एक महापुरुष का कथन है कि “कठिनाई” एक विशालकाय, भयंकर आकृति के, किन्तु कागज के बने हुए हाथों के सामान है। जिसे दूर से देखने पर बड़ा डर लगता है, पर एक बार जो साहस करके पास पहुँच जाता है उसे प्रतीत होता है कि वह केवल एक कागज का खिलौना मात्र है। बहुत से लोग चूहों की खटपट सुनकर डर जाते हैं पर ऐसे भी लाखों योद्धा हैं जो दिन रात आग उगलने वाली तोपों की छाया में सोते है। एक व्यक्ति को एक घटना वज्रपात के समान असह्य अनुभव होती है परन्तु दूसरे आदमी पर जब वही घटना घटित होती है तो लापरवाही से कहता है- “उँह, क्या चिन्ता है, इससे भी निपट लेंगे।” ऐसे लोगों के लिए वह दुर्घटना “स्वाद परिवर्तन” की एक सामान्य बात होती है। विपत्ति अपना काम करती है और वे अपना काम करते रहते हैं।
बादलों की छाया की भाँति बुरी घड़ी आती है और समयानुसार टल जाती है, बहादुर आदमी हर नई परिस्थिति के लिए तैयार रहता है पिछले दिनों यदि मौज बाहर के साधनों का वह उपभोग करता था पर जब मुश्किलों से भरे हुए अभावग्रस्त दिन बिताने पड़ेंगे तो वह इसके लिए भी तैयार रहता है। इस प्रकार का साहस रखने वाले वीर पुरुष ही इस संसार में सुखी जीवन का उपयोग करने के अधिकारी हैं। जो लोग भविष्य के अंधकार की दुखद कल्पनाएं कर करके अभी से सिर फोड़ रहे हैं वे एक प्रकार के नास्तिक हैं। ऐसे लोगों के लिए यह संसार सदा से दुखमय नरक रूप रहा है और आगे भी सदा दुख रूप ही रहेगा। हमें चाहिए कि हर स्थिति में प्रसन्न रहें और भावी विपत्ति की आशंका से घबराने की बजाय उससे मुकाबला करने की तैयारी करें।
आगामी वर्ष के संबंध में कुछ आवश्यक जानकारियाँ
सन् 47 के आरंभिक आरंभिक अंकों में अखण्ड-ज्योति अपने पाठकों को बड़ी अमूल्य पाठ्य सामग्री भेंट कर रही है। अखण्ड-ज्योति संपादक ने विगत बीस वर्षों में जो आध्यात्मिक शोधें की हैं उनका निचोड़ इन अंकों में होगा। ऐसी अद्भुत एवं अपूर्व सामग्री पाठकों के लिए कितनी उपयोगी होगी इसका कुछ अनुमान नीचे दी हुई लेखों की सूची से लगाया जा सकता है।
जनवरी के अंक में निम्न लिखित लेख रहेंगे-
जीवन का सर्वोपरि लाभ, (2) ब्रह्म विद्या के सात सिद्धाँत, (3) साधन का विज्ञान, (4) साधनाओं का उद्देश्य, (5) शक्ति से सिद्धि, (6) सम्पन्नता के चार आधार (7) आत्मबल की अकूत शक्ति, (8) योग शक्तियों का उद्गम, (9) प्रत्यक्ष अष्ट सिद्धियाँ, (10) निरर्थक मृगतृष्णा।
फरवरी के अंक में- अध्यात्म के नाम पर जो धूर्तता, ठगी, छल, माया कर होता है, उसकी विवेचना होगी। इस अंक में निम्न लेख रहेंगे।
(1) दड़ा एवं सट्टा बताने वाले पीर, (2) सोना बनाने वाले सिद्ध, (3) त्रिकाल जानने वाले शक्ति, (4) पेशाब से दिया जलाने वाले योगी, (5) मूक प्रश्न बताने वाले ज्योतिषी, (6) भूतों के ऐजेन्ट, (7) भविष्य वक्ताओं की धूर्तता, (8) दिव्यदर्शी तान्त्रिक, (9) मंत्र बल से वस्तुएं मँगाने वाले महात्मा, (10) शाप से अन्धा बनाने वाले और वरदान से नेत्र ज्योति देने वाले अवधूत, (11) सब रोगों को दूर करने वाला कुआँ, (12) भगवान का प्रत्यक्ष दर्शन कराने वाले संत, (13) निष्कलंक के अवतार, (14) जलती अग्नि पर चलने वाले योगिराज (15) छाया पुरुष एवं योगिनी वाले सिद्ध जी, (16) मंत्र बल से अग्नि प्रकट करने वाले वेदपाठी।
मार्च के अंक में- जादू के लगभग 50 खेलों का रहस्य होगा। यह लेख एक से एक बढ़कर हैरतअंगेज हैं इनमें से दो चार जानने वाला भी पूरा जादूगर बन जाता है। फिर इन सब को जानने वाले के लिए कहना ही क्या है। इन खेलों के रहस्य ऐसी अच्छी तरह समझाये जायेंगे जिससे पाठकों को उनकी पोल भली-भाँति समझ में आ जायगी।
अप्रैल का अंक जनवरी के अंक का उत्तरार्ध होगा। जनवरी के अंक में अध्यात्मवाद का वैज्ञानिक आधार समझाया जायगा। अप्रैल के अंक में चौरासी प्रकार के योगों में से चुन-चुन कर ऐसी साधनाएं पाठकों के सामने उपस्थित की जायगी, जिनका अभ्यास करके अपरिमित लाभ उठाया जा सकता है। कार्यव्यस्त लोग भी उन साधनों पर ऊंची आध्यात्म भूमिकाओं में पहुँच सकते हैं और लोक तथा परलोक के महत्तम लाभों को प्राप्त कर सकते हैं।
स्मरण रखिए, अंक नियत संख्या में छपेंगे और सामग्री अत्यधिक महत्वपूर्ण होने से वह थोड़े ही दिन में समाप्त हो जायेंगे। इसलिए जो पाठक चंदा भेजने में देर करेंगे उन्हें इस अमूल्य पाठ्य सामग्री से वंचित रहना पड़ेगा।
आज देश का साम्प्रदायिक वातावरण जितना घृणा, द्वेष, अविश्वास, भय, आशंका से आच्छादित है उतना कई शताब्दियों और पीढ़ियों से नहीं देखा गया। हिन्दू मुस्लिम विद्वेष के लोमहर्षक समाचार चारों ओर से आ रहे हैं। सैकड़ों हजारों बहुमूल्य जीवन छुरों के घाट उतर गये। अनेक निरपराध बालक, वृद्ध तथा बहिन बेटियों को इस पशुता पर बलि चढ़ना पड़ा। त्राहि-त्राहि करते हुए अनेकों कातर मानव प्राणी शैतानों की राक्षसी डाढ़ों के नीचे कुचल कर नष्ट हो गये। तेजाब फेंक कर, रास्ता चलते बगल में छुरा भोंक कर जिस आततायीपन का आज नंगा प्रदर्शन हो रहा है उससे पशुता भी लज्जित हो जाती है।
इस प्रकार की नारकीय अग्नि एक स्थान से दूसरे स्थान में छूत की बीमारी की तरह उड़-उड़कर पहुँच रही है और नित नये काण्ड प्रस्तुत कर रही है। आग लगा देना सुगम है पर उस पर काबू पाना मुश्किल है। बादशाह और चंगेज को मात कर देने और खून की नदी बहा देने की धमकी देने वाले विगत कई वर्षों से निरन्तर घृणा और विद्वेष का प्रचार कर रहे थे। साम्प्रदायिकता का विषैला वातावरण तैयार करने में उन्होंने एड़ी से चोटी तक का पसीना एक कर दिया था। कट्टरता, अनुदारता, असहिष्णुता और धर्मान्धता पर ही उनकी लीडरी टिकी हुई थी। सेवा त्याग और बलिदान से कोसों दूर रहने वाले ये मजहबी लीडर धर्मान्धता विद्वेष और घृणा फैला कर अपनी लीडरी कायम किये हुए थे उसे मजबूत बनाने के लिए उन्होंने अपने हथकंडों को और भी उग्र कर दिया। “सीधी कार्यवाही” का आरम्भ जिस तरीके से हुआ उससे प्रत्येक समझदार व्यक्ति सन्न रह गया है।
घृणा से घृणा की उत्पत्ति होती है। द्वेष से द्वेष बढ़ता है। अविश्वास से अविश्वास की और आक्रमण से आक्रमण की उत्पत्ति होती है। तालाब में पत्थर फेंकने पर छींटे उड़े बिना नहीं रह सकते। कुएं में जैसी आवाज की जाती है उसकी प्रतिध्वनि तुरन्त ही आती है। रास्ते में असहाय पड़ी हुई धूलि भी लात मारने पर ऊपर उड़ती है और सिर पर चढ़ने का प्रयत्न करती हैं, दबी हुई चींटी भी काट लेती है। यह ऐसी सचाईयाँ हैं जिनसे इन्कार नहीं किया जा सकता। छुरे का जवाब देने के लिए लाठी निकल ही आती है। नोपा खाली में जो संगठित, व्यापक, विस्तृत एवं दिल दहला देने वाली पशुता बरती गई उसकी प्रतिक्रिया बिहार में हुई। उसी बर्बरता का नंगा रूप वहाँ भी देखने को मिला। चिनगारी एक स्थान से दूसरे स्थानों को उड़ रही हैं और गढ़मुक्तेश्वर, डासना, मेरठ, दिल्ली, आगरा, इलाहाबाद आदि से साम्प्रदायिक उपद्रवों के समाचार आ रहे हैं। इन उपद्रवों का देश के सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक जीवन पर कितना बुरा प्रभाव पड़ रहा है यह किसी से छुपा नहीं है। भविष्य के संबंध में आशंकाओं की कल्पनाओं से लोगों के चित्त विचलित हो रहे हैं।
आग लगाने वालों को विवेक बुद्धि की चुनौती है कि वे अपनी विषैली नीति की निस्सारता सोचें। घृणा से घृणा बढ़ेगी। द्वेष से द्वेष उत्पन्न होगा। इससे किसी का कोई हित नहीं हो सकता। आततायीपन से न तो किसी को शक्ति प्राप्त होती है और न सफलता। इस प्रकार घृणा का प्रचार करने से मनुष्य अपने विश्वासियों की सबसे बड़ी कुसेवा करता है क्योंकि अन्त में सभी दृष्टियों से उसे ही घाटे में रहना पड़ता है जो अनौचित्य पूर्ण आक्रमणात्मक नीति अपनाता है।
आज के अशाँत वातावरण में नेताओं की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है विशेष रूप से उनकी जिन्होंने एड़ी से चोटी का पसीना बहा कर अपने अनुगामियों को उत्तेजना एवं घृणा से भरा है और आक्रमण के लिए तैयार किया है। कुछ वर्ष पूर्व तक हिन्दू मुसलमान प्रेम पूर्वक सच्चे पड़ौसी की तरह भाई-भाई की भाँति रहते चले आ रहे थे, दोनों एक दूसरे के सुख-दुख में साथ रहते थे, झगड़े फसाद की कोई बात नहीं थी। सन 1921 में साम्प्रदायिक एकता का जो सुन्दर वातावरण था वह आँखों से ओझल नहीं हुआ है। हर आज दूसरे ही दृश्य देखने में आ रहे हैं। वीराँगना के समान रूप बदलने वाली राजनीति के हथकंडों ने कुछ-कुछ कर दिया है।
वर्तमान साम्प्रदायिक अशान्ति को ‘कुछ गुण्डों की शैतानी’ कह कर नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता। उसके पीछे उस राजनीति का हाथ है जिसने विद्वेष की चिंगारियाँ फैलाने का भयंकर खेल अपने हाथ में लिया है। इस प्रकार की नीति का यही परिणाम हो सकता है जो आज चारों ओर देखने में आ रहा है।
अशान्ति एवं उत्पातों को दबाने के लिए पुलिस और फौज को काम में लाया जा रहा है पर इतने से ही काम न चलेगा। उन उत्पातों की जननी वह विचार धारा है जो कट्टरता, द्वेष, घृणा और उत्पातों को प्रोत्साहन देती है। जब तक उस नीति को रोका न जायगा तब तक शान्ति स्थापित होना कठिन है। लोगों को उत्तेजित करने वाले और लड़ाने वाले नेता मौज से आराम कुर्सियों पर बैठे रहते हैं और उनके नासमझ अनुयायी अपनी या दूसरों की हानि करते हैं। वे खुद खून में हाथ रंगते और रंगाते हैं। ये ही लोग पकड़े जाने पर कठोर राज दंड पाते हैं या बदले प्रति क्रिया के शिकार होते हैं।
स्वस्थ वातावरण स्थापित करने के लिए घृणा, धमकी, आक्रमण, विद्वेष उत्पन्न करने वाला प्रचार करने वालों पर नियंत्रण करना होगा। इस कोढ़ को मरहम लगाकर अच्छा न किया जा सकेगा। इसके लिए रक्त शोधक चिकित्सा की आवश्यकता है। किसी भी देश की उत्तरदायी सरकार का यह पहला फर्ज है कि वह ध्यान पूर्वक देखे कि वे कौन लोग हैं जो घृणा का वातावरण तैयार करने में लगे हुए हैं, उनकी गति विधि को रोकना होगा, चाहे वे कितने ही बड़े आदमी क्यों न हों, अशान्ति उत्पन्न कराने वाले मौजे से ऐश उड़ावें और बेचारी भोली जनता आपस में कट मरे, इस स्थिति को जारी रखना सर्वथा अवाँछनीय है। इस स्थिति के रहते स्वस्थ वातावरण उत्पन्न होना बहुत कठिन है।
जिनके हाथ में शक्ति हो उनसे लड़कर छीनने की बात समझ में आ सकती है पर जिनके हाथ में कोई सत्ता नहीं हैं, उन निरपराध भोले-भाले नर नारियों पर आक्रमण करना और उन्हें गाजर मूली की तरह कतर डालना, नीचातिनी कुकृत्य एवं कसाईपन है। इस कसाईपन को जो लोग अपनाते हैं वे शैतान हैं पर उन्हें क्या कहा जाय जो इस शैतानी के लिए खुलेआम गुण्डों को उभार रहे हैं। नादिरशाह और चंगेजखाँ का अनुकरण जिस प्रकार हो रहा है और उसकी प्रतिक्रिया से जो बदले के आक्रमण हो रहे हैं उससे किसी का भी हित नहीं हो सकता।
अखण्ड-ज्योति, देश के विचारकों से, राजनीतिज्ञों से, नेताओं से, शासकों से एवं जन साधारण से अपील करती है कि इन शैतानी साम्प्रदायिक उत्पातों के भस्मासुर को रोको, यह काबू से बाहर हुआ जा रहा है। आग लगाने वाले तमाशा देख रहे हैं और इस भस्मासुर के प्रकोप से निरीह जनता भुनी जा रही है। इस दाबानल का अन्त करना है तो तात्कालिक रोक-थाम के अतिरिक्त उन लोगों को भी काबू में किया जाना चाहिए जिन्होंने मनुष्यता को कलंकित करने वाली यह आग लगाई है।
(दोलतराम जी कटरहा, बी. ए. दमोह)
अंगरेज कवि मिल्टन ने अपनी एक रचना में फापिंगटन नामक एक वैचित्र्य पूर्ण तथा हास्य-रस प्रधान चरित्र का उल्लेख किया है। लार्ड साहिब कभी किसी पुस्तक का अनुशीलन न करते और वे सदा अपनी ही बुद्धि की उपज तथा उर्वरा-पन पर निर्भर रहना पसन्द करते थे। उनका यह भी कहना था कि पुस्तकों को पढ़ने से हमारी मौलिकता नष्ट तथा विचार शक्ति क्षीण हो जाती है। लार्ड फापिंगटन ने विचार और कार्य भले ही हास्यास्पद और वैचित्र्य-पूर्ण रहे हों किंतु केवल इसी कारण ही उनका यह कथन उपहासास्पद तथा हेय नहीं हो सकता।
एक विषय पर आज हमारे सामने अनेकों की पुस्तकों उपस्थित हैं। यदि सत्समालोचना का विकास इस युग में न हुआ होता तो हम में से अनेकों के सामने यह समस्या उठ खड़ी होती कि संघर्ष-मय जीवन के इस कठिनता से बचाए हुए समय में हम किन पुस्तकों को पढ़े और किन्हें छोड़े।
समालोचकों ने हमारी इस कठिनाई को बहुत अंशों में हल कर दिया है फिर भी पठनीय पुस्तकों की इतनी अधिक बहुमूल्यता है कि उन्हें देख कर हमें विद्वान न्यूटन की भाँति ही अभिमान त्याग कर कहना पड़ता है कि हमने अभी तक विशाल समुद्र के किनारे पड़े हुए कुछ ही कंकड़ों को बीना है। अतएव हम देखते हैं कि ज्ञान का भंडार हमारे सामने विद्वानों ने बिखेर सा दिया है। प्रत्येक विषय के सम्बन्ध में हम उनकी सम्मति ले सकते हैं। किन्तु जब हम उनकी पुस्तकों को पढ़ते है तब उनके बहुत से विचारों और विश्वासों को भी बहुधा चुपचाप ग्रहण कर लेते हैं और इस तरह बौद्धिक क्षेत्र में हम अधिकतर परतंत्र हो जाते हैं। जिस तरह अनपढ़ लोगों के सहायतार्थ उनके पत्र आदि हम लिख दिया करते हैं उसी तरह ये विद्वान भी हमारे सोचने की बातों को हमारे लिए स्वयं सोच दिया करते हैं। इस तरह ये हमारे कार्य को हल्का कर देते हैं किंतु यह भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि इस तरह वे हमें जो योभन देते हैं। उसके कारण हम अपने सोचने की बातों के स्वयं सोचने के अवसर को खो बैठते हैं और बहुधा इनके झूठे अथवा सच्चे विश्वासों को भी अपने ऊपर लाद लेते हैं। इस प्रकार जीवन सम्बन्धी अनेकों प्रश्नों के संबंध में हमारी विचार धारा हमारे पठित ग्रन्थों के ही अनुरूप हो जाती है और उस विचार प्रणाली में हमारे व्यक्तित्व की छाप नहीं रहती। उन विचारों से हमारा व्यक्तित्व ढंक-सा जाता है और हम केवल ग्रामोफोन के रिकार्ड की नाई ही दूसरों के विचारों को उगलते रहते हैं। इस तरह हमारे विचारों में कोई व्यक्तिगत विशेषता नहीं रह जाती। यही व्यक्तिगत विशेषता तो हमारे बौद्धिक जीवन का प्राण तथा जीवन है जिसको कि खो देने पर हमारा व्यक्तित्व भी खो जाता है। व्यक्तित्व का आधार व्यक्तिगत विशेषता ही है। फिर भी हम बहुधा यही पाते हैं कि जिन विषयों पर हम विचार करना चाहते हैं उन पर पहले से ही अनेक लोग भिन्न-2 दृष्टि कोणों से विचार कर गए हैं, अतएव हमें उन्हीं के विचारों को स्वीकार करने में ही सरलता होती है और उन प्रश्नों पर हम स्वयं विचार नहीं करते। इस तरह हमारी विचार शीलता तथा मौलिकता का विकास अच्छी तरह नहीं होने पाता।
विद्यार्थी जीवन का मेरा अनुभव है कि जब हम लोगों को गणित के प्रश्न घर पर हल करने के लिए दिए जाते थे तब हम लोगों में से बहुतेरे कुँजियों से उन्हें उतार लेते थे और जब कभी किसी विद्यार्थी के पास स्कूल में ही कुँजी निकल आती थी तो गुरुजी क्रोध करते थे। क्रोध करने का कारण उस समय मैं नहीं समझता था किन्तु आज यह स्पष्ट है। कुँजियाँ विद्यार्थी की सहायता तो अवश्य करती है किंतु साथ-साथ उसमें अनुद्यम शीलता की भी वृद्धि करती हैं और उसमें स्वावलम्बन की भावनाओं का ह्रास होता है। अतः हम देखते है कि लार्ड फापिंगटन की विचार प्रणाली में कुछ न कुछ सत्यता अवश्य विद्यमान है।
अब यहाँ यह प्रश्न भी उठ सकता है कि क्या गिरा गोतीत आत्मा के सम्बन्ध में भी हम स्वतंत्र रूप से विचार किया करें। इन पर विचार करते समय हमें पता चलेगा कि हम न उनका उत्तर उसी तरह दे सकते हैं जिस तरह कि गणित और विज्ञान के प्रश्नों के उत्तर और न हम उनके सम्बन्ध में वैज्ञानिक प्रणाली पर ही सोच सकते हैं। ऐसी अवस्था में हमें बहुत-सी बातों पर विश्वास ही करना होगा, उन पर ईमान ही लाना होगा। भगवान मुहम्मद साहिब ने इसी लिए तो अपने अनुयायियों से, यह समझ कर ही कि ये विषय इन्द्रियातीत हैं, यह कहा था कि ईश्वर पर ईमान लाओ क्योंकि ईमान ही इस्लाम का मूल तत्व है। किन्तु दुर्भाग्य वश लोग उन्हें ठीक ठीक न समझ सके। अतएव हमें प्राप्त वाक्यों के प्रति श्रद्धा और ईमान रखते हुए यह भी स्मरण रखना होगा कि जब तक किसी विश्वास चाहे वह धार्मिक हो अथवा सामाजिक, की सत्यता के हमें पूर्ण प्रमाण नहीं मिलते तब तक वे विश्वास मात्र ही हैं ध्रुव सत्य नहीं। ज्ञानार्जन का हमारा तरीका है कि हम अपने प्रत्येक विश्वास को अस्वीकार करना सीखें उसे चुनौती दे और जब तक उसके सत्य होने के प्रमाण हमें न मिले तब तब उसे हम विश्वास और सत्य की दो श्रेणियों में विभक्त कर उस असहिष्णुता से बचे रहेंगे जो कि विभिन्न मतावलम्बियों में एक दूसरे के प्रति रहा करती हैं।
अपने विद्यार्थी जीवन में, मैं सोचा करता था कि ईश्वर सत्ता को अस्वीकार करने वाला कोई भी व्यक्ति चरित्रवान नहीं हो सकता। किंतु आज यह बात स्पष्ट तथा गलत मालूम होती है। कपिल का साँख्य शास्त्र कहता है “प्रमाणाभावान्न तत्सिद्धिः” (प्रमाण के अभाव में उसका अस्तित्व नहीं सिद्ध होता।) पतंजलि भी ईश्वर के सृष्टा पन को स्वीकार नहीं करते और भगवान बुद्ध ने भी अपने पट्ट-शिष्य आनंद से कह रखा था कि आनन्द ईश्वर के अस्तित्व को किसी ने सिद्ध नहीं किया, इस झमेले में मत पड़ो। फिर भी हम जानते हैं कि भगवान बुद्ध आध्यात्मिक जीवन के जिस उच्चतम शिखर तक पहुँचे हैं उस तक पहुँचना दूर रहा, उसके पास तक शायद ही कोई पहुँचा हो और अपनी विचार तथा उपदेश पद्धति में ईश्वर का सहारा न लेते हुए उन्होंने जिस उच्च आध्यात्मिक जीवन का उपदेश किया वह बेजोड़ है तथा विश्व की अमूल्य निधि है। अतः चरित्रवान बनने के लिए ईश्वर नाम के आश्रय की अनिवार्यता सिद्ध नहीं होती। सद्गुणों का आधार समाज शास्त्र है।
हमारा इस बात पर जोर देना कि हम जैसा सोचते हैं वैसा दूसरे भी सोचे असहिष्णुता तथा संकीर्णता है। हम मानते हैं कि यदि सब लोग अपनी धारणाओं को एक-सा बना लें तो हमारे विचारों में समानता आ जावेगी किंतु न तो यह सम्भव ही है और न जीवन में उसकी हमें उतनी आवश्यकता ही है जितनी कि सामंजस्य शीलता सहिष्णुता का हमें अपना सारे का सारा समय, दूसरों के विचारों को ही पढ़ने में व्यतीत न कर देना चाहिये। हमारे हृदय में नवीन बातें जानने के लिये उत्साह हो किंतु शास्त्र वासना जन्य यह उत्साह उस उतावली का रूप न धारण कर ले जिससे कि हम स्वयं विचार करने की आदत को ही तिलाँजलि दे दे। अनेक विचारों के परस्पर विरोधी विचारों को पढ़ने से सदा होने वाली उलझन से छुटकारा पाने का एक यही उपाय रह जाता है कि उन बातों पर स्वतंत्रता और निष्पक्षता के साथ हम स्वयं सोचें। पढ़ें कम किंतु मनन करें अधिक। हमें यह स्मरण रखना चाहिये कि स्वयं विचारक एवं मनन शील बनने पर ही हम उस वस्तु को ढूँढ़ने की योग्यता संपादित कर सकेंगे।
(श्री 108 स्वामी श्री शिवानन्द जी सरस्वती)
आत्म भाव के साथ किसी पारमार्थिक संस्था की ओर से मानव-समाज की निस्वार्थ सेवा, भूखों को अन्न दान करने, निर्धनों को वस्त्रदान देकर, रोगियों की परिचर्या में रत रह कर, अछूतों को सान्त्वना देकर, गिरे हुओं को उठाकर सीने से लगाते हुए जरूरत मांदों की जरूरतों को दूर कर के तथा अज्ञानियों तथा अशिक्षितों को ज्ञान की शिक्षा देकर बिना अपनी इन सेवाओं के बदला चाहे जो मनुष्य वास्तव में दूसरों की यथार्थ सेवा करते हैं, वे प्रभु के प्यारे हैं। तुम यह समझ कर सेवा करो कि भगवान के आदेशानुसार सेवा कर रहे हो, निमित्त मात्र बन कर कारीगर के औजार मात्र की भाँति सेवा कार्य करो। सेवा करने से तुम्हारा मन पवित्र होगा, और तुम्हें उच्चतम सत्य की प्राप्ति होगी।
हे मानव! तुम भगवान को कहाँ ढूँढ़ते हो? उपरोक्त सेवित रूप को ही भगवान के रूप समझो, इन्हीं में भगवान का आभास मानो। यदि तुम सब की सेवा नारायण-भाव से करोगे तो तुम्हारी यह सेवा भगवत्सेवा ही समझी जायगी। मानव सेवा ही यथार्थ भगवत्सेवा है। मनुष्य-सेवा ही भगवत्पूजा और इष्ट सिद्धि का साधन है। जब तुम इन निरीह जन-साधारण की सेवा प्रेम से नहीं कर सकते तो संसार में तुम्हें कही भी भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती।
वह पुरुष जो दुनिया की सेवा करता है, वास्तव में वह अपनी सेवा करता है। वह व्यक्ति जो औरों की सहायता करता है, वस्तुतः अपनी सहायता करता है। इसलिए जब तुम दूसरों की सेवा करो, उस समय सदैव यह विचार रक्खो कि भगवान ने तुम्हें आत्मोन्नति का स्वर्ण-अवसर प्रदान किया है। सेवा द्वारा ही तुम अपने दोषों का मार्जन कर सकते हो। अपने को नम्र, मृदुभाषी और सहनशील बनाते हुए उन्नति कर सकते हो अतएव उस मानव के प्रति कृतज्ञता प्रकट करो जिसने अपनी सेवा करने का अवसर तुम्हें दिया है।
जो भगवान की सेवा करते हैं वे सभी व्यक्ति समान हैं-बराबर हैं। यदि तुम भगवान के सच्चे भक्त बन आध्यात्मिकता प्राप्त करना चाहते हो, तो ऊँच-नीच का भाव त्याग दो। समस्त भेद-भावों को समूल भस्म कर दो और भगवान को सब में देखो। विशुद्ध-प्रेम, क्षमा, सम-दृष्टि, सहनशीलता, नम्रता, मधुरता अपने को सबसे छोटा समझने के भावों की वृद्धि करो। सबसे मिलों। सब में एकत्व स्थापित करो और इस प्रकार अपना मानव जीवन सार्थक करो।
कर्म योग का अभ्यास साधक के मन को आत्म-ज्ञान प्राप्ति के योग्य बनाता है। इससे वह वेदान्त सीखने को अविकारी बन सकता है। अज्ञानी-पुरुष बिना कर्म योग की प्रारम्भिक शिक्षा और अभ्यास के एकदम ज्ञान-योग के अभ्यास पर कूद पड़ते हैं। इसी से वे यथार्थ सत्य की प्राप्ति में प्रायः असफल रहते हैं। इससे प्रतीत होता कि अभी उनके मस्तिष्क में विकार और अशुद्धियाँ मौजूद हैं। उनका मन अच्छी और बुरी चाहनाओं से भरा है। वे केवल ब्रह्म की चर्चा मात्र करते हैं वे अक्सर व्यर्थ के वाद-विवाद, वार्ता और निरर्थक-कथनोपकथन में पड़ जाते हैं। जो निरे शुष्क, कभी न समाप्त होने वाले और निष्फल हैं। उनका दार्शनिक-ज्ञान उनके ओठों तक ही सीमित है। दूसरे शब्दों में यदि उनका वाक्-वेदान्ती कह दिया जाय, तो कोई अत्योक्ति न होगी। जिसकी जरूरत है, वह है क्रियात्मक वेदान्त, जो आत्मभाव से और निस्वार्थ रूप से मानव समाज तथा देश की किसी न किसी रूप में सेवा की जाय। स्थायी और अस्थायी का अन्तर सीखो। उस परमात्मा को समस्त जीवों में, सभी पदार्थों में देखो। नाम और रूप की परवाह मत करो। वे तो अनेक हैं, उसके समझने में न फंसो। ऐसा करो कि कहीं भी केवल एक ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। जो शारीरिक मानसिक, आध्यात्मिक आदि तुम्हारे पास है उसमें भाग लो। इस प्रकार सबमें भगवत् भाव ही समझ कर सब की सेवा करो।
ऐसा अनुभव करो जब तुम दूसरों की सेवा करते हो, तो तुम अपनी ही आत्मा की सेवा कर रहे हो। अपने ही समान अपने पड़ौसियों को प्रेम करो। सभी भेद-भावनाओं को दूर हटा दो। ऐसे विचार जो मानव को मानव से पृथक समझें, उन को चित्त में आने से सावधानी पूर्वक रोको। सब से मिलों, सबको गले लगाओ। उस परब्रह्म को निराकार एवं निर्विकार और स्त्री पुरुष में समानत्व स्थिति समझ कर अपने मन से भेद-भाव दूर कर दो। जब तुम कर्म करो तब मन को ब्रह्म में लीन कर दो। यही क्रियात्मक वेदान्त है। यही समस्त उपनिषदों का सार तथा सन्त-महात्माओं के उपदेशों का गूढ़ तत्व है। यही आन्तरिक-आत्मा का जीवन-ध्येय है। अपने दैनिक जीवन में इन बातों का खूब अभ्यास करो। तब तुम निश्चय ही एक सफल योगी और जीवन्मुक्त बन सकोगे।
देना सीखो। दान में अपार प्रसन्नता होती है। इसे बहुत कम लोग समझ पाते हैं, भगवत् इच्छा पर अपने को उत्सर्ग करना सीखो। आत्म शरण गति में अपार प्रसन्नता होती है। बहुत ही कम इसे जानते हैं। पहचानना सीखो। असत्य और सत्य के भेद को समझो। बहुत कम लोग इस अन्तर को जानने की चेष्टा करते हैं।
ऐसे लोग जो पीड़ितों के प्रति सच्ची हमदर्दी रखते हों जो उनके दुःख का अनुभव करते हों बहुत कम पाये जाते हैं। दुनिया ऐसे लोगों से भरी है, जो मौखिक सहानुभूति और दिखावटी हमदर्दी रखते हैं। निश्चित और वास्तविक हमदर्दी वाले तुरन्त ही पीड़ितों को सहानुभूति प्रकट कर उनकी सहायता में क्रियात्मक रूप से जुट पड़ते हैं। उन का दिल बड़ा ही मुलायम होता है। पीड़ितों के कष्ट को वे सहन नहीं कर पाते। यदि किसी निरीह जन को वास्तविक क्लेश में वे देखते हैं, तो देखते ही उनका दिल पिघल जाता है। जो दिखावटी सहानुभूति वाले होते हैं, वे एक सच्चे पीड़ित को देखने पर कम द्रवीभूत होते हैं और अपने पास कुछ खर्च करने या देने में तरह-तरह के बहाने बनाते हुए हिचकते हैं। ऐसे लोग कंजूस होते हैं। मौखिक हमदर्दी वाले फिर भी इन कंजूसों और संग दिल वालों से बेहतर हैं, कारण कि वे सुधारे जा सकते हैं। मौखिक सहानुभूति कभी असली हमदर्दी में भी चेष्टा करके बदली जा सकती है। अधिक अभ्यास और पीड़ितों को अधिक देख रेख से उनके मन पर असर हो सकता है।
अपने काम में सदैव लगे रहो। पूरे मन, मस्तिष्क और आत्मा से कर्म करो। फल की कभी परवाह न करो। सफलता या असफलता का कभी विचार मत करो। भूत (बीते हुए) का ध्यान न करो। पूर्ण-विश्वास रक्खो और आशावादी बन कर कर्म में रत रहो। आत्म निर्भरता का अभ्यास करो। सदैव प्रसन्न चित्त रहो। सधा हुआ मन रक्खो। कर्म, केवल कर्म, करने के ध्येय से ही करो। हिम्मत और जवाँमर्दी रक्खो। तुम हर काम में निश्चय ही सफल होंगे। यही सफलता का मूल सिद्धान्त है।
प्रेम का दीपक अपने हृदय में जलाओ। सभी को प्रेम करो। अपने प्रेम का पात्र जीवमात्र को समझो। विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ो। समस्त मानव समाज को अपने हृदय में स्थान दो। सबको छाती से लगाओ। सबसे सच्चा प्रेम, आन्तरिक प्यार करो। याद रक्खो प्रेम ही वह देवी-औषधि है, जो तुरन्त ही असर करती है। हर काम में विशुद्ध प्रेम प्रकट करो। मक्कारी, लोभ, लालच, स्वार्थ, धूर्तता आदि को त्याग दो, दूर कर दो। ध्यान रक्खो कि केवल लगातार मेहरबानी के कामों का अभ्यास करो, घृणा, क्रोध, द्वेष आदि दुर्गुण भी बराबर प्रेम-पूर्वक सेवा-कार्यों में लगे रहने से छूट जाते हैं। जब तुम दूसरों पर मेहरबानी के काम करोगे, तो तुम अपने में अधिक बल, ज्यादा-खुशी तथा बेहद संतोष पाओगे, तुम्हें सभी प्यार करने लगेंगे। तुम सबके दिलों में बैठ जाओगे सबके प्यारे बन जाओगे। दवा के कार्य नम्र-सेवा भाव और पीड़ितों की सहायता-सहानुभूति से तुम्हारा दिल शुद्ध, कोमल, दयावान, मधुर, नम्र बन जायगा, जिससे तुम दैवी-ज्योति पाकर सफल साधक बन सकेंगे। तुम्हारा मन भगवान के चरण कमल में लीन होगा और तुम्हारा जीवन धन्य हो जायगा।
सब के साथ प्रेम का बर्ताव करो। समानता का व्यवहार करो। सभी को हृदय से चाहते हुए गले लगाओ। सब की सेवा करो तथा सब से प्यार करो। समस्त मानव समाज के दिलों में अपनी प्रेमपूर्ण अनवरत सेवा द्वारा जगह प्राप्त करो निस्वार्थ सेवा ही उन्नति का एकमात्र साधन है। इसे अपने जीवन का ध्येय समझो। इसी से तुम भगवत् गीता कर सकते हो। इसी से तुम्हारा जीवन आदर्श बन सकता है। यह कर्म योग की साधना है और सच्चे कर्म-योग का यही एक मात्र अपना सन्देश है।
भगवान तुम में सेवा करने की शक्ति, देश प्रेम करने का दिल दे और सच्ची हमदर्दी प्रकट करने का साधन प्रदान करें, जिससे तुम कर्म-योगी बन कर अपना और समस्त मानस समाज का कल्याण कर सको।
पाप से घृणा करो, असंयम से द्वेष करो, दुष्ट आचरणों से बैर करो, कुविचारों का अपमान करो और अन्याय से लड़ पड़ो। जिनमें यह दोष हों उनसे अलग रहो, किसी भी व्यक्ति से दुर्भाव न रखो।
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दूसरों की अवनति करके, दूसरों की बुराई करके आप अपनी उन्नति या भलाई करने में समर्थ नहीं हो सकते। आपकी उन्नति उन्हीं कार्यों द्वारा होनी सम्भव है, जिनमें दूसरों की भी उन्नति होती है।
बुद्धि को बनाना जिस प्रकार हमारे हाथ में हैं, उसी प्रकार मनोविकारों का भी बनाना हमारे हाथ में है। मनोविकार बुरे और भले दोनों हैं। जिनका जिस प्रकार विकास करोगे, वे उस प्रकार बन जावेंगे। शराब की दुकान देख कर शराबी से जिस प्रकार वहाँ गये बिना नहीं रहा जाता, उसी प्रकार यह भी आदत हो सकती है कि किसी की बुरी दशा देखकर उसकी स्थिति पर दया अवश्य उत्पन्न हो। दया करने से दया उत्पन्न होती हैं, हिंसा करने से हिंसा की प्रवृत्ति होती है। कोई मनोविकार ऐसा नहीं जो अभ्यास के, आदत के अधीन नहीं हो सकता पहले-पहले वे स्वाभाविक तथा उत्पन्न होते हैं, पर आगे उन्हें बढ़ने देना या न बढ़ने देना मनुष्य पर अवलम्बित है। आगे की बातों के लिए प्रकृति जवाबदार नहीं। उसके लिये हम ही जवाबदार हैं कि किस वस्तु या कल्पना से हमारे मन में विशिष्ट प्रकार का विकार उत्पन्न होता है। आदमी से सब कुछ हो सकता है।
यह आदतों पर ही सब कुछ निर्भर है और आदतें मनुष्य के हाथ की बाते हैं तो आदतों के कुछ नियम भी जान लेना आवश्यक है। सबसे पहले यह ख्याल रखना चाहिये कि यदि कोई नई आदत डालनी हो या कोई आदत छोड़नी हो तो उसके लिए तुम्हें अत्यन्त निश्चयपूर्वक मन की सब शक्ति लगा अच्छी आदतें डालने का प्रयत्न करना चाहिए।
दुख का सबसे बड़ा और असली लाभ यह है कि वह मनुष्य को शुद्ध एवं पवित्र बना देता है और बहुमूल्य अनुभव प्रदान करता है।
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बड़े बनने का शौक रखने वाले इस दुनिया में बहुत कम हैं। अधिकाँश लोग बड़े बनने के शौक का शौक रखते हैं।
(श्रीलावेल फि ल्मोर)
जो भोजन हम मुँह के भीतर ले जाते हैं, वही हमारा सत्वाँश (शरीर का हिस्सा) बनता है। थाली में बचा रह जाने वाला अन्न हमारा सत्वाँश नहीं बनता। यही दशा शब्दों की भी है। जिनको हम अपने मुख में स्थान देते हैं, वे हमारे सत्वाँश बन जाते हैं और जिनको हम नहीं दुहराते, वे सत्वाँश नहीं बनते।
किसी की निन्दा करने के लिए हमें अपशब्दों को मुँह में स्थान देना ही पड़ेगा और ऐसा करने पर वे हमारे सत्वाँश बन जायेंगे। हम बहुधा यह सोचते हैं कि अपराधियों की उचित आलोचना करके हम न्याय का समर्थन करते हैं, पर वास्तव में घृणा और लज्जा के शब्दों को जिह्वा पर लाकर हम उन्हें अपने मन में स्थान देते हैं और फिर उनके द्वारा हमारे सुख और शान्ति पर आघात होता है। ऐसे शब्द हमारे ध्यान को उन रचनात्मक विधियों से दूर हटा देते हैं, जिनके प्रयोग से अपराध करने वालों का सुधार सम्भव होता। हमें यह याद रखना चाहिए कि हम जिन अपशब्दों का उच्चारण करते हैं वे हमारे ही मुखों में रह जाते हैं, अपराधी का उनसे जरा भी सुधार नहीं होता।
ऐसे अवसर भी आ सकते हैं, जब हमको पाप के विरोध में आवाज उठानी ही चाहिये, पर साधारणतया ऐसा करना विषाक्त शब्दों को अपने मुखों में ले जाकर अपनी ही हानि करना है। दोष का परिहार इससे कुछ होता नहीं। निषिद्ध वाक्यों के विक्षुब्ध सागर में अपनी शब्दावली की धारा प्रवाहित करके हम संसार की अशान्ति को और भी बड़ा देते हैं। जनता की कुभावनाओं के शिकार किसी भी पुरुष के छिद्रान्वेषण, दोषारोपण और कोसने में सहयोग देकर न हम अपना ही भला करते हैं और न संसार की ही अवस्था का सुधार करते हैं। उलटे विषमय शब्दों की भारी खुराक पेट में भरकर हम अपने को विषमता के गहरे सागर में डुबो देते हैं।
विषमालोचना और अनुदार उद्गारों की बोतल खोल देने के बाद आकाश में अँधेरा छाया हुआ दीखने लगता है और थोड़ी देर के लिए जीवन का सात्विक आनन्द विषाद के बादलों से ढ़क जाता है। मूर्खता के शब्दों का उच्चारण करके हम अपने आपको बेच देते हैं और बदले में संसार की हालत बहुत बुरी है और भगवान हम लोगों को भूल-से गये है ऐसे अशुद्विचारों को हृदय में जगह देते हैं और जिन पर दोषारोपण करते हैं, उनका हमारे द्वारा कोई नैतिक सुधार भी नहीं होता।
हमारी वह इच्छा होनी चाहिये कि हम भूल करने वालों को उनकी कठिनाइयों से उबारें, परन्तु उन पर निषिद्ध वाक्यों का खौलता कढ़ाहा उलट कर हम ऐसा नहीं कर सकते। उनको पद्दलित करने के बजाय हमें उनको उठाने की कला सीखनी चाहिये।
प्रत्येक बाह्य परिस्थिति का जन्म पहले मन में होता है। बाह्य जगत से यदि बुराई को हम सदा के लिये उखाड़ फेंकना चाहते हैं तो हमें इसके लिये पहले मन में ही बुराई की जड़ को खोद डालना चाहिए। कठोर शब्दों और आघातों से न तो वैमनस्य मिटाता है और न राक्षसों में देवत्व की संस्थापना होती है। उत्तमता की ओर बढ़ने वाले प्रत्येक पग की छाप पहले हृदय और मन पर पड़नी चाहिये। आलोचनापूर्ण अथवा चोट पहुँचाने वाले शब्दों की अपेक्षा मधुर शब्द हृदय पर बाधक प्रकाश डालते हैं। बाह्य जगत की अव्यवस्था की जड़ मानस में रहती है अतः पहले मानस क्षेत्र में समता स्थापित होनी चाहिये, इसलिये विरोध भरे और कड़ुवे शब्दों से विषमता का कभी नाश हो ही नहीं सकता।
यह याद रखना चाहिये कि मुँह में लाये हुए उत्तम शब्द जीवन में सुख और समृद्धि लाते हैं एवं हिंसात्मक और अप्रिय शब्दों से अव्यवस्था उत्पन्न होती है। क्रोधाकुल शब्दों से हमारी पाचन-क्रिया में बाधा पड़ती है तथा शरीर के अन्य व्यापारों में भी उथल-पुथल मच जाती है। वातावरणों की वर्षा करके अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने के बदले हम उल्टे अपनी अधिक हानि ही करते हैं।
आज के संसार को जितनी उत्तम उत्साहवर्द्धक शब्दों की आवश्यकता है, उतनी और किसी वस्तु की नहीं। इन सत् शब्दों को उच्चारण कौन करेगा? आप-हमसे बढ़कर अच्छा कोई नहीं कर सकता। प्रेम, सद्भावना, क्षमा इत्यादि से पूर्ण उत्तम शब्दों का प्रयोग करके विश्व में शान्ति स्थापित करने और मनुष्यों में सद्भावना की वृद्धि करने में अपना हाथ बँटाने का आज अद्भुत सुअवसर प्राप्त है। विश्व में शान्ति और प्राणियों में सद्भावना स्थापित करने के लिये भगवान की दिव्य प्रार्थनाओं में सहयोग देना चाहिये न कि किसी को कष्ट पहुँचा कर संसार की अशान्ति को और बढ़ाना।
आज ऐसे नर-नारियों की आवश्यकता है, जिनको भगवान की कृपालुता पर इतना विश्वास हो कि वे शान्त रहकर जीवों को मुक्त करने की भगवान की क्रिया को देख-समझ सकें और फिर लोगों के सामने उसकी घोषणा करें। जो लोग ऐसा करेंगे, वे लोग बिना इसका पुरस्कार पाये नहीं रहेंगे, क्योंकि आशीर्वाद प्रदान करके वे स्वयं आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। मनुष्य केवल भौतिक आहार पर ही निर्भर नहीं रह सकता। सत्यरूप में जीवित रहने के लिये उसे उन शब्दों को भी अपने भीतर ले जाना होगा, जो स्वयं भगवान के मुखारविन्द से निकलते हैं।
भौतिक जीवन की पाषाणमयी कठोरताओं पर हम अपना जीवन निर्भर करने की चेष्टा कर रहे हैं पर पाप की आलोचना करने वाले शब्दों में कोई पोषणतत्व नहीं हैं। ऐसे आहार पर निर्भर रहकर हमारी आत्मा भूखों मर जायेगी। हमको सच्ची पुष्टि पहुँचाने वाला आहार तो ईश्वर की कल्याणमयी वाणी से प्राप्त होता है, जो सत्य और धर्म से ओत-प्रोत है। ईश्वर की सृष्टि में सब अच्छे हैं और जब हम उसकी कल्याणमयी वाणी का उच्चारण करते हैं तभी जीवन की वास्तविक खुराक ग्रहण करते हैं और जब असली खुराक हमें मिल सकती है तो फिर पत्थरों (कठोरताओं) पर क्यों निर्भर रहें।
पत्थरों को खाकर कोई बढ़ नहीं सकता, फल-फूल नहीं सकता। इसी तरह कठोर शब्दों में कोई बढ़ नहीं सकता, फल-फूल नहीं सकता। ईश्वर का प्रेम, जीवन और उनकी वास्तविकता ही जीवन की असली खुराक है, भगवान की मंगलमयी वाणी सुनिये और उससे शक्ति एवं जीवन प्राप्त कीजिये। केवल उनके मंगलमय शब्दों को ही अपने मुख में धारण कीजिये। अपनी बातचीत में केवल उन्हीं शब्दों का प्रयोग कीजिये, जिनमें आत्मा के निर्माणपरक तत्व भरे हैं। अपनी वाणी को ऐसी मंगल-संस्थापना हो और जगत में उसी का प्रसार हो।
अतः आपको जब कुछ बोलना हो तो केवल मंगल के लिए ही बोलिये।
-कल्याण
(प्रोफेसर रामचरण महेन्द्र एम. ए.)
सत्यसेवन तथा सदाचार-सम्पन्नता के मध्य में सौन्दर्योपासना नामक ध्येय का स्थान है। सौन्दर्योपासना करने का अधिकार बुद्धि और अन्तःकरण दोनों को समान रूप से प्राप्त है। युग की माँग यह है कि सत्य तथा सदाचार के साथ-साथ युवक सौंदर्य को भी अपने अध्याय में स्थान दें।
सौन्दर्योपासक भलाइयों के सौंदर्य को समझता है और वह अपने दैनिक तथा व्यवहारिक जीवन में उस सौंदर्य को प्रत्यक्ष करता है। सच्ची सौंदर्योपासना में सभी कुछ आ जाता है- शील, चरित्र, सुरुचि। जो अश्लील है, वह कुरूप हैं। अतः उसका बहिष्कार होना चाहिये। इसके विपरीत जो शीलयुक्त एवं संयत है, वह सुन्दर है। वह आदमी सुन्दर है जो सदा सर्वदा शुभ्र हितैषी एवं उत्तमोत्तम विचारों में मग्न रहता है, सात्विक कार्य करता तथा सात्विक वाणी का उच्चारण करता है, पवित्र स्थानों में रमण करता तथा दूसरों से पवित्र व्यवहार करता है, जिसकी मनोवृत्तियाँ सदैव पवित्रता की ओर उन्मुख रहती हैं। चरित्र की बुनियाद सौंदर्य पर कायम करनी चाहिये किन्तु यह सौंदर्य आन्तरिक सौंदर्य होना चाहिये। सौंदर्य अच्छाइयों को स्वभावतः देखता है, अच्छाइयों का आदर करता है और अच्छाइयों में जीवन-क्रम का निर्माण करता है।
सौंदर्य का अर्थ शारीरिक बनाव शृंगार, क्रीम, पाउडर, गंदा गायन, युवतियों का नाच, मद्यपान, व्यभिचार नहीं। ऐसा सोचना सौंदर्य का उपहास करना है। सौंदर्य के नाम पर दानवता का प्रचार करना हैं। सौंदर्य का यह बड़ा गन्दा स्वाँग है। जिनके मन में वासना का भयानक नृत्य हैं, इच्छा की उद्दंडता है, व्यभिचारी प्रवृत्तियों का नर्क है, वह बाहर से चिकना चुपड़ा सुन्दर आकर्षक होते हुए भी अपरिमार्जित तथा अपरिपक्व है।
सच्चे सौंदर्य का पारखी-
एक बार का वृतान्त है कि महापुरुष ईसा अपने कुछ शिष्यों सहित वायु सेवनार्थ जा रहे थे। मार्ग में एक स्थान से घृणित बदबू आई। शिष्यों ने नाक में कपड़ा लगा लिया। कुछ चलने के पश्चात् मार्ग में एक मरा हुआ कुत्ता सड़क पर पड़ा हुआ दृष्टिगोचर हुआ। उस पर मक्खियाँ भिनक रही थी, लहू बह रहा था पास से निकलते हुए भय प्रतीत होता था। शिष्य घृणा सूचक शब्दों का उच्चारण करते हुए एक ओर को निकलने लगे किन्तु महात्मा ईसा रुक गए। उन्होंने बड़ी ममता से मृत कुत्ते को हाथों में उठाया। उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे। उन्होंने बड़ी समता से कुत्ते को सड़क के एक किनारे लेटा दिया ओर बोले- कैसे सुन्दर है इसके दाँत।
ईसा सच्चे अर्थों में सौंदर्योपासक थे। वे सौंदर्य को प्रमुख स्थान देते थे। सूक्ष्म दृष्टि में सौंदर्य ही सदाचार का मूल था। अपने दैनिक जीवन में हमें सौंदर्य को प्रमुख स्थान देना चाहिये।
सौंदर्य के दो प्रकार-
सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर दो प्रकार का सौंदर्य होता है। बाह्य सौंदर्य, दूसरा आन्तरिक सौंदर्य। हम बाह्य सौंदर्य को बुरा नहीं कहते। हमें चाहिये कि हम शरीर से साफ , सुन्दर तथा आकर्षक बनें, अपना गृह स्वच्छ तथा सुन्दर रखें, अपनी पत्नि, बाल बच्चों को सुन्दर रखें, अपनी निजी वस्तुएं -उद्यान, कुण्ड, देवालय, विद्यालय, पुस्तकें, सभी स्थानों में सुन्दरता को प्रमुख स्थान है। प्रत्येक मनुष्य तथा स्त्री की यह स्वभावतः इच्छा होती है कि मैं खूब सुन्दर लगूँ। राष्ट्रों तथा संस्थाओं की भी यही बात है। हमारी पोशाक, बर्तन, शरीर सभी कुछ सुन्दर रहें पर वहीं सौंदर्योपासना की इतिश्री ने हो जाय। यह तो सौंदर्योपासना का प्रारंभ है। यह तो पहला पाठ है। इस बाह्य सौंदर्य के पश्चात् दूसरी स्टेज आन्तरिक (आत्मिक) सौंदर्य की आती है। आन्तरिक सौंदर्य ही वास्तविक सौंदर्य है। यही सच्चा परिपक्व सौंदर्य है। सच्चे सौंदर्य पारखी को यहीं आकर रुकना चाहिये।
रस्किन नामक अंग्रेज लेखक ने सौंदर्योपासना पर बहुत लिखा है। रस्किन कहता है हम देखते हैं आजकल के युवक रसिकता की वृद्धि के लिए जितना प्रयत्न करते हैं, उतना शील संवर्धन के लिए नहीं करते। आजकल के स्त्री पुरुष चाहते हैं कि हम नाच सकें, गा सकें, अच्छे चित्रों पर अपनी राय दे सके, शिल्प शास्त्र पर कुछ बोल सकें इत्यादि। उनकी यह चाह योग्य है किन्तु यदि उनमें केवल इतनी चाह ही है तो मैं कहूँगा कि उनकी शिक्षा अधूरी है। मैं चाहता हूँ कि इन कलाओं की आत्मा जो सदाचार सम्पन्नता है, उसकी ओर तरुण स्त्री पुरुषों का ध्यान आकर्षित करूं। जब तक मनुष्य को आन्तरिक सौंदर्य की प्रतीति नहीं हो जाती, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि उसका मन सुसंस्कृत हो गया है।
वास्तव में बिना सदाचार की नींव के सौंदर्योपासना अग्नि से खिलवाड़ करना है। सदाचार सम्पन्नता सौंदर्योपासना का एक प्रकार है।
(महात्मा गाँधी)
मैं यह विश्वास जरूर रखता हूँ कि अगर सिर्फ बुज़दिली और हिंसा में से ही चुनाव करना करना हो तो मैं हिंसा को ही चुनने की सलाह दूँगा। मैं यह पसन्द करूंगा कि हिन्दुस्तान अपनी इज्जत बचाने के लिये हथियारों की मदद ले बनिस्बत इसके कि वह कायरों की तरह खुद अपनी बेइज्जती का असहाय शिकार हो जाय या बना रहे। लेकिन मेरा विश्वास है कि अहिंसा हिंसा से कहीं ऊँची है, सजा की बनिस्बत माफी देना कहीं ज्यादा बहादुरी का काम है। ‘क्षमा वीरस्य भूषणम’। क्षमा से वीर की शोभा बढ़ती है। लेकिन सजा न देना उसी हालत में क्षमा होती हैं जब सजा देने की ताकत हो। किसी असहाय व्यक्ति का यह कहना कि मैंने अपने से बलवान को क्षमा किया कोई मानी नहीं रखता। जब एक चूहा बिल्ली को अपने शरीर के टुकड़े करने देता है तब वह बिल्ली को क्षमा नहीं करता। कोई यह न समझे कि मैं हवाई और खयाली आदमी हूँ। मैं तो असली आदर्श वादी होने का दावा करता हूँ अहिंसा धर्म महज ऋषि और महात्माओं के लिए ही नहीं है वह तो आम लोगों के लिये भी है जैसे पशुओं की आत्मा सोती पड़ी रहती है और वह शारीरिक बल के अलावा और कानून को जानती ही नहीं। इन्सान का गौरव चाहता है कि वह ज्यादा ऊंचे कानून की ताकत आत्मा की ताकत के सामने सिर झुकाये।
इसीलिये मैंने हिन्दुस्तान के सामने आत्म त्याग का, अपनी कुरबानी का, पुराना नियम पेश करने की जरूरत की है। जिन ऋषियों ने हिंसा में से अहिंसा का नियम ढूँढ़ निकाला वे न्यूटन से ज्यादा प्रतिभाशाली थे वे खुद बहुत बड़े योद्धा थे। वे हथियार चलाना जानते थे लेकिन अपने अनुभव से उन्होंने उन्हें बेकार पाया और थकी हुई दुनिया को यह सिखाया कि उसका छुटकारा हिंसा के जरिये नहीं होगा बल्कि अहिंसा के जरिये होगा।
अपनी सक्रिय दशा में अहिंसा के मानी हैं जानबूझ कर तकलीफें उठाना उसके मानी यह नहीं हैं कि आप बुरा करने वाले की ख्वाहिश के सामने चुपचाप अपना सिर झुका दें, बल्कि उसके मानी यह है कि हम जालिम की ख्वाहिश के खिलाफ अपनी पूरी आत्मा को भिड़ा दें। अपनी हस्ती के इस कानून के मुताबिक काम करते हुए, महज एक शख्स के लिए भी यह मुमकिन है कि वह अपनी इज्जत अपने मजहब और अपनी आत्मा को बचाने के लिए, किसी अन्यायी साम्राज्य के पुनरुद्धार या पतन की नींव डाल दें।
और इसीलिए मैं हिन्दुस्तान से अहिंसा का रास्ता अख़्तियार करने के लिये इसलिये नहीं कहता कि वह कमजोर है। मैं चाहता हूँ कि वह अपनी ताकत और अपने बल भरोसे को जानते हुए अहिंसा पर अमल करे। मैं चाहता हूँ कि हिन्दुस्तान यह पहचान ले कि उसमें एक आत्मा है जिसका नाश नहीं हो सकता और वह तमाम शारीरिक कमजोरियों पर फतह पा सकती हैं तमाम दुनिया के शारीरिक बलों का मुकाबला कर सकती है।
दुनिया में आजकल कमजोर आदमियों को रहने के लिए जगह नहीं है। मेरा शरीर भी एक बार कालेज में पढ़ते हुए कमजोर हो गया था। तब मैंने एक वर्ष तक कालेज जाना बन्द करके शरीर सुधार ने की पूरी कोशिश की थी। तुम्हें चाहिए कि पहले शरीर को निरोगी और बलवान बनाओ क्योंकि शरीर रोगी और दुर्बल रखने के समान दूसरा कोई पाप नहीं है।
-लोकमान्य तिलक
जितना आप अपनी योग्यता पर अविश्वास करेंगे, जितना आप भय और शंका को अपने हृदय में स्थान देंगे, उतने ही आप विजय से-सफलता से दूर रहेंगे। चाहे हमारा पथ कितना ही कंटका-कीर्ण और अन्धकारमय क्यों न हो, पर हमें चाहिये कि हम कभी अपने आत्म-विश्वास को मानसिक, धैर्य को तिलाँजलि न दें।
हमारी शंकाएँ और भय जैसे दूसरों के विश्वास को नष्ट करते हैं वैसे कोई अन्य पदार्थ नहीं। बहुत से मनुष्यों की असफलता का कारण यह है कि वे अपने निराशाजनित भाव को ही प्रोत्साहन देते रहते हैं और अपने पास उठने बैठने वाले लोगों से ऐसी ही निराशा भय प्रेरणा किया करते हैं।
यदि तुम अपने को पतित समझोगे। यदि तुम समझोगे कि हम ना कुछ मनुष्य है-हमारा कोई महत्व नहीं तो दुनिया तुम्हें ऐसा ही समझेगी। वह तुम्हारा कोई महत्व नहीं समझेगी। वह तुम्हारी आवाज की कुछ कीमत न गिनेगी।
मैंने कोई ऐसा आदमी नहीं देखा जिसने अपने आप को तुच्छ, हीन और बेकाम समझते हुए कोई महान कार्य किया हो। जिस योग्यता का हम अपने आपको समझेंगे, उतना ही महत्वपूर्ण काम कर सकेंगे। यदि आप बड़े पदार्थों की आशा करते हैं-उनकी माँग करते हैं और अपने मनोभाव को विशाल बनाए हुए हैं तो आपको बड़ी ही ऊँचे दर्जे की सफलता प्राप्त होगी।
जैसे तुम अपने आपको गिनोगे, जैसे तुम्हें अपनी योग्यता पर विश्वास होगा, जैसे तुम्हें अपनी उन्नति का महत्व मालूम हो रहा होगा-तुम संसार के लिए अपने आपको जैसे उपयोगी और वजनदार गिनोगे, वैसा ही भाव तुम्हारे चेहरे पर और तुम्हारे आचार विचार पर दीखने लगेगा।
यदि तुम अपने आपको मामूली आदमी मानोगे तो तुम्हारे चेहरे पर भी ऐसा ही भाव दीखने लगेगा। यदि तुम अपने आप सम्मान न करोगे तो तुम्हारा चेहरा इस बात की गवाही दे देगा। यदि तुम अपने आपको गरीब और कुछ नहीं समझोगे तो खूब समझ लो तुम्हारे चेहरे पर कभी भी भाग्यवानी की प्रभा न चमकेगी। गरीबी की ही झलक उस पर झलका करेगी। जो कुछ गुण तुम अपने आप में प्रकट करते हो उनका अंश उस प्रभाव में भी रहता है जो तुम दूसरों पर डालते हो।
जिन गुणों को आप प्राप्त करना चाहते हो उन्हीं गुणों को यदि आप अपने मानसिक भवन में पैदा करते रहोगे तो धीरे-धीरे ये गुण आपके होने लगेंगे और इन का प्रकाश आपके चेहरे पर भी चमकने लगेगा। यदि आप चाहते हैं कि हमारे मुख मण्डल पर दिव्यता का भाव झलके तो पहले आप अपने हृदय में वैसे भावों को उत्पन्न कीजिये यदि आप चाहते हैं कि हमारे मुख मण्डल और आचार-व्यवहार में उच्चता का भाव झलके तो इसके लिये आवश्यक है कि आप अपने विचारों में उच्चता लावें।
हमारे कार्य की नींव हमारे आत्म विश्वास पर लगी हुई है। हम कार्य करते है इस विचार में बड़ी अद्भुत शक्ति भरी हुई है। जिस मनुष्य में पूरा आत्मविश्वास है वह इस तरह की गड़बड़ी में नहीं पड़ता कि मैं ठीक पथ पर हूँ कि नहीं, मुझ में कार्य सम्पादन की योग्यता है कि नहीं। उसे अपने भविष्य के लिए किसी प्रकार की चिन्ता नहीं उठती।
जिस मनुष्य ने कभी प्रेम नहीं किया, वह मनुष्य कदापि ईश्वरानुभव नहीं कर सकता। यह एक तथ्य है। -स्वामी रामतीर्थ।
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दया के कामों में मनुष्यों को ईसाई होना चाहिये। कड़ाई के साथ बाह्य विधि को ठीक-ठीक पालन करने में मुसलमान और सब प्राणी मात्र के विषय में दया करने में हिन्दू होना चाहिए।
-श्री रामकृष्ण परमहंस।
(श्री विश्वामित्र वर्मा)
विचार मनुष्य में स्वाभाविक है, विचार न हो तो हम पशु की श्रेणी में गिने जायेंगे। हम देखते हैं कि जो लोग विचार हीन होते हैं उनमें मनुष्यत्व की गणना नहीं होती। विचारों का उद्गम मन में है। ‘मन’ हमें प्राप्त होने से ही हम मनुष्य कहाए। मन का काम है विचार करना या मनन करना। यदि हम में मन न हो, हम विचार न करें तो हम मनुष्य नहीं। सारा मानव संसार विचार करता है, बोलता है, काम करता है और अनुभव करता हैं पर बहुत से लोग बड़े-बड़े विद्वान तक यह नहीं जानते कि सबका कारण ‘मन’ है। अज्ञात रूप से विचार चलते रहते हैं उसी के कारण वे बनते बिगड़ते हैं फिर भी कहते हैं कि हमको विचार नहीं आते या हमने बिना विचारे काम कर लिया आदि-तथा हमको विचार शक्ति का रहस्य नहीं मालूम। परन्तु यदि सूक्ष्म दृष्टि से उनके जीवन या संसार में किसी भी कार्य की जड़ देखी जाय तो मालूम होता है कि कोई भी कार्य बाहर दृश्य स्थूल जगत में तैयार हो जाता है-जो संबंध बीज और वृक्ष का है वह संबंध हमारे विचारों और कार्यों में हैं। हम विचार करते हैं फिर काम करते हैं- पर हमें यह नहीं मालूम कि यह कार्य हमारे विचारों का परिणाम है। हमें जो सुख दुःख आदि प्राप्त होते हैं उसका कारण हम बाहर के पदार्थों को समझते हैं पर बाहर नहीं -यह हमारी केवल कल्पना है। एक ही वस्तु आज हमें अप्रिय है, कल वह प्रिय हो जाती है। इतना नहीं-हम जैसा विचार उस वस्तु के विषय में करेंगे वैसी ही वह हमको भायेगी। अच्छी और बुरी बातें सब हमारे मन में-हम से ही उत्पन्न होती हैं। विचार के बिना सृष्टि का कोई भी कार्य एक क्षणभर के लिए भी आगे नहीं बढ़ सकता। हमारे प्राचीन ऋषि महात्माओं ने विचार शक्ति की जो महिमा गाई है उसका महत्व अब पाश्चात्य लोगों को भी विदित होने लगा है। जड़ शक्तियों के साथ वे विचारों की प्रचण्ड शक्तियों का भी अनुभव करने लगे हैं। वे यह मानने लगे हैं कि मनुष्य अपने विचारों का ही बना हुआ है। मनुष्य जैसा विचार करता है वैसा ही वह हो जाता है।
यदि मनुष्य अच्छा विचार करे तो वह अच्छा और बुरा विचार करे तो बुरा बन जाता है। मनुष्य विचारों का पुतला है। मनुष्य में मन का अस्तित्व होने से ही उसे रोग, शोक, भय, दुःख, सुख, मित्र, अच्छा, बुरा आदि भासता है जो चीजें हमारे उपयोग की हैं, जिनसे हमारा स्वार्थ सिद्ध होता है जो वस्तुएँ, प्रसंग व परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल हैं उन्हें ही हम अच्छा कहते हैं बाकी अन्य वस्तुएं सब बुरी हैं। पर हम यह नहीं जानते कि अच्छा-बुरा आदि सब पहले हममें ही उत्पन्न हुआ। यदि हमने कोई वस्तु देखी उसके विषय में हमने अपनी रुचि के अनुसार अच्छी या बुरी कह दी-परन्तु उस वस्तु में कोई परिवर्तन नहीं हुआ-जैसी पहले थी वैसी ही अब भी है-अतः परिवर्तन हमसे ही हमारे अच्छे व बुरे विचारों के कारण होता है।
सारा संसार हमारे विचारों पर ही स्थित है हम उसे बुरा कहे या अच्छा कहें। विचार करने में हम स्वतंत्र है। यदि मनुष्य शोक, भय, व्यभिचार, ईर्ष्या, द्वेष और घृणा इत्यादि के विचार करेगा तो निश्चय ही ये दुर्गुण उसमें बैठ जावेंगे यदि विपरीत में परोपकार, निर्भयता, सत्यता, आदि के विचार करेगा तो उसमें इन गुणों का प्रादुर्भाव होने लगेगा-और साथ ही साथ उसमें एक आश्चर्य कारक शक्ति का संचार होने लगेगा।
विचारों का महत्व असाधारण है। विचारों के द्वारा ही मानव जीवन का निर्माण होता है। विचारों के कारण ही मनुष्य ऊँचा बढ़ता और नीचा गिरता है। इसलिए विचारों को अपनाते समय हमें बड़ी सतर्कता रखने की आवश्यकता है।
(डा. वीर भरती सिंह राणा)
चाय एक मादक अहितकर पेय है। मनुष्य शरीर को जिन चौदह द्रव्यों की आवश्यकता होती है उनमें से एक भी इसमें नहीं है। यह सम्पूर्ण विजातीय पेय है संसार के प्रसिद्ध विश्लेषकों का कथन है कि चाय में निम्न पदार्थों के भी अंश पाए जाते हैं।
(1) टैनीन (Tannin) 16-40 प्र. श. से 27-14 प्र. श. तक (2) दाइन (Thine) 2-24, 3-42 प्रतिशत (3) सुगन्धित तेल (Essential-oil) 0-79 से 2-॰ प्रतिशत तक।
प्रथम तथा द्वितीय पदार्थ एक प्रकार के विष और तृतीय पदार्थ एक प्रकार का सुगन्धित तेल जो नींद को उड़ा देने का कार्य करता है इसमें पाये जाते हैं। इस के बाद भी वैज्ञानिकों ने इसकी अधिक खोज की है और बतलाया है, कि चाय की पत्ती हरी या सूखी लेकर एक प्लेटिनम तार में लपेट कर बनसन फ्लेम में जलाया जाय तो उसमें से पीली लपटें निकलेंगी। उसे नीले रंग के चश्मे (शीशे) से देखने से बैंगनी (Violet) रंग की लपटें दिखाई देंगी। वे पोटेशियम साल्ट के लक्षण हैं। थोड़ी सी बनी हुई चाय (बिना दूध शक्कर के) लें उसमें फैरिक क्लोराइड 5 ग्रेन मिलाने से काली स्याही की भाँति रंग हो जायेगा। जिससे ज्ञात होता है कि इसमें टेनिक एसिड विष है। इसी प्रकार बनी हुई चाय में तग हाइड्रो क्लोरिक एसिड चन्द बिन्दु तथा एक टुकड़ा पोटेशियम क्लोरेट को मिलाए उसमें से क्लोरिन गैस की गंध निकलेगी जो इसमें कैफीन विष का भी होना सिद्ध करता है। यह है संक्षेप में इसका रासायनिक विश्लेषण।
अनेक प्रसिद्ध डाक्टरों ने बतलाया है कि चाय पीने, प्रत्यक्ष विष पीने में कोई अन्तर नहीं। फिर भी आप प्रति दिन चाय पीते हुए स्वयं अपने स्वास्थ्य और अमूल्य जीवन को नष्ट कर रहें हैं। हानि के विचार से शराब और चाय एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं, अन्तर इतना है कि एक महंगी और दूसरी सस्ती है। शराब, मदहोश बनाकर थोड़े समय के लिए दुःख हरती है, किन्तु चाय नींद को उड़ा देती है, अमूल्य जीवन तथा शरीर के स्वास्थ्य को नष्ट करने में यह शराब से अधिक भयंकर है क्योंकि यह उससे सस्ती है इसका प्रचार स्थान-स्थान पर है।
प्रायः जो महानुभाव चाय के अभ्यासी होते हैं उनकी क्षुधा नष्ट हो जाती है। चाय के अतिरिक्त और किसी पदार्थ की इच्छा नहीं रह जाती, उन व्यक्तियों को जब तक चाय का प्याला नहीं मिल जाता, वे अपनी वास्तविक स्थिति में नहीं आ पाते है। इसका मुख्य कारण यह है कि चाय पीने से उनकी इन्द्रियाँ चाय के विष के वशीभूत हो हृदय की गति को निर्बल कर देती हैं, इसके बिना मन खिन्न, चिड़चिड़ा और मस्तिष्क कार्य रहित सा रहता है। इसका नशा लगभग शराब की भाँति ही है, क्योंकि जब चाय का प्रभाव शरीर पर नहीं रहता तो फिर चाय पीने की इच्छा उत्पन्न हो जाती है। इसी प्रकार चाय का विष इन्द्रियों पर अप्रभावित प्रभाव डालकर स्फूर्ति पैदा करता है। परिणाम यह होता है कि शरीर की इन्द्रियाँ समय से पूर्व ही नष्ट हो जाती हैं। भारत के प्रसिद्ध डा. गोपाल भास्कर गडबुल लिखते हैं कि कर्ण इन्द्रिय और अन्य ज्ञान इन्द्रियों पर इसका बहुत बुरा प्रभाव होकर कुछ दिनों में पक्षाघात (लकवा), बहरापन आदि रोग होते दिमाग पाये जाते हैं और इसके प्रमाण भी हैं। फ्राँस के प्रसिद्ध चिकित्सक ने कहा है कि जो व्यक्ति चाय पीते हैं उनके दिमाग की नशे निर्बल पड़ जाती हैं और कानों में साँय की ध्वनि आने लगती हैं। स्त्रियाँ जो मनुष्यों की अपेक्षा निर्बल होती है वे चाय की अभ्यासी होकर प्रायः ऐसे रोगों से अधिक ग्रस्त हो जाती हैं।
डाक्टरों की सम्मति है कि चाय के सेवन करने से एक नवीन रोग यह उत्पन्न हुआ है कि पहले मस्तिष्क में एक प्रकार का वेग उठता है चेहरे का रंग पीत वर्ण होता चला जाता है किन्तु चाय का पीने वाला उसकी चिन्ता नहीं करता है। कुछ समय के पश्चात अतिरिक्त तथा बाह्य कष्ट प्रकट होने लग जाते हैं। चित्त (मिजाज) शुष्क और मुखाकृति अधिक पीत-वर्ण हो जाती है। एक अन्य रोग जिसे चाहरम कहते हैं। जिसमें एक प्रकार की कठिन मूर्छा आँतरिक इन्द्रियों के कार्य शिथिल, हाथ में कंपन जिसका फल यह होता है कि स्वाभाविक शिथिलता प्रकट होने लगती है। चाय का विष मूत्राशय (Bladder) पर अप्राकृतिक प्रभाव डालकर उसकी मूत्र रोक रखने की शक्ति कम कर देता है। जिससे उन्हें अधिक काम करते हुये बार-बार मूत्र त्याग करना पड़ता है और आग जलकर मूत्र में मूत्राम्ल (ric Acid), कैल्शियम आरजैलेट तथा अंडलाल (Albumen) आदि जाने लग जाते हैं जिससे अनेक मूत्र सम्बन्धी पीड़ायें उत्पन्न हो जाती हैं।
मद सेवियों के भाँति चाय पीने वाले अपने कष्ट की चिकित्सा चाय को ही समझा करते हैं। परिणाम यह होता है कि रोग वृद्धि होती जाती है। डा. वेमार्ड ने बहुत से रोगियों की परीक्षा करके ये बातें सिद्ध की हैं कि चाय का विष शरीर में एकत्रित होता रहता है और नवयुवकों तथा दुर्बल शरीर वालों पर इसका बहुत हानिकर प्रभाव होता है। इसके सेवन से इसके विष युक्त प्रभाव के अनेक लक्षण-जैसे क्षुधा का नष्ट होना, पाचन विकार, कोष्ठबद्धता, हृदय धड़कन, हृदय स्थान पर पीड़ा, जी मचलाना, कै, मूर्छा, दर्द, गठिया, वाय आदि रोग हो जाते हैं। चाय का जो प्रचार भारत में किया जा रहा है, यह उसी प्रकार है जैसे चीन में अफीम का किया गया था। स्वास्थ्य का महत्व समझने वाले हर एक विचार शील व्यक्ति को इस हानिकारक पेय से बचने के लिए सावधान रहना चाहिए। जिन्हें आदत पड़ गई है और नहीं छोड़ सकते वे तुलसी, बनफसा, अदरक, मुनक्का, ब्राह्मी, चकन, जैसी लाभदायक औषधियों को पानी में उबाल कर चाय का काम ले सकते हैं।
(डा. दुर्गाशंकरजी नागर)
सुख बाहर से प्राप्त नहीं होता, बल्कि अंतः करण की अनुकूल बुद्धि में ही वास्तविक सुख है। सुख की प्राप्ति भविष्य में होगी या भविष्य में अमुक पदार्थों की प्राप्ति होगी-इस भ्रान्ति युक्त कल्पना को अपने अन्तःकरण से दूर कर दो। वर्तमान में किस बात का अभाव है कि तुम भविष्य की बाट जो रहे हो? भविष्य का विचार भविष्य को सौंप दो, उसे वर्तमान के साथ मिश्रित मत करो।
आज जो तुम्हें सुख उपलब्ध हो रहा है, वही सर्वोत्तम है। सुख के अनुभव करने का यही राजमार्ग है।
तुम क्यों फिर इधर-उधर अपने दुःख को दूर करने का उपाय सोचते-फिरते हो? तुम भय से क्यों काँप रहे हो? क्रोध से क्यों तप रहे हो?
दुःख को दूसरों के पास जाकर रोने गाने से दूर नहीं कर सकते। दुःख के उद्गार संक्रामक रोग के समान फैलते हैं। तुम्हें, स्वयं अधिक दुःखी करते हैं और दूसरों को भी दुःख पहुँचाते हैं। मरण-पर्यन्त तुम दुःख की गाथा संसार को सुनाते रहोगे तो भी तुम्हारा दुःख रत्ती भर कम न होगा।
यदि तुमको दुःख और महान विपत्ति का सामना करना पड़ रहा हो तो शान्ति से सहन करो, और उसके लिए परमात्मा का उपकार मानो। जगत के इतिहास में जो बड़े बड़े महान कार्य हुए हैं, वे धन, और सुख के परिणाम नहीं है। किन्तु दुःख विपत्ति और शोक के हैं।
भूत काल के भ्रान्तिमय दुःख, शोक, निराशा के लिए जरा भी पश्चाताप न करो। पश्चाताप और निराशा प्रकट करके जो तुम भूल सुधारना चाहते हो, वे विचार पुनः पुनः तुम्हारे मानसिक संग्रहालय में स्थान प्राप्त करेंगे। ऐसा करने से तुम पुनः उन विचारों को जाग्रत कर लोगे इसलिए उनका विचार करना बिल्कुल छोड़ दो।
नीतिकार का वचन है कि-
वुभु क्षतैः व्याकरणं न भुज्यते।
पिपासितैः काव्य रसो न पीयते॥
अर्थात्- ‘भूखे व्यक्ति का व्याकरण के भोजन से काम नहीं चलता और न प्यासे की तृप्ति काव्य रस पीने से होती है।’
काव्य, व्याकरण, साहित्य, संगीत, कला, आदि की जीवन में निस्संदेह बहुत बड़ी आवश्यकता है, इनके बिना सरसता, कोमलता और मधुरता कायम नहीं रहती। यह होते हुए भी इन बौद्धिक व्यंजनों से पूर्व शारीरिक स्थिरता के उपकरण जुटाने की आवश्यकता होती है। जीवन को स्थिर रखने के लिए भोजन, वस्त्र, मकान, तथा सामाजिक सम्बन्धों को चलाने के लिए आवश्यक साधन सामग्री की आवश्यकता है, यह सभी वस्तुएं धन के ऊपर निर्भर हैं। पैसे के बिना उपरोक्त आवश्यकताओं में से एक की भी पूर्ति नहीं होती। इस युग में अर्थ के बिना जीवन धारण किये रहना भी कठिन है।
बौद्धिक उन्नति की ओर ध्यान देना जरूरी है, परमार्थिक धर्म संचय भी आवश्यक है, परन्तु इन दोनों से भी आरंभिक सीढ़ी जीवन रक्षा है। यदि भोजन की समुचित व्यवस्था न हो, शरीर रक्षा के आवश्यक उपकरण हो तो मनुष्य निर्बल एवं अस्वस्थ होकर मृत्यु के मुख में जाने की तैयारी करने लगेगा। समाज में रह कर सम्मान सहित जीवन बिताने के लायक धन न हो तो चित्त में, आत्मग्लानि, अपमान, हीनता, दीनता, दुर्भाग्य, चिन्ता, ईर्ष्या एवं घृणा के सत्यानाशी भाव सदा जागते रहेंगे और अंतःकरण की कोमलता को निरन्तर जलाते रहेंगे। ऐसी दशा में न तो सच्ची बौद्धिक उन्नति हो सकती है और न अध्यात्मिक उन्नति। संगीत साहित्य एवं कला में चित्त कैसे जमेगा। चिन्ता निराशा और उद्विग्नता से बेचैन मन किन्हीं ललित कलाओं पर किस प्रकार एकत्र होगा? शारीरिक स्थिरता के बिना दर्शन शास्त्र काव्य, एवं धार्मिक विवेचना में रुख किस प्रकार आयेगा?
एक नीति वचन है कि- “खाली बोरा सीधा खड़ा नहीं रहता।” बोरी अन्न, शक्कर आदि से भरी होगी वह सीधी खड़ी रहेगी पर जिस बोरी में कुछ न भरा हो खाली होगी वह सीधी खड़ी न रह सकेगी, धरती पर गिर पड़ेगी। उसी मनुष्य की नैतिकता स्थिर रह सकती है जिसके पास जीवन निर्वाह के आवश्यक साधन मौजूद हैं। जो भूखा है, अभावग्रस्त है, दीन और दरिद्र है, वह कब तक धर्म पर स्थिर रहेगा? चोरी, बेईमानी, धोखेबाजी आदि की ओर उसकी प्रवृत्ति झुकेगी। जब नीति युक्त रीति से अर्थ व्यवस्था में मनुष्य समर्थ नहीं होता तो उसका मन अनीति की ओर मुड़ते देर नहीं लगती। अभाव और असुविधाओं से सताये हुए मनुष्य के लिए उन आदेशों की ओर चलना कठिन है वह अनैतिकता के कुमार्ग की ओर आसानी से लुढ़क सकता है।
उन्नति की ओर चलना ठीक है, हर मनुष्य को विभिन्न दिशाओं में जीवन को विकसित करना चाहिए। पर सब में पहले आर्थिक स्थिरता की ओर समुचित ध्यान देना चाहिए। क्योंकि उस पर ही शारीरिक एवं मानसिक स्थिरता बहुत अंशों में निर्भर है। जब शरीर गत उद्विग्नताओं से निश्चिन्तता हो जाती है तब मन में अन्य दिशाओं की ओर प्रगति करने लायक स्फूर्ति उत्पन्न होती है। आवश्यक सुविधाओं के अभाव में भीतरी चेतना भी अनुत्साह एवं खिन्नता की दशा में पड़ी रहती है। स्वाध्याय के लिए पुस्तकें, सत्संग के लिए जाने को मार्गव्यय, देवता पर चढ़ाने के लिए भोग, गुरु को देने के लिए दक्षिणा यह सब भी तो अर्थ साध्य ही हैं। कथा, कीर्तन, व्रत तीर्थ, दान, यज्ञ अनुष्ठान, ब्रह्मभोज, सभी के लिए तो धन चाहिए। उचित अवसर पर जब उत्तम कार्य करने के लिये पास में पैसा नहीं होता तो परमार्थ की वृत्तियाँ संकुचित होकर मुरझा जाती है। परमार्थ के पथ पर पैर बढ़ाने योग्य साहस स्थिर नहीं रह पाता। इन सब बातों पर विचार करते हुए नीतिकार ने मनुष्य को सलाह दी है कि वह विकास की प्रवृत्ति आरम्भ करते हुए धन उपार्जन की दिशा से आँखें न मूँद ले। जो इधर उपेक्षा करते हैं और केवल मात्र बौद्धिक उन्नति पर निर्भर रहना चाहते हैं उन्हें नीतिकार ने स्मरण दिलाया है कि- व्याकरण से भूख और काव्य रस से प्यास शान्त नहीं होती। जीवन निर्वाह के लिए अन्न, जल की भी आवश्यकता है। अन्य उन्नतियों के लिए आवश्यक सुविधा एवं प्रेरणा प्राप्त करने को अर्थ की जरूरत है सो उसका भी यथोचित ध्यान रखना चाहिए।
अनीति से धन कमाना बुरा है, सम्पूर्ण शक्तियों को धन उपार्जन में ही लगाये रहना बुरा है, धन का अतिशय मोह, अहंकार, लालच बुरा है, धन के नशे में उचित अनुचित का विचार छोड़ देना बुरा है, परन्तु यह किसी भी प्रकार बुरा नहीं है कि जीवन निर्वाह की उचित आवश्यकताओं की पूर्ति को ईमानदारी और परिश्रम शीलता के साथ धन उपार्जन किया जाय। ऐसा उपार्जन उचित है, आवश्यक है, कर्त्तव्य है एवं जीवन को सुख शान्ति की ओर ले जाने वाला है।
लाखों गूँगों के हृदय में जो ईश्वर विराजमान हैं मैं उसके सिवा अन्य किसी ईश्वर को नहीं मानता। वे इसकी सत्ता को नहीं जानते, मैं जानता हूँ। और मैं इन लाखों की सेवा द्वारा उस ईश्वर की पूजा करता हूँ जो सत्य है अथवा उस सत्य की जो ईश्वर है।
-महात्मा गाँधी
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मनुष्य को चमत्कारिक शक्तियाँ कठिन काम करने से प्राप्त नहीं होती बल्कि इस कारण प्राप्त होती हैं कि वह उन्हें हृदय से करता है।
-डाँ. रिर्चड बी. ग्रेग
(प्रोफेसर मोहनलाल वर्मा एम. ए.)
जैसा हम देखते सुनते या व्यवहार में लाते हैं, ठीक वैसा ही निर्माण हमारे अन्तःकरण का होता है। जो वस्तुएँ हम बाह्य जगत में देखते हैं, हमारी अभिरुचि के अनुसार उनका प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक अच्छी मालूम होने वाली प्रतिक्रिया से हमारे मन में एक ठीक या गलत मार्ग बनता है। क्रमशः वैसा ही करने से वह मानसिक मार्ग दृढ़ बनता जाता है। अन्त में वह आदत बनकर ऐसा पक्का हो जाता है कि मनुष्य उसका क्रीतदास बना रहता है।
जो व्यक्ति अच्छाइयाँ देखने की आदत बना लेता है उसके अंतर्जगत का निर्माण शील गुण, देवी तत्वों से बनता है। उसमें ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ की गंध नहीं होती। सर्वत्र अच्छाइयाँ देखने से वह स्वयं शील गुणों का केन्द्र बन जाता है।
अच्छाई एक प्रकार का पारस है। जिसके पास अच्छाई देखने का सद्गुण मौजूद है, वह पुरुष अपने चरित्र के प्रभाव से दुराचारी को भी सदाचारी बना देता है। उस केन्द्र से ऐसा विद्युत प्रभाव प्रसारित होता है जिससे सर्वत्र सत्यता का प्रकाश होता है। नैतिक माधुर्य जिस स्थान पर एकीभूत हो जाता है, उसी स्थान में समझ लो कि सच्चा माधुर्य तथा आत्मिक सौंदर्य विद्यमान है। अच्छाई देखने की आदत सौंदर्य रक्षा एवं शील रक्षा दोनों को समन्वय करने वाली है।
जो व्यक्ति गंदगी और मैल देखता है, वह दुराचारी, कुरूप, विषयी और कुकर्मी बनता है। अच्छाई को मन में रोकने से अच्छाई की वृद्धि होती है। दुष्प्रवृत्ति को रोकने से हिंसा, मारना, पीटना, ठगना, अनुचित भोग विलास इत्यादि बढ़ता है। यदि संसार में लोग नीर-क्षीर विवेक करने लगें और अपनी दुष्प्रवृत्तियों को निकाल दें, तो सतयुग आ सकता है और हम पुनः उन्नत हो सकते हैं।
(श्रीमती रत्नेश कुमारी जी नीराँजना)
जन साधारण का विश्वास है कि ‘सती उसको कहना चाहिये जो मृत पति के साथ जल जाये’ ये विश्वास ठीक भी है और नहीं भी। बिना सतीत्व के बल के जीवित जलाई नहीं जा सकती अस्तु जलने वाली निस्सन्देह ही सती है पर जिनको संयोग नहीं हुआ उनमें भी थोड़ी बहुत सती स्त्रियाँ अवश्य होंगी अतएव सती की परिभाषा ये समझनी चाहिये। जो तन, मन तथा वचन से सत्य को ही ग्रहण किये रहे कोई भी बड़ा भय अथवा प्रलोभन उसे सत्य से डिगा न सके।
सत्य का मन, वचन तथा कर्म से आचरण करने पर आत्म बल की ही प्राप्ति नहीं आत्म साक्षात्कार की भी शक्ति प्रभु कृपा से प्राप्त होती है और आत्म साक्षात्कार के पश्चात् संसार में किसी भी भय अथवा प्रलोभन का अस्तित्व ही नहीं रहता क्योंकि सारे भय अथवा लोभ शरीर को ही सुख-दुख दे सकते हैं। जिसने शरीर से पृथक अपने को जान लिया है सुख दुख उसे छू भी नहीं सकते वह तो अखण्ड आनन्द में मगन रहती है। संसार की कोई भी बड़ी से बड़ी शक्ति उसकी चिंत् वृन्ति को तिल-2 शरीर काट कर भी चंचल नहीं कर सकती।
सच्चा तो पति सारे संसार का एक प्रभु है क्योंकि वही शरण देने तथा रक्षा करने में पूर्ण समर्थ है अब रहा ये प्रश्न कि उसकी पूजा साँसारिक मनुष्य में ही क्यों करें? सो ये तो विवाद ग्रस्त प्रश्न है। जैसे साकार या निराकार किसी की उपासना क्यों न करो वह ईश्वरोपासना ही होगी वैसे ही जिसको विश्व पति का ज्ञान हो गया है और जो उसमें अपनी आत्मा को अभिन्न करने का ज्ञान हो गया है और जो उसमें अपनी आत्मा को अभिन्न करने के प्रयत्न में पूर्ण शक्ति से लगी हुई हैं वह किसी तरह भी अपने इस महान कार्य को क्यों न पूरा करे सतियों में उसकी गणना होगी।
(मास्टर चन्दनसिंह गहलोत, चंडावल)
जिसके शरीर, मन व आत्मा में किसी तरह का कोई भी रोग न हो, वह स्वस्थ है, निरोग है व तन्दुरुस्त है। एक मनुष्य मोटा तगड़ा या पहलवान तो दिखाई देता है परन्तु अगर उसमें शील, लज्जा, मधुर भाषण, दृढ़ता, सरल स्वभाव, पवित्रता, सन्तोष सुहृद्भाव, विनय, क्षमा, हृदय की शुद्धता, बड़ों की सेवा, इत्यादि मानसिक तन्दुरुस्ती के गुणों का अभाव है तो उसे पूर्ण तन्दुरुस्त नहीं कहा जा सकता।
तन्दुरुस्त मन के जरिये ही अच्छे दाँत, अच्छी दृष्टि, अच्छी भूख, अच्छी नींद, ठीक शौच, चौड़ी छाती, सीधी कमर, अपनी आयु के अनुसार दूर तक बोझा ले जाने की शक्ति, बिना थके लिखाई पढ़ाई कर सकने की शक्ति, चुस्त बदन, ठीक शरीर, भार, दिल, दिमाग, फेफड़े जिगर और सन्तानोत्पादक अंगों के कार्य का ठीक होना, बुखार, खाँसी, जुकाम, कब्जी और सिर दर्द, वगैरह कभी न होकर शारीरिक तन्दुरुस्ती के श्रेष्ठ गुणों की प्राप्ति हो सकती है।
जब शारीरिक व मानसिक तन्दुरुस्ती प्राप्त हो गई तो फिर, आत्मिक उन्नति तो अत्यन्त ही सहज है। इसीलिए पूर्ण तन्दुरुस्ती प्राप्त करने से पहले हमें अपने मन को तन्दुरुस्त बनाने की सर्वप्रथम कोशिश करनी चाहिए। शारीरिक व आत्मिक उन्नति की जड़ ‘तन्दुरुस्त मन’ ही पर अवलम्बित है। हमारे लोक व परलोक का बनना, बिगड़ना भी एक मात्र इसी पर टिका हुआ है।
प्रभु हम सबको पथ प्रदर्शन करें और चलने की शक्ति देवें। सतियों की यह जन्म भूमि एक बार फिर सतियों के पवित्र तेज से आलोकित हो उठे यही उस सर्वशक्तिमान सर्व सुहृदय के पवित्र पाद पद्मों में सारे हृदय से साग्रह प्रार्थना है।
(श्री ब्रह्मदत्त शर्मा आयुर्वेदालंकार)
पिचके हुए गाल, गढ़े में धंसी हुई आँखें, सफेद काले बालों से खिचड़ी बना हुआ सिर, हड्डियों पर मंढ़े चमड़े वाला शरीर, लकड़ियों जैसी पतली टाँगें, पीला हल्दी जैसा या काला चेहरा, झुर्रीदार त्वचा, आँखों पर चश्मा, श्रीहीन-निश्तेज शरीर- यह है औसत ढांचा, जो आज बीसवीं सदी में शहरों के अंदर, देखने को मिलता है, सो भी तथाकथित युवकों का, राष्ट्र के वीर सुपुत्रों का। पेट की हालत यह है कि जिगर-तिल्ली बढ़े हुए हैं, कब्ज या दस्तों के मारे पेट रूपी वक्स में परेशानी बनी ही रहती है, बवासीर के मस्सों से पैजामे की हालत तंग है। कभी सिर में दर्द है तो कभी चक्कर। कभी इस टाँग में ‘श्याटिक’ का दर्द है तो कभी वह बाँह सुन्न है। कभी खट्टे डकार और छाती की जलन के मारे परेशानी हैं तो कभी पेट में शूल से चुभने का दर्द। कभी मसूड़ों से खून निकल रहा है तो कभी ‘पायरिया’ की पूय। कभी दाँत में कीड़ा लगा है तो कभी दाँत-दर्द के मारे हुलिया टैट है और कभी किसी दाँत का मसूड़ा सूज कर चेहरे पर भी सूजन झलक आई है। दाँत या तो काली हपसी से मंढ़ गए हैं या पीले कीचड़ से लिथड़े हुए और या सारे ही काले पड़ गए हैं। पेट या तो बिल्कुल ही पिचका हुआ है या मशक जैसी फूली तोंद है। छाती या तो बिल्कुल पतली सी डिब्बे जैसी या कबूतर जैसी है जिसमें से पसलियों की एक-एक नोंक और रेखा बखूबी झलक रही है या दो लोथड़े से छाती पर विराज कर उसे बिल्कुल गोल बनाए हुए हैं। जरा-सा चलते ही टाँगें दुखने लगती हैं, जरा-सा भार उठाते ही हाँफना शुरू हो जाता है, थोड़ा सा काम करने में अंग दुखने लगता है, हल्की-सी धूप में ही आँखें चौंधिया जाती हैं। किसी सामान्य से भी कारण से नजाकत-भरा अकारण जीर्ण-शीर्ण शरीर चरमराने लगता है, ढह पड़ता है-मानो ‘अंबर डंबर साँझ के बालू की सी भीत’ वाली बालू की दीवार हो। शरीर और मन या तो शिमला-नैनीताल में अच्छा रहा सकता है या विलायत में। यह है ग्राम प्रधान भारत के औसत युवक की ओज रहित श्रीहीन निस्तेज शारीरिक अवस्था।
यह सब इसलिए है कि कष्ट-सहन के लिए आज हम अपने शरीर को अभ्यास नहीं डालते। सुख-दुःख शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वात्मक शारीरिक स्थितियों के प्रति अपने शरीर को हम तैयार नहीं करते। द्वन्द्वों से भरे इस जगत में कष्टमय (या कष्ट रूप से अनुभव होने वाली) अवस्थाओं की ओर से डर कर हम आँखें ही मींचे रहते हैं- ठीक वैसे ही जैसे कि बिल्ली को सामने देखकर कबूतर भय से अपनी ही आंखें मींचकर समझ लेता है कि वह बिल्ली की आँखों और पहुँच से ओझल हो गया और इस अवस्था में भोगवाद के वातावरण से हमारा शरीर इतना कृश-निर्बल और नाजुक हो जाता है कि संसार के विषम-पथ में बड़ी जल्दी लड़खड़ाने लगता है जीवन की झंझाओं में कंपकंपा उठता है- पीपल के पत्ते की तरह, दुःखों और कष्टों की आँधियों से चरमरा कर गिर पड़ता है- घुन और दीमकों से खाए हुए सूखे ठूँठ की तरह और उसे हम उत्तेजना देते हैं चाय-कह वे तम्बाकू से या मद्म-मसाले हौर्लिक्स-ओवल्टीन आदि से। ये सभी चीजें यों तो वैसे ही विष हैं, पर इस प्रकार के शरीर पर वैसा ही घातक प्रभाव करती हैं जैसा थके हुए घोड़े पर चाबुकों की मार का होता है और उस पर भी बड़े दुःख का विषय है कि हम समझते यही हैं कि इन पदार्थों से हम बड़ी ताजगी ओर शक्ति प्राप्त कर रहे हैं। परन्तु कितना विष इकट्ठा कर रहे हैं हम शरीर में। यह पता तब चलता है जब पहले से धुँधला हमारा देहरूपी सूर्य अकाल में ही संध्या-समुद्र में गोता लगाने की तैयारी कर चुकता है। कितनी अफसोसनाक हालत है यह हमारी। इससे छूटने का हर मनुष्य को प्रयत्न करना चाहिए।
यह बाजारू किताबें नहीं हैं। इनकी एक एक पंक्ति के पीछे लेखक का गहरा अनुभव एवं अनुसंधान है। इतने गहन विषयों पर इतना सुलभ साहित्य अन्यत्र प्राप्त होना कठिन है। यह पुस्तकें पाठक की जीवन दिशा में उथल-पुथल उत्पन्न कर देने की दैवी शक्ति से पूर्णतया सम्पन्न हैं।
1- मैं क्या हूँ?
2- सूर्य-चिकित्सा विज्ञान
3- प्राण चिकित्सा विज्ञान
4- परकाया प्रवेश
5- स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्भुत विद्या
6- मानवीय विद्युत के चमत्कार
7- स्वर योग से दिव्य ज्ञान
8- भोग में योग
9- बुद्धि बढ़ाने के उपाय
10- धनवान बनने के गुप्त रहस्य
11- पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि
12- वशीकरण की सच्ची सिद्धि
13- मरने के बाद हमारा क्या होता है।
14- जीव जन्तुओं की बोली समझना
15- ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?
16- क्या धर्म? क्या अधर्म?
17- गहना कर्मणोगति
18- जीवन की गूढ़-गुत्थियों पर तात्विक प्रकाश
19- पंचाध्यायी धर्म नीति शिक्षा
20- शक्ति संचय के पथ पर
21- आत्म गौरव की साधना
22- प्रतिष्ठा का उच्च सोपान
23- मित्र भाव बढ़ाने की कला
24- आन्तरिक उल्लास का विकास
25- आगे बढ़ने की तैयारी
26- अध्यात्म धर्म का अवलम्बन
27- ब्रह्म विद्या का रहस्योद्घाटन
28- ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग
29- यम और नियम
30- आसन और प्राणायाम
31- प्रत्याहार धारणा ध्यान और समाधि
32- तुलसी के अमृतोपम गुण
33- आकृति देख कर मनुष्य की पहचान
34- मैस्मरेजम की अनुभव पूर्ण शिक्षा
35- ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग
36- हस्तरेखा विज्ञान
37- विवेक सतसई
38- संजीवनी विद्या
39- गायत्री की चमत्कारी साधना
40- महान जागरण
41- तुम महान हो
42- गृहस्थ योग
43- अमृत पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति
44- घरेलू चिकित्सा
45- बिना औषधि के कायाकल्प
46- पंच तत्वों द्वारा सम्पूर्ण रोगों का निवारण
47- हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं?
48- विचार करने की कला
49- दीर्घ जीवन के रहस्य
50- हम वक्ता कैसे बन सकते हैं।
51- लेखन कला
52- प्रार्थना के प्रत्यक्ष चमत्कार
53- विचार संचालन विद्या
54- नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा
55- अध्यात्म शास्त्र
56- स्वप्न दोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा
57- सफलता के तीन साधन
58- शिखा और सूत्र का रहस्यमय विवेचन
59- दूध की आश्चर्यजनक शक्ति
60- दैवी सम्पदा
कमीशन देना कतई बन्द है। हाँ आठ या इससे अधिक पुस्तक लेने पर डाक खर्च हम अपना लगा देते हैं। आठ से कम पुस्तकें लेने पर रजिस्ट्री पार्सल का खर्च ग्राहक के जिम्मे होगा।
पता- मैनेजर ‘अखण्ड-ज्योति’ कार्यालय, मथुरा।
मानव से!
(1)
तू आशा और निराशा के दोलों में झूल रहा कब से!
विषम स्वार्थों का तिमिर-जाल तेरी आँखों में है छाया,
विश्व-रूप रमणीक एक क्षण नहीं दृष्टि-पथ में आया,
करुणा पर की सुषमा का पीयूष-पान कब कर पाया!
कल-कल करती बहती है कण-कण में स्नेहमयी सरिता।
अपने कलुषित मन को तूने कब क्षण भर को नहलाया?
पथ-जाल विषम यह जीवन का रे मानव! भूल रहा कब से!
तू आशा और निराशा के दोलों में झूल रहा कब से!
(2)
सस्य श्यामला धरणी है लहलहा रही उल्लासमयी,
सभी दिशाओं में ईश्वर की आभा हास-विलासमयी,
प्रतिक्षण चलती जाती, चलती जाती सृष्टि विभासमयी,
ऐसा मधु का प्याला पीले, रोम-रोम नाचे तेरा,
विश्व बने वृन्दावन, तेरी जीवन-लीला रासमयी।
भवसागर में पवमान प्रवल तेरे प्रतिकूल रहा कब से!
तू आशा और निराशा के दोलों में झूल रहा कब से!
(3)
अपना घर कोमल कुसुमों के मधु- सौरभ से क्यों न भरे।
तेरा तन-पंकज-पराग मानव! पर-सेवा में बिखरे।
नर्क-तुल्य जग में तू नन्दन का मधु-विभव-विकास करे।
अपनी कारा बना रहा क्यों रे मदान्ध! अपने कर से,
कुटिल भाव कर दसन, तपे कंचन-सा तेरा मन निखरे।
पैरों से कुचल-कुचल तू फूलों को, चुन शूल रहा कब से!
तू आशा और निराशा के दोलों में झूल रहा कब से!
*समाप्त*