्यागी आते हैं कि जिन्होंने सब कुछ त्यागा होता है, पर वे जानते कुछ भी नहीं हैं, और यथार्थ रूप से वे होते हैं।

किसी वर्ग को इसलिए अंगीकार मत करो कि वह युवराजों और भूपतियों द्वारा प्राप्त हुआ है। राजा लोगों में माया आध्यात्मिक धन का पूरा अभाव रहता है।

किस धर्म को इसलिये अंगीकार मत करो कि वह ऐसे मनुष्य का चलाया हुआ है कि जिसका चरित्र परम श्रेष्ठ है। अनेकशः परम श्रेष्ठ चरित्र के व्यक्ति खोए तत्व का निरूपण करने में असफल रहे हैं। हो सकता है कि किसी मनुष्य की पाचन शक्ति असाधारण रूप से प्रबल हो, तो भी उसे पाचन क्रिया का कुछ भी ज्ञान न हो। यह एक चित्रकार है जो कला चातुर्य का एक मनोहर, उत्कृष्ट और अत्युत्तम नमूना दिखलाता है, परन्तु वही चित्रकार सारे संसार भर में अत्यन्त कुरूप हो। ऐसे भी लोग हैं जो अत्यन्त कुरूप हैं पर तो भी ये सुन्दर तत्वों का निरूपण करते हैं। सुकरात इसी प्रकार का मनुष्य था।

किसी धर्म पर इस कारण श्रद्धा मत करो कि वह किसी बड़े प्रसिद्ध मनुष्य का चलाया हुआ है। सर आईजक न्यूटन एक बहुत प्रसिद्ध मनुष्य हुए हैं तो भी उसकी प्रकाश-सम्बन्धी निर्गम मीमाँसा (emissary theory of light) असत्य है।

जिस किसी चीज को स्वीकार करो या जिस किसी धर्म पर विश्वास करो, तो उसकी निजी श्रेष्ठता के कारण करो। उसकी स्वयं आप जाँच-पड़ताल करो। खूब छान-बीन करो।

अपनी स्वतन्त्रता को बुद्ध, ईसा मसीह, मोहम्मद या कृष्ण के हाथों न बेच डालो।

जब तक आप स्वयं अपने अन्तरतम के अन्धकार को दूर करने के लिये उद्यत नहीं होते, तब तक संसार में चाहे तीन सौ तेतीस अरब ईसा मसीह आ जायें, तो भी कोई भला नहीं हो सकता। दूसरों के आश्रय मत रहो।

सब धर्मों का लक्ष्य ‘अपने ऊपर से पड़ें को हटाना अर्थात् अपने आपका स्पष्ट निरूपण करना है।


Quotation

जिसने तुम्हारे साथ बुरा बर्ताव किया है उसके साथ भी शुद्ध चरण रखो। बदला लेने के विचार को दृष्टि में न रखो।


ईसप की नीति शिक्षा

(1)

एक बकरी अपने झुण्ड में चर रही थी। झुण्ड का चरवाहा बड़ा उपद्रवी था, उसने एक पत्थर खींचकर बकरी को मारा जिससे उसका सींग टूट गया। अपने दुष्कर्म पर चरवाहा बहुत डरा और बकरी से कहने लगा-बहन! तू मालिक से शिकायत न करना, नहीं तो वह मुझे नौकरी से अलग कर देगा। बकरी ने कहा- न कहने पर भी पाप नहीं छिपता। मेरे चुप रहने पर भी यह टूटा हुआ सींग सारी कथा अपने आप कह देगा।

पाप कर्म प्रकट हुए बिना नहीं रह सकते।

(2)

एक गंजे आदमी के सिर के बाल उड़ गये थे तो उसने अपनी झेंप मिटाने के लिए नकली बालों का गुच्छा बनाकर सिर पर बाँध लिया, ताकि कोई पहचान न सके। एक बार उसका गुच्छा शिर पर से गिर पड़ा तो उसके सब मित्र गंजा शिर देखकर हँस पड़े। वह आदमी भी झेंप मिटाने के लिए मित्रों के साथ हँस पड़ा और बोला जब मेरे असली बाल भी चले गये तो नकली क्या साथ देंगे, इसकी क्या आशा है।

ओ आदमी अपनी सहायता आप करना बन्द कर देता है, दूसरे उसकी भला क्या सहायता कर सकते हैं?

(3)

दो मेंढ़कों में मित्रता थी। उनमें से एक तालाब में रहता था दूसरा मोरी में। तालाब का मेंढक मोरी के मेढ़क से कहता—भाई इस साफ पानी से भरे हुए तालाब में आकर क्यों नहीं रहते? मोरी का मेंढक कहता-तालाब में अधिक खतरे हैं मोरी में कोई विपत्ति नहीं। एक दिन बैलगाड़ी मोरी में होकर निकली मेढ़क पहिये के नीचे आ गया और कुचल कर मर गया। तालाब के मेढ़क ने एक ठंडी सास लेते हुए कहा-अभागा, स्वच्छ पानी का सुख भी न ले सका और विपत्ति में भी न रह सका।

खतरे से डर कर दुरावस्था में पड़े रहने वाले कायर कुत्ते की मौत मरते हैं।

(4)

एक बहेलिया चिड़ियाँ पकड़ने के लिए पेड़ पर चढ़ रहा था कि डाली से लिपटे हुए साँप ने उसे डस लिया। बहेलिया यह कहता हुआ मूर्च्छित होकर जमीन पर गिर गया कि-जो निर्बलों को सताता है उसे बताने के लिए ईश्वर दूसरे बलवान को भेजता है।

(5)

नदी में नहाते-नहाते एक लड़के का पैर फिसल गया वह पानी में डुबकियाँ लेने लगा। इतने में एक पंडित उधर से निकला। वह लड़के को पानी में नहाने की बेवकूफी के लिए फटकारने लगा और स्नान कैसे करना चाहिए यह उपदेश देने लगा। लड़के ने दुखी होकर कहा- महोदय! पहले मुझे पानी में से बाहर निकाल लीजिए तब उपदेश दीजिए। वरना आपके उपदेश सुनने से पहले ही मैं डूबकर मर जाऊँगा।

क्रियात्मक सहायता न करके केवल उपदेश देना बेकार है।

(6)

एक माली मरने लगा तो उसके लड़के ने पूछा-आपका धन कहाँ रखा है। उसने कहा मैंने हर एक पेड़ के नीचे दो-दो रुपये गाड़ कर रखे हैं। आप मर गया तो लड़कों ने सारे पेड़ों को खोद डाला। पर वहाँ एक भी रुपया न मिला, लड़के बाप को झूठा समझने लगे।

जब फसल आई तो हर एक पेड़ न पिछली साल की बजाय दो-दो रुपया ज्यादा के फल दिये। तब बड़े लड़के ने कहा-हमारे बाप ने झूठ नहीं बोला। उसने हमें शिक्षा दी कि मेहनत करने से जरूर फायदा होता है।

परिश्रम ही प्रत्यक्ष धन है।

(7)

एक कुम्हार का गधा बड़ा दुष्ट था। एक बार कुम्हार ने उस पर बर्तन लादे उन्हें तोड़ने के लिये गधा खड्डे की तरफ दौड़ा? कुम्हार ने उसे बहुत रोका और कहा-मेरे बर्तनों से अधिक तेरी देह का नुकसान होगा वह न माना और अपनी जिद पूरी करने के लिए खड्डे में कूद पड़ा और बर्तनों के साथ चूर-चूर हो गया।

दुष्ट लोग दूसरों को नुकसान पहुँचाने के लिए अपना और भी नुकसान कर लेते हैं।


कपड़ों के दाग कैसे छूटें?

कपड़ों पर जो चाय आदि के गिर जाने से दाग पड़ जाते हैं-और जिनके कारण वस्त्र बुरा लगने लगता है—उन दागों को दूर करने के कुछ उपाय पाठकों की परीक्षार्थ नीचे अंकित किये जाते हैं।

1—लोहे के धब्बे—नींबू के रस में नमक मिलाकर मलने से बिल्कुल साफ हो जाते हैं।

2—चाय और कहवा—इन दोनों का दाग सुहागे के पानी से दूर हो जाता है।

3—वारनिश—का दाग अमोनिया और तारपीन से धो के मिट जाता है।

4—खून का दाग नमक के पानी से छूट जाता है।

5—स्याही का दाग सिर के को पानी में गरम करके उसी पानी से कपड़ा धो दो स्याही का धब्बा छूट जायगा। सिर के का दाग साबुन और गरम पानी से छूट जाता है।

6—मेंहदी और फलों का दाग—कबूतर की बीट पानी में छोड़कर मलने से छूट जाता है। सूखा हुआ दाग नींबू के रस से छूट जाता है। नींबू का रस लगाकर सुखाने के बाद धोना चाहिये।

7—ऊनी कम्बल पर यदि तेल गिर जाये तो दही से मल देने से साफ हो जाता है।

8—ऊनी कपड़े को नींबू के अर्क में पानी मिला कर गरम करो, फिर साफ ब्रुश से ऊनी कपड़े के धब्बे पर वहीं पानी रगड़ो—धब्बा साफ हो जायेगा।

9—रेशमी कपड़ों का धब्बा छुड़ाने के लिये पानी में सुहागा मिलाकर रेशम पर समुद्र फेन से धीरे धीरे रगड़ना चाहिये। इससे रेशम के मामूली धब्बे छूट जाते हैं।

10—ऊँट का भंगनी को पीस कर पानी में धोलो, फिर उसी पानी में चौबीस घन्टे तक कपड़े को पड़ा रहने दो और दूसरे दिन उसे धो डालो, फिर हींग और साबुन के पानी से साफ कर दो। इससे सब तरह के दाग वस्त्र से छूट जाते हैं।


इस्लाम में गौवध-निषेध

1-’हरगिज नहीं पहुँचते अल्लाह के पास गोश्त और उनके खून ही पहुँचती हे अल्लाह के पास तुम्हारी परहेज़ गारी।

—करान सूरए हज

2-तहकीक अता की हमने तुमको का था नमाज़ पढ़ो, अपने परवरदिगार की, और कुरबानी करो अपने नफस की।

—सूरए कोतुर

3-’क्या देखते नहीं कि तहकीक हमने पैदा किया उनके वास्ते चौपाइयों की जो हमारे है। पास, वह उनके मालिक हैं और कर दिया हमने उन चौपायों को उनके वास्ते। पस, बाज़ इनमें से सवारियों के काम आते हैं, और बाज़ को इनमें से पालते हैं।’

—सूरए यालीम

4-’गाय को मारने वाला, हरे वृक्ष को काटने वाला और शराब को पीने वाला, नहीं बख्शा जायगा।

—सूरए यासीन


ईसाइयत में गोबध-निषेध

1—’जो बैल को काटता है वह उस आदमी की तरह है जो मनुष्य को मारता है।”

—जबूर बाव 46-50।

2-”मैं तेरे घर का बैल न लूँगा और न मेरे बाड़े का बकरा। किन्तु जंगल के सब जानवर मेरे हैं क्या मैं बैलों का गोश्त खाता हूँ या बकरों का लहू पीता हूँ?”

—तौरंत बाद 18-16।

3—”तू खेत की पैदावार खायेगा, तू अपने मुँह से पीसने की रोटी खायेगा।

—हजरत आदम से खुदा ने फरमाया

4—”मैं कुरबानी को नहीं चाहूँगा, बल्कि रहम को चाहता हूँ, तू गोश्त न खा, शराब न पी और ऐसा काम न कर कि जिससे तेरा भाई ठोकर खाए।’

—इजील।


Quotation

मूर्ख अपने दुराचारों तथा अपनी मूर्खता को दूसरे के शिर पर पटकने की कोशिश में रहता है।


गंगा-जल

(श्री मदनगोपाल सिंहल)

(1)

हिन्दू धर्मशास्त्रों में भगवती भागीरथी के जल की बड़ी महिमा कही गई है तथा इसमें स्नान करने या जलपान करने को बड़ा सहायक बतलाया गया है। गंगाजल की पवित्रता और उत्तमता को प्रमाणित करने के लिये अब आधुनिक साइन्स की भी बड़ी सहायता मिल सकती है। पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने भी गंगाजल का स्थूल शक्ति का निर्णय करके संसार की आँखें खोल दी हैं डॉक्टर सी0ई॰ नल्सन एम0 डी0 महोदय ने ‘गुड हैल्थ’ नामक पत्र में लिखा है ‘गंगा को हिन्दू पवित्र समझते हैं और उनका कहना है कि—गंगाजल शुद्ध है और कभी दूषित नहीं होता। हम लोग गंगाजल को सदा दूषित समझते हैं, क्योंकि भारत के प्रधान नगर पवित्र काशी में ही लाखों मनुष्य अपना धर्म समझकर प्रतिदिन गंगा में स्नान कर उसे गन्दा करते हैं। नालियों के गन्दे जल, शव और कूड़ा कर्कट भी इसमें बहाये और फेंके जाते हैं। इस पर भी एक अद्भुत बात है कि कलकत्ते से इंग्लैंड जाने वाले जहाज इसी गंगा के एक मुहाने हुगली नदी का मैला जल लेकर प्रस्थान करते हैं और यह जल इंग्लैंड तक बराबर ताजा बहता रहता है वह बम्बई पहुँचने के समय तक ताजा नहीं रहता। इंग्लैण्ड से जहाज कलकत्ता की अपेक्षा बम्बई एक सप्ताह पहिले ही पहुँच जाते हैं। जहाजों को पोर्ट सईद, स्हे व अदन पर फिर ताजा पानी लेना पड़ता है, क्या इसका कारण यह है कि गंगा पवित्र है और इससे उसका जल भारत से इंग्लैण्ड की यात्रा में ताजा बना रहता है और टेम्स धारा अपवित्र है इससे उसका पानी भारत पहुँचने तक ताजा नहीं रहता। यह कथन कि गंगाजल इतना दूषित होने पर भी ताजा बना रहता है कुछ अद्भुत सा प्रतीत होता है पर इस संबंध में बैक्टीरिया सम्बन्धी जो अन्वेषण हुए हैं उनसे उपयुक्त कथन की पुष्टि होती है।”

इतना ही नहीं पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने आधुनिक चिकित्सा शास्त्र की कसौटी पर कस कर भी गंगाजल को आश्चर्यकारी ही पाया है। भारत में सरकार की ओर से नियुक्त सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक मिस्टर हैं किसने गंगाजल का वैज्ञानिक यन्त्रों द्वारा परीक्षण कर यह सिद्ध किया है कि गंगाजल में हैजे के कीड़ों को नष्ट करने की प्रबल शक्ति विद्यमान है। उन्होंने काशी आकर स्वयं गंगाजल की परीक्षा की और देखा कि काशी के गन्दे नालों का जो जल गंगोत्री में गिरता है उसमें हैजे के लाखों कीट रहते हैं, किन्तु गंगाजल में मिलने के कुछ समय पश्चात् ही सब मर जाते हैं। उन्होंने गंगा में बहते एक मुर्दे को पकड़ कर उसकी परीक्षा की तो उसमें हैजे के कीट पाये, किन्तु कुछ समय पश्चात् ही वे सब नष्ट हो गये। इसके पश्चात् उन्होंने जगह-जगह हैजे के कीट गंगाजल में तथा साथ ही शुद्ध कूप के जल में छोड़े, किन्तु आश्चर्य के साथ देखा गया कि कुछ समय पश्चात गंगाजल में छोड़े गये कीट बढ़कर असंख्य हो गये। यह देखकर उन्होंने आश्चर्य के साथ लिखा कि हिन्दू लोग गंगाजल को जो इना पवित्र और गंगा को देवी मानते हैं, इसके भीतर कुछ तत्व है। स्वेदज कीट विज्ञान का पता प्राचीन काल के हिन्दुओं को कैसे लगा? क्या प्राचीन काल में भी भारत में ऐसे विज्ञान चित् पंडित थे? हमें मालूम होता है कि जिस समय समस्त संसार असभ्यता के अन्धकूप में डूबा हुआ था उस समय हिन्दू जाति की सभ्यता पराकाष्ठा को पहुँची हुई थी।

गंगाजल में हैजे के कीटाणु को नष्ट करने वाले इस पाठ का समर्थन पेरिस के विख्यात डॉक्टर मिस्टर डेरेल ने भी किया है भारत में जब हैजे और आँवले रोग व्यापक रूप से फैले थे और इन रोगों से मरे व्यक्तियों के शव गंगा में फेंक दिये जाते तब उक्त डॉक्टर महोदय ने इन शब्दों के कुछ ही फुट नीचे गंगाजल की परीक्षा करके देखा कि जहाँ ऐसे आँव के लाखों कीटाणुओं के होने की आशा थी वहाँ वास्तव में उनका एक भी कीटाणु नहीं था। डॉक्टर महोदय ने तब इन रोगों के आक्रान्त रोगियों से रोग कीटाणु उत्पन्न किये और उन उत्पन्न किये गये कीटाणुओं पर गंगाजल डाला। उनके आश्चर्य की सीमा न रही जब कुछ समय पश्चात ही उन्होंने देखा कि रोगों के सब कीटाणु मर गये। इससे उन्होंने यह सिद्ध किया कि हैजे और आँव से आक्रान्त रोगियों के लिये गंगाजल औषधि के रूप में प्रयुक्त हो सकता है। डॉक्टर डेरेल के उपर्युक्त कथन की पुष्टि ‘इण्डियन मेडिकल राबट’ ने भी की है।

केवल हैजा ही नहीं, किन्तु अभी पिछले दिनों इंग्लैंड के सुप्रसिद्ध डॉक्टर के0 गिटा ने यह भी सिद्ध किया है कि गंगाजल के प्रयोग से सन्निपात ज्वर और संग्रहणी भी नष्ट हो जाते हैं। उक्त डॉक्टर महोदय ने गंगाजल से ही इन रोगों से पीड़ित अनेक रोगियों की चिकित्सा भी सफलतापूर्वक की है।

अभी पिछले दिनों ‘स्टेट्स मैन’ पत्र में प्रकाशित हुआ था कि—’गंगाजल में दुष्ट द्रण रोपण करने की भी अद्भुत शक्ति है। इसका कारण यह कहा जाता है कि गंगा जल का प्रवाह जिस भूमि भाग पर से आता है उसमें रेडियम से समान वस्तु होनी चाहिये जिससे प्रवाहित जल में उपयुक्त सब दिखाई देता है।’

डॉक्टर रिचर्ड सम ने तो उससे भी अधिक आश्चर्यमयी एक बात लिखी है और वह यह कि ‘गंगा’ ‘गंगा ‘ कहने और उसके दर्शन करने मात्र से मानव हृदय पर उत्तम प्रभाव पड़ता है।

गंगाजल की इन्हीं स्थूल और सूक्ष्म दैवी शक्तियों का अनुभव कर अपने ग्रन्थों में गंगा स्नान और गंगाजल पान का इतना महत्व वर्णन किया है।


Quotation

भूल तो मनुष्य से हो ही जाती है। किन्तु बुद्धिमान तथा गुणवान वह है, जो आदमी भूल को मान लेता है।

*****

धन की अभिलाषा रखने के बजाय सुख की चाहना करो, क्योंकि धन तो तिजोरी में बन्द रहता है और सुख सन्तोष में। अतः धन से प्राप्त नहीं हो सकता है।


संघर्ष नहीं, सहयोग?

(श्री रवीन्द्र नाथ टैगोर)

सृष्टि ईश्वर की अनन्त स्वतंत्रता का परिणाम है। यही स्वतंत्रता तभी स्वतंत्रता है जिससे सत्य का प्रकाश होता है। हम अभी तक इस अवस्था तक पूरी तरह से पहुँचे हैं पर जो लोग इस स्वतंत्रता को एक बड़ी भारी बात समझते हैं, जो इस पर विश्वास रखते हैं और इसको प्राप्त करना चाहते हैं वे लोग निश्चय ही अपनी प्रबलता से स्वतंत्रता को पाने का मार्ग तैयार कर रहे हैं हिन्दुस्तान हमेशा से मनुष्य की सभी आध्यात्मिक शक्ति पर विश्वास करता आया है इस आत्मिक शक्ति को प्राप्त करने के लिए उसने अनेक तप, योग, व्रत इत्यादि किये हैं। इसीलिए मेरा विचार है कि असली भारतवर्ष एक देश ही नहीं, बल्कि एक आदर्श है। भारतवर्ष तभी विजय प्राप्त करेगा जब इस आदर्श की विजय संसार में होगी। वेद में लिखा है कि “पुरुषं महान्तनादिस्य पर्ण तमसः परस्तान्” अर्थात् सूर्य के समान तेज वाला परब्रह्म परमेश्वर का प्रकाश अन्धकार या तमोगुण के परे हैं। हमारा युद्ध भी इसी तमोगुण के साथ है, हमारा उद्देश्य यह है कि अनन्त परब्रह्म का प्रकाश हमारे अन्दर हो। परब्रह्म का यह प्रकाश सिर्फ अलग अलग आदमियों में उत्पन्न होने से ही काम न चलेगा उसका प्रकाश मनुष्य मात्र में होना चाहिए। जिस तमोगुण का हम नाश करना चाहते हैं वह लोगों का जातीय स्वार्थ है। भारतवर्ष का आदर्श सदा से कुछ बात के विरुद्ध रहा है कि भारतीय अपने को दूसरी जातियों से अलग समझ कर उनसे निरन्तर युद्ध करते रहें। इसलिए मेरी प्रार्थना है कि भारत संसार की कुल जातियों के साथ सहयोग करे।


नेत्रों की ज्योति

(वैद्य भूषण पं. बालकृष्ण शर्मा विशारद)

नेत्रों की ज्योति मंद होने के प्रायः निम्नलिखित कारण हैं इनसे बचने का सदा सर्वदा प्रयत्न करते रहना चाहिए।

1-मूर्द्धा (दिमाग) को विशेष सरदी वा गरमी पहुँचाना

2-अधिक धूप, अग्नि या रोशनी को देखा करना जैसे सिनेमा का व्यसन।

3-बहुत ऊष्ण जल सिर पर डालना।

4-नेत्रों को बहुत गर्म या सर्द हवा के झोंके लगना।

5-नेत्रों में अधिक धूल, धुँआ या भाप लगना विशेषकर जहरीली वस्तुओं की भाप बहुत ही हानिकर है।

6-बहुत बारीक वस्तु बार-बार देखना तथा बहुत ही महीन अक्षर लिखना और पढ़ना।

7-कम प्रकाश में पढ़ने का प्रयत्न करना।

8-तेज रंगों को देखा करना। हरियाली को देखना नेत्र ज्योति के लिए हितकर है।

9-रूखा भोजन करना।

10-शिर में उत्तम तेल न लगना। सिर में डालने के तेल आयुर्वेद पद्धति से बने हुए होने चाहिये। बाजारू सेण्ट या एसेन्स पर बने हुए न होना चाहिये।

11-लेटे लेटे गाना या पढ़ना।

12-मिट्टी के तेल की खुली रोशनी में रहना।

13-ब्रह्मचर्य्य से न रहना।

14-अति परिश्रम करना।

15-तेज औषधियों का सेवन जैसे कुचला आदि या अन्य ऊष्ण प्रकृति औषधियों का सेवन अथवा गरम रुक्ष भोजन करना।

16-तेरह बेगों को रोकना, उनमें विशेष कर अश्रु।

17-अधिक चिन्ता या दुःख से रोते रहना।

18-ऐसी ऐनक का उपयोग करना जिसमें वस्तु व अक्षर बड़े दृष्टि में आवें।

19-झुककर बैठकर काम करना।

नेत्रीपकारक बर्ताव

1-मुँह और आँखों को नित्य ठंडे पानी से धोना

2-कोई अच्छा सुरमा या अंजन बनाना जो कि किसी सद्वेद्य द्वारा बना हुआ हो।

3-ऋषियों के अनुसार मस्तक पर अनुलेपनं लगाना जैसे चन्दन का लेप, ऋतु के अनुसार दोनों को मिलाना।

4-सिर में तेल नित्य डालना, विशेषकर और कर्म के पीछे।

5-हो सके तो नवनीत (माखन) या सद्यः धुत 1 तोला, मिश्री 1 तोला बादाम गिरी 5 काली मिर्च 15 नित्य खाना।

6-गो-घृत दो तोले में चार रत्ती केशर अथवा 1 रत्ती कस्तूरी मिलाकर रखना और उसका नास लेना

7-त्रिफला पाक नित्य दो तोला फाल्गुन चैत में मार्च बसन्त ऋतु में 40 दिनों तक खाना।

8-प्रति आठवों दिन रसाँजन (रसोई) से आँखों के मलिन तल और मेंल निकालना।

9-प्रतिमास एक किसी उत्तम नस्य से मूर्द्धादि की सफाई करना ।

10-नेत्रों में कोई रोग हो तो किसी नेत्र विशेषज्ञ से उपचार शीघ्र करवाना चाहिये।

उपर्युक्त आवश्यक बातों पर बचपन से ही ध्यान दिया जायगा, तो वृद्धावस्था में दृष्टि पूर्ण रूप से स्थिर रहेगी और नेत्रों की कोई बीमारी होने की सम्भावना नहीं रहेगी। आप ऐनक लगाने की व्यथा से भी दूर रहेंगे।

—आम-सुधार


ऋण मुक्ति बिना शान्ति नहीं

-नदी के दाहिनी ओर स्कॉटलैंड में पार्थ नामक नगरी में फौजी छावनी के पास अपनी झोपड़ियाँ बनाकर दो गरीब विधवाएं रहती थी। एक का नाम था एनी दूसरी का मालय। इन दोनों में बहुत प्रेम था। मजदूरी करने साथ-साथ जातीं और साथ भोजन बनाती। उनकी दुनिया बहुत छोटी थी पर थी संतोषपूर्ण।

मृत्यु राजा और रंक का भेद नहीं पहचानती। मालय को निमोनिया हुआ और एक सप्ताह बीमार रह कर मर गई। अब ऐना अकेली थी। कई दिन उसे बड़ा दुख रहा। फिर आखिर उसे संतोष करना पड़ा। वह अकेली मजदूरी करने जाती और अकेली ही सो रहती। अब अकेलापन भी उसे नकारता न था।

एक रात को ऐसी बिस्तर पर लेटी हुई थी कि अचानक मालय वहाँ आ खड़ी हुई। ऐनी ने आँखें फाड़-2 कर देखा और यह तो मालय ही है। बेचारी बुढ़िया बहुत डरने लगी मालय ने कहा ऐनी डरो नहीं। तुम समझती हो कि मैं मर गई। पर मृत्यु के बाद भी मैं जीवित हूँ। तुम्हें कोई कष्ट देने नहीं आई हूँ, किन्तु एक विनम्र प्रार्थना करती हूँ यदि उसे स्वीकार कर सको तो बहुत कृतज्ञ हूँगी।

ऐनी की हिम्मत बँधी और साहस करके पूछा—”हाँ कहो मालय, क्या कहती हो, मालय की छाया मूर्ति ने कहा—मेरे ऊपर तेरह आना कर्ज है। सो तुम उसे चुका देना, क्योंकि बिना उस ऋण को चुकाये मेरी आत्मा को शान्ति नहीं मिल सकती। तुमसे चुकाने के लिए इसलिए कहती हूँ कि तुम्हारे पास मेरे पुराने बर्तन कपड़े भी तो रह गये हैं जो तेरह आने से कम कीमत के नहीं हैं। इतना कह कर मालय अन्तर्ध्यान हो गई।”

दूसरे दिन प्रातःकाल ही ऐनी उठी और रात की प्रतिज्ञा को पूरी करने के लिए बटुए में तेरह आने रखकर घर से बाहर निकली, पर यह पैसे किसे देने हैं, यह तो उसे याद ही न था। या तो मालय ने ऋण दाता का नाम बताया ही नहीं था या बताया था तो वह भूल गई थी। अब क्या किया जाय? एनी बड़ी द्विविधा में पड़ गई।

सोचते-सोचते एक विचार उसे आया कि किसी आध्यात्मवादी पादरी के पास चलना चाहिए। वह अपने एक परिचित पादरी रेवेण्डरचाली के मकान पर पहुँची और उनसे सब वृत्तान्त कह सुनाया।

पादरी बड़े दयालु और सहृदय सज्जन थे। उन्होंने इस सम्बन्ध में दिलचस्पी दिखाई और ऋण दाता की तलाश करने के लिए ऐनी के साथ चल दिये। उन्होंने ढूँढ़ा कि किस किससे यह उधार लिया करती थी। आखिर एक मोदी का पता मालूम हुआ जिससे वह आटा-दाल खरीदा करती थी। पादरी उसी के पास गया और पूछा कि मृतक मालय से तुम्हारा कुछ हिसाब किताब तो शेष था। मोदी को जबानी कुछ याद न था। उसने हिसाब बही ढूंढ़ा तो उसमें मालय के नाम तेरह आने पैसे लिखे हुए थे।

पादरी चार्ल्स ने मोदी को वह पैसे चुका दिये। फिर मालय को छाया मूर्ति को कभी किसी ने नहीं देखा।

उपरोक्त घटना का उल्लेख डॉक्टर चिम्स ने अपने Anotomy of Melancholy नामक ग्रन्थ में किया है। यह घटना उन्हें काउण्ट के राजगुरु धर्माचार्य स्रू जबेरी ने बताई थी।


Quotation

जो मनुष्य अपनी गलतियों तथा निर्बलताओं का प्रकाश में आना सहन नहीं कर सकता है। उसका सत्य के रास्ते पर चलना मुश्किल है।


सच्चा ज्ञानी

(पं. रामदयाल शर्मा, तिलहर)

महाराज पाँडव और धृतराष्ट्र के पुत्र जब विद्याध्ययन के योग्य हुए तो उन्हें गुरु के समीप विद्या पढ़ने के लिए भेजा गया। गुरु कुल में पाँडवों और कौरवों की शिक्षा दीक्षा की समुचित व्यवस्था चलने लगी।

एक दिन आचार्य ने बालकों को पाठ दिया ‘लस्यंवद’ दूसरे दिन सबने उसे रट कर ठीक-ठीक सुना दिया, परन्तु युधिष्ठिर ने कहा—गुरु जी! मैं अभी उस पाठकों याद न कर सका। गुरु ने दूसरे दिन याद कर आने के लिए आदेश किया। दूसरे दिन याद कर आने के लिए आदेश किया। दूसरे दिन भी युधिष्ठिर में वही उत्तर दिया—अभी मैं याद नहीं कर सका। रोज उन्हें आचार्य का आदेश मिलता—’कल जरूर याद कर आना।’ दूसरे दिन युधिष्ठिर का भी यही उत्तर होता—याद न कर सका। इस क्रम को चलते हुए कई दिन व्यतीत हो गए।

अनन्तः आचार्य ने, युधिष्ठिर को खूब झिड़का और कहा—जरा सी बात याद करने में तुमने इतने दिन लगा दिये। युधिष्ठिर ने गुरु की पद-रथ शिर पर चढ़ाते हुए विनय पूर्वक निवेदन किया—गुरुवर! वह छोटा सा शब्द तो मुझे उसी क्षण याद हो गया था और अन्य बालकों की भाँति तोते की तरह तो कमी का सुना चुका होता, पर इतने मात्र से वह शिक्षा पूरी नहीं होती। आपका पढ़ाना और मेरा पड़ना तभी सार्थक हो सकता है, अब मैं ‘सत्यवह’ की शिखा को हृदय के गहरे अन्तस्थल तक उतार लूँ और मेरा जीवन उसी से आते प्रोत हो जाय।

आचार्य का हृदय गदगद हो आया। उनने सच्चे विश्व युधिष्ठिर को छाती से लगा कर कहा—बेटा! शिक्षा का सच्चा तत्व तुमने समझ लिया, लाखों पुस्तकें पढ़ने और हजारों गुरुओं के उपदेश श्रवण करने से भी कुछ लाभ नहीं, यदि धर्म का आचरण न किया जाय। आचरण ही मुख्य है, बहुत पढ़ने वाला ज्ञानी नहीं वरन् सच्चा ज्ञानी वह है, जो भले ही कम जानता हो पर कितना जानता है, उसे ठीक तरह अपने जीवन में प्रयोग करता है।


भक्ति का मर्म

(पं. प्रसादी लाल शर्मा ‘दिनेश’ कराहल)

एक बार नारदजी ईश्वर भक्ति का प्रचार करते हुए भूलोक मैं भ्रमण कर रहे थे। तो उन्होंने सर्वत्र अपनी भक्ति भावना की बहुत प्रशंसा सुनी। नारद जी ने समझा मैं ही सबसे बड़ा भक्त हूँ। अपने इस अभिमान की पुष्टि कराने के निमित्त वे बैकुण्ठ लोक में विष्णु भगवान के पास पहुँचे। भगवान् से उन्होंने कहा “प्रभो? मृत्युलोक में मुझे सबसे बड़ा ईश्वर भक्त समझा जा रहा है सो आप बताइये कि क्या मैं सचमुच सबसे बड़ा भक्त हूँ, यदि मुझसे भी बड़ा कोई और भक्त है तो उसका नाम बताइए जिससे मैं उसके पास जाकर भक्ति करना सीखूँ।

भगवान मुसकराये और बोले—महर्षि, वैसे तो आप श्रेष्ठ भक्त हैं, पर ऐसा मत समझिए कि आप से बढ़कर और कोई भक्त नहीं है। यदि भक्ति में और आगे बढ़ने की इच्छा है तो मैं बताता हूँ कि अमुक ग्राम में अमुक किसान के पास चले जाओ, वह आपसे भी बड़ा भक्त है और आपको बहुत कुछ शिक्षा प्रदान करेगा!

भगवान के वचन सुन कर नारद ने अपनी वीणा उठाई और ‘हे नाथ नारायण वासुदेव’ जपते हुए उस किसान के दरवाजे पर जा पहुँचे। किसान इसे जोत कर लौट रहा था। नारद ने उसे प्रणाम किया और भगवान के सारे वचन सुनाते हुए भक्ति योग की शिक्षा देने की प्रार्थना करने लगे।

किसान ने बैलों को यथास्थान बाँधा और हल को कन्धे पर से उतार कर कोने में रखा, तदुपरान्त देवर्षि को आसन देकर हाथ जोड़ कर कहा-भगवान! मैं सीधा सादा किसान हूँ। फूटा अक्षर पड़ा नहीं और संध्या, भजन भी कुछ नहीं जानता। मालूम होता है किसी ने आपको बहका दिया है। मैंने न तो कोई योग सीखा है न ज्ञान भक्ति के बारे में कुछ जानता हूँ। धर्मपूर्वक अपनी जीविका उपार्जन करता हूँ, और अपना कर्तव्य पालन करने में मैं सफाई के साथ लगा रहता हूँ।

नारद ने पहले तो यह समझा कि किसान बनावटी बात कह रहा है वह जरूर कोई पहुँचा हुआ सिद्ध होगा, पर अनेक प्रकार से जब उसने परीक्षा करली कि यह झूठ नहीं बोलता जो बात है उसे सत्य सत्य कह रहा है, तब नारद उठ खड़े हुए विष्णु भगवान के पास जा धमके।

भगवान में उनकी मनोभावनाएँ पहचान ली और हँसते हुए कहा—नारद! ऐसा मत समझो कि मैंने बहका दिया था और उस अपढ़ किसान के पास भक्ति सीखने के लिये भेज कर तुम्हारा उपहास किया था, देखो, सत्य बात यह है कि असल में वह किसान ही यथा भक्त है! नामधारी भक्तों की तरह वह तरह-तरह के आडम्बर बनाना नहीं जानता है तो भी वह अपने कर्तव्य धर्म का सच्चाई से पालन करता है। हे नारद! तुम जानते ही हो कि भक्त महलों में काम से जी चुराने वाले, सस्ती वाहवाही लूटने वाले, तथा लोग तप और कीर्तन की आड़ में अपने पाप छिपाने वाले ही अधिक होते हैं। यह ढोंगी मुझे जरा भी पसंद नहीं मैं तो धर्मपूर्वक आचरा करने वाले और सच्चाई से अपना कर्तव्य पालन करते रहने वाले लोगों को ही प्यार करता हूँ, और उन्हें ही सच्चा भक्त समझता हूँ! देवर्षि तुम्हारा कीर्तन, नाम जप, भक्ति प्रचार सराहनीय है पर अपने साधारण काम को सच्चाई और ईमानदारी से करते रहने वाले उस किसान को अपेक्षा तुम कुछ ऊंचे नहीं हो।

नारद जी की आंखें खुल गईं और उन्होंने भगवान का चरण वन्दन करते हुए कहा—आज मैंने भक्ति सच्चा मर्म समझा है और अब लोगों को कर्तव्य धर्म में सच्चाई के साथ लगे रहने का ही उपदेश किया करूंगा।

यह कह कर नारद जी वीणा बजाते, हरि गुण गाते, ज्ञान प्रसार के लिए भूलोक की ओर चल दिए।


सच्चे लाभ की साधना

(श्री राधाकान्त मुण्ड, खरियार)

कंचन पुर नगर में एक राजा राज्य करता था, उसके कोई सन्तान न थी। बहुत तपस्या के उपरान्त एक परमसुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई। जब कन्या विवाह योग्य हुई, तब राजा ने देश-देशान्तर के राजाओं को स्वयंवर के लिए बुलाया, किन्तु उस राजकुमारी ने किसी भी राजकुमार को स्वीकार न किया। होते होते बहुत दिन गुजर गये।

एक दिन रात्रि के समय राजा शयनागार में गये हुए थे तब रानी ने पति से कहा “राजन्! राजकुमारी का विचार किसी धर्मपरायण परोपकारी योगी से विवाह करने का है वह भोग ऐश्वर्य की अपेक्षा आत्म उन्नति में सहायता करने वाला साथी चाहती है। कष्ट और निर्धनता की उसे जरा सी परवाह नहीं। इसलिए आप किसी योगी के साथ उसका विवाह करने का प्रयत्न कीजिए।”

राजा को पहले तो यह प्रस्ताव पसंद न आया, पर जब रानी ने प्राचीन इतिहास बताते हुए पार्वती, सावित्री, सुकन्या आदि अनेक राज पुत्रियों का विवाह योगियों के साथ होने के उदाहरण दिये तो राजा सहमत हो गया और दूसरे दिन योगी की तलाश में जाने का उसने निश्चय कर लिया।

राजा और रानी में जिस समय यह वार्तालाप हो रहा था, ठीक उसी समय एक चोर शयनागार के निकट चोरी के उद्देश्य से छिपा हुआ यह सब बातें सुन रहा था। उसने सोचा मैं ही योगी का वेष बनाकर राजा के मार्ग में क्यों न बैठ जाऊं जिससे राजकुमारी का हाथ तथा राज्य का उत्तराधिकार मुझे ही प्राप्त हो जाय? चोर के मन में यह बात बैठ गई। वह तुरंत ही वहाँ से उल्टे पाँव लौट गया और घर जाकर योगी का वेष बना, प्रभात होने से पूर्व राजा के जाने के मार्ग पर जा बैठा।

प्रभात होने पर राजा, योगी वर की तलाश में निकला। उसने कुछ ही दूर आगे चलने पर एक स्वस्थ शरीर, योगी युवक को ध्यान मग्न देखा। राजा वहीं ठहर गया और किसी प्रकार प्रार्थना अनुरोध से उसे विवाह के लिये तैयार करके घर ले आया। राजा रानी असाधारण रीति से अपने भावी जमाता का स्वागत-सत्कार करने लगे। विवाह की तिथि निश्चित हो गई।

चोर मन ही मन विचार करने लगा कि जिस योग का आडंबर करने मात्र से इतना लाभ हो रहा है यदि अपने मन से उसकी साधना की जाय तो न जाने कितना लाभ होगा, बुद्धिमानों ने कहा है कि—”बड़े लाभ के लिए छोटे लाभ का त्याग करना चाहिए।” इसलिए मुझे सच्चे योग की साधना करके अपार लाभ प्राप्त करना चाहिये।

चोर ने राजा से विवाह की अस्वीकृति प्रकट कर दी और सच्चे साधक के रूप में वह तप करने के लिये चला गया।


अमृतमय दोहे


अमृतमय दोहे (kavita)

मानुष तन को पाय के, करे नहीं सत संग।

ज्यों पारस को पाय के, दाग रहे मति भंग॥

पढ़ि पढ़ि के पंडित भये, भये न किया बान।

ज्यों गंगा, तट जायके, प्यासा रहे जबान॥

पढ़ पढ़ कै ज्ञानी भये, मिटवों नहीं तन ताप।

राम राम तोता रटें, कटै न बन्धन पाप॥

वेद शास्त्र सर्व कंठ कर, बग बहुत बाचाल।

बिना कर्म के गति नहीं, घूम रही सिरकाल॥

केवल मन्थन के पढ़े, आवागमन न जाय।

षट्रस भोजन , बिन ना थ न ।

बढ़ बढ़ के बाते करें, नहीं किया के ज्ञान।

लाखों परे खजानची, करे न कोड़ी दान॥

(श्री किशनवी अग्रवाल ‘प्रसाद’ हरदा)


प्रभुता का मद

उस पद को प्राप्त करने के लिए उष्णन हृदय की आवश्यकता है। जिनका हृदय महान् है वे ही महान् कर्तव्यों को पूरा भी कर सकते हैं। नीच वृत्तियों के स्वामी मनुष्यों के हाथ में यदि कभी उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यों को पा जावें या उस सत्ता को किसी प्रकार प्राप्त कर ले तो वे उसका सदुपयोग ही करेंगे।

राजा नहुष ने एक बार बड़ा प्रयत्न करके इन्द्र पद प्राप्त कर लिया था और वह शासक के दायित्वपूर्ण पद पर बैठ गया था। निश्चय ही नीच स्वभाव के मनुष्य उच्च पद को पाकर आपे से बाहर हो जाते हैं और उन्हें एक प्रकार का उन्मादकारी नशा चड़ जाता है जिसे प्रभुता का मद कहते हैं। इन्द्र पद को पाकर नहुष को हुआ। उसने शक्ति के घमंड में उचित अनुचित के भेद का परित्याग कर दिया।

नहुष की इच्छा हुई की भूतपूर्व इन्द्र की सती को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपनी पत्नी बना ले। उसने यह प्रस्ताव इन्द्राणी के पास भेजा पर उसने उसकी इच्छा पूर्ण करने से साफ इनकार कर दिया। पर नहुष ने उसके रूप लावण्य पर मुग्ध हो रहा था वह सत्ता के रथ पर अपनी मनो इच्छा पूरी करने पर उतारू हो गया।

इन्द्राणी ने देखा कि यों काम न चलेगा। काँटे से काँटा निकालना चाहिये। जो दुष्ट अपने बल से न हटाया जा सके उसे अन्य उपायों से ही नष्ट करा देना नीति है। इन्द्राणी ने इसी नीति से काम लिया और कहलवा भेजा कि राजा नहुष मेरे अन्तःपुर में ऋषियों की कहार बनाकर उनकी पालकी में बैठकर आ सकते हैं। कहते हैं कि कामातुर के भय और लज्जा नहीं रहती। नहुष ने निर्लज्जता पूर्वक अपनी तृप्ति के लिए ऋषियों को पालकी में जुतवा दिया और उनके ऊपर सवार होकर इन्द्राणी के अन्तःपुर के लिए चल दिया।

बाद इन्द्रियाँ बेकाबू हो जाय तो मनुष्य को अन्धा बना देती है, आँखें रखते हुए भी उसे भला बुरा कुछ नहीं सूझ पड़ता। वह पागल की तरह चाहे जो कहने और करने लगता है। दुर्बल शरीर वाले ऋषि पालकी और राजा का भार लेकर कड़ी कठिनाई से चल रहे थे। पर राजा को इतना चैन कहाँ था, वह तो आधे पल के अन्दर इन्द्राणी के महल में पहुँचना चाहता था। ऋषियों का धीरे-धीरे चलना उसे सहन न हो सका और उसने उतावला एवं क्रोध के साथ ‘सर्प’ ‘सर्प’ अर्थात् जल्दी चलो, जल्दी चलो कहने लगा।

कोई कितना ही सहनशील क्यों न हो अन्याय के विरुद्ध एक दिन उसकी आत्मा विद्रोह करती ही है। जो निरन्तर अन्याय सहन करता रहे और उसके प्रतिकार का गरम या ठंडा कोई उपाय न करे यह यथार्थ में मनुष्य कहा ही नहीं जा सकता। ऋषि लोग अन्याय सह रहे थे इसलिए कि इसका पाप घड़ा भर जाने दिया जाय तो अपने आप फूट जायगा। पर वह तो मर ही चुका था। ऋषियों की आत्मा विद्रोह कर उठी। उन्होंने समझा ऐसे समय पर भी चुप रहना क्षमा नहीं कायरता होगी।

उन्होंने पालकी को नीचे पटक दिया और शाप दिया कि—’मदान्ध’ तू उचित अनुचित कुछ नहीं देखता और ‘सर्प’ सर्प ही चिल्लाता जाता है, जा तू सर्प ही हो जायगा, पवित्र आत्माओं का वचन मिथ्या नहीं होता, ऋषियों के श्राप से राज सचमुच सर्प होकर भूमि पर लोटने लगा।


Quotation

शक्ति और सत्ता बड़ी उत्तम वस्तुयें हैं, परन्तु यही जब किन्हीं दुष्ट स्वभाव के मनुष्यों के हाथ में चली जाती हैं तो न केवल संसार का ही अहित करती हैं, वरन् स्वयं उसका विनाश कर देती हैं।


समालोचना

शान्ति सुधा-लेखक श्री राधेश्याम जी द्विवेदी वकील। प्रकाशक-केशव साहित्य कुटीर श्री करेरा (ग्वालियर) मूल्य 1), हाथ के बने कागज पर सुन्दर छपी हुई 62 पृष्ठ की यह पुस्तक दाम्पत्य जीवन में सुख शाँति स्थापना के उद्देश्य से प्रकाशित की गई है। विद्वान् लेखक धर्म शास्त्रों के आधार पर पति और पत्नी को अपने अपने कर्त्तव्य पालन करने की मनोहर शिक्षा दी है जिन पर अमल करने वाले दम्पत्ति निश्चय ही सुख शाँति से अपना जीवन बिता सकते हैं। लेखक का प्रयत्न सराहनीय है।


क्या जीवन जो हम जीते हैं?


क्या जीवन जो हम जीते हैं (kavita)

भय विस्मय साहस वेग लेकर हम ‘वर्षों की भाल संजोते,

कितने हम अनुताप अश्रु के मोती उसमें आज पिरोते।

कितना करुणापूर्ण विश्व में संतों का इतिहास हमारा,

लिखते अपने रक्त बिंदु से जिसको हम सब हँसते रोते।

घोर भव सागर का रुद्र रूप होकर पीते हैं॥

क्या जीवन को हम जीते हैं?

प्रताप के झोंके आते दावानल की लपटें आतीं,

कितनी वदनावालियाँ शिक्षा देतीं लौट लौट कर जातीं।

मनुष्यता का सीख यहाँ पर सत्य—सत्य किसने समझा है,

ईर्ष्या और महत्वाकाँक्षा कितने हैं उत्पात—मचातीं।

हम कितना कुछ पाते जावें तो भी रीते के रीते हैं॥

क्या जीवन जो हम जीते हैं?

जितने तुम सुलझाते उलझा यह जीवन का ताना बाना ,

रहने दो दर्शन की बातें तुमने जाना हमने जाना।

ज्ञान और विज्ञान न देंगे हमको शाँति—साँत्वना भी भर,

कर लेते दो, दो-दिल हमको मित्रो! अपना ही ‘मन’ गाना।

बुद्धि के बखिये प्रतिदिन खुद उधेड़ते हैं, सीते हैं॥

क्या जीवन जो हम जीते हैं?

हम अपना दृष्टाँत स्वयं है, हृत्तन्त्री हैं आप बजाते,

बैठ किसी कोने में अपना गाना हम ही सुनते गाते।

हम अपने में मस्त, हमें क्यों कोई छेड़े, राग बिगाड़े,

सुनले वह जिसको सुनना है उसी राह से आते—जाते।

जिस पर अविरत चलते-चलते लोगों को युग-2 बीते हैं॥

क्या जीवन जो हम जीते हैं?

हम अपना! मैदान बनाकर भागे—दौड़ेंगे कूदे—खेले,

दीख पड़े फिर भी असंख्य से होकर हम तो आप अकेले।

हम अपने घावों, पर यही आप बाँधते साँस न लेते,

जग को विस्तृत रणम्यली में सुख भी भोगे, दुख भी झेले।

वैसे तो किसके हो पाये यहाँ, आज तक मन जीते हैं॥

क्या जीवन जो हम जीते हैं?

*समाप्त*

(संकलन कर्त्ता-श्री. बंगाल गुप्त)