व्यभिचार की ओर आकर्षित मत होना

व्यभिचार सबसे बड़ा विश्वासघात है। किसी स्त्री के पास तुम तभी तो पहुँच पाते हो जब उसके घरवाले तुम्हारा विश्वास करते हैं और उस तक पहुँच जाने देते हैं। कौन है जो किसी अपरिचित व्यक्ति के घर में निधड़क चला जावे और उससे मनचाही बातचीत करे। इसलिए सज्जनों! अपने मित्र के घर पर हमला मत करो। जरा पाप से डरो और हया शर्म का ख्याल रखो। क्या पाप, घृणा, बदनामी और कलंक का तुम्हें जरा भी डर नहीं है? सद्गृहस्थ वह है जो पड़ौसी की स्त्री के रूप में अपनी माता की छाया देखता है। वीर वह है जो पराई स्त्री पर पाप की दृष्टि से नहीं देखता। स्वर्ग के वैभव का अधिकारी वह है जो स्त्रियों को माता, बहिन, और पुत्री समझता हुआ उनके चरणों में प्रणाम करता है।

मनुष्यों! व्यभिचार की ओर मत बढ़ो। यह जितना ही लुभावना है, उतना ही दुखदायी है। अग्नि की तरह यह सुनहरा चमकता है। पर देखो, जरा मूल से भस्म कर डालने की उसमें बड़ी घातक शक्ति है। इस सर्वनाश के मार्ग पर मत चलना, क्योंकि जिसने भी इधर कदम बढ़ाया है उसे भारी क्षति और विपत्ति का सामना करते हुए हाथ मल मलकर पछताना पड़ा है।


मानव-जीवन


मानव-जीवन

(रचयिता-श्री महावीर प्रसाद विद्यार्थी; टेढ़ा-उन्नाव)

दिन होली, रात दीवाली हो!

जीवन-पथ के शीतलच्छाय तरुओं का करता उन्मूलन,

अपने ही हाथों से तूने बोए हैं काँटों के ये बन,

अपनी आँखों से उठा अरे! अब अहंकार का अवगुण्ठन;

जड़ मानव! तेरे जीवन की मधुभरी छलकती प्याली हो!

दिन होली, रात दीवाली हो!

यह विश्व बने मधुबन तेरा बन घन जा तू इसका बनमाली,

कर सेचन प्रेम-सुधा से तू, छा जाए सुन्दर हरियाली,

तब मनोदेश से हट जाए छलना की घोर घटा काली;

हँसती, झुकती उल्लासभरी तरु-तरु की डाली-डाली हो!

दिन होली, रात दीवाली हो।

अंगार धधकते तब उरके सौरभमय सुमन-समान बनें,

आँखों से आँसू अधरों पर अब मन्द-मन्द मुसकान बनें,

वेदना भरे ये तेरे स्वर कोयल के मधुमय गान बनें;

तम के अंचल में मुसकाती सुन्दरी उषा की लाली हो!

दिन होली, रात दीवाली हो!


अखंड ज्योति का ज्ञान यज्ञ

अखंड-ज्योति अपने साथ एक ठोस उद्देश्य और शक्तिशाली कार्यक्रम लेकर जन्मी है। आज से पाँच वर्ष पूर्व इस महा संस्थान की नींव जिस दिन रखी गई थी, उस दिन भारत के उच्चकोटि के आध्यात्मिक पुरुषों ने एक स्थान पर एकत्रित होकर संसार की और मानव जाति की विभिन्न समस्याओं पर बहुत गम्भीरतापूर्वक विचार किया था। करीब एक सप्ताह तक प्रतिदिन बारह बारह घंटे इस प्रश्न पर विभिन्न दृष्टिकोणों के साथ विचार किया कि “मनुष्य जाति को वर्तमानकालीन सर्वतोमुखी दुर्गति से निकाल कर मनुष्योचित सुख शान्ति की अवस्था तक कैसे लाया जाया सकता है?” विभिन्न दृष्टिकोणों से गम्भीर विचार विनिमय के पश्चात् इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया कि “आत्मिक उन्नति सब उन्नतियों की जननी है।” विवेक बुद्धि के-सद्ज्ञान के-जागृत होने से मनुष्य शरीर में बिखरी हुई अनन्त दिव्य शक्तियाँ जग पड़ती हैं और लौकिक एवं पारलौकिक सुख शान्ति के साधन आसानी के साथ उपलब्ध हो जाते हैं।

दुनिया में चारों ओर दुख शोक फैले हुए हम देखते हैं। बीमारी, गरीबी, अनीति, कुप्रवृत्ति, व्यसन, व्यभिचार, ईर्ष्या, द्वेष, तृष्णा, कलह, शोक, चिन्ता, भय, पराधीनता आदि के कारण मनुष्य जाति नाना प्रकार के दुख भोग रही है। इन व्याधियों को दूर करने के लिए बाह्य उपचार किये जाते हैं परन्तु हम देखते हैं कि वे स्थायी और इच्छित फल देने वाले नहीं होते। कारण यह है कि समस्त व्याधियों की जड़ मनुष्य के मन में है। दवा सेवन करने से कुछ दिन के लिए रोग दब सकता है परन्तु यदि मन असंयमी है, चटोरेपन से प्रेरित होकर कुपथ्य किया करता है तो सदा बीमार ही रहेगा, बेशकीमती दवाएं उसके लिए निरर्थक होंगी। यदि मन संयमी हो तो बीमारी, बिना दवा के भी बहुत जल्द अच्छी हो जाएगी और आहार विहार के संयम के कारण स्वास्थ्य जल्दी न बिगड़ेगा। कानून द्वारा, दंड द्वारा पाप पूर्ण कार्यों को कुछ हद तक ही रोका जा सकता है, यदि जनता की मानसिक स्थिति पापपूर्ण है तो राजदंड या समाज दंड से बचने और गुप्त रीति से पाप करने की तरह तरह की तरकीबें पैदा हो जाएँगी। यदि लोगों की सदाचार की ओर रुचि हो तो दण्ड और कानून का भय न होते हुए भी मनुष्य सदाचारी रहेंगे। धनी, विद्वान, गुणवान, प्रतिष्ठित आदि बनने के लिए तीव्र इच्छा और लगन की जितनी आवश्यकता है और किसी बात की उतनी आवश्यकता नहीं है। शोक, चिन्ता, भय, द्वेष आदि की उत्पत्ति और समाप्ति परिस्थितियों के कारण नहीं होती वरन् मनोभावों के कारण होती है। एक आदमी धन नाश हो जाने पर अत्यन्त शोक ग्रस्त होकर आत्म हत्या कर लेता है परन्तु दूसरा आदमी इसकी परवाह न करके धन नाश हो जाने पर भी घबराता नहीं। ध्यानपूर्वक देखा जाए तो पता चलता है कि हर प्रकार की व्यथा-वेदना के बीज मन में रहते हैं यदि मानसिक स्थिति का, आत्मबल का, विवेक बुद्धि का सुधार हो जाए तो मानव जीवन के सम्पूर्ण रोग शोक आसानी से दूर हो सकते हैं।

जैसे व्यथा वेदनाओं के उत्पन्न करने का बीज मन के अन्दर है वैसे ही उनका निवारण करके सुख, शान्ति, भय परिस्थितियों को प्राप्त करने का, लौकिक और पारलौकिक उन्नति का, बीज भी मन के अन्दर ही है। गीता कहती है कि-जिस के जैसे विचार हैं वह वैसा ही बन जाता है। यदि विचारधारा उच्च हो तो जीवन का बाह्य रूप भी उच्च ही बन जाता है। राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक, धार्मिक सब प्रकार के सुधारों की कुँजी मन के भीतर है। एक तत्त्वदर्शी आचार्य का कथन है कि क्रान्तियाँ तोप और तलवारों से नहीं होती वरन् विचार बल से होती हैं। विचारों में ऐसी प्रचण्ड शक्ति है कि बेचारे तोप तमंचे उसके आगे झक मारते हैं। इतिहास बताता है कि बड़ी बड़ी बलवान सत्ताएं, रूढ़ियां, अनीतियाँ कुप्रवृत्तियाँ जो अपने को अजेय समझती थीं विचारों की तूफानी आँधी के सामने अधिक न ठहर सकीं और धड़ाम से गिरकर चकनाचूर हो गईं।

दुख शोकों का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। वे मानसिक विकारों का फल मात्र हैं। अज्ञान के साथ साथ वे उसी प्रकार प्रकट होते हैं जैसे रात्रि के साथ तारे और विवेक के साथ वे उसी प्रकार छिप जाते हैं जैसे सूर्य के उदय होते ही चमगादड़। मनुष्य जाति को धन, औषधि, मशीन, विज्ञान, ऐश, मनोरंजन, शासन, कानून आदि द्वारा दुख से नहीं छुड़ाया जा सकता क्योंकि वास्तविक सुख शान्ति बाहर की किसी वस्तु पर निर्भर नहीं है वरन् मनोदशा के ऊपर अवलम्बित है। उत्तम विचारधारा, उच्च दृष्टिकोण और सद्भाव को यदि मनुष्य अपना ले तो धन आदि की कमी होते हुए भी इसी जीवन में स्वर्ग का आनन्द उपलब्ध किया जा सकता है। वर्णों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है, शरीर में मस्तिष्क श्रेष्ठ है, यज्ञों में ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है, गीता की इस उक्ति का यही तात्पर्य है कि मनुष्य जीवन का मर्मस्थान उसका विचार है। विचार ही इस हाड़ माँस के पुतले को दुखी, दरिद्र, नीच, रोगी, पापी, पतित बनाते हैं और उन्हीं के प्रभाव से वह सुखी सम्पन्न, पूजनीय, स्वस्थ, धर्मात्मा प्रतापी और जीवन मुक्त होता है।

इस महान् तत्त्व ज्ञान की अचल सत्यता के आधार पर एक सप्ताह तक विचार विनिमय करने के पश्चात् अखंड ज्योति का शिलान्यास करने वाले महात्मा इसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि मनुष्य जाति को वर्तमान पतितावस्था से ऊँचा उठाने के लिए, आध्यात्मिकता का, श्रेष्ठ विचारधारा का, उच्च दृष्टिकोण का प्रसार किया जाए। यह निश्चित हैं कि जितनी ही मनोदशा बदलेगी उतनी ही सुख शान्ति में वृद्धि होगी। भगवान् की प्रतिज्ञा है कि जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब मैं अवतार लिया करता हूँ। आज का समय ठीक वैसा ही है जैसे में कि अवतार की आवश्यकता होती है। तत्त्वदर्शी महात्मा अपनी दिव्य दृष्टि से देख रहे हैं कि अब भगवान् अवतार ले रहे हैं। असंख्य अन्तःकरणों में उस अदृश्य शक्ति की अदृश्य प्रेरणा हो रही है कि-दुख को, पाप को हटाने के लिए कर्तव्य में प्रवृत्त हुआ जाए। तपस्या और योगसाधना में लगे हुए, जीवन मुक्त महात्मा ईश्वर की उसी अवतारमयी प्रेरणा से प्रेरित होकर लोक सेवा के, जन कल्याण के कार्यों में साधारण मनुष्यों की भाँति जुट गये हैं। अखंड ज्योति भी एक ऐसा ही मिशन है। जिसका कार्यक्रम मनुष्य जाति को सन्मार्ग की ओर सदाचार की ओर, सद् विचारो की ओर, कर्त्तव्य-परायणता की ओर प्रेरित करना है, जिससे दुखों की निवृत्ति और आनन्द की प्राप्ति हो सके।

‘अखंड ज्योति’ संस्थान की ओर से यह मासिक पत्रिका निकलती है जिसकी पंक्तियाँ आप इस समय पढ़ रहे हैं। सद्ज्ञान ग्रन्थ माला की 38 एक से एक उत्तम पुस्तकें छपी हैं। परन्तु ऐसा न समझ लेना चाहिये कि इतना मात्र ही हमारा कार्यक्रम है। अखंडज्योति के हजारों पाठक अपनी-अपनी योग्यता और स्थिति के अनुसार अपने-अपने क्षेत्रों में ज्ञान प्रचार का कार्य करते हैं। कई सौ गृही और वैरागी सन्तजन देश के कोने-कोने में सदाचार का, सद्विचार का, नारद ऋषि की भाँति दिन-रात प्रचार करते रहते हैं। मथुरा कार्यालय में कर्मयोग की शिक्षा प्राप्त करने के लिये सदैव कुछ न कुछ महानुभाव आते ही रहते हैं। सत्संग और स्वाध्याय द्वारा ज्ञान वृद्धि का महान् कार्य सदा चलता ही रहता है।

भगवान् को प्रसन्न करने के लिये उनकी आज्ञा पालन करने के लिये समय समय पर विभिन्न प्रकार की आवश्यकताएं हुआ करती हैं। उन आवश्यकताओं को सच्चे ईश्वर भक्त समय समय पर प्रकट किया करते हैं। एक समय था जब इस देश में वर्षा बहुत अधिक होती थी, कीचड़, और सील रहने के कारण वायु दूषित हो जाती थी और मलेरिया आदि रोग फैलने की अधिक आशंका रहती थी। उस समय वायु को शुद्ध करने के लिये हवन करना, अग्नि जलाना आवश्यक था। तत्कालीन ऋषियों ने घोषणा की कि-’यज्ञ हवन करना ईश्वर को प्रसन्न करने का मार्ग है।’ इसके पश्चात् ऐसा समय आया जब कि धर्म शिक्षा की, ज्ञान वृद्धि की अधिक आवश्यकता अनुभव हुई। तत्कालीन ऋषियों ने घोषित किया कि-”कथा सुनने से, धर्म ग्रन्थों का पाठ करने से, ईश्वर प्रसन्न होता है।” एक समय था जब मनुष्य की समझ में ईश्वर पूजा की बात धंसती ही न थी, उस समय ऐसी आवश्यकता अनुभव की गई कि ईश्वर के चित्रों की सन्निकटता से लोगों का ध्यान ईश्वर की ओर आकर्षित किया जाए। तत्कालीन ऋषियों ने घोषणा की कि ‘मूर्ति की पूजा करने से ईश्वर प्रसन्न होता है।’ एक समय था जब मनुष्य-हिंसा में बहुत प्रवृत्त था। तत्कालीन ऋषियों ने ‘अहिंसा परमोधर्म’ को पालन करना ईश्वर की श्रेष्ठ पूजा बताया। एक समय था जब मनुष्य बहुत स्वार्थी और माया लिप्त हो गया था, भगवान् बुद्ध ने संन्यास द्वारा, त्याग द्वारा, परमात्मा को प्राप्य घोषित किया। इसी प्रकार समय समय पर जप, तप, व्रत, तिलक, छाप, कंठी, माला, ध्यान, मन्त्र, कीर्तन आदि के द्वारा ईश्वर का प्रसन्न होना बताया गया था। विभिन्न देशों में विभिन्न सम्प्रदाय, मजहब भी इसी तथ्य के आधार पर चले हैं। देशकाल की स्थिति के अनुसार मनुष्य जाति को सन्मार्ग पर लाने का जब जो भी मार्ग सब से अच्छा दिखाई पड़ा तब उसे ही ईश्वर की प्रसन्नता का सर्वश्रेष्ठ तरीका घोषित कर दिया गया। वैसे ईश्वर, पूजा पत्री का भूखा नहीं है, भक्त और अभक्त के बीच में भेद भाव भी वह नहीं करता। जो उसकी आज्ञाएं मानता है, उसकी इच्छा का पालन करता है, संसार में सुख शान्ति बढ़ाने के लिए समयानुकूल कार्य करता है, वही उसका प्यारा है, वही उसका भक्त है।

आज की स्थिति में उच्चकोटि की आत्माओं को अपने अन्तःकरण में ईश्वर की ऐसी प्रेरणा अनुभव होती है कि अपने व्यक्तिगत स्वर्ग और मुक्ति की परवाह न करके दुखी संसार को सुखी बनाने के लिये प्रयत्न करना चाहिये। इस प्रेरणा से प्रेरित होकर जो कार्य किया जाता है वह ईश्वर भक्ति का वर्तमानकालीन श्रेष्ठ तरीका है। अखंड ज्योति को चलाने वाली अदृश्य सत्ता इसी कार्यक्रम में लगी हुई है। उसके संचालक, परिवार के सदस्य, पाठक, इसी योजना के एक अंग हैं। इस प्रकार ईश्वर की आज्ञा पालन का, परमात्मा की भक्ति का समयानुसार यह एक अत्युत्तम पथ है। ज्ञान दान को-ब्रह्मदान या जीवनदान कहा जाता है। भगवान् ने कहा है-”ज्ञानं ज्ञानवतामहम्” अर्थात् ज्ञानवानों में जो ज्ञान है, वह ज्ञान परमात्मा ही है। “नहि ज्ञानेन सदृश पवित्रमिह विद्यते” अर्थात्-ज्ञान के समान इस संसार में और कोई पवित्र करने वाली वस्तु नहीं है। “श्रेयान्द्रव्य मया यज्ञाज्ज्ञान यज्ञः परंतप” अर्थात्-वस्तुओं द्वारा होने वाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है।


व्यक्तिगत सफलता के आध्यात्मिक सूत्र

प्रो. रामचरणजी महेन्द्र एम. ए. डी. लिट्.

अमेरिका के एक अत्यन्त सफल व्यापारी से एक बार उसकी सफलता का रहस्य पूछा गया। उसने उत्तर दिया-”मैं प्रत्येक दिन आरम्भ करने से पूर्व रात्रि में ही दस ऐसी आवश्यक बातें अपनी डायरी में लिख लेता हूँ जो मेरी अन्तःप्रेरणा मुझे निर्देश करती है, फिर दूसरे दिन प्रातःकाल से ही उन्हें पूर्ण करने पर जुट जाता हूँ और चाहे कुछ भी हो उन्हें पूर्ण कर ही डालता हूँ।” उत्तर पर गम्भीरता से सोचो। विचार करो। इस व्यक्ति की सफलता का रहस्य है दिव्य विचार तथा उनको क्रियात्मक रूप प्रदान करना (क्रद्बद्दद्धह्ल ह्लद्धशह्वद्दद्धह्ल श्चद्यह्वह्य ह्द्बद्दद्धह्ल ड्डष्ह्लद्बशठ्ठ) वह सर्वप्रथम उद्देश्य निश्चित कर लेता था और फिर उसकी सिद्धि में प्राणप्रण से जुट जाता था। निश्चय और दृढ़ता ही ने उसे सफल बनाया था।

हम बहुत सा समय व्यर्थ नष्ट कर देते हैं क्योंकि हम निश्चय नहीं कर पाते कि अमुक समय क्या करें। यदि हमारे पास पहिले से ही बाकायदा बना बनाया प्रोग्राम हो तो सिर्फ क्रम और व्यवस्था के कारण अपना अधिकाँश समय बचा सकते हैं। जितना अवकाश तुम्हारे हाथ में हैं उसका ब्यौरा ठीक इसी प्रकार रखो जिस प्रकार अपने रुपये पैसे का हिसाब रखते हो। यदि मन को नियत समय पर एक एक विषय पर ही लगाया जाए तो वह बहुत कुछ कर सकता है किन्तु यदि चंचलतापूर्वक कभी यह तो कभी वह किया जाए तो कुछ भी हाथ नहीं आता। आप भी अपने जीवन की स्थिति के अनुसार अपने समय को क्यों नहीं बाँट लेते।

विचारों की सूची-

कभी-2 हमारे मन में अत्यन्त पवित्र विचार उठते हैं। ऐसी बहुत सी अच्छी बातें मन में आ जाती हैं जिन से अत्यन्त लाभ की सम्भावना है। एक ऐसी डायरी बनाओ जिस में तुम ये नये-2 विचार लिखते रहो। तुम अपनी स्मरणशक्ति पर ही पूरा विश्वास न कर लो। संभव है तुम एक समय पर कोई उत्कृष्ट बात भूल जाओ। तुम इन शुभ विचारों को विस्मृत कर सकते हो। कहीं खो न जाएँ इसकी पूर्ण व्यवस्था करनी होगी। विचारों की इस लतिका में नित्य प्रति स्मरण करो। प्रारम्भ से अन्त तक श्रद्धापूर्वक पढ़ जाया करो। विचारों की यह लतिका तुम्हें स्मरण कराती रहेगी कि कौन-2 कार्य तुम्हें कर डालने हैं।

कार्ड पर लिखकर टाँग लो-

ऐसी बहुत सी बातें हैं जो तुम आज ही पूर्ण नहीं कर सकते। उनके लिये यथेष्ट समय चाहिए। तुम अभी नहीं तो इन बातों को महीने पन्द्रह दिन में पूर्ण करने की बात सोचा करते हो। सप्ताह और मास हो जाते हैं और कालान्तर में ये दिव्य भावनाएँ लुप्त हो जाती हैं। मेरे एक मित्र बार-बार कई महत्त्वपूर्ण कार्यों में चूक गये। वे उन्हें करना चाहते थे किन्तु बार बार स्थगित करते रहे। यदि कोई उनसे उन बातों को करने के लिये कहता रहता तो संभव है वे सब कुछ सम्पन्न कर जाते। मैंने उन्हें बताया है कि आप इन कामों को एक कार्ड पर लिखकर दीवार के उस हिस्से में टाँग दीजिये जहाँ आप अधिक देर तक बैठते हैं। स्थान ऐसा हो जहाँ आप की दृष्टि पड़ ही जाए ओर आप के नेत्र उसी बात पर जाकर टिकें। इस कार्ड से उन्हें आशातीत लाभ पहुँचा है। वे उससे बहुत डरते हैं। और प्रायः जो बात कार्ड पर एक बार लिख डालते हैं उसे पूर्ण कर ही डालते हैं। मैं प्रायः यही करता हूँ। कार्ड नहीं मिलता तो चाक, कोयला या पेंसिल से दीवार पर लिख डालता हूँ। फिर वे कार्ड पूर्ण हो ही जाते हैं। यह कार्ड हमारी इच्छा को उत्तेजना देकर सामर्थ्यशील बना देता है।

शीशे पर चिपकालो-

शीशे में अपना मुख देखने का शौक प्रायः प्रत्येक स्त्री पुरुष को होता है। डेलकार्नेगी अपनी पुस्तक (How to win Friends and Influence people) में लिखते हैं कि मेरे स्वर्ण सूत्रों को किताब से काटकर अपने शीशे के एक कोने में चिपका लो। लोगों को अपने विचारानुकूल बनाने की 12 रीतियों का वर्णन इस प्रकार करते हैं- 1-बहस मत करो। 2-दूसरों की बात का आदर करो, उसे कभी झूठा न बताओ। 3-अपनी भूल को फौरन स्वीकार कर लो। 4-वार्ता मित्रता के ढंग से शुरू करो। 5-इस तरह बातें करो कि जिससे दूसरा व्यक्ति तुम्हारी बातों को मंजूर करता चले। 6-दूसरों को ज्यादा बातें करने का मौका दो। 7-दूसरों को यह अनुभव कराओ कि सूझ उन्हीं की है। 8-दूसरे के दृष्टिकोण से देखने की चेष्टा करो। 9-दूसरों के विचारों और इच्छाओं का ध्यान रखो। 10-दूसरे के उच्च विचारों को जागृत करो। 11-अपने विचारों का जादू चलाओ। 12-शर्त मारो। लेखक की सम्मति है कि इन तमाम बातों को पुस्तक से काटकर शीशे पर चिपका लो।

मेज का दराज साफ करो-

एक अमेरिकन आत्म संयमी ने एक अपूर्व रीति निकाली है। वह सब अच्छी-2 बातें कागज के भिन्न भिन्न टुकड़ों पर लिखकर अपनी मेज की दराज में डालता जाता था। जो भी सुन्दर पुस्तक पढ़ता उसके उत्कृष्ट स्थल, नवीन समस्याएँ, महत्वपूर्ण सूत्र, अच्छी-2 बातें लिखकर इन टुकड़ों को अपनी मेज के दराज में डालता जाता था। प्रातः काल उठकर उन तमाम टुकड़ों को मेज पर फैला लेता और फिर एक के ऊपर एक जमाता। उन्हें ध्यान पूर्वक देखता। कंजूस जैसे अपने पैसे-2 की परवाह करता है उसी प्रकार वह उन्हें देखता। थोड़ी देर उन पर मन एकाग्र करता और पुनः उन्हें रख देता। तुम भी नित्य प्रति दिन यह कार्य कर सकते हो। इसके द्वारा तुम अपने स्वभाव, विचारों और आदर्शों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन कर लोगे।

सफल व्यक्ति का अध्ययन करो-

यदि तुम्हें कोई सफल व्यक्ति मिल जाय तो उस से मित्रता स्थापित करने का प्रयत्न करो। उसे यह स्पष्ट करो कि जिस से तुम बातें कर रहे हो वह कुछ महत्त्व रखता है। मित्रता स्थापित करने का सब से सरल उपाय यह है कि तुम उस से सलाह लो, उसके सामने अपने आप को नीचा दिखाओ, उसे उपदेश देने की उत्तेजना दो, उसकी सच्ची प्रशंसा करो, उसकी कोई पुस्तक पढ़ने के लिये माँग लो। उससे सफलता के विषय में पूछते जाओ। तुम्हारे प्रश्न सच्चे हों, उसे तुम्हारे ऊपर दया आ जाए तो अवश्य ही वह तुम्हें बहुत कुछ बता देगा। एक आकर्षक व्यक्ति के संपर्क में रहकर साधारण व्यक्ति भी कुछ चुम्बकीय शक्तियाँ प्राप्त कर लेता है।

अपने प्रिय हीरो की जीवनी पढ़ो-

उपनिषदों में कहा है कि ज्ञान की प्राप्ति कुछ कुछ स्वयंवर के ढंग से होती है। आत्मा जिसका वरण करती है उसी के समान अपना रूप प्रकट करती है। कवि की प्रतिभा स्वयं उसी को चुनती है जो उसे सब से प्रिय है। यही नियम आत्म संस्कार के लिये भी सत्य है। जिस महान् व्यक्ति का व्यक्तित्व तुम्हें सब से प्रिय है उसकी जीवनी को बार बार पढ़ो, अध्ययन करो, उस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करो, उस में तन्मय हो जाओ-चाहे वह कोई सैनिक, तत्त्ववेत्ता, दार्शनिक या लेखक कोई भी क्यों न हो। हम सब थोड़ी बहुत मात्रा में अपने प्रिय व्यक्तियों के पुजारी (Hero worshipper) होते हैं। हमारा आचरण भी उन्हीं जैसा हो जाता है। महान व्यक्ति पुकार पुकार कर हमसे कह रहे हैं कि अध्यवसाय के बिना कुछ नहीं हो सकता। वही राजनीतिज्ञ की बुद्धि है, विजयी का अस्त्र है और विद्वान का बल है।


दिलचस्पी से काम करिए।

एक तत्त्वदर्शी कवि की दिव्य अनुभूति है कि “जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रस धार नहीं। वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।” दार्शनिक थोरो का कथन है कि- “जीवधारी और कुछ नहीं एक बोलता और चलता पाषाण है। किन्तु यदि उसमें भावनाएं-कोमल सतोगुणी भावनाएं उठती हों, सौंदर्य स्नेह और सेवा की तरंगें उठती हों तो वह मनुष्य है। .............मैं मनुष्य उसे नहीं कहता जो बोलता और चलता हो मेरी दृष्टि में तो वही मनुष्य है जिसमें सहृदयता और सद्भावना का निवास है।” विद्वान जार्ज रसेल का मत है कि-”धर्म और पुण्य किसी मनुष्य के हृदय में कितना विद्यमान है इसकी एक मात्र परीक्षा यह है कि वह उच्च कोटि की सात्विक सौंदर्य भावनाओं में कितना प्रवाहित होता है।” रूखा मनुष्य दिखावट के लिए, वाहवाही लूटने के लिए या अपने अहंकार को तृप्त करने के लिए कोई बड़े काम कर सकता है, पैसा खर्च कर सकता है और समय भी लगा सकता है परन्तु इन सब कामों से उसके अन्तराल में वह आनन्द, तृप्ति और सन्तोष उत्पन्न नहीं होता जो कि एक सहृदय गरीब के मन में किसी कष्ट पीड़ित की छोटी सी सहायता, किन्तु भावुकता पूर्ण सहायता करने से होता है।

आप अपनी रुक्षता, उदासीनता, खुदगर्जी, निष्ठुरता और अनुदारता को कम करते चलिए इसके स्थान पर स्नेह, दिलचस्पी, सेवा, सहायता, दया और उदारता को बढ़ाते चलिए। यह परिवर्तन जैसे जैसे आपमें होता जाएगा वैसे वैसे ही आपका आनन्द बढ़ता जाएगा। “दूसरे लोगों से हमें क्या काम, हमें तो अपने मतलब से मतलब,” ऐसे तुच्छ विचार रूखेपन को उत्पन्न करते हैं, इसलिए सावधान रहिए उन्हें अपने मस्तिष्क में प्रवेश मत होते दीजिये। आप एक समाजिक प्राणी हैं, दूसरों की अच्छाई बुराई के ऊपर आपकी अच्छाई बुराई निर्भर है, दूसरों के सुख दुख, हानि लाभ, ज्ञान अज्ञान का परिणाम आपको भी भुगतना पड़ता है। पेट में दर्द हो तो मस्तिष्क का भी कुछ न कुछ नुकसान जरूर होगा और मस्तिष्क की पीड़ा शरीर के अन्य अंगों को भी शक्तिहीन बनावेगी। समाज एक शरीर है और व्यक्ति उसका अंग हैं। अच्छे पड़ोसियों के बीच ही किसी की अच्छाई और सुख शान्ति निभ सकती है, इसलिए यह भली प्रकार से समझ लेना चाहिए कि दूसरों के -पड़ोसियों के मतलब के साथ अपना मतलब ऐसी मजबूती के साथ जुड़ा हुआ है कि उसे अलग नहीं किया जा सकता। इसलिए अपने कुटुम्बियों के, पड़ोसियों के, संबंधियों के, साथियों के प्रति अपनी आत्मीयता अधिक से अधिक बढ़नी चाहिए, उनके विषय में भी दिलचस्पी होनी चाहिए और उनके विचार तथा कार्यों में यथोचित दिलचस्पी लेनी चाहिए।

यह एक नियम है कि जिस वस्तु में आप जितनी दिलचस्पी लेते हैं वह उतनी ही आनन्ददायक हो जाती है और जिसमें से अपनी रुचि हटा लेते हैं वह उतनी ही नीरस हो जाती है। अपना कुरूप पुत्र प्यारा होता है पर दूसरे के सुन्दर लड़के की ओर कुछ ध्यान नहीं जाता। कारण यह है कि अपने पुत्र में दिलचस्पी है, दूसरे के पुत्र में नहीं। अंधेरी रात में वही वस्तु चमकती है कि जिन पर दीपक का प्रकाश पड़ता है, इसी प्रकार संसार में भरी हुई अनेक वस्तुओं में से वही वस्तुएँ प्रिय दीखती हैं जिन पर दिलचस्पी रूपी प्रकाश पड़ता है। यदि आप अपने परिवार के द्वारा प्रसन्नता प्राप्त करना चाहते हैं, अपने संबंधियों को अपने लिए आनन्दमय बनाना चाहते हैं तो उनकी ओर उपेक्षा, रूखापन, उदासीनता रखना छोड़ दीजिए और सच्ची दिलचस्पी के साथ आत्मीयता की भावनाएँ रखना आरम्भ कर दीजिए। जो वस्तुएँ कल तक आपको बेकार, भार चिढ़ाने वाली, तंग करने वाली, दिखाई देती थी, वे ही आज प्रिय एवं आनन्दवर्धक दृष्टिगोचर होने लगेंगी।

जो बात व्यक्तियों के संबंध में है वही बात काम काज के सम्बन्ध में भी है जिस कार्य में आपको रुचि है उसमें अधिक परिश्रम करने पर भी अच्छा होगा। जिस काम को अधूरे मन से उदासीनतापूर्वक करेंगे उसमें बहुत थकान आवेगी, थोड़ा काम होगा, खराब काम होगा। अच्छा और बढ़िया काम करने के लिए यह आवश्यक है कि आदमी अपने काम का सम्मान करे, उसे बढ़िया समझे, उसमें दिलचस्पी ले और गर्व अनुभव करे। ऐसा करने से वह हलका या मामूली काम भी बहुत बढ़िया तथा महत्त्वपूर्ण बन जावेगा। आर्य जाति की वर्ण व्यवस्था का इसी आधार पर निर्माण हुआ है कि एक समूह के लोग एक कार्य को अपना कर्त्तव्य धर्म समझ कर, बिना इधर उधर चित्त डिगाये, पीढ़ी दर पीढ़ी करते रहें ऐसा करने से वह कार्य उत्तमतापूर्वक होते रहेंगे। अस्थिरता, आधे मन और झिझक के साथ जो कार्य किये जाते है वे प्रायः पूर्ण रूप से सफल नहीं हो पाते। काम में और व्यक्तियों में, दोनों क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने का एक ही सिद्धान्त है कि दिलचस्पी को बढ़ाओ, अधिक ध्यान दो। जिस क्षेत्र में काम करना पड़े, रहना पड़े, उसे उत्तम, ऊँचा, सुन्दर और श्रेष्ठ बनाने का प्रयत्न करो। ऐसा करने से तुम्हारे आनन्द में सैकड़ों गुनी बढ़ोतरी हो जाएगी।

प्रेम के समान कोई वस्तु मनुष्य को प्रिय नहीं हैं। धन, मान, शरीर, प्राण सब कुछ मनुष्य प्रेम के ऊपर निछावर कर सकता है। पैसे की बहुतायत होते हुए भी यदि मनुष्य को प्रेम प्राप्त न हो तो उसका जीवन शुष्क ही रहेगा। इसके विपरीत यदि गरीबी और अभावग्रस्त अवस्था में भी प्रेम प्राप्त हो तो वह अमीरी की अपेक्षा कहीं अधिक संतोषदायक होगा। वह प्रेम क्या है? दिलचस्पी का-कोमलता का-दूसरा नाम ही प्रेम है। प्रेम के साथ सौंदर्य जुड़ा हुआ है-जिससे प्रेम होता है वह कुरूप होते हुए भी सुन्दर दिखाई पड़ता है, प्रेम के साथ उदारता जुड़ी हुई है, प्रेम के साथ सेवा और सहायता का सुदृढ़ सम्बन्ध है। प्रेम ही पुण्य है। उदारता, सेवा और सहायता यह पुण्य के प्रत्यक्ष लक्षण हैं, जिसके मन में प्रेम है वह पुण्यात्मा है। प्रेम का दूसरा नाम ही भक्ति है। भक्ति के वश में भगवान हैं, फिर मनुष्य की तो गणना ही क्या है। जिसके मन में प्रेम की कोमल, सरस, सात्विक धारा बहती है उसके लिए सारा संसार चित्र सा सुन्दर, पुष्प सा सुगंधित, दूध सा स्वच्छ, गंगा सा पवित्र है। हर आदमी की अपनी दुनिया अलग होती है, प्रेमी की यह अपनी पवित्र दुनिया अलग ही है। जो ऐसी दुनिया में रहता है वह स्वर्ग में ही रहता हैं। प्रसिद्ध भक्त माइकेल ऐंग्लो कहा करते थे कि ‘मुझे पत्थरों और चट्टानों में अप्सराओं जैसी दिव्य मूर्तियाँ दिखाई पड़ती हैं।” महात्मा माइकेल को चट्टानों में भी सजीव स्वर्ग दिखाई पड़ता था। हम भी यदि अपने नेत्रों में प्रेम का अंजन लगा लें तो हम भी वैसा ही अनुभव कर सकते हैं। बुरी और कठिन परिस्थितियों में अपने आनन्द को अक्षुण्य बनाये रख सकते हैं। महाकवि शैली ने मृत्यु का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है, वह मृत्यु को सुन्दरी के रूप में, प्रेयसी रूप में देखता है, उसका बड़ा ही भावुक और कवित्वमय वर्णन करता है और मृत्युरूपी सुन्दरी की गोद में बैठने की बड़े आनंद और चाव के साथ उत्कंठा प्रकट करता है। जिसके मन में प्रेम की सरसता है उसके लिए मृत्यु भी सुन्दर दिखाई पड़ती है। प्रेम का ऐसा ही महात्म्य है। वह भयंकर कठोरताओं को स्निग्धता, सरसता और सरलता में बदल देता है।

आप कंजूस मत बनिये। जोड़ने जमा करने के चक्कर से बचकर उदारता का दरवाजा खुला, रखिए। आप खुदगर्ज मत बनिए-दूसरों की सेवा सहायता के लिए भी प्रयत्नशील रहिए। आप रूखापन धारण मत कीजिए-स्वयं प्रसन्न रहने और दूसरों को प्रसन्न करने का उद्योग किया कीजिए। आप शुष्क और नीरस मत बनिए, अपने हृदय में कोमलता, दया, करुणा, भ्रातृभाव के भावों को प्रवाहित किया कीजिए। आप उजड्ड और अभिमानी मत बनिये दूसरों को स्वागत, सत्कार, मधुर भाषण से, विनम्र व्यवहार से संतुष्ट करते रहिए। आप कृतघ्न मन बनिये, किसी के लिये हुए उपकार को भूलिए मत और उसे समय समय पर धन्यवादपूर्वक प्रकट करते हुए प्रत्युपकार के लिए प्रयत्नशील रहा कीजिए। अपने क्षेत्र को दोष मत लगाइए वरन् पवित्र मानिए। अपने शरीर को, अपने परिवार को, अपने कार्य को, अपने स्वजन संबंधियों को अपनी मातृभूमि को तुच्छ एवं घृणित मत समझिए वरन् उसमें पवित्रता, श्रेष्ठता और सात्विकता के तत्त्वों को ढूँढ़-ढूँढ़ कर विकसित कीजिए। कुरूपता, गंदगी और अन्धकार को हटाकर सौंदर्य, स्वच्छता और प्रकाश का प्रसार करिए।

हे आत्मन्! प्रेम की वीणा बजाते हुए जीवन को संगीतमय बनाओ, इसे एक सुन्दर चित्र के रूप में उपस्थित करो। जिन्दगी को एक भावुक कविता के रूप में रच डालो। प्रेम का मधुरस पान करो, खय्याम की तरह अपने प्याले को छाती से चिपकाये रहो, हाथ से छूटने मत दो। प्रेम करो! अपने आप से प्रेम करो, दूसरों से प्रेम करो, विश्व से प्रेम करो। मनुष्यों! प्रेम करो, यदि जीवन का अमृत रस चखना चाहते हो तो प्रेम करो अपने अन्तःकरण को कोमल बनाओ, स्नेह से उसे भर लो। इस पाठ पर बार-बार विचार करो और बार-बार अन्तःकरण में गहराई तक उतारने की अनवरत साधना करते रहो।


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सिद्धान्त के दस फूलों की अपेक्षा अनुभव का एक काँटा श्रेष्ठ है।


धर्म और चमत्कार

(महात्मा बुद्ध की डायरी)

उस दिन राजगृह के नगर सेठ को यही पागलपन सूझा। उसने एक चन्दन का पात्र बनवाकर एक लम्बे बाँस पर लटका दिया और जो कोई भिक्षु आता उससे कहता-अगर आप अर्हत् हैं तो बाँस पर चढ़कर पात्र उतार लीजिए। मानो अर्हत्पन की कसौटी बाँस पर चढ़ने योग्य नट कला हो। ये मूर्ख इतना भी नहीं समझते कि कोई भी नट बाँस पर चढ़कर पात्र उतार सकता है तो क्या वह अर्हत् हो जायगा? और अर्हत् भी बाँस पर चढ़ने की कला या शक्ति से वंचित हो सकते हैं। तो क्या वे अनर्हत हो जायेंगे। वह सेठ भी मूर्ख, दुनिया भी मूर्ख और मेरे बहुत से शिष्य भी मूर्ख। मेरे शिष्यों में से वह पिंडोल भारद्वाज उस सेठ के यहाँ जा पहुँचा उसने नट की तरह बाँस पर चढ़कर पात्र उतार लिया। उसने समझा कि बड़ी धर्म प्रभावना हो गई। भीड़ उसके पीछे लग गई, पिंडोल ने समझा मैं सचमुच अर्हत् हो गया।

यदि पिंडोल सरीखे मूर्ख शिष्य धर्म की ऐसी ही प्रभावना करने लगेंगे तो धर्म में सच्चे त्यागियों और समाज सेवकों को स्थान ही न रह जाएगा। धर्म संस्था नटों का अखाड़ा हो जाएगी इसलिए भिक्षु संघ को बुलाकर मैंने सबके सामने पिंडोल को डाँटा और उसके चन्दन के पात्र के टुकड़े-टुकड़े करवा दिये।

-सत्यभक्त


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मैं किसी के विश्वासों को सुनने के लिये तैयार हूं पर उसके सन्देहों को नहीं।

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अपनी प्रतिभा का हर क्षण ख्याल रखो, इसके बदले वह तुम्हें हर घड़ी नया मार्ग सुझावेगी।


पाचन क्रिया को ठीक रखिए।

जान विक्टर हेमन ने अपनी रोग मुक्ति की चर्चा करते हुए बताया है कि वह अपनी जिन्दगी से नाउम्मीद हो चुके थे। आये दिन नए-नए तर्ज की बीमारियाँ पैदा होती थी। इंजेक्शन लगवाते-लगवाते उनका जिस्म छलनी हो गया था। सारी पैतृक सम्पत्ति को डॉक्टर लोग चाट चुके थे, इस पर भी कुछ लाभ न था। हालत दिन पर दिन गिरती गई यहाँ तक कि चारपाई पर से उठकर चलना फिरना उनके लिए दूभर हो गया। ऐसी दशा में एक दिन पड़े-पड़े उन्हें विचार आया कि पाचन क्रिया के ठीक न होने से मेरी यह दुर्दशा हुई। यदि किसी प्रकार मेरा पेट सुधर जाए तो मैं मृत्यु के मुख में से निकल सकता हूँ। मृत्यु का भय और जीवन का लोभ दोनों ने उन्हें असाधारण साहस प्रदान किया और वे सारी दिलचस्पी तथा बुद्धिमानी के साथ पेट को सुधारने में लग गये। उन्होंने एनिमा द्वारा पेट को साफ करना, उपवास, व्यायाम और उचित आहार इन चार नियमों को अपनाया और अपने आप अपनी समझ से अपनी चिकित्सा करते रहे। परिणाम यह हुआ कि दिन-दिन उनकी हालत सुधरती गई और कुछ ही समय में वे पूर्णतया निरोग और स्वस्थ हो गये थे। जीवन से निराश और मृत्यु की घड़ियाँ गिनने वाले व्यक्ति ने नया जीवन प्राप्त किया। बीमारियों से छुटकारा पाने के पश्चात् जान हेमन ने लम्बा दीर्घ जीवन प्राप्त किया जब तक वे जिये फिर कभी वे बीमार न पड़े। अमेरिका के श्री सानफोर्ड वेनिट के अनुभव भी ऐसे ही हैं। उनने भी पेट की पाचन क्रिया का सुधार करके 72 वर्ष की आयु में तरुण अवस्था जैसा अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त किया था। अमेरिका का वर्तमान राष्ट्रपति रुजवेल्ट का स्वास्थ्य एक बार इतना बिगड़ गया था वे चलने फिरने से भी लाचार हो गये थे, हाथ पैरों ने उनका साथ देना छोड़ दिया था। दवा दारु के उपाय जब बिलकुल कुछ काम न आए तो उन्होंने प्राकृतिक नियमों का सहारा लेकर अपने स्वास्थ्य को सुधारने का स्वयं प्रयत्न किया। उस प्रयत्न में उन्हें पूरी सफलता भी प्राप्त हुई। गत नौ वर्ष से लगातार वे राष्ट्रपति के महत्त्वपूर्ण पद का संचालन कर रहे हैं, कार्य भार उन पर बहुत अधिक रहता है फिर भी उनके स्वास्थ्य में कुछ गिरावट नहीं आती वरन् तरक्की ही होती जाती है।

कहने का तात्पर्य यह है कि यदि प्रयत्न किया जाए तो शरीर को ऐसा बनाया जा सकता है कि रोग का घर न रहकर निरोग और सतेज बन जावे। कमजोरी, निस्तेजता, दुर्बलता, गिरावट को दूर हटाया जाना सरल है। क्योंकि यह सब दोष प्रकृति के विरुद्ध आचरण करने के ऊपर अवलम्बित हैं। यदि अपने खान-पान, रहन-सहन और आचार-विचारों को अप्राकृतिक बनने से रोके रहें और संयम तथा सदाचारपूर्ण नीति के अनुसार अपना कार्यक्रम रखें तो स्वास्थ्य को स्थिर रखना बहुत ही आसान साबित होगा। मोटा, तगड़ा, हृष्ट पुष्ट, माँसल, पहलवान बनना प्रयत्न साध्य है, इसके लिए विशेष रूप से विशेष कार्यक्रम को अपनाने की आवश्यकता होती है परन्तु काम चलाऊ स्वास्थ्य कायम रखना-बीमारियों से मुक्त रहना-तो नितान्त सुगम है।

कब्ज-क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में यों कहा जा सकता है कि पेट के साथ बेइंसाफी करने का एक मजबूत सबूत है। जुल्म और बेइंसाफी करने वाले अपराधियों को सरकार सजा देती है। कानून का शासन इसलिए कायम है कि कोई बलवान आदमी किसी कमजोर के साथ ज्यादती न करने पावे। ईश्वर के कानून भी ऐसे ही हैं बेचारा पेट कुछ कह सुन नहीं सकता इसलिए उस की बेबसी का नाजायज फायदा उठाकर आप उस के साथ बेइंसाफी करें, शक्ति से अधिक काम उसके ऊपर लादें तो बड़ी सरकारी अदालत से-कुदरत की कचहरी से आपको सजा मिलेगी। इस सजा को ही बीमारी कहा जाता है। कुदरत की अदालत में झूठा इंसाफ नहीं होता-अगर आप प्राकृतिक नियमों को न तोड़ें तो यह हो नहीं सकता कि कोई बीमारी आपको सतावे। धर्मात्मा पुरुष को जेल पुलिस या अदालत का कुछ डर नहीं होता, इसी प्रकार जो लोग अपने आहार विहार में धर्म का, औचित्य का, ध्यान रखते हैं उन्हें रोगों का शिकार नहीं बनना पड़ता।

पेट का शरीर में प्रमुख स्थान है। यह इंजन है जिसमें सारे कारखाने को चलाने लायक ताकत बनती है। यदि इंजन ही खराब हो जाए तो कारखाने की दूसरी मशीनें अच्छी होने पर भी बेकार साबित होंगी। टंकी में पानी भरा हो तो सब नलों में पानी पहुँचता रहेगा, किन्तु यदि टंकी ही खाली हो जाए या रुक जाए तो नल भी बन्द हो जाएँगे। जिस प्रकार बिजली घर में तरह तरह के यंत्रों को चलाने और प्रकाश उत्पन्न करने की शक्ति पैदा होती है उसी प्रकार पेट में पाचन क्रिया द्वारा रक्त की उत्पत्ति होती है और उस रक्त से देह का हर एक कल पुर्जा चलता है। यदि पेट में खराबी है तो सारी देह खराब हो जाएगी, यदि पाचन क्रिया ठीक है तो सब कुछ ठीक रहेगा। इसलिए स्वास्थ्य को अच्छा रखने और बीमारियों से बचे रहने की जिन की इच्छा है उन्हें भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि उनकी इच्छा पूर्ति का सर्वोपरि, सर्वप्रधान, मार्ग यह है कि अपने पेट को ठीक रखें, पाचन क्रिया को सुव्यवस्थित रखने पर पूरा पूरा ध्यान दें। इस सच्चाई को समझ लेना और तदनुकूल आचरण करना स्वास्थ्य प्राप्त करने का राज पथ है। जब तक मनुष्य दवा दारु की ओर ताकता है, खाद्य पदार्थों की फेहरिस्त में अटकता है तब तक समझना चाहिए कि वह वास्तविकता से दूर है। जब पेट की सफाई और सुव्यवस्था पर ध्यान दिया जाने लगे तब समझना चाहिये कि ठीक रास्ता मिल गया, दरवाजे की कुँजी को प्राप्त कर लिया। स्मरण रखिये आरोग्य का घर पेट है।


सदाचारी व्रत का अधिकारी है।

(पं. तुलसीराम शर्मा सितारी)

त्रीण्ये व पदान्याहुः पुरुषस्योत्तमं व्रतम्।

नद्रुह्येच्चैव दह्याच्चसत्यंचैव पर वदेत्॥ 93॥

(म. भा. वन अ. 207)

ये तीन ही पद पुरुष के उत्तम व्रत हैं कि किसी से द्रोह न करे, दान दे, सत्य भाषण करे॥ 93॥

परापवाद पै शुन्यं स्तेयंहिंसा तथारतिम्।

क्रोधं चैवानृतंवाक्यमेकादश्याँ विवर्जयेत् ॥ 20॥

(पद्र पु. 6। 48)

निंदा, चुगलखोरी, हिंसा, मैथुन, क्रोध और मिथ्या इनको एकादशी के दिन त्याग दे॥ 20॥

‘उपवास’ शब्द का अर्थ पुराणों में कैसा अच्छा और व्यापक किया है-

उपावृत्तस्तु पापेभ्यो यस्तुवासो गुणैः सह।

उपवासःस विज्ञेयोनशरीरस्य शोषणम्॥ 5॥

(अग्नि पु. अ. 175)

यही वचन भविष्य पु. (103। 20) स्कंद पु. (2। 5। 12। 30) आदि ग्रंथों में आता है इसका सीधा अर्थ है (जो शब्द कल्पद्रुम कोषकार और चरक के टीकाकार चक्रदत्त आदि ने किया है) पापों से बचकर गुणों (जो प्रथम दया आदि 8 गुण कह आये हैं) का धारण करना उपवास करना है शरीर को सुखाना उपवास नहीं।


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आशावादी मनुष्य प्रायः सदा सफल होता है, कारण उसका मन इस चिन्ता से मुक्त रहता है कि अमुक बात नहीं हो सकेगी।

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विश्राम का अर्थ आलस्य नहीं है विश्रान्ति से आगे हम क्या करें इसका हमें ठीक मार्ग प्रदर्शन होता है।


व्याध को शाप

विपत्ति मनुष्य पर आया ही करती है। परमात्मा ने इसे मनुष्य की वीरता की परीक्षा लेने के लिये उत्पन्न किया है। लड़ाई झगड़े में आवेश के वशीभूत होकर बहुत से योद्धा कट मरते हैं पर पीछे नहीं हटते किन्तु वीरता की सच्ची परीक्षा आपत्ति के समय होती है, जब कि उसे अकेले ही युद्ध करना पड़ता है और कोई संगी साथी नज़र नहीं आता। राजा नल जुए में हार कर वनवास कर रहे थे तो आपत्तियों के पहाड़ उनके सामने आने लगे, आज एक कष्ट था तो कल दूसरा। योद्धा नल इस परीक्षा में सफल न हो सके, कष्ट और कठिनाइयों से भयभीत हुई बुद्धि किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गई। रानी दमयन्ती को अकेली सोती हुई छोड़कर नल रात्रि के निविड़ अन्धकार में कहीं अन्यत्र दूर देश को चले गये।

प्रातःकाल दमयन्ती सोकर उठी तो उन्होंने उस भयानक जंगल में अपने को बिलकुल अकेला पाया। आगे का मार्ग वे जानती न थीं, भोजन व्यवस्था का, आत्म रक्षा का भी कुछ प्रबंध उनके पास न था। पुष्पों के पालने में पली हुई और राज महलों में हाथों पर रहने वाली राजकुमारी के लिए यह दशा बड़ी ही दुखदायक थी। ऐसी विचित्र स्थिति में अपने को पाकर रानी की आँखों में आँसू बरसने लगे। वे ईश्वर से प्रार्थना करने लगीं कि हे नाथ! मेरी रक्षा करो। सच्ची प्रार्थना कहीं ठुकराई थोड़ी ही जाती है। उसके हृदय में दैवी किरण प्रस्फुटित हुई, साहस की एक ज्योति चमकी, उसी के प्रकाश में इस कठिन वन में से बाहर निकलने का रानी ने प्रयत्न आरम्भ कर दिया।

घासपात खाती हुई, नदी नालों में तृषा शान्त करती हुई, वृक्षों के नीचे रात्रियाँ व्यतीत करती हुई रानी दमयन्ती उस वन को पार करने के लिये यात्रा करती जाती थी। एक दिन एक बड़ा भारी अजगर रास्ते में दिखाई पड़ा। यह सर्प इतना विशाल, विकराल और विषधर था कि रानी को सहज में निगल सकता था। यह भूखा अजगर रानी को देखते ही शिकार प्राप्ति की प्रसन्नता में जीभ से होंठ चाटता हुआ दमयंती की ओर लपका। रानी का धैर्य टूटने लगा वह एक करुणा भरी चीख से भगवान को पुकारती हुई चिल्लाई।

एक व्याध शिकार खेलने के लिये उसी वन में आया हुआ था। चीख सुनकर वह लाभ की आशा से उसी ओर दौड़ा। देखते ही उसके बाछें खिल गई। एक तीर में दो शिकार थे। अजगर का बढ़िया चमड़ा, उसकी मस्तक मणि तथा सुन्दर स्त्री। वधिक को अधिक सोच विचार करने की जरूरत न थी। उसका हाथ सीधा तरकस पर गया। दूसरे क्षण एक सनसनाता हुआ तीर अजगर की गरदन में जा घुसा। मृत्यु निश्चित थी, सर्प को कुछ ही क्षण में प्राण त्याग देने के लिये बाध्य होना पड़ा।

रानी ने एक ठण्डी साँस ली, उसने अनुभव किया कि ईश्वर ने उसे बचा दिया। व्याध वृक्षावलियों को चीरता हुआ शिकार के पास आया, सर्प मरा हुआ पड़ा था। चमड़ा और मणि के लिये उसे निश्चिन्तता थी, उसे कुछ क्षण बाद निकाल लिया जाएगा, अभी तो उसे उस सुरसुन्दरी को अपनाना था। वह धीरे धीरे रानी के पास पहुँचा और कपटमयी मधुर वाणी में रानी को तरह तरह से ललचाने फुसलाने लगा। उसके वार्तालाप का साराँश क्या है यह समझने में रानी को देर न लगी। उन्हें प्रतीत हो गया कि व्याध सतीत्व का अपहरण करना चाहता है।

धर्म की सगी पुत्रियाँ, इस भूतल पर अग्नि की पवित्रता का साक्षात प्रतिनिधित्व करने वाली प्रतिमाएं महिलाएं ही हैं। यह नारकीय विश्व सती साध्वी देवियों के ही पुण्य प्रताप से ठहरा हुआ है अन्यथा माता वसुन्धरा इतने भार से व्याकुल होकर कब की रसातल चली गई होती। दमयंती जैसी सती पर वधिक की बातों का क्या प्रभाव हो सकता था? उसने कहा-”पुत्र! तू कैसे अनर्थकारक वचन बोलता है, ऐसा कहना तेरे योग्य नहीं। धर्म को समझ, अधर्म में बुद्धि मत डाल।”

व्याध रानी के निर्भीक वचनों से सहम तो गया किन्तु उसकी पुरानी क्रूर भावना दबी न। जिसने निरंतर अपनी बुद्धि को दुष्कर्मों में लिप्त रखा है वह अपनी विवेक बुद्धि को खोकर निर्लज्जतापूर्वक कर्म कुकर्म करने पर उतारू हो जाता है। व्याध बलपूर्वक रानी का सतीत्व हरण करने के लिये तत्पर हो गया।

स्थिति बड़ी पेचीदा थी। परन्तु धर्म तो अमूल्य वस्तु है, वह तो प्राण देकर भी रक्षा करने योग्य है, रानी इस मर्म को समझती थी। वह अकेली थी तो भी सत्य उसके साथ था, सत्य का बल दस सहस्र हाथियों के बराबर होता है, उसका मुकाबला करने की शक्ति बड़े से बड़े अत्याचारी में नहीं होती। रानी का धर्म तेज उबल पड़ा। वधिक जब आक्रमण करने पर तुल ही गया तो रानी ने अपनी सम्पूर्ण शारीरिक और मानसिक शक्ति के साथ उससे युद्ध किया और सत्य की दैवी सत्ता के कारण उसे मार गिराया। व्याध अपने कुकर्म का फल पाने के लिये सर्प की तरह भूमि पर लोटने लगा।

महाभारत साक्षी है कि दमयंती के श्राप से व्याध मुँह कुचले हुए सर्प की गति को प्राप्त हुआ। आज भी धर्म की साक्षात् प्रतिमाएं-बहिनें और पुत्रियाँ-अपने आत्म तेज के साथ गुण्डों और कुकर्मियों का साहस पूर्वक मुकाबला करें तो उन दुष्टों को भी सर्प गति ही प्राप्त करनी पड़ेगी चाहे वे देखने में आसुरी बल से कितने ही बलवान् प्रतीत क्यों न होते हों।


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हम संसार रूपी मरुस्थल के पथिक हैं। हमारी इस यात्रा में जो सर्वोत्तम वस्तु हमें प्राप्त होती है, वह है-”सच्चा मित्र”।

-आर. एल. ब्टीवेंशन


धर्म कलह की जड़ नहीं है।

(श्री स्वामी सत्य भक्त जी महाराज, वर्धा)

निस्संदेह धर्म के नाम पर खून बहाया गया है। पर यह अन्तर न भूलना चाहिए कि धर्म के नाम पर खून बहाया गया है- धर्म के लिए खून नहीं बहाया गया। शैतान भी अपनी शैतानी के लिए खुदा के नाम की ओट ले लेता है, तो मनुष्य ने अपने दुस्वार्थों के लिए अगर धर्म की ओट ले ली तो इसमें धर्म क्या करे? जो नियम समाज के विनाश और सुख शान्ति के लिए जरूरी हैं, उनका मन से, वचन से और शरीर से पालन करने का नाम धर्म है। इस धर्म का उस खून खराबी से कोई सम्बन्ध नहीं है जो धर्म के नाम पर स्वार्थ या अहंकार वश की जाती है।

कहा जा सकता है कि जब धर्म का ऐसा दुरुपयोग होता है तब धर्म को नष्ट ही क्यों न किया जाए? मैं कहता हूँ कि भोजन के दुरुपयोग से जब बीमारियाँ पैदा होती हैं तब भोजन ही बन्द क्यों न कर दिया जाए? आजीवन अनशन करने से मौत भले ही आ जाए पर बीमारी से छुट्टी जरूर मिल जाएगी? क्या आप बीमारी से डरकर इस प्रकार मरना पसंद करेंगे? यदि नहीं तो दुरुपयोग से डर कर धर्म को छोड़ना भी पसंद नहीं किया जा सकता।

धर्म संस्थाओं का मुख्य काम आदमी के दिल पर नीति और सदाचार के संस्कार डालना है। सभी धर्मों ने यही काम किया है। इसलिए मैं धर्मों में समानता देखता हूँ और धर्म संस्थाओं की संख्या से घबराता नहीं हूँ। बहुत से स्कूल होने से या अनेक विश्वविद्यालय होने से जैसे शिक्षा में बाधा नहीं पड़ती किन्तु कुछ लाभ ही होता है। इसी प्रकार बहुत सी धर्म संस्थाएं होने से सच्चे धर्म में बाधा नहीं पड़ती।


पुस्तकालय खोलिये

मनुष्य जीवन में ‘ज्ञान’ का कितना महत्व है, अखंड ज्योति के पाठक इसे भली भाँति अनुभव करते होंगे। ज्ञान प्रसार करने का परमार्थ अत्यन्त उच्च कोटि का ब्रह्म यज्ञ है। इस यज्ञ को यथाशक्ति हर एक परमार्थी को नित्य करने का प्रयत्न करना चाहिए।

पुस्तकालय एवं वाचनालय स्थापित करना, ज्ञान यज्ञ के अंतर्गत एक बहुत ही श्रेष्ठ कार्य है। अन्य पुण्य कार्यों की अपेक्षा इस कार्य में लगाया हुआ धन और समय अधिक पुण्य फलदायक होता है। सार्वजनिक रूप से पुस्तकालय की स्थापना अधिक सुगम होती है। चन्दे से पैसा इकट्ठा कर लेने से थोड़ा थोड़ा बोझ सब पर बँट जाता है। किसी एक आदमी को अत्यधिक भार नहीं उठाना पड़ता। बहुत से आदमियों का समय, सहयोग और पैसा लगने के कारण उनकी दिलचस्पी उस ओर बढ़ती है। यह निश्चित है कि जिस कार्य में जितने सहायक अधिक होंगे उसकी उतनी ही उन्नति होगी। जहाँ दस आदमी भी पुस्तकालय योजना में दिलचस्पी लेने वाले हों वहाँ सार्वजनिक रूप से पुस्तकों का और पैसे का चन्दा करके कार्य आरम्भ करना चाहिए। धनी व्यक्तियों को इस कार्य में खुले दिल से सहायता करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

एक अत्यन्त ही सावधानी की बात है जो पुस्तकालय स्थापित करते समय भली प्रकार स्मरण रखनी चाहिए। वह यह कि पुस्तकों की अधिक संख्या बढ़ाने के लोभ में दूषित विचारों की घासलेटी किताबों की भरती हरगिज न की जाए। पुस्तकों का चन्दा करने में ऐसा होता है कि जिसके घर में जैसी भली बुरी पुस्तकें पड़ी होती हैं वह उन्हें ही पुस्तकालय को दे देते हैं। लेने वाले इस लोभ से उन्हें ले लेते हैं कि हमारे पुस्तकालय में पुस्तकों की संख्या अधिक बढ़ेगी। कम पैसों में सस्ती-सस्ती अधिक पुस्तकें खरीद कर संख्या बढ़ाने का लोभ भी ऐसा ही है। यह संख्या बढ़ाने का लोभ जब इतना बढ़ जाता है कि बुरी, घासलेटी, खराब असर डालने वाली पुस्तकें भी बे रोक टोक भरती होने लगें तो समझना चाहिए कि पुस्तकालय की स्थापना निरर्थक हुई, हानिकारक हुई। औषधालय इसलिए खोला जाता है कि बीमार आदमी अच्छे हों परन्तु यदि कोई दवाखाना जहर की पुड़िया बाँट कर अच्छे आदमियों को बीमार करें, बीमारों को मौत की ओर सरकावे तो ऐसे औषधालय को खोलने की अपेक्षा उसका न खोलना हजार दर्जे अच्छा है। इसी प्रकार खराब किताबों की भर्ती करने की अपेक्षा पुस्तकालय न खोलना अच्छा है। जिन्होंने यह भूल की हो उन्हें अपनी गलती का प्रतिकार करना चाहिए और अपने पुस्तकालयों में से सारा कूड़ा करकट, गंदा हानिकारक साहित्य हटा देना चाहिए। जो नया, पुस्तकालय खोल रहे हों उन्हें अच्छी-2 चुनी हुई, ज्ञानवर्धक, सत्मार्ग पर ले जाने वाली पुस्तकें अपने यहाँ रखनी चाहिए। भले ही उनकी संख्या थोड़ी-बहुत थोड़ी ही बनी रहे।

किसी भी संस्था को चलाने में कुछ व्यक्ति उसके प्राण होते हैं। यदि वे उसमें से हट जावें तो एक प्रकार से वह निर्जीव हो जाती है। हर साल ढेरों पदाधिकारियों का चुनाव होना ऐसा बखेड़ा है जिसके कारण अकारण फूट, मन मुटाव, ईर्ष्या, द्वेष, पैदा होती है। इस कंटक को जहाँ तक हो काटने का प्रयत्न करना चाहिए। एक संचालक का नियुक्त करना ही काफी है। जब तक कि कोई विशेष कारण न हो, संचालक का परिवर्तन न करना चाहिए। संस्था के सब सदस्य उसे सहयोग करें, परन्तु पदाधिकारी बनने की होड़ न लगावें। संचालक अपनी मर्जी से कार्यकारिणी समिति की नियुक्ति करे और उसकी सलाह से काम किया करे।

पुस्तकालय द्वारा जनता की अधिक सेवा होना अधिक पुस्तकों के ऊपर, अच्छे मकान के ऊपर, अधिक पैसे के ऊपर निर्भर नहीं है वरन् इस बात के ऊपर निर्भर है कि उसका संचालक दूसरे लोगों को अध्ययन के लिए अधिकाधिक प्रोत्साहित करने के कार्य में दिलचस्पी लेता हो। संचालक का कर्तव्य होना चाहिए कि लोगों को पुस्तक पढ़ने के लाभ खूब विस्तार से बताया करे। दो चार बार किसी के घर जाना पड़े तो भी जा जाकर पुस्तकें उसके घर जाकर दे आने और ले आने का काम करे। जिस प्रकार जुआरी या नशेबाज, अपनी संख्या बढ़ाने के लिए नये नये लोगों को फाँसते हैं। शुरू शुरू में अपनी गाँठ से भी कुछ खर्च करते हैं। दोस्ती जोड़ते हैं और भी तरह तरह से हथकंडे काम में लाते हैं इस प्रकार धीरे धीरे वे अपने व्यसन का जुआ, या नशे का चस्का उसे लगा देते हैं अन्ततः वह नया आदमी उनकी बिरादरी में शामिल हो जाता है। यह क्रिया पद्धति अनुकरणीय है। जब कि पीछे पड़ने से बुरे आदमी, लोगों को बुरी बातों का चस्का लगा देते हैं तो कोई कारण नहीं कि श्रेष्ठ व्यक्ति, श्रेष्ठ कार्य के लिए, सद्भावनापूर्वक आकर्षित करना चाहे तो समझदार लोगों को आकर्षित न कर सके। पुस्तकालय स्थापना की सार्थकता इसी बात में है कि इसके द्वारा अधिक लोगों को सत्साहित्य पढ़ने का चस्का लगाया जा सके। चस्का लगने पर तो वह व्यक्ति अपनी बौद्धिक भूख बुझाने के लिए खुद ही पुस्तकें एकत्रित करेगा। विदेशों में हर एक पढ़े लिखे आदमी की अपनी एक निजी लाइब्रेरी होती है। यहाँ भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार हर साक्षर व्यक्ति को अपने पास अच्छी पुस्तकों का संग्रह उसी प्रकार करना चाहिये जैसे कपड़े या जेवर आदि का संग्रह किया जाता है। पुस्तकालय का उद्देश्य यह नहीं है कि सब किसी की पढ़ने की जरूरत वह खुद पूरी करे वरन् यह है कि स्वाध्याय के लिए-सत्साहित्य पढ़ने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करे, चस्का लगाये, दिलचस्पी पैदा करे। इसके बाद हर आदमी को अपने लिए अच्छी पुस्तकें खुद खरीदनी चाहिए, निजी लाइब्रेरी बनानी चाहिए।

यदि संचालक खुद अपने शरीर से इतना समय न पाता हो कि अधिक लोगों को पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर सके तो इस कार्य के लिए पूरे समय का या दो चार घंटे समय का कोई नौकर रखना चाहिए और चलती फिरती लाइब्रेरी के ढंग से पुस्तकें नये लोगों के घरों पर भेजनी चाहिए। पढ़ने के बाद मँगानी चाहिए और ऐसा चस्का लगा देना चाहिए कि बाद को वे लोग खुद ही पुस्तकालय आकर पुस्तकें ले जावें। आरम्भ में एक दो महीने बिना चंदे के भी नये आदमी को मेम्बर बनाना चाहिए बाद में उससे उसकी सामर्थ्य के अनुसार मासिक चन्दा मुकर्रर कर देना चाहिए। पुस्तकों की जिल्दें बँधवा लेनी चाहिए ताकि वे पढ़ने से खराब न हों।

अधिक लोगों का सहयोग प्राप्त न हो सके और बड़े रूप में पुस्तकालय स्थापित न हो सके तो इसके लिए ठहरने की, रुकने की या प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। अपनी शक्ति के अनुसार जितनी भी अच्छी पुस्तकें संग्रह हो सकें उन्हें जिल्द बंधवा कर रखना चाहिए और खुद ही संचालक के रूप में लोगों को अपनी पुस्तकें पढ़वाने के लिए कोशिश करनी चाहिए। ऐसे निजी पुस्तकालयों के लिए पढ़ने वालों से मासिक चन्दा आदि न लगना चाहिए। यथा अवसर उन्हें नई पुस्तकें मँगाने के लिए कुछ आर्थिक सहायता देने को प्रोत्साहित करना चाहिए। एक कापी या रजिस्टर में पुस्तकों के देने और वापिस आने की तारीख वार का हिसाब जरूर रखना चाहिए, इससे पुस्तकें खोने का डर नहीं रहता। यह याद रखना चाहिए कि हम लोगों में जिम्मेदारी और कर्तव्य भावना की बड़ी कमी है। इस लिए हर एक पुस्तकालय संचालक को यह भली भाँति समझ लेना चाहिए कि उसके सामने थोड़े बहुत ऐसे अवसर अवश्य ही आवेंगे कि लोग पुस्तक को फाड़ कर, गंदी करके वापिस करें या न भी वापिस करें। ऐसी घटनाओं से झुँझलाने, रुष्ट होने या पुस्तकालय बन्द करने की जरूरत नहीं है। यदि हम लोगों में गैर जिम्मेदारी की इतनी बढ़ोतरी न होती तो देश को ऐसा दुर्भाग्य ही क्यों देखना पड़ता। ऐसी बीमारियों को दूर करने के लिए ही तो ज्ञान प्रसार की आवश्यकता है।

अखंड ज्योति के पाठकों को सामूहिक या व्यक्तिगत पुस्तकालयों (ज्ञान मन्दिरों) में अधिक से अधिक दिलचस्पी लेनी चाहिए। वह बड़ा ही धर्म कार्य है। ज्ञान वृद्धि से बढ़कर और दूसरा पुण्य नहीं है। जो पाठक अपने यहाँ इस प्रकार के ज्ञान मन्दिर स्थापित करें उसकी सूचनाएं अखण्ड ज्योति को भी देने की कृपा करें।

सात्विक सहायताएँ

इस मास ज्ञान यज्ञ में निम्नलिखित सात्विक सहायताएँ प्राप्त हुई हैं। अखण्ड ज्योति इन महानुभावों के प्रति अपनी आन्तरिक कृतज्ञता प्रकट करती है।

50) श्री नरसिहंदासजी चितलारया, राजनाँद गाँव,

30) श्री देशराजजी ऋषि रुड़की,

10) पं. हृदयनारायण जी अवस्थी बनारस,

10) श्री गौरीशंकरजी अग्रवाल झीझक,

10) चौं. सुरजनसिंहजी दलेल नगर,

10) श्री साँवलदासजी जमीदार मछरहट्टा,

5) कुँ. मनवोधनसिंहजी कबराई,

2) पं. नारायणप्रसादजी तिवारी मूँदी,

1) श्री धर्मपालसिंहजी रुड़की,

1) श्री नन्दलालजी कीठानिया जलपाई गुड़ी,


वर्षा-वर्णन


वर्षा-वर्णन

(तुलसी कृत रामायण से)

दो.- लछमन देखहुँ मोरगन, नाचत वारिद पेख।

ग्रही विरति रत हरष जस, विष्णु भगत कहँ देख॥

घन घमण्ड गरजत चहुँ ओरा।

प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥

दामिनि दमक रही घन माहीं।

खल की प्रीत यथा थिर नाहीं॥

बरसहिं जलद भूमि नियराये।

यथा नवहिं बुध विद्या पाये॥

बून्द अघात सहैं गिरि कैसे।

खल के वचन संत सहँ जैसे॥

छुद्र नदी भरि चलि उतराई।

जस थोरे धन खल बौराई॥

भूमि परत भा ढाबर पानी।

जिमि जीवहि माया लपटानी॥

सिमिटि सिमिटि जल भरैं तलावा।

जिमि सद्गुन सज्जन पहिं आवा॥

सरिता जल जल निधि में जाई।

होहि अचल जिमि जिव हरि पाई॥

दो.- हरित भूमि तृन संकुल, समुझि परहिं नहिं पंथ।

जिमि पाखंड प्रवाद ते, लुप्त होंइ सद्ग्रन्थ॥

दादुर धुनि चहुँ दिशा सुहाई।

वेद पढ़हिं जनु वटु समुदाई॥

नव पल्लव भये विटप अनेका।

साधक मन जस मिले विवेका॥

अर्क जवास पात विनु भयउ।

जस सुराज खल उद्यम गयऊ॥

खोजत कतहु मिलहिं नहिं धूरी।

करइ क्रोध जिमि धर्महि दूरी॥

ससि सम्पन्न सोह महि कैसी।

उपकारी की संपति जैसी॥

दो.- कबहुँ दिवस महँ निविड़तम, कबहुँक प्रकट पतंग।

विनसइ उपजइ ज्ञान जिमि, पाई कुसंग सुसंग॥


वृक्ष और पौधे लगाइये!

वृक्षों से मनुष्य जाति को इतने लाभ हैं जिनकी कुछ शुमार नहीं। अगले किसी अंक में उन लाभों के ऊपर विस्तार सहित प्रकाश डालेंगे। वृक्षों की लकड़ी जलाने और विविध प्रकार की वस्तुयें बनाने के काम आती हैं। फल मनुष्य का सर्वोत्तम भोजन है वह भी वृक्षों से प्राप्त होता है। पत्ते जमीन पर गिरकर खाद बनते और भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाते हैं। वृक्षों की आकर्षक विद्युत से वर्षा अधिक होती है। जहाँ वृक्ष अधिक होंगे वहीं अपेक्षाकृत पानी भी अधिक बरसेगा। पेड़ कार्बोनिक गैस (दूषित वायु) को खाते हैं और ऑक्सीजन (प्राण प्रद वायु) को निकालते हैं। जिससे वायुशोधन में एक प्रकार से हवन के समान फल होता है। स्वास्थ्य के लिए बगीचों की वायु कितनी लाभप्रद है इसे अब सब लोग जानते हैं। हरियाली से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। पुष्पों से चित्र के समान नयनाभिराम सुन्दरता दिखाई देती है। इसके अतिरिक्त और भी असंख्य लाभ हैं। इसीलिए शास्त्रों में वृक्ष लगाने का बड़ा भारी पुण्य फल कहा गया है। तुलसी के लाभों के सम्बन्ध में तो हम स्वतन्त्र रूप से एक पुस्तक ही लिख चुके हैं।

अब वर्षा ऋतु है। अखंड ज्योति के पाठकों को फलदार वृक्ष तथा छायादार बड़े बड़े वृक्ष लगाने के लिए जितना संभव हो उतना प्रयत्न करना चाहिए। फूलदार पौधे घर के आँगन में, गमलों में, खेतों की मेड़ों पर लगवाने चाहिए। तुलसी को घर घर में पहुँचवाना तो धार्मिक पुण्य भी है। बीज बाँटना, पौधे उगाकर बाँटना, वृक्ष लगाने का प्रचार करना, उनके लाभों को सविस्तार समझाना, पेड़ लगाने में खुद क्रियात्मक सहयोग देना, यह एक सामयिक परमार्थ है। वर्षा ऋतु इसके लिए उचित और उपयुक्त समय है। इस मार्ग में जिससे जितना बन सके उतना पैसा और समय खर्च करना चाहिए।

महर्षि पाराशर का मत है कि-”दश कूप समोवापी दश वापी समो ह्नदः। दश हृद समः पुत्रः दश पुत्र समों द्रुमः”।

अर्थात् दस कुँए बनवाने के समान एक बावड़ी बनवाने का पुण्य होता है। दस बावड़ी बनवाने के समान एक तालाब का फल होता है। दस तालाब के समान एक सत्पुत्र उत्पन्न करने का फल है और दस सत्पुत्रों के बराबर एक वृक्ष लगाने का फल है। इस पुण्य फल को ध्यान में रखते हुए इस वर्षा ऋतु में थोड़े बहुत वृक्ष अवश्य लगाने चाहिए।

कर्मयोग सत्संग

गत मास की अखंडज्योति में 25 जुलाई (नाग पंचमी) से लेकर 4 अगस्त (सावन सुदी 15) तक के 11 दिन के कर्मयोग सत्संग की सूचना छपी थी। तदनुसार अनेक महानुभावों के आगमन की सूचनाएं आ चुकी हैं। जिन्हें आना हो वे पूर्व सूचना हमें अवश्य भेज दें। जिससे उनके ठहरने और खाने पीने की व्यवस्था में सहयोग दिया जा सके। तारीख और ट्रेन की सूचना होने पर हमारा आदमी स्टेशन पर जाकर उन्हें ला सकता है।

-मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा।


परमात्मा की श्रेष्ठ साधना

(पं. नन्दकिशोरजी उपाध्याय, खँडवा)

जब हम साँस लेते हैं तो वायु को ग्रहण करने और छोड़ने के साथ साथ “सोऽहम्” शब्द होता है। यह शब्द सोते जागते हर घड़ी होता रहता है। ध्यान देने पर हमारी सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय इसे आसानी से सुन सकती है। यह ईश्वरीय वाणी है। अन्तः करण में बैठा हुआ परमात्मा हर घड़ी हमें यह उपदेश दिया करता है कि इस शरीर के अन्तराल में बैठा हुआ जो आत्मा है-”वह मैं हूँ” सोऽहम्।

जब हम कोई बुरा कार्य करने को तैयार होते हैं तो उसके विरोध में अन्दर से एक आवाज आती है कि यह कार्य उचित है या अनुचित, इसे करना चाहिये या न करना चाहिये। यदि वह कार्य अच्छा होता है तो ईश्वर हमें प्रसन्नता, प्रोत्साहन और साहस प्रदान करते हुए अपनी स्वीकृति प्रदान करता है। यदि वह कार्य बुरा होता है तो भय, आशंका, धड़कन, झिझक, लज्जा आदि के साथ परमात्मा उस काम को करने से रोकता है।

ईश्वर को ढूँढ़ने के लिये दूर जाने की जरूरत नहीं है। सबसे निकट स्थान जहाँ ईश्वर का अत्यन्त स्पष्ट दर्शन हो सकता है-अपना हृदय है हृदय को टटोलते ही परमेश्वर की झाँकी मिलती है। ईश्वर को प्रसन्न करने का एक ही मार्ग है वह यह कि उसके आदेशों का पालन करते हुए अपने आचार और विचारों को पवित्र बनाया जाए। उलझन भरे साम्प्रदायिक कर्मकाण्डों के चक्कर में फँसने की अपेक्षा आत्म निरीक्षण करना और सच्चरित्र बनना परमात्मा को प्राप्त करने की श्रेष्ठ साधना है।


Quotation

स्नेह से हृदय चिकना हो जाता है, परन्तु फिसलने का भय भी रहता है।


क्रोध से पागल मत हूजिए!

(श्री नरेन्द्र बहादुरसिंह, मथुरा)

क्रोध का मूल कारण होता है अपना विरोध। इसकी उत्पत्ति तब होती है जब कि मनुष्य अपनी मानसिक स्थिरता (Normal Stae of mind) खो बैठता है। पर वास्तव में देव भावनाएं जब सुप्त अवस्था में होती हैं और हमारी पाशविक प्रवृत्ति जोर मारती हैं तो हम क्रोधित होते हैं। अधिकतर तो यह अवज्ञा, अपमान या अन्य किसी कारण के प्रतिशोध के रूप में होता है। हमें ज्ञान नहीं रहता कि हम क्या कर रहे हैं, भले बुरे की बुद्धि नष्ट हो जाती है और मनुष्य ऐसे-2 कार्य कर बैठता है कि उसी को स्वयं पछताना पड़ता है।

क्रोध किसी सीमा तक लाभदायक भी है जैसे दुष्ट को दण्ड देने के लिए या किसी की विपत्ति में रक्षा के लिये। क्योंकि मान लीजिये यदि कोई किसी अबला के साथ बलात्कार करता है और आप क्रोध करते हैं तो यह बहुत ही उपयुक्त और सामयिक होगा। उस समय की शाँति अशाँति से भी भयंकर होगी। परन्तु अधिकाँश में ऐसी परिस्थिति नहीं होती। हम तनिक-2 सी बातों पर क्रोध कर बैठते हैं। जिसमें हम बल बुद्धि के नाश के सिवाय और कोई परिणाम नहीं देखते। जहाँ प्रेम से काम चलता हो वहाँ जूता पैजार करने से कोई लाभ नहीं। विशेष परिस्थिति की तो बात ही दूसरी है।

अब जब हम देखते हैं कि विरोध ही इसका मूल है तो प्रश्न उठता है कि इसका नाश किस प्रकार किया जाए? इसका सब से सरल उपाय ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ के सिद्धान्त का पालन करना है। कोई कार्य करने के पहले सर्वदा यह विचार कर लेना चाहिये कि यदि वही व्यवहार मेरे साथ होता तो मेरे ऊपर क्या प्रभाव पड़ता और फिर यदि उसी प्रकार फल मिले तो उसे अपनी ही भूल समझना चाहिये।


मृत्यु की घड़ी


मृत्यु की घड़ी

(श्री रजेश, दीवा हमीद पुर)

है वियोग-योग का नियोग दुःखदा महा।

सर्व लोक मध्य आज शोक-सिंधु-सा बहा॥

(1)

थी कली जहाँ कभी सुभूमि-मध्य शोभिता।

हा! बनी वहीं किसी महान् व्यक्ति की चिता॥

वस्तु-वस्तु में प्रत्यक्ष मृत्यु है सुभासिता।

है अवण्य आप की प्रवंचना परम् पिता॥

देख जीव को सुखी प्रभो तुम्हें हुई स्पृहा।

है वियोग-योग का नियोग दुःखदा महा॥

(2)

सृष्टि में अप्राप्य है दशा सदैव एक-सी।

पंक में विलुप्त है प्रफुल्ल पुष्प की हँसी॥

जो बसी सुनेत्र-मध्य मूर्तिमान प्यार-सी।

है वही विभूति हाय! शेष अल्प क्षार-सी॥

‘विश्व है विनाशवान्’ सत्य वाक्य है कहा।

है वियोग-योग का नियोग दुःखदा महा॥

(3)

क्यों न भस्म हो शरीर अग्नि आप जी उठी।

रो उठा मनुष्य-वर्ग, एक हूक-सी उठी॥

सृष्टि आदि काल से सदैव ही गिरी, उठी।

व्यर्थ शोक-हर्ष है, बुरी गिरी, भली उठी॥

दैव का दिया सभी सदैव जीव ने सहा।

है वियोग-योग का नियोग दुःखदा महा॥

(4)

विश्व-वन्द्य-नीति वद्ध विश्व कृत्य कृत्य है।

कौन वस्तु है यहाँ कि जो सदा अमर्त्य है॥

विश्व में सदैव एक मृत्यु-आधिपत्य है।

व्यर्थ है विमोह-मोह, ‘राम नाम सत्य है॥’

आज गूँज वायु में अखंड शब्द है रहा।

है वियोग-योग का नियोग दुःखदा महा॥

*समाप्त*