सारी आपदाएं, सारे दुःख क्लेश और कुछ नहीं हैं ये केवल स्वप्न हैं। हमारी कठिनाइयाँ समान हमें दुर्लभ, सारी वस्तुएं भयंकर और अन्धकार मय प्रतीत होती हैं, परन्तु यह सच नहीं केवल माया है। भय मत करो, यह नष्ट हो चुकी है। इसे पीस डालो, यह तिरोहित हो चुका है इसे पद दलित कर डालो, यह लुप्त हो जायगी। डरो मत, इस बात की चिन्ता मत करो कि हमें कई बार असफल होना पड़ा है। कोई परवा नहीं। समय अनन्त है। आगे की ओर पैर बढ़ाये बार-बार प्रयत्न करते रहो, अन्त में चेतना आकर रहेगी।
आपकी रक्षा करने वाला इस संसार में और कोई नहीं है। किसी भी मित्र में ऐसी शक्ति नहीं है यह है। सच तो यह है कि संसार में आप ही अपने सबसे बड़े शत्रु और आप ही सबसे बड़े मित्र हैं। हर आपदाओं और दुर्बलताओं के ऊपर आत्मा का प्रकाश डालिए और उसके उजाले में वास्तविक रूप को पहचानिए। स्मरण रखिए प्रकाश के साथ अन्धकार नहीं रह सकता और न आत्म ज्ञान के डडडड का अस्तित्व कायम रह सकता है।
वर्ष- 4 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक -11
(रचयिता- श्री महावीर प्रसाद विद्यार्थी, टेड़ा, उन्नाव)
मेरे प्राणों के अमर राग॥
टकरा-टकरा जिनसे अविरल करती जीवन -धारा क्रन्दन
अभिलाषा आँसू बन बहती क्षत- विक्षत आशा -स्वर्ण सुमन
हों भस्म शिलाएं ये जग की धधका दे ऐसी विषम आग।
मेरे प्राणों के अमर राग॥
जाते ठुकराए पग-पग पर चिथड़ों में जिनकी ढंकी लाज।
गतिहीन, मूक, शोषित, पीड़ित कीड़ों से भी जो तुच्छ आज॥
इन जर्जर नर- कंकालों में बन स्वाभिमान की ज्योति जाग।
मेरे प्राणों के अमर राग॥
इठलाती शोषित -धारों पर दानवता करती अट्टहास।
प्रलयंकर अस्त्रों-शस्त्रों की नौका पर करती मधु-विलास॥
खिल उठे तुम्हारी लाली से मानवता का कुण्ठित सुहाग।
मेरे प्राणों के अमर राग॥
अविराम धधकती आग जहाँ फैले नन्दन वन का सुवास।
छलके वसुधा के कण कण में वह मधुर प्रेम का तरल हास॥
जल जाए जीवन का कल्मष हो सफल अहिंसा सत्य याग।
मेरे प्राणों के अमर राग॥
(2)
गत अंक की इन्हीं पंक्तियों में बताया जा चुका है कि कलियुग का प्रमुख स्थान स्वर्ण में-पैसे में है। यदि अखण्ड ज्योति के पाठक अपने जीवन को सात्विक-सतयुगी बनाना चाहते हैं तो उन्हें अपना जीवनोद्देश्य पैसा बटोरना और मौज उड़ाना छोड़कर आत्मोन्नति बनाना होगा, पैसे को सर्वोच्च स्थान पर न रखकर धर्म और ईश्वर के प्रति आदर भाव बढ़ाना होगा।
परीक्षित ने कलियुग को रहने के लिए जो स्थान बताये थे, उनमें धन ही सर्वोपरि है। अन्य उसी से सम्बन्धित हैं तो भी उनका स्थान है ही, हम लोगों को उन भयंकर स्थानों से भी उसी प्रकार सावधान रहना होगा जिस प्रकार साँप की बाँबी, सिंह की गुफा, रीछ की झाड़ी के निकट जाते हुए सतर्कता से काम लेते है कि कहीं इनमें से हमारे ऊपर खतरनाक आक्रमण न हो जाए। परीक्षित ने कलियुग को बताया था कि स्वर्ण के अतिरिक्त झूठ, जुआ, नशा, व्यभिचार, चोरी और हत्या भी तुम्हारे निवास स्थान होंगे। उन छः स्थानों से बचाव किस प्रकार करना चाहिए, इसका कुछ विवरण नीचे दिया जा रहा है।
झूठ -”जो बात जैसी हो उसको वैसी ही कह देना” सत्य की यह परिभाषा बहुत ही अपूर्ण लँगड़ी लूली, अनेक शंका संदेहों से भरपूर एवं अव्यावहारिक है। कई बार धर्म की रक्षा और लोक हित के लिए इसमें अपवाद उपस्थित हुआ करते हैं, उन अवसर पर प्रयोग किया हुआ असत्य भी सत्य जैसा उचित होता है। वास्तव में झूठ से तात्पर्य छल, कपट, ठगी, ढोंग, धूर्तता, धोखा, बेईमानी, विश्वासघात से है। बड़े से बड़े लाभ के लिये इन दुष्कर्मों को नहीं किया जाना चाहिए। अनीतिपूर्वक किसी के हक का, अधिकार का, अपहरण करना, धोखा देकर विपत्ति में फँसा देना, विश्वास दिलाकर वचन पलट देना यह ‘झूठ’ का असली तात्पर्य है। मनोरंजन के लिए या धूर्तता से बचाव करने के लिए “मंत्र को गुप्त रखने” की शास्त्रीय परिपाटी का अवलंबन किया जा सकता है, वह झूठ नहीं कहा जायेगा। हाँ, किसी के साथ असत्य आचरण करके उसे विपत्ति में नहीं डालना चाहिए।
जुआ- ताश, कौड़ी, पासे, गोट आदि की सहायता से जो जुआ खेले जाते हैं, जो खेल कानून द्वारा जुआ की परिभाषा में सम्मिलित हैं वे तो जुआ हैं ही, पर वास्तव में जुए का क्षेत्र आज बहुत व्यापक हो गया है। बुद्धि चातुरी से उन कार्यों को जुआ की परिभाषा और कानून से बचा लिया गया है तो भी असल में वे सब जुआ ही हैं। तेजी मंदी के सट्टे, फीचर के सटे, वायदे के सौदे, लाटरी, दड़ा, यह एक खास किस्म के जुए हैं जिन कार्यों में उद्योग, परिश्रम, बुद्धि का सामंजस्य नहीं वरन् भाग्य के ऊपर निर्भर रहना पड़े वे कार्य जुआ हैं। आजकल प्रतियोगिताएं भी जुए के रूप में चल पड़ी हैं। किसी पराक्रम के लिए पुरस्कार देना प्रतियोगिता का उद्देश्य था पर इन दिनों पहेलियाँ, तीतरों की लड़ाई, घुड़दौड़, पतंग बाजी आदि में जुआ ही चल पड़ा है। यह जुए त्याज्य हैं, धन कमाने का मार्ग शरीर और बुद्धि का परिश्रम ही हैं, व्यापार वस्तुओं का होना चाहिए, बातूनी जमा खर्च का नहीं। इससे ही आर्थिक परिस्थिति बिगड़ती है, पुरुषार्थता घटती है एवं झटके के साथ जो असाधारण हानि-लाभ होते हैं वे दोनों ही निकृष्ट परिणाम उत्पन्न करते हैं। सब प्रकार के जुओं से बचते हुए केवल वास्तविक व्यापार पर ही निर्भर रहना चाहिए।
नशा- नशे दो प्रकार के हैं- तम्बाकू, भाँग, गाँजा, ताड़ी, चरस, अफीम, शराब, कोकीन आदि जितने भी नशे हैं, इनके सेवन से लाभ किसी प्रकार का नहीं और हानि शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, नैतिक, चार प्रकार की है। अन्य व्यसनों में कुछ प्रत्यक्ष लाभ तो भी है पर इन नशों में तो वह भी नहीं। बुरा द्वन्द्व, बुरी गंध, बुरा फल तीनों ही प्रकार की बुराई है। मूर्खतावश दूसरों की देखा−देखी या बहकावे में आकर मनुष्य नशा सेवन करने लगता है, फिर इनकी ऐसी आदत पड़ जाती है कि छुड़ाये नहीं छूटती। मानसिक नशा अहंकार का होता है, धन का, विद्या का, बुद्धि का, अधिकार का, घमंड का, किन्हीं किन्हीं को ऐसा होता है कि उसकी खुमारी में शराबी की तरह झूमते रहते हैं, जमीन पर सीधे पाँव नहीं धरते, सीधे मुँह बोलते नहीं, हर बात में अकड़, ऐंठ, गुमान, गरुर टपकता हैं यह मानसिक नशा है। यह दोनों ही प्रकार के नशे त्याग देने योग्य हैं। इनसे मनुष्य पतन, क्लेश और दुखों में ही गिरता है। भूख की तृप्ति के लिये आवश्यकतानुसार सात्विक आहार करना चाहिए और विनय, सत्यता, भाईचारा, प्रेम, मनुष्यता को ध्यान में रखते हुये दूसरों से मधुर व्यवहार करना चाहिए।
व्यभिचार- ब्रह्मचर्य की मर्यादा तोड़ने को व्यभिचार कहते है। स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए नियत मर्यादा में काम सेवन करना चाहिए। अगम्य से गमन करना, दबाव, बहकावा, प्रलोभन द्वारा विपरीत पक्ष को काम सेवन के लिए तैयार करना आदि व्यभिचार की सीमा में आते हैं। जिस भोग से समाज में किसी प्रकार का अन्याय उत्पन्न नहीं होता एवं स्त्री पुरुष स्वेच्छा से एक दूसरे को स्वीकार करते हैं वही उचित है। व्यभिचार से बचना चाहिए और शक्ति संचय के लिये ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
चोरी- किसी के उपार्जित धन को बिना उसकी इच्छा के गुप्त रूप से ले लेने को चोरी कहते हैं। दूसरों को उचित भाग दिये बिना स्वयं खाना चोरी है, उपकार के लिये कृतज्ञ न होना चोरी है, अनीति पूर्वक किसी का हक लेना चोरी है, रिश्वत चोरी है, कर्तव्य का पालन न करना चोरी है, प्रकट करने योग्य विचारों को प्रकट न करना चोरी है, आवश्यकता से अधिक जमा करना चोरी है, इन सब चोरियों से बचने का प्रयत्न करना चाहिए, अपने हाथ-पाँव और बुद्धि की धर्म उपार्जित कमाई पर निर्वाह करना एवं पराये धन का आसरा नहीं तकना चाहिए।
हिंसा - मोटे अर्थ में किसी प्राणी की हत्या करना या दुख देना हिंसा कही जाती है। सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर दुष्ट, अत्याचारी, परपीड़क, पापी, कुकर्मी को दंड देना या मार डालना हिंसा नहीं है। वरन् हिंसा वह है जिससे सत्कर्मों में बाधा पड़ती हो, श्रेष्ठ व्यक्तियों को कष्ट होता हो, धर्म की अवनति और अधर्म की उन्नति हो, किसी के उचित अधिकारों का अपहरण किया जाता हो, ऐसे हिंसा पूर्ण कार्यों से दूर रहना चाहिए। माँसाहार तो स्पष्ट हिंसा है ही, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दूसरों का शोषण, उनके अधिकारों का अपहरण हिंसा है, आप न किसी का अनुचित रीति से सताया जाना सहन करें और न किसी को अनुचित रीति से सतावें, इस प्रकार सच्चे अहिंसक बन सकेंगे।
अब कलियुग का आसुरी अधिकार अपने ऊपर से हटा डालने का समय आ गया है, आप अपने अन्दर सत्य की सत्ता स्थापित कीजिए। कलियुग जिन स्थानों में रहता है उनसे बचते रहने का निरन्तर प्रयत्न करते रहिए, फिर वह आपके ऊपर अधिकार न जमा सकेगा।
(योगी अरविन्द घोष)
इस समय योगियों द्वारा ही संसार में एक विचित्र नवीन परिवर्तन भगवान करना चाहते हैं। योग के प्रकाश स्वरूप परिपूर्ण कार्य के ऊपर ही संसार की भविष्य सृष्टि निर्भर करती है- वह कार्य बड़ा विस्तृत है। पूर्ण योगी पुरुषों द्वारा जो कर्म तैयार होगा, वही भावी जगत का सच्चा काम होगा। पूर्ण योगियों को पैदा किये बिना कभी भी कार्य पूर्ण नहीं हो सकता। अभी तक भक्ति एवं शक्ति को लेकर बहुत से काम हुए हैं, किन्तु पूर्ण ज्ञान का अभाव होने के कारण उनमें कोई भी काम स्थायी नहीं हुआ। भक्ति एवं शक्ति द्वारा संसार में जितने कार्य हुए हैं, वे भगवान के कार्यों के मामूली क्षुद्र अंश हैं। उनसे बहुत कुछ तैयार भी हो गया था, किन्तु वह पूर्ण ज्ञान का अभाव होने के कारण अब बिल्कुल नष्ट हो गया है। इस समय प्रयोजन है आध्यात्म ज्ञान का, प्रगाढ़ प्रेम एवं असाधारण शक्ति का, क्योंकि इनके बिना कर्म की परिपूर्णता नहीं होती। कर्म की पूर्णता इन्हीं के द्वारा ही होगी। ज्ञान पूर्ण होने पर ही कर्म पूर्ण मूर्ति प्राप्त होगी। आज उसी का साधन भी चल रहा है।
ऐ भारत वासियों! ज्ञान में आरुढ़ हो जाओ और उसी के सहारे नीरव साधना में चित्त लगाकर काम करते जाओ, बाहरी उत्तेजना में न फसो, अन्तर में भगवान की दिव्य मूर्ति प्रकट होने दो। स्मरण कर लो, तुम्हारी साधना से जो नई चीज पैदा होगी, वह संसार भर की एक अपूर्व सम्पत्ति होगी।
(महात्मा योगानन्द जी महाराज)
तुम परमात्मा की आधी शक्ति के मध्य में खड़े हुए हो, तुमसे ऊंचे देव, सिद्ध और अवतार हैं तथा नीचे पशु पक्षी, कीट पतंग आदि हैं। ऊपर वाले केवल मात्र सुख ही भोग रहे हैं और नीचे वाले दुख ही भोग रहे हैं। तुम मनुष्य ही एक ऐसे हो जो सुख और दुख दोनों एक साथ भोगते हो। यदि तुम चाहो तो नीचे पशु पक्षी भी हो सकते हो और चाहो तो देव, सिद्ध, अवतार भी हो सकते हो।
यदि तुम्हें नीचे जाना है तो खाओ पीओ और मौज करो, तुम्हें तो सुख के लिए धन चाहिए वह चाहे न्याय से हो अन्याय से, नीचे आने में बाधा या कष्ट नहीं है। पहाड़ से नीचे उतरने में देर नहीं लगती। इसी तरह यदि तुम अपने भाग्य को नष्ट करना चाहो तो कर सकते हो परन्तु पीछे तुम्हें महानुताप करना पड़ेगा। यदि तुम ऊपर जाना चाहो तो तुम्हें सत्य मिथ्या, न्याय अन्याय, धर्म अधर्म के बड़े बड़े विचार करने पड़ेंगे। पर्वत के ऊपर चढ़ने में क्लेश तो है ही, परन्तु क्लेश का फल सुख भी मिलेगा। यदि तुम क्लेशों के दुख को यहीं सिर पर ले लोगे तो परम सुखी हो जाओगे।
दोनों बातें तुम्हारे लिए यहीं हैं क्योंकि तुम बीच में खड़े हो, मध्य में रहने वाले आगे पीछे अच्छी तरह देख सकते है, ऐसे ही तुम भी अपने भाग्य के विधाता हो चाहे जो कर सकते हो, तुम्हारे लिए उपयुक्त और अनुकूल समय यही है, समय चूक जाने पर पश्चाताप ही हाथ रह जाता है।
धर्म का प्रधान लक्षण दान है। भारतीय जनता सदा से धर्म में दिलचस्पी लेती आई है, फलस्वरूप दान करने की उसकी प्रवृत्ति सदा रहती है। देश का बौद्धिक अधोपतन होने के साथ-साथ दान की पुण्य प्रथा में भी अविवेक का समावेश हो गया। आज दान देने और लेने वाले दोनों ही पक्षों ने इस ओर औचित्य का ध्यान रखना छोड़ दिया है। दान के दो उद्देश्य हैं कि (1) दैवी तत्वों को ऊँचा उठाया जाए। (2) असमर्थों की सहायता की जाए। हिन्दू धर्म में ब्राह्मणों को दान देने की प्रथा है, इसका कारण अमुक वंश को महत्व देना नहीं है वरन् यह है कि जो समूह जनता में सदाचार की, ज्ञान की, विवेक की वृद्धि करता है, समाज की सुख शान्ति की रक्षा के लिये निरंतर प्रयत्नशील रहता है उसके भरण-पोषण का भार दूसरे लोग उठावें। प्राचीन समय में ब्राह्मण ऐसे ईमानदार ट्रस्टी थे जो दान में आये हुए धन में से अत्यन्त स्वल्प भाग अपने निजी निर्वाह में खर्च करते थे और शेष को, गुरुकुल चलाने में, अन्वेषण करने में, ग्रन्थ-निर्माण करने में, सत्संग समारोहों में, प्रचार में, यज्ञ में, जीव दया में खर्च कर देते थे। ऐसे विश्वसनीय ट्रस्टियों के हाथ में गई हुई दान की एक-एक पाई का सदुपयोग होता था। दुरुपयोग की कोई संभावना न थी इसलिए सर्व-साधारण में ऐसी प्रथा थी कि सत्य कार्यों के निमित्त तथा ब्राह्मण के भरण-पोषण के निमित्त जो दान देना होता था, उसका वर्गीकरण करने के झंझट में नहीं पड़ते थे अपितु उस सारी दान-राशि को सुपात्र विश्वस्त ब्राह्मण के हाथ में सौंप देते थे कि वह जैसा चाहे उसका उपयोग करें। दान देने वाले की श्रद्धा के साथ ब्राह्मण लोग खिलवाड़ नहीं करते थे। जिस उद्देश्य के लिए वह धन था उसमें विश्वासघात नहीं किया जाता था, अमानत में खयानत होने की स्वप्न में भी संभावना न रहती थी।
इसके अतिरिक्त अनाथों, बालकों, अपाहिजों, रोगियों, विपत्ति ग्रस्तों, असमर्थों की सहायता के लिए दान दिया जाता था, जिससे वे लोग अपने कष्टों से छुटकारा पा सकें। दुखियों को देखकर जो दया उमड़ती है, उसे सार्थक और फलवती बनाने के लिए असमर्थों को दान दिया जाता है और पुण्य से जो प्रेम होता है उसको सार्थक करने के लिए, संसार में पवित्रता एवं दैवी तत्वों की वृद्धि के लिए, ब्रह्म कर्मों में दान दिया जाता है। यह विवेक युक्त दान ‘ब्रह्म दान’ कहलाता है। वह कर्तव्य युक्त दान ‘दया दान’ कहा जाता है।
आज इन दोनों ही दानों का रूप बड़ा विकृत हो रहा है। ब्रह्मदान से ब्राह्मण वेशधारी कुपात्र गुलछर्रे उड़ाते हैं। तिलक लगाये, जनेऊ पहने, चोटी बढ़ाये, अनेक ब्राह्मण वेशधारी चारों ओर दिखाई पड़ते हैं, दान प्राप्त करना और उसे बैठकर खाना यह दो ही इन लोगों के काम हैं। दधीचि की तरह अस्थि दान करने वाले, बृहस्पति के समान देव समाज का पथ प्रदर्शन करने वाले, द्रोणाचार्य की तरह शास्त्र विद्या सिखाने वाले, चरक के समान चिकित्सा करने वाले, परशुराम के समान अन्यायियों को दंड देने वाले, वेद व्यास की तरह ग्रन्थ रचने वाले, नारद के समान प्रचार करने वाले, कपिल के समान दस सहस्र विद्यार्थियों का गुरुकुल चलने वाले, आर्यभट्ट के समान खगोल विद्या का अन्वेषण करने वाले, इन ब्राह्मणों में ढूँढ़े न मिलेंगे। ब्राह्मण की एक ही कसौटी है कि वह अपना समय और बल परमार्थ में, सर्व भूत व्यापी ईश्वर की पूजा में, लगाता है, बेशक दान लेना ब्राह्मण के छः कर्मों के अंतर्गत है। पर दान देना भी उसके साथ साथ ही लगा हुआ है। जो दान लेता है पर संसार के प्रत्युपकार में अपने को खपा नहीं देता, घुला नहीं देता, वह ब्राह्मण नहीं है, कम से कम दान लेने का अधिकारी तो किसी भी दशा में नहीं है। आज अनेक संत, महंत, पंडे, पुजारी, पुरोहित, याचक, भिक्षुक ब्राह्मण का बाना धारण किये हुये है और दान के धन से अपनी उदर दरी को भर रहे हैं। ब्राह्मणत्व की खाल उन्होंने ओढ़ रखी है पर उस खाल के अन्दर ब्राह्मणत्व का प्राण कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होता है।
इसी प्रकार असमर्थों की समस्या बड़ी घृणित हो चली है। हट्टे-कट्टे स्वस्थ व्यक्ति परिश्रम करने की योग्यता होते हुए भी भिक्षा को अपना व्यवसाय बनाये हुए हैं। झूठ मूठ अपने को विपत्तिग्रस्त कह कर ठगते हैं, स्वस्थ अपाहिजों का स्वाँग बनाते हैं, आँख रहते अन्धे बनते हैं, पाँव रहते लंगड़ा कर चलते हैं। लोगों की दया उभार कर अधिक कमाई करने की इच्छा से यह लोग बड़ी निर्भयता पूर्वक क्रूर कर्म करते है। एक गौ का अंग काट कर दूसरी गौ के अंग को चीरकर उसमें सी देते हैं, इस तरह पाँच पैर की गौ बनाकर उसके बहाने भिक्षा माँगते हैं। आप शायद विश्वास न करें पर ऐसे भिखारी हैं जो अपने छोटे बच्चों के हाथ-पाँव तोड़ डालते हैं, आँखें फोड़ देते हैं ताकि उनके सहारे अधिक भिक्षा मिल सकें। असमर्थों के नाम पर अधिकाँश में समर्थ भिखमंगे मौज मारते हैं, यह लोग वास्तविक असमर्थों का हक खा जाते हैं और उन बेचारे वास्तविक असमर्थों वास्तविक पीड़ितों को उनके भाग से वंचित कर देते हैं।
शास्त्रों में देव भाग और यज्ञ भाग खाने वाले को बड़ा पापी माना गया है, उसकी बड़े कठोर शब्दों में भर्त्सना की गई है। दान का पैसा देव भाग और यज्ञ भाग हैं, जो सच्चे अधिकारी को ही ग्रहण करना चाहिए किन्तु आज तो छप्पन लाख पेशेवर व्यक्ति भिक्षा के लिए हाथ पसारे फिर रहे हैं और प्रतिग्रह लेना अपना ‘हक’ मान बैठे हैं। इस प्रकार हमारा दान उन कुपात्रों के हाथ में चला जाता है जो किसी प्रकार उसके अधिकारी नहीं हैं। अविवेक पूर्वक, बिना पात्र-कुपात्र का विचार किये, अश्रद्धा युक्त दान केवल व्यर्थ जाता हो सो बात नहीं, वरन् दाता के लिए उलटा घातक होता है, उसे नरक में ले जाता है। मनु ने पशु हत्या में माँस खाने वाला, पकाने वाला, बेचने वाला, वध करने वाला, सलाह देने वाला आदि आठ व्यक्तियों को पाप का साझीदार बताया है। इसी प्रकार कुपात्र लोग दान पाकर हराम-खोरी, ठगी, धोखाधड़ी, दुराचार, बदमाशी, मलीनता आदि में प्रवृत्त होते हैं, इसका पाप उन दाताओं को भी लगता है जो बिना विचारे चाहे किसी को दान देकर अपने अविवेक का परिचय देते हैं।
दान मनुष्य का अत्यन्त आवश्यक और अनिवार्य कर्तव्य है। जिसको जो कुछ देना संभव हो अपनी स्थिति के अनुसार ज्ञान, समय, बल, सेवा, विद्या, पैसा, अन्न आदि का दान करना चाहिए, इसके बिना न तो आत्मोन्नति हो सकती है और न लोक परलोक में सुख मिल सकता है। पुण्य कर्मों में दान का प्रमुख स्थान है, यह दान विवेकपूर्वक होना चाहिए। ब्राह्मणों को दान देना चाहिए, ब्रह्म कर्मों के लिए दान देना चाहिए जिससे समाज में ज्ञान की, विद्या की, सदाचार की, सद्विचारों की उन्नति हो। यह भली प्रकार छानबीन करनी चाहिए कि जिस व्यक्ति को दान दिया गया है वह सच्चा ‘ब्राह्मण’ है या नहीं, जिस कार्य में दान किया गया है? उस कार्य का कोई अच्छा फल समाज को मिलेगा या नहीं? यदि आप देखें कि यह दान संसार में सात्विकता की वृद्धि करेगा, मनुष्य जाति की उन्नति में सहायक होगा तो समझिए कि वह दान सार्थक है और उसका फल स्वर्ग के समान सुखदायक प्राप्त होगा। यदि आप ऐसे देखें कि यह दान अमुक निठल्ले व्यक्ति की उदर दरी को कुछ समय तक भरे रहने मात्र का साधन सिद्ध होगा या दान पाया हुआ व्यक्ति अपनी अकर्मण्यता एवं धूर्तता के लिए अधिक प्रोत्साहित होगा तो समझिए कि आपका दान निरर्थक गया और उसका परिणाम नरक के समान दुखदायी होगा। असमर्थों, पीड़ितों, विपत्ति ग्रस्तों को अधिक से अधिक सहायता करनी चाहिए, एक पैसा फेंक कर कर्तव्य की इतिश्री न करनी चाहिए वरन् उसके अभाव को अधिक मात्रा में, अधिक समय के लिए दूर करने का अधिक प्रयत्न करना चाहिए। बेगार भुगत कर पाई पैसा फेंक देने से दया सार्थक नहीं होती वरन् किसी व्यक्ति को यदि वास्तविक कष्ट है तो उस कष्ट को मिटाने के लिए भरपूर सहायता करने का उद्योग करना चाहिए जिससे सच्चा आत्मसंतोष प्राप्त हो सके, सच्चे रूप में दया सार्थक हो सके।
स्मरण रखिए ‘दान’ मनुष्य का आवश्यक कर्तव्य है पर वह सार्थक, पुण्य-रूप, सुखदायक तभी हो सकता है, जब विवेकपूर्वक परिणाम पर विचार करके श्रद्धापूर्वक दिया जाये। अन्य प्रकार के दान अधर्म की वृद्धि में सहायक होते हैं, इसलिए उनका परिणाम दुखदायी ही होता है।
जो मनुष्य अपने भाई से तो प्यार करता नहीं है और कहता है कि मैं ईश्वर से प्यार करता हूँ। वह झूठ बोलता है। जो देखा उससे तो द्वेष रखता है तो जो अदृश्य है उससे प्यार कैसे करेगा?
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जो श्रेष्ठ कार्य करता है वह ईश्वर के खजाने से मय ब्याज के पाता है।
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सज्जन मनुष्य बेईमानी से ऊँचा चढ़ना पसन्द नहीं करते। वे अपनी ईमानदारी पर ही रहते हैं। चाहे नीचे ही क्यों न बैठना पड़े।
(स्वामी रामतीर्थ)
आत्मा असली जिन्दगी और चोखी नगदी है। यह अनुभव करो और ये भौतिक सुख तुम्हें खोजना शुरू करेंगे। जैसे पतिंगा जलती हुई ज्वाला के पास आता है, जैसे नदी समुद्र में मिलती है, जैसे छोटा कर्मचारी किसी महान सम्राट का आदर सम्मान करता है, ठीक उसी तरह सुख तुम्हारे पास तब आयेंगे जब तुम अपने सच्चे स्वरूप, अपने परमेश्वरीय प्रताप को, सच्चे तेजस्वी आत्मा को पूरी तरह से जान और अनुभव कर चुकोगे।
लोग कहते है- “हम चाहते हैं जीवन! कोरी कल्पनायें हमें नहीं चाहियें।” अरे, जीवन क्या वस्तु है? तुम कौन सा जीवन चाहते हो? स्वप्नावस्था का, या गाढ़ निद्रावस्था का, या जागृत अवस्था का? यह सब तो केवल दिखाऊ हैं। वास्तविक सच्चा जीवन तुम्हारा अपना आपा वा आत्मा का है। ऐसे कठोर नियम हैं जो इन्द्रियों के द्वारा तुम्हें सदा विषयानन्द न भोगने देंगे। अपने आपको इन्द्रियों का दास बनाकर इन्द्रिय लोक के हाथ बेचकर क्या तुम्हारे लिए सुखी होना सम्भव है। नहीं यह असम्भव है। प्रकृति के निर्दय कानून इन्द्रियों के भोग में तुम्हें सुखी न होने देंगे।
मनुष्य जब तक मेले से दूर है, तभी तक बाजार का हल्ला सुनता रहता है किन्तु जब बाजार में आ जाता है तो उसे हल्ले की तरफ ध्यान नहीं रहता। इसी तरह जब तक मनुष्य ईश्वर से दूर है तभी तक तर्क-वितर्क करता है, किन्तु पास आने पर सब भूल जाता है।
एक बार एक व्यक्ति नौकरी की तलाश में किसी सरकारी दफ्तर में पहुँचा। पूछने पर उसने कहा कि मैंने दो तीन पुस्तकें अंग्रेजी की पढ़ी हैं और कुछ हिन्दी जानता हूँ। दफ्तर के अफसर ने कहा- हमारे यहाँ एक चपरासी की जगह खाली है, तनख्वाह 12) मासिक मिलेगी, चाहो तो नौकरी कर सकते हो।
उस व्यक्ति ने मैनेजर से कहा- हुजूर, मेरे पिता तहसीलदार थे, बाबा कलेक्टर थे, परदादा कप्तान थे, मैं इतने ऊंचे खानदान का हूँ। वे लोग बड़ी बड़ी तनख्वाहें पाते थे और राजदरबार में आदर होता था, फिर मुझे इतनी छोटी हैसियत की और कम तनख्वाह की जगह क्यों मिलनी चाहिए?
अफसर ने कहा- आपके उच्च खानदान का मैं आदर करता हूँ और आपके उन प्रशंसनीय पूर्व पुरुषों की कद्र करता हूँ पर खेद है कि ऐसे नर रत्नों के घर में आप जैसे अयोग्य पुरुष पैदा हुए जिन्हें चपरासी से ऊंची जगह नहीं मिल सकती। नौकरी आपको करनी है, इसलिए आपकी योग्यता के अनुरूप ही वेतन मिलेगा, खानदान या पूर्व-पुरुषों का बड़प्पन इसमें कुछ भी काम नहीं आ सकता।
हम लोग अपने को ऋषियों की संतान कहते हैं, अपने जगद्गुरु होने का दावा करते है, और तरह तरह से प्राचीन गाथाओं के आधार पर अपने को बड़ा साबित करते हुए यह आशा रखते हैं कि हमें वही स्थान मिले जो हमारे पूर्वजों को प्राप्त था। परन्तु हम यह भूल जाते हैं कि जितनी योग्यता, कर्मनिष्ठा पूर्वजों में थी, क्या उसका थोड़ा अंश भी हममें है? यदि नहीं है तो हम अपमान और अधोगति के ही योग्य हैं जो कि आज प्राप्त है। पूर्वजों का गौरव उस समय तक प्राप्त नहीं हो सकता जब तक कि वैसे ही पराक्रम करने का साहस अपने अन्दर उत्पन्न न कर लें।
(सन्त कबीर)
कबीर कहता जात हूँ, सुनते हैं सब कोय।
राम कहे हो वै भला, नहिं तौ भला न होय॥
भगति भजन हरि नाव हैं, दूजा दुख अपार।
मनसा वाचा कर्मणा, कबीर सुमिरन सार॥
कबीर निर्भर राम जपि जब लगि दीवै बाति।
तेल घटा बाती बुझे, फिर सो वो दिन राति॥
कबीर सोता क्या करै, जागि न जपै मुरारि।
एक दिन सोना चैन से लम्बें पाँव पसारि॥
जिहिघट प्रीति न प्रेम रस, पुनि रसना नहि राम।
ते नर इस संसार में, उपजि खये बे काम॥
कबीर एक न जानियाँ, बहु जाना क्या होहि।
एकहि ते सब होत हैं, सब ते एक न होहि॥
सब सूँ बूझत मैं फिरौं, रहन कहत कोय।
प्रति न जोड़ी राम सूँ, रहन कहाँते होय॥
चलौ चलौ, सब कोई कहे, मोहि अंदेसा और।
साहब सूँ परचा नहीं, ये जाइहैं किस ठौर॥
कबीर कुल तौ से भला, जिहि उपजै हरिदास।
जिहि कुल दास न उपजै, सो कुल आक पलास॥
राम जपत दारिद भला, टूटी घर की छानि।
ऊंचे मंदिर जानदे, जहाँ न सारंग पानि॥
क्षीर रुप हरि नाम है, नीर आम व्यवहार।
हंस रुप कोई साध है, सत न जानन हार॥
कबीर हरि के नाम सूँ, प्रीति रहैं इकतार।
तौ मुख ते मोती झड़ैं, हीरा अन्त न पार॥
साई मेरा वाणियाँ, सहज करै व्यौपार।
बिन डंडी बिन पालड़े तोलै सब संसार॥
हिन्दू मूए राम कहि, मुसलमान खुदाइ।
कहें कबीर सो जीवता, दुहु में कभी न जाइ॥
काबा फिर काशी भया, राम भया रहीम।
मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम॥
अन्न जल की तरह जीवन की प्रधान आवश्यकताओं में निद्रा का स्थान है। दिन भर काम करने की थकान निद्रा द्वारा पूरी होती है और दूसरे दिन के लिए नवीन बल संचय होता है। गहरी निद्रा का आनन्द बड़े-बड़े ऐश्वर्यों से अधिक मूल्यवान है। किन्तु कितने ही व्यक्ति इस ईश्वरदत्त महाप्रसाद का पूरा-पूरा उपभोग नहीं कर पाते। उन्हें अल्प और अधूरी निद्रा आती है, जिससे व्यय हुई शक्तियों की पूर्ति नहीं हो पाती इसलिए सदा उदासी, थकान, आलस्य, अनुत्साह और बेचैनी घेरे रहती है। शरीर टूटता रहता है और किसी काम पर मन ही नहीं लगता। अनिद्रा के कारण जीवन अवधि घटती है और स्वास्थ्य गिरता है। जिन्हें अधूरी नींद आती है उन्हें स्वप्न बहुत आते हैं और पेट में कब्ज भी हुआ तो डरावने सपने उन्हें भयभीत करते रहते हैं। सचमुच अल्प और अधूरी निद्रा आना एक बुरी विपत्ति है। इस विपत्ति से छुटकारा पाने के लिए डॉक्टर फुरिण्टन ने कुछ महत्वपूर्ण उपाय बताये हैं। जो नीचे दिये जाते हैं-
(1) सदा खुली हवा में सोओ। यह भय मत करो कि सर्दी लग जायेगी या जुकाम हो जायेगा। सर्दी से बचने के लिए कपड़े रखो। पर मुँह खुला रखो। बंद मकानों में दरवाजे और खिड़कियाँ बन्द करके सोने से मस्तिष्क पर विषैला प्रभाव पड़ता है जिससे निद्रा कम हो जाती है।
(2) चारपाई पर अकेले सोओ। बहुत छोटे बालक माता के पास सो वे। इस अपवाद को छोड़कर घने से घने मित्रों को भी एक चारपाई पर रात न बितानी चाहिए। पति-पत्नी को भी निद्रा के समय अलग-अलग ही सोना चाहिए। दो व्यक्तियों के साथ सोने से उनकी शारीरिक गर्मी एवं अंग-संचालन क्रिया से दूसरे के ऊपर उत्तेजक प्रभाव पड़ता है जिससे निद्रा के योग्य शिथिलता ठीक तरह नहीं आ पाती।
(3) बिस्तर साफ रखो। ओढ़ने-बिछाने के कपड़े स्वच्छ रहने चाहिएं। जो कपड़े शरीर को छूते हैं, उनका हफ्ते में एक बार धुलना आवश्यक है। नित्य धूप में सुखा लेना तो बहुत ही जरूरी है। तकिया ऊँचा न होना चाहिए जहाँ तक हो सके। बिना तकिये के सोने की आदत डालो। सीधे सोओ, मेरु दंड को बहुत मत झुकाओ। ओढ़ने-बिछाने के लिए जितने कम कपड़ों में हो सके काम चलाओ।
(4) निद्रा नाश का सबसे बड़ा कारण पाचन क्रिया सम्बन्धी है। यदि पेट भरा हुआ हो और भोजन पच न पाया हो तो अच्छी नींद न आवेगी। वह भोजन वायु पैदा करेगा और वह वायु मस्तिष्क में हलचल उत्पन्न करके अच्छी नींद न आने देगी। इसलिए सोने के समय से चार घण्टा पूर्व भोजन कर लेना चाहिए। संध्या के भोजन में भारी, गरिष्ठ, चरपरी, मसालेदार, मादक और उत्तेजक वस्तुएं कदापि न लेनी चाहिएं। हल्का, सादा, सुपाच्य और अल्प मात्रा में संध्या का आहार लेना चाहिए।
(5) सोने से आध घण्टे पूर्व नंगे बदन खुली हवा में जल्दी-जल्दी टहलते हुए वायु स्नान करना चाहिए। यहि सर्दी अधिक हो तो एक पतला कपड़ा ओढ़कर वायु स्नान करना उचित है।
(6) कई लोगों को सोते समय दिमाग पर अधिक जोर न डालने वाली पुस्तकें पढ़ने से जल्दी नींद आती है। जिन्हें यह प्रयोग हितकर हो, वे इसका प्रयोग कर सकते हैं।
(7) सोते समय शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें। डॉक्टर लाटसन इस उपाय को बहुत ही विश्वसनीय बताते हैं। उनका कथन है कि -सोते समय ऐसी भावना करनी चाहिए- मानो किसी नीले रंग के अथाह सागर पर तैरते हुए हम बहे जा रहे हैं। सब अंगों को बिल्कुल शिथिल कर देने और नीले जल का ध्यान करने से निद्रा बहुत जल्द आती है।
(8) सोने से पूर्व गहरी श्वास-प्रश्वास क्रिया करनी चाहिए। झटका देकर जल्दी-जल्दी साँस लेने की जरूरत नहीं है। बड़ी शान्ति, स्थिरता और सावधानी से लंबा गहरा और पूरा श्वास धीरे-धीरे खींचना चाहिए और उसी तरह धीरे-धीरे पूरा श्वास छोड़ना चाहिए। दस-पन्द्रह मिनट इस क्रिया को करते रहने से निद्रा आने लगती है।
(9) आत्म सूचना का प्रभाव मस्तिष्क पर अवश्य पड़ता है। चारपाई पर पड़ने के बाद मन ही मन ऐसी दृढ़ भावना करनी चाहिए कि मुझे गहरी निद्रा आ रही है, पलकें भारी हो रहे हैं, आँखें झपक रही हैं, अब नींद में ही जा रहा हूँ। कल्पना के साथ-साथ व्यवहार रूप में भी नींद की बनावटी झपकियाँ लेनी चाहिएं, यह आत्म सूचना निद्रा बुलाने में अव्यर्थ साबित होती हैं।
(10) अक्सर भय, आशंका, चिन्ता, दुख एवं बुरे भविष्य की कल्पना से निद्रा उचट जाती है या अधूरी नींद आती है। इसलिए सोते समय अपने सुन्दर भविष्य की कल्पना किया कीजिए। धन सब से प्रिय वस्तु लगती है। यदि सोते समय धन की देवी लक्ष्मी जी की मनोहर मूर्ति का ध्यान किया जाए तो मस्तिष्क में शान्ति एवं संतोष प्राप्त होता है, जिससे निद्रा के शीघ्र आने में बहुत सहायता मिलती है।
पाठक इन उपायों को काम में लाकर गहरी और पूरी निद्रा का आनन्द अनुभव कर सकते हैं।
(महात्मा गाँधी)
बालक मरें, चाहे जवान या बूढ़े मरें, हम इससे भयभीत क्यों हों? कोई पल ऐसा नहीं जाता जब इस जगत में कही किसी का जन्म और कही किसी की मृत्यु होती है। पैदा होने पर खुशियाँ मनाना और मौत से डरना बड़ी मूर्खता है, यह बात हमें अवश्य सदैव अनुभव करनी चाहिए। जो लोग आत्मवादी हैं, - और हममें कौन हिन्दू, मुसलमान या पारसी ऐसा होगा जो आत्मा के अस्तित्व को न मानता होगा? - वे जानते हैं कि आत्मा कभी मरती नहीं। यही नहीं, बल्कि जीवित और मृत समस्त प्राणी एक ही हैं, उनके गुण भी एक ही हैं। इस दशा में, जबकि जगत में उत्पत्ति और लय पल पल-पर होता ही रहता है, हम क्यों खुशियाँ मनावें? और किस लिए शोक करें? सारे देश को यदि हम अपना परिवार मानें- देश में जहाँ कहीं किसी का जन्म हुआ हो, उसे अपने यहाँ ही हुआ मानें- तो कितने जन्मोत्सव मनाइयेगा? देश में जहाँ-जहाँ मौतें हों उन सबके लिए यदि हम रोते रहें तो हमारी आँखों के आँसू कभी बन्द ही न हों। यह सोचकर हमें मृत्यु का भय छोड़ देना चाहिए।
अन्य देशों की अपेक्षा प्रत्येक भारतवासी अधिक ज्ञानी, अधिक आत्मवादी होने का दावा रखता है, तिस पर भी मौत के सामने जितने दीन हम हो जाते हैं उतने और लोग शायद ही होते हों और उनमें भी मेरा खयाल है कि हिन्दू लोग जितने अधीर हो जाते हैं उतने भारत के दूसरे लोग नहीं। अपने यहाँ किसी का जन्म होते ही हमारे घरों में आनन्द मंगल उमड़ पड़ता है और जब कोई मर जाता है तब इतना रोना पीटना मचता है कि आस-पास के लोग भी हैरान हो जाते हैं। हमें इस अज्ञान जन्य हर्ष शोक को छोड़ ही देना चाहिए।
(1)
एक चोर कहीं से मुर्गा चुरा लाया और घर पर लाकर उसे मारने लगा। मुर्गा बड़ी विनती के साथ जोर से कहने लगा - मैं तो बड़ा उपकारी हूँ, लोगों को समय पर जगाकर उनकी निस्वार्थ सेवा करता हूँ, कृपया मुझे मत मारिये। चोर ने कहा - “सोते हुए लोगों को जगाकर तू ही मेरे काम में बड़ी बाधा डालता है, इसलिए तुझे तो और भी जल्दी मारूंगा।”
दुष्ट लोग सज्जनों को अपने मार्ग का काँटा समझ कर उनसे घोर शत्रुता रखते हैं।
(2)
एक राहगीर कुएं की मुँडेर पर पड़ा सो रहा था। उधर से तकदीर देवी उड़ती हुई निकली। उन्होंने मुसाफिर को स्वप्न में कहा- मूर्ख, धीरे से उठ बैठ और कुएं से हटकर सो, नहीं तो करवट बदलते ही कुएं में गिर पड़ेगा और व्यर्थ ही मुझे दोष देगा।
अपनी मूर्खता से लोग अनेक विपत्तियाँ बुला लेते हैं और फिर भाग्य को दोष देते हैं।
(3)
गाड़ी के पहिये चें-चें करते हुए चल रहे थे। गाड़ीवान ने कहा-बैल जो बोझा ढोते हैं चुप हैं पर यह दुष्ट बिना कारण चिल्ल पों मचा रहे हैं।
काम करने वाले चुप रहते है और निकम्मे बड़ बड़ाते हैं।
(4)
एक कोयले वाले के पास बड़ा मकान था उसने खाली हिस्से में धोबी को किरायेदार रख लिया। धोबी ने देखा कि कितना ही बचकर क्यों न रहा जाए कोयले की गर्द उड़कर जरूर आती है और उसके धुले हुए सफेद कपड़ों को मैला कर देती है।
धोबी ने उसका घर यह कहते हुए खाली कर दिया कि जिस स्थान पर जो रहता है वह वहाँ के असर से बच नहीं सकता।
अल्लाह की राह में खर्च करो और अपने हाथों अपने को विनाश में न डालो और उपकार करो। निस्संदेह अल्लाह उपकारी लोगों को मित्र बनाता है।
-सूरये बकर 1। 2। 23
गुप्त तथा प्रकट पापों को छोड़ दो, जो लोग पाप कमाते हैं उनको अपने कृत्य का परिणाम शीघ्र प्राप्त हो जाएगा।
- सूरये माइदा 2। 8। 14। 11
नम्रता से उत्तर देना और क्षमा करना उस दान से अधिक उत्तम है जिसके पीछे किसी प्रकार का कष्ट हो। अल्लाह धनी और सहनशील है।
-सूरये बकर 1। 2। 36। 3
जो लोग अपने धन को अल्लाह के मार्ग में खर्च करते हैं और फिर किसी पर अहसान नहीं जताते और न लेने वालों को किसी प्रकार का कष्ट पहुँचाते हैं, उनको उनके दिये का फल उनके पालनकर्ता की ओर से प्राप्त होगा और न तो उन पर किसी प्रकार का आतंक होगा और न वे शोकग्रस्त ही होंगे।
-सूरये बकर 1। 2। 36। 2
सत्य को सत्य (सिद्ध) कर और मिथ्या को मिथ्या (सिद्ध) कर, भले ही पापी सहमत न होंगे।
-सुरये अन्फाल 2। 9। 1
जो मनुष्य तुम्हारे साथ युद्ध करे, तुम भी अल्लाह के मार्ग में उनसे युद्ध करो और अत्याचार न करो। निस्संदेह अल्लाह अत्याचारियों से प्रसन्न नहीं होता।
- सूरये बकर 1। 2। 24
सात्विक सहायताएं
इस मास ज्ञान यज्ञ के लिए निम्नलिखित महानुभावों ने अपनी धर्म उपार्जित कमाई में से निम्न लिखित सात्विक सहायताएं भेजी हैं। अखंड ज्योति इनके प्रति अपनी आन्तरिक कृतज्ञता प्रकट करती है।
(15) श्रीमती माताजी महारानी साहिबा, मैन पुरी स्टेट
(10) श्री के ए भैया, वर्धा।
(5) श्री भीमराव सोलंकी, युद्ध सैनिक।
(1) श्री सुरेश शुक्ल, मन्वोरा।
(श्री विद्यादत्त गोपालदत्त शुक्ल, सोहागपुर)
पिछले तीन वर्षों से मैं अखण्ड ज्योति का ग्राहक हूँ। यों तो मेरे यहाँ कई भाषाओं के करीब 20 धार्मिक पत्रिकाएं आती हैं परन्तु उन सब में अखंड ज्योति मुझे विशेष रुचिकर होती है। इसकी लेखन शैली ऐसी है जो गले से नीचे दूध की तरह उतरती जाती है। इस वर्ष हाथ के बने स्वदेशी कागज में तो ऐसी सात्विकता रही कि उसे स्पर्श करते ही ताड़पत्र और भोजपत्र पर लिखे प्राचीन ऋषि प्रणीत ग्रन्थों की तरह सहज श्रद्धा उत्पन्न होती थी। ऐसी ही अनेक आकर्षणों के कारण अखंड ज्योति संपादक से मिलने की मेरे मन में तीव्र उत्कंठा जागृत हो आई और पिछले मास अपने इस वृद्ध शरीर को मथुरा घसीट ले गया।
मैं सत्संग प्रेमी हूँ। विगत तीस वर्षों से उच्च कोटि की आत्माओं के संपर्क में बड़ी गम्भीरतापूर्वक मैं आता रहा हूँ। इसलिए स्वभावतः मुझे ऐसे व्यक्तियों का नीर-क्षीर परीक्षण करने का बहुत कुछ अनुभव हो चला है। अपनी उसी छोटी सी योग्यता के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि आचार्य श्रीराम शर्मा एक विलक्षण पुरुष हैं। इस दुर्बल काय अस्थि पंजर तपस्वी के चारों ओर एक ऐसा प्रभावशाली तेज मण्डल छाया रहा है जिसके निकट जाते ही अनेक प्रकार के संदेह, उद्वेग, शंका, वासना, विकार अपने आप शान्त हो जाते हैं और उसी क्षण संतोष, शान्ति, पवित्रता, एवं आस्तिकता का संचार होता है।
इस महापंडित की विद्या अगाध है। वेदों का, शास्त्रों का, दर्शनों का, पुराणों का, इनका अध्ययन गम्भीर है। ईसाई, इस्लाम, पारसी, बौद्ध तथा भारत में प्रचलित अनेक मत-मतान्तरों के धर्म ग्रन्थों का इन्होंने पर्याप्त ज्ञान प्राप्त किया है। मनुष्य जीवन की असंख्य समस्याओं पर विविध दार्शनिक दृष्टिकोणों से इनके बड़े सुलझे हुए स्पष्ट विचार हैं। पाश्चात्य भौतिकवाद और पूर्वी आध्यात्मवाद को एक स्थान पर केन्द्रीभूत करके एक ऐसी त्रिवेणी आपकी विचारधारा में प्रवाहित होती है जो नई रोशनी के लोगों को जितनी पसंद आती है उतनी ही प्राचीन परिपाटी वाले को भी हृदयग्राही होती है।
उच्च चरित्र, आदर्श सदाचार, निष्कपट आचरण, बालकों का सा भोलापन, दूध सा स्वच्छ हृदय, ईश्वर ने इनको दिया है। एक सच्चे ब्राह्मण को जैसा तपस्वी, त्यागी, उदार, अपरिग्रही, निर्लोभ, परोपकारी, सत्यनिष्ठ होना चाहिए, उस आदर्श की मूर्तिमान प्रतिमा इस कलियुग में जब हम देखते हैं तो विश्वास होता है कि भारत का ऋषित्व अभी जीवित है और उसके द्वारा यह देश एक दिन फिर अपने आत्मिक बल से संसार का पथ-प्रदर्शन करेगा।
एक छोटे से मकान में अखंड ज्योति का छोटा सा दफ्तर है। बाहरी ठाठ-बाट वहाँ कुछ नहीं, यह सादगी इस तड़क भड़क की दुनिया को छोटी वस्तु जंचेगी। ठाठ-बाट से महत्ता को नापने वाले लोगों की निगाह में यह एक छोटा सा दुर्बल प्रयत्न मालूम होगा, पर जिनमें आत्मिक परख है, जिनमें थोड़ी भी सूक्ष्म दृष्टि है, जिनमें सत्य को पहचानने की जरा सी भी क्षमता है, वे देखेंगे कि यह ईश्वरीय सत्य अत्यंत प्रबल शक्ति छिपाये बैठा है, यह तपस्या का महान संस्थान आगे चलकर पाप-ताप से पीड़ित करोड़ों व्यक्तियों को सत्य का संदेश सुनावेगा और उन्हें आत्मिक शान्ति प्रदान करेगा।
दस दिन मथुरा रहकर मैं वापिस लौटा। इन दिनों में कितना आत्म-बल लेकर मैं लौटा हूँ इसे किस प्रकार प्रकट करूं? मेरा अनुमान है कि अब तक के लम्बे जीवन में यह दस दिन इतने महत्वपूर्ण हैं कि इन पर पिछली सारी जिंदगी को न्यौछावर किया जा सकता है।
अधिक आयु में संतानोत्पादन करना कई दृष्टियों से लाभदायक है। प्रो रेल्ड फोल्ड ने इस संबंध में गहरी खोजबीन की है और उन्होंने अनेक सबूतों के आधार पर सिद्ध किया है कि नई उम्र के लड़कों से जो संतान उत्पन्न होती है वह उजड्ड, मूर्ख एवं दुर्गुणी होती है। कारण यह है कि नई उम्र के युवकों का शारीरिक और मानसिक विकास बहुत कम होता है, इसलिए उन अविकसित युवकों की संतान भी महत्वपूर्ण सद्गुणों से वंचित रह जाती है।
अनेक किस्से-कहानियों में ऐसी गाथाएं मिलती हैं जिनमें किसी पिता के बड़े बेटे को अल्प बुद्धि और छोटे बेटे को बुद्धिमान बताया जाता है। सचमुच यह तथ्य ठीक है। अधिक आयु वाले पुरुष से जो बच्चा उत्पन्न होता है वह अपेक्षाकृत अधिक पराक्रमी और प्रतिभाशाली होता है। बीस-बाईस वर्ष से कम उम्र के पिताओं की संतान स्वास्थ्य की दृष्टि से भी निर्बल होती है और मानसिक दृष्टि से भी। बाईस से तीस वर्ष तक की उम्र के पिताओं के बच्चे खूब तन्दुरुस्त होते हैं और साधारणतः होशियार भी होते है। तीस से ऊँची उम्र के पिता द्वारा प्रखर बुद्धि के बालक पैदा होते हैं। चालीस से ऊपर की आयु में उत्पन्न हुआ बालक स्वास्थ्य की दृष्टि से कुछ हलका भले ही रहे पर बुद्धि में असाधारण होता है।
प्रो रेल्ड फोल्ड ने अपनी पुस्तक में असंख्य प्रमाण एकत्रित करके प्रकाशित किये हैं जो आयु संबंधी उपरोक्त तथ्यों की पुष्टि करते हैं। गेटे, स्पिलर, शेक्सपियर, रैफल, एवार्ड मैकाले, गोल्डस्मिथ, फेड्रिक दी ग्रेट, ग्रान्ट, सिकन्दर, नेपोलियन, रुजवेल्ट आदि महापुरुष अधेड़ माता-पिताओं के रज वीर्य से पैदा हुए थे। चालीस से पचास वर्ष के बीच की आयु में उत्पन्न हुए बालक देश के नेता, धुरंधर विद्वान गंभीर एवं बुद्धिमान होते हैं, प्रिंस बिस्मार्क, क्रामवेल, ग्लेडस्टोन, कीटो जैसे प्रतिभाशाली पंडित ढलती उम्र के पिताओं से पैदा हुए थे। जेलखानों में बंद अपराधियों की ढूँढ़ खोज करने से जाना गया है कि उनमें से तीन चौथाई ऐसे हैं जो किशोर अवस्था के पिताओं के वीर्य से उत्पन्न हैं, कारण यह है कि चढ़ती उम्र में शरारत और नासमझी अधिक होती है इसलिए यह गुण संतान में भी उतर आते हैं।
कुछ विशेष उदाहरण ऐसे भी मिलते हैं जिनसे उपरोक्त सिद्धान्त की पुष्टि नहीं होती। ऐसे उदाहरणों के बारे में जाँच करने पर पता चलता है कि उनके माता-पिता असाधारण रूप से बाल्यकाल में ही वृद्धों जैसी बुद्धिमत्ता संग्रह कर चुके थे, या फिर वह जन्मा हुआ बालक पूर्व जन्मों के कोई विशेष संस्कार अपने में लिये हुए हो। यह भी हो सकता है कि नई उम्र की संतान बुद्धिमान निकल आवे और ढलती उम्र की मूर्ख या दुर्गुणी निकले। परन्तु ये अपवाद हैं जो थोड़े से ही होते हैं।
आधुनिक शोधें जितनी खोज और गहराई के साथ की जाती हैं, उतना ही प्राचीन स्वर्ण सिद्धान्तों के समीप पहुँचती जाती हैं, शास्त्रकारों ने दीर्घकाल तक ब्रह्मचर्य रखने और बड़ी उम्र में सन्तानोत्पादन करने का आदेश किया है, उसके असंख्य लाभ हैं। उन लाभों में से एक लाभ यह प्रकाश में आया है कि सन्तान ऐसी उत्पन्न होती है जो माता-पिता को सन्तोष दे सके, उसे पाकर मन संतुष्ट हो जाए।
कामोत्तेजना का जितना जोश पच्चीस वर्ष से नीचे होता है, उतना आगे चलकर नहीं रहता इस लिए इससे अधिक आयु में विवाह करने पर अमर्यादित वीर्यपात करने की मूर्खता उतनी नहीं होती, विवेक की मात्रा बढ़ने से वे उच्छृंखलताएं नहीं होतीं जिनकी नई उम्र में अधिक सम्भावना रहती है। इसके अतिरिक्त वीर्यरक्षा से शारीरिक एवं मानसिक बल बढ़ने का लाभ तो प्रत्यक्ष ही है।
गीता का संदेश -
नेहामिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विंचते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥
गीता 2। 40
अर्थ- इसके आरंभ का नाश नहीं होता और न उलटा फल निकलता है। इस धर्म का थोड़ा सा भी साधन महान भय से रक्षा करता है।
धर्म के मार्ग पर चलते हुए, आध्यात्मिक साधना आरंभ करते हुए लोग अक्सर ऐसा संदेह किया करते हैं कि यदि इस मार्ग पर पूरी तरह न चल सके, यदि साधन बीच में ही टूट गया तो देवता रुष्ट हो जायेंगे और उनके कोप से कहीं उलटा फल न उपस्थित हो जाए। यदि धर्म का कार्यक्रम आगे न चल सका तो कहीं उपहास का भाजन न बनना पड़े हानि या निन्दा सहन न करनी पड़े।
इस प्रकार के संकल्प-विकल्प उठाने वालों को गीता आश्वासन देती है कि इस प्रकार की कोई बात नहीं है। अच्छे कर्म का बुरा फल किसी प्रकार नहीं निकल सकता है। यदि थोड़ी या अधूरी धर्म साधना की गई है तो भी वह लाभदायक ही सिद्ध होगी। शुभ कर्मों में ऐसा आकर्षण है कि उन्हें एक बार थोड़ा सा करने पर फिर उनका चस्का लग जाता है और बार-बार श्रेष्ठ कर्म करने की इच्छा होती है। उनका ऐसा बीज रूप संस्कार जम जाता है जो अवसर पाते ही फिर उग आता है। ग्रीष्मऋतु में घास सूख जाती है, उसका दर्शन होना भी कठिन हो जाता है, परन्तु वर्षा होते ही उसकी सूखी हुई जड़ें जमीन के अंदर फिर हरी हो जाती हैं और घास का भूमि पर बड़ा भारी विस्तार दिखाई पड़ने लगता है। इसी प्रकार शुभ कर्म का बीज जम जाने पर उस आरंभ का फिर कभी नाश नहीं होता, अनायास छूट जाने और बुरी परिस्थिति में पड़ जाने से भले ही दुर्बुद्धियों का आधिपत्य हो जाए पर जब कभी भी अनुकूल अवसर मिलेगा, उस थोड़े से धर्म-संस्कार का बीज हरा हो जाएगा और फिर धर्म में प्रवृत्ति बढ़ जाएगी।
उलटा फल निकलने का कोई कारण नहीं। आप कुछ दिन दूध घी सेवन करें और फिर वह प्राप्त न हो तो ऐसा नहीं होगा कि सेवन किया हुआ दूध घी कोई नुकसान करे। थोड़े दिनों या थोड़ी मात्रा में पौष्टिक पदार्थ सेवन किये थे तो उसी अनुपात से थोड़ा लाभ प्राप्त होगा, पर होगा अवश्य, ऐसा नहीं हो सकता कि वह निरर्थक जाए या कोई हानि उपस्थित करे। किसी महात्मा के साथ सत्संग के थोड़े क्षण, तीर्थ-यात्रा में लगाया हुआ थोड़ा समय, किसी पुनीत कार्य में किया हुआ थोड़ा सा दान, सच्चे हृदय से की हुई ईश्वर की थोड़ी सी प्रार्थना, क्या कभी व्यर्थ जाती है? शुभ कर्मों को अधिक मात्रा में, अधिक समय, लगातार करते रहा जाए तो बहुत ही उत्तम है पर यदि वे थोड़ी मात्रा में ही, बीच-बीच में छूट जाएं तो भी अपना उत्तम फल अवश्य देंगे। पुण्य करते पाप बन जाने की अव्यवस्था ईश्वर के सुव्यवस्थित शासन में नहीं हो सकती।
गीता कहती है कि इस धर्म का थोड़ा सा भी आरंभ भय से रक्षा करता है। पापों का परिणाम दारुण दुख देने वाला, महान भय उत्पन्न करने वाला होता है। यदि धर्म-मार्ग में थोड़ा भी पदार्पण किया है तो उस ओर रुचि बढ़ेगी, और अधिक मात्रा में शुभ कर्मों का संपादन होने लगेगा। पुण्य फल के कारण मनुष्य सहज ही उस महान भय से छुटकारा पा सकता है, जो पापियों को असह्य वेदना के साथ घुट-घुट कर सहन करनी पड़ती है।
जैसे भी बन पड़े धर्म का अवसर आगे आ जाने पर उसे चूकना न चाहिए, इस प्रकार थोड़ा थोड़ा भी सत्कर्म करते रहा जाए तो एक दिन उसकी जड़ें बहुत मजबूत होकर जीवन को पूर्ण रूप से धर्ममय बना देंगी।
हमारे एक मित्र को अपनी तीर्थ यात्रा में एक वयोवृद्ध तपस्वी महात्मा के दर्शन हुए। यह महात्मा बीस वर्ष से बिल्कुल नंगे रहते हैं और वृक्षों की पत्तियाँ खाते हैं। इन महात्मा जी से बड़ी विनय के उपरान्त कुछ सामयिक समस्याओं पर जानकारी प्राप्त हुई, वह इस प्रकार है।
(1) महात्मा गाँधी आदि प्रमुख राष्ट्रीय नेता इस वर्ष बन्दीगृह से छूट जायेंगे। (2) भारत को युद्ध के बाद कुछ शासनाधिकार और प्राप्त होंगे। (3) महायुद्ध का अंत अगले वर्ष दिखाई दे जायेगा। (4) युद्ध जन्य परिस्थितियों से उत्पन्न हुई कठिनाइयाँ अभी चार-पाँच वर्ष संसार को परेशान करेंगी। (5) हिन्दू जाति में बड़ा भारी सामाजिक परिवर्तन होगा, इसकी सारी कुरीतियाँ और कमज़ोरियां दस-पन्द्रह वर्ष के भीतर ही निकल जायेंगी और वह अपना प्राचीन गौरव पुनः प्राप्त करेगी। (6) सम्वत् 2000 के बाद धर्म, विवेक, ज्ञान, न्याय और सत्य की बड़ी तीव्र गति से वृद्धि होगी। पाप भावनाएं बहुत ही कम रह जायेंगी। (7) भारत में त्यागी, तपस्वी, ज्ञानवान और कर्तव्य परायण ब्राह्मण वृत्ति के लोगों की संख्या बहुत बढ़ेगी। नई पीढ़ी के यह स्वार्थ त्यागी कार्यकर्ता भारत भूमि की दुर्दशा का अन्त कर देंगे। (8) ईश्वरीय दिव्य शक्ति का अब संसार में अवतरण हो रहा है। उसकी प्रेरणा से असंख्य महापुरुष उत्पन्न होकर बड़े बड़े धर्म-वर्धक कार्यों को सहज ही पूरा करेंगे। (9) ईश्वर की इच्छा से सर्वसाधारण के मन में धर्म भावनाएं उत्पन्न होंगी और वे खूब फलेंगी-फूलेगी (10) अभी दो-तीन वर्ष संसार के लिए बहुत कष्टकारक हैं, इनमें अनेक प्रकार की दैविक, दैहिक, भौतिक विपत्तियाँ सतावेंगी।
पाठक उपरोक्त बातों को नोट कर लें और देखें कि यह भविष्यवाणियाँ कहाँ तक सत्य होती है।
(ऋषि दयानन्द)
“यस्म नाम महद्यशः” यजु अ. 32 मं. 3
परमेश्वर का नाम लेना बड़े यश अर्थात् धर्मयुक्त कामों का करना हैं। जैसे ब्रह्म, परमेश्वर, ईश्वर, न्यायकारी, दयालु, सर्वशक्तिमान आदि नाम परमेश्वर के गुण कर्म स्वभाव से हैं। जैसे ब्रह्म से बड़ा परमेश्वर ईश्वरों का ईश्वर। ईश्वर सामर्थ्य युक्त न्यायकारी कभी अन्याय नहीं करता। दयालु सब पर कृपादृष्टि रखता, सर्वशक्तिमान अपने सामर्थ्य ही से सब जगत की उत्पत्ति स्थिति प्रलय करता, सहायता किसी की नहीं लेता, ब्रह्मा विविध जगत के पदार्थ का बनाने हारा, विष्णु सब में व्यापक होकर रक्षा करता, महादेव सब देवों का देव, रुद्र प्रलय कर हारा आदि नामों के अर्थों को अपने में धारण करें अर्थात् बड़े कामों से बड़ा हो, समर्थों में समर्थ हो सामर्थ्यों को बढ़ता जाए, अधर्म कभी न करें, सब पर दया रखे, सब प्रकार के साधनों को सामर्थ्य करे, शिल्प विद्या से नाना प्रकार के पदार्थों को बनावे, सब संसार में अपने आत्मा के तुल्य सुख दुख समझे, सब की रक्षा करे, विद्वानों में विद्वान होवे, दुष्ट कर्म और दुष्टकर्म करने वालों को प्रयत्न से दण्ड और सज्जनों की रक्षा करे। इस प्रकार परमेश्वर के नामों का अर्थ जानकर परमेश्वर के गुण कर्म स्वभाव के अनुकूल अपने गुण, कर्म, स्वभाव को करते जाना ही परमेश्वर का नाम स्मरण है।
(श्री दिनकर प्रसाद शुक्ल ‘दिनकर’, गोहद)
मानव के सोते भाग्य अचल,
खोल अतन्द्रित पल,
सुख चेतनता से अपना
प्रतिक्षण अभिनव प्रलय नूतन,
श्वासों के प्रत्यावर्तन तिप्त-
ले! विहँस उठा है परिवर्तन।
कण से लेकर के अनन्त तक-
है खेल रही कब से हलचल!!
मानव के सोते भाग्य अचल,
अब तो उठ खोल अतन्द्रित पल॥
यों पड़ा हुआ कब से सोता,
अणु अणु दिन दिन जीवन खोता,
उर अथक वेदनायें अपार,
ले सिसक रहा रह रह रोता,
होता आहुति बन स्वयं- स्वतः,
रच रहा आत्म-बलिदान प्रबल,
मानव के सोते भाग्य अचल,
अब तो उठ खोल अतन्द्रित पल॥
स्वागत नवीनता का कर ले,
पलकों में मादकता भर ले,
स्पन्दित कर दे अवनी अम्बर,
झंकृत -तन्त्री जागृति -स्वर ले,
फिर बिखर पड़े हो सर्वोन्मुख,
संसृति में शुभ सौभाग्य अटल,
मानव के सोते भाग्य अचल,
अब तो उठ! खोल अतन्द्रित पल,
*समाप्त*