तपस्या से ही अभीष्ट उद्देश्य प्राप्त होता है।

भागीरथी तप करके गंगा को मृत्युलोक में लाये, पार्वती जी ने तप करके शिव को वर रूप में पाया, ध्रुव ने तप करके अचल राज्य पाया, एक नहीं अनेकानेक प्रमाण इस बात के मौजूद हैं कि तप से ही सम्पदा मिलती है। मनोवाँछाऐं पूर्ण करने का एक मात्र साधन तप ही है—परिश्रम एवं प्रयत्न ही है। क्या देव क्या असुर जिसने भी ऐश्वर्य पाया है, वरदान उपलब्ध किये हैं तप के द्वारा पाये हैं। अनन्त सम्पदाओं का ढेर अपने चारों ओर बिखरा पड़ा हो तो भी कोई उसे तप बिना नहीं पा सकता। समुद्र के अन्दर अतीत काल से अनेक रत्न छिपे पड़े थे। उनका अस्तित्व किसी पर प्रकट न था किन्तु जब देवता और असुरों ने मिलकर समुद्र मन्थन किया तो उसमें से चौदह अमूल्य रत्न निकले। यदि मन्थन न किया जाता तो चौदह क्या चौथाई रत्न भी किसी को न मिलता। प्रयत्न, परिश्रम और कष्ट सहन करने से ही किसी ने कुछ प्राप्त किया है। अकस्मात छप्पर फाड़कर मिल जाने के कुछ अपवाद कहीं कहीं देखे और सुने जाते हैं, परन्तु यह इतने कम होते हैं कि उन्हें सिद्धान्त रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। पूर्व जन्मों का संचित पुण्य एक दम कहीं प्रकट होकर कुछ सम्पदा अकस्मात उपस्थिति कर दे ऐसा होना असम्भव नहीं है, कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि किन्हीं व्यक्तियों को बिना परिश्रम के भी कुछ चीज मिल जाती है परन्तु इसे भी मुफ्त का माल नहीं कहा जा सकता। पूर्व संचित पुण्य भी परिश्रम और कष्ट सहन द्वारा ही प्राप्त हुए थे। इन भाग्य से अकस्मात प्राप्त होने वाले लाभों में भी अप्रत्यक्ष रूप से परिश्रम ही मुख्य होता है। भाग्य का निर्माण तपस्या से ही होता है।


“अखण्ड-ज्योति” द्वारा प्रकाशित अमूल्य पुस्तकें।

यह बाजारू किताबें नहीं हैं। इनकी एक एक पंक्ति के पीछे लेखक का गहरा अनुभव एवं अनुसंधान है। इतने गहन विषयों पर इतना सुलभ साहित्य अन्यत्र प्राप्त होना कठिन है। यह पुस्तकें पाठक की जीवन दिशा में उथल-पुथल उत्पन्न कर देने की दैवी शक्ति से पूर्णतया सम्पन्न हैं।

1- मैं क्या हूँ?

2- सूर्य-चिकित्सा विज्ञान

3- प्राण चिकित्सा विज्ञान

4- परकाया प्रवेश

5- स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्भुत विद्या

6- मानवीय विद्युत के चमत्कार

7- स्वर योग से दिव्य ज्ञान

8- भोग में योग

9- बुद्धि बढ़ाने के उपाय

10- धनवान बनने के गुप्त रहस्य

11- पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि

12- वशीकरण की सच्ची सिद्धि

13- मरने के बाद हमारा क्या होता है।

14- जीव जन्तुओं की बोली समझना

15- ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?

16- क्या धर्म? क्या अधर्म?

17- गहना कर्मणोगति

18- जीवन की गूढ़-गुत्थियों पर तात्विक प्रकाश

19- पंचाध्यायी धर्म नीति शिक्षा

20- शक्ति संचय के पथ पर

21- आत्म गौरव की साधना

22- प्रतिष्ठा का उच्च सोपान

23- मित्र भाव बढ़ाने की कला

24- आन्तरिक उल्लास का विकास

25- आगे बढ़ने की तैयारी

26- अध्यात्म धर्म का अवलम्बन

27- ब्रह्म विद्या का रहस्योद्घाटन

28- ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग

29- यम और नियम

30- आसन और प्राणायाम

31- प्रत्याहार धारणा ध्यान और समाधि

32- तुलसी के अमृतोपम गुण

33- आकृति देख कर मनुष्य की पहचान

34- मैस्मरेजम की अनुभव पूर्ण शिक्षा

35- ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग

36- हस्तरेखा विज्ञान

37- विवेक सतसई

38- संजीवनी विद्या

39- गायत्री की चमत्कारी साधना

40- महान जागरण

41- तुम महान हो

42- गृहस्थ योग

43- अमृत पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति

44- घरेलू चिकित्सा

45- बिना औषधि के कायाकल्प

46- पंच तत्वों द्वारा सम्पूर्ण रोगों का निवारण

47- हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं?

48- विचार करने की कला

49- दीर्घ जीवन के रहस्य

50- हम वक्ता कैसे बन सकते हैं।

51- लेखन कला

52- प्रार्थना के प्रत्यक्ष चमत्कार

53- विचार संचालन विद्या

54- नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा

55- अध्यात्म शास्त्र

56- स्वप्न दोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा

कमीशन देना कतई बन्द है। हाँ आठ या इससे अधिक पुस्तक लेने पर डाक खर्च हम अपना लगा देते हैं। आठ से कम पुस्तकें लेने पर रजिस्ट्री पार्सल का खर्च ग्राहक के जिम्मे होगा।

पता- मैनेजर ‘अखण्ड-ज्योति’ कार्यालय, मथुरा।


संतोष का तत्व

‘सम’ उपसर्ग पूर्वक ‘तुष-प्रीतौ’ धातु से संतोष शब्द बना है। प्रीति शब्द अर्थ है प्रसन्नता। अमर-कोश के प्रथम काण्ड का काल वर्ग का 24 वाँ-श्लोक देखिये- ‘मुत् प्रीतिः प्रमदो हर्षः प्रमोदामोद संमदाः’ इससे स्पष्ट है कि संतोष का अर्थ प्रसन्नता, खुशी आनन्द है। जैसी भी भली बुरी परिस्थिति सामने हो उसमें प्रसन्न रहना, संतोष का तात्पर्य है।

आज कल सन्तोष का मतलब समझा जाता है, निठल्ले बैठे रहना, कूड़ा कचरा खाना पर हाथ पाँव न हिलाना, उद्योग न करना, पुरुषार्थ से इनकार करना, पराश्रित रहना, कहीं से किसी प्रकार जो कुछ मिल जाय उसी में काम चल लेना, उन्नति का प्रयत्न न करना, भाग्य के भरोसे बैठे रहना, आपत्तियों के निवारण की कोशिश न करना। आम तौर से सन्तोष का यही अर्थ किया जाता है। यह अर्थ का अनर्थ करना है। योग शास्त्र, धर्म और आध्यात्म विज्ञान जब से हरामखोरों के गन्दे हाथों में पड़ा है तब से उसकी ऐसी ही दुर्गति की गई है। घोर तामस में डूबे हुए अकर्मण्य और आलसी लोगों ने अपनी हीनता और नीचता को ब्रह्म विद्या की आड़ में छिपाने की इच्छा से उस महा विज्ञान की ही दुर्गति कर डाली। इसका एक उदाहरण सन्तोष सम्बन्धी अर्थ का अनर्थ हमारे सामने मौजूद है।

उद्योग करना, प्रयत्न जारी रखने, निरन्तर ऊँचे चढ़ना, आगे बढ़ना और ऊँची परिस्थितियाँ प्राप्त करने की चेष्टा करना मनुष्य का प्राकृतिक धर्म है। इससे कोई भी सिद्धान्त या सूत्र आज तक बाधक नहीं हुआ और न आगे हो सकता, ईश्वरीय नियम में मनुष्य के बनाये हुए सिद्धान्त रुकावट नहीं डाल सकते। यदि सन्तोष के अनर्थ पूर्ण भाव को अपनाया जाय तो दरिद्री, रोगी, पापी, अज्ञानी, अत्याचारी, दुखी सबको अपनी-अपनी दशा में ही पड़ा रहना होगा। स्वर्ग और मुक्ति-जो अत्यन्त पुरुषार्थ के फल हैं, उनका प्राप्त होना तो दूर साधारण जीवन का आनन्द लेना भी दुर्लभ हो जाएगा। अहदी और अपाहिजों की तरह वे ‘सन्तोषी’ लोग अन्धकार पूर्ण तामसिक परिस्थितियों में पड़े-पड़े सड़ते रहेंगे।

हमें असत् को छोड़कर सत् की ओर बढ़ना होगा। सन्तोष के झूठे अनर्थ को छोड़कर सच्चे अर्थ को ग्रहण करना होगा। आनन्दित रहना हर घड़ी प्रसन्न रहना, बुरी दुखदायी परिस्थिति सामने हो तो भी खिन्न न होना, यही सन्तोष का साराँश है। हर हालत में प्रसन्न रहना, मुसकराते रहना, प्रफुल्लित रहना एक ऐसा उच्च आध्यात्मिक गुण है जो पर्वत के समान विपत्ति को राई सा हल्का बना देता है और नसों में उत्साह की बिजली का संचार करता रहता है। अक्सर देखा जाता है कि कोई अप्रिय घटना या समस्या सामने आने पर लोग बहुत घबरा जाते हैं, दुखी होकर रोने पीटने लगते हैं और अपना मानसिक संतुलन खोकर किंकर्तव्य विमूढ़ हो जाते हैं। इन परिस्थितियों में उसकी बुद्धि इतनी कुँठित हो जाती है कि कोई ठीक मार्ग निर्धारित नहीं कर पाती, उस विपत्ति से छुटकारा पाने और क्षति पूर्ति के साधन जुटाने के लिये स्वस्थ और शान्त मन की आवश्यकता है, पर जिसका मन उलझन में पड़ा हुआ दिग्भ्रान्त हो रहा है वह भला किस प्रकार सही मार्ग ढूँढ़ सकता है? कहते हैं कि विपत्ति अकेली नहीं आती एक के पीछे अनेक दुख चिपके आते हैं, कारण यह ही है कि अस्वस्थ बुद्धि के निर्णय एवं कार्य अनुचित होते हैं, फलस्वरूप उनसे गाँठ और भी ज्यादा उलझती जाती है। यदि सन्तोष का अभ्यास किया जाय बुरी घड़ी में भी विचलित न होने की आदत हो तो वह कठिनाई जो सामने आई थी आसानी से हल की जा सकती है, क्षति पूर्ति का मार्ग ढूँढ़ा जा सकता है, नई कठिनाई पैदा होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

जो वस्तुएं प्राप्त हैं उनका प्रसन्नतापूर्वक उपभोग करना उनमें रस लेना और ईश्वर की देन समझ कर सिर माथे पर लेना यह सन्तोष का लक्षण है। कर्म करते समय अधिक की इच्छा करना और फल भोगते समय सन्तुष्ट रहना यही संतोष की नीति है। जो भोजन परोस कर सामने आ गया है और उसे बदला नहीं जा सकता तो उचित है कि उसे सिर माथे पर रखकर अमृतमय व्यंजनों की भावना से ग्रहण करें। यदि विवाह हो चुका है और किसी स्त्री को जीवन संगिनी बनाया जा चुका है तो यही उचित है कि जैसी भी कुछ काली कुबड़ी वह है, अप्सरा समझ कर स्नेह किया जाय। कठिन परिश्रम के बाद जो मजदूरी मिली है उस पर प्रसन्न रहा जाय। जब काम करने का समय हो। जब ऊँची और अच्छी स्थिति प्राप्त करने का जी तोड़ उद्योग करना आवश्यक है, पर जब कि काम करने का अवसर समाप्त हो गया और कोई निश्चित परिणाम सामने आ गया है जिसको कि हटाया जाना असंभव है तो यही उचित है कि कुड़-कुड़ाना, झुँझलाना, भाग्य को कोसना, छोड़ कर सन्तोष का घूँट पिया जाय क्योंकि यह कुढ़न निरर्थक है। इससे मानसिक विक्षेप बढ़ सकता है और निराशा एवं आत्म हीनता की भावनाएं बल पकड़ सकती हैं, इससे लाभ कुछ न होगा, हानि ही अधिक रहेगी। इस हानि से बचने के लिए एक बहुत ही उत्तम ढाल अपने पास है और वह है सन्तोष।

‘भाग्य में जो लिखा है, वह होकर रहेगा, विधना के अंक मिट नहीं सकते, दैव इच्छा वली यशी सन्तोषी सो सदा सुखी’ यह उक्तियाँ प्रयोग करने का ठीक समय वह है जबकि कोई इच्छा से न्यून, हल्का या विपरीत परिणाम सामने आवे। चूँकि हर एक की मनोवांछाऐं सदैव पूरी नहीं होती हैं, असफलता या अल्प सफलता मिलने के भी प्रसंग आते हैं उन अप्रिय प्रसंगों के सामने आने पर भी चित्त की प्रसन्नता बनाये रहने के लिये, सन्तोष भाग्य आदि की व्यवस्था है। जो सिद्धान्त जिस समय जिस कार्य के लिए है उसे उसी में प्रयोग करना चाहिए। कर्त्तव्य करने में सन्तोष कर बैठना तो ऐसा है जैसे कपड़ा काटने की कैंची का उपयोग अपनी नाक काटने में कर लेना।

सन्तोषी को प्रसन्न रहना चाहिये। हर घड़ी अपने को आनन्दित बनाये रहना चाहिये। घर में, व्यापार में, परदेश में, मित्रों में, शत्रुओं में, निन्दा में, प्रशंसा में, कष्ट में, सम्पदा में, लाभ में, हानि में हर एक परिस्थिति में चेहरे पर प्रसन्नता छाई रहनी चाहिये। हर बात के साथ-साथ मुसकराहट की किरणें निकलनी चाहिये, आत्मा की महानता और दिव्यता का अनुभव करते हुए सदैव गौरवान्वित रहना चाहिए, यही सन्तोष का मर्म है। पाठकों को सन्तोषी होना चाहिये, जिससे अपना आनन्दमय कोष विकसित होता रहे।


Quotation

—आपकी बाह्य परिस्थिति कितनी ही सामान्य क्यों न हो, यदि आपका अन्तःकरण असामान्य है तो निश्चय जानिये कि आप अपनी बाह्य स्थिति को भी असामान्य बना सकेंगे।

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—आप यह कभी न सोचिये कि एक मैं ही पूर्ण हूँ, मुझ में ही सब योग्यताएं हैं, मैं ही सब कुछ हूँ, सबसे श्रेष्ठ हूँ, वरन् आप यह सोचिये कि मुझ में भी कुछ है, मैं भी मनुष्य हूँ, मेरे अन्दर जो कुछ है उसे मैं बढ़ा सकता हूँ, उन्नत और विकसित कर सकता हूँ।


चतुर्मुखी-ब्रह्मा

(2)

विष्णु- संसार में एक संतुलन शक्ति भी काम कर रही है। जो किसी वस्तु की अतिवृद्धि को रोककर उसे यथास्थान ले आती है। संसार की सुन्दरता और वैभव शालीनता को वह कुरूपता और विनाश से बचाती है। प्रजनन शक्ति को ही लीजिये। एक-एक जोड़ा कई-कई बच्चे पैदा करता है, यदि यह वृद्धि पीढ़ी दर पीढ़ी निर्वाध गति से चलती रहे तो थोड़े ही दिन में सारी पृथ्वी इतनी भर जाय कि संसार में प्राणियों को खड़ा होने के लिए भी जगह न मिले। मछली एक वर्ष में करीब सत्रह हजार अंडे देती है, मक्खी, मच्छर, जैसे कीट पतंग एक हजार से लेकर साठ हजार तक अंडे प्रति वर्ष देते हैं। वे अंडे एक दो सप्ताह में ही पककर बच्चे की शकल में आ जाते हैं और फिर दो चार हफ्ते बाद ही वे भी अंडे देने लगते हैं। इनकी एक ही साल में प्रायः आठ पीढ़ी हो जाती हैं, यदि यह सब बच्चे जीवित रहे तो दस पाँच साल में ही सारा संसार उनमें से एक जाति के रहने के लिए भी पर्याप्त न रहेगा, चींटी, दीमक, टिड्डी आदि कीड़े भी बड़ी तेजी से बढ़ते हैं। सुअर, बकरी आदि भी तेजी से प्रचुर संतान वृद्धि करते हैं। एक जोड़ा स्त्री-पुरुष भी औसतन आठ दस बच्चे पैदा करता है। यह अभिवृद्धि यदि न रुके तो संसार के सम्मुख दस पाँच वर्ष में ही बड़ी विकट परिस्थिति उत्पन्न होकर खड़ी हो सकती है। परन्तु लाखों करोड़ों वर्ष प्राणियों को इस पृथ्वी पर हो गए, ऐसी परिस्थिति कभी भी उत्पन्न नहीं हुई। सृष्टि की संतुलन शक्ति उस विषमता को उत्पन्न होने से रोके रहती है। दुर्भिक्ष, भूचाल, महामारी, युद्ध तथा किसी न किसी दैवी प्रकोप द्वारा प्राणियों के प्रजनन शक्ति से उत्पन्न होने वाले खतरे का निराकरण करती रहती है।

रात्रि का अन्धकार एक सीमा तक बढ़ता है। उस बाढ़ को प्रकृति रोकती है और पुनः दिन का प्रकाश लाती है। मध्यान्ह तक सूर्य की तेजी बढ़ती है फिर वह घटने लगती है। समुद्र में ज्वार आते हैं, फिर थोड़े समय बाद उसका प्रतिरोधी भाटा आता है। चन्द्रमा घटते-घटते क्षीण होता है। फिर बढ़ने लगता है। गर्मी के बाद सर्दी और सर्दी के बाद गर्मी का मौसम आता है। मरने वाला जन्मता है और जन्मने वाला मृत्यु की तैयारी करता है। सृष्टि के सौंदर्य का क्रम यथावत चला आता है, उसका बैलेन्स बराबर कायम रहता है—संतुलन बिगड़ने नहीं पाता।

पुराणों में ऐसे वर्णन आते हैं कि देवताओं को जब असुर सताते हैं तो वे इकट्ठे होकर विष्णु भगवान के पास जाते हैं और प्रार्थना करते हैं कि हमारी रक्षा कीजिये। कई पुराणों में ऐसी कथाएं मिलती हैं कि पृथ्वी पर जब अधर्म बढ़ा तो धरती माता गौ का रूप धारण कर विष्णु भगवान के पास गई और प्रार्थना की कि अब मुझसे पाप का बोझ नहीं सहा जाता, मेरा उद्धार कीजिए। देवताओं की रक्षा करने तथा पृथ्वी का भार उतारने के लिए विष्णु भगवान अवतार धारण करते हैं। गीता में भी ऐसी ही प्रतिज्ञा है (यदा यदा हि धर्मस्य.........तदात्मानम् सृजाम्यहम्) बुराइयों में यह गुण है कि वे आसानी से और तेजी के साथ बढ़ती हैं। पानी ऊपर से नीचे की ओर बड़ी तेजी से स्वयमेव दौड़ता है पर यदि उसे नीचे से ऊपर चढ़ाना हो तो बड़ा प्रयत्न करना पड़ेगा। पत्थर को ऊपर से नीचे की ओर फेंके तो जरा से संकेत के साथ वह तेजी से नीचे गिरेगा और अगर बीच में कोई रोकने वाली चीज न आवे तो सैकड़ों मील नीचे गिरता चला जायगा। परन्तु यदि उस पत्थर को ऊपर फेंके तो बड़ा जोर लगाकर फेंकना पड़ेगा सो भी थोड़ी ऊंचाई तक जायेगा फिर गिर पड़ेगा इसी प्रकार बुराई के मार्ग पर पतन की ओर मन तेजी से गिरता है पर अच्छाई की ओर कठिनाई से चढ़ता है। लोगों का झुकाव पाप की ओर अधिक होने के कारण थोड़े ही समय में पाप छा जाता है और फिर उसे दूर करने के लिए संतुलन ठीक करने के लिये विष्णु शक्ति को किसी न किसी रूप में प्रकट होना पड़ता है, उस प्राकट्य को ‘अवतार’ कहते हैं।

शरीर में रोगों के विजातीय विषैले परमाणु इकट्ठे हो जाने पर रक्त की जीवनी शक्ति उत्तेजित होती है और उन विषैले परमाणुओं को मार भगाने के लिए युद्ध आरम्भ कर देती है। रक्त के श्वेत कणों और रोग कणों में भारी मारकाट मचती है, खून खच्चर होता है। इस संघर्ष को बीमारी कहते हैं बीमारी में पीड़ा, फोड़ा, पीव, पसीब, दस्त, उल्टी, जलन आदि के लक्षण होते हैं। युद्ध में चोट लगती है, दर्द होता है यही बीमारी की पीड़ा है, खून खच्चर होता है, यही पीव, दस्त आदि हैं। बीमारी का प्रयोजन शरीर को निर्दोष बनाना है। अवतार शक्ति का भी यही कार्य होता है। जब रावण, कंस, हिरण्यकश्यप सरीखे कुविचारों के प्रतिनिधि अधिक बढ़ जाते हैं तो पापों की प्रतिक्रिया स्वरूप अन्तरिक्ष लोकों में हलचल मचती है और उस विषमता को हटाने के लिए अवतार प्रकट होता है। जब ग्रीष्म ऋतु का ताप असह्य हो जाता है तो उसे शान्त करने के लिये मेघ मालाएं गरजती हुई चली आती हैं। पापों की अतिवृद्धि का नियमन करने के लिये वैष्णवी सत्ता अवतार धारण करके प्रकट होती है और भीषण संघर्ष उत्पन्न करके शान्ति स्थापित करती है। “परित्राणाय साधू नाम विनाशायश्च दुष्कृताम्” अवतार का यही उद्देश्य होता है। धर्म की संस्थापन के लिए वह बार-बार प्रकट होता है।

अवतार समष्टि आत्मा का परमात्मा का प्रतीक है। सभी आत्माओं की एक सम्मिलित सत्ता है जिसे ‘विश्वमानव’ या समाज की सम्मिलित आत्मा कहते हैं। यही परमात्मा है। एक मनुष्य यह चाहता है कि मैं सुख पूर्वक रहूँ मेरे साथ में सब प्रेम, भलाई एवं सहयोग का बर्ताव करें कोई यह नहीं चाहता है कि मेरे साथ चोरी, हिंसा, ठगी, कठोरता, अन्याय का बर्ताव करे। यही इच्छा ‘विश्वमानव’ की समिति आत्मा—या परमात्मा की है। परमात्मा की-विश्वमानव की-इच्छा को ही धर्म कहते हैं। अवतार धर्म की रक्षा के लिए होता है। अधर्म अर्थात् विश्वमानव की इच्छाओं के प्रतिकूल कार्य जब संसार में अधिक बढ़ जाते हैं। तो उसे दूर करने के लिए विश्वमानव के अन्तस्तल में प्रतिक्रिया होती है और विरोध का उफान उबल पड़ता है। इस उफान को अवतार के नाम से पुकारा जाता है।

अवतार एक अदृश्य प्रेरणा है। सूक्ष्म वातावरण में परमात्मा की इच्छा का आवेश भर जाता है। जैसे आकाश में आँधी छाई हुई हो और उसी समय पानी बरसे तो वर्षा की बूँदें उस आँधी की धूलि से मिश्रित होती हैं। बसन्त ऋतु में प्रकृति के सूक्ष्म अन्तराल में ‘काम क्षोभ’ का आवेश आता है उन दिनों सभी नर नारियों में जीव जन्तुओं में कामेच्छा फूट पड़ती है। भय, क्रोध, हिंसा, साम्प्रदायिक, राजनैतिक तनाव, घृणा तथा सत्कर्मों की भी लहर आती है वातावरण जैसा बन जाता है वैसे ही काम बहुत बड़ी संख्या में होने लगते हैं। इसी प्रकार विश्वमानव-परमात्मा की इच्छापूर्ण करने के लिए सूक्ष्मलोक में अदृश्य वातावरण में आवेश आता है। उस आवेश से प्रेरित होकर कुछ विशिष्ट पुण्यात्मा, जीवन युक्त महापुरुष संसार में आते हैं और परमात्मा के इच्छा को पूरा करते हैं। एक समय में अनेकों अवतार होते हैं, किसी में न्यून किसी में अधिक शक्ति होती है। इस शक्ति को माप करने का पैमाना ‘कला’ है। बिजली को नापने के लिये ‘यूनिट’, गर्मी को नापने के लिये ‘डिग्री’, लम्बाई को नापने के लिये ‘इंच’, दूरी को नापने के लिये मील जैसे होते हैं वैसे ही किस व्यक्ति में कितना अवतारी अंश है इसका नाप ‘कला’ के पैमाने से होती है। त्रेता में परशुराम जी और श्री रामचन्द्रजी एक ही समय में दो अवतार थे। परशुरामजी को तीन कला का और रामचन्द्र जी को बारह कला का अवतार कहा जाता है। यह तो उस समय के विशिष्ट अवतार थे। वैसे अवतार का आवेश तो अनेकों में था बानरों की महती सेना को तथा अनेकों अन्य व्यक्तियों को अवतार के समतुल्य कार्य करते हुये देखा जाता है।

इस प्रकार समय-समय पर युग-युग में आवश्यकतानुसार अवतार होते हैं। बड़े कार्यों के लिये बड़े और छोटे कार्यों के लिये छोटे अवतार होते हैं। सृष्टि को सन्तुलन करने वाली विष्णु−शक्ति वैसे तो सदा ही अपनी क्रिया जारी रखती है। पर बड़ा रोग इकट्ठा हो जाने पर बड़ा डॉक्टर भेजती है। उस बड़े डाक्टरों को उनके महान कार्यों के अनुरूप यश एवं सम्मान प्राप्त होता है। अवतारी महापुरुषों की पूजा यथार्थ में विष्णु−शक्ति की पूजा है जिसके कि वे प्रतीक होते हैं।

लक्ष्मीपति विष्णु सृष्टि की सुन्दरता की, सम्पन्नता की, सद्बुद्धि की और सात्विकता की रक्षा करते हैं। लक्ष्मीजी के चार हाथ, सुन्दरता सम्पन्नता, सद्बुद्धि और सात्विकता के प्रतीक हैं। समस्त प्राणियों की समष्टि-सम्मिलित आत्मा-लक्ष्मी है, यह लक्ष्मी विष्णु का अर्धांग है। पर आत्मा की सत्ता जीवों की आत्मा में समाई हुई है, संसार का नियमन करती है साथ-साथ लक्ष्मी की-विश्वमानव की इच्छा की-रक्षा भी करती है। लक्ष्मी विष्णु से अभिन्न है।

विष्णु के उपासक-वैष्णव वे हैं। जो विश्व मानव की इच्छाओं के अनुकूल कार्य करने में अपनी शक्ति लगाते हैं। मीरा का प्रसिद्ध भजन है—”वैष्णव जनतो तेने कहिये जे पीर पराई जाने रे।” समाज का लाभ, संसार की सेवा, विश्व की श्री वृद्धि, विश्वमानव की सुख शान्ति के लिये सच्चे अन्तःकरण से हर घड़ी लगे रहने वाले मनुष्य असली वैष्णव हैं। विष्णु की इच्छा ही उन वैष्णवों की इच्छा और विष्णु की कार्य प्रणाली ही उनकी कार्य प्रणाली होती है। वे पाप को घटा कर धर्म की स्थापना के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। जनता जनार्दन को विष्णु रूप समझकर लोक सेवा में, विष्णु पूजा में, प्रवृत्त रहते हैं। —क्रमशः


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जब कोई मनुष्य चुप रहता है तब या तो मूढ़ होता है या ज्ञानी। जब मनुष्य बहुत बक-बक करता है तब या तो भोला होता है या अहंकारी। जब मनुष्य बहुत मधुर शब्द बोलता है तब या तो वह धूर्त होता है या सुसंस्कृत।


विचारणीय तत्व

वेद की अपेक्षा सत्य, सत्य की अपेक्षा इन्द्रिय निग्रह, इन्द्रिय निग्रह की अपेक्षा दान, दान की अपेक्षा तपस्या, तपस्या की अपेक्षा वैराग्य, वैराग्य की अपेक्षा आत्मज्ञान, आत्मज्ञान की अपेक्षा समाधि और समाधि की अपेक्षा ब्रह्म प्राप्ति उत्कृष्ट है।

ज्ञान ही परमब्रह्म है एवं साधना सर्वोत्तम मार्ग। जो व्यक्ति निगूढ़ भाव से ज्ञान तत्व को जानने में समर्थ होता है, उसकी समस्त कामनाएँ परिपूर्ण हो जाती हैं।

काल समस्त प्राणियों को विनष्ट कर देता है किन्तु जिसके प्रभाव से वह काल भी विनष्ट हो जाता है, उसको कोई भी नहीं जान सकता। वह परम स्वरूप परमात्मा ऊपर, बीच में, नीचे व निर्जन स्थानों में नहीं दिखाई पड़ता है, क्योंकि वह सारे लोक उसी के अन्तस्थ हैं, उसका बर्हिभाग कुछ नहीं है।

जिस पुण्यात्मा पुरुष ने कभी कोई पाप नहीं किया, उसकी अपेक्षा घोर पापी के पश्चाताप की महिमा कहीं अधिक है, क्योंकि जिन्होंने पापमय जीवन की कटुता का कभी अनुभव नहीं किया; उनके लिये दूर रहना कुछ कठिन कार्य नहीं है।

प्रार्थना का द्वार किसी समय खुला रहता है और किसी समय बन्द, पर पश्चाताप का द्वार तो सदा अनावृत रहता है।

आज ही तुम अपने पापों का प्रायश्चित कर लो, क्योंकि कल तुम्हारी मृत्यु भी हो सकती है।

सद्गुणों में सब से अधिक आवश्यक वह गुण है, जो अहंकार को दूर करता है, और वह सद्गुण है—विनम्रता।


आइये आपका मनोविश्लेषण करें

(डा. रामचरण महेन्द्र एम. ए. डी. लिट्)

आपकी सामान्य बुद्धि —

यदि आप में जल्दी-जल्दी पढ़ जाने की आदत है, तो इसका यह अर्थ है कि मन में एकाग्रता एवं ग्रहण शक्ति का अभाव है। आप किसी तत्व का ऊपरी ज्ञान ही लेना चाहते हैं, उसके अन्त तक बैठ कर समूचा तत्व नहीं ग्रहण करना चाहते। अध्ययन में अधिक समय दीजिए और तभी आगे पढ़िये, जब आप यह समझते हों कि आपने प्रारम्भिक अंश अच्छी तरह समझ लिया है और आप निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं।

यदि आपको पढ़ने लिखने या समझने में कठिनाई प्रतीत होती है तो शायद आपकी भावना (Feelings) उत्तेजित है। विचार, भावना, संकल्प इन तीनों में आपकी भावना उत्तेजित हो सकती है और वही विचार धारा में व्यवधान उपस्थित कर सकती है। भावना में बह जाइए, कल्पना के साथ मत उड़िये। वरन् मस्तिष्क को कठोर चिंतन में लगाकर भावना को वश में कीजिए और विचार को विकसित होने का अवसर दीजिए। सर्वांगीण विकास ही सर्वोत्तम है।

यदि आपको अपने पढ़ने लिखने, ज्ञानार्जन करने, परीक्षा पास करने में सामान्य (Averge) रूप से अध्ययन करना पड़ा, न आपने अधिक परिश्रम किया, न समय बरबाद किया, तो इसका अर्थ है कि आपका प्रारम्भिक मानसिक विकास ठीक रहा है। किन्तु फिर अपने से पूछिए कि परीक्षा पास करने के पश्चात् भी उसी रफ्तार से बुद्धि का विकास चल रहा है या नहीं? यदि अब भी आप निश्चित समय अपने दैनिक व्यापार कारोबार के अतिरिक्त अध्ययन, चिंतन तथा मनन में लगाते हैं, तब आपका बौद्धिक विकास ठीक चल रहा है। आगे आशा है।

यदि स्कूल के दिनों में मानसिक प्रतियोगिताओं तथा कक्षा के पाठों में आपको सम्मान मिलता रहा है, तो संभव आपने अपने व्यक्तित्व के अन्य अंशों की तरफ समुचित ध्यान नहीं दिया है। क्या शारीरिक तथा आत्मिक विकास, सामाजिक व्यवहार इत्यादि भी उसी अनुपात से हुआ है? यदि नहीं, तो आपका व्यक्तित्व एकाँगी है। उसके बहुत से अंश अविकसित रह गए हैं। इसके विपरीत यदि आप स्कूल में फिसड्डी रहे, तो उसका मतलब है कि आपने अपना मन बहुत से अन्य कार्यों में लगाये रक्खा है। सोचिये कि वे कौन से कार्य थे? किसकी दुसंगति से लगे? अब उनसे छुटकारा मिला या अब भी वे आपकी शक्तियों को चूसते जा रहे हैं? शायद आप स्कूल के दिनों में हीनत्व की भावना में ग्रसित रहे? बड़े विद्यार्थी आपको सताते रहे? या निंद्य कार्यों में संलग्न रहे? आपने मजेदारी के कार्य अधिक किये और लाभ के कम? अब समय है कि आप अपने मानसिक विकास की कमी को पूरा कर डालें और व्यक्तित्व के समस्त पहलू विकसित कर चरित्र को सर्वांगपूर्ण (Well-rounded character) बनायें।

यदि आप स्कूल के दिनों में अध्ययन के अतिरिक्त कार्यों में भी लगे रहे और उत्तरदायित्व को अच्छी तरह संभाले रहे, तब आपका विकास ठीक रहा। आप सामान्य से कुछ ऊँचे रहे और भविष्य में आप सर्वांग पूर्ण व्यक्तित्व बना सकेंगे।

यदि स्कूल के दिनों में लेखनी हाथ में लेकर जहाँ देखा कुछ न कुछ लिख दिया, दस्तखत कर दिये या व्यर्थ कागज खराब करते रहने की आदत आप में थी, अपनी खुद की पुस्तक में या दूसरे की पुस्तक में जो मन में आवे, वही आप लिख डालते थे, तो उसका अर्थ यह था कि आपमें आत्मसंयम की बहुत कमी थी। दिखावे की, शान दिखाने तथा अहं के विस्तार की भावना तीव्र थी। आप दूसरे पर अपनी विद्वता दिखाना चाहते थे, जबकि वास्तव में वह आत्म प्रवंचना के अतिरिक्त कुछ न था।

यदि बचपन में आप पुस्तकों को फाड़ते रहे हैं, उन्हें पाँव से छू देने पर दुःखी नहीं हुए हैं, उनके पृष्ठों को मोड़ते, फाड़ते, मोसते, गन्दा करते रहे हैं, जहाँ देखा पुस्तक पड़ी रही, गन्दी होती रही—तो इसका अर्थ है कि विद्या के प्रति आपका विशेष अनुराग प्रवृत्ति न थी। यही कारण है कि आपने कुछ न सीखा, न पढ़ा लिखा। आपकी बुद्धि अन्य कार्यों में लगी रही, ऊँचे विषयों की ओर उसकी प्रवृत्ति न रही।

यदि आप कक्षा के साथ चलते रहे, रोज का कार्य रोज निपटाते रहे, तो आपने वही किया जिसकी आपसे आशा की जाती थी। आपमें प्रारम्भ से ही उत्तरदायित्व की भावना दृढ़ रही और कार्य भार सम्भालने की योग्यता आप में तभी से थी।

यदि आपके अध्यापक आपको अच्छा, सुशील और आज्ञाकारी शिष्य बताते रहे, तो शायद आप बहुत मृदु, नर्म, स्वभाव के रहे, उनसे अत्यधिक दबते रहे। आपके गुप्त मन में थोड़ा भय, थोड़ी लज्जा, हीनत्व की भावना रही। आपने अपने व्यक्तित्व को साहस से विकसित न किया। यदि आपके अध्यापकों ने आपके विषय में कुछ भी न कहा, तो आपकी प्रगति ठीक (सामान्य) रही। आप ठीक रफ्तार से चले और भविष्य में भी आपसे वैसी ही आशा की जा सकती है।

यदि आप अन्य विषयों को छोड़कर एक या कुछ विशेष विषयों में दिलचस्पी लेते रहे, तो आपके व्यक्तित्व के कई पहलू अविकसित छूट गये, अन्य आवश्यक बातों का ज्ञान आपको न हुआ और थोड़े से परिश्रम से डरकर आप संकुचित रह गए। यह तंगदिली बुरी है। जीवन तो कड़ुवे मीठे अनुभवों की चटनी है। मजेदार और बेमजे—दोनों ही प्रकार के तत्वों का योग है। सम्पूर्ण व्यक्तित्व में सभी तत्वों का अनुपात से विकास होना चाहिए। चाहे आप पसन्द करें या न करें—सभी तत्वों का, अपने सभी पुरुषोचित गुणों का विकास होना चाहिए।

यदि आप प्रत्येक कार्य का ध्यानपूर्वक सतर्कता से निरीक्षण करते हैं, तब आप अपने कार्यों पर अवलम्बित रह सकते हैं। आप भूल चूक न करेंगे, यदि हड़बड़ाकर करने के आदी हैं तो मन में शान्ति का अभाव है। वह अनेक चीजों, कार्यों, प्रवृत्तियों में बँटा हुआ है। इस प्रवृत्ति से भविष्य में आप हानि उठा सकते हैं। बातें करने से पूर्व उसे खूब सोच लिया कीजिए। इसी प्रकार जो कुछ हाथ में ले उसी में सुई की तरह गढ़ जाया कीजिये।

यदि आप अपने व्यापार, उद्देश्यों, मनोरथों में सफल होते रहे हैं तो आप तीव्र बुद्धि सम्पन्न हैं और भविष्य में इसी के सहारे चल सकते हैं। मन से अपनी शक्तियों के प्रति सभी संशय दूर कर दीजिए यदि आप इनमें असफल होते रहे तो असफलता के दो मुख्य कारण हैं—या तो यह कार्य आपकी शक्तियों के अनुकूल नहीं है अन्यथा आप में विश्वास की कमी है। आप उस कार्य को मन से नहीं चाहते।

यदि समाज में लोग आपसे सलाह लेते हैं, तो अपने विषय में तुच्छता रखने का कोई अधिकार आपको नहीं है। आप आत्मश्रद्धा विकसित करें और खुद अपनी दृष्टि में भी प्रतिभा सम्पन्न बनें। यदि लोग आपसे सलाह नहीं लेते, आपको यों ही समझते हैं, तब जरुर आपके व्यक्तित्व में कमजोरी है। अपनी इस कमजोरी को मालूम कीजिये। क्या आपमें शिक्षा की कमी है? चरित्र की दृढ़ता नहीं है? या अनुभव शून्यता है? प्रतिभा अपने मौलिक विचारों का स्पष्ट प्रदर्शन है।

क्या तुम निशाना चुक गऐ हो? चूक गऐ तो किस कारण? संभव है अब तुमने विद्या, बुद्धि, अनुभव, अध्ययन एकत्रित कर लिया हो। अब निशाना चमकता दीख रहा है, पुनः एक प्रयत्न करो। क्या तुम दौड़ते-दौड़ते गिर गये हो? थोड़ा श्वास लो और फिर दौड़ो।

किसी कार्य को तय करने में यदि तुम्हें बहुत देर लगती है। करूं या न करूं? ऐसा सोचते हो, तो इसका अभिप्राय है कि तुममें संशय तथा अविश्वास है। तुम उत्तरदायित्व नहीं लेना चाहते।

यदि तुम एक दम किसी की बावत राय पक्की कर लेते हो, तो यह बुद्धि का विक्षेप है। भली भाँति सोचकर ही राय पक्की करनी चाहिए।

यदि तुमने पहले ही सोच लिया है कि कल, भविष्य, जन्म में तुम्हें स्पष्टतः क्या करना है, तो तुम दूरदर्शी हो। किन्तु यदि उस योजना पर तुम ठीक से नहीं चल रहे हो, तो तुम संकल्प के ढीले हो। ढीले संकल्प वाले को कुछ नहीं मिलता। एक बार निश्चय करो और समय शक्तियों को उधर ही केन्द्रीभूत कर दो।

यदि तुम्हारा मन विद्या प्राप्त करने, नई-नई बातें सोचने, सुनने, समझने की इच्छा करता है तो सामान्यतः तुम्हारी बुद्धि की गति ऊँची तरफ है। उसका विकास हो रहा है। यदि तुम यही बात नहीं सीखना चाहते और रूढ़ियों में जकड़े हो, तो बुद्धि को जंग लग गया है।

—क्रमशः


मानसिक विकास का अटल नियम

(डा. दुर्गाशंकर जी नागर, उज्जैन)

जिस प्रकार के विचार हम नित्य किया करते हैं उन्हीं विचारों के अणुओं का मस्तिष्क में संग्रह होता रहता है। सारे दिन जो निठल्ले बैठे रह कर गपशप लगाया करते हैं, उनके मस्तिष्क में फालतू विचारों का कचरा ही इकट्ठा हुआ करता है और अन्य सद्गुणों के अणु शुष्क हो जाते हैं। जो व्यक्ति दुष्ट दुर्व्यसनों अथवा दुर्गुणों में फँसे रहते हैं, उनके मस्तिष्क में उसी प्रकार के अणुओं की वृद्धि होती रहती है।

मस्तिष्क का उपयोग उचित और सत्कार्यों में करने से, उसे आलसी निकम्मा न छोड़ने से मानसिक शक्ति का विकास होता है। सामान्य मनुष्य अपने सारे मस्तिष्क का उपयोग नहीं करता, केवल मस्तिष्क के अर्द्ध भाग को ही उपयोग में लाता है और मस्तिष्क के आधे भाग के अणु निष्क्रिय पड़े रहते हैं। बिना अध्ययन, सूक्ष्म विचार के मस्तिष्क संकुचित हो जाता है। दूसरों के आदेश व सम्मति पर जो मनुष्य अपना जीवन संचालन करते हैं उनकी बुद्धि इतनी सुस्त व मन्द हो जाती है कि स्वतः विचार नहीं कर सकते। अपने विचार करने का कार्य दूसरों से करवाते हैं किंचित मात्र भी अपने विचार रूपी यन्त्र का उपयोग नहीं करते। फलतः उनके मस्तिष्क संकीर्ण हो जाते हैं और उनका सारा जीवन दासता के बन्धन में ही व्यतीत होता है।

मस्तिष्क को उत्तम या निकृष्ट बनाना तुम्हारे हाथ में ही है। सोचो, विचारो तथा मनन करो। क्रोध करने से तुम्हारे मस्तिष्क में क्रोध करने वाले अणुओं की संख्या की वृद्धि होती है। चिंता, शोक, भय व खेद करने से इन्हीं, कुविचारों के अणुओं का तुम पोषण करते हो और मस्तिष्क को निर्बल बनाते हो। भूतकाल की दुर्घटनाओं या दुखद प्रसंग को स्मरण कर, खेद या शोक के वशीभूत होकर मस्तिष्क को निर्बल मत बनाओ। शरीर में बल होते हुए भी उसका उपयोग न करने से, बिना उपयोग से बल क्षीण होता है। इसी प्रकार बिना विचार के मस्तिष्क भी क्षीण होता है। नवीन विचारों का मन में स्वागत करने से मस्तिष्क का मानस व्यापार व्यापक होता है तथा मन प्रफुल्लित हो जाता है, जीवन व बल की वृद्धि होती है, मन व बुद्धि तेजस्वी बनते हैं। जो विचार हमारे मस्तिष्क में हैं, वे ही हमारे जीवन को बनाने वाले हैं। जिस कला के विचार तथा अभ्यास करोगे, उसी में निपुणता मिलेगी। मस्तिष्क के जिस भाग का उपयोग करोगे, उसी की शक्तियों का विकास होगा।


Quotation

यदि हम इस नियमबद्ध संसार में स्वतन्त्र और स्वाधीन बनना चाहते हों तो हमारे स्वतन्त्र विचार होने चाहिये और हमें दूसरों के स्वतन्त्र विचारों का आदर करना चाहिए।


यज्ञ द्वारा रोगों की चिकित्सा

साधारणतः दैनिक कार्यक्रम में हवन को भी एक नित्य कर्म की तरह स्थान देना चाहिए। शास्त्रों ने नित्य पंचयज्ञ करने के लिए हर गृहस्थ को आदेश दिया है। पूजा भजन के समय थोड़ा सा हवन नित्य कर लेना चाहिये। शास्त्रीय विधि व्यवस्था मंत्र या “ॐ भूर्भुवः स्वः” इन व्याहृतियों से जितनी सामर्थ्य हो उतना घी और सामग्री लेकर हवन कर लेना चाहिए। समिधा की लकड़ी आम, पीपल, बड़, गूलर, छोंकर, बेल, ढाक आदि के पुराने पेड़ की खूब सूखी हुई लेनी चाहिए। चंदन, देवदारु, सरीखी सुगंधित लकड़ियाँ भी थोड़ी बहुत मिला लीं जाय तो और भी अच्छा है। हवन सामग्री में निम्न वस्तुएं होनी चाहिए-चन्दन, इलाइची, जायफल, जावित्री, केशर, गिलोय, अगर तगर, असगंध, बंशलोचन, गूगल, लौंग, ब्राह्मी, पुनर्नबा जीवन्ती, कचूर, छार छबीली, शतावरि, खस, कपूर-कचरी, कमलगट्टा, शीतल चीनी, तालीस पत्र, बच, नागकेशर, दालचीनी, रास्ना, आँवला, जटामासी, इन्द्र जौ, मुनक्का, छुहारा नारियल की गिरी, चिरौंजी, किशमिश, पिस्ता, अखरोट। यह चीजें साधारणतः समान भाग होनी चाहिए पर केशर बंसलोचन जैसी अधिक महंगी चीजें आर्थिक कारणों से कम भी डाली जा सकती हैं। सामग्री नई, ताजी सूखी और साफ होनी चाहिए। सामग्री कूट कर उसमें तिल, जौ, चावल, उर्द, शक्कर और घी मिला लेना चाहिए। इस सामग्री का हवन करने से हवन के निकटस्थ लोगों को बल वर्धक, मानसिक शान्तिदायक और रोग नाशक तत्व प्राप्त होते हैं। फलस्वरूप उनके स्वास्थ्य की स्थिति उन्नत एवं सन्तोषजनक होने लगती है।

यदि किसी रोग विशेष की चिकित्सा के लिए हवन करना हो तो उसमें उस रोग को दूर करने वाली ऐसी औषधियाँ सामग्री में और मिला लेनी चाहिए जो हवन करने पर खाँसी न उत्पन्न करती हों। यह मिश्रण इस प्रकार हो सकता है—(1) साधारण बखारो में तुलसी की लकड़ी, तुलसी के बीज, चिरायता, करंजे की गिरी (2) विषम ज्वरों में—पाढ़ की जड़, नागरमोथा, लाल चन्दन, नीम की गुठली, अपामार्ग, (3) जीर्ण ज्वरों में-केशर, काक सिंगी, नेत्रवाला, त्रायमाण, खिरेंटी, कूट, पोहकर मूल (4) चेचक में—वंशलोचन, धमासा, धनिया, श्योनाक, चौलाई की जड़ (5) खाँसी में —मुलहठी, अड़ूसा, काकड़ा सिंगी, इलायची, बहेड़ा, उन्नाव, कुलंजन (6) जुकाम में—अनार के बीज, दूब की जड़, गुलाब के फूल, पोस्त, गुलबनफसा (7) श्वाँस में—धाय के फूल, पोन्त के डौड़े, बबूल का वक्कल, मालकाँगनी, बड़ी इलायची, (8) प्रमेह में—ताल मखाना, मूसली, गोखरु बड़ा, शतावरि, सालममिश्री, लजवंती के बीज (9) प्रदर में—अशोक की छाल, कमल केशर मोचरस, सुपाड़ी, माजूफल (10) बात व्याधियों में—सहजन की छाल, रास्ना, पुनर्नवा, धमासा, असगंध, बिदारीकंद, मैंथी, (11) रक्त विकार में—मजीठ, हरड़, बावची, सरफोंका, जबासा, उसवा (12) हैजा में—धनियाँ, कासनी, सोंफ, कपूर, चित्रक (13) अनिद्रा में—काकजघा पीपला-मूल, भारंगी (14) उदर रोगों में—चव्य, चित्रक तालीस पत्र, दालचीनी, जीरा, आलू बुखारा, पीपरिं, (15) दस्तों में—अतीस, बेलगिरी, ईसबगोल, मोचरस, मौलश्री की छाल, ताल मखाना, छुहारा। (16) पेचिश में—मरोड़फली, अनारदाना, पोदीना, आम की गुठली, कतीरा (17) मस्तिष्क संबंधी रोगों में-गोरख मुँडी, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, बच शतावरी (18) दाँत के रोगों में—शीतल चीनी, अकरकरा, बबूल की छाल, इलायची, चमेली की जड़ (19) नेत्र रोगों में-कपूर, लौंग, लाल चन्दन, रसोत, हल्दी, लोध (20) घावों में—पद्माख, दूब की जड़, बड़ की जटाएं, तुलसी की जड़, तिल, नीम की गुठली, आँवा हल्दी। (21) बंध्यत्व में-शिवलिंग के बीज, जटामासी, कूट, शिलाजीत, नागरमोथा, पीपल वृक्ष के पके फल, गूलर के पके फल, बड़ वृक्ष के पके फल, भट कटाई। इसी प्रकार अन्य रोगों के लिए उन रोगों की निवारक औषधियाँ मिलाकर हवन सामग्री तैयार कर लेनी चाहिये। इस संबंध में ‘अखंड-ज्योति’ कार्यालय से पाठकगण जवाबी पत्र द्वारा सलाह ले सकते हैं।

स्वास्थ्य मनुष्य को अपनी तन्दुरुस्ती कायम रखने और उसे बढ़ाने के लिए नित्य गायत्री मंत्र के साथ हवन करना चाहिये। इससे आध्यात्मिक लाभ भी होता है। रोगी मनुष्य यदि चल फिर सकता हो तो उसे आसान पर पूर्व की ओर मुँह करके बैठना चाहिये और स्वयं हवन करना चाहिए। यदि रोगी अशक्त हो तो उसे हवन के समीप मुलायम बिस्तर पर लिटा देना चाहिये। जिस कमरे में रोगी का रहना होता हो उस कमरे की खिड़कियाँ खोलकर यदि हवन किया जाय तो बहुत अच्छा है। परन्तु इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि कमरे में जरूरत से ज्यादा गैस भर जाने के कारण रोगी को कष्ट न हो। हवन की अग्नि प्रज्वलित रहनी चाहिए धुँआ सदा हानिकारक होता है, चाहे वह लकड़ी का हो चाहे सामग्री का हो। जलती हुई अग्नि से ही औषधियों की सूक्ष्मता ठीक प्रकार होती है। घर में हवन की वायु के बस जाने से अनेक प्रकार के अस्वास्थ्यकर विकारों का निवारण हो जाता है।

हवन के समय हल्के ढीले और कम वस्त्र पहनने चाहिये। यदि ऋतु अनुकूल हो तो नंगे ही बैठना चाहिये जिससे कि यज्ञ की वायु शरीर को बाहर भी स्पर्श करे। स्नान करके बैठना सबसे अच्छा है पर यदि स्थिति अनुकूल न हो तो हाथ मुँह धोकर भी काम चल सकता है। यदि विधिवत हवन न हो सके तो एक मिट्टी के सकोरे में लकड़ियाँ जलाकर उस पर घी और हवन सामग्री डालकर रोगी के समीप रख देना चाहिए। एक तरीका यह भी हो सकता है कि सामग्री को कूट कर घी के साथ उसकी बत्ती सी बना ली जाय और धूपबत्ती की तरह उसे जलने दिया जाय। हवन के लिए प्रातःकाल का समय सबसे अच्छा है। बिना विशेष आवश्यकता के रात्रि में हवन न करना चाहिये।

हवन के समीप जल का भरा हुआ एक पात्र रखना कभी न भूलना चाहिये। यदि बड़ा हवन हो हवन कुण्ड के चारों ओर पानी में भरे पात्र रख देने चाहिये। कारण यह है कि हवन में जहाँ उपयोगी वायु निकलती है वहाँ कार्बन सरीखी हानिकार गैस भी निकलती है। पानी उस हानिकर गैस को खींचकर अपने में चूस लेता है। इस पानी को सूर्य के सम्मुख अर्घ के रूप में फैला देने का विधान है। इस जल को पीने आदि के काम में न लाना चाहिये।

हवन के अतिरिक्त वायु चिकित्सा का दूसरा तरीका प्राणायाम है। हम अपनी “आसन और प्राणायाम” पुस्तक में इसका वर्णन कर चुके हैं। प्राणायाम के द्वारा अनेक कठिन रोगों के रोगी स्वास्थ्य लाभ कर चुके हैं। विशेष रोगों के लिए विशेष प्राणायाम भी हो सकते हैं। पर साधारण और सर्व रोगोपयोगी प्राणायाम यह है कि (1) खुली हवा में प्रातःकाल मेरुदण्ड सीधा कर पद्मासन से समतल भूमि पर एक छोटा आसन बिछा कर बैठें (2) फेफड़ों में जितनी हवा भरी हो उस सबको धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। (3) जब फेफड़े बिल्कुल खाली हो जाए तो धीरे-धीरे साँस खींचना आरम्भ करें और जितनी वायु छाती एवं पेट में भरी जा सके भर लें। (4) जितने सेकिंड में हवा खींची गई हो उसके एक तिहाई समय तक वायु को भीतर ही रोकें (5) अब धीरे-धीरे वायु को बाहर निकालना आरम्भ करें और पेट को बिल्कुल खाली कर दें (6) जितनी देर में हवा बाहर निकाली गई हो उसके एक तिहाई समय तक बिना वायु के रहें (7) फिर पूर्ववत वायु खींचना आरम्भ कर दे यह एक प्राणायाम हुआ। ऐसे प्राणायाम सामर्थ्य के अनुसार एक समय में 10-15 या न्यूनाधिक किये जा सकते हैं। घण्टे दो-दो घण्टे के अन्तर से यह प्राणायाम करते रहने चाहिये। साथ में ‘ॐ’ का या गायत्री मन्त्र का जप भी करते रहना चाहिये। जैसे आँधी आने से आकाश में वायु की शुद्धि हो जाती है उसी प्रकार प्राणायाम से वायु की प्रचण्ड हलचल द्वारा भीतरी विकास उमड़ कर साँस द्वारा बाहर निकल जाते हैं। फेफड़े, मस्तिष्क, हृदय, आमाशय, आँत, पेडू और गुर्दे को इस प्राणायाम द्वारा बल मिलता है और आवश्यक व्यायाम हो जाता है। जिससे निर्बल अंगों में सबलता बढ़ती है और बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य सुधरता है।


ज्योति वर्धक, नेत्र-व्यायाम

नेत्रों की ज्योति बढ़ाने के लिए एक उपयोगी व्यायाम नीचे दिया जाता है। इसे प्रतिदिन प्रातः काल सूर्योदय के समय करना चाहिये। इस अभ्यास को करने में दस मिनट के लगभग लगते हैं। इसके कुछ दिन लगातार करने से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है और चश्मा लगाने की आदत छूट जाती है। व्यायाम इस प्रकार है-

कमर को सीधी करके पालथी मारकर शान्तिपूर्वक बैठिये। सिर सीधा रखिये, नेत्र बन्द कर लीजिए।

पुतलियों को नेत्र बन्द किये ही दाहिनी ओर मोड़िये फिर बाई ओर मोड़िए। ऐसा पाँच बार करिए। इस क्रिया को करते समय सिर न हिलना चाहिए।

पुतलियों को ऊपर ले जाइए फिर नीचे लाइए। सिर को बिना इधर-उधर हिलाए, इस क्रिया को भी पाँच बार कीजिए।

पुतलियों को ऊपर उठाओ फिर दाहिनी ओर, नीचे बाई ओर, ऊपर, इस क्रम से पाँच चक्कर घुमाइए।

पुतलियों को नीचे ले जाकर बायीं ओर, ऊपर, दायीं ओर, नीचे इस क्रम से पाँच चक्कर घुमाइए।

नाक के अग्रभाग के पहले दाहिनी आँख से फिर बाई आँख से देखो। नेत्र दोनों खुले रहें। नाक का अग्रभाग पुतली को थोड़ा सा मोड़ने से दिखाई देता है। इस क्रिया को भी पाँच बार करो।

पलकों को सिकोड़ कर आँखों को बंद कीजिए फिर एक दम खोल दीजिये इस क्रिया को भी पाँच बार कीजिये।

यह सब क्रियाएं करने के बाद नेत्रों को बन्द कर उंगलियों से धीरे-धीरे एक मिनट सहलाना चाहिये।

इसके बाद ताजे स्वच्छ शीतल जल से पलकों पर छींटे मारने चाहिये।

यह अभ्यास प्रातःकाल सूर्योदय के समय खुली जगह में पूर्व की ओर मुँह करके ऐसी जगह करना चाहिये जहाँ से सूर्य दीखता हो।

आरम्भ में हर क्रिया पाँच-पाँच बार करने का आदेश किया गया है। इसमें प्रति सप्ताह एक बार की वृद्धि करते जाना चाहिये और अन्त में हर क्रिया को दस बार करने का प्रयत्न करना चाहिये। दस बार से अधिक करने की जरूरत नहीं है।

आँखों की कमजोरी शिथिलता, धुन्ध, और मन्द ज्योति को हटाने में इससे सहायता मिलती है। जलन दूर होकर शीतलता प्राप्त होती है। व्यायाम से जैसे शरीर के अन्य अंग पुष्ट होते हैं वैसे ही नेत्रों को भी व्यायाम द्वारा पुष्ट एवं निरोग बनाया जा सकता है।


Quotation

मनुष्य को बड़ी सजगता के साथ जीवन को व्यवस्थित बनाना सीखना चाहिए। अव्यवस्था से समय और शक्ति दोनों का दुर्व्यय होता है। एक बार व्यवस्थित जीवन की आदत बन जाने पर कार्यक्रम में तेजी और खूबसूरती आ जाती है। भीतरी और बाहरी व्यवस्था जीवनोन्नति की सबसे पहली एवं सर्वोपरि सीढ़ी है।


एक चमत्कारी कथन

(प्रोफेसर मोहनलाल वर्मा एम. ए. एल. एल. बी.)

एक बार यमुना जी के उस पार दुर्वासा मुनि आये हुए थे दुर्वासाजी का क्रोध तो प्रसिद्ध ही है। मुनिवर के आदर सत्कार के लिये वृहत योजनाएं होने लगीं। श्रीकृष्ण भगवान ने गोपियों को आज्ञा दी कि जाओ; उन्हें यमुनाजी के उस पार भोजन दे आओ। योगेश्वर कृष्ण हजारों गोपियों में रहते थे। श्रीकृष्ण जी ने आज्ञा दी कि जाओ, मुनिवर दुर्वासा को किसी प्रकार की तकलीफ न हो, रुष्ट होने का अवसर न मिले गोपियाँ चकराई और बोलीं—हे, नटराज! यमुना पार कैसे जाए। इसकी विधि तो बताइये।”

श्रीकृष्ण ने कहा—”यमुनाजी से कहना, यदि श्रीकृष्ण हममें से किसी के साथ रमण करते हों, तो हमें जाने का मार्ग मत देना, यदि हम पूर्ण ब्रह्मचारिणी हों, पवित्र और सात्विक हों तो हे यमुना मैय्या! हमें रास्ता दे देना।” गोपियों ने वैसा ही किया और यमुना का जल इतना कम हो गया कि वे सुविधा से पार चली गई।

मुनि दुर्वासा को षट्रस व्यंजन खिलाकर जब गोपियाँ लौटने लगीं, तो पुनः उन्होंने यमुना पार का प्रश्न उठाया। इस पर मुनि ने कहा—”यमुना जी से कहना, यदि दुर्वासा ने दूब रस के सिवा और कुछ खाया हो, तो रास्ता मत देना, नहीं तो दे देना।” गोपियों ने वैसा ही किया, तब कहीं वे पार जा सकीं।

इन बातों से गोपियाँ चकित हो गई क्योंकि प्रत्यक्ष विरोधाभास था। दुर्वासाजी को विविध प्रकार का राजसी भोजन कराया था और वे कहते थे कि सिवा दूब रस के उन्होंने कुछ नहीं खाया। श्रीकृष्ण प्रतिदिन गोपियों के साथ विहार करते थे, किन्तु उनका कहना कि उन्होंने कभी किसी के साथ रमण नहीं किया—यह एक चमत्कारी कथन था। यह गूढ़ रहस्य भला उन बेचारी गोपियों के समझ में क्योंकर आता। वे तो केवल प्रेम जानती थीं—प्रेम मार्ग ही उनके लिए सुलभ था। गोपियों के लिए योग साधन, अथवा ज्ञान प्राप्ति करना असंभव नहीं तो महा कठिन अवश्य था।

दुर्वासाजी की भोजन की तथा श्रीकृष्ण की कामवासना नियन्त्रण की बात जो ऊपर लिखी गई हैं, उससे जिस चित्तवृत्ति का पता लगता है, वह आदर्श रूप और अनुकरणीय है। हम संसार में रहें किन्तु अपने को, अपनी आत्मा का, अपने स्वत्व को साँसारिक वस्तुओं में न डुबोये वरन् सदा उनसे ऊपर रहें, उनके प्रति वीतराग रहें, साँसारिक कार्यों में संसार में रहते हुए भी अधिक लिप्त होना ठीक नहीं। हमें सदैव उनके प्रति वैराग्य भाव रखना चाहिये। कामवासनाओं को नियंत्रित रखने के लिए अत्यन्त मानसिक दृढ़ता की आवश्यकता है जो एक पूर्ण योगी में पर पकता को पहुँचती है। नियमित कर्म कीजिये, किन्तु फल प्राप्ति की वासना ही में न डूबे रहिये। कमल जैसे जल में रहकर भी उससे दूर ही रहता है, इसी प्रकार आप संसार में रहते हुए भी साँसारिक वस्तुओं में लिप्त न रहिए। समत्व भाव रखिये। एक पहुँचे हुए योगी को चाहे आप सत्तू और नमक रख दीजिए, या छप्पन प्रकार के भोजन परोस दीजिये। “समत्व” भाव के कारण वह एक ही स्वाद से भोजन करेगा। महात्मा साँसारिक वस्तुओं में रहते हुए भी उन्हें तृणवत् त्याज्य समझते हैं, तथापि सम्पूर्ण संसार उनको गोद में उठाने के लिये दौड़ता है। यह प्रत्यक्ष बात है कि आप जिस वस्तु के पाने की इच्छा अधिक करेंगे, उतनी ही मानो वह वस्तु आपसे दूर हटती जायगी। महात्मा, योगी, मुनि किसी के प्रति आकर्षित नहीं होते, विरागी रहते हैं तभी दूसरे मनुष्यों को उनके प्रति आकर्षण प्रतीत होता है। अतः संसार में रहकर भी उसकी रंगीन चीजों में अपनत्व न खोइए। वृत्तियों को उच्च बनाइये। रागी से विरागी बनिये। रागी या विरागी होना बाह्य उपकरणों पर निर्भर नहीं प्रत्युत आन्तरिक भावना पर अवलम्बित है।


यदि गेहूँ न मिले तो?

(डा. बिट्ठलदास मोदी, आरोग्य मन्दिर, गोरखपुर)

उस दिन जब राशन में चार छटाँक के बजाय दो छटाँक गेहूँ मिलने का आर्डर हुआ तो एक भाई आरोग्य मन्दिर में पधारे और कहने लगे कि आप तो बराबर ही शाक तरकारी अधिक खाने एवं अन्न कम खाने की सिफारिश करते हैं पर यह तो बताइये कि “यदि राशन और भी कम हो जाय एवं गेहूँ दो छटाँक भी न मिले तो?”

ठीक यही प्रश्न आज से दो महीने पहले मुझसे स्थानीय मारवाड़ी छात्र संघ के मन्त्री ने किया और बदले में अपने और अपने सदस्यों के लिए इस समस्या को सुलझाते भोजन की एक दावत मुझ से माँग ली थी। मैंने उन्हें बुलाया और उस समय आने वाली तरकारियों में से चुकन्दर, पात गोभी, टमाटर, गाजर एक, दो, तीन, चार के अनुपात में कच्ची ही पाव पाव भर की मात्रा में प्रत्येक के लिए एक कटोरे में सजा दी थी। ऊपर से दो-दो तोले किशमिश और नमक, जीरा और पाँच सात बूँद नीबू का रस भी डाला गया था, गन्ने के रस, मखनिया दूध और लौकी की खीर बनाई गई थी। कुछ गुड़ भी था और “गेहूँ न मिले तो?” का जवाब बालू में भुना आलू भी परोसा गया था। लोगों ने खाया और छात्र संघ के चालीस सदस्यों में से पाँच सात ही ऐसे निकले होंगे जिन्हें इस भोजन में मजा न आया हो। यहाँ पर यह बता देना अप्रासंगिक न होगा कि इस भोजन में प्रत्येक के पीछे पाँच आने ही खर्च हुये थे।

इधन की पूर्ति

जब लोग यह सोचने लगते हैं कि अगर गेहूँ न मिले तो? तो यह भूल जाते हैं कि शरीर के लिए गेहूँ, चावल, जौ, मकई, बाजरे, बजडी, टाँगुन, साँवा, केला और आलू का मूल्य एक ही है। ये सभी शरीर रूपी इंजन के लिए इंधन का काम करते हैं। इंधन किसी भी लकड़ी का क्यों न हो जल कर तो वह गरमी ही पहुँचाता है। अतः प्रश्न होना चाहिए कि इंधन की पूर्ति कैसे हो? न कि अमुक से ही इंधन की पूर्ति हो। यहाँ क्यों और कैसे—में न जाकर यह सीधे में बता देना उचित समझता हूँ कि उत्तमता के हिसाब से सर्वोत्तम श्वेता सार केले में फिर आलू में और तब चावल, गेहूँ, जो, मकई, बाजरे आदि में पाया जाता है। केले को लोग भोजन समझते ही नहीं, आलू को भी भाजी से अधिक महत्व नहीं दिया जाता। यही नहीं आलू के विषय में लोगों में अनेक गलत धारणायें भी बैठी हुई हैं। उन सबमें बड़ी तो यह है कि आलू गरम होता है। श्वेतसार का काम ही शरीर में गरमी पहुँचाना है और लोग जब इसे रोटी या चावल के साथ शाक समझ कर खा जाते हैं तो शरीर में आवश्यकता से अधिक श्वेत सार पहुँचने से अधिक गरमी उत्पन्न हो जाती है और दोष अपनी समझ को नहीं गरीब आलू को दिया जाता है। तो आलू को शाक की तरह, नहीं अन्न की तरह बरतिए, इसे पूरा भोजन समझिये।

आलू की उपयोगिता

भोजन विज्ञान के कई जानकार भी आलू में उत्तम प्रकार का श्वेता सार होने पर भी आलू, केले, चावल के मुकाबले में गेहूँ की ही अधिक सिफारिश करते हैं। इसका भी कारण है। भोजन के साथ फुजले का होना आवश्यक है और वह गेहूँ में चोकर के रूप में, केले में रेशों, आलू के छिलके या चावल की ऊपरी पर्त की अपेक्षा बहुत अधिक होता है। अतः गेहूँ खाने वालों के लिए कब्ज का डर नहीं रहता पर यदि आलू के साथ हरी तरकारियाँ अधिक खायी जायें तो वह डर जाता रहेगा, क्योंकि हरी तरकारियों में फुजले की प्रधानता होती है।

आलू खाना भी सीखिये। यदि डेढ़ सेर पानी में सेर भर आलू उबालकर आप उसका पानी फेंक देंगे तो आप उन पुराने जमाने के चाय इस्तेमाल करने वालों की तरह हास्यास्पद होंगे जो चाय की पत्तियाँ पानी में उबलकर पानी फेंक देते थे और बची पत्तियों को मक्खन और रोटी पर छिड़क कर खाते थे। आलू में जो प्राकृतिक लवण होते हैं वे अधिकतर इस पानी में चले जायेंगे और आप श्वेतसार ही खायेंगे। अतः पूर्ण लाभ के लिए आलू को भाप से पकाइये या आग में भुनवाइये। उबला ही पसंद हो तो तरकारियों या दाल में डाल दीजिये। इस तरह उबालने में जो सामान निकलेगा वह आपको दूसरे रूप में मिल जायगा। जिस तरह भी पकाइये पर जहाँ तक बन सके उसका छिलका न फेंकिये। कच्चे को छीलकर तो कभी बनाइये ही नहीं। ऐसा करके आप आलू का बहुत कुछ नष्ट कर देते हैं। एक आलू को बीच से तराशिये, आपको उसमें दो भाग स्पष्ट दिखाइए देंगे एक बीच का जरा पनीला बड़ा भाग और फिर उसके चारों और पतली पर कड़ी सी हद। इसी बाहरी हद में आलू के प्राकृतिक लवण होते हैं और छिलने में तो उनका ज्यादा हिस्सा निकलने से न रुकेगा।

आलू तथा आटे में श्वेतसार की मात्रा इस प्रकार होती है—

श्वेतसार पानी

उबला और छिला आलू 19780

छिलके समेत भुना आलू 2571

छने आटे की रोटी 5432

चोकर समेत आटे की रोटी4437

आलू में गेहूँ से ज्यादा लोहा, चूना, फास्फोरस और पोटाश तो होता ही है इसमें और भी कई मूल्यवान प्राकृतिक लवण पाये जाते हैं जो गेहूँ में नहीं मिलते। इन प्राकृतिक लवणों की रोगों से बचाये रखने की शक्ति आज किसी से छिपी नहीं है।

पर एक मनुष्य को जितनी रोटी की जरूरत होगी उससे दूने से भी थोड़े अधिक वजन के आलू की जरूरत होगी। इसका कारण यह है कि आलू में रोटी की बनिस्बत दूने से ज्यादा पानी होता है अतः इसी अनुपात में श्वेतसार कम होता है।

घबराइये नहीं

गेहूँ की कमी के कारण न घबराइये। रूस में बहुत से लोगों का भोजन राई है, अमेरिका में मकई, जर्मनी में आलू, टिसटम डी कुनहा द्वीप के लोग तो आलू के सिवाय दूसरी चीज जानते ही नहीं। विदेश को जाने दीजिए भारत में ही बंगाल, बिहार के अधिकतर लोग चावल खाते हैं। राजपूताने में बाजरा चलता है, सावाँ कोदों रागी खाने वालों की भी संख्या कम कहीं हैं, फिर यदि आलू खाने वालों की संख्या बढ़े तो हर्ज क्या है। आलू आप अपने बाग में बो सकते हैं और भोजन उपजाने के साथ-साथ श्रम का भी लाभ पा सकते हैं।


भोपाओं का भ्रम जाल

(श्री राजमल ललवानी’ श्वफ्. रु.रु.्न. च्ष्टद्गठ्ठह्लह्ड्डद्यज् )

यह जानते हुए भी कि मुझे देवी देवताओं तथा फकीर बली व भोपादि मन्त्र तन्त्र जानने वालों पर बिल्कुल श्रद्धा नहीं है फिर भी मेरे एक हितैषी सज्जन बड़े दृढ़ विश्वास के साथ एक भोपा को साथ लेकर एक सप्ताह हुए आये। भोपा को सम्बोधन करके वे महाशय बोले “यह एक सिद्ध हस्त महापुरुष हैं तथा इनको मालूम हुआ कि आपके मकान की नींव में एक देवी की मूर्ति गढ़ी हुई है जो पुत्रोत्पत्ति में बाधा डालती है। आप आज्ञा दें तो यह महाराज आपके सामने जमीन में से वह मूर्ति निकाल देंगे, इसके अलावा इनके पास कई विस्मयकारी चमत्कार हैं और वे सब इनको भी श्री बजरंगबली की कृपा से उपलब्ध हुए हैं।” उनके प्रशंसा के उद्गारों का साराँश यह था कि उनके नजरों में वह भोपा परमात्मा के एक छोटे भाई से कम न जँचता था मुझे उनकी इस भोली समझ पर बड़ी हँसी आ रही थी कि ऐसे वैज्ञानिक युग में भी हमारी समाज में कितनी अंध श्रद्धा है। इतना ही नहीं हमारे पूज्य मुनि महाराज संत महात्मा जब कि हमेशा सम्यकत्व का उपदेश देते हैं। फिर भी यह विपरीत श्रद्धा हमारी समाज में इतनी गहरी क्यों विद्यमान है? बड़ा विचार पैदा हुआ।

आखिर मैंने लोगों की इस भोली मान्यता को मिटाने के उद्देश्य से मेरे गाँव के कुछ सज्जनों को जिनको देवी देवताओं पर व भोपादि पर विश्वास था बुलाया व सबके सामने भोपाजी को अपना चमत्कार बताने के लिये कहा। भोपाजी ने धूप किया व अपने पास के कंगन पर हाथ रखा हाथ रखते ही बड़ी आवाज के साथ आँखों को अनिमेष करके अंग को जोर शोर से घुमाना शुरू किया। लोगों ने समझा बजरंग बली आ गये 2-3 दफे विश्रान्ति ले लेकर विकराल रूप करके एक दम उठे और एक कोने में लात मार कर एक मूर्ति गिराकर बोले-देखिये यह मूर्ति आ गई। मैंने कहा “महाराज जमीन में से अगर मूर्ति आई होती तो जमीन में कहीं खड्डा नजर आता और न इस मूर्ति पर कोई मिट्टी की रंगत ही नजर आती है और फिर हम कैसे मान लें कि यह मूर्ति आपने जमीन में से निकाली है। उत्तर में बड़े जोर से गुर्राने लगे। इस गुर्राने में भी उनकी चालाकी थी सामने वाला व्यक्ति इस आवाज से घबरा जाय व उसके दिल में देवी दोष करने का भय होने लगे ताकि वह आगे पूछ न सके। परन्तु उनकी यह युक्ति मेरे पर कोई असर कर न सकी। आखिर बोले माँग क्या माँगता है? मेरे हितैषी सज्जन ने मुझे माँगने के लिए कहा मैंने महाराज से कहा महाराज मैं मुद्दत की कोई वस्तु नहीं माँगता। मैं प्रत्यक्ष वस्तु चाहता हूँ जिसमें भी मेरा किसी प्रकार का स्वार्थ व लोभ न होगा। हम लोगों ने आज तक पारस का नाम सुना है परन्तु अभी तक देखा नहीं अतः आप अपने देवता से कहिये कि वे पारस लाकर उससे लोहे को सोना करके हमें सिर्फ बता दें। हमको पारस की, सोने की, जरूरत नहीं है केवल हम देखना चाहते हैं। अगर हमें पारस बता दिया तो हम समझेंगे कि आपके अंग में जरूर देव आते हैं।” भोपाजी ने कहा कि हम कल आपको पारस लाकर बतायेंगे दूसरे दिन फिर एक दफे ही नहीं दो दफे प्रयोग किया। जोर-जोर से घूमकर देव को बुलाये। खूब हाथ पैर पटके परन्तु कोई निष्कर्ष नहीं निकला। आखिर हताश होकर बोले कि आप कोई दूसरी वस्तु माँगिये। मैंने दस लाख सो नये बरसाने का व दस लाख जवाहरात बरसाकर केवल बताने को कहा परन्तु सब ओर से निराशा हाथ लगी आखिर उन्होंने देख लिया कि इन तिलों में कोई तेल नहीं है। तीसरे दिन मुझसे बिना मिले ही चलते बने। मेरे हितैषी सज्जन के चेहरे पर तो हवाइयां उड़ रहीं थीं।

मेरा इस घटना का उल्लेख करने का उद्देश्य यह है कि पाठकगण ऐसे भोपे डोपे तन्त्र मन्त्र वालों पर विश्वास कर बरबाद न होवे। मैंने मालूमात की दृष्टि से ऐसे लोगों से कई प्रयोग कराये हैं परन्तु मुझे किसी में भी तथ्य जान नहीं पड़ा। भोले लोगों को सिर्फ यह ठगने का जाल है इसके सिवाय कुछ नहीं। इनसे डरने की व देवी दोष का भय करने की कतई जरूरत नहीं है।


Quotation

त्याग का अर्थ है—दूसरों की सेवा करना। उनसे प्रेम और सहानुभूति रखना और उन्हें अपनी शक्तियों द्वारा लाभ पहुँचाना। जो त्याग के द्वारा प्राप्त होने वाले आनन्द का रसास्वादन एक बार कर लेता है वह जानता है कि लेने की अपेक्षा देना अधिक आनन्दमय है।

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मनुष्य का सबसे बड़ा मुक्तिदाता स्वयं उसी के भीतर विद्यमान है-वह है-’सत्य’। सत्य ही ईश्वर है। जिसके विचार और कार्य भले हैं, वास्तव में वही सच्चा मनुष्य ईश्वर भक्त एवं जीवन मुक्त है।


दिव्य-ज्योति

(श्री रामलालजी पहाड़ा, खंडवा)

अग्नि का आन्तरिक अव्यक्त रूप ज्योति है और बहिरगत व्यक्त रूप ज्वाला-उजाला है। ज्वाला-किरणें फैलाकर पदार्थों पर आघात करती हैं। इस तरह किरणों का घात प्रतिघात चलता है। इस क्रिया को ‘प्रकाश’ कहते हैं। इसी से मनुष्यों को पदार्थ दृष्टिगोचर होते हैं। सामान्य स्थिति में मनुष्य किरणों के व्यापार को ही ज्योति समझते हैं। व्यवहार में बिजली के प्रकाश को सब जानते हैं पर बिजली के वास्तविक रूप का ज्ञान किसी बिरले को ही होता है। तार में क्रिया को देखकर विद्युत प्रवाह का अनुमान कर लेते हैं, पर मूल कारण के रूप का ज्ञान बुद्धि ग्राह्य ही रहता है। इन चर्म चक्षुओं से विद्युत का स्वरूप देखना असम्भव है, यद्यपि विधूत रस “बाहर देखना असम्भव है, यद्यपि विद्युत रस बाहर भीतर सर्वत्र प्रवाहित रहता है। जैसा श्रुति में कहा है, ‘तदेजति तन्नेजति तद्दूरेतदून्तिके, तदन्तरस्थ सर्वस्य तदु सर्वम्यास्य बाह्यतः! बह जाता है अर्थात् किरणों द्वारा फैलता है, यह नहीं जाता है अर्थात् मूल रूप में स्थित रहता है, वह पास है अर्थात् सब प्राणियों में समाया हुआ है, वह दूर है, अर्थात् किरणों द्वारा दूर-दूर के पदार्थों को प्रकाशित करता है, इस तरह वह इस जगत के भीतर बाहर सर्वत्र है।

“यज्जाग्रतो दूर मुदैति दैवं तदुसुप्तस्थ तथैवेति। दूरंगमं ज्योतिषाँ ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिव संकल्प मस्तु” जैसे जागते हुए दूर जाता है वैसे ही सुप्त अवस्था में भी दूर जाता है। वह सब ज्योतियों का एक दूर गतिवान ज्योति है, यही शिव संकल्पवान मेरा मन होवे। सूर्य के उदय होते ही प्रकाश इतनी दूर पृथ्वी पर और अन्य ग्रहों पर भी 186000 मील प्रति सेकेंड के वेग से पहुँचता है, अस्त होने पर भी उतनी ही दूर चला जाता है। मनुष्य भी जब जागता तब नेत्र स्थित ज्योति की किरणें दूर-दूर के पदार्थों पर पहुँचती हैं और सोता है तब अन्तरिक्ष में न जाने कितनी दूर चली जाती हैं। इन्द्रियाँ मानों मध्य में स्थित रहती है वहाँ से यह ज्योति दोनों अवस्थाओं में दूर जाती है। यही सब इन्द्रियों को पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करने में सहायक होता है। इसके बिना इन्द्रियों के और जगत के सब व्यापार बन्द रहते हैं।

“यत्त प्रज्ञानमुतचेतोधृतिश्च यज्जयोतिरन्तरमृतं

प्रज्ञासु। यस्मानन्नऽऋते किंचन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु” अर्थात् यही ज्योति प्रज्ञा और धृति को उद्भासित करती है, सब प्रकृति से उत्पन्न हुए पदार्थों के भीतर स्थित है, अमर है, इसके बिना जगत में कुछ भी काम नहीं होता है। यही ज्योति सब कामों का मूल कारण है। मनुष्य इसी का ध्यान रख असत् भावों को त्याग करे। जिस तरह बादलों के आने से आँधी के कारण धूल उड़ने से वातावरण कुछ सघन हो जाता है। सघन वातावरण में ढके रहने के कारण मनुष्यों को सूर्य दर्शन दुर्लभ होता है। उसी प्रकार माया सक्त जीवों को इस ज्योति का प्रकाश मिलना कठिन है, यहाँ “नाहं प्रकाशः सर्वस्य योग माया समावृताः” यद्यपि यह प्राणियों के हृदय में सदा स्थित है। इस सूक्ष्म ज्योति का ध्यान कठिन भी है। इन्द्रियों को बहिर्मुख होना अधिक प्रिय है। इस सिद्धान्त को जानकर कृष्ण भगवान अर्जुन को वस्तुगत तत्व का ध्यान दिलाने के लिए भौतिक पदार्थों का दृष्टान्त लेकर कहते हैं “ज्योतिषाँ रवि रशुमान्” अर्थात् ज्योतियाँ में मेरी विभूति किरणों वाला रवि-[र अग्नि मूल को, ‘वि’ वितरण करने वाला] हूँ’। यही ज्योतियों के ज्योति अन्धकार से परे श्रेष्ठ कही जाती है। यह आदित्य, चन्द्र, अग्नि सब में समाया हुआ है, इन सबका मूल कारण एक ही है यथा “यदादित्यगंत तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्। यच्चद्रमसि यञ्चाग्नौतत्ते जोविद्धि मामकम्” सर्व मनुष्यों के हृदय में रहने वाला महापुरुष ज्योतिर्मय है किन्तु विषय और अपस्वार्थ से वह मलिन हो रहा है। श्रुति कहती है “अंगुष्ठमात्र पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः। लिंग देह अंगुष्ठ मात्र है और धूम रहित ज्योति समान है। और भी “तच्छुभ्रमू ज्योतिषाँ ज्योतिस्तद्यदात्म विदोविदुः” वह ज्योतियों की ज्योति शुभ्र है जिसको आत्मवेत्ता ही जानते हैं। जिन मनुष्यों ने संयम नियम द्वारा इन्द्रियों का निग्रह कर अपने दोषों को दूर कर दिया है वे ही इस ईश्वरीय दिव्य ज्योति का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। अस्तु।


हमारा यह शरीर ही कुरुक्षेत्र है।

गीता सार्वभौम और सर्वप्रिय ग्रन्थ है। विद्वानों ने इसकी भाँति-भाँति से व्याख्या की है। उनका कथन है कि भगवान का यह अमरगान आज भी प्रत्येक हिन्दू के शरीर रूपी कुरुक्षेत्र में गूँज रहा है। यह मानव शरीर ही कुरुक्षेत्र है। भगवान ने कहा है—

इद शरीर कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयेत—

हे! कौन्तेय! इस शरीर को ही क्षेत्र कहते हैं। यह कर्म करने का क्षेत्र है इसलिए इसको कर्मक्षेत्र या कुरुक्षेत्र कहा गया है। अब प्रश्न यह है कि यदि शरीर को ही कुरुक्षेत्र मान लिया जाय तो भी यह धर्मक्षेत्र नहीं हो सकता। पाप का पुतला, पापों से भरा हुआ विकार वान और नश्वर यह शरीर धर्मक्षेत्र कैसे कहा जा सकता है?

श्रुतियों में बतलाया गया है 83 लाख 99 हजार दो सो निन्यनिवे योनियाँ रचकर भगवान इतने प्रसन्न नहीं हुए जितने इस मनुष्य देह को रचकर। कारण? इसमें रहकर उनका मित्र जीव, अथवा उनका अंश रूपी आत्मा बहुत प्रसन्न हुआ उसे सुख मिला, उसे बुद्धि से साधनों द्वारा उन्नति करने के लिए क्षेत्र मिला, आत्मा एवं परमात्मा को सुखप्रद होने के कारण-धार्मिक साधनों का आधार होने के कारण—बुद्धि द्वारा अच्छे कर्म करके सद्गति पाने योग्य होने के कारण, यह कुरुक्षेत्र (शरीर) धर्मक्षेत्र कहलाया।

सद्वृत्तियाँ कहती हैं कि हमें केवल रहने मात्र का स्थान दे दो परन्तु दुष्वृत्तियां बिना लड़े एक सुई की नोंक के बराबर भूमि भी देने को तैयार नहीं। सद्वृत्तियाँ पाण्डव हैं और दुष्वृत्तियां कौरव। इस शरीर पर सद्वृत्तियों का ही अधिकार है, परन्तु धृतराष्ट्र—राष्ट्र को धृत अर्थात् धारण कर बैठा है। वास्तव में यह उसकी चीज नहीं, वह अन्धा भी है, उसे कुछ सूझता नहीं। यह धृतराष्ट्र हमारे शरीर में मन है, जो जबरदस्ती स्वामी बना हुआ है, परन्तु अन्धा होने के कारण इन्द्रियों और बुद्धि के सहारे है। संजय सम्यक् प्रकार से रोग द्वेष को जय करने वाला विज्ञान है। विज्ञान से ही इस शरीर के सारे हाल जान सकता है। अर्जुन जीवात्मा है और कृष्ण आत्मा रूप परमात्मा है। यदि जीवात्मा अपने रथ की बागडोर को आत्मारूप परमात्मा के हाथों में सौंपकर (युद्ध कर्त्तव्य पालन) करे तो जय निश्चित है।


अखण्ड-ज्योति के जीवन का दूसरा अध्याय आरंभ होता है।

इस पुण्य पर्व के अवसर पर आप भी तुलसीदल चढ़ाइये

सद्ज्ञान की बुद्धि के लिए, मानवता के कर्त्तव्यों सद्गुणों, सद्विचारों, सद्भावों को बढ़ाने के लिए अखण्ड-ज्योति मिशन गत सात वर्षों से जो महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है उससे प्रायः सभी पाठक भली भाँति परिचित हैं। भारतवर्ष से एक छोर से दूसरे छोर तक धर्म प्रचार का कार्य जितनी तत्परता से जिस सफलता के साथ किया गया है उसे देखकर अनेकों विद्वानों, नेताओं एवं महात्माओं ने मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। विचार क्षेत्र में घुसे हुए शैतान से, पाप से, अज्ञान से, अखण्ड-ज्योति का मिशन, कड़ा मोर्चा ले रहा है। असंख्यों व्यक्तियों की जीवन दिशा को उलट-पुलट कर देने में इस छोटे से मठ को अभूतपूर्व सफलता मिली है।

अब तक प्राप्त हुई इन समस्त सफलताओं का श्रेय हमारे पाठकों को है। क्योंकि उन्होंने सच्चे हृदय से अपना सद्भाव हमारे साथ रखा है। पाठकों ने अखण्ड-ज्योति के साथ वैसे ही आत्मीयता भरे सद्भाव रखे हैं जैसे गुरुजनों के साथ, सगे कुटुम्बों के साथ, हितू रिश्तेदारों के साथ एवं आन्तरिक आत्मीय सखाओं स्वजनों के साथ रखे जाते हैं। अपनी शारीरिक, मानसिक, घरेलू, व्यापारिक, धार्मिक गुत्थियों को, समस्याओं को पाठक हमारे सामने हृदय खोलकर उसी प्रकार रख देते हैं जैसे अपने सबसे अधिक विश्वासी मित्र के साथ रखा जा सकता है। इन गुत्थियों का जो सुलझाव यहाँ से भेजा गया है उसे उन्होंने श्रद्धापूर्वक अपनाया और कार्य रूप में परिणत किया फल स्वरूप ऐसे ऐसे मधुर परिणाम सामने आये, जिनका स्मरण करने मात्र से आनन्द के रोमाँच हो आते हैं।

परमात्मा की धर्म संस्थापन की पुनीति इच्छा में, उन्हीं की प्रेरणा से सहस्रों पाठकों ने पूरी दिलचस्पी से सहयोग दिया, उस सहयोग के कारण ही अखण्ड-ज्योति द्वारा सत प्रचार का इतना कार्य हो सका। इसका श्रेय उन सहस्रों स्वजनों को है जिन्हें मोटी भाषा में हम ‘पाठक’ भी कह देते हैं।

लड़ाई के दौरान में एक समय ऐसा आया था जब कागज की दुर्लभता एवं सरकारी कन्ट्रोल कठोरता इतनी बढ़ गई थी कि अनेकों पत्र लड़खड़ा कर मर गये। अखण्ड-ज्योति के सामने भी उसकी मृत्यु मुँह फाड़कर नाच रही थी क्योंकि उसके संचालक एक प्रकार से निर्धन ही है। इस विषम घड़ी में पाठकों ने अपने प्रेम से सने पैसे सहायता के लिए भेजे। उन पैसों से हाथ का बना कागज बनाकर पत्रिका और पुस्तकें जीवित रखी गई। हिसार के श्री मुँशीराम जी गुप्ता जो मथुरा आकर कुछ दिनों अखण्ड-ज्योति में ठहरे थे। उन्होंने एक अद्भुत आदर्श रखा। दाल की छोटी सी दुकान से उन्हें जो कुछ आमदनी होती थी उसमें से भोजन वस्त्र लेकर प्रायः सबका सब अखण्ड-ज्योति को भेज देते थे। अन्य पाठकों ने अपने ढंग से सहायताएँ कीं। कानपुर के राजनरायण जी श्रीवास्तव, अहमदाबाद के बाबू भाईजी, वेतिया के गोपालप्रसाद जी आदि सज्जनों ने बिल्कुल निस्वार्थ भाव से, अपना बहुमूल्य समय देकर सैकड़ों ग्राहक बनाये। अनेकों स्वजनों ने जैसे भी बन पड़ा, तन से, मन से, धन से इस मिशन को सींचा। पाठकों के स्वजनों के प्रेम जल से सींचा हुआ, यह धर्म तरु आज छोटा है तो भी हरा भरा और सुरक्षित है, उस पर हर एक पाठक को गर्व करने का अधिकार है।

सात वर्ष बाद अब अखण्ड-ज्योति के जीवन का दूसरा अध्याय आरम्भ होता है। पहले परिच्छेद में वह मृत्यु के मुख से बच गई और भद्दे, रद्दी, खराब कागजों पर बुरी भली छपाई से छपा साहित्य देकर जनता को आध्यात्मिक खुराक पहुँचाती रही। यह दो ही निष्कर्ष अब तक के कार्य का सिंहावलोकन करके कहे जा सकते हैं। पर अब परिस्थितियाँ बदल रहीं है। दूसरे महायुद्ध का दौरा ठंडा पड़ गया है, तीसरा महायुद्ध भी बहुत समीप नहीं है। जो कठिनाइयाँ आज हैं निकट भविष्य में उनके घटने और हटने की आशा है इन नयी परिस्थितियों में अखण्ड-ज्योति का सद्ज्ञान प्रसार का, धर्म स्थापना का कार्य अधिक तत्परता से करना है। जनता को सात्विक आध्यात्मिक भोजन पहुँचा कर उसके मस्तिष्क में सतोगुणी भावनाओं को ओत-पोत करना है, इस कार्य के लिए बहुत बड़े परिमाण में, देश की विभिन्न भाषाओं में, सुलभ सस्ता, सुन्दर, साहित्य तैयार करके उसे जन साधारण तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य करना है। अखण्ड-ज्योति में पुस्तकों में, अधिक उन्नति करनी हैं। मिशन की अन्य प्रगतियों को विविध प्रकारों प्रभु की इच्छा पूर्ण करने में निमित्त बनने के लिए, धर्म स्थापना के लिए, नये धर्म युग का सूत्र पात करने के लिए इस कार्य प्रणाली को आगे बढ़ाना सचमुच आज की घड़ी में बहुत ही आवश्यक है।

इस साहसपूर्ण कदम को हम अकेले नहीं बढ़ा सकते। अखण्ड-ज्योति अपने दूसरे अध्याय में प्रवेश करते हुए स्वजनों का सहारा चाहती है। इस दिशा में सबसे प्रथम कार्य जो करना है वह है—अपना प्रेस लगाना। अपने पास प्रेस न होने के कारण बाहर के प्रेसों से पत्र तथा पुस्तकों की छपाई करानी पड़ती है। इसमें अनेक असुविधा हैं। छपाई का खर्च बहुत पड़ता है, अशुद्ध और खराब छपाई होती है, समय पर काम नहीं मिलता, अधिक काम छापने की उन्हें फुरसत नहीं होती, इन चारों कठिनाइयों के कारण नित्य ही अड़चनें आती हैं। अपना प्रेस हो जाने पर यह सब कठिनाइयाँ दूर हो जावेंगी और मन चाहा साहित्य, समय पर, सुविधापूर्वक, कम खर्च में तैयार हो सकेगा। इन सब बातों पर विचार करते हुए अखण्ड-ज्योति अपना प्रेस लगाना चाहती है। यह कार्य पूरा होते ही अधिक उत्तम, अच्छा, सुन्दर, उपयोगी एवं आवश्यक साहित्य प्रकाशित होना आरम्भ हो जायगा। इस प्रकाशन से होने वाला लाभ अन्य उपयोगी, धर्म वृद्धि करने वाले कार्यों को प्रगति एवं प्रेरणा देगा। जिस प्रकार घड़ी में चाबी लगा देने से फिनर में ताकत भर जाती है और फिनर की ताकत में घड़ी के अनेकों छोटे बड़े पुर्जे घूमने लगते हैं उसी प्रकार प्रेस की व्यवस्था ठीक प्रकार हो जाने से अखण्ड-ज्योति में शक्ति भर जायगी। इस बल के कारण अनेकों धर्म प्रवृत्तियों के आसानी से चलते रहने में बड़ी सुविधा हो जायगी।

अपने जीवन के दूसरे अध्याय में प्रवेश करते हुए अखण्ड-ज्योति अपने स्वजनों आत्मीयों, कुटुम्बियों की सहायता चाहती है। जिस धर्म तरु के सुस्थित हो जाने से अनेक भ्रान्त व्यक्तियों को सद्ज्ञान का अमृत लाभ होगा, जिसकी छाया में बैठ कर असंख्य नर नारी रोग, शोक, क्लेश, पीड़ा और पाप तापों से छुटकारा प्राप्त करेंगे, ऐसे पौधे की जड़ में आज थोड़ा-थोड़ा जल, अपने परिजन छिड़क दें तो उन छींटों से उनके घड़े में घाटा न आवेगा, पर यह पौधा उन सद्भावमयी बूँदों के द्वारा नवजीवन धारण करके कुछ ही समय में परिपुष्ट वृक्ष बन जायेगा।

इच्छा होने पर कठिनाई की स्थिति में भी मनुष्य थोड़ा बहुत दे सकता है। अनिच्छा होने पर बड़ी धनराशि का स्वामित्व होने पर भी कुछ त्याग नहीं बन पड़ता। हम अपने साथियों, स्वजनों, कुटुंबियों, पाठकों के उच्च अन्तःकरण में निवास करने वाली सद्भावना को इन पंक्तियों द्वारा जागृत करते हैं और ज्ञान यज्ञ के महत्व पूर्ण आयोजन के लिए सहायता प्राप्त करने की आशा करते हैं। हमें विश्वास है कि हमारे आत्मीयजनों का उच्च अन्तःकरण उन्हें अखण्ड-ज्योति के प्रेस फण्ड के लिए कुछ न कुछ भेजने को अवश्य प्रेरित करेगा और इसी वर्ष प्रेस की स्थापना हो जायगी। प्राप्त हुई सहायताएं अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित की जावेंगी।


दुखी सदा को? विषयानुरागी

(श्रीमती प्रीतम देवी महेन्द्र साहित्यरत्न)

श्री मद्भागवत में एक स्थान पर कथा लिखी है- अवधूत ने 24 गुरुओं में चील को भी एक गुरु माना था। चील के मुख में माँस था, इसीलिए सहस्रों कौए उसे घेरे फिरते थे। जिस ओर वह चील माँस को मुख में लिए हुए जाती थी, उधर ही काँव-काँव करते हुए कौए भी उसके पीछे-पीछे भागते थे। जब चील के मुख से हठात् माँस का टुकड़ा नीचे गिर पड़ा, तब सारे कौए उस माँस की ओर चले गए, फिर उनमें से कोई भी चील की ओर नहीं गया।

माँस से यहाँ अभिप्राय है, भोग के पदार्थों से। कौए चिंता और भावनाएँ हैं। जहाँ-जहाँ भोग है, वहीं-वहीं भावना और चिन्ताएँ हैं। भोग त्याग करते ही शान्ति प्राप्त हो जाती है। इसके विपरीत जितना भोग में लिप्त होते हैं, जितनी साँसारिक आवश्यकताएं बढ़ाते हैं, उतने ही संसार के कुचक्र में फँसते जाते हैं। प्रत्येक आवश्यकता एक बन्धन है। जिसकी जितनी आवश्यकताएँ हैं, उस बेचारे के जिम्मे उतने ही बन्धन हैं। जिसकी जितनी कम जरूरतें हैं, वह उसी अनुपात में दूसरे की अपेक्षा सुखी है। साँसारिक पुरुषों का मन सदा वासनात्मक विचारों, पहलुओं, कल्पनाओं, भोगों को ही ग्रहण करने के लिए उद्यत रहता है। वह सूक्ष्म दार्शनिक भावों को ग्रहण नहीं कर सकता वह शिथिल होता है और उसकी गति दार्शनिक भावों को ग्रहण करने के लिए उपयुक्त नहीं होती।

संसार के विषय भोग कभी तृप्त नहीं होते, अग्नि में घृत डालने के समान ही सदा बढ़ते जाते हैं। अतः भोग से दूर रहने में ही भला है। मन निष्काम कर्म, जप, प्राणायाम और दूसरे आध्यात्मिक साधनों से शुद्ध किया जा सकता है। चित्त शुद्धि के साथ दार्शनिक ग्रन्थों का अध्ययन स्वयमेव एक प्रकार की समाधी है क्योंकि मन इन प्रक्रियाओं से भोग से मुक्त रहता है। कठिन तप साधन करो। तप से वासनाएँ दग्ध हो जाती हैं और मन का संयम होता है। मन का संयम ही सच्ची सिद्धि है।


सुख दुःख के साथी

(लेखक-श्रीयुत महेश वर्मा)

सन् 1912 में टाईटेनिक नाम का एक बहुत बड़ा जहाज डूबा था। उसके साथ जो थोड़ी सी स्त्रियाँ डूबी थीं, उनमें से एक श्रीमती हसाडार स्टास भी थीं। उसके डूबने का कारण यह था कि वह अपने पति को नहीं छोड़ सकती थीं। प्रेम, तथा पारस्परिक सहानुभूति की यह कहानी इस प्रकार है-

उस दिन रात से ही जहाज में पानी आ रहा था। मल्लाह तथा कप्तान अस्त-व्यस्त हो इधर से उधर दौड़ रहे थे। जहाज के बचने की कोई आशा न थी। कम से कम स्त्रियों की जान बचा दी जाय—ऐसा सोचकर लाइफ बोटें उतारी जा रही थीं। मुसाफिर स्त्रियाँ घबराहट में लाइफ बोटों पर बैठ रहीं थीं। स्त्रियाँ काफी मात्रा में थीं अतः कुछ ही चुने हुए पुरुष लिए जा सकते थे। श्रीयुत स्टास इन चुने गये भाग्यशाली पुरुष मुसाफिरों में न आ सके। वे चुपचाप एक ओर शान्त मुद्रा से खड़े थे और यथा सम्भव भयभीत स्त्रियों तथा बच्चों को लाइफ बोटों में बैठने में सहायता दे रहे थे। वे बार-बार अपनी पत्नि को किसी लाइफ बोट में बैठकर प्राण रक्षा करने के लिए विवश कर रहे थे। वह बुढ़िया किसी प्रकार मानती न थी। श्रीयुत स्टास ने अन्त में अपनी प्यारी पत्नि की प्राण रक्षा के लिए उसे बलपूर्वक पकड़ कर नाव में धकेल दिया और नाव चल दी। उन्हें सन्तोष था कि अन्त समय में वे पति प्रेम की जिम्मेदारी का निर्भाव कर सके हैं। अपने बलिदान पर उन्हें सन्तोष था।

परन्तु ‘अरे! यह क्या? उनके मुख से निकल गया। उनकी बूढ़ी पत्नि गीले कपड़ों, हाँफती हुई जहाज के तख्ते पर चढ़ रही थी। उसमें न जाने कैसा बल आ गया था। इसके पूर्व कि उसका पति वहाँ तक पहुँच सके, वह डेक पर आ चढ़ी। वहाँ उसने अपने पति की बाँह पकड़कर अपनी बगल के साथ लपेट लीं और बोली-”हम वर्षों प्रेम और दुःख में इकट्ठे रहे हैं क्या अब मृत्यु समय में साथ न रहेंगे?”


आपकी आकांक्षाएं शुभ हों

ये यथा माँ प्रपद्यंते ताँस्तथैव भजाम्यहम्।

गीता 4।11

जो मुझको जिस रीति से भजता है मैं उसको उसी के अनुसार भजता हूँ। अर्थात् मुझको जो जैसा भजता है उसको में वैसा ही फल देता हूँ।

अर्थात् ईश्वर यह कहता है कि जो मुझको उत्तम भाव से देखता है उसको मैं उत्तम फल देता हूँ। जो माध्यम भाव से भजता है उसे मध्यम फल देता हूँ और जो अधम भाव से भजता है उसे अधम फल देता हूँ। यह कहकर ईश्वर हमको समझाता है कि कैसा लेना तुम्हारे हाथ में है। अगर अच्छा फल चाहो तो वह भी ले सकते हो और खराब फल चाहो तो वह भी ले सकते हो। तुमको अच्छा फल देना मेरी मर्जी पर नहीं है। मैं तो सिर्फ तुम्हारी भावना के अनुसार अर्थात् तुम्हारी इच्छा के अनुसार, तुम्हारे विचार के अनुसार और तुम्हारे काम के अनुसार तुमको फल देता हूँ। अगर तुम्हारी इच्छा और तुम्हारे विचार तथा तुम्हारे काम अच्छे हों तो तुम्हें अच्छा फल मिलेगा और तुम्हारी इच्छा तुम्हारे विचार और तुम्हारे खराब काम हों तो वो तुम्हें खराब फल मिलेगा। क्योंकि अच्छा या बुरा फल ईश्वर कुछ अपनी इच्छा से हमको नहीं देता बल्कि हमारी भावना के अनुसार देता है। इसलिए हमको अपनी भावना सुधारनी चाहिये और याद रखना कि अपनी भावना सुधारना ही अपना भाग्य फेरने की कुँजी है। इसी से महात्मा वशिष्ठ मुनि ने भगवान रामचन्द्रजी को उपदेश देते समय बतलाया है कि ज्ञान की सात कोटियां हैं। उनमें सबसे पहली शुभेच्छा है। याद रखना कि पहले शुभेच्छा आने के बाद ही ज्ञान की दूसरी सीढ़ी पर चढ़ सकते हैं क्योंकि शुभेच्छा ही स्वर्ग का मार्ग है और शुभेच्छा ही अपना भाग्य फेरने की कुँजी है इसलिए पहले के पवित्र पुरुष हमेशा सवेरे उठकर ईश्वर से यही प्रार्थना करते थे।

“सर्वे भवन्तु सुखिनः ‘सर्वे सन्तु निरामयाः।

“सर्वे भद्राणि पश्यन्तु ‘मा कश्चिदुःखमाप्तुपात्॥

सब जीव सुखी रहे, किसी जीव को किसी तरह का जरा भी दुःख न हो, सबका कल्याण हो और कोई भी दुःखी न हो।

इस प्रकार महात्मा लोग हमेशा सबका कल्याण चाहते थे और ईश्वर से यही प्रार्थना करते थे कि हे प्रभु हमको सद्बुद्धि दो। ऋषियों का बड़े से बड़ा मन्त्र गायत्री है। गायत्री हिन्दू धर्म का बड़े से बड़ा मन्त्र है। और सवेरे, दोपहर और शाम को, दिन में तीन बार उसका जप करने की शास्त्र में विधि है। इस मन्त्र का अर्थ क्या है? यह आपको मालूम है? इसका संक्षेप से संक्षेप सहज से सहज और सार अर्थ इतना ही है कि-ईश्वर हमको सद्बुद्धि दो।

त्रिकालदर्शी पवित्र से पवित्र और चतुर से चतुर हमारे पूर्वजों ने ईश्वर से और कुछ नहीं माँगा, इतना ही माँगा कि हे प्रभु। हमको सद्बुद्धि दो क्योंकि सद्बुद्धि भाग्य फेरने की कुँजी है सद्बुद्धि में सब तरह की उन्नति है सद्बुद्धि में स्वर्ग है। सद्बुद्धि में देवत्व है, और सद्बुद्धि में सब तरह की शिल्प कला है। और सद्बुद्धि में आप ईश्वर है और ईश्वर ज्ञान स्वरूप है इसलिए सद्बुद्धि सबसे बड़ी बात है। और याद रखना कि सबका भला हो ऐसी शुभेच्छा रखने से ही सद्बुद्धि खिल सकती है इसलिए शुभेच्छा हमारे धर्म की पहली सीढ़ी है। शुभेच्छा ज्ञान का दरवाजा और शुभेच्छा हमारा भाग्य फेरने की कुँजी है। अगर अपने भाग्य को अच्छा बनाना हो तो पहले शुभेच्छा रखना सीखना चाहिये।


Quotation

धोखा देना संसार की सबसे बड़ी निर्बलता है। छल-कपट करना संसार की सबसे बड़ी मूर्खता है क्योंकि धोखेबाजी से जितना लाभ उठाने की कोई व्यक्ति आशा करते हैं उससे अनेकों गुनी हानि उन्हें उठानी पड़ती है।


परमार्थी विश्व में स्वार्थी मानव


परमार्थी विश्व में स्वार्थी मानव

(पु. श्री. प्रतापनारायण जी, ‘कविरत्न’)

काम क्या खुद के आते वे, भूख बस औरों की हरते।

दूसरों के लिए ही सदा, पेड़ हैं फल पैदा करते॥

रक्त-सा अपना रस देते, लुटेरे भौरों को भी तो।

फूल मर मिटते हैं यों ही, सुगंध दे-देकर औरों को॥

पान खुद कभी नहीं खाती, बढ़ी है अशुभों को हरने।

खड़ी है नागरबेल यहाँ, पराया मुख शोभित करने॥

बोल अनमोल बोल करके, स्वयं को नहीं रिझाती है।

कोकिला औरों के हित ही, सुधा का स्रोत बहाती है॥

निरा पशु होकर भी बनता, बिछौना, पर-हित में मरता।

प्राणहर-मृगमद को भी तो, सर्वदा मृग पैदा करता॥

पहनता-खाता सिन्धु नहीं, खजाने औरों के भरता।

सजाने औरों को ही वह, मोतियों को पैदा करता॥

लाभ करते हैं औरों का, ताप हरते हर्षा-हर्षा।

कभी भी अपने लिए नहीं, मेघ वर्षाते हैं वर्षा॥

पराया हित करने को ही, चमकते सूर्य, चन्द्र, तारे।

और यह पृथ्वी-माता भी, झेलती कष्टों को सारे॥

लकड़ियों, नदियों, खानों को, धातुओं को भी जनने में।

हिमालय को है क्या मीठा, ढाल भारत की बनने में॥

प्यास अपनी न बुझाती है, आफतें लाखों सहती है।

भला औरों का करने ही, भला यह गंगा बहती है॥

अधूरे ज्ञानवान जो हैं, हाल यह उनका है सारा।

दशा पर उनकी तो देखो, जिन्होंने मानव तन धारा॥

नहीं सम्हाले लख चौरासी, योनियाँ खोकर के भी जो।

गए-बीते हैं पशुओं से, आदमी होकर के भी जो॥

स्वार्थ से सने हुए रहते, एक-को-एक ता रहा है।

मर रहे अपने मतलब में, एक-को एक खा रहा है॥

आज हम पर-हित-चिन्तन में, हो गए सब जीवों में कम।

आपके पार लगाए ही, नाथ! अब पार लगेंगे हम॥

—कल्याण

*समाप्त*