अपने वचन का पालन करिए!

आत्म-सम्मान को प्राप्त करने और उसे सुरक्षित रखने का एक ही मार्ग है, वह यह कि-’ईमानदारी’ को जीवन की सर्वोपरि नीति बना लिया जाये। आप जो भी काम करें, उसमें सच्चाई की पर्याप्त मात्रा होनी चाहिए, लोगों को जैसा विश्वास दिलाते हैं, उस विश्वास की रक्षा कीजिए। विश्वासघात, दगा करना, वचन पलटना, कुछ कहना और कुछ करना, मानवता का सबसे बड़ा पातक है। आजकल वचन पलटना एक फैशन सा बनता जा रहा है। इसे हलके दर्जे का पाप समझा जाता है पर वस्तुतः अपने वचन का पालन न करना, जो विश्वास दिलाया है उसे पूरा न करना बहुत ही भयानक, सामाजिक पाप है। धर्म-आचरण की अ, आ, इ, ई, वचन पालन से आरंभ होती है। यह प्रथम कड़ी है जिस पर पैर रखकर ही कोई मनुष्य धर्म की ओर, आध्यात्मिकता की ओर, बढ़ सकता है।

आप जबान से कहकर या बिना जबान से कहे या किसी अन्य प्रकार दूसरों को जो कुछ विश्वास देते हैं, उसे पूरा करने का शक्ति भर प्रयत्न कीजिए, यह मनुष्यता का प्रथम लक्षण है। जिसमें यह गुण नहीं, सच्चे अर्थों में मनुष्य नहीं कहा जा सकता और न उसे वह सम्मान प्राप्त हो सकता है जो एक सच्चे मनुष्य को होना चाहिए।

वर्ष 2 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक 10


उद्बोधन


उद्बोधन

(रचयिता-श्री जनार्दन पाण्डे शास्त्री, सालम)

जागृति का प्रबल प्रकाश लिये, ओ भीषण पथ के पथिक! चलाचल॥

दुर्दिवसों की इन घड़ियों में।

जीवन की उलझी लड़ियों में॥

मधु सुमधुर उपहास लिये ओ, इस दुनिया के व्यथित! चलाचल॥

आगे ऊंचे पर्वत तेरे।

पीछे से है सागर घेरे॥

मन में अनुपम उल्लास लिये तू भीत न हो, मत सोच बला बल॥

आँधी आई तूफान उठा।

दुखिया का दुःखमय गान उठा॥

अन्तर में प्रेमाभास लिये तू सतत निरंतर अविरत चल॥

मग में काँटों के जाल बिछे।

यह समझ दुशाले, शाल बिछे॥

ओ न्यायी! न्याय विकाश लिये तू निज गति से कुछ शीघ्र चलाचल॥


कलियुग का निवास स्थान

श्रीमद्भागवत में कलियुग आगमन की कथा इस प्रकार है कि एक म्लेच्छ गौ, बैल को मारता जा रहा था तो राजा परीक्षित ने उसे रोका और पूछा कि तू कौन है जो गौ बैलों को मारता है? म्लेच्छ ने कहा- मैं कलियुग हूँ। अब आगे मेरा ही शासन होगा। परीक्षित जब उस म्लेच्छ को मारने को तैयार हुए तो उसने कहा- महाराज अब तो मुझे रहना ही है, इसलिए मेरे लिए कोई स्थान ऐसा बता दीजिए जहाँ रहा आऊँ। मुझे तो थोड़ा स्थान चाहिए सर्वत्र पाँव पसारने की मेरी इच्छा नहीं है।

परीक्षित ने कलियुग को गन्दे घृणित और त्याज्य स्थान रहने के लिए बता दिये। वे स्थान यह थे, स्वर्ण, जुआ, झूँठ, नशा, व्यभिचार, चोरी और हिंसा। राजा की आज्ञानुसार कलियुग इन स्थानों में रहने लगा।

एक दिन सिर पर स्वर्ण मुकुट धारण करके परीक्षित बन को गये, स्वर्ण में बसे कलियुग ने राजा की बुद्धि बिगाड़ दी, उन्होंने घमंड में आकर लोमस ऋषि के साथ अनुचित व्यवहार किया, तदनंतर श्रृंगी ऋषि के कोष के कारण तक्षक द्वारा राजा की मृत्यु हो गई। यह कलियुग आगमन की कथा डडडड है। इस पर गम्भीर डडडड करने से कुछ नहीं डडडड तथ्यों पर अच्छा प्रकाश डडडड कलियुग का रहने के जो स्रोत स्थान प्राप्त हैं उनमें एक ही मुख्य है और वह है ‘स्वर्ण- धन’ बाकी छः उसी से संबंधित हैं। जुआ, नशा, चोरी, हिंसा, व्यभिचार, झूठ इनका पैसे से ही संबंध है। यदि पैसा न हो तो इनके होने की संभावना ही कम रह जाती है। यह छः तो ऐसे हैं जिनका उपयोग कोई-कोई व्यक्ति कभी-कभी करते हैं। ‘धन’ की व्यापकता अधिक हे, उससे हर व्यक्ति का प्रयोजन रहता है। कलियुग की व्यापकता इसी के आधार पर बढ़ी है और आज उसने मनुष्य को बुरी तरह ग्रस लिया है।

प्राचीनकाल में धन संग्रह को एक निंदनीय समझा जाता था। जिनके पास धन इकट्ठा होता था वे उसे यथा शीघ्र सत्कर्मों में खर्च कर देते थे। राजा कर्ण सवा भार स्वर्ण नित्य दान करते थे और अपनी जीवन पालन की आवश्यकताओं से जो कुछ बचता उसे सत्कर्म में लगा देते थे। राजा के यहाँ आय दिन बड़े पैमाने पर दान हुआ करता था, व्यापारी लोग धर्म स्थान बनवाने में अनुष्ठान, दान पुण्य में अतिरिक्त पैसे को अच्छे कार्यों में लगाते रहते थे। जिसके पास पैसा होता था अपनों को उसका ट्रस्टी समझते और जरूरत पड़ने पर जरा भी लोभ संकोच किये बिना उसका त्याग कर देते। राणा प्रताप की आवश्यकता को देखकर भामाशाह ने अपनी करोड़ों रुपये की सम्पत्ति उनके चरणों में फेंक दी। जो लोग धन का संग्रह करते भी थे, वे किसी महत्वपूर्ण, लोकहित के कार्य में लगा देते थे। वैयक्तिक भोग विलास के लिए उपयोग न होता था, जिसके पास पैसा अधिक वह अपने ठाठ बाट और शान शौकत में अपने को न लगाता था, आज भी पुराने चलन के धनवान बहुत सादगी से रहते हैं, तड़क-भड़क का शौक वे जरा भी पसन्द नहीं करते।

मनुष्यों का रहन सहन एक सा रखना उचित है जिससे समाज में असमानता न फैलने पावे। स्वार्थ के लिए धन संग्रह करने वाले को अपने लिए कमाने वाले को गीतादि धर्म शास्त्रों में चोर बताया गया है और उसके प्रति घृणा एवं निन्दा की भावना प्रकट की है।

किन्तु कलयुग में चक्र दूसरी तरह से घूमा। स्वर्ण में उसने अपना प्रमुख स्थान बनाया, लोग पैसे को सर्वोपरि वस्तु समझने लगे। संग्रह का चस्का लगा, कोठियाँ बनने लगीं, तिजोरियाँ भरने लगी, खजाने गढ़ने लगे, पैसे की हविस बढ़ी, धन जमा करने में एक दूसरे से बाजी मार ले जाने का प्रयत्न करले लगे। यदि किसी के पास धन हैं तो वह अपने को उसका ट्रस्टी समझे और लोकोपकारी कार्यों में उसे व्यय करें इस तथ्य को लोग बिलकुल भूल गये, अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने, ऐश आराम करने, तड़क-भड़क बढ़ाने के लिए, शानो-शौकत बनाने में पैसे का उपयोग होने लगा। निजी जरूरतें अनाप-शनाप बढ़ाई जाने लगीं, जिन वस्तुओं के अना जीवन निर्वाह में जरा भी बाधा नहीं पहुँचती ऐसी निरर्थक वस्तुओं को फैशन के नाम पर अन्धाधुन्ध इकट्ठा किया जाने लगा, अपने लिये अधिक से अधिक परिमाण में किस प्रकार पैसा खर्च किया जा सकता है इसके लिए नाना प्रकार के तरीके सोचे और निकाले जाने लगे। आज आप किसी अमीर के खर्च का हिसाब देखें तो मालूम पड़ेगा कि उतने पैसे के बीसवें भाग में ही भली प्रकार जीवन निर्वाह कर सकता है। बीस या पचास गुना खर्च जो बढ़ा रखा है वह इसलिए नहीं कि उससे किसी शारीरिक तथा मानसिक आवश्यकता की पूर्ति होती है वरन् इसलिए है कि उससे शान शौकत बढ़ती है, फैशन की पूर्ति होती है।

जैसे-जैसे कलयुग का दौर बढ़ता गया वैसे वैसे ही पैसे की प्रधानता बढ़ती गई। अधिक जमा करो और अधिक उड़ाओ की नीति का बोल-बाला हुआ। बड़ों को देखकर छोटों के मुँह में पानी भर आया, वे भी इसी मार्ग पर दौड़े, जिसका जैसा मुँह है वह वैसी ही हविस लिए हुए है, “आवश्यकता की पूर्ति के लिए पैसा” इसकी ओर कैसी का ध्यान नहीं है, हर कोई अधिक जमा करने और अधिक उड़ाने की हविस पर मस्त हो रहा है। संसार में सर्वोपरि स्थान आज जिस वस्तु को प्राप्त हो रहा है- ‘पैसा’। पैसे के लिए मनुष्य बुरे से बुरे कार्य करने पर उतारू हो रहे हैं, मनुष्यता, पैसे के बदले बिक रही है। स्वर्ग, मुक्ति, धर्म, परमार्थ पैसे के द्वारा टकेसेर बिक रहे हैं। मनुष्य का बड़प्पन रुपयों की गड्डी से तोला जा रहा है, जिसके पास जितना पैसा अधिक है वह उतना ही बड़ा है और उतना ही आदरणीय है, फिर भले ही वह मूर्ख, अधर्मी या दुर्गुणी क्यों न हो। पैसे की इतनी प्रभुता देखकर हर एक के मुँह में पानी भर रहा है, जिसे देखिए वह जीवन की सफलता पैसे में ही तलाश कर रहा है। कलियुग की यह पूर्ण विजय है स्वर्ण में निवास करने वाला कलिकाल अपनी इस सफलता पर फूला नहीं समाता।

अब हम उस शैतानी जादू के खिलाफ धर्मयुद्ध करने चले हैं, कलियुग की सत्ता के नीचे रहने से इनकार करने के लिए खड़े हुए हैं, अब हमने निश्चय कर लिया कि हम परमात्मा के अविनाशी राजकुमार असुरत्व की आराधन छोड़कर अपना स्वाभाविक देवत्व को प्राप्त करेंगे, अपने ऊपर से दानवी छाया को हटाकर ईश्वर के चरणारविन्दों में अपने को मुक्त करके रहेंगे जिसने हमारे जीवनोद्देश्य को बिलकुल उलट दिया है, जिसने हमें अन्धा कर दिया है।

“पैसा” आपको पैसा चाहिए, यह हम मानते हैं, पैसे की आवश्यकता को स्वीकार करते हैं, पैसा कमाना चाहिए इस तथ्य को हम मानते हैं, परन्तु इस बात से इनकार करते हैं कि उसे अनावश्यक महत्व दिया जाए-सर्वोपरि स्थान दिया जाए। भोजन, वस्त्र, अध्ययन, अतिथि सत्कार, विपत्ति निवारण के लिए जितने पैसे की जरूरत है उतना कमाना चाहिए और बिना कंजूसी किये आत्मोन्नति के कार्यों में उसे विवेकपूर्वक खर्च करना चाहिए। जीवनयापन में पैसा एक साधन की तरह प्रयोग होना चाहिए, वह ‘परम लक्ष’ नहीं बन जाना चाहिए। यदि ईश्वर की कृपा से आपके व्यवसाय द्वारा “आवश्यकताओं को पूर्ण करने” लायक आय हो जाती है तो कोई कारण नहीं कि अध्ययन, आत्मोन्नति, सत्संग, स्वाध्याय, परमार्थ, परोपकार जैसे अमूल्य तथ्यों की अवहेलना करें और पागल की तरह पैसे की रट लगाते रहें। अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखिए, निर्वाह और उन्नति के मार्ग पर चलते हुए जितने के बिना काम नहीं चल सकता उतना ही संचय कीजिए। जिन्दगी भर के लिए आज ही जमा कर लेने की योजना मत बनाइए। ईश्वर के राज्य में ऐसी समुचित व्यवस्था है कि आपको यथा समय सब कुछ मिलता रहेगा। प्रभु पर विश्वास कीजिए और सीमित मात्रा में संग्रह कीजिए। अपनी बढ़ी हुई अनावश्यक जरूरतों को घटा डालिए ताकि धन की प्यास कम हो जाए। नियत व्यवसाय द्वारा जीविका कमा लेने के उपरान्त अपने मस्तिष्क को दूसरी तरफ लगाइए, ज्ञान का संचय कीजिए, आत्मा को ऊँचा उठाने की साधना कीजिए, परमार्थ में प्रवृत्त हूजिए।

मनुष्य की महत्ता उसको आत्मिक सम्पत्ति के अनुसार, ज्ञान के अनुसार, विचार और कार्यों के अनुसार नापिये, रुपयों की गड्डी से और सताने की शक्ति के अनुसार नहीं। कोई व्यक्ति अधिक सताने की शक्ति रखता है या अधिक पैसे वाला है केवल इसी कारण उसे महत्व मत दीजिए, इसी कारण उसके प्रशंसक एवं सहायक मत बनिए। निर्धन गुणवानों की सतयुग में मान्यता थी, पैसा न होना कोई अयोग्यता नहीं समझी जाती थी, वरन् गुण, ज्ञान और आचरण का अभाव, तिरस्कार का, लघुता का कारण होता था। अब हमें उसी प्राचीन राजमार्ग की ओर लौट चलना होगा, पैसे की अपेक्षा श्रेष्ठ आचरण को बड़प्पन की कसौटी बनाना होगा।

आप कलियुग से घृणा कीजिए, उसके प्रमुख निवास स्थान को सर्वोपरि स्थान देने से इनकार कर दीजिए, पैसे के बांटो को मनुष्यता की महत्ता को मत तौलिए, अब तक धन में सुख की खोज कर चुके अब ज्ञान और आचरण में उसे तलाश कीजिए, धन संग्रह की लिप्सा छोड़िए, अनावश्यक खर्चों को हटाकर सादगी का जीवन व्यतीत कीजिए, संतुष्ट रहिए, सम्पदा जमा हो तो उसे सत्कर्मों के लिये धरोहर समझिए। अब हम सतयुग की ओर -धर्म की ओर -ईश्वर की ओर कदम बढ़ाते हैं, इसलिए निश्चय करते हैं कि कलियुग- पाप के निवास स्थान से सावधान रहेंगे, परीक्षित की तरह उसके चंगुल में फँस कर अपना सर्वनाश न होने देंगे। पैसे को सर्वोपरि स्थान देकर कलियुग को हमने सर्वव्यापी बनाया है, अब उसको पदच्युत करेंगे, असत्य को हटाकर सत्य की स्थापना करेंगे।

-श्री राम शर्मा,


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जैसे कि काष्ठ का पैदा हुआ कीड़ा काठ ही को नष्ट कर देता है, उसी तरह अधर्म करने वाले को अधर्म ही नष्ट-भ्रष्ट करके नरक में गेर देता है।

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बुद्धिमान किसी से अपने कष्टों को बैठकर नहीं रोते हैं। वे तो अपने दुखों का सामना करते हुए उनके निवारण के लिये कठोर परिश्रम करते हैं।

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सत्य और निडरता दोनों का साथ है, सच्चा आदमी हमेशा निर्भय रहता है।


प्रेम ही सर्वोपरि है।

(महात्मा जेम्स ऐलन)

ईश्वरीय ज्ञान और निस्वार्थ प्रेम के अनुभव से प्रेम का भाव नष्ट हो जाता है, तमाम बुराइयां रफू चक्कर हो जाती हैं। और वह मनुष्य उस दिव्य आत्मा को प्राप्त कर लेता है जिसमें प्रेम, न्याय और अधिकार ही सर्वोपरि दिखलाई पड़ते है।

अपने मस्तिष्क को दृढ़ निष्पक्ष तथा उदार भावों की खान बनाइए, अपने हृदय में पवित्रता और उदारता की योग्यता लाइए, अपनी जबान को चुप रहने तथा सत्य और पवित्र भाषण के लिए तैयार कीजिए। पवित्रता और शक्ति प्राप्त करने का यही मार्ग है और अन्त में अनन्त प्रेम भी इसी तरह प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार जीवन बिताने से आप दूसरों पर विश्वास जमा सकेंगे, उनको अपने अनुकूल बनाने की कोशिश की दरकार न होगी। बिना विवाद के आप उनको सिखा सकेंगे, बिना अभिलाषा तथा चेष्टा के ही बुद्धिमान लोग आपके पास पहुँच जायेंगे, लोगों के हृदय को अनायास ही आप अपने वश में कर लेंगे क्योंकि प्रेम सर्वोपरि, सबल और विजयी होता है। प्रेम के विचार, कार्य और भाषण कभी व्यर्थ नहीं जाते।

इस बात को भली प्रकार जान लीजिए कि प्रेम विश्वव्यापी है, सर्व प्रधान है और हमारी हर एक जरूरत को पूरा करने की शक्ति रखता है। बुराइयों को छोड़ना अन्तःकरण की अशान्ति को दूर भगाता है। निस्वार्थ प्रेम में ही शान्ति है, प्रसन्नता है, अमरता है और पवित्रता है।


आशावादी आस्तिक

(महात्मा गाँधी)

आशावाद आस्तिकता है। सिर्फ नास्तिक ही निराशावादी हो सकता है। आशावादी ईश्वर का डर मानता है, विनयपूर्वक अपना अन्तर नाद सुनता है, उसके अनुसार बरतता है और मानता है कि ‘ईश्वर जो करता है वह अच्छे के लिये ही करता है।’

निराशावादी कहता है ‘मैं करता हूँ।’ अगर सफलता न मिले तो अपने को बचाकर दूसरे लोगों के मत्थे दोष मढ़ता है, भ्रमवश कहता है कि “किसे पता ईश्वर है या नहीं’, और खुद अपने को भला तथा दुनिया को बुरा मानकर कहता है कि ‘मेरी किसी ने कद्र नहीं की’ ऐसा व्यक्ति एक प्रकार का आत्मघात कर लेता है और मुर्दे की तरह जीवन बिताता है।

आशावादी प्रेम में मगन रहता है, किसी को अपना दुश्मन नहीं मानता। भयानक जानवरों तथा ऐसे जानवरों जैसे मनुष्यों से भी वह नहीं डरता, क्योंकि उसकी आत्मा को न तो साँप काट सकता है और न पापी का खंजर ही छेद सकता है, शरीर की वह चिन्ता नहीं करता क्योंकि वह तो काया को काँच की बोतल समझता है। वह जानता है कि एक न एक दिन तो यह फूटने वाली है, इसलिए वह है, इसलिए वह उसकी रक्षा के निमित्त संसार को पीड़ित नहीं करता। वह न किसी को परेशान करता है न किसी की जान पर हाथ उठाता है, वह तो अपने हृदय में वीणा का मधुर गान निरंतर सुनता है और आनन्द सागर में डूबा रहता है।

निराशावादी स्वयं राग-द्वेष से भरपूर होता है, इसलिए वह हर एक को अपना दुश्मन मानता है और हर एक से डरता है, वह मधु-मक्खियों की तरह इधर उधर भिनभिनाता हुआ बाहरी भोगों को भोग कर रोज थकता है और रोज नया भोग खोजता है। इस तरह वह अशान्त, शुष्क और प्रेमहित होकर इस दुनिया से कूच कर देता है।


वाणी विज्ञान

(श्री द्वारिका प्रसाद भट्ट, चयियानी)

अधिकाँश व्यक्ति यही आशा करते है कि मेरी बातों को सभी बिना तर्क के स्वीकार कर लें और ऐसा न होने पर या तो वह दुराग्रह पर उतर आते है अथवा संताप करके मौन धारण कर लेते हैं और द्वेष भाव को पोषित करके बदले या अप्रतिष्ठा की ताड़ में रहते हैं। परन्तु जो सत्यनिष्ठ हैं, वे एकान्त में विचार कर पवित्र भावों को स्थान देते है और ऐसों की ही आत्मा मुक्त पथ की अनुगामिनी हो सकती है। बहुत से व्यक्ति कलह के भय से तर्क करना नापसन्द करते हैं, सम्भवतः यही उक्ति झूठे को प्रोत्साहित करके समाज के अन्दर निन्दित घटनाओं का कर्ता बना देती है।

‘मूकता’ एक प्रकार से विरोधी को स्वीकृति देना है, कहा भी हैः- “खामोशी नीम रजास्त” यह वाणी का संयम नहीं, इसे तो मूर्खता छिपाने का एक गुण कहा जाता है। वास्तव में आवश्यकता इस बात की है कि हम जो कुछ कहें उसे तात्कालिक क्रिया द्वारा सोचते भी जाएं कि यह शब्द काव्यमय के अतिरिक्त कर्तव्यमय भी हों। जब तक सक्रियता का आभास न होगा तब तक वाणी का प्रभाव निरर्थक रहेगा।

कुछ लोग औरों से न बोलने में ही अपनी शान समझते हैं परन्तु मन ही मन इस फिक्र में लगे रहते हैं कि कोई हम से बोले, गो कि ऐसे लोग मुँह, आँख, हाथ आदि के इशारों से काम अधिक लेते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि मानसिक शक्तियों को अधिक उत्तेजित रहना पड़ता है और शरीर पर विषाक्त प्रभाव पड़ने से स्वास्थ्य क्षीण होता रहता है। ऐसे व्यक्ति हंसमुख नहीं होते और यदि हंसते भी हैं तो झूठी हंसी। फलतः क्रूर स्वभाव हो जाता है। इस दशा में वाणी और दृष्टि का संतुलन चलता रहता है कि उसे वैज्ञानिक दृष्टि में एक ही वस्तु या एक ही उद्गम स्वीकार किया जा सकता है। प्रेम, भय, घृणा क्रोधादि का प्रभाव शीघ्र प्रकट हो जाता है। परन्तु इन सब आदि का प्रतिघात केवल एक अस्त्र से किया जा सकता है। वह है “वाणी का संयम।” वास्तव में यदि मनुष्य एक आदर्श पुरुष बनने चले तो प्रथम अपने शब्दों को इतना वश में कर ले कि किसी को रोष प्रकट करने का मौका ही न मिले और शब्दों का प्रकाशन किसी व्यक्ति पर तभी करे जब वह शान्त और एकान्त हो।

सभा समाज में भाषण करने का उद्देश्य श्रोता का ज्ञान लाभ करना, उनका पथ प्रदर्शन करना हो सकता है। इसमें वे ही लोग सफल हो सकते हैं, जिन में निस्वार्थता का अंश अधिक है, जो निष्कपट और चरित्रवान हैं। किसी सिद्धांत पर चलने के लिए दूसरों से उसी का कहना ठीक है जो खुद उस पर चलता है, जिसके कार्य और भाषण में अन्तर हो, उसका दूसरों पर कहने लायक प्रभाव नहीं हो सकता।

कुछ व्यक्ति मजाक पसन्द होते हैं और अकाल इसे प्रयोग करके उपहासास्पद भी बन जाते हैं। इसमें यदि संयम से काम लिया जाए तो यह स्वास्थ्य वर्धक अवश्य है, परन्तु मजाक का एक पर्यायवाची शब्द आलोचना है। यदि इसके परे कटु आलोचना है तो संघर्ष भी है। चाहे जो कुछ हो प्रयोक्ता की वाणी का वैज्ञानिक असर तब पड़ता है जब वह स्वयं चरित्र का जादू रखता हो और सामयिक प्रयोग कर सकता हो।


भारत की महान जिम्मेदारी

(योगी अरविन्द घोष)

आधुनिक समय का सबसे बड़ा ईश्वरीय कार्य यह है कि वह कुछ पूर्ण योगी मनुष्यों को पैदा कर रहे हैं। इस समय संसार का भविष्य भारतवर्ष के उन्हीं योगियों के ऊपर निर्भर है। यद्यपि यहाँ काम करने वाले मनुष्य बहुत से हैं पर भारत के भविष्य के काम के लिए पूर्ण योगी पुरुषों की आवश्यकता है। क्योंकि संसार के जिस विराट कार्य का भार भारत पर पड़ने वाला है, उसका भार पूर्ण योगी पुरुषों के बिना, साधारण बुद्धिजीवी या हृदयजीवी मनुष्य चाहे वे कितने ही बड़े नेता अथवा कार्यकर्ता क्यों न हों- नहीं सँभाल सकेंगे और न उनका संभालना किसी प्रकार संभव ही है।

भविष्य में भारत को जिस विपुल विराट कर्म का भार अपने ऊपर लेकर खड़ा होना पड़ेगा, उसी की सूचना स्वरूप सारे संसार में एक विचित्र प्रकाश का होना आरम्भ हो गया है। आगामी तीस चालीस वर्ष के भीतर दुनिया में एक विचित्र परिवर्तन होगा। सारी बातों में उलट पलट हो जायेगा, उसके बाद जो नवीन जगत तैयार होगा उसमें भारत की सभ्यता ही संसार की सभ्यता होगी। भावी भारत का काम केवल भारत के लिए नहीं है, बल्कि समूचे संसार के लिए है, अतएव भारत को उन्हीं पूर्ण योगी मनुष्यों की तैयारी में लग जाना चाहिए, जो इतने गुरु-तर भार का सम्भार करने में समर्थ होंगे। यह काम नीरव मातृ-साधना में प्रारम्भ भी हो गया है, योगियों के लिए सब कुछ सम्भव है। शिक्षा, समाज, राजनीति, शिल्प, वाणिज्य आदि सभी क्षेत्रों में योगियों की अपूर्व प्रतिभा एक विचित्र संसार तैयार कर सकती है यह निश्चय है।


ईश्वर का स्वरूप

(स्वामी रामतीर्थ)

यदि बैल एकत्र जमा होकर धार्मिक महासभा करें तो ईश्वर का वे क्या लक्षण करेंगे? वे ईश्वर को एक महान प्रतापी बैल बतावेंगे या वर्णन करेंगे कि जिसके डर से किसी भी दूसरे बैल के प्राण छूट जायेंगे। यदि सिंह अपनी धार्मिक महासभा करें, तो उनकी ईश्वर की कल्पना एक सबसे बड़ा और सबसे बलवान सिंह होगी। क्या अपनी योग्यता से परे की किसी चीज की धारणा तुम कर सकते हो? क्या तुम अपने आप से बाहर कूद सकते हो? सिंहों को निर्णय के लिये बैठने और ईश्वर पर विचार आरम्भ करने दो। वे उसे भीम काय, दारुण सिंह बना देंगे। इसी तरह यदि डरे हुए लोग निर्णय के लिये बैठें और ईश्वर का विचार करने लगें तो वे लाचार होकर उसे महान दास-स्वामी ही क्या महान मालिक, भयानक हाकिम मानेंगे। इस प्रकार यहूदियों ने स्वभावतः परमेश्वर को भीमकाय प्रतापी शासक, महान स्वामी चित्रित किया है।

अब समय है कि सारा संसार साहसपूर्वक सत्य के इस फुफकारते हुए सर्प को उठाकर पकड़ ले। पूर्ण सत्य तुम्हारे पास आता है, और तुम से कहता है कि “तुम परमेश्वर हो,” परमेश्वर तुमसे पृथक नहीं है परमेश्वर इस स्वर्ग वा उस नर्क में नहीं है बल्कि तुम्हारे अपने आप अर्थात् निज स्वरूप में है।” यहाँ इस भावना के अनुभव में तुम्हें पूर्ण-स्वतन्त्रता का लाभ है।


विषयों में रमणीयता नहीं है।

(श्री रामकरणसिंह जी वैद्य, जफरापुर)

विषयों की ओर चित्त वृत्तियों के आकर्षित होने में सबसे पहला कारण उनमें रमणीयता का बोध है। विषयों में रमणीयता का भास बुद्धि के विपर्यय में होता है। बुद्धि के विपर्यय में अज्ञान सम्भूत अविद्या प्रधान कारण है। इस अविज्ञा से ही हमें असुन्दर में सुन्दर बुद्धि, अनित्य में नित्य बुद्धि, दुःख में सुख बुद्धि, अपवित्र में पवित्र बुद्धि, प्रेम हीनता में प्रेम बुद्धि और असत में सत बुद्धि हो रही है। उल्लू की भाँति रात में दिवस और दिवस में रात्रि, इस अविद्या से ही दीखता है। इसी से हमें अस्थि चर्मसार शरीर और तत्सम्बन्धीय तुच्छ पदार्थों में रमणीय बुद्धि हो रही है। मनुष्य जिस विषय का निरंतर चिन्तन करता है उसी में उसकी समीचीन बुद्धि हो जाती है। यह समीचीनता ही रमणीयता के रूप में परिवर्तित होकर हमारे मन को आकर्षित करती रहती है। अब विचारना चाहिए कि विषयों में वास्तव में रमणीयता है या नहीं और यदि नहीं है तो रमणीयता क्यों भासती है?

विचार किया जाए तो वास्तव में विषयों में रमणीयता बिल्कुल नहीं है। जो शरीर हमें सबसे अधिक सुन्दर प्रतीत होता है, उसमें क्या है, वह किन पदार्थों से बना है। रस, रक्त, माँस, मेद, हड्डी, मज्जा, चर्म, कफ, विष्ठा, मूत्र आदि पदार्थों से भरे इस ढांचे में कौन सी वस्तु रमणीय और आकर्षक है। अलग-अलग देखने पर सभी चीजें घृणास्पद प्रतीत होती हैं। यही हाल और सब वस्तुओं का है। वास्तव में रमणीयता, किसी (वस्तु) चीज में नहीं होती, वह कल्पना में रहती है। कल्पना ही रूढ़ी बनकर तदनुसार धारणा कराने में प्रधान कारण होती है।

हम लोगों को जहाँ गौर वर्ण अपनी ओर आकर्षित करता है, वहाँ हब्शियों को काली सूरत ही रमणीय प्रतीत होती है, चीन में कुछ समय पूर्व स्त्रियों के छोटे पैरों में लोगों की रमणीय बुद्धि थी। वहाँ लड़कियों को बचपन से ही लोहे की जूतियाँ पहना दी जाती थीं, जिससे उनके पैर बढ़ने नहीं पाते थे। यद्यपि इससे उन्हें चलने में बड़ी तकलीफ होती थी, परन्तु रमणीय बुद्धि से बाध्य होकर वे प्रसन्नतापूर्वक ऐसा करती थीं। मारवाड़ी स्त्रियाँ विचित्र गहने-कपड़ों के भारी बोझ से कष्ट सहन करने पर भी उन्हें पहनकर अपने को सुन्दर समझती हैं, पर गुजरात की सादी पोशाक धारण करने वाली स्त्रियाँ उसे देखकर हँसती है। ठीक इससे विपरीत मनोवृत्ति मारवाड़ी बहनों की गुजराती बहनों की वेशभूषा के प्रति होती है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि रमणीयता किसी विषय में नहीं है, बल्कि हमारे मन की कल्पना में है। हमने ही विषयों की सुन्दरता की कल्पना कर ली है।

नश्वर पदार्थों और इन्द्रिय-भोगों में रमणीयता नहीं हैं। हमने उनमें काल्पनिक रुचि उत्पन्न कर ली है जो क्षण-क्षण पर टूटती और असत्य सिद्ध होती रहती है। वास्तविक सौंदर्य तो शाश्वत और सत्य में है। आत्मा में परमात्मा में ही वास्तविक सुख है और विवेक द्वारा कर्म साधना से उसे प्राप्त किया जा सकता है। हमें स्मरण रखना चाहिए कि विषयों में रमणीयता नहीं वरन् आत्मा में है। जो वस्तु जहाँ है वह वहीं से प्राप्त हो सकती है।


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मनुष्य को दो वक्त तो निश्चय ही आपे में रहना चाहिए, एक तो भोजन करते समय और दूसरे भाषण के समय।


साकार, निराकार और उसकी उपासना

(श्री रतनचंद जैन, गोटे गाँव)

जिसे हम साकार कहते हैं वह केवल निराकार का प्रतिबिम्ब है। यहाँ भौतिक दृष्टि से लीजिए, जब एक कुम्हार घड़ा बनाता है, तब इसके पहले वह अपने मस्तिष्क में उसकी सुन्दरता का रूप खींच लेता है। बिना मानसिक जगत में मकान का नक्शा खींच कदापि मकान खड़ा नहीं किया जा सकता। ऐसी हालत में किसी भी कार्य का रूप होता है, वह रूप, वह कल्पना, निराकार स्वरूप कहलाता है। सृष्टि की उत्पत्ति में प्रथम ब्रह्मा का विष्णु का अवतार इसके पश्चात् साकार होना और फिर ब्रह्मा पर राक्षसों का प्रहार होने पर विष्णु का साकार प्रगट होना यही अर्थ होता है कि वह निराकार विष्णु उस महान शक्ति की कल्पना ही रही होगी क्योंकि आखिरकार सृष्टि उत्पन्न के पहले विष्णु का अवतार किसका पालन करने को हुआ था? इसी तरह इस्लाम मजहब कहता है कि खुदा ने फरिश्ता भेजकर आदम, और पीछे हव्वा को पैदा किया। अब सोचिये कि यह फरिश्ता कौन था। मेरी समझ के मुताबिक कल्पना ही हो सकती है, वेद भी कहता है कि जब उस आद्य बीज शक्ति ने अथवा यूँ कहिये ब्रह्म ने इच्छा की कि, “एकोहं बहुस्याम” एक से अनेक होऊँ तब उसने यह सृष्टि बनाई, इनका निराकार ब्रह्मा इच्छा ही को सूचित कराता है, चूँकि मेरा जैन धर्म इसे प्रकृति की रचना कहता है तब भी यह प्रश्न आवेगा कि प्रकृति नामक तत्व कहाँ से आया? अन्त में वहाँ भी हम इसी निर्णय पर पहुँचते हैं कि कोई इच्छा करने वाला भी होगा। ईसा धर्म भी फरिश्ता का आधार बताते हैं, तब यहाँ बहुमत से यह साबित होता है कि संसार की बनावट की सृष्टि की उत्पत्ति की कल्पना पहले ऐसी ही बनी होगी जैसा रूप हमें आज दृष्टिगोचर हो रहा है।

परलोक में मनुष्य कर मरने के बाद क्या होता है, इस विषय पर नजर डालने से मालूम होता है कि मनुष्य अपना सूक्ष्म शरीर साथ ले जाता है और स्वयं अपनी इच्छानुसार सूक्ष्म शरीर को लेकर जन्म ग्रहण कर लेता है। आप यह न सोच बैठना कि मरने के समय अच्छी कल्पना कर ली जावे तो उत्तम जन्म धारण होगा, यह गलत है क्योंकि हमारी इच्छा का सम्बन्ध कर्मों से बना है और कर्म के फल के मूजब ही इच्छा प्रबल होती है, इसलिये तो यह धर्म, शास्त्र, मन्दिर, मूर्ति स्थापित कर दिये हैं और साकार रूप दे दिया है और ठीक भी है क्योंकि बालक जब स्कूल जाता है तब उसे वर्णमाला का बोध कराने के लिये उसकी मूर्ति बताना जरूरी है, किन्तु जब वह उसे मस्तिष्क में उतार लेता है तब उसे चित्र मूर्ति के परिचय की जरूरत नहीं रह जाती। इसी तरह ये मन्दिर स्कूल हैं, जहाँ हम साकार मूर्ति द्वारा उस निराकार की ओर खिंचते हैं। यह हो सकता है कि मनुष्य जीवन भर वर्णमाला की मूर्ति देखे और उसको हृदयंगम न करे तो यह गलती खुद की है। यदि आप यह सोचें कि हजारों वर्षों में भी संसार निराकार को ग्रहण न कर सका तो मूर्ति की सार्थकता रही कहाँ? तो इसका उत्तर यही हो सकता है कि स्कूल में नये विद्यार्थी भी तो आते रहते हैं, उन्हें तो है। तब यह स्पष्ट सा हो जाता है कि साकार, निराकार यह दोनों वस्तु विशेष की अवस्थायें हैं। आप अपने को लीजिये। जब आप धूप में चलते है तो आपकी छाया आपके साथ रहती है। आप जब शीशे में देखते है तो आपकी छाया अन्दर दीखने लगती है। आखिर सोचिये कि साकार की यह निराकार छाया नहीं तो क्या है। जिस तरह उत्थान से पतन, स्वाभाविक क्रिया है। गेंद उछालने पर वापिस ही लौटती है उसी तरह आत्मा निराकार से साकार हुआ है साकार से निराकार होता है।

जिस काम शक्ति से प्रेम आलिंगन करते हैं, उससे प्रभु का स्पर्श भी होता है। जिस क्रोध से हम अपनी शारीरिक शक्ति का नाश करते हैं, उस शक्ति से दुर्बुद्धि का नाश भी कर सकते हैं। जिस अहंकार से हम पतन को पहुँचते हैं, वह अहंकार हमको लक्ष्य तक पहुँचाने में भी सहायक हो सकता है। जिस लोभ संवरण से हम स्वार्थ में अंधे बनकर मनमानी करते हैं, उसी लोभ-शक्ति से हम विवेक रूपी भण्डार भी भर सकते हैं, अतएव इन सब शक्तियों को सत्कार्य में लगा दीजिये, यही साकार रूप है और यही साकार उपासना है।

निराकार हमारा वह स्वरूप है, जो चेतन, शुद्ध बुद्ध, निर्विकल्प रूप आत्मा है, जो तमाम संकल्प विकल्पों से परे है, यही उसका यथार्थ रूप भी है। कहा भी है, अहं ब्रह्मास्मि। पर वह रूप यथार्थ बन जाने का है। केवल मौखिक सिद्धान्तों का नहीं। इसीलिये इसका निरूपण ज्यादा न करके मैं उस ठोस कार्य को लेता हूँ जिसके बिना सब ज्ञान-विज्ञान अधूरा रह जाता है। केवल बहस मुबाहिसे करते-करते खूब समय हुआ, अब कुछ व्यवहार में लीजिये। चरित्र के बिना ज्ञानी का ज्ञान फिजूल है। कर्मों की श्रृंखला इतनी मजबूत है जिसे काटने की शक्ति कर्म ही रखते हैं। जिस तरह गरम लोहे को ठंडा लोहा काटता है उसी तरह तामस वृत्तियाँ सात्विक वृत्ति से मिटाई जा सकती हैं।

कहना पड़ता है कि चरित्र मुख्य है जिसे हम व्यवहार रूप कहते हैं संभव है। उक्त लेख में यह भ्रम पड़ गया हो कि पूजन या श्रद्धा साकार की की जावे या निराकार की? तो मैं अपनी व्यक्तिगत राय के मुताबिक कहूँगा कि हम मूर्तिवान हैं, हमारा रूप साकार है, प्रत्येक पदार्थ जब अपनी समान शक्ति को ग्रहण किये है तब आप भी साकार प्रतिबिम्ब की पूजा, उपासना, योग समाधि अपनी श्रद्धा के माफिक करते जाइये, यही साकार भक्ति हमें ज्ञान, विवेक, दर्शन, चरित्र बल स्वयं देती चली जायेगी।


धैर्य

(श्री मुरारी लाल शर्मा ‘सुरस’ गौघाट, मथुरा)

मनु भगवान ने धर्म के दस लक्षणों का वर्णन करते हुए धृति (धैर्य) को पहला स्थान दिया है। वास्तव में धैर्य का स्थान जीवन में इतना ही ऊँचा है कि उसे प्रारम्भिक सद्गुण माना जाए। हर एक कार्य कुछ समय उपरान्त फल देता है, हथेली पर सरसों जमते नहीं देखी जाती, किसान खेत बोता है और फसल की प्रतीक्षा करता रहता है। यदि हम अधीर होकर बोये हुए दानों का फल उसी दिन लेना चाहे तो उसे निराश ही होना पड़ेगा।

लोग किसी कार्य को उत्साहपूर्वक आरम्भ कर हैं किन्तु फल की शीघ्रता के लिए इतने उतावले होते हैं कि थोड़े समय तक प्रतीक्षा करना या धैर्य धारण करना उन्हें सहन नहीं होता, फलस्वरूप निराश होकर वे उस काम को छोड़ देते हैं और दूसरा काम आरम्भ करते हैं, फिर वह दूसरा काम छोड़ना पड़ता है, इसी प्रकार अनेकों अधूरे कार्य छोड़ते जाते हैं, सफलता किसी में भी प्राप्त नहीं होती। असफलताओं की एक लम्बी सूची अपने साथ लिये फिरते हैं, अयोग्य और मूर्ख बनते हैं तथा लोक हँसाई कराते हैं। प्रतिभा, योग्यता, कार्यशीलता, बुद्धिमत्ता सभी कुछ उनमें होती है पर अधीरता और उतावलेपन का एक ही दोष उन सारे गुणों पर पानी फेर देता है।

धर्म का आरम्भिक लक्षण धैर्य है। हमें चाहिए कि किसी कार्य को खूब आगा-पीछा सोच-समझने के बाद आरम्भ करें किन्तु जब आरम्भ कर दें तो दृढ़ता और धैर्य के साथ उसे पूरा करने में लगे रहें। विषम कठिनाइयाँ, असफलताएं, हानियाँ प्रायः हर एक अच्छे कार्य के आरम्भ में आती देखी गई हैं पर यह बात भी निश्चय है कि कोई व्यक्ति शान्त चित्त से उस मार्ग पर डटा रहे तो एक दिन पथ के वे काँटे फूल बन जाते हैं और सफलता प्राप्त होकर रहती है।


आध्यात्मिक निष्ठा कैसे दृढ़ हो

(श्री साधुराम रंधवें, सिटीकालेज, नागपुर)

मनुष्य अपने व्यक्तित्व को दो तरह से शासित कर सकता है। (1) आभ्यंतरिक प्रवृत्तियों को नियमित करके और (2) बाह्य प्रवृत्तियों को संयमित करके। पहिले मार्ग में साधक भीतर से बाहर की ओर आता है, दूसरे में वह बाहर से भीतर की ओर प्रविष्ट होता है।

पहिले मार्ग में चिन्तन-विचारशीलता की आवश्यकता है। साधक मनन के द्वारा अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकता है। अर्थात् अपनी मनोवृत्तियों पर साधक जब विजय प्राप्त कर लेता है तब उसे बाह्य प्रकृति प्रभावित-शासित नहीं कर सकती। इस साधना की बागडोर आत्मबल, मनन, विचारशीलता और चिन्तन के हाथ में है। यहाँ हमें हर कदम पर सावधान रहना चाहिए, कहीं अपनी पगडंडी से फिसल न जायें।

दूसरे मार्ग में बाह्य प्रवृत्तियों को संयमित किया जाता है। इसमें चाहिए परिस्थितियों की अनुकूलता। साधक जैसा बनना चाहता है, उसी के अनुकूल अपना वातावरण निर्मित करना होगा। मित्रों का चुनाव, दिनचर्या का क्रम आदि जिन भी उपकरणों से उसका अधिकतर संसर्ग रहता है, उन उपकरणों को वह अपने अनुकूल कर ले। बस, फिर उसे अपना मार्ग सहज और निरापद जान पड़ेगा। इसमें पहली मुसीबत यही है कि वह अनुकूल चुनाव-अनुकूल वातावरण कैसे निर्मित करे। इस पथ का पथिक अपनी अनुकूल परिस्थिति के बाहर कदम रखते ही अक्सर फिसल जाता है- अपने को अनुत्तीर्ण पाता है और महसूस करता है कि अभी वह इतना निष्ठावान नहीं बन सका है कि प्रतिकूल वातावरण में भी स्वस्थ रह सके-अपने व्यक्तित्व को-अपने अहमत्व को अपने आत्मबल को अचल रख सके।

तीसरा मार्ग बिल्कुल निराला ही है। इसमें साधक अपने को परमेश्वर की इच्छा पर छोड़ देता है। वह अदृष्ट के प्रवाह में स्वच्छन्द बहने लगता है। उसे रास्ते का ख्याल नहीं रहता। एक मात्र ख्याल रहता है अपने लक्ष्य का-उस परमोज्जवल सत्य ज्योति का। परन्तु इस साधक को परमेश्वर में अपनी श्रद्धा दृढ़ और अमल रखनी चाहिए; अन्यथा वह परमेश्वर के नाम पर अपने अहमत्व के प्रवाह में ही बह जावेगा और जब आक्षिप्त किया जावेगा तो साहस के साथ प्रत्युत्तर देगा- “परमेश्वर की ऐसी ही इच्छा है, हम क्या करें? वह ऐसा ही कराता है, शायद उसकी ऐसी ही प्रेरणा हो।” यह प्रकृति पतन की ओर ही ले जायेगी। वस्तुतः यह मार्ग साधना में प्रविष्ट होने वाले साधक के लिए घातक ही सिद्ध होगा। यह साधना पुष्टि मार्ग की है और तदनुसार यही कहना चाहिए कि यह ‘स्टेज’ परमेश्वर के अनुग्रह द्वारा ही प्राप्त हो सकती है। इस दर्जे को प्राप्त करने के लिए प्रथम कथित दो साधन ही उपयुक्त सिद्ध होंगे।


सात्विक सहायताएं

इस मास ज्ञान यज्ञ के लिए निम्नलिखित महानुभावों ने अपनी धर्म उपार्जित कमाई में से यह सात्विक सहायता भेजी हैं। अखण्ड ज्योति इन महानुभावों के प्रति अपना आन्तरिक कृतज्ञता प्रकट करती है।

10) राकुमार हरभगतसिंह, भण्डरा स्टेट।

5) श्री भीमरावजी सोलंकी, युद्ध सैनिक।

4) श्री घासीरामजी कुलमी, पलाश्या।

3) श्री बाबूलाल जी गोयल, शिवपुरी।

2) पं. देवीसहाय जी वैद्य, मैनपुरी।

2) पं. राधेमोहन मिश्र, बहराइच।

2) पं. धर्मपाल सिंह जी, रुड़की।

1) महात्मा जयरामपुरी जी महाराज, ऊँचा।

1) श्री माधवनारायण जी तिवारी, पटवारी, कदमपुर।

मनोरंजक कथा-


दृढ़ विश्वास से भगवत दर्शन

(श्री माधव तिवारी पटवारी, कमदपुर)

किसी गाँव में एक चोर रहता था। वह रात को चोरी करने के लिये निकला। एक महाराज के यहाँ हरि कथा हो रही थी, उसमें पंडित जी भगवान के आभूषणों का वर्णन कर रहे थे, कि उनके शरीर पर बेशकीमती आभूषण धारण किये हैं, सोने का रत्न जटित मुकुट है, गले में कीमती कंठे शोभायमान हैं। ये शब्द चोर के कान में पड़े, उसने वह माल चुराने का निश्चय किया, उसने सोचा इसका पता पंडितजी को है। वह वहीं छिपकर बैठ गया। कथा-समाप्ति के बाद पंडित जी सामान बटोरकर घर रवाना हुए, चोर ने रास्ते में घेर लिया और कहा कि या तो जो तुम्हारे पास माल है दे दो, नहीं तो उस आदमी का पता बताओ कि जिसके शरीर पर करोड़ों का माल है जिसकी चर्चा तुमने अभी की थी। पंडित जी घबरा गए, उन्होंने पीछा छुड़ाने के लिये कहा कि वह आदमी जमुना किनारे जंगल में गौं वें चराता है व बंसी बजाता है। बस चोर पंडित जी को छोड़ जमुना किनारे खोज में चल दिया, व इधर उधर ढूँढ़ने लगा। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते पाँच-छः दिन बीत गये परन्तु कहीं पता नहीं लगा। भूख से पीड़ित व हताश होकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद भगवान कृष्ण आभूषण युक्त (जैसा की पंडितजी ने कहा था) गोपों के झुँड में नजर आये। उनको देखते ही चोर प्रसन्न हो गया और हाथ में डंडा लेकर भगवान पर लपका। भगवान उसका मतलब समझ गये, उन्होंने पूछा कि तू कौन है? यहाँ किस लिये आया है? उसने कहा कि मैं चोर हूँ, जो तुमने आभूषण पहिने हैं, उनको मैं चुराने आया हूँ। भगवान ने वहीं पास में खजाना बतला दिया कि तुझसे जितना माल उठे उतना ले जा। बस चोर प्रसन्न होकर उससे जितना धन उठा, गठरी में बाँध कर घर ले आया। फिर पंडित जी को इनाम देने के लिये आया और कहने लगा कि पंडित जी साहूकार तो अच्छा मालदार बतलाया। पंडित जी आश्चर्य में डूब गये और कहने लगे कि भाई वह साहूकार नहीं हैं, वह भगवान कृष्ण थे। उनके दर्शन हमें भी कराओ। बस पंडित जी चोर के पीछे हो लिये व वहाँ जाकर छिप गये। थोड़ी देर के बाद चोर को भगवान दीख गये परन्तु पंडित जी को नहीं दीखे। तब चोर भगवान से प्रार्थना करने लगा कि प्रभो आप पंडित जी को क्यों नहीं दर्शन देते। भगवान कहने लगे कि जिस प्रकार तेरा विश्वास है वैसा पंडित जी का नहीं है इसलिये उनको दर्शन नहीं होते।

जिस प्रकार चोर ने पंडितजी के कहने पर दृढ़ विश्वास कर लिया। उसी प्रकार हर एक मनुष्य को चाहिये कि संत महात्मा विद्वान पुरुषों के विवेक युक्त वचनों का नियम से पालन करें। उसको अवश्य इच्छित सफलता मिल सकती है। जो काम दृढ़ विश्वास भावना से किया जाता है वह अवश्य ही फलीभूत होता है।


Quotation

यदि तुम्हें जीवन को प्यार करना है तो समय को फिजूल नष्ट न करो, समय ही तो जीवन है।

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यदि तुम संसार को वश में तथा अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हो, तो एक आदत छोड़नी होगी वह यह है -कटु वचन।

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अच्छा व्यापारी वही है, जो अपना समय ईश्वर में तथा धन गरीबों में दान करता रहता है।


रजत-कण

(श्री बटेश्वर दयाल जी वकेवरिया, शास्त्री, भिंड)

संयम और स्वतंत्रता जिस तरह एक ही सिक्के के दो बाजू हैं, उसी प्रकार नम्रता और निर्भयता भी एक ही वस्तु के दो रूप हैं। स्वतन्त्रता में जिस प्रकार अपने अधिकारों की रक्षा की प्रतिज्ञा है, उसी प्रकार संयम में दूसरे के अधिकारों की रक्षा का आश्वासन है। जो किसी को डराता नहीं, वास्तव में वह किसी से डरता नहीं है। जो औरों को डरा सकता है, वह जरूर दूसरों से डरता है।

जो अपनी गलती को खुद ही देखकर सुधार लेता है, और उसका प्रायश्चित कर लेता है, वह साधु है। जो गलती बताने पर मान लेता, और खेद प्रकाशित करता है, वह सज्जन और सद्गृहस्थ है। अपनी गलती महसूस होने पर भी हठ करता है, वह नर पशु है। जो सही और गलती की तमीज ही नहीं कर पाता, या जो गलत को सही, और सही को गलत मानता है, वह पशु है।

धार्मिक, राजकीय, अथवा वैज्ञानिक दलीलें जो किसी एक स्थान और एक समय में सही मान ली गई हैं, वही दूसरे स्थान और दूसरे समय में गलत भी हो सकती हैं। परन्तु व्यवहार नीति एक चिरकाल सत्य है। इससे लोगों को सच्चा सुख-प्रेम और शान्ति प्राप्त हो सकती है।

जीवन क्षणभंगुर अवश्य है, पर जिस जीवन में जैसा आकर्षण है, दीपक जैसा प्रकाश है, और पुष्प जैसा पराग है, वही अमरता है।

स्त्री, पुत्र और धन से किसी को भी सच्ची तृप्ति नहीं हो सकती। यदि हो सकती होती तो अब तक किसी न किसी को अवश्य हुई होती। सच्ची तृप्ति का विषय है केवल निजात्मा तत्व की प्राप्ति। आत्म तत्व की प्राप्ति हो जाने पर वह प्राणी सदा के लिये तृप्त हो जाता है।


गृहस्थ में ईश्वर प्राप्ति

(श्री मंगलचन्द जी भण्डारी, अजमेर)

एक बार एक राजा ने अपने मंत्री से पूछा कि “क्या गृहस्थ में रहकर भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है?” मंत्री ने उत्तर दिया- हाँ, श्रीमान् ऐसा हो सकता है। राजा ने पूछा कि यह किस प्रकार संभव है? मंत्री ने उत्तर दिया कि इसका ठीक ठीक उत्तर एक महात्मा जी दे सकते हैं जो यहाँ से गोदावरी नदी के पास एक घने वन में रहते हैं।

राज अपने प्रश्न का उत्तर पाने के लिए दूसरे दिन मंत्री को साथ लेकर उन महात्मा से मिलने चल दिया। कुछ दूर चलकर मंत्री ने कहा- महाराज, ऐसा नियम है कि जो उन महात्मा से मिलने जाता है, वह रास्ते में चलते हुए कीड़े-मकोड़ो को बचाता चलता है। यदि एक भी कीड़ा पाँव से कुचल जाए तो महात्मा जी श्राप दे देते हैं। राजा ने मंत्री की बात स्वीकार कर ली और खूब ध्यानपूर्वक आगे की जमीन देख देखकर पैर रखने लगे। इस प्रकार चलते हुए वे महात्मा जी के पास जा पहुँचे।

महात्मा ने दोनों को सत्कारपूर्वक बिठाया और राजा ने पूछा कि आपने रास्ते में क्या-क्या देखा मुझे बताइए। राजा ने कहा- भगवन् मैं तो आपके श्राप के डर से रास्ते के कीड़े-मकोड़ो को देखता आया हूँ। इसलिए मेरा ध्यान दूसरी ओर गया ही नहीं, रास्ते के दृश्यों के बारे में मुझे कुछ भी मालूम नहीं है।

इस पर महात्मा ने हँसते हुए कहा- राजन् यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। मेरे श्राप से डरते हुए तुम आये उसी प्रकार ईश्वर के दण्ड से डरना चाहिए, कीड़ों को बचाते हुए चले, उसी प्रकार दुष्कर्मों से बचते हुए चलना चाहिए। रास्ते में अनेक दृश्यों के होते हुए भी वे दिखाई न पड़े। जिस सावधानी से तुम मेरे पास आये हो, उसी से जीवन क्रम चलाओ तो गृहस्थ में रहते हुए भी ईश्वर को प्राप्त कर सकते हो। राजा ठीक उत्तर पाकर संतोषपूर्वक लौट आये।


दुःखों का स्वागत कीजिये।

(श्री प्रेमनारायण जी पाण्डेय, ‘प्रेम’ कानपुर)

दुःख से लोग बहुत डरते हैं और चाहते है कि वह न आवे, फिर भी न चाहते हुए भी वह आ ही जाता है, इसमें महान ईश्वरीय प्रयोजन है। मनुष्य के अहंकार और दुर्भावों का शमन शोधन करने के लिए दुःख का आगमन ऐसी रामबाण औषधि की तरह साबित होता है जो पीने में कड़वी होते हुए भी व्याधि का नाश कर डालती है। जब नाना प्रकार की यंत्रणाएं, घोर दुःख, संकटों का अपार समूह उमड़ता चला आता है और बाहुबल कुछ काम नहीं करता, शक्तियाँ असमर्थ हो जाती हैं, तब मनुष्य सोचता है कि मुझसे भी ऊँची कोई शक्ति मौजूद है और उस शक्ति का विधान इतना प्रबल है जिसे मैं तोड़ नहीं सकता।

नास्तिकता से आस्तिकता की ओर, अधर्म से धर्म की ओर, अहंकार से नम्रता की ओर ले चलने की क्षमता दुःखों में है। जो मनुष्य हजार उपदेशों से भी कुपथ पर चलने से बाज नहीं आते थे वे विपत्ति की एक करारी ठोकर खाकर तिलमिला गये और ठीक रास्ते पर आ गये। विपत्ति में ईश्वर का स्मरण आता है और अधर्म के दुखद परिणामों को देखकर सुपथ पर चलने की इच्छा होती है। कष्टों की खराद पर घिसे जाने के उपरान्त मनुष्य की बुद्धि, सावधानी, क्रियाशीलता सभी तेज हो जाती हैं। संसार में जितने महापुरुष हुए हैं, वे विपत्तियों की खराद पर खूब रगड़-रगड़ कर घिसे गये हैं तब उनका उज्ज्वल स्वरूप दुनिया को दिखाई पड़ा हैं।

विपत्ति से डरने की कोई बात नहीं है, कष्टों में ऐसा कोई तथ्य नहीं है जो अन्ततः हानिकर सिद्ध हो। एक पहुँचे हुए ईश्वर भक्त का कहना है कि “ईश्वर जिसे अपनी शरण में लेना चाहते हैं उसके पास दुख भेजते हैं ताकि वह मोह को छोड़कर प्रेम के, भक्ति के मार्ग पर पदार्पण करे।”


एक काम करो।

(श्री देवराज जी विशारद, सातों जोगा)

करने योग्य कार्यों का समूह आगे खड़ा हुआ है। जीवन छोटा है और कार्य बहुत हैं। मनुष्य सोचता है कि यह करूं, वह करूं, इस कार्य में सफलता पाऊँ, उस लाभ को उठाऊँ। इस प्रकार की कल्पनाओं में बहुत सी उचित होती हैं, बहुत सी अनुचित आरम्भ किये हुए कार्यों में से बहुतों में वह सफ हो जाता है और बहुतों में असफल रहना पड़ता है। कभी-कभी बहुत से कार्य एक साथ इस प्रकार सामने आते हैं जिनमें से सर्वोत्तम का चुनाव करने में बड़ी असुविधा होती है।

आपके सामने कितने ही कार्य क्यों न हों, उनमें से किसी को कितना ही अधिक पसंद क्यों न हों, पर एक बात का विशेष रूप से ध्यान रखिए, और वह है-”कर्तव्य पालन”। अपना जो काम है, अपने ऊपर जो जिम्मेदारी है, उसे पूरी तरह से ठीक प्रकार से निबाहना चाहिए। वेद, शास्त्र, पुराण सबका एक ही मन्तव्य है कि मनुष्य को अपना कर्तव्य भले प्रकार निबाहना चाहिए, कठिनाई सहकर भी अपने उत्तरदायित्व की पूर्ति करनी चाहिए।

मायाग्रस्त मनुष्य इन्द्रिय भोगों में रुचि लेने और ललचाने वाली चीजों को प्राप्त करने के लिये भरे-बुरे का, धर्म-अधर्म का विचार छोड़ देते हैं, अमीर बन सकते हैं, दौलतमन्द कहा सकते हैं, और अधिकार प्राप्त कर सकते हैं पर जीवन का सुख प्राप्त नहीं कर सकते। इतिहास में जिन पुरुषों के नाम स्वर्णाक्षरों में लिखे हुए हैं और कितने वर्ष बीत जाने पर भी जिनकी विमल कीर्ति अब भी चारों ओर फैल रही है, उन्होंने एक काम प्राण-प्रिय बनाया था और वह था ‘कर्तव्य पालन’, इसीलिए हम कहते है कि पाठको- एक काम अब करो- अपने कर्तव्य को दृढ़ता के साथ पूरा करो।


त्याग करो-और मिलेगा।

(जान. एम. प्रसाद, बैलूक)

सारपत नगर में एक विधवा स्त्री रहती थी। उसके केवल एक ही पुत्र था। एक बार उस नगर में भारी दुर्भिक्ष पड़ा। गाँव के गाँव उजड़ने लगे। भूख के मारे लोग काल के गाल में समा रहे थे।

एक दिन इलियाह नामक एक धर्मी पुरुष परमेश्वर की ओर से इस स्त्री के पास भेजा गया। इलियाह ने जाकर उससे रोटी माँगी। स्त्री ने उत्तर दिया कि उसके पास घड़े में केवल एक मुट्ठी आटा तथा कुप्पी में थोड़ा सा तेल है जिससे रोटी बनाकर एक ही बार भोजन करके वे दोनों माता-पुत्र मर जायेंगे, क्योंकि दूसरी बार के लिये एक दाना तक शेष नहीं है। इलियाह ने कहा- “जैसा मैं कहता हूँ, वैसा ही कर”, क्योंकि परमेश्वर कहता है कि “न तेरे घड़े का आटा और न तेरी कुप्पी में का तेल चुकेगा।” इसलिये परमेश्वर पर विश्वास करके अपनी चिन्ता उसी पर डाल और पहिले मुझे भोजन बनाकर खिला।

यह बड़ा ही टेढ़ा सवाल था। स्त्री ने सोचा कि यहाँ तो खुद भूखे मरने की नौबत है, अब क्या करूं। इतने ही में उसके हृदय से आवाज आई कि त्याग का प्रतिफल अवश्य ही मिलता है। उसने तुरन्त ही भोजन बनाया और उसे खिला दिया।

आश्चर्य की बात है कि वह जितना आटा निकालती थी उतना ही बढ़ता जाता था। उस दिन से उस स्त्री को मालूम हो गया कि भगवान हमारी कठिन से कठिन परिस्थिति में भी हमारा विश्वास बढ़ाता है। क्या हम भी इस विधवा स्त्री के सदृश्य त्याग करते हैं? और परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं?


पवित्र जीवन

(श्री गुरुचरण जी आर्य, बिहिया)

मानव जीवन में व्यवहृत जितने अनुष्ठान (नियम, व्रत) सत्य, पूर्ण पवित्रता स्थापित कर सकते हैं, उनमें सबसे सरल, मीठा अनुष्ठान “ईश्वर पर विश्वास कर लेना है।” मनुष्य को यदि अपने चरित्र को ऊँचा उठाना है तो ईश्वरी नियमों को साथ-साथ आत्मिक बल बढ़ाकर स्वाध्याय, संतोष और तप को भी अपना एक मात्र लक्ष्य रखना है, इसी लक्ष्य के सहारे हम अपने अन्तिम लक्ष्य और ईश्वर के आत्मस्वरूप गुणों को प्राप्त करने की क्षमता उत्पन्न कर सकेंगे।

जैसे-जैसे हमारा स्वाध्याय बढ़ेगा, हमारी आत्मा संतोष व्रतधारी बनेगी और जब संतोष का पूर्ण रूपेण समावेश हो चुकेगा तो हमारा तप पवित्र मानव का स्वरूप लोकोपकारी वृत्तियों को जीवन देकर हमें हमारे एक मात्र लक्ष्य की पूर्ति में सहायक होगा। बस यही रूप मानव जाति का विश्व शान्तिदायक पवित्र जीवन है।


VigyapanSuchana

(सन् 44 का विशेषाँक)

“मैस्मरेजम अंक” होगा।

मैस्मरेजम विद्या सम्बन्धी सारे गुप्त प्रकट रहस्य इसमें खोलकर रख दिये जायेंगे।

जिनकी सहायता से आप स्वयं मैस्मरेजम में निपुण हो सकते हैं।

1 जनवरी सन् 44 को प्रकाशित होगा।

आज से ही प्रतीक्षा कीजिए।


दौलत का नशा

(श्री अविनाश चन्द्र खरे, सिवनी)

एक दिन मंगरु किसान खेत जोतने गया। उसके पास दो रोटियाँ थी। उसने यह सोचकर कि काम करने के बाद रोटियाँ खा लूँगा, रोटियाँ एक झाड़ी के पास रख दीं। झाड़ी के पास ही एक भूत बैठा था। भूत को भूख बहुत जोरों से सता रही थी। भूत ने रोटियाँ खा लीं।

किसान जब दोपहर को काम समाप्त करने के बाद अपनी भूख मिटाने झाड़ी के पास आया तो देखा कि रोटियाँ नदारद हैं। उसने सोचा किसी भूखे ने ही रोटियाँ खाई होंगी। यह सोचकर उसने पानी पी लिया और फिर काम में लग गया।

भूत किसान का यह कार्य देखकर अपने राजा अधर्म के पास गया और उन्हें सारा हाल सुनाया। अधर्म ने सोचा यदि संसार में इसी प्रकार स्वार्थ की भावना का लोप और संतोष की भावना बढ़ती जायेगी तो अनर्थ हो जायेगा। यह सोचकर उसने भूत से कहा कि तुम जाकर मनुष्यों में संतोष की भावना का लोप कर दो।

भूत लौटकर विचार करने लगा कि क्या यत्न किया जाए। सोचते-सोचते उसे एक उपाय सूझ गया। उसने एक किसान का रूप धर लिया और मंगरु किसान के यहाँ नौकर हो गया। उसने पहले साल मंगरु को दलदल में खेती बोने की सलाह दी। उस साल पानी बिल्कुल न गिरा पर मंगरु को लाभ ही हुआ। दूसरे वर्ष उसने एक टीले पर दाना बोने की सलाह दी। भाग्यवश उस साल बहुत जोरों का पानी बरसा और सब किसानों की फसल सड़ गई पर मंगरु को जरा भी नुकसान न हुआ। मंगरु का घर जौ के बोरों से भर गया। भूत ने मंगरु को जौ की शराब बनाना सिखा दिया। किसान अपने साथियों के साथ शराब का सेवन करने लगा।

भूत किसान की दशा देखकर अपने राजा के पास गया और उनसे विनती की-महाराज चलकर जरा उस किसान की दशा देख लीजिए। भूत और अधर्म राज किसान के घर आये। उन्होंने देखा कि सब किसान शराब पी रहे हैं, इतने में एक साधु भीतर आया। मंगरु ने उसे डाँट कर कहा- भीतर क्यों घुसे आते हो, निकल जा बाहर यहाँ कुछ न मिलेगा।

अधर्म राजा किसान की दशा देखकर बहुत खुश हुए। उन्होंने भूत की तारीफ करते हुए कहा- यही हाल रहा तो पृथ्वी पर अधर्म का राज्य हो जायेगा।

शराब पीकर वे लोग आपस में गाली-गलौज मार-पीट करते, और तरह-तरह के कुकर्मों निर्लज्जता पूर्वक लगे रहते।

अधर्म राज ने किसानों की दशा देखकर भूत से पूछा- तुमने इन पर कौन सा मन्त्र फूँक दिया है, देखो तो संतोष की भावना का लोप हो गया है। भूत ने कहा- महाराज यह नियम है कि जब तक मनुष्य को उसके खाने भर को भोजन मिलता जाये तब तक तो उसे संतोष रहता है पर जहाँ उसे कुछ अधिक भोजन मिला कि वह विलास वासनाओं में लिप्त हो जाता है। मैंने इसी मन्त्र का उपयोग मंगरु किसान पर किया। उसे अधिक दाना दिया और उसकी क्या दशा हुई यह आप स्वयं देख सकते हैं। इस प्रकार संसार से संतोष भावना का लोप होता गया।


Quotation

वीर वह है जिसने दूसरों को परास्त कर दिया है। बहादुरों में भी बहादुर वह है जिसने अपने को जीत लिया।

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चन्दन स्वयं घिसकर सुगन्धि देता है, भले मनुष्यों का यही काम है।


VigyapanSuchana

मनुष्य को देवता बनाने वाली पुस्तकें

जो ज्ञान युगों के प्रयत्न से मिलता हैं उसे हर अनायास ही आपके सामने उपस्थित करते है।

यह बाजारू किताबें नहीं हैं। इनकी एक-एक पंक्ति के पीछे गहरा अनुभव और अनुसंधान है। विनम्र शब्दों में हमारा दावा है कि इतना खोज-पूर्ण अलभ्य साहित्य इतने स्वल्प मूल्य में अन्यत्र नहीं मिल सकता।

(1)मैं क्या हूँ?

(2)सूर्य चिकित्सा विज्ञान

(3)प्राण चिकित्सा विज्ञान

(4)पर काया प्रवेश

(5)स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्भुत विद्या

(6)मानवीय विद्युत के चमत्कार

(7)स्वर योग से दिव्य ज्ञान

(8)भोग में योग

(9)बुद्धि बढ़ाने के उपाय

(10)धनवान बनने के उक्त रहस्य

(11)पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि

(12)वशीकरण की सच्ची सिद्धि

(13)मरने के बाद हमारा क्या होता है

(14)जीव-जन्तुओं की बोली समझना

(15)ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?

(16)क्या धर्म? क्या अधर्म?

(17)गहना कर्मणोगति

(18)जीवन की गूढ़ गुत्थियों पर तात्विक प्रकाश

(19)पंचाध्यायी (अजिल्द)

नोट- कमीशन के लिए लिखा पढ़ी करना बिल्कुल व्यर्थ है। हाँ 6 से अधिक पुस्तकें लेने पर डाक व्यय नहीं लिया जायेगा।

इसी जीवन में स्वर्ग का आनन्द लीजिये।

लौकिक और पारलौकिक सफलता की व्यावहारिक शिक्षा

आध्यात्मिकता आनन्दमय जीवन बिताने की कला है। यदि आप इसी जीवन में स्वर्ग का प्रत्यक्ष आनन्द भोगने की इच्छा करते हैं तो निश्चय समझिये आप उसमें सफल हो सकते हैं। कैसे? इस प्रश्न का रहस्य जानने के लिये इन पुस्तकों को पढ़िये। जीवन की व्यावहारिक सफलता के गुप्त मन्त्र इन पुस्तकों में मिलेंगे-

(20)शक्ति संचय के पथ पर

(21)आत्म गौरव की साधना

(22)प्रतिष्ठा का उच्च सोपान

(23)मित्र भाव बढ़ाने की कला

(24)आन्तरिक उल्लास का विकास

(25)आगे बढ़ने की तैयारी

(26)आध्यात्म धर्म का अवलम्बन

(27)ब्रह्म विद्या का रहस्योद्धाटन

कमीशन देना कतई बन्द है। इसलिये इसके लिये लिखा पढ़ी करना बिल्कुल व्यर्थ है। 6 या इससे अधिक पुस्तकें लेने पर डाक खर्च हम अपना लगा देते हैं। आठ से कम पुस्तकें लेने पर डाक खर्च ग्राहक के जिम्मे है।

- मैनेजर “अखण्ड ज्योति” कार्यालय, मथुरा।

- मैनेजर “अखण्ड ज्योति” कार्यालय, मथुरा।


नश्वर संसार


नश्वर संसार

(लेखक-श्री पं. प्रेम नारायण शर्मा, गिर्दावर कानूनगो, अम्वाह)

(1)

जीर्ण शीर्ण पत्तों से निर्मित यह नश्वर संसार।

मृत्यु और जीवन इसके आने जाने के द्वार॥

बड़े बड़े विद्वान, शूर, सामन्त, गुणी, धनवान।

हाथ पसारे चले गये सब, छोड़ साज सामान॥

(2)

वह निर्धन जो जीवन में दो दाने जोड़ न पाया।

वह अमीर जिसकी कोठी में भरी पड़ी थी माया॥

दोनों लोट रहे मरघट में, मिली धूलि में काया।

इस सराय में किसको रहना? एक गया इक आया॥

(3)

जिन महलों में कल तक पुजती थी वैभव की रानी।

आज गूँजती उन्हीं खँडहरों में उलूक की वानी॥

जिन प्रासादों में था कल तक धन का, बल का, डेरा।

आज वहाँ कौए, चमगादड़ करते रैन बसेरा॥

(4)

चलती चक्की में आकर पिसते जाते हैं दाने।

फिर क्यों लगा अभागा मानव, इस पर भी इतराने॥

पानी भरी खाल जिसमें सांसों का ताना-बाना।

कौन ठिकाना इसका बन्दे, आज रहे कल जाना॥

(5)

तृष्णा लोभ, मोह, मद, ममता, मद कर पाप कमाई।

वह कर ले जिसके कारण तूने नर देही पाई॥

पथिक! दूर है तेरी मंजिल, रास्ते को कुछ धर ले।

पल में परलय होगी, जो करना हो सो अब कर ले॥

*समाप्त*