स्वर्ग प्राप्त करना बहुत ही सरल है!

स्वर्ग का द्वार हर मनुष्य के लिए खुला हुआ है। जो चाहे सो उसमें बड़ी आसानी के साथ प्रवेश कर सकता है। परमात्मा ने श्रेष्ठ, शुभ और पुण्य कार्यों को बड़ा ही सरल बनाया है, इस राजमार्ग पर चलने का हर कोई अधिकारी हैं। झूठ बोलने में बहुत सोचने समझने, विचारने और संभल संभल कर बात करने की जरूरत होती है परन्तु सत्य बोलने में जरा भी खटपट नहीं। चोरी करने के लिए बड़ी तिकड़म लड़ानी पड़ती है परन्तु ईमानदारी से रहना बेहद आसान है, एक कम बुद्धि का आदमी भी ईमानदारी का व्यवहार बड़ी सुगमता से कर सकता है इसमें उसे कुछ भी परेशानी न उठानी पड़ेगी। इसी प्रकार जुआ व्यभिचार, ढोंग, छल आदि में पग पग पर कठिनाई पड़ती हैं परन्तु पावन कर्तव्यों का पालन करते रहना बेहद आसान है, उसमें कोई आपकी बदनामी या कठिनाई नहीं है।

लोग समझते हैं कि असत्य का, पाप का रास्ता सरल और सत्य का, धर्म का रास्ता कठिन है परन्तु असल बात ऐसी नहीं है। नरक के द्वार तक पहुँचने में बहुत कठिनाई है और स्वर्ग का द्वार सड़क के किनारे है जहाँ हर कोई बड़ी आसानी के साथ पहुँच सकता है। यह द्वार हर किसी के लिए हर घड़ी खुला रहता है। आप चाहें तो आज ही-अभी ही, उसमें बे रोक टोक प्रवेश कर सकते हैं। अपने अन्तःकरण को टटोलिए, आत्म निरीक्षण कीजिए, आपके अन्दर जो ईश्वरीय दिव्य तेज जगमगा रहा है उसके दर्शन कीजिए विवेक के प्रकाश में अपनी सद्भावनाओं और सद्वृत्तियों की सम्पत्ति को तलाश कीजिए यही आपकी अमर सहचरी है। यह अप्सराएं आपको क्षण भर में स्वर्ग के दरवाजे तक पहुँचा सकती हैं।


‘मैं-अकेला’ या ‘हम-सब’

आध्यात्म शास्त्र की सम्पूर्ण रचना केवल एक आधार पर हुई है। वह आधार है-’आत्मोन्नति,’ आत्मोन्नति को तात्पर्य है आत्मभाव का अहंभाव का विस्तार। जब कोई अपने धन को बढ़ा लेता है तब कहते हैं कि उसने आर्थिक उन्नति की है, कोई अपने ज्ञान को बढ़ा लेता है तो कहते है उसने बौद्धिक उन्नति की है, इसी प्रकार देह को हृष्ट पुष्ट कर लेना शारीरिक उन्नति कही जा सकती है। उन्नति का तात्पर्य बढ़ोतरी से है, जिसकी जिस दिशा में बढ़ोतरी होती है उसे उसी दिशा में उन्नत हुआ कहा जा है। आत्मोन्नति का तात्पर्य आत्मभाव में बढ़ोतरी होना है। जब तक मनुष्य अपने को अकेला समझता है, अपने अकेले के हित अनहित की बात सोचता है तब तक वह आत्मिक दृष्टि से पतित समझा जाता है। उसे स्वार्थी, खुदगर्ज, मतलबी आदि नामों से पुकारते है किन्तु जब वह आत्मोन्नति करता है तो “मैं-एक” के स्थान पर हम- “सब” का विचार करता है।

शास्त्रों में अनेक स्थानों पर ऐसा अभिमत प्राप्त होता है कि ‘जो अकेला खाता है वह पाप खाता है। जो अपने लिए सोचता है वह नरक सोचता है। ब्रह्म विद्या का मूल भूत तथ्य यह है कि मनुष्य स्वार्थ के बन्धनों से ‘मुक्ति’ प्राप्त करे। आत्मा को परमात्मा से मिला दे। जीव से बढ़ कर शिव बने, तुच्छता से उठकर महान बने, यही सभी आदेश एक ही दिशा में संकेत करते हैं कि अपने पन के- आत्मिकता के-दायरे को बढ़ाना चाहिए। ‘मैं’ की संकुचितता को बढ़ा कर ‘हम’ की महानता की ओर अग्रसर होना चाहिए। यह मर्यादा जैसे-2 बढ़ती जाती है वैसे ही वैसे मनुष्य की आत्मोन्नति समझी जाती है। जो मनुष्य खुदगर्जी के जितने तुच्छ दायरे में विचरण करता है वह उतना ही अनात्मवान् है जो परमार्थ में स्वार्थ के सिद्धाँत को मानता हुआ दूसरों के हानि लाभ में अपना हानि लाभ देखता है वह उतना ही बड़ा आत्म ज्ञानी है।

ब्रह्म विद्या समस्त विद्याओं की जननी है, आत्मोन्नति सब उन्नतियों की जड़ है, यह सिद्धाँत इतने ध्रुव सत्य हैं कि इनकी सच्चाई पर संदेह करने की जरा भी गुँजाइश नहीं रह जाती। जब किसी व्यक्ति, जाति या देश ने जिस हद तक इन सिद्धाँतों को अपनाया है तब उसने उसी सीमा में भौतिक उन्नति की है, जब जिस देश ने इन सिद्धाँतों को जितना ढीला छोड़ा है तभी वह उतना ही नीचे गिर गया है। यूरोपीय देशों की उन्नति और भारत की अवन्नति का भी यही कारण है।

भारतवर्ष के पतन के कारणों पर आप गंभीरता से विचार करेंगे तो आपको वैसा कोई दुर्गुण यहाँ के निवासियों में न मिलेगा जिनके कारण राष्ट्रों की दुर्गति होती है। हमारा देश बौद्धिक उन्नति में अपना सानी नहीं रखता, यहाँ ऐसे-2 आला दर्जे के दिमाग थे और हैं जिनका मुकाबला करने में संसार के अन्य देश अभी तक पीछे हैं। यहाँ के निवासी बहादुरी में भी अद्वितीय हैं, प्राचीन काल की बहादुरी की गौरवगाथाओं से इतिहास रंगा हुआ है, आज भी भारतीय सेना युद्ध में जो जौहर दिखा कर रही है उसकी भूरि भूरि प्रशंसा करते-2 हमारे शासक थकते नहीं। मरहटे आर सिख पिछली शताब्दियों में अद्वितीय कूट क्षितिज रहे हैं, आज भी राजनीति के ऐसे ऐसे पंडित मौजूद हैं जिनकी सूक्ष्म दृष्टि असाधारण है। यदि ये लोग किसी स्वतंत्र देश में हुए होते तो उनने अपनी प्रतिमा से संसार को चकित कर दिया होता। साधारण जनता पर दृष्टि डालिए तो वह विलासी या अकर्मण्य भी नहीं हैं। पूर्वकाल में तो धार्मिक अधिक होने के कारण और वर्तमान समय में दरिद्रता के कारण यहाँ की जनता भोग विलासों में मस्त नहीं हो पाई। कड़ा परिश्रम करने में भी भारतीय अद्वितीय हैं, सस्ते से सस्ता अपौष्टिक भोजन खाकर यहाँ के किसान मजूर जितना काम करते हैं उतना काम अन्य देशों के श्रम जीवी नहीं कर पाते। कई लोग जैन और बौद्धों द्वारा प्रचलित अत्यन्त अहिंसा को देश के पतन का कारण मानते हैं, परन्तु यह बात भी ठीक नहीं, क्योंकि जिन दिनों जैन और बौद्ध धर्म भारत में अपनी पूर्ण उन्नति पर थे, राज धर्म थे, उन दिनों भी यवन, शक और हूणों के आक्रमण भारत पर हुए थे, परन्तु उस समय कोई भी आक्रमणकारी सफल न हुआ, फिर आज जब कि कहने मात्र की अहिंसा ही लोग मानते हैं उसके कारण इस प्रकार पतित अवस्था को प्राप्त नहीं हो सकते।

यों तो छोटे मोटे अनेक कारण बताये जा सकते हैं, पर ऐसे कारण तो स्वतंत्र और समृद्ध देशों में भी हैं। दूध का धुला कोई समाज या राष्ट्र नहीं है। थोड़े बहुत दोष सर्वत्र पाये जाते हैं, वैसे दोष यहाँ भी रहे हैं और रहेंगे पर वे इतने प्रचंड नहीं हैं जिनके कारण सारा देश इतने गहरे गर्त में गिर पड़े। अत्यन्त गंभीरतापूर्वक आप विचार करेंगे तो इसका कारण एक ही मिलेगा वह है-आत्मिक पतन-खुदगर्जी-अपना दायरा संकीर्ण रखना। यह दुर्गुण जिस दिन से भारत वासियों ने अपनाया उसी दिन से पतन आरम्भ हो गया। यह दुर्गुण इतना जबरदस्त है कि इसके आगे और सारी अच्छाइयाँ फीकी पड़ जाती हैं।

अंग्रेजी राज्य की भारत में स्थापना किस प्रकार हुई इसका सूक्ष्म अध्ययन जिनने किया है वे जानते हैं कि ईस्ट इंडिया कम्पनी के जितने भी गवर्नर यहाँ आये उनमें से कोई भी ऐसा न था जिसने अपने देश के लाभ को भुलाकर अपने निजी लाभ की बात सोची हो। यदि क्लाइव, हेस्टिंग्स आदि ऐसा सोचते तो वे कम्पनी को धता बता कर अपना खुद का राज्य स्थापित कर सकते थे, परन्तु उन्होंने ऐसी बात स्वप्न में भी नहीं सोची। वे खुद मामूली नौकर बने रहे पर अपने देश के लाभ के लिए उन्होंने यहाँ साम्राज्य स्थापित किया, व्यापार बढ़ाया और भी जो कुछ कर सकते थे, किया। यदि वे खुद राजा हो जाते तो वे खुद जरूर बड़े आदमी होते परन्तु सारे इंग्लैण्ड को उससे कुछ लाभ न होता आज भी अंग्रेज लोग व्यक्तिगत लाभ की संकीर्ण परिधि में शारीरिक और मानसिक परिश्रम नहीं करते वरन् अपने समाज और राष्ट्र के लाभ को ध्यान में रखते हुए विचार और कार्य करते हैं। वहाँ के वैज्ञानिक नेता, उद्योगपति, विद्वान, सैनिक और साधारण जनता अपने देश के हित अनहित में अपना हित अनहित समझते हैं, व्यक्तिगत स्वार्थ की अपेक्षा सामूहिक स्वार्थ को वे अधिक महत्व देते हैं। यही कारण है कि वह देश समृद्ध और सम्पन्न बना हुआ है, जब तक उनमें यह सद्गुण बना रहेगा तब तक वे निश्चयपूर्वक सुखी रहेंगे। अन्य सब दुर्गुण इस एक गुण की छाया में ढ़क जाते हैं।

हमारे देश में हर व्यक्ति अपने अकेले के स्वार्थ को महत्व देता है। अपने या अपने बाल बच्चों के हानि लाभ से आगे उनकी दृष्टि जाती ही नहीं। अनेक अमीर लोग जब निस्संतान होते हैं तो उन्हें यह चिन्ता पड़ती है कि हमारे धन को कौन खरचे विलसेगा, मानो इस देश में किसी सार्वजनिक कार्य के लिए पैसे की जरूरत है ही नहीं। उनका ध्यान अपने देश और जाति की दुर्दशा को दूर करने के लिए अपना धन लगा जाने की ओर नहीं जाता वरन् कहीं से गोद रखने के लिए लड़के की तलाश होती है जिससे उस धन का खरचने विलसने वाला कोई पैदा हो जाए। यह भावना हर एक क्षेत्र में जोर पकड़ती जा रही है। आध्यात्मिक या धार्मिक क्षेत्र में देखिए-हर धार्मिक व्यक्ति अपनी निजी मुक्ति, निजी स्वर्ग की तृष्णा से एक कदम भी आगे नहीं बढ़ता। साधु, महात्मा, गुरु, पुरोहित अपने समय को बुरी तरह बरबाद करना पसंद करते हैं पर अपने समाज और देश की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते। फल यह होता है कि चन्द आदमी धनी, विद्वान, प्रतिभाशाली, गुणी, सिद्ध आदि बन जाते हैं, वे अपने निजी उन्नति खूब कर लेते हैं। पर उनकी इस उन्नति से देश को कुछ भी लाभ नहीं पहुँचता। जितने धनी, विद्वान और महात्मा इस देश में हैं इतने यदि किसी अन्य देश में हुए होते तो आज वह संसार का मुकुट मणि हुआ होता, संसार की सुख शाँति का पथ प्रदर्शक हुआ होता।

हमारा देश गरीब है, गुलाम है, दुखी है, पीड़ित है, इसका सर्वोपरि कारण हम लोगों की संकुचित स्वार्थवृत्ति है। “अपने मतलब से मतलब” की मनोवृत्ति ने हमें मिट्टी में मिला दिया। जब तक यह घृणास्पद, नारकीय और पाशविक मनोवृत्ति हमारी बनी रहेगी तब तक चन्द आदमी व्यक्तिगत रूप से कुछ ‘बड़े’ भले बन जावें पर सामूहिक रूप से हम लोग पीड़ित और पतित ही रहेंगे। सामूहिक उन्नति तभी होगी जब मनुष्य ‘मैं-अकेला’ की मर्यादा में सोचना छोड़कर “हम-सब” की मर्यादा में सोचना और काम करना आरम्भ करेंगे। ‘सब की उन्नति में अपनी उन्नति’ की मनोवृत्ति में वह जादू है जिसके द्वारा समाज की भी उन्नति होती है और व्यक्ति की भी। इंग्लैण्ड आदि देश इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

पाठको, विचार करो! विवेक को जागृत करके सोचो! अध्यात्म शास्त्र के इस एक मात्र-सूर्य से प्रकाशवान-ध्रुव से अटल-सिद्धान्त को समझो। सबकी उन्नति में आपकी उन्नति है इसलिए केवल व्यक्तिगत लाभ की दृष्टि से ही काम न करो वरन् यह भी सोचो कि कार्य का परिणाम हम सब के लिए क्या होगा। “मैं अकेला” से बढ़कर “हम-सब” की ओर आपकी जितनी प्रगति होगी, उतनी ही आपकी आत्मोन्नति गिनी जाएगी। याद रखो, जिस देश की जितनी आत्मोन्नति होगी वह उतना ही सुखी और समृद्ध होगा। देश के सुख में ही व्यक्ति का सुख भी निहित है। दुखी पड़ोसियों के बीच रहकर कोई बड़ा आदमी भी शान्तिपूर्वक सुख नहीं भोग सकता। इसलिए हे सुख शान्ति के इच्छुकों! हे अध्यात्म विद्या के जिज्ञासुओं! उठो घर घर में मनुष्य में यह भाव भर दो कि वह खुदगर्जी के बन्धनों को तोड़ कर परमार्थ रूपी मुक्ति की ओर बढ़े, आत्मा का दायरा बढ़ा कर उसे परमात्मा बनावे। मैं-अकेला’ की निकृष्ट नारकीय वृत्ति को छोड़ कर “हम-सब” की दिव्य भावनाओं को अपनावे। इसी मन्त्र में हमारा और हमारे समाज का उत्थान निहित है।


Quotation

मैं किसी के विश्वासों को सुनने के लिये तैयार हूँ पर उसके सन्देहों को नहीं।

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अपनी प्रतिभा का हर क्षण ख्याल रखो, इसके बदले वह तुम्हें प्रति घड़ी नया मार्ग सुझावेगी।

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आशावादी मनुष्य प्रायः सदा सफल होता है, कारण उसका मन इस चिन्ता से मुक्त रहता है कि अमुक बात नहीं हो सकेगी।


प्रतिघात और प्रतिकूलता

(डॉक्टर रामचरण जी महेन्द्र एम. ए. डी. लिट् (अमेरिका)

पराक्रमी व्यक्ति का जीवन पुष्प प्रतिघात एवं प्रतिकूलता की झंझावात में प्रस्फुटित होता है, संसार के विकट प्रहारों में परिपुष्ट होता है, और भयंकर परिस्थितियों में ही फलित भी हो जाता है। मानव मन की रचना कुछ ऐसी है कि उसकी असाधारण शक्तियों के विकास एवं अभ्युदय के निमित्त विकट प्रसंगों की परम आवश्यकता है। यदि वातावरण सरल रहे, तो मनुष्य की उत्कृष्ट शक्तियों के प्रकाश का अवसर कम है। विकट परिस्थितियों, कठोर प्रतिकूलता, सैंकड़ों विघ्न इन आन्तरिक शक्तियों को अन्तःकरण के भीतरी पट से प्रकाश में लाते हैं। स्थूल दृष्टि से जनसाधारण को जो विघ्न, अनिष्ट एवं कठोर प्रसंग प्रतीत होते हैं वे ही मनुष्य की गुप्त शक्तियों को उपयुक्त उत्तेजना प्रदान करते हैं।

क्या तुमने कभी इस तत्त्व पर विचार किया है? तुम्हारे जीवन में अनेक प्रतिघात एवं प्रतिकूलताएँ उपस्थित हुई। उनके प्रति तुम्हारी कैसी भावना रही। तुम तनिक सी प्रतिकूलता से व्यग्र हो उठे, घबराकर कायर बन बैठे, अन्तःकरण में तुच्छ विघ्नों से भयभीत बनकर बुज़दिल बन गये। इस प्रकार तुमने अपने हृदय में स्थित ईश्वरत्व को नष्ट कर दिया। तुमने प्रतिघात से प्रोत्साहन प्राप्त नहीं किया। वस्तुतः तुम्हें उन्नति की उत्तेजना प्राप्त नहीं हुई। तुम आज वहीं हो जहाँ से चले थे।

तनिक-तनिक सी प्रतिकूलताओं से व्यग्र होकर असंख्य मनुष्य पशु स्थिति में दिनों को धक्के दे रहे हैं। उनमें अद्भुत शक्तियाँ अन्तर्निहित हैं किन्तु वे यों ही व्यर्थ पड़ी पड़ी नष्ट हो रही हैं। उनका परिमार्जन नहीं किया गया अतः वे कुँठित हो गई और उन्होंने शनैः शनैः अपना व्यापार बन्द कर दिया। जो कुछ ये व्यक्ति प्राप्त कर सकते थे उसका एक क्षुद्र अंश ही प्राप्त कर सके। उनका उत्साह क्षीण हो गया और गुप्त सामर्थ्य का आदि स्त्रोत भी शुष्क हो गया। सामान्य प्रसंग और साधारण जीवन से मनुष्य की दिव्य शक्तियों का विकास नहीं होता। अन्तःकरण और इच्छा की अद्भुत शक्तियां ऊपरी परत (Lair) में नहीं रहतीं वे भीतरी पट में छिपी रहती हैं। हमारी उत्कृष्ट शक्तियों का केन्द्र स्थान भी यही मर्मस्थल है। अतएव आन्तरिक शक्तियों को प्रोत्साहित (Stimulate) करने के निमित्त किसी ऐसी चोट की परम आवश्यकता है जो शक्ति का स्त्रोत पुनः खोल दे।

एक बार महा पद्मानन्द ने चाणक्य के भरी सभा में लात मारी। इस अपमान से चाणक्य की सुप्त इच्छा और संकल्प की शक्तियाँ झंकृत हो उठीं। मर्मस्थल पर प्रहार से आन्तरिक शक्तियों को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ उसका असामान्य (श्वफ्ह्लह्ड्ड-शह्स्रद्बठ्ठड्डह्ब्) पराक्रम प्रकट हुआ। प्रतिशोध को उत्तेजना मिली। उसने उसी समय राज दरबार में प्रतिज्ञा की और कहा-”ओ, राजकुलंक महानंद! तूने भरी सभा में एक निरपराध ब्राह्मण की अवहेलना की है। इसका प्रतिशोध तुझसे चाहे कुछ हो अवश्य लूँगा।” फिर भरी सभा की ओर मुख करके बोला-हे सभासदों! मैं चाणक्य हूँ। महानन्द ने आज मेरा तिरस्कार किया है। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि जब तक नन्दवंश की ईंट से ईंट न बजा लूँगा तब तक मेरी चोटी इसी प्रकार खुली रहेगी और नागिन बनकर नन्दवंश को डस जाएगी।” ब्राह्मण के इस भयंकर संकल्प को सुनकर समस्त सभा सशंकित हो उठी। चाणक्य के मार्ग में अनेक प्रतिघात एवं प्रतिकूलताएँ आई किन्तु उसने संकल्प न छोड़ा। उद्देश्य पूर्ति में तत्पर रहा अन्त में उसने जैसा कहा था वैसा ही कर भी दिखाया। गौतम की साधना में प्रतिकूलता पर विजय प्राप्ति के अनेक ज्वलंत उदाहरण दृष्टिगोचर होते हैं। प्रताप के निरन्तर प्रयत्न महमूद गजनवी के 18 आक्रमण अनेक प्रतिघातों के अनन्तर सिद्धि को प्राप्त हुए थे।

यदि तुम कार्य सिद्धि के लिए निकले हो तो प्रतिघात एवं प्रतिकूलता की डरपोक विचारधारा को मनोमन्दिर में लाकर उसे कलुषित न करो। प्रतिकूलता के अवसर पर पुरुषार्थ द्वारा आत्म शक्ति को प्रकट करो। आन्तरिक शक्ति को जागृत करो। ये कठिन प्रसंग तो तुम्हारे परीक्षक हैं। क्या तुम इतनी सरलता से परीक्षा में फेल होना पसन्द करोगे? कदापि नहीं। सच्चे आत्मबन्धु ही ऐसे अवसरों पर चमक उठते हैं। गुप्त सामर्थ्य प्रकट होने का यही समय है। सामान्य व्यक्ति ऐसे अवसरों पर कुचल जा कर अवनति को प्राप्त होते हैं।

न प्रतिघात, न कोई प्रतिकूलता, न निरन्तर आने वाले विघ्न हमें अपने मनःस्थित गुप्त सामर्थ्य से वंचित कोई नहीं कर सकता। शक्तियों के उस अटूट भण्डार पर हमारा पूर्ण अधिकार है। उस शक्ति पुंज से हमारा अखण्ड सम्बन्ध है। कोई ऐसी ताकत नहीं जो हमें शक्ति के उस अगाध पुंज से दूर रखे। हाँ, प्रतिघात से वे सब हिल अवश्य उठती हैं, उत्तेजना प्राप्त कर लेती हैं और उस गहन स्थल से प्रकाशित होने को तैयार रहती हैं। जब मनुष्य को अपमान, पराभव, विफलता, तथा हास्य या और किसी प्रकार का प्रसंग उत्तेजना प्रदान करता है तो यकायक वे प्रकट हो जाती हैं। नरसिंग मेहता की अपूर्व भक्ति के प्रकट होने का कारण उनकी भौजाई के मार्मिक वचन थे। ध्रुव को उनकी सौतेली माँ ने इसी प्रकार की उत्तेजना प्रदान की थी। कालीदास और तुलसीदास को उनकी पत्नियों ने। सब ही शक्तियाँ मौजूद तो पहले ही से थीं। उत्तेजना के अवसर की आवश्यकता थी। प्रतिघात से उत्तेजना और उत्तेजना से आत्मशक्ति का प्रकटीकरण हुआ।

अपने को असमर्थ एवं अशक्त मानने वाला व्यक्ति कहता है-”हे प्रतिघात, तू मुझ बेचारे को क्यों तंग करता है। मैं जीवन में कुछ महत् कार्य करना नहीं चाहता। यों ही मन्दगति से घिसटते घिसटते रोते रोते जीवन समाप्त करूंगा। मैं श्रेष्ठ व्यक्ति नहीं बनना चाहता। मैं तो नगण्य हूँ। तुच्छ हूँ। रुकावटों और असंख्य बाधाओं का मारा हुआ थर थर काँपने वाला गरीब आदमी हूँ।” सामान्य व्यक्ति बस ऐसी क्षुद्र भावना के वशीभूत होकर स्वयं आप ही अपना शत्रु बन जाता है। वह ऐसे अपवित्र अनुपयोगी विचारों के कारण अपने ऊपर आने वाले घात प्रतिघातों को और आमन्त्रित करता है।

जिस व्यक्ति में दृढ़ निश्चय और गुप्त सामर्थ्य प्रकट हो जाते हैं वह चाहे अस्सी वर्ष का वयोवृद्ध ही क्यों न हो जाए मरण पर्यन्त जीवन में आश्चर्यकारक शक्तियों का उद्घाटन करता रहता है। वह अपने मन ही मन सोचा करता है कि “मुझे जीवन में एक ऐसा अद्भुत कार्य करना है कि संसार विस्मृत न करना चाहेगा। मुझ में गुप्त मनःशक्ति का पर्याप्त प्रादुर्भाव हो गया है। मेरी आत्मा में वह सामर्थ्य वृद्धि हो रही है कि कोई मुझे दबा नहीं सकता। मेरा मन पर्याप्त पुष्ट है, महान् है, दुःख, क्लेश, प्रतिकूलता पर विजय प्राप्त करने वाला है। मेरे लिये सब कुछ सम्भव है। मैं जो चाहूँ कर सकता हूँ। मेरी आत्मिक शक्तियाँ दैदीप्यमान होकर परम तेजोमय हो रही हैं।” इस प्रकार की संजीवनी शक्ति के शुभ विचारों में रमण करता करता ऐसा व्यक्ति उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होता जाता है। उसकी आत्मा में महान् भद्र, शुभ संकल्प ही उदित होते हैं वस्तुतः वह बड़ा सामर्थ्यशील बन जाता है।

जिस व्यक्ति ने यह दृढ़ निश्चय कर लिया है कि मैं अत्युच्च बनूँगा। सौभाग्य, समृद्धि, आत्मिक पूर्णता प्राप्त करूंगा, वह अवश्य एक न एक दिन अपने मानसिक प्रवाह को अनन्त शक्ति के महासागर की ओर प्रवाहित कर देगा और अपने आदर्श अपनी अभिलाषा के अनुकूल उपयुक्त वातावरण उत्पन्न कर लेगा।

अत्यन्त अल्प संख्यक व्यक्ति इस तत्त्व को जानते, मानते या विश्वास करते हैं कि मन के साहसिक संकल्प में कितनी राजब की ताकत भरी पड़ी है। वस्तु जगत में आने वाली प्रत्येक साधारण या असाधारण वस्तु की प्रतिमा सर्वप्रथम मानस क्षेत्र में निर्मित होती है। यदि मनुष्य किसी अत्युच्च पदार्थ को अपनी मानसिक सृष्टि में भली भाँति निर्माण करे तो दृश्य सृष्टि में वह उसे और आकर्षक रूप प्रदान कर सकेगा।

जिस प्रकार सुन्दर बीज बोने से उत्तम फसल बनती है इसी प्रकार बलवान् विचारधारा से मनुष्य में प्रतिघात और प्रतिकूलता से युद्ध करने का पुरुषार्थ प्रकट होता है। ऋद्धि सिद्धि को प्राप्त करने का आदि स्थल मनुष्य के मन में स्थित है, वहीं से उसे प्रकट करने का प्रयत्न करना चाहिए।

प्रतिकूलता तथा प्रतिघात से हम सदैव बाजी जीतेंगे-ऐसी भावना पर मानसिक केन्द्र दृढ़ करो। मन में दृढ़तापूर्वक कहो-हम विपत्ति से विचलित कदापि नहीं होते, प्रतिकूलता से कभी नहीं डरते। इन्हें पराजित करने के लिए हममें शक्ति है। हम में वही अद्भुत शक्ति है जो महापुरुषों में थी अतः अब मैं अस्त व्यस्त कदापि न होऊँगा प्रत्युत अपनी अन्तःस्थित आध्यात्मिक शक्ति के बल पर अत्यन्त वेग से अग्रसर हूँगा। अल्पज्ञान के कारण मैं अन्तःस्थित अगाध सामर्थ्य को अवश्य प्रकट करूंगा। अभी तो मेरी शक्तियों का कुछ ही अंश प्रकट हुआ है। असली कार्य तो मैं अब प्रारम्भ करूंगा।”

“मैं जान गया हूँ कि विपत्ति, प्रतिघात और प्रतिकूलता तो मनुष्य की जड़ता को दूर करते हैं फिर उत्तेजना प्रदान कर उसके चैतन्य अंश को प्रोत्साहित करते हैं। जो कार्य श्रीमान् व्यक्ति अनुकूल दशा में सम्पादन नहीं कर सकते वहीं कार्य साधारण व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थिति में पूर्ण कर डालते हैं। बस, आज से मैं जागृत हो गया हूँ।”

प्रतिकूलता और प्रतिघात हमारे शत्रु नहीं, मित्र हैं। ये हमारी गुप्त शक्तियों का साक्षात्कार कराते हैं।


आस्तिकता की निशानी

(जोजफ मेजिनी)

ईश्वर के अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि हमारा अस्तित्व है। हर आदमी अपने अन्तःकरण में एक ऐसी सत्ता अनुभव कर सकता है जो उसे धर्म का आदेश दिया करती है। बेशक, मैं इस बात को मानता हूँ कि लोगों ने आज के जमाने में ईश्वर को बड़ा ही घृणित और भयानक बना दिया है, तो भी ईश्वर है, इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता। विश्व का कण कण उसके अस्तित्व की गवाही दे रहा है।

जब ईश्वर है तो नास्तिकता कैसे आरम्भ हुई। इस प्रश्न पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के उपरान्त मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि जिस आदमी ने अपना पाप अपने सजातियों से छिपाया सबसे पहला नास्तिक वह था, यह फिर जिसने अपने किसी भाई के हक को मार कर अत्याचार किया वह पहला नास्तिक था। जो भी हो, यह दो ही श्रेणियाँ नास्तिकों की हैं और वे आज तक विद्यमान हैं।

कहने को तो उस आदमी को नास्तिक कहते हैं जो ईश्वर सम्बन्धी अमुक सिद्धान्त को या अमुक पुस्तक को नहीं मानता। परन्तु ऐसे आदमी को मैं नास्तिक नहीं कहता। किसी मजहबी सिद्धाँत को या पुस्तक को मानना न मानना नास्तिकता का चिन्ह नहीं वरन् यह है कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे के हक को मारे, उसकी स्वतंत्रता को आप हरण करें और पापी होते हुए भी धर्मात्मा बनने का ढोंग करे। जिसका ईश्वर पर सच्चा विश्वास है जो उसे सर्व व्यापक और अन्तर्यामी समझता है वह न तो बेईमान हो सकता है न ढोंगी। मेरा विश्वास है कि सच्चे ईश्वर भक्त वे ही हैं जिनका जीवन पवित्र और सेवामय है। जो ईश्वर को अपने चारों ओर भीतर और बाहर देखता है पाप करने की हिम्मत भला वह किस प्रकार कर सकेगा?


गौ हत्या को रोको

(महामना पं. मदनमोहनजी मालवीय)

गौ के समान उपकारी जीव मनुष्य के लिए दूसरा कोई भी नहीं है। अति प्राचीन काल से ही गौ ने मनुष्य जाति को सुखी और समृद्ध बनाने में बहुत बड़ा काम किया है। मनुष्य के लिए सर्वोत्तम आहार अर्थात् दूध गौ ही देती है; और गौ के बछड़े ही हमारे खेतों को जोतते और हमारे लिए अस्त्र-वस्त्र पैदा करते हैं। इसके सिवा अन्य कितने ही प्रकारों से गौ हमारा उपकार करती है। सर्वप्रथम भारतवर्ष के ऋषियों ने ही गौ दूध की महिमा को ठीक-ठीक जाना और गौ को लोकमाता कह कर उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की। संसार के सब से प्राचीन ग्रन्थ वेदों ने गौ को अवधनीय कहा है। अर्थात् यह वह है जिसकी कोई हत्या न करे भारतवर्ष में सर्वत्र हिन्दुओं द्वारा गौ पूज्य मानी जाती है और वास्तव में करोड़ों मनुष्य यथावत इसकी पूजा करते हैं। सचमुच यह बड़े दुःख की बात है कि ऐसे देश में वर्तमान शासन की अवस्था में अनेक वर्षों से बे-रोकटोक गौओं की हत्या होती रहने के कारण गोवंश का बड़ा ही भीषण ह्रास हुआ है। अकेले कलकत्ते में एक वर्ष में एक लाख गाय, बैल और भैंस की हत्या हुई हैं। अभी तक कुछ वर्ष ही पहले बम्बई के समीप बान्द्रा के कसाई खाने में कत्ल की जाने वाली गौओं की संख्या बढ़ती-बढ़ती 63000 तक बढ़ गई। इस प्रकार विविध स्थानों में गौओं की जो हत्या होती है उसके सिवाय हरियाणा तथा अन्यान्य स्थानों से विदेश में जो गाएँ भेजी जाती हैं उससे भी गौओं की संख्या बहुत घट गई हैं। गत 3 वर्षों में राज-पूताना और आस-पास के प्रदेशों में जो दुर्भिक्ष पड़ा उससे भी कितनी ही गायें नष्ट हो गई। उसका परिणाम यह हुआ है कि भारत में हमारे बच्चों को चाहे वे हिंदु, मुसलमान, सिख या ईसाई कोई हों, पर्याप्त दूध नहीं मिलता और इस कारण बच्चों की मृत्यु-संख्या बहुत बढ़ गई है। यह बात बहुत पहिले से ही सिद्ध है कि बच्चों की शारीरिक बाढ़ के लिये दूध का मिलना जरूरी है। हमारे देश के लोगों के शरीर बहुत ही कृश और कमजोर हो गये हैं, क्षय रोग दिन-दिन विशेष कर स्त्रियों में बढ़ता जा रहा है। भारत में अपने जीवन के पहिले ही वर्ष में मरने वाले बच्चों की संख्या 1000 में 198 है। इंग्लैंड जापान और डेनमार्क में यही संख्या केवल 50 है। भारत में औसत आयु 23 वर्ष है और इंग्लैंड में 52 वर्ष है। इंग्लैंड में औसत हिसाब से प्रत्येक मनुष्य को आधा सेर दूध मिलता है अमेरिका में सवा सेर, स्विट्जरलैंड में 1 पाव और भारत में केवल 1 छटाँक। इसी तरह मक्खन की खपत इंग्लैंड में हर साल प्रति आदमी 12 पौंड है, अमेरिका में 17 पौंड, स्विट्जरलैंड में 13 पौंड, कनाडा में 27 पौंड और भारत में केवल 2 पौंड।

दूध की इस कमी के मुख्य चार कारण हैं-

1. दूध देनेवाली गौओं की बे रोकटोक हत्या।

2. अच्छे साँडों की कमी।

3. शहरों के लिये दूध इकट्ठा करना और शहर में सब जगह पहुँचाने के लिये शहर के बाहर डेरियों का इन्तजाम न होना।

4.ग्रामों के लिये पर्याप्त गोचर भूमि का अभाव।

गोचर भूमि के सम्बन्ध में यहाँ यह ध्यान दिलाना है कि इंग्लैंड में जोतने योग्य भूमि का लगभग आधा हिस्सा गाय-बैलों के लिये चरने को छोड़ा जाता है। न्यूजीलैंड में एक-तिहाई हिस्सा जापान और जर्मनी में छठा हिस्सा और भारत में केवल 27 वाँ हिस्सा ही इस काम के लिये छोड़ा जाता हैं। इस छोड़े हुए हिस्से का भी कुछ हिस्सा गाँव के लोग जोत ही लेते हैं। परिणाम यह होता है कि गौएं जब वृद्ध हो जाती हैं, तब किसान उनका खर्च नहीं चला सकते और वे कसाई या गुमाश्तों के हाथ बेच दी जाती हैं। भारतीय कृषि विषयक रायल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है-”गोवंश के सुधार में बातें मुख्य 2 हैं उनको खिलाना और अच्छी नस्ल पैदा करना। खिलाने के विषय को हम पहला स्थान देते हैं। क्योंकि अच्छी नस्ल पैदा करने के सम्बन्ध में कोई महत्वपूर्ण सुधार तब तक नहीं हो सकता है, जब तक गाय बैलों को आज की अपेक्षा अच्छा-अच्छा खाना न खिलाया जाए। कमीशन ने यह भी लिखा है कि बहुत से साथियों ने गोचर भूमि वृद्धि को ही आवश्यक बताया है। अभी की हमारी कलकत्ते की यात्रा में ग्वालों के प्रतिनिधियों ने हमसे कहा कि हम लोग एक एक गाय को कसाई के हाथ से बचा सकते हैं, यदि हमें पर्याप्त गोचर भूमि मिल जाए। दूध देने वाली गौओं की हत्या रोकने के सम्बन्ध में मैंने एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट की ओर ध्यान दिलाया था यह कमेटी बम्बई सरकार ने नियुक्त की थी। कमेटी ने लिखा-”कमेटी की यह राय है कि आज की अवस्था में जब दूध देने वाली गाय, भैंस दूध के लिये शहर के अन्दर ही रखी जाती हैं उपयोगी पशुओं की हत्या रोकने के लिये कानून का होना आवश्यक है।” कमेटी का यह भी कहना है कि यदि प्राँतीय सरकारें, म्युनिसिपैलिटियाँ आदि शहरों के बाहर ऐसे डेअरी केन्द्र स्थापित कर सकें, जहाँ ग्वाले दूध उत्पन्न न करे अच्छी गौओं की उत्पत्ति बढ़ाकर पालन करें। और वृद्ध गौओं को भी तब तक खिलावें जब तक वे फिर से दूध न देने लग जाए तो उपयोगी पशुओं की हत्या का प्रश्न बहुत कुछ आसान हो जाएगा और कुछ समय में रह ही न जाएगा। अर्थात् कमेटी की यह राय है कि उपयोगी दूध देने वाले’ पशुओं की हत्या शहर में जो गाय-बैलों के गोठ हैं उन्हीं का प्रत्यक्ष परिणाम है। और कमेटी का यह दृढ़ता-पूर्वक कहना है कि गोठों की पद्धति बदल कर शहर के बाहर दूध उत्पादन का प्रबन्ध होना चाहिये। दूध देने वाले पशुओं की रक्षा और इस प्रान्त के दुग्ध व्यवसाय की सन्तोषजनक उन्नति के लिये जो कुछ भी प्रयत्न किया जाएगा उसमें सबसे पहिला और सबसे महत्वपूर्ण काम यही है।

मैं एक्सपर्ट केंटल कमेटी की यह सिफारिश प्राँतीय सरकार, म्युनिसिपैलिटियों और जिला बोर्डों के सामने रखता हूँ। यह कहा जाता है कि देश में 1000 गौशालाएँ, डेअरी-फार्म और पिंजरा पोल है, तथा 1 करोड़ रुपया प्रतिवर्ष इन संस्थाओं के लिये खर्च किया जाता है, यदि ये सब गौशालाएँ एक सूत्र में आबद्ध हों और जहाँ सम्भव हो वहाँ एक साथ काम करें तो जनता को शुद्ध और सस्ता दूध दे सकती हैं और साथ ही गौओं को बचा सकती हैं। जहाँ गौशालाएं और पिंजरापोल न हों वहाँ उनकी स्थापना यथा सम्भव शीघ्र होनी चाहिये।


Quotation

इस संसार में रहने का सच्चा तत्वज्ञान यही है कि प्रतिदिन एक बार खिलखिला कर हँसना चाहिये। अपनी तरफ से उद्योग की पराकाष्ठा करनी चाहिये और किसी भी बात को अधिक महत्व नहीं देना चाहिये।

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सन्मार्ग पर चलते हुए अगर लोग बुरा कहें तो यह उससे अच्छा है कि लोग तुम्हारी प्रशंसा करें।

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खोया हुआ धन उद्योग से फिर प्राप्त होगा, नष्ट हुआ आरोग्य मिताहार से फिर मिलेगा, भूला हुआ ज्ञान अभ्यास से फिर ताजा होगा। परन्तु खोया हुआ घण्टा क्या किसी ने फिर देखा है या खोया हुआ अवसर फिर पाया है?


सफलता का पिता-आत्मविश्वास

क्या आपने अपनी महत्ता पर कभी विचार किया है? यदि किया होगा तो आप जानते होंगे कि मानव प्राणी तुच्छ नहीं महान है। परब्रह्म परमात्मा का अमर राजकुमार जिसका निर्माण सत् चित् आनन्द तत्वों से हुआ है, कदापि तुच्छ नहीं हो सकता। संसार के महान पुरुषों का इतिहास पढ़ो तुम देखोगे कि उनका आरंभिक जीवन सर्वथा असहाय, असुविधापूर्ण और अन्धकार-मय था तो भी उन्होंने महानतम कार्यों का सम्पादन का डाला। यह सब किसी भूत प्रेत या देव दानव की कृपा से नहीं हुआ वरन् उन महापुरुषों ने अपनी निजी शक्तियों को विकसित किया और उन्हीं की सहायता से उन्नति के उच्च शिखर पर जा पहुँचें। जीव तत्वतः ईश्वर का ही पुत्र है उसमें अपने पिता की सम्पूर्ण योग्यताएं बीज रूप से समाई हुई हैं। यदि वह अपनी शक्तियों को जाने उन पर विश्वास करे और दृढ़ता के साथ प्रयोग करे तो निस्संदेह ऐसे ऐसे काम कर सकता है जिन्हें देखकर अचंभा करना पड़ता है। पागल और अपाहिजों को छोड़कर शेष सभी मनुष्यों में करीब करीब एक सी योग्यताएं होती हैं। ‘करीब करीब’ शब्द का प्रयोग हम इसलिए कर रहे हैं कि जो असाधारण अन्तर दिखाई पड़ता है वह वास्तविक नहीं है। एक ऐसा व्यक्ति जिसकी योग्यताएं आरम्भ में बहुत थोड़ी दिखाई पड़ती हैं। अभ्यास और लगन के द्वारा अपनी शक्तियों और योग्यताओं को कुछ ही समय में अनेक गुनी उन्नत कर सकता है पूर्व समय में जो लोग असाधारण शक्तियों और योग्यताओं से सम्पन्न हुए हैं एवं जो वर्तमान समय के प्रतिभाशाली महापुरुष हैं उन्हें यह शक्तियाँ कहीं बाहर से दानस्वरूप प्राप्त नहीं हुई हैं उन्होंने अपने प्रयत्न से अपने ही भीतर से उनका उत्पादन किया है। दस किसानों को एक से खेत, एक से साधन, एक से बीज दिये जायें और फिर फसल के समय खेत की पैदावार का निरीक्षण किया जाए तो प्रतीत होगा कि जिसने शारीरिक और मानसिक परिश्रम ठीक तौर से किया उसकी पैदावार अधिक हुई, जिसने आलस्य और मूर्खता को अपनाया वह घाटे में रहा। इसमें बीज या खेत को दोष नहीं दिया जा सकता। परमात्मा ने अत्यन्त परिश्रम के साथ मानव शरीर की रचना की है, यह उसकी सर्वोत्कृष्ट कृति है। अपनी अकर्मण्यता का दोष परमात्मा पर लगाना बहुत ही अनुचित बात है, जो यह कहते हैं कि-”क्या करें, परमात्मा ने हमें ऐसा ही बनाया है” वे अपने दोषों को परमात्मा पर थोपने का धृष्टता पूर्वक दुस्साहस करते हैं। कोई मनुष्य चार हाथ, चार पाँव, दो सिर लेकर नहीं जन्मा है। जैसा शरीर और मस्तिष्क तुम्हारा है, वैसा ही और लोगों का भी था या है। फिर कोई कारण नहीं कि जैसे महत्वपूर्ण कार्य पूर्व पुरुष कर चुके हैं या वर्तमान समय में कोई व्यक्ति कर रहे हैं वह तुम नहीं कर सको। मनुष्य शक्तियों का पुँज है। उसके रोम रोम में अद्भुत शक्तियाँ हिलोरें ले रही हैं, कुबेर का खजाना उसके पास जमा है, किन्तु अज्ञान के कारण वह उसे न जानता है न अनुभव करता है न काम में लाता है।

कहते हैं कि एक सिंह का बच्चा भेड़ों के झुण्ड में पाला गया। जब बड़ा हुआ तो वह भी घास खाने लगा और भेड़ों की तरह मिमियाने लगा। बहुत दिन बाद जब उसे किसी सिंह से भेंट हुई तो उसने उसे समझाया कि तू वन का राजा सिंह है। तब वह बच्चा अपने असली स्वरूप को समझ कर वनराज की तरह रहने लगा। हम लोग ऐसे ही सिंह शावक हैं जो घास खाते और मिमियाकर बोलते हैं। “क्या करें, हमारा शरीर ठीक नहीं, हमारी बुद्धि अल्प है, हमारा कोई सहायक नहीं, हमें साधन प्राप्त नहीं, हम उन्नति कैसे कर सकते हैं?” जो लोग ऐसा कहते हैं वे अपनी असली वाणी को भूल कर भेड़ों की बोली बोलते हैं। “मेरी कलम खराब है इसलिए इस लेख का लिखना अधूरा ही छोड़ रहा हूँ” यदि लेखक यह कहे तो पाठक समझें कि यह सिर्फ बहानेबाजी है या तो इसमें इतनी योग्यता नहीं कि कलम को सुधार सके या फिर यह लिखने की क्षमता नहीं रखता। कलम खराब होना, यह कोई ऐसा कारण नहीं है कि सदा के लिए लिखना बन्द कर दिया जाए। यदि लेखक में लिखने की शक्ति हैं तो कलम की खराबी रूपी छोटी सी बाधा को वह आसानी से हल कर लेगा, उसे सुधारने का कोई न कोई उपाय कर लेगा। साधनों का अभाव होने की शिकायत कुछ अधिक महत्व नहीं रखती क्योंकि जिसके अन्दर कार्य-कारिणी शक्ति है वह साधनों को भी सुधार लेगा या पैदा कर लेगा। जो अपने को असहाय या अशक्त समझता है असल में वह साधनों और सुविधाओं की तो झूठ मूठ शिकायत करता है वास्तविक कमी उसमें आत्मविश्वास है। जो अपना महत्व समझता है, अपनी छिपी हुई अनेकानेक शक्तियों का ज्ञान रखता है, जिसे अपने आत्मिक बल पर भरोसा है, वह क्यों शिकायत करेगा? वह तो अकेला और साधन रहित होने पर भी उठ खड़ा होगा और “फरियाद” जैसे दुर्गम पर्वतों को चीर कर “शीरी” के लिए नहर खोद लाया था उसी प्रकार वह अपने मनोवाँछित उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए घोर प्रयत्न करने में प्रवृत्त होगा। जो अपनी सहायता आप करता है ईश्वर भी उसी की सहायता करता है। जिसको अपने ऊपर विश्वास है उसे हम प्रतिज्ञापूर्वक विश्वास दिलाते हैं कि दुनिया में चारों ओर से उसे विश्वसनीय सहायता प्राप्त होगी।


सत्य पर पर्दा नहीं पड़ सकता

(महात्मा जेम्स ऐलन)

वर्तमान युग बौद्धिक संघर्ष का युग है इसमें दार्शनिक, साम्प्रदायिक, नैतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक विषयों के ऊपर घनघोर मुठभेड़ें हो रही हैं। अपने पक्ष का समर्थन करने और दूसरे को परास्त करने में हर तरफ से प्रयत्न हो रहे हैं। इस समय बौद्धिक जगत में ऐसा महायुद्ध हो रहा है जैसा सृष्टि के आदि से लेकर अब तक कभी भी न हुआ था।

इस तूफान को देखकर एक साधारण जिज्ञासु क्षुब्ध हो उठता है। तर्क, कल्पना और विचारों की उड़ान ऐसे ऐसे मानसिक इन्द्रजाल रचकर खड़े कर देती है जिससे साधारण बुद्धि मोह में पड़ जाती है और वास्तविकता को समझना कठिन मालूम देता है। दो विरोधी पक्ष ऐसे ऐसे तर्क उपस्थित करते हैं कि झूठ और सच का पता लगाना बड़ा जटिल हो जाता है।

यह विषम स्थिति बड़े व्यामोह में डालने वाली है तो भी निराश होने की कोई बात नहीं है क्योंकि सत्य का सूर्य स्वयं इतना तेजस्वी है कि तर्क और कल्पनाओं के बादल उसके प्रकाश को पूर्ण रूप से ढ़क देने में समर्थ नहीं हो सकते। मनुष्य के अन्तःकरण में एक ऐसी चेतना है जो सत्य और असत्य का निर्णय करने में पूर्णतया समर्थ है। यह हो सकता है कि कोई प्रचंड तार्किक व्यक्ति अपने से कम ज्ञान वाले को अपनी तर्क शक्ति से निरुत्तर कर दे तो भी वह निरुत्तर हुआ व्यक्ति यह अनुभव कर सकता है कि क्या उचित है क्या अनुचित? क्या सत्य है क्या झूठ? आत्मा सत्य से परिपूर्ण है, वह सत्य को भली प्रकार पहचान सकती है। आज बौद्धिक संघर्ष का धुँआ चारों ओर घटा की तरह छाया हुआ है तो भी मेरा विश्वास है कि इससे सनातन सत्य पर कुछ भी आघात नहीं पहुँच सकता।


मंत्र-शक्ति का रहस्य

(श्री मन्त्रयोगी)

मंत्र शक्ति से कभी कभी ऐसे काम होते देखे और सुने जाते हैं जिनसे असाधारण आश्चर्य होता है। अत्यन्त विषैले सर्प जिनकी फुंसकार से ही मनुष्य मर सकता है, मंत्र शक्ति से कीलित होकर रस्सी की तरह पड़े रहते हैं और कुछ हानि नहीं पहुँचाते। जिस सर्प ने मनुष्य को काटा है उसे ही मंत्र शक्ति से बुलाकर काटे हुए स्थान से विष चुसवा कर रोगी को अच्छा कर देना कई सर्प विद्या विशारदों का बाँए हाथ का खेल होता है। जहरीले बिच्छू जिनका डंक लगते ही मनुष्य बेचैन हो जाता है, मंत्र शक्ति से निर्विष हो जाते हैं, डंक की पीड़ा मिनटों में अच्छी हो जाती है। पागल सियार या कुत्ते के काटे हुए जहरीली मक्खियों या कीड़ों के काटे हुए लोग भी इसी प्रकार ठीक होते देखे गये हैं। मधुमक्खियों को मंत्र शक्ति से निर्विष करके लोग उनका शहद बड़ी सुगमतापूर्वक निकाल लेते हैं।

कमलवाय, पीलिया, तिल्ली, पारी के ज्वर कंठमाला, मृगी, उन्माद आदि रोग मंत्र द्वारा ठीक होते देखे जाते हैं। बच्चों के पसली चलना, अधिक रोना, दूध पटकना, चौंक पड़ना, सूखते जाना आदि बहुत से रोग भी इसी विधि से ठीक होते देखे गये हैं। भूत बाधा, प्रेत पिशाच आदि के उपद्रव आदि का भी मंत्रों द्वारा शमन होता है। मंत्रों द्वारा हानि भी पहुँचाई जाती है किसी को बीमार कर देना, मतिभ्रम पैदा कर देना, द्वेष करा देना, वश में कर लेना आदि हानिकारक उपचार भी किये जाते हैं और जरूरत पड़ने पर बुद्धि को सुधारने में मानसिक शक्तियों को श्रेष्ठ एवं उन्नतिशील बनाने में भी इसका प्रयोग किया जाता है, हम ऐसे व्यक्तियों को जानते हैं जिन्होंने मंत्र शक्ति से अनेक पगले, अधपगले, भुलक्कड़, जड़, मूढ़, शठ और दुष्टों के जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन उपस्थित कर दिया है। इसके अतिरिक्त और भी असंख्य प्रकार के भले बुरे कार्य मंत्र शक्ति से होते हैं और होंगे।

इन सब बातों को देखते हुए यह प्रश्न उपस्थित होता है कि ऐसे आश्चर्यजनक कार्यों का मूलस्रोत क्या है? यह शक्ति कहाँ से आती है और किस प्रकार काम करती है? मंत्रों की शब्द रचना पर मामूली तौर से दृष्टिपात करने पर यह पता नहीं चलता कि इनके उच्चारण में ऐसी क्या विशेषता है जिनके द्वारा वह अद्भुत शक्ति उत्पन्न हो जाती है। मन्त्रों की वाक्यावली में से कोई ऐसा महत्वपूर्ण अर्थ भी नहीं निकलता जिसके आधार पर उसमें किसी विशेषता के निहित होने का अनुमान लगाया जा सके।

मोटी बुद्धि से सरसरी तौर पर देखने से मंत्रों का मर्म समझ में नहीं आता परन्तु गंभीरतापूर्वक विवेचन करने से वस्तु स्थिति का पता चल जाता है। ‘शब्द’ एक सजीव पदार्थ है जो भी शब्द हमारे स्वर यंत्र में से निकलता है वह ईथर तत्व में एक कम्पन उत्पन्न करता है, यह कम्पन उस उच्चारण करने वाले मनुष्य की इच्छा शक्ति और धारणा के अनुसार बलवान और निर्बल होते हैं, पृथक पृथक रूप से अक्षरों का स्वरूप अदृश्य जगत में बनता है एक विशेष प्रकार की शब्दावली को एकत्रित कर देने से उनका विशिष्ट स्वरूप बन जाता है। अक्षर विज्ञान के आचार्य इस बात को जानते ओर मानते हैं कि अमुक प्रकार के अक्षरों का एक समूह अमुक प्रकार के कंपन उत्पन्न करता है और वह इस प्रकार का हानिकर व लाभदायक प्रभाव उत्पन्न करता है। जैसे शहद और घी दोनों ही मामूली खाद्य पदार्थ हैं परन्तु यदि वे बराबर मात्रा में मिलाकर खाये जायें तो बड़ा घातक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। उसी प्रकार अमुक अक्षर का उच्चारण अमुक अक्षर के बाद करने से क्या फल होता है उस विज्ञान का सूक्ष्म परीक्षण करने के बाद मन्त्रों की अक्षर रचना इस प्रकार की गई हैं जिससे अमुक प्रकार का ही प्रभाव उत्पन्न हो।

ऊँ, ह्रीं, हूँ, श्रीं, क्लीं, फट् आदि एकाक्षरी मंत्र अपना विशेष महत्व रखते हैं कंठ के स्वर यन्त्र के जिस स्थान से यह अक्षर निकलते हैं उसमें कुछ अलौकिक विशेषता है। इस विशेषता को ध्यान में रखते हुए वर्णमाला में या बोल चाल की भाषा में कहीं भी इन्हें स्थान नहीं दिया गया है, यदि दिया जाता तो उच्चारण करने वालों के सामने ऐसे भले बुरे परिणाम उपस्थित होते जिनकी उन्हें आवश्यकता न थी। मंत्रों की रचना ऊट-पटाँग अक्षरों का जोड़ मालूम पड़ती है परन्तु वास्तव में बात दूसरी ही है। एक अक्षर का स्वतंत्र महत्व और अमुक अमुक अक्षर के सम्मिलन का सामूहिक महत्व उन दोनों तथ्यों पर योग विद्या के तत्वज्ञों ने सूक्ष्म दृष्टि से विवेचना करके मंत्रों की रचना की हैं। सच्चे मंत्रों को उचित रूप से अभिमन्त्रित करने पर अक्षर विज्ञान के सिद्धान्तों के अनुसार उनका निश्चित फल प्राप्त होता है इसकी चाहे जो परीक्षा कर सकता है।

शब्द रचना के अतिरिक्त प्रयोक्ता की धारणा और विश्वास शक्ति का बल होता है। यह बल जितना ही न्यूनाधिक होगा उतना ही मंत्र भी फलदायक होगा। उसी मंत्र के द्वारा एक साधक अद्भुत करतब कर दिखाता है, परन्तु दूसरे को उसके द्वारा कुछ विशेष सफलता नहीं मिलती, इसका कारण प्रयोक्ताओं का विश्वास और मनोबल है। जिसके मन में अपने मंत्र के ऊपर अविचल श्रद्धा है उसका प्रयोग असफल नहीं हो सकता किन्तु जिसका मन शंका शंकित रहता है, संकल्प विकल्प किया करता है उसको सफलता प्राप्त होना दुर्लभ है। मंत्र को सिद्ध करने के लिए एक विशेष प्रकार का अद्भुत कर्मकाण्ड करना पड़ता है, कोई मंत्र मरघट में सिद्ध किये जाते हैं, किन्हीं के लिए अर्ध रात्रि के समय निर्जन स्थानों में जाना पड़ता है, किन्हीं मंत्रों को अमुक व्रत उपवास और विधि विधानों के साथ सिद्ध करते हैं, यह मंत्र सिद्धि के कर्मकाण्ड इसलिए हैं कि मंत्र योगी को स्वयं अपने ऊपर, अपने मंत्र के ऊपर सुदृढ़ विश्वास हो जावे। जिसने उन साहस पूर्ण और कष्टदायक मंत्र सिद्धि की साधना को पूरा किया है निश्चय ही उसे अपनी साधना पर विश्वास होना चाहिए। यही विश्वास वह बल है जिससे मंत्र सजीव होता है और अपना चमत्कार दिखाता है। अक्षर रचना के पश्चात यह धारणा एवं विश्वस्तता ही सफलता की आधार भूमि है।

मंत्र में तीसरा तथ्य इच्छा शक्ति है। कार्यसिद्धि के लिए प्रयोक्ता की तीव्र इच्छा का होना आवश्यक है। प्रयोग के साथ साथ अपनी सम्पूर्ण मानसिक शक्तियों को एक स्थान पर एकत्रित करके सफलता की उत्कट आकाँक्षा में अपना मनोयोग लगाना होता है। विभिन्न दिशाओं में काम करने वाली शक्तियाँ जब एक ही दिशा में पिल पड़ती हैं तो उसी प्रकार अचरज भरा कार्य हो जाता है जैसे आतिशी शीशे के थोड़े से क्षेत्र पर बिखरी हुई सूर्य किरणें एक स्थान पर एकत्रित कर देने से आग जलने लगती है।

मंत्र की सफलता यह तीन आभ्यन्तरिक तथ्य है। चौथा तथ्य बाहरी है। वह भी इन तीन की तरह ही आवश्यक और महत्वपूर्ण है। यह चौथा तथ्य यह है कि जिस आदमी के ऊपर प्रयोग किया जाए उसको मंत्र की शक्ति पर विश्वास हो, कम से कम इस बात की सूचना तो अवश्य ही हो कि मेरे ऊपर कुछ माँत्रिक प्रयोग किया जा रहा है। मैस्मरेजम विद्या का जिन्हें ज्ञान है वे पाठक जानते हैं कि जब तक सामने वाला व्यक्ति कुछ झेंप न जाय तब तक उसे निद्रित नहीं किया जा सकता। कोई कठोर मनोभूमि का आदमी दृढ़तापूर्वक कह दे कि मेरे ऊपर कोई मैस्मरेजम नहीं कर सकता तो उसको प्रभाव में लाना कठिन है। मंत्र योग और मैस्मरेजम एक ही पेड़ की दो शाखाएं हैं, इसमें भी वही सिद्धान्त काम करता है। यदि सामने वाले व्यक्ति को विश्वास होगा कि मेरे ऊपर कोई कारगर प्रयोग हो रहा है तो निश्चय ही उसके ऊपर प्रभाव पड़ेगा। यदि उसे पता न हो या विश्वास न हो तो मंत्र का पूरा फल नहीं मिल सकता। कारण यह है कि मंत्र योग भी एक योग है, योग का अर्थ जोड़। जोड़ के लिए कम से कम दो संख्या जरूर चाहिए। दोनों के मिलने से ही तो योग होगा। यदि एक पक्ष मिलने से इनकार करे तो जोड़ का, योग का, मंत्रयोग का समुचित लाभ होना कठिन है, जिसके ऊपर प्रयोग किया गया है उसका विश्वास भी साथ में होना चाहिए, यदि वह नहीं तो प्रयोग उतना ही सफल होगा जितना कि एक हाथ से ताली बजाने में सफलता मिलती है।

जो प्रयोक्ता सदाचारी, संयमी, सद्भावनायुक्त हैं, जिन्हें अपनी साधना पर विश्वास है, जो दूसरों को अपने प्रभाव में लेने की कला से परिचित हैं उनके मंत्र कभी झूठे नहीं होते। ऐसे मंत्र योगी आमतौर से अपने उद्देश्य को पूरा कर ही लेते हैं उनके प्रयोग प्रायः व्यर्थ नहीं ही जाते हैं। अगले अंक में गायत्री मंत्र को सिद्ध करने की विधि बताई जाएगी।


Quotation

विश्राम का अर्थ आलस्य नहीं है, विश्रान्ति से आगे हम क्या करें इसका हमें ठीक मार्ग प्रदर्शन होता है।

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जिस मनुष्य में स्थिरता, संयम, मनुष्य के प्रति विश्वास और सहयोग बुद्धि है वहीं संसार का सफल व्यवस्थापक हो सकता है।

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सिद्धान्त के दस फूलों की अपेक्षा अनुभव का एक काँटा श्रेष्ठ है।


देशभक्ति में धर्म

सच्चा तप वह है जो कि अपने भाइयों के ताप से तपा जाए, सच्चा यज्ञ वह हैं जिसमें अपने स्वार्थ की आहुति दी जाए, सच्चा दान वह है जिसमें कि परमार्थ किया जाए और सच्ची ईश्वर सेवा वह है कि उससे दुखी जीवों की सहायता की जाए। परमात्मा सब के हृदय में व्यापक हैं, इस लिये जितने प्राणियों को हम प्रसन्न करें उतने ही गुना ईश्वर को प्रसन्न करेंगे।

यह सच्चा धर्म देश-भक्ति द्वारा प्राप्य है। देश-भक्ति का संचार हमारे हृदय से स्वार्थ को निकाल कर फेंक देगा। हम अदूरदर्शी, स्वार्थी और खुशामदियों की तरह ऐसे कार्य कदापि न करेंगे जिनसे कि देशवासियों को हानि पहुँचे बल्कि दूरदर्शी, परमार्थी, सत्यशील और दृढ़ताप्रिय आत्माओं की भाँति असंख्य कष्ट उठाते हुये भी करेंगे वही जिसमें देश का भला हो। निर्धन, धनवान, बलवान और मूर्ख भी बुद्धिमान हो जाए प्रत्येक प्रकार के सामाजिक दुख मिटें और दुर्भिक्ष आदि आपत्तियाँ दूर होकर लाखों बिलबिलाती हुई आत्माओं को सुख पहुँचे। देश भक्ति द्वारा इतने धर्मों का सम्पादन होता हुआ देख कर भी यदि कोई धर्म के आगे देश-भक्ति कुछ नहीं समझता, उस पुरुष को जान लीजिये कि वह धर्म तत्व ही को नहीं पहचानता। ‘धर्म धर्म’ शब्द गा रहा है, परन्तु यह नहीं जानता कि धर्म क्या वस्तु है। यदि आप विद्वान् हैं, बलवान हैं और धनवान हैं तो आपका धर्म यह है कि अपनी विद्या, धन और बल को देश की सेवा में लगाओ, उनकी सहायता करो जो कि तुम्हारी सहायता के भूखे हैं। उनको योग्य बनाओ जो कि अन्यथा अयोग्य ही बने रहेंगे। जो ऐसा नहीं करते वे अपनी योग्यता का उचित प्रयोग नहीं करते और ईश्वर की सौंपी हुई अमानत में विश्वासघात करते हैं जो कि एक अधर्म है और जिसका बुरा फल मिले बिना रह नहीं सकता।


पंच तत्वों की साधना

पंच तत्वों के द्वारा इस समस्त सृष्टि का निर्माण हुआ है। मनुष्य का शरीर भी पाँच तत्वों से ही बना हुआ है। इन तत्वों का जब तक शरीर में उचित भाग रहता है तब तक स्वस्थता रहती है। जब कमी आने लगती है तो शरीर निर्बल, निस्तेज, आलसी, अशक्त तथा रोगी रहने लगता है। स्वास्थ्य को कायम रखने के लिए यह आवश्यक है कि तत्वों को उचित मात्रा में शरीर में रखने का हम निरंतर प्रयत्न करते रहें और जो कमी आवे उसे पूरा करते रहें। नीचे कुछ ऐसे अभ्यास बताये जाते हैं जिनको करते रहने से शरीर में तत्वों की जो कमी हो जाती है उसकी पूर्ति होती रह सकती है और मनुष्य अपने स्वास्थ्य को अच्छा बनाये रहते हुए दीर्घ जीवन प्राप्त कर सकता है।

पृथ्वी तत्व- पृथ्वी तत्व में विषों को खींचने की अद्भुत शक्ति है। मिट्टी की टिकिया बाँध कर फोड़े तथा अन्य अनेक रोग दूर किये जा सकते हैं। पृथ्वी में से एक प्रकार की गैस हर समय निकलती रहती है। इसको शरीर में आकर्षित करना बहुत लाभदायक है।

प्रतिदिन प्रातःकाल नंगे पैर टहलने से पैर और पृथ्वी का संयोग होता है। उससे पैरों के द्वारा शरीर के विष खिच कर जमीन में चले जाते हैं और ब्राह्ममुहूर्त में जो अनेक आश्चर्यजनक गुणों से युक्त वायु पृथ्वी में से निकलती है उसको शरीर सोख लेता है। प्रातःकाल के सिवाय यह लाभ और किसी समय में प्राप्त नहीं हो सकता। अन्य समयों में तो पृथ्वी से हानिकारक वायु भी निकलती है जिससे बचने के लिए जूता आदि पहनने की जरूरत होती है।

प्रातःकाल नंगे पैर टहलने के लिए कोई स्वच्छ जगह तलाश करनी चाहिए। हरी घास भी वहाँ हो तो और भी अच्छा। घास के ऊपर जमी हुई नमी पैरों को ठंडा करती है। वह ठंडक मस्तिष्क तक पहुँचती है। किसी बगीचे, पार्क, खेल या अन्य ऐसे ही साफ स्थान में प्रति दिन नंगे पाँवों कम से कम आधा घंटा नित्य टहलना चाहिए। साथ ही यह भावना करते चलना चाहिए “पृथ्वी की जीवनी शक्ति को मैं पैरों द्वारा खींच कर अपने शरीर में भर रहा हूँ और मेरे शरीर के विषों को पृथ्वी खींच कर मुझे निर्मल बना रही है।” यह भावना जितनी ही बलवती होगी, उतना ही लाभ अधिक होगा।

हफ्ते में एक दो बार स्वच्छ भुरभुरी पीली मिट्टी या शुद्ध बालू लेकर उसे पानी से गीली करके शरीर पर साबुन को तरह मलना चाहिए। कुछ देर तक उस मिट्टी को शरीर पर लगा रहने देना चाहिए और बाद में स्वच्छ पानी से स्नान करके मिट्टी को पूरी तरह से छुड़ा देना चाहिए। इस मृतिका स्नान से शरीर के भीतरी और चमड़े के विष खिंच जाते हैं और त्वचा कोमल एवं चमकदार बन जाती है।

जल तत्व- मुरझाई हुई चीजें जल के द्वारा हरी हो जाती हैं। जल में बहुत बड़ी सजीवता है। पौधे में पानी देकर हरा भरा रखा जाता है, इसी प्रकार शरीर को स्नान के द्वारा सजीव रखा जाता है। मैल साफ करना ही स्नान का उद्देश्य नहीं हैं वरन् जल में मिली हुई विद्युत शक्ति, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन आदि अमूल्य तत्वों द्वारा शरीर को सींचना भी है। इसलिए ताजे, स्वच्छ, सह्य ताप के जल से स्नान करना कभी न भूलना चाहिए। वैसे तो सवेरे का स्नान ही सर्वश्रेष्ठ है पर यदि सुविधा न हो तो दोपहर से पहले स्नान जरूर कर लेना चाहिए। मध्याह्न के बाद का स्नान लाभदायक नहीं होता। हाँ गर्मी के दिनों में संध्या को भी स्नान किया जा सकता है।

प्रातःकाल सोकर उठते ही वरुण देवता की उपासना करने का एक तरीका यह है कि कुल्ला करने के बाद स्वच्छ जल का एक गिलास पीया जाए। इसके बाद कुछ देर चारपाई और इधर उधर करवटें बदलनी चाहिए। इसके बाद शौच जाना चाहिए। इस उपासना का वरदान तुरन्त मिलता है। खुल कर शौच होता है और पेट साफ हो जाता है। यह ‘उषापान’ वरुण देवता की प्रत्यक्ष आराधना है।

जब भी आपको पानी पीने की आवश्यकता पड़े, दूध की तरह घूँट घूँट कर पानी पियें। चाहे कैसी ही प्यास लग रही हो एक दम गटापट न पी जाना चाहिए। हर एक घूँट के साथ यह भावना करते जाना चाहिए-”इस अमृत तुल्य जल में जो मधुरता और शक्ति भरी हुई है, उसे मैं खींच रहा हूँ।” इस भावना के साथ पिया हुआ पानी, दूध के समान गुणकारक होता है। पानी पीने में कंजूसी न करनी चाहिए। भोजन करते समय अधिक पानी न पियें इसका ध्यान रखते हुए अन्य किसी भी समय की प्यास को जल द्वारा समुचित रीति से पूरा करना चाहिए। व्रत के दिन तो खास तौर से कई बार काफी मात्रा में पानी पीना चाहिए।

अग्नि तत्व - जीवन को बढ़ाने ओर विकसित करने का काम अग्नि तत्व का है जिसे गर्मी कहते हैं। गर्मी न हो तो कोई वनस्पति एवं जीव विकसित नहीं हो सकता। गर्मी के केन्द्र सूर्य उपासना और अग्नि उपासना एक ही बात है।

स्नान करके गीले शरीर से ही प्रातःकालीन सूर्य के दर्शन करने चाहिए और जल का अर्घ्य देना चाहिए। पानी में बिजली का बहुत जोर रहता है। बादलों के जल के कारण आकाश में बिजली चमकती है। इलेक्ट्रिसिटी के तारों में भी वर्षा ऋतु में बड़ी तेजी रहती है। पानी में बिजली की गर्मी को खींचने की विशेष शक्ति है। इसलिए शरीर को तौलिया से पोंछने के बाद नम शरीर से ही नंगे बदन सूर्य नारायण के सामने जाकर अर्घ्य देना चाहिए। यदि नदी, तालाब, नहर पास में हो कमर तक जल में खड़े होकर अर्घ्य देना चाहिए। अर्घ्य लोटे से भी दिया जा सकता है और अंजलि से भी, जैसी सुविधा हो कर लेना चाहिए। सूर्य के दर्शन के पश्चात् नेत्र बन्द करके उनका ध्यान करना चाहिए और मन ही मन यह भावना दुहरानी चाहिए-”भगवान सूर्य नारायण का तेज मेरे शरीर में प्रवेश करके नस नस को दीप्तिमान सतेज और प्रफुल्लित कर रहे हैं और मेरे अंग प्रत्यंग में स्फूर्ति उत्पन्न हो रही है।” स्नान के बाद इस क्रिया को नित्य करना चाहिए।

हो सके तो रविवार का व्रत भी करना चाहिये। यदि पूरा व्रत न हो सके तो एक समय, बिना नमक का भोजन करने से भी सूर्य का व्रत माना जा सकता है। इससे भी मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के अनुसार मनुष्य के तेज में वृद्धि होती है और नेत्र रोग, रक्त विकार तथा चर्म रोग विशेष रूप से दूर होते हैं।

वायु तत्व - शरीर को पोषण करने वाले तत्वों का थोड़ा भाग भोजन से प्राप्त होता है, अधिकाँश भाग की पूर्ति वायु द्वारा होती है। जो वस्तुएं स्थूल हैं वे सूक्ष्म रूप से वायु मंडल में भी भ्रमण करती रहती हैं। योरोप अमेरिका में ऐसी गायें हैं जिनकी खुराक 24 सेर है परन्तु दिन भर में दूध 28 सेर देती हैं। यह दूध केवल स्थूल भोजन से ही नहीं बनता वरन् वायु में घूमने वाले अदृश्य तत्वों के भोजन से भी प्राप्त होता है। बीमार तथा योगी बहुत समय तक बिना खाये पिये भी जीवित रहते हैं। उनका स्थूल भोजन बन्द है तो भी वायु द्वारा बहुत सी खुराकें मिलती रहती हैं। यही कारण है कि वायु द्वारा प्राप्त होने वाले ऑक्सीजन आदि अनेक प्रकार के भोजन बन्द हो जाने पर मनुष्य की क्षण भर में मृत्यु हो जाती है। बिना वायु के जीवन संभव नहीं। आबोहवा का जितना स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है उतना भोजन का नहीं। डॉक्टर लोग क्षय आदि असाध्य रोगियों को पहाड़ों पर जाने की सलाह देते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि बढ़िया दवाओं की अपेक्षा उत्तम वायु में अधिक पोषक तत्व मौजूद हैं।

अनन्त आकाश में से वायु द्वारा प्राणप्रद तत्वों को खींचने के लिए भारत के तत्व दर्शी ऋषियों ने प्राणायाम की बहुमूल्य प्रणाली का निर्माण किया है। मोटी बुद्धि से देखने में प्राणायाम एक मामूली सी फेफड़ों की कसरत मालूम पड़ती है और इससे इतना ही लाभ प्रतीत होता है कि फेफड़े मजबूत बनें और रक्त शुद्ध हो किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से इस क्रिया द्वारा अनिर्वचनीय लाभ प्रतीत हुए हैं। बात यह है कि प्राणायाम द्वारा अखिल आकाश में से अत्यन्त बहुमूल्य पोषक पदार्थों को खींचकर शरीर को पुष्ट बनाया जा सकता है।

स्नान करने के उपरान्त किसी एकान्त स्थान में जाइए। समतल भूमि पर आसन बिछा कर पद्मासन से बैठ जाइए। मेरुदंड बिलकुल सीधा रहे। नेत्रों को अधखुला रखिए। अब धीरे धीरे नाक द्वारा साँस खींचना आरम्भ कीजिए और दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ भावना कीजिए कि “विश्वव्यापी महान प्राण भण्डार में से मैं स्वास्थ्यदायक प्राणतत्व साँस के साथ खींच रहा हूँ और वह प्राण मेरे रक्त प्रवाह तथा समस्त नाड़ी तन्तुओं में प्रवाहित होता हुआ सूर्यचक्र में (आमाशय का वह स्थान जहाँ पसलियाँ और पेट मिलते हैं) इकट्ठा हो रहा है। इस भावना को ध्यान द्वारा चित्रवत् मूर्तिमान रूप से देखने का प्रयत्न करना चाहिए। जब फेफड़ों को वायु से अच्छी तरह भर लो तो दस सैकिण्ड तक वायु को भीतर रोके रहो। रोकने के समय ऐसा ध्यान करना चाहिए कि “प्राणतत्व मेरे अंग प्रत्यंगों में पूरित हो रहा है।” अब वायु को नासिका द्वारा ही धीरे धीरे बाहर निकालो और निकालते समय ऐसा अनुभव करो कि “शरीर के सारे दोष, रोग और विष वायु के साथ साथ निकाल बाहर किये जा रहे हैं।”

उपरोक्त प्रकार से आरम्भ में दस प्राणायाम करने चाहिए फिर धीरे धीरे बढ़ाकर सुविधानुसार आधे घंटे तक कई बार इन प्राणायामों को किया जा सकता है। अभ्यास पूरा करने के उपरान्त आपको ऐसा अनुभव होगा कि रक्त की गति तीव्र हो गई है और सारे शरीर की नाड़ियों में एक प्रकार की स्फूर्ति, ताजगी और विद्युत शक्ति दौड़ रही है। इस प्राणायाम को कुछ दिन लगातार करने से अनेक शारीरिक और मानसिक लाभों का स्वयं अनुभव होगा।

आकाश तत्व - आकाश का अर्थ शून्य या पोल समझा जाता है। पर यह शून्य या पोल खाली स्थान नहीं है। ईथर तत्व (Ethar) हर जगह व्याप्त है। इस ईथर को ही आकाश कहते हैं। रेडियो द्वारा ब्रॉडकास्ट किये हुए शब्द ईथर तत्व में लहरों के रूप में चारों ओर फैल जाते हैं। रेडियो यंत्र की सहायता से उन लहरों को पकड़ कर उन शब्दों को दूर दूर स्थानों में भी सुना जाता है। केवल शब्द ही नहीं विचार और विश्वास भी आकाश में (ईथर में) लहरों के रूप में बहते रहते हैं। जैसी ही हमारी मनोभूमि होती है उसी के अनुरूप विचार इकट्ठे होकर हमारे पास आ जाते हैं। एक ही समय में दिल्ली, बम्बई, लाहौर, लन्दन, न्यूयार्क आदि से विभिन्न प्रोग्राम ब्रॉडकास्ट होते हैं परन्तु आपके रेडियो सैट की सुई जिस स्टेशन के नम्बर पर लगी होगी उसी का प्रोग्राम सुनाई पड़ेगा और अन्य प्रोग्राम अपने रास्ते चले जायेंगे। इसी प्रकार हमारी मनोभूमि, रुचि, इच्छा जैसी होती हैं उसी के अनुसार आकाश में से विचार, प्रेरणा और प्रोत्साहन प्राप्त होते हैं। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक असंख्य प्राणियों द्वारा जो असंख्य प्रकार के विचार अब तक किये गये हैं वे नष्ट नहीं हुए वरन् अब तक मौजूद हैं, आकाश में उड़ते फिरते हैं। यह विचार अपने अनुरूप भूमि जहाँ देखते हैं वहीं सिमट सिमट कर इकट्ठे होने लगते हैं। कोई व्यक्ति बुरे विचार करता है तो उसी के अनुरूप असंख्य नई बातें उसे अपने आप सूझ पड़ती हैं, इसी प्रकार भले विचारों के बारे में भी है हम जैसी अपनी मनोभूमि बनाते हैं उसी के अनुरूप विचार और विश्वासों का समूह हमारे पास इकट्ठा हो जाता है और यह तो निश्चित ही है कि विचारो की प्रेरणा से ही कार्य होते हैं। जो जैसा सोचता है वह वैसे ही काम भी करने लगता है।

आकाश तत्व में से लाभदायक सद्विचारों को आकर्षित करने के लिए प्राणायाम के बाद का समय ठीक है। एकान्त स्थान में किसी नरम बिछाने पर चित्त होकर लेट जाओ, या आराम कुर्सी पर पड़े रहो अथवा मसंद या दीवार का सहारा लेकर शरीर को बिलकुल ढीला कर दो। नेत्रों को बन्द करके अपने चारों ओर नीले आकाश का ध्यान करो। नीले रंग का ध्यान करना मन को बड़ी शान्ति प्रदान करता है। जब नीले रंग का ध्यान ठीक हो जाए तब ऐसी भावना करनी चाहिए कि ‘निखिल नील आकाश में फैले हुए सद्विचार, सद्विश्वास, सत्प्रभाव चारों ओर से एकत्रित होकर मेरे शरीर में विद्युत किरणों की भाँति प्रवेश कर रहे हैं और उनके प्रभाव से मेरा अन्तःकरण दया, प्रेम, परोपकार, कर्तव्यपरायणता, सेवा, सदाचार, शान्ति, विनय, गंभीरता, प्रसन्नता, उत्साह, साहस, दृढ़ता, विवेक आदि सद्गुणों से भर रहा है।” यह भावना खूब मजबूती और दिलचस्पी के साथ मनोयोग तथा श्रद्धा पूर्वक होनी चाहिए। जितनी ही एकाग्रता और श्रद्धा होगी उतना ही इससे लाभ होगा।

आकाश तत्व की इस साधना के फलस्वरूप अनेक सिद्ध, महात्मा, सत्पुरुष, अवतार तथा देवताओं की शक्तियाँ आकर अपने प्रभाव डालती हैं और मानसिक दुर्गुणों को दूर करके श्रेष्ठतम सद्भावनाओं का बीज जमाती हैं। सद्भावों के कारण ही यह लोक और परलोक आनन्दमय बनता है यह तथ्य बिलकुल निश्चित और स्वयं सिद्ध है।

उपरोक्त पाँच तत्वों की साधनाएं देखने में छोटी और सरल हैं तो भी इनका लाभ अत्यन्त विषद है। नित्य पाँचों तत्वों का जो साधन कर सकते हैं। वे इन सबको करें जो पाँचों को एक साथ न कर सकते हों वे एक एक दो दो करके किया करें। कौन सा साधन पहले कौन सा पीछे यह भी अपनी अपनी सुविधा के ऊपर निर्भर है। जिन्हें प्रतिदिन करने की सुविधा न हो वे सप्ताह में एक दो दिन के लिए भी अपना कार्यक्रम निश्चित रूप से चलाने का प्रयत्न करें। रविवार के व्रत के दिन भी इन पाँचों साधनों को पूरा करते रहें तो भी बहुत लाभ होगा। नित्य प्रति नियमित रूप से अभ्यास करने वालों को तो शारीरिक और मानसिक लाभ इससे बहुत अधिक होता है।


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जीवनोद्देश्य की खोज ही सब से बड़ा सौभाग्य है, और उसे नहीं ढूँढ़ने की अपेक्षा अपने हृदय में ढूँढ़ना चाहिये।

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अनुचित का त्याग करो। मन वचन और क्रिया में सत्य का आश्रय ही दुनिया की अनमोल निधि और जीवन का सर्वोपरि नियम है।

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युवकों के लिये मेरी एक सलाह है और वह यह कि काम करो! काम करो!! काम करो!!!

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सब दुःख को साहस पूर्वक सहन करो। इससे तुम्हारी आत्मा किले को भाँति अजेय हो जायेगी। और फलस्वरूप भविष्य में आने वाली कोई कठिनाई तुम्हें विचलित और चंचल न कर सकेंगी।


यज्ञ द्वारा रोग निवारण

(ले.-श्री डॉक्टर फुन्दनलाल एम. डी.)

जब हम अपने प्राचीन साहित्य के पृष्ठ उलटते हैं, तो अपने पूर्वजों के लम्बे-चौड़े नीरोग शरीरों और सैंकड़ों वर्ष की आयु का उल्लेख पाते हैं। वे न डाक्टरी पास करने विलायत जाते थे न करोड़ों रुपये की विलायती औषधियाँ मंगाते थे, न युवा पुरुषों की आँख पर चश्मा था, न 99 प्रतिशत पायरिया और मन्दाग्नि (Dyspepsia) आदि के रोगी थे। ऐसी दशा में हमें यही कहना पड़ता है कि हमारे रोगी होने का सब से बड़ा कारण अपनी प्राचीन वैदिक संस्कृति, आचार-विचार, रहन-सहन और नित्य कर्म की अवहेलना करना और पाश्चात्य संस्कृति को अपनाना है। हमारी प्राचीन संस्कृति में नित्य कर्म पर बड़ा बल दिया गया है, यहाँ तक बताया गया है कि संध्या हवन न करने वाला पापी है। नित्य कर्म से जो आध्यात्मिक लाभ हैं, वह तो वर्णनातीत हैं। पर स्वास्थ्य विषयक लाभ भी इतना होता है कि इनको नियम पूर्वक करने वाला सदाचारी कभी किसी कठिन रोग में नहीं फँस सकता। अन्य यज्ञों को छोड़ केवल हवन यज्ञ की ही वैज्ञानिक परीक्षा हमें इसी परिणाम पर पहुँचाती है। यही कारण था कि हमारे प्राचीन वैद्य जिनको रोगियों से धन प्राप्त करने की इच्छा नहीं थी उन गृहस्थों को जो अपनी स्वस्थ अवस्था में भेंट-पूजा के साथ वैद्य की सेवा में उपस्थिति होते थे, वैदिक दिनचर्या का जिसमें हवन यज्ञ भी था उपदेश किया करते थे और गृहस्थ लोग नित्य प्रति प्रातः सायं यज्ञ करके जहाँ संसार के रोगों का नाश करते थे, दूसरे के उपकार के विचार से उत्तम से उत्तम पदार्थ घृत मोहन भोग इत्यादि हवन में डाल अपने भीतर परोपकार की वृत्ति को जाग्रत कर जगत् में शान्ति फैलाते थे, वहाँ वैज्ञानिक नियमों के आधार पर स्वयं भी स्वास्थ्य लाभ करते थे। वैज्ञानिक ढंग पर हवन यज्ञ कैसे लाभ पहुँचाता हैं वह यहाँ संक्षेप में बताते हैं।

1. पदार्थ विद्या का यह सिद्धान्त है कि किसी वस्तु का नाश नहीं होता, किन्तु उसका रूप बदल जाता है। हवन में चार प्रकार के पदार्थ डाले जाते हैं।

(क) पुष्टिकारक (ख) रोग नाशक (ग) सुगन्धित (घ) मिष्ट। हवन करते समय दूर बैठे मनुष्य की नासिका में भी सुगन्धि पहुँचती है, इससे पदार्थ विद्या के उपरोक्त सिद्धान्त की सचाई प्रकट होती है और ज्ञात होता है, कि उन वस्तुओं के परमाणु वायु में फैल गए। यह परमाणु जब श्वास द्वारा हमारी नासिका में जावेंगे तो रोग नाशक औषधियों के होने से रोग का नाश करेंगे। मिष्ट और पुष्टिकारक औषधियों के परमाणु पुष्टि देवेंगे और सुगन्धित औषधियों के चित्त को प्रसन्न करेंगे और जब नित्य प्रति प्रात सायं ऐसा होता रहेगा तो हम कभी भी रोगी न हो सकेंगे। यह थोड़ी बात नहीं है।

2. आग जलाने से रोग कीटाणुओं का नाश होता और वायु की शुद्धि होती है इस सिद्धान्त को हमारे पूर्वज तो प्राचीन काल से जानते थे। प्रसूति गृह में सर्वदा आग बनाए रखना रसोई घर में बैठकर भोजन करना आदि रिवाज इसका प्रमाण है। परन्तु अब थोड़े काल से इस साइंस को आधुनिक विद्वान् भी समझने लगे हैं, प्रोफेसर मैक्समूलर साहब की पुस्तक ‘फिजिकल रिलीजन’ के पाठ से विदित होता है कि यवन देश के तत्ववेत्ता ल्पूयकी ने आग को वायु शोधक माना है और इस पर उक्त प्रोफेसर साहब लिखते हैं कि आग जलाने की रीति गत शताब्दी तक स्काटलैण्ड में पाई जाती थी, तथा आयरलैंड और दक्षिणी अमेरिका में महामरी के अग्नि जलाने की प्रथा प्रचलित रह चुकी है। युरोपादि में जितने प्रकार आजकल वायु शुद्धि के प्रचलित हैं उन में प्रायः “फायरसटौब” (अंगीठियाँ) का उपयोग किया जाता है अतः दूषित वायु उष्ण होकर फैले और हलकी होकर गृह की खिड़की अथवा भिन्न मार्गों से दूर निकल जावे और उसकी जगह तात्कालिक ठंडी वायु नीचे के द्वारों से आ सकेगी। साधारण अग्नि जलाने के तो इतने लाभ हैं। अब हवन में जो औषधियाँ लगाई गई हैं, वे रोग नाशक भी हैं। अतः उन से सैकड़ों ऐसे रोगों का बीज उनके उत्पन्न होने से पूर्व ही नष्ट हो जावेगा जो यदि प्रकट हो जाते तो कष्ट के साथ साथ हजारों रुपये डाक्टरों की भेंट कराते और कभी कभी तो उनका परिणाम मृत्यु होता। इस प्रकार हवन यज्ञ रोग नाशक और आयुवर्धक भी है।

3. रक्त की अशुद्धि अनेक रोगों का कारण है। रक्त शुद्धि के लिए रोग अनेक उपाय करते हैं। डॉक्टर लोग कड़वी औषधि पिलाते हैं, स्वादिष्ट भोजन छुड़वा देते हैं। इंजेक्शन करते हैं। फिर भी रक्त शुद्ध नहीं होता तो फस्द खुलवाते हैं। इतना करने पर भी रक्त दोष के रोग दिन प्रतिदिन बढ़ ही रहे हैं, हवन में डाली हुई सोमलता चिरायता इत्यादि के सूक्ष्म परमाणु प्रातः सायं श्वास द्वारा फुस्फसों में पहुँच कर रक्त के दोषों को नित्य ही दूर करते रहते हैं; जिससे हवन करने वाले का रक्त सर्वदा शुद्ध रहता है और वह कभी भी रक्त दोष के रोग में नहीं फंस सकता और यदि कभी किसी बड़े अपथ्य से रक्त दोष हो ही जावे तो बिना औषधि के केवल हवन से शुद्ध हो जाता है।

4. तपेदिक इत्यादि जब कोई कठिन रोग हो जाता है जिसमें औषधि भी काम नहीं देती तो डॉक्टर लोग रोगी को पहाड़ व समुद्र पर जाने का परामर्श देते हैं, इस कारण कि वहाँ की वायु में न केवल शुद्ध औषजन है किन्तु उससे भी उत्तम भाग (Ozone) ओजोन होता है जो बड़ी उपयोगी गैस है और एक प्रकार की तीव्र ऑक्सीजन है। निर्मल वायु में यह बहुत अधिक पाई जाती है और अशुद्ध वायु में बहुत कम। ओजोन की पहचान उसकी गन्ध है, जो बहुत तीव्र होती है। यहाँ तक कि यदि वायु के पच्चीस लाख भाग हों और उसमें ओज़ोन केवल एक भाग हो तब भी उसकी विद्यमानता प्रकट हो सकती है। जंगल, वाटिका अथवा समुद्र की खुली हवा में श्वाँस लेने से जो आनन्द प्रतीत होता है, यह उसी की विद्यमानता का फल है, अंग्रेजी भाषा में जिसे ओजोन कहते हैं, उसी को हम अपनी भाषा में शुद्ध प्राणप्रद अथवा सुगन्धित वायु कह सकते हैं, हवन करने पर वही आनन्द और उससे अधिक सुगन्धि प्रत्यक्ष प्रतीत होती है। अतः हवन करने वाला नित्य प्रति कुछ देर उस वायु में श्वास लेता है जो ओजोन का भंडार हैं। फिर ऐसे व्यक्ति को तपेदिक इत्यादि भयानक रोग सता ही नहीं सकते और जो इन रोगों में फँस चुके हैं वह भी कुछ अन्य साधनों के साथ हवन यज्ञ करने से नीरोग हो सकते हैं।

5. यह सब जानते हैं कि पुष्ट शरीर न केवल रोगों से सुरक्षित रहता है, प्रत्युत जीवन के सारे आनन्द पुष्ट शरीर वाला मनुष्य ही भोगता है। हवन में जो पुष्टिकारक पदार्थ डाले जाते हैं, उनके सूक्ष्म परमाणु शरीर में पहुँच उसे पुष्ट बनाते हैं। पुष्टिकारक पदार्थों का खाना भी बल देता है। अतः इन्हें अवश्य खाना चाहिए पर उससे अधिक उपयोगी इनका हवन में जलाना है। जलाने में दो गुण विशेष हैं; प्रथम यह कि खाने में सम्भव है आप पुष्टिकारक पदार्थ अपनी शक्ति से अधिक खाकर लाभ के स्थान में हानि उठावे। पर हवन में यह खटका नहीं क्योंकि इसके परमाणु सीधे रक्त में पहुँचते हैं और पाचन शक्ति पर कोई बोझ नहीं डालते। तब ही तो पुत्रेष्टि यज्ञ में जब खाने के पदार्थों से वीर्य पुष्ट नहीं होता और अधिक खाने से पाचन शक्ति बिगड़ती है, उस समय हवन यज्ञ में डाले पुष्ट पदार्थों के सूक्ष्म परमाणु सीधे रक्त में पहुँच कर वीर्य पुष्ट करते हैं।

दूसरे औषधि को घोटने से उसकी भीतरी प्राण शक्ति उभर आती है। अतः ऐसी थोड़ी चीज बिना घुटी बहुत चीज़ की अपेक्षा अधिक बल देती है। आप 10 बादाम नित्य प्रति एक मास तक खावें फिर एक मास 4 बादाम पत्थर पर घिस कर पीवें। आप स्वयं अनुभव करेंगे कि आप में पूर्व की अपेक्षा अधिक बल आ रहा है। अब सोचिये हवन में जो पदार्थ डाले जाते हैं वह अग्नि द्वारा सूक्ष्म से सूक्ष्म हो जाते हैं। अतः थोड़ा पदार्थ भी अधिक बल देता है। इससे हवन यज्ञ की उपयोगिता और महत्ता और भी बढ़ जाती है। सज्जनों? संसार में रोगों के बढ़ते हुए वेग को रोकने तथा स्वार्थ की प्रवृत्ति को हटा परोपकार की वृति जगाने का एक मार्ग साधन हवन यह है जिसे प्रत्येक स्त्री-पुरुष को नित्य प्रति करना चाहिए।


राजा भोज का स्वप्न

(श्री मंगलचन्दजी भंडारी, हि. सा. विशारद)

एक दिन राजा भोज गहरी निद्रा में सोया हुआ था। उसे स्वप्न में एक बड़े तेजस्वी वृद्ध पुरुष के दर्शन हुए। भोज ने उससे पूछा -भगवन् आप कौन हैं? वृद्ध ने कहा-हे राजन्! मैं सत्य हूँ। तुझे तेरे कार्यों का वास्तविक स्वरूप दिखाने आया हूँ। मेरे पीछे पीछे चला आ, और अपने कार्यों की वास्तविकता को देख। राजा प्रसन्नता पूर्वक उस वृद्ध पुरुष के पीछे पीछे चल दिया।

राजा भोज अपने को बहुत बड़ा धर्मात्मा समझता था। उसने दान, पुण्य, यज्ञ, व्रत, उपवास, तीर्थ यात्रा, कथा, कीर्तन, भजन, पूजन आदि में कुछ भी कसर न रहने दी थी। वह ब्राह्मणों का बड़ा सत्कार करता था, उन्हें प्रचुर दक्षिणा देकर संतुष्ट करता था। मन्दिर बाग, बगीचे, कुंआ, बावड़ी, तालाब आदि उसने एक से एक अच्छे बनवाये थे। अपनी इन वृत्तियों को देख देखकर राजा मन नहीं मन बहुत अभिमान किया करता था।

वृद्ध पुरुष के रूप में आया हुआ सत्य राजा भोज को अपने साथ लेकर उसकी कृतियों के पास ले गया। पहले एक बड़े भारी बगीचे में वह उसे ले गया। भोज का लगाया हुआ यह बगीचा फल फूलों से लदा हुआ था। सत्य ने कहा-हे भोज! तुझे अपनी इस कृति के बाह्य रूप को देखकर बड़ा अभिमान होगा। पर इसमें असलियत कितनी है यह मैं तुझे अभी दिखाये देता हूँ। सत्य ने एक पेड़ को छुआ, छूते ही उसके सारे फल फूल ओर पत्ते जमीन पर गिर पड़े छुए और वे सभी ठूँठ हो गये। यह सब देखकर भोज के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। आकुलता पूर्वक चिन्तित नेत्रों से सत्य की ओर देखा। वृद्ध पुरुष ने कहा-मैं जानता हूँ कि तुम इसका कारण जानना चाहते हो पर आओ मुझे अभी तुम्हारी अन्य कृतियों का भी खोखलापन दिखाना है। उन्हें दिखा लेने के बाद ही इसका कारण तुम्हें बताऊँगा।

सत्य, राजा भोज को साथ लेकर आगे बढ़ा वह उसे उस स्वर्ण जटित मन्दिर के पास ले गया जिस पर भोज को बड़ा अभिमान था। सत्य ने उसे जरा सा छुआ, छूते ही उसकी सारी चमक उड़ गई। सोना लोहे के समान काला हो गया, आलीशान पत्थर जमीन पर गिर गिर कर चूर होने लगे थोड़ी ही देर में वह गगनचुम्बी मन्दिर टूटे फूटे खँडहर के रूप में परिणित हो गया। इस दृश्य को देखकर राजा के होश उड़ने लगे। वह जड़ पत्थर की तरह गति हीन होकर खड़ा हो गया, सत्य ने कहा- राजन्! विषाद मत करो, अभी और मेरे साथ आओ, मैं तुम्हारे सभी धर्म कार्यों की वास्तविकता खोल खोल कर सामने रखे देता हूँ।

वृद्ध पुरुष आगे बढ़ा उसने राजा के यज्ञ, तीर्थ, कथा, कीर्तन, पूजन, भजन, दीन, व्रत आदि के निमित्त बने हुए स्थानों, व्यक्तियों और उपादानों को हुआ। सत्य जिस वस्तु से उंगली लगाता था, उसी की चमक दमक गायब हो जाती थी और टूटे फूटे नष्ट रूप में वह भूमि पर गिर पड़ती थी। कुंआ, बावड़ी, मन्दिर मठों की भी यही दुर्गति हुई। दान में दी हुई धन की बड़ी भारी स्वर्ण राशि के निकट भी उसे ले जाया गया, सत्य ने जैसे ही उसे छुआ वह भी मिट्टी कंकड़ की शकल में बदल गई। राजा को अपनी जिन जिन वस्तुओं पर अभिमान था उन सभी को सत्य ने स्पर्श करके दिखाया। वे सभी निकम्मी-झूठी और निष्फल साबित हुई। राजा की आँखों के आगे अँधेरा छा गया। जिन वस्तुओं को देख देखकर वह फूला नहीं समाता था, उनकी यह दुर्गति होते देख कर भोज के पैरों तले से जमीन खिसकने लगी। वह हत बुद्धि होकर वहीं जमीन पर बैठ गया।

सत्य ने कहा- राजन्! वास्तविकता को समझो। भ्रम में मत पड़ो। भौतिक वस्तुओं के न्यूनाधिकता के आधार पर धर्म की न्यूनाधिकता नहीं होती। कर्म के राज्य में भावना का सिक्का चलता है। भावना के अनुरूप ही पुण्य फल प्राप्त होता है। यश की इच्छा से, लोक दिखावे के लिए जो कार्य किये गये हैं उनका फल इतना ही है कि दुनिया की वाहवाही मिल जाए। सच्ची सद्भावना से, निस्वार्थ होकर, कर्तव्य भाव से जो कार्य किये गये हैं वे ही पुण्य फल हैं। एक गरीब आदमी जिसके पास पैसा नहीं हैं यदि निस्वार्थ भाव से किसी को एक लोटा जल पिलाता है तो उसका पुण्य किसी यश लोलुप धनी के लाख करोड़ रुपया खर्च करने से अधिक है। मजहबी कर्मकाण्डों की कवायद पूरी कर देने मात्र से यदि पुण्य प्राप्त हो जाता तो धनिकों के लिए या अमुक मजहब वालों के लिए ही धर्म खरीद लिया गया होता परन्तु सचाई यह नहीं है। वास्तविकता यह है कि जो मनुष्य अपने तुच्छ स्वार्थों से आगे बढ़कर कर्तव्य भावना से लोग कल्याण के लिए ठीक कार्य करता है वही पुण्य होता है और उसी का पुण्य फल प्राप्त होता है। बाकी अन्य आडम्बर तो दिखावा मात्र हैं उनकी पहुँच तो इस लोक तक ही है। धर्म के राज्य तक इनकी पहुँच नहीं हो सकती।

इतना कह कर वह वृद्ध पुरुष के रूप में आया हुआ सत्य अन्तर्धान हो गया। भोज की निद्रा टूटी। उसने गंभीरतापूर्वक अपने स्वप्न पर विचार किया और अन्त में इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि भौतिक साधनों की सहायता से पुण्य कमाने की आशा छोड़ कर मनुष्य को अपने अन्तःकरण की पवित्रता और विशुद्धता की ओर प्रवृत्त होना चाहिए, क्योंकि धर्म अधर्म की जड़ मन में हैं बाहर नहीं।

सात्विक सहायताएं

इस मास ज्ञान यज्ञ के लिए निम्नलिखित सात्विक सहायता प्राप्त हुई हैं। अखंड ज्योति इन महानुभावों के प्रति अपनी आन्तरिक कृतज्ञता प्रकट करती है।

5. श्री दयाशंकर जी दुवे, कान्हेपुर।

5. श्री गोवर्धनदासजी खिमज भाई, पौनी।

2. श्री शिवप्रतापजी श्रीवास्तव, कानपुर।

1. श्री धर्मपालसिंहजी, रुड़की।


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मनुष्य सहस्र बार नीचे गिरता है, उसे सहस्र बार ऊँचे उठने का प्रयत्न करना चाहिये-प्रति बार उस सीमा से कुछ अधिक ऊँचा, जहाँ से वह गिरता था। पूर्णता प्राप्त करने का यही अव्यर्थ साधन हैं।

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जिस मनुष्य में ज्ञान संचय का ठीक क्रम नहीं है, वह जितना विद्वान बनेगा उतना ही अधिक भ्रम में पड़ेगा।


शंख बजाया कीजिए

(श्री स्वामी देवानन्दजी)

देश के शिखासूत्र धारी जाति जनता में अधिकाँश जनों के उपास्य देवता श्री विष्णु भगवान् को शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी बताया गया है। और देश के काल्पनिक चित्रकारों ने भी अपनी कल्पना द्वारा श्री विष्णु भगवान् के चित्र में भी दिखलाया है। संसार सुप्रसिद्ध श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय प्रथम के श्लोक 11 से 16 तक में श्री मन्महात्मा भीष्मपितामह और युधिष्ठिरादि पाण्डवों ने भी श्रीकृष्ण भगवान के साथ साथ अपने अपने शंखों को युद्धारम्भ में बजाया। उन लोगों के शंखों के नाम भी भिन्न भिन्न दिये हुए हैं। श्रद्धास्पद श्री मत्स्वामिशंकराचार्यजी ने मानवी जीवन को नास्तिकवाद के गहरे गर्त से निकालने में और आस्तिकवाद के उच्च शिखर के ऊपर ले जाने में इसी अमोध अस्त्र का आलम्ब लिया था। इस्लाम धर्म के मूलाधार (प्रवर्तक) हजरत मुहम्मद साहब के दामाद सुप्रसिद्ध इमाम हुसैन और हुसरेन के पिता हजरत अली जो बीबी फातिमा के पति थे अपने जीवन काल में नमाज पढ़ने के लिये लोगों को इकट्ठा करने और सम्मिलित नमाज के लिए शंख बजाया करते थे। देखिये! मिश्कात हदीस रवायत हजरत अली साहब की आजकल उसकी जगह को अजान ने ले रखा है। अस्तु! अब विचारने योग्य बात यह है कि जब संसार में अनेक प्रकार के बाजे बजाये जाते रहते हैं तो यहाँ शंख ही के बजाने में क्या अनुपम लाभ पाया था? क्या शंख के सदृश कोई और बाजा न था?

यद्यपि शंख के अतिरिक्त मानवकृत अनेक प्रकार के उस समय भी बाजे थे परन्तु ईश्वरी प्रकृति प्रदत्त इस अलौकिक अनुपम गुण सम्पन्न शंख के सम्मुख तुच्छ रही है। देश में श्वाँस रोग के रोगी, पेट के रोगी, आँख के रोगी, मुख रोग के रोगियों की दिन प्रति दिन अधिकता ही देखने में आ रही है। आयुर्वेदिक, यूनानी, एलोपैथी, होमियोपैथी चिकित्सकों की भी संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि ही है। परन्तु यहाँ “मर्ज बढ़ता गया जों जों दवा की” इसलिये यदि सचमुच अपने जीवन और जन्म को सुखमय सार्थक सिद्ध कर दिखाना हो तो अपने पूर्वजों के प्रयोग प्रथा के यथानुगामी बन अनुपम लाभ उठाते हुए यशस्वी बनिये! शंख प्रति दिन बजाने में एक लोकोक्ति हैं कि “पंच मुख परमेश्वर मुख है” गीता में कहा गया है कि “ईश्वरः सर्व भूतानाँ” अर्थात् ईश्वर प्रत्येक प्राणियों में व्यापक रूप से विद्यमान होते हुए पुकार पुकार कह रहा है कि “शंख बाजे बलाय भाजै!” अर्थात् शंख बजाने वाले शक्तिशाली के सम्मुख कोई आपत्ति विपत्ति कभी ठहर ही नहीं सकती। क्यों शंख बजाने वाला अपनी शक्ति और वीर्य की वृद्धि और रक्षा कर सकता है। अतः शंख बजाने वाले निम्न अपने अंगों से लाभ उठाते हुए रोग मुक्त हो अपनी आयु की भी वृद्धि कर सकेंगे? यथा-

फुफुस्स रोगी (टी. बी. वाले) श्वाँस रोगी (दमा, श्वाँस, खाँसी, वाले), हृदयरोगी (धड़कन वाले), नेत्ररोगी (रोहे वाले), मस्तिष्क (विवेक शीलहीन वाले), आशा है देश के विवेकशील शंख बाजा को अपने अपने व्यवहार विधि में लाने का प्रयत्न अवश्य करेंगे।


Quotation

सद्व्यवहार मनुष्य की आँतरिक सज्जनता का परिचायक है।

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संसार में जो सबसे बड़ी विभूतियाँ सो गई हैं उनका तो उसे ज्ञान ही नहीं है।


विवश बंदी की वेदना


विवश बंदी की वेदना

(श्री माधव)

कैसे घूँघट का पट खोलूँ?

पिय हैं खड़े द्वार पर कैसे ‘आओ-भीतर’ बोलूँ?

कैसे घूँघट का पट खोलूँ?

शत शत जनमों के संस्कार बँधे हैं मेरे पग में।

अगणित पाप और अपराध खड़े हैं मेरे मग में॥

इन्हें चीर, मैं बन्दी कैसे हिय का सौदा तोलूँ?

कैसे घूँघट का पट खोलूँ?

आज अचानक आये हैं मेरे प्राणों-के-प्राण।

रोम-रोम में उत्कंठा है, कण-कण में कल्याण॥

किन्तु आज भी कैसे हिय के काले धब्बे धोलूँ?

कैसे घूँघट का पट खोलूँ?

श्वास-श्वास में तेरी गति है, प्राण-प्राण में तान।

अणु-अणु में तेरा कंपन है, तेरा ही मधु-गान॥

किन्तु आज इस लाचारी में कैसे तुझसे बोलूँ?

कैसे घूँघट का पट खोलूँ?

बहुत हटाया, हट न सका, यह बार बार गिरता है।

तेरे मेरे बीच प्राण! यह झिलमिला-सा हिलता है॥

युग-युग की इस विषम हार को प्यारे! कैसे तोलूँ!

कैसे घूँघट का पट खोलूँ?

मिटना, मिट-मिटकर बनना, बन बनकर मिट-मिट जाना।

यही हृदय ने सीखा है, पापों में सदा नहाना॥

है गहरा डूबा, इस पर भी बोलो क्या मैं बोलूँ?

कैसे घूँघट का पट खोलूँ?

लाख करूं, यह हट न सकेगा मेरे हटे हटाये।

प्रतिपल घना हुआ जाता है मेरे घटे घटाये॥

हाय! विवश बंदी की आहों में अब सर्वस खोलूँ?

कैसे घूँघट का पट खोलूँ?

मुझे अनावृत करने की ठानी है तूने ठान।

अवगुँठन यह रह न सकेगा तेरा है अभिमान॥

एक बार पिय! इसे हटा दो, मैं देखूँ और बोलूँ!

कैसे घूँघट का पट खोलूँ?

*समाप्त*