अपनी भूलों को स्वीकार कीजिए।

जब मनुष्य कोई गलती कर बैठता है, तब उसे अपनी भूल का भय लगता है। वह सोचता है कि दोष को स्वीकार कर लेने पर मैं अपराधी समझा जाऊँगा, लोग मुझे बुरा भला कहेंगे और गलती का दंड भुगतना पड़ेगा। वह सोचता है कि इन सब झंझटों से बचने के लिए यह अच्छा है कि गलती को स्वीकार ही न करूं, उसे छिपा लूँ या किसी दूसरे के सिर मढ़ दूँ।

इस विचार धारा से प्रेरित होकर काम करने वाले व्यक्ति भारी घाटे में रहते हैं। एक दोष को छिपा लेने से बार-बार वैसा करने का साहस होता है और अनेक गलतियों को करने एवं छिपाने की आदत पड़ जाती है। दोषों के भार से अन्तःकरण दिन-दिन मैला, भद्दा और दूषित होता जाता है और अन्ततः वह दोषों की, भूलों की खान बन जाती है। गलती करना उसके स्वभाव में शामिल हो जाता है।

भूल को स्वीकार करने में मनुष्य की महत्ता कम नहीं होती। वरन् उसके महान आध्यात्मिक साहस का पता चलता है। गलती को मानना बहुत बड़ी बहादुरी है। जो लोग अपनी भूल को स्वीकार करते हैं और भविष्य में वैसा न करने की प्रतिज्ञा करते हैं वे क्रमशः सुधरते और आगे बढ़ते जाते हैं। गलती को मानना और उसे सुधारना यही आत्मोन्नति का सन्मार्ग है।


पूजा का आत्मिक रहस्य

(श्री हर भगवान दास ‘खुश्तर’ मुलतान)

ईश्वर पूजा के स्थूल उपकरणों का सूक्ष्म आध्यात्मिक महत्व है। उस सूक्ष्म तथ्य को समझे बिना जो लोग केवल मात्र भौतिक कर्मकाण्डों के बाह्य आडंबरों तक ही अपनी दृष्टि सीमित रखते हैं, वे पूजा के वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाते और न उसके सच्चे लाभ को ही प्राप्त कर पाते हैं।

सच्चा भगवद्भक्त- प्रभु भक्ति के निमित्त जिस समय आसन पर बैठता है तो वह अनुभव करता है कि वह एक चटाई के टुकड़े पर नहीं कर्तव्य की कठोर प्रतिज्ञा के ऊपर आरुढ़ है। इसी स्थान पर अविचल भाव से बैठकर उसे सत्य की दिव्य-ज्योति प्राप्त करनी है। एक ओर से प्रलोभनों का ताना और दूसरी ओर से कठिनाइयों का बाना डालकर बना हुआ यह साँसारिक घटना क्रम का आसन मेरे पैरों तले रहेगा मैं इसको नीचे दबाये रहूँगा, इसकी छाती पर बैठ कर जीवनोद्देश्य को प्राप्त करूंगा। परमात्मा की इच्छा और आज्ञा के अनुकूल जीवन का संचालन करूंगा।

भक्त- भगवान के आगे धूप जलाता है। मानो वह स्वीकार करता है कि आत्म दान करने से, त्याग की आहुति देने से, ही यशस्विनी गंध उत्पन्न होती है। उस गंध का परमात्मा का मन्दिर संसार सुवासित होता है और प्रभु भी प्रसन्न होते हैं। जहाँ धूप जलती है वहाँ से दुर्गन्ध पूर्ण हानिकारक रोग कीट भाग जाते हैं। जहाँ आत्म त्याग की, परमार्थ के लिए बलिदान की भावना ज्वलित रहेगी वहाँ विषय विकारों के जहरीले कीटाणु ठहर न सकेंगे। मन्दिर सुवासित होगा और प्रभु प्रसन्न होंगे।

चन्दन घिसता हैं। ज्यों-ज्यों घिसता है चन्दन का भार हलका होता जाता है, स्थूल दृष्टि वाले लोग समझते हैं। भगवद्भक्ति के मार्ग में चलते हुए चन्दन को घाटा हुआ वह घट गया। परन्तु भक्त को स्पष्ट दिखाई देता है कि चन्दन को लाभ ही हुआ, वह सूक्ष्म, सुवासित, पूज्य दृव्य बन कर, भक्तों के ही नहीं भगवान के भी मस्तक पर जा विराजता है। बिना घिसे वह इस सौभाग्य से वंचित रह जाता। भक्त सोचता है मुझे भी घिसना होगा, पिसना होगा, लोक सेवा के लिए अपनी भौतिक संपदाओं का त्यागना होगा, ऐसा करके ही मैं सच्ची भक्ति कर सकता हूँ।

प्रभु के सम्मुख वह दीप जलाता है। ज्ञान का दीपक भगवान की अखण्ड-ज्योति का निकटतम प्रतिनिधि है। ज्ञान का प्रकाश ही आत्मा को परमात्मा से मिलाता है। इस प्रकाश को जगाये बिना पूजा का कार्य पूरा हो नहीं सकता। भक्त दीपक जलाता है, मंदिर में भी और हृदय मंदिर में भी। इस ज्ञान दीप के प्रकाश में वह भगवान के सच्चे स्वरूप को देखता है और उन्हें प्राप्त करने का सच्चा प्रयत्न करता है।

नैवेद्य, मधुर शर्करा सा बना हुआ, हृदय के अन्तस्तल से निकला हुआ निवेदन प्रभु के सामने उपस्थित किये बिना पूजा की विधि पूरी कैसे हो सकती है? हृदय मन्दिर में विराजमान परमात्मा के सामने अपने गुण दोषों का निवेदन करना अपनी भूलों को स्वीकार करना आवश्यक है। “प्रभो, मुझे बल दीजिए, सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दीजिए, अन्धकार में से प्रकाश की ओर ले चलिए, असत् से सत् की ओर ले चलिए, मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिए।” ऐसे मधुर भक्ति रस की मधुर शर्करा से बने हुए नैवेद्य निवेदन प्रभु के सामने वह उपस्थित करता है। ऐसी आध्यात्मिक पूजा से ही भगवान प्रसन्न होते हैं।


देवताओं के अनुग्रह का मार्ग

भगवान् शंकराचार्य का कथन है-

“दुर्लभं त्रयमेषैतद् देवानुग्रह हेतुकम्।

मनुष्यत्वं, मुमुक्षत्वं महा पुरुष संश्रयः॥”

अर्थात् संसार में तीन वस्तुएं दुर्लभ हैं। और यही देवताओं के अनुग्रह का हेतु है। ये तीन वस्तु यह हैं - 1. मनुष्यत्व, 2. मुमुक्षत्व और 3. श्रेष्ठ पुरुषों की संगति।

देव पूजन में रुचि रखने वाले वे उपासक जो देवताओं की प्रसन्नता अनुग्रह एवं कृपा की आकाँक्षा करते हैं या उनको किसी प्रकार का वरदान प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं, उन्हें उपरोक्त श्लोक पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। इस श्लोक में प्रकट कर दिया गया है कि देवताओं का अनुग्रह होने से क्या वस्तु मिलती है या किस वस्तु से देवता अनुग्रहीत होते हैं।

साधारण वस्तुएं सभी मनुष्य आम तौर से प्राप्त करते और उनका उपभोग करते हैं किन्तु ऐसी दुर्लभ वस्तुएं जो आसानी से नहीं मिलती, मनुष्य देवताओं की कृपा से प्राप्त करने की इच्छा करता है। साथ ही देवताओं को प्रसन्न करने के लिए उसे दुर्लभ वस्तुएं भेंट करनी पड़ती हैं। जप, तप अनुष्ठान, बलिदान आदि द्वारा मनुष्य बहुत कष्ट सहकर साँसारिक प्रिय वस्तुओं को त्याग कर उपासना करता है तब देवताओं को प्रसन्न करता है। वह दोनों प्रकार की वस्तुएं क्या हैं इसका भगवान् शंकराचार्य ने स्पष्ट शब्दों में विवेचन कर दिया है। वे कहते हैं कि देवताओं के अनुग्रह के तीन हेतु हैं 1. मनुष्यत्व 2. मुमुक्षत्व 3. सत्संग। इन तीन तत्वों में ही देवता ओत-प्रोत हो रहे हैं। इनका प्राप्त होना और देवताओं का प्राप्त होना बिलकुल एक ही बात है। इन दोनों का इतना घनिष्ठ सम्बन्ध हैं कि जहाँ एक होता है वहाँ दूसरा निश्चय ही उपस्थित रहता है। जिस मनुष्य पर देवता प्रसन्न हों तो उसे संसार की दुर्लभ संपदाएं 1. मनुष्यत्व 2. मुमुक्षत्व 3. सत्संग, अवश्य प्राप्त होंगे अथवा यों कहिए कि जिसमें यदि तीनों बातें होंगी उस पर देवताओं की प्रसन्नता का प्रत्यक्ष दर्शन किया जा सकता है। अब देखना है कि यह तीनों तत्व क्या हैं-

मनुष्यत्व- अपने तुच्छ स्वार्थों की अवहेलना करके सम्पूर्ण समाज के लाभ को ध्यान में रखकर विचार और कार्य करना मनुष्यत्व का लक्षण है। जिसे सम्पूर्ण समाज के लाभ हानि में अपना हित अनहित दिखाई पड़ता है, वह मनुष्य है। सत्य, प्रेम और न्याय को जो धर्म का आधार मानता है, संसार में सुख शान्ति की वृद्धि करना जिसका जीवन लक्ष्य है, जो इस धर्म लक्ष्य के लिए जो जीवन भर तप करने का व्रत लेता है वह मनुष्य है। न किसी के हक को दबाना न किसी के हक को दबने देना मनुष्यता की निशानी है।

मुमुक्षत्व- मोक्ष की स्वतन्त्रता की छुटकारे की इच्छा करना मुमुक्षत्व है। पाप के, माया के, स्वार्थ के, वासना के बन्धन के छुड़ा कार आत्मा को सत्य के, पुण्य के, परमार्थ के स्वर्ग में ले जाने की तीव्र आकाँक्षा रखने वाला मुमुक्ष है। अपने को महान, उच्च, परम बनाना- आत्मा को परमात्मा में लीन कर देना है। विश्व के कण-कण में परमात्मा की झाँकी करना, जीव भाव को छोड़ कर परमात्मा भाव की दृष्टि प्राप्त कर लेना परमात्मा को प्राप्त कर लेना है। मुमुक्ष व्यक्ति सदा इसी प्रकार की मुक्ति और परमात्मा प्राप्ति के लिए निरन्तर तीव्र प्रयत्न करने वाले होते हैं।

सत्संग- शरीर को श्रेष्ठ पुरुषों की मित्रता समीपता, दृष्टि, कृपा एवं रोशनी में रखना, मन को सत् उचित बातें सुनने, कहने और सोचने में लगाये रहना, आत्मा में सत्य प्राप्ति की उत्कट लालसा भरे रहना सत्संग है। जिन साधनों से आत्मा मन और शरीर सत् तत्व के समीप रहें वे सब सत्संग हैं।

पाठको! यदि आप अपने मन में देवताओं को आमंत्रित करना चाहते हो तो इन तीन कठिन वस्तुओं का ध्यान रखो। यही ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं जो इन तीनों को प्राप्त कर लेता है उसे इसी जीवन में देव लोक का अक्षय आनन्द प्राप्त हो जाता है।


Quotation

दूर से भौंकने वाला कुत्ता काटता नहीं। जो अवसर आने से पहले बहुत बड़बड़ाता है वह समय पर पुरुषार्थ नहीं दिखाता।

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स्वर्ग, पृथ्वी और नरक में बहुत अन्तर नहीं है। जहाँ प्रेम और सचाई है वहाँ स्वर्ग है। जहाँ चतुरता और श्रम है वह पृथ्वी है। और जहाँ स्वार्थ एवं आलस्य है वहाँ प्रत्यक्ष नरक है।


धर्म का विश्वास

(श्री स्वामी शिवानन्द जी)

“धर्म” वह विश्वास है जिसके द्वारा मनुष्य ईश्वर को जानता है और उनकी पूजा करता है। यह क्लब (ष्टद्यह्वड्ढ) की मेज पर बैठ कर वाद-विवाद करने का विषय नहीं है। यह सत्य आत्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान और साधन है। यह मनुष्य की गंभीर आन्तरिक उत्कण्ठा (आकाँक्षा) की सिद्धि है। तुम अपने जीवन को प्रति-क्षण इसी की साधना में व्यतीत करो। इस सिद्धि के बिना जीवन वास्तव में मृत्यु है। अपने विचारों को शोधों (उनका सार निकालो)। अपने प्रयोजनों को परखो (या उनकी परीक्षा करो) स्वार्थभाव का त्याग करो। इन्द्रिय विकारों को शाँत करो। घमण्ड और अहंकार का नाश करो, प्रत्येक जीव से प्रेम करो तथा उसकी सेवा करो। अपने हृदय को शुद्ध करो। अपने मन के मल को साफ करो। सुनो, सोचो, एकाग्रचित्त करो और ध्यान करो, इस प्रकार आत्म सिद्धि प्राप्त करो।

हे सौम्य! प्रिय अविनाशी आत्मा! साहसी बनो, यद्यपि तुम बेकारी की अवस्था में भी हो, यद्यपि तुम्हारे पास भोजन के लिये कुछ भी नहीं हो, यद्यपि तुम्हारे शरीर पर केवल चिथड़े ही हों लेकिन तुम खुश रहो क्योंकि तुम्हारी मूल प्रकृति ‘सत-चित-आनन्द’ है। यह बाहरी जामा, यह नश्वर (मर्त्य) स्थूल कोष (अन्नमय कोष) अर्थात् शरीर, माया की मायावी सृष्टि है। इस माँस के पिंजरे से बाहर निकलो। तुम यह विनाशी (मर्त्य) शरीर नहीं हो। तुम अविनाशी अमृत आत्मा हो। तुम स्त्री, पुरुष भेद से रहित आत्मा हो। तुम वह आत्मा हो जो कि तुम्हारे हृदय के मन्दिर में बसती है। उसी की तरह तुम काम करो। उसी की तरह संवेदन (अनुभव) करो।


सहज समाधि

महात्मा कबीर का वचन-

साधो! सहज समाधि भली।

गुरु प्रताप भयो जा दिन से सुरति न अनंत चली॥ आँखन मूँदूँ कानन रुँदूँ, काया कष्ट न धारुँ।

खुले नयन से हँस-हँस देखूँ सुन्दर रुप निहारुँ॥ कहूँ सोई नाम, सुनूँ सोई सुमिरन, खाउँ पीउँ सोई पूजा गृह उद्यान एक सम लेखूँ भाव मिटाउँ दूजा॥ जहाँ-2 जाऊँ सोई परिक्रमा जो कछु करूं सो सेवा। जब सोउँ तब करूं दंडवत, पूजूँ और न देवा॥

शब्द निरंतर मनुआ राता, मलिन बासना त्यागी।

बैठत उठत कबहूँ न विसरै, ऐसी ताड़ी लागी॥

कहै कबीर यह उन मनि रहनी सोई प्रकट कर गाई। दुख सुख के एक परे परम सुख, तेहि सुख रहा समाई॥

उपरोक्त पद में सद्गुरु कबीर ने सहज समाधि की स्थिति का स्पष्टीकरण किया है यह समाधि सहज है- सर्व सुलभ है- सर्व साधारण की साधना शक्ति के भीतर है, इसीलिए उसे ‘सहज-समाधि’ का नाम दिया गया है। हठ योग, राज योग, लय योग, नाद योग, बिन्दु योग, आदि की साधना से कठिन है, उनका अभ्यास करते हुए समाधि की स्थिति तक पहुँचना असाधारण कष्ट साध्य है। चिरकालीन तपश्चर्या, षट्कर्मों के श्रम साध्य साधन सब किसी के लिए सुलभ नहीं हैं। अनुभवी गुरु के सम्मुख रहकर विशेष सावधानी के साथ वे क्रियाएं साधनी पड़ती हैं फिर यदि उनका साधन खंडित हो जाय तो वे संकट भी सामने आ सकते हैं जो योग भ्रष्ट लोगों के सामने कभी-कभी भयंकर रूप से आ खड़े होते हैं।

कबीर जी सहज योग को प्रधानता देते हैं। सहज योग का तात्पर्य है- सिद्धान्त मय जीवन, कर्त्तव्य पूर्ण कार्यक्रम। इन्द्रिय भोगों, पाशविक वृत्तियों एवं काम, क्रोध, लोभ, मोह की तुच्छ इच्छाओं से प्रेरित होकर आमतौर से लोग अपना कार्य-क्रम निर्धारित करते हैं।

1.संपत्ति संचय, 2. अहंकार की पूर्ति, 3. मनोरंजन, 4. काम सेवन, 5. रुचिकर आदर विहार, 6. ममत्व का पोषण, 7. परिग्रह की तृष्णा। इन सात इच्छाओं की आधार धुरी पर घूमने वाले जीवन ‘भोगी जीवन’ है। जो इस छोटी सीमा में ही घिरे रहते हैं, इसी घेरे में अपने विचार और कार्यों को सीमित रखते हैं वे बन्धन ग्रस्त हैं, माया पाश में बँधें हुए हैं। योगी लोग इस क्षुद्र सीमा का उल्लंघन करके आगे बढ़ते हैं, वे इस बचपन से ऊँचे उठकर अध्यात्मिक यौवन की सीमा में पदार्पण करते हैं। भोगमयी क्षुद्रता को योगी लोग उल्लंघन करते हैं इसलिए उन्हें जीवन मुक्त कहते हैं।

योगियों का जीवन आदर्शमय होता है, अथवा यों कहना चाहिए कि जिनका जीवन सिद्धान्त मय-आदर्शमय है वे योगी हैं। जो वासना एवं तृष्णा से प्रेरणा ग्रहण नहीं करते, जिन्होंने तुच्छ स्वार्थों को महत्व देना छोड़ दिया है और आदर्शों की, सिद्धान्तों की स्थिरता के ऊपर खड़े होकर जीवन की गति-विधि को चलाते हैं वे योगी हैं। योग की आधार शिला यही है। अब आगे के साधन, अभ्यास, स्थूल, भिन्न-भिन्न हैं उनकी कार्य प्रणाली पृथक-पृथक है। इस पृथकता और भिन्नता के होते हुए भी मूल तथ्य सभी साधनाओं के अंतर्गत एक ही है।

सहज योग, असंख्य प्रकार की योग साधनाओं में से एक है। इसकी विशेषता यह है कि साधारण रीति से साँसारिक कार्य करते हुए भी साधना क्रम चलता रहता है। इसी बात को यों भी कहना चाहिए कि दैनिक जीवन के समान साँसारिक काम ही साधना भय बन जाते हैं। सहज योगी अपने दिन भर के कार्यों को कर्त्तव्य, यज्ञ, धर्म, ईश्वरीय आज्ञा पालन की दृष्टि से करता है। भोजन करने में उसकी भावना रहती है कि प्रभु की एक पवित्र धरोहर शरीर को यथावत रखने के लिए भोजन किया जा रहा है। खाद्य पदार्थों का चुनाव करते समय शरीर की स्वस्थता उसका ध्येय रहता है, स्वादों के चटोरेपन के बारे में वह सोचता तक नहीं। कुटुम्ब का पालन पोषण करते समय वह परमात्मा की एक सुरम्य वाटिका का माली की भाँति सिंचन, संवर्धन का ध्यान रखता है, कुटुम्बियों को अपनी सम्पत्ति नहीं मानता। जीविकोपार्जन को ईश्वर प्रदत्त आवश्यकताओं की पूर्ति का एक पुनीत साधन मात्र समझता है, अमीर बनने के लिए जैसे भी बने वैसे धन संग्रह करने की तृष्णा उसे नहीं होती। बात चीत करना, चलना फिरना, खाना, पीना, सोना, जागना, जीविकोपार्जन, प्रेम, द्वेष आदि सभी कार्यों को करने से पूर्व परमार्थ को, कर्त्तव्य को, धर्म को, प्रधानता देते हुए करने से वे समस्त साधारण काम काज यज्ञ रूप हो जाते हैं।

जब हर काम के मूल में कर्त्तव्य भाव को प्रधानता रहेगी तो उन कार्यों में पुण्य प्रमुख रहेगा। सद्बुद्धि से सद्भाव से किये हुए कार्यों द्वारा अपने आपको और दूसरों को सुख शान्ति ही प्राप्त होती है। ऐसे सत्कार्य मुक्ति प्रद होते हैं, बन्धन नहीं करते। सात्विकता सद्भावना और लोक सेवा की पवित्र आकाँक्षा के साथ जीवन संचालन करने पर कुछ दिन में वह नीति एवं कार्य प्रणाली पूर्ण तथा अभ्यस्त ही जाती है और जो चीज अभ्यास से आ जाती हैं वह प्रिय लगने लगती हैं, उसमें रस आने लगता है। बुरे स्वाद की, खर्चीली, प्रत्यक्ष हानिकारक, दुष्प्राप्य, नशीली चीजें- मदिरा, अफीम, तम्बाकू आदि चीजें जब कुछ दिन के प्रयोग के बाद प्रिय लगने लगती हैं और उन्हें बहुत कष्ट उठाते हुए भी छोड़ते नहीं बनता। जब तामसी तत्व कालान्तर के अभ्यास से इतने प्राणप्रिय हो जाते हैं तो कोई कारण नहीं कि सात्विक तत्व उससे अधिक प्रिय न हो सकें।

सात्विक सिद्धान्तों को जीवन का आधार बना लेने से, उन्हीं के अनुसार विचार और कार्य करने से आत्मा को सत् तत्व में स्मरण करने का अभ्यास पड़ जाता है, यह अभ्यास जैसे-जैसे परिपक्व होता जाता है वैसे-वैसे सहज योग का रसास्वादन होने लगता है, उसमें आनन्द आने लगता है। जब अधिक दृढ़ता, श्रद्धा, विश्वास, उत्साह एवं साहस के साथ सत् परायणता में, सिद्धान्त संचालित जीवन में परायण रहता है तो वह उसकी स्थायी वृत्ति बन जाती है, उसे उसी में तन्मयता रहती है एक दिव्य आवेश सा छाया रहता है, उसकी मस्ती, प्रसन्नता, संतुष्टता असाधारण होती है। इस स्थिति के सहज योग को समाधि या ‘सहज समाधि’ कहा जाता है।

कबीर ने उसी समाधि का उपरोक्त पद में उल्लेख किया है। वे कहते हैं- ‘हे साधुओं! सहज समाधि श्रेष्ठ है। जिस दिन से गुरु की कृपा हुई है यह स्थिति प्राप्त हुई है उस दिन से सुरति दूसरी जगह नहीं गई- चित्त डामा डोल नहीं हुआ। मैं कान मूँद कर, कान रुँध कर, कोई हठयोग की काया कष्टदायिनी साधना नहीं करता। मैं तो आँखें खोले रहता हूँ और हँस-हँस कर परमात्मा की पुनीत कृति का सुन्दर रूप देखता हूँ। जो कहता हूँ सो नाम जप है। जो सुनता हूँ सो सुमिरन है, जो खाता-पीता हूँ सो पूजा है। घर और जंगल एक सा देखता हूँ, और द्वैत का भाव मिटाता हूँ। जहाँ-जहाँ जाता हूँ, सोई परमात्मा है और जो कुछ करता हूँ सो सेवा है। जब सोता हूँ तो वहीं मेरा दंडवत है। मैं एक को छोड़ कर अन्य देव को नहीं पूजता। मन मलिन वासना छोड़ कर निरन्तर शब्द में, अन्त करण की ईश्वरीय वाणी सुनने में रत रहता है। ऐसी तारी लगी है- निष्ठा जमी है कि उठते बैठते वह कभी नहीं बिसरती। कबीर कहते हैं कि मेरी यह उन मानी-हर्ष शोक से रहित-स्थिति है जिसे प्रकट करके गाया है। दुख सुख से परे जो एक परम सुख है उसमें समा रहा हूँ।”

यह सहज समाधि उन्हें प्राप्त होती है जो “शब्द में रत” रहते हैं। भोग एवं तृष्णा की शुद्र वृत्तियों का पर त्याग करके जो अन्तःकरण में प्रतिक्षण ध्वनित होने वाले ईश्वरीय शब्दों को सुनते हैं-सत्य की दिशा में ही चलने की ओर दैवी संकेतों को देखते हैं-और उन्हीं को जीवन नीति बनाते हैं वे ‘शब्द रत’ सहज योगी उस परम आनन्द से सहज समाधि सुख को प्राप्त होते हैं। चूँकि उनका उद्देश्य ऊंचा रहता है, दैवी प्रेरणा पर निर्भरता रहती है इसलिए उनके समस्त कार्य पुण्य रूप साधना रूप, बन जाते हैं। जैसे खाँड़ से बना हुआ खिलौना आकृति में कैसे ही क्यों न हो, होंगे मीठे ही। इसी प्रकार सद्भावना और उद्देश्य परायणता के साथ किये हुए काम बाह्य आकृति में कैसे ही क्यों न दिखाई देते हों, होंगे वे यज्ञ रूप ही, पुण्यमय ही, सत्य परायण व्यक्तियों के सम्पूर्ण कार्य-छोटे से छोटे कार्य-यहाँ तक कि चलना, सोना, खाना देखना तक ईश्वर आराधना बन जाते हैं।

स्वल्प प्रयास में समाधि का शाश्वत सुख उपलब्ध करने की इच्छा रखने वाले अध्यात्म मार्ग के पथिकों को चाहिए कि वे जीवन दृष्टिकोण उच्च उद्देश्यों पर अवलम्बित करें। दैनिक कार्यक्रम का सैद्धान्तिक दृष्टि से निर्णय करें। भोग से ऊंचे उठकर योग में आस्था आरोपण करें। इस दिशा में जो जितनी-जितनी प्रगति करेगा उसे उतने ही अंशों में समाधि में लोकोत्तर सुख का रसास्वादन होता चलेगा।


सब कुछ भगवान का है।

(योगी अरविन्द घोष)

हमारे पास कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जिसे हम अपनी कह सकें, सब वस्तु भगवान की है, यह जीवन उसी के लिए है, हमारी वासना, हमारी कामना, हमारा मानवता, हमारा आदर्श, उचित-अनुचित, सम्भव-असम्भव जो कुछ ज्ञान है। उन सबको इसी भगवंत ज्ञान के अनुगामी करना होगा। हृदय की समस्त आशा आकाँक्षा एवं बुद्धि के सब विकारों को हटाना होगा धारणा करनी होगी कि यह जगत और हम अभिन्न हैं इस अनन्त कोटि ब्रह्माँड के भीतर सत् चित आनन्द स्थित है, यह सब उसी परब्रह्म के विकास हैं, वे ही इस विश्व पट पर ज्ञान, शक्ति और प्रेम की अनन्त लीला प्रगट करते और दिखलाते हैं। सभी प्रकार के भेद भावों को दूर प्रकट करते और दिखलाते हैं।

सभी प्रकार के भेदभावों को दूर करके उस विश्व शिल्पी के हाथ में अपने को खिलौने की तरह समर्पण करके निश्चिन्त होने से ही परम आनन्द मिल सकेगा। अहंकार इस उत्तम योग मार्ग का कंटक है। अहंकार दूर होने से भगवान की पूर्ण लीला हम लोगों के जीवन में कुँभ में अभिनीत होगी, पूर्ण ज्ञान, प्रेम, आनन्द और शान्ति से हमारा यह जीवन पूर्ण रूप से विकसित हो उठेगा और तभी हम दिव्य जीवन का उपयोग कर सकेंगे, क्योंकि तब हमारा जीवन भगवत् लीला का आधार स्वरूप बन जायगा। इस प्रकार आत्मोत्सर्ग यदि साधक अंशतः भी कर सकेंगे तो उनके कुसंस्कार की दुष्प्रवृत्तियाँ और बुरे कर्मों की ओर झुकाने वाली अन्धचेष्टा की वृत्तियाँ दूर हो जायेंगी।


रोग निवारण के मानसिक प्रयोग

(प्रो. रामचरण जी महेन्द्र एम. ए. डी. लिट्.)

मानसिक उपचारों द्वारा जो विचित्र चमत्कार प्राप्त होते हैं, उनका अनुभव पाठकों को निम्न-स्वर्ण-सूत्रों से उपलब्ध होगा। ये सूत्र बड़े-बड़े अनुभवी मानस चिकित्सकों के जीवन के निचोड़ हैं। इनमें गहरा अनुभव एवं अनुसंधान निहित है। पाठकों से हमारा अनुरोध है कि वे इन प्रयोगों को स्वयं कर देखें।

अमृतधारा ध्यान-

रोगी को प्रतिदिन सायं-प्रातः एकान्त स्थल अथवा किसी शान्त स्थल, मन्दिर इत्यादि में बैठकर एक घण्टे तक अपने इष्टदेव का या जिस पर उसका विशेष प्रेम, श्रद्धा, व विश्वास हो, उसका ध्यान नियत समय पर करना चाहिए। ध्यान के समय ऐसा देखने का प्रयत्न करें कि इष्टदेव स्वर्ण के कमंडल से अमृत की वर्षा हमारे मस्तिष्क पर कर रहे हैं जिसकी धारा उदर में प्रवेश कर रही है। जिसकी प्रत्येक बूँद सम्पूर्ण रोगों को समूल नष्ट कर रही है तथा शरीर में अतुलबल, स्वास्थ्य, व उत्साह प्रदान कर रही है। इस अमृतधारा ध्यान से कुछ ही सप्ताहों में पुराने रोगों से छुटकारा मिल जायगा।

सिरदर्द मिटाने के प्रयोग-

शान्त होकर अपनी मानसिक प्रवृत्तियों को पैरों पर एकाग्र करो। पैरों का ही ध्यान करो और इच्छा करो कि पैरों की तरफ ऊपर से नीचे की ओर रक्त संचार हो रहा है। इच्छा से रक्त की मस्तक में अधिकता मिटा कर नीचे की ओर उसका संचार होगा। इससे सिरदर्द मिट जाता है।

सिरदर्द मिटाने के लिए दूसरा प्रयोग कपाल के मध्य में ध्यान एकाग्र करने का है। अब इच्छा करो कि मस्तक की सारी शक्ति उसी मध्य बिन्दु में आ रही है। वह शक्ति तुम्हारे आज्ञानुसार कार्य कर रही है। रोग के द्रव्य हट रहे हैं। सरदर्द कम हो रहा है। प्रसन्नता एवं आनन्द आत्मा से प्रकाशित होने लगा है। इस ध्यान में मग्न होते ही सिरदर्द का फुर हो जायगा।

पाचन शक्ति सुधार-

हमारे शरीर के जठर भाग में रक्त संचालन बराबर न होने से पाचन शक्ति विकृत हो जाती है। इसके लिए अपना मन पाचन क्रिया पर लगाओ और ध्यान करो कि जठर भाग में रक्त संचालन ठीक हो रहा है। हमें थोड़ी-थोड़ी क्षुधा लगने लगी है। पाचन शक्ति तेजी से कार्य कर रही है। ऐसी भावना से विद्युत का सा प्रभाव पड़ेगा।

ठंड से बच सकते हैं-

जाड़े के दिनों में जब ठंड लगती हो, सहन न हो सकती हो तो अपने शरीर के सब अंगों में रक्त गति बढ़ाने का प्रयत्न करो। मन को उत्तेजित करो। ध्यान कर प्रबल इच्छा करो कि सम्पूर्ण शरीर में रक्त तीव्र गति से संचरित हो रहा है। नस-नस में तेजी से रक्त दौड़ रहा है। गर्मी आ रही है। चारों ओर गर्मी ही गर्मी भरी पड़ी है।

घबराहट से मुक्ति-

जब अशान्ति, घबराहट या थकान मालूम हो तो दस बीस मिनट पूर्ण शान्त रहो। अपने मन के अन्तर्भाग में पूर्ण शान्ति स्थापित होने की इच्छा करो। शरीर में प्रत्येक भाग में शान्ति का ध्यान करो। मुझमें क्रमशः भक्ति प्रेम और शान्ति का स्त्रोत खुल गया है। मेरे पवित्र हृदय में तो शान्ति की सरिता का प्रवाह बड़े वेग से बहने लगा है। मेरे शान्त और पवित्र हृदय को क्लेश एवं कष्ट कैसे स्पर्श हो सकता है? मैं पूर्ण तृप्त हो गया हूँ। मेरे हृदय में अब कोई प्रचंड द्वन्द्व उधम नहीं मचा सकता। ऐसी भावना में ध्यान स्थिर करने से शरीर की घबराहट मिटकर ताजगी आती है। मन की अशान्ति दूर होकर एकाग्रता प्राप्त होती है।

जैसे चाहो वैसे बनो-

जब तुम अपने को जैसा प्रफुल्ल चाहते हो, वैसा न मालूम करते हो, तो अपने मन को बारबार सूचना देते रहो कि तुम जैसा चाहते हो, वैसा ही अनुभव भी कर रहे हो। जब कभी समय मिले इसी प्रकार की सूचना से मन को हरा भरा उत्साहित रखो ऐसा करने से प्रकृति तुमको इतनी सहायता देगी कि तुम्हारे शरीर में से सब सुस्ती दूर हो जावेगी। प्रकृति नित्य ही मनुष्य शरीर को नवीन और प्रफुल्ल बनाये रखने का प्रयत्न करती है। उत्तम सूचना से प्रकृति को इस काम में सहायता मिलती है।

जब तुम अपने आपको हारा थका कुछ हीन से मालूम पड़ते तो अपनी कल्पना के अनुसार अपने का सर्वोत्कृष्ट, समृद्धि शील सुन्दर और भव्य होने का चित्र अपने मानस जगत में खींचो। ऐसा करने से तुम अपने मन में अधिक उत्तमता, योग्यता, और निरोगता उत्पन्न करते हो। मन को परिपूर्ण और संतुष्ट करने पर तुमको अपना सब कुछ प्रिय और योग्य प्रतीत होता है।

सुन्दर कल्पना के चित्र-

जब तुम्हें आस-पास का वातावरण बुरा मालूम हो तो अपनी कल्पना में एक प्रशान्त चित्र खींच कर मन को उसी का ध्यान करने दो। इससे शीघ्र ही मन शान्त और सुखी हो जायगा। जब तुम्हें ऐसा प्रतीत हो कि तुम्हारा शरीर कमजोर हो रहा है या थक गया है तो तुम तुरन्त मन में बलवान इच्छा को जाग्रत करो कि-”तुम बलवान हो, शक्ति के अवतार हो! कार्यक्षम हो।” इस इच्छा को इस प्रकार करो कि शरीर के रोम-रोम में, नस-नस में बल स्फूर्ति का संचार होते हुए जान पड़े। ऐसा करने से तुम घंटों बिना किसी उचाट के काम करते रहोगे।

जब तुमको अपनी प्रकृति ठीक न जान पड़े तो कम भोजन करो और अधिक निद्रा लो। ऐसे समय अपने शरीर में जो नीरोग मय और बलवान तत्व हैं, उसका ही ध्यान करके मन को शान्त रखो। सबसे महत्वपूर्ण तत्व तो यह है कि हमारा आरोग्य तब तक ठीक नहीं रह सकता और सुधर सकता जब तक हम अपने मन को सुन्दर विचार, उच्च भावना और आरोग्य मय सूचनाओं से निरोग रखें। शरीर का आरोग्य हमारे मन पर ही निर्भर है-यह कदापि न भूलिये।


Quotation

साँसारिक वैभव मनुष्य को अपनी दृष्टि में न तो ऊँचा उठा सकता है और न नीचा गिरा सकता है। महान पुरुष स्वयं अपनी दृष्टि में बड़ा होता है, संसार चाहे उसकी महानता से परिचित हो या न हो। नीच मनुष्य स्वयं अपनी कमजोरी जानता है, अतः वह उस सतह तक कभी ऊँचा नहीं उठ सकता, जिस तक उसके प्रशंसक उसे उठाना चाहते हैं।

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मनुष्य अपनी इच्छा और रुचि के अनुकूल संसार को नहीं बना सकता अपितु साँसारिक परिस्थिति के अनुकूल अपने आपको ही बनाना होता है। संसार सार्वजनिक आवश्यकताओं के लिए बना है। व्यक्ति को अपनी आकांक्षाएं सार्वजनिक आवश्यकता के अन्तर्भूत कर देना चाहिए।


सत्य का तथ्य

मोटे तौर से जो बात जैसी सुनी है उसे वैसे ही कहना ‘सत्य’ कहा जाता है। किन्तु सत्य की यह परिभाषा बहुत ही अपूर्ण और असमाधानकारक है। सत्य एक अत्यंत विस्तीर्ण और व्यापक तत्व है। वह सृष्टि निर्माण के आधार स्तंभों में सब से प्रधान है। सत्य भाषण उस महान सत्य का एक अत्यन्त छोटा अणु है, इतना छोटा जितना समुद्र के मुकाबले में पानी की एक बूँद।

सत्य बोलना चाहिए, पर सत्य बोलने से पहले सत्य की व्यापकता और उसके तत्व ज्ञान को जान लेना चाहिए, क्योंकि देश काल और पात्र के भेद से बात को तोड़-मरोड़ कर या अलंकारिक भाषा में कहना पड़ता है। धर्म ग्रन्थों में मामूली से कर्म काण्ड के फल बहुत ही बढ़ा-चढ़ा कर लिखे गये हैं। जैसे गंगा स्नान से सात जन्मों के पाप नष्ट होना, व्रत उपवास रखने से स्वर्ग मिलना, गौदान से वैतरणी तर जाना, मूर्ति पूजा से मुक्ति प्राप्त होना, यह सब बातें तत्व ज्ञान की दृष्टि से असत्य हैं क्योंकि इन कर्मकाण्डों से मन में पवित्रता का संचार होना और बुद्धि का धर्म की ओर झुकना तो समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि इतनी सी मामूली क्रियाओं का इतना बड़ा फल कैसे हो सकता है? यदि होता तो योग यज्ञ और तप जैसे महान साधनों की क्या आवश्यकता रहती? टके सेर मुक्ति का बाजार गर्म रहता। अब प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या वह धर्म ग्रन्थ झूठे हैं? क्या उन ग्रन्थों के रचयिता महानुभावों ने असत्य भाषण किया है। नहीं उनके कथन में भी रत्ती भर झूठ नहीं है और न उन्होंने किसी स्वार्थ बुद्धि से असत्य भाषण किया है। उन्होंने एक विशेष श्रेणी के अल्प बुद्धि के अविश्वासी, आलसी और लालची व्यक्तियों को, उनकी मनोभूमि परखते हुए एक खास तरीके से अलंकारिक भाषा में समझाया है। ऐसा करना अमुक श्रेणी के व्यक्तियों के लिए आवश्यक था, इसलिए धर्म ग्रन्थों का वह आदेश एक सीमा में सत्य ही है।

बच्चे के फोड़े पर मरहम पट्टी करते हुए डॉक्टर उसे दिलासा देता है। बच्चे डरो मत, जरा भी तकलीफ न होगी। बच्चा उसकी बात पर विश्वास कर लेता है, किन्तु डॉक्टर की बात झूठी निकलती है। मरहम पट्टी के वक्त बच्चे को काफी तकलीफ होती है, वह सोचता है कि डॉक्टर झूठा है, उसने मेरे साथ असत्य भाषण किया। परन्तु असल में वह झूठ बोलना नहीं है।

अध्यापक बच्चों को पाठ पढ़ाते हैं, गणित सिखाते हैं समझाने के लिए उन्हें ऐसे उदाहरण देने पड़ते हैं, जो अवास्तविक और असत्य होते हैं, फिर भी अध्यापक को झूठा नहीं कहा जाता।

जिन्हें मानसिक रोग हो जाते हैं या भूत प्रेत लगने का वहम हो जाता है, उनका ताँत्रिक या मनोवैज्ञानिक उपचार इस प्रकार करना पड़ता है जिससे पीड़ित का वहम निकल जाय। भूत लगने पर भुतहे ढंग से उसे अच्छा किया जाता है यदि वहम बता दिया जाय तो रोगी का मन न भरेगा और उसका कष्ट न मिटेगा। तान्त्रिक और मनोविज्ञान के उपचार में प्रायः नब्बे फीसदी झूठ बोलकर रोगी को अच्छा करना पड़ता है, परन्तु वह सब झूठ की श्रेणी में नहीं ठहराया जाता।

राजनीति में अनेक बार झूठ को सच सिद्ध किया जाता है। दुष्टों से अपना बचाव करने के लिए झूठ बोला जा सकता है। दम्पत्ति अपने गुप्त सहवास को प्रकट नहीं करते। आर्थिक, व्यापारिक या अन्य ऐसे ही भेदों को प्रायः सच-सच नहीं बताया जाता है।

कई बार सत्य बोलना ही निषिद्ध होता है। काने को काना और लँगड़े को लँगड़ा कहकर संबोधन करना कोई सत्य भाषण थोड़े ही है। फौजी गुप्त भेदों को प्रकट कर देने वाला अथवा दुश्मन को अपने देश की सच्ची सूचना देने वाला भी अपराधी समझा जाता है और कानून से उसे कठोर सजा मिलती है। भागी हुई गाय का पता कसाई को बता देना क्या सत्य भाषण हुआ?

इस प्रकार बोलने में ही सत्य को मर्यादित कर देना एक बहुत बड़ा भ्रम है, जिसमें अविवेकी व्यक्ति ही उलझे रह सकते हैं। सच तो यह है कि लोग कल्याण के लिए देश, काल और पात्र का ध्यान रखते हुए नग्न सत्य की अपेक्षा अलंकारिक भाषण से ही काम लेना पड़ता है। जिस वचन से दूसरों की भलाई होती हो सन्मार्ग के लिए प्रोत्साहन मिलता हो वह सत्य है। कई बार हीन चरित्र वालों की झूठी प्रशंसा करने पर वे एक प्रकार की लोक में लाज बंध जाते हैं और स्वसंमोहन विद्या के अनुसार अपने को सचमुच प्रशंसनीय अनुभव करते हुए निश्चय पूर्वक प्रशंसा योग्य बन जाते हैं। ऐसा असत्य भाषण सत्य कहा जायगा। किसी व्यक्ति के दोषों को खोल खोलकर उससे कहा जाय तो वह अपने को निराश, पराजित और पतित अनुभव करता हुआ वैसा ही बन जाता है। ऐसा सत्य असत्य से भी बढ़कर निन्दनीय है।

भाषण संबंध सत्य की परिभाषा होनी चाहिए कि “जिससे लोक हित हो, वह सत्य और जिससे अहित हो वह असत्य है।” मित्र धर्म का विवेचन करती हुई रामायण उपदेश देती है कि, “गुण प्रकट अवगुणहि दुराबा” यहाँ दुराव को, असत्य को धर्म माना गया है। आपका भाषण कितना सत्य है कितना असत्य, इसकी परीक्षा इस कसौटी पर कीजिये कि इससे संसार का कितना हित और कितना अहित होता है। सद्भावनाओं की उन्नति होती है या अवनति, सद्विचारों का विकास होता है या विनाश। पवित्र उद्देश्य के साथ निस्वार्थ भाव से परोपकार के लिए बोला हुआ असत्य भी सत्य है और बुरी नीयत से, स्वार्थ के वशीभूत होकर पर पीड़ा के लिए बोला गया सत्य भी असत्य है। इस मर्म को भली भाँति समझकर गिरह बाँध लेना चाहिए।

वास्तविक और व्यापक सत्य ऊँची वस्तु है वह भाषण का नहीं, वरन् पहिचानने का विषय है। समस्त तत्वज्ञानी उसी महान तत्व की अपनी-अपनी दृष्टि के अनुसार व्याख्या कर रहे हैं। विश्व की रंग स्थली, उसमें नाचने वाली कठपुतलियाँ, नचाने वाली तंत्री तत्वतः क्या है, इसका उद्देश्य और कार्य कारण क्या है, इस भूल भुलैयों के खेल का दरवाजा कहाँ हैं, यह बाजीगरी विद्या कहाँ से और क्योंकर संचालित होती है? इसका मर्म जानना सत्य की शोध है। ईश्वर, जीव प्रकृति के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करके अपने को भ्रम बन्धनों से बचाते हुए परम पद प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ना मनुष्य जीवन का ध्रुव सत्य है। उसी सत्य को प्राप्त करने के लिए हमारा निरन्तर उद्योग होना चाहिए।

भगवान् वेद व्यास ने योगदर्शन 2।20 का भाष्य करते हुए सत्य की विवेचना इस प्रकार की है।

“परन्न स्वबोध संक्रान्तये वागुप्ता सा यदि न वंचिता भ्रान्ता व प्रतिपत्ति बन्ध्या वा भवेदिति। एथा सर्वभूतोपकरार्थ प्रवृत्ता, न भूतोपघाताय। यदि चैवमय्यभिधीयमाना भूतोपघात परैवस्यान्न सत्यं भवेत् पापमेव भवेत्।”

अर्थात्- ‘सत्य’ वह है चाहे वह ठगी, भ्रम, प्रतिपत्ति बन्ध्या युक्त हो अथवा रहित, जो प्राणिमात्र के उपकारार्थ प्रयुक्त किया जाय। न कि किसी प्राणी के अनिष्ट के लिए। यदि सत्यता पूर्वक कही गई यथार्थ बात से प्राणियों को अहित होता है- तो वह ‘सत्य’ नहीं। प्रच्युत सत्या भास ही है और ऐसा सत्य भाषण असत्य में परिणत होकर पाप कारक बन जाता है। जैसे कसाई के यह पूछने पर कि-गाय इधर गई हैं? यदि ‘हाँ, में उत्तर दिया जाय तो यह सत्य प्रतीत होने पर भी सत्य नहीं, प्रत्युत प्राणी घातक है। अन्य उपाय न रहने पर विवेकपूर्वक सत्कार्य के लिए असत्य भाषण करना ही सत्य भी है।

महाभारत ने सत्य की मीमाँसा इस प्रकार की है-

“न तत्व वचन सत्यं, ना तत्व वचनं मृषा।

यद्भूत हित मत्यन्तम् तत्सत्यमिति कथ्यते॥”

अर्थात्-बात को ज्यों की त्यों कह देना सत्य नहीं है और न बात को ज्यों की त्यों न कह देना असत्य है। जिसमें प्राणियों का अधिक हित होता हो वही ‘सत्य’ है।

‘सत्य’ को वाणी का एक विशेषण बना देना उस महातत्व को अपमानित करना है। सत्य बोलना मामूली बात है जिसमें आवश्यकतानुसार हेर-फेर भी किया जा सकता है। सत्य को ढूँढ़ना, वास्तविकता का पता लगाना, और जो-जो बात सच्ची प्रतीत हो उस पर प्राण देकर दृढ़ रहना, यह सत्य परायणता है। ‘यम’ की दूसरी सीढ़ी ‘सत्य बोलना’ नहीं सत्य परायण होना है। योग मार्ग के अभ्यासी को सत्यवादी होने की अपेक्षा सत्य परायण होने का साहस, निर्भीकता, और ईमानदारी के साथ प्रयत्न करना चाहिए।


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मनुष्य सहस्र बार नीचे गिर सकता है पर उसे सहस्र वार ही ऊँचे उठने का प्रयत्न करना चाहिए। जहाँ से वह गिरा था वहाँ से अधिक ऊँचा उठने का हर बार प्रयत्न होना चाहिए। पूर्णता प्राप्त करने का यही अव्यर्थ साधन है।


सत्य ही शक्ति है।

जो मनुष्य बोलता कुछ है, विचारता कुछ और करता कुछ और ही है वह आगे चलकर बड़ा नीच विश्वासघाती और पर निन्दा में रत हो जायगा। वह समाज-कण्टक बन कर समस्त संसार के तिरस्कार का पात्र हो जायगा। सत्य पक्ष के ऊपर पहले चाहे विपत्ति भी आ जाय परन्तु अन्त में उसकी जीत हुए बिना नहीं रहती। सत्य का मार्ग अगम होने पर भी सुगम, सीधा और सरल होता है। सत्य के ही बल पर संसार स्थित है। इसके विपरीत झूठे पन का मार्ग क्षणिक मोहकता के कारण पहले यद्यपि सरल मालूम होता हो परन्तु अन्त में दूध का दूध और पानी का पानी होता है, हर एक मनुष्य इस बात को जानता है कि झूठ सदा अन्त तक नहीं छिप सकता। तब फिर भंडा फूट जाने पर बड़ी विपन्न दशा आ पहुँचती है। इतना ही नहीं झूठे पन का मार्ग सभी तरह से नाशकारी हैं। एक झूठ बात कह कर उसका निर्वाह करने के लिए दूसरी झूठ बात बनानी पड़ती है और दूसरी के लिए तीसरी इस प्रकार सदा झूठी बातें करने की ही आवश्यकता होती जाती है।

अन्त में किसी न किसी तरह निशाना चूक जाने पर मनुष्य ऐसा बेढ़ग फँसता है कि फिर उस जाल से जन्म भर निकलना असम्भव हो जाता है। असत्य प्रिय मनुष्य अपने आचरण से सदा विचार हीनता, मन-दुर्बलता और कायरता प्रकट किया करता है।


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आशावादी मनुष्यों को प्रायः सफलता ही मिलती है क्योंकि वे नाना प्रकार के संदेहों और संकल्प विकल्पों में अपनी शक्ति नष्ट होने से बचा लेते हैं।


पेट ठीक रखने की दो क्रियाएं

पेट को ठीक रखना एक ऐसा सुनिश्चित उपाय है जिससे प्रायः सभी रोगों से बचा जा सकता है। 1. कड़ी भूख लगने पर खाना। 2. खूब चबा-चबा कर खाना। 3. पेट को थोड़ा खाली रहने देना। 4. सुपाच्य सात्विक पदार्थ खाना और 5. भोजन में अमृत की भावना करके खाना। इन पाँच नियमों का जो सावधानी के साथ अनुसरण करता है उसको कब्ज की शिकायत करने का अवसर नहीं आता।

पेट की कमजोरी दूर करके पाचन यंत्रों को सबल बनाने तथा आमाशय और आँतों की खराबियों को दूर करने के लिए योगाभ्यास के अंतर्गत ‘उड्डियान बंध’ और ‘नौलि कर्म’ दो साधनाएं ऐसी हैं जिनसे पेट का बड़ा हित होता है। उन दोनों की विधि नीचे बताई जाती हैं।

उड्डियान बंध -

प्रातःकाल सुखासन या पद्मासन से बैठ कर दोनों हाथों को दोनों घुटनों पर रखो सिर को जरा नीचे की तरफ झुकाओ, रीढ़ (मेरुदंड) जरा झुकने दो। फिर आहिस्ता-आहिस्ता श्वांस नासिका द्वारा बाहर निकाल डालो, और साथ ही उदर को अन्दर खींचो और बाहर निकालो, इस प्रकार चार बार करो, पुनः श्वास लेकर निकाल दो और फिर उसी प्रकार करो, प्रथम दिन प्रातःकाल 5 या 6 बार करो और सायंकाल भी यानी प्रातः-काल के भोजन के 5 घन्टे पश्चात् 5 या 6 बार करो, इसको उड्डियान बंध कहते हैं। पेट जितना हो सके अन्दर जाने दो और जल्दी से बाहर निकाल दो, ध्यान रहे! जब कि पेट को अन्दर लेने तथा बाहर निकालने का काम करते रहो तब तक श्वाँसों को बन्द रखो यानी निकाले हुए ही रहना चाहिये। यदि रोग पुराना और शरीर स्थूल (मोटा) हो तो उक्त प्रमाण से अधिक यानी 8 या 9 बार करो और धीरे-धीरे बारह बार करना विशेष लाभप्रद होगा।

ऐसा अभ्यास प्रति दिन 7 दिन तक दो-दो बार अधिक बढ़ाते जा वो तीन या चार दिन के बाद बहुत ही आराम मालूम होने लगेगा। दस्त साफ आवेगा, पेट की शिकायतें दूर होती जायगी, नींद अच्छी आवेगी, शरीर हल्का व चित्त प्रसन्न रह कर स्फूर्ति दीखने लगेगी, परन्तु ऐसे समय में खाने पर पूर्ण ध्यान रखना चाहिये भारी खुराक बिलकुल नहीं लेनी चाहिये।

नौलि कर्म -

जब उड्डियान अच्छी तरह होकर खाद्य पदार्थ को भली प्रकार मिश्रित होकर रस बनने लगे।

प्रायः 15 दिन बाद सिद्धासन या पद्मासन से बैठकर घुटनों पर दोनों हाथ रखो और सिर को नीचे झुकाकर रीड़ को भी झुकाओ, फिर श्वास संपूर्ण रूप से बाहर निकाल कर पेट को अन्दर की ओर खींचो जब पेट अच्छी तरह अन्दर चला जाय तब केवल सिर्फ दोनों नलों को युक्ति से ऊपर को उठाओ (पेट नहीं उठाना सिर्फ नले ही उठाना चाहिये) और उठने के बाद दायें से बायें तरफ और बाई से दाई तरफ फिराओ, इस प्रकार तीन मिनट तक करो बीच-बीच में आराम लेते जाओ। यह कार्य प्रातःकाल (सुबह) उठने के साथ ही करना चाहिये, फिर दस मिनट बाद शौच को जाओ।

इस प्रकार नित्य करने से उदर से सर्व रोग नष्ट होकर पाचन शक्ति बढ़ती है और पेट के ठीक रहने से अन्य रोगों से बचाव होता रहता है।


दाम्पत्ति प्रेम का संतति पर प्रभाव

पति पत्नी के आपसी घनिष्ठ एवं सच्चे प्रेम का बहुत ही गंभीर प्रभाव बालकों के स्वास्थ्य, वर्ण एवं संस्कारों पर होता है। जो स्त्री पुरुष हृदय से एक दूसरे को प्रेम करते हैं और एक दूसरे की सुविधाओं का ध्यान रखते हैं उनके अन्तःकरण आपस में पूरी तरह मिल जाते हैं। जिस प्रकार उत्तम खाद और उत्तम पानी के मिलने से सुन्दर हरे भरे पौधे उगते हैं और उनकी भीतरी बाहरी सुन्दरता देखने ही योग्य होती है, उसी प्रकार पति और पत्नी का निष्कपट प्रेम सम्बन्ध होने पर बालकों का शरीर और मन परिपुष्ट हो जाता है।

डॉक्टर जान कावेन के अनुभव में एक ऐसा बालक आया जो बहुत छोटी उम्र का होने पर भी मशीनों के काम में बहुत जानकारी और दिलचस्पी रखता था। उन्होंने उसके पिता से पूछ कर मालूम किया कि जिन दिनों वह बालक अपनी माता के पेट में था तब उसका पिता इंजीनियरिंग संबंधी एक कार्य में बड़ी तत्परता से लगा हुआ था, वह जब काम पर से लौट कर आता तो अपनी गर्विणी स्त्री से भी उसी संबंध की वार्तालाप करता, तदनुसार बालक की प्रवृत्ति उसी ओर झुकी हुई थी।

डॉक्टर फाउलर के कुछ अनुभव बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, वे अपनी पुस्तक में लिखते हैं- मैं एक दिन घूमने जा रहा था कि रास्ते में दो बहुत ही तन्दुरुस्त और सुन्दर बालकों को देखा। मेरी इच्छा उनके सम्बन्ध में अधिक जानने की हुई। तलाश करता हुआ उनके घर पहुँचा और उनके माता-पिता से उत्तम सन्तान प्राप्त करने के कारणों के सम्बन्ध में पूछ ताछ की। मालूम हुआ कि वे इस सम्बन्ध में किसी विशेष नियम का पालन नहीं करते केवल उन दाम्पत्ति में अत्यधिक प्रेम है। दोनों ने आपस में कभी किसी को कटु शब्द नहीं कहा और न कोई किसी से नाराज हुआ। इसी गुण के कारण उन्हें उत्तम सन्तानें प्राप्त हुई।

इन्हीं डॉक्टर साहब के इलाज में एक ऐसा लड़का आया जो बहुत कमजोर और बुद्धिहीन था। उसकी माता यद्यपि बहुत तन्दुरुस्त और चलते पुर्जा थी, फिर भी ऐसी सन्तान क्यों, उत्पन्न हुई, इससे डॉक्टर साहब को आश्चर्य हुआ, उन्होंने उस स्त्री से पूछताछ की तो मालूम हुआ कि दाम्पत्ति प्रेम के अभाव के कारण ऐसी सन्तान हुई, इस स्त्री के साथ उसके पति की सदा अनमन बनी रहती थी।

इसी तरह की एक और कन्या को उन्होंने देखा जो बड़ी ही डरपोक और रोनी सूरत की थी। जवान होने पर भी उसे साँसारिक कार्यों की ओर बिल्कुल रुचि न थी। सदा एकान्त में रहती और बाइबिल पढ़ा करती, कोई जरा भी कुछ कह देता तो आँसू नाक पर आ जाते। पूछने पर उसकी माता ने बताया कि जब यह लड़की गर्भ में थी तो उसका पति सदा उससे झगड़ता और रुलाता रहता था। माता दुखी होकर एकान्त में पड़ी रहती और अपने दुखी चित्त को धार्मिक गाथाएँ पढ़ कर शान्त करती रहती थी। यही सब गुण उस कन्या में भी आ गये।

डॉक्टर डे. का यह मत है कि माता-पिता के आपसी प्रेम में जितनी अधिक घनिष्ठता होगी, बालक उतना ही अधिक उत्साही, स्फूर्तिवान और तेजस्वी होगा। कारण यह है कि गर्भ पलता तो माता के पेट में है, परन्तु उसका मूल बीज पिता के शरीर से आता है, इसलिए माता के द्वारा प्राप्त होने वाली वस्तुएं ही उसके लिए पर्याप्त नहीं है। मनुष्य स्थूल ही नहीं है। उसका जितना भाग स्थूल दिखाई पड़ता है, उसकी सूक्ष्मता उससे हजार गुनी अधिक है। मनुष्य को गुप्त शक्तियाँ सूक्ष्म लोक से प्राप्त होती हैं। चूँकि बालक माता के बन्धन में होता है, इसलिये वह अपने योग्य सूक्ष्म तत्व उसी से प्राप्त कर सकता है, जिससे माता पिता की विद्युत शक्ति आकर्षण रखती हो। यों तो माता के पास अन्य स्त्री-पुरुष भी रहते हैं, परन्तु आकर्षण केवल आन्तरिक प्रेम के द्वारा ही होता है। स्त्री का यदि अपने पति से पूर्ण प्रेम है तो अपनी आकर्षण शक्ति द्वारा पति के सूक्ष्म तत्वों को खींच कर उदरस्थ बालक को देती रहेगी। इसी प्रकार यदि पति का पत्नी से अधिक स्नेह है, तो वह अपने तत्वों को उसकी ओर फेंकता रहेगा। इस प्रकार के सूक्ष्म आकर्षण द्वारा बालक उन शारीरिक और मानसिक वस्तुओं को प्राप्त कर लेता है, जिसकी उसे आवश्यकता है। पिता द्वारा यह गुण इसलिए आसानी से प्राप्त हो सकते हैं कि गर्भ अपने मूल स्थान की वस्तुओं का अभ्यासी होता है। शुभ कीट जो अब गर्भ का रूप धारण किये हुये हैं, अपने उद्गम स्थान को भूल नहीं गया है। जिस प्रकार बछड़ा अपनी माता का दूध आसानी से पी लेता है और माता उसके लिए अधिक दूध निकाल देती है, इसी प्रकार पिता के तत्वों से ही गर्भ का अधिक मात्रा में मानसिक पोषण होना सम्भव है।

स्त्री पुरुष में प्रेम की घनिष्ठता होने पर ही यह सूक्ष्म वस्तुएं प्राप्त हो सकती हैं। यदि ऐसा न हो और इसके विपरीत दंपत्ति में अनबन या उदासीनता रहती हो, तो गर्भ का पूरा पोषण नहीं हो पाता और जिस प्रकार भोजन मिलने पर, पानी न मिलने या पानी मिलने पर भोजन न मिलने से अपूर्णता रहती है-पेट नहीं भरता और संतोष नहीं होता, उसी प्रकार पिता के तत्वों के अभाव में बालक का शारीरिक और मानसिक संगठन अपूर्ण रह जाता है। चाहे उसके शारीरिक अंग देखने में पूरे भले ही प्रतीत होते हैं, परन्तु वास्तव में उसके अन्दर बहुत सी दुखदायी त्रुटियाँ रह जाती हैं, जो कि बड़े होने पर प्रकट होती हैं।

डॉक्टर बेवर कहते हैं कि- “स्त्री, पुरुषों का उदासीनता या उपेक्षा पूर्वक जीवन बिताना सब दृष्टिकोणों से हानिकर है, उससे तो यही अच्छा है कि वे विवाह ही न करें। स्त्री, पुरुष आपस में अधिकाधिक प्रेम बढ़ा कर केवल अपने शरीरों की उन्नति करते और जीवन को सुखमय ही नहीं बनाते हैं, वरन् उत्तम संतान भी उत्पन्न करते हैं। मैंने तीन सौ से अधिक परिवारों की गुप्त जाँच की है और इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि प्रेमी दम्पत्तियों ने ही उत्तम शरीर और बुद्धि वाली संतानें उत्पन्न की हैं। चालीस परिवार मेरी जाँच में ऐसे आये, जिनमें स्त्री, पुरुषों में अनबन रहा करती थी। इनके तीन चौथाई बच्चे बड़े बेढंगे, बेहूदे, अंग-अंग, दुर्बल और मूर्ख थे। जो बच्चे अच्छे थे, वे भी प्रेमी दम्पत्तियों की सन्तान की अपेक्षा कहीं नीचे दर्जे के थे।


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निस्संदेह बालकों पर माता पिता के सच्चे प्रेम का असाधारण रीति से उत्तम प्रभाव पड़ता है। जिन्हें स्वस्थ, सुन्दर, दीर्घजीवी, तेजस्वी और सद्गुणी बालकों की इच्छा हो उन्हें दाम्पत्ति प्रेम की घनिष्ठता एवं पवित्रता अधिकाधिक मजबूत बनानी चाहिए।

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स्वार्थ, अहंकार और लापरवाही की मात्रा बढ़ जाना यही किसी व्यक्ति के पतन का कारण होता है।

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आत्मोन्नति का सर्वोपरि नियम यह है कि उचित को ग्रहण करने और अनुचित का त्याग करने के लिए सदा प्रस्तुत रहा जाय। जो पक्षपात की हठ न करके सदा सत्य की तलाश में रहता है वहीं उन्नति के शिखर पर चढ़ सकता है।

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आत्म संयम का आनन्द

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(श्री देशराज जी ऋषि, रुड़की)

अनियंत्रित असीम इच्छाओं के चंगुल में फँस जाने से मनुष्य जीवन की सुख शाँति नष्ट भ्रष्ट हो जाती है। क्योंकि जितनी इच्छाएं मन में उठती हैं, उनका पूरा होना असंभव है। उनकी जितनी ही पूर्ति की जाती है उतना ही वे और भी अधिक भड़कती हैं। इस आपाधापी के कारण चित्त में सदा क्लेश अशान्ति एवं उद्विग्नता बनी रहती है।

जिन्हें शान्तिमय जीवन बिताने की इच्छा है उनके लिए यह आवश्यक है कि असीम कामना एवं वासनाओं पर निमंत्रण करने का अभ्यास करें। साँसारिक और आत्मिक विकास के लिए उचित आवश्यक एवं धर्मयुक्त आवश्यकताओं की इच्छा करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त तामसिक एवं राजसिक, क्षणिक आकर्षक अन्त में दुखदायी तृष्णाओं को मनः प्रदेश में से बहिष्कृत करने का निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। तभी जीवन में स्याथी शान्ति का होना संभव है।

मनुष्येत्तर योनियों में विषय-सुख की कमी नहीं है। मक्खी को देखिये उसे मनमाने भोज्य पदार्थों का स्वाद लेने की जितनी स्वतंत्रता हैं उतनी मनुष्य को कहाँ? कुत्ते जिस स्वतंत्रता से काम सेवन करते हैं उतना अवसर मनुष्य को नहीं है। अन्य योनियों में विषयों का आस्वादन करने की पर्याप्त सुविधा है। मनुष्य जीवन इससे ऊँचा है। उसमें बहुत बड़े आनन्द का समावेश है। जिसे परमानन्द कहते हैं। इस परमानन्द को प्राप्त करना ही मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।

रामायण ने इसे और भी स्पष्ट कर दिया है।

नर तन पाय विषय मन देंहीं।

पलट सुधा ते शठ विष लेंहीं॥

एहि तन कर फल विषय न भाई।

स्वर्ग हु अल्प अन्त दुख दाई॥

विषय विकारों में जो सुख दिखाई पड़ता है वह भ्रम मात्र है। वास्तव में “काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।” इनके सेवन से शारीरिक और मानसिक अधः पतन ही होता है। उस क्षणिक सुखाभाव के बदले में अमित हानि ही उठानी पड़ती है।

परमानन्द की प्राप्ति के लिए आत्म संयम सबसे पहली साधना है। काम, क्रोध लोभ, मोह के तूफान के कारण मनः क्षेत्र में भारी उथल-पुथल मची रहती है। इस अशान्त वातावरण में आत्मा अपने स्वरूप में स्थित नहीं हो पाती। हर घड़ी एक लालसा, चिन्ता, आशंका एवं उद्विग्नता और मानसिक शक्तियों का क्षरण होता रहता है। ऐसे व्यक्तियों का आत्म विकास पूरी तरह नहीं हो पाता। आत्मोन्नति के मार्ग पर तो वे ही व्यक्ति चल सकते हैं जिनके मस्तिष्क में शान्ति और स्थिरता है। इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए आत्म संयम के लिए अनावश्यक तृष्णा एवं वासनाओं से बचने के लिए अध्यात्म मार्ग के साधकों को पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिए।

शारीरिक आत्म संयम के लिए ब्रह्मचर्य और उपवास की आवश्यकता है। जो गृहस्थ-वासना की दृष्टि से नहीं वरन् आवश्यक कर्त्तव्यों की पूर्ति के लिए काम सेवन करता है वह गृहस्थ होते हुए भी ब्रह्मचारी है। इसी प्रकार जो स्वाद का, चटोरेपन का, बहिष्कार करके शरीर रक्षा की दृष्टि से भोजन ग्रहण करता है वह उपविश्य है। इन दोनों व्रतों की धारण करने से मनुष्य कुछ ही समय में आत्म संयमी बन जाता है। और आत्मिक स्थिरता एवं शान्ति का परम सात्विक आनन्द प्राप्त होने लगता है।

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आसन से स्वास्थ्य-लाभ

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(ले.- वैद्यभूषण श्री श्रीनिवास जी शर्मा)

संसार में मनुष्यों के लिये शरीर तथा स्वास्थ्य का सुख, सबसे पहला सुख है। विद्या, धन प्रतिष्ठा, सन्तान तथा घर इत्यादि अनेकों पदार्थ मनुष्यों को मिले हुए हैं परन्तु यदि मनुष्य रोगी है तथा उसे शरीर का कोई सुख नहीं तो यह सब व्यर्थ है। इसे सब मानते हैं परन्तु इतने पर भी वह प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करते हैं तथा स्वयं ही रोग ग्रसित होते हैं।

औषधियों, डाक्टरों, वैद्यों तथा दवाखानों के देश में प्रचार करने से रोग दूर नहीं होते। जितना धन इनके प्रचार में व्यय किया जाता है, यदि इससे आधा भी स्वास्थ्य प्रचार में व्यय किया जाय तो आज ही रोग देश से भाग जावें। यदि आप अपने जीवन को नियमित बना लें तो रोग आपके पास भी न फटके। रोग केवल आपके दुश्चरित्रों का परिणाम है। आप जिह्वा के स्वाद में ऐसे-ऐसे पदार्थ खा जाते हैं जो आपके पेट का सत्यानाश कर देते हैं। आप स्वयं अनुभव करते हैं कि रोग प्रायः पेट के दर्द तथा अजीर्ण से उत्पन्न होते हैं इनको भगाने का सिद्ध उपचार आसन करना है। आप आसन के लाभ से भी परिचित हैं परन्तु फिर भी वह विष मिश्रित औषधियाँ सेवन करते हैं जो तत्काल लाभ तो दर्शाती हैं, परन्तु शरीर के अन्य भागों को हानिप्रद सिद्ध होती हैं। उतनी शीघ्रता से दवा लाभ नहीं करती, जितनी शीघ्रता से आसन से लाभ होता है यह केवल कथनमात्र ही नहीं, पाठकगण अनुभव करें। रोग तो ठीक हो ही जायगा, साथ ही स्वास्थ्य भी सदैव ठीक रहेगा। आसन करने की प्रवृत्ति उत्पन्न कीजिये तथा हृष्ट-पुष्ट बनिये। जो सहस्रों रुपये व्यय करने से भी आप स्वास्थ्य लाभ नहीं कर सकते, यह नियमित रूप से आसनों के द्वारा बिना खर्च प्राप्त कर सकते हैं। यहाँ कुछ उपाय लिखते हैं, आशा है पाठक इससे लाभ उठायेंगे।

1-पेट को आगे की ओर जितना फूला सकें फुलायें, फिर सिकोड़े। नाभि को रीढ़ की हड्डी के साथ लगायें और दोनों हाथों को पेट पर रखें, आप पीछे रहें तथा अँगुलियाँ सामने की ओर रखें। अब पेट को फिर फुलायें तथा बायें हाथ से दायें, दायें से पीछे की ओर दबाव डालें। इस प्रकार नियम पूर्वक करने से पेट के भीतर की गन्दी वायु निकलती रहेगी पेट के दर्द को इस रीति से शीघ्र लाभ होगा।

2- Atleution खड़े होकर श्वास को बिल्कुल बाहर निकाल कर पसली के दोनों पासों को भीतर खींचने का प्रयत्न करें। नाभि का भाग ऊपर की ओर उभरा रहे, दोनों हाथों को घुटनों पर रख लें तथा इस रीति से झुक कर कुछ बार श्वास को भीतर बाहर करें।

3-आपने कुत्तों तथा बिल्ली को अँगड़ाई लेते देखा होगा ठीक उसी प्रकार हो जाइये, हाथों को सीधा आगे फैलाइये, पृथ्वी पर ठोड़ी लगाइये तथा टाँगे लम्बी करके घुटने अलग-अलग रखिये, इस प्रकार हाथ 3-4 बार ऊपर को करके फिर अँगूठों को पकड़िये तथा कमर जितनी झुक सके झुकाइये।

4-पृथ्वी पर बैठ कर पैरों को आगे फैलाइये फिर दोनों हाथों से दोनों पाँव के अँगूठों को पकड़ लीजिये तथा सिर को दोनों अँगूठों के बीच में रखिये, पेट को भीतर की ओर खींचिये, ऊपर की ओर उभार बिल्कुल न हो इस दशा में कुछ देर तक बैठे रहिये। आरम्भ में तो यह आसन कठिन प्रतीत होगा परन्तु धीरे-धीरे सरल हो जायगा।

उपरोक्त आसन पेट के समस्त रोगों को दूर करने वाले हैं। प्रथम तो कम से कम 1 सप्ताह तक केवल पाँच मिनट तक कीजिये फिर धीरे-धीरे बढ़ाते चलें तथा आधे घण्टे तक करें। इससे आँतों के समस्त विकार दूर होकर पाचनशक्ति तीव्र हो जायगी, भूख लगेगी परन्तु याद रखें जब भूख लगे तो दूध, घी अथवा फल खायें मसालेदार पदार्थ न खायें नहीं तो हानि होगी। यदि सम्भव हो तो भोजन के उपरान्त छाछ अवश्य पी लिया करें।

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मिथ्या व्यवहार की मूर्खता

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(श्री पं. ललिता प्रसाद मिश्र, मंडला)

मिथ्या आहार वे हैं जिनकी आवश्यकता शारीरिक स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन के लिए नहीं होते हुए भी मनुष्य जिह्वा के स्वाद के प्रलोभन में आकर व्यवहार करता है या यों कहिये कि वास्तविक क्षुधा और शारीरिक स्वास्थ्य के स्वाद से जिस भोजन का निषेध है वह आहार मिथ्या है। इसी प्रकार जिस व्यवहार की आवश्यकता साँसारिक जीवन में नहीं है उस का बर्ताव करना मिथ्या व्यवहार है। ये मिथ्या व्यवहार हैं-असत्य भाषण, छल-कपट, बाह्याडम्बर और दगाबाजी इत्यादि।

जिस प्रकार बिना पूर्ण भूख लगे और शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान न रखते हुए किया हुआ भोजन शरीर में नाना प्रकार के रोग उत्पन्न कर देता है जो अन्त में दुःसाध्य और असाध्य होकर शरीर को बलहीन एवं नष्ट कर डालते हैं, उसी प्रकार जिन व्यवहारों के बिना ही साँसारिक कार्य सुगमता और स्थायी सुचारु रूप से चलते हैं उनको कार्य रूप में लाने से मानसिक रोग पैदा हो जाते हैं। वे मानसिक प्रवृत्तियों को अधःपतन की ओर अग्रसर करके दुःसाध्य और असाध्य बन जाते हैं।

छल, कपट, दंभ, धूर्तता, मायाचार, धोखेबाजी एवं असत्यता युक्त व्यवहार से कुछ लोग क्षणिक सफलता प्राप्त कर लेते हैं पर थोड़े ही समय में उस मायाचार का भण्डा फूट जाता है और लोगों पर से उसका सारा विश्वास उठ जाता है। ऐसे अविश्वस्त व्यक्ति यत्र-तत्र मारे फिरते हैं। विश्वास के अभाव में उनकी सभी योग्यताएं धूलि में मिल जाती हैं। सब लोग उससे बचते, दूर रहने एवं चंगुल में न फंसने का प्रयत्न करते हैं। गहरा और सच्चा सहयोग उसके साथ स्थापित करने को कोई भी तैयार नहीं होता।

इस संसार में कोई भी मनुष्य अपने आप अकेला, अपने बलबूते पर किसी कहने लायक सफलता को प्राप्त नहीं कर सकता। इसके लिए दूसरों के सहयोग की आवश्यकता होती है। मनुष्य एक दूसरे के सहयोग से आगे बढ़ते, ऊँचे उठते और सफल होते हैं। परन्तु यह सहयोग उन्हें ही मिलता है जो इसके पात्र हैं। ठग, धोखेबाज, बेईमान, झूठे एवं खुदगर्ज आदमी ऐसे सहयोग को नहीं पा सकते हैं। उनके विरोधी तथा दुश्मन तो अनेक होते हैं पर सच्चा मित्र एक भी नहीं होता। यही कारण है कि “चोरों के महल खड़े नहीं देखे जाते” की उक्ति सर्वत्र चरितार्थ होती देखी जाती है। अनेक बार वे बेईमानी से छोटी मोटी सफलताएं प्राप्त कर लेते हैं पर उनकी कमाई सच्चे सहयोगियों के अभाव में यों ही नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है और वे आगे नहीं बढ़ पाते।

चटोरे आदमी क्षणिक स्वाद के आकर्षण में आँख मूँदकर भक्ष-अभक्ष खाते हैं और कुछ ही समय बाद उस अन्धा धुन्धी के फल स्वरूप उत्पन्न हुए रोगों का कष्ट भुगतते हैं, इसी प्रकार दुःस्वभाव के व्यक्ति अनुचित अनीति को अपना कर अपनी तथा कथित चतुरता के बल पर कुछ लाभ उठा लेते हैं परन्तु वह लाभ अनेक गुना हानियों को उत्पन्न करता है, समाज में उसकी प्रतिष्ठा नष्ट हो जाती है, लोगों की निगाह में एक पतित नीच बन जाता है, जिसके साथ बुराई की है वे तो शत्रु होते ही हैं, साथ ही उस अनीति युक्त व्यवहार की बात सुनने वाले भी उसके शत्रु बन जाते हैं। अनेकानेक शत्रुओं से उसे नाना विधि हानियाँ पहुँचती हैं। आत्म ताड़ना, राज दंड एवं ईश्वरीय दंड इससे भी बढ़कर है। उनसे मिलने वाले दुखों की तुलना में, अनीति से प्राप्त हुआ लाभ धूलि के बराबर है। मिथ्याचारी अपने को चतुर कहते हैं पर यथार्थ में वे ही सबसे बड़े मूर्ख हैं।

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हम गलती क्यों करते हैं।

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(ले.- श्री रामकिशनजी आर्य, ग्वालियर)

मनुष्य गलती पर गलती करता है। क्यों? क्या इसलिए कि उसे इस बात का पता नहीं लगता कि वह गलती कर रहा है या नहीं? तो फिर किसी गलती को जब कोई मनुष्य बार-बार दोहराता है तो इसका यही अर्थ होता है कि उस मनुष्य में नैतिक बल की न्यूनता है। मनुष्य के कोई गलती कर चुकने पर उसके मस्तिष्क में एक सूक्ष्म प्रतिक्रिया होती है। यही सूक्ष्म प्रतिक्रिया प्रकृति की ओर से मनुष्य के लिए आत्म सुधार का सन्देश-रूप होती है। जो मनुष्य गलती कर चुकने पर भी इस सन्देश को खुले कानों से सुन लेता है वह संभल जाता है और जो प्राणी इस संदेश को एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देने का आदी हो जाता है वह निरन्तर अवनति के गर्त की ओर अग्रसर होता जाता है। आइए, जरा विचार करें कि यह प्रतिक्रिया किस रूप में हमारे सामने आती है। मान लो किसी व्यक्ति ने स्वाद के फेर में पड़कर एक रोटी भूख से अधिक खाली। जैसे ही वह खाना खाकर उठता हैं उसे अपना पेट भारी मालूम होने लगता है। थोड़ी देर बाद डकारें भी आने लगती हैं और वह आदमी यह मानने के लिए बाध्य हो जाता है कि इस समय चौके में उसने एक भूल की है जिसका परिणाम उसके सामने है। स्वभावतः ही वह इस बात का निश्चय करता है कि अब हुआ सो हुआ आगे वह ऐसी गलती नहीं करेगा और आधी रोटी की भूख रखकर ही चौके से उठ आया करेगा। ऐसा निश्चय करते ही उसके हृदय पर से एक बोझ सा हट जाता है और वह कुछ शान्ति का अनुभव करता है। उसे अपनी डकारें कम होती मालूम पड़ती हैं। परन्तु अगले दिन जब वह भोजन करने बैठता है तो पहले दिन वाले प्रलोभन उसे आ घेरते हैं। “आज आलू की सब्जी खूब स्वादिष्ट बनी है।” “एक दो दिन अधिक खाने से कहाँ सेहत को नुकसान पहुँचता है,” “कल से नियम बना लूँगा” आदि भाँति-भाँति के कुतर्क उसके हृदय में उठते हैं और उसके नैतिक बल की दीवार को हिला देते हैं। मनुष्य फिर गिरता है और इसी प्रकार गिरता चला जाता है।

यह क्षणिक प्रतिक्रिया प्रत्येक छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी गलती के उपरान्त होती है। अनावश्यक वीर्य-पात से अधिक भयंकर भूल शायद ही कोई होगी। जब काम का वेग आता है तो मनुष्य अन्धा हो जाता है और भूल कर बैठता है। तदुपरान्त उसके मस्तिष्क की जो दशा होती है वह अनुभव करने के ही योग्य है। कहते हैं कि मनुष्य का वैराग्य दो ही जगह उत्पन्न होता है- एक तो किसी जलती हुई चिता को देखकर और दूसरे सम्भोग क्रिया के पश्चात् सम्भोग क्रिया कर चुकने पर मनुष्य के मस्तिष्क पर धक्का सा लगता है और वह अनुभव करता है मानो किसी ने उसे आकाश से उठा कर पृथ्वी पर पटक दिया हो। इतने पर भी मनुष्य दूसरे दिन फिर उसी भूल को दुहराता है।

हम प्रतिदिन छोटी-बड़ी असंख्य गल्तियाँ करते हैं। यदि हम क्षणिक प्रतिक्रिया के रूप में आने वाले प्रकृति के सन्देश को ध्यान पूर्वक सुन सकें और उसे स्थायी रूप दे सकें, तो अवश्य ही हम भूलों से बच सकते हैं और अपने जीवन का निर्माण कर सकते हैं। क्रोध करना, समय बरबाद करना किसी के दिल की मनसा, वाचा कर्मणा ठेस पहुँचाना, पर निन्दा करना, झूठ बोलना, स्त्रियों को गिद्ध दृष्टि से देखना, आदि सैंकड़ों ही भूलें हम दिन में करते होंगे। एक-एक का सुधार करने से ही मनुष्य एक दिन महात्मा बन जाता है और अपना तथा दूसरों का सच्चा उपकार कर सकता है।

हम बहुत सी भूलें उस समय करते हैं जब हम अपने आपको अकेला पाते हैं। अतः परमपिता परमात्मा को सर्वव्यापी और सर्वत्र हाजिर मानने वाले मनुष्य के लिए गलती करने का बहुत कम अवसर रह जाता है। वह यही सोचता है कि परमात्मा मेरी भूलों को देखता है। वह हर समय मेरे साथ रहता है, अतः मुझे कोई गलती नहीं करनी चाहिये, इस तरह आस्तिक मनुष्य की गल्तियाँ करने की बहुत कम सम्भावना है जबकि नास्तिक मनुष्य इस ओर से आजाद रहता है। इसका पूरा-पूरा फल हर समय अपने माता-पिता, भाई-बहिन, स्त्री-बच्चे, मित्र अथवा अन्य कुटुम्बी जन किसी को साथ रख कर भी प्राप्त किया जा सकता है।

आज तक जो भी व्यक्ति महात्मा और महापुरुष बने हैं वे अपनी इन्हीं छोटी-छोटी भूलों की ओर विशेष ध्यान देकर इस पद पर पहुँचे हैं। हममें से प्रत्येक व्यक्ति महात्मा बन सकता है, केवल थोड़ा सा सतर्क रहने की आवश्यकता है।

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स्वप्नदोष कैसे रुके?

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(श्री स्वामी सत्य देव जी परिव्राजक)

जवान आदमी का यदि महीने में एक दो बार वीर्य गिर जाय तो अधिक घबड़ाने की बात नहीं उसे निम्नलिखित नियमों पर ध्यान रखना उचित है-

1- रात्रि को देरी से भोजन नहीं करना चाहिए यदि हो सके तो हल्का भोजन करना चाहिये।

2- चाय काफी और तम्बाकू आदि नशीली चीजें नहीं पीनी चाहिए। सोने से पहले गर्म दूध पीना भी वीर्य को गिरा देता है।

3- रोज अच्छी प्रकार ठण्डे पानी से स्नान करना चाहिये।

4- उपस्थेन्द्रिय का पर्दा पीछे कर उसे ठण्डे जल से नित्य धोना चाहिये।

5- संध्या के समय यदि शौच जाने की आदत हो तो उससे कभी चूकना उचित नहीं। शौच न जाकर भोजन कर लेना बड़ी हानि करता है। रात को उस पाखाने की गर्मी से वीर्य गिर जाता है।

6- बहुत पेट भर किसी वस्तु को नहीं खाना चाहिये, रात्रि को खास कर पेट भर भोजन वर्जनीय है।

7- माँस भोजन सर्वथा त्याग देना चाहिये। और इस बात का ध्यान रखना उचित है कि कब्ज किसी प्रकार से न हो, नहीं तो शौच जाते समय वीर्य गिरेगा।

8- शान्त कमरे में बिस्तरे पर अकेले सोना उचित है।

9- रात्रि को पेशाब लगे तो फौरन उठकर करना उचित है। आलस्यवश उसे रोके रखने से वीर्यपात हो जाता है।

10- सोने से पूर्व एक घंटा शुद्ध विचारों का मनन कीजिये। इससे बुरे स्वप्न रुक जाते हैं।

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माँस खाने से मनुष्य में पशुता

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(लेखक-मदनमोहन गुगलानी शास्त्री)

पहली बैठक

उस घने जंगल में, जहाँ जाने के विचार मात्र से मनुष्य का हृदय काँप उठे, वह सभा हो रही थी।

सभापति भी था, मन्त्री भी और सभासद भी। सभापति वनराज ‘सिंह’ एक ऊँची शिला पर विराज रहे थे। बाकी सब-के-सब नीचे ही थे -कँटीली जमीन पर। सभा पति कह रहे थे-

“मैं नहीं समझ सकता इसका कारण क्या है? मनुष्य-एक नन्हा-सा दुर्बल प्राणी-अपने से कई गुना अधिक बलशालियों पर, हम पशुओं पर, शासन करे, हुकुम चलाये और जब भी चाहे हमें मार गिराये, यह शर्म की बात है। मुझे दया आती है उन घोड़ों पर, जो मनुष्य को पीठ पर बिठाये लिये फिरते हैं, उन बैलों पर जो मनुष्य के लिए सैकड़ों मन बोझ खींचा करते हैं और उन हाथियों पर जो मनुष्य की एक लोहे के लकुटिया के डर से बिल्ली बने रहते हैं। क्या है मनुष्य को हक कि वह गाय, भैंस और बकरियाँ के बच्चों के मुँह से छीन कर, उनका दूध दूहा करे? क्या मनुष्य में शक्ति इन सबसे अधिक है? यदि नहीं, तो हम उससे दबे क्यों? आज परस्पर वैर भाव छोड़कर आप सब यहाँ एकत्रित हैं। क्या कोई ऐसा उपाय नहीं सोचा जा सकता जिससे मनुष्य के हाथों छुटकारा पाया जा सके, और हम फिर से स्वतन्त्रता पूर्वक जंगलों व पहाड़ों में घूम सकें?”

वह चुप हो गये।

मन्त्री ‘शृंगाल’ देव विनीत भाव से बोले-

‘महाराज आपके प्रताप से सब कुछ सम्भव है। पर, क्षमा करें, मनुष्य को नीचा दिखा सकना आसान काम नहीं। यह मनुष्य का बल नहीं जो घोड़ों, बैलों व हाथियों तक को दबाये हुए है एवं वनराज पर वार करने में भी नहीं हिचकता। यह तो है मनुष्य की बुद्धि। इसी बुद्धि के सहारे वह सीना अकड़ा कर चला करता है। जब तक मनुष्य में बुद्धि है, वह काबू में नहीं आ सकता। मनुष्य को नीचा दिखाने के लिये पहले उसकी बुद्धि का नाश आवश्यक है।”

“हमें तुम्हारी बात पसंद है,” सभापति बोले, “तुमने ठीक ही कहा। हमें आज ऐसे उपाय सोचने होंगे जिनसे मनुष्य की बुद्धि नष्ट की जा सके। इसमें यदि हम सफल हों तो पौ बारह हैं। मित्रो, क्या तुम इस बारे में कोई राय दे सकते हो?”

सब चुप रहे। दो-तीन मिनट कोई भी बोला नहीं। अन्त में झिझकते हुए ‘ऋषभ’ देव खड़े हुए।

“हजूर,” वह बोले, “मेरे समझ में तो मनुष्य की बुद्धि आसानी से नष्ट की जा सकती है। यदि मनुष्य में पर्याप्त पशुता भरदी जाय, तो उसकी बुद्धि अवश्य ही नष्ट होती जायगी। इसके लिये हमें बलिया देनी होंगी। हमें स्वयं मनुष्य के आहार का बड़े-से-बड़ा अंग बन जाना होगा। तभी सफलता सम्भव है। कई-कई पशु खा चुकने वाले मनुष्य में उन सब पशुओं की पशुता का संचार क्योंकर न होगा? मनुष्य एक बड़ा पशु बन जायगा और पशुता के ऐसे भयंकर कार्य करेगा, जिन्हें देखकर पशु भी दंग हुए बिना न रह सकेंगे। और”

“ठीक है, ठीक है”, सभापति बीच में ही बोल पड़े, “तुम्हारी ही बात ठीक है। मनुष्य पशु-माँस का आहार करता है, पर थोड़ा। अब यदि पशु उसकी रुचि इस ओर बढ़ा दें, उसका जीवन केवल पशु-माँस-पर ही निर्भर बना दें, तो मनुष्य धीरे-धीरे मनुष्यता छोड़ पशुता की ओर बढ़ता जायगा। इसके लिये जाओ, जैसे भी हो, मनुष्य को तरह-तरह के प्रलोभन दो। अपनी जाति के लिये जान की परवा मत करो। भेड़ें, हिरन, घोड़े, गौवें, बैल सभी छोटे से लेकर बड़े तक, मनुष्य का आहार बनने का प्रयत्न करो, अपनी-अपनी पशुता पर्याप्त रूप में उसमें भर दो। भगवान पशुपति हमारी सहायता करेंगे। क्या आप सब तैयार हैं?”

“तन-मन से, तन-मन से,” चारों ओर से आवाज आयी। सभा विसर्जित कर दी गयी।

दूसरी बैठक

बहुत समय बाद फिर से वही सभा हुई। सभापति नये थे, मन्त्री नये थे, सभासद नये थे। पर अपने पुरखाओं के चलाये हुए कार्य को वे भूले नहीं थे। मन्त्री कार्य-विवरण सुना रहे थे-

“हजारों, लाखों ने जान की परवाह नहीं की। आग की भीषण लपटों में जलाये जाने के कष्ट को नहीं सोचा। छोटे-बड़े हर प्रकार के पशुओं ने भाग लिया है। पक्षियों ने भी बड़ी सहायता की। आशा से अधिक उत्साह दिखाया जा रहा है इस काम में सफलता भी हमें आशा से अधिक मिल रही है। मनुष्य दिन-प्रति दिन बुद्धि खो रहा है और तो और, वह अपने आपको भी एक पशु (डार्विन की, की थ्योरी के अनुसार) मानने लगा है। यह इस बात का प्रमाण है कि पशुता उसमें घर करती जा रही है। शेर-शेर के, बैल-बैल के, घोड़ा-घोड़े के खून का प्यासा नहीं। पर मनुष्य-मनुष्य के खून का प्यासा बन चुका है। पशुता उसमें वह रंग दिखा रही है कि आकाश के देवता भी विस्मित होते होंगे।”

“संतोषजनक!” सभापति बोले “यह सब कुछ सन्तोषजनक है। पर हमें अभी यत्न छोड़ नहीं देना चाहिये। इससे वह फिर होश में आ जायेगा। बुद्धि उसकी ठिकाने आ लगेगी काम जारी रखो और जारी रखो और जारी रखो, तब तक जबतक मनुष्य का नाम तक बाकी है। मनुष्य की सत्ता ही मिट जाने दो। सैकड़ों पशु खाने वाला मनुष्य सैकड़ों पशुओं जैसे कार्य कर रहा है तो हजारों पशु खा चुकने पर वह क्या कुछ न कर गुजरेगा। जब उसकी रग-रग में हजारों पशुओं का खून दौड़ेगा तो वह अपने निकट बंधुओं के खून से प्यास बुझाने में नहीं हिचकेगा। इस द्वन्द्व को पैदा हो जाने दो। मनुष्यों को आपस में ही लड़ मर जाने दो। लगे रहो, पशुपति हमारी रक्षा करें, लगे रहो।”

“हम निरन्तर जान पर खेलते रहेंगे।” सभी ने कहा। सभापति चल दिये। सभी उठ उठकर चल दिये।

तीसरी बैठक

और भी सदियाँ बीत गयीं। स्थान वही रहा सभापति बदल गये, सभासद बदल गये। सभा फिर से हुई। सभापति बोल रहे थे-

“आज सौभाग्य का दिन है। सदियों पूर्व अपने पुरखाओं द्वारा चलाये गये कार्य की सफलता को हम अब निकटतम ही देख रहे हैं। हमारा सबसे बड़ा शत्रु आज गले पर स्वयं छुरी चला रहा है। खून की प्यास मनुष्य में व्यक्तिगत नहीं रही। जातियों की जातियाँ, देशों के देश, इस खून की प्यास से आकुल हो उठे हैं। वह उस कलह की आग में जल रहें हैं जो उनकी भस्म तक को जला देगी। मनुष्यों में वह युद्ध प्रारम्भ हो चुका है जिसे उन्हीं की भाषा में ‘विश्व-युद्ध’ कहते हैं। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य के रहने का कोई स्थान ऐसा नहीं जो इस युद्ध की लपेट से बच रहा हो। हर नया सूर्य लाखों नयी मनुष्य की लाशों को देखता है। मनुष्य का सारा ऐश्वर्य शून्यता में लीन हो रहा है। इससे अधिक सुखद समाचार और हो ही क्या सकता है? पर अभी वह दिन आना है जब पशु माँसाहारी मनुष्य नरमाँस से भूख मिटायेगा। माँ बच्चों को बड़े छोटों को मारकर खा जायेंगे। मनुष्यता का सारा दम्भ मिट्टी में मिल जायगा। उस दिन को आने दो, हाँ आने दो। अपना यत्न मत छोड़ो। भगवान पशुपति हमारे मनोरथ पूरे करें। हाँ अब भी कहीं मनुष्य चेत गये और उन्होंने माँस खाना छोड़ दिया तो हमारी कामना सफल न होगी। अस्तु

“भगवान पशुपति हमारे मनोरथ पूरे करें,” यही सबने दोहराया। सभा एक बार फिर विसर्जित हुई।

-’कल्याण’

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हँसने से स्वस्थता की प्राप्ति

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स्वास्थ्य जगत में यह उक्ति बहुत ही महत्व पूर्ण है कि-’हँसो और मोटे बनो,” हम देखते हैं कि हँसमुख स्वभाव वाले मनुष्य प्रायः मोटे होते हैं। वे जरा ही बात पर हँस पड़ते हैं। खिल-खिलाकर हँसने से पाचन क्रिया पर आश्चर्य-जनक प्रभाव पड़ता है। भूख लगती है और अन्न का परिपाक ठीक प्रकार हो जाता है। समस्त शरीर के नाड़ी तन्तुओं और स्नायुओं पर हँसने की अच्छी प्रतिक्रिया होती है। मुँह, गरदन, छाती और उदर के बहुत से उपयोगी स्नायुओं की आवश्यक हो जाती हैं जिससे भीतरी अवयव प्रफुल्लित और सुदृढ़ होते हैं। माँस पेशियाँ और ज्ञान तन्तु चैतन्य होकर रक्त संचालन का भाग सुगम कर देते हैं, फलस्वरूप त्वचा पर चमक आ जाती है और तेज तथा लालिमा की शरीर में वृद्धि होने लगती है।

जोर के साथ हँसने से फेफड़ों में एक प्रकार का तूफान आता है जिससे उनमें भरी हुई गंदी हवा खुल कर साफ हो जाती है। क्षय आदि के कीटाणु जो किसी कोने में छिपे पड़े रहते हैं, इस तूफान की हलचल में अपने स्थान से हट कर साँस के साथ बाहर निकल जाते हैं। साथ ही फेफड़ों का अच्छा व्यायाम हो जाता है। उनके मजबूत होने से अनेक रोगों की जड़ कट जाती है।

कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि हँसोड़ स्वभाव रखने के कारण हमारी गंभीरता नष्ट हो जायगी और लोग हमें हल्का आदमी समझेंगे। परन्तु यह एक मिथ्या भ्रम है। उदास, चिड़चिड़े, मुर्दना का सा मुँह लेकर बैठे हुए व्यक्ति दूसरों पर कोई अच्छा असर नहीं डालते। उदास और गुम-सुम अकड़े हुए बैठे रहने से रस और रक्त बनने की क्रिया मंद हो जाती है और कलेजे में विषैले पदार्थ जमा होने लगते हैं, तिल्ली और कलेजे का व्यायाम करने की एक मात्र क्रिया हँसना ही है। जिन्हें तिल्ली या यकृत में खराबी के रोग हों वे कुछ दिनों, दिन में दो, तीन बार खिलखिला कर हँस लिया करें तो उन्हें बिना एक पैसा खर्च किये उन महाव्याधियों से छुटकारा मिल सकता है।

आनन्दमय जीवन के अनेक साधनों में हँसने का स्वभाव अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। बड़ी बड़ी विपत्तियों को हँसते-हँसते मनुष्य सहज ही पार कर सकता है, जब कि गंभीर मुद्रा बनाये बैठे रहने वाला भावुक व्यक्ति, छोटी-मोटी आपत्तियों से ही किंकर्तव्य विमूढ़ हो जाता है। हँसने की आदत प्रपंची, कपटी, स्वार्थी और कंजूस मनुष्यों को प्राप्त नहीं हो सकती जीवन को हँसी खेल समझने वाले मस्त तबियत के व्यक्ति सदा प्रसन्न रहते हैं और उनके होठों पर मधुर मुसकान अठखेलियाँ करती रहती हैं। जिन्हें हँसना प्रिय हो उन्हें प्रसन्न मुख और विनोदी स्वभाव वाले साथियों का सहचर्या प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। जिन्हें सौभाग्यवश ऐसे मित्र प्राप्त हैं उन्हें एक स्वर्णिम अवसर प्राप्त है। इसके विपरीत जो लोग भय आतंक, प्रतिबंध, ताड़ना के कठोर घेरे में कैद हैं जिन्हें स्वतंत्रतापूर्वक हँसने की सुविधा नहीं, उन्हें एक प्रकार दुर्भाग्यग्रस्त कैदी ही समझना चाहिए।

मुर्दा दिल, दरिद्र और शोक ग्रस्त लोगों को प्रायः सच्ची हँसी नहीं आती इसलिए वे प्रायः दुर्बल पीतवर्ण और निस्तेज देखे जाते हैं। मुस्कान में एक ऐसा आकर्षण है जो दूसरों के हृदय को जीतने में जादू का काम करता है। इतना ही नहीं, इस दैवी आकर्षण से सुख सौभाग्य और आरोग्य भी खिंच कर उस व्यक्ति के पास चले आते हैं। हमें नित्य जी खोल कर हँसना चाहिए इसका स्वास्थ्य पर बड़ा अच्छा असर होता है।

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कवि की-वाणी से

(लेखक- अविज्ञात)

अधिक अनसुनी कर न सकूँगा दर्द भरी चीत्कार सुकेशी।

भूख भूख रोटी रोटी की व्यापक करुण पुकार सुकेशी॥

हिल उट्ठे हैं विन्ध्य हिमाचल सुन यह हाहाकार सुकेशी।

बाँध सकेगा कब तक कवि करुणा का पारावार सुकेशी॥

मैंने कब चाहा परियों का साथ छोड़ भूतल पर जाऊँ।

मैंने कब चाहा सुमनों का प्यार छोड़ काँटों पर धाऊँ॥

मैंने प्रणय छोड़ कब चाहा सजनि प्रलय के गाने गाऊँ।

मैंने कब चाहा मधुमय प्याली ढुलका विष पीने जाऊँ॥

किन्तु सह्य अब हो न सकेगा कानों के परदे फटते हैं।

वह देखो मानव के खाने को मानव के सर कटते हैं॥

महलों को रोशन करने को कुटियों को आहुति दी जाती।

वैभव का जी बहलाने को श्रम-शोणित-हाला पी जाती॥

श्रम का स्वेद बहा कर जो धरती को सींच अन्न उपजाता।

वह रोटी के बिना तड़फता तिलतिल जलकर प्राण गवाँता॥

वस्त्र नहीं, जिससे बेचारी अबलाऐं लज्जा ढ़क पावें।

वस्त्र नहीं जिससे रोगी, सर्दी गर्मी से प्राण बचावे॥

दूध नहीं जिसके बिन दीनों के बच्चे दम तोड़ रहे हैं।

दूध नहीं जिसके बिन नन्हे शिशु जग से मुँह मोड़ रहें हैं॥

उसी दूध से मन्दिर और मठों की नाली धोई जाती।

“दूध कहाँ से पाऊँ लालन?” शिशु की दीना माँ चिल्लाती॥

आओ सजनी, चलें हम भू पर, रख दें अपनी स्वर्गीय वीणा।

मुझको भूखे कृषक बुलाते, तुम्हें मजूरिन वस्त्र बिहीना॥

चलो, अतल पाताल धरातल जहाँ कहीं भी हम पा जायें।

रोटी भूखों को, नंगों को कपड़ा, शिशुओं को पय लायें॥

रोटी भूखों को, नंगों को कपड़ा, शिशुओं को पय लायें॥

*समाप्त*