ऐ अविनाशी आत्माओं! तुम तुच्छ नहीं महान हो। तुम्हें किसी आशक्ता का अनुभव करना या कुछ माँगना नहीं हैं। तुम अनन्त शक्तिशाली हो, तुम्हारे बल का पारावार नहीं, जिन साधनों को लेकर तुम अवतीर्ण हुए हो वे अचूक ब्रह्मास्त्र हैं। इनकी शक्ति अनेक इन्द्र-वज्रों से अधिक हैं। सफलता और आनन्द तुम्हारे जन्मजात अधिकार हैं। उठो, अपने को, अपने हथियारों को, भली प्रकार पहचानो और बुद्धि पूर्वक कर्तव्य मार्ग में जुट जाओ। फिर देखें कैसे वह चीज नहीं मिलती जिन्हें तुम चाहते हो। तुम कल्पवृक्ष हो, पारस हो, अमृत हो और सफलता की साक्षात मूर्ति हो।
तुम शरीर नहीं हो, जीव नहीं हो, वरन् आत्मा, महान-आत्मा, परम आत्मा हो। तुम इन्द्रियों के गुलाम नहीं हो, आदतें तुम्हें मजबूर नहीं कर सकती। पाप और अज्ञान में इतनी शक्ति नहीं है कि वे तुम्हारे ऊपर शासन कर सके। अपने को हीन, नीच, पतित, पराधीन! और दीन हीन मानना एक प्रकार की आत्महत्या हैं। आध्यात्म शास्त्र का सन्देश है कि ऐ महान पिता के महान पुत्रों! अपनी महानता को पहचानो। उसे समझने में, खोजने में और प्राप्त करने में तत्परता पूर्वक जूट जाओ। तुम संत हो हो, आनंद पूर्वक अपनी वास्तविकता को अनुभव करो, और स्वाधीनता का-मोक्ष का-आनन्द प्राप्त करो।
मनुष्य को ‘सच्चा मनुष्य’ बनाने का प्रयत्न
दुःखी जीवन की सुखमय बनाने को एक अद्भुत योजना
क्या आप यह इच्छाएं करते हैं?
क्या आप बुद्धिमान और सद्गुणी बनना चाहते हैं?
क्या आप अपनी चिन्ता और वेदनाओं से छुटकारा पाना चाहते हैं?
क्या आप संसार में प्रतिष्ठा और आदर पूर्ण उन्नत जीवन जीना चाहतें हैं।
क्या आप अपने परिवार को अपना वशवर्ती बनाना चाहते हैं?
क्या आप इस जीवन में ही स्वर्ग का आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं?
क्या आप शत्रुओं के अनिष्ट प्रभाव से बचना चाहते है?
क्या आप कुविचार, कुसंस्कार और बुरी आदतों से छुटकारा पाना चाहतें हैं?
क्या आप अपने कारोबार में अधिक लाभ प्राप्त करना चाहते हैं?
क्या आप अपनी तन्दुरुस्ती और सुन्दरता बढ़ाना चाहते हैं?
क्या आप अपने दुखदायी मानसिक रोगों को मार भगाना चाहते हैं?
क्या आप अपनी बुद्धि तथा प्रतिभा का विकास करना चाहते हैं।
क्या आप मृत्यु के उपरान्त सद्गति की इच्छा करते हैं?
क्या आप सच्चे धर्मात्मा, योगी और ईश्वर भक्त बचना चाहते हैं?
क्या आप दूसरों की कृपा, सद्भावना स्नेह और सहायता चाहते हैं?
क्या आप दुनिया दारी की निकट उलझनों को आसानी से पार करना चाहते हैं?
क्या आप मनुष्यता प्राप्त करके सच्चे अर्थों में मनुष्य-द्विज-बनना चाहते हैं?
यदि उपरोक्त इच्छाओं को पूर्ण करना चाहते हैं तो ‘अखंड ज्योति’ आपकी कुछ व्यावहारिक सहायता कर सकती हैं। ‘कर्मयोग‘ की शिक्षा प्राप्त करने के लिए आप मथुरा आ सकते हैं।
श्री मद्भगवद्गीता द्वारा शिक्षा। शिक्षाक्रम बिलकुल सादा। आचार्य श्रीराम शर्मा के साथ पारिवारिक सदस्य की तरह रहना। शिक्षा की कोई फीस नहीं। भोजन खर्च का 15 रु. मासिक से कम में ही चल जाना। बृज के प्रमुख तीर्थों की यात्रा। रहने के समय की कोई कैद नहीं। तपस्वी जीवन बिताने व अनुशासन में रहना होगा। बिस्तर और थाली लौटा साथ लाना चाहिए। एक समय में अधिक से अधिक 5-7 व्यक्ति रखने की ही व्यवस्था यहाँ है। आने से पूर्व अपना शारीरिक और मानसिक पूरा परिचय भेजकर स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए। बिना स्वीकृति के कोई सज्जन न पधारें।
मैनेजर-अखण्ड-ज्योति, मथुरा।
(घीया मंडी रोड, किशोरी रमन गर्ज्स स्कूल के सामने)
शाखाएं-ऋषिकेश (हिमालय) नैरोबी (अफ्रीका) मेहसाणा (गुजरात)
सोल प्रोप्राइटर:-भगवान कैलाशपति, मैनेजिंग डाइरेक्टर:-श्री जी. एम. शर्मा
हिमालय शाखा के प्रेसीडेण्ट:- श्री स्वामी शिवानन्द जी, आनन्द कुटीर ऋषिकेश (हिमालय)
मेहसाणा ब्राञ्च के मैनेजर:-श्री रामलाल भाई गोपाल जी व्यास
बी. ए., एल. एल. बी., वकील
इस बैंक में लाल स्याही से कागज की एक और निश्चित संख्या में “ॐ नमः शिवाय” मन्त्र (नागरी अक्षरों में) एक ही मनुष्य के हाथ लिखे हुए जमा करने से निम्न लिखित वस्तुएं उपहार में दी जायेंगी।
इस के अतिरिक्त निम्न लिखित मन्त्र भी बैंक में जमा किये जा सकते हैं। (1.) गणपतये नमः (2.) ॐ नमोभगवते वासदेवायः (3) और नमोनारायणायः (4) ॐ हुँ हनुमतये नमः (5) हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे (नीचे बतलाई हुई संख्या में इस मन्त्र की संख्या आधी गिनी जायेगी)
मन्त्र की संख्या. इनाम में मिलने वाली वस्तुएं
500, श्री काशीजी में तैयार कराया हुआ शुद्ध जनेऊ (यज्ञोपवीत).....2
2000, चंदन या तुलसी की सुन्दर माला ..........1
5000,असली पञ्चमुखी रुद्राक्ष की माला ..........1
“सुन्दर धार्मिक फोटो साइज 12&14..........1
“ श्री भगवद्गीता-गुजराती टीका वाली ..........1
10000,पंचपात्र ताँबे का ..........1
“ सुन्दर नर्मदेश्वर शिव लिंग ..........1
सवा लाख, “कल्प वृक्ष” मासिक पत्र उज्जैन, एक वर्ष को बिना मूल्य
डेढ़ लाख, “अखण्ड ज्योति” मासिक पत्र मथुरा, एक वर्ष को बिना मूल्य
दो लाख, “कल्याण” मासिक पत्र गोरखपुर, “ “ “ “ “
“ स्फटिक मणि की सुन्दर माला अथवा शिव लिंग
तीन लाख, गुजराती टीका वाली रामायण अथवा श्रीमद्भागवत
पाँच लाख, शिव पुराण गुजराती टीका वाला
पन्द्रह लाख, काशी व हरिद्वार की टिकिट मेहसाणा स्टेशन से और साथ में 5) भोजन के वास्ते, चौबीस लाख, बद्रीकेदारनाथजी की यात्रा का खर्चा,
यह इनाम बैंक की तरफ से वर्ष में तीन बार “महाशिवरात्रि” “अक्षय तृतीया” और विजयादशमी-(दशहरा) वितरण किये जायेंगे,
मन्त्र लिखने के इच्छुक महानुभाव पहिले से बैंक को सूचना देकर अपना नाम रजिस्टर करालें जिससे तदनुसार व्यवस्था की जा सके,
निष्काम भावना से ईश्वर के कृपा पात्र आत्माएं उपरोक्त मन्त्रों को लिख कर बैंक में भेजेंगे तो वह भी सधन्यवाद स्वीकार किये जावेंगे।
(रचयिता- श्री महावीर प्रसाद विद्यार्थी, टेढ़ा- उन्नाव)
मानव! ये मंजुल मणियों की-टूटी लड़ियाँ अब तो जोड़ो!
नादान! अरे! गलते कब से,
अपने ही अश्रु-प्रवाहों में।
जीवन का कण-कण जला रहे,
इस चिन्ता में, इन आहों में।
तुम मृग-तृष्णा में भटक रहे,
कब से इन दुर्गम राहों में॥
किस हाव-भाव से मुसकाती-यह माया, इससे मुँह मोड़ो!
सुख-शान्ति मिलेगी क्या तुमको,
पर-पीड़न में,इस छल-बल में?
शीतल छाया हैं यहाँ कहाँ,
विष-बल्लरियों के अंचल में!
अविरल आनन्द-सुधा-धारा,
बहती निश्छल-अन्तस्तल में!
जागो, जागो, आँखें खोलो, स्वप्नों की ये कड़ियाँ तोड़ो!
मानव! ये मंजुल मणियों की, टूटी लड़ियाँ अब तो जोड़ो!
संसार तीन गुणों के संमिश्रण से बना है इसलिए इसमें निवास करने वाले प्राणी भी तीन प्रकार की प्रकृति के देखे जाते हैं। बेशक, संसार में अन्धकार की अपेक्षा प्रकाश अधिक है, बुराई से भलाई अधिक है, पाप से पुण्य अधिक है, फिर भी तम तत्व की इतनी न्यूनता नहीं है कि उसकी सहसा उपेक्षा की जा सके। पाश्चात्य देशों से भौतिकवाद की जो प्रचण्ड हवाएं चली हैं उसने इस शताब्दी में तमोगुण को और भी अधिक बढ़ा दिया है।
सात्विक विचार और कार्य मृदुल, सुन्दर एवं हलके होते हैं उनका बाहुल्य सुख, शान्ति की स्वाभाविक स्थिति उत्पन्न करता है, इस लिए यदि संसार में सतोगुण बढ़े, अधिक रहे तो इसमें कोई अस्वाभाविकता, कटुता और कठिनाई नहीं होती। आनन्द कितना ही बढ़ जाए उससे मनुष्य ऊबता नहीं किन्तु दुख, कष्ट और विघ्नों से मनुष्य थोड़े में ही घबरा जाता है। तामसिक कार्य बड़े कटु कठोर भी चित्त में विक्षोभ पैदा करता है। अस्वाभाविक स्थिति थोड़ी होने पर भी असह्य प्रतीत होती है।
यों तो सदा से ही तमोगुण, पाप, अकर्म, दुर्व्यवहार, संसार में मौजूद है, परन्तु वर्तमान समय में उसकी वृद्धि और भी अधिक हो गई है। यह अधिकता अपनी कठोरता, भयंकरता और अस्वाभाविकता के कारण बहुत ही असह्य एवं क्षोभ उत्पन्न करने वाली प्रतीत होती हैं। ऐसी स्थिति में ऐसा लगता हैं मानों धर्म का नाश हो गया है और चारों ओर अधर्म ही अधर्म का शासन स्थापित हो गया हैं। परिस्थिति को बढ़ा चढ़ाकर नमक-मिर्च लगा कर कहने की आदत मनुष्य जाति में बहुत पुरानी हैं। सेर को सवासेर कहने और अनुभव करने की वृत्ति मनुष्य स्वभाव में रहती हैं, उससे प्रेरित होकर लोगों में पाप अधिक है। कोई कोई भावुक गणितज्ञ तो यहाँ तक घोषित करते हैं कि संसार में पाप 90 प्रतिशत, पुण्य 7। 1/2 प्रतिशत और सत्य 2। 1/2 प्रतिशत वर्तमान हैं।
हम सदा से ऐसा मानते रहे हैं कि पुण्य से पाप अधिक नहीं हो सकता, प्रकाश से अन्धकार की मात्रा बढ़ नहीं सकती, सफेदी से कालिमा ज्यादा नहीं होती। बेशक पाप की भावनाएं आज दुनिया में अधिक हैं तो भी वे इतनी नहीं है कि पुण्य से बढ़ी चढ़ी हों, आज क्या ऐसी स्थिति कभी भी नहीं आ सकती जिस दिन इस पृथ्वी पर धर्म से अधर्म बढ़ जायगा, उस दिन वह मनुष्यों के रहने योग्य न रहेगी। कोई मानव प्राणी इस भूतल पर अवतीर्ण होना और रहना पसंद न करेगा। पुण्य में ही रस हैं। रस ही परमात्मा है। जब यह संसार नीरस हो जाय, जीवन के प्रति कोई दिलचस्पी न रहे, संसार में प्रिय वस्तुओं को अभाव हो जाय तब यह कहा जा सकता है कि संसार पाप मय हो गया, परन्तु ऐसा आज तो क्या, शायद कभी भी न हो सकेगा। परमात्मा ने सृष्टि की रचना इस प्रकार की है कि इसमें पुण्य ही सदा अधिक रहेगा।
आनन्द का जहाँ कहीं भी दिग्दर्शन होता हैं वहाँ भलाई की अधिकता हैं। स्वास्थ्य, सौंदर्य, प्रयत्न, खोज, क्रियाशीलता, उत्साह, उपार्जन, निर्माण, उल्लास, भावतरंग, सहयोग, सेवा आदि के गुणों और कार्यों का उद्भव, पुण्य, धर्म और सतोगुणी वृत्तियों की प्रधानता से होता है, जब तक इस प्रकार के विचार और कार्यों की अधिकता है तब तक पुण्य का सतोगुण का अभाव नहीं समझना चाहिए। आजकल मुलम्मा साजी की बुद्धि बढ़ गई है, हानिकारक कार्यों को आनन्द दायक बनाया जा रहा है, तामसिकता के ऊपर सतोगुण की कलई की जा रही हैं, फिर भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि उसमें जितना आनन्द का अंश है, जितना आकर्षण है, वह सतोगुण के ही कारण हैं। तमोगुण के पाप के चिन्ह हैं-आलस्य, प्रमाद, अकर्मण्यता, गंदगी, कुरूपता, निराशा, दुर्बलता, जड़ता, अज्ञान, हिंसा, कठोरता, निष्ठुरता, पेटूपन आदि। हम देखते हैं कि संसार में आलस्य से कर्म अधिक है। निष्ठुरता से दया, पेटूपन से सहयोग, जड़ता से सतर्कता, गंदगी से सफाई, कुरूपता से सौंदर्य, निराशा से आशा, दुर्बलता से सशक्ता, अज्ञान से विवेक, अविश्वास से विश्वास, द्वेष से प्रेम, कठोरता से मधुरता, अधिक है। ऐसी दशा में नहीं कहा जा सकता कि संसार में पाप की प्रभुता है, अधर्म का शासन है।
अनात्मवान लोग जिन्हें आत्मबोध नहीं होता, जो आत्म सम्मान और आत्म गौरव को भूले हुए हैं, वे अपने को सदा हीन, नीच, पतित तथा दुर्भाग्यग्रस्त ही अनुभव करते हैं। अपनी सभी बातें उन्हें निकृष्ट, तुच्छ प्रतीत होती हैं। इस प्रकार के अनात्मवान व्यक्ति अपने आत्मा को कुटिल खल कामी, अपने शरीर को नरककुण्ड, अपने संसार को भवसागर, अपने समय को कलिकाल, अपने समाज को सबसे गिरा हुआ मानते हैं और निराशा के अन्धकार को ही सर्वत्र देखते हैं। अपना सब कुछ बुरा प्रतीत होना दीनता और दासता की हीन मनोवृत्ति हैं। अपने देश में उत्पन्न हुई महान आत्माओं का हम तिरस्कार करते हैं, परन्तु दूसरे देश का मामूली हमारी दृष्टि में बहुत ऊंचा जँचता हैं। यह हीनता की भावना हमारी नस नस में समा गई हैं, अपनी हर चीज़ को हीनता के रंगीन चश्मे में होकर ही देखते हैं। जब कोई व्यक्ति इस लोक को मृत्युलोक को, अपनी दुनिया को, तिरस्कार की दृष्टि से देखता हुआ उसे भवसागर, कहता हैं और उससे उदासीन होकर, उपेक्षा भाव रखकर एक कल्पित स्वर्ग के स्वप्न में झोंके लेता है तब उस हीनता की भावना का एक शर्मनाक चित्र सामने उपस्थित होता है।
ऊपर आकाश में लाखों योजन ऊँचा कोई काश्मीर सा सुरम्य सोने चाँदी का नगर बसा हुआ हैं, उसमें भगवान जी राज करते हैं, देवी देवता राजकर्मचारी हैं, खूब नाच गान होता रहता है, बढ़िया खाने मिलते हैं, ऐश आराम के सब साधन हैं, ऐसी कल्पनाओं के साथ एक स्वर्ग का स्वप्न देखना और उसके लिए अपनी कर्तव्य भूमि के उत्तरदायित्वों की ओर से उदासीनता, उपेक्षा एवं तिरस्कार की भावनाएं धारण करना, वैसा ही है जैसा कि शेखचिल्ली ने कल्पित बीबी और बाल बच्चों के स्वप्न में शिर पर रखा हुआ घड़ा फोड़ डाला था और मजूरी पाने के स्थान पर मार खाने का परिणाम भुगता था।
जो इस लोक का सुख नहीं पा सकता, वह स्वर्ग का भी सुख नहीं पा सकेगा। जिसे यह लोक भवसागर प्रतीत होता है उसे परलोक भी नरक सा लगेगा। जिसे यहाँ के लोग कपटी, कुचाली, धूर्त स्वार्थी, पापी दिखाई पड़ते हैं उसे स्वर्ग में देवता भी ऐसे ही लगेंगे। इन्द्र को व्यभिचारी, बृहस्पति को नास्तिक, चन्द्रमा को गुरुपत्नी गामी, बुध को पिता द्रोही, यम को हत्यारा, शंकर को नशेबाज वाराह का अभक्ष भोज, दुर्गा को माँसाहारी, आदि समझेंगे। भगवान पर भी अनेक दोषों के आरोप की गुंजाइश हैं। जिन्हें इस लोक में सर्वत्र पाप ही पाप दिखाई पड़ता है उन्हें वैसी ही सामग्री स्वर्ग में भी मिल जायगी। इस प्रकार के पापी वहाँ भी दीख पड़ेंगे और अन्ततः भवसागर और स्वर्ग में कुछ विशेष अन्तर न रहेगा।
अपने पाठकों को उपरोक्त पंक्तियों में हमने यह बताने का प्रयत्न किया है कि ईश्वर ने हमें जिस पुण्य भूमि में कर्तव्य करने के लिए, जीवन का सद्व्यय करने के लिए भेजा है वह तीर्थभूमि भवसागर नहीं हैं। उसमें पापों और कष्टों की अधिकता दिखाई पड़ती हैं तो भी यथार्थ में यहाँ पुण्य, और सत्य ही अधिक है। तत्वदर्शी ऋषियों ने इस वास्तविकता को अपनी सूक्ष्म दृष्टि से भली भाँति समझा था और निस्संदेह होकर मुक्त कंठ से घोषणा की थी “जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” निश्चय ही कल्पित स्वर्ग की अपेक्षा यह वसुधा वसुन्धरा जिस पर हमने जन्म धारण किया है अनेक गुनी श्रेष्ठ हैं। दुख और पाप यहाँ हैं परन्तु पुण्य और सत्य उनसे भी अधिक यहाँ हैं। इस लोक से हमें उदासीन या निराश होने की नहीं वरन् इस बात की आवश्यकता है कि इस लोक की समस्याओं में पूरी दिलचस्पी लें इसे अधिक सुन्दर और सुसम्पन्न बनावें।
हम मर्त्यों के लिए परमात्मा ने यह मृत्युलोक ही क्रीड़ा भूमि बनाई है, हमें उसमें पुण्य, पवित्रता और महानता की दृष्टि रखनी चाहिए, इसे ही अपना स्वर्ग समझना चाहिए, यहाँ जो बाधा तथा व्यथाएं हैं उन्हें अपने लिए एक चुनौती समझना चाहिए और उन्हें दूर करने के लिए प्रयत्न पूर्वक जुट जाना चाहिए। स्मरण रखिए मनुष्य शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है, स्मरण रखिए जन्म भूमि स्वर्ग से भी गरीयसी है काल्पनिक स्वर्ग स्वप्न में विचरण करने की अपेक्षा यह अच्छा हैं कि आप इस पुण्य भूमि में आध्यात्मिकता का सात्विक आनन्द उपलब्ध करें और सत्कर्मों द्वारा आजीवन को धन्य बताते हुए परमपद प्राप्त करें।
जिसे उत्तमोत्तम पुस्तकों के पठन-पाठन का सौभाग्य प्राप्त होता हैं, उसके लिये चंचल लक्ष्मी का शुष्क विनोद किस काम का?
-नीतिकार
हरे-भरे बन में, भूखों मरने वाले पशु में, और पढ़ने के इतने साधन होते हुए भी ज्ञान-हीन रहने वाले मनुष्य में, क्या अन्तर हैं?
-जिज्ञासु
गरीबों को दरिद्रता से छुड़ाने की, दुखियों का दुःख दूर करने की, शरीर तथा मन को नीरोग बनाने की और बीमारों का दुःख भुला देने की जितनी शक्ति ग्रन्थों में होती हैं, उतनी संसार की और किसी भी चीज़ में नहीं।
-मार्सडन
अच्छी पुस्तकों के पास होने से हमें अपने भले मित्रों के साथ न रहने की कमी नहीं खटकती। जितना ही मैं पुस्तकों का अध्ययन करता गया, उतना ही मुझे उनकी विशेषतायें मालूम होती गई। जिसे पुस्तकों के पढ़ने का शौक है, वह सब जगह सुखी रह सकता है।
-महात्मा गाँधी
मैं नरक में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत करूंगा क्यों कि इनमें वह शक्ति है कि जहाँ ये होंगी, वहाँ आप ही स्वर्ग बन जायगा।
-भगवान तिलक
पुराने कपड़े पहिन कर नई किताबें खरीदिये।
-आस्टिन फेल्प्स्
(श्री प्रकाशजी, एम. एल. ए.)
सबको ही कुछ न कुछ खब्त हैं। मुझे भी कई बातों का खब्त है। उनमें एक यह है कि जब किसी विदेशी से मित्रता हो जाती हैं, उन्हें सहृदय पाता हूँ, साथ ही यह समझता हूँ कि हमारे देश में बहुत दिनों से रहने के कारण वे पर्याप्त अनुभव भी प्राप्त कर चुके हैं, तो मैं उनसे किसी सुअवसर पर यह पूछता हूँ-’आप कृपा कर यह बतलावें कि क्या कारण हैं कि हमारे देश में इतने विशेष पुरुषों के रहते हुये, इतने बड़े-बड़े आन्दोलनों के होते हुए भी देश कुछ उन्नति नहीं कर रहा हैं। ऐसा मालूम होता हैं कि हम ज्यों के त्यों पड़े हुए हैं।” अवश्य ही हमारे मित्र इससे चकित होते हैं, उत्तर देते संकोच करते हैं और शिष्टता के नाते क्षमा चाहते हैं, पर मैं उन्हें छोड़ता नहीं और उनको उत्तर देने के लिये बाध्य करता हूँ। मैं नहीं कह सकता पर सम्भव है कि विशाल हृदय और विशाल मस्तिष्क के पाठक विशाल विषयों को एक क्षण के लिये छोड़ कर मेरी छोटी-सी बात सुन लें और इन मित्रों के उत्तर पर ध्यान दें। विषय संकुचित मालूम पड़ता हो पर इसका परिणाम व्यापक रहा है और इसी कारण मेरी बुद्धि में इसका बड़ा भारी महत्व हैं।
मेरे पहले मित्र एक वृद्ध ईसाई पादरी हैं। 36 वर्षों से भारत में ईसाई मत के प्रचार में तो उतना नहीं, पर सपत्नीक देश के दरिद्र नर नारियों की सामाजिक सेवा में वे लगे रहे हैं। मेरे हृदय में उनके लिये बड़ा सत्कार और प्रेम हैं उनका उत्तर थोड़े में यह हैं कि ‘तुम लोग अपने काम में गर्व नहीं लेते।’ विस्तार से उन्होंने यह बतलाया कि यहाँ पर जब किसी को कोई नौकरी चाहिये, तो अतिशयोक्ति पूर्ण शब्दों में वह दरख्वास्त देता हैं। बहुत ही ‘विनय’ और ‘सम्मान’ के साथ वह आरम्भ करता हैं। अन्त में वह प्रतिज्ञा करता हैं कि यदि स्थान मिल जावेगा तो वह सदा अपने मालिक की शुभ कामना करेगा, पर स्थान मिलते ही वह अपने काम अर्थात् अपनी जीविका के साधन को ही खराब समझने लगता हैं। अन्य साथियों से मिल कर काम खराब करने के लिये षडयन्त्र रचता हैं और मालिक की नाकों में दम कर डालता है और देशों में भी लोग नौकरी की दरख्वास्त देते हैं। साधारण शब्दों में प्रार्थना-पत्र लिखते हैं और जब स्थान मिल जाता हैं, तो इस तरह काम करते हैं जैसे संसार की गति उन्हीं पर निर्भर करती हैं और वे यदि काम छोड़ दें, तो संसार डूब जाय। बात इस पादरी मित्र ने बहुत ठीक कही। हमें अपने काम का गर्व नहीं। दुख तो इसका हैं कि इस मुल्क की परम्परा में अपने काम का गर्व करने का आदेश हैं। जाति-भेज इसी पर निर्भर करता हैं। एक जाति का आदमी दूसरी जाति के आदमी द्वारा अपनी मान-मर्यादा नहीं चाहता। वह अपनी जाति वालों के ही बीच अपना उपयुक्त पद और स्थान चाहता हैं। वह अपनी जीविका के साधनों का बड़ा आदर सत्कार करता हैं। बढ़ई अपने औजार की और दुकानदार अपने बहियों की निश्चित तिथियों पर पूजा करता हैं। पर आज दासता के कारण हमारे यहाँ वर्ण शंकर हो गया है। इस अपनी परम्परा भूल गये हैं। हम अपना काम छोड़ दूसरों का काम उठाते हैं। एक काम छोड़ दूसरा काम लेते रहते हैं। अपनी असफलता का दोष दूसरों को देते रहते हैं। स्वयं दुखी रहते और दूसरों को दुखी करते हैं। कोई काम ठीक कर न सकने के कारण अपने को खराब करते हैं। काम को खराब करते हैं “स्वधर्में निर्धन श्रेय” यह आदेश हम भूल गये। हम अपने काम में गर्व नहीं लेते।
दूसरे मित्र एक वृद्ध सरकारी कर्मचारी आई. पी. एस. के सदस्य हैं। 30 वर्षों से अधिक भारत में गवर्नमेंट नौकरी कर हाल में पेन्शन लेकर वापस स्वदेश गये। न जाने कैसे मुझसे उनसे बड़ी मैत्री हो गई। वही सवाल मैंने पेश किया। उत्तर मिला-’तुम लोग जिम्मेदारी नहीं समझते’ विस्तार में इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति का समष्टि की तरफ जो कर्तव्य होता हैं, उसे हम नहीं जानते। जो काम उठाया, उसे करना चाहिए, जो वादा किया उसे पूरा करना चाहिए-यह सब गुण हम भूल गये। किसी का किसी पर विश्वास नहीं रह गया। खाने की दावत हो तो न मेजबान को यह विश्वास कि मेहमान समय से आवेंगे, न मेहमान को विश्वास कि समय से जाने पर खाना मिल जायगा। न गृहस्थ को विश्वास कि धोबी और दरजी वादे पर कपड़ा दे जायेंगे। न धोबी दरजी को विश्वास कि समय पर दाम मिल जायगा। रेलगाड़ी पर चढ़ने वाले को यह विश्वास नहीं कि पहले से बैठे मुसाफिर उन्हें स्थान देंगे, पहले से बैठने वाले को यह विश्वास नहीं कि नया मुसाफिर धीरे से आकर उचित स्थान लेगा और व्यर्थ का शोर न करेगा न और प्रकार से तंग करेगा। सड़क पर चलने वालों को यह विश्वास नहीं कि आगे चलने वाला अपना छाता इस तरह ले चलेगा कि उसकी नोक से मेरी आँख न फूट जायगी या पीछे चलने वाला मुझे व्यर्थ धक्का न देगा। किसी को किसी पर यह विश्वास नहीं कि केले नारंगी का छिलका या सूई पिन आदि इस तरह वह न छोड़ेगा, जिससे दूसरे को कष्ट पहुँचेगा। माँगी गई चीज समय पर वापस करेगा इत्यादि इत्यादि हम केवल अपनी तात्कालिक सुविधा देखते हैं। हम सारे संसार को अपने आराम के लिए बना समझते हैं-दूसरों के प्रति-अपने कर्त्तव्य का अनुभव नहीं करते। इसी कारण हम सब एक दूसरे के प्रति अविश्वसनीय और अस्पृश्य हो गये हैँ। अपना धार्मिक आदेश भूल गये- ‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत’। ‘हम अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते।
तीसरी व्यक्ति एक स्त्री हैं। सात-आठ वर्षों से अपने को भारतीय बना कर बड़े प्रेम और श्रद्धा बड़ी तत्परता से भारत की सेवा कर रही हैं असहयोग आन्दोलन में जेल भी जा चुकी है। कई कारण से भारतीयों का निकट तक अनुभव इन कार्य-क्षेत्र में हुआ हैं। इनको भी मैंने घेरा। उनका उत्तर था-’तुम लोग बड़े आलसी हो, अर्थात् लोगों ने श्रम का महत्व ही नहीं पहचाना हैं। मेहनत करना तो हमने मरभुक्खों का काम समझ रखा हैं। बड़े लोगों का काम तो केवल बैठे रहना हैं हम भूल गये कि संसार में जो बड़े हुए हैं, वे सब अथक परिश्रमी रहे हैं। जब हम परिश्रम ही न करेंगे, तो हम सफलता कैसे पावेंगे। आरम्भ शूर तो हम हैं, पर हम में लगन नहीं है। इसी कारण हम अपने रोजगार में, अपनी न गृहस्थी सार्वजनिक जीवन में ही सफल होते हैं। रोने, पीटने झींकने में जितना समय हम बिताते हैं, उतना काम में बिताते, तो हम देश की और अपनी काया पलट कर सकते हैं।
चौथी व्यक्ति एक बड़ी वृद्धा स्त्री थी। संसार प्रसिद्ध थी। मेरे कुल से उनका बड़ा प्रेम था। पितामही तुल्य थीं। उनको भी मैंने तंग किया- ‘आपने अपना 40 वर्ष हमारे देश की विविध सेवाओं में लगा दिया। आपको बतलाना ही होगा कि हमारा क्या दोष हैं, जिससे हमारी उन्नति नहीं होती’ थोड़े में उनका उत्तर था ‘तुम लोगों में उदारता नहीं हैं। विस्तार से उदाहरण दे दे कर उन्होंने बतलाया कि भारत में लोग दूसरों को आगे बढ़ाते। अपने ही आगे रहना चाहते हैं। गुणी नव-युवकों को अपनी योग्यता दिखलाने को नहीं देते। उनके मरने के बाद उनका काम खराब हो जाता हैं। वास्तव में वृद्धा की बातें थी। अन्त तक पिता पुत्र को घर का काम बतलाता, कितने ही कुटुम्ब इसके कारण नष्ट हो गए। बड़े गणी अपनी विद्या लेकर मर गये। इस कारण कितने ही वैज्ञानिक आविष्कार, औषधि आदि लुप्त हो गई। पेशों में इतनी प्रतिद्वन्दिता हो गई हैं कि बड़ा छोटे को काम नहीं सिखलाता। सार्वजनिक जीवन में तो इतनी वीभत्सता दीख पड़ती हैं कि चित्त व्याकुल हो जाता हैं। कितना काम बिगड़ता हैं, इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता।
साराँश यह कि ठीक समय से उपयुक्त काम न उठा कर और अपने काम में गर्व न रख कर, उसके करने में दूसरों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को न अनुभव कर, अपने काम की एक तफसील को समझ कर, उसमें दत्त चित्त होकर परिश्रम के साथ उसे स्वयं न कर और उदारता के साथ उसे दूसरों को न सिखा कर हम अपना नाश कर रहे हैं। चारों मित्रों ने एक एक अक्षर हमारे दोष का बतलाया, उन सबको मिलाकर मैंने ऊपर पूर्ण कर दिया। यदि और भी कोई सूत्रवत सत्य जानना चाहे, तो मैं कहूँगा कि हम नागरिक कर्तव्यों और अधिकारों को भूल गये हैं। बड़े से बड़े नेता के होते हुए भी हम साधारण जन उनसे कोई लाभ नहीं उठा रहे हैं। हम उनकी मूर्ति की स्थापना करते हैं, उनका जय जयकार पुकारते हैं और इसी में अपने धर्म और कर्तव्य की इति श्री समझते हैं। हम उनके कहे अनुसार चलते नहीं। उनके आदेशों के अनुरूप अपने जीवन का संघटन नहीं करते यही कारण है कि हम वहीं के वहीं हैं। संसार वेग के अनुरूप अपने जीवन का संघटन नहीं करते यही कारण हैं कि हम वहीं के वहीं हैं। संसार वेग से चला जा रहा हैं, हम तटस्थ हैं, सामने सब कुछ हैं पर हम हाथ पर हाथ दिये किंकर्तव्यविमूढ़ की तरह बैठे हुये हैं। हम किसी दूसरे की खोज में हैं, जो आकर हमारा काम कर दे। दूसरा क्या कर सकता हैं-जब कि हम खुद नहीं कुछ करना चाहतें?
-गृहस्थ गीता
(परमहंस श्री 1008 महात्मा केवलानंदजी महाराज)
साधु दो प्रकार के होते हैं, एक आत्मार्थी दूसरे परमार्थी। प्राचीन काल में परमार्थी साधु ही थे। व्यास, बाल्मीक, धन्वन्तरि, परशुराम, चर, सुश्रुत, नारद, वशिष्ठ, कपिल, कणाद, पातंजलि, शंकराचार्य, चाणक्य आदि संत अपने अपने ढंग से परमार्थ में प्रवृत्त रहते थे। अपने बहुमूल्य परमार्थ के बदले दान रूप में जनता से अन्न वस्त्र ग्रहण करने का उन्हें अधिकार था, उनके लिये यह उचित भी था। अब भी जो संत परमार्थी हों, लोक सेवा के लिए अपना जीवनदान जिन्होंने किया हो उन्हें बदले में भिक्षा या दान लेने का अधिकार है। किन्तु जो लोग आत्मार्थी हैं, अपने स्वर्ग, मुक्ति, आनन्द के लिए कोई साधना उपासना, पूजा पुरुषार्थ करते हैं तो यह उनका एक आध्यात्मिक व्यापार हैं। इसके लिए किसी दूसरे से न तो भिक्षा माँगनी चाहिए और न स्वीकार करनी चाहिए।
यदि कोई साधु जप तप द्वारा स्वर्ग या मुक्ति की कमाई कर रहे हैं तो यह उनका निजी व्यापार हैं आत्मार्थी साधु को अपने भोजन वस्त्र का स्वयं प्रबंध करना चाहिए, क्योंकि यदि उन्हें स्वर्ग मिलता है तो किसी दूसरे को क्या लाभ? और बिना बदला दिये किसी से लेना उचित नहीं यह तो एक प्रकार का कर्ज हैं जिसे चुकाये बिना छुटकारा नहीं मिल सकता। आत्मार्थी साधु को अपनी कमाई पर ही निर्भर रहना चाहिए। जो साधु परमार्थ मार्गी हैं, संसार की भलाई के लिए कोई कार्य करते हैं, वे दीन पर निर्वाह कर सकते हैं।
हम अपने साधु वेशधारी या दान-भिक्षा पर निर्वाह करने वाले अन्य व्यक्तियों को स्पष्ट रूप से बता देना चाहते हैं कि समय के बदलते हुए प्रवाह को आँख खोलकर देखें और अपने आचरणों को दुरुस्त कर लें अन्यथा उन्हें पीछे बहुत पछताना पड़ेगा।
अच्छी आदतें डालने का अभ्यास
गायक जब बाजा बजाने का भली भाँति अभ्यास कर लेता है तो उसे इस बात की जरूरत नहीं पड़ती कि बाजे के स्वर स्थानों पर दृष्टि रखे या उंगलियों को देख कर चलावे। वह गाने पर अपना चित्त लगाता है और दर्शकों की ओर देखता जाता है किन्तु बाजे पर उसका हाथ जहाँ का तहाँ पड़ता है, कहीं जरा भी त्रुटि नहीं होती। जप करने वाले मुँह से मन्त्रोच्चारण करते रहते हैं पर उनका मन दूर दूर उड़ता रहता है। कुम्हार, लुहार, सुनार आदि के हाथ ऐसे सध जाते हैं कि उनका मन उस काम में न लगा हो तो भी उनका शरीर निश्चित कार्य को ठीक प्रकार पूरा करता रहता है। इस प्रकार बिना अधिक सोच विचार किये भी जो कार्य होते रहते हैं उन्हें अभ्यस्त किया या अनैच्छिक क्रिया कहते हैं। हमारे शरीर में इसी शक्ति का सब से अधिक बोलबाला है। हमें मालूम भी नहीं होता के साँस चलती रहती है, दिल धड़कता रहता हैं, खून दौड़ता रहता हैं। लोग समझते हैं कि यह कार्य किसी अदृष्ट शक्ति की कृपा से होते हैं यह अदृष्ट शक्ति और कुछ नहीं हमारे मन का एक गहरा भाग हैं जिसे गुप्त मन-गुप्त मन या (Subconscsnes) कहते हैं।
अपने पूर्व संस्कारों में जकड़ा हुआ मनुष्य जब अपनी इच्छाओं के वशीभूत होकर जन्म लेना चाहता है और गर्भ में प्रवेश करता हैं तब भी यह सुप्त मन क्रिया शील रहता हैं, गर्भ में जैसे ही अनुकूल अंग बने कि गुप्त मन के अभ्यास के कारण रक्त संसार आदि की अनैच्छिक क्रियाएं आरम्भ हुई। घड़ी में चाबी दे देने पर जैसे वह बहुत समय तक चलती रहती है या लट्टू को एक बार फिरा देने से यह बहुत देर अपने आप घूमता रहता हैं उसी प्रकार शरीर की क्रियाएं आरम्भ हो जाती है और जब तक उस यन्त्र में शक्ति रहती हैं कार्य चलता रहता हैं। एक बार साइकिल के पहिये को जोर से घुमा देने पर वह बहुत दूर तक अपने आप दौड़ती चली जाती हैं फिर भी उसका संचालक वही है जो उसकी गद्दी पर बैठा हुआ हैं। उसमें योग्यता हो तो लुढ़कती हुई साइकिल की गति में प्रयत्न पूर्वक परिवर्तन भी कर सकता हैं। कई योगाभ्यासी प्राणायाम द्वारा साँस का चलना और इच्छा द्वारा रक्त का दौड़ना रोक देते हैं। समाधि की अवस्था में यह दोनों या शरीर की अन्य क्रियाएं पूर्ण रूप से बन्द हो जाती हैं और जब योगी चाहता हैं तो फिर चलने लगती हैं।
मन की संकल्प शक्ति में चेतना तो है पर उससे कुछ करते धरते नहीं बन पड़ता। जैसे तुम सोचो कि मेरी आँख आज रात को तीन बजे खुल जाय तो अच्छा हैं परन्तु यह सोच विचार यदि गुप्त मन तक न पहुँचा तो वह विचार हवा में उड़ जायगा और कुछ भी प्रयोजन सिद्ध न होगा किन्तु शरीर की अनैच्छिक क्रिया का अधिपति गुप्त मन यदि अच्छी तरह इस बात को स्वीकार करले कि हाँ, मुझे रात को तीन बजे जागना हैं तो जरूर ही नियत समय पर निद्रा भंग हो जायगी। शरीर के संचालन में अनैच्छिक क्रिया का अत्यन्त महत्व पूर्ण स्थान हैं। बुरी या भली आदतें शरीर और मन दोनों में ही पड़ जाती हैं हम उन्हें छोड़ना चाहते हैं पर छूटती रही कारण यह है संकल्प करने वाला बाहरी मन एक चेतना हैं और भीतरी मन के हाथ में सारी कुँजी हैं। इसलिए इन दोनों मनों के साथ जस्य से जो कार्य होता हैं उसी में सफलता मिलती हैं। हम चाहें तो प्रयत्न पूर्वक इन क्रियाओं में एकता उत्पन्न करके बहुत कुछ लाभ उठा सकते हैं।
जब हम कुछ दिन दिन में दो बार खाते रहते हैं तो नियत समय पर भूख लगती हैं। इसी प्रकार सोने, जागने, शौच जाने आदि के नियम के संबंध अनैच्छिक क्रिया को सूचना दे दी जाती हैं तो नियत समय पर वह काम होने की आदत पड़ जाती हैं। किन्तु यदि उसे कोई सूचना न दी जाय तो भूख आदि की कुछ ठीक व्यवस्था न रहेगी। यदि भोजन का कोई समय निर्धारित न करो और चाहे जब खाते रहो तो कभी सच्ची भूख न लगेगी। देखा गया कि भोज्य पदार्थों में यदि कुछ अपवित्र वस्तु हो या किसी अन्य कारण से घृणा हो जाय तो भूख मर जायगी। बाह्य मन में भले बुरे विचार आते रहते हैं उनका कोई विशेष प्रभाव नहीं होता किन्तु यदि कोई भाव तीव्र होने के कारण गहरे उतर जावे तो उनका प्रभाव तुरन्त ही होता हैं। भय लगने पर बालक गश खाकर गिर पड़ते हैं, क्रोध में एक प्रकार का उन्माद आ जाता हैं और नाड़ियों की चेतनता जाती रहती हैं, धर्म या युद्ध के जोश में लोग सिर तक कटा देते हैं और मरते दम तक दुखी नहीं होते।
हमारा विचार करने वाला बाहरी मन जब बार-बार और गंभीरता पूर्वक किसी बात को स्वीकार करता हैं या नित्य प्रति उस काम को दुहराता हैं तो गुप्त मन उस बात को मान लेता हैं और शरीर को प्रायः उसी साँचे में ढाल देता हैं। यदि शौच जाने के नियत समय का ध्यान रखें तो ठीक वक्त पर मल त्याग की इच्छा होगी। यदि विशेष रुप से कुछ समय पूर्व नियत समय पर साफ दस्त होने का विशेष चिन्तन किया जाय तो निश्चय ही पेट साफ हो जायगा इसी प्रकार यदि उसकी उपेक्षा की जाय और समय को बिलकुल भुला दिया जाय तो अक्सर वह क्रिया निर्बल और शिथिल पड़ जाती हैं और उपरोक्त दोनों बातों में से जिसे भी कुछ काल तक निरंतर किया जाय वहीं स्वभाव में आ जाती हैं।
गुप्त मन को प्रभावित करके उसे सूचना देकर शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है और रोगों से छुटकारा मिल सकता हैं। यदि गुप्त मन को इस प्रकार की सूचनाएं बराबर दी जायें कि “अब मैं निरोग हो गया हूँ और मेरे सब भीतरी अंग ठीक प्रकार काम कर रहें हैं।” तो उस सूचना को वह ग्रहण कर लेगा और ऐसे ही जीवन कोषों की रचना करने लगेगा जो निरोग स्वस्थ तथा सक्षम हों। इसी प्रकार जो लोग बीमारी या रोग का चिन्तन कर करके दुखी होते रहते हैं उनके शरीर में कोष उसी साँचे में ढल जाते हैं। यदि तुम अपने शरीर और मन में अच्छी उपयोगी आदतें उत्पन्न करना चाहते हो तो उचित हैं कि बार बार अपने मन में स्वास्थ्य और आनन्द के विचार करो। अपने को समर्थ समझो और उच्च सत्ता-परमात्मा से प्रेम करके उसके उच्च गुणों को आकर्षित करके अपने अन्दर धारण करो। ऐसा करने से गुप्त मन शरीर और मस्तिष्क में सद्गुण उत्पन्न करेगा।
धैर्य पूर्वक भय का मुकाबला करने से कुछ तो स्वयं ही नष्ट हो जाती हैं। जैसे समुद्र की लहरें पैरों तक आकर लौट जाती हैं।
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जैसे किसी पहाड़ी पर चढ़ना दुर्गम दिखाई देता हैं। उसी तरह विपत्तियों का सामना करना भी असह्य मालूम पड़ता हैं। परन्तु जैसे धीरे धीरे पहाड़ी पर चढ़ जाते हैं, उसी तरह आपत्ति भी आसानी से धैर्य रखने पर धीरे-2 दूर हो जाती हैं।
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जिस कर्त्तव्य से तुम दूर होकर भागते हो, वह तो तुम्हारा सुधार करने वाला है। जिस व्यसन को तुम पकड़ने दौड़ रहे हो, वह तुम्हारा शत्रु हैं।
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मनुष्य जीवन के आधे दुःख परोपकार, पारस्परिक दया उत्साह से निवारण हो सकते हैं।
(जे.-श्री भीकमचन्द कपुरचन्द्रजी पेरवावाला शिवगंज)
आप उसी बात को सोचिए उसी बात को अपनी जबान से निकालिए जिसे चाहते हैं कि वह सत्य हो। बहुत से मनुष्य कहा करते हैं कि भाई! अब हम थक गये, बेकाम हो गये, अब परमात्मा हमें सँभाल ले तो अच्छा हो। वे इस रोने को रोते रहते हैं कि हम बड़े ही अभागे, कम नसीब हैं, हमारा भाग्य फूट गया हैं, दैव हमारे विरुद्ध हैं, हम दीन हैं, गरीब हैं। हमने सिर तोड़ परिश्रम किया, उन्नत होना चाहा, पर भाग्य ने हमें सहायता न दी। पर वे बेचारे इस बात को नहीं जानते कि इस तरह का रोना रोने से, अन्धकारमय, निराशा जनक विचार रखने से, हम अपने हाथ अपने भाग्य को फोड़ते हैं, उन्नति रूपी कौमुदी को काले बादलों से ढ़क देते हैं।
वे यह नहीं जानते हैं कि इस तरह के कुविचार हमारी शान्ति, सुख और विजय के घोर शत्रु हैं। वे यह बात भूले हुए हैं कि इस तरह के विचारों को मन से देश निकाला देने ही में मंगल हैं। ऐसे विचारों को मन में स्थान देना अपने हाथ अपने पैरों पर कुठाराघात करना हैं। कभी एक क्षण के लिए भी अपने मनमें इस विचार को स्थान मत दो के हम बीमार हैं-कमजोर हैं। इस तरह के विचार शरीर पर इनके आक्रमण होने में सहायता देते हैं। हम सब अपने विचारों ही के फल हैं। उच्चता, महानता पवित्रता के विचारों से हमें आत्म-विश्वास प्राप्त होता हैं। ऊँचा उठाने वाली शक्ति मिलती हैं और ऊँचे दरजे का साहस प्राप्त होता हैं।
यदि आप किसी खास विषय में अपनी अपूर्वता कट करना चाहते हैं तो आप अपने अभिलषित विषय में उच्च आदर्श को लिए हुए प्रवेश हो जाइये और तब तक आप अपने अन्तःकरण को वहाँ से तिलमात्र भी मत हटाइये, जब तक आपको यह न मालूम हो जाये कि सफल होने में अब कुछ भी सन्देह नहीं है।
हमारे आदर्श ही हमारे चरित्र के संगठनकर्ता हैं और उन्हीं में यह प्रभाव हैं जो जीवन को वास्तविक जीवन में परिणत करता हैं। जैसे हमारे आदर्श होते, जैसी हमारी मानसिक अभिलाषायें होती हैं, जैसे हमारे हार्दिक भाव होते हैं ठीक उन्हीं की झलक हमारे मुखमण्डल पर दिखाई देने लगती हैं। हो नहीं सकता कि इनका भाव हमारे चेहरे पर न झलके, इनका प्रतिबिम्ब आँखों में न दीखे। अतएव हमें अपने आदर्श को अपने मनो-भाव को अपने विचार प्रवाह को श्रेष्ठता और दिव्यता की ओर झुका हुआ रखना चाहिये। हमें निश्चय पूर्ण विश्वास कर लेना चाहिये कि निकृष्टता, दीनता, निर्बलता, आधि-व्याधि, दरिद्रता और अज्ञान से हमारा कोई सरोकार नहीं। हमें इस बात का दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि हमारे हाथ से हमेशा उत्तम ही कार्य होगा, बुरा कभी न होगा।
हमें अपने जीवनोद्देश्य को सफल करने में श्रद्धा की-आस्था की भी बड़ी आवश्यकता होती है। यदि यों कहा जाय कि मनो-वाँछित पदार्थ का मूल श्रद्धा ही होती है तो कुछ भी अतिशयोक्ति न होगी। यदि यों कहा जाय कि श्रद्धा-आस्था ही हमारे आदर्श की बाह्य रेखा हैं, तो कुछ भी अनुचित न होगा। पर हमें श्रद्धा ही तक न ठहर जाना चाहिये वरन् देखना चाहिए कि श्रद्धा के परे भी कोई पदार्थ रहा हुआ हैं या नहीं? विचार करने से गहरी दृष्टि डालने से मालूम होता हैं कि श्रद्धा, आशा, हार्दिक लालसा आदि मनोवृत्तियों के पीछे एक अलौकिक दिव्य पदार्थ-सत्य-रहा हुआ हैं। यह वह सत्य हैं जो हमारी प्रकृत अभिलाषाओं को सु-स्वरूप प्रदान करता है।
उत्पादक शक्ति का यह एक नियम हैं कि जिसका हम दृढ़ता पूर्वक विश्वास करते हैं, वह हमें अवश्य प्राप्त होता हैं यदि आप इस बात का पक्का विश्वास करें कि हम समृद्धिशाली होंगे, हम प्रभावशाली होंगे, समाज में हम वजनदार गिने जावेंगे, आप में एक प्रकार की विलक्षण उत्पादक शक्ति का उदय होगा और वह आपके मनोरथों पर सफलता का प्रकाश डालेगी।
यदि आप अपने जीवनोद्देश्य को सफल करना चाहते हैं, यदि आप अपने आदर्श को कार्य रूप में परिणत करना चाहते हैं तो आप अपने सम्पूर्ण विचार प्रवाह को अपने उद्देश्य की ओर लगा लीजिये। एक ही उद्देश्य की ओर अपने मन, वचन, काया को लगा देने से संसार में बड़ी-2 सफलतायें प्राप्त होती दीख पड़ती हैं। आप उन पदार्थों की आशा कीजिये जो दिव्य हों, आप यह विश्वास कर लीजिये कि हमारे प्रयत्न उत्साह पूर्वक होने से कोई उच्च दिव्य और महान पदार्थ प्राप्त होने वाला है और हम अपने जीवनोद्देश्य पर पहुँच रहे हैं। आप इस विचार में तल्लीन हो जाइये कि हमारी शाश्वत उन्नति हो रही है और हमारी आत्मा का एक एक परमाणु दिव्यता की ओर बढ़ रहा हैं।
ज्ञानियों की प्रशंसा के बजाय ज्ञानवानों की झिड़कियां ठीक हैं। क्योंकि उनकी झिड़की से मनुष्य को अपने दोष का ज्ञान हो जाता है, परन्तु ज्ञान हीन दोषों को भी गुण बतला कर बड़ाई करते रहते हैं जो कि अत्यन्त हानिकारक होती हैं।
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वस्तुतः विद्वान वहीं भाग्यवान होता हैं जो स्वयं सुमार्ग पर चलकर दूसरों को भी सद्-उपदेश देता रहता हैं।
(श्री वटेश्वर दयालजी शास्त्री, भिण्ड)
क्रोध और आतुरता के मूल में क्या अहंकार नहीं हैं? क्रोध प्रायः तभी आता हैं, जब कोई हमारी इच्छा की पूर्ति नहीं करता। क्या दूसरा मनुष्य इसके लिये बाध्य है? उसे ऐसा समझ लेना क्या अहंकार नहीं हैं? और क्या आतुरता इस बात को नहीं सूचित करती कि मनुष्य समाज को तथा प्रकृति को वश में रखने की सत्ता मुझे प्राप्त हैं? वह सत्ता वास्तव में जिसके पास होती है, उसे आप अधीर और आतुर न पायेंगे। सत्ता शासन के लिए नहीं, कार्य की सुव्यवस्था और सुचारुता के लिए मिलती हैं। सत्ता जहाँ सुव्यवस्था में असफल होती हैं, वहाँ प्रेम की जीत अवश्यमेव होती हैं।
जो अपने प्रति कठोर और साथियों के प्रति सहृदय होता हैं, वह बिना सत्ता के ही शासक हो जाता हैं। उसकी आज्ञाएं प्रेम के संदेश होते हैं और साथी उनके लिए उत्सुक रहते हैं। पर जहाँ अपने प्रति रियायत के विशेषाधिकार का भाव हो और साथियों के प्रति कठोरता का, तो वहाँ सत्ता का शासन भी बेकार होता हैं। उसका पुरस्कार हैं-अप्रतिष्ठा। कड़ाई के साथ नियमों का पालन कार्य का सुचारुता और सुव्यवस्था के लिये अनिवार्य हैं। जो सेवक इसकी उपेक्षा करता है, वह दूसरों के आराम को अपनी सुविधा पर बलिदान कर देना चाहता है।
(ले.-नन्दकिशोर उपाध्याय, बुढ़नसी)
जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ।
मैं बौरि खोजन गई रही किनारे बैठ॥
ईश्वर को ढूँढ़ने के लिए, उसे प्राप्त करने के लिए हम नाना प्रकार के प्रयत्न करते हैं, पर उसे नहीं पाते, कहते हैं कि वह सर्वत्र है, वह सब जगह हैं, पर फिर भी हमें क्यों नहीं दीखता?
उसे प्राप्त करने को धन, वैभव, जीवन तक नष्ट करते हैं, पर पाते नहीं, अन्त में निराश हो कहते हैं कि-ईश्वर नहीं हैं।
भाई ईश्वर हैं! पर उसे खोजने में गलती कर रहे हो, हम उसे धन वैभव से नहीं पा सकते, अगर उसे पाना हैं तो प्रेम करना सीखो प्राणी मात्र से प्रेम करो, जड़ चेतन से प्रेम करो, आत्मा से प्रेम करो।
उसे पाने को जंगल में जाने की, धूनी रमाने की, धन वैभव कष्ट करने की, कोई आवश्यकता नहीं हैं। जब वह सर्वत्र है तो आपके पास भी होगा, होगा नहीं-हैं। कहाँ? आपके शरीर में।
जिसे आप आत्मा कहते हैं क्या आपने कभी अपनी आत्मा की आवाज पर ध्यान दिया हैं? नहीं यही कारण है कि आप उसे ढूँढ़ने पर भी नहीं पाते।
विचार करो! जब तुम बोलते हों, चलते हों, काम करते हों, सोचते हो या शुभ काम करने की प्रेरणा होती है तो वह कहाँ से और कौन करता या कहता हैं? जब तुम किसी को कष्ट पहुँचाने का विचार कर चलते हो और तुम्हें अन्दर से कोई रोकता हैं कि ऐसा न करो वह कौन हैं? वह अपने अन्दर मौजूद हैं, उसे अपने अन्दर ही प्राप्त किया जा सकता हैं।
(स्वर्गीय श्री मनोरमा देवी उपाध्याय की डायरी से)
जहाँ स्वच्छता हैं, कूड़ा कचरा न पड़ा हो, छत पर जाले न लगे हों, दरवाजे और खिड़कियाँ हों, सफाई हो, चीजें सब अच्छी व साफ हो, जहाँ व्यवस्था हो, जगह के लिये चीज हो, चीज के लिये जगह हो, कहीं कुछ इधर उधर न पड़ा हो, हर वस्तु व्यवस्थित हो उसे कहना चाहिये-’गृह मन्दिर!’
जहाँ शान्ति हो, स्त्री पुरुष में प्रेम हो, सेवा और संस्कार हो, स्वच्छता और सौंदर्य व्यापक हो, तथा वातावरण में सर्वत्र स्नेह प्रतीत हो, वही-गृह मन्दिर हैं।
गृह मन्दिर वहीं हो सकता हैं जहाँ स्त्री जाति को हर प्रकार की छूट हो, जैसे घूमने, फिरने, बोलने, हृदय के भाव प्रगट करने, दिल का दर्द सुनाने, बीमार हो तो आराम करने और गर्भिणी हो तो चिन्ता भार से छूट हो।
हम उसे गृह मन्दिर कह सकते हैं जहाँ स्त्री का सम्मान हो, स्त्री जाति को जीवन सहचरी के सब हक हो, जहाँ बालकोँ में प्रेम और शिक्षा हो, जहाँ रूढ़ीवाद न हो, माताओं के लिये मातृत्व का स्थान हो और नारी जाति ईश्वर की शक्ति क्रिया शक्ति के प्रतिनिधि के रूप में समझ कर स्वीकार की गई हों।
गृह मन्दिर में बाल मन्दिर भी समाया हुआ हैं बालक स्वतन्त्र होना चाहिये यानी उन्हें खेलने कूदने की छूट रहना चाहिये, बालक भूत, प्रेत, हौवा के डर से डरपोक न हों। गृह मन्दिर तो वही है जहाँ बालकों को ईश्वर का प्रतिनिधि समझ प्रेम किया जाता हो।
गृह मन्दिर प्रेम का विश्वविद्यालय हो और सृष्टि-सौंदर्य का भाग हो।
(डा. श्याममनोहर अग्निहोली, बीघापुर)
हमारे आस पास जैसी भी भली बुरी वस्तुएं तथा परिस्थितियाँ मौजूद हैं वे हमारी इच्छाशक्ति का कारण है। ईश्वर ने इच्छा की कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ फलस्वरूप यह दृश्य संसार उत्पन्न हो गया इसी प्रकार ईश्वर के पुत्र जीव की जब इच्छा होती है कि मैं अमुक प्रकार की परिस्थितियाँ प्राप्त करूं तो वही उसी प्रकार की परिस्थिति प्राप्त कर लेता है।
यहाँ प्रश्न यह उठता है कि कोई मनुष्य दुख, रोग, शोक आदि नहीं चाहता फिर यह क्यों प्राप्त होते हैं? उत्तर बिल्कुल स्पष्ट है। दुख, रोग, शोक की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है, यह कुविचारों के परिणाम मात्र हैं। जब मनुष्य कुविचारों को अपने मन में स्थान देता है तो अविलम्ब उसका शरीर कुकर्म करने के लिए उत्तेजित होता है और कुकर्मों की पूँछ से बँधे हुए दुख, रोग, शोक भी सामने आ जाते हैं। यह इसकी इच्छा का परिणाम है। यदि वह सुविचारों और सुकर्मों को प्रवृत्त रहे तो दुख शोक उसके पास भी नहीं फटक सकते।
कहते हैं कि माया एवं अविद्या ने मनुष्य को भुलावे में डाल रखा है। वह भुलावा यही है कि हम कुविचार और दुख को पृथक-2 वस्तुएं समझे हुए हैं। वास्तव में यह दोनों एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। अग्नि और उष्णता एक ही वस्तु है इसी प्रकार पाप और दुख भी एक ही हैं, जो पाप की इच्छा करता है समझना चाहिए कि वह दुख की ही इच्छा करता है। इच्छा शक्ति का आकर्षण बड़ा प्रबल है जो जिस वस्तु को चाहता है वह उसे वह वस्तु मिल कर रहती है। हमें यह बात भली भाँति ध्यान रखनी चाहिए कि सद्विचार और सुख एक ही पदार्थ के दो नाम हैं। ईश्वर ने हमें इच्छा शक्ति का ऐसा प्रबल शस्त्र दिया है कि उसके द्वारा सुख, दुख आदि हर एक इच्छित वस्तु प्राप्त कर सकते हैं।
(श्री मंगलचन्द भण्डारी हि.सा. विशारद, अजमेर)
मनुष्य जीवन का अधिकाँश भाग आहार, निद्रा, भय और मैथुन में व्यतीत हो जाता है। शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति में समय और शक्तियों का अधिकाँश भाग लग जाता है। विचार करना चाहिए कि क्या इतने छोटे कार्यक्रम में लगा रहना ही मानव जीवन का लक्ष्य है? यह सब तो पशु भी करते हैं यदि मनुष्य भी इसी मर्यादा के अंतर्गत घूमता रहे तो उसमें और पशु में क्या अन्तर रह जाएगा? सृष्टि के समस्त जीवों में सर्वश्रेष्ठ स्थान पाने कारण मनुष्य का उत्तरदायित्व भी ऊँचा है, जो अपने महान कर्त्तव्य की ओर ध्यान नहीं देता निश्चय ही वह मनुष्यता का महान गौरव प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है।
दुख और अधर्म को हटाकर सुख और धर्म की स्थापना करना मनुष्य जीवन का लाभ होना चाहिए। ईश्वर ने जो योग्यताएं और शक्तियाँ मानव प्राणी को दी हैं उनका सदुपयोग वही हो सकता है कि दूसरों की सहायता की जाए, उन्हें सुखी और उत्तम जीवन बिताने में सहयोग दिया जाए। बेशक, शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए श्रम करना आवश्यक है, परन्तु यह भी ध्यान रखना चाहिए की जीवन निर्वाह की साधारण समस्या को हल करने के उपरान्त जो समय और शक्ति बचती है उसे परमार्थ में संसार की भलाई में लगाना चाहिए।
जीवन एक सार्वजनिक वस्तु है। दूसरों की सहायता से ही हम किसी प्रकार की योग्यता प्राप्त कर पाते हैं इसलिए उस कर्ज को अदा करने के लिए हमें चाहिए कि दूसरों की सुख शान्ति में वृद्धि करें। जो मनुष्य स्वार्थ पर से दृष्टि हटाकर परमार्थ में जितना ध्यान देता है, समझना चाहिए कि वह उतना ही जीवन का सद्व्यय कर रहा है।
कुछ दीर्घ जीवी महानुभावों ने अपने दीर्घ जीवन का रहस्य अपने अनुभव के आधार पर बताये हैं। पाठकों के लाभार्थ उन अनुभवों को नीचे प्रकाशित किया जा रहा है इन अनुभवों से लाभ उठाकर अन्य महानुभाव भी उन्हीं की तरह सुन्दर स्वास्थ्य के साथ दीर्घ जीवन प्राप्त कर सकते हैं।
प्रोफेसर कर्वे, उम्र 81, वर्ष पूना- ‘खूब भ्रमण करो। नियमित रूप से सुबह-शाम को टहलो। चाय की आदत न डालो।’
रेट बोर्न अमरीका, उम्र 72 साल-’पैरों से चलने-फिरने के कारण मुझमें जवानी का जोश अब तक कायम हैं। मैं अब भी प्रति सप्ताह पचास मील से अधिक चलता हूँ। पैदल चलने के कारण ही मैं जिन्दगी का आनन्द लूट रहा हूँ। घूमने से हाजमा सुधरता हैं, शरीर के विकार नष्ट होते हैं और फेफड़े अच्छी तरह कार्य करने लगते हैं। घूमना सबसे सरल और प्राकृतिक व्यायाम हैं। चाल में फुर्ती होनी चाहिये। चाय, काफी, शराब और सिगरेट से मुँह मोड़ लीजिये।’
बैजमिन, उम्र-114 वर्ष-’कर्म खाओ, ज्यादा चबाओ, सवारी पर कम बैठो, पैरों से खूब चला, गाली कम दो, हँसो ज्यादा और खूब सोओ। चिन्ताओं को हँस-हँस कर टाल दो, पेट के साथ ज्यादती न करो। शाकाहारी बनो।’
लुई क्रेमर, 70 वर्ष-गत 50 वर्ष से मैं खूब घूमता रहा हूँ। पिछले 23 वर्ष से तो मैं रोज 30-40 मीलों चला हूँ। शराब पीना मैंने बहुत वर्षों से छोड़ दिया हैं और चाय, काफी तथा तम्बाकू से मुझे नफरत हैं। शाम को दूध, भाजी और फल मेरे लिए पर्याप्त होते हैं। बिना छाने आटे की रोटी मैं लेता हूँ। पेय पदार्थों में पानी, दूध और फलों का रस मुझे प्रिय हैं। जो जीवन से निराश हो चुके हैं। उनको मेरी सलाह हैं, ‘घूमना शुरू करो, पगडंडी पकड़ लो और स्वास्थ्य के उच्चतम शिखर पर चढ़ जाओ।’
डॉक्टर मेंचनी कौफ, बलगेरिया-’दही और मट्ठे का प्रयोग बहुत लाभदायक हैं, क्योंकि ये अंतड़ियों में पहुँचकर उनको शुद्ध करते हैं।’
बलगेरिया में दीर्घ-जीवियों की संख्या अधिक हैं और उनके जीवन तथा आहार का अध्ययन करके डॉक्टर साहब इस परिणाम पर पहुँचे हैं।
विक्टर डेन-’उत्तेजक मनोविकारों से दूर रहो। उनसे उम्र घटती है, चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और हमारे शरीर में तरह-तरह के विष पैदा हो जाते हैं। घृणा, कामुकता, क्रोध और द्वेष इत्यादि तीव्र मनोविकारों से अपने को बचाओ।’
डॉक्टर बरसन मैकफैडन, अमरीका-’अपने दाँतों से अपनी कब्र मत खोदो। अत्यधिक खाने से आदमी कम जीता है।
डॉक्टर शाहू, नागपुर-’पिण्डखजूर खाओ। इससे कब्ज दूर होगा। गरम मसाले, मिर्च, चाय, तम्बाकू और शराब से दूर रहो।’
श्री वासुदेवराव गणेश जोशी, पूना-’सुबह चार बजे से 6 बजे तक नित्यप्रति टहलो। जब मन में उदासी का अनुभव हो, अन्न छोड़कर-केवल दूध का सेवन करो।’
लगमाण्णा कोकर्ण, बेलगाँव, उम्र 80 वर्ष ‘खेतों की शुद्ध हवा में रहो, दूध पियो और ताजी शाक-भाजी का सेवन करो। भोजन करते समय पानी बिल्कुल न पियो। ठंडे जल से स्नान करो दांतों को शुद्ध रखो, रात को जल्दी सोओ और सुबह जल्दी उठो।’
शेख इस्माइल, नागापट्टम, उम्र 226 वर्ष-’खूब घूमो, चाय, सिगरेट, बीड़ी, तमाखू आदि से परहेज करो।’
एक ईरानी, उम्र 126 वर्ष-’खूब घूमिए, खूब दूध पीजिये, खूब खाइये और खूब प्रसन्न रहिये। बेफिक्री और अलमस्ती दीर्घ-जीवन की कुँजी हैं।’
विश्राम के मानी है शरीर में जंग लगाना। परिश्रम को भार मत समझो। श्रम ही पूजा है।
सरदार फीरोज दस्तूर-’नियमित रूप से आहार करो। प्रातःकाल उठो। सदा प्रसन्न रहो। दुःखों को भी हँसते हुए सहन करो। शराब और तमाखू हानिकारक हैं। खूब घूमो।’
जाहिद पाल, अवस्था 115 वर्ष-’मैंने अपनी आयु के प्रथम 40 वर्ष केवल खजूर और पानी पर बिताये थे।’
सालाक ममोसा, अवस्था 205 वर्ष-’मैंने जीवन भर घास के अतिरिक्त और कुछ नहीं खाया हैं। अपने लिए मैं स्वयं घास उखाड़ता हूँ और स्वयं पकाता हूँ। कभी-कभी परिवर्तन के लिए कच्ची घास भी खाता हूँ।
सर दिनशावाचा, अवस्था 90 वर्ष-’मैं 5 बजे सबेरे उठता हूँ और रात को नियमित समय पर सो जाता हूँ। ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ का अनुयायी हूँ। मेरे घूमने ने मेरे स्वास्थ्य को स्थाई बनाने में बड़ी सहायता पहुँचायी हैं। मैं खेलना भी पसन्द करता हूँ।’
मिसेज केथराइन प्रकेट अवस्था 112 वर्ष-’मैं अपनी रहन सहन में सदा से सादी रखती चली आ रही हूँ और कामों में काफी दिलचस्पी लेने की मेरी आदत हैं।
सर तेमुल जी, अवस्था 87 वर्ष-’मैं खान-पान में सदा से संयमी रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि मुझे कितना खाना चाहिए, क्या खाना चाहिए, कब खाना चाहिए और कैसे खाना चाहिए। मैं नियमित रूप से व्यायाम करता हूँ। इस उम्र में भी मैं खूब घूमता हूँ डंड-बैठता लगाता हूँ। 75 वर्ष की उम्र तक दवा की एक बूँद की भी मुझे आवश्यकता नहीं मालूम हुई। मैं सबेरे उठ जाता हूँ। हमें यह न भूल जाना चाहिए कि शरीर के साथ अन्याय करने से उसका पाप हमें भुगतना पड़ेगा। देर से या जल्दी ही।’
सर नसरवान जी, अवस्था 73 वर्ष-मैं तड़के उठता हूँ और तभी से अथक परिश्रम आरम्भ कर देता हूँ। शारीरिक व्यायाम मनुष्य को युवा बनाये रखने में बड़ी सहायता पहुँचाते हैं। मैंने जवानी में जो व्यायाम किये, उसका मजा इस बुढ़ापे में लूट रहा हूँ। व्यायाम अनेक रोगों की अर्व्यथ औषधि हैं,किन्तु जिस समय मन और शरीर दोनों थक जाते हैं उस समय व्यायाम कदापि न करना चाहिए। नियमित रहने की आदत अच्छी हैं।’
मिसेज पीटर ड्रमंड, अवस्था 100 वर्ष-’मेरा जन्म अच्छे वंश में हुआ हैं। मैंने अपने शरीर को सदैव काम में लगाये रक्खा हैं। जीवन में जो अच्छी वस्तुएं हैं मैंने उन सबका उपयोग किया हैं। मद्यपान से मैं घृणा करती हूँ।’
सर होती मेहता-दीर्घजीवी होना मेरे हाथ की बात हैं। खूब खेलना और मस्त रहना स्वास्थ्य-वर्धक हैं। मैं कहीं भी होऊँ 5। 1/2 बजे सुबह जरूर उठ जाता हूँ। मैं काम करने में सुख अनुभव करता हूँ और पेंशन लेने की कल्पना भी नहीं करता। मैं कभी खतरनाक बीमारी का शिकार नहीं हुआ। मुझे दवाओं पर तनिक विश्वास नहीं हैं। जब कभी मुझे शरीर में कुछ खराबी मालूम होती हैं, मैं भोजन त्याग देता हूँ और उपवास करने लगता हूँ। उपवास में जल खूब पीता हूँ रात में अधिक जागना हानिकारक हैं। खुली हवा में अधिक रहो। दिल को हँसी-खुशी से उछालते रहो, मनहूसियत से सदा दूर रहो। अधिक भोजन करने से उम्र घटती है।’
इस्तम्बोल का जारा आगा, अवस्था, 160 वर्ष-’मेरी दीर्घायु का रहस्य मेरा संयमी जीवन हैं मैंने केवल शाक-भाजी और फल खाकर इतनी लम्बी उम्र पाई हैं।’
जार्ज बर्नार्डशा, अवस्था 86 वर्ष-धूम्र पान या मद्यपान न करने के कारण ही मुझमें एक युवक जैसा रक्त चाप हैं। मैं कट्टर शाकाहारी हूँ और डाक्टरों से सदा बचता रहता हूँ।’
मिसेज एक स्टन्सन, अवस्था 112 वर्ष-’मेरे दीर्घजीवन का रहस्य है काम करना और संतुष्ट रहना।’ -’जीवन सखा’
(पं. तुलसीराम शर्मा, सितारी)
किसी एक प्रसंग पर लक्ष्मी जी ने कहा है-
स्थिता पुण्यवताँ गेहे सुनीतिपथवेदिनाम्।
गृहस्थानाँनृपाणाँ वा पुत्रवत्पालयामितान्॥ 19॥
नीति मार्ग पर चलने वाले, पुण्य कर्म करने वाले गृहस्थ व राजाओं के यहाँ मैं टिकती हूँ और ऐसों का मैं पुत्र के समान पालन करती हूँ।
गृहान् यास्यामि देवानाँ युष्माकं चाज्ञया द्विजाः।
येषाँगेहं नगच्छामि श्रृणुध्वं भारतेषु च॥ 20॥
(ब्रह्मवैवर्त पु. 3। 23)
तुम ब्राह्मणों की आज्ञा से दवों के गृह में मैं जाऊँगी। जिनके घर न जाऊँगी उनको सुनो।
मिथ्यावादीचयः शश्वनध्यायीचयः सदा।
सत्वहीश्च दुश्शीलोनगेहं तस्ययाम्यहम्॥ 21॥
मिथ्यावादी, धर्म ग्रन्थों में न दिखने वाला, पराक्रम से हीन, खोटे स्वभाव का, ऐसे पुरुषों के गृह में मैं नहीं जाती।
सत्यहीनः स्थाप्यहारी मिथ्या साक्ष्य प्रदायकः।
विश्वसघ्नः कृतघ्नो वायामि तस्यनमन्दिरम्॥ 22॥
सत्य से हीन की सी की धरोहर मारने वाला, झूठी गवाही देने वाला, विश्वास देकर मुकरने वाला, ऐसों के घर मैं नहीं जाती।
चिन्ताग्रस्तो भयग्रस्तः शत्रुग्रस्तोऽतिपातकी।
ऋणग्रस्तोऽति कृपणो न गेहं यामिपापिनाम्॥ 23॥
चिन्ताग्रस्त, भयग्रस्त, शत्रुग्रस्त, पातकी, कर्जदार, अधिक कंजूस ऐसे पापियों के घर मैं नहीं जाती।
दीक्षाहीनश्चशोकार्त्तोमन्दघीः स्त्रीजितः सदा।
नयास्यामि कदागेहं पुँश्चल्याः पतिपुत्रयोः॥ 24॥
गुरु से हीन, शोक ग्रस्त, मंदबुद्धि, स्त्री का गुलाम, व्यभिचारिणी का पति और पुत्र ऐसे पुरुष के यहाँ मैं कदापि नहीं जाती।
योदुवीक् कलर्हावष्टः कलिः शश्वद्यदालाये।
स्त्रीप्रधाना गृहेयस्य यामितस्यनमंदिरम्॥ 25॥
कटुभाषी, कलहप्रिय, जिसके घर निरन्तर कलह होता रहे, जिसके यहाँ स्त्री की चलती रहे ऐसे पुरुष के यहां मैं नहीं जाती।
यत्रनास्ति हरेः पूजातदीय गुणकीर्तनम्।
नोत्सुकस्तत्प्रशंसायाँयामि तस्यतमन्दिरम्॥ 26॥
जहाँ भगवान की पूजा और कीर्तन नहीं, भगवान की प्रशंसा में उत्सुकता नहीं ऐसे घर में मैं नहीं जाती।
सात्विक सहायताएं
इस मास ज्ञान यज्ञ के लिए निम्नलिखित महानुभावों ने अपनी धर्म उपार्जित कमाई में से निम्नलिखित सात्विक सहायताएं भेजी हैं। अखण्ड ज्योति इसके प्रति अपनी आन्तरिक कृतज्ञता प्रकट करती है।
15) श्रीमती महारानी साहिबा मैनपुरी स्टेट।
11) पं. जगन्नाथ प्रसाद शर्मा वाय।
5) हवलदार भीमराव युद्ध सैनिक।
4) श्री श्रीनाथ जी बजाज मिर्जापुर।
2॥) श्री भीलचन्द वर्मा वकील धरमपुरी।
2) श्री धर्मपाल सिंह जी रुड़की।
2) श्री चन्द्रभान गुप्ता शाहाबाद।
(लेखक-कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर, अनुवादक-साहित्य-रत्न श्री सुधीन्द्र बी. ए.)
(1)
यदि संध्या बढ़ती आती है गति मन्द मन्द मन्थर चलकर।
संगीत रुक गया हैं दिन का उसके इन नीरव इंगित पर।
साथी-संगी भी नहीं एक सूना-सा हैं अनन्त अम्बर।
यदि अंग-अंग में भी तेरे आई है गहरी क्लाँति उतर॥
जाग्रत हैं अन्तर में तेरे यदि निस्वर आशंका महान।
सोये हैं सारे दिग दिगन्त अपने अवगुण्ठन श्याम तान॥
मेरे विहंग, अंधे विहंग, पर पंख अभी तू बन्द न कर।
(2)
अब भी मेरे आगे विहंग! हैं रात बड़ी लम्बी-दृभर।
सम्मुख सुदूर अस्ताचल पर हैं अब भी ऊंघ रहा दिनकर॥
संसार सकल निश्वास रोक एकान्त स्तब्ध-आसन ऊपर।
रजनी के ये धीमे-धीमे है एक-एक गिन रहा पहर॥
तिर अंधकार सागर अकूल, कढ़ अभी अभी ही लिए बाँक
पश्चिम-दिशान्त पर वह सुदूर हैं क्षीण चंद्रमा रहा झाँक॥
मेरे विहंग, अंधे विहंग, पर पंख अभी तू बन्द न कर।
(3)
तारागण अम्बर में ऊपर अँगुलियों से इंगित कर कर।
तेरी ही ओर निहार रहे अपनी अनिमेष दृष्टि रख कर॥
नीचे अधीर गंभीर मरण शत-शत लहरों से लहर-लहर।
तेरी ही ओर दौड़ता हैं उद्वेलित, उछल उछल कर॥
वे किन्तु न जाने कौन वहाँ हैं खड़े हुए बहु दूर, पार।
कर जोड़ करुणा अनुनय करके ‘आओं-आओं!’ करते पुकार!
मेरे विहंग, अंधे विहंग, पर पंख अभी तू बन्द न कर!
(4)
भय नहीं, मीति भी नहीं अरे, ने स्नेह-मोह का पाश ।
आशा न यहाँ, आशा केवल छल हैं जग में-झूठा- ।
मुँह में न अरे वाणी नहीं कोई बैठना वृथा न ।
टिक रहने को घर-बार नहीं फूलों की सेज ॥
हैं पंख, पंख बस विद्यमान, फैला आँगन-सा ॥
हैं निबिड़ भयावह अन्धकार, हैं कहीं न ऊषा- ।
मेरे विहंग, अन्धे विहंग, पर पंख अभी तू बं ।
*समाप्त*