“मैंने इतना किया पर इसके बदला मुझे क्या मिला?” ऐसे विचार करने की उतावली न कीजिये। बादलों को देखिये वे सारे संसार पर जल बरसाते फिरते हैं, किसने उनके अहसान का बदला चुका दिया? बड़े-बड़े खण्डों का सिंचन करके उनमें हरियाली उपजाने वाली नदियों के परिश्रम की कीमत कौन देता है? हम पृथ्वी की छाती पर जन्म भर लदे रहते हैं और उसे मल मूत्र से गन्दी करते रहते हैं, किसने उसका मुआवज़ा अदा किया है? वृक्षों से फल, छाया, लकड़ी पाते हैं, पर उन्हें हम क्या कीमत देते हैं?
परोपकार स्वयं ही एक बदला है? त्याग करना अजनबी आदमी को एक घाटे का सौदा प्रतीत होता है, पर जिन्हें उपकार करने का अनुभव है वे जानते हैं कि ईश्वरीय वरदान की तरह यह दिव्य गुण कितना शान्ति दायक है और हृदय को कितना बल प्रदान करता है। उपकारी मनुष्य जानता है कि मेरे कार्यों से कितना लाभ दूसरों को होता है, उससे कई गुना अधिक स्वयं मेरा होता है।
त्याग करना, किसी की कुछ सहायता करना, उधार देने की एक वैधानिक पद्धति है, जो कुछ हम दूसरों को देते हैं, वह हमारी रक्षित पूँजी की तरह परमात्मा की बैंक में जमा हो जाता है। जो अपनी रोटी दूसरों को बाँट कर खाता है, उसको किसी बात की कमी न रहेगी। जो केवल खाना और जमा करना ही जानता है, उस अभागे को क्या मालूम होगा कि त्याग में कितना मिठास छिपा हुआ है।
(महात्मा गाँधी)
हम लोगों ने ब्रह्मचर्य की व्याख्या को केवल स्थूल रूप दे दिया और जो लोग प्रतिक्षण क्रोध करते रहते हैं, उन्हें दोषी मानना छोड़ दिया है। जिस प्रकार स्थूल ब्रह्मचर्य का पालन-शरीर-सुख के लिये आवश्यक है, उसी प्रकार आध्यात्मिक ब्रह्मचर्य की भी आवश्यकता है।
ब्रह्मचर्य का अर्थ है मन, वचन और काया से समस्त इन्द्रियों का संयम। जब तक अपने विचारों पर इतना कब्जा न हो जाय कि अपनी इच्छा के बिना एक भी विचार न आने पावे, तब तक वह सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य नहीं। जितने भी विचार हैं वे सब एक तरह के विकार हैं। उनको वश में करने के मानी हैं मन को वश में करना और मन को वश में करना वायु को वश में करने से भी कठिन है। इतना होते हुए भी यदि आत्मा कोई चीज है तो फिर यह भी साध्य होकर रहेगा।
ब्रह्मचर्य हीन जीवन मुझे शुष्क और पशुवत् मालूम होता है। पशु स्वभावतः निरंकुश है, परन्तु मनुष्यत्व इसी बात में है कि मनुष्य स्वेच्छा से अपने को अंकुश में रखे। ब्रह्मचर्य की जो स्तुति धर्मग्रंथों में की गई है उसमें पहले मुझे अत्युक्ति मालूम होती थी। परन्तु अब दिन-दिन यह अधिकाधिक स्पष्ट होता जाता है कि वह बहुत ही उचित और अनुभव सिद्ध है।
‘विषय मात्र का निरोध ही ब्रह्मचर्य है।’
सत्याग्रह-सेनापति के शब्द में ताकत होनी चाहिये-वह ताकत नहीं जो असीमित अस्त्र-शस्त्रों से प्राप्त होती है, बल्कि वह जो जीवन की शुद्धता, दृढ़ जागरुकता और सतत आचरण से प्राप्त होती है। यह ब्रह्मचर्य का पालन किये बगैर असम्भव है। ब्रह्मचर्य का अर्थ यहाँ खाली दैहिक आत्म संयम का निग्रह ही नहीं है। इसका तो इससे कहीं अधिक अर्थ है। इसका मतलब है सभी इन्द्रियों पर पूर्ण नियमन। इस प्रकार अशुद्ध विचार भी ब्रह्मचर्य का भंग है और यही हाल क्रोध का है।
सारी शक्ति उस वीर्य शक्ति की रक्षा और ऊर्ध्वगति से प्राप्त होती है जिससे कि जीवन का निर्माण होता है। अगर इस वीर्य-शक्ति का, नष्ट होने देने के बजाय संचय किया जाय तो यह सर्वोत्तम सृजन शक्ति के रूप में परिणत हो जाती है। बुरे या अस्त-व्यस्त, अव्यवस्थित, अवाँछनीय विचारों से भी इस शक्ति का बराबर और अज्ञात रूप से क्षय होता रहता है और चूँकि विचार ही सारी वाणी और क्रियाओं का मूल है इसलिये वे भी इसी का अनुकरण करती हैं। इसीलिये पूर्णतः नियंत्रित विचार खुद ही सर्वोच्च प्रकार की शक्ति है और स्वतः क्रियाशील बन सकता है। मूक रूप में की जाने वाली हार्दिक प्रार्थना का मुझे तो यही अर्थ मालूम पड़ता है। अगर मनुष्य ईश्वर की मूर्ति का उपासक है तो उसे अपने मर्यादित क्षेत्र के अन्दर किसी बात की इच्छा भर करने की देर है, जैसा वह चाहता है वैसा ही बन जाता है। जिस तरह चूने वाले नल में भाप रखने से कोई शक्ति पैदा नहीं होती, उसी प्रकार जो अपनी शक्ति का किसी भी रूप से क्षय होने देता है उसमें इस शक्ति का होना असम्भव है।
“ब्रह्मचारी रहने का यह अर्थ नहीं कि मैं किसी स्त्री को स्पर्श न करूं, अपनी बहिन का स्पर्श न करूं। ब्रह्मचारी होने का अर्थ यह है कि स्त्री का स्पर्श करने से किसी प्रकार का विकार न उत्पन्न हो जिस तरह कि कागज को स्पर्श करने से नहीं होता। मेरी बहिन बीमार हो और उसकी सेवा करते हुए उसका स्पर्श करते हुए ब्रह्मचर्य के कारण मुझे हिचकना पड़े तो वह ब्रह्मचर्य तीन कौड़ी का है। जिस निर्विकार दशा का अनुभव हम मृत शरीर को स्पर्श करके कर सकते हैं उसी का अनुभव जब हम किसी सुन्दरी युवती का स्पर्श करके कर सकें तभी हम ब्रह्मचारी हैं।
मुझे यह बात कहनी होगी कि ब्रह्मचर्य व्रत का तब तक पालन नहीं हो सकता जब तक कि ईश्वर में जो कि जीता जागता सत्य है, अटूट विश्वास न हो।
आज देश का वातावरण बड़ा क्षुब्ध और अशाँत है। द्वितीय महायुद्ध के दिनों में भय और आशंका का वातावरण रहता था। पर चूँकि युद्ध क्षेत्र दूर था और इसलिए बहुत अधिक व्याकुलता नहीं थी और सामूहिक आक्रमण होने पर उससे बचने के सामूहिक उपायों का ढाढ़स था आज उससे भिन्न अवस्था है। ‘फूट डालो और लूट खाओ’ की साम्राज्यवादी नीति ने साम्प्रदायिक मतभेद इस देश में पैदा किये और विभिन्न तरीकों से उन्हें प्रोत्साहित किया। आज वह विष बेल बढ़ते चारों ओर छा गई है। राजनैतिक महत्वकाँक्षाओं की अभीष्ट सिद्धि करने के लिए अगुआ लोग तनातनी और कटुता को बढ़ाते ही जा रहे हैं। इस अवांछनीय स्थिति के कारण साम्प्रदायिक वैमनस्य बढ़ता जा रहा है। एक वर्ग जब निरन्तर घृणा, कटुता, उत्तेजना, द्वेष उगले तो दूसरा वर्ग कितना ही शाँतिप्रिय क्यों न हो उसकी प्रतिक्रिया से वंचित नहीं रह सकता। ढेला फेंकने पर शाँत तालाब में भी लहरें उठने लगती हैं। कुएं की आवाज के समान मनुष्य स्वभाव भी क्षोभ वान है। दूसरों के व्यवहार की प्रतिक्रिया से उत्तेजना उत्पन्न होने से मनुष्य अपने आपको बचा नहीं सकता। दूसरों के दुर्व्यवहारों से जो कष्ट और क्लेश मिलता है उससे बचने के लिए आत्मरक्षा की दृष्टि से भी दुर्व्यवहारों के विरोध में कुछ न कुछ उपाय करना पड़ता है। आक्रमण की प्रतिक्रिया भी होती है, कुचल जाने पर चींटी भी काटने को तैयार हो जाती है।
हिन्दू-मुस्लिम समस्या नाम की वास्तव में कोई समस्या नहीं है। इनमें आपसी रोटी बोटी के व्यवहार नहीं है, एक दूसरे से छूतछात भी मानती है। हिन्दू धर्म में अनेकों परस्पर विरोधी रीति रिवाज, विचार एवं मान्यताएं प्रचलित हैं फिर भी सब आपस में परस्पर प्रेम पूर्वक सदियों से साथ-साथ रहते हुए चले आ रहे हैं। सैंकड़ों जातियाँ, उप जातियाँ, सम्प्रदाय, मत मतान्तर, भाषा, भेष आदि का होना कभी कलह या पृथकता का कारण नहीं बना। महाराष्ट्र, पंजाब, मद्रास आदि के निवासियों में कई दृष्टियों से काफी अन्तर दिखाई पड़ता है पर उस अन्तर के कारण कोई किसी से न तो लड़ता झगड़ता है और न पृथकता का दावा करता है। एक दूसरे को दुश्मन समझने और छोटी-छोटी बातों की आड़ लेकर कोई किसी की जान का ग्राहक नहीं बनता। शाँतिप्रियता भारतीय संस्कृति का प्रधान अंग है।
भारत के हिन्दू और मुसलमानों में एक ही रक्त है। एक ही जाति और एक ही वंश के हैं। धर्म या मजहब को बदल लेने मात्र से आज का भाई कल दुश्मन या विदेशी नहीं हो सकता। धर्म व्यक्तिगत रुचि की वस्तु है, उसे बदला जा सकता है पर इतने मात्र से उस प्रकार की पृथकता के दावे नहीं किये जा सकते जैसे कि लीगी नेता आज कल कर रहे हैं।
आज के युग में कूटनीति का बोल बाला है। अपनी मनमानी करने के लिए चाहे जिस पर चाहे जैसे इल्जाम लगाकर सीधी-साधी जनता को भड़का कर विद्वेष और घृणा उत्पन्न करना और उन स्थितियों से लाभ उठाकर खुद नेता बन बैठना, आज की राजनीति का बेढ़व जादू है। इस जादूगरी ने सीधे साधे लोगों को दिक् भ्रम करा दिया है। भाई-भाई को दुश्मन मान बैठा है। एक दूसरे का गला काटने के लिए आक्रमण कटिबद्ध हो रहा है।
विगत कई वर्षों से साम्प्रदायिक दंगों का जोर पड़ा है। अभी हाल में अहमदाबाद, इलाहाबाद, कलकत्ता, बम्बई, ढाका आदि में जो दंगे हुए हैं, उसके रोमाँचकारी वृत्तान्तों को सुनकर कलेजा काँप उठता है। निर्दोष बालकों, वृद्धों, महिलाओं के साथ नृशंसता बरती गई उसे देखकर तो यही कहना पड़ता है, मनुष्य जाति पशुता से अभी बहुत कम ऊपर उठ सकी है। जो लोग इस प्रकार की पशुता उभारते हैं, भड़काते हैं और उससे अपनी नेतागीरी को मजबूत बनाने जैसे नीच काम करते हैं उनको किन शब्दों में क्या कहा जाय यह समझ में नहीं आता।
घृणा और द्वेष का निरन्तर प्रचार और विस्तार करने वाले नेता चैन की छानते हैं और निर्दोष जनता को उसका घातक परिणाम भुगतना पड़ता है। कानून, लड़ने वालों को तो पकड़ता है पर लड़ाने वालों के विरुद्ध कुछ भी करने में अपने आपको असमर्थ पाता है। इस स्थिति को भारतीय जनता का दुर्भाग्य ही कह सकते हैं। भगवान इस बुद्धि से न जाने कब तक हमें पार करेंगे।
आज इस दुर्बुद्धि के कारण चारों ओर अशाँति, आशंका और भय का वातावरण छाया हुआ है। जिन नगरों में साम्प्रदायिक विद्वेष वृद्धि पर है वहाँ के शाँति प्रिय लोगों को आकस्मिक विपत्ति की आशंका हर घड़ी बनी रहती है। मुस्लिम लीग सीधी कार्यवाही के नाम पर लोगों से क्या कराने जा रही है इसका कुछ आभास तभी से लगने लगा है जब से लीगी नेता चंगेज खाँ को धमकी दे रहे हैं और ‘अहिंसा’ पर अविश्वास प्रकट कर रहे हैं। वर्तमान राजनैतिक घटना चक्र के कारण साम्प्रदायिक उपद्रवों की आशंका बहुत बढ़ गई है।
जनता की जान माल को गुंडागिरी के आक्रमण से बचावे यह सरकार का कर्त्तव्य है। पर साथ ही हमें स्वयं भी सतर्क, सावधान रहना चाहिए और आत्मरक्षा के लिए सभी शाँतिमय साधनों से अपने आपको प्रस्तुत रखना चाहिए। थोड़े से संगठित बदमाश, असंगठित विपुल जन समूह को आतंकित कर देते हैं। अक्सर दस पाँच गुण्डे उपद्रव आरंभ करते हैं, उस उपद्रव को देखकर सब लोग भाग खड़े होते हैं, बाजार बंद हो जाते हैं और लोग अपने अपने घरों में भागकर छुप जाते हैं। इस भगदड़ का वे मुट्ठी भर बदमाश लाभ उठाते हैं और लूटमार, अग्निकाण्ड, हत्या आदि के मनमाने उपद्रव निधड़क होकर करते हैं। उन्हें इस प्रकार का खुला अवसर देने का बहुत कुछ दोष इन भगदड़ करने वालों पर भी है। इस भगदड़ का कारण आपस में एक दूसरे के सहयोग पर अविश्वास होना है। एक निर्दोष व्यक्ति सताया जा रहा हो तो उसकी सहायता करने की बजाय चुप रहने या भागने का विचार बहुत ही अनैतिक है। निर्दोष की सहायता करना और आक्रमणकारी को रोकना यह हर एक विचारवान व्यक्ति का कर्त्तव्य है, बिना इस कर्त्तव्य का पालन किये संगठित गुंडागिरी को नहीं रोका जा सकता। इसलिए हर जगह इस प्रकार के संगठन किये जाने चाहिए कि दूसरों की परवाह न करके केवल मात्र अपनी सुरक्षा की तरकीब सोचने की अपेक्षा सामूहिक सुरक्षा के लिए तत्पर रहेंगे। अपनी-अपनी बात सोचने से कोई किसी की मदद को नहीं आता और सब पिटते हैं। सबके साथ-साथ खुद भी बच जाते हैं। अकेलेपन में जितनी हानि की आशंका है, सामूहिकता में वह बहुत कम हो जाती है।
प्रेम, सहयोग, सद्भाव, संगठन सदा ही अच्छे होते हैं क्योंकि यह अध्यात्मिक गुण हैं। पर आजकल साम्प्रदायिक अशाँति के दिनों में तो हम इन्हें पूरी तरह चरितार्थ करके अपने जान माल की बचत कर सकते हैं और साम्प्रदायिक उपद्रवकारियों के आक्रमणों से बच सकते हैं। सामूहिक चौकीदारी, सामूहिक स्वयं सेवा, सामूहिक रक्षा के लिए सदा तत्परता यह सामूहिकता का आध्यात्मिक कार्यक्रम शीघ्र से शीघ्र हमारे व्यवहारिक जीवन में प्रयुक्त होना चाहिए। आत्म रक्षा की शिक्षा उसके उपयुक्त साधनों का संग्रह तो आवश्यक है ही पर सबसे आवश्यक और सर्व प्रधान सामूहिक सहयोग की भावना है उसे हमें बढ़ाना चाहिए। इस संघ शक्ति की ढाल के नीचे से हम आततायी तत्वों से अपनी रक्षा कर सकते हैं। हमें अपने संगठन की आज सबसे अधिक आवश्यकता है।
साधारण रीति से सभी राम नाम लेते रहते हैं पर उसका कोई विशेष फल नहीं होता। विधि पूर्वक राम नाम लेने से ही नाम महात्म्य का वास्तविक फल प्राप्त होता है। कहा भी है-
राम नाम सब कोई कहे, दश ऋत कहे न कोय।
एक बार दशऋत कहे, कोटि यज्ञ फल होय॥
दशऋत के साथ राम नाम लेने से कोटि यज्ञों का फल होना इस अभिवचन में माना गया है। ऋत कहते हैं दोषों को -दंशों इन्द्रियों की कुवासनाओं को त्याग कर, चित्त को सदाचारी और सात्विक बना कर जब परमात्मा का नाम लिया जाता है तो उससे सच्चा लाभ प्राप्त होता है।
नाम जप करने वालों के लिए शास्त्रकारों ने दश नामापराध बताये हैं और उनसे बचे रहने का कठोर आदेश किया है। जैसे औषधि सेवन के साथ-साथ परहेज से रहना भी आवश्यक है उसी प्रकार नाम जप करने वालों को दस नामापराधों से बचना भी आवश्यक है। परहेज बिगाड़ने से, कुपथ्य करने से, अच्छी औषधि का सेवन भी निष्फल हो जाता है, उसी प्रकार नामापराध करने से नाम जप भी निष्फल चला जाता है। दशऋतों से दश नामापराधों से बचकर राम नाम जपने से कोटि यज्ञों का फल प्राप्त होता है। वे दश ऋत यह हैं-
सान्निन्दासति नामवैभव कथा श्रीशेशयोर्भेदधी-
रश्रद्धा गुरु शास्त्र वेद वचने नाम्न्यर्थवादभ्रमः नामास्तीतिनिषिद्ध वृत्ति विहित्त त्यागौहि धर्मान्तरैः, साम्यं नाम जपे शिवस्य च हरेर्नामापराधा दश।
1. सन्निन्दा 2. असति नाम वैभव कथा 3. श्रीशेशयोर्भेदधीः 4. अश्रद्धा गुरु वचने 5. शास्त्र वचने 6. वेद वचने 7. नाम्न्यर्थवाद भ्रमः 8. नामास्तीति निषिद्ध वृत्ति 9. विहित त्याग 10. धर्मान्तरे साम्यम्। यह दश नामापराध या ऋत हैं इनको त्यागने से नाम जप का कोटि यज्ञ फल प्राप्त होता है। इन दसों का खुलासा नीचे किया जाता है।
1. सत् निन्दा- सत् पुरुषों की, सज्जनों की, सत्य की, सच्चे कार्यों की, सत् सिद्धाँतों की, किसी स्वार्थ से प्रेरित होकर निन्दा करना। सत्य पर चलने की, सत् सिद्धान्तों को अपनाने का किसी लोभ या भय से साहस न होता हो तो लोग अपनी कमजोरी छिपाने के लिए सत्य बातों का या सत् पुरुषों का ही किसी मिथ्या आधार पर विरोध करने लगते हैं, यह ‘सन्निन्दा’ है। शत्रु में भी सत्यता हो तो उस सत्यता की तो प्रशंसा ही करनी चाहिए।
2. असति नाम वैभव कथा- असत्य के आधार पर बढ़े हुए व्यक्तियों या सिद्धान्तों के नाम या वैभव की प्रशंसा करना। कितने ही झूठे, पाखण्डी, अत्याचारी व्यक्ति अपनी धूर्तता के आधार पर बड़े कहलाने लगते हैं। उनकी चमक दमक से आकर्षित होकर उनकी प्रशंसा करना या उनके वैभव का लुभावना वर्णन करना त्याज्य है। असत्य की सदा निन्दा ही की जानी चाहिए, झूठे आधार पर मिली हुई सफलताओं को इस प्रकार समझना या समझाना कि उसका अनुकरण करने का लोभ पैदा हो, नामापराध है।
3. श्रीशेशयोर्भेदधीः- विष्णु महादेव आदि देवताओं में भेद बुद्धि रखना उन्हें अलग-अलग मानना। एक ही सर्वव्यापक सत्ता की विभिन्न शक्तियों के नाम ही देवता कहलाते हैं। वस्तुतः परमात्मा ही एक देव है। अनेक देवों के आस्तित्व के भ्रम में पड़ना-नाम जप करने वाले के लिये उचित नहीं।
4. अश्रद्धा गुरु वचने- सद्गुरु, धर्मविद् तत्वदर्शी, निस्पृह, आप्तपुरुषों के सद्वचनों में अश्रद्धा रखना। विरोध न करते हुए भी उदासीन रहना अश्रद्धा कहलाती है। सद्गुरुओं के लोक हितकारी सद्वचनों में श्रद्धा रखनी चाहिये।
5. अश्रद्धा शास्त्र वचने- शास्त्र के वचनों में अश्रद्धा रखना, यों तो कितनी ही पुस्तकें साम्प्रदायिक परस्पर विरोधी और असंगत बातों से भरी रहने पर भी शास्त्र कहलाती हैं पर वास्तविक शास्त्र वह है जो सत्यता, लोकहित, कर्त्तव्य परायणता और सदाचार का समर्थन करता हो। इस कसौटी पर जो ज्ञान खरे सोने के समान ठीक उतरता हो वह शास्त्र है। ऐसे शास्त्रों के वचनों पर अश्रद्धा नहीं करनी चाहिए।
6. अश्रद्धा वेद वचने- अर्थात् वेद वाक्य में अश्रद्धा रखना। वेद-ज्ञान को कहते हैं। ज्ञानपूर्ण, विवेकपूर्ण, सद्बुद्धि सम्मत वचनों में अश्रद्धा नहीं करनी चाहिये। वेद, सत्य ज्ञान के आधार होने के कारण श्रद्धा करने योग्य हैं।
7. नाम्न्यर्थ वाद भ्रमः- नाम के अर्थवाद में भ्रम करना। ईश्वर के अनेक नामों के अर्थ में जो भिन्नता है उसके कारण भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये। गोपाल, मुरलीधर, यशोदा नन्दन, राम, रघुनाथ, दीनबन्धु, अल्लाह, गौड़ आदि नामों के शब्दार्थ पृथक-पृथक हैं। इन अर्थों से तत्व के अलग-अलग होने का भ्रम होता है, यह ठीक नहीं। सब नाम उस एक परमात्मा के हैं। इसलिए परमात्मा के संबंध में किसी पृथकता के भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए।
8. नामास्तीति निषिद्ध वृत्ति- नाम तो है ही फिर अन्य बातों की क्या जरूरत ऐसी निषिद्ध वृत्ति। ईश्वर का नाम उच्चारण करने मात्र से सब पाप कट जावेंगे, इसलिए पाप करने में कुछ हर्ज नहीं ऐसा कितने ही लोग सोचते हैं। दिन रात कुविचारों में और कुकर्मों में लगे रहते हैं, उनके फल से बचने का सहज नुस्खा ढूँढ़ते हैं कि दो चार रामनाम जबान में कह दिया बस बेड़ा हो गया। सारे पाप नष्ट हो गये। यह भारी अज्ञान है। परमात्मा निष्पक्ष, सच्चा न्यायाधीश है। वह खुशामद करने वाले के न तो पाप माफ करता है और न बिना खुशामद करने वाले के पुण्यों को रद्द करता है। कर्मों का यथायोग्य फल देना उसका सुदृढ़ नियम है। इसलिए आत्म बल बुद्धि के लिये नाम स्मरण करते हुए भी यही आशा करनी चाहिए कि परमात्मा हमारे भले बुरे कर्मों का यथायोग्य फल अवश्य देगा। जो पापनाश की आशा लगाये बैठे रहते हैं और कुमार्ग को छोड़कर सन्मार्ग पर चलने का प्रयत्न नहीं करते वे नामापराध करते हैं।
9. विहित त्याग- विहित कर्मों का त्याग, उत्तरदायित्व का छोड़ना, कर्त्तव्य धर्म से मुँह मोड़ना नामापराध है। कितने ही मनुष्य ‘संसार मिथ्या है, दुनिया झूठी है।’ आदि महावाक्य का सच्चा रहस्यमय अर्थ न समझकर अपने कर्त्तव्य धर्म एवं उत्तरदायित्व को छोड़कर घर से भाग जाते हैं, इधर-उधर आवारागर्दी में दुर्व्यसनियों के कुसंग में मारे फिरते हैं। यह अनुचित है। ईश्वर प्रदत्त उत्तरदायित्वों और कर्त्तव्य धर्मों को पूरी सावधानी और ईमानदारी से पूरा करते हुए भगवान का नाम स्मरण करना चाहिए।
10. धर्मान्तरैः सम्यक्- धर्म से इतर, धर्म विरुद्ध बातों को भी धर्म की समता में रखना। अनेक सामाजिक कुरीतियाँ ऐसी हैं जो धर्म विरुद्ध होते हुए भी धर्म में स्थान पाती हैं जैसे पशु बलि एवं स्त्री और शूद्रों के साथ होने वाले असमानता तथा अन्याय के व्यवहार धर्म के नाम पर प्रचलित हैं पर वास्तव में वे अधर्म है। ऐसे अधर्मों को धर्म में जोड़ना, धर्म की समता में रखना, नामापराध है। कर्त्तव्य कर्म ही धर्म कहलाते हैं। अकर्तव्यों को रूढ़िवाद के कारण धर्म साम्य नहीं बनाना चाहिए।
इन दशऋतों से शुद्ध होकर इन्हें त्याग कर, दसों इन्द्रियों को संयम में रखकर, सत्य और धर्म से जीवन को ओत-प्रोत बनाते हुए जो लोग नाम जप करते हैं, भगवान का नामोच्चार करते हैं उन्हीं की आत्मा पवित्र होती है और वे ही कोटि यज्ञ फल के भागी होते हैं। वैसे तो तोते भी राम-राम रटते रहते हैं इससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है।
पाठकों को दशऋत होकर नाम जप करना चाहिए। और याद रखना चाहिए कि-
राम नाम सब कोई कहे, दशऋत कहे न कोय, एक बार दशऋत कहे, कोटि यज्ञ फल होय।
(2)
हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों में आधे से अधिक श्राद्ध तत्व भरा हुआ है। सूरज, चाँद, ग्रह, नक्षत्र, पृथ्वी, अग्नि, जल, कुआँ, तालाब, नदी, मरघट, खेत खलिहान, भोजन, चक्की, चूल्हा, तलवार, कलम, जेवर, रुपया, घड़ा, पुस्तक आदि निर्जीव पदार्थों की विवाह या अन्य संस्कारों में अथवा किन्हीं विशेष अवसरों पर पूजा होती है। यहाँ तक कि नाली या कूड़े तक की पूजा होती है। तुलसी, पीपल, वट, आँवला आदि पेड़-पौधे तथा गौ, बैल, घोड़ा, हाथी आदि पशु पूजे जाते हैं। इन पूजाओं में उन जड़ पदार्थों या पशुओं को कोई लाभ नहीं होता, परन्तु पूजा करने वाले के मन में श्रद्धा एवं कृतज्ञता का भाव जरूर उदय होता है। जिन जड़ चेतन पदार्थों से हमें लाभ मिलता है उनके प्रति हमारी बुद्धि में उपकृत भाव होना चाहिए और उसे किसी न किसी रूप में प्रकट करना ही चाहिए। यह श्राद्ध ही तो है। मृतकों का ही नहीं, जीवितों, जानदारों और बेजानों का भी हम श्राद्ध करते हैं। ऐसे श्राद्ध के लिये हमारे शास्त्रों में पग-पग पर आदेश है।
मरे हुए व्यक्तियों को श्राद्ध कर्म से कुछ लाभ होता है कि नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि-होता है, अवश्य होता है। संसार एक समुद्र के समान है जिसमें जल कणों की भाँति हर एक जीव है। विश्व एक शिला है तो व्यक्ति उसका एक परमाणु। हर एक आत्मा जो जीवित या मृत रूप से इस विश्व में मौजूद है अन्य समस्त आत्माओं से सम्बद्ध है। संसार में कहीं भी अनीति, युद्ध, कष्ट, अनाचार, अत्याचार हो रहे हैं तो सुदूर देशों के निवासियों के मन में भी उद्वेग उत्पन्न होता है। जब जाड़े का प्रवाह आता है तो हर चीज ठण्डी होने लगती है और गर्मी की ऋतु में हर चीज की उष्णता बढ़ जाती है, छोटा सा यज्ञ करने से उसकी दिव्यागन्ध तथा दिव्य भावना समस्त संसार के प्राणियों को लाभ पहुँचाती है। इसी प्रकार कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिए किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शाँतिमयी सद्भावना की लहरें पहुँचाता है। यह सूक्ष्म भाव तरंगें सुगंधित पुष्पों की सुगंध की तरह तृप्ति कारक आनन्द और उल्लासवर्धक होती हैं, सद्भावना की सुगंध जीवित और मृतक सभी को तृप्त करती है। इन सभी में अपने स्वर्गीय पितर भी आ जाते हैं। उन्हें भी श्राद्ध यज्ञ की दिव्य तरंगें आत्मशाँति प्रदान करती हैं।
मर जाने के उपरान्त जीव का अस्तित्व मिट नहीं जाता वह किसी न किसी रूप में इस संसार में ही रहता है। स्वर्ग, नरक निर्देह, गर्भ, संदेह आदि किसी न किसी अवस्था में इस लोक में ही बना रहता है। इसके प्रति दूसरों की सद्भावनाएं तथा दुर्भावनायें आसानी से पहुँचती रहती हैं। स्थूल वस्तुएं एक स्थान से दूसरे स्थान तक देर में कठिनाई से पहुँचती है परन्तु सूक्ष्म तत्वों के संबंध में यह कठिनाई नहीं है उनका यहाँ वहाँ आवागमन आसानी से हो जाता है। हवा, गर्मी, प्रकाश, शब्द आदि को बहुत बड़ी दूरी पार करते हुए कुछ विलम्ब नहीं लगता। विचार और भाव इससे भी सूक्ष्म हैं वे उस व्यक्ति के पास जा पहुँचते हैं जिसके लिए वे फेंके जाय। सताये हुए व्यक्तियों की आत्मा को जो क्लेश पहुँचता है उसका शाप शब्द बेधी तीर या राकेट बम की तरह निश्चित स्थान पर जा पहुँचता है। सेवा, संतुष्ट, उपकृत, अहसानमंद, कष्ट उद्धरति व्यक्ति की सद्भावना, दुआ, वरदान, आशीर्वाद भी इस प्रकार उपकारी व्यक्ति के पास पहुँचते हैं जिसने कोई परोपकार किया है। कोई व्यक्ति जीवित हो या मृतक उसके पास जहाँ कहीं भी वह रहे लोगों के शाप, वरदान पहुँचते हैं उसे मालूम हो पावे या न हो पावे वे शाप, वरदान उसे दुख या सुख देने वाले परिणाम उसके सामने उपस्थित करते रहते हैं। इसी प्रकार कृतज्ञता की श्रद्धा की भावना भी उस व्यक्ति के पास पहुँचती है जिसके लिए वह भेजी जाती है। फिर चाहे वह स्वर्गीय व्यक्ति किसी भी योनि या किसी भी अवस्था में क्यों न हो। श्राद्ध करने वाले का प्रेम, आत्मीयता कृतज्ञता की पुण्य युक्त सद्भावना उस पिता आत्मा के पास पहुँचती है और उसे आकस्मिक, अनायास, अप्रत्याशित, सुख, शाँति प्रसन्नता, स्वस्थता एवं बलिष्ठता प्रदान करती है। कई बार कई व्यक्तियों को आकस्मिक, अकारण आनन्द एवं संतोष का अनुभव होता है संभव है यह उनके पूर्व संबंधियों के श्राद्ध का ही फल हो।
श्रद्धा- कृतज्ञता हमारे धार्मिक जीवन का मेरु दंड है। यह भाव निकल जाय तो धार्मिक समस्त क्रियाएं व्यर्थ, नीरस एवं निष्प्रयोजन हो जायेगी। श्रद्धा के अभाव में यज्ञ करना और भट्टी जलाना एक समान है। देव मूर्तियों और बालकों के खिलौनों में, शास्त्र श्रवण और कहानी कहने में, प्रवचनों और ग्रामोफोन के रिकार्डों में कोई अन्तर न रह जायेगा। अश्रद्धा एक दावानल है जिसमें ईश्वर, परलोक, कर्मफल, धर्म, सदाचार, दान, पुण्य, परोपकार, प्रेम, एवं सेवा सहायता पर से विश्वास उठता है और अन्त में अश्रद्धालु व्यक्ति अपनी छाया पर, अपने आप पर भी अविश्वास करने लगता है। भौतिक वादी नास्तिक दृष्टिकोण और धार्मिक आस्तिक दृष्टिकोण में प्रधान अन्तर यही है। भौतिकवादी नीरस, शुष्क, कठोर दृष्टिकोण वाला व्यक्ति स्थूल व्यापार बुद्धि से सोचता है, वह कहता है पिता मर गया-अब उससे हमारा क्या रिश्ता जहाँ होगा अपनी करनी भुगत रहा होगा उसके लिए परेशान होने से हमें क्या मतलब? इसके विपरीत धार्मिक दृष्टि वाला व्यक्ति स्वर्गीय पिता के अपरिमित उपकारों का स्मरण करके कृतज्ञता के बोझ से नत मस्तक हो जाता है, उस उपकार मयि स्नेह मयि देवोपम स्वर्गीय मूर्ति के निस्वार्थ प्रेम और त्याग का स्मरण करके उसका हृदय भर जाता है। उसका हृदय पुकारता है ‘स्वर्गीय पितृ देव तुम सशरीर यहाँ नहीं हो, पर कहीं न कहीं इस लोक में आपकी आत्मा मौजूद है। आपके ऋण भार से दबा हुआ मैं बालक आपके चरणों में श्रद्धा की अंजुली चढ़ाता हूँ।’ इस भावना से प्रेरित होकर वह बालक जल की अंजुली भर कर तर्पण करता है।
तर्पण का वह जल उस पितर के पास नहीं पहुँचा वहीं धरती में गिर कर विलीन हो गया, यह सत्य है, यज्ञ में आहुति दी गई सामग्री जल कर वहीं खाक हो गई यह भी सत्य है, पर यह असत्य है कि ‘इस यज्ञ के तर्पण से किसी का कुछ लाभ नहीं हुआ।’ धार्मिक कर्मकाण्ड स्वयं अपने आप में कोई बहुत बड़ा महत्व नहीं रखते, महत्वपूर्ण तो वे भावनाएं हैं जो उन अनुष्ठानों के पीछे काम करती हैं। मनुष्य भावनाशील प्राणी है। दूषित तमोगुणी, नीच भावनाओं को ग्रहण करने से वह असुर, पिशाच, राक्षस एवं शैतान बनता है और ऊंची सात्विक, पवित्र, धर्ममयि भावनायें धारण करके वह महापुरुष, ऋषि, देवता अवतार बन जाता है। यह भावनाएं ही मनुष्य को सुखी, समृद्ध, स्वस्थ, सम्पन्न, वैभवशाली, यशस्वी, पराक्रमी तथा महान बनाती है और इन भावनाओं के कारण ही मनुष्य दुखी, रोगी, दीन, दास, तिरष्कृत तथा तुच्छ हो जाता है। शारीरिक दृष्टि से लगभग सभी समान एक से ही होते हैं उनके बीच जो जमीन आसमान का अन्तर दिखाई पड़ता है यह भावनाओं का ही अन्तर है। धार्मिक दृष्टिकोण, सद्भावनाओं, सात्विक, परमार्थिक वृत्तियों को ऊंचा उठाता है, धार्मिक कर्मकाण्डों का आयोजन इसी आधार पर है, धर्म, हृदय का ज्ञान है। अन्तरात्मा में सतोगुणी तरलता उत्पन्न करना धर्म का, धार्मिक कर्मकाण्डों का मूल प्रयोजन है। समस्त कर्मकाण्डों की रचना का यही आधार है। स्थूल व्यापार बुद्धि से धार्मिक कृत्यों और भावों की उपयोगिता किसी की समझ में आवे चाहे न आवे पर सूक्ष्म दृष्टि से उनका असाधारण महत्व है। इन कर्मकाण्डों में कुछ समय और धन अवश्य खर्च होता है पर उसके फलस्वरूप वे तत्व प्राप्त होते हैं जो मनुष्य प्रेरणा केन्द्र का निर्माण करते हैं। उसके अंतरंग तथा बहिरंग जीवन को सुख-शाँति से पूरित करते हैं।
ब्राह्मणत्व रहित, विद्या, विवेक, आचरण त्याग, तपस्या से रहित, वे व्यक्ति जो शूद्रोपम होते हुए भी वंश परम्परा के कारण ब्राह्मण कहलाते हैं, उन्हें श्राद्ध का या अन्य किसी प्रकार दान प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। श्राद्ध के निमित्त किया हुआ दान या भोजन उन्हीं सच्चे ब्राह्मणों को दिया जाना चाहिये जो वस्तुतः उसके अधिकारी हैं। श्रुतियों में कहा गया है कि ब्राह्मण अग्निमुख है उसमें डाला हुआ अन्न देवता एवं पितरों को प्राप्त होता है, उससे विश्व का कल्याण होता है परन्तु वे ब्राह्मण होने चाहिये अग्निमुख, त्याग, तपस्या, विद्या और विवेक की यज्ञ अग्नि जिनके अन्तःकरण में उज्ज्वलित है वही अग्निमुख है। अग्नि में न डालकर कीचड़ में यदि हवन सामग्री डाली जाय तो कुछ पुण्य न होगा, इसी प्रकार अग्निमुख ब्राह्मणों के अतिरिक्त अन्यों को दिया हुआ दान भी निरर्थक होता है। शास्त्र का मत है कि कुपात्रों को दिया हुआ दान दाता को नरक में ले जाता है।
श्राद्ध करना चाहिये जीवितों का भी, मृतकों का भी। जिन्होंने अपने साथ में किसी भी प्रकार की कोई भलाई की है उसे बार-बार प्रकट करना चाहिये क्योंकि इससे उपकार करने वालों को संतोष तथा प्रोत्साहन प्राप्त होता है। वे अपने ऊपर अधिक प्रेम करते हैं और अधिक घनिष्ठ बनते हैं, साथ-साथ अहसान स्वीकार करने से अपनी नम्रता एवं मधुरता बढ़ती है। उपकारों का बदला चुकाने के लिये किसी न किसी रूप में सदा ही प्रयत्न करते रहना चाहिये जिससे अपने ऊपर रखा हुआ ऋण भार हल्का हो। जो उपकारी, पूजनीय एवं आत्मीय पुरुष स्वर्ग सिधार गये हैं उनके प्रति भी हमें मन में कृतज्ञता रखनी चाहिए और समय-समय पर उस कृतज्ञता को प्रकट भी करना चाहिए। जल की एक अंजली, दीपक या पुष्प से भी श्राद्ध किया जा सकता है। श्राद्ध में भावना ही प्रधान है। श्रद्धा भावना का हमें कभी परित्याग न करना चाहिए। श्रद्धा की परम्परा समाप्त हो जाने पर तो पिता को कैद कर लेने वाले शाहजहाँ ही चारों ओर दृष्टि गोचर होने लगेंगे।
जिन विश्वासों की प्रेरणा से मनुष्य सन्मार्ग की ओर अग्रसर होता है। उन विश्वासों की धारणा ही बुद्धिमानी है।
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शस्त्र युद्ध में विजय प्राप्त करने की अपेक्षा आत्म जय करने में अधिक वीरता है।
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दुनिया में बुराई की कालिमा अधिक है पर वह भलाई की उज्ज्वलता से अधिक नहीं है। यदि यहाँ भलाई की अपेक्षा बुराई अधिक होती तो कोई भी प्राणी इस संसार में रहना पसंद न करता।
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पाप का प्रायश्चित-पश्चाताप है। पश्चाताप का अर्थ है-पाप की पुनरावृत्ति न करना।
(प्रोफेसर श्री रामचरण महेन्द्र एम. ए.)
यदि आप प्रसन्न मुख एवं अह्वादित रहते हैं, अलमस्त और आनन्दी स्वभाव के हैं, तो प्रतिघात और प्रतिकूलताओं को आप हंसते-हंसते चुटकियों में उड़ा सकेंगे। आपके इष्ट मित्र आपको देख कर एक अजीब आकर्षण का अनुभव करेंगे। उत्साही मुद्रा आपके व्यक्तित्व का विशिष्ट अंग है। इसके विपरीत यदि आप प्रसन्न रहने के आदी नहीं है, खिन्न तथा उदास रहते हैं, तो इसका अभिप्राय यह है कि आप संसार की घटनाओं तथा अड़चनों से परास्त हो गए हैं। जीवन को भार स्वरूप समझ बैठे हैं, किसी प्रकार जीवन की गाड़ी खींच रहे हैं। इस परिस्थिति से निकलने के लिए एक बार दिन भर की घटनाओं पर दृष्टि डालिये। आपको किस-किस बात की फिक्र है? कौन-कौन कार्य करने हैं? आपके क्या-क्या कर्त्तव्य हैं? साथ ही प्रतिकूलताओं से युद्ध करने के लिए आपके पास कौन-कौन से साधन हैं। आपके कष्टों को अतिश्योक्ति पूर्ण दृष्टि से न देखिए साथ ही अपनी शक्तियों का मूल्य नीचा न आँकिये। यदि आपके पास जिम्मेदारी का बोझ है, तो साथ ही उसे उठाने की ताकत भी आपके हाथ पाँवों में मौजूद है। अपने उत्तरदायित्वों को बढ़ा-बढ़ा कर न देखो। जो वास्तविक वस्तु स्थिति है, उसी पर दृष्टि एकाग्र करो।
यदि आप गंभीर चिन्तनशील प्रकृति के हैं, बात को समझ बूझ कर ही स्वीकार करते हैं, तो आपके इर्द-गिर्द आने वाले सभी व्यक्ति आपसे सलाह मशवरा लेंगे। चिन्तनशील व्यक्ति श्रद्धा एवं आदर के पात्र होते हैं। लेकिन गंभीरता की अति करना मूर्खता है। वृद्धि होकर गम्भीरता एवं चिंतन शुष्क निराशावादिता, दार्शनिकता या (Melancholia) उदासी, विवाद तथा चिंताकुलता जैसे मानसिक रोगों में परिणीत हो जाता है। मस्तिष्क के तन्तुओं का अत्यधिक तनाव बड़ा घातक है। इससे कभी-कभी प्रमाद तक हो सकता है।
यदि आप किसी भी वस्तु को गम्भीरता से नहीं देखते, यों ही हंसी हंसी में टाल देते हैं या बचा जाते हैं, तो आप में अभी तक बाल स्वभाव का आधिक्य है। आपका स्वभाव मजेदारी में लगा है। उसमें तितली जैसी चंचलता वर्तमान है। विकास का समय आते ही जहाँ जरा सा जोर पड़ा कि स्वभाव मचलने लगता है। यदि आप क्षुद्र चीजों पर मोहित हो जाते हैं, बाजार में रंग-बिरंगी वस्तुओं को देखकर उन पर लट्टू हो जाते हैं, तो अभी दीखने में बुड्ढे होते हुए भी अभी आप बच्चे ही हैं। जीवन को गम्भीरता से देखिये और अपने स्वभाव का परिष्कार कीजिए।
यदि आप में उत्साह की गर्मी है अपने नित्य प्रति के व्यवहार में उत्साह से कार्य करते हैं, अपने पेशे में दिलचस्पी लेते हैं, तो समझ लीजिए कि आप उन्नति के पथ पर चल रहे हैं किन्तु यह स्मरण रखें कि कहीं यह जिन्दगी समाप्त न हो जाय। यदि आप में उत्साह नहीं है तो इसका अभिप्राय यह है कि आपका दिल उस कार्य को करना नहीं चाहता है। आत्मबल तथा इच्छा शक्तियाँ उत्साह के साथ-साथ चलती हैं। वह कारण मालूम कीजिए जिसके कारण आप अपने कार्य में अरुचि दिखा रहे हैं दृढ़ता से मन को वश में कीजिए।
यदि आप में हास्य की वृत्ति है तो उसे बाहर निकालिये। हंसी का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। हास्य आकर्षक व्यक्तित्व का प्रमुख लक्षण है। अनेक जीवन-उलझनें हास्य की वृत्ति से हल हो जाती हैं। यदि आप में हास्य-वृत्ति नहीं तो उसे उत्पन्न कीजिए। हास्य न होने का एक कारण आन्तरिक भय है। इस हीनता की भावना का उन्मूलन कीजिए। यदि आप मजाक करते हैं तो गंदे मजाक से सावधान रहिए। दूसरे का मजाक करने से पूर्व उनके मजाक का बुरा न मानने का प्रण कीजिए।
यदि आप आशावादी और आस्तिक हैं, तो आप सही मार्ग पर चलते रहेंगे। लेकिन आपका आशावाद भक्ति, प्रेम तथा सत्य के आधार पर निर्भर होना चाहिए।
यदि आप निराशावादी या नास्तिक हैं, तो बड़ी भूल कर रहे हैं। चिंता आपको जीते जी चिता में धकेल सकती है। यदि आप जो कुछ आप कर सकते हैं, करते जा रहे हैं तो फिर निराश होने की क्या आवश्यकता है? भविष्य पर निर्भर रहिए।
शारीरिक स्वास्थ्य का भी नैतिक और मानसिक उन्नति से घनिष्ठ सम्बन्ध है। जिसका शरीर ठीक नहीं, उसकी नीति और मन भी बहुधा ठिकाने नहीं रहता। जिस पुरुष के अवयवों का ठीक प्रयोग नहीं होता, उसका शरीर रुग्ण और कमजोर बना रहता है और कुछ नहीं तो उस पुरुष को महाकष्ट होते हैं। कमजोर शरीर वाले में शारीरिक शक्ति कम रहती है और मानसिक शक्ति भी कम हो जाती है। वह साहस के कार्य नहीं कर सकता। उसका प्रत्येक रोगी को अनुभव है। वह लोभ, क्रोध इत्यादि रिपुओं को भी नहीं दबा सकता। रोगी मनुष्य खाने-पीने और भोग-विलास की बातों में लालची हो जाता है। मानसिक शक्ति कम होने के कारण वह इनसे जल्द दब जाता है और वह उनके आधीन हो जाता है। यही बात बुद्धि की भी है। बुद्धि का विकास मस्तिष्क के विकास पर अवलम्बित है। यदि शरीर ठीक नहीं होता तो मस्तिष्क भी ठीक नहीं होता, क्योंकि रुधिर संचारण सब जगह होता रहता है। यदि रुधिर की दशा ठीक नहीं तो मस्तिष्क किस प्रकार ठीक रह सकता है धीरे-धीरे उसकी बुद्धि क्षीण होने लगती है, इसका भी प्रत्येक रोगी को अनुभव है। बुढ़ापे में स्मरण शक्ति कमजोर होती है इसका यही कारण है। शारीरिक क्षीणता पैदा होने से बुद्धि भी अवश्य क्षीण हो जाती है। प्रत्येक वृद्ध पुरुष यही बात बतलाता है। इसलिए जिस किसी को अपने आपको क्षीण होने से बचाना है उसे मेहनत करने से न हिचकना चाहिए।
(प्रो.- श्री गुणवन्तसिंह जी गूँदर खेडा)
राम रावण युद्ध के समय-रावण को सुन्दर सुदृढ़ रथ पर चढ़े हुए देख तथा श्री रामचन्द्र जी को नंगे पैर जमीन पर खड़े देखकर विभीषण के मन में संदेह हुआ कि इस प्रकार पदाति-राम जी रावण को कैसे जीतेंगे। वह श्री राम जी से बोला आप रथ हीन हैं सुदृढ़ रथारुढ़ रावण को कैसे जीतेंगे? तब श्री रामजी ने स्थूल काष्ठमय रथ की अपेक्षा आध्यात्मिक रथ को बताते हुए समझाया कि तात्! प्रिय! ऐसा आध्यात्मिक रथ जिसके पास होता है उसी की निश्चित विजय होती है।
रावण रथी विरथ रघुवीरा।
देखि विभीषण भयउ अधीरा॥
सौरज धीरज तेहि रथ चाका।
सत्यशील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल विवेक दम परिहित घोरे।
क्षमा कृपा समता रजु जोरे॥
ईश भजन सारथी सुजाना।
बिरती चर्म सन्तोष कृपाना॥
दान पर सुबुद्धि सक्ति प्रचंडा।
वर विग्यान कठिन को दण्डा॥
अमल अचल मन त्रोण समाना।
सम जम नियम सिलीमुख नाना॥
अवच अभेद विप्र गुरु पूजा।
एहि सम विजय उपाय न दूजा॥
सखा धर्म मय असरथ जाकें।
जीतन कहँन कतहुँ रिपु ताकें॥
अर्थ- उस आध्यात्मिक रथ के पहिए, 1. शौर्य 2. धैर्य हैं, सत्य और शील मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम-इन्द्रियों का वश में होना और परोपकार ये चार घोड़े हैं। क्षमा, दया, समता रूपी डोरियों से जुड़े हुए हैं। ईश्वर भजन ही चतुर सारथी है। वैराग्य ढाल है, सन्तोष तलवार है। दान-फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है। श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है। निर्मल और अचल शाँत मन तरकस के समान है। यम नियम ही अनेक तीर हैं, इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है।
कबीर ने प्रेमियों की दशा का वर्णन करते हुए कहा हैः-
प्रेम व्यथा तन में बसै, सब तन जर्जर होय।
राम वियोगी ना जिये, जिये तो बौरा होय॥
जिन्हें प्रेम की लगन है, जिनके मन में राम की लगन है, परमात्मा के साकार रूप संसार की सेवा की लगन है वे सच्चे-प्रेमी अपने निजी स्वार्थों निजी आवश्यकताओं की ओर ध्यान न देकर जीवनोद्देश्य में तल्लीन हो जाते हैं। इस तल्लीनता के कारण साँसारिक वैभवों और आरामों से वंचित होकर उन्हें जर्जरता सहन करनी पड़ती है। उन्हें मृत्यु तुल्य कष्ट सहने पड़ते हैं, मौत के मुँह में प्रवेश करना पड़ता है। संकुचित दृष्टि रखने वाले विषय भोगों में डूबी रहने वाली दुनिया की दृष्टि में वह बौरा-बावला बन जाता है। संसार के प्रायः सभी महापुरुषों को कबीर की बताई हुई इस कसौटी पर चढ़कर अपने खरे-खोटे की परीक्षा देनी पड़ी है।
राजा महेन्द्र प्रताप सच्चे अर्थों में प्रेम पुजारी हैं। जापान में युद्ध अपराधी के रूप में वे पकड़े गये थे। तब ऐसा प्रतीत होता था कि उन्हें स्वेच्छाचारी तलवार की धार पर प्राणों की आहुति देनी पड़ेगी, पर प्रभु को धन्यवाद वह घड़ी टल गई और प्रेम पुजारी राजा महेन्द्र प्रताप आज हम लोगों के बीच मौजूद हैं। समस्त देश में उनके आगमन से हार्दिक प्रसन्नता की लहर दौड़ गई, मथुरा वृन्दावन की जनता को तो उसी प्रकार हर्ष हुआ जैसा कि राम के वनवास से लौटने पर अयोध्या के वासियों को हुआ था।
राजा साहब की जन्मभूमि मथुरा से आठ कोस दूर मुरसान है। मुरसान नरेश राजा घनश्याम सिंह के घर आप 1 दिसम्बर सन 1886 को पैदा हुए। ढाई वर्ष की आयु में हाथरस के राजा हरिनारायण सिंह ने आपको गोद ले लिया। राजा हरिनारायण सिंह प्रायः वृन्दावन के अपने महल में ही समय व्यतीत करते थे, राजा साहब का रहना भी वहीं हुआ। जींद के राजा की बहिन से आपका विवाह सोलह वर्ष की आयु में हो गया। राजा हरिनारायण सिंह उन्हें सात वर्ष का ही छोड़कर स्वर्ग सिधार गये थे। अतएव रियासत सरकारी प्रबंध में चली गई थी। बालिग होने पर रियासत का प्रबंध आपके हाथ में आ गया। 18 वर्ष की आयु में रानी साहिबा सहित आपने यूरोप के प्रायः सभी देशों का भ्रमण किया।
स्वतंत्र देशों का वातावरण स्वतंत्र होता है। जो देश आजादी की साँस लेते हैं उनमें जीवन होता है। राजनैतिक गुलामी के बन्धनों में जो लोग जकड़े रहते हैं उन्हें मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, दैहिक, दैविक, भौतिक सभी प्रकार के बंधनों में बंधा रहने के लिए विवश होना पड़ता है। राजनैतिक स्वाधीनता के बिना किसी देश की जनता सुखी नहीं रह सकती इस सत्य का साक्षात्कार उन्हें योरोप की यात्रा में हुआ। भारत की जनता और योरोप की जनता की तुलना करने पर उनके हृदय को भारी आघात पहुँचा। यों सैर सपाटे के लिए राजा रईस विलायत जाते रहते हैं और वहाँ ऐश करते गुलछर्रे उड़ाते और धन को पानी की तरह बहाते हैं पर राजा महेन्द्र प्रताप दूसरी धातु के बने हुए थे, विदेशों की तुलना में भारत की दयनीय दुर्दशा देखकर उनका हृदय रो पड़ा।
यूरोप की यात्रा से लौटकर राजा साहब ने नरनारायण के जनता जनार्दन के चरणों पर अपना आत्म समर्पण करने का संकल्प किया। सच्चा भक्त, सच्चा प्रेमी अपने आराध्यदेव के ऊपर सर्वस्वा निछावर कर देता है, राजा साहब ने भक्तों की इस सनातन परम्परा को शिरोधार्य किया और अपना निजी जो कुछ था उसे निछावर कर दिया। अपने परिवार के खर्च के लिए थोड़ी सी जमीन बचाकर शेष सारा राजपाट, महल, तिवारे जनता के लाभ के लिए अर्पण कर दिए। वृन्दावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना पुत्र उत्पन्न की खुशी जैसा समारोह मनाते हुए की। महामना मालवीय जी ने इस अद्भुत पुत्र का नामकरण संस्कार करते हुए प्रेम महाविद्यालय नाम रख दिया। इस विद्यालय के खर्च के लिए राजा साहब ने अपनी जमीन जायदाद दे दी। यह विद्यालय विगत 38 वर्षों से कला कौशल की शिक्षा देकर उन्हें आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बनाता है और उनके अन्दर ऐसे भाव भरता है जिससे वे देश सेवा में महत्वपूर्ण भाग लें। इस विद्यालय के विद्यार्थियों और कार्यकर्ताओं ने स्वाधीनता संग्राम को आगे बढ़ाने के लिए जो कार्य किया है वह स्वर्णाक्षरों में लिखा जाने योग्य है।
राजा साहब बहुत काल तक विद्यालय का संचालन स्वयं अपने हाथों करते रहे और ग्राम्य संगठन, अछूतोद्धार, राष्ट्रीय शिक्षा, स्वदेशी प्रचार, साम्प्रदायिक एकता आदि रचनात्मक कार्यों में बड़े उत्साह से जुटे रहे। अपने प्रेमी हृदय की पुकार प्रेम भरे शब्दों में सर्व साधारण तक पहुँचाने के लिए ‘प्रेम’ नामक पाक्षिक पत्र निकाला। जिसमें सच्चे प्रेम की, वास्तविक ईश्वर भक्ति की लोक सेवा की आध्यात्मिक चर्चा रहती थी। भक्ति के आडम्बरी और पाखण्डी रूप से बचते हुए सच्ची प्रेम भावना का प्रचार करने के लिए उन्होंने एक ‘प्रेम क्लब’ भी कायम किया जिसके द्वारा महत्वपूर्ण कार्य हुए। देहरादून में ‘निर्बल सेवक समाज’ स्थापित की और ‘निर्बल सेवक’ पत्र निकाला।
उपयोगी ज्ञान एकत्रित करने के लिए सन 1912 में आप फिर योरोप की यात्रा करने गये और एक वर्ष विभिन्न देशों का भ्रमण करके वापिस लौट आये।
सन 1914 का महायुद्ध शुरू होने पर देखा कि यह उचित अवसर है। जर्मनी की सहायता से भारत को स्वतंत्र कराना चाहिए। इस निश्चय को कार्यान्वित करने के लिए वे बिना पासपोर्ट के ही जहाज द्वारा विलायत जाने में अपनी चतुरता के कारण सफल हो गए। जर्मन सम्राट विलियम कैसर से वे मिले, कैसर ने उनके सहयोग का बड़ा आदर किया और भारत को स्वाधीन कराने में सहायता देने का वचन दिया। युद्ध के दौरान में राजा साहब बराबर अपनी उद्देश्य पूर्ति के लिए प्रयत्न करते रहे पर घटनाचक्र अनुकूल न पड़ा। लड़ाई में जर्मनी हार गया। राजा साहब को भारत से निर्वासित होना पड़ा।
सन् 1918 से लेकर दूसरा महायुद्ध शुरू होने तक राजा साहब संसार भर में भारत की स्वाधीनता के लिए प्रयत्न करते हुए फिरते रहे। पाँच बार उन्होंने सारी पृथ्वी की परिक्रमा की। रूस में लेनिन तथा ट्राटस्की से भारत की समस्याओं के बारे में गम्भीर मंत्रणाएं करते रहे। अफगानिस्तान के बादशाह अमातुल्ला आपके घने मित्र थे, उन्होंने राजा जी को आर्थिक सहायता तथा राजकीय सम्मान देने की कमी न की। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए समय-समय पर कोशिशें की पर वह राजा जी की चतुराई के आगे सफल न हो सके।
दूसरा महायुद्ध छिड़ने पर आपने आर्यन आर्मी की स्थापना की, आजाद हिन्द फौज के संस्थापकों में आप हैं पर जापान सरकार से मतभेद होने के कारण आपको जापान में नजरबंद की तरह रहना पड़ा। टोकियो के पास गाँव में वे आश्रम बनाकर रहते थे। उस आश्रम में मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि थे और सभी धर्मों की प्रार्थना होती थी, वहीं से आप वर्ल्ड फेडेरेशन नामक एक अखबार निकालते थे। जापान की हार होने पर वे युद्ध अपराधी के रूप में पकड़े गये और काँग्रेस और महात्मा गाँधी के प्रयत्नों के कारण वे छूटकर भारत आ गये और आज वे हमारे बीच में मौजूद हैं।
राजा महेन्द्र प्रताप अब 60 वर्ष के हो गये हैं, बाल पक गये हैं और शरीर ढीला पड़ गया है। पर अब भी उनमें नौजवानों का सा जोश और साहस मौजूद है। वे अब कांग्रेस के आदेशानुसार राष्ट्र सेवा में शेष जीवन को लगावेंगे। साम्प्रदायिक एकता आपका प्रिय विषय है। प्रेम से आपका अन्तःकरण लबालब भरा रहता है। ईश्वर की पवित्र प्रतिमा का भाव रखकर हर एक को वे प्रेम करते हैं। सब में आपसी प्रेम भाव बढ़े यही आपकी अभिलाषा रहती है। बन्दी शिविर में से छूट कर जब से आप भारत आये हैं तब से बिना एक दिन भी विश्राम किये देश भर में जगह-जगह जाकर अपने विचारों का संदेश पहुँचा रहे हैं।
राजा जनक की तरह राजा महेन्द्र प्रताप आदर्श कर्म योगी के रूप में हमारे सामने उपस्थित हैं। वे गेरुए कपड़े नहीं पहनते तो भी सच्चे साधु हैं वे साम्प्रदायिक कर्मकाण्डों से उदासीन रहते हैं वे सच्चे ईश्वर भक्त हैं। वे जबान से नाम जप करने और पेट में गाँठ रखने की अपेक्षा जीवन को सर्वतो भावेन जनता जनार्दन के ऊपर निछावर कर देने को सच्ची भक्ति समझते हैं। ऐसे आदर्श भगवद् भक्तों के कारण ही यह भारत वसुन्धरा अपने को धन्य मानती है।
दुर्गा-पूजा (नवरात्रि) का दिन हिन्दुओं का बहुत बड़ा पर्व माना जाता है। विशेष करके बंगाल, बिहार, आसाम, उड़ीसा इत्यादि कई प्राँतों में दुर्गा-पूजा का त्यौहार बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। देवी भक्तगण अपने इस त्यौहार में सब प्रकार के आनन्द प्राप्त करने के लिए खर्च करने की कमी नहीं रखते हैं। अपना मकान सजाते, मण्डप बनाकर श्रृंगार करते जिसमें दुर्गा माता की सुशोभित भव्य प्रतिमा की प्रतिष्ठा करके नाच रंग करवाते तथा मनाते हैं, अर्थात् मौज मजा में वृद्धि करने की कोशिश करने में अपनी शक्ति व्यय करते हैं। इतना आनन्द उत्सव होते हुए भी दुःख का विषय तो यह है कि इन दिनों में देवी-देवताओं के पवित्र मंडपों और मन्दिरों में बकरे, भेड़, भैंसा (देहातों में) सुअर, मुर्गी वगैरह लाचार गरीब निःसहाय मूक असंख्य प्राणियों के बलिदान निमित्त क्रूर की रीति से वध किया जाता है, जिससे उन पवित्र स्थानों में मल, मूत्र रक्त इत्यादि गंदी चीजों की धारा बहती है।
बलिदान एवं माँसाहार से जीव हत्या होती है धर्म के नाम पर अधर्म होता है। शारीरिक हानि अर्थात् रोगों की वृद्धि आर्थिक बर्बादी और देश की अवनति होती है। निष्पक्ष दृष्टि से यदि देखा जाए तो यह प्रथा सर्वथा अनुचित है। कोई भी सहृदय व्यक्ति इसके औचित्य को स्वीकार नहीं कर सकता। पूजा तीन तरह की है सात्विकी, राजसी और तापसी। सात्विकी पूजा फल, फूल, मेवा, मिष्ठान, घी, शक्कर, दूध, केला, गुड़, नारियल, खीर, तिल, दही वगैरह से की जाती है और वही सर्वोत्तम है। फिर हम क्यों तामसी पूजा करें जिसके करने पर हमें प्रायश्चित करना पड़े। पहले कीचड़ में पैर लिपटा कर धोने की अपेक्षा कीचड़ में न घुसना ही अच्छा है।
भगवती दुर्गा को जब हम जगत-जननी और जगत रक्षिका मानते हैं और यहाँ भी स्वीकार करते हैं कि छोटे प्राणी से लेकर बड़े तक उसकी प्रिय संतान हैं तो फिर क्या वे मूक पशु उसकी सन्तान नहीं हैं जो हम उनका वध उनकी माता के समक्ष करें? कोई भी माता अपने खोटे से खोटे से पुत्र को भी दुखी देखना नहीं चाहती। वह नहीं चाहती कि किसी पुत्र का रक्त पात हो। देखा जाता है कि जिस माता के चार पुत्र होते हैं उन सबको वह एक दृष्टि से देखती है, फिर कोई कारण नहीं कि वह अपनी तृप्ति के लिये मूक पशुओं का रक्त माँगे। संसार में अपराधी को दण्ड दिया जाता है। पशु मूक निरपराध है। उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला, चोरी नहीं की, किसी किस्म का कोई- अत्याचार नहीं किया। फिर क्या कारण है कि हम उस मूक निरपराध प्राणी की गरदन पर छुरी चलायें और वह भी धर्म के नाम पर। जगत जननी के सामने पशु वध करना उस पवित्र मन्दिर को मल, मूत्र एवं रक्त से रंग कर अपवित्र करना हिन्दू धर्म के अहिंसा सिद्धान्त को और दुर्गा माता के नाम को कलंकित करना है। आश्चर्य तो यह है कि बलि करने वाले उसमें होने वाली हिंसा को भी ‘बौद्धिक हिंसा, हिंसा न भवति’ ऐसा कह कर हिंसा नहीं मानते। यह कितनी दुर्बल उक्ति है। यह मनगढ़न्त केवल अपनी स्वार्थ साधना के लिए ही है। जो हिंसा है वह हिंसा ही है। आप कहेंगे कि वध करने से उस पशु को कोई दुःख नहीं होता। अगर ऐसा है तो वह क्यों रोता चिल्लाता है, क्यों तड़फड़ाता है और इससे बचने की कोशिश करता है? जैसे प्राण हमारे हैं वैसे उसके भी है अगर हमको जरा-सा काँटा लगने पर दुःख होता है तो क्या उसे छुरी से काटने पर भी दुःख नहीं होता? अपितु अवश्य होता है।
कुछ मनुष्य कहते हैं कि बलि से प्राणी मर कर स्वर्ग को जाता है। यदि यह सत्य है तो अपनी ही बलि क्यों न की जाय। इससे अनायास ही स्वर्ग मिल जायेगा और फिर नर-बलि और सिंह आदि की बलि न देकर क्यों न मूक पशुओं की ही बलि दी जाती है। और पशु तो आपसे यह भी नहीं कहता कि भाई मुझे स्वर्ग पहुँचा दो, मैं यहाँ पर दुःखी हूँ। किन्तु वह तो केवल घास वगैरह खाकर ही अपने को सुखी मानता है।
स्वयं सहृदय व्यक्ति बलि के लिये लाए गये पशु की दयनीय अवस्था और दुःख का अनुमान कर सकते हैं। मन्दिर में पशु की हृदय विदारक आह और रक्तपात के कारण बहुत सी दयालु दुर्गा के भक्त पुरुषों को मन्दिर में जाने का साहस नहीं होता। इसलिए प्रत्येक हिन्दू का परम कर्त्तव्य है कि मन्दिर को इतना पवित्र, शाँत सुखद बनायें जिससे प्राणिमात्र उसके दर्शन कर अपने को धार्मिक और सुखी बना सके।
पूज्यपाद महात्मा गाँधी कलकत्ते की काली माता के मन्दिर में घातकी पशु बलि प्रथा को देख कर कम्पित हो गये और आपने कहा था कि ‘काली माता के मन्दिर का पशु-बलिदान निर्मित भयभीत बकरों को भयभीत रीति से बंध कर माँस खाते हैं यह बहुत शोचनीय है’ पशु बलि अपवित्र प्रथा एक कलंक है। इससे हिन्दू धर्म को शीघ्र ही मुक्त किया जाना चाहिए।
(श्री रामनारायण शर्मा)
जिस समय किसी को साँप काटता है, उसका विष उसके दाँतों से काटे हुए घावों में होकर मनुष्य के खून में प्रवेश करता है। यह विष समस्त देह में अत्यन्त शीघ्रता से संचरित हो जाता है। इसका प्रभाव वैसा ही होता है जैसे अफीम का। केवल अन्तर इतना ही है कि अफीम पेट और अन्तड़ियों द्वारा प्रविष्ट होने में समय लेता है और इलाज करने का मौका मिल जाता है।
साँप का विष बहुत शीघ्र असर करता है। इससे उसका इलाज उसी दम होना चाहिए। डॉक्टर लोग प्रायः उसका इलाज इस प्रकार करने की सलाह देते हैं-
जिस स्थान में साँप काटे उसके ठीक ऊपर रस्सी या पगड़ी या कपड़ा कस कर बाँध देना चाहिए। यदि स्थान ऐसा हो, जहाँ बाँधना असम्भव हो तो हाथ ही से जोर से दबाये रखना चाहिए।
साँप के दाँतों से हुए जख्मों को चाकू से खूब चीर देना चाहिए और गरम लोहे से या मिट्टी का तेल डालकर जला देना चाहिए। यदि कहीं तेजाब सल्फुरिक एसिड स्ट्राँग अथवा नाइट्रिक एसिड स्ट्राँग मिल सके तो उनसे भी जलाना अच्छा है।
स्ट्रीकनीन नाइट्रेट का दसवाँ हिस्सा चर्म के नीचे पिचकारी से डालना चाहिए। स्ट्रीकनीन नाइट्रेक कुचले का सत है, जो विशेष रासायनिक रीति से निकाला जाता है। गर्म और तेज कहवा या चाय भी घण्टे-घण्टे के बाद भी दिया जाय अथवा एक-एक चम्मच ब्राण्डी हर दूसरे तीसरे घंटे दी जाय तो बड़ा लाभ होता है।
पोटाश आफ पर मैगनैट पाँच या छःग्रेन भर देना चाहिए।
साँप के विष का प्रतिकार करने वाला एण्टीह्वैनेमस अर्क मिल सके तो चर्म के नीचे छोड़ देना चाहिए।
(श्रीमती रत्नेश कुमारी जी नीराँजना)
हम कौन थे? क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी? आओ, विचारे आज मिलकर ये समस्यायें सभी॥
-भारत भारती
उपनिषद् में एक कथा वर्णित है कि प्रजापति ब्रह्मा से देवताओं तथा दानवों के सम्राट आत्मज्ञान का उपदेश लेने गये। सौ वर्ष तक अखण्ड ब्रह्मचर्य से रहने के पश्चात दोनों को प्रजापति ने आज्ञा दी कि सुन्दर वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर देखो वही तुम्हारा आत्मा है। दानवेन्द्र को तो सन्तोष हो गया और दानवों में उन्होंने इसी देहात्मवाद का प्रचार किया, पर देवेश को संतोष न हुआ। दो बार और ब्रह्मचर्यदिक नियमों का सौ-सौ वर्ष तक पालन करके उन्होंने अपनी समस्त शंकाओं का समाधान प्राप्त करके यथार्थ तत्व प्राप्त किया।
आत्म विवेचन करने के समय साधक के सामने अनेक भ्रम आते हैं, उनका खण्डन करने के पश्चात यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है क्या शरीर ही मैं हूँ? क्या मन ही मैं हूँ? क्या बुद्धि ही मैं हूँ? अथवा इन तीनों की संयुक्तता ही मेरा आस्तित्व है? ये ही समस्याएं देवेन्द्र के सन्मुख आयी थीं और उन्होंने बड़ी बुद्धिमत्तापूर्वक उनको सुलझाया। फिर यथार्थ ज्ञान प्रजापति से पाकर देवताओं में प्रचार किया। दैवी सभ्यता का यही यथार्थ ज्ञान हमारी आर्य संस्कृति का मूल तत्व है। किसी भी कार्य के ग्रहण अथवा त्याग की सदैव यही कसौटी रही है कि सर्वप्रथम तो ये देखे आत्मा की उन्नति अथवा कल्याण के लिये कितना लाभदायक है? पश्चात बुद्धि तथा मन के लिये तत्पश्चात शरीर को।
आजकल अधिकतर भारतीयों के विचार आसुरी सभ्यता (देहात्मवाद) की ओर झुक रहे हैं। वे किसी भी कार्य को ग्रहण अथवा त्याग करते समय शारीरिक सुख पर प्रथम दृष्टिपात करते तथा प्रधान स्थान देते हैं। वैवाहिक सम्बंध को भी उसी मूल सिद्धाँत के अनुसार आर्य संस्कृति मत से दो आत्माओं मन, बुद्धियों तथा शरीरों के एकत्व को विवाह मानते थे, पर आधुनिक काल में आत्मिक मिलन का क्रियात्मक अनुभव रखने वाले तो उंगलियों पर गिनने योग्य ही मिल सकेंगे। आजकल की विवाह की उच्चतम परिभाषा यही समझी जाती है कि दो हृदय सदैव के लिये एक हो जाएं।
पर पतन की ओर हमारा बढ़ना रुका नहीं है जारी ही है। कुछ भारतीय लोग भारत में तलाक प्रथा लाने का प्रयत्न कर रहे हैं यह प्रथा हमें पूर्णतया पतन के गड्ढे में गिरा देगी, तब अन्य देशों के समान हमारे यहाँ भी यही विवाह की साधारण परिभाषा बन जायेगी कि मन की क्षणिक भाप हिलोरों में बहकर एक दूसरे पर कुछ दिनों के लिये ही क्यों न हो, मुग्ध हो जाना एक दूसरे के अधिकतर निकट रहने की लालसा ही विवाह रूपी महल की आधार शिला है।
देहात्मकवाद रूपी दानव अपनी ‘तलाक बिल’ रूपी भुजाओं को बढ़ाये हमारी चिरकालीन आर्य संस्कृति नष्ट करने को बढ़ा आ रहा है, यदि हम सचेत न हुए, हमने अपने भूले हुए अमूल्य आदर्शों को न अपनाया, विवाह को तन, मन, आत्मा का चिर बन्धन न माना, अपने जीवन साथी से अभिन्न संबंध न स्थापित कर सके तो हमारे गृह कुविचारों से नर्क (यातना केन्द्र) बन जायेंगे। यदि हमारे हृदय में अपने जीवन साथी के लिए अभिन्नता का भाव प्रेम, विश्वास, सद्भावनायें, सहनशक्ति तथा स्वार्थ त्याग की इच्छा है तो हमारा घर में दैवी भावनायें स्वर्ग बनाये बिना रह ही नहीं सकती है। इसके विपरीत आसुरी सम्पत्ति के व्यक्तियों के मन में असन्तोष, क्रोध, घृणा, ईर्ष्यादिक नरकाग्नियों से जलाये बिना नहीं मानेंगे।
विष्णु पुराण में लिखा है, विशाल ब्रह्माण्ड के ही भाँति प्रत्येक गृह में भी एक विष्णु (गृह स्वामी) तथा एक लक्ष्मी (गृह स्वामिनी) होती है, वे ही उसमें सृष्टि (सन्तान) उत्पन्न करते हैं तथा पालन करते हैं और उस गृह के समस्त व्यक्ति के शासन, सुख, सुविधा आदिक गृह को व्यवस्थित रूप में चलाने वाले सभी कार्यों के उत्तरदायित्व का भार उन्हीं के ऊपर रहता है। कितनी सुन्दर भावना है जहाँ लक्ष्मी और विष्णु निवास करते हैं वही स्थान तो स्वर्ग होता है, आइये हम पुनः एक बार इस भावना को अपने हृदय में बसायें।
ये भावना कितनी उपयोगिनी है। यदि कोई पति सच्चे हृदय से अपनी जीवन संगिनी को लक्ष्मी समझे तो क्या वह भूल कर भी दुर्व्यवहार या उपेक्षा कर सकेगा? कोई पत्नी सम्पूर्ण हृदय से अपने चिरसंगी को यदि देवता माने तो स्वप्न में भी मन में दुर्भाव अथवा वाणी से वाक्य वाणों की निर्मम वर्षा अथवा कठोर व्यवहार रख सकेगी? आप ही विचारिये इन सब दुखदायी कारणों के न होने पर क्या अपना गृह जीवन स्वर्ग नहीं बन जायेगा। एक बार गहराई से विचार कीजिए, दो में से क्या चुनेंगे? तलाक या चिर बंधन? नर्क या स्वर्ग?
लोग डरते हैं तो अपने आप से, पर कहते हैं कि हम दूसरों से डरते हैं। भय एक मानसिक रोग है जो आत्मिक निर्बलता के कारण उत्पन्न होता है। डरपोक आदमी अपने अन्दर रहने वाली कायरता से डरता है, पर भूत, प्रेत, चोर या शमशेर को डर का कारण बताता है। झूठा आदमी ही दूसरों से डरता है, क्योंकि वह अपनी झूठ से डरता है। जो सत्यनिष्ठ है वह सदा निर्भय है, उसे इस दुनिया में किसी से डरने की जरूरत नहीं होती।
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इस संसार में विजयी वे हैं जो नम्र हैं, सेवा भावी हैं, उदार हैं और मधुर स्वभाव के हैं। इस संसार में हार उनकी है जो अहंकारी हैं, लोभी हैं, स्वार्थी हैं और संकीर्ण भावों से घिरे हुए हैं।
(पं.- दीनानाथ भार्गव ‘दिनेश’)
समस्त योनियों में से केवल मनुष्य योनि ही ऐसी योनि है जिसमें मनुष्य कर्म करने के लिये पूर्ण स्वतंत्र है। ईश्वर की ओर से उसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि इसलिए प्रदान किये गये हैं कि वह प्रत्येक कर्म को मानवता की कसौटी पर कसे और बुद्धि से तोल कर, मन से मनन करके, इन्द्रियों द्वारा पूरा करे। मनुष्य का यह अधिकार जन्म सिद्ध है। यदि वह अपने इस अधिकार का सदुपयोग नहीं करता तो वह केवल अपना कुछ खोता ही नहीं है, बल्कि ईश्वरीय आज्ञा के अवहेलना करने के कारण पाप का भागी बनता है।
कर्म करने में मनुष्य का अधिकार है, परन्तु इसके विपरीत कर्म को छोड़ देने में वह स्वतंत्र नहीं है। किसी प्रकार भी कोई प्राणी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। यह हो सकता है कि जो कर्म उसे नहीं करना चाहिए, उसका वह आचरण करने लगे। ऐसी अवस्था में स्वभाव उसे जबरदस्ती अपनी ओर खींचेगा और उसे लाचार होकर यंत्र की भाँति कर्म करना पड़ेगा।
लोग कहा करते हैं कि मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र नहीं है। कोई उसके हृदय देश में बैठकर कर्म कराता है और अच्छा या बुरा जैसा भी मनुष्य से कराया जाता है, वह करता है यह केवल मिथ्या ज्ञान है, परन्तु उन लोगों के लिये सत्य है, जो अपना अधिकार खो देते हैं, गीता में जब भगवान अर्जुन को उपदेश दे चुके तब उन्होंने अन्त में कहा-
“यदि तू अज्ञान और मोह में पड़कर कर्म करने के अधिकार को कुचलेगा तो याद रख कि स्वभाव से उत्पन्न कर्म के आधीन होकर तुझे सब कुछ करना पड़ेगा। ईश्वर सब प्राणियों के हृदय देश में बसा हुआ है और जो मनुष्य अपने स्वभाव तथा अधिकार के विपरीत कर्म करते हैं उनको यह डण्डा लगाकर इस प्रकार घुमा देता है, जैसे कुम्हार चाक पर चढ़ाकर एक मिट्टी के बरतन को घुमाता है।”
(श्री दौलतराम जी कटरहा बी.ए. दमोह)
मानव जीवन अत्यंत रहस्यमय है। महान से महान व्यक्तियों में जहाँ अनेक सद्गुण पाये जाते हैं वहाँ ढूँढ़ने पर उनमें कुछ भद्दे दुर्गुण भी मिल जाते हैं। मनुष्य का जीवन ही ऐसा है कि जब वह कुछ सद्गुण प्राप्त करता है तो उसे कुछ दुर्गुण भी अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं, जिनकी कि उसे कुछ खबर भी नहीं होती।
मान लीजिये एक व्यक्ति धन संचय करने में प्रयत्नशील है और वह अपना सारा समय धनार्जन में लगाता है। फलस्वरूप उसे विपुल धन-राशि की प्राप्ति होती है और तत्पश्चात् हमारे देखने में यह भी आता है कि धन के साथ उसे धन मद भी प्राप्त हो जाता है जिसकी उसे खबर भी नहीं होती। उसी तरह राजाओं के पीछे राज-मद, विद्वानों के पीछे विद्या-मद, ज्ञानियों के पीछे ज्ञान-मद, बलवानों के पीछे बल-मद, और कुलीनों के पीछे कुल-मद लग जाता है। जिसका सब जगह आदर सम्मान होता है, वह दूसरों को अपने से छोटा समझ बैठता है और यह स्वाभाविक भी है। जब क्लर्क न्यायाधीश को बड़ा समझता है तो न्यायाधीश के मुँशी को छोटा न समझना अत्यंत कठिन हो जाता है।
हमारे जीवन के व्यापार ही ऐसे हैं कि गुणों के साथ-साथ चुपके-चुपके दुर्गुण भी प्राप्त हो जाते हैं। अतएव जहाँ हम सद्गुणों का विकास करने के लिये सचेष्ट हों वहाँ हम उन सद्गुणों के साथ-साथ उनके सहारे ही चुपचाप चोरों की नाई घुस आने वाले दुर्गुणों की तरफ से असावधान, उदासीन तथा बेखबर भी न हो। जब हम ज्ञानार्जन अथवा द्रव्यार्जन कर रहे हों तब हम साथ ही साथ नम्रता का भी विकास करें, वैराग्य का भी विकास करें, अन्यथा वही धन हमारे पतन और हमारे नाश का कारण होगा।
महात्मा ईसा ने एक धनी सेठ को अपना सारा धन गरीबों को बाँट देने का आदेश दिया था। कहा था कि तभी वह स्वर्ग के साम्राज्य में प्रवेश कर सकेगा। महात्मा ईसा आज होते तो सम्भव है यही आदेश आजकल के विद्वानों को भी देते। स्वतंत्र विचारक कहलाने वाले और प्रत्येक सिद्धाँत के (भले ही वह बुद्धि के परे हो) तर्क रूपी कसौटी पर कसने वाले आजकल के उपाधिधारी विद्वान, जब तक अपने विद्या रूपी धन का मोह नहीं छोड़ते जब तक उनका विद्याभिमान नहीं जाता तब तक उन्हें सत्य तत्व की प्राप्ति असम्भव है।
दूसरी बात जो ध्यान देने की है, वह यह है कि जब हम किसी गुण का विकास करें तब इस बात का ध्यान रखें कि वह गुण अज्ञान के संयोग से दोष की सीमा तक न पहुँच जावे, दोष न बन जावे, आसक्ति, बंधन और मोह का कारण न हो जावे। हमें चाहिये कि आत्मविश्वास अपनी आत्म श्रद्धा को जाग्रत करें और अपनी शक्तियों और गुणों की श्रेष्ठता में विश्वास करें किन्तु हमें यह भी ध्यान रहे कि हमारा यह आत्मविश्वास अभिमान अथवा अहंकार का विकृत रूप न धारण कर ले। रावण, कर्ण और कौरवों का यह आत्मविश्वास ही था जिसे हम आज अभिमान कहकर पुकारते हैं।
हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमें मितव्ययी होना है, पर कंजूस नहीं। हम उदार हों पर अपव्ययी नहीं। हम सत्यवादी हों पर अप्रिय-भाषी नहीं। हम में प्रेम हो किन्तु मोह नहीं, आसक्ति नहीं। हम अपने कुटुम्बियों से प्रेम करें किन्तु साथ ही अनासक्त होने का भी प्रयत्न करें। हम उनके स्वास्थ्य की देखभाल रखें किन्तु चिंतित या दुखी न हो। हम में नम्रता और भक्ति हो किन्तु दासता नहीं। हमें चाहिए कि हम गुरु और वेद के वचनों में श्रद्धा रखें किंतु साथ-साथ हममें अंधश्रद्धा भी तो न हो। हममें बौद्धिक स्वातंत्र्य भी तो हो।
यूरोप में देशभक्ति की लहर उठी, उसने मृत प्रायः जातियों को जगा दिया, उनमें नव जीवन का संचार किया। किन्तु वह मर्यादित और संयत न होने के कारण अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध का कारण हुई, जिसके फलस्वरूप हम दो भयंकर यूरोपीय महायुद्धों को भी देख चुके हैं। हमें चाहिये कि हम अपने देशवासियों से प्रेम करें किंतु इसका यह अर्थ नहीं कि हम अन्य देशवासियों से द्वेष करें। हम में विश्व बन्धुत्व की भावना होनी चाहिये।
हम अपने धर्म तथा धर्मावलम्बियों से प्रेम करें, उन्हें अच्छा समझें, किन्तु इसका यह मतलब नहीं कि हम अन्य धर्मों तथा धर्मावलम्बियों से द्वेष करें, उन्हें हीन समझें। याद रखिये कि न तो आपको आत्म श्रेष्ठता (Superiority Complex) की ही भावनाएं चैन लेने देंगी और न अमरत्व (Inforiorty Complex) की भावनाएं ही। आपको तो एक मध्य मार्ग ही, अभिन्नता का मार्ग ही पकड़ना होगा। अतएव हमें सदा स्मरण रखना चाहिये कि जहाँ हम मन्दिरों को आदर की दृष्टि से देखें वहाँ हम मस्जिदों और गिरजाघरों का भी अपमान न होने दें।
हम जहाँ अपने दृष्टिकोण को अच्छा समझते हैं, वहाँ हमें दूसरे व्यक्तियों के दृष्टिकोणों का भी सम्मान करना चाहिये। तभी हम में वास्तविक उदारता होगी। यह ठीक है कि हम मातृभक्त हों, पितृ भक्त हों, किन्तु इसका यह अर्थ न लगाया जावे कि हम दावा करें कि हमारे माता-पिता ही सर्वश्रेष्ठ हैं। यह तो फिर अंध-भक्ति होगी और संघर्ष को जन्म देगी।
हमें मानसिक संतुलन के लिए समता की भी आवश्यकता है, किन्तु समता तो तभी आवेगी जब राग द्वेष आदि द्वन्द्वों का अभाव होगा। कल कण्ठ से राग और कर्कश स्वर से द्वेष हमें जहाँ कोयल से प्रेम करावेगा वहाँ काक से द्वेष भी। हम राग द्वेष त्यागें और मानसिक संतुलन प्राप्त करें।
(ले.- श्री चम्पालाल कर्णावट भोपालगढ़)
जिस पुरुष के सदृश होने की आप इच्छा करते हैं, उसको आदर्श बना लें और दिल में यह विचार कर लें कि ‘हम में कार्य करने की विलक्षण शक्ति है। उस आदर्श के प्रति हम दृढ़ श्रद्धा बना लें तथा इस विचार पर कायम रहें कि हमें अपनी मनोवाँछित वस्तु अवश्य ही प्राप्त होगी।’
आप अपने मन में दुर्बलता के विचार न आने दें। कायरता का साम्राज्य न जमने दें। असफलता एवं पराजय के विचार अपने इस स्वच्छ सलिल हृदय में न घुसने दें। आप यह निश्चय रखें कि जिस सिद्धि के लिए हम वसुँधरा पर आये हैं, वह प्राप्त करके ही जावेंगे। इससे इतर विचार यदि दिल में प्रवेश करें तो शीघ्र ही बाहर निकाल फेंके। हमेशा वे ही विचार आने दें जिससे अपना हित हो। अहितकर भावों को देश निकाला दे दें।
आह! आशा में अद्भुत शक्ति है। यही
हमें सफलता प्राप्त करने के लिए उकसाती रहती है। आशा ही सुख एवं शाँति की खान है। कभी अपने मन में निराशाजनक भावों को स्थान न दो। निराशा मन को मलीन करती हुई कार्य करने की शक्ति को नष्ट करती है। अतः हमेशा ऐसा ही समझो कि हमारा कार्य अवश्य सफल होगा।
इसीलिए आशावादी बनो। इससे हमारे भावों में काफी परिवर्तन हो जायेगा। हमारे जीवन की उन्नति में अपूर्व वृद्धि होगी। यदि हमारा मन साफ है और अपने उद्देश्य की ओर जा रहा है तो निश्चय समझो कि वह हजारों शत्रुओं पर भी अकेला विजय प्राप्त कर सकता है।
पाप का प्रायश्चित्त-पश्चाताप है, पश्चाताप का अर्थ है-पाप की पुनरावृत्ति न करना।
(लेखक- श्री स्वामी रामतीर्थ जी)
मन की शाँति बढ़ाओ। अपने मन को शुद्ध सात्विक विचारों से परिपूर्ण करो। याद रखो कि मन चंगा तो कठौती में गंगा, की कहावत के अनुसार मन को दृढ़ एवं पवित्र बनाओ, फिर तुम भगवान को भी प्राप्त कर सकोगे। वेदान्त की शिक्षा है कि ‘दूसरों की इच्छाओं का या अपनी ही इच्छाओं का गलत इस्तेमाल न करो।’ अगर तुम अपने मन की स्थिरता कायम रखो, तो वे सब इच्छायें, जो तुम्हारे मन में प्रकट हो रही हैं, काबू में आयेंगी। यदि तुम उनके प्रति यथार्थ भाव रखो, तो बड़े ही विचित्र ढंग से ठीक समय पर तुम्हें इसका अनुभव हो जायेगा। अपनी इच्छाओं के प्रति भ्राँत भाव रखने ही से तुम बने काम को बिगाड़ देते हो और अवाँछनीय परिस्थितियों को उत्पन्न करते हो।
मन को पवित्र बनाने के मामूली साधन यह है- सुबह सूर्य निकलने से बहुत पहले उठो प्रातः शौचादि से निवृत्ति होकर थोड़ी देर स्वच्छ वायु का अकेले सेवन करो। इससे तुम्हारा मन प्रफुल्लित होगा। शरीर में स्फूर्ति आयेगी। फिर दिन में ऐसे काम करो जिससे दूसरों को कष्ट न पहुँचे, दूसरों की स्त्रियों की ओर मत देखो, दूसरों का द्रव्य पाने की इच्छा न करो। भगवान के प्यारे भक्तों का आदर करो, उनकी बात ध्यान से सुनो व उन पर अमल करो। मन में भ्राँति न पैदा होने दो। सुख में हर्ष व दुख में क्लेश के भाव सावधानी से धीरज से न आने दो। दिन भर में कुछ समय अकेले रहो। सोचो कि तुमने दिन भर में किसी को सताया तो नहीं, पीड़ितों की सेवा की व आम तौर पर जन-हित का कौन सा काम किया? रोज ऐसा सोचने से मन में बुरे विचार पैदा होना बंद हो जाएंगे और इस तरह तुम्हारा मन पवित्र व स्वच्छ हो जाएगा।
किसी तरह की शंकाओं को मन में जगह न दो। याद रखो कि शंकायें मन को कमजोर करती हैं। हमेशा शंकित हृदय वाले अपने हर काम में असफल रहते हैं। भगवान पर भरोसा रखो। किसी काम को करने से पहले उस पर खूब विचार कर लो। उस काम के करने का सही ढंग सोच लो, फिर तर्क बुद्धि को छोड़कर दृढ़ता से उसे करने में लग जाओ। तुम्हें अवश्य ही सफलता मिलेगी।
मन को इन्द्रियों का दास हरगिज न बनाओ। ऐसा अभ्यास करो कि इंद्रियाँ ही मन की सेविका बनें। एकाग्रता का अभ्यास करो। एकान्त में मनन करने से ऐसा हो सकता है। हर चमकीली भड़कीली चीज पर मन को न चलाओ। सादा वस्त्र पहनो, सात्विक भोजन करो और कभी भी अश्लील पुस्तकें न पढ़ो, न भद्दी तस्वीरें ही देखो। प्राणायाम का अभ्यास भी उत्तम है। संसार के नाना प्रपंचों से बचो। आडम्बर से मन मोड़ों। सादा जीवन व्यतीत करो। इससे तुम्हारा मन पवित्र हो जायेगा।
अच्छी, भगवद्भक्ति विषयक पुस्तकें पढ़ा करो। वीरों के चरित्रों का अध्ययन करो। छल-छिद्र से बचो। अपने जीवन को नियमित बनाओ। मन को प्रसन्न व पुष्ट बनाओ। समय पर प्रत्येक काम करने की आदत डालो। जहाँ तक हो, बहुत कम बोलो। इन बातों से तुम्हारा मन जरूर पवित्र होगा।
दूसरों की बुराई कभी मत सोचो। मलिन-विचारों से मन दूषित हो जाता है। अतः सावधानी पूर्वक सदैव शुभ विचारों का ही मनन किया करो। ‘आप भला तो जग भला’ के अनुसार अपना मन साफ रखो, तुम्हें दुनिया का मन साफ दिखाई देगा। मन की पवित्रता पर ही मनुष्य का चरित्र निर्भर है। चरित्रवान बनो। नम्रता, शील, सत्य और साहस से मन पवित्र होता है।
(रचयिता- श्री रजेश)
कैसे निज पथ से विचलित कर सकता है संसार मुझे?
जब पीड़ित माताएं निज आँखों से नीर बहाती हों।
अबलाएं रोटी के बदले में सम्मान लुटाती हों॥
जब कि भूख से होनहार बच्चों की जानें जाती हों।
जब लाखों परिवारों की आवाजें मुझे बुलाती हों॥
तब कैसे बन्दी रख सकता है कोई परिवार मुझे?
कैसे निज पथ से विचलित कर सकता है संसार मुझे?
मैंने सुखी कहाने वालों को भी कर मलते देखा।
पथ के दावेदारों को भी नई राह चलते देखा॥
अवसर पर दृढ़ चट्टानों को भी पल में गलते देखा।
मैंने कोमल कलियों को अंगारों पर जलते देखा॥
कैसे आकर्षित कर लेगा फिर क्षण-भंगुर प्यार मुझे?
कैसे निज पथ से विचलित कर सकता है संसार मुझे?
जिसमें जलकर खण्डहरों पर महलों का निर्माण हुआ।
जीवन हीन जगत में फिर से संचारित नव-प्राण हुआ॥
जिसमें जलकर दानवता से मानवता का त्राण हुआ।
जिसमें जलकर सृष्टि हुई, संघर्ष हुआ, कल्याण हुआ॥
उस चिनगारी से बचकर चलने का क्या अधिकार मुझे?
कैसे निज पथ से विचलित कर सकता है संसार मुझे?
दुनिया मुझको ठुकरा देगी तो एकाकी रह लूँगा।
अपने उर की व्यथा गगन से, दीवारों से कह लूँगा॥
सब अन्यायों, अपमानों को हंसते-हंसते सह लूँगा।
मृत्यु अचानक आ जाएगी तो भी तनिक न दहलूँगा॥
बाधाएं सब कुछ सहने को कर लेंगी तैयार मुझे।
कैसे निज पथ से विचलित कर सकता है संसार मुझे?
*समाप्त*