इन्द्रियों के गुलाम नहीं, स्वामी बनिए!

जो आदमी केवल इन्द्रिय सुखों और शारीरिक वासनाओं की तृप्ति के लिए जीवित है और जिस के जीवन का उद्देश्य ‘खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ’ है। निस्संदेह वह आदमी परमात्मा की इस सुन्दर पृथ्वी पर एक कलंक है, भार है। क्योंकि उसमें सभी परमात्मीय गुण होते हुए भी वह एक पशु के समान नीच वृत्तियों में फंसा हुआ है। जिस आदमी में ईश्वरीय अंश विद्यमान है, वही अपने सुख से हमें अपने पतित जीवन को दुख भरी गाथा सुनाता है!! यह कितने दुख की बात है। जिस आदमी का शरीर सूजा हुआ, भद्दा लज्जा युक्त दुखी और रुग्ण है व इस सत्य की घोषणा करता है कि जो आदमी विषय वासनाओं की तृप्ति में अंधा धुँध, बिना आगा पीछा देखे, लगा रहता है वही शारीरिक अपवित्रताओं, यातनाओं को सहता है।

वास्तव में आदर्श मनुष्य वही है जो समस्त पाशविक वृत्तियों तथा विषय वासनाओं को रखता हुआ भी उनके ऊपर अपने सुसंयता तथा सुशासक मन से राज्य करता है, जो अपने शरीर का स्वामी है, जो अपनी समस्त विषय वासनाओं की लगाम को अपने दृढ़ तथा धैर्य युक्त हाथों में पकड़ कर अपनी प्रत्येक इन्द्रिय से कहता है कि तुम्हें मेरी सेवा करनी होगी न कि मालिकी। मैं तुम्हारा सदुपयोग करूंगा दुरुपयोग नहीं। ऐसे ही मनुष्य अपनी समस्त पाशविक वृत्तियों तथा वासनाओं की शक्तियों को देवत्व में परिणित कर सकते हैं, विलास मृत्यु है और संयम जीवन है। सच्चा रसायन शास्त्री वही है जो विषम वासनाओं के लोहे को आध्यात्मिक तथा मानसिक शक्तियों के स्वर्ण में पलट लेता है।


‘अखण्ड-ज्योति’ का अमूल्य प्रकाशन!

जो ज्ञान कठिन के प्रयत्न से मिलता है, उसे हम अनायास ही आपके सन्मुख उपस्थित करते हैं।

यह बाजारू पुस्तकें नहीं हैं इनकी एक-एक पंक्ति में लेखकों का चिरकालीन अनुभव और अभ्यास भरा हुआ है। इन पुस्तकों को पढ़कर आप वह लाभ प्राप्त करेंगे, जो इनके मूल्य के पैसों से अनेक गुना अधिक है।

मैं क्या हूँ?

सूर्य चिकित्सा विज्ञान

प्राण चिकित्सा विज्ञान

परकाया प्रवेश

स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्भुत विद्या

मानवीय विद्युत के चमत्कार

स्वर योग से दिव्य ज्ञान

भोग में योग

बुद्धि बढ़ाने के उपाय

धनवान बनने के गुप्त रहस्य

पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि

वशीकरण की सच्ची सिद्धि

मरने के बाद हमारा क्या होता है?

जीव जंतुओं की बोली समझना

ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?

क्या धर्म? क्या अधर्म?

गहना कर्मणोगति।

जीवन की गूढ़-गुत्थियों पर तात्विक प्रकाश

शक्ति संचय के पथ पर

पंचाध्यायी धर्म नीति शिक्षा

आत्म गौरव की साधना

प्रतिष्ठा का उच्च सोपान

मित्र भाव बढ़ाने की कला

आन्तरिक उल्लास का विकास

आगे बढ़ने की तैयारी

आध्यात्म धर्म का अवलम्बन

ब्रह्म विद्या का रहस्योद्घाटन

ज्ञान योग, कर्म योग, भक्तियोग

यम नियम

आसान और प्राणायाम

प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि

तुलसी के अमृतोपम गुण

आकृति देख कर मनुष्य की पहचान

मैस्मरेजम की अनुभव पूर्ण शिक्षा

ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग

हस्तरेखा विज्ञान

विवेक सतसई

संजीवनी विद्या

गायत्री की चमत्कारी साधना

महान जागरण

तुम महान हो

गृहस्थ योग

अमृत, पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति

घरेलू चिकित्सा

बिना औषधि के कायाकल्प

पंच तत्वों द्वारा संपूर्ण रोगों का निवारण

हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं?

विचार करने की कला

कमीशन देना कतई बन्द है। हाँ आठ या इससे अधिक पुस्तकें लेने पर डाक खर्च हम अपना लगा देते हैं। आठ से कम पुस्तकें मंगाने पर रजिस्ट्री पार्सल का डाक खर्च ग्राहक को देना पड़ता है।

पता मैनेजर “अखण्ड-ज्योति” मथुरा।


आस्तिक बनो।

परमात्मा सर्वत्र व्यापक है, इस सत्य को जानते तो अनेक लोग हैं पर उसे मानते नहीं। व्यवहार में नहीं लाते। जो परमात्मा को सर्वव्यापी, घट-घट वासी मानेगा, उसका जीवन उसी क्षण पूर्ण पवित्र, निष्पाप और कषाय-कल्मषों से रहित हो जायेगा। गीता में भगवान ने कहा है कि जो मेरी शरण में आता है, जो मुझे अनन्य भाव से भजता है वह तुरन्त ही पापों से छूट जाता है निःसंदेह बात ऐसी ही है। भगवान की शरण में जाने वाला, उस पर सच्चा विश्वास करने वाला, उस पर पूर्ण आस्था रखने वाला, एक प्रकार से जीवन मुक्त ही हो जाता है।

ईश्वर का विश्वास और सच्चा जीवन एक ही वस्तु के दो नाम हैं। जो भगवान का भक्त है, जिसने तब छोड़ कर प्रभु के चरणों में आत्म समर्पण कर गया है। जो परमात्मा की उपासना करता है उसे जगत-पिता की सर्व व्यापकता पर आस्था जरूर होनी चाहिए। यदि वह विश्वास दृढ़ हो जाय कि भगवान जर्रे-जर्रे में समाया हुआ है, हर जगह मौजूद है तो पाप कर्म करने का साहस ही नहीं हो सकता। ऐसा कौन सा चोर है जो सावधान खड़ी हुई सशस्त्र पुलिस के सामने चोरी करने का साहस करे, चोरी, व्यभिचार, ठगी, धूर्तता, दंभ, असत्य, हिंसा आदि के लिए आड़ की, पर्दे की, दुराव की जरूरत पड़ती है। जहाँ मौका होता है इन बुरे कामों को पकड़ने वाला नहीं होता, वहीं इनका किया जाना संभव है। जहाँ धूर्तता की भली प्रकार समझने वालों देखने वाले और पकड़ने वाले लोगों की मजबूत ताकत सामने खड़ी होती है। वहाँ पाप कर्मों का हो सकना संभव नहीं। इसी प्रकार जो इस बात पर सच्चे मन से विश्वास करता है कि परमात्मा सब जगह मौजूद है वह किसी भी दुष्कर्म के करने का साहस नहीं कर सकता।

बुरा काम करने वाला पहले यह भली प्रकार देखता है कि मुझे देखने वाला या पकड़ने वाला तो कोई यहाँ नहीं है। जब वह भली-भाँति विश्वास कर लेता है कि उसका पाप कर्म किसी भी दृष्टि या पकड़ में नहीं आ रहा है तभी वह अपने काम में हाथ डालता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने का परमात्मा की दृष्टि या पकड़ से बाहर मानते हैं वे ही दुष्कर्म करने को उद्यत हो सकते हैं। पाप कर्म करने का स्पष्ट अर्थ यह है कि यह व्यक्ति ईश्वर का मानने का दंभ भले ही करता हो पर वास्तव में वह परमात्मा के आस्तित्व से इनकार करता है। उसके मन को इस बात पर भरोसा नहीं है कि परमात्मा यहाँ मौजूद है। यदि विश्वास होता तो इतने बड़े हाकिम के सामने किस प्रकार उसके कानूनों का तोड़ने का साहस करता है। जो व्यक्ति एक पुलिस के चपरासी को देखकर भय से थर-थर काँपा करते हैं वे लोग इतने दुस्साहसी नहीं हो सकते कि परमात्मा जैसे सृष्टि के सर्वोच्च अफसर की आँखों के आगे, न करने योग्य काम करें, उसके कानून को तोड़े, उसको क्रुद्ध बनावें, उसका अपमान करें। ऐसा दुस्साहस तो सिर्फ वही कर सकता है जो यह समझता हो कि ‘परमात्मा’ कहने, सुनने भर की चीज है। वह पोथी पत्रों में मन्दिर मठों में नदी, तालाबों में या कहीं स्वर्ग नरक में भले ही रहना चाहेगा, पर हर जगह वह नहीं है। मैं उसकी दृष्टि और अकड़ से बाहर हूँ।

जो लोग परमात्मा की सर्व व्यापकता पर विश्वास नहीं करते, वे ही नास्तिक है। जो प्रकट या अप्रकट रूप से दुष्कर्म करने का साहस कर सकते हैं वे ही नास्तिक हैं। इन नास्तिकों में कुछ तो भजन पूजा बिल्कुल नहीं करते, कुछ करते हैं। जो ही करते ही वे सोचते हैं व्यर्थ का झंझट मोल लेकर उसमें समय गंवाने से क्या फायदा? जो पूजन भजन करते हैं वे भीतर से तो न करने वालों के समान ही होते हैं पर व्यापार बुद्धि से रोजगार के रूप में ईश्वर की खाल ओढ़ लेते हैं। कितने ही लोग ईश्वर के नाम के बहाने ही अपने जीविका चलाते हैं हमारे देश में करीब 56 लाख आदमी ऐसे हैं जिनकी कमाई पेशा, रोजगार ईश्वर के नाम पर है। यदि वे यह प्रकट करें कि हम ईश्वर को नहीं मानते तो उसी दिन उनकी ऐश आराम देने वाली बिना परिश्रम की कमाई हाथ से चली जायेगी। इसलिए इन्हें ईश्वर को उसी प्रकार ओढ़े रहना पड़ता है। जैसे जाड़े से बचने के लिए गर्मी देने वाले कम्बल को ओढ़े रहते हैं जैसे ही वह जरूरत पूरी हुई वैसे ही कम्बल को एक कोने में पटक देते हैं। यह तिजारती लोग जनता के समझ अपनी ईश्वर भक्ति का बड़ा भारी घटाटोप बाँधते हैं क्योंकि जितना बड़ा घटाटोप बाँध सकेंगे उतनी ही अधिक कमाई होगी। तिजारती उद्देश्य पूरा होते ही वे अपने असली रूप में आ जाते हैं। पापों से खुलकर खेलते हुए एकान्त में उन्हें जरा भी झिझक नहीं होती।

एक तीसरी किस्म के नास्तिक और हैं। वे प्रत्यक्ष रूप में ईश्वर के नाम पर रोजी नहीं चलाते बल्कि उलटा उसके नाम पर कुछ खर्च करते हैं। ईश्वर का आडम्बर उनके द्वारा आये दिन रचा जाता रहता है। शरीर पर ईश्वर भक्ति के चिह्न धारण किये रहते हैं, घर में ईश्वर के प्रतीक मौजूद होते हैं, ईश्वर के निमित्त कहे जाने वाले कर्मकाण्डों का आयोजन होता रहता है। ईश्वर भक्त कहलाने वालों का स्वागत सत्कार भेंट पूजा होती रहती है। यह सब इसलिए होता है कि लोग उनके संबंध में अच्छे ख्याल रखें, उनका आदर करें, उन्हें धर्मात्मा समझें, उनके जीवन भर के कुकर्मों की कलई न खोलें और आज भी जो उनके दुष्कर्म चल रहे हैं वे छिपे रहें।

चौथे प्रकार के नास्तिक ये हैं जो पाप छिपाने या धन कमाने के लिए नहीं किन्तु अपने को पुजवाने के लिए यश और श्रद्धा प्राप्त करने के लिए ईश्वर भक्त बनते हैं, इसके लिए कुछ त्याग और कष्ट भी उठाते हैं, पर भीतर से उन्हें प्रभु की सर्व व्यापकता पर आस्था नहीं होती। कुछ लोग रिश्वत के रूप में ईश्वर भक्ति की साधते हैं अमुक भोग ऐश्वर्य की लालसा उन्हें उसी मार्ग पर ले जाती है जिस प्रकार आज कल घूस-खोर हाकिमों को एक मोटी रकम भुका कर लोग मनमाना काम करवा लेते हैं और थैली खर्च करके थैला भरने में सफल हो जाते हैं। कुछ लोग तथा कथित ऋद्धि-सिद्धियों और न जाने किन-किन अप्रत्यक्ष वैभवों के मनसूबे बाँध कर उसे प्राप्त करने की फिक्र में ईश्वर के दरवाजे खटखटाते रहते हैं।

इस प्रकार प्रत्यक्षतः ईश्वर भक्त दिखाई देने वालों में भी असंख्यों मनुष्य ऐसे हैं जिनकी भीतरी मनोभूमि परमात्मा से कोसों दूर है। उनका निजी जीवन, घरेलू आचरण, व्यक्तिगत व्यवहार ऐसा नहीं होता जिससे यह प्रतीत होता है कि यह ईश्वर को हाजिर नाजिर समझ कर अपने को बुराइयों से बचाते हैं। ऐसे लोगों को किस प्रकार आस्तिक कहा जाय? जो पापों में जितना ही अधिक लिप्त है। जिसका व्यक्तिगत जीवन जितना ही दूषित है वह उतना ही बड़ा नास्तिक है। लोगों को धोखा देकर अपना स्वार्थ साधना, छल, प्रपंच, माया, दंभ, भय, अत्याचार, कपट और धूर्तता से दूसरों के अधिकारों को अपहरण कर स्वयं सम्पन्न बनना नास्तिकता का स्पष्ट प्रमाण है। जो पाप करने का दुस्साहस करता है वह आस्तिक नहीं हो सकता, भले ही वह आस्तिकता का कितना ही बड़ा प्रदर्शन क्यों न करता हो।

ईश्वर भक्ति का जितना ही अंश जिसमें होगा वह उतने ही दृढ़ विश्वास के साथ ईश्वर की सर्व व्यापकता पर विश्वास करेगा, सबसे प्रभु को समाया हुआ देखेगा। आस्तिकता का दृष्टिकोण बनते ही मनुष्य भीतर और बाहर से निष्पाप होने लगता है। अपने प्रियतम को घट-घट में बैठा देख कर वह सबसे नम्रता का मधुरता का स्नेह का आदर का सेवा का सरलता शुद्धता और निष्कपटता से भरा हुआ व्यवहार करता है। भक्त अपने भगवान के लिए व्रत, उपवास, तप, तीर्थ यात्रा आदि द्वारा स्वयं कष्ट उठाता है और अपने प्राणबल्लभ के लिए नैवेद्य, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, भोग प्रसाद आदि कुछ न कुछ अर्पित करता ही करता है। “स्वयं कष्ट सहकर भगवान को कुछ समर्पण करना” पूजा की सम्पूर्ण विधि व्यवस्थाओं का यही तथ्य है। भगवान को घट-घट वासी मानने वाले भक्त अपनी पूजा विधि को इसी आधार पर अपने व्यवहारिक जीवन में उतारते हैं। वे अपने स्वार्थों की उतनी परवा नहीं करते, खुद कुछ कष्ट भी उठाना पड़े तो उठाते हैं पर जनता जनार्दन को, नरनारायण को अधिक सुखी बनाने में वे दत्त चित्त रहते हैं लोक सेवा का, व्रत लेकर वे घट-घटवासी परमात्मा की जीवन व्यावहारिक रूप से पूजा करते हैं। ऐसे भक्तों का जीवन-व्यवहार बड़ा निर्मल, पवित्र, मधुर और उदार होता है। आस्तिकता का यही तो प्रत्यक्ष लक्षण है।

पूजा के समस्त कर्मकाण्ड इसलिए हैं कि मनुष्य परमात्मा को स्मरण रखे, उसके अस्तित्व को अपने चारों ओर देखे और मनुष्योचित कर्म करे। पूजा, अर्चना, वन्दना, कथा, कीर्तन, व्रत, उपवास, तीर्थ आदि सबका प्रयोजन मनुष्य की इस चेतना की जाग्रत करना है कि परमात्मा की निकटता का स्मरण रहे और ईश्वर के प्रेम एवं श्रद्धा द्वारा लोक सेवा का व्रत रखे और ईश्वर के क्रोध से डर कर पापों से बचे। जिस पूजा उपासना से यह उद्देश्य सिद्ध न होता हो, वह व्यर्थ है। जिस उपाय से भी “पाप से बचने और पुण्य में प्रवृत्त होने” का भाव उठें वह उपाय ईश्वर भक्ति की साधना ही है।

पाठको! ईश्वर की खाल मत ओढ़ो? सच्चे ईश्वर भक्त बनो। भक्ति को मंदिरों को धरोहर मत बनाओ, उसे व्यवहारिक जीवन में उतार लो। वाचक ज्ञानी मत बनो, कर्मनिष्ठा सीखो। ईश्वर के थन लाठियों से मत छुओ उसे अपने में ओत-प्रोत कर लो। विडम्बना को छोड़ो, परमात्मा के चरणों से लिपट जाओ उसे अपने अंतःकरण के भीतरी कोने में बिठा लो। अपनी दृष्टि को परमात्मा मय बना लो। तुम्हारा जीवन सच्चे आस्तिक का पवित्र जीवन होना चाहिए। अपवित्र जीवन तो प्रत्यक्ष नास्तिकता है।

=कोटेशन============================


Quotation

उत्तम-उत्तम संस्थाओं की इतनी आवश्यकता नहीं, विस्तृत धन और स्वर्ण राशियों की आवश्यकता नहीं, असीम पौरुष और बलवान लेखनी की आवश्यकता नहीं बल्कि आवश्यकता है मनुष्यता परिपूर्ण मनुष्य की।

-महादेव गोविन्द रानाडे।

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सत्य धर्म का मतलब ईश्वर शब्द पर विश्वास की अपेक्षा भलाई पर विश्वास करना है।

-स्वामी रामतीर्थ।

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दान ही बुद्धिमानी है।

इस विश्व की समस्त गति विधि- ‘दान’ के सतोगुणी नियम के आधार पर चल रही है। जो कोई भी तत्व अपनी- देने की प्रक्रिया को बंद कर देता है वही नष्ट हो जाता है, विकृत और कुरूप बन जाता है। यदि कुएँ पानी देना बंद कर दें, खेत अन्न देना बंद कर दें, पेड़ फल देना बंद कर दें, हवा अपने अविश्रान्त सेवा कार्य को बंद कर दे तो सृष्टि का संचालन ही बंद समझिये। माता-पिता बालक के लिए आत्म दान करना बंद कर दें तो चेतन जीवों का बीज ही मिट जायेगा।

भगवान हमें खुले हाथों सब कुछ बिना मूल्य मुक्त दान स्वरूप दे रहे हैं। जैसा शरीर हमें मिला हुआ है वैसा यंत्र कोई वैज्ञानिक 100 खरब रुपये को भी बनाकर नहीं दे सकता। जितनी आनन्दमयी परिस्थितियाँ परमात्मा ने हमारे चारों ओर जुटा दी हैं- उपहार स्वरूप भेज दी हैं, क्या हम उसकी कीमत चुका सकते हैं? दानी परमात्मा हर घड़ी हमें कुछ न कुछ देता रहता है, उसकी रचना में दान तत्व मुख्य है।

मनुष्य जीवन में सार्थकता, शोभा ओर प्रसन्नता उसकी दान शीलता के ऊपर निर्भर है। जो जितना ही अधिक देता है वह उतना ही अधिक धनी बनता है। कोई भी विद्यादान करने वाला अध्यापक ऐसा नहीं है जिसकी विद्या दूसरों के देने के कारण घट गई हो। कोई भी धनवान ऐसा नहीं है जिसका दानी होने के कारण दिवाला निकला हो, स्त्री अपने पति को सर्वस्व देती है इस दान के कारण उसका घटता कुछ नहीं उलटे बहुत कुछ मिल जाता है। भगवान को आत्म-समर्पण करने वाला भक्त अपने आत्म दान द्वारा भगवान को खरीद लेता है।

दान क्या है? कल के लिए ईश्वर के बैंक में जमा की हुई पूँजी ही दान है, जो चक्रवृद्धि ब्याज से बढ़ती रहती है और आड़े वक्त में काम आती है। दान करते समय हमारे मन में यश प्राप्ति की इच्छा फलाशा या अहंकार की भावना न होनी चाहिए। बालक खिलौनों से खेलते हैं। क्या इसके बदले में वे कुछ चाहते हैं? नहीं! खेल का आनन्द स्वतः ही एक पुरस्कार है और बालक उसी से पूर्णतया संतुष्ट हो जाते हैं। दान करना स्वयं एक आनंद है देते समय जो संतोष की उच्च सात्विक तृप्ति अन्तः करण में उठती है वह इतनी महान है कि कोई भी भौतिक सुख उसकी तुलना नहीं कर सकता।

कृपण और कंगाल में कोई भेद नहीं। कंजूस आदमी जिसका दान के अवसर पर प्राण सूखता है सचमुच इस सृष्टि का बड़ा अभागा प्राणी है। पूर्व संचित पुण्य पूँजी के समाप्त होते ही उसकी कंगाली प्रकट हो जाती है। पैसे ही सर्प की तरह चौकीदारी करने वाला मनुष्य दान के स्वर्गीय आत्म-सुख का रसास्वादन करने से वंचित रहता है। इसके विपरीत जो देता है वह सच्चा अमीर है पैसा न होने पर भी वह सुसम्पन्न व्यक्तियों को मिलने वाले सभी वैभवों का सुख उसे अनायास ही मिल जाता है। जो देता है वह अपने आपको बचाता है किन्तु जो प्रकृति के प्रवाह को रोकता है देने से इंकार करता है, वह अपने आपको नष्ट कर लेता है।

संकीर्णता छोड़ दीजिए, आपके पिता के खजाने में बहुत भरा हुआ है। वह आपके लिए किसी वस्तु की कमी न पड़ने देगा। साँस को हम पेट से निकालते हैं, क्षण भर बाद ही नई ताजी स्वच्छ हवा साँस लेने के लिए प्राप्त हो जाती है। यदि आप दूसरों को देंगे तो परमात्मा आपको और देगा, परन्तु यदि कंजूसी करेंगे तो आपको मिलना भी बंद हो जायेगा। जो उदार है, दानी है सत्कर्मों में अपनी सामर्थ्य भर देता है वास्तव में वहीं बुद्धिमान है और बुद्धिमानों का ही भविष्य उज्ज्वल होता है।


चार आवश्यकीय प्रार्थनाएं

(1) इस अंक के साथ अधिकाँश पाठकों का चंदा समाप्त हो जाता है। सन् 46 का चंदा मनीआर्डर से भेजने की प्रार्थना है।

(2) पेपर कन्ट्रोल की सरकारी आज्ञाओं के अनुसार आजकल हमें उतना ही कागज प्राप्त होता है जितने कि ग्राहक हैं। इसलिए अपना चंदा दिसम्बर में ही भेज देना चाहिए ताकि जनवरी का ‘मनोविज्ञान अंक’ भेजा जा सके। गत वर्ष जिनका चंदा देर से आया था वे विशेषाँक से वंचित रह गये थे। इस बार भी जो सज्जन देर से चंदा भेजेंगे, वे गत वर्ष की भाँति जनवरी के महत्वपूर्ण अंक से वंचित रह सकते हैं।

(3) वर्ष के बीच के महीनों से चंदे का हिसाब रखने में हमें बहुत कठिनाई होती है। इसलिए जिन महानुभावों का हिसाब वर्ष के बीच में किसी महीने से होता है। उनसे अनुरोध पूर्वक प्रार्थना है कि सन् 46 के शेष महीनों का चंदा भेज दें। जनवरी से पूरे वर्ष का हिसाब रखने में ही सुविधा रहती है।

(4) मनीआर्डर कूपन पर अपना ग्राहक नम्बर और पूरा पता साफ अक्षरों में अवश्य लिखना चाहिए। जो नये ग्राहक हो उन्हें ‘नये ग्राहक’ शब्द अवश्य लिख देना चाहिए। साधारण लिफाफे में नोट आदि भूल कर भी न भेजने चाहिए। क्योंकि ऐसे लिफाफे रास्ते में ही गुम हो जाते है।


संसार मिथ्या नहीं है।

(ले.- श्री स्वामी सत्यदेव जी परिव्राजक)

जिस समय एक मनुष्य यह सोचने लगता है कि- “यह संसार मिथ्या है, कोई वस्तु स्थायी नहीं, मुझे मर जाना है, जीवन एक स्वप्न मात्र है” उस समय उसको अपने जीवन में कोई दिलचस्पी नहीं रहती। वह उदासीन हो जाता है। संसार की जिम्मेदारियाँ उसको बोझ सम मालूम होती हैं न उसका घरवालों से प्रेम, न उसको जाति का कुछ ख्याल। उसका देश चाहे रसातल में चला जाय, वह कुछ परवाह नहीं करता। उसे चाहे कोई गालियाँ दे, चाहे मारे, पीटे उसके लिए सब बराबर है। अपने देश बंधुओं का दुख उसके लिए कल्पना मात्र है। देश हितैषिता क्या वस्तु है? यह बात उसके दिमाग में भी नहीं घुस सकती। उसकी जन्म भूमि का धन चाहे कहीं का कहीं चला जाय, उसके करोड़ों भाई चाहे भूखे मर जायं, उसको इसका कुछ दुख नहीं होता।

स्मरण रखिये यह वह विष है जिसके खाने से मनुष्य का मनुष्यत्व जाता रहता है। धैर्य, क्षमा, वीरता, साहस, सत्य आदि दैविक गुण कभी भी विकास को प्राप्ति नहीं हो सकते, जब तक कि मनुष्य इस विष को अपने शरीर से न निकाल दे। उस व्यक्ति के सिर पर कोई जिम्मेदारी नहीं रहती जो बोझ उठाने से घबड़ाता है। उसके अंग-प्रत्यंग कैसे बढ़ सकते हैं? वह अवश्य ही भीरु हो जाएगा, विरोधों का सामना करने की शक्ति जाती रहेगी। वह मिलकर काम नहीं कर सकेगा। संघ से उसे घृणा होगी। ऐसी दशा में ये दैविक गुण भी उसके लिए निकम्मे हो जाते हैं और वह मनुष्य शरीर रखता हुआ भी पशुवत् हो जाता है।


साधना का मार्ग

(ले.- श्री डॉ. चतुर्भुज सहाय जी, एटा)

1- प्रत्येक अभ्यासी के लिए यह बहुत लाजमी है कि वह साधना पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखें। अभ्यास को बिना नागा, नित्य प्रति ठीक समय पर करते जाना चाहिए। एक दिन के लिए भी छूटने पर अभ्यासी कुछ न कुछ अपने स्थान से (जहाँ तक चढ़ाई कर ले गया था) नीचे खिसक आता है और लगातार कुछ दिवस न करने पर तो कोरा रह जाता है।

2- पूजा या अध्यात्मिक किसी कर्म के लिए पवित्रताई और शुद्धताई की भी बहुत जरूरत है। वस्त्र, स्थान, शरीर, मन सभी पवित्र होने चाहिए। पूजा का स्थान शुद्ध और शान्तिमय हो और उसको किसी दूसरे काम में नहीं लाना चाहिए। अभ्यास या तो निर्जन जंगल में जाके करे या घर में एक कोठरी इसी काम के लिए रख छोड़े, उसमें अधिक सजावट भी न करे।

3- पूजा अकेले भी की जा सकती है पर सामूहिक रूप में करने से उसका फल शीघ्र ही प्राप्त होता है। ऐसे स्थानों पर देवगण आ जाते हैं और सबको सहायता पहुँचाते हैं। कुछ लोगों का तो यहाँ तक ख्याल है कि मनुष्य की भक्ति की खबर यही देवगण ईश्वर तक पहुँचाते हैं और ईश्वर का आशीर्वाद इस भूलोक में लाकर देते हैं। पुराणों में लिखी गई नारदादि ऋषियों की गाथाएँ इसी बात की सूचक हैं। कुरान में लिखा है कि जहाँ सब लोग मिल के इबादत (भजन) करते हैं फरिश्ते (देवता) वहाँ अपनी रहमत बरसाते हैं और खुदा से जाके अर्ज करते हैं कि फलाँ गिरोह (समूह) मुहब्बत (प्रेम) के साथ आपको याद कर रहा है।

4- इस सामूहिक पूजा का नाम ही ‘सत्संग’ है। सत्संग की महिमा सबने गाई है उसका कारण उपरोक्त कारण ही है।

5- आज कल कुछ दिनों से लोगों के अन्दर यह ख्याल बहुत मजबूत हो गया है कि संध्या पूजन भजन इत्यादि व्यक्तिगत अर्थात् अलग-अलग एकान्त ही में करना चाहिए परन्तु अनुभव ने यह बताया है कि जितने अधिक मनुष्य सामूहिक रूप से किसी साधन या भजन को करें तो उसका फल एक व्यक्ति की क्रिया से दुगना चौगुना नहीं बल्कि बहुत अधिक होगा। कई लोगों के एक साथ बैठने से एक की त्रुटि दूसरे से पूरी होती रही है और यह पूजकों का समूह ईश्वरीय आशीर्वाद उतारने के लिये संगठित बलवान यंत्र बन जाता है।

6-पूजा या भजन के समय श्रद्धा उच्च भावना और दृढ़ निश्चय होना चाहिए बहुत लाजिमी है। भाव से ही फल मिलता है। जहाँ भाव नहीं वहाँ भावना नहीं।

7- सत्संग के समय नग्न खुले उघारे नहीं बैठना चाहिए पाँव पसार के या टेढ़े-मेढ़े भी नहीं बैठना चाहिए। जहाँ तक हो सरकिल बना के बैठना उचित पड़ता है, ताकि प्रवाहित विद्युतधारा का असर सब पर एक समान पहुँचे और सब मिलके अनेक से एक बन जायं।

8- कई लोग आशा और मनोरथ लेके भजन में बैठते हैं इससे पूजा या भजन की शक्ति उसी ओर चली जाती है और साधक मुख्य वस्तु को नहीं प्राप्त हो सकता।

9- जिस समय मनुष्य विधि सहित साधन में जो पूर्ण और अनुभवी गुरु द्वारा उसे मालूम हुआ हो लगता है तो एक दम उसका सम्बन्ध उस आदि सूर्य जगदीश्वर से हो जाता है और उसकी ओर से तुरन्त ही बहुत मोटी किरण प्रकाश की आन कर भजन करने वाले के ऊपर गिरने लगती है और उसका प्रकाश उसके हृदय मस्तिष्क आदि रोम-रोम में फैल जाता है।

10- अनुभवी पुरुषों ने ऐसी स्थूल किरण का प्रकाश स्वेत सुनहरी वर्ण लिए हुए बताया है पर किसी किसी अभ्यासी को दूसरे रंगों में भासती दिखाई देती है यह किरण चाहे दिन हो चाहे रात्रि हो हर समय मिल सकती है और अगर हम किवाड़ बंद करके अंदर बैठे तो वहाँ भी दीवार में घुस के वहाँ पहुँच जाती है।

11- लोगों को तरह-तरह के रंग-बिरंगे प्रकाश क्यों दिखाई देते हैं। इसका कारण है प्रथम यह श्वेत किरण अन्तरात्मा में प्रवेश करती है फिर वहाँ टकरा के बाहर आती है और हमारे अंतःकरण से पास होती है। बस उसी समय उसमें अनेक रंग भासने लगते हैं। हमारे अंदर जिस तत्व के परमाणु अधिक होंगे वही रंग स्पष्ट होगा। जैसे त्रिकोण शीशे के टुकड़े में सूर्य की किरण अनेक रंगों वाली हो जाती है।

12- साइंस यह बतलाती है कि जब प्रकाश किसी बिन्दु से निकल के आगे बढ़ता है तो वह गोल होता जाता है और अर्ध गोलाकार शकल में वह ठहर जाता है। परंतु यहाँ उसका उल्टा होता है। जो लोग साधन या भजन करते हैं उनमें से तेज पुँज जिसको अंग्रेजी में औरा (aura) कहते हैं- निकल कर बिन्दु की शकल अख़्तियार कर लेता है और यह बिन्दु चाहे किसी रंगत के हों साधक के आगे ही चला करते हैं पीछे की ओर नहीं जाते। आगे बढ़ के यह सब बिन्दु आपस में मिलते जाते है और ठोस किरण के आकार में आते जाते हैं। फिर उन सबका अति तेजोमयी ‘प्रकाश बिन्दु’ बन जाता है।

13- यह बिन्दु बिलकुल जड़ ही नहीं होते उनमें चेतनता होती है। इसका सबूत यह है कि यदि कोई चैतन्य शरीर मनुष्य या दूसरी योनि का उनके रास्ते के समीप होता है तो यह अपना स्थान त्याग के उसकी ओर मुड़ पड़ते हैं और उसके हृदय और मस्तिष्क को स्पर्श करने लगते हैं और अपने प्रभाव से थोड़ी देर के लिए उसको भी प्रज्वलित कर देते हैं फिर बाहर आके अपने काम में लग जाते हैं इस प्रकार एक साधक अनेकों मनुष्यों को अपनी किरण द्वारा प्रकाश देने ओर अपने प्रभाव में लाने का अनायास ही उद्योग करता रहता है और यह एक बड़ा उपकार है।

14- पश्चिमी साइंसदानों ने इस तेजपुँज (aura) के लिए जो लिखा है वह यह है कि यह साधारण मनुष्य में 18 इंच चारों ओर रहता है यानी केवल डेढ़ फुट। और विकसित अर्थात् जिसने आत्म उन्नति कर ली हो ऐसे मनुष्य में 50 गज अर्थात् 150 फिट तक वह फैला रहता है और उसमें बहुत शक्ति होती है। तात्पर्य यह है कि आध्यात्मिक विकास के साथ यह तेज पुँज (aura) भी बढ़ता रहता है और यही कारण है कि संत-महात्माओं के स्थानों में पहुँच के मनुष्य अपने को बदला हुआ पाता है उनके तेज पुँज के प्रभाव में आकर अपनी तपन थोड़ी देर को त्याग देता है और शाँति की गोद में खेलने लगता है।

15- साधारण मनुष्य अपने तेज पुँज से कोई काम नहीं ले सकता मगर विकसित मनुष्य उस पर अधिकार रखता है। उसे वह अपनी संकल्प शक्ति (will) के साथ सैकड़ों मील दूर भेज सकता है और अपना प्रभाव फैला सकता है। साधारण पुरुष का प्रयोग 30 या 40 गज से अधिक नहीं चलता मगर साधक उसे दूर देशों में भी ले जा सकते हैं।

जब बहुत से मनुष्य मिल कर पूर्ण भाव के साथ एक स्वर होकर उसको पुकारते हैं, उसका गुणगान करते हैं या उसका चिन्तन (ध्यान) करते हैं तो एक बहुत मोटी किरण ऊपर से उतरती है अकेले मनुष्य पर उतरने वाली किरन का व्यास इतना नहीं होता। एक साथ मिल के साधन करने में आकर्षण बढ़ जाता है और सबके तेजबिन्दु (aura) मिल के वहाँ छा जाते हैं और अपने भंडार से प्रकाश खींचने लगते हैं। इसलिये सत्संग की विशेषता है।

16- चूँकि यहाँ (aura) या तेज पुँज का वर्णन हम कर रहे हैं इसलिए एक बात हम और बतलाते हैं इस बात को शायद अभी तक तुमने न समझा हो। संसार में जितने मत हैं उन सब के पूजा गृह या मंदिर भिन्न-भिन्न प्रकार के पाये जाते हैं। शैवों के मन्दिर दूसरी तरह के, वैष्णवों के दूसरी तरह के, जैनी, बौद्ध, ईसाई, पारसी, मुसलमान, यहूदी सबके मन्दिरों की बनावट में फर्क होता है। यह बात यों ही नहीं हैं इन मजहबों के प्रचारकों का अनुभव इसमें शामिल है और उसी की आकृति बाहर स्थूल में उन लोगों ने बनवाई थी कि जो रस्म के तोर पर अब तक चली आती है।

मनुष्य जब पूजा या आराधना करने बैठता है तो उसके चारों ओर अन्तरिक्ष ( eather) में एक सूक्ष्म इमारत बन जाती है वह किसी साधन में गुम्बददार होती है किसी साधन में दूसरे प्रकार की। प्रत्येक मत के कर्म में भेद रहता है रस्म रिवाज भी दूसरी रहती है, इसलिए उनके यह ( Astrel building) आस्ट्रल बिल्डिंग सूक्ष्मगृह में भी फर्क हो जाता है और उसी के फोटो पर बाहर यह सब बनाये गये हैं।

17- ऊपर से जब प्रकाश की धार गिरती है तो अभ्यासी को कभी-कभी ब्रह्म रन्ध्र से शरीर में उतरते हुए अनुभव होती है, कभी हृदय के स्थान पर से घुसती मालूम देती है, कभी लगातार मूसलाधार आती है, कभी आती है फिर बंद हो जाती है, फिर आने लगती है यानी रुक-रुक कर आती है। धारा प्रवाह उसका नहीं रहता और कभी इतनी सूक्ष्म आती है कि उसको हम महसूस ही नहीं कर पाते पर फायदा देखते हैं।

18- संतों ने व अनुभवी पुरुषों ने पहली तरह के प्रकाश को निकृष्ट, दूसरी प्रकार के प्रकाश को मध्यम और तीसरे सबसे सूक्ष्म को उत्तम श्रेणी का माना है। इसका लाभ ठहराऊ होता है और शरीर व अंतःकरण के परमाणु सब उससे भर जाते हैं और दूसरे व पहले में यह बात नहीं होती। वह वर्षा के जल की तरह बह कर चला जाता है।

19- इस बात की बहुत जरूरत है कि भजन या पूजा के समय हमारी वृत्ति अन्तरमुखी रहे। इष्ट का ध्यान अंतर में ही हो। बाहरी ध्यान से वृत्ति बहिर्मुखी रहती है, उससे काम पूरा नहीं बन पाता। न तो पूर्ण शक्ति आती है और न आत्म-साक्षात्कार होता है।


पाप छिपता नहीं

(ले.- सुश्री कैलाश वर्मा बी. ए. तृतीय वर्ष)

चाहे आप किसी अत्यन्त एकाँत गुफा में कोई पाप कर्म, असुन्दर कृत्य, घृणास्पद कर्म कर लो, रात्रि के अंधकार में उसे छिपाने का प्रयत्न करो। किन्तु विश्वास रक्खो पाप स्वयं पुकार-पुकार कर अपना ढोल पीटता है। आप बिना किसी विलम्ब के यह देखकर चकित होंगे कि आपके पैरों के नीचे की घास खड़ी होकर आपके विरुद्ध साक्षी देती है। आपके इर्द-गिर्द खड़े हुए वृक्षों की भी जुबान खुल जाती है। उनके पत्ते-पत्ते उद्बोधन कर उठते हैं- “आप प्रकृति को, इस कुदरत को धोखा नहीं दे सकते।”

प्रकृति के, परमेश्वर के उस आदि नियन्ता के पाप कर्म देखकर सजा देने के लिए सहस्रों नेत्र हैं, सहस्रों कान हैं और अनगिनत हाथ हैं। वह दिन-रात चौबीसों घन्टे आपकी विभिन्न लीलाएँ मुद्राएँ निहारा करता है। प्रत्येक पाप कर्म का किसी न किसी रूप में किसी न किसी समय अवश्य प्रतिकार मिलता है। इसमें किसी भी रुठिरिआयत नहीं होती। यह एक दैवी विधान है।


इस पृथ्वी पर ही स्वर्ग बनेगा।

(योगी अरविन्द घोष)

जो अशुभ है उससे मुक्त होकर उसके संसर्ग से अपनी आत्मा को पवित्र बनाकर हमें उसकी विद्युत शक्ति से परिचालित होकर इस संसार में प्रकाश फैलाने के लिए, उसके ज्योति की किरणों को संसार में बाँटने के लिए आधार मंत्र (ॐ नमो) का काम करना होगा। जिस प्रकार एक ही सुरंग पूर्ण शक्ति युक्त होकर घोर रव के साथ पर्वत माला को विदीर्ण कर देता है, उसी प्रकार ईश्वर की ज्योति से सम्पन्न हमें संसार की सभी अशुद्धताओं और कुसंस्कारों को दूर करना होगा। इस तरह एक-एक मनुष्य साधना में सिद्ध होकर सैकड़ों और हजारों प्राणियों के बीच ज्ञान व शक्ति की ज्योति फैलाकर उनमें से अविद्या को दूर करेगा और उनका उद्धार करेगा। एक साधक की शक्ति के प्रभाव से सहस्रों जन भागवत धर्म में दीक्षित होंगे और सच्चिदानन्द के अगाध सागर में निमग्न होंगे।

मानव समाज के उद्धार का केवल एक ही मार्ग, एक ही उपाय और एक ही पंथ है, जिसकी व आज तक उपेक्षा करता आया है। उस मार्ग का नाम है शक्ति साधना और आत्मोपलब्धि।

प्रकृति का ज्ञान अवगम्य करके भी यदि प्रकृति की सहायता से आत्मा की मुक्ति नहीं हो पाती तो निश्चय जानिये कि उस मार्ग से जीवन की सफलता नहीं प्राप्त हो सकती। इसके लिए हमें पुनः किसी मार्ग का अनुसरण करना होगा, उसी पथ पर लौटना होगा, जहाँ से हमें ईसा की पवित्रता व पूर्णता, मुहम्मद का आत्म-विश्वास और आत्म-समर्पण, श्री चैतन्य देव का प्रेम व आनन्द, रामकृष्ण परमहंस का संसार में सभी धर्मों का समन्वय तथा एकीकरण, व अति मानव तत्व की प्राप्ति होगी।

इन सब भावों को एकत्र करके एक प्रबल स्रोत बहाना होगा। पतित पावनी, सकल मलहारिणी पवित्र सलिला भागीरथी गंगा की भाँति नाशवान इस संसार तथा अर्धमृत इस मानव जाति के बीच में इसे प्रवाहित कर देना होगा। जिस प्रकार राजा भागीरथ विष्णुपाद स्पर्श पवित्रा इस गंगा के स्पर्श से अपने पितरों को मुक्त करा कर अनन्त धाम में पहुँचा सके, उसी प्रकार हम भी इस नवीन धर्म के पवित्र स्रोत को मानव जाति के बीच में प्रवाहित करके उनकी आत्म-शुद्धि करके उनकी आत्मा का उद्बोधन करावेंगे। निश्चय मानो कि इस पृथ्वी पर एक पुनः स्वराज्य की स्थापना होगी।

पर इतने से ही लीला का यह उद्देश्य नहीं सिद्ध हो सकता है। इसी लीला के लिए ही भगवान प्रत्येक युग में अवतार ग्रहण करते हैं। वह लीला क्या है? मानव जाति की दिन प्रतिदिन शनैः शनैः उन्नति के पथ पर पहुँचाना समुच्चय की दैवी शक्ति तथा तूरीय के विपुल आनन्द द्वारा मनुष्य को देवता की भाँति बनाना ही इस लीला का उद्देश्य है। भगवान अनन्त युग से विविध प्रकार के रूप धारण करके इस प्रकार की लीला करते आ रहे हैं। मानव संसार के बीच में उनकी इस प्रकार की लीला सदा व सर्वदा अविच्छिन्न रूप से होती चली आ रही है। उन्होंने स्वर्ग को मर्त्य बना दिया है और इस पृथ्वी पर सहस्रों धारा द्वारा अमृत की वर्षा की है। जब तक पृथ्वी और स्वर्ग एक न हो जायं हमें शान्ति नहीं मिल सकती। जब तक इस उद्देश्य की सिद्धि न हो जाय, हमारी साधना पूर्ण व चरितार्थ नहीं हो सकती।


आध्यात्मिक शान्ति के कुछ अनुभव

(प्रो. श्री रामचरण महेन्द्र, मनः शास्त्र विशेषज्ञ)

आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होते हुए मुझे जो प्रत्यक्ष अनुभव हुए हैं उन्हीं के स्पष्टीकरण के हेतु यह विवेचन लिख रहा हूँ। आशा है कि उन्नति के पथ पर चलने वाले अन्य पथिकों को भी इससे कुछ लाभ होगा। मेरा स्वयं तो यह विश्वास है कि इन सूत्रों से प्रायः प्रत्येक व्यक्ति को ही थोड़ा बहुत लाभ अवश्यमेव होगा।

आप संसार के काँटे नहीं बिन सकते- कुछ वर्ष पूर्व में एक बोर्डिंग हाऊस का सुपरिटेंडेंट था। विद्यार्थियों का उचित निरीक्षण करना, उन्हें सन्मार्ग पर चलाना, प्रातःकाल शीघ्र उठने की आदत डालना, सिनेमा, सिगरेट, बकवास समय की बरबादी रुपयों की होली फूँकना इत्यादि अनेक बातों से उनकी भरसक रक्षा करता। एक पिता की हैसियत से विद्यार्थी समुदाय को प्रत्येक अनुचित कार्य से रोकता। मैंने कुछ मास पश्चात देखा कि यद्यपि 75 प्रतिशत लड़कों में उन्नति की महत्वकांक्षाएं प्रदीप्त हुई, कुछ ऐसे रह ही गए जो अनेक दुष्कर्मों में विरत रहे। इन कुमार्ग पर चलने वालों को ठीक पथ पर लाने के लिए मुझे अनेक यत्न करने पड़े। अन्ततः एक दो ही व्यक्ति ऐसे रहे जिन्हें कुमार्ग से न हटा सका।

प्रत्येक कुपथगामी को देखकर मेरे मन में पीड़ा होती। व्यग्रता और कभी कभी क्रोध भी आता। मैं स्वयं अपना सुधार कुछ भी न कर सकता उलटा अशान्ति का दावानल अन्तःकरण में जलने लगा। आज मैंने सीखा है कि मनुष्य वास्तव में किसी दूसरे का सुधार नहीं कर सकता। न दूसरों की उन्नति का उत्तरदायित्व ही अपने ऊपर ले सकता है। उसे दूसरों का सुधार करने की धुन में न पड़कर स्वयं अपना सुधार करना चाहिए। वास्तव में दुःख देने वाला कारण दूसरों के दुःखों, कष्टों, न्यूनताओं, कमजोरियों, छिद्रों को देखना ही है संसार में हजारों पुरुष ऐसे दुष्कर्मी हैं कि हम उनका सुधार नहीं कर सकते। उनकी कमजोरियों को हटाने के चक्कर में कहीं हम अपना पतन न कर लें यह हमें स्मरण रखना चाहिए।

दूसरों पर दोषारोपण करके अपने को हम अंधेरे में ही रहने देते हैं। अपनी निर्बलताओं पर चादर ढ़क लेते हैं। अमुक व्यसन दूर हो जाय, अमुक व्यक्ति का अमुक दुर्गुण जाता रहे, फलाँ बुरी आदत छूट जाय, तम्बाकू बीड़ी शराब छूट जाय, ऐसी बातों को मन में बार-बार आने देने से अशान्ति उत्पन्न होती है।

कोई भी क्षुद्र औरा निकृष्ट विचार मन के आरुढ़ हो जाने पर पतन होता है। इसी प्रकार मैंने स्वयं अनुभव किया है कि जो मनुष्य अपना संकल्प बार-बार बदलता है वह वास्तव में कुछ नहीं कर पाता। मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि दूसरों की सम्मति से अपना निश्चय नहीं बदलना चाहिए।

अपने से नीचे वालों को देखिए- हमसे ऊँची जगहों, पदों, स्थानों पर संसार में अनेक व्यक्ति हैं। प्रत्येक व्यक्ति यदि यही चाहने लगें कि हम सम्राट बनें, बड़े धनी, अमीर, उच्च पदाधिकारी बनें, हमें ढेर से रुपये मिलें, मोटर, आलीशान कोठी, सुन्दर आभूषण, सुन्दर प्रियतमा मिले- तो यह कहाँ संभव है।

प्रत्येक व्यक्ति उच्चाधिकारी नहीं बन सकता, प्रत्येक व्यक्ति आलीशान कोटी मोटर कार नौकर नहीं रख सकता, प्रत्येक सुँदर वस्त्राभूषण से अपना शरीर अलंकृत नहीं कर सकता, प्रत्येक सुन्दर प्रियतमा नहीं पा सकता। आप जितना ही इन चीजों को पाने की कामना करेंगे, उतने ही अशान्त दुःखी रहेंगे।

आप कितने भाग्यशाली हैं- अपने से नीचे वालों को देखिए। उन्हें भर पेट भोजन भी नहीं मिलता, और आप कितने भाग्यशाली हैं कि दो समय इज्जत से भरपेट भोजन कर लेते हैं। कितने ही सड़कों पर पड़े ठिठुरते हुए रात्रि व्यतीत करते हैं नंगे-उघाड़े क्लाँत पड़े रहते हैं। और आप घर पर मजे में रात्रि व्यतीत करते हैं। आप कितने भाग्यशाली है।

शफाखाने में जाकर देखिए। कितने रोगों के मरीजों का ताँता बँधा है। कोई खौं-खौं करके खाँस रहा है तो कोई हाय-हाय करके कराह रहा है। किसी के नेत्रों में भयंकर रोग है तो कोई मूत्र रोग से विह्वल है। किसी का ऑपरेशन किया जा रहा है और रक्त, पीव की धार बह रही है। आपके पास स्वस्थ शरीर है हाथ पाँव चलते हैं, खाना उचित समय पर पच जाता है, कब्ज बवासीर, खाँसी आपको नहीं है, आपका चेहरा मधुर मुस्कान से हरा-भरा है। सचमुच, आप कितने भाग्यशाली हैं।

जो कुछ आपके पास है वह आवश्यकता से अधिक है। जो नहीं है उसके बिना भी आपका कार्य भली-भाँति निर्विघ्न चल सकता है। जब हम अपने से अधिक दुःखी संतप्त दुनिया को देखते हैं तो सचमुच हमें प्रतीत होता है कि वास्तव में हम भी बड़े भाग्यशाली हैं।

दूसरों से कुछ प्राप्ति की आशा मत रखिए-

अशाँति का मुख्य कारण यह है कि नित्यप्रति के व्यवहार में हम दूसरों से बहुत अधिक सहानुभूति प्रेम प्राप्ति की उम्मीद रखते हैं। अमुक से हमने अमुक अवसर पर भलाई की थी, अब इस अवसर पर वह हमारी तरफदारी करेगा, लाभ पहुँचायेगा, कुछ अर्थ प्राप्ति करा देगा, हमारा विशेष ख्याल रक्खा करेगा। ये सब ऐसी थोथी आशाएँ हैं जो इस कठोर संसार में बहुत कम पूर्ण होती हैं। आप जिनसे उम्मीद बाँधे रहते हैं वे ही आपका पेट काटते हैं। तकलीफें देते हैं, कन्नी काट लेते है, सहायता नहीं करते।

अतः आप दूसरों से कुछ भी प्राप्ति की उम्मीद न रखिए। आपकी कोई सहायता नहीं करेगा, आप स्वयं ही अपने लिए जो चाहे कर सकते हैं। यदि दूसरे आपके लिए कुछ कर दें- तो यह उनकी उदारता है। यदि उनसे प्राप्ति की आशा न रखकर आप उनकी सहानुभूति पायेंगे, तो वह आपको बहुत भारी मालूम होगी। आप तो यह मानिये कि हम स्वयं ही अपने लिए हैं, दूसरा कोई साथी नहीं है, दुनिया का लम्बा रास्ता हमें स्वयं ही तय करना है।

आपका सबसे बड़ा सहायक- आपको अपना लाभ स्वयं संभालना होगा। दुर्बलताओं को अपने हृदय से स्वयं बाहर फेंकना होगा। अपनी शक्तियों में श्रद्धा जागृत करनी होगी। जब आप दोषदर्शी स्वभाव से मुख मोड़ कर स्वयं अपनी दुर्बलताओं को दूर करने का प्रयत्न करेंगे, तभी भीतर से परिवर्तन प्रारम्भ होगा।

मनुष्य को अपनी दुर्बलताओं को दूर करने के लिए प्रतिदिन उद्योग करना चाहिए। निरन्तर प्रयत्न, उद्योग, संतत अध्यवसाय से यह दूर हो सकेंगी।

बड़े सावधान रहें- जिस व्यक्ति को धन, संपदा, मान, बड़ाई और ऊंचे पदों की अतृप्त आकाँक्षा नहीं विचलित करती किन्तु जो सब कुछ उसके पास है उसी में वह संतुष्ट प्रसन्न रहता है और उसके छिन जाने पर भी शोक नहीं करता- वही वास्तव में सच्चा कर्म-मार्गी है। परन्तु जिसे लगातार “और मिले” और मान बड़ाई प्राप्त हो- ऐसी अतृप्ति लगी रहती है, जिसे जो कुछ उसके पास है, उस पर संतोष नहीं है और जो दूसरे को हड़प जाने के लिए हाथों को खून से रंजित करता है- वही यथार्थ में मूर्ख और अज्ञानी है।

जिस साधक ने अपने स्वार्थ को तिलाँजलि देकर मन को शुद्ध कर लिया है और यह समझता है कि मेरा कोई शत्रु नहीं है, जो ध्यानावस्थित हो, अपने भीतर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को देखता है, वही ज्ञानी है।

जीवन में आगे बढ़ना चाहते हो तो दूसरों पर मत निर्भर रहो, स्वयं अपनी विशेषता प्रदर्शित करो। तुम्हें अपना बोझ स्वयं ही ग्रहण करना पड़ेगा। दूसरा कोई भी व्यक्ति इस कर्म क्षेत्र में तुम्हारा साझीदार नहीं बनेगा।


धर्म की कसौटी पर चढ़ने दीजिए!

(श्री स्वामी विवेकानन्द जी)

बड़े-बड़े धर्म वक्ता आपने देखे होंगे और उनके व्याख्यान सुने होंगे। सोचना चाहिए कि उनके शब्दों का अनुवाद उनका हृदय कहाँ तक करता है? वे अपने अंतःकरण के भावों को यदि स्पष्टता प्रगट करने लगें तो आप निश्चय समझिये कि उनमें से अधिकाँश लोगों को ‘नास्तिक’ कहना पड़ेगा, वे अपनी बुद्धि को चाहे जितनी भगतन बनावें, वह उनसे यही कहेगी कि “किसी पुस्तक में लिखा है या किसी महापुरुष ने कहा है इसलिए मैं उस पर बिना विचार किये विश्वास क्यों कर करूं? दूसरे भले ही अंध श्रद्धा के अधीन हो जायं मैं कभी फँसने वाली नहीं” इधर जाते हैं तो खाई और उधर जाते है तो अथाह समुद्र। यदि धर्मोंपदेशक या धर्मग्रन्थों का कहना मानो तो विवेचक बुद्धि बाधा डालती है और न मानो तो लोग उपहास करते हैं। ऐसी अवस्था में लोग उदासीनता की शरण लेते हैं जिन्हें आप धार्मिक कहते हैं। उनमें से अधिकाँश लोग उदासीन अथवा तटस्थ हैं और इसका कारण धर्म पर यथार्थ विचार न करना ही है, धर्म की उदासीनता यदि ऐसी ही बढ़ती जायेगी और लोग धर्माचरण के लाभों से अनभिज्ञ ही बने रहेंगे तो धर्म की पुरानी इमारत भौतिक शास्त्रों के एक ही अघात से हवाई किले की तरह नष्ट भ्रष्ट हो जायेगी।

भौतिक शास्त्र जिस प्रकार विवेचक बुद्धि को भट्टी से निकाल कर अपनी सत्यता सिद्ध करते हैं उसी प्रकार धर्मशास्त्र को भी अपने सिद्धान्तों की सत्यता संसार के आगे सप्रमाण सिद्ध कर देना चाहिए। ऐसा करने पर बुद्धि के तीव्र ताप ये यदि धर्मत्व गल, पच भी जायेंगे तो भी हमारी कोई हानि नहीं है। जिसे आज तक हम रत्न समझे हुए थे, वह पत्थर निकला। उसके नष्ट होने का हमें दुःख क्या? अंध परम्परा से उसे सिर पर लादे रहना ही मूर्खता है। मेरी समझ में ऐसे संदिग्ध पत्थर को जहाँ तक शीघ्र ही परीक्षा कर व्यवस्था से लगा देना ही अच्छा है। यदि धर्मतत्व सत्य होंगे तो वे भट्टी में कभी न जलेंगे, उलटे वे ही असत्य पदार्थ भस्म हो जायेंगे, जिनके मिश्रण से सत्य धर्म में संदेह होने लगा है। आग में तपाने से सोना मलीन नहीं किन्तु अधिक उज्ज्वल हो जाता है। विवेचक बुद्धि की भट्टी में सत्य धर्म को डालने से उसके नष्ट होने का कोई भय नहीं है किन्तु ऐसा करने से उसकी योग्यता और भी बढ़ जायेगी तथा उसका उच्च स्थान सर्वदा बना रहेगा। पदार्थ विज्ञान और रसायन शास्त्रों की तरह धर्म शास्त्र भी प्रत्यक्ष प्रमाणों में सिद्ध करना चाहिए। यदि कर्मेन्द्रियों की अपेक्षा ज्ञानेन्द्रियों की योग्यता अधिक है तो जड़ भौतिक शास्त्रों पर ज्ञान प्रधान धर्मशास्त्र की विजय क्यों कर न होगी?


चिन्तन के रज कण

(ले.- ठा. गुणवंत सिंह, गूदर खेड़ा)

-दम्भी लोग दूसरे लोगों के लिए ‘बावले जान’ हो जाते हैं, दम्भी अपना तो गुण गान करता है और दूसरों के दोषों का वर्णन करता है। उसे अपने से छोटों के सम्मुख आनन्द आता है, जो उसके गुणों और कार्यों की प्रशंसा करते नहीं थकते। अन्त में दम्भी उन आदमियों का शिकार हो जाता है जो उसकी प्रशंसा करते हैं क्योंकि दम्भी की अपेक्षा और कोई खुशामद से प्रसन्न कहीं होता।

-स्पिलोजा।

-कंजूस अंधा होता है क्योंकि वह सिवा सोने के और किसी सम्पत्ति को नहीं देखता। फिजूल खर्च व्यक्ति अंधा होता है। क्योंकि व प्रारम्भ को ही देखता है अंत को नहीं। रिझाने वाली स्त्री अंधी होती है क्योंकि वह अपनी झुर्रियाँ नहीं देखती। विद्वान अंधा होता है क्योंकि वह अपना अज्ञान नहीं देखता। ईमानदार चोर अंधा होता है क्योंकि वह परमात्मा को नहीं देखता

-विक्टर ह्यूगो।

-मनुष्य अपना सच्चा मूल्य नहीं कूत सकता क्योंकि उसे दैविक ज्ञान नहीं रहा है, इसलिए वह अपने विषय में औरों से पूछता फिरता है। यद्यपि वह अधिक विश्वस्त अपनी आत्मा से अपने विषय में दृढ़ता पूर्वक जानकारी कर सकता है। देवता तो साँसारिक दृश्य पर मोहित नहीं होता। वह निरन्तर अंतर दृष्टि रखता है और उसकी आनन्दमयी मुस्कान का रहस्य आत्म प्रतीति है।

-महर्षि रमण।

-मैं तुम लोगों को घोर नास्तिक देखना पसन्द करूंगा। लेकिन कुसंस्कारों से भरे मूर्ख देखना न चाहूँगा। नास्तिकों में कुछ न कुछ जीवन तो होता है। उनके सुधार की तो कुछ आशा है ‘वे मुर्दे तो नहीं हैं। लेकिन कुसंस्कार मस्तिष्क में यदि घुस जाते हैं तो वह बिल्कुल बेकार हो जाता है। दिमाग बिल्कुल फिर जाता है। मृत्यु के कीड़े उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। तुम्हें इन दोनों को छोड़ना होगा। मैं साहसी ‘निर्भीक’ नौजवानों को चाहता हूँ तुम लोगों में ताजा खून हो ‘स्नायुओं’ में तेजी हो ‘पेशियाँ’ लोहे की तरह सख्त हों। मस्तिष्क को बेकार और कमजोर बनाने वाले भावों की आवश्यकता नहीं, इन्हें छोड़ दो।

-स्वामी विवेकानन्द।

-सूअर के सौ पुत्र किस काम के कि भूखों मरें। पर धन्य है कि सिंहनी का पूत, जिसके बल पर वह भाड़ी में निर्द्वन्द्व होकर सोवे। मनुष्य संख्या बढ़ने से लाभ नहीं बल्कि आवश्यकता है ‘पूर्ण मनुष्य की’।

-चाणक्य।

-उत्तम उत्तम संस्थाओं की इतनी आवश्यकता नहीं, विस्तृत धन और स्वर्ण राशियों की भी आवश्यकता नहीं, असीम पौरुष और बलवान लेखनी की आवश्यकता नहीं, बल्कि आवश्यकता है एक मनुष्यता से परिपूर्ण मनुष्य की।

-जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे।

-आपके स्थापित किये हुए श्वेत मन्दिर तथा पत्थर के स्थापित विष्णु आपके हृदय के पाप शाँत न करेंगे। पूजो देश के भूखे इन नारायणों को। इन परिश्रम करने वाले विष्णुओं को पूजो।

-स्वामी रामतीर्थ।

-किसी देश का बल छोटे विचार के बड़े आदमियों से नहीं किन्तु बड़े विचार के छोटे आदमियों से बढ़ता है। सत्य धर्म का मतलब ईश्वर शब्द पर विश्वास की अपेक्षा भलाई पर विश्वास करना है।

-स्वामी रामतीर्थ।


धन की अनावश्यक तृष्णा

(ले.- डॉ. हीरालालजी गुप्त, बोगूसराय)

आज कल पैसे को अत्यधिक महत्व दिया जाने लगा है। जिसे देखिए वह पैसे के पीछे बेतहाशा दौड़ रहा है। भिक्षुक और धन कुबेर अशिक्षित और विद्वान सभी को पैसे की चाह एक समान है। वास्तविक आवश्यकता के कारण नहीं वरन् तृष्णा के कारण, यह लालसा उन्हें सताती है। धन प्राप्त करने के लिए लोग उचित और अनुचित हर एक तरीका अपनाने को तैयार रहते हैं। मधुमक्खी की तरह संचय और कंजूसी को अपनी जीवन नीति बनाकर पैसे की मृग तृष्णा में मारे-मारे फिरते हुए लोगों को देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि इस युग में, टका ही धर्म, कर्म और परमपद बन गया है।

यद्यपि जीवन निर्वाह के लिए एक नियत मर्यादा में पैसे की हर किसी को आवश्यकता है। एक नियत सीमा तक धन का उपार्जन और संचय करना भी चाहिए। पर उसका अति लोभ अनावश्यक है। सुर दुर्लभ मानव शरीर बड़े भाग्य से मिलता है इसका एक-एक क्षण अमूल्य निधि के समान है। इसलिए समय का सदुपयोग, आत्मोन्नति, सेवा, परोपकार, स्वाध्याय, सत्संग, ईश्वर आराधना, सरीखे सत्कर्मों में करना चाहिए।

जो लोग लालच के मारे हर घड़ी धन के लोभ में फँसे रहते हैं वे संगीत, साहित्य और कला के सौंदर्य से वंचित रह जाते हैं। विश्व के कण-कण में सौंदर्य और आनन्द भरा हुआ है जिसका आध्यात्मिक दृष्टि से निरीक्षण करने पर मनुष्य को अपार तृप्ति और सुख शान्ति की उपलब्धि हो सकती है। परन्तु दुर्भाग्य की बात है कि चाँदी, ताँबे के टुकड़ों के लिए लोग उन सब तृप्ति दायक आनन्दों से वंचित हो जाते हैं।


प्रार्थना अमोघ अस्त्र है।

ले.- श्री प्रभुदत्त जी ब्रह्मचारी, रेवाड़ी

जिस हृदय में जितनी ही विश्वास की मात्रा अधिक है वह उतना ही अधिक धनी व बलवान् है। विश्वास में वह शक्ति है जो अतर्क्य कार्य को भी कर दिखाती है। महात्मा ईसा के शब्दों में यदि हम में राई भर विश्वास हो तो हम पर्वत को उठा सकते हैं। किन्तु विश्वास जैसी अमूल्य निधि के अधिकारी, उस प्रभू के प्यारे कोई विरले ही जन होते हैं। निश्चय ही वे अहोभाग्य हैं। उनकी संगति में आने से अविश्वासी हृदयों में भी परिवर्तन हो जाता है। हाँ, विश्वास भी प्राप्त किया जा सकता है और वह मिलता है- प्रार्थना से।

महात्मा ईसा ने बाइबिल में प्रार्थना के विषय में कहा है कि-

“जो प्रभु की प्रार्थना में आँसू भेंट चढ़ायेगा उसे प्रभु की प्रसन्नता का प्रसाद मिलेगा, और जो गद्-गद् होकर उसके आगे रोयेगा, वह प्रभु के मन्दिर से निश्चय पूर्वक आनन्द में विह्वल हुआ अपनी आशा की पूर्ति लेकर लौटेगा।”

यदि हम अपने आत्मा के प्रति सच्चे रह कर निज कर्तव्य का प्रमाद रहित होकर यथावत् पालन करें और फिर भगवान् से अपनी शुभ अभिलाषा की पूर्ति के लिये प्रार्थना करें तो निश्चय हमारी प्रार्थना स्वीकार होगी। इसमें सन्देह का अवकाश किंचित् भी नहीं है। यह स्वयं करने की और परखने की बात है। हाँ, लगन और प्रयत्न, चिरकाल तक धैर्य पूर्वक बढ़ाना चाहिये। प्रार्थना निराशा की अँधेरी को सूर्य के प्रकाश के समान चमका देती है। प्रार्थना दुःख के ताप से झुलसे हुए हृदयों को, सूखी खेती को वर्षा के समान लहलहा देती है। प्रार्थना मृतक हृदयों को जीवित करने के लिए संजीवनी बूटी है।

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देवियो! अपना देवत्व-प्रकट करो।

(ले.- राजकुमारी रत्नेश कुमारी ‘नीराँजना’)

जो अधिक से अधिक देते और कम से कम लेते हैं उनको देवता कहते हैं, जो लेना-देना बराबर रखते हैं उनको मनुष्य और जो केवल सबसे लेना ही लेना जानते हैं उनको दानव अथवा राक्षस मानना चाहिये। आर्य संस्कृति अपने अनुयायियों को देव अथवा देवी के ही रूप में देखना चाहती है। वह ऐसे स्वर्ण युग का आदर्श चित्र सम्मुख रखती है जब कि अधिकाँश परिवारों के सभी व्यक्ति अपने देवत्व से उसे भू स्वर्ग बना रहे हैं।

वह गृह लक्ष्मियों को देवी रूप में देखने को और भी अधिक उत्सुक रहती है। कारण भावी नागरिकों पर उनके देवत्व का गहरा प्रभाव पड़ेगा। जिनकी धमनियों में उन्हीं का दूध-खून बन कर लहरा रहा है जो उनकी गोदी में पलकर सर्व प्रथम शिक्षा ग्रहण करते हैं वह शिक्षा अच्छी ही अथवा बुरी उनके हृदय के अंतर्गत में प्रवेश कर जाती है।

विचार पूर्वक देखिए, जिस व्यक्ति में जितना ही अधिक देवत्व होगा संसार उसका उतना ही अधिक स्वागत करेगा। मँगतों का स्वागत तो, केवल देव प्रकृति वाले व्यक्ति ही कर सकते हैं। जीवन में प्रत्येक नारी का एक बार जब प्रथम बार ससुराल को जाती है तो यह अनुभव करने का सुअवसर मिलता है कि उस पर प्रेम और आदर की सब ओर से वर्षा हो रही है। घर का प्रत्येक व्यक्ति आनन्द विभोर बना फिरता है नव वधू को प्रसन्न करने के लिए सभी नई-नई युक्तियाँ सोचते हैं आखिरकार इतना सब क्यों होता है? और फिर ये आनन्दोत्सव फीका पड़ते-पड़ते एक दिन लाइन मिस।

क्यों हो जाता है? वह प्रेम वह आदर वह उमंग कहाँ खो जाती है?

क्या कभी आपने इस पर विचार किया है? क्या यह परिणाम अवश्यम्भावी है? सुनिये! उन्होंने आशा की थी कि आप देवी हैं उनकी अभिलाषाओं को पूर्ति का वरदान देंगी। उनके घर में निरन्तर सुख-शान्ति और प्रेम की वर्षा करेंगी। यदि वे कभी क्षणिक उत्तेजना वश अनर्गल बातें भी कह कर वातावरण को कभी तिक्त बना देंगे तो आप अपने मधुर भाषण से उसमें फिर नवीन माधुर्य की सृष्टि कर देंगी। यदि उनकी भूल भी होगी तो आपको सबके सन्मुख अपमानित नहीं करेंगी कटु व्यंगों से दिल नहीं दुखाएंगी किसी से उनकी निन्दा नहीं करेंगी परन्तु एकान्त में मधुर शब्दों में उनको समझा देंगी। देवियों में भी दुर्गा अथवा सरस्वती की उपमा कोई नहीं देता, वधू को उपमा हमेशा दी जाती है- लक्ष्मी की। इससे यह स्पष्ट प्रगट होता है कि वे आपसे यही आशा रखते हैं कि आप अपनी गृह कुशलता तथा दिव्य स्वभाव से उनके गृह रूपी संसार को श्रीयुक्त (शोभायुक्त) बनावें।

यदि आप उनकी इस कामना की पूर्ति का वरदान दे देवेंगी तो वे आप पर सदैव प्रेम रखेंगे, आदर करेंगे, मुक्त कण्ठ से आपकी सराहना करेंगे, फूले नहीं समायेंगे। वह प्रथम दर्शन का स्वागत आपका पुराना नहीं होने पायेगा। सब उसी प्रकार आप पर स्नेह, आदर, आत्मीयता, कृतज्ञता तथा आनन्द की वर्षा सर्वदा करते रहेंगे। आपका गृह संसार सदैव स्वर्ग बना रहेगा और आप उस स्वर्ग की लक्ष्मी। यदि आप इसके विपरीत आचरण करेंगी तो दिन-दिन यह आनन्दोत्सव, यह शानदार घर की रानी जैसी स्वागत, फीका पड़ता जायेगा। प्रेम तथा सम्मान में न्यूनता आती जायेगी, और सभी आपकी तरफ से उदासीन होते जायेंगे।

यदि आपने मानवी स्वभाव रक्खा (जितना लेना उतना देना) तब तो वे आपको किसी प्रकार निभा भी लेंगे पर यदि आपने दानवी प्रकृति को अपनाया (देने के नाम कुछ भी नहीं, केवल लेना ही लेना) तो सभी आपसे असन्तुष्ट हो जायेंगे, आपसे दूर-दूर रहेंगे और आपकी निन्दा करेंगे, आपसे कटु शब्द कहेंगे, अपमान करेंगे और आपकी तनिक भी परवाह नहीं करेंगे। इस भाँति आपका गृह आपके ही आचरणों के कारण नरक बन जायेगा। आप भी ऊब उठेंगी ऐसे कडुए जीवन से।

अतएव आपके सामने तीन रास्ते खुले हैं। 1-देवी बनना। 2- मानवी बनना। 3- दानवी बनना। चुन लीजिये आपको कौन सा चुनना है? आर्य संस्कृति निरन्तर कह रही है-

तुम देवी हो? इसलिए अपना देवत्व प्रकट करो।

=कोटेशन============================


Quotation

जब तक संसार में कीट-पतंग आदि की मुक्ति नहीं हो जायेगी तब तक मैं अपनी मुक्ति नहीं चाहता।

-महात्मा बुद्ध।

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व्यवहारिक ज्ञान

जिस तरह आम को बिना खाये, रखे रहने से, उसका स्वाद नहीं मालूम होता, उसी तरह शिक्षा और ज्ञान का व्यवहार हुये बिना कुछ उपयोग नहीं है।

पठन-पाठन और वाचन का ज्ञान चाहे वह कितना भी अधिक क्यों न हो, अन्त में पुस्तक में ही रह जायगा। जो ज्ञान हमें जीवन की प्रत्यक्ष बातों से अनुभव द्वारा मिलता है, वही सच्चा ज्ञान है। छटाँक भर ऐसा ज्ञान सेर भर पण्डिताई से बहुत अच्छा समझा जाता है।

संसार में जो बड़े-बड़े विख्यात पुरुष हो गये हैं वे अधिक पढ़े लिखे नहीं थे। पहले जमाने में इतनी किताबें ही नहीं थी। आजकल की लाखों करोड़ों पुस्तकों की जगह उस जमाने में एकाध पुस्तक मुश्किल से मिलती थी। परन्तु किताबें पढ़े बिना ही पूर्व युग के मनुष्य एक से एक पढ़ कर गुणवान और कार्यशील हो गये हैं।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जिस मनुष्य ने अपनी बुद्धि के छोटे से नमूने के स्वरूप में संसार को रेलगाड़ी बनाना सिखलाया है वह पढ़ा लिखा नहीं था।

तात्पर्य यह है कि संस्कृत, अरबी, फारसी, अथवा, ग्रीक, लेटिन और अँग्रेजी या अन्य भाषाओं के व्याकरण में वाक्यों का जन्म भर विन्यास करते रहने से ही कुछ साहस और कार्य-शीलता की वृद्धि नहीं हो जाती। इसी तरह मौलिकता तथा नूतनता तर्क शास्त्र के हजारों पृष्ठों को भी पढ़ने से नहीं आतीं। ये सब बातें प्रत्यक्ष व्यवहार से प्राप्त हुआ करती हैं।


आदेश बनाम विवेक

सिद्धान्तों का परीक्षण करना आवश्यक है। क्योंकि परस्पर विरोधी सिद्धाँतों का सर्वत्र आस्तित्व प्राप्त होता है। एक ओर जहाँ हिंसा को, बलिदान या कुर्बानी को, धर्मों में समर्थन प्राप्त है वहाँ ऐसे भी धर्म हैं जो जीवों की हत्या तो दूर, उन्हें कष्ट पहुँचाना भी पाप समझते हैं। इसी प्रकार ईश्वर, परलोक पुनर्जन्म, अहिंसा, पवित्र पुस्तक, अवतार पूजा विधि, कर्मकाण्ड, देवता आदि विषयों के मतभेदों से धार्मिक क्षेत्र भरे पड़े हैं। सामाजिक क्षेत्रों में वर्णभेद, स्त्री अधिकार, शिक्षा, रोटी, बेटी, आदि प्रश्नों के सम्बन्ध में परस्पर विरोधी विचारों की प्रबलता है। राजनीति में प्रजातंत्र साम्राज्यवाद, पूँजीवाद, अधिनायकवाद, समाजवाद आदि अनेकों प्रकार की परस्पर विरोधी विचार धाराएं काम कर रही हैं। उपरोक्त सभी प्रकार की विचार धाराएं आपस में खूब टकराती भी हैं। उनके समर्थक और विरोधी व्यक्तियों की संख्या भी कम नहीं है।

जब कि सिद्धाँतों में इस प्रकार के घोर मत भेद विद्यमान हैं तो एक निष्पक्ष जिज्ञासु के लिए, सत्य शोधक के लिए, उनका परीक्षण आवश्यक है। जब तक यह परख न लिया जाय कि किस पक्ष की बात सही है किसकी गलत? किसका कथन उचित है किसका अनुचित? तब तक सत्य के समीप तक नहीं पहुँचा जा सकता। यदि परीक्षा और समीक्षा को आधार न बनाया जाय तो किसी प्रकार उपयोगी और अनुपयोगी की परख नहीं हो सकती।

‘महाजनो ये न गतो स पन्था’ के अनुसार महाजनों का- बड़े आदमियों का- अनुसरण करने की प्रणाली प्रचलित है। साधारणतः लोग सैद्धाँतिक बातों के सम्बन्ध में अधिक माथा पच्ची करना पसंद नहीं करते। दूसरों की नकल करना सुगम पड़ता है, निकटवर्ती बड़े आदमी जो कह दें उसे मान लेने में दिमाग पर जोर नहीं डालना पड़ता अधिकाँश जनता की मनोवृत्ति ऐसी ही होती है। परन्तु इस प्रणाली से सत्य असत्य की समस्या सुलझती नहीं। क्योंकि जिन्हें हम महापुरुष-महाजन समझते हैं संभव है वे भ्रान्त रहे हों। और दूसरे लोग जिन्हें महापुरुष समझते हैं संभव है उन्हीं की बात ठीक है। जब कि अनेक व्यक्ति एक प्रकार के विचार वाले महाजन की बात ठीक मानते हैं और उसी प्रकार अनेक व्यक्ति दूसरे महाजन की, दूसरे प्रकार के विचारों को मान्यता देते हैं। तब यह निर्णय कठिन हो जाता है कि इन दोनों कथनों में किसका कथन उचित है किसका अनुचित?

महापुरुष दो प्रकार से अपने विचारों को व्यक्त करते हैं। (1) लेखनी द्वारा। (2) वाणी द्वारा। वाणी द्वारा प्रकट किये हुए विचार क्षणस्थायी होते हैं इसलिए उन्हें चिरस्थायी करने के लिए लेख बद्ध किया जाता है। विचारों के व्यवस्थित को लेखन- यही ग्रन्थ या पुस्तक कहते हैं। जिन ग्रन्थों में धार्मिक या आध्यात्मिक विचार लिपि बद्ध होते हैं उन्हें शास्त्र कहते हैं। शास्त्रों को लोग एक स्वतंत्र सत्ता का स्थान देने लगे हैं। जैसे देवता की अपनी एक स्वतंत्र सत्ता समझी जाती है वैसी ही शास्त्र भी स्वतंत्र सत्ता बनने लगे हैं। परन्तु बात ऐसी नहीं है। वे महाजनों के विचार ही तो हैं। जैसे महाजन भ्रान्त हो सकते हैं-होते हैं वैसे ही शास्त्र के अभिमत का खण्डन करना यही प्रकट करता है कि एक समान श्रेणी के महाजनों में प्राचीन काल में भी इसी प्रकार मत भेद रहता था जैसा कि आजकल अनेक समस्याओं के संबंध में हमारे नेता आपसी मतभेद रखते हैं।

आज नेताओं के मत भेद में से छान कर हम वही बात ग्रहण करते हैं जो हमारी बुद्धि को अधिक उचित और आवश्यक जँचती है। किसी नेता के मत से सहमति न रखते हुए भी उसके प्रति आदर भाव रहता है इसी प्रकार स्वर्गीय महाजनों, महापुरुषों की लेखबद्ध विचार प्रणाली के सम्बन्ध में भी होना चाहिए। शास्त्र का अन्धानुकरण नहीं होना चाहिए वरन् उनके प्रकाश में सत्य को ढूँढ़ना चाहिए। अन्धानुकरण कोई किया भी नहीं जा सकता। क्योंकि कभी-कभी एक ही शास्त्र में दो विरोधी आदर्श मिलते हैं। हमारे शास्त्रों में जीवित प्राणियों को मारकर अग्नि में होम देने का भी विधान है और जीवमात्र पर दया करने का भी। दोनों ही आदेश पवित्र धर्म ग्रन्थों में मौजूद हैं। वे शास्त्र हमारे परम आदरणीय और मान्य हैं तो भी इनके आदेशों में से हम वही बात आचरण में लाते हैं जो बुद्धि संगत, उचित और आवश्यक दिखाई पड़ती है।

हिन्दू धर्म किसी व्यक्ति या उसके लेख बद्ध विचारों को अत्यधिक महत्व नहीं देता। चाहे वह व्यक्ति कितना ही बड़ा महापुरुष ऋषि महात्मा या ईश्वर ही क्यों न रहा है। हिन्दू धर्म में सिद्धाँतों की समीक्षा और उसके बुद्धि संगत अंश को ही ग्रहण करने की ही परिपाटी का समर्थन किया गया है। किसी बड़े से बड़े व्यक्ति या ग्रन्थ से मतभेद रखने और उसके मन्तव्यों को स्वीकार करने न करने की उसमें पूर्ण सुविधा है। हाँ, किसी की महानता को कम करने की आज्ञा नहीं है। महापुरुषों और पवित्र ग्रन्थों का समुचित आदर करते हुए भी उनकी सम्पत्ति में से बुद्धि संगत अंश को ही ग्रहण करने का आदेश है। इसी आदेश के आधार पर प्राचीन समय में सच्चे जिज्ञासुओं ने सत्य की शोध की है और अब भी वही मार्ग अपनाना होता है।

हिन्दू धर्म में भगवान बुद्ध को ईश्वर का अवतार माना गया है। दश अवतारों में उनकी गणना है। इससे अधिक ऊँचा आदर, श्रद्धा, महत्व और क्या हो सकता है? भगवान बुद्ध भी हिन्दुओं लिए वैसे ही पूज्य हैं जैसे अन्य अवतार। उनके महान् व्यक्तित्व, त्याग, तप, संयम, ज्ञान, साधन के आगे सहज ही हर व्यक्ति का मस्तक नीचे हो जाता है। उनके चरणों पर हृदय के अस्तर से निकली हुई गहरी श्रद्धा के फूल चढ़ा कर लोग अपने को धन्य मानते हैं। इतने पर भी भगवान बुद्ध के विचारों का हिन्दू धर्म में प्रबल विश्वास है। श्री शंकराचार्य ने उनके मत का खण्डन करने का प्राण प्रण प्रयत्न किया है। बौद्ध विचारों उनके सम्प्रदाय को स्वीकार करने के लिए हिन्दू तैयार नहीं है, तो भी उनके व्यक्तित्व भगवान का दर्शन करता है।

बात यह है कि व्यक्तित्व और सिद्धान्त भिन्न-2 वस्तुएं हैं। कोई सिद्धान्त इसलिए नहीं हो सकता कि उसे अमुक महापुरुष ने अमुक ग्रन्थ ने प्रकाशित किया है। इसी प्रकार घृणित व्यक्ति द्वारा कहे जाने या प्रतिपादन जाने से कोई सिद्धान्त अमान्य नहीं ठहरता। कोई चोर यह कहे कि “सत्य बोलना उचित है” तो उसे इसलिए अस्वीकार नहीं किया जा सकता है कि यह बात चोर ने कही है। चोर का व्यक्तित्व भिन्न बात है और ‘सत्य बोलने’ सिद्धाँत अलग चीज है। दोनों को मिला देने पर तो बड़ा अनर्थ हो जायेगा। चूँकि चोर ने बोलने के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है वह सिद्धाँत अमान्य नहीं ठहराया जा सकता। इसी प्रकार कोई बड़ा महात्मा किसी अनुपयोगी बात का उपदेश करे तो उसे मान्य नहीं ठहराया जा सकता। कई अघोरी साधु अभक्ष भक्षण करते हैं, यद्यपि उनकी तपश्चर्या ऊँची होती है तो उनके आचरण का कोई अनुकरण नहीं करते, निश्चय ही व्यक्तित्व अलग चीज है और सिद्धान्त अलग चीज है। महात्मा कार्लमार्क्स, एजिं लेनिन आदि का चरित्र बढ़ा ही ऊँचा था वे विषय के उत्कट विद्वान भी हैं। उनके उज्ज्वल व्यक्तित्व के लिए दुनिया शिर नवाती है पर उनका अनीश्वरवादी मत मान्य नहीं किया जाता।

प्राचीन समय में भी आज की भाँति ही परस्पर विरोधी मत प्रचलित थे। जैसे आज अनेकानेक विचार धाराओं के मतभेद पर बारीक दृष्टि डालकर उसमें से उपयोगी तत्व ग्रहण करने को विवश होना पड़ता है वही बात प्राचीन समय के सम्बन्ध में लागू होती है। आधुनिक महापुरुषों के विचारों से जीवन निर्माण कार्य में हमें मदद मिलती है, उसी प्रकार प्राचीन काल के स्वर्गीय महापुरुषों के लेखबद्ध विचारों से-धर्मग्रन्थों से-लाभ उठाना चाहिए। परन्तु अंध भक्त किसी का नहीं होना चाहिए। यह हो सकता है कि प्राचीन काल की ओर आज की स्थिति में अन्तर पड़ गया है। जिससे तब के विचार आज के लिए उपयोगी न रहे हों, यह भी हो सकता है कि उनने किसी बात को अन्य दृष्टिकोण से देखा हो। और आज उसे किसी अन्य दृष्टि से देखा जा रहा हो। एक समय समझा जाता था कि चातक स्वाति नक्षत्र का ही पानी, पीता है, पर अब प्राणिशास्त्र के अन्वेषकों ने देखा है कि चातक रोज पानी पीता है। हंसों का मोती चुगना, या दूध पानी का अलग कर देना भी अब अविश्वस्त ठहरा दिया गया है। इसी प्रकार अन्य अनेक बातों में भी प्राचीन काल के सिद्धाँतों में और आज की शोधों में अन्तर आ गया है। इन अंतरों के सम्बन्ध में हमें परीक्षक बुद्धि से कोई बात निर्धारित करनी पड़ती है। आधुनिक या प्राचीन होने में ही कोई सिद्धाँत मान्य या अमान्य नहीं ठहरता। शास्त्रकारों का भी यही मत है कि- “बालक के भी युक्ति युक्त वचनों को मान लें परन्तु यदि युक्ति विरुद्ध हो तो ब्रह्मा की भी बात को तृण के समान त्याग दे।”


भ्राँति से मुक्ति के उपाय

(श्री डॉ. दुर्गाशंकर जी नागर संपादक ‘कल्पवृक्ष’)

बुद्धि को तर्क की भूलभुलैयों में डालने से भ्राँति और संशय दूर नहीं होते। आप प्रश्न करेंगे कि क्या भ्राँति रहित कोई प्रदेश है? हाँ अवश्य है, और वह है तुम्हारी अन्तरात्मा। अन्तरात्मा में भ्राँति का सर्वथा अभाव है। अन्तरात्मा में प्रवेश करने से भ्राँति रहित स्थान का अनुभव होता है। भ्राँति वाले विचारों को तिलाँजली दो और शुद्ध शुभ विचारों का सेवन करो। प्रयत्नपूर्वक श्रद्धा सहित उन्हीं में रमण करो। यह अन्तरात्मा में प्रवेश करने का प्रथम सोपान है।

इन्द्रिय और बुद्धि के व्यापार बन्द करके प्रेरक आत्मा में जो स्थिर हो चुके हैं, उन्हीं को आत्म प्रतीति होती है। अतः अपने में कभी भी विक्षेप, उद्विग्नता, भ्राँति का प्रवेश न होने दो। सदा यह समझो कि ईश्वर की सदैव तुम्हारे ऊपर कृपा है। वे आदि पुरुष सदैव तुम्हारे ऊपर सुख शान्ति की वर्षा करते हैं। उच्च स्वर से कहो- “मैं चैतन्य स्वरूप आत्मा हूँ।” इन दिव्य शब्दों को प्रातः काल या सायंकाल स्मृति पट पर अंकित कर लो। इस सत्य की भावना को हृदय में आरुढ़ करने से तुम्हारा जीवन सुख शान्तिमय हो जायगा।


ईश्वर हमारे अन्दर है।

(योगिराज, श्री. शिवकुमार जी शास्त्री)

हमने ईश्वर का दर्शन किया है। पर, इन आँखों से नहीं, ज्ञान से। बाहर नहीं, भीतर। अलग नहीं, अपने में, वह दूसरा नहीं है, हमारी आत्मा है। इसे समझो, और इसके गूढ़ अर्थ पर विचार करो। सच्ची शान्ति और सच्चा आनन्द इसी ज्ञान के भीतर वर्तमान है।

तुम सुख व शान्ति के लिए वृत्त या परिधि की ओर दौड़ते हो- तुम केन्द्र को छोड़ कर संसार में भटकते हो-पर क्या वह शान्ति मिल सकती है? कदापि नहीं।

यदि तुम शान्ति और आनन्द के भूखे हो तो वृत्त, परिधि या संसार को छोड़कर केन्द्र में भीतर-अपने आपमें-मन से सिमट कर स्थित हो जाओ। यहीं शान्ति, आनन्द और सुख का भण्डार है, यहीं सच्चिदानन्द का निवास है।

संसार में केवल दो पदार्थ हैं। एक जड़ दूसरा चेतन। एक अनात्मा दूसरा आत्मा। अनात्मा स्थूल संसार है और आत्मा ईश्वर है। हम और तुम दोनों आत्मा हैं इसलिए हम और तुम दोनों ईश्वर हैं। हम और तुम दोनों आनन्द और शाँति के अगाध समुद्र हैं।

ईश्वर को हम, न आँखों से देख सकते, न कान से सुनते हैं, न नाक से सूँघ सकते, न जिह्वा से स्वाद ले सकते हैं, न हाथ से छू सकते हैं। स्थूल मन भी वहाँ तक नहीं पहुँच सकता। केवल अपने भीतरी ज्ञान और विचार से वहाँ तक नहीं पहुँच सकते हैं। अतः जब उसे विचार करके ध्यान से देखा तो वह हमारी आत्मा के अन्दर था जहाँ शान्ति और आनन्द की लहर सर्वदा उठा करती है।

जो जैसा होता है उसी को अपनी ओर खींचता है। जलराशि समुद्र, भूमण्डल की सब नदियों को अपनी ओर खींच लेता है। लड़कों के पास लड़के, वृद्धों के पास वृद्ध और लुटेरों के पास लुटेरे इकट्ठे हो जाते हैं। अतः सर्वदा प्रसन्न रहो हँसते रहो और आनन्दमय रहो। इसका फल यह होगा कि चारों ओर से संसार का सारा आनन्द और सुख तुम्हारी ओर झुक पड़ेगा, खिंचा हुआ और बहता हुआ चला आवेगा।

जैसे को तैसा खींचता है। समान के पास समान जाता है। गँजेड़ी के पास गँजेड़ी, भँगेड़ी के पास भँगेड़ी और शराबी के पास गाँव भर के शराबी एकत्र हो जाते हैं। मनुष्य के चरित्र का उसकी मित्रमंडली से बहुत कुछ लग सकता है। अतएव यदि हमें सच्चिदानन्द को पास और अपने हृदय में बुलाना है तो हमें स्वयं सच्चिदानन्द बन जाना चाहिये।

समान को अपने समान वाली वस्तुओं के खींचने की अद्भुत शक्ति होती है। पक्षियों के पास, पक्षी, भेड़ियों के पास भेड़िये और हिरनों के पास हिरन आपसे आप जुट जाते हैं। अतः यदि ईश्वर को अपने हृदय में बुलाना है तो पहले हृदय में उन्हीं शुभ गुणों को धारण करो जो ईश्वर में वर्तमान हैं। ईश्वर को खींचने के लिए तुम्हें स्वयं ईश्वर बन जाना चाहिये।

मुक्ति का अर्थ यह नहीं है कि जीव ईश्वर से मिल जाता है या मनुष्यात्मा ईश्वरत्व के समुद्र में डूब मरता है। ऐसा हो तो कोई विचारवान् इस मुक्ति को न चाहेगा। मुक्ति की अवस्था में ज्ञान द्वारा ईश्वर ही जीव में मिल जाता है। जीव ईश्वर में नहीं। जिसको साधारण मनुष्य बिन्दु कहते हैं, वही ज्ञान होने पर समुद्रसावित होता है। इस ज्ञान को समझो बस सुख की सामग्री और आनन्द का समुद्र तुम्हारे भीतर मौजूद है। और तुम सम्राट के भी सम्राट हो।


एक दिन का समय ‘अखण्ड-ज्योति’

(ले.- श्री. सोमेश्वर नाथ भट्टाचार्य एम. ए., कलकत्ता)

अखण्ड-ज्योति के आरम्भ काल से ही उसके संपर्क रखने के कारण-आचार्य जी तथा पाठकों के बीच होने वाले विचार परिवर्तन से निश्चिंत होने के कारण-मुझे मालूम है कि पाठक- अखण्ड-ज्योति तथा आचार्य जी के प्रति कितना प्रगाढ़ आदर तथा सम्मान रखते हैं, कितनी ऊँची दृष्टि से देखते हैं।

जिनका इस अध्यात्मिक प्रकाशन के प्रति प्रेम, अनुग्रह आत्म भाव है, वे अक्सर यह पूछते हैं- “हमारे योग्य कोई हो तो लिखिए।” अखण्ड-ज्योति व्यापारिक नहीं आध्यात्मिक संस्था है। उसकी सेवा यही है कि- सद् विचारों का, सद्ज्ञान का और सदाचार का अधिकाधिक प्रचार एवं प्रसार किया जाय।” इस प्रकार की सहायता एवं सेवा करने से इस संस्थान की उद्देश्य पूर्ति होती है।

अखण्ड-ज्योति पत्रिका को तथा यहाँ से प्रकाशित अन्य साहित्य को अधिक से अधिक व्यक्ति पढ़ें, इस कार्यक्रम में सहयोग देकर अधिक व्यक्ति इस मिशन की सहायता कर सकते हैं। पाठक इसके सम्पादक श्री आचार्य जी का 9 दिसम्बर जन्म दिन है। परिवार के आत्मीयजन उस दिन लिए सद् भावनाएं भेजते हैं। इस अवसर शाब्दिक शिष्टाचार का ही नहीं वरन् का भी परिचय देना चाहिए। ता.9 सक्रिय सहायता के लिए देना चाहिए। उस दिन अखण्ड-ज्योति के नये ग्राहक बढ़ाने के लिए निकलना चाहिए। प्रयत्न करने पर कुछ न कुछ नये ग्राहक अवश्य बढ़ाये जा सकते हैं। नये ग्राहकों का चंदा वसूल करके, अपने चंदे के साथ भेज देना चाहिए। हम लोगों के लिए यह सब बहुत ही सरल है। एक दिन इस धर्म कार्य के लिए दे देने से कोई बड़ा घाटा नहीं आ सकता। पर इससे अखण्ड-ज्योति की शक्ति अनेक गुना बढ़ जाती है।

जो सज्जन पाठक बनते हैं उन्हें अपने आचरण और विचारों में परिवर्तन करते का अलभ्य अवसर मिलता है। लगातार नियमित रूप से जो एक वर्ष अखण्ड-ज्योति को पढ़ लेगा उसके जीवन में सतोगुणी असाधारण परिवर्तन होने अवश्यंभावी हैं। उच्च अध्यात्मिक सत्पुरुष, तपोपूत अन्तःकरण से जिन विचारों को प्रकट करते हैं वे लोगों के मन में तीर की तरह धँस जाते हैं। जीवनों में सात्विक परिवर्तन कराना ब्रह्म यज्ञ है। जो सज्जन अखण्ड-ज्योति के पाठक बढ़ाते हैं वे ब्रह्म यज्ञ का प्रत्यक्ष आयोजन करते हैं। ब्रह्म यज्ञ का पुण्य फल किसी अन्य यज्ञ से कम नहीं है।

अखण्ड-ज्योति को प्रेम करने वाले सज्जनों के लिए यह एक परीक्षा अवसर है। ता. 9 दिसम्बर को आचार्य जी के जन्म-दिवस के उपहार स्वरूप अपना एक दिन का समय देना चाहिए और उस दिन अखण्ड-ज्योति के ग्राहक बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।


झरने का आत्म परिचय

(ले.- श्री आद्याप्रसाद शर्मा ‘शुचि’)


झरने का आत्म परिचय

(1)

झुकी करुणा का सबल, सजल-संचय हूँ, पत्थर का पिघला हुआ कठोर हृदय हूँ। तुम पूछ रहे हो पथिक, आज बतलाऊँ, मैं निर्झर, अपना एक स्वयं परिचय हूँ॥

शत-सहस्र तूफान लिए आया मैं, फिर भी लहरों में गान लिए आया मैं। भिशप्त विश्व के, ऊसर करुणा कर, उर्वरता का वरदान लिए आया मैं॥

(2) यह तोड़-फोड़ दृढ़ पाषाणों की कारा, भरती झर-झर मेरी निर्मल जल-धारा। करने जो गति-अवरोध सामने आया-पाया कब उसने त्राण, प्राण तक हारा॥

सीखा मुझसे कलियों ने नित मुस्काना, नभ ने धरती पर करुणा-जल बरसाना। सीखा नन्दन-कानन की कल कोकिल ने, मेरी लहरों की ध्वनि से मंजुल-गाना॥

(3) न कभी रुकना जीवन में सीखा, मैंने न कभी झुकना जीवन में सीखा। अन्तर में सरस-स्रोत-लहरी जो, इसने न कभी चुकना जीवन में सीखा।

बात सभी निश्चल सहता जाता हूँ, अपनी प्राण-गाथा कहता जाता हूँ। सिन्धु-मिलन की चाह अमिट अन्तर में, उठ-उठकर गिर-गिरकर बहता जाता हूँ॥

(4) हो मधु-प्रभात या सघन-रात बेला, पथ हो निर्जन या लगा हुआ हो मेला। यह देख सकूँ, इतना अवकाश कहाँ है? चलता ही जाता हूँ, अविराम अकेला॥

मेरा आकुल आह्वान सुने मत कोई, मेरे उरके अरमान सुने मत कोई। परवाह नहीं, मुझको बढ़ते जाना है, मेरे जीवन के गाने सुने मत कोई॥

(5) वन-उपवन पार किये हैं मैंने, निर्मित सुख संसार किये हैं मैंने। कृतज्ञ जग, अंगीकार करेगा, उसके अगणित उपकार किये हैं मैंने॥

बढ़ना होता जिनको न सहन है, उनके दुःख पर भी मुझको संवेदन है। अक्सान किन्तु क्यों होगा, जब शक्ति में, प्राणों में स्पन्दन है॥

बढ़ना होता जिनको न सहन है, उनके दुःख पर भी मुझको संवेदन है। अक्सान किन्तु क्यों होगा, जब शक्ति में, प्राणों में स्पन्दन है॥

*समाप्त*