दुष्ट लोग उस मूर्खता से नहीं डरते, जिसे पाप कहते हैं। मगर विवेकवान सदा उस बेवकूफी से दूर रहते हैं। बुराई से बुराई ही पैदा होती है, इसलिए बुराई को अग्नि से भी भयंकर समझ कर उससे डरना और दूर रहना चाहिए। जिस तरह छाया मनुष्य को कभी नहीं छोड़ती वरन् जहाँ-जहाँ वह जाता है उसके पीछे-पीछे लगी रहती है। उसी तरह पाप कर्म भी पापी का पीछा करते हैं और अन्त में उसका सर्वनाश कर डालते हैं। इसलिए सावधान रहिए और बुराई से सदा डरते रहिए।
जो काम बुरे हैं उन्हें मत करो। क्योंकि बुरे काम करने वालों को अन्तरात्मा के शाप की अग्नि में हर घड़ी झुलसना पड़ता है। वस्तुओं को प्रचुर परिमाण में एकत्रित करने की कामना से, इन्द्रिय भोगों की लिप्सा से और अहंकार को तृप्त करने की इच्छा से लोग कुमार्ग में प्रवेश करते हैं। पर यह तीनों ही बातें तुच्छ हैं। इनसे क्षणिक तुष्टि होती है, पर बदले में अपार दुख भोगना पड़ता है। खाँड मिले हुए विष को लोभवश खाने वाला बुद्धिमान नहीं कहा जाता, इसी प्रकार जो तुच्छ लाभ के लिए अपार दुख अपने ऊपर लेता है उसे भी समझदार नहीं कह सकते।
इस दुनिया में सबसे बड़ा बुद्धिमान, विद्वान, चतुर और समझदार वह है जो अपने को कुविचार और कुकर्मों से बचाकर सत्य को अपनाता है, सत्मार्ग पर चलता है और सत्विचारों को ग्रहण करता है। यही बुद्धिमानी अन्त में लाभदायक ठहरती है और दुष्टता करने वाले अपनी बेवकूफी से होने वाली हानि के कारण सिर धुन-धुन कर पछताते हैं।
(उनमें सैकड़ों प्रकार के सच्चे, झूठे, चमत्कारों का सुविस्तृत रहस्योद्घाटन किया जायगा।)
अखण्ड-ज्योति कार्यालय में विगत छः वर्षों में कई हजार पत्र इस आशय के आ चुके होंगे कि वे योग के चमत्कारों को सीखना चाहते हैं, मथुरा कार्यालय में पधारने वाले सज्जनों में से भी सैकड़ों ने यही प्रस्ताव हमारे समक्ष रखे। पर अब तक हम इन पत्रों और प्रस्तावों को अस्वीकृत ही करते रहे। कारण यह था कि पिछले बीस वर्ष में इसी संबंध में हमने सुदूर प्रदेशों की यात्राएं की हैं। प्रचुर धन और समय लगाया है, इतना सब करने के बाद जो कुछ प्राप्त हुआ है वह ऐसा है जिसे न कहते बनता है और न गुप्त रखते।
हमें ऐसे अनेकों तथाकथित सिद्धों के साथ रहने का अवसर मिला है जो देवता की तरह पुजते थे और धन की जिन पर वर्षा होती थी। उनके पास एक से एक बढ़ कर योग विद्या के चमत्कार लोगों को दिखाई देते थे। हमने भी उन्हें देखा और सीखा, ऐसे कितने ही जादूगरों से हमारे निकट संपर्क रहें हैं जो हैरत में डाल देने वाले जादू के खेल दिखाकर लोगों को आश्चर्य चकित कर देते हैं और इसी कला से प्रचुर धन कमाते हैं। ऐसे सैकड़ों ही खेल हमने सीखें हैं। जिन्हें हमारा निकटवर्ती परिचय है वे जानते हैं कि अखंड-ज्योति संपादक ने चमत्कारों की गहरी जानकारी प्राप्त की है। इसीलिए वे पूछते भी थे। पर उत्तर देते समय, हमारी स्थिति साँप छछूँदर जैसी हो जाती थी। कारण यह है कि-वे सभी बातें बनावटी, नकली और जालसाजी से भरी हुई हैं। जो सिद्ध, योग के नाम पर बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ दिखाते हैं वे तथा जो जादूगरी विद्या की कलाएं हैं वे, सभी असत्य और चालबाजी पर अवलम्बित हैं। उनके रहस्य बताते समय हमें यह भय रहता था कि-कहीं यह व्यक्ति इन रहस्यों के आधार पर स्वयं कोई प्रपंच खड़ा कर जनता को भ्रम में डालने और लूटने का कार्य आरम्भ न कर दे। हमें ऐसे चमत्कारी करतब मालूम हैं जिनमें से एक दो को ही पकड़ लेने पर कोई आदमी देवता की तरह पुज सकता है और चाँदी के महल खड़े कर सकता है। जनता को ठगा जाना और उसे भ्रम में डालना एक बहुत बड़ा अनर्थ है, इस कार्य में हम किसी भी प्रकार निमित्त बनें तो यह हमारे हक में बहुत ही बुरा था। इस लिए हम किसी को भी उन बातों को बताने को तैयार न होते थे।
अभी थोड़े ही दिन हुए अजमेर के हमारे एक स्वजन श्री सत्य देव राव, हमारे यहाँ पधारे। उनसे इस विषय में दो रोज तक लम्बी बातचीत हुई। गंभीर विचार विनिमय के बाद यह निष्कर्ष निकला कि जो धूर्त लोग आजकल इन हथकंडों से अपना व्यापार चलाते हैं उनका मार्ग रोकने के लिए इन रहस्यों को सार्वजनिक रूप से प्रकट कर दिया जाय। जब वह बातें सर्व साधारण को मालूम हो जायेगी तो ठगी का द्वार बन्द हो जायगा, एक दो व्यक्तियों को जिन बातों के बताने में खतरा है वह सार्वजनिक रूप से प्रकट कर देने पर न रहेगा। इस निष्कर्ष के अनुसार सन् 47 का विशेषाँक हम चमत्कार अंक निकाल रहे हैं। चमत्कारों के प्रश्न को इस अंक में भली प्रकार हल कर दिया जायेगा।
कागज का कठोर कन्ट्रोल अब भी लागू है। लम्बी लिखा पढ़ी के बावजूद पृष्ठ बढ़ाने के लिए कागज नहीं मिला है। ऐसी स्थिति में जनवरी, फरवरी और मार्च के तीन अंकों में गत वर्ष की भाँति इस विशेषाँक को पूरा किया जायगा। जनवरी के अंक में वास्तविक योग की वास्तविक सिद्धियाँ, सच्चे चमत्कार जिन्हें हम सच्चा जीवन व्यतीत करने पर बड़ी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं बताये जायेंगे। जीवन को सुख शान्तिमय, उन्नत एवं सम्पन्न बनाने के लिए जो सिद्धियाँ आवश्यक हैं और जिन्हें प्राप्त करना हर पाठक का कर्त्तव्य है जनवरी के अंक में रहेंगी। फरवरी के अंक में योगी और महात्मा कहलाने वाले कुछ लोगों द्वारा जो नकली सिद्धियाँ दिखाई जाती हैं और जिनसे पूजा मान और धन लूटा जाता है उनका भंडाफोड़ किया जायगा। उनकी सारी चालाकियाँ खोल कर रख दी जायगी। मार्च के अंक में जादू के पचासों खतों का रहस्य प्रकट कर दिया जायगा।
अनेक प्रकार की कठिनाइयों विपत्तियों तथा तथा संकटों का प्रधान कारण निर्बलता है। निर्बल के ऊपर रोग, नुकसान, अपमान आक्रमण आदि के पहाड़ आये दिन टूटते रहते हैं। निर्बलता में एक ऐसा आकर्षण है जिससे विपत्तियाँ अपने आप आकर्षित हो जाती हैं। जिसका कुछ नहीं बिगाड़ा है वह भी निर्बल का शत्रु बन जाता है। बकरी की निर्बलता उसके प्राणों को घातक सिद्ध होती है। जंगली जानवर, मनुष्य यहाँ तक कि देवी देवता भी उसी के रक्त के प्यासे रहते हैं। बदला लेने की शक्ति रखने वाले और आसानी से हाथ न आने वाले सिंह व्याघ्र, भेड़िया आदि का माँस लेने की किसी की इच्छा नहीं होती। देवी देवता भी इनकी ओर आँख उठाकर नहीं देखते।
हिन्दू जाति बहुत समय से बकरी बनी हुई है। उस पर भीतर और बाहर से लगातार आक्रमण होते रहते हैं। पिछली शताब्दियों की ओर दृष्टिपात करते हैं तो प्रतीत होता है कि उसे बहुत समय से आक्रमणों का शिकार होना पड़ रहा है। यूनानियों ने हिन्दुस्तान पर हमला किया, सिकन्दर ने चढ़ाई करके काफी धन जन की हानि पहुँचाई। इसके बाद मुसलमानों के हमले शुरू हुए, एक के बाद एक हमला हुआ। नये-नये वंश आते रहे और मन चाही लूट खसोट करते रहे। धर्म विस्तार के लिए उन्होंने जो ज्यादतियाँ कीं, हिन्दू अबलाओं जिस प्रकार इज्जत लूटी वह किसी से छिपा नहीं है। इसके बाद अंग्रेज, फ्राँसीसी पोर्तगीज आदि के आक्रमण हुए उन्होंने भी अपने ढंग से हुकूमत चलाई और हुकूमत से मिलने वाले लाभों को खूब लूटा।
इतने बड़े देश पर, इतनी बहु संख्यक जाति पर थोड़े से लोगों ने इस प्रकार आक्रमण किये और ऐसी लूट खसोट मचाई इसे देखकर हैरत होती है। बड़ी संख्या को देखकर छोटी संख्या वाले खुद डर जाते हैं और दुर्व्यवहार करने का दुस्साहस नहीं करते, पर यहाँ तो बिल्कुल उलटा हुआ। मुट्ठी-मुट्ठी भर हमलावरों को तनिक से प्रयत्न में सफलता मिल गई। और वे काफी लंबे समय तक निधड़क होकर कब्जा किये बैठे रहें, यह सचमुच ही एक आश्चर्य की बात है।
आज साम्प्रदायिक दंगों का वातावरण गरम है। जगह-जगह से साम्प्रदायिक दंगों के दिल दहला देने वाले समाचार प्राप्त होते रहते हैं। जिनसे प्रतीत होता है कि थोड़े से गुंडे उबल पड़ते हैं और हजारों नर नारियों को गाजर मूली की तरह काट कर रख देते हैं। अपार धन जन की हानि कर देना उनके बायें हाथ का खेल है। हम अनाथ बालकों की तरह रोते चिल्लाते और इधर-उधर भागते हैं अखबारों में लेख छापते हैं प्रस्ताव पास करते हैं, और अन्त में माथा पीट कर चुप हो बैठते हैं। गुण्डों का हौसला बढ़ाते हैं, वे एक के बाद दूसरा आक्रमण अधिक जोर से करते हैं और अधिक उत्पात मचाते हैं। हर उत्पात के साथ उनकी पशुवृत्ति तृप्त होती है और लूट का माल हाथ लगता है। इस घटनाक्रम की बार-बार पुनरावृत्ति होती रहती है।
इस दुखद स्थिति पर गंभीरता पूर्वक विचार करने से ऐसा प्रतीत होता है कि हम या तो अशक्त हो गये हैं या हमने अपने को इस रूप में रखा है कि दूसरों द्वारा अशक्त समझे जाने लगे हैं। जरूरत से ज्यादा जो सीधे होते हैं वे बकरी की भाँति सताये जाते हैं। इसी कारण हिन्दू जाति को अनेकों प्रकार के संकटों का आये दिन सामना करना पड़ता है।
हिन्दू धर्म, दया, शान्ति, क्षमा और सहिष्णुता का धर्म है। हमारी धार्मिक शिक्षाएं शान्ति का उपदेश देती हैं। यह शिक्षा बहुत ही उच्च एवं महान हैं। यह जितनी उच्च हैं, उतने ही उच्चकोटि के व्यक्तियों द्वारा प्रयोग में लाये जाने योग्य हैं। जिस समय आर्य जाति सब प्रकार उन्नत अवस्था में थी चक्रवर्ती साम्राज्य उसके हाथ में था उस समय वह इन शिक्षाओं को चरितार्थ करने की स्थिति में थी, जिसमें बल है, जो दंड देने की योग्यता से सम्पन्न है उसी वीर को क्षमा शोभा देती है। पैर मैं चींटी काट ले तो मनुष्य चाहे तो उसे क्षणभर में मसल कर रख दे सकता है, ऐसी स्थिति में यदि वह उस चींटी के प्रति क्रोध न लावे और दया पूर्वक उसे क्षमा कर दे तो यह क्षमा उसके लिए शोभनीय है, प्रशंसा के योग्य है। परन्तु यदि कोई भयंकर भेड़िया आक्रमण कर और नृशंसता पूर्वक अपने बालकों को खाने लगे तो उसका प्रतिरोध न करना ‘क्षमा’ नहीं कही जा सकती, यह कायरता या अशक्यता ही ठहरेगी।
क्षमा वीरों का धर्म है, अशक्तों का नहीं। जो पूर्ण स्वस्थ है उसके लिए खीर, पुआ मोहनभोग, घी, रबड़ी का सेवन लाभदायक है पर जो रोग से चारपाई पे रहा है, उठकर खड़े होने की शक्ति जिसमें नहीं, उसके लिए वे पौष्टिक पदार्थ लाभदायक नहीं है, उसके लिए तो वे अहित कर परिणाम ही उपस्थित करेंगे। वे निर्बल जो अपने न्यायोचित अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते, अपनी आत्म रक्षा में सफल नहीं होते, यदि शान्ति और क्षमा की रट लगाते हैं तो समझना चाहिए कि अपनी निर्बलता और कायरता छिपाने का एक थोथा बहाना ढूँढ़ते हैं। मुकाबला करने को धर्म ग्रन्थों और राजकीय कानूनों का समर्थन प्राप्त है।
हमें अपनी दुर्गति को रोकना है तो बकरी की स्थिति से ऊँचा उठना होगा। किसी पर आक्रमण करने का किसी को सताने का उद्देश्य कदापि न रखते हुए भी आत्मरक्षा के लिए हमें शक्ति सम्पन्न बनना चाहिए आतताइयों के आक्रमण का मुँह तोड़ उत्तर देने की क्षमता हमारे अन्दर जैसे उत्पन्न होती जायगी वैसे ही वैसे अकारण सिर के ऊपर टूटते रहने वाले अनर्थों से छुटकारा मिलने लगेगा।
अंग्रेजी की एक कहावत है कि शक्ति का प्रदर्शन, शक्ति के प्रयोग को रोकता है। जिसके पास शक्ति होती है उसको उसका प्रयोग बहुत कम करना पड़ता है उसका परिचय पाकर ही दुष्ट लोग दहल जाते हैं और दुष्टता का दुस्साहस करने की हिम्मत नहीं पड़ती। पर जहाँ वह निधड़क होते हैं कि न तो हमारे आक्रमण का मुकाबला किया जायगा और न पीछे कोई दण्ड मिलेंगे वहाँ उनकी दुष्टता नंगे रूप में नाचने लगती है। ऐसी विषम स्थिति से बचने का एक मात्र उपाय शक्ति का परिचय देना ही है। बकरे की माँ कब तक दुआ माँगती रहेगी निर्बल की रक्षा बातूनी जमा खर्च से नहीं हो सकती।
धन कमाने और धर्म चर्चा करने की ओर आज हमारे समाज की प्रवृत्तियाँ विशेष रूप से हैं पर यह दोनों कार्य भी तब तक ठीक प्रकार नहीं हो सकते, जब तक अमन चैन का वातावरण न हो। अशान्त वातावरण का कारण शक्ति सन्तुलन का बिगड़ जाना है। इसे ठीक किये बिना जीवन की कोई दिशा स्थिर नहीं रह सकती, आज समय का तकाजा है कि हम अपनी निर्बलता और कायरता को निकाल फेंके। संगठन करें, शारीरिक बल बढ़ावें, आत्मरक्षा के लिए लाठी आदि की शिक्षा प्राप्त करें और मुसीबत के समय एक दूसरे की सहायता करते हुए आततायियों के आक्रमण को विफल बनाने की तैयारी करें। हम आत्मरक्षा के साधनों से जब सुसज्जित हो जायेंगे तभी बकरी की स्थिति से छुटकारा पा सकेंगे। बाहर से और भीतर से होने वाले आक्रमण से बचने के लिए शक्ति संचय के पथ पर अग्रसर होना चाहिए। शक्ति से ही शान्ति स्थापित होती है।
(श्री स्वामी शिवानन्दजी सरस्वती)
भगवान की व्यक्तिगत सूरतों को ईश्वर, अल्लाह, हरि, जेंहोवाह, स्वर्गीय-पिता, विष्णु, शिव आदि कहा जाता है।
वेदान्ती- लोग उन्हें ब्रह्म कहते हैं। हर्वट-स्पेन्सर उन्हें “जो न जाना जा सके” ऐसा कहते हैं। सकोपेन हेनर उन्हें ‘इच्छा’ के नाम से पुकारते हैं। ‘पूर्ण’, ‘पुरुषोत्तम’ आदि नामों से भी कुछ लोग उन्हें पुकारते हैं और स्पिनोजा उन्हें ‘तत्व’ कहकर सम्बोधन करते हैं।
भगवान को पहचानने में, धर्म में, विश्वास और उनकी पूजा में निष्ठा होनी चाहिये। यह विषय किसी गोष्ठी या क्लब में बैठ कर बहस करने का नहीं है। यह तो सत्य-आत्म की प्राप्ति का विषय है। यह मानव की सबसे गहरी आवश्यकता की पूर्ति है।
अतः अपने जीवन को उच्च बनाने के लिये धर्म की शरण लो। उसकी प्राप्ति के लिये प्रति-क्षण उद्योग करो और प्रत्येक पल धार्मिक बनने के लिये जीवित रहो। बिना धर्म के जीवन से मृत्यु बहुत अच्छी है।
स्वार्थान्धता को दूर करो। इच्छाओं का दमन करो। वहम या शंकाओं को हटाओ, हृदय को पवित्र करो। अपने विचारों पर मनन करो। अपने सिद्धान्तों पर विचार करो। जो गन्दगी या कूड़ा-करकट हो, उसे साफ करो और इस प्रकार भगवान् को प्राप्त करो। यही हर युग के सन्त-महात्माओं के उपदेशों का सार है। बुद्ध, ईसा, मुहम्मद शिन्टो, चैतन्यदेव, शंकर आदि के उपदेश को पढ़ो। तुम्हें साधना का यही सार मालूम होगा। यही भगवत्प्राप्ति का मार्ग है। भगवत्प्राप्ति ही तुम्हारा मुख्य-कर्त्तव्य है।
जिस प्रकार एक गाड़ी को कुशल हाँकने वाला अपनी गाड़ी में जुते चंचल घोड़ों की रास या लगाम के द्वारा रोक-थाम करता है, उसी तरह तुम भी अपनी चंचल-इन्द्रिय-रूपी घोड़ों को विवेक और वैराग्य की लगामों के द्वारा रोक-थाम करो। तभी तुम्हारी उस परब्रह्म भगवान या सुमधुर आत्मा तक पहुँचने की यात्रा सकुशल पूरी होगी और तुम्हें वास्तविक सुख-शान्ति प्राप्त होगी।
सदैव सत्य बोलो सत्य के पथ से कभी विचलित मन हो वो। यह ध्यान रक्खो कि सत्य का अभ्यास करने और पवित्र-जीवन बिताने के लिये ही तुम पैदा हुए हो। नेकी में ही सत्य का निवास है। सीधे खड़े हो, सुदृढ़ बनो, निर्भाव हो वो, सत्यवादी बनो और सत्य का अभ्यास करो। हर जगह सत्य का ही प्रचार करो।
वह व्यक्ति जो सदैव सत्य बोलता हो, जो दयावान हो, उदार हो, जो क्षमाशील और शान्त हो, जो हर प्रकार के भय से निर्भय हो, जिसने क्रोध और लालच को जीत लिया हो, जो परम पवित्र और प्रेमी हो, वही वास्तव में ब्रह्म है वही सच्चा ब्राह्मण है। जिसमें उपरोक्त गुण न हों, वे तो वास्तव में शुद्र ही हैं।
जब तक तुम अपने को बिना शर्त, बिना किसी स्वार्थ और निष्काम भाव से अपने को प्रभु की शरण में अर्पण नहीं कर देते, तब तक तुम उनकी कृपा के अधिकारी कैसे हो सकते हो? भगवान तुमसे कहीं अच्छी तरह यह बात जानते हैं कि तुम्हारा हित-अहित क्या है? पूर्ण रूप से अपना समस्त अपनत्व उन्हीं भगवान के पावन पाद-पदों में समर्पण करना मन्दिरों में जाकर दर्शन करने, घंटा घड़ियाल बजा कर पूजा करने और अन्य प्रकार की भगवत्सेवाओं से कहीं बढ़-चढ़ कर है। भगवान तुम्हारा ऊपरी दिखावा नहीं चाहते। वे तो तुम्हारा हृदय चाहते हैं। एक बार प्रेम से ऐसा कह दो-प्रभु! तेरी इच्छा पूरी करूंगा, मैं तेरा हूँ, मेरे पास जो कुछ भी है सभी तो तेरा ही है। किन्तु यह बात हृदय की अन्तरात्मा से निकले। सचाई और निष्ठा के साथ। शुद्ध प्रेम में मतवाले बन कर रुदन करो एकान्त में उनके लिए विलाप करो ऐसे ढंग से रोओ कि तुम्हारे सब वस्त्र तुम्हारी अश्रु-धारा से भीग कर सराबोर हो जाय।
अपनी आँखों को बन्द करो। दुनिया, शरीर और समस्त वासनाओं को नष्ट करो। सब और से मन को खींच लो। केवल एक प्रभु में लीन हो जाओ। तब असली अमरत्व के अमृत का पान करो।
भगवान श्रीकृष्ण का सच्चा भक्त अपने कृष्ण को समस्त संसार में देखता है जिस ओर उसकी दृष्टि जाती है, उधर ही उसे कृष्ण दिखाई देते हैं। उसे दिव्य योग के चक्षु और योग की दृष्टि प्राप्त हो गई है।
ऐसा सोचना कि तुम दुनिया से पृथक हो, भारी मूर्खता है। तुम दुनिया में हो और दुनिया तुम में है दुनिया के किसी प्राणी को कष्ट पहुँचाना तुम्हें अपने को ही कष्ट पहुँचाने के बराबर है। विश्व रंजन का हानि लाभ तुम्हारा ही हानि लाभ है। चन्द्रशेखर को प्रेम करना अपने को ही प्रेम करना है। दुई का भाव निकाल दो। दुई में मृत्यु है और एकत्व में असली जीवन है।
मित्रो! भगवान के दर्शन पाना बहुत कठिन नहीं है। उन प्रभु को प्रसन्न करना उतना अधिक कठिन नहीं है। वे सर्वव्यापी और घट-घट वासी हैं। वे तुम्हारे हृदय में निवास करते हैं। उन्हीं का सदैव चिन्तन करो। उनके साकार और सगुण रूप का ही ध्यान करो। नित्य ऐसी प्रार्थना करो-हे भगवान! मुझ पर दया करो। मेरी अन्तः दृष्टि खोल दो। मुझे दिव्य चक्षु प्रदान करो। मुझ पर ऐसी अनन्त दृष्टि कृपा कर दो कि मैं विश्व रूप दर्शन कर सकूँ। भक्त गण आपको पतित-पावन कह कर आपके गुणों का गान करते हैं। भक्तवत्सल! दीनदयाल!! मुझ पर भी दया करो। हे दयासागर! जिस प्रकार पक्षी अपने बालकों को अपने पंखों के भीतर छुपा कर रक्षा करते हैं, उसी प्रकार तुम भी मुझे अपनी चिर-शान्तिदायिनी शरण में लेकर मेरा उद्गार करो।
ऐसी प्रार्थना सच्चे हृदय से, प्रेम और निष्ठा से नित्य करने पर अवश्य ही तुम्हें भगवान के दर्शन होंगे। तब तुम सा भाग्यवान फिर कौन होगा?
(पं.- दीनानाथ भार्गव ‘दिनेश’)
कर्मयोग के मार्ग की श्रेष्ठता यही है कि इसमें लड़ते-2 मृत्यु से लड़ जाने पर स्वर्ग निश्चित हो जाता है और विजय प्राप्त कर लेने पर संसार का राज्य मिलता है।
संसार कायर पुरुषों के रहने का स्थान नहीं है। विजयी ही इसके सुखों का उपभोग कर सकते हैं। विजयी पुरुष ही सर्वतन्त्र स्वतन्त्र होकर संसार का शासन करते हैं। हिन्दूधर्म शास्त्रों में कहीं भी कायरता और ग्लानि पूर्ण दीन हीन जीवन को स्थान नहीं दिया गया है पर आश्चर्य तो यह है कि आज हिन्दुओं ने ही आत्म सम्मान के मान का मस्तिष्क झुका दिया है।
पृथ्वी का राज्य पाने के लिए पृथ्वी के सुख का त्याग, शान्ति, क्षमा, मैत्री और करुणा के मिथ्या भावों ने भारतीयों के गौरवपूर्ण मुकुट की मणि को कान्तिहीन कर दिया है। योगी अरविन्द के शब्दों में गीता में वर्णित मार्ग को त्याग कर, उससे दूर शान्तिमय आश्रम में पहाड़ की गुफा में या निर्जन स्थान में गीता पथ के पथिक भगवान का दर्शन लाभ नहीं करते। वे तो बीच मार्ग में ही कर्म के कोलाहल में (युद्ध में) इस स्वर्गीय दीप्ति से जगत को आलोकित करते हैं।
विश्व भाषण-संग्राम क्षेत्र है, कौरवों तथा पाण्डवों की वृहत सेना का मध्य काल है, शस्त्र प्रहार हो रहा है, जो कर्त्तव्य कर्म में लगे हुए हैं, वे इधर-उधर विचलित नहीं होते। विजयी होकर ऐसे पुरुष ही संसार के सुख को भोगने के अधिकारी हैं। विकारी भावों में संसार विकारी हो सकता है परन्तु हमारे शास्त्र तो कहते हैं- ‘वीर भोग्या वसुन्धरा’-वीर ही पृथ्वी का राज्य भोगते हैं। भारत वर्ष की स्त्रियाँ धर्म राज तक से कहने का सामर्थ्य रखती थीं-
“पराक्रम के आश्रय में रहने वाली समृद्धियाँ विषाद के साथ कभी नहीं रहतीं।”
(श्री डा. बनारसीदास जैन)
क्रोध एक भयंकर शत्रु है। क्रोध में आकर मनुष्य अपना सर्वनाश कर बैठता है। किसी ने ठीक ही कहा है कि “जिस प्रकार बवंडर अपने प्रकोप से पेड़ों को चीरता फाड़ता हुआ प्रकृति की आकृति को बिगाड़ देता है या भूकम्प अपने क्षोभ से बड़े-2 नगरों को उलट-पुलट देता है ठीक उसी तरह मनुष्य का क्रोधावेग अपने आसपास अनेक उत्पात खड़े कर लेता है। संकट और विनाश तो उसके सिर पर ही मंडराया करते हैं।” इससे स्पष्ट है कि जहाँ क्रोध है वहाँ शान्ति नहीं रह सकती। गीता में कहा है कि “क्रोधात् भवति सँमोह सँमोहात् स्मृति विभ्रमः। स्मृति भ्रंशाद बुद्धि नाशो बुद्धि नाशात् प्रणश्यात”॥ अर्थात् जिस मनुष्य पर क्रोध का भूत सवार हो जाता है उसकी विवेक बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। वह सुपथ को त्याग कुपथ को ग्रहण करता है और अन्त में नाश को प्राप्त होता है। क्रोधी व्यक्ति अन्धे और बहरे की भाँति चेतन रहते हुए भी अचेतन के समान कोई भी कर्त्तव्य स्थिर करने में असमर्थ होता है। क्रोधी मनुष्य को उचित अनुचित का ध्यान नहीं रहता। वह सदा डाँवा-डोल रहता है, कभी-कभी तो वह पागल होकर मर तक जाता है। क्रोधी मनुष्य शारीरिक, मानसिक, नैतिक या अध्यात्मिक किसी भी प्रकार की उन्नति नहीं कर सकता।
विद्वानों का कथन है कि इस मनोविकार के प्रबल हो जाने पर खून में एक प्रकार का विष पैदा हो जाता है जिससे क्रोधी मनुष्य को बहुत हानि होती है। यही वजह है कि क्रोधी प्रायः दुर्बल रहते हैं। क्रोधी मनुष्य का खून इतना जहरीला हो जाता है कि उसके उसके खून की एक बून्द खरगोश आदि जीवों के शरीर में पिचकारी द्वारा डालने से उनकी दशा बड़ी खराब हो जाती है। जिस खरगोश के शरीर में उसका प्रयोग किया जाता है वह दूसरे खरगोश को फाड़ खाता है और कभी-कभी मर तक जाता है। इसी से क्रोध आत्मघात के तुल्य है। क्रोध में आकर मनुष्य ऐसे-2 काम कर डालता है कि जिससे उसे बाद में पछताना पड़ता है तथा भयंकर सन्ताप सहना पड़ता है।
क्रोधी मनुष्य कभी स्वस्थ नहीं रह सकता। उसका चेहरा पीला पड़ जाता है। शरीर सूखकर काँटा हो जाता है। पाचन-शक्ति तो बिल्कुल ही बिगड़ जाती है जिसके फलस्वरूप शरीर रोगों का घर बन जाता है। क्रोधी मनुष्य की नाड़ी की गति तेज हो जाती है। रगें ऊपर की ओर खड़ी हुई दिखाई देती हैं। क्रोध वेश में वह दाँत पीसने लगता है, उसकी साँस जल्दी-2 चलने लगती है, भौएं और हाथ सिकुड़ने लगते हैं। उसका शरीर रोमाँचित हो जाता है, वाणी बदल जाती है, चेहरा लाल हो जाता है, जुबान खुश्क हो जाती है और खून में गर्मी पैदा हो जाती है। हारवर्ड मेडीकल कालेज के प्रोफेसर डाक्टर वाल्टरकेनिन लिखते हैं कि “मनुष्य के दोनों गुर्दों के ऊपर चने के दाने के बराबर दो छोटी-2 ग्रन्थियाँ होती हैं जिनमें से एक प्रकार का पदार्थ निकलता है जिसको एडरेनलिन (्नस्रह्द्गठ्ठड्डद्यद्बठ्ठ) कहते हैं। यह पदार्थ जब खून में मिलकर जिगर में पहुँचता है तो वहाँ जमे हुये गलाईकोजन (त्रद्यब्द्गशद्दद्गठ्ठ) को शक्कर में बदल देता है। यह शक्कर खून में मिल कर नाड़ियों के द्वारा शरीर के तमाम हिस्सों में पहुँच जाती है जो रोग और पट्ठो में बहुत खिंचावट पैदा करती है।
एक प्रसिद्ध विद्वान “सेकेका” का कथन है कि “क्रोध दुर्भाग्य की तरह जिस पर सवार होता है उसका विनाश करके छोड़ता है। यह लकवे की तरह अन्त में अंगों को शक्तिहीन करके छोड़ता है। क्रोधावेश में प्रथम तो मनुष्य नशे की तरह उत्तेजित होता है और अपने अन्दर कई गुनी कार्य-शक्ति अनुभव करने लगता है, किन्तु अन्त में क्रोध का नशा उतरते ही वह निर्बल हो जाता है। शराबी की तरह वह दुबला-पतला हो जाता है, मस्तिष्क एवं विचार शक्ति क्षीण हो जाती है। यह क्षणभर का आवेग दीर्घ कालीन पश्चाताप का कारण बन जाता है।”
बाइबिल में भी लिखा है कि है कि “जो मनुष्य क्रोधावस्था में शयन करता है मानो वह एक विषधर सर्प को अपनी बगल में दबाकर सोता है।” सचमुच क्रोध विषधर से किसी प्रकार कम नहीं है। विषधर तो शरीरान्त करता है किन्तु क्रोध धीरे-धीरे कष्ट पहुँचाता हुआ देह एवं आत्मा दोनों का पतन करता है। इसका कष्ट चिरकालीन होता है। अतः यह सर्प से भी बढ़कर भयंकर शत्रु है।
केलूलैंड के डॉक्टर अरोली ने इस संबंध में कई तरह के परीक्षण किये हैं। उनका कथन है कि खून में शक्कर की अधिकता के कारण कुछ ऐसे तेजाब पैदा हो जाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक और घातक हैं। यही वजह है कि उन्नतिशील पाश्चात्य देशों में शारीरिक दण्ड की घृणित प्रथा स्कूलों से उठती जा रही है। किन्तु खेद के साथ कहना पड़ता है कि हमारे देश में अब भी इस घातक दण्ड पद्धति का बोलबाला है जिसके फलस्वरूप बालक अपना विकास पूर्णरूपेण नहीं कर सकते। क्या माता-पिता और शिक्षक इन नवीन गवेषणाओं से फायदा उठाकर निर्दोष बालकों को डराना या उन पर हाथ उठाना एक अक्षम्य अपराध समझेंगे?
क्रोध से बचने के उपाय-
क्रोध से बचने का स्थायी और वास्तविक उपाय तो यही है कि हम क्रोध के कारण को मालूम करने की कोशिश करें। क्रोध का आरम्भ या तो मूर्खता से या दुर्बलता से अथवा मानव स्वभाव से अनभिज्ञता के कारण होता है। अब कोई व्यक्ति हमारा कहना नहीं मानता या हमारी इच्छा के विरुद्ध काम करता है तो हम आपे से बाहर हो जाते हैं और उस पर बेतहाशा बरस पड़ते हैं। हम यह समझने की तकलीफ ही नहीं करते कि हमें दूसरों को अपनी इच्छानुसार चलाने का क्या अधिकार है। हम अपने रोजमर्रा के अनुभव से भली प्रकार जान सकते हैं कि प्रत्येक मनुष्य की वृत्ति दूसरे मनुष्य से भिन्न होती है ऐसी हालत में सभी मनुष्य एक ही लाठी से कैसे हाँके जा सकते हैं। मनोविज्ञान के इस अटल सिद्धाँत को समझ लें तो हम बहुत हद तक क्रोध के चंगुल में पड़ने से बच सकते हैं और आनन्द से जीवन व्यतीत कर सकते हैं। सर्वसाधारण के लाभार्थ कुछ सरल उपाय भी नीचे दिये जाते हैं जिन पर अमल करने से क्रोध को शान्त किया जा सकता है।
जब क्रोध के उत्पन्न होने की तनिक भी सम्भावना हो तब हमें सावधान हो जाना चाहिए या उस समय कहीं चले देना चाहिए। अगर क्रोध का आक्रमण हो चुका हो तो कुछ देर के लिए उस प्रसंग को बदल देना चाहिए तथा किसी दूसरे मनोरंजक विषय या अन्य काम की ओर अपने चित्त को लगाने का प्रयत्न करना चाहिए। मौनावलम्बन तो क्रोध शाँति का एक अचूक साधन है। एक गिलास ठण्डा जल पी लिया जावे या स्नान कर लिया जावे तो भी क्रोध पूर्णरूपेण शान्त नहीं तो घट अवश्य जाता है। जैसे जलती हुई लकड़ी पर पानी डालने से उसका वेग कम हो जाता है उसी प्रकार गुस्से में ठण्डा जल पीने से उसका वेग कम हो जाता है। एक बात और है-अगर हम दूसरों की आलोचना न करके अपनी ही आलोचना करने की आदत डाल लें तो क्रोध वेग से बहुत कुछ छुटकारा पा सकते हैं। पर अफसोस तो यह है कि हम अपनी आँख का तो शहतीर भी नहीं देखते किन्तु दूसरे की आँख का तिल भी हमें खटकने लगता है। यदि क्रोध से छुटकारा पाना है तो हमें अपनी इस बुरी आदत को बदलना होगा, दूसरों पर जबरन अपनी बात लादने का मोह छोड़ना होगा और सबके साथ मृदुता से पेश आना होगा क्योंकि किसी ने ठीक ही कहा है कि मधुर जवाब क्रोध को दूर भगाता है।
उद्योगी पुरुष अपना मार्ग ढूँढ़ता या उसे स्वयं बना लेता है।
(श्री दौलतरामजी कटरहा बी. ए. दमोह)
वह धर्म जो संसार के कर्त्तव्य-कर्मों को त्याग करने का उपदेश देता है, जन साधारण का धर्म नहीं हो सकता। बौद्ध-धर्म अधिकतर संन्यासियों का धर्म था तथा स्वयं भगवान बुद्ध ने भी अनेकों शिष्यों को पराजित कर अपने धर्म में दीक्षित किया था। संसार को दुःख रूप और सारहीन बताकर संसार से दूर भागने का उपदेश करने वाली फिलॉसफी वाला यह धर्म साधारण जन समाज की आवश्यकताओं, आशाओं तथा आकाँक्षाओं की पूर्ति न कर सकता था, यही कारण है कि वह थोड़े से समय तक अपनी अलौकिक छटा और चमक-दमक दिखाकर उसका मूलरूप संसार से विलीन-प्रायः हो गया।
संसार के कर्त्तव्य-कर्मों को न त्यागने का अर्थ संसार से आसक्ति नहीं है। जीवन का अर्थ है विकास और अनुभव की प्राप्ति। संसार में रहकर जिन्होंने सत्य तथा अहिंसा आदि व्रतों का निर्वाह किया है उन्हीं के द्वारा इन गुणों की जीवन में व्यावहारिकता और साध्यता निष्पन्न हुई है उन्होंने ही यह सिद्ध कर दिखाया है कि जीवन में पूर्ण रूप से इन गुणों का निर्वाह करना सम्भव है। उन लोगों ने जो संसार को झंझट समझ बैठे थे, इन गुणों को व्यवहार में लाकर संसार के सामने आदर्श उपस्थित नहीं किया। इनकी व्यावहारिकता को सिद्ध करने वाले तो जनक, युधिष्ठिर, हरिश्चन्द्र और शिवि आदि राजर्षि थे। संसार में रहकर जीवन रूपी पहेली को किस तरह सुलझाना चाहिए यह हमें इन्हीं महानुभावों के अनुभवों से ज्ञात हो सकता है। कर्म-क्षेत्र से दूर कर शील और चरित्र का कोरा उपदेश करने वाले लोगों की बातें उतनी हृदय-ग्राहिणी नहीं हो सकतीं जितनी कि इनकी। वस्तुतः संसार-क्षेत्र में प्रवेश करने पर ही हम अपने अनुभवों और आध्यात्मिक सिद्धान्तों को व्यवहार में लाकर हृदयंगम कर सकते हैं। सिद्धान्तों का अन्यथा कोई व्यर्थ नहीं। संसार से भागने पर यह नहीं हो सकता। इसीलिए तो यह संसार व्यवहार-क्षेत्र, प्रयोग-क्षेत्र या कर्म क्षेत्र है। संसार से भागने का अर्थ है संसार से भयभीत होना।
भगवान शिव कामजयी हैं। वे गृहस्थ हैं और कामोद्दीपक वस्तुएं पास रहते हुए भी विकार-शून्य ही रहते हैं। वस्तुतः विषयों के समीप रहते हुए भी विकार-शून्य रहने वाला ही विषयों को जीतने वाला तथा जितेन्द्रिय है तथा धीर पुरुष वही है जिसका चित्त विकार का हेतु आलंबन विद्यमान रहते हुए भी विकृत नहीं होता। ऐसी धीरता गृहस्थ ही प्राप्त कर सकते हैं अतएव केवल गृहस्थ ही कामजयी तथा पूर्ण होने का दावा कर सकता है। गृहस्थ जीव से ही पूर्णता प्राप्त हो सकती है इसीलिए तो गृहस्थ धर्म सर्व श्रेष्ठ है और उसकी इतनी महिमा है।
जीवन की सफलता इसी में है कि हम जीवन को सर्वांग-पूर्ण बनाएं और उसका पूर्ण विकास करें। हमारे जीवन के चार पहलू हैं-आध्यात्मिक, मानसिक शारीरिक और साम्पत्तिक। इन चारों दिशाओं में उन्नति करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य है और तभी हमारा विकास सर्वांगीण कहला सकता है। उस व्यक्ति का जीवन हमारे लिए आदर्श नहीं हो सकता जो कि एक महान विद्वान है किन्तु जिसका चरित्र सन्देहास्पद है या जिसकी शारीरिक सम्पत्ति अत्यन्त क्षीण है। इस पुरुष का जीवन तो एकाकी है और इसका मिलान तो हम उस चित्र से कर सकते हैं जिसमें सिर तो भारी भरकम बनाया गया हो किन्तु सारा शरीर काँटे जैसा हो। अतएव संसार त्यागने पर हमारा जीवन इसी चित्र जैसा होगा।
संसार के त्याग का अर्थ है उसका सदुपयोग और तज्जन्य अनुभवों की जीवन में न्यूनता। एक संन्यासी का जीवन जिसने कभी गृहस्थाश्रम में प्रवेश नहीं किया पूर्ण नहीं है और वह हमारे लिये पूर्णतया अनुकरणीय नहीं हो सकता। उसे साँसारिक अनुभव नहीं, जीवन का उसका अनुभव अपूर्ण है, एकाँगी है, एकदेशीय है, भले ही वह एक प्रख्यात संन्यासी ही क्यों न हो वह अतिवादी है और सम्भव है कि उसके अनेकों विचार संतुलित न हों।
सफल जीवन का अर्थ है अनेकों विरोधाभासों का समन्वय, संतुलन और सामंजस्य। जिसे सुख और दुख दोनों का ज्ञान है, जो जीवन की सब अवस्थाओं में से होकर गुजरा है, जिसका अनुभव सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक है वही हमारे लिये आदर्श हो सकता है। भगवान ईसा को गृहस्थी का अनुभव नहीं हुआ था और न उन्हें भगवान बुद्ध की न ही कभी इस बात का ज्ञान हुआ कि अपने प्राण प्रिय परिजनों के मोह को त्यागना कितना कठिन होता है। भगवान बुद्ध को भी ऐसे दुष्ट और हत्यारे लोगों के बीच में धर्म-प्रचार करने का अनुभव नहीं हुआ था जैसा कि महात्मा ईसा और पैगम्बर मुहम्मद साहिब को। सुकरात जैसे महात्मा को जेंटिपी जैसी कुर्कशा स्त्री के साथ समस्त जीवन यापन करने में जो विशेष अनुभव हुआ वह भगवान राम को नहीं हुआ। अतएव हम देखते हैं कि कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितना ही महान क्यों न हो सब परिस्थितियों में से होकर नहीं गुजर सकता और न उसे जीवन का सर्वांगीण अनुभव ही हो सकता है। ऐसी दशा में केवल एक ही मनुष्य के जीवन को पूर्ण समझ बैठना, उसी एक की वाणी को ही, उसी एक की रची पुस्तक को ही, मान्य विश्वसनीय या रमणीक मानना, उसी एक को ही आदर्श मान बैठना कितनी भारी भूल होगी और क्या हमने कभी सोचा है कि यही भूल हमारे साम्प्रदायिक झगड़ों के मूल में विद्यमान रही है।
प्राचीन काल के हिन्दुओं ने अपने जीवन को चार भागों में बाँट लिया था। यह बड़ी बुद्धिमत्ता का बात थी। उन्हें जीवन की सभी परिस्थितियों और पहलुओं का ज्ञान हो जाता था और इस तरह वे अपने जीवन और अनुभव को पूर्ण बनाया करते थे संसार में रहते हुए संसार से विरक्त रहने की कल्पना ऐसे ही लोगों को ही सकती थी।
भगवान कृष्ण ने अपनी गीता में स्थान-स्थान पर कर्मयोग की शिक्षा दी है। उन्होंने हमें वासनाओं के शमन करने का आदेश दिया है। वासनाओं को त्यागे बिना संसार को त्यागने की बात उन्होंने कभी नहीं कही। उनकी यह उक्ति कि “जो पुरुष मन से भोगों का चिन्तन करता है तथा इन्द्रियों को उनमें बलात् रोकता है, मिथ्याचारी कहलाता है,” इस सम्बन्ध में ध्यान देने योग्य है। भगवान का आदेश है कि हम तब तक कर्म करते रहें जब तक कि हमारी वासनाएं परिमार्जित नहीं हो जाती और हम तब तक संसार को छोड़ने की बात न सोचें जब तक कि हमें भक्तिभाव का आधिक्य ही एतदर्थ प्रेरित तथा बाध्य नहीं करता।
संन्यासी कहता है कि संसार को छोड़ो, गृहस्थ कहता है गृहस्थी में ही बने रहो दोनों अपने अपने दृष्टि-कोण से बात करते हैं, दोनों अपना-अपना अनुभव सामने रखते हैं। अतएव न तो पूर्णतया यह सच है न वह। बेचारे छः जन्मांधों में से प्रत्येक ने हाथी को भिन्न-भिन्न आकर का बताया था। इसीलिए प्रश्न का सुलझाव यही है कि हम समन्वय की नीति का या मध्य मार्ग का अनुकरण करें। संन्यासी का तात्पर्य वासना-त्याग से है और गृहस्थ का गृहस्थ-धर्म पालन से। अतएव हमारे जीवन का लक्ष्य वासनाओं का त्याग है संसार का नहीं। हमें अपने प्रियजनों का मोह त्यागना है न कि प्रियजनों को ही। हमें भोजन को नहीं त्यागना है बल्कि त्यागना है स्वाद-सुख को, उसमें सुख की कल्पना भावना को। वस्तु को मत त्यागो, त्यागो उसकी आसक्ति को।
कच्चे सूत के पलंग पर बैठने वाला मनुष्य जैसे नीचे गिर जाता है, उसी प्रकार विषय-सेवन के आश्रय में जाने वाला नीचे ही गिरता है अर्थात् उसकी अधोगति होती है।
धर्म का रूप प्रेम है और अधर्म का रूप है द्वेष। मानव-समाज में शान्ति, सद्भावना और भ्रातृत्व को अक्षुण बनाए रखना ही धर्म का ध्येय है। जो लोग सांप्रदायिकता के चक्कर में पड़ कर इसके विपरीत उपदेश करते हैं परस्पर दुर्भावना और वैमनत्य फैलाते हैं वे संसार में धर्म की सेवा नहीं, प्रत्युत पाप को पुष्ट करते हैं। सच पूछिए तो मानव मात्र के लिए धर्म एक ही है। जितने मुख उतने धर्म-यह साम्प्रदायिकता का ही परिणाम है। आज धर्म के नाम पर जैसी धाँधली मची हुई है, उसे देख कर मानव समाज का एक वर्ग धर्म का अस्तित्व ही मिटाने पर तुल गया है। उसकी धारणा यह है कि यदि धर्म से मानवी प्रेम, एकता और बन्धुत्व के बदले परस्पर द्वेष-दुर्भाव और लड़ाई-झगड़े होते हैं तो उसका जितना शीघ्र लोप हो जाये मनुष्य समाज के लिए उतना ही कल्याणकारक होगा। वास्तव में धर्म वह चीज है, जो आत्मा को परमात्मा का बोध कराती है। किन्तु आज संसार की विचित्र दशा है। धर्म के नाम पर अनेक सम्प्रदाय बन गए हैं, एक सम्प्रदाय अपने को दूसरे सभी सम्प्रदायों से श्रेष्ठ समझता है और अपने अनुयायियों को यह शिक्षा देता है कि उसके द्वारा ही ईश्वर और मोक्ष की प्राप्ति होगी और अन्य सम्प्रदाय वाले नरक में जायगा। इसलिए तो स्व. मौलाना मुहम्मद अली जैसे विद्वान तक का विचार था कि नीच से नीच मुसलमान भी महात्मा गाँधी से श्रेष्ठ है। इस प्रकार की संकुचित साम्प्रदायिक भावना से ही परस्पर संघर्ष होता रहता है।
लोग यह नहीं देखते कि किस मनुष्य का चरित्र कितना ऊंचा है। उसने साधना द्वारा कितनी आत्मोन्नति कर ली है, प्रत्युत साम्प्रदायिकता की दूरबीन चढ़ा कर वे अपने अपने मजहबी ट्रेड मार्क ही सर्वोपरि कहने में बद्धपरिकर रहते हैं। कभी-कभी उसका वीभत्स रूप देख कर सहसा हृदय से यह उद्गार निकल पड़ता है कि यदि यही धर्म है तो अधर्म की परिभाषा क्या होगी।
साम्प्रदायिकता के इस गर्हित रूप को देख कर हमारे देश के कुछ विवेकशील नव युवकों को धर्म से घृणा हो रही है। और वे उसका हस्ती मिटाने पर तुल गये हों इसमें विण्मय की बात ही क्या है? पुरातन काल में जहाँ वृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह घी, विद्या, सत्य और अबोध को जीवन में घटाना ही धर्म समझा जाता था वहाँ आज नाना प्रकार के सम्प्रदायों की सृष्टि हो जाने के कारण अशान्ति, कलह, उपद्रव और पारस्परिक विग्रह ही मजहबी दीवानों को धर्म बना हुआ है। संसार में ऐसे कौन से कुकृत्य है, जो धर्म के नाम पर नहीं हुए। यूरोप की साम्प्रदायिकता का इतिहास खूनी घटनाओं से रंगा हुआ है। जब वहाँ पर आडम्बर और अन्ध विश्वास के विरुद्ध कुछ विवेकशील व्यक्तियों ने विरोध की आवाज उठाई तो उनको जीते जी आग में इस नृशंसता से जलाया गया जिसका वर्णन पढ़ कर रोम-रोम काँप उठता है। इस बीसवीं सदी में भी कुछ दिन पहले अफगानिस्तान में एक ऐसी घटना घटी थी, जिसे सुन कर सारी दुनिया दंग रह गई। कुरान शरीफ पर अविश्वास करने के कारण दो आदमियों का आधा शरीर जमीन में गाड़ दिया गया और फिर जो कोई उस रास्ते गुजरता उन अधगड़े व्यक्तियों पर पत्थर मारते मारते जाना सवाब समझता था। इस प्रकार उनके शरीर पर पत्थरों का ढेर लग गया। इस नृशंसता की महात्मा गाँधी ने बड़ी आलोचना की थी। मजहब के नाम पर इस नृशंस कृत्य को मानवी नहीं दानवी बताया था।
अब संसार के विवेकशील पुरुष यह समझने लगे हैं कि धर्म का सम्बन्ध आत्मा से है और शरीर का सम्बन्ध समाज से और इसलिए वे देश और समाजहित के कार्यों में धर्म का दखल देना उचित नहीं समझते। हमारे पड़ोस जापान में भी इसी नीति का अवलम्बन किया जाता है। एक ही परिवार में एक भाई बौद्ध है तो दूसरा कन्फ्युशन, तीसरा ईसाई है तो चौथा नास्तिक किन्तु इससे उनकी राष्ट्रीयता और पारम्परिक प्रेम में कोई अन्तर नहीं आता। मुस्तफा कमाल अतातुक ने तो टर्की का रूप ही बदल दिया, खिलाफत का जनाजा निकला और यह घोषणा कर दी कि राज्य से धर्म का कोई सम्बन्ध नहीं है इसका परिणाम यह हुआ कि जो टर्की यूरोप का मरीज समझा जाता था, आज वही अपने शौर्य, साहस और शक्ति से संसार को विस्मय में डाल रहा है। मिश्र, ईरान, ईराक और चीन की अवस्था भी बिल्कुल बदल चुकी है। वहाँ भी राष्ट्रवाद के समक्ष धर्म को गौण माना जाता है। अमानुल्ला ने अफगानिस्तान को भी नए साँचे में ढालने का प्रयत्न किया था, किन्तु विदेशियों के दलालों ने मदान्धों को उकसा कर उसकी मुराद पूरी न होने दी। इस प्रकार इस समय विश्व का नक्शा ही बदल गया है। हर देश और राष्ट्र जमाने की दौड़ में सबसे आगे रहना चाहता है, किन्तु हमारा अभागा देश अटल चट्टान की नाई अपने पुराने स्थान से जरा हिलना डुलना नहीं चाहता। दासत्व ने उसे नितान्त अकर्मण्य और चेतना रहित बन दिया है। प्रायः यह देखने में आता है कि पराधीन राष्ट्रों में ही मजहबी मामलों में ज्यादा दिलचस्पी ली जाती है। विदेशी शासक राज्यतन्त्र का संचालन करते हैं, इसलिए दास प्रजा प्रायः धर्म के नाम पर तर्क और वितर्क और लड़ाई-झगड़े करने में ही मशगूल रहती है।
हम धर्म के नाम पर धर्म-द्रोह का कटु फल काफी मात्रा में चख चुके हैं और अब भी चख रहे हैं। इसने हमें सहिष्णुता के स्वर्गीय सरोवर से निकाल कर नरक की नाली में नहलाया है, कल्याण पथ से हटाकर कुमार्ग का पथिक बना दिया है स्वाधीनता के स्वर्ग से धकेल कर गुलामी के गर्त में गिराया है, सद्भाव की सुगन्धि के बदले द्वेष की दुर्गन्ध में बोर दिया है, सौहार्द की सुधा छुड़ा कर वैर-विरोध का विष पिलाया है। हम अपनी सांप्रदायिक मनोवृत्ति के कारण दुनिया में बुरी तरह से बदनाम हो रहे हैं। विश्व की प्रजा हमें नफरत की निगाह से देखती है और सोचती है कि हम सदा गुलाम रहने योग्य हैं। अब भी समय है, सजग हो जाना चाहिये, धर्म के असली रूप को पहचानना चाहिए। धर्म का यह धन्धा नहीं है कि वह मानव समाज में फूट और बैर फैलावें, वह तो स्नेह, सद्भावना, सहनशीलता, सौहार्द और सात्विक सिद्धान्तों का स्रोत है, वह मानव जीवन को उच्च और पवित्र बनाने का साधन है। जब हम धर्म के विशुद्ध रूप को जान कर तदनुकूल जीवन व्यतीत करने का संकल्प कर लेंगे और संकुचित साँप्रदायिकता को त्याग कर मनुष्य का मूल्य उसके आचरण से आकेंगे, तभी हम राष्ट्रीय भावनाओं को पुष्ट कर सकेंगे, जातीय जीवन की ज्योति जगमगा सकेंगे ध्यान रहे कि गुलाम प्रजा का कोई धर्म नहीं होता। धर्म और दासता में उतना ही अन्तर है जितना कि परमात्मा और पिशाच में। परमात्मा हमारे देश को सच्चे धर्म से ओत-प्रोत कर दे, यही मेरी कामना है।
(श्री विश्वमित्रजी वर्मा)
बहुतों को चिंता, भय, शोक, द्वेष, ईर्ष्या आदि के विचार सताते रहते हैं-वे इन विचारों को हटाने का प्रयत्न भी लाखों करते हैं तो भी दूर नहीं होता वे इन बुरे विचारों को, उन्हीं का चिंतन बार-बार करके हटाने का प्रयत्न करते हैं-कि ये विचार हट जायें-परन्तु ऐसा कदापि नहीं होता और हो भी नहीं सकता। इस प्रकार हम बुरे विचारों को नहीं हटा सकते। हमें चाहिए कि जब हममें बुरे विचार आवें-तो उन्हें हटाने का कभी प्रयत्न न करें बल्कि तुरन्त ही शुभ विचार करना आरंभ कर दें।
हमें यह अच्छी तरह मालूम है कि जब बच्चा अप्रसन्न हो जाता है, रोता है। तब हम उसे यदि कहें कि प्रसन्न हो जाओ। रोना बन्द करो, तो वह ओर भी अधिक अप्रसन्न होगा, अधिक रोवेगा। इस बला से दूर होने के लिए जब हम बच्चे को अच्छी मिठाइयाँ खाने को देते हैं या बाजा या खिलौना उसके हाथ में दे देते हैं तो वह झट से रोना बंद कर देता है-प्रसन्न हो जाता है और उन्हीं खिलौनों से खेलने लगता है उसका मन उन्हीं खिलौनों में रम जाता है, फिर यदि उसे उसके रोने की बात याद दिलाई जाय तो वह पहले तो ध्यान ही नहीं देता-फिर जब हम बार-बार उसे उसी बात की याद दिलाते हैं तब रोना आरंभ करता है। देखा आपने शुभ और अशुभ संकल्पों का प्रभाव?
पहले उसके मन में अप्रसन्नता के विचारों ने स्थान पा लिया था-जो एक शुभ संकल्प-मन बहलाव से नहीं हटे-जब बार-बार उसका मन शुभ विचारों मिठाई और खिलौनों द्वारा बहलाया गया-तब बुरे विचारों ने भागना आरंभ किया क्योंकि नया विचार आना आरम्भ हो गया था-ज्यों-ज्यों नये शुभ विचार आने लगे-बुरे विचारों का स्थान मन में से खाली होने लगा-यहाँ तक कि शुभ विचारों के आधिक्य से बुरा विचार एक भी न रह सका और बच्चा प्रसन्न हो गया-हम बच्चे के मन में प्रसन्नता के विचार भेजते रहे-विचारों ने उसके मन में दृढ़ता प्राप्त कर ली। पुनः जब किसी दूसरे बहकाने वाले आदमी ने बुरे विचार प्रचारित करना आरम्भ किया तो पहले कुछ देर तक तो असर ही न पड़ा, जैसे शुभ विचार रोते समय देने में पहले असर न पड़ा था। फिर जब बार-बार उसको रोने की बात याद दिलाई तो शुभ विचारों को अशुभ विचारों ने भगा दिया-इस प्रकार त्यों-त्यों शुभ विचारों का स्थान मन में से रिक्त होता जाता है और रोने के लक्षण अधिकाधिक आने लगे-जब शुभ विचार एक भी न रहा-अशुभ विचारों ने पूर्ण मन पर स्थान पा लिया तब बच्चा फिर रो दिया।
एक मनुष्य या कोई भी प्राणी अपनी ही जाति वाले के साथ-अपनी ही बराबरी वाले व्यक्ति के साथ रहेगा-छोटे बड़े शुभ-अशुभ, कौआ और हंस का संयोग कभी नहीं हो सकता और निभ भी नहीं सकता। यही बात हमारे विचारों के संबंध में लागू होती है जब हम कोई बुरा विचार अपने मन में लाते हैं तो उससे अन्य भी बुरे विचार व बुरे काम कराने वाले विचार उत्पन्न होते हैं-फिर उसके फलस्वरूप हमारे मुँह से उसी के सजातीय बुरे शब्द भी निकलते हैं। फिर बार-बार वह विचार मन में आने में अपनी जड़ जमा लेता है और दृढ़ हो जाता है जिससे हम बुरा काम कर बैठते हैं।
चिंता, भय, शोक द्वेष, ईर्ष्या आदि के कुविचार जब मन में अपना अड्डा जमा लेते हैं तो और भी अनेकों प्रकार के बुरे-बुरे कुविचार आने लगते हैं जिनके कारण बेचैनी और व्याकुलता बनी रहती है और जीवन बड़ा अशान्त एवं कष्टमय बन जाता है। इस स्थिति से छुटकारा पाने के लिए हमें निर्भयता, प्रसन्नता, प्रेम एवं आत्मीयता की भावनाएं मन में धारण करनी चाहिए। अच्छे विचारों को मन में भरने से दुर्भाव और कुविचार अपने आप चले जाते हैं।
(प्रोफेसर रामचरण महेन्द्र एम.ए.)
हमारे देखने में कुछ ऐसे व्यक्ति आये हैं, जो इतने संवेदन शील होते हैं कि उन पर छुईमुई के पुष्प की भाँति तनिक-तनिक सी बात का बहुत प्रभाव पड़ता है कई व्यक्ति अपने अफसरों की छोटी सी टीका टिप्पणी भी नहीं सुन पाते। वे सुन कर उबल से उठते हैं, आवेश में भर जाते हैं।
स्त्रियों में विशेषतः संवेदनशीलता वृहत मात्रा में होती है। उन्हें दूसरे की आलोचना सुनने का माद्दा बिल्कुल नहीं होता। कोई बात हो जाय तो उसे बार-बार कहती फिरेंगी, चबोड़ करेंगी। गढ़े मुर्दे खोदेंगी और दिल के फफोले तोड़ेंगी। वे जरा-जरा सी बात पर उत्तेजित हो जायेंगी। गृहयुद्ध ठन जाएगा, गर्म-गर्म बातें चलेंगी। बातों-बातों में रोने तक की नौबत आ जायगी।
छुई मुई स्वभाव के व्यक्ति संसार की आलोचना से बड़े परेशान रहते हैं। वे उस सुकोमल सेब और अंगूर की भाँति हैं जो जरा सी ठसक से क्षत विक्षत हो जाते हैं। मनुष्य हो या स्त्री-यदि वह जरा सी बात से चिढ़ उठे, या मन से घायल हो जाय अपने को न सम्हाल सके, रोने लगे या खिन्न हो उठे, तो वास्तव में उसका रहना मुश्किल हो जाए। संसार तो पग-पग पर घात प्रतिघात से परिपूर्ण है। यहाँ तो काँटे बिछे हैं। और उन्हीं पर होकर हमें जीवन का मार्ग तय करना होता है। जरा-जरा दूर पर संघर्ष करना है, लड़ना है। प्रतिद्वन्द्वियों को पराजित कर रुकावटों को रौंदते हुए आगे का रास्ता पूरा करना है।
किसी भी क्षेत्र को ले लीजिए। प्रायः प्रत्येक क्षेत्र में आप यही स्पर्धा प्रतिघात पायेंगे। अफसर अपनी आफीसरी के घमंड में बैठा गुर्रा रहा है, पिता पुत्र को जली कटी सुना रहा है, राजा प्रजा को प्रताड़ना दे रहा है, शिक्षक विद्यार्थी को बुरी भली कह रहा है। सूदखोर अपने आसामी को धमका रहा है। संसार में इंच-इंच पर प्रबल प्रतिकूलता है। राजनैतिक क्षेत्र को लीजिए। यहाँ अनेक विरोधी दल हैं। एक विरोधी दूसरे को गाली देता है, खुले आम तीखी आलोचना की जाती है, फटकार सुनाई जाती हैं। छिद्रान्वेषण किया जाता है। अच्छे से अच्छे आदमी पर कीचड़ उछाली जाती है। सूर्य पर थूकने की चेष्टा की की जाती है। किन्तु हम देखते हैं कि गन्दे से गन्दा मनुष्य जीता है। जिसे भला-बुरा कहते हैं, वह भी अपना कार्य चलाता है। कुत्ते भौंकते रहते हैं तथा वह दत्तचित्त हो अपना कार्य करता चलता है। उसका मन इन आलोचनाओं से पस्त नहीं होता। उसमें दूसरों के प्रतिरोध को सहने की क्षमता होती है वह सहिष्णुता का अवतार होता है।
साहित्यिक क्षेत्र कटु आलोचनाओं का जगत है। इसमें विरोध सबसे अधिक होता है। जौन कीट्स नामक कवि बड़ा संवेदन शील था। आपकी प्रसिद्ध पुस्तक “एण्डेमियन” की कई साहित्य को ने बहुत प्रशंसा की? मिष्टरली हन्ट ने उसे अति उच्च श्रेणी की पुस्तक ठहराया किन्तु काटरली रिव्यू नामक प्रतिष्ठित पत्र में इसी सुन्दर कृति की अत्यन्त अन्यायपूर्ण एवं कटु आलोचना निकली जिसका प्रभाव इस कवि के संवेदनशील हृदय पर अत्यन्त बुरा पड़ा, वे अत्यन्त खिन्न एवं संतप्त हो गये और कच्ची उम्र में ही उनका देहान्त हो गया। स्पष्ट है कि यदि कवि में प्रतिकूलता एवं प्रतिघात को सहने का मादा होता तो वे दीर्घ जीवन प्राप्त कर पाते जिससे अंग्रेजी साहित्य की श्रीवृद्धि होती। डी. एच. लौरेन्स को कितने लोगों ने अश्लील कहा किन्तु वह उस प्रतिरोध में भी कार्य करते रहे और कई अच्छे पुस्तकें संसार को दे गये। अनेक ऐसे महापुरुष हो गए है जिनका प्रारंभ में बड़ा विरोध किया गया किन्तु अन्त में लोग उन्हें समझ पाये। जिसे आज गाली देते हैं वही कल ऊँचा उठ जाता है और देखते-2 प्रतिष्ठा का पात्र बन जाता है। वही आदमी जीतता है जो दूसरों की सुनकर जब्त करना जानता है।
वैराग्य का अर्थ है- रोगों को त्याग देना। राग मनोविकारों को, दुर्भावों और कुसंस्कारों को कहते हैं। अनावश्यक मोह, ममता, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, शोक, चिन्ता, तृष्णा, भय, कुढ़न आदि के कारण मनुष्य जीवन में बड़ी अशान्ति एवं उद्विग्नता रहती है। कितने ही लोग अपने को बड़ा दीन दुखी, अभाव ग्रस्त, संतप्त, अभागा समझते हैं और यह रोना रोते रहते हैं कि हमारे पास अमुक वस्तु नहीं, अमुक स्थिति अनुकूल नहीं, अमुक त्रास है। परन्तु असली बात दूसरी ही होती है। अन्तः करण में रहने वाले राग द्वेष भीतर से उठते हैं और मन में घुमड़ते हैं उन्हीं की विषैली गर्मी से मनुष्य संतप्त रहता है।
तत्वदर्शी सुकरात का कथन है कि-”संसार में जितने दुख हैं उनमें तीन चौथाई काल्पनिक हैं।” मनुष्य अपनी कल्पना शक्ति के सहारे उन्हें अपने लिए गढ़कर तैयार करता है और उन्हीं से डर-डर कर खुद दुखी होता रहता है। यदि वह चाहे तो अपनी कल्पना शक्ति को परिमार्जित करके अपने दृष्टि कोण को शुद्ध करके इन काल्पनिक दुखों के जंजाल से आसानी से छुटकारा पा सकता है। आध्यात्म शास्त्र में इसी बात को सूत्र रूप में इस प्रकार कह दिया है कि-”वैराग्य से दुखों की निवृत्ति होती है।” हम मनचाहे भोग नहीं भोग सकते। धन की, संतान की, अधिक जीवन की, भोग की, एवं मनमानी परिस्थिति प्राप्त होने की तृष्णा किसी भी प्रकार पूरी नहीं हो सकती, एक इच्छा पूरी होने पर दूसरी नई दस इच्छाएं उठ खड़ी होती हैं। उनका कोई अन्त नहीं, कोई सीमा नहीं। इस अतृप्ति से बचने का सीधा साधा उपाय अपनी इच्छाओं एवं भावनाओं को नियंत्रित करना है। इस नियंत्रण द्वारा, वैराग्य द्वारा ही दुखों से छुटकारा मिलता है। दुखों से छुटकारे का वैराग्य ही एक मात्र उपाय है।
वैराग्य हिन्दू धर्म की शिक्षाओं में आदि से अन्त तक ओत-प्रोत है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त हर मनुष्य को वैरागी रहने का आदेश है। क्योंकि वैरागी मनुष्य ही को वैरागी रहने का आदेश है। क्योंकि वैरागी मनुष्य ही अपने मानसिक संतुलन को ठीक रख सकता है, जीवन के सच्चे आनन्द का उपभोग कर सकता है, उन्नत, समृद्ध, यशम्बी, प्रतापी एवं पारलौकिक सम्पन्नता के लिए भी वैराग्य की प्राथमिक आवश्यकता है। एक शब्द में यों कह सकते हैं-”जीवन की सुसम्पन्न बनाने का एक मात्र आधार वैराग्य है।” गीता का कर्मयोग, वैराग का ही दूसरा नाम है।
हर स्थिति के व्यक्ति को सदैव अपना दृष्टि कोण वैराग्यमय रखना चाहिए, यह भारतीय दर्शन शास्त्र का सर्वमान्य सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त की चर्चा प्राचीन ग्रन्थों में हमें सविस्तार मिलती है। पर कितने दुख की बात है कि आज वैराग्य के अर्थ का अनर्थ कर दिया गया है। उसका तात्पर्य कुछ से कुछ निकाला जाने लगा है। आज हमें वैरागी कहलाने वालों की एक भारी जनसंख्या निरुद्देश्य बेकारी में समय काटती हुई, मुफ्त की रोटियाँ खाती हुई, इधर से उधर मारी-मारी फिरती दीखती है। आज के वैराग्य का अर्थ यह समझा जाता है घर छोड़कर चल देना, कुटुम्ब के महान उत्तरदायित्व को तिनके के समान तोड़ कर फेंक देना, संसार को मिथ्या बताना, फिर भी संसार के अन्न, वस्त्र, मकान, धन आदि का उपभोग करना, लोक सेवा से सर्वथा दूर रह कर अपनी निजी मुक्ति या स्वर्ग प्राप्ति की खुदगर्जी की बातें सोचते रहना, भाँग चरस, गाँजा, तमाखू आदि नशीले पदार्थों की भरमार रखना, पात्र कुपात्र का विचार न करके दीनतापूर्वक भीख माँगना, भाग्यवादी अकर्मण्यता का उपदेश करना, विचित्र प्रकार का वेष बना लेना, आदि।
आज के वैरागियों ने वैराग की जो दुर्दशा कर रखी है, आइए, उस पर विचार करें और यह देखें कि उनकी कार्य पद्धति ठीक है या नहीं? छोटे-छोटे बाल बच्चों को अनाथ बनाकर, तरुण पत्नी, वृद्ध माता-पिता को छोड़कर कई लोग घर से भाग खड़े होते हैं, यह कर्म परित्याग किसी भी दृष्टि में उचित नहीं ठहराया जा सकता। प्राचीन समय में ऐसे उदाहरण हमें देखने को नहीं मिलते। साधारण जनता अपना साधारण गृहस्थ जीवन बिताते हुए ही वैराग्य का दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास करती थी। पर जो विशेष रूप से वैराग्य साधन का कार्यक्रम बनाते थे वे भी कुटुम्ब को त्यागते न थे। योगेश्वर भगवान शंकर ने दो बार विवाह किया उनकी पहली स्त्री सती और दूसरी पार्वती थी। गणेश और स्वामी कार्तिक दो पुत्र उनके थे। गीता के प्रवक्ता योगिराज कृष्ण की कई स्त्रियाँ और कई संतानें थीं। शुकदेव जी को ब्रह्मविद्या सिखाने वाले राजा जनक की एक सौ पत्याँ थीं। याज्ञवल्क ऋषि की कात्यायल्की और मैत्रेयी दो स्त्रियाँ थीं। गौतम ऋषि की अहिल्या पत्नी थी, जमदग्नि की रेणुका स्त्री और परशुराम पुत्र थे। च्यवन ऋषि की सुकन्या पत्नी थी। अत्रि ऋषि की स्त्री अनुसूया थी, जिन्होंने सीताजी को पतिव्रत धर्म का उपदेश किया। व्यासजी की पत्नी मत्सोदरी ने शुकदेव को जन्म दिया। वशिष्ठजी के शत पुत्रों को विश्वामित्र जी ने मार डाला। लोमश ऋषि के पुत्र ऋंगी ऋषि ने परीक्षित को शाप दिया। दुर्वासा ऋषि की शकुँतला कन्या थी। पुलिस्त्य ऋषि का पुत्र रावण हुआ। उद्दालक ऋषि के पुत्र नचिकेता थे। उद्दालक, वाजश्रवा के पुत्र थे। द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा था। छान्दोग्य उपनिषद में उपमन्यु के पुत्र प्राचीनशाल, पुलुष के पुत्र सत्ययज्ञ, भल्लव के पुत्र इन्द्रद्युम्न, शर्कराक्ष के पुत्र जन और अश्वतराश्विका के पुत्र वुडिल इन पाँचों को महाशाल अर्थात् वेद पढ़ाने वाले महा अध्यापक लिखा है वे पाँचों ऋषिकुमार थे। अरुण के पुत्र आरुणि उद्दालक के श्वेतकेतु पुत्र था। इन सबकी माताओं के नाम अविदित हैं तो भी उनकी माताऐं रही अवश्य होंगी। इस प्रकार उन ऋषियों का समत्नीक होना निश्चित है। यह आम प्रथा थी। गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए ऋषि लोग वैराग्य भरा जीवन बिताते थे। इसमें न तो कोई दोष है और न कभी कोई दोष समझा गया है। आज का वैराग्य तो विचित्र वैराग्य है, उसमें उत्तरदायित्व और कर्त्तव्य कर्मों का त्याग ही त्याग समझा जाने लगा है।
आज के वैरागी दुनिया को मिथ्या बताते हैं और लोक सेवा से नाक भौं सिकोड़ कर अपने निजी स्वर्ग मुक्ति की तरकीबें लड़ाते हैं। पर प्राचीन काल में यह विचार धारा बहुत बुरी दृष्टि से देखी जाती थी। यह तो एक विशुद्ध खुदगर्जी है। व्यापारी लोग अपने निजी लाभ के लिए धन कमाते हैं ऐसी दशा में उनके लिए भिक्षा माँगने का कोई अधिकार नहीं और वे माँगते ही हैं। इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने निजी स्वर्ग या मुक्ति की साधना में लगे हुए हैं उन्हें दूसरों से भिक्षा माँगने या दूसरों पर अपना किसी प्रकार का कोई भार डालने का अधिकार नहीं है। प्राचीन काल में ऋषि गण इस प्रत्यक्ष सत्य को भली भाँति जानते थे और वे अपने जीवन को लोकोपयोगी कार्यों में लगाये रहते थे। जब अपना सारा जीवन जनता जनार्दन के चरणों में अर्पण कर दिया तो प्रसाद स्वरूप दान या भिक्षा के रूप में निर्वाह साधन लेने का भी उन्हें अधिकार था। आज तो वैरागी कहे जाने वाले लोग लोक सेवा से कोसों दूर भागते हैं और दूध मलाई उड़ाने के लिए तैयार रहते हैं।
प्राचीन काल में ऋषि लोग लोक सेवा में तल्लीन रहते थे। धंवन्तरि, अश्विनीकुमार, चरक, सुश्रूत, वाँगभट्ट, शाँर्गधर आदि ऋषियों ने शरीर विज्ञान स्वास्थ्य, औषधि अन्वेषण और चिकित्सा में अपने सारे जीवन लगाये। जनता को रोग मुक्त करके उसे सुखी बनाने के लिए उन्होंने अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया। नागार्जुन सरीखे कितने ही वैज्ञानिक रसायन विद्या की शोध करके जनता के लिए उपयोगी ज्ञान सामने लाये। आर्य भट्ट सरीखे ऋषि खगोल विद्या के अन्वेषणों में लगे रहे और ग्रह नक्षत्रों की गतिविधि की महत्वपूर्ण जानकारी जनता के सामने रखी। नालन्दा, तक्षशिक्षा जैसे पचासों विश्वविद्यालय उन्हीं के द्वारा चलते थे और संसार में विद्या का प्रकाश किया जाता था। वात्स्यायन जैसे कामशास्त्र के अन्वेषक वैरागी ही थे। बाण विद्या द्रोणाचार्य सिखाते थे। नारद जी सदा भ्रमण ही करते रहते थे और एक स्थान के समाचारों से दूसरे स्थान की जनता को अवगत कराते थे। विश्वकर्मा ऋषि शिल्प विद्या के आचार्य थे। चाणक्य राजनीति के अनुपम महारथी थे। समय पड़ने पर परशुराम जी ने अत्याचारी शासकों के विरुद्ध स्वयं फरसा उठाया और उन्हें मिटा कर जनता को अभय किया। असुरों के नाश के लिए दधीचि ने अपनी अस्थियाँ तक निकाल कर दे दी। व्यासजी ने अनुपम काव्य पुराण लिखे, सूत जी कथा और उपदेशों द्वारा धर्म प्रचार करते थे। संगीत साहित्य, व्याकरण, सर्वविद्या, मल्लविद्या, विमान विद्या, शस्त्र विद्या, अर्थ शास्त्र, युद्धविद्या, मंत्र विद्या, रसायन विद्या, पशु विद्या आदि अनेकानेक प्रकार के वैज्ञानिक अन्वेषण ऋषियों के आश्रमों में होते थे और वहाँ से बड़ा महत्वपूर्ण ज्ञान संसार को मिलता था। वे एकान्त सेवा नहीं थे वरन् संसार की गतिविधि पर अपना पूरा नियंत्रण रखते थे, राजाओं के शासन उनकी इच्छानुसार चलते थे। दशरथ के गुरु बृहस्पतिजी निमंत्रण जीम कर दक्षिणा लेने वाले गुरु नहीं थे। उनके नियंत्रण में ही राजसत्ता की सारी गतिविधि चलती थी।
आज के तथा कथित वैरागी “दुनिया से हमें क्या मतलब” की रट लगाते हैं। पर प्राचीन काल में इस दूषित, ओछे संकीर्ण दृष्टिकोण को कोई सच्चा वैरागी पास भी नहीं फटकने देता था। भगवान बुद्ध कहा करते थे कि- ‘मैं तब तक स्वर्ग या मुक्ति नहीं चाहता जब तक कि संसार का एक भी प्राणी बन्धन में है। कहाँ वह बोधिसत्वमयि ऋषि उचित भावनाएं, कहाँ आज के वैरागियों का खुदगर्ज दृष्टि कोण? दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। आज देश ओर जाति की जो दुर्दशा है उसे देख कर सच्चे संत का हृदय पानी की तरह पिघल पड़ता है। प्रति वर्ष लाखों गौओं के सिर-धड़ से अलग हो जाते हैं, असंख्यों स्त्री, बच्चे उदर की ज्वाला शान्त करने के लिए विधर्मी बन जाते हैं। बीमारी, गरीबी, विदेशी शासन की रक्त शोषक दासता, अविद्या, साम्प्रदायिक कलह, आदि के कारण भारत माता जर्जर हो रही है। जिसके हृदय में संत पन का एक कण भी मौजूद है वह चुप नहीं बैठ सकता, अपनी शक्ति और समर्थ के अनुसार पंडित जनता की सेवा के लिए कुछ न कुछ किये बिना उससे रहा ही नहीं जा सकता। 56 लाख वैरागी जिस काम को भी हाथ में ले लें उसे बात की बात में पूरा कर सकते हैं। पर करें तब न, जब संत पन या वैराग की सचाई उनके पास हो।
वेष की नकल करने से कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। सिंह की खाल ओढ़ कर गधा सिंह नहीं बन सकता। जिस वेष की नकल करके आज लोग वैरागी कहलाते हैं वह प्राचीन समय में सर्व-साधारण का गृहस्थों का वेष था। प्राचीन समय के महापुरुषों की या देवताओं की तस्वीरें या मूर्तियाँ जो आजकल प्राप्त होती हैं उनमें हम देखते हैं कि वे प्रायः नंगे बदन रहते थे, धोती और बहुत हुआ तो कंधे पर दुपट्टा यही भारतीय पहनावा था। सिर पर सब कोई लंबे बाल रखते थे। आबादी कम थी जंगल अधिक थे। छोटे-छोटे गाँवों में झोंपड़ी बना कर वनवास करना पड़ता था। लकड़ी की खड़ाऊँ आसानी से बिना खर्च और कठिनाई के बन जाती थीं, वस्त्रों के अभाव में अपने आप मरे हुए मृग आदि पशुओं का चर्म आसन आदि के काम में ले लिया जाता था। दियासलाई उस वक्त थी नहीं, जंगली हिंसक पशुओं को डराने के लिए अग्नि जलती रखी जाती थी, लकड़ियों की कमी थी नहीं, यह धूनी हर घर में सदा ही जलती रहती थी। यह सब रहन-सहन आम जनता का था। संतों का वैरागियों का भी वही रहन-सहन था। आज स्थिति बदल गई है पुरानी रहन-सहन की नकल करना उतना उपयोगी नहीं रहा है पर आज तो वह नकल वैरागी होने के साइन बोर्ड की तरह काम में लाई जाती है। इस अवैध अनुकरण में क्या विवेकशीलता है इसे वे नकलची ही समझ सकते हैं। जब कि न तो हिंसक पशुओं के आक्रमण का भय है, न लकड़ियों की बहुतायत, दियासलाई से अग्नि प्राप्ति की असुविधा भी नहीं रही ऐसी दशा में धूनी जलाने का क्या प्रयोजन है इसे वे ही समझ सकते हैं।
विवेकशीलता हमें पुकारती है। प्राची से प्रकाश का उदय हो रहा है। हमें हर समस्या पर विवेक के आधार पर विचार करना पड़ेगा। वैराग्य जैसे महातत्व को हमारे दैनिक व्यवहार में उपयोग करके जीवन को सच्चे अर्थ में आनन्दित बनाना लाभ दायक है या वैराग का ऊटपटाँग आडंबर करना उचित है? इस प्रश्न का भी हमें सही उत्तर प्राप्त करना होगा। तभी हम सत्य की दिशा में अग्रसर हो सकेंगे।
(श्रीमती रत्नेश कुमारी नीराँजना, मैनपुरी)
अमित दान भर्ता वैदेही।
अधम सोनारि जो सेव न तेही॥
ये हिन्दू संस्कृति का विपत्ति काल में पुनरुद्वार करने वाले महाकवि तुलसीदास के शब्द हैं जिनसे मानस सरोवर रूपी दान पाकर हिन्दू जनता जब तक अपनी संस्कृति के महत्व का ज्ञान शेष है तब तक कृतज्ञ रहेगी। और ये शब्द उन्होंने महासती अनुसुइया द्वारा देवी सीता को उपदेश करवाये हैं अतः इनकी सत्यता में सन्देह के लिये तनिक भी स्थान नहीं है। पाठिकाओं! क्या आपने कभी विचार किया है कि और सब सम्बन्धियों को तो मितप्रद पर पति को “अमित दान” देने वाला क्यों कहा गया है? अमित के अर्थ हैं असीम जिसकी तादाद न हो और इन्द्रियों के द्वारा जो भी विषय उपभोग किये जाते हैं वे सभी क्षण भंगुर हैं अस्तु इनसे परे जो परमात्मा है उसी को असीम कहा जा सकता है। अब प्रश्न ये उठता है ‘भर्ता’ अमित का दान कैसे दे सकता है? यहाँ पर यही गोस्वामी जी का संकेत प्रतीत होता है कि पति को प्रतीक बनाकर उसमें जगत्पति की श्रद्धा विश्वास पूर्वक उपासना करने पर ‘अमित’ को ‘भर्ता’ द्वारा पाया जा सकता है।
जो ऐसा सुअवसर पाकर भी उससे लाभ न उठाये घर आई गंगा से पवित्र न होकर उसमें गन्दी नाली साफ करने में लगाये अकस्मात प्राप्त हुआ अमृत गली सींचने में व्यय कर दे ऐसी दयनीय दुर्भागिनी नारी
को यदि महाकवि ने ‘अधम’ कहा तो उसमें तनिक भी
अतिशयोक्ति नहीं यदि इस अमित दान कर्ता से मित दान ही लेते-लेते अपनी सारी आयु हम खों डालें तो शरीर त्यागने पर हम अवश्य ही अनुभव करेंगी कि अनन्त जीवन का ये इतना भाग हमने व्यर्थ ही खो डाला। ऐसी दुखदाई परिस्थिति में हमको अज्ञान वश न पड़ना पड़े इसीलिए तो तुलसीदासजी की चेतावनी है-”अ मितदान भर्ता वैदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही” वैदेही शब्द भी यहाँ बड़े विचारपूर्वक रखा है देह से अहं भाव त्याग देने पर ही हम इस सदुपदेश से लाभ उठा सकेंगी। यदि हम देह को ‘मैं’ मानतीं रहीं तब तो हम ये सोचने ही क्यों लगीं कि मरने के बाद हमारे इस जन्म में किये हुए कार्य हमारे लिये आगे की जीवन यात्रा के लिये कुछ उपयोगी सिद्ध होंगे अथवा नहीं? अतएव यह उपदेश उन्हीं के लिए है जो आर्य संस्कृति के अनुसार इस शरीर के त्याग के पश्चात् भी जीवन की स्थिति रहती है ये मानती हैं।
अतः जो समय खो चुका उसे जाने दीजिये आइये आज से ही हम अपने जीवन को पूर्ण रूप से सफल बनाने के लिये पूर्ण शक्ति से प्रयत्नशील हों। महाकवि की चेतावनी से लाभ उठायें ताकि जब पुराने वस्त्रों के समान हम इस शरीर को त्याग दें तब हमें ये पश्चाताप न करना पड़े कि हमने इस जन्म में ऐसा कुछ भी नहीं किया जो हमारी अनन्त जीवन यात्रा में कुछ भी सहायता दे सके इतना सारा समय व्यर्थ ही चला गया।
यज्ञोपवीत के-तीन लड़, नौ तार और 16 चौवे।
त्रिरस्यता परमा सन्ति सत्या स्पार्हा देवस्य
जनिमान्यग्नेः अनन्ते अन्तः परिवती आगा
च्छुचिः शुक्रो अर्य्योरोरुचानः।
ऋग्वेद 4।7।1
इस उपवीत के तीनों तार महान हैं। उससे सत्य, तेजस्वी और पवित्र व्यवहार को ग्रहण करो। इसके मध्य में (ब्रह्म ग्रन्थि में) अनन्त परमात्मा की शुचिता तेजस्विता और श्रेष्ठता प्रकाशवान है। यह यज्ञोपवीत भली प्रकार प्राप्त हो।
जायमानो ह वै ब्राह्मस्त्रिभिऋणैऋणवान् जायते। ब्रह्मचर्य्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यइति।
तै. सं. 6, 3, 10, 5
तीन सूत्रों से तीन ऋणों का बोध होता है। ब्रह्मचर्य से ऋषि ऋण, यज्ञ से देव ऋण और प्रजापालन से पितृऋण चुकाया जाता है।
मनुष्य के ऊपर तीन ऋणों का भार रहता है। ऋषि, देवऋण, और पितृऋण। इन ऋणों को चुकाने का सतत् प्रयत्न करना चाहिए। ब्रह्मचर्य से ब्रह्म के अनुकूल आचरण करने से, स्वाध्याय, तप, संयम, सत्संग आदि के द्वारा आत्मोन्नति करने से ऋषि ऋण चुकाया जाता है। ऋषियों ने जीवन भर तपश्चर्या करके लोक कल्याण के लिए जो आत्मोन्नति का पथ निर्धारित किया है उसको अपनाकर हमें ऋषियों का उद्देश्य सफल बनाना चाहिए। ऋषि तत्व का विस्तार करना चाहिए। अपने और दूसरों के अन्दर अधिकाधिक मात्रा में ऋषित्व की अभिवृद्धि करनी चाहिए। यह ऋषि ऋण से उऋण होने का मार्ग है।
देवता वे होते हैं जो देते हैं, लेवता वे होते हैं जो लेते हैं। देवता का गौरवास्पद पद उन्हें ही प्राप्त होता है जो संसार को कुछ न कुछ देने का, परोपकार का कार्य निरन्तर करते रहते हैं। जब देव पुरुषों की कृपा से हम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अनेकों प्रकार के लाभ प्राप्त करते हैं तो हमारा भी कर्त्तव्य है कि अपनी शक्तियों से संसार का अधिकाधिक उपकार करें। यज्ञ-परोपकार को कहते हैं। यज्ञ में, लोक सेवा में, अपने को जुटाये रह कर हमें देव ऋषि से उऋण होने का निश्चय करना चाहिए।
पितृ ऋण-पितरों का पूर्वजों का ऋण है। जिनकी कृपा से हमें स्वर्गादपि गरीयसी पुण्यमयी भारत भूमि में जन्म मिला है, सुरदुर्लभ मानव शरीर पाया है उन पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता के भाव रखना, उनके नाम को उज्ज्वल करना अपना कर्त्तव्य है। कोई ऐसे दूषित कार्य न करने चाहिए जिससे स्वर्गीय पूर्वजों को भी लज्जित होना पड़े। पूर्वजों का श्राद्ध, उनके नाम को, कीर्ति को स्थिर रखने का प्रयत्न करना चाहिए। गृहस्थ की सुव्यवस्था, बालकों की उचित शिक्षा दीक्षा, अपने परिवार को आदर्श बनाने का प्रयत्न यह सब पितृऋण से उऋण करने वाले कार्य है।
यज्ञोपवीत धारी को इन तीनों ऋणों से उऋण होने का प्रयत्न करना चाहिए।
यज्ञोपवीत के तीन प्रधान तार होते हैं। यह तीन तीर सृष्टि के समस्त पहलुओं में व्याप्त त्रिविधि धर्मों की ओर हमारा ध्यान दिलाते हैं। उन तीनों पक्षों को स्मरण रखने और तद्विषयक कर्त्तव्यों को ठीक प्रकार पालन करने का संकेत करते हैं। वे त्रिवर्ग इस प्रकार हैं।
1. ईश्वर, जीव और प्रकृति। इन तीनों के आपसी सम्बन्धों को समझने के लिए अध्यात्म विज्ञान का अध्ययन करना चाहिए। और माया के चंगुल से छुटकारा प्राप्त करके शाश्वत सुख की उपलब्धि के लिए अग्रसर होना चाहिए।
2. उत्पत्ति, सियति और विनाश। सृष्टि के हर एक पदार्थ को इन तीन अवस्थाओं में होकर अनिवार्यता गुजरना पड़ता है। इसलिए वस्तुओं तथा प्राणियों के जन्म मरण की घटनाओं से, एवं परिवर्तन चक्र के अनुसार बदलती हुई परिस्थितियों को देखकर विचलित न होना चाहिए।
3. ब्रह्मा, विष्णु और महेश। परमात्मा की इन तीन शक्तियों को तीन नामों से पुकारा जाता है। एक मात्र परमात्मा ही उत्पादक है, वह पालनकर्ता तथा मृत्युरूप है। उसे प्रसन्न करने के लिए ईश्वरीय नियमों पर चलना चाहिए।
4. सत्, रज और तम। यह तीन तत्व सर्वत्र व्यापक हैं। इनके गुण दोषों को समझते हुए अपने में से इनका हानिकारक भाग हटाने और लाभदायक भाग बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए।
5. माता, पिता और आचार्य। यह तीन प्रत्यक्ष देव हैं। इनको सुखी एवं संतुष्ट रहकर सच्ची देव पूजा करनी चाहिए।
6. भूत, भविष्य और वर्तमान। यह तीन काल हैं। भूत काल की बातों से अनुभव लेकर, सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए वर्तमान काल का कार्यक्रम निर्धारित करना चाहिए।
7. धर्म, अर्थ और काम। संसार के यह तीन प्रयोजन है। इन तीनों सूत्रों को ब्रह्मग्रन्थि रूपी मोक्ष के साथ बाँध देना चाहिए। अर्थात् हमारा धर्म अर्थ और काम मोक्ष में सहायक होना चाहिए।
8. ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ। साँसारिक अवस्था के इन तीन आश्रमों को संन्यास रूपी ब्रह्मग्रन्थि के साथ जोड़ना चाहिए। अर्थात् हर एक आश्रम का उद्देश्य संन्यास संस्कारों को परिपक्व एवं पुष्ट करना होना चाहिए।
9. दैहिक, दैविक, और भौतिक। तीन प्रकार के सुख दुख संसार में है। यह सब कर्मरूपी ब्रह्मग्रन्थि से बंधे हुए हैं। इससे ऐसे शुभ कर्म करने चाहिए जिससे इन तीनों प्रकार के दुखों से बचकर परमानन्द प्राप्त हो सके।
10. योग, यज्ञ और तप। यह तीन साधन लौकिक और परलौकिक समस्त सिद्धियाँ और सफलताएं देने वाले हैं। इन्हें जीवन में ओत-प्रोत कर लेने से सच्चा जीवन फल प्राप्त होता है।
11. देश, धर्म और जाति। इनकी श्रीवृद्धि करना आवश्यक कर्तव्य है।
इसी प्रकार अन्य अनेक त्रिवर्ण हैं। उन पर सूक्ष्म विचार करने, कर्त्तव्य निर्धारित करने एवं तदनुसार कार्य करने का एक प्रेरक, संकेत दीपक यज्ञोपवीत है। उसकी उपस्थिति से प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए।
नौ लड़ें क्यों होती है?
यज्ञोपवीत कुर्बीत सूत्रेण नवतान्तवम्!
देवतास्तत्र वक्ष्यामि आनुपूर्वेण याः स्मृताः
ओंकारः प्रथमे तन्तौ द्वितोयेऽमि स्तथैवच।
तृतीयेनागादेवत्यं चतुर्थे सोमदेवता।
पंचमे पितृदेवत्यं षष्ठे चेव प्रजापतिः!
सप्तमे मारुतश्चैव अष्टमे सूर्य एव च
सर्वे देवास्तु नवम इत्येतास्तन्तु देवताः
-सामवेदीय छान्दोग्य सूत्र (परिशिष्ट)
अर्थात्- यज्ञोपवीत के नौ सूत्रों में 9 देवता वास करते हैं (1) ओंकार-ब्रह्म (2) अग्नि-तेज (3) अनन्त-धैर्य (4) चन्द्र, शीतल-प्रकाश (5) पितृगण-स्नेह शीलता (6) प्रजापति-प्रजापालक (7) वायु-स्वच्छता (8) सूर्य-प्रताप (9) सब देवता-समदर्शन।
इन नौ देवताओं को-नौ गुणों को धारण करना भी नौ तार का अभिप्राय है। ब्रह्म परायणता, तेजस्विता, धैर्य, नम्रता, दया, परोपकार, स्वच्छता एवं शक्ति सम्पन्नता यह नौ गुण उपरोक्त नौ देवताओं के हैं। नव सूत्री उपवीत धारण करने वाले इन नौ गुणों को अपनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न शील रहना चाहिए।
यस्यादेकगुणं शरासनमिंद सुव्यक्त मुर्वीभुजान्।
अस्माकं भवतो यतो नवगुणं यज्ञोपवीत वलम्।
भगवान राम ने परशुरामजी से कहा- हमारे पास तो शरासन का केवल एक ही गुण है परन्तु आपके पास तो नवगुण यज्ञोपवीत का बल है। फिर हीन बल होने के कारण हम आपसे भला संग्राम किस प्रकार कर सकते हैं।
नौ गुणों का बोध कराने वाले भी नौ सूत्र हैं। “धृति, क्षमा दमोस्तेय, शौचमिन्द्रय निग्रह, धीर्विधा सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्॥” इस श्लोक में (1) धृति (2) क्षमा (3) दम (4) अस्तेय (5) शौच (6) इन्द्रिय निग्रह (7) धी (8) विद्या (9) सत्य (10) अक्रोध। यह दस लक्षण धर्म के बताये हैं। इनमें दम और इन्द्रिय निग्रह लगभग एक ही बात है। बहुत थोड़ा अन्तर है। इसलिए कई शास्त्रकार इन्हें नौ लक्षण ही बताते हैं। यही मनुष्य के परम पुनीत नौ गुण कहे जाते हैं। इन नौ गुणों का प्रतिनिधित्व करने वाले यज्ञोपवीत के नौ तार है। जनेऊ पहनने वाले का कर्त्तव्य है कि नौ तारों के सूत्रों के वास्तविक भेद उन नौ गुणों को भी अपने में धारण करे।
ब्रह्मणोत्पादितं सूत्रं विष्णुना त्रिगुणी कृतम्।
कृतो ग्रन्थिस्त्रिनेत्रण गायत्र्या चाभिमंत्रितम्।
-सामवेदीय छान्दोग्य सूत्र परिशिष्ट
अर्थात्- ब्रह्माजी ने वेदत्रियी से तीन तन्तु का एक सूत्र बनाया विष्णु ने कर्म उपासना और ज्ञान तीनों काण्डों से तिगुना किया और शिवजी के गायत्री से अभिमंत्रित करके ब्रह्म गाँठ दी। इस प्रकार यज्ञोपवीत नौ तार का बन गया।
इस प्रकार ऋग्, युज्, साम तीन वेदों का ज्ञान कर्म उपासना का तथा जन्म, पालन एवं मृत्यु का आभास यज्ञोपवीत से मिलता है। तीनों देवताओं के त्रिविधि कर्मों से नौ सूत का यज्ञोपवीत बना है।
96 चापे का ऋण-
चतुर्वेदेषु गायत्री चतुर्षिं शतिकाक्षरी।
तस्माच्चतुगुणं कृत्वा ब्रह्मतन्तुमुदीरयेत्।
(1) अर्थात्- गायत्री 24 अक्षर की है। वेद 4 हैं। चौबीस का चौगुना 96 होता है। यह भी 96 चप्पों का हेतु है। वेद और गायत्री के अभिमत को स्वीकार करना 96 चौवे लगाने का अभिप्राय है।
तिथिर्वारंच नक्षत्रं तत्ववेदगुणान्वितम्।
कालत्रयं च मासाश्च ब्रह्मसूत्रं हि षण्णवम्
सामेवेदी छान्दोगय सूत्र
(2) तिथि 15, वार 7, नक्षत्र 27, तत्व 25, वेद 4, गुण 3, काल 3, मास 12 इन सबका जोड़ 96 होता है। ब्रह्म पुरुष के शरीर में सूत्रात्मा प्राण का 96 वस्तु रूप कन्धे से कटि पर्यन्त यज्ञोपवीत पड़ा हुआ है, ऐसा भाव यज्ञोपवीत धारण करने वाले को मन में रखना चाहिए। मैं समय का विश्व का, सृष्टि का, तथा धर्म का एक घटक हूँ, ब्रह्म पुरुष को सूत्र रूप से अपने में धारण किये हुए हूँ। मैं विश्व में ओत-प्रोत हूँ विश्व मुझमें समाया हुआ है। विश्व की समस्याएं मेरी समस्याएं, विश्व के हित में मेरा हित है। इन विचारों को अपना कर मनुष्य तुच्छ स्वार्थों को तिलाँजलि देकर परमार्थी बने यह भी 96 चौवों का अभिप्राय है।
(3) चारों वेदों में 1 लाख श्रुतियाँ है। इनमें 80 हजार कर्मकाण्ड, 16 हजार उपासना काण्ड और शेष 4 हजार ज्ञान काण्ड की है। इनमें से कर्मकाण्ड और उपासना काण्ड गृहस्थों ब्रह्मचारियों के लिए तथा ज्ञान काण्ड संन्यासियों के लिए है। कर्मकाण्ड की 80 हजार और उपासना की 16 हजार मिला कर 96 हजार होती है। एक चप्पे में एक हजार श्रुतियों का प्रतिनिधित्व लिया गया है। और 96 चप्पे का यज्ञोपवीत बनाया गया है। इसका तात्पर्य इतनी श्रुतियों को धारण करना है। संन्यासी यदि यज्ञोपवीत पहनते तो उनका 100 चोपे का होता पर शास्त्र में संन्यासी को उपवीत त्यागने का आदेश है इसलिए वे नहीं धारण करते।
(4) सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार मनुष्य अपनी उंगलियों से 84 से लगा कर 108 अंगुल तक का होता है। 84 और 108 के बीच का मध्यान्तर 96 है साधारणताः औसतन, 96 अंगुल को मनुष्य शरीर मान कर जनेऊ में 96 चप्पे रखे गये हैं शरीर को, जीवन को ब्रह्ममय बनाने का बोझ कन्धे पर धारण करना, यह भी 96 चप्पे के यज्ञोपवीत का अभिप्राय है।
(जगद्गुरु आचार्य पीत्पधिपति श्री राघवाचार्य जी)
भक्ति शास्त्र का आदेश है कि केवल प्राकृतिक पुष्पों को भगवान के चरणों में समर्पित कर देने से भगवान प्रसन्न नहीं हो जाते। बाह्य आराधना के अतिरिक्त भक्त को भगवान की अंतरंग आराधना भी करनी पड़ेगी। इस आराधना की पूर्ति तभी होती है जब निम्न लिखित आठ पुष्पों की पुष्पाँजलि भगवान को समर्पित की जाती है-
अहिंसा प्रथम पुष्पं पुष्पमिन्द्रियनिग्रहः।
सर्वभूत दया पुष्पं क्षमा पुष्पं विशेषतः॥
ज्ञान पुष्पं तपः पुष्पं ध्यानं पुष्पं तथैव च।
सत्यमष्टविधं पुष्प विष्णोः प्रीतिकरंभवेत्॥
अहिंसा, इन्द्रियनिग्रह, सब प्राणियों पर दया, क्षमा, ज्ञान, तप, ध्यान और सत्य-ये आठ पुष्प भगवान श्री विष्णु को प्रसन्न करने वाले हैं। अतएव भक्त का कर्त्तव्य है कि आठ पुष्पों के द्वारा भगवान की नित्य आराधना करे।
पहला पुष्प अहिंसा है। भक्त को अहिंसक बनना होगा। उसे किसी की हिंसा न करनी चाहिए और सदा यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके शरीर से ही नहीं प्रत्युत वाणी और मन से भी किसी को कष्ट न पहुँचे।
दूसरा पुष्प है इन्द्रिय निग्रह। इन्द्रियाँ ही आत्मा को संसार के बन्धन में फँसाकर श्रेय के मार्ग से डिगा देती है। भक्त यदि इन इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में नहीं रखता तो भगवान से प्रेम करने के स्थान पर नश्वर और असत् पदार्थों से प्रेम करने लगेगा। इसलिए भक्त को अपनी इन्द्रियों का दमन करना चाहिये।
तीसरा पुष्प है सर्वभूत दया। भक्त का कोई शत्रु नहीं होता। वह सारे जगत को ‘सीय राम मय’ देखा करता है। उसे सर्वत्र अपने प्रभु की झाँकी दिखाई देती है। भक्त का हृदय शान्त होता है। जब वह किसी को अशान्त देखता है तो तुरन्त शान्ति का उपाय बता देता है। यह उसकी दया है। किसी भी दीन अथवा दुःख को देखकर उसको दया आ जाती है और वह उस व्यक्ति के लिये भगवान से प्रार्थना करता है।
चौथा पुष्प है क्षमा। यदि कोई व्यक्ति को दुःख दे तो भी वह उस अपराधी के अहित की कामना नहीं करता। वह उसके अपराध क्षमा कर देता है और भगवान से भी इसकी प्रार्थना करता है।
पाँचवाँ पुष्प है ज्ञान। जिसके द्वारा भक्त भगवान को जान पाता है। संसार के लोग समझते हैं कि वह भगवान के अतिरिक्त और किसी को नहीं मानता। किन्तु वास्तव में वह भगवान के अतिरिक्त अन्य किसी को जानता ही नहीं।
छठा पुष्प है तपस्या। भक्त अपने जीवन को तपाता है। उसकी तपस्या भगवान के प्रसन्न करने के लिए होती है। वह तपस्या को अपना कर्त्तव्य समझकर तपस्या के द्वारा भगवान की आराधना करता है।
सातवां पुष्प है ध्यान। भक्त भगवान का निरन्तर ध्यान करता है और किसी का चिन्तन उसे रुचिकर नहीं होता। अन्य किसी का ध्यान करने को उसके पास समय ही नहीं होता।
आठवाँ पुष्प है सत्य। भक्त के जीवन में सर्वत्र सत्य का ही प्रकाश दिखाई देता है। असत्यता का भाव उसमें तनिक भी नहीं रहता।
अहिंसा आदि इन आठ गुणों को अपना लेना ही इन पुष्पों को भगवान के समर्पित करना है। प्रत्येक भगवद्-भक्त का कर्त्तव्य है कि वह इन आठ गुणों को अपनावें और अपनाकर इस पुष्पाँजलि को भगवान को समर्पित करें।
मनुष्य को सहिष्णुता सीखनी चाहिए। वही आदमी जीतता है, जो दूसरों की सुनकर जब्त करना जानता है।
(श्री महावीर प्रसाद विद्यार्थी, साहित्यरत्न)
आँखें खोल उर की, हटाके यह मोह-पट,
प्रेम-मूर्ति, होके, प्रेम-गीत, जब गाएगा।
लहरा रही है वसुधा पै सुधा-धारा मञ्जु,
पीके उसे तब तू अमर-पद पाएगा॥
राग गूँजता है कण-कण में रसीला यहाँ,
ब्रह्मानन्द-धारा बीच सुन के समाएगा।
जागेगी अखण्ड-ज्योति तेरे मनोमंदिर में,
विश्व अभिराम-धाम तेरा बन जाएगा॥
आँगन में प्राची के मनोरमा उषा समोद,
स्नेह-सरिता में जगती को नहलाती है।
वायु के हिलोर मन्द मधु को लुटाती हुई,
जीवन में एक नव राग भर जाती है॥
लाल-लाल गूँध के गुलाब अलकों में मञ्जु,
संध्या-सुन्दरी साहस शाँति सरसाती है।
बैठा क्यों व्यथित, देख कर करुणेश की ये,
करुणा सकल विश्व-बीच लहराती है॥
तेरे प्रिय बन्धु क्यों विलग तुझसे हैं पड़े,
टूटी हुई प्रेम की लड़ी को अब जोड़ तू।
वासना-विभावरी है बाँधे अलकों में तुझे,
ज्ञान की जगा के ज्योति, यह पाश तोड़ तू॥
स्वार्थ-साधना में दिन-रात रहता है रत,
जीवन को गरल बनाना अब छोड़ तू।
शाँतिमय नन्दन निकुँजों में विहार कर,
नारकीय पथ से मनुज! मुँह मोड़ तू॥
प्रेम की सुधा से सींच सूखे हृदय स्थल को,
घुनी क्यों रमाता है, लगाता भस्म अंगों में।
ज्योति जागती है परमेश की अनवरन,
आँखें खोल, देख तेरी जीवन-तरंगों में॥
कान खोल, वायु गुन-गुन गा रहा है कुछ,
तू तो है महान्ध! मस्त अपने मृदंगों में।
अंतस् में तेरे रस-धारा बहती अमन्द,
भटक रहा क्यों तू वनों में, गिरि-श्रृंगों में?
*समाप्त*