(रचयिता-महावीर प्रसाद विद्यार्थी; टेढ़ा-उन्नाव)
उछल-उछल कर इस कारा से
छल-छल कर चल, मेरे जीवन!
रोक सकेगा कौन तुझे रे! यह प्रवाह तेरा अविनश्वर!
विघ्नों का कैसा भय तुझको बढ़, चल अविचल अपने पथ पर!
आए सरिता, आए सागर, तड़पे बिजली, बरसें जलधर!
रजकण बनकर शैल करेंगे
तेरे चरणों का अभिवन्दन!
आशा-अभिलाषा के मृदु-दल अंगारों पर बिखराता जा,
चाह सुधा की करता है क्यों गरल-पान कर मुसकाता जा,
गिरता जा, हँसकर उठता जा, बढ़ता जा, रे! टकराता जा,
अक्षय-ज्योति लिए प्राणों में
कल-कल कर चल, मेरे यौवन!
छिपा हुआ काँटों के वन में सुखमय सौरभ लहराता है,
गला-गला कर तन पतझड़ में पादप नव-जीवन पाता है,
झंझा के भीषण झोंकों में नव-मलयानिल लहराता है!
भाग्य बना अपना मिट-मिट कर,
क्यों प्रतिपल करता तू क्रन्दन !
*समाप्त*
(ले. श्री लक्ष्मीनारायण गुप्त “कमलेश”)
निज आत्म-शक्ति महान है!
संसार के शुभ-क्षेत्र में बस आत्म-तेज प्रधान है!!
आत्म शक्ति-विकास से ही सृष्टि की है शृंखला,
और इसमें ही भरी है ‘मैस्मरेजम’ की-कला;
सब सफलता और साधन का यही आगार है,
भोग और अनेक-तत्वों का इसी में सार है;
अति सरल इससे समझना विश्व का विज्ञान है!
निज आत्म-शक्ति महान है !!
ऋषि-सिद्धि विभूति इसके हैं भरी भण्डार में,
मुक्ति माया सब इसी के लोटती है द्वार में;
कौन-सी है वस्तु जग की जो न इससे मिल सके,
कौन-सी है शक्ति ऐसी जो न इससे हिल सके;
जीवन इसी से पा रहा प्रति-पल परम-उत्थान है!
निज आत्म-शक्ति महान है!!
वर्तमान युग में भौतिक विज्ञान ने असाधारण उन्नति की है। उसने अपनी प्रत्यक्षता सर्वसाधारण पर प्रकट करके मनुष्य जाति को आश्चर्य में डाल दिया है। उस वैज्ञानिक उन्नति में पाश्चात्य देशों का प्रमुख हाथ है। इस उन्नति का अधिकाँश श्रेय उन्हीं को प्राप्त है। अतएव नवीन पीढ़ी के मनों में यह बात घर कर गई है कि पाश्चात्य देश हमारी अपेक्षा अधिक समुन्नत हैं। बड़ों की नकल छोटे किया करते हैं। बड़प्पन की भावना पाश्चात्यों के लिए स्थापित की गई तो यह स्वाभाविक ही है कि उनके द्वारा कही जाने वाली और की जाने वाली बातों को प्रामाणिक माना जाए। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में हम भारतवासी उन्हीं बातों को प्रामाणिक, सत्य एवं ग्राह्य मानते हैं जिनपर पश्चिम देशवासियों की मुहर लगी होती है। योरोपियन भाषा, पोशाक, फैशन, शिष्टाचार, रहन सहन, खान पान, रीति रिवाज, आचार विचार हमारे जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। भारतीय सभ्यता का आधे से अधिक स्थान योरोपीय सभ्यता ग्रहण कर चुकी है, यह प्रत्यक्ष है, पर कोई इस बात को आँख पसार कर देख सकता है, अनुभव कर सकता है।
यह सब बातें हम आलोचना करने के लिए नहीं लिख रहे हैं। इन पंक्तियों में इस परिवर्तन की भलाई बुराई पर प्रकाश डालने के लिए स्थान नहीं है। यहाँ तो यह चर्चा, वास्तविकता का दिग्दर्शन कराने के उद्देश्य से की गई है। सचमुच प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हमारे मनों ने पश्चिम का नेतृत्व स्वीकार किया हुआ है। विमानों की बात हँसी में उड़ाई जा सकती है पर हवाई जहाजों की प्रत्यक्षता पर कौन अविश्वास करेगा? संजय ने दिव्य दृष्टि से धृतराष्ट्र को महाभारत का वर्णन सुनाया था वह झूठ कहा जा सकता है पर टेलीविजन (रेडियो द्वारा चित्र दर्शन) को कौन गलत कहेगा? पाताल (अमेरिका) से अहिरावण ने लंका के रावण से दूर दूर होते हुए भी वार्तालाप किया था वह गप्प कही जा सकती है पर रेडियो को मिथ्या कौन कहेगा? कहा जाता है कि यह प्रत्यक्षवाद का जमाना है, इसमें सिर्फ वह बातें मानी जा सकती हैं जो प्रत्यक्ष हैं, जो विज्ञान सम्मत हैं।
उपरोक्त विचारधारा ने हमारे जीवन की प्रत्येक दिशा में प्रवेश किया है आध्यात्मिक तत्व को भी इसने अछूता नहीं छोड़ा है। ऐसे असंख्य लोग हैं जो योग की सिद्धियों पर विश्वास नहीं करते परन्तु मैस्मरेजम या उसके समतुल्य हिप्नोटिज्म, टेलीपैथी, क्लेयर वायेन्स, मेन्टल हीलिंग, स्प्रिचुअलिज्म, मैगनेटिज्म, साइटिज्म, फेनामिनल, थाट रीडिंग, ऑकल्ट साइंस, साइकिक थ्रेपी, साइको मेटरी, ट्र्न्स, फ्रेनालौजी, इलेक्ट्रिक वायलाजी, साइको एनेलेसिस आदि विद्याओं की सत्यता पर उन्हें विश्वास है, क्योंकि एक तो उनपर पश्चिमी लोगों की मुहर लगी है, दूसरे उनके चमत्कार प्रत्यक्ष हैं।
विगत पाँच वर्षों में लगभग पाँच हजार व्यक्ति हमसे पत्र व्यवहार एवं वार्तालाप द्वारा ‘मैस्मरेजम’ के संबंध में जिज्ञासा प्रकट कर चुके हैं जबकि प्राचीन भारतीय योग साधना के लिए एक हजार व्यक्तियों ने भी रुचि न दिखाई होगी। जिनकी आध्यात्म मार्ग में रुचि हैं ऐसे साधकों में उनकी संख्या अधिक हैं जो मैस्मरेजम की चमत्कारी पद्धति को जानना ओर सीखना चाहते हैं। अपने प्रियजनों को सदा से ही हम यह बताते रहें हैं कि मैस्मरेजम में कोई अनोखी बात नहीं है, यह योग साधना का एक बहुत ही छोटे दर्जे का तुच्छ सा खेल है। ऐसे खेल करने पर भारतीय योगी उतरते तो हजारों तरह की मैस्मरेजमों की रचना हो जाती और वे सब एक से एक अद्भुत होती। मनुष्य का मन जादू का पिटारा है, इसकी हर एक लहर आश्चर्यमयी है। एकाग्रता के द्वारा जो दिव्य शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं उनका वारापार नहीं मिल सकता। श्रीमती ओ. हष्णु हारा ने अपने ग्रन्थ च्च्ष्टशठ्ठष्द्गठ्ठह्लह्ड्डह्लद्बशठ्ठ ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ्नष्ह्नह्वद्बह्द्गद्वद्गठ्ठह्ल शद्ध क्कद्गह्ह्यशठ्ठड्डद्य रुड्डठ्ठद्दद्गह्लद्बह्यद्वज्ज् में विशद वैज्ञानिक विवेचना करते हुए यह साबित कर दिया है कि मनुष्य का मन अद्भुत शक्तियों का भण्डार है और मानसिक एकाग्रता द्वारा आश्चर्यजनक शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं और हो सकती हैं।
पाश्चात्य प्रभाव से प्रभावित जिज्ञासुओं के असाधारण आग्रह के कारण हमें यह ‘मैस्मरेजम अंक’ निकालना पड़ा। हमारे कितने स्नेही मित्र ‘मैस्मरेजम’ सीखने की व्याकुलता में धूर्तों के चंगुल में फँसकर अपना अमूल्य समय तथा पसीने से कमाया हुआ पैसा बर्बाद कर चुके हैं, फिर भी उन्हें कुछ कहने लायक वस्तु न मिली। संभव हैं कि अन्य पाठक भी इसी प्रकार ठोकर खा जावें, इसलिए यह अंक हम प्रस्तुत कर रहे हैं। हमने प्रयास किया है कि इस विषय की प्रायः सभी मोटी मोटी बातों का समावेश हो जाय, बारीकी और विस्तार से लिखने में तो यह अंक कम से कम दस गुना बढ़ जाता जो इस कागज के अकाल में संभव नहीं। विषय को सरल बनाने का ध्यान रखा गया फिर भी पाश्चात्य बातों की पूर्वीय ढंग से प्रतिपादित करने में जो कठिनाइयाँ रह गई हों उन्हें विषय की कलिष्टता ही समझना चाहिए। जो बातें समझ में न आवें उन्हें पाठक हम से पूछ सकते हैं, उनका समाधान कर दिया जाएगा। साथ ही हमारी सलाह है कि कोई पाठक खेल तमाशों में इस शक्ति को जरा भी व्यय न करें। जो बाजीगरी के लिए इस विद्या का उपयोग करेंगे वे अन्ततः बहुत घाटे में रहेंगे। अपनी और दूसरों की सात्विक उन्नति में ही इस विद्या का उपयोग करना उचित है।
(ले. विद्याभूषण पं. मोहन शर्मा, विशारद, पूर्व सम्पादक “मोहिनी”)
मैस्मरेजम का गये 150 वर्ष में जितना प्रचार हुआ है उससे जन साधारण में इसकी चर्चा जोरों से हो रही है पर इसके जानकार और अभ्यासी कम ही दिखाई पड़ते हैं। इसका कदाचित् यह कारण है कि मैस्मरेजम का अभ्यास कठिनाई से होता है और प्रत्येक व्यक्ति स्वभावतः उलझन और कठिनाई में गिरना नहीं चाहता। फलतः हमारे देश में लाखों करोड़ों मनुष्यों के लिये मैस्मरेजम आज भी कौतूहल और आश्चर्य की वस्तु बनी हुई है। मनुष्य समाज में इसके चमत्कार देखने की रुचि, लालसा और आग्रह ने जैसी वृद्धि प्राप्त की यदि अभ्यास क्रम के पक्ष में भी यही होता तो आज दिन मैस्मरेजम के अनन्त उपकारों से हमारे जीवन की समुन्नति में युगान्तर उपस्थित हो जाता। मैस्मरेजम हमारी योग विद्या की ही धारणा है जो मेस्मेर नामक जर्मन विद्वान को खोज और प्रयन्त से प्राप्त हुई और उन्होंने इसे मैस्मरेजम का रूप देकर पश्चिमी देशों में प्रचारित किया। मैस्मरेजम आँग्ल भाषा का शब्द है और मेस्मेर के नाम पर से इस शब्द की सृष्टि हुई है। इसको हिन्दी में ‘प्राण विनिमय’ और उर्दू में ‘इल्म सवज्जह’ कहते हैं। पर हिन्दी, उर्दू के यह दोनों नाम ठीक कार्य सूचक होने पर भी मैस्मरेजम शब्द के मुकाबले में आज तक प्रचारित नहीं हो सके। मैस्मरेज्म के सम्बन्ध में कुछ जानने के पूर्व इसके आध संशोधक मेस्मेर का जीवन परिचय जानना कहीं अधिक आवश्यक है। अतः इसकी जो भी सामग्री उपलब्ध है, उसे हम इस विद्या के प्रेमियों के ज्ञान लाभार्थ ज्यों की त्यों नीचे देने का प्रयत्न कर रहें है।
फ्रेडरिक एन्टोन मेस्मेर का जन्म सन् 1737 ईस्वी के लगभग जर्मनी में रायन नदी के किनारे किसी एक गाँव में हुआ था। वयस्क होने पर इन्होंने वीयना नगर में वेदों का अभ्यास किया और वहाँ से डॉक्टर की उपाधि प्राप्त की। उपाधि मिलने पर सन् 1766 के लगभग इन्होंने “मानव शरीर पर ग्रहों का प्रभाव” विषय में खोज बीन और कठिन अभ्यास का आरम्भ कर दिया। बाद में यह सिद्ध करने का भी जिम्मा लिया कि ‘सूर्य, चन्द्र और दूसरे-दूसरे ग्रह अपने चंचल प्रवाह से जीवित मनुष्यों को प्रतिक्षण प्रभावित कर रहे हैं।” इस चंचल प्रवाह की क्रिया को मेस्मेर ने ‘एनीमल मैग्नेटिज्म’ अर्थात् प्राणियों को आकर्षित करने की शक्ति कहकर प्रसिद्ध किया। पश्चिमी जगत में मेस्मेर की इस अपूर्व शोध से खलबली मच गई। इसके कुछ कालोपरान्त मैस्मेर प्रसिद्ध खगोलवेत्ता जेस्वीट फादर हेल से जाकर मिला जो सन् 1974 में वीयना नगर में आकर बसा था। जेस्वीट फादर हेल लोह चुम्बक के प्रयोग द्वारा कठिन रोगों के रोगियों को आरोग्य प्रदान करता था। इन प्रयोगों को देखकर मेस्मेर ने अपने ग्रहों के सिद्धान्त और लौह चुम्बक के सिद्धान्त में बहुत कुछ समानता पायी। उसने जेस्वीट फादर को बताया कि वह बिना लोह चुम्बक की सहायता के भयंकर मानवीय रोगों को निरन्तर प्रयोग द्वारा अच्छा कर सकता है। अपने इस विश्वास में उसे एक दिन नीचे की घटना पर से और भी अधिक दृढ़ता प्राप्त हुई- एक बार मेस्मेर ने एक घाव के रोगी के उपचारार्थ ज्यों−ही लोह चुम्बक हाथ में लाने का उपक्रम किया कि उसका हाथ एकाएक रोगी के खून से बहते हुए घाव पर फिसल पड़ा जिसका तत्काल ही घाव पर अपूर्व प्रभाव देखा गया। फलतः अपने प्रयोग की विचित्रता अनुभव कर मेस्मेर ने लोह चुम्बक के उपयोग को सदैव के लिये बन्द कर दिया और उस दिन से अपनी चिकित्सा का क्कड्डह्यह्यद्गह्य को ही मुख्य आधार बनाया। उसने तर्क और प्रयोग द्वारा सर्व साधारण में यह प्रसिद्ध किया कि “अखिल संसार में एक खास प्रकार की आकर्षण शक्ति काम कर रही है और वह मनुष्यों की छोटी बड़ी हर एक नस में विशेष रूप से गतिशील होकर विद्यमान है।”
देखते-2 पश्चिमी जगत में मेस्मेर के इन विचित्र प्रयोगों की धूम मच गयी। वीयना के प्रसिद्ध-2 समाचार पत्रों ने मेस्मेर की सफलता के हर्ष सूचक संवाद प्रकाशित किये। कई नामांकित व्यक्तियों ने मेस्मेर को प्रमाण पत्र देकर उसके नवाविष्कृत सिद्धान्त का सम्मान किया। इसी तरह म्युनिच विज्ञान मन्दिर के मुख्य अध्यापक ओस्टर वाल्ड और गणित के अध्यापक बेनरे ने भी मेस्मेर की आश्चर्यजनक चिकित्सा पद्धति की सराहना की। ओस्टर वाल्ड को लकवा हो गया था और बेरने की आँखों की शक्ति क्षीण हो गई थी पर मेस्मेर की चिकित्सा का आश्रय लेने से दोनों ने खोई हुई आरोग्यता पुनः प्राप्त कर ली।
सन् 1775 में मेस्मेर ने यूरोप के प्रमुख विद्यालयों को मैस्मरेजम विषय शिक्षा क्रम में रखे जाने के लिये कई पत्र लिखे पर दुर्भाग्य से किसी भी पाठशाला ने उसके इस सुझाव को मान्य नहीं दिया। जर्मनी के हम वतन पण्डितों और विद्वानों ने भी उसकी पद्धति को प्रमाण भूत मानने में आगा पीछा किया। अतः सन् 1778 में मेस्मेर, वियना नगर छोड़कर पेरिस चला आया। उसके वियना छोड़ने का ठीक-ठीक कारण बताना कठिन है। यह जान पड़ता है कि जुदी-जुदी चिकित्सा पद्धतियों के प्रचारकों की प्रतियोगिता ही उसके मार्ग में बाधक हुई। महानगरी पेरिस में पहिले वह गरीबों के मुहल्ले में जाकर रहा। सन् 1779 में उसने आकर्षण शक्ति की शोध पर एक निबन्ध प्रकाशित कराया जिसमें उसने अपने 27 सिद्धान्तों का खुलासा किया था। कहना नहीं होगा कि इससे उसे अपने इच्छित प्रयास में सफलता प्राप्त हुई। आरम्भ में ही वहाँ के एक सुप्रसिद्ध डॉक्टर ने मेस्मेर के सिद्धान्त के प्रति अपने अटल विश्वास की घोषणा द्वारा उसके प्रचार मार्ग को निष्कण्टक बना दिया। धीरे-धीरे रोगी और विद्यार्थी अधिक संख्या में उपस्थित होने लगे। उनमें से बहुतों को मोह निद्रा में पड़ने की आदत पड़ गई और काम काज इतना बढ़ गया कि मेस्मेर को एक चतुर सहायक की अनिवार्य आवश्यकता जान पड़ने लगी। एक साथ कई रोगियों को मुग्ध करने के उद्देश्य से उसने ‘बेके’ नाम का एक यन्त्र विशेष तैयार किया-इस यन्त्र के द्वारा 30 से भी अधिक मनुष्यों को एक साथ मुग्ध किया जा सकता था। इस यंत्र का वर्णन एक अंग्रेजी पुस्तक में नीचे लिखे अनुसार आया है-
“एक विशाल कमरे के बीचों बीच लकड़ी का एक डब्बा रखा जाता था, जिसके आस पास कपड़े का पर्दा लटकाया जाता; जिसमें होकर प्रकाश की क्षीण रेखाएं आ जा सकती थी। डब्बे की तली में काँच और लोहे के बुरादे पर कई शीशियां इस प्रकार बैठाई जाती कि उनका ऊपरी भाग मध्य बिन्दु की ओर रहता था। इन शीशियों को पानी में डुबाकर रखा जाता। डब्बे के ढक्कन में छोटे मोटे कई छिद्र रहते थे। जिनमें बलखाती हुई लोहे की छड़ें फँसायी जाती थीं रोगीजन इन्हीं छड़ों को पकड़ कर एक दूसरे का हाथ अपने हाथ में ले चारों और चक्राकार बैठाये जाते थे। इसके बाद ही पियानो या हारमोनियम की ध्वनि से कमरा गूँज उठता-कभी-कभी वादन क्रिया के साथ गायन भी होता था जिसमें आस पास बैठे हुये रोगियों की चित्तवृत्ति गायन वादन में केन्द्रित हो जाती थी।
मेस्मेर अपना रेशमी लम्बा कोट पहिने रोगियों के चारों तरफ फिरता था। साथ ही लोहे की लम्बी छड़ को हाथ में रखकर उसे प्रत्येक रोगी के उस अंग से स्पर्श कराता जो रोग की पीड़ा का मुख्य स्थान माना जाता था बीच में कभी-कभी वह अपनी इस ‘जादू की लकड़ी’ को एक ओर रखकर रोगियों पर दृष्टि जमाता था हर एक रोगी पर बारी-बारी से हाथ फेरता रहता था। अनेक अवसरों पर यह पासेज की क्रिया घण्टों तक जारी रहती थी। इस प्रकार की क्रिया से युवती स्त्रियों पर इतना अधिक प्रभाव हुआ कि वे बारम्बार मोह निद्रा में जाना पसन्द करने लगीं। इस प्रकार मेस्मेर की इस विचित्र पद्धति ने अत्यल्प समय में ही अधिक से अधिक मनुष्यों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। रोगियों की संख्या वृद्धि होने से चिकित्सालय का स्थान संकीर्ण जंचने पर मेस्मेर ने ‘बुलियन होटल’ नामक तथा मकान भाड़े पर रखा, जहाँ उसने चार बेके यन्त्र एक साथ बैठाये जिनमें एक को गरीब और अपाहिजों के लिये मुफ्त चिकित्सा के नाम पर खोल दिया। पर इतना व्यवस्थित उपाय करने पर भी रोगियों की संख्या और भीड़ में कोई कमी नहीं हुई। तब उसने सबोंडी नाम के राजमार्ग पर एक विशाल वृक्ष द्वारा अपना प्रयोग आजमाने की ठानी। हजारों रोगी मनुष्य उस वृक्ष के समीप जाकर उसकी शाखाओं से लटकी हुई रस्सियों को पकड़ कर अपने-अपने योग की निवृत्ति के लिये घण्टों प्रयोग में सम्मिलित रहने लगे। इसके फलस्वरूप कितने ही रोगियों को स्वास्थ्य लाभ हुआ पर मेस्मेर ने अपने पहली चिकित्सा पद्धति के मुकाबले में इस क्रिया को अधिक लाभकारी नहीं पाया। इसलिये पहले पद्धति ही चिकित्सा के लिये ठीक समझी गई।
मेस्मेर की इस उपचार विधि का सिलसिला अधिक समय पर्यन्त स्थायी नहीं रह सका। उसके इस मार्ग में भाँति-भाँति की कठिनाईयाँ उत्पन्न होने लगी। जब वह पेरिस गया था तो उसने वहाँ के विज्ञान मन्दिर के अध्यक्ष और सरकारी औषधालयों के अधिकारियों से अपने प्रयोगों के विषय में अनुसंधान करने की अपील की थी। परन्तु अनुसन्धान कार्य के लिये मेस्मेर ने जो शर्तें रखी थीं वह अन्वेषकों को स्वीकार नहीं हुईं-इससे वह क्रुद्ध होकर वहाँ से चला गया। इसके कुछ दिनों बाद मोश्योर डीवोजेम्स की अध्यक्षता में एक दूसरी समिति ने अनुसन्धान कार्य आरम्भ किया जिसके अधिकाँश सभासद मेस्मेर के निपट विरोधी थे। अतः समिति ने बिना कोई संगीन जाँच पड़ताल के अपना कार्य समाप्त कर दिया और मेस्मेर को यह धमकी दी कि वह अपनी प्रणालियों में शीघ्रता से सुधार करे अन्यथा उसका सरकारी प्रमाण पत्र उससे छीन लिया जायेगा। इन कारणों से अन्त में मेस्मेर को फ्रांस की भूमि त्याग करने के लिये बाध्य होना पड़ा। उसने फ्रांस सरकार के सामने यह शर्त रखी कि वह उसे 20000 फ्रेंक की पेन्शन देना स्वीकार करे तो वह फ्रांस में रह सकता है।
मेस्मेर कुछ दिनों तक ही फ्रांस के बाहर रहा होगा कि उसके अनुयायियों ने उसकी लोभी मनोवृत्ति का अनुभव कर उसके एक भाषण के लिये 10000 लुई का चन्दा एकत्रित कर उसे पुनः फ्राँस बुला लिया। इस अवसर पर मेस्मेर ने अपने भाषणों में गुप्त शोध पर कोई विशेष प्रकाश न डालते हुये जो विवरण पेश किया उससे उसके अनुयायियों में फूट पड़ गई। अन्त में फ्राँस सरकार ने मध्यस्थता स्वीकार की और सन् 1784 में मैस्मरेजम के सम्बन्ध में सरकारी तौर पर जाँच करने के लिये एक कमीशन बैठा। जिसने अपनी खोज के बाद निर्णय किया कि “(मैग्नेटिज्म) आकर्षण शक्ति, अनुकरण, कल्पना और संसर्ग के परिणाम से उत्पन्न होती है और यह अभ्यास साध्य है।” कमीशन का यह निर्णय प्रकाशित होने पर मेस्मेर फ्रांस छोड़कर जर्मनी चला आया। यहाँ उसने अपना शेष जीवन किस प्रकार व्यतीत किया इसका वृत्तांत आज तक अप्राप्य है। अन्त में सन् 1815 के लगभग मैस्मरेजम के जनक मेस्मेर का 81 वर्ष की उतरती अवस्था में निज जन्म भूमि जर्मनी में देहावसान हुआ। इस तरह मेस्मेर की जीवन लीला सम्बन्धी ऐतिहासिक धुँधली स्मृतियाँ यहाँ समाप्त होती हैं। पर मैस्मरेजम के भूतल व्यापी प्रचार को देखते हुये सिद्धान्त रूप से ये आज भी जीवित हैं और इस विद्या के अनुरागियों का पथप्रदर्शन करा रहे हैं।
पाठकों को आवश्यक सूचनाएं।
1. सादा लिफाफे में टिकट आदि भूल कर भी न भेजना चाहिए ऐसे लिफाफे प्रायः रास्ते में ही खुल जाते या गायब हो जाते हैं। लिफाफे में टिकट आदि भेजना डाकखाने के कानून के खिलाफ एवं एक प्रकार की चोरी है पोस्टल आर्डर या चैक, रुपया पैसा मनीआर्डर, बीमा द्वारा ही भेजना चाहिए?
2. सादा पैकिट से पुस्तकें नहीं भेजी जाती। क्योंकि ऐसे पैकेटों के पहुँच जाने की जिम्मेदारी नहीं है। इसलिए एक दो पुस्तकें मँगाने वालों को रजिस्ट्री खर्च के लिए पाँच आने भी मूल्य के साथ ही जोड़ कर भेजने चाहिए।
3. कम से कम आठ पुस्तकें लेने पर डाक खर्च हम लगा देते हैं। कम पुस्तकें लेने पर रजिस्ट्री डाक खर्च खरीदार को देना होगा।
4. अपना पूरा पता और ग्राहक नम्बर हर पत्र के साथ अवश्य लिखना चाहिए।
-मैनेजर -’अखंड ज्योति’
पिछले पृष्ठों पर हमारे आदरणीय मित्र पं. मोहन शर्मा ने अपने लेख में मैस्मरेजम के आविष्कर्ता डॉक्टर मेस्मेर की संक्षिप्त जीवनी लिखी है। उसे पढ़कर पाठक यह समझ सकेंगे कि उस महापुरुष ने कितने प्रबल प्रयत्नों के साथ इस विद्या को सुव्यवस्थित रूप में बनाकर सर्व साधारण के सम्मुख प्रस्तुत किया निस्संदेह इस विद्या को ठीक ठीक रूप देने में डॉक्टर मेस्मेर को श्रेय है। परन्तु यह न समझना चाहिए कि इस विद्या का आदि और अन्त भी उन्हीं के साथ था। बहुत प्राचीन काल से इस दिशा में प्रयत्न हो रहे थे और उनके पीछे भी बहुत कुछ हुआ है। ईसा की छठवीं शताब्दी में ग्रीस देश के एक पंडित सोलन ने बहुत से ऐसे रोगी प्राणशक्ति से अच्छे किये थे जो औषधि से ठीक नहीं हो सके। पांचवीं शताब्दी में नील नदी के तट पर रहने वाले जीयस नामक योगी इस विधि में प्रसिद्ध था। ईसा के 431 पूर्व डॉक्टर हिमोक्लेटस इस विद्या के पंडित थे। एक दूसरा ग्रीक विद्वान एसक्लिपियेडिस, मार्जन द्वारा बीमारों को अच्छा करता था। ईसाई धर्म के प्रवर्तक यीशु और उनके साथी मोजेस दोनों ने यह विद्या मिश्र देश के पुरोहितों से सीखी थी। इंजील से प्रकट है कि यीशु ने इस विद्या के बल से असंख्य पंडितों को अच्छा किया था। सन् 1700 में आयरलैंड के ग्रीट्रेक्स नामक न्यायाधीश ने देश विदेश में घूम-घूम कर शारीरिक बिजली के द्वारा अनेक लोगों के कष्ट दूर किये थे। सन् 1501 में कार्डेनस नामक एक व्यक्ति ने मैस्मरेजम के प्रयोग किये थे सन् 1649 में विलियम मैक्सवेल नामक अंग्रेज ने इस विद्या के मूल तत्व लिखे थे। ईसा से 500 वर्ष पूर्व यूनान का योगी पिथागोरस हाथ के इशारे से बड़े बड़े भयंकर जंगली जीवों को इच्छानुवर्ती बना लेने के लिए प्रख्यात था। इपीरस का राजा पिहस, क्रेस्पेसियन का राजा हेडरियन अपनी उंगलियों से छूकर पीड़ित स्थान को अच्छा कर देते थे। इंग्लैंड और फ्राँस के कई राजा इस विद्या के अच्छे अभ्यासी हो चुके हैं। इस प्रकार पंडित इस्कुलेपियस इंग्लैंड का पुजारी उरुइड ह्वान हेमंह, स्काटलैंड निवासी मेक्सवेल, पादरी हेडल आदि अनेक माननीय पाश्चात्य सज्जनों ने इस विद्या द्वारा लाभ उठाया है। मिश्र देश के अलफराद नामक एक विचित्र आध्यात्म शक्ति सम्पन्न योगी की अद्भुत कथाएं सुनी जाती हैं। तिब्बत के लामा योगियों का थोड़ा बहुत परिचय जिन्हें है वे उनकी अद्भुत शक्तियों का वर्णन करते करते नहीं थकते।
डॉक्टर मेस्मेर के पश्चात् योरोप तथा अमेरिका में इस विद्या की पर्याप्त शोधें हुई है और हो रही है। डॉक्टर ग्रेगरी और राय केन बक यह दोनों ही समकालीन प्रयोक्ता रहे हैं योरोप में एक समय इनकी धाक थी। ल्यूविस नामक नीग्रो ने ऐसी सफलता प्राप्त की थी कि ‘जब वह मन को एकाग्र करता था चेहरा प्रकाशवान हो उठता था, एक साथ बीस पच्चीस आदमियों को बेहोश कर देने की शक्ति उसमें थी। डॉक्टर डार्लिग और डॉक्टर ब्रड ने चमकती हुई चीज पर दृष्टि रखवा कर मनुष्यों को निद्रित करने की एक अलग विधि का प्रचार किया। डॉक्टर एसडेज नामक सिविल सर्जन अपने बीमारों को मैस्मरेजम से बेहोश करके आपरेशन किया करते थे। क्लोरोफार्म का प्रयोग करने की उन्हें जरूरत न पड़ती थी। लीवस नामक एक विद्वान ने संगीत की एक ऐसी विधि निकाली थी जिससे वह अपने बीमारों को निद्रित कर देते थे, डॉक्टर विलियम डेवी श्वास प्रश्वास क्रिया द्वारा जल को ऐसा अभिमंत्रित कर देते थे कि उसके सेवन करते ही मनुष्यों पर असाधारण प्रभाव पड़ता था, कप्तान जेम्स कुर्सी या चौकी पर किसी व्यक्ति को बिठाते थे और उस पर मार्जन क्रिया द्वारा प्रभाव डालते थे। रूस के बादशाह जार को एक मैस्मरेजम ज्ञाता ने अपने हाथ की कठपुतली बना रखा था, वह जो चाहता था सो उससे कराता था। इस ग्रेगरी को ‘रूस का राहु’ की इतिहास लेखकों ने उपाधि दी है।
योरोप में आजम ब्रोका और बरन्युस इस विद्या के दो बड़े आचार्य हुए हैं। दुमोन्ट पेलियर पेट्रिस, विनसुए जर, चारकोट, लुटसन इनके प्रयोग बहुत सफल रहा करते थे। लायवोल्ट को अपने प्रयोगों में 90 फीसदी और बर्हम को 80 फीसदी सफलता मिली थी। स्वीडन वासी बेटर्स ब्राड, एमर्स्टडम निवासी वान रेन्टर धम और धान ईडन की सफलताएं चारों ओर प्रसिद्ध हो चुकी थी। जेम्स कोट ने इस विज्ञान के सूक्ष्म तत्वों को सर्व साधारण पर भले प्रकार प्रकट किया था। मार्जन किया में डी ल्यूज ने अनेक नये आविष्कार किये। वर्न्हीम ने बिना निद्रित किये ही पात्र को प्रभावित करने का विज्ञान रच डाला। डॉक्टर एल्फ्रड में ऐसी शक्ति थी कि उनके द्वारा निद्रित किये हुए लोग दूर स्थानों के दृश्यों को ठीक ठीक देख लेते थे। डॉक्टर हाल फ्रायड ने एक पात्र को निद्रित करके उससे पूछा कि अमेरिका के प्रेसीडेण्ट इस समय क्या कर रहे हैं पात्र ने बताया कि प्रेसीडेण्ट विलसन इस समय व्हाइट हाउस में कुर्सी पर बैठे हुए एक तार पढ़ रहे हैं। तार का मजबून भी उसने बता दिया। इस तार में सुलह कान्फ्रैन्स की ऐसी गुप्त राजनैतिक बातें थी जिनका किसी को कानों कान पता नहीं हो सकता था। डॉक्टर हाल फ्राइड तुरंत ही प्रेसीडेण्ट के पास गये और उस तार की बात मालूम होने का भेद प्रकट किया। विलसन आश्चर्य से सन्न रह गये कि इतनी गुप्त बात किस प्रकार इन्होंने जान ली। उन्होंने डॉक्टर साहब के प्रयोग की सचाई को स्वीकार किया, साथ ही उस तार का भेद किसी पर प्रकट न करने का कठोर आदेश कर दिया। डॉक्टर डब्ल्यू ब्राउन ने गत महायुद्ध के समय मैस्मरेजम विद्या से 60 फीसदी ऐसे बीमार सैनिक अच्छे किये थे जिन्हें उन्माद, निद्रानाश आदि रोग हो गये थे।
जर्मनी के डॉक्टर अलबर्ट मैस्मरेजम में ‘संकल्प प्रकाश’ की विशेष शक्ति मानते थे। उनके प्रयोगों का यही आधार था। प्रोफेसर फ्रायड के मत से ‘अन्तः चेतना’ को प्रभावित करने से व्यक्तियों को प्रभावित किया जाता है। काउण्ट पुसीगर ने मानवीय विद्युत के संबंध में चमत्कारिक शोधें प्रकट की। प्रो. विलियम क्रुक्स जो पहले इस विद्या के कट्टर विरोधी थे, अन्त में इसकी सत्यता से प्रभावित होकर पूर्ण भक्त बन गये। लंदन में डॉ. ईलिरसन ने इसी विद्या से निद्रित करके अनेक रोगियों के आपरेशन किये थे। फ्रांस के मनोविज्ञान वेत्ता आचार्य ऐमिली क्यू ‘आदेश द्वारा कठिन रोगों की चिकित्सा करते हैं।
शोधें करते करते अन्वेषकों में मतभेद भी हुआ है। जेम्स कोट और ब्राइड के सिद्धान्तों में प्रत्यक्ष मतभेद हैं। योरोप में अब (1) मेस्मेर का सिद्धान्त (2) नेन्सी का सिद्धान्त (3) चारकोट का सिद्धान्त यह तीन पृथक सम्प्रदाय हो गये हैं। मेस्मेर के मत वाले ओज शक्ति और एकाग्रता को प्रधान मानते हैं। नेन्सी का मत है कि केवल मार्जन-(पास) और आदेश (सजेशन) से भी यह सब हो सकता है। (4) चारकोट के मत से चमकदार चिकनी वस्तुओं पर एकाग्रता करने से निद्रा आ सकती है। तीनों ने ही अपने अपने मत की पुष्टि में सप्रमाण सहित बड़े बड़े ग्रन्थों की रचना की है।
अब तक मैस्मरेजम संबंधी अनेक अच्छी पुस्तकें निकल चुकी हैं। उनमें डॉक्टर विलियम्स की Text book of Mesmerism, डॉक्टर ग्रेगरी की Animel Magnetism, डॉ. विलियम डेवी की, The Illas Tracted Practical Mesmerist, प्रो. एलिस ग्रे की Miracles of Nature, डॉ. ब्राइड की Hypnotism, जेम्स बर्न्स की Mesmerism, डाक्टर एसडेल की Mesmerism, एलिन पुटमेन की Works on Spritualism, डॉक्टर डबल्यू ई फोरेस्ट की Hydien, ओ. हष्णुहारा की Practical Hypnotism, डुएन्ट डी ग्रोस की Electrodyne misme vital सी. डबल्यू. लेडवीटर की Dreams, एफ. एच. मायर्स की Human Personality, सर ओलिवर लाज की Survival of Man, प्रोफेसर बैरेट की Psychical Research, मोडाल्यूज की History of Megnetism, त्रिश्नन डी. लारसन की Your forces & how to use them आदि पुस्तकें विशेष महत्व की है। इस प्रकार की पुस्तकें M/s L.N.Fowler&co. 7 Imperil Arcade, Ludgate Circus London E. C. 7 की मारफत मँगाई जा सकती हैं।
प्रकृति के रहस्य बड़े गूढ़ हैं। मनुष्य जाति जितना कुछ जान सकी है वह अल्प है, उससे असंख्य गुना जानना अभी बाकी है। स्वतंत्र और मस्तिष्क के लोग इसी दृष्टि कोण से विचार करते हैं। किसी लकीर के फकीर बन बैठने से उस विद्या को सजीवता नष्ट हो जाती है। हर्ष की बात है कि मैस्मरेजम विद्या डॉक्टर मेस्मेर का सम्प्रदाय बनकर नहीं रह गई, वरन् इसके संबंध में अधिक गहरी महत्वपूर्ण शोधें हुई हैं और हो रही हैं। यह वैज्ञानिक अन्वेषण जारी रहे तो हमारा विश्वास है कि भारतीय योग शास्त्र एवं आध्यात्म शास्त्र को ही आदर्श स्वीकार करना पड़ेगा और नवीन पीढ़ी को उन्हीं सिद्धान्तों का अनुगमन करते हुए आगे बढ़ना पड़ेगा।
हास्य रस केवल सुख की नदी ही नहीं बहाता, बल्कि दिल की गाँठो को भी खोलता है।
मैस्मरेजम विद्या के अनुसार जो शक्ति उत्पन्न होती है उसके तीन स्रोत हैं (1) इच्छा (Will) (2) आदेश (Suggestion) (3) मार्जन (Passes) इन तीन साधनों द्वारा शक्ति का उत्पादन और प्रयोग करके प्रयोक्ता लोग आश्चर्यजनक कार्यों का सम्पादन करते हैं। अब हम इन तीनों तथ्यों पर कुछ प्रकाश डालते हैं।
(1) इच्छा-शक्ति- ईश्वर ने इच्छा की कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ” फलस्वरूप इस सारे जगत की रचना हो गई। इच्छा के कारण ही मनुष्य स्वर्ग-नरक, बंध-मोक्ष, जन्म मरण के चक्र में घूमता है। संसार की सारी हलचल संकल्प के आधार पर है। जहाँ कहीं जो कुछ कार्य हो रहा है इच्छा के कारण ही हो रहा है। चैतन्य प्राणियों की चेतना इच्छा से परिपूर्ण है, कुछ न कुछ इच्छा उन्हें बनी ही रहती है, और उसी की प्रेरणा से शारीरिक एवं मानसिक यंत्र चलते रहते हैं। इच्छा और चेतना दो ऐसे तत्व हैं जिनको एक दूसरे के पृथक नहीं किया जा सकता। निखिल विश्व ब्रह्माण्ड में जो चेतना काम कर रही है वह संकल्पमय है। संकल्प के शान्त होते ही चेतना भी समाप्त हो जाती है।
वैज्ञानिक टी.डी. ब्रेनो ने सिद्ध किया है कि जड़ प्रकृति का एक सूक्ष्म परमाणु-इलेक्ट्रॉन-इतनी शक्ति रखता है कि उसके विस्फोट से लन्दन जैसा महानगर, क्षणभर में भस्मसात् हो सकता है। जड़ प्रकृति के परमाणुओं की इतनी महान शक्ति कूती गई है। परन्तु चैतन्य जगत् के एक परमाणु का जब अन्वेषण किया जाएगा तब पता चलेगा कि उसके अंतर्गत जड़ परमाणुओं की अपेक्षा सहस्रों गुनी शक्ति छिपी पड़ी है। जड़ पदार्थों पर पूरा पूरा शासन चैतन्य का है। जो चैतन्य है वह अपनी क्षमता के कारण जड़ पदार्थों का मनमाना उपयोग करता है। इससे प्रकट है कि चैतन्य में जड़ की अपेक्षा कहीं अधिक और उच्चकोटि की शक्ति है।
मनुष्य चैतन्य प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है। उसमें अन्य जीवधारियों की भाँति साधारण चेतना तो है ही साथ ही विकास के उच्च शिखर पर पहुँची हुई आत्मिक चेतना भी है। इस चेतना में अकूत ताकत है। विकासवाद के आचार्य डार्विन महोदय ने प्रमाणों सहित साबित किया है कि मक्का की भुट्टियों ने अपनी रक्षा के कारण अपने ऊपर परतदार खोल उत्पन्न किया। माँसाहारी चिड़ियों की पहचान में न आने की इच्छा से तितली ने अपना रंग फूलों जैसा बनाया। पेड़ों के नीचे खड़े होने पर धूप छाया से दीखें और पहचाने न जा सकें इस इच्छा के कारण कितने ही जीवों ने अपने शरीर चितकबरे बना लिये, कुछ घास में छिपने वाले घास के रंग के हो गये। इन सब बातों से पता चलता हैं कि इच्छा के कारण छोटे दर्जे के जीव बड़े बड़े परिवर्तन करने में सफल हुए हैं। फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या? उसकी इच्छा शक्ति ने निर्जन, सुनसान, ऊबड़ खाबड़, जमीन को कैसी रंगभूमि बना दिया है, तरह तरह के अद्भुत आविष्कारों और कला कौशलों से पृथ्वी को कैसा चित्र सा बना दिया है। किसी उजाड़ नक्षत्र का इस सरसब्ज पृथ्वी से यदि कोई मुकाबला कर सके तो वह समझेगा कि मनुष्य के संकल्प में कितनी रचना शक्ति है। जितनी अब तक प्रकट हुई उसने अनेकों गुनी अभी अप्रकट पड़ी हुई है।
निस्संदेह संकल्प की शक्ति महान है। यों कहना चाहिए कि वह सर्वोपरि है। इच्छा के बल से जीव महानतम कार्य कर सकता है। मैस्मरेजम जैसी साधारण योग्यता का उसके द्वारा प्राप्त कर लेना बिलकुल ही साधारण और सरल है। ‘चाहना’ और ‘इच्छा करना’ दो पृथक बातें हैं। केवल चाहना ‘शेख चिल्ली की से कल्पनाएं करना’ कुछ विशेष महत्व की बात नहीं है इससे शक्ति उत्पन्न नहीं होती किन्तु ऐसी इच्छा जिसके पीछे एकाग्रता, गम्भीरता, दृढ़ता, तत्परता, तीव्रता और प्रयत्नशीलता भी हो अवश्य ही फलवती होती है उसके असफल होने की संभावना नहीं रहती।
श्रीमती ओ. हष्णुहारा ने मानसिक शक्तियों की विवेचना करते हुए सिद्ध किया है कि मस्तिष्क में तीव्र इच्छा के साथ जो भावना की जाती है उससे बड़ी शक्तिशाली विद्युत लहरें उत्पन्न होती हैं यह लहरें ईथर तत्व में दौड़ पड़ती हैं और चाही हुई बात को पूरा करने के लिए परिस्थितियाँ जुटाने में लग जाती हैं। उनका यह भी मत है कि जिस वस्तु या कार्य के लिए तीव्र इच्छा की जाती है वे विद्युत लहरें नियत स्थान पर पहुँच कर अनुकूलता पैदा करने लगती हैं। मनोविज्ञान के सिद्धान्तानुसार तीव्र इच्छा में दूसरों को प्रभावित करने की पर्याप्त शक्ति है। श्रद्धा और विश्वास को तुलसीदास जी ने भवानी और शंकर की उपमा दी है। भगवान उमाशंकर सर्व शक्तिवान हैं, श्रद्धा और विश्वास की प्रचण्ड सत्ता से कौन इनकार कर सकता है।
अखण्ड ज्योति के पाठकों में एक भी ऐसा न होगा जो संकल्प की शक्ति से अपरिचित हो। भावना से भगवान प्रकट होते हैं, फिर मैस्मरेजम की योग्यता प्रकट होने में तो संदेह ही क्या है। आतिशी शीशे द्वारा जब थोड़ी सी परिधि की सूर्य किरणें एक स्थान पर एकत्रित कर दी जाती हैं तो अग्नि उत्पन्न हो जाती है। सारे शरीर में व्याप्त शक्तियों को एक स्थान पर एकत्रित करके यदि किसी जगह उसे फेंका जाए तो उसका प्रहार और प्रभाव असाधारण होगा। मैस्मरेजम के प्रयोक्ता अपनी मानसिक शक्तियों को तीव्र इच्छा के द्वारा एकीकरण करके किसी व्यक्ति पर फेंकते हैं, यह प्रहार व्यर्थ नहीं जाता वरन् सनसनीखेज असर दिखाता है। इसी असर को लोग “मैस्मरेजम का चमत्कार” कहकर पुकारा करते हैं।
(2) आदेश- मनुष्य स्वतः गीली मिट्टी के समान है। उसे चाहे जैसा ढाला जा सकता है। छोटा बच्चा जिन लोगों के द्वारा पाला पोसा जाता है उन्हीं की भाषा सीखता है। वैसे ही आचरण, विचार, व्यवहार ग्रहण करता है। मेहतर का लड़का गंदगी से घृणा नहीं करता पर उच्च वर्ण का बालक वैसे स्वभाव का न होगा। यह अन्तर क्यों है? इसको खोज करने पर पता चलता है कि मेहतर के बालक के ऊपर जिन लोगों का प्रभाव पड़ा है वे गंदगी से घृणा नहीं करते इसलिए उसने अपने पथ प्रदर्शकों का प्रभाव ग्रहण किया। इसी प्रकार उच्चवर्ण के बालक ने भी अपने अभिभावकों का प्रभाव ग्रहण करके तदनुसार आचरण करना सीखा।
गीली मिट्टी को जैसे साँचे में ढाला जाता है वैसा ही बर्तन या खिलौना बनकर तैयार हो जाता है। मनुष्य का निर्माण, आदेशों (Suggestion) के साँचे में होता है। जो जैसे वातावरण, विचार और परिस्थितियों में बढ़ा है वह उसी प्रकार का ढल जाएगा। अफ्रीका में एक बार एक भेड़िया दो मनुष्य बालकों को उठा ले गया। कुछ ऐसी अद्भुत बात हुई कि उसने उन बालकों को खाया नहीं वरन् पाल लिया। बहुत दिन बाद शिकारियों का एक दल उधर से निकला तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि मनुष्य बालक भेड़ियों के साथ रहते हैं, वैसे ही चार पैर से चलते हैं, उसी तरह गुर्राते हैं, शिकार पकड़ते हैं और कच्चा माँस खाते हैं। इन बालकों को पकड़ कर मानव तत्व की खोज करने वालों की अन्वेषणशाला में भेज दिया गया।
वैज्ञानिकों की एक प्रसिद्ध सभा अब इस निष्कर्ष पर पहुँच गई है कि “मनुष्य स्वयं एक कोरे कागज की तरह होता है उस पर जैसा कुछ अंकन होता है वैसा ही वह बन जाता है।” अब वे लोग कई बालकों को अलग अलग एकान्त कमरों में रखकर परीक्षण कर रहे हैं। इनका पालन पोषण करने के लिए सुविज्ञ वैज्ञानिक नियुक्त हैं। इनके अतिरिक्त और कोई उन बालकों के पास नहीं जा सकता। इस प्रयोग द्वारा उन बालकों को वर्तमान मनुष्यों से सर्वथा भिन्न विचार, विश्वास, शक्ति और संभावनाओं वाला बनाया जा रहा है। इसमें सफल होने की वैज्ञानिकों को पूरी आशा है।
‘संगति का प्रभाव’ इस सत्य को सब कोई स्वीकार करते हैं। उसी संगति का असर पड़ता है जिसका कि प्रभाव मनुष्य ग्रहण करे। यदि प्रभाव ग्रहण न करे तो महात्मा गान्धी जैसे महापुरुष के साथ रहकर भी दुष्टात्मा लोग पहले जैसे दुष्ट ही बने रहते हैं। यदि प्रभाव ग्रहण करें तो दूरस्थ व्यक्ति का असर भी अपने में धारण कर सकता है। ‘एकलव्य भील’ ने दूरस्थ गुरु की मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसी से बाण विद्या सीख ली थी। ‘संगति’ का तात्पर्य ‘पास रहना’ नहीं, वरन् ‘प्रभाव ग्रहण करना’ है। पास पास रहना तो संगति का एक छोटा सा साधन है। यह हो सकता है कि पास रहते हुए भी प्रभाव न हो और दूरस्थ व्यक्ति का असर पड़ जाए। कारण स्पष्ट है सच्चे अर्थों में ‘सत्संग‘ वही है जिसमें प्रभाव ग्रहण किया जाता है।
‘प्रभाव’ की शक्ति अद्भुत है। इसके द्वारा मनुष्य कुछ का कुछ बन जाता है। मैस्मरेजम विद्या में ‘इच्छा शक्ति के उपरान्त ‘प्रभाव शक्ति’ का स्थान है। इसे ही आदेश या सजेशन कहते हैं। प्रभाव डालने में विचार प्रकाशन मुख्य है। बिना मुँह से बोले आचरण दिखाकर भी प्रभाव डाला जाता है और वाणी से विचारों का प्रकाशन करके भी। आचरण का प्रभाव गहरा पड़ता है क्योंकि फिर उसमें कुछ संदेह नहीं रहता, वाणी में संदेह की गुंजाइश रहती है। इसलिए केवल विचार प्रकाशन से मैस्मरेजम करने वालों का काम नहीं चलता। उन्हें दूसरों को प्रभावित करने के लिए वाणी और आचरण दोनों की सहायता लेनी पड़ती है।
तर्क संदेह या अविश्वास यदि मन में काम कर रहें हों तो दूसरे का फेंका हुआ प्रभाव प्रायः निरर्थक चला जाता है। अखिल ईथर तत्व में रेडियो की वाणी गूँजती रहती है पर सुनाई सिर्फ वही पड़ती हैं जहाँ रेडियो यंत्र लगा हो। इसी प्रकार एक व्यक्ति का प्रभाव सदा एक सा होते हुए भी उसे ग्रहण वही करते हैं जिनका मन उसे ग्रहण करने के अनुकूल है। अविश्वास तर्क, संदेह के स्थान पर श्रद्धा विश्वास या स्वीकारोक्ति मौजूद हैं।
मैस्मरेजम करने वाले जानते हैं कि वाह्य मन (ह्रड्ढद्भद्गष्ह्लद्बक्द्ग रुद्बठ्ठस्र) में तर्क और संदेह की शक्ति है और अंतर्मन (स्ह्वड्ढद्भद्गष्ह्लद्बक्द्ग) में श्रद्धा तथा विश्वास का निवास है इसलिए वे अपना प्रभाव डालने के लिए एक अद्भुत उपाय काम में लाते हैं वे एक विशेष आध्यात्मिक क्रिया द्वारा बाह्य मन को निद्रा ग्रस्त कर देते हैं जिससे तर्क और संदेह की शक्ति शिथिल हो जाए। दरवाजा खुल जाने पर घर में भीतर घुस जाना आसान है इसी प्रकार तर्क, संदेह और विवेचना के सो जाने पर अंतर्मन के ऊपर सुगमतापूर्वक प्रभाव स्थापित किया जा सकता है। साधारण जीवन में तर्क और संदेह की चलनी में भले बुरे प्रभावों को छानता रहता है विवेचना की कसौटी पर उन्हें कसता रहता है तब फिर जो उपयोगी और ठीक जंचते हैं उन्हें स्वीकार करता है और अरुचि कर प्रभावों को अस्वीकार करके बाहर हटा देता है किन्तु मैस्मरेजम क्रिया द्वारा तार्किक मन के निद्रित हो जाने पर फिर यह बात नहीं रहती। प्रयोक्ता अपने प्रभाव को सीधा अन्तः मन पर स्थापित कर देता है। यह बात प्रत्यक्ष है कि अंतर्मन के विश्वासों के आधार पर शारीरिक एवं मस्तिष्कीय क्रियाएं चलती हैं। मैस्मरेजम द्वारा निद्रित मनुष्य की सारी क्रियाएं भी उसी प्रभाव के द्वारा होने लगती हैं जो उस पर डाला गया है। जब तक मैस्मरिक निद्रा है तब तक तो वह प्रभाव पूर्ण रूप से रहता ही है। बाद में भी जग जाने पर भी वह संस्कार बीज रूप से मन पर बने रहते हैं। इस विज्ञान के अनुसार ही आदेश शक्ति का प्रयोग किया जाता है। वाणी द्वारा सूचनाएं-आज्ञाएं-देकर, दूसरे व्यक्ति से इच्छित कार्य कराया जाता है। यही ‘आदेश’ मैस्मरेजम विज्ञान का दूसरा तथ्य है।
(3) मार्जन - अनेक वैज्ञानिक परीक्षणों के उपरान्त यह सिद्ध हो चुका है कि मानव शरीर में एक विद्युत प्रवाह निरंतर जारी रहता है। कोई इसे ओड (ह्रष्ठ) कोई ‘औरा’ (ह्रह्रक्र्न) कहते है। भारतीय शास्त्रों में इसे ‘ओज’ कहा गया है। डॉक्टर मेस्मेर ने इसे ‘एनेमल मैगनेटिज्म’ नाम दिया है। विशेष यंत्रों की सहायता से मनुष्य शरीर के चारों और करीब 6 इंच तक एक प्रकाश दिखाई पड़ता है इसे अंग्रेजी भाषा में ‘औरा’ कहा जाता है। देवी देवताओं की तस्वीरों में उनके मुखमण्डल के आस पास सूर्य जैसा तेज मंडल दिखाया जाता है। इससे प्रतीत होता है कि भारतीय वैज्ञानिक बहुत प्राचीन काल से इस विद्युत तेज के संबंध में जानकारी रखते रहें हैं। शरीर के अन्य अंगों की अपेक्षा चेहरे पर यह तेज अधिक मात्रा में होता है और अधिक दूरी तक फैला रहता है।
डॉक्टर मैस्मर ने इस दिशा में एक और खोज की। इन्होंने साबित किया कि यह तेज हाथों की उंगलियों के छोरों में भी काफी रहता है। पहले एक प्रसिद्ध नक्षद्ध नक्षत्र विद्या के विज्ञ पुरुष मि. जेसवीट फादर, लोह चुम्बक की सहायता से कठिन रोगों की चिकित्सा करते थे। डॉक्टर मेस्मर उनसे मिले और प्रमाणित किया कि इस चिकित्सा पद्धति में लोह चुम्बक का कुछ महत्व नहीं, हाथों की उंगलियों से जो मानवीय विद्युत का प्रवाह निकलता है उसी के प्रभाव से बीमारियाँ अच्छी होती। विशेष कैमरों द्वारा फोटो लेकर भी यह देखा गया कि उंगलियों के आस पास ‘औरा’ बहुत दूर तथा घना और पर्याप्त मात्रा में फैला रहता है। लोहे की सुई उंगलियों से नहीं चिपकती तो भी उंगलियों में लोह चुम्बक के गुण ‘पर्याप्त मात्रा में मौजूद रहते हैं।
बिजली स्वभावतः हलचल उत्पन्न करने वाली, प्रभाव डालने वाली शक्ति है। मनुष्य के शरीर की बिजली का किस प्रकार चमत्कारिक प्रभाव होता है इसका सविस्तार वर्णन हम अपनी “मानवीय विद्युत से चमत्कार” और ‘परकाया प्रवेश’ पुस्तकों में कर चुके हैं उन बातों को यहाँ फिर से दुहराने की आवश्यकता नहीं। यहाँ तो हम संक्षेप में अपने पाठकों को यह बताना चाहते हैं कि इस बिजली की सहायता के कठिन रोगों की चिकित्सा हो सकती है। जिन्होंने हमारी ‘प्राण चिकित्सा विज्ञान’ पुस्तक पढ़ी है वे इस विधि को भली प्रकार जानते होंगे। मैस्मरेजम विद्या में उंगली के छोरों से मार्जन करने पास देने- का तीसरा विधान है। इस क्रिया द्वारा प्रयोग करने वाला अपने शरीर की बिजली को दूसरे के शरीर में प्रवेश कराता है। डॉक्टर द्वारा पेट में पहुँचाई गई औषधियाँ विभिन्न प्रभाव उत्पन्न करती हैं किसी से दस्त होते हैं, किसी से निद्रा आती है, किसी से खून साफ होता है किसी से कफ छँटता है। इसी प्रकार दूसरे के शरीर में डाला गया विद्युत प्रवाह भी इच्छित परिणाम उपस्थित करता है। किन्हीं मार्जनों (क्कड्डह्यह्यद्गह्य) से रोग अच्छे होते हैं। किन्हीं से निद्रा, किन्हीं से चैतन्यता, किन्हीं से मानसिक उथल पुथल किन्हीं से शारीरिक हलचल होती है। इन सब बारीकियों को मैस्मरेजम का प्रयोक्ता जानता है और अपनी विद्युत शक्ति का विधि व्यवस्था के अनुसार दूसरों पर प्रयोग करके इच्छित फल उत्पन्न करता है। मैस्मरेजम का तीसरा तथ्य यही है। मार्जन क्रियाओं का यह आधार है।
उपरोक्त पंक्तियों में मैस्मरेजम के तीन आधार भूत तथ्यों पर-इच्छा, आदेश, मार्जन पर-कुछ प्रकाश डाला गया है। इससे पाठकों को यह समझने में सरलता होगी कि मैस्मरेजम द्वारा दूसरों पर प्रभाव किस प्रकार डाला जाता है। भौतिक बिजली के ए.सी. करेंट और डी.सी. करेंट सिर्फ तांबे और जस्ते के दो तारों के मिलने से उत्पन्न होते हैं परन्तु आत्मिक बिजली में तीन तारों का समन्वय है। इच्छा, आदेश मार्जन यह तीनों तार महत्वपूर्ण विद्युत प्रवाहों से भरे हुए हैं जब ये एक स्थान पर एकत्रित होते हैं, आपस में एक दूसरे को छूते हैं तो तुरंत ही हलचल पैदा करने वाली बिजली उत्पन्न हो जाती है। इसके ‘निगेटिव’ और ‘पाजेटिव’ भागों का ठीक प्रकार विज्ञान सम्मत उपयोग करके चतुर मैस्मराइजर अपने करतब दिखाया करते हैं। संक्षेप में यही मैस्मरेजम का तत्व ज्ञान है।
अपने आत्मिक विद्युत प्रवाह में वृद्धि करना मैस्मरेजम के अभ्यासियों के लिए आवश्यक है। अपनी प्रभावशालिनी योग्यताओं को विकसित करने, बढ़ाने और दूसरों पर असर डालने योग्य बनाने के लिए कुछ अभ्यास करने पड़ते हैं। यही मैस्मरेजम की साधना है।
पिछले लेखों में बताया जा चुका है कि इच्छा, आदेश ओर मार्जन यह तीन क्रियाएं मैस्मरेजम में होती हैं। इन तीनों का संचालन करने के लिए शारीरिक और मानसिक विद्युत शक्ति की मात्रा बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके लिए दो साधन बताये जाते हैं (1) मानसिक विद्युत बढ़ाने के लिए-प्राणाकर्षण प्राणायाम (2) शारीरिक विद्युत बढ़ाने के लिए-त्राटक। दोनों अभ्यास नीचे बताये जाते हैं।
प्राणाकर्षण-प्राणायाम-कहीं एकान्त स्थान में जाओ। समतल भूमि पर नरम बिछौना बिछाकर पीठ के बल लेट जाओ। मुँह ऊपर को रहे। पैर, कमर, छाती, सिर सब एक सीध में रहें। दोनों हाथ सूर्य चक्र पर (आमाशय का वह स्थान जहाँ पसलियाँ और पेट मिलता है) रख लो। मुँह बन्द रखो। शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दो, मानों वह कोई निर्जीव वस्तु है और उससे तुम्हारा कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। कुछ देर शिथिलता की भावना करने पर शरीर बिलकुल ढीला पड़ जाएगा। अब धीरे-धीरे नाक द्वारा साँस खींचना आरम्भ करो और दृढ़ शक्ति के साथ भावना करो कि विश्वव्यापी महान् प्राण भण्डार में से मैं स्वच्छ प्राण, साँस के साथ खींच रहा हूँ और वह प्राण मेरे रक्त प्रवाह तथा समस्त नाड़ी तन्तुओं में प्रवाहित होता हुआ सूर्य चक्र में इकट्ठा हो रहा है। इस भावना को कल्पना लोक में इतनी दृढ़ता के साथ उतारो कि प्राणशक्ति की बिजली जैसी किरणें नासिका द्वारा देह में घुसती हुई चित्रवत् दीखने लगे और अपने रक्त का दौरा एवं नाड़ी समूह तस्वीर की तरह दीखें तथा उसमें प्राण बहता हुआ नजर आवे। भावना की जितनी अधिकता होगी उतनी ही अधिक मात्रा में तुम प्राण खींच सकोगे। फेफड़ों को वायु से अच्छी तरह भर लो और पाँच से दस सेकिण्ड तक उसे भीतर रोके रहो। आरम्भ में पाँच सेकिण्ड काफी हैं पश्चात् अभ्यास बढ़ने पर दस सेकिण्ड तक रोक सकते हैं। साँस रोके रहने के समय अपने अन्दर प्रचुर परिमाण में प्राण भरा हुआ अनुभव करना चाहिये। अब वायु को मुँह द्वारा धीरे धीरे बाहर निकालो। निकालते समय ऐसा अनुभव करो कि शरीर के सारे दोष, रोग और विष इसके द्वारा निकाल बाहर किये जा रहे है। दस सेकिण्ड तक बिना हवा के रहो और फिर पूर्ववत् प्राणाकर्षण प्राणायाम करना आरम्भ कर दो। स्मरण रखो कि प्राण आकर्षण का मूल तत्व साँस खींचने छोड़ने में नहीं वरन् आकर्षण की उस भावना में है जिसके अनुसार अपने शरीर में प्राण का प्रवेश होता हुआ चित्रवत् दिखाई देने लगता है।
इस प्रकार की श्वांस प्रश्वास क्रियाएं दस मिनट से लेकर धीरे धीरे आधे घण्टे तक बढ़ा लेनी चाहिए। श्वांस द्वारा खींचा हुआ प्राण सूर्य चक्र में जमा होता जा रहा है इसकी विशेष रूप से भावना करो। यदि मुँह द्वारा साँस छोड़ते समय आकर्षित प्राण को छोड़ने की भी कल्पना करने लगे तो यह सारी क्रिया व्यर्थ हो जायगी और कुछ भी लाभ न मिलेगा। ठीक तरह से प्राणाकर्षण करने पर सूर्यचक्र जागृत होने लगता है। ऐसा प्रतीत होता है कि पसलियों के जोड़ का आमाशय के स्थान पर जो गड्ढा है, वहाँ सूर्य के समान एक छोटा सा प्रकाश बिन्दु मानस नेत्रों से दीखने लगा है। वह गोला आरंभ में छोटा, थोड़े प्रकाश का और धुँधला मालूम देता है किन्तु जैसे जैसे अभ्यास बढ़ने लगता है वैसे वैसे वह साफ, स्वच्छ, बड़ा और प्रकाशवान् होता जाता है। जिनका अभ्यास बढ़ा चढ़ा है उन्हें आँखें बन्द करते ही अपना सूर्य चक्र साक्षात् सूर्य की तरह तेज पूर्ण दिखाई देने लगता है। यह प्रकाशित तत्व सचमुच प्राणशक्ति है। इसकी शक्ति से कठिन कार्यों में अद्भुत सफलता प्राप्त होती है।
अभ्यास पूरा करके उठ बैठो। तुम्हें मालूम पड़ेगा कि रक्त का दौरा तेजी से हो रहा है और सारे शरीर में एक बिजली सा दौड़ रही है। अभ्यास के उपरान्त कुछ देर शान्ति-मय स्थान में बैठना चाहिये और हो सके तो किसी सात्विक वस्तु का जलपान कर लेना चाहिये। अभ्यास से उठकर एक दम किसी कठिन काम में जुट जाना, स्नान, भोजन या मैथुन करना निषिद्ध है। अभ्यास के लिये प्रातः काल का समय सर्वोत्तम है।
दृष्टिपात का अभ्यास (त्राटक)
पूर्व ही यह बताया जा चुका है कि शरीर की विद्युत शक्ति कई भागों में विभक्त होकर अलग-अलग दिशाओं में काम कर रही है। इस क्रिया में ऐसे साधन की जरूरत है, जिससे शरीर और मन की विद्युत शक्तियाँ अधिक से अधिक मात्रा में एकत्रित होकर एक स्थान पर लग जाए। त्राटक हठ योग का एक साधन है। इसके द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों में बहने वाली बिजली को सब ओर से खींच कर एक स्थान पर लाने का प्रयत्न किया जाता है। त्राटक का अभ्यास जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, वैसे ही वैसे नेत्रों की प्रभावकारिणी शक्ति बढ़ती जाती है।
एक हाथ लम्बा एक हाथ चौड़ा एक चौकोर कागज या पट्ठा लेकर उसके बीच में रुपये के बराबर एक काला गोल निशान बनाओ। स्याही एक सी, कहीं कम ज्यादा न हो। इसके बीच में सरसों के बराबर सफेद निशान छोड़ दो और उस सफेदी में पीला रंग भर दो। इस कागज को किसी दीवार पर टाँग दो और तुम उससे चार फीट दूरी पर इस प्रकार बैठो कि वह काला गोला तुम्हारी आँखों के बिलकुल सामने सीध में रहे। यह साधना का कमरा ऐसा होना चाहिये, जिसमें न अधिक प्रकाश रहे न अन्धेरा। न अधिक सर्दी हो न गर्मी। पाल्थी मार कर मेरुदण्ड को सीधा रखते हुये बैठो और काले गोले के बीच में जो पीला निशान है, उसपर दृष्टि जमाओ। चित्त की सारी भावनायें एकत्रित करके उस बिन्दु को इस प्रकार देखो मानो तुम अपनी सारी शक्ति नेत्रों द्वारा उसमें प्रवेश कर देना चाहते हो। ऐसा सोचते रहो कि मेरी तीक्ष्ण दृष्टि से इस बिन्दु में छेद हुआ जा रहा है। कुछ देर इस प्रकार देखने से आँखों में दर्द होने लगेगा और पानी बहने लगेगा, तब अभ्यास को बन्द कर दो।
अभ्यास के लिये प्रातःकाल का समय ठीक है। नित्यकर्म से निवृत्त होकर नियत स्थान पर बैठना चाहिये और चित्त एकाग्र करके साधन आरम्भ करना चाहिये। पहले दिन देखो कि कितनी देर में आंखें थक जाती हैं और पानी आ जाता है, पहले दिन जितनी देर अभ्यास किया है, प्रति दिन उसमें एक या आधी मिनट बढ़ाते जाओ। इस प्रकार दृष्टि को स्थिर करने पर तुम देखोगे कि उस काले गोले में तरह-तरह की आकृतियाँ पैदा होती हैं। कभी वह सफेद रंग का हो जायेगा, तो कभी सुनहरा। कभी छोटा मालूम पड़ेगा, तो कभी बड़ा। कभी चिनगारियाँ सी उड़ती दिखाई देंगी, तो कभी बादल से छाये हुए प्रतीत होंगे। इस प्रकार वह गोला अपनी आकृति बदलता रहेगा। किन्तु जैसे-जैसे दृष्टि स्थिर होना शुरू होगी, वैसे ही वैसे यह गोला भी स्थिर होता जाएगा और उसमें दीखने वाली विभिन्न आकृतियाँ बन्द हो जायेगी और बहुत देर देखते रहने पर भी गोला ज्यों का त्यों बना रहेगा।
त्राटक करने का चित्र और भी कई प्रकार से बनाया जाता है। एक एक फुट लम्बे चौड़े चौकोर दर्पण के बीचों बीच चाँदी की चवन्नी भर काले रंग के कागज का गोल टुकड़ा काट कर चिपका दिया जाता है। उस कागज के मध्य में सरसों के बराबर एक पीला बिन्दु बनाते हैं। इस अभ्यास को एक मिनट से शुरू करते हैं और प्रति दिन एक-एक मिनट बढ़ाते जाते हैं। जब इस तरह दृष्टि स्थिर हो जाती है, तब और भी आगे का अभ्यास शुरू किया जाता है। दर्पण पर चिपके हुए कागज को छुड़ा देते हैं और उसमें अपना मुँह देखते हुए अपनी बाँई आँख की पुतली पर दृष्टि जमा लेते हैं और उस पुतली में बड़े ध्यान पूर्वक अपना प्रतिबिम्ब देखते हैं।
तीसरी विधि मोमबत्ती या दीपक की ज्योति पर दृष्टि जमाने की है। दीपक घृत का या शुद्ध सरसों के तेल का होना चाहिये। मोमबत्ती की रोशनी भी ठण्डी समझी जाती है।
चौथी विधि प्रातःकाल के सूर्य पर दृष्टि जमाने की है और पांचवीं चन्द्रमा पर त्राटक करने की है। इनमें से इच्छानुसार चाहे जिसे किया जा सकता है, पर हमें अनुभव से पहला साधन ही सुलभ और निरापद प्रतीत हुआ है।
अभ्यास पर से जब उठो, तो गुलाब जल से आंखें धो डालो। आँख धोने के लिये एक काँच की प्याली चार पाँच पैसे की बाजार में मिलती है, उसमें गुलाब जल भरकर आँखों से लगाना चाहिये और उस पानी में आँख खोलकर उन्हें स्नान कराना चाहिये, जिससे उनकी उष्णता शान्त हो जाए और शीतलता प्राप्त हो। अभ्यास से उठने के बाद कोई पौष्टिक शीतल वस्तु खा लेना भी आवश्यक है। दूध या दही की लस्सी, मक्खन, मिश्री, फल, शरबत आदि कुछ सेवन कर लेने से शरीर की बढ़ी हुई गर्मी शान्त हो जाती है।
अभ्यासी की आयु कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए। शरीर और मन से निरोग तथा दुर्व्यसनों से मुक्त होना चाहिए। उसे सदाचारी, आत्मविश्वासी, आशावादी, दृढ़ निश्चयी और धैर्यवान होना चाहिए। जब तक यह योग्यताएँ न हों तब तक साधना करने के लिए ठहर जाना चाहिए। अभ्यास के दिनों में सात्विक आहार विहार रखना, ब्रह्मचर्य पालन करना और उत्तम भावनाएं रखनी चाहिए।
पहले प्राणायाम फिर त्राटक यह क्रम रखना ठीक है। आरंभ में प्राणायाम के लिए पन्द्रह मिनट और त्राटक के लिए पाँच मिनट देने चाहिए। फिर इसी अनुपात में समय बढ़ाते हुए आधा घण्टा कर लेना चाहिए। देखा गया है कि 6 से 8 सप्ताह में साधारण श्रेणी के लोगों को मैस्मरेजम की योग्यता हो जाती है। किसी किसी को न्यूनाधिक समय भी लग जाता है। साधन सफल हो जाने के बाद अभ्यास को छोड़ न देना चाहिए वरन् आधा घण्टा प्रतिदिन अथवा कुछ कम प्रतिदिन अभ्यास करते रहना चाहिए जिससे अपनी साधना सुरक्षित बनी रहे।
प्रयोगकर्ता को अपने आचरण, चरित्र, विचार, रहन सहन, पहनाव उढ़ाव, बातचीत का ढंग मुख-मुद्रा आदि इस प्रकार के रखने चाहिए जिसका दूसरों पर प्रभाव पड़े। यदि प्रयोक्ता का रंग ढंग भद्दा और छिछोरा होगा तो दूसरे उससे प्रभावित न होंगे ऐसी दशा में अपनी विद्युत शक्ति पर्याप्त होते हुए भी प्रयोगों में सफलता न मिलेगी। इस बात को भले प्रकार समझ रखना चाहिए कि यदि कोई दूसरे का प्रभाव स्वयं ग्रहण न करे तो उस पर किसी भी प्रयोग का असर नहीं हो सकता, यदि पात्र का प्रयोक्ता पर अविश्वास हो, और उसकी योग्यता को स्वीकार न करे तो फिर सभी प्रयोग निष्फल रहेंगे। चतुर प्रयोक्ता इस मर्म को भली भाँति समझते हैं, इसलिए वे अपना रंग-ढंग ऐसा रखते हैं जिससे प्रभाव उत्पन्न हो। प्रयोग से पहले ही अपने पात्र को जो आधा प्रभावित कर लेता है वही सफल प्रयोक्ता है। मैस्मरेजम करने वाले की पोशाक मुखमुद्रा तथा वाणी की ओजस्विता अधिकाधिक प्रभावशालिनी होनी चाहिए।
अभ्यास से अपनी विद्युत शक्ति की उन्नति हुई या नहीं इसका परीक्षण करने के लिए कुछ उपाय नीचे बताये जाते हैं। यदि इनमें से अधिकाँश परीक्षणों में सफलता मिले तो समझना चाहिए कि मैस्मरेजम विद्या का प्रयोग करने लायक योग्यता उपलब्ध हो गई।
(1) काले पर्दे की सहायता से
एक अंधेरी कोठरी इस कार्य के लिए चुनो। एक कुर्सी रखकर उसकी पीठ पर गहरे काले रंग का कपड़ा लटका दो। एक बहुत क्षीण प्रकाश का दीपक कुर्सी के आगे की तरफ जरा दूर रख दो ताकि कुर्सी की पीठ पर लटके हुए कपड़े पर प्रकाश न पड़ने पावे अंधेरा बना रहे। इस कपड़े के पीछे अपने लिए एक चौकी या कुर्सी बिछाओ और उस पर बैठ जाओ। अब अपने दोनों हाथों को इस प्रकार मिलाओ जैसे नमस्कार करने के लिये हाथ जोड़ते हैं। काले कपड़े और तुम्हारे हाथों के बीच एक फुट का फासला रहना चाहिये। कुर्सी के ऊपरी सिरे की सीध से एक इंच नीचे हाथों को रखकर उन्हें आपस में धीरे धीरे रगड़ना आरंभ करो और फिर इस क्रिया को उत्तरोत्तर तेज करते जाओ। ध्यानपूर्वक देखने से पता चलेगा कि झाड़ते समय एक सफेद भाप जैसा पदार्थ उनमें से निकल रहा है। कभी कभी हथेलियों की चमड़ी चमकती मालूम पड़ेगी और कभी एक दो हलकी चिनगारी सी इधर उधर बिखरती मालूम देगी। नाखूनों के छोरों में चमक विशेष रूप से देखी जाती है।
(2) आकर्षक प्रभाव।
पालथी मार कर लकड़ी की चौकी पर बैठो। कुर्सी पर बैठना हो तो पांवों को लकड़ी के तख्ते पर रखो। जिस कुर्सी या चौकी पर बैठे हो उसमें धातु की कोई ऐसी कील न लगी हो जो तुम्हारे शरीर को छूती हुई जमीन तक पहुँचती हो। इन बातों का ध्यान रखना इसलिये आवश्यक है कि तुम्हारा शरीर जमीन को छू रहा होगा या धातु की कोई वस्तु शरीर को छूती हुई पृथ्वी तक पहुँच रही होगी तो शारीरिक विद्युत का प्रभाव जमीन में खिंचने लगेगा और जिस वस्तु की परीक्षा करना चाहते हो उसे देखने में सफलता न मिलेगी।
चौकी या कुर्सी पर पाँव ऊँचे करके बैठना चाहिए। दोनों हाथों को आपस में इस प्रकार मिलाओ कि हथेलियों और उँगलियों के सिरे आपस में मिल जावे। हथेली के बीच का भाग जरा सा खुला रह सकता है। एक मिनट तक हथेली ओर उँगलियों के सिरों को आपस में खूब चिपकाने का प्रयत्न करो। तदुपरान्त हथेलियों को कसकर मिलाये रहते हुए उँगलियों को अलग करने का प्रयत्न करो। ऐसा करने पर चारों उँगलियों में कंपकंपी मच जाएगी। वे एक दूसरे से अलग न होना चाहेंगी, किन्तु जब तुम उनका चुम्बकत्व भंग करके उन्हें अलग-अलग करना चाहते हो, तो मानवीय चुम्बक विद्युत के आकर्षण के कारण वे काँपने लगती हैं।
(3) जल का स्वाद परिवर्तन।
एक मेज पर कांच के गिलासों में पानी भरकर रखो। उनमें से एक में अपनी उँगलियों का अग्र भाग 4-5 मिनट डुबाये रहो और इच्छा करते रहो कि तुम्हारी विद्युत शक्ति इस पानी में उतर जाए। इसके बाद किसी कुशाग्र बुद्धि के मनुष्य को उन दोनों जल पात्रों को दिखाओ या उन जलों में से थोड़ा थोड़ा पिलाओ। वह व्यक्ति तुरंत ही बता देगा कि इस पानी के स्वादों में और चमक में कितना अन्तर है।
(4) लटकती हुई वस्तु को झुलाना!
सुई के छेद में धागा पिरोकर ऊपर छत में उसे इस तरह बाँध दो कि सुई बीच में लटकती रहे। उस कमरे में हवा के झोंके न आने पावें, इसका प्रबन्ध रखो, अब उस सुई से तीन फुट के फासले पर तुम बैठो और उसपर दृष्टि जमाओ, कुछ ही देर में उसमें हरकत होने लगेगी और जिस तरह चाहोगे उसी तरफ वह हटने व हिलने जुलने लगेगी। जलती हुई मोमबत्ती या दीपक की लौ को भी इसी प्रकार मानवीय विद्युत के आधार पर हिलाया झुलाया जा सकता है।
(5) जीव-जन्तुओं पर प्रतिबन्ध।
रामायण में ऐसा उल्लेख है कि लक्ष्मण जी एक रक्षित रेखा खींचकर चले आते थे और उसके अन्दर सीता जी अकेली निर्भय होकर बैठी रहती थी। जब रावण सीता को चुराने पहुँचा तो उसका इतना साहस न हुआ कि उस रेखा के अन्दर प्रवेश कर सके, अतएव उसे भिक्षुक का रूप बनाकर छल से सीता को रेखा के बाहर बुलाने का षड़यंत्र रचना पड़ा। इस प्रकार की विद्युतमयी रेखाएं हर कोई खींच सकता है, परन्तु उनमें असर अपने प्रयोक्ता के बल के अनुसार ही होगा। भूमि पर एक कोयले से कहीं छोटा सा एक गोल घेरा चक्र की तरह खींच दो। खींचते समय उस रेखा में अपनी विद्युतमयी इच्छा का समन्वय कर दो और बैठकर तमाशा देखो। उधर से जो चींटियां या इसी प्रकार के छोटे कीड़े निकलेंगे, उनके लिये यह रेखा जलती हुई बाल की तरह होगी। वे रेखा के समीप तक जायेंगे, किन्तु उलटे पाँवों लौट आवेंगे, उसे पार करते उनसे न बन पड़ेगा। यदि किसी छोटे कीड़े के आस पास ऐसी रेखा खींच दी जाए तो उससे बाहर न निकला जाएगा और उसके अन्दर ही घुमड़ाता रहेगा। जब उसे कोई मार्ग न मिलेगा और अपनी जान को हथेली पर रख लेगा, तब उस रेखा को पार करने को उद्यत होगा। जब वह पार करेगा, तो उसे बड़ा कष्ट होगा और निकलने के बाद ध्यानपूर्वक देखने से वह पीड़ित या पागल की तरह बेचैन दिखाई देगा।
(6) फोटो खींचना।
फोटो खींचने के जो अच्छे प्लेट आते हैं, वे आँखों की अपेक्षा प्रकाश को अधिक स्पष्ट अनुभव कर सकते हैं, किसी ऐसे अंधेरे कमरे में जाओ, जिसमें बाहर का प्रकाश बिलकुल न पहुँचता हो और जिसमें प्लेट पर बाहरी प्रकाश लग जाने की आशंका न हो। उस कमरे में जाकर एक फोटो का प्लेट खोलो और दो मिनट तक उसपर अपने हाथ का पंजा रखे रहो, बाद में प्लेट को सावधानी से ढ़क कर फोटोग्राफर से धुलवालो। उस पर हाथ के प्रकाश का चित्र बन जाएगा।
(7) चौंका देना।
कोई व्यक्ति किसी कार्य में व्यस्त हो, तो चुपके से उसके पीछे कुछ दूरी पर जाकर खड़े हो जाओ और रीढ़ की हड्डी या गर्दन का पिछला भाग जो खुला हुआ हो, उस पर दृष्टि जमाओ और उसे चौंका देने की भावना करते रहो। वह व्यक्ति कितने ही जरूरी काम में क्यों न लग रहा हो, अपना ध्यान हटाने को बाध्य होगा। उस स्थान को खुजलावेगा और मुड़कर तुम्हारी ओर देखने लगेगा।
मैस्मरेजम का प्रयोग जिस व्यक्ति के ऊपर किया जाता उसे एक प्रकार की निद्रा आती है, इसे योग निद्रा या सम्मोहन तन्द्रा कह सकते हैं। रात को गहरी निद्रा में सुधि बुधि भूल कर सो जाते हैं उस तरह की निद्रा यह नहीं होती, इसमें शरीर जागता है या अर्द्ध जागृत अवस्था में रहता है। शारीरिक दृष्टि से यह अर्द्ध निद्रा है, नेत्र झपक जाते हैं, अंग शिथिल हो जाते हैं, देहाध्यास कम हो जाता है, फिर भी होश बना रहता है, चेतनता में कमी आ जाती है पर वह नष्ट नहीं होती। मन की दृष्टि से भी वह अर्द्ध निद्रा ही है बाह्य मन सो जाता है तर्क, सन्देह, छान बीन, परीक्षण की शक्ति चली जाती है पर विश्वास स्वीकृत के अवयव जागते रहते हैं। स्वप्न में अंतर्मन सो जाता है और बाह्यमन सैर करता रहता है, योग निद्रा में इस से उलटा होता है अर्थात् बाह्यमन सो जाता है और अंतर्मन जागता रहता है। इस प्रकार यह योग निद्रा शारीरिक और मानसिक दोनों दृष्टियों से आधी निद्रा है इसमें मनुष्य आधा सोता रहता है और आधा जागता रहता है।
जिस व्यक्ति के ऊपर प्रयोग करना हो उसे प्रयोग के लिए पहले रजामन्द कर लेना चाहिए। उसे बता देना चाहिए कि इससे उसे कुछ भी हानि या तकलीफ न होगी। वरन् मस्तिष्क का विकास होगा, अनेक मानसिक शक्तियाँ जग उठेंगी तथा जो शुभ संकल्प इस प्रयोग के द्वारा स्थापित किये जायेंगे वे उसके सद्गुणों की वृद्धि करेंगे और दुर्गुणों तथा मानसिक रोगों को हटा देंगे। फूलों के बगीचे के समीप रहने वाले को सुगन्ध का लाभ होता है इसी प्रकार योगाभ्यास जैसे परम पुनीत और उपयोगी तत्व के संपर्क में आने से कुछ न कुछ लाभ ही प्राप्त होगा। जो व्यक्ति रजामन्द हो उसी को निद्रित करना चाहिए, जोर जबरदस्ती या दबाव का परिणाम अच्छा नहीं होता।
निद्रित करने से पहले पात्र को शिथिल होने का आदेश करना चाहिए, हमारी “आसन और प्राणायाम” पुस्तक में शिथिलासन की विस्तृत विधि बताई गई है। संक्षेप में पात्र को यह बताना चाहिए कि वह किसी आराम कुर्सी या मुलायम मसनद का सहारा लेकर अपने शरीर को बिल्कुल निर्जीव की तरह ढीला छोड़ दे, ऐसा अनुभव करे कि शरीर के अंगों में से प्राण निकल गया है और वे बिल्कुल निर्जीव पड़े हुए हैं। मन को “अथाह नीले समुद्र में तैरने” का ध्यान करने पर लगा दे और शरीर को पूर्ण रूपेण शिथिल कर दे। पन्द्रह बीस मिनट नित्य अभ्यास किया जाए तो एक सप्ताह के अन्दर शिथिलासन में बहुत कुछ सफलता मिल जाती है। सबसे अच्छा तो यही है कि पात्र को एक सप्ताह शिथिलासन का अभ्यास कराया जाए तत्पश्चात् उसे निद्रित करने के लिए लिया जाए। यदि ऐसा संभव न हो तो एक दिन में कई बार शिथिलासन का अभ्यास करके फिर दूसरे दिन प्रयोग के लिए उसे लेना चाहिए। यदि यह भी संभव न हो तो प्रयोग से पहले दस पन्द्रह मिनट तक हर एक पात्र को शिथिलासन का अभ्यास करना चाहिए। इससे उसका चित्त शान्त और एकाग्र हो जाएगा ऐसी मनोदशा होने पर प्रयोग करना सरल हो जाता है।
प्रयोग के लिए पात्र को आराम कुर्सी पर मसनद के सहारे गद्दी पर बिठाना चाहिए। पीठ और सिर के पीछे कुछ सहारा होना जरूरी है जिससे तन्द्रा आने पर इधर उधर लुढ़क कर गिर जाने का अन्देशा न रहे। स्थान एकान्त, खुला हुआ, स्वच्छ और शोर गुल से रहित होना चाहिए। समय प्रातःकाल का सबसे अच्छा है पर आवश्यकता होने पर सन्ध्याकाल भी रखा जा सकता है। आमतौर से मैस्मरेजम प्रयोग के लिए कुर्सियाँ ही काम में लाई जाती हैं पात्र के लिए आराम कुर्सी और प्रयोक्ता के लिए हत्थेदार कुर्सी ठीक रहती है। यह लकड़ी की ही होनी चाहिए, धातु की बनी कुर्सियाँ त्याज्य हैं क्योंकि प्रयोग की विद्युत शक्ति का अधिकाँश भाग धातु में चला जाने के कारण इच्छित फल प्राप्त नहीं होता। पात्र का मुँह उत्तर या पूर्व की ओर रखना चाहिए प्रयोक्ता अपनी कुर्सी उसके सामने करीब एक हाथ फासले पर डालकर बैठे।
आरंभ में दोनों को अपना चित्त शान्त और एकाग्र करना चाहिए। प्रयोक्ता, पात्र के चेहरे पर एक गम्भीर दृष्टि डाले, तत्पश्चात् उसके बाँए नेत्र की पुतली पर अपनी दृष्टि जमावें। आरंभ में यह दृष्टिपात हलका होना चाहिए, फिर धीरे धीरे तीव्रता बढ़ाई जाए, जिस प्रकार काले रंग के गोले पर त्राटक किया जाता था उसी प्रकार पात्र के बाएं नेत्र की पुतली पर त्राटक करना चाहिए और सम्पूर्ण एकाग्रता एवं इच्छा शक्ति के साथ ऐसी भावना करनी चाहिए कि मेरी विद्युत शक्ति का प्रवाह बड़े जोरों से पात्र के नेत्र मार्ग से उसके मस्तिष्क में प्रवेश कर रहा है और वह बहुत शीघ्र निद्रित होने वाला है। यह प्रयोग करने से पाँच से लेकर पन्द्रह मिनट के अन्दर पात्र की आंखें झपकने लगती हैं, पलक भारी होने लगते हैं, और तन्द्रा जैसी खुमारी आने लगती है। पात्र को पहले से ही बात देना चाहिए कि जब पलक भारी होने लगे, खुमारी आने लगे तो वह बलपूर्वक जागने की कोशिश न करे वरन् ढीला होकर आराम से पड़ जाए।
इच्छा शक्ति और एकाग्रता द्वारा प्रयोक्ता की विद्युत शक्ति जब पात्र के शरीर में बलपूर्वक प्रवेश करती है तो उसे स्थान देने के लिए किसी दूसरी शक्ति को अपना स्थान खाली करना पड़ता है। पात्र का बाह्य मन अपने स्थान से हट जाता है इसलिए निद्रा आ जाती है। इस अवस्था में प्रयोक्ता की इच्छा शक्ति का पात्र के भीतरी मस्तिष्क पर कब्जा हो जाता है और वह उससे इच्छानुसार काम लेता है। मैस्मरेजम द्वारा सारे परिणाम इसी आधार पर उत्पन्न किये जाते हैं।
पात्र को निद्रित कर देने के उपरान्त उसके ऊपर ‘मार्जन’ और आदेश का प्रयोग करने के लिए अपनी कुर्सी को छोड़कर खड़ा हो जाना चाहिए। दोनों हाथों की उँगलियाँ सीधी पसार देनी चाहिए, उनमें कड़ाई रखने की जरूरत नहीं है, सीधे सादे ढंग से उन्हें आगे की ओर जरा झुका हुआ सा रखना चाहिए। यदि मानसिक दोषों को दूर करने के लिए प्रयोग किया गया है तो मस्तिष्क पर मार्जन होना चाहिए यदि सारे शरीर व्यापी दोष को दूर करना है तो सारे शरीर पर मार्जन करना होगा, यदि किसी स्थान विशेष की पीड़ा दूर करनी है तो उसी स्थान पर मार्जन करना ठीक है। दोनों हाथों की उंगलियाँ बराबर बराबर एक सीध में रखनी चाहिए और उन्हें पात्र के शरीर से आधे इंच के फासले पर रखते हुए आगे बढ़ाना चाहिए। किसी स्थान में भरा हुआ घी आदि गाढ़ा द्रव पदार्थ जिस प्रकार उंगलियों से खींचते हैं उसी प्रकार नियत अंग पर ऊपर से नीचे की ओर उंगलियों को ले जाना चाहिए और फिर उन्हें एक तरफ हलके से झटकार देना चाहिए इस प्रकार आवश्यकतानुसार दस से लेकर बीस तक ‘पास’ देने चाहिए। इस क्रिया को करते समय यह भावना करते जाना चाहिए कि दूषित तत्वों को अपनी आकर्षण शक्ति द्वारा खींच खींच बाहर फेंक रहा हूँ और इस स्थान को निर्दोष बना रहा हूँ।” ऐसी भावनाएं दृढ़ इच्छा शक्ति और श्रद्धा विश्वास के साथ की जानी चाहिए। और ध्यान पूर्वक पीड़ित स्थान को स्वस्थता की कामना से देखते जाना चाहिए मार्जन समाप्त करते हुए अन्त में हाथों को तीन बार जरा जोर से एक तरफ झटकार देना चाहिए। जिससे वे इथित तत्व अपने शरीर में चिपटे न रह जावें।
मार्जन करने से पात्र को अधिक शान्ति मिलती है जिससे वह कुछ और गहरी निद्रा में चला जाता है। अब आदेश की बारी आती है। निद्रित पात्र की पीठ पीछे खड़े होकर गंभीर, स्थिर, निश्चित, स्पष्ट और मध्यम स्वर में उसे निरोगता, स्वस्थता एवं उन्नति का अनुभव कराना चाहिए। दाहिना हाथ पीड़ित स्थान पर हलके से रख लेना चाहिए। नकारात्मक नहीं वरन् स्वीकारात्मक ही आदेश देना चाहिए। “तुम बीमार नहीं हो” यह कहने की अपेक्षा ‘तुम स्वस्थ हो’ कहना चाहिए। रोगी के लिए इस प्रकार आदेश दिया जा सकता है ‘तुम्हारी पीड़ा को नाश करती हुई स्वस्थता बढ़ रही है, विश्वास करो तुम्हें अवश्य आराम होगा, शीघ्र आराम होगा, स्वस्थता बढ़ रही है, अब तुम निरोग होकर रहोगे, निरोगता प्रतिक्षण बढ़ती चली जा रही है। मैं तुम्हारे रोग को निकाल रहा हूँ, खींच कर बाहर फेंक रहा हूँ, जब तुम जाओगे तो बहुत कुछ स्वस्थ होओगे।
अपनी प्राण शक्ति तुम्हारे शरीर में प्रवेश करके नवीन बल की, स्वस्थता की, ताजगी की दे रहा हूँ, इससे तुम अपने में चैतन्यता और शक्ति अनुभव करोगे।
बुद्धि बढ़ाने के लिए निद्रित पात्र के सिर पर रख कर इस प्रकार का आदेश दिया जा सकता है। “मैं अपने हाथ की उंगलियों में से तुम्हारे मस्तिष्क में बुद्धि शक्ति की लहरें डाल रहा हूँ। वे बुद्धि की लहरे तुम्हारे मस्तिष्क में जड़ जमा रही हैं। अब तुम्हारी बुद्धि में पर्याप्त उन्नति होगी, वह बराबर बढ़ती ही जाएगी, हर एक विषय को अब तुम बहुत अच्छी तरह समझ सकोगे और स्मरण रख सकोगे। अब से ही, इसी क्षण से ही तुम्हारी बुद्धिमत्ता बढ़ेगी और तुम भली प्रकार उसका अनुभव करोगे।
इस प्रकार के आदेश शारीरिक रोगों के लिए, मानसिक रोगों के लिए, चरित्र सम्बन्धी दोषों के लिए, बनाये जा सकते हैं सद्गुणों का बीजारोपण करने के लिए भी ऐसे ही आदेश बनाये जा सकते हैं। इनके रटने की आवश्यकता नहीं है, समयानुसार, परिस्थिति के अनुकूल आदेशों की रचना करने की योग्यता प्रयोग करने वाले में स्वयं होनी चाहिए।
आदेशों को कई बार दुहराना चाहिए। इसके पश्चात् प्रयोग समाप्त करके अलग हट जाना चाहिए। यदि पात्र गहरी नींद में हो तो उसे उसी दशा में सोते रहने देना चाहिए और थोड़ी थोड़ी देर बाद यह देखते रहना चाहिए कि निद्रा हलकी हुई है या नहीं, जब निद्रा टूटने के लक्षण दीखने लगे, अंगों में चैतन्यता और हलचल प्रतीत होने लगे तो मस्तिष्क से उदर तक चार पाँच ‘पास’ देकर हल्के संबोधन के साथ पात्र को जगा देना चाहिए।
निद्रित करने के उपरान्त पात्र से खेल तमाशे की, अव्यक्त बातों के संबंध में पूछ ताछ करने का, उसको किसी मार्ग पर ले जाने का या कुछ और काम कराना हो उसी भावना से आदेश और मार्जन करने चाहिए। जैसी इच्छा का प्रयोग किया जाएगा वैसा ही फल होगा।
निद्रित करने की कुछ और विधियाँ भी हैं जो यहाँ लिखी जाती हैं-
(1) दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली पात्र की दोनों भवों के बीच-त्रिकुटी स्थान पर हलके से लगाओ और उससे “धीरे धीरे मुझे निद्रा घेरती आ रही है” इस संकल्प की भावना करने को कहो, थोड़ी देर में निद्रा आ जाएगी।
(2) बिल्लौरी काँच की चमकदार अँगूठी को प्रकाश के सम्मुख इस प्रकार रखो कि उसकी चमक पात्र के नेत्रों पर पड़े। इस अँगूठी के नग पर दृष्टि जमाने से निद्रा आ जाती है।
(3) अपने दोनों हाथों की मुट्ठियों में पात्र के दोनों हाथों के अँगूठे पकड़ लो। उसके अँगूठे की जड़ों में अपने अँगूठों का नख जरा सा घिसो और उससे चेहरे की तरफ निद्रित करने की इच्छा के साथ घूरते रहो निद्रा आ जाएगी।
(4) सादा चौकोर काँच लेकर उसकी पीठ पर काला पक्का रंग पोत दो और चौखटा लगा दो। यह “त्रिकालदर्शी दर्पण” हो गया, जिसकी लोग पाँच-पाँच रुपया कीमत वसूल करते हैं। इस काले दर्पण के बीचों बीच एक रुपये बराबर स्थान में गोलाकार तेल लगा दो। शीशे के सामने कुछ फासले पर दीपक इस प्रकार रखो कि तेल लगे हुए स्थान के बीचों बीच प्रकाश चमके। इस चमक पर पात्र को दृष्टि जमाने के लिए कहो। और निद्रा आने के आदेश करते रहो। थोड़ी देर में वह निद्रित हो जाएगा।
मैस्मरेजम विधान के अनुसार दूसरों को निद्रित करना एवं उनकी मनोभूमि का संशोधन, परिमार्जन करना पिछले पाठ में बताया जा चुका है। अब यह बतावेंगे कि इस साधना से अपना क्या हित साधन किया जा सकता है।
जिस प्रकार विश्वास और संकल्प शक्ति के आधार पर दूसरों को निद्रित किया जा सकता है एवं कुसंस्कारों का परिमार्जन तथा शुभ संस्कारों का बीजारोपण किया जा सकता है उसी प्रकार का प्रयोग अपने ऊपर अपने आप भी किया जा सकता है। पीछे बताया जा चुका है कि विश्वास हो जाने पर झाड़ी का भूत दिखाई देने लगता है। यह अपने आप अपने पर अनजाने में मैस्मरेजम प्रयोग है। जैसे हिप्नोटाइज्ड व्यक्ति को कुछ का कुछ दिखाई पड़ने लगता है वैसे ही अपने निजी संकल्प से भी तन्द्रावस्था प्राप्त होती है और उसमें संकल्पों का ही मूर्त रूप दिखाई पड़ने लगता है।
कहते हैं कि एक ग्रामीण व्यक्ति किसी साधु के पास गया और कहने लगा मुझे योग साधन सिखा दीजिए। साधु ने सरल स्वभाव से उसे श्रीकृष्ण की मूर्ति का ध्यान करने को कहा, ग्रामीण ने प्रयत्न किया पर उससे वह ध्यान न हुआ। तब साधु ने उसे दूसरा ध्यान बताया। वह भी उससे नहीं हुआ, इस प्रकार हर बार वह विफल होता गया। अन्त में साधु ने उसे बताया कि जो वस्तु तुझे सबसे प्रिय हो उसी का ध्यान कर। ग्रामीण को अपनी भैंस सबसे प्रिय थी, वह भैंस का ध्यान एकान्त कुटी में बैठकर करने लगा। कुछ समय बाद साधु ने उससे पूछा कि-बच्चा क्या होता है, कुटी से बाहर निकल कर अपना हाल बताओ। ग्रामीण ने कहा-महाराज अब तो मैं भैंस ही हो गया हूँ, बड़े बड़े सींग उपज आये हैं, कुटी से बाहर नहीं निकला जाता। साधु उसकी सफलता देखकर प्रसन्न हुआ और उसे बाहर निकाल कर सच्चे ध्यान में लगा दिया। यह स्वयं सम्मोहन क्रिया है। दूसरे को हिप्नोटिज्म करके उसे यह अनुभव कराया जा सकता है कि वह मनुष्य नहीं हाथी है, इसी प्रकार अपने आप अपने ऊपर हिप्नोटिज्म करके भी लोग कुछ का कुछ अनुभव कर सकते हैं। सच पूछा जाए तो दुनिया के अधिकाँश लोग स्वसम्मोहन किया द्वारा अर्धमूर्च्छा में डूबे रहते हैं और कुछ का कुछ अनुभव करते रहते है। मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य और कर्तव्य क्या है? इसे करीब-करीब सभी लोग जानते हैं पर साँसारिक चकाचौंध से अपने आपको अर्ध निद्रित करके भ्रम पूर्ण विश्वास और विचारों को अपने अन्दर भरे रहते हैं और अधपगलों जैसा आचरण करते हुए निरर्थक एवं हानिकर कार्यों में अपनी जीवन सम्पत्ति को नष्ट कर डालते हैं।
‘मन’ ही मनुष्य तत्व का सार है। यह जिधर चल पड़ता है, जीवन की धारा उसी ओर प्रवाहित होने लगती है। इसलिए हम अपने को जिधर ले लाना चाहते हैं वैसे ही संस्कार मन के ऊपर जमाने की आवश्यकता है। यह कार्य मैस्मरेजम के ‘स्वसम्मोहन’ सिद्धान्त द्वारा हो सकता है। आत्मोन्नति की योगिक साधनाओं को मैस्मरेजम विज्ञान की भाषा में ‘स्वसम्मोहन’ कहा जायगा। साधक लोग मंत्रों का जप करके, पुस्तकों का पाठ करके, ध्यान करके, अमुक अनुष्ठान कर्म काण्ड करके अपने ऊपर अमुक प्रकार के संस्कार जमाते हैं। यह संस्कार जितने मजबूत होते जाते हैं, बाह्य जीवन में वैसी ही परिस्थितियाँ इकट्ठी होती जाती है।
अपनी जिस दिशा में उन्नति करनी हो तदनुकूल संस्कारों को मनोभूमि पर जमाने का अभ्यास करना चाहिए। वास्तविक संपत्ति यह संस्कार ही है। एक बार एक बड़े व्यापारी की कोठी में आग लग गई, कर्मचारी भागे हुए आये और उन्होंने व्यापारी को सब हाल सुनाया कि करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हो गई, अब कारोबार करने के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं बची है। व्यापारी के चेहरे पर इस समाचार से जरा भी उदासी नहीं आई उसने कहा-तुम समझते हो कि कोठी या ‘सम्पत्ति के कारण मैं अमीर था, यह तुम्हारी भूल है। मैं धन के कारण नहीं अपनी आदतों और मानसिक संपदाओं के कारण अमीर हूँ, तुम लोग देखोगे कि कुछ ही दिनों में फिर वैसी ही कोठियाँ खड़ी हो जायेंगी। व्यापारी का कहना सत्य हुआ, सब कुछ नष्ट हो जाने पर भी उसने प्रयत्न किया और थोड़े ही दिनों में फिर पहले जैसा अमीर हो गया। लोग बड़ी भूल करते हैं जब यह कहते है कि हम परिस्थितियों के गुलाम हैं। वास्तव में हर मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं निर्माण करता है। जिसकी जैसी मनोदशा है उसे तदनुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त होकर रहती हैं।
नीचे कुछ ऐसे अभ्यास बताये जाते हैं जिनको करते रहने से स्वसम्मोहन सिद्धान्त के अनुसार अपने मन के ऊपर स्वयं प्रभाव डाल कर उसे नियत दिशा में चलने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, और तदनुसार इच्छित परिस्थितियाँ तथा वस्तुएं प्राप्त हो सकती हैं।
(1) आरोग्य प्राप्ति के लिए।
एकान्त कमरे में पद्मासन से बैठो या आराम कुर्सी पर पड़े रहो, चित्त की चंचलता छोड़ दो और सारी माँसपेशियाँ तथा नाड़ियों को ढीली करके शरीर को शिथिल हो जाने दो। शिथिल हो जाने पर धीरे धीरे एक लम्बी साँस खींचो और फिर उसी प्रकार धीरे धीरे छोड़ते हुए साँस बिलकुल निकाल दो, साँस खीचते समय भावना करो कि आरोग्यतावर्द्धक तत्वों को साँस द्वारा खींच कर अपने अन्दर भर रहा हूँ। जब साँस छोड़ो तो ध्यान करो कि मेरी बीमारियाँ तथा दुर्बलताएं साँस के साथ निकल कर बाहर जा रही हैं, दस पन्द्रह मिनट तक इसी प्रकार श्वास प्रश्वांस क्रिया करते रहो। इससे बड़ी शान्ति मिलेगी, और शरीर में हलकापन फुर्ती तथा चैतन्यता नजर आवेगी। अब मन ही मन इस मन्त्र का जप करो- “ॐ” मैं अपने शरीर का स्वामी हूँ। मैं बलवान हूँ। निरोग हूँ। मेरे सारे अंग ठीक ठीक काम करते हैं। सबलता स्वस्थता और सुन्दरता निरंतर मुझ में बढ़ती जा रही है। धमनियों में शुद्ध रक्त प्रवाहित हो रहा है। बहुत तेजी से मैं स्वस्थता प्राप्त कर रहा हूँ।” इस मंत्र को मन ही मन अनेक बार जपो और कल्पना शक्ति द्वारा वैसा ही अपने को अनुभव करो। इस अभ्यास को प्रति दिन प्रातःकाल करने से आश्चर्यजनक तीव्रता से आरोग्य की प्राप्ति होती है।
(2) ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए।
एकान्त स्थान में चित्त को शान्त और शरीर को शिथिल करके, आराम से बैठ जाओ। नेत्रों को बन्द कर लो। ध्यान द्वारा सर्वत्र हरा रंग देखो। आकाश, भूमि, सूर्य, नक्षत्र, मकान, पेड़, पहाड़, नदी, जीव-जन्तु सब को हरे रंग का देखो। चारों ओर हरा ही हरा अनुभव करो। यह हरे रंग की भावना जितनी अधिक देर तक जितनी दृढ़ता पूर्वक जमाये रहोगे उतना ही अच्छा है। मनोविज्ञान शास्त्रियों का मत है कि हरा रंग धन, वैभव और सफलता का प्रतिनिधि है। शुभ कर्मों में हरे रंग को प्रधानता दी जाती है। हरे रंग के बंदनवार और तोरण विवाह शादियों में बाँधे जाते हैं। चूने में हरा रंग डाल कर कमरे पुतवाये जाते हैं, इसमें वैभव वृद्धि का रहस्य छिपा हुआ है।
हरे रंग का ध्यान करते हुए शिथिल मन और मस्तिष्क से इस मंत्र का भावनापूर्वक मन ही मन जप किया कीजिए “मेरी सत्ता में अमित ऋद्धि सिद्धियाँ समाई हुई हैं। अब मैं अपनी प्रबल इच्छा शक्ति द्वारा वैभव की कामना करता हूँ, और विश्वास करता हूँ कि अत्यंत शीघ्र मेरे ऐश्वर्य की वृद्धि होगी, मुझे इच्छित वस्तुएं तथा परिस्थितियां प्राप्त करने में सफलता प्राप्त होगी। मैं अपनी सम्पूर्ण शक्तियों के साथ वैभव प्राप्त करने में लगा हूँ इसी लिए यह निर्विवाद निश्चित है कि मेरी मनोकामना पूर्ण होकर रहेगी। इस मन्त्र को श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन जपना चाहिए।
(3) मानसिक शक्तियों की उन्नति के लिए
उपरोक्त रीति से एकान्त स्थान में बैठ कर दोनों भृकुटियों के मध्य में त्रिकुटी स्थान में नेत्र बन्द करके ध्यान जमाना चाहिए और चन्द्रमा के समान सुनहरी तथा शीतल प्रकाश ज्योति का ध्यान करना चाहिए और मन ही मन इस मन्त्र का जप करना चाहिए मेरा मस्तिष्क स्वस्थ तथा सबल है, मेरी बुद्धि तीव्र होती जा रही है, विचार शक्ति, निर्णय शक्ति, परीक्षण शक्ति, कल्पना शक्ति आदि अनेक मानसिक शक्तियाँ बढ़ रही हैं, विकसित हो रही हैं। मैं धीरे धीरे बुद्धिमान बनता जा रहा हूँ बहुत शीघ्रता से मेरा मानसिक विकास हो रहा है।” इस ध्यान और जप से मानसिक शक्तियों का बड़ी तीव्र गति से विकास होता देखा गया है।
(4) आत्मिक बल बढ़ाने के लिए-
उपरोक्त रीति से एकान्त स्थान में शिथिल होकर बैठिए। दोनों पसलियों के जोड़ पर आमाशय के स्थान पर-सूर्य चक्र में सूर्य के समान तेजस्वी ज्योति का ध्यान कीजिए, साथ ही निम्न मंत्र जपते जाइए-मैं आत्मबल से परिपूर्ण हूँ, मेरे अन्दर अपार आत्म शक्ति है, इस सोई हुई महान् शक्ति को अब मैं प्रयत्नपूर्वक जागृत कर रहा हूँ। सारे दुर्गुण एवं कुसंस्कारों को मैं ठोकर मार मार कर भगाये दे रहा हूँ और उनके स्थान पर सात्विक सद्गुणों को प्रतिष्ठित कर रहा हूँ। मैं दृढ़ हूँ, निर्भय हूँ, पुरुषार्थी हूँ, सदाचारी हूँ और सत्यनिष्ठ हूँ। मैं आत्मा हूँ और अपनी महान आत्मिक शक्तियों को दृढ़तापूर्वक धारण किये हुए हूँ।
(5) किसी साँसारिक वस्तु को प्राप्त करने के लिए-
पूर्वोक्त प्रकार से शान्तिपूर्वक बैठकर पीले रंग का ध्यान करना चाहिए और इस प्रकार का मानसिक जप करना चाहिए कि-”अमुक वस्तु को मैं चाहता हूँ, उसे प्राप्त करने की दृढ़ प्रतिज्ञा करता हूँ। सम्पूर्ण शक्ति के साथ उसे प्राप्त करने के लिए जी जान से कोशिश करूंगा, यह निश्चित सिद्धान्त है कि ‘जो चाहता है उसे मिलता है। मैं सच्चे दिल से अमुक वस्तु को चाहता हूँ, इसलिए उसे प्राप्त करके रहूँगा।” इस संकल्प के अतिरिक्त इस चौपाई को बार बार गुनगुनाते रहना चाहिए। “जेहि कर जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलत न कछु संदेहू।”
(6) प्रार्थना द्वारा इच्छा पूर्ति।
ईश्वर से, या किसी देवता से, अमुक वस्तु के लिए प्रार्थना करने की पद्धति भारत में अत्यंत प्राचीनकाल से चली आ रही है। वेदों का आधे से अधिक भाग ऐसे मंत्रों से भरा हुआ है जिसमें धन, वैभव, पुत्र, यश, आरोग्य, बुद्धि, सुख आदि के लिए ईश्वर से प्रार्थना है। ऐसी प्रार्थनाएं करना मैस्मरेजम सिद्धान्त के सर्वथा अनुकूल है। प्रार्थना से दो बातें होती हैं (1) अपनी आवश्यकता का बार बार स्मरण आता है जिससे उधर रुचि तथा लगन बढ़ती हैं (2) ईश्वर या देवता द्वारा सहायता मिलने की संभावना से आशा की किरणें दिखाई पड़ती हैं तथा उत्साह उत्पन्न होता है। यह दोनों ही बातें इच्छा पूर्ति में बहुत सहायक होती हैं। अनेक बार तो प्रार्थना बहुत अंशों में तथा कभी कभी पूर्ण रूपेण सफल हो जाती है। प्रार्थना के साथ साथ यदि पौरुष और प्रयत्न भी हो तो वह बहुत ही फलवती होती है। अकर्मण्यों की प्रार्थना ईश्वर के दरबार में सुनी नहीं जाती, मैस्मरेजम सिद्धान्त के अनुसार भी वह निष्फल ही ठहरती है।
मैस्मरेजम का अभ्यासी त्राटक और प्राणायाम द्वारा अपनी आत्मिक शक्तियों को विकसित करके कुछ और भी दिव्य लाभ प्राप्त कर सकता है। उनका संक्षिप्त उल्लेख नीचे किया जाता है।
(1) दूरस्थ व्यक्ति पर प्रभाव-प्रेरणा।
किसी को सामने बिठा कर उस पर मैस्मरेजम प्रयोग करने की विधि पीछे बताई जा चुकी है। यह प्रयोग दूर रहने वाले व्यक्ति पर भी हो सकता है। सूक्ष्म शक्ति के लिए दूरी का कोई प्रश्न नहीं है। प्रकाश एक सैकिण्ड में जितने मील चलता है किन्तु विचारों की गति तो उससे भी अनेक गुनी तीव्र है। इसलिए दो व्यक्तियों के दूर होते हुए भी आत्म शक्ति का प्रयोग संभव है।
जिस व्यक्ति पर प्रभाव प्रेरणा करनी हो उसकी कोई ऐसी वस्तु लेनी चाहिए जो उसके शरीर से बहुत काल तक संबन्धित रही हो। योरोपीय प्रयोक्ता इस कार्य के लिए रुमाल मंगाया करते हैं क्योंकि वह छोटा वस्त्र होते हुए भी शरीर के स्पर्श में बार बार आता है। भारतीय तान्त्रिक नख या बालों को अधिक काम की वस्तु मानते हैं। फोटो, वस्त्र, आभूषण, उसी के हाथ का लिखा हुआ कागज आदि भी काम दे सकते हैं जिन वस्तुओं का मनुष्य के शरीर से बार बार स्पर्श होता है उनमें उसके कुछ शारीरिक विद्युत कण चिपके रह जाते हैं, यह कण पूर्ण रूप से सम्बन्ध विच्छिन्न नहीं होते। माता के शरीर का कुछ भाग पुत्र में होता है, दूरस्थ पुत्र पर विपत्ति आने पर माता का दिल धड़कने लगता है कारण यह है कि पुत्र शरीर में जो विक्षोभ उत्पन्न होता है उसकी अनुभूत पूर्व सम्बन्धित माता के शरीर तक पहुँचती है। इस प्रकार नख, देश, वस्त्र, आदि में चिपके हुए कणों पर जो प्रयोग किया जाता है उसका प्रभाव पूर्व सम्बन्धित शरीर पर उस व्यक्ति पर भी होता है।
एकान्त स्थान में प्राणाकर्षण क्रिया करके अपने आत्मबल को सतेज कर लीजिए। जिस व्यक्ति के ऊपर प्रभाव प्रेरणा करनी है उसके नख, केश, वस्त्र, या लिखा हुआ पत्र आदि सामने रखिए और उस पर ऐसी दृष्टि जमाइए मानो त्राटक का अभ्यास कर रहे हों। मन में भावना कीजिए कि यह वस्तु जो रखी हुई है मानो साक्षात यह मनुष्य ही बैठा हुआ है। जिस प्रकार सामने बैठे हुए मनुष्य के ऊपर दृष्टिपात, आदेश एवं मार्जन द्वारा प्रयोग किया जाता है वैसे ही उस वस्तु पर कीजिए। स्मरण रखिए यह प्रयोग कल्याण के लिए उचित ढंग का होना चाहिए हानिकारक या अनुचित मार्ग पर ले जाना वाला प्रयोग करने के लिए हम अपने पाठकों को कड़ी मनाही करते हैं।
इस प्रकार किये हुए प्रयोग दूर रहने वाले व्यक्ति पर असाधारण प्रभाव डालते हैं और उसे इच्छानुकूल कार्य करने के लिए विवश करते हैं। प्रतिदिन एक बार प्रातःकाल प्रयोग करना चाहिये अधिक से अधिक दो बार संध्या को भी किया जा सकता है। कुछ दिनों लगातार जारी रखने से इच्छित फल प्राप्त होता है।
(2) दूसरों के कुप्रयोग से बचाव
ऐसा भी होता है कि कोई दुष्टात्मा जीवित या मृत व्यक्ति दूसरों को हानि पहुँचाने के अदृश्य प्रयत्न करते हैं। इससे बीमारी, पीड़ा, कलह, मतिभ्रम, चित्त उचटना, भय आदि उत्पन्न होकर मनुष्य की कार्य शक्ति, बुद्धिमत्ता को नष्ट कर डालते हैं।
इस प्रकार के कुप्रभाव को दूर करने के लिये अपने चारों ओर एक प्रकार का घेरा डालने की आवश्यकता होती है। रामचन्द्रजी जब वन में सीता को अकेली छोड़ कर जाया करते थे तो कुटी के चारों ओर एक रेखा खींच कर घेरा बना जाते थे, इस घेरे के अन्दर ऐसा आत्मिक प्रभाव रहता था कि अन्दर किसी हानिकर तत्व का प्रवेश नहीं हो सकता है। रावण जब सीता को चुराने गया तो वह घेरे के अन्दर न घुस सका, किसी प्रकार बहका कर उसने सीता को रेखा से बाहर बुलाया तब उन्हें हरण कर सका।
योग शास्त्र की भाषा में इस घेरे को ‘कवच’ कहते हैं। कवच एक ऐसा धातु मिश्रित कपड़ा होता है जिसे पहन कर योद्धा लोग लड़ने जाते हैं, उस कपड़े पर शत्रु के हथियारों का प्रभाव नहीं होता। आत्म शक्ति युक्त कवच का भी ऐसा ही प्रभाव है। जब संभावना हो कि कोई अनिष्ट, प्रभाव अपने ऊपर किया जा रहा है तो निम्न उपाय करके कवच धारण कर लेना चाहिए।
(1) एकान्त स्थान में स्वस्थ चित्त होकर मेरुदंड को सीधा रखते हुए पद्मासन से पूर्व को मुँह करके बैठिए। फेफड़ों में भरी हुई साँस को धीरे धीरे बाहर निकालिए और भावना करते जाइए कि दूसरे के अनिष्ट कर प्रभाव साँस के साथ बाहर निकल रहे हैं। जब साँस पूरी तरह बाहर निकल जाए तो साँस खींचना आरंभ कीजिए और भावना कीजिए कि पवन देवता अपने पुत्र हनुमान जी के साथ शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। साँस को पूरी तरह खींच लेने पर कुछ देर उसे भीतर ही रोकिये और भावना कीजिए कि बजरंगी पवन पुत्र मेरे शरीर में भरे हुए हैं उनके प्रभाव से सारे कुप्रभाव भागे जा रहे हैं। इस भावना से कई बार प्राणायाम कीजिए।
(2) प्राणायाम के बाद नेत्र बन्द कर लीजिए और अपने तेजोबलम (ह्रह्वह्ड्ड) का ध्यान कीजिए। शरीर के चारों ओर कुछ दूर तक एक प्रकाश फैला रहता है इसे तेजो बलम कहते हैं। भावना कीजिए कि “आप सूर्य के समान तेजस्वी हैं और आपकी किरणें दूर दूर तक घेरे के रूप में फैली हुई हैं। इस घेरे में बहुत तेज है, कोई भी बाह्य कुप्रभाव इसके अन्दर प्रवेश नहीं कर सकता।” इस ध्यान को श्रद्धापूर्वक अधिक समय तक कीजिए।
(3) जब ऐसी आशंका हो और कर्म करा डालिए, तेल लगाकर गरम पानी से स्नान कीजिए यज्ञोपवीत बदलिए सारे कपड़े उतार कर धो डालिए ओर धुले हुए कपड़े पहन लीजिए, उपवास रखिए और एक हजार गायत्री मंत्र जप कीजिए। देव दर्शन कीजिए और यथा शक्ति कुछ दान कीजिए।
(4) किसी आध्यात्मिक पुरुष से अभिमंत्रित जल ग्रहण करिए, विभूति, रक्षा सूत्र, एवं कवच (ताबीज) धारण करिए।
(5) यदि किसी दूसरे को कुप्रभाव से बचाना हो तो उसे उपरोक्त तीन उपाय करने का आदेश करना चाहिए और इच्छा शक्तिपूर्वक गायत्री मंत्र से जल या भस्म मंत्रित करके उसे देना चाहिए। बीसा यंत्र या ॐ का अक्षर रक्षा भावना से पवित्रता पूर्वक लिखकर उसे धारण करा देना चाहिए।
इन उपायों से दूसरों द्वारा अपने ऊपर किये हुए कुप्रयोगों का शमन होता है, और वे कुकर्म लौट कर प्रयोग करने वाले के उपर ही पड़ते हैं।
(3) दूर दर्शन
कौरव पाण्डव युद्ध का सारा दृश्य राज महल में बैठे हुए संजय देखा करते थे, और उसे धृतराष्ट्र, को सुनाया करते थे। ऐसी पूर्णावस्था तो विशेष प्रयत्न साध्य है परन्तु इस दिशा में थोड़ी बहुत सफलता मैस्मरेजम के अभ्यासी भी कर सकते हैं। दूर स्थानों पर होने वाली हलचलों का बहुत हद तक आभास प्राप्त कर सकते हैं।
(1) बिलकुल शान्त, कोलाहल रहित एकान्त स्नान में नेत्र बन्द करके बैठिए। मन में से एकोंएक संकल्पों रहित कर दीजिए, सारी चंचलता हटाइए और अपनी निज की बातों को बिलकुल भुला दीजिए। मानों हमें कुछ विचार या कार्य है ही नहीं। इस संकल्प रहित अवस्था को प्राप्त करने में इस पन्द्रह मिनट लगाइए।
(2) जब चित्त शान्त हो जाए तो उस स्थान का ध्यान कीजिए जहाँ के दृश्य आप देखना चाहते हैं। उस स्थान का ठीक ठीक कीजिए, हर वस्तु को गौर से देखिए। उस समय वहाँ जो कुछ कार्य हो रहे होंगे दृष्टिगोचर होंगे। आरम्भ में कुछ त्रुटि रहती है परन्तु धीरे धीरे जब एकाग्रता बढ़ती है और मन इधर उधर नहीं उछलता तो यह त्रुटियाँ घटने लगती हैं और ‘दूर दर्शन’ की सिद्धि प्राप्त होती जाती है।
(4) भविष्य-ज्ञान
(1) अपने आपको पूर्णतया शिथिल कर दीजिए। शरीर में से अपने को पृथक अनुभव कीजिए। अंगूठे के बराबर आत्मा की ज्योति का ध्यान कीजिए। निर्विकार, निर्लिप्त, शुद्ध बुद्ध, मुक्त, गुणों से युक्त आत्मा अपने को अनुभव कीजिए।
(2) इस तेज स्वरूप आत्मा को ऊँचा, ऊपर आकाश में अवस्थित कीजिए। वहाँ से अमुक व्यक्ति, देश या कार्य के ऊपर दृष्टिपात कीजिए दिखाई देगा कि उसके आगे पीछे एक विशेष वर्ण का धुआँ सा उड़ता चलता है। यह धुआँ किस रंग का है इसे बारीकी के साथ पहचानिए।
(3) जिसके आस पास काला, घना, भयानक कुहरा सा उड़ता दिखाई दे उसका भविष्य अन्धकारमय अनिष्ट सूचक समझना चाहिए, जिसके चारों ओर श्वेत, स्वच्छ, हलका, कुहरा सा छाया हो इसका भविष्य उज्ज्वल समझना चाहिए।
(4) अधिक दिनों के अभ्यास से ध्यान करने पर भविष्य में होने वाली घटनाओं के दृश्य भी दृष्टिगोचर होते हैं जिनसे जाना जा सकता है कि इस व्यक्ति या कार्य का भविष्य कैसा होगा।
(5) व्यक्तित्व की पहचान।
कौन व्यक्ति कैसे आचरण और विचार का है इसकी जानकारी भी आत्मिक अभ्यास द्वारा प्राप्त की जा सकती है। वह इस प्रकार है।
(1) जिस मनुष्य का व्यक्तित्व जानना है दस सेकेंड तक उसकी बाँई आँख की पुतली पर त्राटक कीजिए। इस पश्चात् दस सेकेंड के लिए आंखें बंद कर लीजिए।
(2) आंखें बन्द करके सामने वाले व्यक्ति के चेहरे का ध्यान कीजिए। आपको किन्हीं खास रंग की धज्जियाँ सी उसके चेहरे के आस पास उड़ती हुई दृष्टिगोचर होंगी।
(3) इन रंगों के द्वारा इस प्रकार का परिणाम निकाला जा सकता है। सफेद रंग-सच्चा ईमानदार। मटीला-चालाक। खाकी-वचन का पालन करने वाला। गुलाबी-पेट का साफ । लाल-क्रोधी। हरा-शान्त स्थिर। पीला-पुरुषार्थी, बहादुर। नारंगी-अभिमानी। लीला-अस्थिर। बैंगनी-स्वार्थी। काला-निर्दय, धोखेबाज। सुनहरी-दिव्य स्वभाव। मिश्रित रंग-कूट नीतिज्ञ। यदि एक साथ कई रंग मिश्रित हों तो मिश्रित गुण समझने चाहिए।
(4) सामने वाले व्यक्ति के चेहरे पर गम्भीरतापूर्वक नजर जमाइए और देखिए कि इससे आपके मन पर किस प्रकार की छाप पड़ती है। स्वच्छ मन में जैसी श्रद्धा या आशंका उत्पन्न होती है प्रायः वैसा ही सामने वाले का चरित्र तथा स्वभाव निकलता है।
(6) संदेश पहुँचाना।
बिना टेलीफोन या रेडियो के भी एक मनुष्य दूसरे तक अपने विचार पहुँचा सकता है। इस विद्या को यूरोपीय योगी ‘टेलीपैथी’ कहते हैं। इस विद्या का अभ्यास इस प्रकार करना चाहिए।
(1) एक समान विचार के मनुष्य एक ही समय नियत करके अपने अपने स्थान पर एकान्त स्थान में शान्त चित्त से बैठा करें।
(2) आरम्भ में पाँच मिनट पहला व्यक्ति अपना संदेश भेजेगा और दूसरा सुनेगा। बात में दूसरा व्यक्ति पाँच मिनट संदेश देगा और पहला सुनेगा। पहला कौन, दूसरा कौन यह क्रम पहले ही स्नाश्वेत कर लेना चाहिए।
(3) संदेश देने वाला नेत्र बन्द करके दूसरे मनुष्य का ध्यान करे और उसे सामने बैठा हुआ अनुभव करते हुए मन ही मन अपनी बात कहे। जो बात कही जाए उसका एक एक शब्द स्पष्टता और गम्भीरता युक्त होना चाहिये। शब्दों को मुख से उच्चारण करने की आवश्यकता नहीं है। मौनभाव से ही यह सब होना चाहिए।
(4) दूसरा व्यक्ति आरम्भ के नियत समय में पहले व्यक्ति का नेत्र बन्द करके ध्यान करे और मुख की तरफ गम्भीरतापूर्वक देखे कि वह क्या भाव प्रकट कर रहा है। जो भाव उसकी मुख मुद्रा से समझ में आवे उन्हें हृदयंगम कर ले।
(5) इसी प्रकार पाँच मिनट बाद दूसरा व्यक्ति संदेश भेजे और पहला उसे ग्रहण करे।
यह अभ्यास ब्राह्ममुहूर्त में अच्छा होता है। दोनों अभ्यासी, अपने अभ्यासों से निवृत्त होकर आपस में मिला करें और विचार किया करें कि कितने अंशों में सफलता मिली। आरम्भ में दस प्रतिशत सफलता मिलती है। फिर धीरे धीरे उन्नति होने लगती है। आधी बातें ठीक निकलें तो इसे अच्छी सफलता समझना चाहिये। फिर बिना समय नियत किये भी संदेश भेजे जा सकते हैं और सतत् प्रयत्न से पूर्ण सिद्धि भी प्राप्त हो सकती है।
(7) दूसरों के मन की बात जानना
(1) ध्यानस्थ होकर अपनी मनोभूमि को बिलकुल खाली, नीले आकाश की तरह शून्य देखो। जिस व्यक्ति के मन की बात जाननी है उसकी अकेली मूर्ति उस अखिल नीले आकाश में स्थित देखो अर्थात् ऐसा अनुभव करो कि सारा विश्व नीला आकाश मात्र है और उस आकाश में अमुक व्यक्ति के अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं है।
(2) एकटक होकर उस व्यक्ति की प्रतिमा की ओर ध्यान लगाकर देखो। कुछ क्षण में वह व्यक्ति अपने भाव और विचार संकेतों द्वारा तथा मुँह खोलकर बताता हुआ दृष्टिगोचर होगा।
(3) इस प्राप्त हुए संदेश द्वारा दूसरों के मन की बात जानी जा सकती है।
(8) पीड़ा दूर करना।
दाँत, सिर, पसली, जोड़ आदि के दर्द, बिच्छू, ततैया, साँप आदि जहरीले जानवरों के काट लेने का दर्द, उन्माद, आवेश, भूतबाधा, भय, आदि की मानसिक पीड़ा के लिए दुःख निवारण की दृढ़ इच्छा करते हुए, गायत्री मन्त्र कर से जल अभिमन्त्रित करके पिलाना चाहिए। शुद्ध भस्म को मंत्रित कर के उस स्थान से लगा देना चाहिए और पीड़ित स्थान पर हाथ फेरना तथा मार्जन करना चाहिए। ऐसा करने से पीड़ा को बहुत शीघ्र आराम होता है।
(9) शक्ति-पात।
आध्यात्म विद्या के ऊंचे अभ्यासी अपनी शक्ति को सामने वाले व्यक्ति पर असाधारण रूप से एक दम गिरा सकते हैं। इससे उसका भीतरी जीवन बिलकुल उलट पुलट हो जाता है, स्वभाव, विचार और संस्कार दूसरे ही ढांचे में ढल जाते हैं। यह मैस्मरेजम का ऊँचे दर्जे का प्रयोग है। साधारण प्रयोग का विशेष असर तो सिर्फ उतनी ही देर रहता है जब तक कि तन्द्रा रहती है। जागृत होने पर प्रभाव कम हो जाता है, किन्तु शक्तिपात का प्रभाव स्थायी पड़ता है और एक ही बार में प्रयोग से मनुष्य की मानसिक स्थिति बदल जाती है। इस प्रयोग को ग्रहण करते समय कँपकँपी आ जाती है, झटके से लगते हैं और अवर्णनीय विचित्र मनोदशा हो जाती है। सच्चे, सदाचारी, तपस्वी और खरे साधक ही शक्तिपात कर सकते हैं।
उपरोक्त पंक्तियों में जिन 9 सिद्धियों का वर्णन किया है वे आरम्भ में ही किसी को पूर्ण रीति से प्राप्त नहीं हो जाती। बहुत समय तक निरंतर अभ्यास करते रहने से सफलता की मात्रा धीरे धीरे बढ़ती जाती है और एक दिन साधक आशातीत सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
जिसकी आत्मा शान्त है जो बुद्धिशाली है जिसके हृदय में नम्रता है उसे ही उन्नति प्राप्त है।
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परिश्रम ही जीवन है और सुस्ती ही बीमारी है। शरीर के हर एक हिस्से का जीवन इसी में हैं कि अपने कार्य की पूर्ति करता रहे।
सूचना।
अखण्ड ज्योति का दफ्तर अब पुराने स्थान से हट कर घीयामण्डी में सड़क के किनारे ही पहुँच गया है। मथुरा पधारने वाले सज्जन नोट कर लें। पत्र व्यवहार में-”अखण्ड ज्योति कार्यालय, मथुरा” इतना ही पता लिखना पर्याप्त है।
विश्वास की शक्ति का उपयोग करते हुए मनोविज्ञान शास्त्र के आधार पर डॉक्टर मैस्पर के पश्चात अन्य लोगों ने कुछ खेल तमाशे आविष्कृत किये। जिनसे जनता में बड़ा कौतूहल हुआ। कुछ लोग तो इन्हें केवल खेल तमाशे ही समझते थे कुछ सीधे, साधे अल्पज्ञ अन्ध श्रद्धालु लोग इनको सत्य समझने लगे, कुछ लोगों ने इन शोधों को अपना धंधा बना लिया और उनके साथ विज्ञापनी तौर तरीके जोड़ कर एक खासा खेल खड़ा कर दिया। यह खेल तमाशे यद्यपि डॉक्टर मैस्पर के विज्ञान से कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखते तो भी हमारे देश की जनता पूरी जानकारी न होने के कारण उन्हें मैस्मरेजम का ही भेद समझती है। यह खेल तमाशे हिप्नोटिज्म की मर्यादा के अंतर्गत आ सकते हैं।
मैस्मरेजम और हिप्नोटिज्म का अन्तर पाठकों को भली प्रकार समझ लेना चाहिए। मानवीय विद्युतशक्ति का दूसरे के ऊपर उपयोग कर के इच्छित फल उत्पन्न मैस्मरेजम है। हिप्नोटिज्म में इस शक्ति की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। उसमें किसी प्रकार डाँट डपट से, धौंस से, बहकावा देकर, भूल में डाल कर, डरा कर, फुसला कर कुछ विश्वास उत्पन्न कराया जाता है। हिप्नोटिज्म करने वाला तरह तरह की तरकीबों से यह कोशिश करता है कि पात्र मेरी बात का पूरा भरोसा कर ले, गहरा विश्वास जमा ले। जितना ही विश्वास पक्का होगा उतना ही खेल अच्छा होगा। यदि विश्वास हलका रहा या न रहा तो खेल भी गड़बड़ हो जाता है। अब हम हिप्नोटिज्म के कुछ खेल नीचे देते हैं।
दृष्टि बन्ध (स्द्बद्दद्धह्लद्बह्यद्व)
किसी काली, गोल चमकदार चीज़ पर एकाग्रता पूर्वक दृष्टि जमाने से बाह्यमन शिथिल होने लगता है। इस सिद्धान्त के आधार पर दृष्टि बन्ध के खेल होते हैं।
दस से बारह वर्ष की आयु के बीच का एक लड़का चुनिए। सामने जो लड़के खड़े हों उन पर निगाह फेंक कर यह पहचानिए कि इनमें सीधा, दब्बू, डरपोक, लड़का कौन सा है, उसे ही तमाशे के लिए बाहर बुला लीजिए। चंचल, तार्किक, हेकड़ लड़के इस काम के लिए अच्छे साबित नहीं होते। लड़के की अपेक्षा लड़कियाँ और भी अच्छी रहती हैं।
बालक को आराम से कुर्सी, चौकी या आसन पर बिठा दीजिए। उसके दाहिने हाथ के अंग के नाखून पर बीचों बीच गोलाकार गीली स्याही लगा दीजिए। उस हाथ की मुट्ठी बंधवा कर स्याही लगे हुए अँगूठे को दोनों आँखों के बीच की सीध में एक बालिश्त फासले पर रखवाइए। और उस बालक से कहिए कि-अंगूठे पर लगी हुई काली स्याही के बीच में चमक है उस पर ध्यानपूर्वक दृष्टि जमाये रहो। अब तीन चार मिनट हो जाए तो कहिए कि-”इसके अन्दर तुम्हें एक बाग दिखाई पड़ेगा जब दिखाई पड़ने लगे तब हमें कह देना।” थोड़ी देर में बालक कहेगा-मुझे बाग दिखाई पड़ने लगा। फिर उससे कहिए ध्यान से देखते रहो-इस बगीचे में एक मैदान दिखाई देगा। थोड़ी देर में लड़का कहेगा मैदान भी दीखने लगा। अब लड़के से कहलवाइए कि-कहो-कि इस मैदान को साफ करने के लिए एक मेहतर आवे। लड़का आपकी बताई बात कहेगा और थोड़ी-देर में बतावेगा कि मेहतर आ गया, झाडू से मैदान साफ कर रहा है। उससे कहलवाइए-कहो-’एक भिश्ती पानी छिड़कने आवे। लड़का कहेगा और थोड़ी देर में बतावेगा कि भिश्ती आ गया, छिड़कवा कर एक आदमी बुला कर फर्श बिछवाइए, दरी, गलीचे, कालीन, कुर्सी, मेज जो चाहें तो मँगवाइए।
ढीले स्वभाव के लड़के कुछ देर दार करते हैं। जैसे भिश्ती के आने में देर दार हो लड़का कहे कि अभी नहीं आया तो जरा हलके से गंभीर स्वर में कहिए ध्यान से देखो किसी कोने की तरफ से आ रहा होगा। बालक कहने लगेगा, हाँ उधर से आता तो मालूम पड़ता है-आ रहा है-आ गया। इसी प्रकार अन्य वस्तुएं मँगाने के समय ढील ढाल हो तो ऐसे ही उससे कहिए देर दार में वह चीज आ जायेगी।
पूछने वाले किसी देवी देवता को-बालक से कहवा कर बुलवाते हैं। उनके लिए प्रणाम कहलवाते हैं और चोरी में गई वस्तु, भूत भविष्य की बात, गढ़ा धन, बीमारी, जन्म मृत्यु, भाग्योदय, हानि लाभ, तेजी, मन्दी, मुकदमा, भूत बाधा, पास फेल, विवाह शादी आदि की बातें लड़के द्वारा पुछवाते हैं। वे देवता बोर्ड पर लिख कर इशारे से या मुँह से बोलकर उन बातों का उत्तर देते हैं, मनोवांछा पूरी होने का उपाय बताते हैं, और कुछ शर्तों पर सहायता करने के लिए तैयार हो जाते हैं। अन्त में उन देवता को प्रणाम कर के विदा कर दिया जाता है और पूर्ववत् नौकर को बुला कर कुर्सी फर्श आदि उठवा दिये जाते हैं, तत्पश्चात् खेल खत्म हो जाता है। इस क्रिया को ‘हजारत’ के नाम से भी पुकारते हैं।
आप देवी देवता न बुलाना चाहें तो किसी महापुरुष को बुला सकते हैं और उनसे किन्हीं समस्याओं के बारे में पूछताछ कर सकते हैं। बराबर जवाब मिलेगा। अँगूठे पर स्याही लगाने की अपेक्षा “करामाती अँगूठी” या “त्रिकालदर्शी दर्पण” से भी काम लिया जा सकता है। यह दर्पण या अँगूठी बनाना बहुत आसान है। काले नग की अँगूठी ही ‘करामाती अँगूठी’ है और पीठ पर काला रंग पुता हुआ दर्पण ही ‘त्रिकालदर्शी दर्पण है। प्रयोग करते समय इन पर गोल घेरे में जरा सा तेल चुपड़ देना चाहिये जिससे चमक आ जावे।
इस करामात का रहस्य यह है कि चमकदार स्याही पर दृष्टि जमाने से बालक का बाह्य मन निद्रित हो जाता है देखने में जागता मालूम पड़ने पर भी उसकी मनोदशा तन्द्रा या अर्ध स्वप्न की सी हो जाती हैं। इस दशा में आप जो कुछ उसे आदेश करेंगे बिना तर्क के स्वीकार कर लेगा, आपका संकल्प उसके विश्वास में जम जायेगा और विश्वास के आधार पर स्याही में सब वस्तुएं वैसे ही दिखाई पड़ेंगी, जैसे झाड़ी का स्वरूप भूत जैसा बन जाता है। वास्तव में कोई भिस्ती, मेहतर या देवता वहाँ नहीं है, यह केवल मात्र बालक का जागृत स्वप्न है। प्रश्नों के जो उत्तर मिलते हैं वे बालक के अपने विचार हैं। यह स्वप्न हर किसी को नहीं दिखाये जा सकते आसानी से तो दब्बू और सीधे स्वभाव के बालक ही देख सकते हैं। स्त्रियों पर भी यह प्रयोग सफल हो जाते हैं। कभी-कभी कोई बड़ी उम्र के पुरुष भी यह सब देख लेते हैं।
प्रेत-विद्या (स्श्चद्बह्द्बह्लह्वड्डद्यद्बह्यद्व)
(1) एक हलकी तीन पाये की गोल मेज लीजिए। इसके पाये किनारों से लगे हुए न हों वरन् छः इंच अन्दर की तरफ हों यदि गोल न मिले तो साधारण हलकी मेज से भी काम लिया जा सकता है। उसके एक पाये के नीचे कंकड़ी लगा देनी चाहिए जिससे थोड़े संकेत से हिल डुल सके।
पायों का नीचे का सिरा गोल घुन्डीदार ठीक रहता है। मेज के चारों ओर एक एक हाथ के फासले पर कुर्सियाँ रख दी जावें, इन पर प्रेतों को आवाहन करने वाले बैठें और अपनी हथेलियाँ मेज के तख्ते से सटा लें। हाथ इस प्रकार सीध में रखे जावें कि गोल चक्र से मालूम पड़ें। इन बैठने वालों में से एक नेतृत्व करे। सब लोग दस मिनट तक शान्त चित्त होकर मेज के मध्य बिन्दु में एकाग्रता करते रहें और भावना करते रहें कि कोई या अमुक प्रेतात्मा इस मेज पर पधार कर हम लोगों से वार्तालाप करे।
इस स्थिति में कुछ देर रहने के उपरान्त मेज में एक कँपकँपी सी उत्पन्न होगी और एक पाया खटखट करने लगेगा। यह खट खट प्रेतात्मा के आगमन की सूचना समझी जायेगी। उसे प्रणाम करने के उपरान्त नेतृत्व करने वाला आत्मा से कुछ प्रश्न करे और स्वयं ही उन प्रश्नों के दो, तीन या चार पाँच उत्तर एक कागज पर लिख लें। फिर मेज के पायों के जितने खटके हों उसी नम्बर के उत्तर को प्रेतात्मा का उत्तर समझे। जैसे प्रश्न किया गया कि आई हुई प्रेतात्मा किस वर्ण की है? इसका उत्तर क्रमशः लिख लिया गया (1) ब्राह्मण (2) क्षत्रिय (3) वैश्य (4) शूद्र। यदि मेज के पाये एक बार खटके तो ब्राह्मण वर्ण की, दो बार खटके तो क्षत्रिय वर्ण की समझना चाहिए। इसी प्रकार अन्य प्रश्नों के उत्तर मिल सकते हैं। एक बार खटकने को अ, दो बार खटकने को इ, तीन बार को उ, उस प्रकार वर्णमाला बनाकर भी उत्तर प्राप्त किये जा सकते हैं। जब प्रेतात्मा विदा होना चाहती है तो एक जोर से मेज हिला कर विदा हो जाती है। इस प्रकार प्रेतात्माओं से वार्तालाप हो जाता है।
(2) दूसरा तरीका प्लेनचिट (Planchet) का है। यह पान के आकार का लकड़ी का टुकड़ा है। इसमें पीछे की ओर सब तरफ घूमने वाले दो छोटे छोटे पहिये लगे रहते हैं। नोंक की ओर एक छेद होता है जिसमें पेन्सिल लगा दी जाती है। मेज या चौकी पर कोरा कागज रख कर उस पर इस प्लेनचिट यंत्र को रखते हैं। प्रयोग करने वाले दो आदमी अपनी उँगलियों के छोर उस पर रख कर बैठते हैं और एकाग्रता तथा ध्यान करते हैं। थोड़ी देर में हाथों में हरकत सी होती है और प्लेनचिट आगे चलने लगता है और पेन्सिल द्वारा प्रश्नों के उत्तर कागज पर लिखे जाते है।
(3) तीसरा तरीका-स्वयं लेखन-ऑटोमेटिक राइटंग का है। एक व्यक्ति अपने हाथ में पेन्सिल लेकर और मेज पर कागज रख कर बैठता है। अमुक या किसी भी प्रेतात्मा का ध्यान करता हुआ उसे आवाहन करता है। शरीर में रोमाँच होता है और हाथ में लगी हुई पेन्सिल द्वारा उत्तर लिखे जाने लगते हैं। स्वयं ही प्रश्न कर सकता है और कुछ देर ध्यान करके आवेश आने पर स्वयं ही उत्तर लिख सकता है। ऐसा भी हो सकता है। एक व्यक्ति प्रश्न पूछे और दूसरा आत्मा के आवेश में उत्तर लिखता रहे।
साधारणतः इन्हीं तीन तरीकों से प्रेतात्माओं का आवाहन किया जाता है। आत्माओं का खींचना, प्रत्यक्ष दर्शन करना, ट्रान्स द्वारा बोली सुनना, स्पर्श करना आदि अन्य पद्धतियाँ भी प्रचलित हुई हैं पर वे अपने देश में अभी उतनी प्रचलित नहीं हैं। उपरोक्त तीन तरीके ही यहाँ अधिक प्रचलित हैं। यह प्रेतात्मा वाद भी मैस्मरेजम के अंतर्गत शामिल समझा जाता है, इसलिए इस पर भी इन पंक्तियों में कुछ प्रकाश डालना पड़ा है।
सम्भव है कोई विशेष अनुभवी महानुभाव वास्तविक प्रेतों को बुलाने में समर्थ होते हों, पर आम तौर से ऐसा नहीं होता। अधिकाँश प्रयोगों में मानसिक आवेश ही काम करता है। ध्यान, एकाग्रता और विश्वासपूर्वक चिन्तन करने से एक आवेश पैदा हो जाता और इस मानसिक आवेश का प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है तदनुसार मेज, प्लेनचिट तथा पेन्सिल की हरकतें होने लगती हैं। जो उत्तर प्राप्त होते हैं वे प्रयोग करने वालों के मस्तिष्क में उत्पन्न हुए होते हैं। जैसे ‘हाजरात’ में बालक को भंगी, भिस्ती, देवता दिखाई पड़ते हैं वैसे ही प्रेतात्माओं के आवेश में उत्तर लिखे जाते हैं। बाहरी रूपरेखा दो हैं पर सिद्धान्त एक ही है। प्रेतात्मा आवाहन विधि की कलई तब खुल जाती है भुलावे में डालने वाले, परीक्षा दृष्टि से प्रश्न पूछे जाते हैं। जिन्दे आदमियों की आत्माएं भी आती हैं, बिलकुल झूठे उत्तर देती हैं, जिन्हें देख कर यही मानना पड़ता है कि यह उत्तर प्रयोग करने वाले मस्तिष्क में उत्पन्न हुए हैं। श्री प्रियरत्न जी आर्य तो बिजली, वायु आदि जड़ तत्वों का आदेश कराने में सफल हुए हैं, उनके प्रयोगों में बिजली, वायु आदि के प्रयोग के उत्तर भी दिये हैं।
(3) सम्मोहन (Hypotism)
एक लाइन में कई सीधे स्वभाव के आदमी खड़े कर लीजिए। इनमें कौन व्यक्ति आपके तमाशे के लिये उपर्युक्त हो सकता है, इसका निर्णय इन विधियों से कीजिए।
(1) अपने अँगूठे पर स्याही लगा कर बारी बारी हर एक को दो-दो मिनट दिखाइये और कहिए इसमें एक सोने का मन्दिर जिसे दिखाई पड़े हमें बता दे। जो जो यह कहें कि हमें ‘सोने का मन्दिर’ दिखाई पड़ता है, समझिये कि यह प्रयोग के योग्य है।
(2) लाइन में खड़े हुए व्यक्तियों के सामने तीन फीट के फासले पर अपने हाथ का पंजा खोल दीजिए और कहिए मैं इस हाथ की आकर्षण शक्ति से आप में से कई लोगों के सिर नीचे झुक जावेंगे। ऐसा कहकर पंजे को इस प्रकार पीछे खींचिये मानों पंजे में पकड़ कर उन लोगों को खींच रहे हैं। इस प्रकार दस पाँच बार कीजिये, जिनके सिर झुक जावें उन्हें अपने प्रयोग के योग्य समझिये।
(3) साधारण पानी एक गिलास में लेकर उस पर तीन बार हाथ फिराइए और फिर उसमें से एक एक चम्मच सब को पीने के लिए दीजिए और कहिए यह अभिमंत्रित जल जिसको जरा मीठा मालूम पड़े वह बता दे इन लोगों में से जो कहें कि जल हमें मीठा लगा उन्हें प्रयोग के लिए ठीक समझिए।
जो व्यक्ति प्रयोग के योग्य ठहरें उनमें से सब से श्रद्धालु और सीधा एक व्यक्ति चुन लीजिए। इसे साधारण कुर्सी पर बिठा लीजिए। आप उसके सामने खड़े होकर सिर से छाती तक मार्जन दस-बारह कीजिए और सुनिश्चित स्वर में आदेश दीजिए कि अब तुम पूर्ण रूप से हमारे आज्ञानुवर्ती हो गये हो। जो हम कहेंगे जैसा हम चाहेंगे उसी के अनुसार तुम्हारी सारी क्रियाएं होंगी, हमने मैस्मरेजम का प्रयोग करके तुम्हें पूर्ण रूप से अपने वश में कर लिया है।” यह शब्द कह कर दो तीन मिनट एकटक दृष्टि से उसके चेहरे को घूरते रहिए, और देखते रहिए कि उसके चेहरे के भाव आज्ञानुवर्ती जैसे हो गये या नहीं, यदि न हुए हों तो एक दो बार वहीं आदेश फिर जरा दृढ़ शब्दों में दीजिये
जब पात्र का चेहरा ढीला पड़ जाए। आज्ञानुवर्तीपन झलकने लगे तब कहिए-”तुम्हारे हाथ भारी-बहुत भारी-बहुत ज्यादा भारी कर दिये गये हैं, अब तुम उन्हें उठा न सकोगे। कितना ही प्रयत्न करें तो तुमसे उठेंगे नहीं। वह व्यक्ति हाथ उठाने की कोशिश करेगा पर उठा न सकेगा। जब आप कहेंगे हमने हाथ हलके कर दिये तब वह हाथ उठा लेगा। जब आप कहेंगे बड़ी सर्दी पड़ रही है तो वह जाड़े के मारे काँपने लगेगा, गर्मी लगने का आदेश करेंगे तो गर्मी से बेचैन हो जायेगा, कपड़े उतारेगा और पंखा झलेगा। मिट्टी का टुकड़ा देकर उसे मीठा बतावेंगे तो मिठाई की तरह रुचिपूर्वक खाने लगेगा। मिठाई को कड़वी बतावेंगे तो उसे चखते ही थूक देगा। लड़की को सर्प बतावेंगे तो उससे डर कर भागेगा किसी मनुष्य को पशु बतावेंगे तो वह उससे पशु जैसा व्यवहार करेगा। फूल को कोयला बतावेंगे तो उसे वह कोयला ही नजर आवेगा। आपके आदेशानुसार एक ही रुमाल में कभी इत्र की कभी मिट्टी के तेल की, कभी हींग ही गन्ध बतावेगा। कानों से भी अनेक संगीत सुनेगा। नेत्र बन्द कराके सुला दें और कहें कि तुम्हें बम्बई भेजते हैं तो बंबई की सैर करो वहाँ की बातें सुनावो, लड़ाई के मोर्चे पर भेज दीजिए तो युद्ध का वर्णन करेगा। अफ्रीका के जंगलों में भेजिए तो वहाँ का हाल बतावेगा, स्वर्ग में, नरक में, आकाश में पाताल में कही भी भेज दीजिये वहीं पहुँचेगा और वहीं के समाचार सुनावेगा।
एक अच्छे भले आदमी को इस तरह अद्भुत आचरण करते देखकर लोग अचंभे से दंग रह जाते हैं। परन्तु उसमें अचम्भे की कुछ बात नहीं है, विश्वास में ऐसी ही शक्ति है, इससे भी अनेक गुनी अधिक शक्ति है। हिप्नोटिज्म करने वाले अपनी आदेश शक्ति से पात्र का विश्वास अपनी ओर खींचते हैं और उसका मन भी अपने कब्जे में कर लेते हैं। इन्द्रियों पर भी प्रयोक्ता का कब्जा हो जाता है। आँख, नाक, कान, जिह्वा, त्वचा यह सब भी प्रयोक्ता के आदेशानुसार ही शब्द, रूप, रस, गंध स्पर्श का अनुभव करती हैं। गर्मी के दिनों में धूप का रंगीन चश्मा लगाने से मन को भ्रम हो जाता है कि धूप अधिक नहीं है, इसी भ्रम के आधार पर आदमी चिलचिलाती हुई दोपहरी में फिरता रहता है और गर्मी अनुभव नहीं करता। यही विश्वास हिप्नोटिज्म में अपनी करामात दिखाता है। चतुर और ऊँचे चढ़े हुए प्रयोग करने वाले अपनी इच्छा शक्ति से एक साथ हजारों मनुष्य को हिप्नोटाइज्ड कर सकते हैं और सारी जनता को भी बड़े-बड़े आश्चर्यजनक खेल दिखाते रहते हैं। फोटो लेने पर मालूम हुआ है कि वे लोग खेल कुछ नहीं करते सिर्फ बात बनाते रहते हैं और देखने वाले बुद्धि विमूढ़ होकर उन बातों को साक्षात अनुभव करते रहते हैं।
हिप्नोटिज्म के तीन खेलों का यहाँ उल्लेख किया गया है। यह कौतुक मात्र है। मिथ्या है। इनसे किसी का कुछ लाभ नहीं उपरोक्त तीन खेलों के अलावा मन शक्ति के और भी अनेक कौतुक हैं तथा हो सकते हैं। हम अपने पाठकों से इस खेल तमाशों में अपनी और दूसरों की शक्ति बर्बाद करने को मना करते हैं। इसमें कौतुक के अलावा लाभ कुछ नहीं, हानि दोनों की है। हाँ इनसे एक मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त जरूर साबित होता है। वह यह कि विश्वास में प्रबल शक्ति है। जो वैसा विश्वास करता है उसे बाहरी वस्तुएं वैसी ही दिखाई पड़ती हैं। “हर मनुष्य अपनी दुनिया आप बनाता है” इस उक्ति का प्रमाण हिप्नोटिज्म के खेलों से पाया जा सकता है। और यह शिक्षा ग्रहण की जा सकती है कि हम संसार को जैसा देखना चाहते हैं अपने विश्वासों को उसी साँचे में ढालें।
आपने देखा होगा कि बाजीगर लोग एक लड़के को पास देकर बेहोश करते हैं, उसे कपड़े से ढ़क देते हैं, ऊपर से उसकी छाती पर एक-ताबीज रख देते हैं। लड़के की आँखों से पट्टी बाँध दी जाती है। बाजीगर कोई सवाल पूछता है लड़का उसका उत्तर देता है। इस खेल को देख कर लोग बड़े अचम्भे में रह जाते हैं। इसे ताबीज की करामात समझते हैं। बाजीगर के ताबीज धड़ाधड़ बिकने लगते हैं। पैसों का ढेर लग जाता है।
रहस्य यह है कि बाजीगर अपने ही लड़के को बेहोश करके प्रश्न पूछता है। यह लड़का पहले से हो सिखाया पढ़ाया होता है। अगर आप अपना लड़का पेश करें कि इसे बेहोश करके प्रश्न पूछो तो उनकी सारी कलई खुल सकती है। तमाशा करने वाला कुछ प्रश्न और उत्तर पहले से ही तय करता है और उसे लड़के को भली भाँति लोगों कंठस्थ करा देता है। तमाशा करते वक्त उपस्थित लोगों की चीज़ों को बाजीगर छूता है और उसका नाम कपड़े से ढंके हुए लड़के से पूछता है। इस पूछने में प्रश्न की भाषा-पूर्व निश्चित होती है। लड़का ध्यान से उसे सुनता है और कंठस्थ उत्तर कह देता है।
एक छोटी सी प्रश्नोत्तरी नीचे दी जाती है। ऐसी ही और भी बनाई जा सकती हैं। तमाशे में कैसे लोग उपस्थित होंगे और उनके पास क्या-2 चीजें होंगी, इस बात का ध्यान रखते हुए बाजीगर समय समय पर नये नये प्रश्नोत्तर बनाया करते हैं।
(1) यह कौन है-इंसान
(1) कौन?- मर्द, (2) कौन है? औरत, (3) ये कौन है? लड़की (4) यह कौन है?- लड़का, (5) क्या उम्र?- नौजवान, (6) क्या उम्र है? -खसती उम्र, (7) उनकी क्या उम्र है?-बुड्ढा (8)कौन जात है?- मुसलमान, (9) कौन लोग है?- हिन्दु (10) कौन कौम है?-ईसाई।
(2) पेशा
1. क्या करता है?-नौकरी, 2. ये क्या करते हैं?-तिजारत, 3. यह क्या करते हैं?-खौमचा, 4. क्या करता है?-हजामत बनाता है, 5. ये क्या करता है?-मेहनत मजदूरी, 6. यह क्या करता है?-खेती।
(3) इसे बताओगे?-कपड़ा।
1. क्या है?-कोट, 2. ये क्या है? रुमाल 3. यह क्या है? जाकेट, 4. वह क्या है?-दुपट्टा, 5. अच्छा ये क्या है?-कुरता, 6. अच्छा यह क्या है?-कमीज, 7. और वे क्या है?-धोती, 8. और यह क्या है?-पजामा, 9. देखो यह क्या है?-टोपी, 10. देखो यह क्या है?-टोप, 11. देखो यह क्या है? पगड़ी।
(4) इसे बताओ? -कोई रंगीन चीज
1. कैसी?-सफेद, 2. कैसी है? - काली, 3. ये कैसी है? -पीली, 4. यह कैसी है? -नीली, 5. अच्छा ये कैसी है? -हरी, 6. अच्छा यह कैसी है?-लाल, 7. और ये कैसी है?-गुलाबी, 8. और यह कैसी है? -खाकी।
(5) इसे बता सकते हो? -कागज।
1. किसमें लिखा? -हिन्दी, 2. किसमें लिखा है? -उर्दू, 3. ये किसमें लिखा है? -गुजराती, 4. यह किसमें लिखा है? -अंग्रेजी, 5. अच्छा ये किसमें लिखा है?-बंगला, 6. अच्छा यह किसमें लिखा है? -मराठी, 7. और यह किसमें लिखा है? -पढ़ नहीं सकता।
(6) यह बताओगे? -सिक्के।
1. कौन?-पैसा, 2. कौन सा? -इकन्नी, 3. कौन सा है? -दुअन्नी, 4. ये कौन सा है? -चौअन्नी, 5. यह कौन सा है? -अठन्नी, 6. और यह कौन सा है? -रुपया, 7. कौन छाप? विक्टोरिया, 8. किसकी छाप? -एडवर्ड, 9. किसकी छाप है पंचमजार्ज, 10. ये किसकी छाप है? -छटवे जार्ज, 11. यह किसकी छाप है? -देशी रियासत।
(7) 1. कै? -एक, 2. कै है? -दो, 3. कितने? -तीन, 4. कितने हैं ? -चार, 5. ये कितने हैं?-पाँच, 6. यह कितने हैं? -छः, 7. और ये कितने हैं?-सात, 8. और यह कितने हैं? -आठ 9. अच्छा ये कितने हैं?-नौ, 10. अच्छा यह कितने हैं?-दस।
(8) यह बता सकते हो? -एक चीज।
1. क्या? -अंगूठी, 2. क्या है? -छड़ी, 3. क्या है?-छाता, 4. यह क्या है?-घड़ी, 5. क्या चीज? -बैग, 6. क्या चीज? -डिब्बी, 7. ये क्या चीज है? -गठरी, 8. यह क्या चीज है? कलम, 9. अच्छा ये क्या चीज है? -माचिस, 10. अच्छा यह क्या चीज़ है? -सिगरेट, 11. जलती हुई या बुझी?-जलती, 12 बुझी हुई या जलती? -बुझी।
(9) मैं क्या पकड़े हूँ?-कोई जिस्म।
1. कौन सा?-कान, 2. कौन सा जिस्म?-नाक, 3. ये कौन सा जिस्म?-हाथ, 4. यह कौन सा जिस्म? -गरदन, 5. ये कौन सा जिस्म है?-ठोड़ी, 6. यह कौन सा जिस्म हैं? -कंधा।
जो बात बाजीगर को दिखाई देती है या मालूम है, तथा पहले से जिस बात के प्रश्नोत्तर तैयार किये हुए हैं उस बात को वह अपने ढके हुए लड़के से पूछ सकता है। जो बात बाजीगर को मालूम नहीं या दिखाई नहीं देती उसे वह लड़के से नहीं कहलवा सकता।
इस खेल को कई लोग पैसे की दृष्टि से नहीं कौतुक एवं शान बघारने के लिए करते हैं उन्हें ताबीज रखने की जरूरत नहीं होती। एक सीखे पढ़े साथी की सहायता से चाहे कोई इसे कर सकता है। साथी झूठ मूठ बेहोश होने का बहाना करके लेट जाता है।
दो साधक सिद्ध मिल कर झूठ मूठ हिप्नोटिज्म का तमाशा भी इसी तरह गढ़ लेते हैं। मिली भगत से और कई तरह के खेल किये जाते हैं।
मैस्मरेजम और हिप्नोटिज्म का संक्षिप्त परिचय पिछले पृष्ठों पर पाठक प्राप्त कर चुके होंगे। इच्छा शक्ति की प्रबलता और मानसिक शक्तियों की एकाग्रता के द्वारा एक असाधारण विद्युत शक्ति उत्पन्न होती है, उसका उपयोग दूसरों पर करने की कला में जो प्रवीणता प्राप्त कर लेते हैं उनके लिए अचरज भरे काम कर दिखाना बायें हाथ का खेल हो जाता है। इस अंक में जो आरंभिक साधना बताई गई है उसका अभ्यास करने से छोटी मोटी कई सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं जैसे- (1) कठिन साध्य और असाध्य रोगों को दूर किया जा सकता है, इनकी विधि हम अपनी ‘प्राणचिकित्सा, विज्ञान पुस्तक में सविस्तार बात चुके हैं। (2) निकटस्थ या दूरस्थ व्यक्तियों के मन में किन्हीं संस्कारों को जमाया जा सकता है जिसकी विधि हमारी परकाय प्रवेश पुस्तक में है। (3) दूसरों से मन की बातें जानी जा सकती हैं। (4) अपने कुसंस्कारों और रोगों को हटाया जा सकता है। (5) अपनी मानसिक एवं आत्मिक शक्तियों का विकास किया जा सकता है। इन लाभों का तात्पर्य अपना और दूसरों का सच्चा हित साधन करना है।
हम अपने साधारण पाठकों को इसी सीमा तक शिक्षा देना चाहते हैं इसलिए इतना ही प्रकाशन करना उचित है परन्तु ऐसा न समझना चाहिए कि इस विद्या का अन्त यहीं हो जाता है। डॉक्टर मैस्मर का विज्ञान साधारण तथा इसी सीमा तक है उसकी पहुँच इससे बहुत आगे तक नहीं है, परन्तु भारतीय योगवेत्ता इससे बहुत आगे की जानकारी, अनुभव तथा सफलता प्राप्त कर चुके हैं। कुण्डलिनी जाग्रत करना, शक्तिपात करके आध्यात्मिक कायाकल्प कर देना, षडचक्र वेधन करके अदृश्य बातों का पता मालूम करना, यह सब सफलताएँ इसी मार्ग पर आगे चलने से मिलती हैं। डॉक्टर मेस्मर यह नहीं जानते थे पर भारतीय योगी मुद्दों पहले इसका आविष्कार कर चुके थे।
जादू के बहुत से खेलों को दिखाते हुए बाजीगर लोग अपने कार्य को मैस्मरेजम बताया करते हैं। हम स्वयं कई वर्षों इसी चक्कर में फँसे रहे हैं, विद्यार्थी जीवन के अमूल्य तीन साल इसी जंगल में भटकते हुए हमने बिताए हैं। भारत के इस कौने से उस कौने तक बड़े बड़े, चमत्कारियों की लंगोठियाँ धोते फिरे हैं, और घर से ढेरों रुपया लोगों को खिलाते रहे हैं। सैकड़ों एक से एक चमत्कारी खेल सीखने के बाद अन्त में हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि कोई धूर्त व्यक्ति इन को काम में लाकर पैसा बटोर सकता है, पर आत्मोन्नति कुछ नहीं कर सकता। निरंतर छल, झूठ, फरेब का अभ्यास करने से और उलटा नीचे को ही गिरेगा। इसलिए झूठी जादूगरी के पीछे न पड़ कर सच्ची आत्म साधना करनी चाहिए।