अपने को ‘शरीर’ नहीं, ‘आत्मा’ मानिए।

आप अपने को आत्मा माना कीजिए। ‘मैं’ या ‘हम’, शब्द का अर्थ ‘आत्मा’ है, यह बात अन्तःकरण में बहुत गहराई तक उतार लीजिए, उसे भली प्रकार हृदयंगम कर लीजिए। आपके मस्तिष्क में जो विचार उठते हैं, आपके मन में जो विश्वास जमे हुए हैं उनका सावधानी से निरीक्षण कीजिए और देखिए कि वे “आत्मा” जैसे महान तत्व के गौरव के अनुरूप हैं या नहीं? आप जो काम करते हैं या करना चाहते हैं, विचार कीजिए कि वे परमात्मा के राजकुमार के करने योग्य हैं, उचित हैं तब तो उन्हें प्रसन्नता-पूर्वक ग्रहण करते रहिए। यदि आपका अन्तःकरण कहे कि यह विचार और कार्य तुच्छ हैं, निष्कृष्ट हैं ओछे हैं, आत्म सम्मान के विरुद्ध हैं तो उन्हें साहसपूर्वक परित्याग कर दीजिए, दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर दूर फेंक दीजिए। जिस विचार या कार्य को करने से आपको भय, झिझक, लज्जा, अधर्म, असन्तोष पश्चात्ताप का अनुभव होता हो उसे एक क्षण के लिए भी मत अपनाइये, भले ही उसके द्वारा साँसारिक बड़े से बड़ा लाभ होने वाला हो। जिस विचार या कार्य के करने से आपको प्रसन्नता, आनन्द, उल्लास, सन्तोष, गर्व, महत्व, सम्मान उन्नति, पुण्य का अनुभव होता है। उसे अपनाने में एक क्षण के लिए भी विलम्ब मत कीजिए, भले ही उसके द्वारा कोई साँसारिक घाटा, हानि दिखाई देती हो, यही आत्म-ज्ञान का सीधा सा मार्ग है।


वैराग्य का तत्व

संसार की वस्तुओं में मालिकी के विचार रखने से उनका दुरुपयोग होता और संसार के समस्त पदार्थों को ईश्वर की वस्तु समझ कर उनका खजांची रहते हुए कार्य करने से सामग्री का उपयोग धर्म, न्याय और सुख के कार्यों में होता है। साँसारिक वस्तुओं से वैराग्य करना, उनका ठीक प्रकार उपयोग करने की कला सीखना है। लेकिन आज तो कर्त्तव्य त्यागी को वैरागी कहने की प्रथा उठ खड़ी हुई है।

वैराग्य का सारा रहस्य निष्काम कर्मयोग में छिपा हुआ है। मानव जाति के सबसे महान दर्शन शास्त्र गीता ने निष्काम कर्म योग पर ही सबसे अधिक बल दिया है। संसार में हमें किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें गीताकार का भावार्थ भली प्रकार समझने की चेष्टा करनी चाहिए। निष्काम और कर्म योग यह दो शब्द हैं। निष्काम से तात्पर्य अलग रहने, न मिल जाने, निर्लिप्त रहने से है। कर्म योग का तात्पर्य कर्त्तव्य धर्म पालन करने से है। जीव का धर्म यह है कि वह विकास के निमित्त अहंभाव का प्रसार करे। अपनी आत्मीयता को दूसरों तक बढ़ावे, अपने स्वार्थों को दूसरों के स्वार्थों से जोड़ने के दायरे को बढ़ाया जाय। यह आध्यात्मिक उन्नति यदि वास्तविक हो तो वह आदमी अपनी शक्तियों का अधिक से अधिक भाग दूसरों की सेवा में लगाता है और कम से कम भाग अपने लिए रखता है। अर्थात् वह सेवाधर्म अपना लेता है और परोपकार में रत रहता है। उसका दृष्टिकोण संकुचित स्वार्थ पूरा करने का नहीं होता वरन् उदारता सहित परमार्थ को लिए हुए होता है। जो जितना ही परमार्थ चिन्तक है वह उतना ही बड़ा महात्मा कहा जायगा।

हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों को ठीक तौर से पहचानने में लोग बड़ी भूल करते हैं। उनकी दृष्टि इतनी ही पहुँचती है कि ऋषि मुनि नगरों से दूर जंगलों में रहते थे और फल−फूल खाकर तथा वल्कल वसन पहनकर जीवन यापन करते थे। आजकल के साधु नामधारी तथाकथित वैरागी अपना वैराग्य उसी की नकल का बनाते हैं। जीवन की आवश्यकताएं तो घटाते हैं पर बची हुई शक्ति को परमार्थ में नहीं लगाते, वरन् दंभ, आलस्य, प्रमाद और धूर्तता पर उतर आते हैं इसलिए उनका जीवन साधारण गृहस्थ से भी नीचे दर्जे का बन जाता है। यही कारण है कि साधु वेशधारी भिखमंगों को गली-कूचों में हम कुत्तों की तरह दुरदुराता हुआ देखते हैं। ऋषि मुनियों के जीवन पर गंभीरता पूर्वक दृष्टिपात किया जाय तो उनकी सच्ची आत्मोन्नति के प्रमाण प्रत्यक्ष हो जाते हैं। जंगलों में जाकर, रूखा सूखा खाकर, नंगे उघाड़े अजगरों की तरह वे नहीं पड़े रहते थे वरन् वहाँ जाकर जनसाधारण की सेवा के लिए अधिक से अधिक काम करते थे। योगी द्रोणाचार्य ने शस्त्र विद्या में स्वयं पूर्णता प्राप्त की और अनेकों अधिकारियों को उस विद्या में पारंगत बनाया। योगी चरक ने चिकित्सा शास्त्र की अन्यतम शोध की, योगी सुश्रुत ने शल्य क्रिया (सर्जरी) का आविष्कार किया, पाणिनी ने व्याकरण शास्त्र निर्माण किया, आर्य भट्ट ने खगोल विद्या के मर्मों की खोज करके ज्योतिष शास्त्र बनाया, योगी वशिष्ठ ने अपने उपदेशों से राम जैसे राजकुमार को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम बना दिया, योगी परशुराम ने अपने प्रचंड बाहुबल से पृथ्वी को अत्याचारियों के रक्त से रंग दिया, योगी नारद का प्रचार कार्य इतना प्रबल था कि वे एक घड़ी से अधिक एक स्थान पर नहीं ठहरते थे और उस युग में जो कार्य अनेक अखबार और पब्लिक सिटी ऑफिसर मिलकर नहीं कर पाते उस समय सारा काम अकेले नारद कर लेते थे। योगी विश्वामित्र ने अलग ही सृष्टि रच दी, योगी व्यास ने अष्टादश महापुराण रचे, जिनमें गीता जैसे अनेक रत्न छिपे पड़े हैं। योगिराज कृष्ण ने महाभारत जैसे संग्राम को कराया। योगी चाणक्य ने अर्थशास्त्र और कूटनीति शास्त्र के अपूर्व विज्ञान की रचना की। एक भी योगी का जीवन ऐसा नहीं पाया जा सकता जिसमें लोक सेवा के महान कार्य समन्वित न हों। आत्म शक्ति की उन्नति के लिए वे योगाभ्यास भी करते थे पर वह होता इसी प्रकार था जैसे प्रातःकाल अधिक काम करने की शक्ति प्राप्त करने लिए हम रात को निद्रा लेते हैं, या कुश्ती लड़ने का बल बढ़ाने के लिए दूध पीते हैं, रहन-सहन को कम खर्चीला वे इसलिए बनाते थे कि अपने निजी झंझटों को पूरा करने के लिए कम परिश्रम करना पड़े और अपनी अधिकाँश शक्ति का उपयोग लोक सेवा के निमित्त हो सके। यह मानना भी गलत है एक हमारे ऋषि महात्मा स्त्री पुत्रों को त्याग देते थे। जिसने अविवाहित जीवन बिताया हो। अन्यथा पुराण साक्षी है कि सभी ऋषियों के स्त्रियाँ और सताने मौजूद थीं। शंकर जैसे योगेश्वर के दो विवाह हुए और उनके बाल बच्चे भी मौजूद थे।

महर्षियों के जीवन पर थोड़ा सा प्रकाश इसलिए डाला गया है कि नकलची लोग पूरी बात को समझें और तब उसका अनुकरण करें। बाल बच्चों को भटकता छोड़ कायरता के साथ कर्त्तव्य धर्म की अवहेलना करते हुए घर त्याग कर भाग जाना और भगवान का भजन करने की झूँठी आत्मवंचना के बहाने भीख टूक खाकर अकर्मण्यतापूर्वक जीना न तो योग है, न संन्यास, न स्वार्थ है, न परमार्थ। यह एक प्रकार की आत्म हत्या है। जिसे अल्प शिक्षित या अशिक्षित व्यक्ति, स्वार्थी कनफूका गुरुओं के बहकावे में आकर स्वीकार कर लेते हैं और अपने बहुमूल्य जीवन की आलस्य और प्रमाद की छुरियों से निर्दयतापूर्वक हत्या कर डालते हैं। वैसे तो आज भी थोड़े बहुत सच्चे महात्मा इन साधु वेशधारियों के बीच मिल सकते हैं जो स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ को महत्व देते हैं और अहंकार के नशे में इठे फिरने की बजाय नम्रता और सेवा का परिचय देते हैं। ऐसे महापुरुष उसी प्रकार पूजनीय हैं जैसे कपिल कणाद। हमारा विरोध तो उन भिखमंगों से है जो वैराग्य के पवित्र नाम को कलंकित करके प्रमाद की उपासना करते हैं और जनसाधारण के मन में यह झूठी धारणा पैदा करते हैं कि वैरागी वही है जो घरबार छोड़ कर निरुद्देश्य मारा मारा फिरे और भजन की झूठी आत्मवंचना करता हुआ स्वार्थी जीवन बितावे।

जीवन विकास के लिए अहंभाव का प्रसार आवश्यक है। परमार्थ में स्वार्थ को घोलते जाना, अपने लिए कम दूसरे के लिये ज्यादा की उदार वृत्ति को अपनाते जाना बस एक मात्र यही जीव का धर्म है। धर्म के सारे अंग-उपाँग इसी परिभाषा के अंतर्गत आ जाते हैं। त्याग, सहानुभूति, प्रेम, दया, उदारता आदि सत् वृत्तियाँ विकास धर्म की किरणें हैं। सम्पूर्ण धर्म शास्त्र इसी एक बिन्दू के आप-पास उसी प्रकार घूम रहे हैं जैसे ध्रुव के चारों ओर अन्य नक्षत्र घूमते हैं। आप संसार से विरक्त रहिए, पर प्राणियों को आत्म तुल्य समझ कर उनकी अधिकाधिक सेवा के मार्ग पर बढ़ते चलिए। स्त्री के, पुत्र के, कुटुम्बियों के शरीरों को नाशवान समझिए पर उनके जीव की उन्नति में भरपूर सहायता कीजिए। उनकी आवश्यक सुविधाओं का उसी प्रकार ध्यान रखिये जैसे अपनी सुविधा का रखते हैं। इस आत्म प्रसार के दायरे को क्रमशः बढ़ाते चलिए। जिन सुखों को प्राप्त करने की इच्छा अपने लिए करते हैं उन्हीं की दूसरों के लिए इच्छा करिए। सहृदय माता घर में बने हुए खीर खाँड़ के भोजन पहले अपने बालकों को कराती है तब बचा खुचा आप खाती है। आप जब विकास धर्म का पालन करेंगे तो ऐसी ही उदार एवं सहृदय माता बन जावेंगे। विश्व के अन्य प्राणी आपके बालक होंगे। आपका सारा वैभव अल्प बुद्धि वाले, अल्प साधन वाले, अल्प शक्ति वाले, अल्प वैभव वाले, प्राणियों के काम आवेगा तब कहीं बचा खुचा भौतिक सुख आप अपने लिए चाहेंगे। खीर खाँड खाकर प्रसन्न हुए बच्चों का प्रफुल्ल मुख देखकर माता का हृदय आनन्द से भर जाता है अशक्त प्राणियों की सेवा में अपना वैभव उत्सर्ग करे देने के पश्चात् आपके अन्तःकरण में आनन्द की लहरे उठने लगेंगी।

नश्वर संसार का उपदेश है कि वैरागी बनिए। वैरागी का अर्थ है संसार के पदार्थों की नश्वरता को समझते हुए उनका उपयोग विकास धर्म की पूर्ति के लिए परमार्थ में कराना। स्वार्थ को, लोभ को, तृष्णा को कम करके परमार्थ के विचार और कार्यों में निरन्तर लगे रहना ही सच्चा वैराग्य है।

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मनुष्य विवेक शील और न्याय परायण होने के कारण मनुष्य है। किन्तु प्रेम और उदारता की भावनाओं को विकसित करके वह देवता भी बन सकता है।

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स्वयं विचार करना सीखिए।

(डॉक्टर दुर्गाशंकर जी नागर सम्पादक ‘कल्पवृक्ष’)

जब तक तुम दूसरों के बल पर खड़े रहोगे, दूसरों की सम्मति से कार्य करते रहोगे, अपने मस्तिष्क को दूसरों के आधीन कर दोगे, अपने को महत्वहीन समझोगे और अपने आप विचार करना नहीं सीखोगे तो तुम्हारा मस्तिष्क जड़ हो जायगा, बुद्धि मंद हो जायगी। जब तक मनुष्य दूसरों पर निर्भर रहता है, तब तक वह अपनी शक्तियों को नहीं पहचानता। जिस शक्ति से मनुष्य नई-नई बातें निकालता है, आविष्कार करता है, उसका विकास स्वयं विचार करने से होता है।

अपना विचार कार्य स्वयं अपने आप करना, दूसरों पर आश्रित न रहना, अपने पैरों आप खड़े होना अपनी विचार शक्ति को विकसित करना और शरीर तथा मन को सशक्त और पुष्ट बनाना जीवन तत्व की वृद्धि करना है।

जो अपने मस्तिष्क के काम को बंद कर देता है, वह अपना नाश आप करने लगता है। मस्तिष्क की वृद्धि, ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा जो भिन्न-भिन्न अनुभव मन में प्रवेश करते हैं उनको एकत्रित कर नवीन भावना, नवीन विचार, नवीन मानसिक स्थिति, नवीन अभिप्राय प्रकट करने से ही होती है।

प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व वायु सेवन के लिए बाहर जंगल में चले जाना चाहिए। सिर खोलकर सिर तथा छाती को सीधी तथा समान करके घूमना चाहिए। प्रातःकाल की ठंडी हवा से तुम्हारा दिमाग ताजा हो जायगा। फिर किसी ऊँचे स्थान पर बैठकर दीर्घ श्वास-प्रश्वास की क्रिया करनी चाहिए। ऐसा करने से विचारने तथा सोचने की शक्ति अधिक प्राप्त होगी। इस प्रकार श्वास प्रश्वास की क्रिया करने से तुममें प्राण-तत्व का अधिक प्रवेश होगा। मस्तिष्क के भूरे रंग के द्रव्य को पुष्कल शुद्ध रक्त पोषण के लिए प्राप्त होगा।


तुम महान हो।

(ले.- डॉ. रामचरण महेन्द्र, एम. ए. डी. लिट् डी. डी.)

तुम्हारा वास्तविक स्वरूप

तुम्हारे हिस्से में स्वर्ग की अगणित विभूतियाँ आई हैं न कि नर्क की कुत्सित यातनाएँ और तुमको वही लेना चाहिये जो तुम्हारे हिस्से में आया है। स्वर्ग तुम्हारी ही सम्पत्ति है। शक्ति तुम्हारा जन्म-सिद्ध अधिकार है। तुमको केवल स्वर्ग में प्रवेश करना है तथा शक्ति का अर्जन कर लेना है। स्वर्ग में सुख ही सुख है। वहाँ आत्मा को न तो किसी बात की चिन्ता रहती है न किसी प्रकार की इच्छा। वहाँ तो अखण्ड शाँति, अखण्ड पवित्रता तथा अखण्ड तृप्ति है। तूफान मचाने वाले विकारों की आसुरी लीला, या भय के भूतों का लेश भी वहाँ नहीं है। वह स्वर्ग इस संसार में ही है। वह तुम्हारे भीतर है। उसे खोजने का प्रयत्न करो, अवश्य तुम्हें प्राप्त हो जायगा।

संसार में फैले हुए पाप, निकृष्टता, भय शोक तुम्हारे हिस्से में नहीं आये हैं। मोह, शंका, क्षोभ की तरंगें तुम्हारे मानस-सरोवर में नहीं उठ सकती क्योंकि विक्षोभ उत्पन्न करने वाली आसुरी प्रवृत्तियों से तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं। संशय तथा शंकाओं से दबकर तुम्हें इधर उधर मारा-मारा नहीं फिरना है। क्षण-क्षण उद्विग्न तथा उत्तेजित नहीं होना है, शान्त तथा पवित्र आत्मा में क्लेश, भय, दुःख, शंका का स्पर्श कैसे हो सकता है? यदि तुम इन कुत्सित वस्तुओं को अपनाओगे तो अवश्य ही ये तुम्हारे गले पड़ेंगे और तुम्हारे जीवन की तुम्हारी महत्वाकाँक्षा की, तुम्हारे भावी जीवन की इतिश्री कर देंगे।

तुम्हारा मनुष्य होना ही इस बात का प्रमाण है कि तुम्हारी शक्ति अपरिमित है। संसार की ओर आँख उठाकर देखो। प्रकृति पर मनुष्य का आधिपत्य है, बड़े से बड़े पशु उसके इंगित पर नृत्य करते हैं। ऊँची से ऊँची वस्तु पर उसका पूर्ण आधिपत्य है। उससे शक्तिशाली प्राणी पृथ्वी पर दूसरा नहीं है। उसकी बराबरी करने वाले अन्य जीव की सृष्टि नहीं हुई। मनुष्य पशुओं का राजा है।

एक कवि कहता है- “मनुष्य! तू कितना शक्तिशाली है। तेरी सृष्टि में उस दैवी कलाकार ने अपनी कला की इतिश्री कर दी है।”

“तेरे प्रत्येक भाग में शक्ति का अस्तर लगाया गया है, और वह इसलिए कि तू निर्भयता से पृथ्वी पर राज्य कर सके ।”

“तेरे बल का पारावार नहीं, जिन साधनों से सम्पन्न करके तुझे पृथ्वी पर भेजा गया है वे अचूक है, उनके आगे कोई ठहर नहीं सकता।”

“तुझमें शारीरिक शक्ति का भण्डार है, तेरे हाथ पाँव, छाती, पुट्ठों में शक्ति इसीलिए दी गई है कि कोई तुझे दबा न सके, तेरी बराबरी न कर सके, जहाँ तेरी शारीरिक सम्पन्नता कार्य न करे, वहाँ कार्य के लिए तुझे बुद्धि की असीम शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। इनकी ताकत अनेक इंद्रवज्रों से उत्कृष्ट हैं। इनके आगे दूसरे की नहीं चल सकती।”

“तुझमें असीम सामर्थ्य वर्तमान है, शक्ति का वृहत पुँज भरा पड़ा है। तुझे किसी के आगे हाथ पसार कर माँगने की आवश्यकता नहीं है। तुझे किसी देव की कृपा सम्पादन की आवश्यकता नहीं है। संसार के क्षुद्र आघात प्रतिघातों में इतनी हिम्मत नहीं कि तुझे विचलित कर सकें।”

“तू निष्पाप है, तू आनन्द है, तू अविनाशी आत्मा है, तू सच्चिदानन्द रूप है, तू शोक रहित, भय रहित, नित्य मुक्त स्वभाव वाला देव है। न दुःख, न क्लेश, न रंज, न भूत, न प्रतिद्वंद्वी-तुझे अपने जन्म जाति अधिकारों से कोई विचलित नहीं कर सकता। वासनाएँ तुझे मजबूर नहीं कर सकती।”

“तू ईश्वर का महान् पुत्र है। ईश्वर की शक्ति का ही तेरे अंदर प्रकाश है। तू ईश्वर को ही अपने भीतर से कार्य करने दे। ईश्वर को स्वयं प्रकाशित होने दें। ईश्वर जैसा ही बन कर रह। ईश्वर होकर खा, पी, और ईश्वर होकर ही साँस ले, तभी तू अपनी महान् पैतृक सम्पत्ति का स्वामी बन सकेगा।

कुछ मनुष्यों की भूल

परमेश्वर ने मनुष्य को परम निर्भय बनाया था। वह पशु जगत् का अधिपति डरपोक रहकर क्यों कर राज्य कर सकता था? समाज के प्रतिबंधों ने उसे डरपोक बना दिया है।

संसार के असंख्य व्यक्ति आज जिस मानसिक व्यथा से क्षुब्ध हो रहे हैं वह मनोजनित की रोग-भय है। मनुष्य के मन की निर्बल आदतों को जन्म देने वाला अन्य कोई नहीं केवल भय ही है। अविश्वास, अकर्मण्यता, अधैर्य, ईर्ष्या, असंतोष, मन की चंचलता तथा ऐसे अनेकों मनोजनित रोग केवल भय की ही विभिन्न स्थितियाँ है। भय से उद्भूत कुत्सित मनोवृत्तियाँ उपयोगी पुरुषार्थ को जड़ मूल से नष्ट कर देती हैं। केवल एक भय को अन्तःकरण से उखाड़ फेंकने से अनेक अवगुण स्वयं विनष्ट हो जाते हैं।

शेक्सपीयर निर्देश करता है- “यदि तुम अपनी कमजोरी से, अपने शत्रुओं से, अपनी निर्बलताओं से डरोगे, तो तुम्हारे शत्रुओं को तुम्हारे विरुद्ध बल प्राप्त होगा तथा तुम्हारी भूलें स्वतः तुम्हारे ही सामने तुम्हारे खिलाफ युद्ध करने को प्रस्तुत हो जायेंगी।”

मनुष्य की महत्वाकाँक्षाओं को चूसने वाला भय महाराक्षस है। भय की मनोस्थियाँ हमारे शुभ्र विचारों, साहसपूर्ण प्रयत्नों तथा उत्तम योजनाओं को एक क्षण में चूर्ण-चूर्ण कर डालती हैं। मिथ्या भय की भावना ने सहस्रों जीवनों को नष्ट-भ्रष्ट कर धूल में मिला दिया है। स्निग्ध पुष्प के समान विकसित होने वाले अनेक सद्गुण भय की एक ठेस पाकर क्षत-विक्षत हो गये हैं।

आज के अनेक पुरुष किसी आती हुई आपदा की भावना के कारण आवेगपूर्ण रहते हैं। भविष्य की चिन्ता ही हमारे जीवन को कंटकाकीर्ण बनाती है। जिन चिन्ताओं के कारण हम महीनों पहले विक्षुब्ध रहते हैं, वह कभी-कभी बिल्कुल आती ही नहीं तथा कभी स्वयं अपने आप टल जाती है।

प्रकृति इतनी दयालु, इतनी कुशल, इतनी शक्तिशाली है कि उसने आने वाली आपत्तियों को झेलने की शक्ति प्रचुर मात्रा में हमें प्रदान की है। अपनी अज्ञानता के कारण हम इस कोष को खोलते नहीं।

भय एक स्वार्थी विकार है। सैकड़ों नवयुवकों के आशापूर्ण हृदयों को इसने अंधकारपूर्ण बनाया है। भय के साथ मनुष्य अभ्युदय के मार्ग पर आरुढ़ नहीं हो सकता। भय आशा के अंकुर को अंकुरित नहीं होने देता तथा नित्य इच्छा शक्ति को निर्बल किया करता है।

भय की उत्पत्ति

संक्षय भय का बीज है। अश्रद्धा तथा संक्षय (Indecision) मिलकर शक या शुबा (Doubt) उत्पन्न करती हैं। यही बढ़ते बढ़ते भय (Fear) में परिणत हो जाता है। भय का विकास क्रमशः होता है। संक्षय का बीज क्षुद्र कठिनाइयों तथा अड़चनों के योग से परिवर्तित होते हैं। कितनी ही बार तो यह इतना सूक्ष्म होता है कि हमें बोध भी नहीं होता। कब इसका बीज लगा कब यह विष वृक्ष विकसित हुआ यह पूर्णत्व पर ही हमें ज्ञान होता है।

भय की सन्तानें

भय की प्रथम सन्तान चिंता है। चिंता तथा चिता का बड़ा सम्बन्ध है। दूषित अंतःकरण का व्यक्ति चिंता की कालिमा से कलंकित रहता है। ऐसे अन्तःकरण में अपने अकल्याण व अनेक कल्पनाएँ उठा करती हैं। चिन्ता के कारण मनुष्य में कायरता तथा भीरुता का पदार्पण करता है। ये मनुष्य में भारी दोष माने जाते हैं। चिंता मनुष्य के उत्साह को नष्ट कर डालती है।

भय की दूसरी सन्तान है अकर्मण्यता। उस विषैले प्रभाव से हमारी कोई भी सद्प्रेरणा, कोई भी आकाँक्षा, तथा कोई भी नवीन प्रयोग सफल नहीं हो पाता। मन की सद् कल्पनाएँ जहाँ की तहाँ विमूर्छित हो जाती हैं। अकर्मण्यता का प्रवेश होते ही ‘मैं कार्य क्षमता रखता हूँ’ ‘मैं संसार को हिला डालूँगा’ ‘मुझमें पर्याप्त शक्ति है,’ इत्यादि दृढ़ निर्देशों (Suggestions) के स्थान पर “मैं नहीं कर सकूँगा,” मेरा साहस नहीं होता, अरे, मेरे पास अमुक वस्तु तो है ही नहीं, अब काम कैसे होगा, यह तो मुझसे न हो सकेगा, जो भाग्य में लिखा है वही होगा, करने या न करने वाला मैं कौन होता हूँ। इस प्रकार के संक्षय घर कर लेते हैं।

जब एक बार तुम “मैं नहीं कर सकूँगा”- कहते हो तो तुम्हारा अव्यक्त (nconscious mind) मन एक शीघ्र ग्राहक फोटोग्राफी प्लेट (Sensitive plate) की तरह उस चित्र को पकड़ लेता है। फिर जितने भी अवसर तुम्हें प्राप्त होते हैं सब में विकृत चित्र दिखाई देते हैं। जैसे-जैसे यह भावना दृढ़ होती जाती है, वैसे-वैसे अवस्था असाध्य होती जाती है।

आत्महीनता की ग्रन्थि

भय जब स्वभाव का एक विशिष्ट अंग बन जाता है तो मनः प्रदेश में एक प्रकार की ग्रन्थि (Complex) का निर्माण होता है। इस जटिल ग्रन्थि द्वारा मनुष्य की प्रगति में बड़ी बाधा पहुँचती है। अज्ञात मन में स्थित रहने के कारण ऐसा व्यक्ति खुलेआम उसका अनुभव नहीं करता। कोई उससे कहे कि तुम अपने आप को कमजोर, दीन, हीन समझते हो, तो वह कदापि विश्वास नहीं करता। समाज के व्यवहार में उक्त ग्रन्थि की जो प्रतिक्रियाएँ (Reactions) होती हैं उनके द्वारा ही हीनत्व की भावना से ग्रस्त व्यक्ति के स्वरूप का ज्ञान होता है।

हीनत्व की ग्रन्थि की प्रतिक्रियाएँ

प्रत्येक व्यक्ति के दैनिक जीवन में इस ग्रन्थि के फलस्वरूप अनेक प्रतिक्रियाएँ हुआ करती हैं। मैंने अनेक ऐसे नवयुवक देखे हैं, जो लज्जावश किसी भयानक दोषी की भाँति मुँह छिपा दारुण मानसिक यातना, घोर अपमान, निरादर एवं ग्लानि का अनुभव किया करते हैं। इस दुर्बलता की ग्रन्थि के कारण देश के लाखों हीरे सार्वजनिक अथवा सामाजिक क्षेत्र में पदार्पण नहीं कर पाते। उनकी आकांक्षाएं, महत्वाकाँक्षाएँ और उमंगे अधखिली कलिका की भाँति असमय में ही मुर्झा जाती हैं।

कितने ही व्यक्ति विक्षिप्त जैसे कार्य भी इसी ग्रन्थि के कारण किया करते हैं। बेढंगे व्यवहार अटकना, अंग-प्रत्यंगों का अप्राकृतिक संचालन प्रायः इसी ग्रन्थि के कारण होते हैं। सनकीपन (Eecentricity) तथा अनेक विवेक शून्य कार्य इसी की प्रतिक्रियाएँ हैं।

एक व्यक्ति के विषय में यह विख्यात हुआ कि वह बड़ा अच्छा गाता है। लोग उससे गाने के लिए आग्रह करते किन्तु वह टालमटोल करता। भाँति-भाँति के बहाने बनाता। बाद में ज्ञात हुआ कि वह गाना नहीं जानता था। साथ ही आत्महीनता की ग्रन्थि से ग्रसित था। टालमटोल तथा बहानेबाजी भी आत्मा हीनता की प्रतिक्रियाएँ हैं।

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दूसरों का सौभाग्य देख कर ईर्ष्या मत करो। दुनिया में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो तुम्हारा स्थान पाने के लिए लालायित हैं।

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वह मनुष्य विवेकवान है जो भविष्य से न तो आशा रखता है और न भयभीत ही होता है।

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दानी होने से पहले विचारवान बनना अत्यन्त आवश्यक है। बिना विचारे अनाधिकारी को दान देना धन का दुरुपयोग करना है।

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गायत्री का अर्थपूर्ण संदेश।

गायत्री के मंत्र का शाब्दिक अर्थ भी इतना महत्वपूर्ण है कि उसकी महत्ता असाधारण प्रतीत होती है। एक-एक शब्द ऐसा नपा तुला है कि मानव जीवन में जिन तत्वों की सर्वोपरि आवश्यकता है उन्हीं की ओर मन्त्र में ध्यान दिलाया गया है, उन तत्वों को प्राप्त करने और सुरक्षित रखने की प्रेरणा की गई है।

अब आइये, गायत्री मंत्र के एक-एक शब्द का अर्थ करें-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

ॐ (ब्रह्म) भूः-(प्राण स्वरूप) भुवः-(दुःख नाशक) स्वः-(सुख स्वरूप) तत्-(उस) सवितुः-(तेजस्वी-प्रकाशवान्) वरेण्यं-(श्रेष्ठ को) भर्गो-(नाशक) देवस्य-(देने वाले को, दिव्य को) धीमहि-(धारण करें) धियो-(बुद्धि) यो-(जो) नः-(हमारी) प्रचोदयात्-(प्रेरित करे)

अर्थात्- उस सुख स्वरूप, दुःख नाशक, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पाप नाशक, प्राण स्वरूप ब्रह्म को हम धारण करते हैं। जो हमारी बुद्धि को (सन्मार्ग की ओर) प्रेरणा देता है।

“हम अपने अन्दर प्राण स्वरूप ब्रह्म को धारण करें,” यह इस मन्त्र का मुख्य उपदेश है। असंख्य मनुष्य चलते-फिरते पुतले की तरह जीते हैं। उनमें जान तो है पर प्राण नहीं है। निष्प्राण व्यक्ति, ‘जीवित मृतक’-बन कर जीवन को जीना मनुष्यता को कलंकित करना है। ऐसा जीवन भू-भार बढ़ाना है। जीवन परमात्मा की आत्म गौरव के अनुरूप नीति से जीवित रहना चाहिए।

प्राण युक्त- जीवट दार-महानता से भरा हुआ, जीवन-जीना मनुष्य का कर्त्तव्य है। इस कर्त्तव्य की ओर ही वेद माता गायत्री ने संकेत किया है।

ब्रह्म- जिसको प्राप्त करने के लिए योगी जन सदा प्रयत्न करते रहते हैं। वह ब्रह्म कोई दूर की वस्तु नहीं है, वह प्राण स्वरूप है। जिसने प्राण को धारण कर लिया। जिसके पास प्राण है उसके पास ब्रह्म है। इस ‘जान’ और ‘प्राण’ के भेद को भली प्रकार समझने की आवश्यकता है। जान रहने से चलना, फिरना, सोना, उठना, बैठना, आहार, निद्रा, भय, मैथुन आदि की क्रियाएँ होती रहती हैं। वृक्ष, वनस्पति, उद्भिज कीट-पतंग आदि में जान होती है, यह जानदार होते हैं परन्तु जिस प्राण का ‘भूः’ शब्द में संकेत किया गया है वह भिन्न प्रकार है। वह मानवोचित महत्ताओं का, आध्यात्मिक विशेषताओं का द्योतक है। यह तत्व जिसमें जितनी अधिक मात्राओं में होता है, वह उतना ही उच्च उन्नतिशील गिना जाता है। शास्त्रों में ब्रह्म हत्या को सर्वोपरि पाप माना गया है, वह इसलिए कि जिसमें ‘भू’ तत्व, प्राण तत्व, आध्यात्मिक उच्च तत्व, अधिक है, वह अति मानव है महापुरुष है, साधारण जानदार जीवों से अधिक ऊँचा है, अज्ञानी और अविवेकी मनुष्यों से भी अधिक ऊंचा है। ब्रह्म को-सत्प्राण को-अधिक मात्रा में धारण करने वाला ही ब्राह्मण है। ऐसे ब्रह्मभूत ब्राह्मण की हत्या को ‘सर्वोपरि पाप’ शास्त्रों ने ठीक ही कहा है। इन अति मानव ब्राह्मणों की सत्कारणीय और पूजनीय भी ठीक ही कहा है।

यों तो ‘जान’ को भी प्राण कहते हैं। जानदार जीव को, प्राणी कहा जा सकता है परन्तु ‘भूः’ शब्द द्वारा जिस प्राण का गायत्री में उल्लेख है, वह ब्रह्म स्वरूप है। इस प्राण को समझने में किसी प्रकार का भ्रम एवं सन्देह न रहे इसलिए उसके लक्षणों को भी मंत्रकार ने स्पष्ट कर दिया है। दुःख नाशक, सुख स्वरूप, तेजस्वी, प्रकाशवान, श्रेष्ठ, पाप नाशक, देने वाला-दिव्य, यह विशेषताएँ जिस प्राण में हों वहीं भूः है, इन गुणों का अन्तःकरण में सुदृढ़ समावेश हो जाना ही ब्रह्म-प्राप्ति है।

यदि हम गायत्री के उपदेशानुसार ‘भूः’ तत्व रूपी ब्रह्म को प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें उन गुणों को ढूँढ़-ढूँढ़ कर अपने अन्दर भरना होगा जो कि उसके गुण हैं। जिसमें असुरता के गुण अधिक हो जाते हैं वही असुर कहलाने लगता है, यक्ष, गंधर्व, किन्नर योगी, यती, ब्रह्मचारी पिशाच, हत्या, गायक, दुराचारी आदि विशेषण गुणों के आधार पर मिलते हैं, जिसमें जो गुण अधिक हो जाते हैं उसको उसी नाम से पुकारा जाने लगता है, उसके अन्दर दुराचार, पिशाचत्व ब्रह्मचर्य आदि तत्वों की स्थिति मान ली जाती है। भूः तत्व धारण करना कोई आभूषण, वस्त्र, सूत्र, कवच, तिलक कंठी आदि धारण करना नहीं है जिसमें भूः तत्व के गुण आ गये समझ लीजिए कि उसमें प्राण स्वरूप ब्रह्म की धारण हो गई। वायु में शीतलता, शरबत में मिठास, मिर्च में तीखापन दिखाई नहीं पड़ता, परन्तु गुणों को देखकर यह कहा जाता है कि इसमें यह पदार्थ विद्यमान है, इसी प्रकार भूः तत्व की धारणा हुई है या नहीं यह बात आँखों से दिखाई नहीं देती तो भी उस तत्व के गुणों का समावेश हुआ है या नहीं यह देखकर आसानी से जानी जा सकती है।

गायत्री ने मतानुसार ब्राह्मी-स्थिति वह स्थिति है जिसमें मन से दुखों की समाप्ति हो जाती है और सुख का अनुभव होता रहता है, जिसमें मन तेजस्वी और प्रकाशवान बनता है, कायरता, भय, झिझक को हटाकर स्वतन्त्रता की ओर बढ़ता है, अन्धकार अज्ञान और अविवेक को छोड़ कर प्रकाश की ओर चलता है। जीवन को बहिर्मुखी बना कर इन्द्रिय भोगों की सामग्री जुटाने तथा नीच वृत्तियों की तृप्ति करने में न लग कर उद्देश्यमय, सिद्धाँत सम्मत, कर्त्तव्य धर्म से परिपूर्ण, अन्तर्मुखी बनने की श्रेष्ठता ग्रहण करता है। वह पाप भावनाओं को अपवित्र विचार और कार्यों को, अपने पास नहीं फटकने देता। संसार को कुछ देते रहना, दूसरों की सेवा करते रहना, परोपकार में रख लेना, उसका स्वभाव बन जाता है। देव लोग दिया करते हैं-साधारण वस्तुएं नहीं-दिव्य वस्तुएँ सद्ज्ञान, सदुपदेश, सन्मार्ग का प्रसार जो अपनी कथनी और करनी दोनों के द्वारा करता है वह देव है ऐसा देवत्व भी भूः तत्व के धारण करने वालों में होता है।

हमें तुच्छ, मायाबद्ध, कुटिल, खल, कामी, नश्वर आदि विशेषणों वाले ‘जीव भाव’ से ऊंचा उठा कर सत् चित्, आनन्दमयी ब्राह्मी-स्थिति में जागृत होना चाहिये। हम साधारण से साँसारिक हानि लाभों से अपने आपको दुखी न बनावें, भौतिक पदार्थों का स्वभाव ही बिगड़ना, बदलना और परिवर्तन होना है, इस स्वभाव को कायम रखना सृष्टि संचालन के लिए अनिवार्य है। यदि वस्तुएँ ज्यों की त्यों एक ही अवस्था में बनी रहें तो आगे का निर्माण कार्य रुक जायगा। यदि धन जहाँ का तहाँ रुक जाय तो सारे व्यापार बन्द हो जायं, यदि मृत्यु बन्ध हो जाय तो नये प्राणी भी उत्पन्न न होंगे, यदि खेत में वर्तमान पौधे ही खड़े रहें तो आगे की फसल कैसे उत्पन्न की जा सकेगी? सृष्टिकर्ता ने सृष्टि संचालन के लिए परिवर्तन का नियम बनाया है। इस नियम के अनुसार हमारी किसी वस्तु या स्थिति में अरुचिकर परिवर्तन होता हो तो उस सीधी सी बात के लिए दुखी न होना चाहिये वरन् अपनी स्वाभाविक सच्चिदानन्द स्थिति के कारण सदा प्रफुल्ल, प्रसन्न, आनन्दित रहना चाहिये। ‘भुवः’ और स्वः शब्दों का हमारे लिए यही उपदेश है।

सवितुः-सूर्य के समान तेजस्वी, प्रकाशवान्, हम बनें। अन्धकार चाहे जितना ही बड़ा क्यों न हो चाहे वह दिग्दिगन्त में सुदूर देशों तक फैला हुआ हो, असंख्य प्राणी उस अन्धकार में होश-हवाश छोड़ कर मूर्छित पड़े हुए हों, परन्तु फिर भी उसकी परवाह न करके उसे नष्ट करने का ही प्रयत्न करना चाहिये। सविता-सूर्य-अकेला ही अन्धकार से लड़ता है कोई दूसरा साथी उसके साथ उसके कार्य में सहयोग देने नहीं आता तो भी वह अकेलेपन की परवाह न करके अपना काम जारी रखता है। पाप, अन्याय, अत्याचार, अविचार, अन्धविश्वास, हानिकारक-रीति-रिवाज, यह सब अन्धकार के रूप हैं, हमें तेजस्वी सविता बन कर इनका निवारण करने का प्रयत्न करते रहना चाहिये। अन्धकार का विस्तार अधिक देखकर डरने, पीछे हटने या कायरता मन में लाने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। निर्भीकता धारण करके तेजस्वी सूर्य के समान यथा शक्ति इनका विरोध ही करते रहना चाहिये। अविचार या अन्याय की बड़ी से बड़ी शक्ति हो तो भी उसके विपक्ष में सत्य का प्रकाश करना चाहिये। हमें अपने मन के भीतरी कोनों में, अन्धकार में, छिपे हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मत्सर आदि शत्रुओं को अपने आत्मिक प्रकाश द्वारा ढूँढ़ निकालना चाहिये और अपनी दृढ़ तेजस्विता के साथ उन्हें मन के पवित्र प्राँगण में से निकाल कर बाहर कर देना चाहिये। हमारा सांसारिक जीवन निर्भीक, स्पष्ट, खरा, एवं तेजस्वी होना चाहिये। हमारे विचार और कार्यों से दूसरों को प्रकाश मिले, अपने बौद्धिक प्रकाश द्वारा उपयोगी तथ्यों को ही चुनें ‘सवितुः’ शब्द का हमारे लिए यही संकेत है।

वरेण्यं-श्रेष्ठ। हम श्रेष्ठ बनें। पैसे की सर्वभक्षी हविस ने आदमी को शैतान बना दिया है। जिह्वा के चटोरेपन के ऊपर करीब आधी जिन्दगी बलिदान कर दी जाती हैं। भोग-विलासों की तृष्णा में पतंगे की तरह लोग जले जा रहे हैं। भोग सामग्री जुटाना यही एक कार्यक्रम लोगों के सामने है, पाशविक वृत्तियों को तृप्त करने तक की ही अभिलाषाएँ मनोभूमि में उठती हैं। यह बहिर्मुखी प्रवृत्तियाँ अभद्र हैं, अश्रेयष्कर हैं, श्रेष्ठता से रहित हैं। गायत्री कहती है कि हम वरेण्य प्राण का धारण करें, अपने अन्दर श्रेष्ठता, महानता, विकसित करें। आत्मा परमात्मा का अंश है, इसका अवतार संसार में होता है। जीवन धारण करने का अभिप्राय प्रभु की पवित्र सृष्टि में उसकी आज्ञाओं और इच्छाओं का सन्तुलन ठीक रखना और दूसरों से रखवाना है। जीवन कायम रखने के लिए भौतिक पदार्थों की इतनी कम मात्रा में आवश्यकता है कि बिना किसी प्रकार का पाप किये बड़ी आसानी के साथ, सुविधापूर्वक, पूरी ईमानदारी के साथ उन्हें कमाया जा सकता है। यह कहना गलत है की पेट के लिए पाप करते हैं। पेट की मर्यादा इतनी छोटी है कि वह बिना पाप के आसानी से भर सकता है-पाप तो तृष्णा के लिए किया जाता है। अनन्त तृष्णाओं के लिये अनन्त पाप करते जाना अश्रेष्ठ है। हमें श्रेष्ठ बनना चाहिये। संयमित, अपरिग्रही, संतोषी रह कर जीवन को उच्च उद्देश्यमय, सिद्धाँत सम्मत, कर्त्तव्य धर्म से परिपूर्ण बनाना चाहिये। आध्यात्मिक सत्सम्पत्तियाँ एकत्रित करने के लिए वैसा ही उद्योग करते रहना चाहिये जैसा कि माया बन्धन में बँधे हुए जीव, माया के लिये खून पसीना एक करते हैं। यही श्रेष्ठता है- हमें ऐसा ही ‘वरेण्य’ होना चाहिए। (अपूर्ण)


Quotation

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जो अपने कर्त्तव्य का विचार नहीं करते और अपने उत्तर दायित्वों को पूरा करने का शक्ति भर प्रयत्न नहीं करते वे मनुष्य रूप में पशु हैं।

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यदि सच्ची शान्ति की स्थापना करनी है तो उसकी पूरी कीमत चुकानी होगी। शान्ति की पूरी कीमत यह है कि जो बलवान हैं वे लोभी होना छोड़ दें और जो निर्बल हैं वे बलवान बनना सीखें।

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अध्ययन तथा मनन

(ले.- श्रीमती प्रीतम देवी महेन्द्र, साहित्य रत्न)

अध्ययन तथा अनुभव इन दो साधनों से ज्ञान प्राप्त होता है। इसमें से अध्ययन से जितना ज्ञान एक वर्ष में प्राप्त हो सकता है, उतना अनुभव से बीस बाईस वर्ष में प्राप्त हो सकता है। जो अनुभव से ज्ञान प्राप्त करता है उसे बड़ा कष्ट उठाना पड़ता है, घोर तकलीफों का सामना करना पड़ता है तब कहीं दो चार सत्य के कण (Particles Truth) प्राप्त होते हैं। इसके विपरीत अध्ययन से सहज में ही यथेष्ट ज्ञान संग्रह किया जा सकता है।

अध्ययन में महत्व गंभीरता का है। आप घंटों बैठे पढ़ते रहें और हाथ कुछ न लगे या थोड़ी देर पढ़े और जो कुछ पढ़े उसे दृढ़ता से अंतर्मन में दृढ़ कर लें। जो व्यक्ति अध्ययन के साथ मनन का उपयोग करता है वह शक्ति का उचित उपयोग करता है। लंबा चौड़ा बेमतलब का अध्ययन वैसा ही है जैसा खाया तो बहुत जाय, पर पचे दो चार रत्ती भर। ऐसा अध्ययन व्यर्थ है।

आप जो पढ़े उस पर विचार करें। सोचें कि बात कहाँ तक उचित है। आप स्वयं उस विषय पर क्या सोचते हैं कहाँ आपकी राय नहीं मिलती? इत्यादि। अध्ययन में प्रज्ञा, बुद्धि स्वातंत्र्य प्रतिभा बढ़नी चाहिए और यह तब ही संभव है जब आप अपने पढ़े लिखे को मनन द्वारा हजम करें, अपनी सम्पत्ति बनाएँ, उस पर कार्य करें।

मनन के सहयोग से नई कल्पना उत्पन्न होती है। नया उत्साह आता है तथा प्रतिभा प्राप्त होती है। जिस अध्ययन से प्रेरणा (Inspiration) प्राप्त न हुआ वह अध्ययन कैसा? बहुत सा पढ़ते ही पढ़ते रटने से कुछ भी हाथ नहीं लगता। पढ़ो कम, उस पर सोचो अधिक। “अल्पमात्रा, चिंतन, मनन तथा उस पर क्रिया” यही वास्तविक अध्ययन है।


दब्बूपन : मानसिक बीमारी

(ले.- श्रीयुत रमेशचन्द्र वर्मा, नई दिल्ली)

कुछ व्यक्ति सोचते हैं, “हमें कौन पूछने वाला है? हम किस गणना में हैं? हमसे क्या होना जाना है?” -इस प्रकार मनःस्थिति से वे अपनी तुच्छता तथा हीनता की कुत्सित ग्रन्थि को और सुदृढ़ करते हैं और कायरता दब्बूपन तथा घोर निराशा में निरत रहते हैं?

दब्बूपन- इच्छा शक्ति की दुर्बलता का चिह्न है। सदा सर्वदा निज अनिष्ट की भावना में रत रहने से वह अंतर्मन में आरुढ़ (Fix) हो जाती है। दूसरी आदतों की तरह यह भी एक प्रकार की आदत है तथा अन्य आदतों की तरह अभ्यास से प्राप्त होती है। अभ्यास द्वारा ही हमें दब्बूपन प्राप्त होता है। अभ्यास द्वारा ही हम दब्बूपन प्राप्त करते हैं। कभी-कभी हमारे घर वाले बचपन में कठोर नियंत्रण द्वारा हमें दब्बू बनाते हैं।

प्रश्न है कि दब्बूपन से कैसे मुफ्त हों? अपना आध्यात्मिक बल बढ़ाइये। वीरता के, उत्साह के, तथा आत्मविश्वास के प्रबल विचारों को प्रचुरता से मनः केन्द्र में प्रवेश करने दीजिए। आत्मावलम्बन की भावना को दृढ़ता से अव्यक्त में बिठाइये।

यदि आप अपने को ईश्वरत्व से युक्त समझने लगेंगे, सर्वांग को ईश्वरमय देखने की आदत बना लेंगे तो आपकी दीनता हट जायगी।

मनुष्य जिस स्थिति का निरंतर चिंतन करता है, उस स्थिति का भाव अवश्य उसमें प्रकट होता है अतः तुम यही सोचो कि “मैं भय तथा दब्बूपन के दूषित विचारों की कल्पना में नहीं रहता। अन्तःकरण को भूत, प्रेत, पिशाच की श्मशान भूमि नहीं बनाता। मेरे अन्तःकरण में तो निर्भयता, श्रद्धा, उत्साह और शान्ति का अखण्ड राज्य है। मैं चारों ओर से अभय हूँ, परम निःशंक हूँ। परमात्मा की गोद में पूर्ण सुरक्षित हूँ।”


शब्द-योग

(योगिराज-श्री शिवकुमार जी शास्त्री)

वेद में कहा है कि उसने इच्छा किया कि मैं एक से अनेक हो जाऊं और इसी में सारा संसार उत्पन्न हो गया। ब्रह्म ने वेद के अनुसार सृष्टि के आदि में कहा था कि मैं एक हूँ अनेक हो जाऊं बस सारे संसार की उत्पत्ति हो गई। इंजील में भी कहा है कि आदि में वचन था और वचन से सब कुछ हुआ। कुरान में भी कहा है कि खुदा ने कहा कि हो जा (कुन) बस सब कुछ हो गया। तात्पर्य कहने का यह है कि सारा संसार शब्दों से उत्पन्न हुआ है। अब भी जो कुछ हो रहा है उसके कारण शब्द ही हैं। संसार की बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ शब्दों के ही कारण हुई हैं। सुलह भी शब्दों ने ही किया। प्रेम और विरोध सबका कारण शब्द हैं। बिना इच्छा के कुछ नहीं होता और इच्छा स्वयं शब्दों में हुआ करती है। इच्छा का प्रत्यक्ष रूप शब्द है। शब्द को व्यक्त करके और अपने धक्के से सारे संसार का हिलाकर इच्छा को पूर्ण कर लेता है। पानी की इच्छा हुई कि वह इच्छा शब्द के रूप में मुँह से निकल पड़ी बस निकलते ही नौकर ने पानी उपस्थित किया। मुँह में पहले पानी शब्द आया और बाद को पानी स्वयं आ पहुँचा।

सच्ची बात यह है कि इच्छा स्वयं अर्थ रूप है। जिसकी आप इच्छा करते हैं उसके मिलने में जरा भी संदेह नहीं है। जिसकी आप इच्छा करते हैं वह इच्छा स्वयं वह वस्तु है। इच्छा सफलता की वह सीढ़ी है जिसके बाद सफलता स्वयं खड़ी रहती है। इच्छित वस्तु को प्राप्त करने में देरी नहीं लग सकती। पर न मिलने का कारण यह है कि इच्छा के जो शब्द हमारे भीतर से उठते हैं उन पर हम स्वयं विश्वास नहीं करते। हमें स्वयं विश्वास नहीं होता। हमें स्वयं शंका हो जाती है। हम इच्छा करते ही कह देते हैं कि इसका मिलना कठिन है यह मिलेगा नहीं। हमारे अविश्वास के शब्द इच्छा के शब्दों की हत्या करा डालते हैं, नहीं तो मनुष्य के शब्दों में ब्रह्मा की शक्ति है।

जो शब्द भीतर दृढ़ता से उठें, विश्वास के साथ उठें या मुँह से बाहर निकलें उन शब्दों में ब्रह्मा की शक्ति है। कहिये और विश्वास के साथ कहिये कि हम निरोग हैं आप निरोग हो जायेंगे। कहिये कि हम अमर हैं-मृत्यु आपके वश में हो जावेगी। विश्वास के साथ कहिये कि हमें वह वस्तु अवश्य प्राप्त होगी उसके मिलने में देरी न लगेगी। चाहे देरी भी लगे पर मिलेगी अवश्य। आप अपना भाग्य, अपना कर्म, अपना संसार, अपनी परिस्थिति और अपने लिए संसार की सारी सामग्री, अपने शब्दों और अपनी आज्ञाओं से बुला सकते और बना सकते हैं। आपको जिस समय अपने शब्दों की शक्ति का पता लगेगा उस समय आप विधाता का मुँह नहीं ताकेंगे।

ईश्वर आपके भीतर है। आप स्वयं ईश्वर हैं। आपकी आज्ञा, आपके शब्द, ईश्वर की आज्ञा और ईश्वर के शब्द हैं। आप विश्वास के साथ आज्ञा दीजिए वह अवश्य हो जायगा। बोले हुए शब्दों से संसार के परमाणुओं में धक्का लगता है और उससे जो लहर होती है वह तब तक शान्त नहीं हो सकती जब तक कि वह अंत तक जाकर पूरी न हो जाय। पर हमारा अविश्वास इसका बहुत बड़ा विरोधी और नाशक है। हमारे शब्दों से जो लहर उत्पन्न होती है वह विराट रूप ईश्वर की आत्मा को कँपा देती है। वह निरर्थक नहीं हो सकती। एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने वालों ने यह देखा कि जगह-जगह वहाँ पर बर्फ के चट्टान और बादल जमे हुए हैं। वहाँ पर एक शब्द भी जरा जोर से बोल देने पर चढ़ने वालों के ऊपर बहुत बड़ी आफत आ जाती है। बोलने पे एक-एक फर्लांग का हिमखण्ड (बर्फ की चट्टान) ऊपर से खिसक पड़ती है और सम्भव है कि उसके सब चढ़ने वाले उसी के नीचे दब जायं। बोलने से वहाँ के जमे हुए बादल भी हिल जाते हैं और बरसने लगते हैं। बोलने से आकाश में लहर उत्पन्न होती है उसी से यह सब हुआ करता है। शब्द स्वयं अपने अणुओं में वह शक्ति रखते हैं जिसमें इच्छित पदार्थ बन जायं, हम जिस वस्तु की इच्छा या कल्पना करते हैं वह इच्छा स्वयं वही वस्तु है मन इच्छा या वस्तु हमारी कल्पना से बाहर नहीं है। कल्पना से स्वप्न में सारा संसार बन जाता है। स्वप्न में मन द्वारा बिना रोड़े के सड़क पिट जाती है, बिना वृक्षों के बाग लग जाता और हजारों मकान बनकर तैयार हो जाते हैं। मन स्वयं वस्तु रूप और संसार रूप है। यह संसार की सारी चीजों को बात ही बात में बना सकता है। समाधि के समय इच्छा का अद्भुत चमत्कार क्षण-क्षण में प्रत्यक्ष देखने में आता है। योगी ने इच्छा किया नहीं कि वह बना नहीं। समाधि के समय योगी जिस वस्तु की इच्छा करता है वह वस्तु उसी समय बनकर तैयार हो जाती है।

स्थूल संसार भी स्वप्न के समान मनोमय और कल्पनामय है। स्वप्न की सृष्टि और जाग्रत अवस्था की सृष्टि में कुछ भेद अवश्य है पर मन और कल्पना का प्रभाव सर्वत्र है। इस पर हम अपने दूसरे लेखों में बहुत कुछ लिख चुके हैं। प्लेग की कल्पना होते ही प्लेग से भयभीत होते ही ज्वर और गिल्टी दिखलाई देने लगती है। यदि कल्पना से ज्वर बढ़ जाता है तो क्या कल्पना से उतर नहीं सकता? यदि हमारा यह विचार, यह भय कि ऐसा न हो कि हमें गिल्टी हो जाय, गिल्टी उत्पन्न कर सकता है तो क्या हमारी निर्भयता और हमारा यह विचार कि हमारे गिल्टी नहीं हो सकती या हमारी गिल्टी अभी अच्छी हो जायगी हमारा कल्याण नहीं कर सकता? हमारी इच्छा में हमारी कल्पना में या हमारे शब्दों में बनाने और बिगाड़ने की पूरी शक्ति है।

“यथा मनसा मनुते तथा वाचा वदति” जैसा मन में विचार करता है वैसा ही वचन से बोलता है। मनुष्य अधिकतर कुछ न कुछ मनन किया करता है। इसका मतलब यह हुआ कि मनुष्य भीतर अपने मन में, अपने मन से, बातचीत किया करता है, कुछ न कुछ बोला करता है। देखने में आया है कि इन अव्यक्त शब्दों का प्रभाव शरीर पर पड़ता जाता है। मनुष्य के मनन करते हुए चेहरे का उतार-चढ़ाव और रंग इस प्रकार से बदलता है कि बिना बोले ही योगी अभ्यासी या इस विद्या के जानने वाले बतला देते है कि यह मनुष्य अमुक बात सोच रहा है। भावनाओं के अनुसार मुख की आकृति और वर्ण बदलता जाता है। सोचते समय कभी मनुष्य का चेहरा पीला पड़ जाता है, कभी प्रसन्न हो जाता है, कभी ललाट का चर्म सिकुड़ जाता है, कभी भृकुटी तिरछी हो जाती और कभी दोनों कपोल लाल हो जाते हैं। इसके सिवाय और भी कई तरह के रूपांतर और परिवर्तन हुआ करते हैं। इन रूपाँतरों को देखकर किसी के भीतर का भाव या मन का विचार जान लेना कठिन नहीं है।

पूर्वोक्त बातों से यह सिद्ध होता है कि हमारे प्रत्येक शब्द का और प्रत्येक विचार का हमारे शरीर पर अद्भुत रूप से प्रभाव पड़ता है। अतः आपको अपने शरीर का जो अंग जिस प्रकार का बनाना हो अपनी आज्ञा से बना सकते हैं। आप नित्य उठकर अपने शरीर को आज्ञा दीजिए कि हमारे शरीर का अमुक अंग ठीक हो जाय इस आज्ञा का या आपके इस वाक्य और शब्द का प्रभाव कुछ दिनों में प्रत्यक्ष देखने में आवेगा। जिस अंग के लिए आप जो आज्ञा देंगे वह अवश्य पूरा होगा। मनुष्य के शब्दों में रचना करने की या विधाता बनने की पूरी शक्ति है।

यदि कोई मनुष्य दरिद्री है तो उसे नित्य उठकर कहना चाहिए कि हमारी दरिद्रता मिट जाय हम धनी हो जायं। यह भी सोचना चाहिए कि हम धनी हो गये और हमारे चारों तरफ रुपया और सोना-चाँदी पड़ा हुआ है। सब संदूक रुपयों से भरी हैं। इससे अवश्य दरिद्रता मिट जायगी। यदि किसी का दिमाग ठीक नहीं है तो पेट पर हाथ फेर कर नित्य पेट को आज्ञा देनी चाहिए कि ठीक हो जा पेट ठीक हो जायगा। जीवन में आपको जो अभाव है दृढ़तापूर्वक कहिए कि मुझे अमुक वस्तु चाहिए मैं उसे प्राप्त करूंगा। आपके वह शब्द अदृष्ट से टकरा कर वह वस्तु सामने उपस्थित कर देंगे जिसे आप चाहते हैं।

आपके शरीर का रचयिता कोई दूसरा नहीं है, आप स्वयं अपने शरीर के रचयिता हैं। आपके भाग्य का रचयिता कोई दूसरा नहीं है अपने भाग्य के विधाता आप स्वयं हैं। विधाता के वचन में जो शक्ति है वही आपके वचन में हैं। विश्वास के साथ जो कहियेगा अवश्य पूरा होगा।


किसी को तुच्छता का भ्रम मत कराइये।

(श्री रत्नेश कुमारी ‘ललन’ मैनपुरी स्टेट)

बहुत से शिक्षक तथा माता पिताओं की ये आदत होती है कि वे जरा-जरा सी भूलों पर अथवा शीघ्र पाठ न समझ सकने पर चिढ़ कर कहने लगते हैं-तुम से ये काम हो ही नहीं सकता अथवा तुम भला इसे क्या कर सकोगे? या फिर यूँ कहेंगे-अमुक व्यक्ति की बराबरी तुम क्या कर सकोगे? तुम तो बस हमेशा ऐसे ही रहोगे। इन बातों का कोमल मति सुकुमार बालकों तथा अल्प वयस्क किशोर किशोरियों के हृदय पर बहुत ही गहरा और बुरा असर पड़ता है। (वयप्राप्त पर अतिशय भावुक व्यक्तियों पर भी कम कुप्रभाव नहीं पड़ता) उनके मन में तुच्छता की ग्रन्थि (यदि मनोवैज्ञानिकों के शब्दों में कहूँ) अथवा संस्कार गहराई से (अन्तः चेतना में) अंकित हो जाता है। परिणाम यह होता है इस भावना से सन्तप्त व्यक्ति या तो इसका सक्रिय विद्रोह करता है (अच्छा बन सकने से निराश होकर बुरा बनने को कटिबद्ध हो जाता है) अथवा अज्ञात रूप से (अन्तःचेतना के इस कुसंस्कार से प्रभावित हो जाने के कारण) निष्क्रिय विद्रोह करता है। किसी भी कार्य को आत्म विश्वास जनित उत्साह से वह कर ही नहीं पाता। असफलता का निश्चित चित्र और लोक हंसाई का भय उसकी मन की दृढ़ता और कार्यकारिणी शक्तियों को निर्जीव बनाता रहता है। अस्तु उसकी शारीरिक, मानसिक आदि शक्तियों की उन्नति का मार्ग अवरुद्ध तथा जीवन नीरस हो जाता है।

सोचिये तो आपके अविचार पूर्ण शब्दों का कितना भीषण परिणाम हुआ? बस आज से ही दृढ़ प्रतिज्ञा कर लीजिये किसी भी कोमल हृदय को इन वाक्य बाणों के विष से विषाक्त बना कर किसी का भविष्य अंधकारमय और जीवन नष्ट नहीं करूंगा। जगत्पिता आपके इस सद्संकल्प से प्रसन्न होकर अपने दो अमूल्य, दुर्लभ वरदानों की वर्षा आप पर करेगा शान्ति और सन्तोष। मुझे विश्वास है मेरे इस अनुरोध को आप अवश्यमेव मानेंगे।

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मनुष्य पुण्य का फल सुख चाहता है, पर पुण्य नहीं करना चाहता और पाप का फल दुःख नहीं चाहता पर पाप नहीं छोड़ना चाहता। इसीलिये सुख नहीं मिलता और दुःख भोगना ही पड़ता है।

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पत्नी व्रत

(श्री हरिभाऊ जी उपाध्याय)

आशा है, इस लेख के नाम से हमारी बहनें खुश होंगी। खास करके वे बहनें, जिनकी यह शिकायत है कि प्राचीन काल के पुरुषों ने स्त्रियों को हर तरह दबा रखा। और वे पुरुष सम्भव है, लेखक को कोसें, जिन्हें स्त्रियों को अपनी दासी समझने की आदत पड़ी हुई है। यह बात कि किसने इसको दबा रखा है, एक ओर रख दें, तो भी यह निर्विवाद सिद्ध और स्पष्ट है कि आज स्त्री पुरुष के सम्बंध पर और उनके मौजूदा पारस्परिक व्यवहार पर नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता उपस्थित हो गई है। स्त्री और पुरुष दो परस्पर पूरक शक्तियाँ हैं और उनका पृथक-पृथक तथा सम्मिलित बल और गुण व्यक्ति और समाज के हित और सुख में लगना अपेक्षित है। यदि दोनों के गुणों और शक्तियों का समान विकास न होगा तो उनका पूरा और उचित उपयोग न हो सकेगा, पक्षी का एक पंख यदि कच्चा या कमजोर हो तो वह अच्छी तरह उड़ नहीं सकता। गाड़ी का एक पहिया यदि छोटा या टूटा हो तो वह चल नहीं सकती, हिन्दू समाज में आज पुरुष कई बातों में स्त्रियों से ऊंचा उठा हुआ, आगे बढ़ा हुआ, स्वतंत्र और बलशाली है। धर्म मन्दिरों में उसकी जय जय कार है, साहित्य कला में उसका आदर सत्कार है, शिक्षा दीक्षा में भी वही अगुआ है। स्त्रियों को न पढ़ने की स्वतंत्रता और सुविधा, न घर से बाहर निकलने की। परदा और घूँघट तो नाग-पाश की तरह उन्हें जकड़े हुए है। चूल्हा चौका, धोना-सोना, बाल-बच्चे यह हिन्दू स्त्री का सारा जीवन है। इस विषमता को दूर किए बिना हिन्दू समाज का कल्याण नहीं। देश और काल के ज्ञानी पुरुषों को चाहिए कि वे स्त्रियों के विकास में अपना कदम तेजी से आगे बढ़ायें। जहाँ तक लब्ध प्रतिष्ठा बलवान और प्रभावशाली व्यक्ति के सद्गुणों से सम्बन्ध है, हिन्दू पुरुष, हिन्दू स्त्री से बढ़-चढ़ कर है। और जहाँ तक अंतर्जगत के गुण और सौंदर्य से सम्बन्ध है, वहाँ तक स्त्रियाँ पुरुषों से बहुत आगे हैं। पुरुषों का लौकिक जीवन अधिक आकर्षक है उपयोगी है, व्यक्तिगत जीवन अधिक दोषयुक्त, नीरस और कलुषित है। अपने सामाजिक प्रभुत्व से वह समाज को चाहे लाभ पहुँचा सकता हो, पर व्यक्तिगत विकास में वह पीछे पड़ गया है। विपक्ष में स्त्रियों के उच्च गुणों का उपयोग देश और समाज को कम होता है, परन्तु व्यक्तिगत जीवन में वे उनको बहुत ऊंचा उठा देते हैं। अपनी बुद्धि चातुरी से पुरुष सामाजिक जगत में कितना ही ऊँचा उठ जाता हो, व्यक्तिगत जीवन उसका भोग विलास, रोग शोक, भय चिंता में समाप्त हो जाता है। स्त्रियों की गति समाज और देश के व्यवहार जगत में न होने के कारण, उनमें सामाजिकता का अभाव पाया जाता है। अतएव अब पुरुषों के जीवन को अधिक व्यक्तिगत और पवित्र बनाने की आवश्यकता है और स्त्रियों के जीवन को सामाजिक कामों में अधिक लगाने की। पुरुषों और स्त्रियों के जीवन में इस प्रकार सामंजस्य जब तक न होगा, तब तक न उन्हें सुख मिल सकता है, न समाज को।

यह तो हुआ स्त्री पुरुषों के जीवन का सामान्य प्रश्न। अब रहा उनके पारस्परिक सम्बन्ध का प्रश्न। मेरी यह धारणा है कि स्त्री, पुरुष की अपेक्षा अधिक वफादार है। पुरुष एक तो सामाजिक प्रभुता के कारण और दूसरे अनेक भले बुरे लोगों और वस्तुओं के संपर्क के कारण अधिक बेवफा हो गया है। स्त्रियाँ व्यक्तिगत और गृह जीवन के कारण स्वभावतः स्वरक्षण शील अतएव वफादार रह पाई हैं। पर अब हमारी सामाजिक अवस्था में ऐसा उथल-पुथल हो रहा है कि पुरुषों का जीवन अधिक उच्च, सात्विक और श्रेष्ठ एवं वफादार बने बिना समाज का पाँव आगे न बढ़ सकेगा। अब तक पुरुषों ने स्त्रियों के कर्त्तव्यों पर बहुत जोर दिया है उनकी वफादारी, पवित्रता हमारे यहाँ पवित्रता की पराकाष्ठा मानी गई है। अब ऐसा समय आ गाया है कि पुरुष अपने कर्त्तव्यों की ओर ज्यादा ध्यान दें। व्यभिचारी, दुराचारी, आक्रामक, अत्याचारी पुरुष के मुँह में अब पतिव्रत-धर्म की बात शोभा नहीं देती। हमारी माताओं और बहनों ने इस अग्नि परीक्षा में तप कर अपने को शुद्ध सुवर्ण सिद्ध कर दिया है। अब पुरुष की बारी है। अब उसकी परीक्षा का युग आ रहा है। अब से अपने लिए पत्नीव्रत धर्म की रचना करनी चाहिये। अब स्मृतियों में, कथा वार्त्ताओं में, पत्नीव्रत धर्म की विधि और उपदेश होना चाहिये। पत्नी व्रत धर्म के माने है- पत्नी के प्रति वफादारी। स्त्री अब तक जैसे पति को परमेश्वर मान कर एक निष्ठा से उसे अपना आराध्यदेव मानती आई है, उसी प्रकार पत्नी को गृहदेवी मानकर हमें उसका आदर करना चाहिये, उसके विकास में हर प्रकार सहायता करनी चाहिये और सप्तपदी के समय जो प्रतिज्ञायें पुरुष ने उसके साथ की हैं उनका पालन एक निष्ठापूर्वक होना चाहिए।


ईर्ष्या क्यों करते हो?

(श्री हरदयाल जी एम. ए.)

प्रकृति सब प्रकार के उपहार एक व्यक्ति को नहीं देती, किन्तु वह उनमें से कुछ उपहार प्रत्येक व्यक्ति को देती है जिससे वह सब बराबर हो जाता है। आप सुन्दर और बुद्धिमान और प्रसिद्ध और सब कुछ नहीं हो सकते। “मैं” और “मुझको” के विषय में अधिक सोचना बंद कर दो, वरन् “हम” और “हमको” के विषय में अधिक सोचा करो। इस प्रकार करने से ईर्ष्या अपने आप दूर हो जावेगी और आप में सहानुभूति पूर्ण कद्र करने की प्रवृत्ति उत्पन्न होकर विकसित होगी। यदि कोई व्यक्ति आपसे अधिक प्रसिद्ध है तो यह विचार करो, यह ख्याति मेरी ही है, केवल यह दूसरे के नाम के साथ है।” आपके भाई-दूसरे मनुष्य में-जो कुछ गुण हैं वह मानवी एकता के नियम से आपके ही हैं। आपको यह भी सोचना चाहिये कि प्रत्येक पुरुष किन्हीं बातों में दूसरों से अधिक और किन्हीं बातों में कम होता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति की क्षतिपूर्ति हो जाती है। ईर्ष्या, अभिमान और असमानता से उत्पन्न होती है, यह एक पूर्णतया प्रतिशोधात्मक और अलाभदायक भाव है, क्योंकि आप केवल दूसरों से ईर्ष्या करके सौंदर्य, बुद्धि अथवा ख्याति को प्राप्त नहीं कर सकते, ईर्ष्या करने से आप उस कुत्ते के समान हो जाते हो, जो हाथी अथवा मोटरकार पर भौंकता है।

ईर्ष्या करने से आपको कुछ नहीं मिलता इसके विरुद्ध अपने ही ओछेपन और स्वार्थपरता से आपके मन की शान्ति और आपका आनन्द दूर हो जाता है।


साधु की खोज

(श्री स्वामी सत्य भक्त जी वर्धा)

(1)

-भाई, तुम इन जानवरों की पूजा क्यों करते हो?

-साहब मैं साधुओं का पुजारी हूँ। एक बड़े भारी मुनिराज मुझे मिल गये थे, उनने कहा- बिना नग्नता के साधुता नहीं रहती बल्कि नग्नता हो तो साधु के सब गुण आ जाते हैं, इसलिए नग्न दिगम्बर को छोड़कर तुम किसी की पूजा न किया करो। तब से मैं नग्न दिगम्बरों की ही पूजा किया करता हूँ और इस कसौटी में पशु की सबसे बड़े दिगम्बर हैं।

-अरे क्या मूर्ख हुये हो। नंगा होने से क्या कोई साधु बन सकता है? तुम साधु की पहचान नहीं जानते?

-तो साधु की पहिचान क्या है?

-जो मुँहपत्ती लगाता है-वह साधु है, मुँह बन्द रखने से वायु के जीव नहीं मरते, समझे?

-जी हाँ, समझ गया।

(2)

-अरे भाई, तुम इस घोड़े की पूजा क्यों करते हो?

-जी, मैं साधु-पूजक हूँ-एक साधु जी ने कहा था कि मुँह बन्द रखने वाले साधु होते हैं। इस घोड़े को तोबरा लगा था, मैंने सोचा इससे अच्छा मुँह बन्द कौन करेगा, इसलिए इसकी पूजा कर रहा हूँ।

-पागल हुए हैं, तोबरा लगाने से कहीं कोई साधु होता है? साधु की पहिचान यह तोबरा नहीं, किन्तु जटा है। समझे?

-जी हाँ, समझ गया।

(3)

-अरे भाई, इस नारियल को वेदी पर क्यों रख छोड़ा है और ऊपर ये फूल क्यों डाल रक्खे हैं?

-जी इसकी पूजा की थी। मैं साधु-पूजक हूँ, एक साधु जी ने कहा था कि साधु की पहिचान जटा है,

इसलिये मैंने सोचा कि इस नारियल से बढ़कर स्वाभाविक जटा कहाँ मिलेगी, इसलिए इसकी पूजा किया करता हूँ।

-हिस्ट, इस तरह तुम साधु को नहीं पा सकते।

-तो कैसे पा सकता हूँ? जो जैसा कहता है उसी के अनुसार करता हूँ, फिर भी अभी तक मुझे साधु न मिला। क्या आप मुझे साधु के दर्शन करा सकते हैं?

-तुम क्या करते हो?

-मैं मजदूरी करता हूँ। आठ घंटा मजदूरी करके जो समय बचा पाता हूँ उसमें सुबह-शाम भगवान का भजन करता हूँ और मुहल्ले की विधवाएँ और बच्चे जो काम बता देते हैं-उनका काम किया करता हूँ। और मैं मूरख क्या कर सकता हूँ?

-बदले के लिए तो मैं मजदूरी करता हूँ ये सब पैसे के लिए नहीं करता, मजदूरी से पेट के लिए मिल ही जाता है, तब फालतू समय में किसी रोगी की सेवा कर दी, किसी अनाथ स्त्री का सामान ला दिया, किसी के बच्चे सम्हाल दिये, किसी की गाय लगा दी-इसमें मेरा क्या बिगड़ा? उनका भी काम हो गया अपना भी समय कट गया-इसमें पैसे के लेने-देने की क्या बात है?

-तब तुम्हें साधु-दर्शन हो जायगा।

-धन्य भाग्य! बताइये कब और कहाँ होगा?

-अब और यहीं। देखो! (आइना दिखाकर)

-क्या देखूँ यह तो आइना है। इसमें तो मेरा ही मुँह दिखता है?

-बस तुम्हीं साधु हो। जो कम से कम लेकर अधिक से अधिक देता है-वही साधु है। अच्छा साधु जी, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। अब साधु दर्शन के लिए कहीं न भटकना।


अभ्यास से मिलता है।

(प्रो. श्री मोहनलाल जी वर्मा M.A. LL. B.)

ऐथेन्स निवासी सुकरात ग्रीस के सबसे बड़े तत्वज्ञानी थे। इन्होंने अपना जीवन नवयुवकों को नीति तथा आचरण सम्बन्धी शिक्षा देने तथा सद्गुणों से प्रेम करने में व्यतीत किया। इनका कहना था- सद्गुण ज्ञान हैं, दुर्गुण अज्ञान हैं।

एक दिन ऐथेंस में एक व्यक्ति आया जो यह दावा करता था कि चेहरा देखकर मैं किसी का भी चरित्र बता सकता हूँ। उसकी चतुराई की परीक्षा लेने के लिए सुकरात के उपदेश सुनने वाले तथा उनके अनुयायी नवयुवकों ने उस व्यक्ति को बुलाया और सुकरात की ओर संकेत करके कहा कि बतलाओ तो इस वृद्ध पुरुष का चरित्र कैसा है? सुकरात अत्यन्त कुरूप थे। काला भद्दा रंग, बेढंगा शरीर, बुरी तरह फैली हुई मूँछ दाढ़ी। जीवन की संध्या थी। बुढ़ापा अट्टहास कर रहा था।

सुकरात की ओर देखकर वह नवागंतुक बोला- यह वृद्ध दुर्गुणों से युक्त, सड़े दिमाग, तथा चिड़चिड़े स्वभाव का है। इस पर नवयुवक हँसे क्योंकि वे अपने गुरु के सद्गुणों एवं आश्चर्यमयी विभूतियों से परिचित थे किन्तु सुकरात ने मुस्कराते हुए कहा- “वह आगंतुक गलती नहीं कर रहा है। स्वभाव से मेरा झुकाव बुराई की ओर था, मैं बात-बात पर झगड़ता था, लोगों को परेशान करता था किन्तु चिरकालीन अभ्यास से मैंने अपनी कुप्रवृत्तियों को दबाकर अपने वश में कर लिया है। समस्त शक्तियों का गुप्त रहस्य यही है कि तुम अपने सद् उद्देश्यों को पुष्ट करो, और उनकी प्राप्ति का दीर्घकाल तक अभ्यास करो।”

जो कार्य जितनी बार किया जाता है, वह प्रत्येक बार सरल तथा प्रिय बनता जाता है। उसकी पहले की कठिनाइयाँ दूर होती जाती हैं, नई-नई बातें मालूम होती जाती हैं और प्रारंभ की समूल कठिनाइयाँ धीरे-धीरे सुगम होती जाती है। अभ्यास का ऐसा ही नियम है।

अभ्यास एक प्रकार का मानसिक-मार्ग अंतःमन के योग की बड़ी आवश्यकता पड़ती है। जब पहले-पहले तुम कोई कार्य हाथ में लेते हो तो अड़ियल अश्व की भाँति मन झिझकता, अड़ता-अकड़ता एवं बड़ी कठिनाई से मार्ग पर चलता है। अतः प्रत्येक कार्य का प्रारम्भ नितान्त कठिन एवं कष्टकारी होता है। एक बार के बाद जब पुनः उस कार्य को करते हो तो वह अपेक्षाकृत सरलता से होता जाता है। पुनः-पुनः करने से सफलता की अभिवृद्धि होती तथा कार्य अत्यन्त सुगम हो जाता है।

आप जिस उत्कृष्ट गुण, या आदत की बढ़ोतरी (Development) करना चाहते हैं उसे आरम्भ से ही दृढ़तापूर्वक प्रारंभ कर दीजिए। आरंभ में झिझक होगी किन्तु तुम इस नवीन मार्ग पर डटे रहो। उसे जितना उपयोग में लाओगे, वह उतना ही सुगम एवं दृढ़ बनेगा। बारंबार उसी मार्ग पर चलने से वह आदत बन जायगी।

मान लिया आप अनुभव करते हैं कि व्यायाम करना जरूरी है। लंगोट पहन कर एकान्त स्थान में भी आप चले जाते हैं। जब पहले दिन डंड लगा करके निकलते हैं तो शरीर अकड़ा सा, नस कुछ दुःखती हुई प्रतीत होती है। दूसरे दिन जी अपने आप चाहता। बस, यहीं से आपको दृढ़ता पकड़नी जरूरी है। व्यायाम दृढ़तापूर्वक दो-चार मास कर लेंगे तो पश्चात् आदत का रूप धारण कर लेगा, आपके खान-पान की भाँति यह भी आपके स्वभाव का महत्वपूर्ण अंग बन जायगा।

सभ्य देशों में हजारों व्यक्ति आध्यात्म के मार्ग का अभ्यास कर अपनी मनोवृत्तियों को उस दिशा की ओर मोड़ रहे हैं। तुम भी जो सद् कार्य करना चाहते हो मन की दृढ़ता के अभ्यास से पूर्ण कर सकते हो।


प्रवाही पथिक

(श्री रामनरायण जी श्रीवास्तव, हृदयस्थ)

जीव एक पथिक है। ऐसा पथिक जिसकी यात्रा सदैव जारी रहती है। तीव्रगति से बहती हुई नदी में जिस प्रकार एक हल्का तिनका बहता चला जाता है उसी प्रकार गतिशील सृष्टि की अजस्र धारा में हमारा जीवन भी निर्वाध गति से बहता चला जाता है। यह प्रवाह क्रम वृत्ताकार है, इसका आदि अंत नहीं। अनन्त काल से अनन्त योजनों की यात्रा करते रहने पर भी इस यात्रा का अन्त नहीं आता।

जीवन एक अखण्ड धारा है। यह कभी न बुझने वाली अखण्ड-ज्योति है। जीव अनादि और अनन्त है, इस जीव का स्वाभाविक धर्म ही जीवन है। जब तक जीव है तब तक जीवन कायम रहेगा। सत्य को समझ लेने से अमृतत्व की प्राप्ति हो जाती है। मृत्यु का भय, जिसे संसार का सबसे बड़ा भय कहा जाता है, वास्तव में एक भ्रामक कल्पना है। जीव कभी नष्ट नहीं होता और न उसके जीवन की ही कभी समाप्ति होती है।

शरीर का बदलना एक साधारण स्वाभाविक और आवश्यक क्रिया है। जहाँ हलचल होगी, क्रिया और गति जारी रहेगी, वहाँ परिवर्तन अवश्य होगा उत्पन्न होने वाली वस्तु का नाश अवश्यंभावी है। यदि ऐसा न हो तो सृष्टि का कार्य चलना ही बन्द हो जायगा। मृत्यु में भय जैसी कोई वस्तु नहीं है। यह एक विश्राम है जिसे प्राप्त करने के बाद नया, अधिक सक्षम शरीर प्राप्त होता है।

जीव अमर है। मृत्यु के काल्पनिक भ्रम से डरने या घबराने की हमें जरा भी आवश्यकता नहीं है। पथिक को एक मंजिल छोड़कर दूसरी पर अर्पण करते हुए कुछ झिझक या घबराहट नहीं होती फिर हम प्रवाही पथिक अपनी अमर यात्रा एक मंजिल से दूसरी पर चलते समय डरें क्यों? मृत्यु से घबरायें क्यों।


हम अपने बनें।

(ले.- श्रीयुत महेश वर्मा, हर्बर्ट कॉलेज, कोटा)

तुम व्यर्थ में दूसरों के अनर्थकारी सन्देशों को ग्रहण कर लेते हो, तुम वह सब मान बैठते हो जो दूसरे कहते हैं। तुम स्वयं अपने आपको दुःखी करते हो और कहते हो कि दूसरे लोग हमें चैन नहीं लेने देते। तुम स्वयं ही दुःख का कारण हो, स्वयं ही अपने शत्रु हो। जो किसी ने कुछ कह दिया तुमने मान लिया। यही कारण है कि उद्विग्न रहते हो।

सच्चा मनुष्य एक बार उत्तम संकल्प करने के पश्चात् यह नहीं देखता कि लोग क्या कह रहे हैं, वह अपनी धुन का पक्का होता है। सुकरात के सामने जहर का प्याला लाया गया किन्तु उसकी राय को कोई न बदल सका। बंदा बैरागी को भेड़ों की खाल पहना कर काले मुँह गली-गली फिराया गया। काजियों ने कहा कि इस्लाम ग्रहण कर लो, तुम्हें प्राण दान-दिया जायगा। इस प्रस्ताव को सुनकर उसने कहा था-मैं जिस धर्म, जिस बात में, जिस तथ्य में, विश्वास नहीं करता उसे नहीं मान सकता। आज्ञा के उल्लंघन में उसे हाथी के पाँव तले कुचलवा कर मार डाला गया किन्तु उसने दूसरों की राय न मानी।

दूसरे के इशारों पर नाचना, दूसरों के सहारे पर निर्भर रहना, दूसरों की झूठी टीका-टिप्पणी से उद्विग्न होना मानसिक दुर्बलता है। जब तक मनुष्य स्वयं अपना स्वामी नहीं बन जाता, तब तक उसका सम्पूर्ण विकास नहीं हो सकता। दूसरों का अनुकरण करने से मनुष्य अपनी मौलिकता से हाथ धो बैठता है।

स्वयं विचार करना सीखो। दूसरों के बहकाए में न आओ। कर्त्तव्य-पथ पर बढ़ते हुए तुम्हें दूसरे क्या कहते हैं-इसकी चिन्ता न करो। यदि ऐसा करने का साहस तुममें नहीं है तो जीवनभर दासत्व के बंधनों से जकड़े रहोगे।


फलाहार से रोग निवारण

(ले.- श्री बिट्ठलदास मोदी, आरोग्य मंदिर, गोरखपुर)

फलों के रस कृमिनाशक होते हैं। उनके उपयोग से हमारे शरीर में स्थित रोग-कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। डाक्टरों का कहना है कि फलों में जो साइट्रिक एसिड और फॉलिक एसिड होता है उनके संपर्क में आकर कीटाणु क्षण के लिए भी ठहर नहीं सकते। नींबू और खट्टे सेब का रस तो इस काम को और भी तेजी से करता है। यही कारण है कि घावों पर नींबू का हल्का रस लगा देने के बाद खुला छोड़ देने का रिवाज बढ़ रहा है। अपने कृमिनाशक प्रभाव के कारण पायरिया रोग में नींबू का रस मुँह और दाँत साफ करने के लिये अधिक व्यवहृत होता है। दाद पर जो नींबू लगाने से दाद अच्छे हो जाते हैं, वह इसका कृमिनाशक प्रभाव ही है। कृमि के डर से जो लोग पानी उबाल कर पीते हैं, यदि वे पानी में नींबू का रस निचोड़कर पीएं तो वही काम निकल सकता है।

ज्वर के रोगी को तो यदि कोई भी भोजन दिया जा सकता है तो वह फलों का रस ही है। जर्मनी में ऐसे रोगियों को किशमिश, मुनक्का आदि मीठे फलों को उबाल कर उसका पानी छानकर पिलाने का आम रिवाज है। अनानास, अनार, नींबू, नारंगी, सेब, अँगूर, मकोय, मुनक्का आदि के रस को पानी में मिलाकर ज्वर के रोगी को फायदे के साथ पिलाया जा सकता है। इस विधि से रोगी पानी अधिक पी सकेगा और फलों का रस भी शरीर शुद्धि में सहायक होगा। गुर्दे आदि की बीमारी में जिसमें अधिक पेशाब लाने की जरूरत होती है, इस विधि से पानी अधिक पिलाया जा सकता है।

कब्ज दूर करने के लिये फल से अच्छा सहायक मिलना कठिन है। इस रोग को दूर करने के लिए फल भोजन से तुरन्त पहले या थोड़ा पहले खाने चाहिये। यदि नाश्ते के लिये ऐसे रोगी केवल फल का व्यवहार करें तो अधिक लाभ होगा। भोजन के साथ फल का व्यवहार करते समय यह अवश्य ख्याल रखना चाहिये कि फल खट्टे न हों। श्वेतसार मुँह की लार से पचता है और खटाई के व्यवहार से लार निकलना कम हो जाता है अतः यदि खट्टे ही फलों का व्यवहार करना हो तो उन्हें भोजन के अंत में करना चाहिये।

गठिया, अनिद्रा, पुराने सिरदर्द के रोगी यदि अधिकतर फलों का व्यवहार करें तो वे धीरे-धीरे कुछ दिनों में अवश्य अच्छे हो जायेंगे।

जिनकी जबान हमेशा गंदी रहती है, मुँह से बदबू आया करती है, यदि वे कुछ दिनों तक केवल फल या फल और गेहूँ के आटे की रोटी खाकर रह जायं तो उनकी जबान साफ हो जाय और मुँह से बदबू आना बंद हो जाय। ऐसे रोगियों के लिए अच्छा होगा कि वे सवेरे केवल फल, दोपहर को रोटी और शाम को फल के साथ कुछ मेवे भी लें। इससे भोजन की ताकत भी बनी रहेगी और उनका रोग भी चला जायगा।

फलों का रस सुपाच्य होने के कारण बच्चों के लिये एक बहुत ही उपयोगी भोजन है। टमाटर या संतरे का रस उन्हें दूध के साथ पिलाया जाय तो बहुत लाभ हो।


तपस्वी बबूल

(श्री नरेन्द्र)


तपस्वी बबूल

मैं हूँ एक समान अहिर्निशि, एक रूप प्रतिवार। मेरी जय श्री विश्व विजय, श्री यह काँटों का हार।

दो दिन के बसन्त में हँसकर कहता मैं न विश्व श्री नश्वर। पलभर के पावस में रह कर, कहता मैं न, ‘विश्व दुख-सागर॥’

सुख-दुख एक समान मुझे सब, मुझे न भेद विकार। लाती मलियानिल कलि किस लय, तरुओं के आँचल भर जाती। आती फिर झँझा की बारी, आँखों में आँधी भर जाती॥

मैं अपने अभाव में श्रीयुत, श्री अभाव शृंगार। कभी न बरसे सरस सुरभि घन, मुझे न व्यापी पर जग-ज्वाला। निर्गुण फूल फली काँटों की, विधि ने दी मुझको मणि माला॥

व्यंग रूप यह बाम विधाता का मुझको उपहार। कण्टक मय जीवन आजीवन, पर मैं निर्भय विश्वासी हूँ। हूँ समर्थ, मैं सबल सनातन, पर नित नव बल अभिलाषी हूँ॥

सबल बनूँ, यदि बरसे काँटे नभ से शतशत धार। मैं स्थित प्रज्ञ-विज्ञ पहचानें, अपना जीवन भार उठाए। चाहे राशि-राशि शूलों से,

फिर-फिर मेरा तन भर जाए॥ मैं हूँ धीर वीर संन्यासी, दृढ़ता ही आधार। मैं हूँ एक समान अहिर्निश, एक रूप प्रतिवार॥

-प्रभात फेरी,

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*समाप्त*