आत्म विश्वास से महानता प्राप्त होती है।

‘मैं पवित्र अविनाशी और निर्लिप्त आत्मा हूँ।” इस महान सत्य को स्वीकार करते ही मनुष्य अमरत्व के समीप पहुँच जाता है जो अपनी आत्मा का सम्मान करता है अपनी सत्ता को श्रेष्ठ, पवित्र महान एवं विश्वसनीय अनुभव करता है वह सचमुच वैसा ही बन जाता है। योग शास्त्र पुकार-पुकार कर कहता है कि “जो समझता है कि मैं शिव हूँ वह शिव है, जो समझता है कि मैं जीव हूँ वह जीव है,” यदि आप अपने को महान बनाना चाहते हैं तो अपनी महानता को देखिए, अनुभव कीजिए और उसे द्रुत गति से चरितार्थ करना आरम्भ कर दीजिए।

जो व्यक्ति बार-बार अपने सम्बन्ध में बुरे विचार करेगा, हीनता और तुच्छता के भाव रखेगा वह निस्सन्देह कुछ समय में वैसा ही बन जायेगा। मैं नीच हूँ पापी हूँ, तुच्छ हूँ, दास हूँ, असमर्थ हूँ, अयोग्य हूँ, आलसी हूँ, भाग्यहीन हूँ, दीन हूँ, दुखी हूँ इस प्रकार के मनोभाव रखने का स्पष्ट फल यह होता है कि हमारी अन्तः चेतना उसी ढाँचे में ढल जाती है।

आप अपने को तुच्छ मत मानिए ईश्वर का अविनाशी राजकुमार -मनुष्य किसी भी प्रकार तुच्छ नहीं हो सकता। अपने पिता की सम्पूर्ण शक्तियाँ उसके अन्दर सन्निहित हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि वह अपनी महानताओं को अनुभव करे और अपने जीवन को सब ओर से महान बनाने का प्रयत्न करे। इस साधना पथ पर कदम बढ़ाने वाला अपनी वास्तविक महत्ता को शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है।


अखण्ड ज्योति द्वारा प्रकाशित अमूल्य पुस्तकें

यह बाजारू किताबें नहीं हैं। इनकी एक-एक पंक्ति के पीछे लेखकों का गहरा अनुभव अनुसंधान है। इनमें जो पुस्तकें आपने अभी तक नहीं पढ़ी, उन्हें आज ही मँगा लीजिए।

(1) मैं क्या हूँ?

(2) सूर्य चिकित्सा विज्ञान

(3) प्राण चिकित्सा विज्ञान

(4) परकाया प्रवेश

(5) स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्भुत विद्या

(6) मानवीय विद्युत के चमत्कार

(7) स्वर योग से दिव्य ज्ञान

(8) भोग से योग

(9) बुद्धि बढ़ाने के उपाय

(10) धनवान बनने के गुप्त रहस्य

(11) पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि

(12) वशीकरण की सच्ची सिद्धि

(13) मरने के बाद हमारा क्या होता है

(14) जीव जन्तुओं की बोली समझना

(15) ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?

(16) क्या धर्म? क्या अधर्म?

(17) गहना कर्मणोगति

(18) जीवन की गूढ़ गुत्थियों पर तात्विक प्रकाश

(19) पंचध्यायी धर्म नीति शिक्षा

(20) शक्ति संचय के पथ पर

(21) आत्म गौरव की साधना

(22) प्रतिष्ठा का उच्च सोपान

(23) मित्र भाव बढ़ाने की कला

(24) आन्तरिक उल्लास का विकास

(25) आगे बढ़ने की तैयारी

(26) आध्यात्म धर्म का अवलम्बन

(27) ब्रह्म विद्या का रहस्योद्घाटन

(28) ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग

(29) यम और नियम

(30) आसन और प्राणायाम

(31) प्रत्याहार, धारणा ध्यान और समाधि

(32) तुलसी के अमृतोपम गुण

(33) आकृति देखकर मनुष्य की पहचान

(34) मैस्मरेजम की अनुभवपूर्ण शिक्षा

(35) ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग

(36) हस्त रेखा विज्ञान

(37) विवेक सतसई

(38) संजीवनी विद्या

(39) गायत्री की चमत्कारी साधना

(40) महान जागरण

(41) तुम महान हो

(42) गृहस्थ योग

(43) अमृत पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति

(44) घरेलू चिकित्सा

(45) बिना औषधि के काया कल्प

(46) पंच तत्वों द्वारा संदर्भ रोगों का निवारण

(47) हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं?

(48) विचार करने की इच्छा

(49) दीर्घ जीवन के रहस्य

(50) हम वक्ता कैसे बन सकते हैं

(51) लेखन कला

(52) प्रार्थना के प्रत्यक्ष चमत्कार

(53) विचार संचालन

(54) नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा

(55) आध्यात्म शास्त्र

(56) स्वप्न दोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा

(57) सफलता के तीव्र स्थान

(58) शिखा और यज्ञोपवीत की रहस्यमय विवेचना

(59) दूध की चमत्कारिक शक्ति

(60) दैवी संपदाएं

(61) अध्यात्म विद्या का प्रवेश द्वार

(62) कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान

(63) सुखी वृद्धावस्था

(64) आत्मोन्नति का मनोवैज्ञानिक मार्ग

पाँच रुपये से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाकखर्च माफ इससे कम की पुस्तकों का डाकखर्च ग्राहक के जिम्मे।

पता - अखण्ड ज्योति कार्यालय, मथुरा।


योग साधना की आवश्यकता

योग साधना मनुष्य की एक दैनिक आवश्यकता है। योग का कार्य है :- मिलना। दो बिछुड़े हुओं का मिलाप बड़ा आनन्ददायक होता है। यही आनन्द हम योग साधना द्वारा प्राप्त करते हैं। आत्मा का परमात्मा से जब मिलना होता है तो बिछुड़ी हुई भावुक माता और छोटी बिटिया के अन्तःस्तलों की जो दशा होती है वही अनुभूति साधक को प्राप्त होती है।

भक्त, लोग ईश्वर आराधना के समय जो आनन्द उपलब्ध करते हैं उसकी तुलना संसार के अन्य किसी आनन्द से नहीं की जा सकती। रामायण में बलि की मृत्यु के समय का बड़ा सुन्दर चित्रण मिलता है। मृत्यु शय्या पर पड़े हुए बालि से भगवान राम ने पूछा कि तुम स्वर्ग मुक्ति या जो सद्गति चाहो वह प्राप्त कर सकते हो। बालि ने उन्हें उत्तर दिया।

“जेहि योनि जन्मों कर्म वश तँह रामपद अनुरागऊँ”

यही भावनाएं प्रायः अन्य सभी अनुभवी आध्यात्मवादियों की होती हैं। स्वर्ग और मुक्ति सुख की अपेक्षा प्रभु मिलन का सुख उन्हें अधिक ऊँचे दर्जे का लगता है। अनेकों साधक अपनी भौतिक संपदाओं में लात मारकर आत्मिक साधनाओं में तल्लीन होते हैं। क्योंकि उन्हें इस त्याग की अपेक्षा आत्म प्राप्ति का सुख अनेक गुना महत्वपूर्ण लगता है।

आइए, इस प्रश्न पर विचार करें कि यह योग साधना क्या है? उसकी रूप रेखा क्या है? उसके द्वारा किस प्रकार हमारा क्या लाभ होता है? इन प्रश्नों का ठीक प्रकार उत्तर प्राप्त कर लेने पर इस मार्ग पर अग्रसर होना सुविधाजनक होगा।

मनुष्य के अन्तस्थल में जो शुद्ध बुद्ध चैतन्य सत, चित, आनन्द, सत्य शिव, सुन्दर, ऊजर, अमर सत्ता है वही परमात्मा है। मन बुद्धि चित्त अहंकार के चतुष्टय को जीव कहते हैं। यह जीव आत्मा से भिन्न भी है और अभिन्न भी । इसे द्वैत भी कह सकते हैं और अद्वैत भी। अग्नि में लकड़ी जलने से धुआँ उत्पन्न होता है। धुएं को अग्नि से अलग कहा जा सकता है, यह द्वैत है। धुआँ अग्नि के कारण उत्पन्न हुआ है, अग्नि बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं, वह अग्नि का ही अंग है, यह अद्वैत है। आत्मा अग्नि है, और जीव धुआँ है। दोनों अलग भी हैं और एक भी। उपनिषदों में इसे एक वृक्ष पर बैठे हुए दो पक्षियों की उपमा दी गई है। गीता में इन दोनों का अस्तित्व स्वीकार करते हुए एक को क्षर (नाशवान) एक को अक्षर (अविनाशी) कहा गया है।

भ्रम से, अज्ञान से, माया से, शैतान के बहकावे से, इन दोनों की एकता, पृथकता में बदल जाती है। यही दुख का, शोक का, संताप का, क्लेश का, वेदना का कारण है। पिता पुत्र में, पति स्त्री में, भाई भाई में सास बहू में, नौकर मालिक में, जब एकता रहती है दोनों पक्ष आपस में प्रेम करते हैं, एक दूसरे का हित चाहते हैं। सामंजस्य रखते हैं तो घर में सब सुख रहता है श्री वृद्धि होती है और वह परिवार स्वर्गीय आनन्द का उपभोग करता है। यही स्थिति मानव जीवन की है। जहाँ मन और आत्मा का एकीकरण होता है, जहाँ दोनों की इच्छा रुचि एवं कार्य प्रणाली एक होती है वहाँ अपार आनन्द का स्रोत उमड़ता रहता है। पर जहाँ दोनों में विरोध होता है, जहाँ नाना प्रकार के अन्तर्द्वन्द्व चलते रहते हैं। वहाँ आत्मिक शान्ति के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं।

जिनके सम्बन्ध दूर के हैं उनमें मतभेद, विरोध या द्वेष हो तो बहुत बड़ी हानि नहीं, पर जिनके सम्बन्ध अति निकट के हैं उनमें थोड़ा सा भी विरोध होना भारी गड़बड़ी उत्पन्न करता है। पति पत्नी का आपसी सम्बन्ध बहुत घनिष्ठ है इसलिए उन दोनों को आपस में एक दूसरे से पूर्णतया सहयोग रखना आवश्यक समझा जाता है पतिव्रत धर्म का महात्म्य इसीलिए है कि इन दोनों सहचरों में पूर्ण एकता रहे। कदाचित इन दोनों में विरोध हो, एक दूसरे से बैर रखें, कार्य प्रणाली पृथक रखें तो दांपत्ति जीवन कितना अशान्त हो जायेगा उसकी भयंकरता की कल्पना सहज ही की जा सकती है।

मन और आत्मा का सम्बन्ध पति पत्नी और पिता पुत्र की अपेक्षा अधिक घनिष्ठ है इसलिए उन दोनों की एकता की और भी अधिक आवश्यकता है। दोनों का दृष्टिकोण एक होना चाहिए, दोनों की इच्छा रुचि एवं कार्य प्रणाली एक होनी चाहिए तभी जीवन में सच्ची शान्ति के दर्शन हो सकते हैं। पर इस स्थिति को विरले ही लोग प्राप्त कर पाते हैं। जिस प्रकार हमारे घर कुटुम्ब और समाज में अनैक्य के कारण क्लेश और संतापों की भरमार है वैसे ही आन्तरिक आत्मिक एकता न होने से मनुष्य के मन क्षेत्र में घोर अशान्ति मची रहती है। इस अव्यवस्था के संताप से उसका अन्तःलोक दावानल की तरह जलता रहता है। उसके पास भौतिक सुख साधन कितने ही अधिक क्यों न हों उससे अन्तःकरण को जरा भी शान्ति उपलब्ध नहीं होती। कितने ही लखपती करोड़पती व्यक्तियों को हम जानते हैं जिनके पास धन दौलत की, ऐश आराम के साधनों की, किसी प्रकार कमी नहीं है फिर भी वे अनेकों चिन्ताओं आवेशों, वेदनाओं, संतापों से घिरे रहते हैं इससे प्रकट है कि केवल धन दौलत से ही कोई व्यक्ति जीवन का आनन्द प्राप्त नहीं कर सकता। इसी प्रकार ऐसे भी अनेकों व्यक्ति हैं जिनके पास रुपया पैसा या अन्य संपदाएं नहीं हैं फिर भी वे खूब मस्त रहते हैं, सुख की नींद सोते हैं और अपने चारों ओर आनन्द देखते हैं। इससे प्रकट है कि धन दौलत के या साधनों के न होने से सच्चे सुख में कोई कमी नहीं आती। अमीरों का भी दुखी रहना और गरीबों का भी सुखी होना इस बात का प्रमाण है कि सुख का वास्तविक स्थान बाहर नहीं है, बाहर की वस्तुओं में नहीं है।

मन और अन्तःकरण के मिलन में एकता में सुख है। इसी को आत्मा और परमात्मा का मिलन कहते हैं। इस मिलन का दूसरा नाम योग है। दो वस्तुओं के मिलने से एक नवीन तन्त्र उत्पन्न होता है। पति पत्नी का मिलन एक मनोहर सन्तान का उपहार उपस्थित करता है, बिजली की ऋण और धन (ठंडी और गरम) शक्ति के तार जब आपस में मिलते हैं तो एक नवीन शक्ति उत्पन्न होती है। आत्मा और परमात्मा के योग से एक ऐसे आनन्द का आविर्भाव होता है जिसकी तुलना संसार के अन्य किसी भी सुख से नहीं की जा सकती। इस सुख को परमानन्द जीवन मुक्ति, ब्रह्मनिवारण आत्मोपलब्धि, प्रभुदर्शन आदि नामों से पुकारा जाता है।

मन का वस्तुतः स्वतन्त्र कोई अस्तित्व नहीं है। वह आत्मा का ही एक उपकरण, औजार, यंत्र है। आत्मा की कार्यपद्धति को सुसंचालित करके चरितार्थ करके स्थूल रूप देने के लिए मन का अस्तित्व है। इसका वास्तविक कार्य यह है कि आत्मा की इच्छा एवं रुचि के अनुसार विचारधारा एवं कार्य प्रणाली को अपनाए। इस उचित एवं स्वाभाविक मार्ग पर यदि मन की यात्रा जारी रहे तो मानव प्राणी जीवन के सच्चे सुख का रसास्वादन करता है। पर दुर्भाग्य की बात है कि आज हममें से अधिकाँश को यह स्थिति उपलब्ध नहीं है। आत्मा सत् प्रधान है। उसकी इच्छा एवं रुचि सात्विकता की दिशा में होती है। जीवन की हर घड़ी सात्विकता में सराबोर हो, हर विचार और कार्य सात्विकता से परिपूर्ण हो यह आत्मा की माँग है। पर माया या अविद्या के कुचक्र में फँसकर वे यह दूसरी ओर चल देता है। रज और तम में उसकी प्रवृत्ति दौड़ती है। इस कार्य विधि को निरन्तर प्रोत्साहन मिलने से वह इतनी प्रबल हो जाती है कि आत्मा की पुकार के स्थान पर मन की तृष्णा ही प्रधानता प्राप्त कर लेती है। आत्मा कहती है जीवन का उपयोग सात्विकतामय होना चाहिए, परमार्थ सेवा, तप, संयम, ईश्वराधना, कर्तव्य पालन उचित उपार्जन, निर्दोष मनोरंजन, प्रेम सद्भाव, सहयोग की प्रवृत्तियों को अपनाना चाहिए। पर मन की दौड़ इससे विपरीत दिशा की होती है वह ऐश आराम, बड़ाई पद दम्भ काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार व्यसन, मनोरंजन में रस लेता है और इन की पूर्ति के लिए इतना आतुर हो जाता है कि उचित अनुचित का पाप पुण्य का भी विचार छोड़ देता है और जैसे भी हो आत्मा की आवाज को कुचल कर भी अपनी अभिलाषाओं को पूर्ण करना चाहता है।

यह संघर्ष यह अनैक्य, यह विरोध ही आत्मिक अशान्ति का मूल कारण है। व्यभिचारिणी स्त्री की स्वच्छंदता के कारण धर्मपाण पति की जो दशा होती है, व्यसनी आवारा कुसंगति में पड़े हुए फिजूल खर्च, दुराचारी, बदमाश बेटे की हरकतों से प्रतिष्ठित पिता को जो कष्ट होता है, वैसा ही कष्ट इस आत्मिक विपरीतता के कारण आत्मा को होता है। इस कष्ट के कारण वह कराहती रहती है, इसका संताप, भोगों के छींटों से किसी प्रकार शान्त नहीं होता। यह आन्तरिक अशान्ति एक प्रकार का नरक है। बन्धन है। इस नरक और बन्धन से छुटकारा तभी मिल सकता है जब एकता का अभिमान हो। मन और अन्तःकरण में मेल हो। इस मेल को, एकता को एवं उसकी कार्य पद्धति को योग साधना कहते हैं।

यह योग साधना जीवन का एक नित्य कर्म होना चाहिए। संसार के वातावरण का कुप्रभाव मन पर जमता है, इसको नित्य ही साफ करने की जरूरत पड़ती है। कमरे में नित्य धूलि जमती है, इसलिए नित्य झाड़ू लगानी पड़ती है, त्वचा पर, नाक कान, आँख, दाँत, जीभ पर नित्य मैल जमता है इसलिए उनको जल से नित्य स्वच्छ करते हैं, इसी प्रकार मन पर साँसारिक दुष्प्रवृत्तियों के कुसंस्कार नित्य जमते हैं। उनको हटाने के लिए नित्य योग साधना की जरूरत पड़ती है। रोज जमने वाले मानसिक मैलों की सफाई के लिए और मन की आत्मा विरोधी प्रवृत्तियों को हटाने के लिए योग साधना आवश्यक है। और इतनी आवश्यक है कि उसे स्नान, शौच, भोजन, शयन की ही भाँति नित्य कर्मों में स्थान मिलना चाहिए। साधना, अन्तःकरण का शौच और आहार है इसलिए उसकी ओर तो शरीर की अपेक्षा अधिक सावधानी बरतनी चाहिए।

तेज धूप में चलकर थका हुआ पथिक जिस प्रकार शीतल सरोवर के तीर सघन वृक्षों की छाया में शान्ति अनुभव करता है। उसी प्रकार साँसारिक संघर्षों से व्यथित मनुष्य अंतर्मुखी होकर आत्मा के निकट जब बैठता है तो एक शान्ति अनुभव करता है। इस थोड़ी देर के सुस्ता लेने से उसे एक स्फूर्ति, चैतन्यता एवं ताजगी प्राप्त होती है, जिसके आधार पर जीवन पथ को उचित रीति से पार करना उसके लिए सुगम हो जाता है।

सच्ची सुख शान्ति प्राप्त करना हमारे जीवन का चरम लक्ष्य है। उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए योग साधना ही एक आधार है। उस आधार के लिए यों तो जितना अधिक से अधिक समय लगाया जा सके उतना अच्छा है, पर कम से कम 2 घण्टे नित्य अनिवार्य रूप से लगना चाहिए। साधना के बिना केवल वाचक ज्ञान से, किसी का वास्तविक भला नहीं हो सकता।


आत्म जागरण योग

योग शास्त्रों के कथनानुसार साधना का प्रयोजन यह है कि “हम अपने वास्तविक स्वरूप को समझें, आत्मा का दर्शन और अनुभव करें एवं विचार और कार्यों को उस ढाँचे में ढालें जो आत्मा की रुचि के अनुरूप हो।”

हम अपनी ‘मैं क्या हूँ’ और ‘ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?’ पुस्तकों में उस साधना विधियों का उल्लेख कर चुके हैं जिनके द्वारा आत्म दर्शन की ओर कदम बढ़ाया जा सकता है। आत्म दर्शन के लिए इस प्रकार के विचार और विश्वासों को मन में स्थान देना चाहिए कि ‘मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ।” अपने अहम् को शमार से भिन्न अविनाशी आत्मा और शरीर मन बुद्धि को अपना औजार समझने की मान्यता जब सुदृढ़ हो जाती है तो मनुष्य उसी ढाँचे में ढलने लगता है जो आत्मा के स्वार्थ एवं गौरव के अनुरूप है।

आमतौर से सभी लोग यह जानते हैं कि प्राणी शरीर से भिन्न है। पर यह उनका ज्ञान मस्तिष्क के अग्रभाव तक ही सीमित होता है। वे इस तथ्य को जानते तो हैं पर मानते नहीं। व्यवहार में लोग अपने को शरीर ही अनुभव करते हैं और शरीर को जिन कामों में लाभ होता है सुख मिलता है मनोरंजन होता है उन्हें करने के लिए दिन रात लगे रहते हैं। धन कमाने में और इन्द्रिय भोगों में आमतौर से लोगों का समय खर्च होता है। जिन चिन्ताओं में व्यस्त रहते हैं वे शरीर के लाभ हानि से ही सम्बन्धित होती हैं। शरीर के लिए आत्मा की परवाह नहीं की जाती, पाप, अनीति, छल, दुराचार असत्य को अपनाकर भी लोग स्वार्थ साधन करते हैं वह शरीर से ही सम्बन्धित होते हैं। जन साधारण का स्वार्थ शरीर स्वार्थ से ही सम्बन्धित होता है। मेरा स्वार्थ किसमें है? इस प्रश्न पर विचार करते हुए लोग “मेरा” आत्मा का अर्थ शरीर ही करते हैं। आत्मा के स्वार्थ को आमतौर से स्वार्थ नहीं कहा जाता, वह तो एक लोकोत्तर असाधारण, पुण्य परमार्थ कहा जाता है। उसे करने की कभी भी ही आवश्यकता समझी जाती है। इससे स्पष्ट है कि संसार में शरीर को ही ‘मैं’ समझने की आम प्रवृत्ति है। ‘मैं’ का अर्थ आत्मा है इसे जानते जरूर हैं पर व्यवहार में मानते यह हैं कि ‘मैं’ का अर्थ है- मेरा शरीर।

इस दृष्टिकोण से जीवन की गतिविधि में भारी अन्तर आ जाता है। आत्मवादी और भौतिक दृष्टि कोण में वैसे बहुत थोड़ा अन्तर दिखाई पड़ता है पर अन्तर के कारण जो परिणाम उपस्थित होते हैं। उनमें उतना ही भेद होता है जितना आकाश पाताल में। रेल की पटरी में लाइन बदलने की कैंची जहाँ लगी होती है वहाँ कोई बहुत भारी अन्तर दिखाई नहीं देता पर जब एक गाड़ी एक तरफ की गुजरती है और दूसरी गाड़ी दूसरी तरफ से तो अन्त में जब चलते-चलते दोनों गाड़ियाँ पहुँचती हैं उन स्थानों में सैंकड़ों हजारों मील का अन्तर होता है। एक पूर्व में पहुँचती है तो दूसरी पश्चिमी में, कैंची के काटने में दो चार अंगुल का फर्क होता है पर अन्त में उसका प्रतिफल बहुत ही भिन्न होता है। ठीक यही हालत आत्मिक और भौतिक दृष्टिकोणों के बीच में है। जो व्यक्ति अपने को आत्मा मानता है वह अपना स्वार्थ उसे समझाता है जिससे आत्मकल्याण होता है। वह आत्मकल्याण करने वाले विचार और कार्यों को अपनाता है। यदि इस मार्ग में चलते हुए उसे शरीर पर प्रभाव डालने वाली कोई भौतिक हानि होती है तो वह उसकी परवाह नहीं करता। इसके विपरीत भौतिक दृष्टिकोण का फलितार्थ हमारे सामने मौजूद है कि असंख्यों मनुष्य स्वर्ग नरक की, मुक्ति बंधन की चिन्ता न करके आत्म हनन करते हुए भौतिक संपदायें कमाते हैं जिससे उनको मनोवाँछित सुख सामग्री प्राप्त हो सके।

‘मैं शरीर हूँ इसलिए शरीर सुख के लिए धर्म अधर्म की परवाह न करता हुआ भौतिक संपदाएं कमाऊँ उसी के लिए जीवन का प्रत्येक क्षण लगाऊँ” आज के इस लोकव्यापी दृष्टिकोण में परिवर्तन किये बिना कोई मनुष्य, कोई समाज, कोई राष्ट्र, सुख शान्ति से नहीं रह सकता। “मैं आत्मा हूँ, ईश्वर का अविनाशी राजकुमार हूँ, अपने औजार शरीर और मन का उपयोग केवल उन्हीं कार्यों में करूंगा जो मेरे गौरव के, धन के, कर्तव्य के, अनुकूल हैं।” यह आध्यात्मिक दृष्टिकोण जिन व्यक्तियों ने अपना लिया है उनका जीवन क्रम एक सतोगुणी ढाँचे में ढल जाता है। भौतिक दृष्टिकोण मनुष्य को चिन्ता, क्रोध, शोक, द्वेष, कलह, ईर्ष्या, मद, प्रस्तर, मोह, रोग, उद्वेग आवेश का नारकीय प्रतिफल उपस्थित करता है और आत्मिक दृष्टिकोण के कारण प्रेम सहयोग, प्रसन्नता, साहस, अभय, सन्तोष एवं सात्विक आनन्द का उपहार प्राप्त होता है। इनमें एक को नरक और दूसरे को स्वर्ग कहा जा सकता है।

योग साधना द्वारा स्वर्गीय आनन्द की प्राप्ति की जाती है। इस साधना मंदिर का पहिला द्वार आत्म जागरण है। ‘मैं आत्मा हूँ- इस भाव का अन्तःकरण में प्रत्यक्ष होना उस पर पूर्ण श्रद्धा, विश्वास, निष्ठा तथा इस आस्था का होना साधना का प्रयोजन है। सोते जागते, चलते, काम करते, साधक के मन में यह गहरा विश्वास होना चाहिए कि मैं ईश्वर का पवित्र अंश अविनाशी आत्मा हूँ केवल वही विचार और कार्य अपनाऊँगा जो मेरे वास्तविक आत्मिक स्वार्थ के अनुकूल हैं।” यह छोटी शब्दावली एक कागज पर लिखकर उस स्थान पर टाँग लेनी चाहिए जहाँ बराबर नजर पड़ती हो। इन भावनाओं को जितनी अधिक बार हो सके मानसिक जप की तरह हृदयंगम करना चाहिए। लगातार बहुत दिनों तक इस तथ्य पर अन्तःकरण को केन्द्रित करने से मन पर वैसे ही संस्कार जम जाते हैं और साधक अपने वास्तविक स्वरूप को समझ जाता है। इसको आत्मिक भूमिका का जागरण कहते हैं।

आत्म जागरण योग की साधना।

किसी शान्त या एकान्त स्थान में जाइए। निर्जन, कोलाहल रहित स्थान इस साधना के लिए चुनना चाहिए। इस प्रकार के स्थान पर घर का स्वच्छ, हवादार कमरा भी हो सकता है और नदी तट अथवा उपवन भी। हाथ मुँह धोकर साधना के लिए बैठना चाहिए। आराम कुर्सी पर अथवा दीवार वृक्ष या मसनद के सहारे बैठ कर यह साधना भली प्रकार होती है।

सुविधापूर्वक बैठ जाइए। तीन लम्बे-लम्बे साँस लीजिए पेट में भरी हुई वायु को पूर्ण रूप से बाहर निकालना और फिर फेफड़ों में पूरी हवा भरना एक पूरा साँस कहलाता है। तीन पूरे साँस लेने से हृदय और फुएफल की भी उसी प्रकार एक धार्मिक शुद्धि होती है जैसे स्नान करने, हाथ पाँव धोकर बैठने से शरीर की शुद्धि होती है।

तीन पूरे साँस लेने के बाद शरीर को शिथिल कीजिए शरीर के हर अंग में से खिंच कर प्राण शक्ति हृदय में एकत्रित हो रही है ऐसा ध्यान कीजिए। हाथ पाँव आदि सभी अंग प्रत्यंग शिथिल ढीले निर्जीव, निष्प्राण हो गये हैं ऐसी भावना करनी चाहिए। मस्तिष्क से सब विचारधाराएं और कल्पनाएं शान्त हो गई हैं, और समस्त शरीर के अन्दर एक शान्त नील आकाश व्याप्त हो रहा है। इस शान्त शिथिल व्यवस्था को प्राप्त करने के लिए कुछ दिन लगातार प्रयत्न करना पड़ता है। अभ्यास से दिन-दिन अधिक शिथिलता एवं शान्ति अनुभव होती जाती है।

शरीर के भली प्रकार शिथिल हो जाने पर हृदय स्थान में एकत्रित अंगूठे के बराबर शुभ श्वेत ज्योति स्वरूप प्राण शक्ति का ध्यान करना चाहिए। अजर, अमर, शुद्ध, बुद्धि चेतन, पवित्र ईश्वरीय अंश आत्मा मैं हूँ। मेरा वास्तविक स्वरूप वही है। मैं सत् चित आनन्द स्वरूप आत्मा हूँ। उस ज्योति के कल्पना नेत्रों से दर्शन करते हुए उपरोक्त भावनाएं मन में रखनी चाहिए।

दूसरी साधना- उपरोक्त शिथिलासन के साथ आत्म दर्शन करने की साधना इस योग में प्रथम साधना है। जब यह साधना भली प्रकार अभ्यास में आ जाय तो आगे सीढ़ी पर पैर रखना चाहिए। दूसरी भूमिका की साधना का अभ्यास नीचे दिया जाता है।

ऊपर लिखी हुई शिथिलावस्था में अखिल आकाश में नील वर्ण आकाश का ध्यान कीजिए। उस आकाश में बहुत ऊपर सूर्य के समान ज्योति स्वरूप आत्मा को अवस्थित देखिए। “मैं ही यह प्रकाशवान आत्मा हूँ,” ऐसा निश्चित संकल्प कीजिए। अपने शरीर को नीचे भूतल पर निस्पंद अवस्था में पड़ा हुआ देखिए उसके अंग प्रत्यंगों का निरीक्षण एवं परीक्षण कीजिए। वह हर एक कल पुर्जा मेरा औजार है। मेरा वस्त्र है यह यंत्र मेरी इच्छानुसार क्रिया करने के लिए प्राप्त हुआ है। इस बात को बार-बार मन में दुहराइए। इस निस्पंद में मन और बुद्धि को दो सेवक शक्तियों के रूप में देखिए। वे दोनों हाथ बाँधे आपकी इच्छानुसार कार्य करने के लिए नतमस्तक खड़े हैं। इस शरीर और मन बुद्धि को देखकर प्रसन्न हूजिए की इच्छानुसार कार्य करने के लिए यह मुझे प्राप्त हुए हैं। मैं उनका उपयोग सच्चे आत्मस्वार्थ के लिए ही करूंगा। यह भावनाएं बराबर उस ध्यानावस्था में आपके मन में गूँजती रहनी चाहिए।

तीसरी साधना- जब दूसरी भूमिका का ध्यान भली प्रकार होने लगे तो तीसरी भूमिका का ध्यान कीजिए।

अपने को सूर्य की स्थिति में ऊपर आकाश में अवस्थित देखिए। मैं समस्त भूमंडल पर अपनी प्रकाश किरणें फेंक रहा हूँ। संसार मेरा कर्म क्षेत्र और लीला भूमि है, भूतल की वस्तुओं और शक्तियों को इच्छित प्रयोजन के लिए काम में लाता हूँ पर ये मेरे ऊपर प्रभाव नहीं डाल सकतीं। पंच भूतों की गतिविधि के कारण जो हलचलें संसार में हर घड़ी होती हैं वे मेरे लिए एक विनोद और मनोरंजक दृश्य मात्र हैं। मैं किसी की साँसारिक हानि लाभ से प्रभावित नहीं होता। मैं शुद्ध चैतन्य सत्यस्वरूप पवित्र निर्लिप्त अविनाशी आत्मा हूँ। मैं आत्मा हूँ, महान आत्मा हूँ। महान परमात्मा का विशुद्ध स्फुल्लिंग हूँ।

तीसरी भूमिका का ध्यान जब अभ्यास में कारण पूर्ण रूप से पुष्ट हो जाय और हर घड़ी वही भावना रोम रोम में प्रतिभाषित होने लगे तो समझना चाहिए कि इस साधना की सिद्धावस्था प्राप्त हो गई यही जागृत समाधि या जीवन मुक्त अवस्था है।


सम्यक्त्व योग

यह विश्व त्रिगुणात्मक है। स्थूल प्रकृति को हम तीन रूपों में देखते हैं। (1) ठोस (Solid) (2) तरल (Liquid) और (3) वायु (Gas) सृष्टि की समस्त स्थूल सम्पदा इन रूपों में ही है। (1) सत् (2) रज और (3) तम मनुष्यों के स्वभाव, चेतनाएं, प्रवृत्तियां इन तीन विभागों में विभक्त हैं। विश्व की सूक्ष्म प्रक्रियाएं, संवेदनाएं इच्छा आकांक्षाएं इन तीनों के अंतर्गत हैं। जब तक आत्मा जीवन धारण किये हुए हैं, जीव रूप में अवस्थित है, प्रकृति के साथ विचरण कर रहा है तब तक इन तीन गुणों के साथ भी रहना पड़ता है। स्थूल तत्व समयानुसार न्यूनाधिक होते रहते हैं पर पूर्ण रूप से किसी का भी आस्तित्व नष्ट नहीं होता।

जैसे वात पित्त कफ तीनों ही शरीर के लिए आवश्यक हैं, उसी प्रकार चैतन्य जगत के लिए सत रज तम अनिवार्य है। इनमें कोई भला बुरा नहीं केवल उनकी विषमता अति दुखदाई है। वात, पित्त, कफ तीनों में से कोई भी अत्यधिक या अतिन्यून हो जाय तो वही अनिष्ट का कारण बन जाता है। जब वे अपनी अपनी, मात्रा मर्यादा, और स्थिति के अनुसार संतुलित रहते हैं तो स्वास्थ्य ठीक रहता है, इस संतुलन में गड़बड़ी पड़ते ही मनुष्य बीमारी या मृत्यु की डाढों के नीचे कुचलने लगता है। हमारे अंतर्जगत में भी सत, रज, तम की जिस अनुपात में आवश्यकता है यदि वह अनुपात बिगड़ जाता है तो मानसिक स्वस्थता नष्ट होने लगती है, आत्म शांति के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। इसलिए तीनों गुणों का समुचित समन्वय हमारे बाह्य और आन्तरिक जीवन में होना चाहिए। किसी एक ही तत्व की अति का आत्मविद्या के तत्वज्ञों ने निषेध किया है भगवान बुद्ध ने श्रेष्ठ योग साधन ‘मज्झाम मग्ग’ अर्थात् मध्यम मार्ग पर चलना बताया ‘मज्झम निकाम’ का भली प्रकार मनन करने से मध्यम मार्ग की श्रेष्ठता और आवश्यकता सहज ही समझ में आ जाती है।

हिन्दू धर्म में इन तीनों गुणों की समुचित उपासना करने का आदेश किया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में त्रिदेवों का अधिष्ठान सत, रज, तम का ही प्रतीक है। वेद का, ज्ञान का, अधिष्ठाता ब्रह्मा सत का प्रतीक है। लक्ष्मी पति शाक वैकुण्ठ लोक के वासी विष्णु कहते हैं रजोगुण का प्रतिनिधित्व त्रिशूल धारी, ताण्डव नृत्य करने वाले, तीसरे नेत्र के आग उगलते हुए रुद्र तमोगुण की प्रतिमा हैं। जिन साधकों ने प्रकृति को नारी के रूप में देखा है उन्होंने सत, रज, तम को सरस्वती लक्ष्मी एवं दुर्गा की छवि के साथ देखा है। इन सभी को हिन्दू दार्शनिकों ने उपास्य ठहराया है। तीनों ही गुण, जीवन के अभिन्न अंग हैं इसलिए उनका समुचित सदुपयोग सम्यक् समन्वय होना चाहिए वही त्रिदेव पूजा का आध्यात्मिक रहस्य है।

मोटी धारणा के अनुसार सत को ग्राह्य और मन को त्याज्य माना जाता है पर यह धारणा भ्रममूलक है। तीनों का ही अपना अपना महत्व है तीनों की ही अपने अपने स्थान पर आवश्यकता है। हाँ मात्रा में अन्तर अवश्य होना चाहिए। सत की मात्रा सब से अधिक, रज की उससे कम, तम की उससे कम होनी चाहिए और तीनों का यथास्थान यथा अवसर, विवेकपूर्वक उपयोग होना चाहिए। समत्व का एक अर्थ समता बराबरी है और दूसरा धर्म सम्यक्त्व (भली प्रकार यथोचित रीति से है) गीता के समस्त योग का वास्तविक तात्पर्य सम्यक्त्व ही है। सब को समान समझने का अर्थ ब्राह्मण और कसाई को, राजा और गधे को, माता और पत्नी को पुत्र और पिता को एक समान समझना नहीं है वरन् यह है कि सम्यक् रीति से भली प्रकार उन्हें समझा जाय। जो जैसा हो उसे वैसा ही समझा जाय।

सतोगुण हमारे जीवन में सबसे अधिक होना चाहिए। प्रेम, करुणा, मैत्री, सेवा, सहायता, दया निष्कपटता, उदारता, पवित्रता, त्याग एवं संयम के भाव मन में अधिक मात्रा में होने चाहिएं। इन भावों को चरितार्थ करने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। अधिकारी व्यक्तियों के प्रति विवेकपूर्वक उनका उचित उपयोग करना चाहिए।

रजोगुण का अर्थ है सम्पन्नता। जीवन के चतुर्मुखी विकास के साधनों को सम्पन्नता कहते हैं। जैसे बिना कागज स्याही के पत्र नहीं लिखा जा सकता, बिना खाँड के मिठाई नहीं बन सकती इसी प्रकार बिना साधनों के जीवन विकास नहीं हो सकता स्वास्थ्य, विद्या, धन, प्रतिष्ठा, मित्रता, चातुर्य साहस यह सात संपन्नताएं आत्मोन्नति के लिए बड़ी आवश्यक हैं। अपने आपको बलवान, सम्पन्न, समृद्ध, विकसित बनाना अपने निकटवर्ती व्यक्तियों को सम्पन्न बनाना जीवन की बहुत बड़ी आवश्यकता है। क्योंकि सत् की रक्षा और वृद्धि के लिए रज की जरूरत पड़ती है। जो स्वयं भूखा है, स्वयं अभाव ग्रस्त दीन दुखी है, विद्या बल, पुरुषार्थ आदि से रहित है, उनके मन में उठने वाली सतोगुणी भावनाएं ग्रीष्म की बालू में उगने वाले अंकुरों की भाँति मुरझा जाती हैं। रजोगुण से ऊपर उठ कर सतोगुण में पहुँचना सुगम है, क्योंकि उसे बहुत ही पास की मंजिल पर कदम धरना होता है।

तमोगुण क्रोध, अविश्वास, घृणा, हिंसा, दुराव जैसे कार्यों में देखा जाता है। राक्षस पिशाच तस्कर, पापी, निर्दय, लोक कंटक, आततायी, अनीति एवं भ्रान्ति फैलाने वाले लोगों की आत्मा से प्रेम करते हुए भी उनके स्थूल शरीर एवं विकृति मन से घृणा करने की विरोध करने की, दंड देने की आवश्यकता होती है। इस दुनिया में अनीति के अनेकों शक्तिशाली केन्द्र हैं।

लोक कल्याण के लिए, उनसे आत्म रक्षा के लिए दुराव की, गुप्त मंत्रणा की एवं समाचार की जरूरत पड़ती है। भगवान वामन को राजा बलि के साथ, मोहनी रूपधारी विष्णु को भस्मासुर के साथ राम, को बालि के साथ ऐसा ही व्यवहार करना पड़ा था। आवश्यकतानुसार इस प्रकार की नीति भी अपनानी पड़ सकती है। अशाँति को नष्ट करने वाली अशाँति भी शाँति कही जाती है। बच्चे के फोड़े को डॉक्टर से चिरवाते समय माता जिस प्रकार कठोर बन जाती है ऐसे अवसर जीवन में आ सकते हैं। “भय बिनु होहि न प्रीति” “वक्र चन्द्रहिं भ्रसे न रहूँ।” “लातों के देव बातों से नहीं मानते।” “सीधी उंगली से घी नहीं निकलता।” जैसी उक्तियों से यह प्रकट है कि केवल सीधे मन से ही काम नहीं चल सकता। जैसे को तैसा की नीति बरते जाने की जहाँ संभावना रहती है, वहाँ ही दुष्टों की दुष्टता का प्रतिबन्ध लगता है। अपने आन्तरिक शत्रुओं के प्रति भी विरोध की, घृणा की, संघर्ष की प्रवृत्ति सतेज किये बिना उनसे छुटकारा नहीं मिलता। इस प्रकार तमोगुण भी समयानुसार उचित मात्रा में उपयोगी होता है।

इन तीनों गुणों में से हर एक उचित एवं आवश्यक है। केवल उनकी अति तथा दुरुपयोग में ही दोष है। अति तो सतोगुण की भी बुरी है। दुष्टों पर दया करने से, साँप को दूध पिलाने से, दुष्टता के विष की वृद्धि होती है। बिच्छु को पालना एक प्रकार से घर के बच्चों को डंक की तीव्र पीड़ा में झोंकना है। भावुकता वश किसी एक भिखारी को अपना सब कुछ दे डाला जाय तो इसका अर्थ दूसरे दिन से ही अपने बच्चों को भिखारी बना देना होगा। घृणा और द्वेष करने योग्य व्यक्तियों से प्रेम निबाहा जाय तो वह धर्म विरोधी तत्वों को एक प्रकार की सहायता देना ही होगा। ऐसे सतोगुण की अति भी अनुचित है। रजोगुण की अति में मनुष्य लोभी कंजूस तथा अहंकारी बनता है। तमोगुण के दुरुपयोग से हिंसा अनीति एवं पाप तापों की अभिवृद्धि होती है। सम्यक्त्व का तकाजा है कि हम आन्तरिक स्वास्थ्य तथा सुव्यवस्था को कायम रखने के लिए सत, रज, तम का भी प्रकार उचित रीति से उपयोग करें। इस मार्ग पर चल कर ही हम सुख शाँतिमय जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

सम्यकत्व योग की साधना।

अपने स्वभाव पर दृष्टिपात कीजिए कि आपमें किस तत्व की आवश्यकता से अधिक न्यूनता और आवश्यकता से ज्यादा अधिकता है। वह निरीक्षण पहले मोटे तत्व पर से आरंभ कीजिए। तमोगुण उचित मात्रा में है या नहीं? कहीं आप कायर डरपोक आलसी तो नहीं हैं? यदि यह बातें हों तो समझिए कि आपमें तमोगुण की मात्रा न्यून है। वीरता की कमी है। तब आपको वीरता उत्पन्न करने की, तमोगुण बढ़ाने की आवश्यकता है।

यदि आप निर्धन दरिद्र, मित्रों से रहित, बीमार, समाज में अप्रसिद्ध, साधन रहित, अशिक्षित बुद्धु स्वभाव के हैं तो आपको रजोगुण बढ़ाने की आवश्यकता है।

यदि आप तोताचस्म प्रेम रहित अनुदार हैं दान सेवा परोपकार, त्याग, संयम उपासना में रुचि नहीं, तो समझिए कि आप में सतोगुण बढ़ाने की जरूरत है।

इन तीनों में कौन तत्व अधिक कम है, यह भली प्रकार निरीक्षण कीजिए। जो तत्व सब से कम हो, जिस कमी से जीवन यात्रा में अधिक असुविधा होती हो। उसे प्रथम हाथ में लीजिए। यदि सत तत्व कम हो तो ब्रह्म को, रज कम हो तो विष्णु को, तम कम हो तो शिव को अपना इष्ट देव चुन लीजिए।

प्रातः सायं नियत समय पर साधना के लिए बैठिए। यदि सत कम है तो ब्रह्म का ध्यान कीजिए। मस्तिष्क के मध्य भाग में सहस्र दल कमल के ऊपर अवस्थित परम सात्विकता के पुँज, वेद ज्ञान के अक्षय भंडार, विवेक वृद्ध, ब्रह्मा जी का ध्यान कीजिए, आप उनके समीप नतमस्तक श्रद्धाभाव से बैठे हैं और वे अनन्त सात्विकता की शुभ्र किरणें आपके ऊपर फेंक रहे हैं। दाहिना हाथ उठा कर आपको प्रचंड सात्विक शक्तियों की अभिवृद्धि का वरदान दे रहे हैं। इस ध्यान को एकाग्र मन से दृढ़ कल्पना और पूर्ण श्रद्धा के साथ कीजिए।

यदि आप में रजोगुण कम है तो ध्यान कीजिए कि निखिल रजोगुण के प्रतीक श्री विष्णु भगवान अतुलित वैभव वाले बैकुँठ लोक रत्नजटित स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान है। आप उनके दाहिनी ओर भक्तिभाव से बैठे हैं और वे आपके मस्तक पर हाथ फेर रहे हैं। उनकी कृपा दृष्टि द्वारा अतुलित रजोगुणी शक्तियाँ आपके अन्तः करण में भरी जा रही हैं।

यदि आप में तमोगुण कम है तो ध्यान कीजिए कि प्रलयंकर शंकर लाल-लाल प्रज्वलित अग्नि जैसा तीसरा नेत्र खोल कर ताण्डव नृत्य कर रहे हैं। उनके नृत्य के साथ कड़कड़ाती बिजली जैसी पीत वर्ग लपटें चारों ओर उठ रही हैं। आप इस नृत्य को देख रहे हैं। डमरू ध्वनि से आपके हृदय में वीरता की संहारिणी शक्ति संचार हो रहा है। चारों ओर उड़ने वाली बिजली की लपटें आपके शरीर में प्रवेश करके नवचेतना नवस्फूर्ति निरालस्यता उत्पन्न कर रही हैं। भगवान शंकर प्रसन्न होकर आपके चारों ओर डमरू बजाते हुए नृत्य कर रहे हैं और आपको अतुलित बल प्रदान कर रहे हैं।

यदि आप इष्ट देव को पुरुष वेष की अपेक्षा स्त्री वेष में दर्शन करना पसन्द करते हैं या स्वयं स्त्री हैं, तो ब्रह्म के स्थान पर सरस्वती का, विष्णु के स्थान पर लक्ष्मी का, शिव के स्थान पर दुर्गा का ध्यान कर सकते हैं। इन ध्यानों से जो तत्व आप में कम हैं वह निश्चित रूप से वृद्धि को प्राप्त होगा।


आत्म निरीक्षण योग

हानिकारक एवं विजातीय तत्व वहाँ एकत्रित होते हैं, जहाँ ढीलढाल या लापरवाही रहती है, चौकसी निगरानी देखभाल, जाँच पड़ताल का अभाव रहता है। दाद अक्सर जंघाओं में होता है, कारण यह है कि शरीर के अन्य स्थानों की अपेक्षा जाँघों की सफाई कम होती है। स्नान करते समय भी वहाँ पूरी सफाई नहीं की जाती, धूप हवा से भी वहाँ स्थान वंचित रहता है, फलस्वरूप गंदगी के कीटाणु मजे में छिपे बैठे रहते हैं और अवसर पाकर दाद के रूप में प्रकट होते हैं। पूरी गहरी साँस न लेने के कारण फेफड़ों का कुछ हिस्सा निकम्मा पड़ा रहता है वहाँ विजातीय द्रव्य आसानी से जमा हो जाता है और क्षय सरीख रोग उपज पड़ते हैं। घर के जिस भाग में नित्य झाड़ू नहीं लगती वहाँ मकड़ी, मच्छर, पिस्सू, कीड़े-मकोड़े पलते रहते हैं और दुर्गन्ध आने लगती है। जो लोग दाँतों की नित्य भली प्रकार सफाई नहीं करते उनके मुख से बदबू आने लगती है और दाँत पीले पड़ जाते हैं। कहते हैं कि सुनसान, उजाड़, जनशून्य खण्डहरों में भूत, पलीत, उल्लू चमगादड़ छिपे रहते हैं। चोर, डाकू, लुटेरे, जुआरी प्रकृति के लोग अपना डेरा ऐसे स्थानों में जमाते हैं, जो जन साधारण की दृष्टि से ओझल हों। हिंसक पशु दिन में अपनी माँद में छिपे रहते हैं जब रात हो जाती है तब चुपके-चुपके निकलते हैं और अपना काम बनाने के लिए चोट करते हैं।

यही स्थिति हमारे मन क्षेत्र में होती है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, भय, शोक, द्वेष, ईर्ष्या, आलस्य, प्रमाद, व्यसन अहंकार, आदि अनेकों प्रकार के शत्रु मन क्षेत्र में घुस बैठते हैं और चुपके-चुपके अपना बल बढ़ाते रहते हैं। क्षय, दमा आतिशक, सुजाक कोढ़, दाद आदि रोगों के छोटे कीटाणु आरम्भ में किसी प्रकार मनुष्य के शरीर में घुस जाते हैं, और धीरे-धीरे अपनी वंश वृद्धि करते रहते हैं कुछ समय में उनका अधिकार समस्त शरीर पर हो जाता है इसी प्रकार मन में घुसे हुए यह शत्रु निधड़क होकर अपना अड्डा जमा लेते हैं और मनुष्य की जीवन शक्तियों को चूस-चूस कर परिपुष्ट होते रहते हैं। धीरे धीरे उनकी प्रबलता इतनी अधिक हो जाती है कि प्राणी अपने को उनके बन्धन से छूटना कठिन अनुभव करता है।

मानसिक क्षेत्र में अवाँछनीय तत्वों का, शत्रुओं का इतना प्राबल्य हो जाने का कारण यह है कि इनको निधड़क बैठ जाने का अवसर मिलता है। हममें से अधिकाँश व्यक्ति ऐसे हैं जो अपने अंतर्जगत की चौकसी नहीं करते उसकी क्षति और सुरक्षा की परवा नहीं करते। इस प्रमाद का फायदा शत्रुओं को होता है। जिस गोदाम का कोई पहरेदार न हो उसमें चोरियों का होना निश्चित है। जिस खेत का कोई रखवाला न हो उसे पशु पक्षी उजाड़ेंगे यह निश्चित है। जब अंतर्जगत की चौकसी छोड़ दी जाती है तो भी यही परिणाम होता है। बाहरी काम काज में, साज संभाल में, निर्माण उपार्जन में, लोग बड़े परिश्रम और प्रयत्न के साथ जुटे रहते हैं पर अंतर्जगत की ओर वे बिलकुल उदासीन रहते हैं, इस सम्पदा की रक्षा और वृद्धि के लिए उनका तनिक भी ध्यान नहीं जाता उस ओर आँख उठा कर भी नहीं देखा जाता। आत्म चिन्तन के लिए, आत्म निरीक्षण और परीक्षण के लिए कोई विरले ही थोड़ा समय खर्च करते हैं। इस प्रकार की उपेक्षा के कारण, मैदान खाली देख कर हानिकारक कुप्रवृत्तियाँ और वासनाएं उठ खड़ी होती हैं और निरन्तर बढ़ती, फलती फूलती तथा परिपुष्ट होती रहती हैं। जिस खेत की जुताई, सिंचाई नराई से संस्कारित नहीं किया जाता उसमें खर पतवार और जंगली झाड़ झंखाड़ जड़ जमा लेते हैं। जिस मनोभूमि को संस्कारित नहीं किया जाता उसमें अच्छी फसल नहीं उपजती वहाँ तो कुविचार और कुसंस्कारों का ही उत्पादन होता है।

इन सब बातों पर विचार करते हुए आध्यात्म विद्या के आचार्यों ने बताया है कि नित्य आत्मचिन्तन, आत्मनिरीक्षण, आत्मपरीक्षण करना चाहिए। जिससे शत्रुओं की दाल न गलने पावे, मनः क्षेत्र में कुसंस्कार जड़ न जमाने पाएं। जिस घर में घर का मालिक एक बच्चा भी खाँस रहा हो उसमें घुसने की बलवान चोर की भी हिम्मत नहीं पड़ती। घर से घुसे हुए चोर मालिक के जागने की आहट पाकर भाग खड़े होते हैं। क्योंकि असत्य स्वतः कमजोर होता है, कहते हैं कि “चोर के पाँव नहीं होते।” जो सोता है सो खोता है, जो जागता है सो पाता है। अंतर्जगत की चौकसी और बढ़ोतरी के लिए हमें जागृत रहना चाहिए, प्रयत्न शील रहना चाहिए, ताकि उसमें से दुखदायी कुसंस्कारों की जड़ें उखड़ जाएं और सच्ची शाँति का अमर कल्पवृक्ष लहलहाने लगे। उसकी छाया में हमारा भीतरी और बाहरी जीवन अखण्ड सुख शाँति का रसास्वादन करे।

आत्म चिन्तन की साधना।

रात को सब कार्यों से निवृत्ति होकर जब सोने का समय हो तो सीधे चित्त लेट जाइए। पैर सीधे फैला दीजिए। हाथों को मोड़ कर पेट पर रख लीजिए। शिर सीधा रहे। पास में दीपक जल रहा हो तो बुझा दीजिए या मन्द कर दीजिए। नेत्रों को अधखुले रखिए।

अनुभव कीजिए कि आपका आज का एक दिन, एक जीवन था। अब जब कि एक दिन समाप्त हो रहा है तो एक जीवन की इतिश्री हो रही है। निद्रा एक मृत्यु है। अब इस घड़ी मैं एक दैनिक जीवन की समाप्ति करके मृत्यु की गोद में जा रहा हूँ।

आज के जीवन की आध्यात्मिक दृष्टि से समालोचना कीजिए। प्रातःकाल से लेकर सोते समय तक के कार्यों पर दृष्टिपात कीजिए मुझ आत्मा के लिए वह कार्य उचित था या अनुचित? यदि उचित था तो जितनी सावधानी एवं शक्ति के साथ उसे करना चाहिए था? उसके अनुसार किया या नहीं? बहुमूल्य समय का कितना भाग उचित रीति से, कितना अनुचित रीति से, कितना निरर्थक रीति से व्यतीत किया? यह दैनिक जीवन सफल रहा या असफल? आत्मिक पूँजी में, लाभ हुआ या घाटा? सद्वृत्तियाँ प्रधान रहीं या असद्वृत्तियाँ इस प्रकार के प्रश्नों के साथ दिन भर के कामों का निरीक्षण कीजिए।

जितना अनुचित हुआ हो उसके लिए आत्म देव के सम्मुख पश्चाताप कीजिए। भविष्य में भूल को न दुहराने का निश्चय ही सच्चा पश्चाताप है। धन्यवाद दीजिए और प्रार्थना कीजिए कि आगामी जीवन में कल के जीवन में उस दिशा विशेष कि ओर विशेष रूप से अग्रसर करें। इसके पश्चात शुभ्रवर्ण आत्म ज्योति का ध्यान करते हुए निद्रा देवी की गोद में शाँति पूर्वक चले जाइए।

दूसरी साधना :- प्रातःकाल जब नींद पूरी तरह खुल जाय तो एक अंगड़ाई लीजिए। तीन पूरे लम्बे साँस खींच कर सचेत हो जाइए।

भावना कीजिए कि आज नया जीवन ग्रहण कर रहा हूँ। नया जन्म धारण करता हूँ। इस जन्म को इस प्रकार खर्च करूंगा कि आत्मिक पूँजी में अभिवृद्धि हो। कल के दिन पिछले जन्म में जो भूल हुई थी, आत्म देव के सामने जो पश्चाताप किया था, उसको ध्यान में रखता हुआ आज के दिन का अधिक उत्तमता के साथ उपयोग करूंगा।

दिन भर के कार्यक्रम की योजना बनाइए। इन कार्यों में जो खतरा सामने आने को है उसे विचारिए और उससे बचने के लिये सावधान हो जाइए। उन कार्यों में जो आत्मलाभ होने वाला है वह और अधिक हो इसके लिए तैयारी कीजिए। यह जन्म यह दिन, पिछले की अपेक्षा अधिक सफल हो, यह चुनौती अपने आपको दीजिए और उसे साहसपूर्वक स्वीकार कर लीजिए।

परमात्मा का ध्यान कीजिए। और प्रसन्न मुद्रा में चैतन्यता, ताजगी, उत्साह, साहस आशा एवं आत्मविश्वास की भावनाओं के साथ उठ कर शय्या का परित्याग कीजिए। शय्या से नीचे पैर रखना मानो आज के नव जीवन में प्रवेश करना है।


Quotation

दुनिया में बुराई की कालिमा अधिक है पर वह भलाई की उज्ज्वलता से अधिक नहीं है। यदि यहाँ भलाई की अपेक्षा बुराई अधिक होती तो कोई भी प्राणी इस संसार में रहना पसन्द न करता।


भूत साधना से आत्म विजय

कितने ही मनुष्यों की विचार प्रणाली ऐसी विकृत हो जाती है कि वे अपने मस्तिष्क में दौड़ने वाले विचार प्रवाह को रोकने में समर्थ नहीं हो पाते। किसी से झगड़ा हुआ, झगड़ा होने के बाद दोनों पक्ष अलग हो गये पर विकृत विचार प्रणाली वाले मनुष्य का मस्तिष्क उसी में उलझा रहता है। दिमाग में भारी उत्तेजना एवं गर्मी भर जाती है जिसके कारण सिर भन्नाने लगता है। उस समय कितना ही आवश्यक कोई कार्य सामने हो मस्तिष्क उस उत्तेजना को छोड़ कर नये प्रश्न पर विचार करने के लिए तैयार ही नहीं होता। बुद्धि कहती है कि “जो होना था हो गया, छोटी सी बात पर इतना उलझना ठीक नहीं, चलो दूसरी बात पर विचार करें।” पर वह विचार प्रवाह हटता नहीं बराबर वही उत्तेजना सिर के भीतर गूँजती रहती है। रात को पूरी नींद नहीं आती सिर में दर्द होने लगता है। आँखों में गर्मी छा जाती है पर उस उत्तेजना से पीछा नहीं छूटता।

इसी प्रकार कितने ही व्यक्ति, चिन्ता, शोक, ईर्ष्या, अहंकार, द्वेष, लोभ आदि के कुविचारों में बुरी तरह डूबे रहते हैं। वे इन विचारों को छोड़ना चाहते हैं पर वे छूटते नहीं। लौट-लौट कर वह बातें दिमाग में भर जाती हैं। यह दूषित विचार प्रणाली का परिणाम है। यह एक प्रकार का भयंकर बन्धन है। जिसमें बंधा हुआ मनुष्य विवश होकर कहीं का कहीं घिसटता फिरता है। इस विचारों की गुलामी से छुटकारा पाये बिना आन्तरिक शाँति प्राप्त होना कठिन है।

विचारों पर हमारा आधिपत्य होना चाहिए। जब जिस विचार को हम चाहें अपने मस्तिष्क में विचार करने दें और जब चाहें जिस विचार को निकाल बाहर करें यह स्थिति प्राप्त करना अध्यात्म क्षेत्र के पथिकों के लिए बड़ा आवश्यक है। विचारों पर काबू पाना एकाग्रता में सफलता पाना है। एकाग्रता- मानसिक उन्नति का सर्वोपरि हथियार है। मैस्मरेजम में दूसरों को निद्रा में लाने का प्रधान साधक एकाग्रतापूर्वक तीव्र दृष्टिपात ही तो है। ध्यान में एकाग्रता ही मुख्य है। समाधि एकाग्रता की ही सिद्धावस्था है। व्यापारी, वैज्ञानिक, कवि, चित्रकार, नट, लेखक, विचारक, शिल्पकार कलाकार सरीखे प्रतिभाशाली वर्गों के सफल व्यक्ति एकाग्रता के ही प्रभाव से अपनी प्रतिभा चमकाते हैं। जिसमें एकाग्रता नहीं वह मानसिक क्षेत्र में कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर सकता।

बारूद को जमीन पर फैला कर उसमें आग लगाई जाए तो वह भक् से जल कर समाप्त हो जायगी। पर उसी बारूद को बन्दूक की नली में रखकर केवल एक नियत दिशा में ही चलने दिया जाय तो वह भयंकर शब्द और प्राण घातक चोट करती है। विचार भी यदि बिखरे रहें अस्त व्यस्त रहें, तो उनका कोई महत्व नहीं, पर जब वे एक स्थान पर केन्द्रित किए जाते हैं तो एकाग्रता की शक्ति के साथ गजब के परिणाम उपस्थित करते हैं। एकाग्र मन जिधर लग जाता है उधर ही सफलताओं का ढेर लग जाता है।

विचारों पर काबू पाना ही मन को वश में करना कहलाता है। पातंजलि ने चित्तवृत्तियों के निरोध को योग कहा है। जिसने अपने मन के ऊपर विजय प्राप्त कर ली समझिए कि उसने संसार के ऊपर विजय प्राप्त कर ली। महापुरुषों में यही विशेषता होती है कि वे विचारों के प्रवाह में नहीं बहते वरन् जिधर चाहते हैं उधर विचारों को बहाते हैं। जब चाहते हैं तब विचारों के प्रवाह को मोड़ देते हैं, बदल देते हैं पलट देते हैं एवं बन्द कर देते हैं। महात्मा गाँधी को बड़ी गंभीर गुत्थियाँ सुलझानी पड़ती हैं, उनके आगे कभी-कभी बड़ी विकट चिन्ताजनक समस्याएं आती हैं उनके कन्धे पर हर घड़ी जिम्मेदारियों का भारी बोझ रहता है पर वे जब चाहते तब विचारों के प्रवाह को रोक देते हैं। गंभीर बहस मुवाहिसे में भाग लेते हुए यदि कुछ मिनटों का समय मिल जाता है तो वे इतनी ही देर में गहरी नींद सो लेते हैं। नैपोलियन युद्ध क्षेत्र में घमासान करते समय कुछ देर के लिये घोड़े को पेड़ के सहारे लगा कर और देह को पेड़ का सहारा देकर सो लेता था। विचारों पर हमारा ऐसा ही अधिकार होना चाहिए। घुड़सवार लगाम मोड़ कर अपने घोड़े को मन चाही दिशा में ले जाता है विचार पर भी हमारा ऐसा ही आधिपत्य होना आवश्यक है।

मनोनिग्रह, विचार संयम, चित्त निरोध, एकाग्रता की साधना से एक बड़ी आध्यात्मिक समस्या का हल हो जाता है। जहाँ चाहें वहाँ मन लगा देना और जहाँ चाहे वहाँ से मन हटा लेना यह एक ऐसी सिद्धि है जिसके द्वारा शोक, क्रोध, चिन्ता, भय, काम, निराशा, आवेश आदि अवाँछनीय स्थिति से मन हटा कर समस्त मानसिक दुखों का अन्त किया जा सकता है। संसार में तीन चौथाई दुख मानसिकता और एक चौथाई दुख शारीरिक है। शारीरिक दुख को भी तब मनुष्य भूल जाता है। जब उसका चित्त किसी आनन्ददायक विचारधारा में रमण कर रहा हो। जिसका मन काबू में है जिसका आहार विहार संयमित है उसे वैसे भी शारीरिक कष्टों में नहीं पड़ना पड़ता पर यदि कदाचित किसी पर कोई प्रारब्ध भोग का कष्ट आ भी पड़े तो उसे संबंधित चित्त वाला व्यक्ति आसानी से हंसी हंसी में ही सहन कर लेता है। इस प्रकार साँसारिक दुखों से छुटकारा पाकर मनोनिग्रही आत्मानन्द का सुखोपभोग करता है। हर घड़ी विपरीत, परिस्थितियों में रह कर भी- उसकी आँतरिक शाँति नष्ट नहीं होती।

मनोनिग्रह की साधना।

मन का स्वभाव कुछ न कुछ काम करने का है। वह बेकार कभी नहीं बैठता हर वक्त उसे कुछ न कुछ कार्य चाहिए। इसलिए मन को अन्य दिशाओं से रोक कर पाँच ज्ञानेन्द्रियों के पाँच विषयों पर लगाया जाता है। कान, आँख, जिव्हा, नाक, त्वचा यह पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं- इनके कार्य क्रमशः शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श को अनुभव करना है। यह पाँचों अनुभूतियाँ पाँच तत्वों से भी सम्बन्धित हैं। आकाश से शब्द; तेज से रूप जल से रस, पृथ्वी से गन्ध और वायु से स्पर्श का भान होता है। मन को इन पाँचों की अनुभूतियों में एक विशेष विधि से लगाने की साधना द्वारा उसका संचय हो सकता है। अब क्रमशः पाँचों साधना संक्षिप्त रूप से आगे लिखी जाती हैं।

शब्द-साधना :- कबीर पंथ और राधा स्वामी मत में शब्द साधना की बड़ी मान्यता है। नाद विन्दोमनिषद में इस नाद योग का विस्तृत वर्णन है।

जायफल का चूर्ण, मोम और थोड़ी कस्तूरी मिला कर उसे लाल रेशम की दो छोटी-छोटी गोली जैसी पोटलियों में बाँध लेना चाहिए। यह पोटली इतनी बड़ी होनी चाहिए कि कान में बोतल के काक की तरह फिट हो जावें और भीतर हवा जाने को पथ न बचे। कोई कोई साधक इन पोटलियों की बजाय, तुलसी या चन्दन की लकड़ी, बोतलों के काक रुई या उंगलियों का प्रयोग करते हैं, प्राचीन प्रथा तो रेशम की पोटली की है। पर सुविधानुसार अन्य चीजों से भी काम लिया जा सकता है। साधना के बाद इन्हें निकाल कर ठीक तरह से साफ कर लेना जरूरी है जिससे कि कान का मैल उससे चिपका रह कर गन्दगी की वृद्धि न करे।

इस साधना के लिए रात्रि का निस्तब्ध, कोलाहलरहित समय अधिक उत्तम है। शुद्ध होकर शाँतिपूर्वक ऐसे सुविधाजनक आसन पर बैठिए जिसे कष्ट के कारण साधना समय के बीच में फिर न बदलना पड़े। गोली, पोटली, कार्क, रुई या उंगली लगा कर कान के छेदों को बन्द कर लीजिए ताकि बाहर के शब्द कानों के भीतर न पहुँचने पाएं। नेत्रों को बन्द कर लीजिए। मेरुदण्ड सीधा रखिए।

“ओऽम्” की ध्वनि लहरी पर चित को एकाग्र कीजिए। जैसे घड़ियाल में थोड़ी मार देने पर कुछ देर तक उसमें से थरथराती हुई शब्द ध्वनि निकलती रहती है। इसी प्रकार की ओं..... ओं..... ओं...... ओं..... शब्द ध्वनि आपके मनः लोक में गुँजित हो रही है। इस प्रकार की भावना श्रद्धा एवं गम्भीरता के साथ कीजिए।

कुछ समय पश्चात् कई प्रकार की शब्द ध्वनियाँ सूक्ष्म कर्णेंद्रिय द्वारा सुनाई पड़ेगी, आँधी चलने, रेल दौड़ने, झींगुर बोलने, घंटियां मृदंग, शंख बजने, सितार झनझनाने, बादल गरजने एवं वंशी बजाने जैसे शब्द सुनाई पड़ते हैं।

सब साधकों को एक जैसी ये शब्द ध्वनियाँ सुनाई नहीं पड़ती। कारण यह है कि विभिन्न साधकों की मानसिक स्थिति भिन्न होती है। सतोगुणी स्वभाव वालों को मन्द, समरस, मृदुल शब्द सुनाई पड़ते हैं। रजोगुणी को तीव्र स्वर के गम्भीर शब्द सुनाई देते हैं। तमोगुणी को कर्कश अस्थिर भयंकर डराने वाले शब्दों का अनुभव होता है।

इन शब्द ध्वनियों को आरम्भ में पन्द्रह मिनट तक सुनना चाहिए। फिर क्रमशः एक-एक मिनट बढ़ा कर सुविधानुसार अधिक से अधिक दो घंटे तक किया जा सकता है। जो ध्वनि सुनाई पड़े उसे सुनने में मन को पूरी तन्मयता के साथ लगाना चाहिए ताकि वह बीच में इधर-उधर न दौड़े।

रूप साधना :- रूप साधना के लिए त्राटक का अभ्यास किया जाता है। त्राटक दो प्रकार के होते हैं वाह्य और आभ्यंतरिक दोनों की साधना नीचे लिखी जाती है।

(1) वाह्य त्राटक- किसी बिन्दु पर दृष्टि जमाने को कहते हैं। सफेद चिकने चमकदार कागज के एक चौकोर टुकड़े पर ठीक बीचों-बीच एक रुपये के बराबर गहरी काली स्याही से गोला अंकित कीजिए इस गोले के बीचों-बीच सफेद बिन्दु रहने दिया जाए।

मेरुदंड को सीधा रख कर स्वस्थ चित्त होकर पद्मासन पर अथवा अर्धपद्मासन पर (पाल्थी मार कर) बैठिए। उपरोक्त काले गोले को नेत्रों की सीध तीन फुट के फासले से दीवार पर टाँग लीजिए। काले गोले के बीच के सफेद बिन्दु पर दृष्टि जमाइए। पलक मारते रहने में कुछ हर्ज नहीं पर दृष्टि बिन्दु पर से न हटे। आंखें न तो बहुत अधिक खोली जाएं न पलक सिकोड़े जाएं, दृष्टिपात बहुत हलका हो और न बहुत जोर लगाया जाय। मध्यम स्थिति में यह साधन करना चाहिए। यह साधन स्वस्थ नेत्र वालों को ही करना चाहिए। जिनकी आँखों में कोई रोग है उनके लिए त्राटक करना वर्जित है।

एकटक दृष्टि जमाने से कुछ ही देर में गोले के बीच का सफेद बिन्दु हिलता डुलता घटता बढ़ता काँपता थरथराता तथा रंग बदलता दीखने लगता है। यह सब होने पर भी दृष्टि हटानी न चाहिए। कुछ दिनों के अभ्यास से बिन्दु स्थित हो जाता है। यह इस साधना की परिपक्वावस्था का चिन्ह है। साधन दो मिनट से आरम्भ करके एक-एक मिनट नित्य बढ़ाना चाहिए। आँखों में पानी भर आवे तो त्राटक अवश्य ही समाप्त कर देना चाहिए।

चन्द्रमा पर, घी के दीपक की शिखा पर, शालिग्राम या शिवलिंग के अभाग पर, इष्ट देव के चरण नख या किसी अंग विशेष के बिन्दु पर भी यह साधन किया जा सकता है।

(2) आभ्यन्तरिक त्राटक के लिए नेत्र बन्द करके साधना पर बैठना चाहिए। दोनों कानों के छिद्रों के बीच में एक सीधी रेखा खींची जाय और भूमध्य भाग से लेकर शिरा के पीछे की ओर एक रेखा खींची जाय तो वह दोनों रेखाएं आपस में जहाँ मिलती हैं वहाँ त्रिकुटी ब्रह्मरंध्र या सहस्रकमल का स्थान है। इस स्थान पर शाँत चित्त से ध्यान जमाने पर एक छोटा सा प्रकाश बिन्दु दृष्टिगोचर होता है कुछ दिन के बाद एक के स्थान पर अनेक तथा लाल, पीले हरे, काले, विभिन्न वर्णों के विभिन्न आकृतियों के बिन्दु मस्तक के भीतर चारों ओर बढ़ते हुए दिखाई देते हैं। दीर्घ कालीन सतत अभ्यास से वे बिखरे हुए विभिन्न आकार प्रकार के बिन्दु उस मूल बिन्दु में लय होने लगते हैं और अन्त में एक ही शुभ्र ब्रह्म ज्योति रह जाती है। इसके दर्शन से अन्तः प्रदेश में बड़ी आनन्ददायक शान्ति वर्षा होती है।

रस साधना- जो फल आपको खाने में सबसे अधिक स्वादिष्ट लगता हो उसे इस साधना के लिए लीजिए जैसे आपको कलमी आम अधिक रुचिकर हैं तो उसके पाँच छोटे टुकड़े लें। एक टुकड़ा लेकर जिव्हा के अग्रभाग पर एक मिनट तक रखे रहें और उसके स्वाद का अनुभव करें। फिर इस टुकड़े को फेंक दें और उस पूर्व स्वाद का ध्यान करें बिना आम के आम का स्वाद जिव्हा को होता रहे। दो मिनट में वह अनुभव शिथिल होने लगेगा फिर दूसरा टुकड़ा जबान पर रखिए और पूर्ववत उसे फेंक कर आम के स्वाद का अनुभव कीजिए इस प्रकार पाँच बार करने में पन्द्रह मिनट लगते हैं।

धीरे-धीरे जिव्हा पर कोई वस्तु रखने का समय कम करना चाहिए और बिना इस वस्तु के रस अनुभव करने का समय बढ़ना चाहिए। कुछ समय पश्चात बिना किसी वस्तु को जीभ पर रखे भी केवल भावना मात्र से इच्छित वस्तु का पर्याप्त समय तक रसास्वादन किया जा सकता है।

गन्ध साधना- नासिका के अग्रभाग पर त्राटक करना इस साधना के लिए आवश्यक है। दोनों नेत्रों से एक साथ नासिका के अग्रभाग पर त्राटक नहीं हो सकता इसलिए एक मिनट दाहिनी ओर तथा एक मिनट बाई ओर करना उचित है। दाहिने नेत्र को प्रधानता देकर उससे नाक के दाहिने हिस्से को और फिर बाएं नेत्र को प्रधानता देकर बाएं हिस्से को गम्भीर दृष्टि से देखना चाहिए आरम्भ में एक-एक मिनट से करके अन्त में पाँच पाँच मिनट तक बढ़ाया जा सकता है। इस त्राटक से नासिका की सूक्ष्म शक्तियाँ जाग्रत होती हैं।

इस त्राटक के बाद कोई सुगन्धित तथा सुन्दर पुष्प लीजिए। उसे नासिका के समीप ले जाकर एक मिनट तक धीरे-धीरे सूँघिए और उसकी गन्ध का भली प्रकार स्मरण कीजिए। इसके बाद फूल को फेंक दीजिए और बिना फूल के ही उस गन्ध को दो मिनट तक स्मरण कीजिए। इसके बाद दूसरा फूल लेकर फिर इसी क्रम की पुनरावृत्ति कीजिए। पाँच फूलों का पन्द्रह मिनट प्रयोग करना चाहिए। स्मरण रहे कम से कम एक सप्ताह एक ही फूल प्रयोग होना चाहिए। इसी प्रकार रस साधना में एक फल एक सप्ताह तक प्रयोग होना चाहिए।

स्पर्श साधना- (1) बर्फ या कोई अन्य शीतल वस्तु, शरीर पर एक मिनट लगा कर फिर उसे हटा लें और दो मिनट तक अनुभव करें कि वही ठंडक मिल रही है। सह्य उष्णता का गरम किया हुआ पत्थर का टुकड़ा शरीर से स्पर्श करा कर उसकी अनुभूति कायम रखने की भावना करनी चाहिए। पंखा झोल कर हवा करना, चिकना काँच का गोला या रुई की गेंद त्वचा पर स्पर्श कर के फिर उस स्पर्श को ध्यान रखना भी इसी प्रकार का अभ्यास है। ब्रश से रगड़ना लोहे का गोला उठाना जैसे अभ्यासों की भी इसी प्रकार ध्यान भावना की जा सकती है।

(2) किसी समतल भूमि पर एक बहुत ही मुलायम गद्दा बिछा कर उस पर चित्त लेट रहिए कुछ देर इसकी कोमलता का स्पर्श सुख अनुभव करते रहिए। इसके बाद बिना गद्दे की कठोर जमीन या तख्त पर लेट जाइए। कठोर भूमि पर पड़े रह कर कोमल गद्दे के स्पर्श की भावना कीजिए। फिर पलट कर गद्दे पर आ जाइए और उस कठोर भूमि की कल्पना कीजिए। इस प्रकार भिन्न परिस्थिति में भिन्न वातावरण की भावना करने से तितीक्षा की सिद्धि मिलती है। स्पर्श साधना में सफलता प्राप्त करने पर शारीरिक कष्टों को हँसते हँसते सहने की शक्ति प्राप्त हो जाती है।

उपरोक्त पाँचों साधनाओं को एक साथ ही किया जाय यह आवश्यक नहीं। जिनके पास साधना के लिए थोड़ा समय है वे इन में से किसी एक दो साधनाओं को अपनी रुचि और सुविधा के अनुसार चुन सकते हैं। उसमें सफलता मिलने पर अन्य साधनाओं को हाथ में लिया जा सकता है।

इन साधनाओं से मन वश में होता है, चित्तवृत्तियों का निरोध होता है और विचारों पर काबू होता है। योग के समस्त साधनों का यही उद्देश्य है। एकाग्रता की सफलता तथा आत्म विजय जीवन की सब से बड़ी सफलताएं हैं। इनके आधार पर मनुष्य अपनी इच्छानुसार जो चाहे सो बन सकता है। जो चाहे सो कर सकता है। इन्द्रियों की सूक्ष्म शक्ति से अनेकों प्रकार की सिद्धियाँ मिलती हैं, वे इन्द्रियाँ वस्तुओं के आधार पर नहीं वरन् इच्छा के आधार पर संसार के समस्त सुखों को अनुभव कर लेती हैं। भोगी लोग जिन भौतिक भोगों के लिए मृग तृष्णा में मारे-मारे फिरते हैं वे सब योगियों के करतल गत होते हैं। संकल्प शक्ति से वे सब सुख उनके सामने आकर खड़े हो जाते हैं।


उपवास साधना

साधनाओं में उपवास का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रायश्चित्तों के लिए तथा आत्म शुद्धि के लिए उपवास सर्वोत्तम साधन माना जाता है। किसी शुभ कार्य को आरम्भ करते हुए प्रायः उपवास का आश्रय लिया जाता है। कन्यादान के दिन माता पिता उपवास रखते हैं। यज्ञोपवीत व्रतबन्ध, समावर्तन , वेदारम्भ आदि संस्कारों के दिन ब्रह्मचारी को उपवास रखना आवश्यक है। अनुष्ठान के दिन में यजमान तथा आचार्य को उपवास रखना होता है। नवदुर्गा के नौ दिन कितने ही स्त्री पुरुष पूर्ण या आँशिक उपवास रखते हैं।

भूल, अपराध, पाप अथवा न करने योग्य कार्य हो जाने पर उपवासों द्वारा प्रायश्चित किया जाता है। आत्म बल बढ़ाने के लिए, आन्तरिक पवित्रता में अभिवृद्धि करने के लिए उपवास एक अचूक अस्त्र है। विश्व विभूति महात्मा गाँधी ने अपने जीवन में कई बार उपवास का आश्रय लिया है। उन्होंने इक्कीस-इक्कीस दिन के उपवास किये हैं। सत्याग्रह के रूप में एक महान अस्त्र के रूप में भी उपवास किया जाता है। वीर यतीन्द्रनाथ दास, देशभक्त मेक्म्विनी जैसी आत्माओं ने निराहार रह आत्म विसर्जन किया था। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर ने अपने जीवन में लम्बे-लम्बे उपवास किये थे और उस तपश्चर्या के प्रताप से आत्मदर्शन करने में सफल हुए थे।

उपवास के संकल्प के साथ-साथ सात्विकता की तरंगें अन्तःकरण में उठना आरम्भ होती हैं और रजोगुण तमोगुण की कमी होने लगती है। गीता कहती है कि- ‘निराहार रहने से विषय निवृत्त होते हैं।’ शुभ कर्मों के लिए सात्विकता की अधिकता आवश्यक है इसलिए प्रत्येक धर्म कृत्य के साथ उपवास को सम्बन्धित रखा गया है। आवेशों का उफान भूखे रहने पर घट जाता है। विषय विकारों से हल्के पड़ते हैं और भवताप से पीड़ित मनुष्य को इस महौषधि द्वारा तुरन्त पवित्रता की शीतलता अनुभव होने लगती है।

स्वास्थ्य की दृष्टि से उपवास का असाधारण महत्व है। रोगियों के लिए इसे एक प्रकार की जीवन मूरि ही कह सकते हैं। चिकित्सा शास्त्र का रोगियों को एक दैवी उपदेश है कि- “बीमारी को भूखा मारो” भूखे रहने से बीमारी मर जाती है और रोगी बच जाता है। संक्रामक कष्ट साध्य, खतरनाक रोगों में साधन ही एक मात्र चिकित्सा है। मोतीझरा, निमोनिया, त्रिशूचिका, प्लेग, सन्निपात, टाइफ़ाइड जैसे रोगों में कोई भी चिकित्सा उपवास का आश्रय हटाने का साहस नहीं कर सकता। प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान तो समस्त पूर्ण या आँशिक उपवास को ही सर्वप्रधान उपचार बताता है। इस तथ्य को हमारे माननीय ऋषिगण भी भली प्रकार जानते थे। इसलिए उन्होंने धार्मिक कृत्यों में इस साधना को बड़ा महत्व दिया है। एकादशी, रविवार, अमावस्या, पूर्णमासी, चतुर्थी प्रभूति व्रत हर महीने निश्चित हैं। इसके अतिरिक्त हर महीने दो चार विशेष व्रत भी होते हैं, इनके लम्बे चौड़े महात्म्यों का उल्लेख पुराणों में मिलता है। इन महात्म्यों का इतना आकर्षक वर्णन इसलिए है कि लोगों की रुचि इस ओर आकर्षित हो और वे उपवास के द्वारा प्राप्त होने वाले शारीरिक तथा आत्मिक लाभों को उठावें।

आध्यात्म मार्ग के पथिकों के लिए उपवास साधना को अपनाना आवश्यक है। इससे उनके आत्मिक दोष घटते और आत्मबल बढ़ता चले। उपवास तीन प्रकार के होते हैं (1) दैनिक (2) नियत कालीन (3) विशिष्ट। इन तीनों का विवेचन नीचे किया जाता है।

दैनिक उपवास- नित्य जो अन्न ग्रहण किया जाता है वह उपवास के स्वल्पाहार की तरह हो। जिस दिन उपवास होता है उस दिन बीच में कुछ स्वल्पाहार किया जाता है उसके लिए सात्विक, नमक आदि स्वादिष्ट मिश्रणों से रहित आहार लिया जाता है। दैनिक उपवास करने वाले को दोपहर को एक बार पूर्ण आहार अन्नाहार लेना चाहिए। उसमें मिर्च मसालों का पूर्ण रूपेण त्याग रहे। केवल नमक लिया जा सकता है। मीठा लेना हो तो बहुत थोड़ा लेना चाहिए। रोटी में कई अनाजों का मिश्रण न हो एक ही किस्म का अन्न होना चाहिए। रोटी के साथ दूध,दही, छाछ, दाल, साग में से कोई एक चीज ली जा सकती है। कई दालों का, कई सागों का मिश्रण या थाली में कई प्रकार के पदार्थों का होना ठीक नहीं। चावल, दलिया खिचड़ी आदि के सम्बन्ध में भी यही हो। भोजन अपने हाथ से बनाया जा सके तो सबसे अच्छा, नहीं तो ऐसे विश्वस्त व्यक्ति द्वारा बनाया हुआ तो होना ही चाहिए जो सात्विक प्रकृति का और शुद्ध चरित्र का हो। कारण यह है कि भोजन बनाने वाले की मनोवृत्तियों का आहार पर बड़ा भारी प्रभाव पड़ता है और उसे खाने वाले के मन में भी वैसे ही भाव उत्पन्न होते हैं।

शाम को अन्नाहार न लेकर फल एवं दूध लिया जा सकता है। दैनिक उपवास रखने वालों को केवल एक कालिक आहार पर रहने की आवश्यकता नहीं है। यदि साधक बालक या श्रम जीवी है तो प्रातःकाल भी दूध ले सकता है।

बासी, बुसा, घी, तेल में तला हुआ, गरिष्ठ, बहुत अधिक जलाया या भुना हुआ मिर्च मसाले खटाई, मिठाई से सराबोर आहार त्याज्य है। इस प्रकार विवेक-पूर्वक जो सात्विकता प्रधान आहार लिया जाता है वह फलाहार स्वल्पाहार के समान है। इस प्रकार आहार करता हुआ मनुष्य उपवास के फल को ही प्राप्त होता है।

(2) नियत कालीन- किसी निर्धारित समय पर जो उपवास किये जाते हैं वे नियत कालीन कहलाते हैं। एकादशी, अमावस्या, पूर्णमासी, रविवार, शिवरात्रि, नवदुर्गा आदि नियतकालीन उपवास है। दैनिक की नियत कालीनों में अधिक कड़ाई बरती जाती है। इनमें एक ही बार फलाहार करना चाहिए। जो लोग दैनिक उपवास करने की स्थिति में नहीं हैं, उन्हें नियत कालीनों को ही अपनाना चाहिए। समय-समय पर निराहार रहने से पेट में संचित मलों का पाचन हो जाता है तथा मनोविकारों की शुद्धि होती रहती है। महीने में कम से कम दो उपवास तो अवश्य ही करने चाहिएं इसके लिए दोनों पक्षों की एकादशियाँ या अमावस्या पूर्णमासी नियत कर लेनी चाहिए। यदि महीने में चार दिन सम्भव हो तो सप्ताह का कोई एक दिन तेज वृद्धि और प्रतिभा विकास के लिए उत्तम है।

(3) विशिष्ट- आत्म शुद्धि के लिए, अपराधों के प्रायश्चित्त स्वरूप अथवा किसी विशेष प्रयोजन के लिए जो उपवास किये जाते हैं। वे विशिष्ट कहलाते हैं। इनकी कोई मर्यादा नियत रहनी चाहिए। अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार उनकी अवधि नियत करनी चाहिए। बिल्कुल निराहार व्रत स्वस्थ अवस्था में एक दिन से अधिक न करना चाहिए। दूध या फलों का रस जैसी कोई चीज लेते रहना ठीक है।

उपवास सम्बन्धी कुछ आवश्यक नियम।

1- उपवास के दिन कड़ा शारीरिक या मानसिक परिश्रम नहीं करना चाहिए। उस दिन यथा-सम्भव अधिक विश्राम लेना चाहिए।

2- उपवास के दिन खूब पानी पीना चाहिए बिना इच्छा के भी पानी पीना चाहिए जिससे पेट अच्छी तरह धुल जावे। पानी के साथ नींबू या थोड़ा नमक भी मिला लिया जावे तो पेट की सफाई में और भी मदद मिलती है।

3- उपवास समाप्त करते ही गरिष्ठ चीजें अधिक मात्रा में खाने से उल्टी हानि होती है। इसलिए उपवास तोड़ते समय थोड़ी मात्रा में हल्की सुपाच्य चीजें लेनी चाहिएं। जितने समय उपवास किये हो, उतने ही समय पीछे भी साधारण आहार पर धीरे-धीरे आने में लगाना चाहिए।

4- उपवास काल में आवश्यकता होने पर सुपाच्य फल शाक या दूध ही लेना चाहिए गरिष्ठ पकवान या मिठाइयाँ खाना उपवास को व्यर्थ बना देता है।

5- उपवास काल में आत्म चिन्तन, ईश्वराधन स्वाध्याय, सत्संग आदि सात्विकता बढ़ाने वाले कामों में विशेष रूप में समय लगाना चाहिए।


आत्म नियंत्रण के लिए व्रत

किसी सत कार्य को पूरा करने का संकल्प व्रत कहलाता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य अपरिग्रह आदि महाव्रत कहलाते हैं। धर्मचर्या प्रतिज्ञा लेना उसे निबाहना व्रत है। अनेक दिशाओं में बिखरी हुई इच्छाओं को एकत्रित करके एक कार्य में लगाने के लिए तथा उस कार्य में जागरुक रहने के लिए व्रत लिए जाते हैं। व्रत का एक संकल्प है जिसे लेकर मनुष्य अपने ऊपर एक स्वेच्छा उत्तरदायित्व लेता है। यह उत्तरदायित्व व्रत की प्रतिज्ञा के आधार पर पालन होता रहता है।

मन की मूल प्रवृत्तियाँ बड़ी स्वच्छंद हैं वे बार -बार इधर उधर भागती हैं। नित नये परिवर्तन, चंचलता तथा, अस्थिरता में मन को बड़ा रस आता है। भौंरा एक फूल से दूसरे पर उड़ता फिरता है, मन जंगली घोड़े की तरह जहाँ तहाँ उछल-कूद मचाना अधिक पसन्द करता है। किसी एक बात पर डटा रहना उसे रुचिकर नहीं होता। यदि स्वभाव को ज्यों का त्यों रहने दिया जाय तो किसी एक विचार पर स्थिर रहना या एक कार्य में जुटा रहना कठिन है। कितने ही मनुष्य जिन्होंने अपनी प्रवृत्तियों का नियंत्रण नहीं किया है अपने विचार और कार्य जल्दी-जल्दी बदलते रहते हैं, फलस्वरूप उनका जीवन क्रम सदा अस्त−व्यस्त रहता है। किसी भी दिशा में उन्हें सफलता नहीं मिलती।

आत्मोन्नति के लिए जीवन क्रम को, विचारधारा को, कार्य प्रणाली को पूर्ण तथा नियंत्रण ऐसा होना चाहिए कि कठिनाइयाँ आने पर भी निश्चित पथ से विचलित होने का अवसर न आवे। इस आत्म नियंत्रण की महत्वपूर्ण सफलता को प्राप्त करने के लिए संकल्प को, प्रतिज्ञा का, व्रत को, लेना पड़ता है। जिव्हा के चटोरेपन पर उपवास द्वारा वाचालता पर मौन द्वारा काम वासना पर ब्रह्मचर्य द्वारा नियन्त्रण स्थापित किया जाता है। “अमुक काम न करूंगा” या “इस मर्यादा के अन्दर करूंगा” इस प्रकार की कठोर प्रतिज्ञा करने से एक निश्चित संकल्प की स्थिरता होती है। यदि धार्मिक भावनाओं के साथ, ईश्वर की साक्षी में यह प्रतिज्ञा की जाती है तो उसे व्रत कहा जाता है। साधारण प्रतिज्ञाओं की अपेक्षा व्रत की शक्ति बहुत प्रबल होती है क्योंकि उसका अन्तःकरण के गहरे स्तल तक प्रभाव पड़ता है। साधारण प्रतिज्ञाएं तो टूटती भी रहती हैं पर व्रतों में ईश्वर की कृपा से आम तौर से सफलता ही मिलती है। उनके टूटने के अवसर बहुत ही कम आते हैं।

व्रतों के साथ एक प्रकार की तपश्चर्या सम्बन्धित है। उनके द्वारा तितीक्षा का कष्ट सहने का अभ्यास बढ़ता है। नियत गतिविधि से कोई धार्मिक कृत्य, व्रतों के आधार पर बड़ी आसानी से चलते रहते हैं। एक व्रत के सफलतापूर्वक पूरा हो जाने पर साधक का साहस बढ़ जाता है। और अगले व्रतों के लिए वह अधिक दृढ़ हो जाता है। इसलिए आरम्भ छोटे व्रतों से किया जाता है। स्त्रियों में इस प्रकार के छोटे-छोटे व्रतों का बहुत प्रचलन है। वे संक्रान्ति से कोई धार्मिक अनुष्ठान आरम्भ करती हैं। एक वर्ष पूरा हो जाने पर उस कर्मकाण्ड का सफलतापूर्वक पूर्ण हो जाने के उपलक्ष्य में कुछ दान पुण्य करती हैं।

मार्गशीर्ष का, माघ का प्रातःकालीन शीतल जल का स्नान शीत की तितीक्षा का व्रत है। भूमि पर शयन, मौन, उपवास, भोजन में से कुछ वस्तुओं का त्याग, प्रातःकालीन शीघ्र जागरण नियत पूजन वन्दन क्रिया क्षेत्र की परिक्रमा, आहार-विहार दिनचर्या एवं किसी पद्धति में किन्हीं विशेष बातों का सम्मिलित करना या त्याग करना, सर्दी-गर्मी, भूख प्यास को सहना, एक प्रकार के तप हैं। इन्हें नियत समय पर धार्मिक भावनाओं के साथ आरम्भ और पूर्ण करना व्रत कहलाता है।

व्रतों के अपनाने से आत्म बल बढ़ता है। इसलिए आत्म मार्ग के पथिकों को समय-समय पर शारीरिक, मन, वाणी, व्यवहार और वस्तुओं सम्बन्धी व्रतों का पालन करते रहना चाहिए। कुछ समय तक के लिए जूता पहनना छोड़ देना, भूमि पर सोना, उपवास रखना, रात्रि जागरण, पैदल तीर्थ यात्रा, नमक छोड़ देना, सूर्य दर्शन के साथ भोजन करना, कम वस्त्रों का धारण, शीत ऋतु में प्रातः स्नान जैसे उपायों का अवलम्बन करते रहने से शरीर कष्ट सहिष्णु बनता है मौन, पूजन, आराधना, एकान्त सेवन, दान, परोपकार सत्संग, स्वाध्याय, म्यान जैसे कार्यों से मानसिक क्षमता एकाग्रता बढ़ती है। केवल सत्य ही बोलना, हिंसा न करना, धन का अधिक संचय न करना, काम सेवन अयुक्त मर्यादा से अधिक न करना। अन्योपार्जित धन से, कटुभाषण से बचना, आदि आत्मिक बातों से आत्म शक्ति बलवती होती है।

आत्म शुद्धि के लिए चांद्रायण या अर्ध चांद्रायण जैसे व्रत बहुत उपयोगी हैं। उनसे अनेक रोगों की अपने आप चिकित्सा भी हो जाती है। चांद्रायण व्रत एक महीने के लिए होता है। जिस आदमी का आहार एक सेर का हो वह पूर्णमासी के दिन पूर्ण आहार करके प्रतिदिन एक छटाँक घटाता जाय और अमावस्या को बिल्कुल निराहार रहे। फिर शुक्र पक्ष की प्रतिपदा से एक छटाँक आरम्भ करके प्रतिदिन एक छटाँक बढ़ाता जाय और पन्द्रह दिन में (अगली पूर्णमासी को) पूरे आहार पर पहुँच जावे। अर्ध चांद्रायण इसका आधा होता हो। पन्द्रह दिन में से सात दिन क्रमशः कम करे आठवें दिन निराहार रहे फिर उसी क्रम से बढ़ाकर अगले सात दिन में पूर्ण आहार पर पहुँच जावे। नये साधकों को अर्ध चांद्रायण ही सुगम पड़ता है।

व्रतों से साधक की आत्म शक्ति बढ़ती है और उसे बाह्य एवं आन्तरिक अनेक लाभों की उपलब्धि होती है।


सूर्य नमस्कार

स्वास्थ्य को स्थिर रखने और बढ़ाने के लिए व्यायाम की बड़ी आवश्यकता है। व्यायाम से माँसपेशियाँ, नाड़ी समूह, संधियाँ तथा अस्थियाँ मजबूत होती हैं, रक्त का संचार ठीक होता है। फेफड़े, हृदय आमाशय, जिगर तथा आंतें अपना-अपना काम भली प्रकार करते रहते हैं। चेहरे पर तेज, गहरी निद्रा, उदर की सफाई का बहुत कुछ आधार व्यायाम पर निर्भर है। इन कारणों से व्यायाम हमारे दैनिक जीवन में उतना ही महत्वपूर्ण है जितना अन्न जल और भोजन।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कुपथियों ने व्यायाम को योग विद्या में प्रमुख स्थान दिया है। अष्टाँग योग साधना में यम नियम के बाद आसन का नम्बर आता है। आसन अपने ढंग के अनोखे व्यायाम हैं। पहलवान जिन डंड बैठक आदि कठोर व्यायामों को करते हैं, सर्व-साधारण के लिए उपयोगी नहीं बैठते। जिनके शरीर मजबूत हैं जिनके आहार में घी दूध की पर्याप्त मात्रा रहती है, जिन्हें मानसिक संघर्ष में अधिक नहीं उलझना पड़ता उनके लिए पहलवान बनने वाले कठोर व्यायाम ठीक हैं। पर जिनकी ऐसी स्थिति नहीं है। उनके लिए ऐसा व्यायाम होना चाहिए जो अंग प्रत्यंगों पर अधिक दबाव न डाले। और लाभ की दृष्टि से जो सर्वांगपूर्ण है। ऐसे व्यायाम आसान ही हैं, शरीर में कुछ सूक्ष्म ग्रन्थियाँ होती हैं। जिन पर आसनों के द्वारा विशिष्ट प्रभाव पड़ता है। इस प्रभाव के कारण शारीरिक शक्ति की वृद्धि होने के साथ-साथ मानसिक तथा आत्मिक बल भी बढ़ता है। आसनों का लाभ स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीरों को मिलता है।

सर्व-साधारण के लिए जो आसन बहुत ही उपयोगी हैं उनको क्रमबद्ध करके सूर्य-नमस्कार की विशिष्ट प्रणाली का आविष्कार हुआ है। इस एक साधना के अंतर्गत बारह आसन हो जाते हैं इसकी नियमित साधना करने से थोड़े ही दिनों में स्वास्थ्य का आश्चर्यजनक परिवर्तन हो जाता है।

साधना विधि।

प्रातः काल सूर्योदय समय के आस पास इस साधना को करने के लिए खड़े हो जाइए। यदि अधिक सर्दी गर्मी या हवा हो तो हल्का कपड़ा शरीर पर पहने रहिए अन्यथा लंगोट या नेकर के अतिरिक्त सब कपड़े उतार दीजिए। खुली हवा में या स्वच्छ खुली खिड़कियों के कमरे में कमर सीधी रख कर खड़े हो जाइए। मुख पूर्व की ओर कर लीजिए। नेत्र बन्द करके हाथ जोड़कर भगवान सूर्य नारायण का ध्यान कीजिए और भावना कीजिए सूर्य की तेजस्वी आरोग्यमयी किरणें आपके शरीर में चारों ओर से प्रवेश करती हुई आपको तेज और आरोग्य प्रदान कर रही हैं। अब निम्न प्रकार क्रिया आरम्भ कीजिए।

1- पैरों को सीधा रखिए। कमर पर से नीचे की ओर झुकिये, दोनों हाथों को जमीन पर लगाइए। मस्तक घुटनों से लगे। यह हस्त पादासन है इससे टखनों का टाँग के नीचे के भागों का, जंघा का चूतड़ों का, पसलियों का, कन्धों के पृष्ठ भाग तथा बाँहों के नीचे के भाग का व्यायाम होता है।

2- शिर को घुटनों से हटाकर लम्बा श्वास लीजिए। पहले दाहिने पैर को पीछे ले जाइए और पंजे को लगाइए। बाएं पैर को आगे की ओर मुड़ा रखिए। दोनों हथेलियाँ जमीन से लगी रहें। निगाह सामने और शिर कुछ ऊँचा रहे। इस से जाँघों के दोनों भागों का तथा बायें पेड़ू का व्यायाम होता है। इसे एक पाद प्रसरणासन कहते हैं।

3- बाएं पैर को भी पीछे ले जाइए। उसे दाहिने पैर से सटा कर रखिए। कमर को ऊंचा उठा लीजिए। सिर और सीना कुछ नीचे झुक जाएगा।

यह द्विपाद प्रसरणासन है। इससे हथेलियों की सब नसों का, भुजाओं का, पैरों की उंगलियों और पिंडलियों का व्यायाम होता है।

4- दोनों पाँवों के घुटने, दोनों हाथ, छाती तथा मस्तक इन सब अंगों को सीध से रख कर भूमि से स्पर्श कराइए। शरीर तना रहे- कहीं लेटने की तरह निःचेष्ट न हो जाइए। पेट जमीन को न छुए।

इसे अष्टाँग प्रणिपातासन कहते हैं। इससे बाहों, पसलियों, पेट, गर्दन, कन्धे तथा भुजदंडों का व्यायाम होता है।

5- हाथों को सीधा खड़ा कर दीजिए। सीना ऊपर उठाइए। कमर को जमीन की ओर झुकाइए सिर ऊँचा कर दीजिए आकाश को देखिए। घुटने जमीन पर न टिकने पावें। पंजे और हाथों पर शरीर सधा रहे। कमर जितनी मुड़ सके मोड़िए ताकि धड़ ऊपर को अधिक उठ सके।

यह सर्पासन है। इससे जिगर का आँतों का तथा कण्ठ का अच्छा व्यायाम होता है।

6- हाथ और पैरों के पूरे तल्वे जमीन से स्पर्श कराइए। घुटने और कोहनियों के टखने झुकने न पावें। कमर को जितना हो सके ऊपर उठा दीजिए। ठोड़ी कन्ठ मूल में लगी रहे। सिर नीचा रखिए।

यह भूधरासन है। इससे गर्दन पीठ, कमर, कूल्हे, पिंडली, पैर तथा भुजदंडों की कसरत होती है।

7- यहाँ से अब पहले की हुई सूरतों पर वापिस जाया जायगा। दाहिने पैर को पीछे ले जाइए। पूर्वोक्त नं. 2 के अनुसार एक पाद प्रसरणासन कीजिए।

8- पूर्वोक्त नं. 1 की तरह हस्त पादासन कीजिए।

9- सीधे खड़े हो जाइए। दोनों हाथों को ऊपर आकाश की ओर ले जाकर हाथ जोड़िए। सीने को जितना पीछे ले जा सकें ले जाइए। हाथ जितने पीछे जा सकें ठीक है। पर वे मुड़ने न पाए। यह ऊर्ध्व नमस्कारासन है इससे फेफड़े और हृदय का अच्छा व्यायाम होता है।

10- अब उसी आरम्भिक स्थिति पर आ जाइए। सीधे खड़े होकर हाथ जोड़िए और भगवान सूर्य नारायण का ध्यान कीजिए।

यह एक सूर्य नमस्कार हुआ। आरम्भ पाँच से करके सुविधानुसार थोड़ी थोड़ी संख्या धीरे धीरे बढ़ाते जाना चाहिए। व्यायाम काल में मुँह बन्द रखना चाहिए। साँस नाक से ही लेनी चाहिए।


साधकों के कुछ नियम

1- साधकों को सूर्योदय से कम से कम एक घन्टा पूर्व उठना चाहिए और नित्य कर्म से निवृत्त होकर साधना में लग जाना चाहिए। साधना के लिए सर्वोत्तम समय प्रातःकाल का ही है।

2- ऋतु और स्वास्थ्य अनुकूल हो तो स्नान करके साधना पर बैठना चाहिए। यदि सुविधा न हो तो हाथ पैर मुख धोकर कार्य आरम्भ कर देना चाहिए।

3- साधकों का आहार विहार सात्विक होना चाहिए। ब्रह्मचर्य का जिस हद तक अधिक पालन हो सके उतना ही अच्छा है।

4- रात्रि को जल्दी सो जाना आवश्यक है। अधिक रात्रि तक जगने वालों के लिए प्रातः जल्दी उठने में असुविधा होती है।

5- साधना का आसन माला आदि अलग रखने चाहिए उसे दूसरे लोग प्रयोग न करें। एक नियत स्थान अभ्यास के लिए चुन लेना चाहिए रोज-रोज जगह बदलना ठीक नहीं।

6- साधना काल में कम से कम वस्त्र शरीर पर रखने चाहिएं। स्वच्छ वस्त्र ही शरीर पर रहें।


प्राणाकर्षण प्राणायाम

हृदय और मस्तिष्क शरीर के भीतर दो ऐसे प्रधान अंग हैं जिन पर मनुष्य की जीवनी शक्ति एवं मानसिक स्वस्थता निर्भर रहती है। हृदय की गति में अवरोध होते ही मृत्यु निश्चित है। मस्तिष्क में विकार उत्पन्न होने पर विक्षिप्तता एवं पागलपन आ घेरता है। जिनके यह दोनों अंग स्वस्थ हैं उनकी शारीरिक और मानसिक स्वस्थता कायम रहती है- बढ़ती है। इन दोनों अंगों के परिशोधन और परिवर्धन के लिए प्राणायाम का व्यायाम है। इस व्यायाम से फेफड़े मजबूत रहते हैं और खाँसी श्वास क्षय आदि रोगों से सुरक्षा रहती है।

इतना ही नहीं सूक्ष्म शरीर को भी प्राणायाम से बहुत लाभ पहुँचता है। उससे आत्मशक्ति बढ़ती है। महर्षि पातंजलि ने योग दर्शन में कहा है :-

“किंच धारण सुच योग्यता मनस” अर्थात् प्राणायाम से मन की एकाग्रता होती है। चंचल मन को वश में करने के लिए प्राणायाम का हथियार बहुत ही उपयुक्त सिद्ध होता है। वे और भी कहते हैं- “ततः क्षीयते प्रकाश वरणम्” 2।52 अर्थात् प्राणायाम से अन्धकार का आवरण क्षीण होता है। हृदय में अज्ञान और कुविचारों के कारण एक प्रकार का अन्धकार हो जाता है। प्राणायाम से आत्म ज्योति का प्रकाश जगता है और इससे इस अज्ञान का नाश होता है।

प्राणायाम की सुगम क्रिया।

प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर साधना के लिए किसी स्वच्छ शान्तिदायक स्थान में आसन बिछा कर बैठिए दोनों हाथ दोनों घुटनों पर रखिए। मेरुदण्ड सीधा रहे। नेत्र बन्द कर लीजिए।

फेफड़ों में भरी हुई सारी हवा बाहर निकाल दीजिए। अब धीरे-धीरे नासिका द्वारा साँस लेना आरम्भ कीजिए जितनी अधिक मात्रा में भर सकें। फेफड़ों में भर लीजिए। अब कुछ देर उसे भीतर ही रोके रहिए। इसके पश्चात साँस को धीरे धीरे नासिका द्वार से बाहर निकालना आरम्भ कीजिए। हवा को जितना अधिक खाली कर सकें कीजिए। अब कुछ देर साँस को बाहर ही रोक दीजिए। अर्थात् बिना साँस के रहिए, यह एक प्राणायाम हुआ। साँस निकालने में रेचक, खींचने को पूरक और रोके रहने को कुँभक कहते हैं। कुँभक के दो भेद हैं। साँस को भीतर भर कर रोके रहना ‘अन्तर कुँभक’ और खाली करके बिना साँस रहना ‘बाह्य कुँभक कहलाता है। रेचक और पूरक में समय बराबर लगाना चाहिए पर कुँभक में उसका आधा समय ही पर्याप्त है।

पूरक करते समय भावना करनी चाहिए कि मैं जनशून्य लोक में अकेला बैठा हूँ मेरे चारों ओर चैतन्य विद्युत प्रवाह जैसी जीवनी शक्ति का समुद्र लहरें ले रहा है। साँस द्वारा वायु के साथ साथ उस प्राण शक्ति को मैं अपने अन्दर खींच रहा हूँ।

अन्तर कुँभक करते समय भावना करनी चाहिए कि उस चैतन्य प्राण शक्ति को मैं अपने भीतर भरे हूँ। समस्त नस नाड़ियों में, अंग प्रत्यंगों में वह शक्ति जज्ब हो रही है। उसे सोख कर देह का रोम रोम चैतन्य प्रफुल्ल सतेज एवं परिपुष्ट हो रहा है।

रेचक करते समय भावना करनी चाहिए कि शरीर में संचित मल, रक्त में मिले हुए विष, मन में घुसे हुए विकार, साँस छोड़ने पर वायु के साथ साथ बाहर निकले जा रहे हैं।

बाह्य कुँभक करते समय भावना करनी चाहिए कि अन्दर के दोष साँस द्वारा बाहर निकाल कर भीतर का दरवाजा बन्द कर दिया गया है ताकि वे विकार वापिस लौटने न पावें।

इन भावनाओं के साथ प्राणाकर्षण प्राणायाम करने चाहिए। आरम्भ में पाँच प्राणायाम करें फिर क्रमशः सुविधानुसार बढ़ाते जावें।


क्रिया योग

सम्पत्तिवान बनने के लिए यह आवश्यक है कि अधिक कमाया जाय और उस कमाई को सुरक्षित रखा जाय। आत्मिक दृष्टि से सम्पन्न बनने के लिए भी हमें यही करना पड़ता है। आत्मिक गुणों को, अध्यात्मिक तत्वों को अपने अन्दर बढ़ाना और उन तत्वों को क्रियात्मक रुप में चरितार्थ करना यही कमाना और जमा करना है। इसी रीति से साधक आत्म सम्पत्ति शाली बनता है।

आहार विहार की सुव्यवस्था से शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ाना, विद्या, विवेक, ज्ञान, विज्ञान, कला चातुर्य से मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाना, धन, प्रतिष्ठा, मित्रता लोक सेवा एवं सत्कार्यों द्वारा सामाजिक स्वस्थता बढ़ाना, हर साधक के लिए आवश्यक है। जो इनसे जितना संपन्न होगा उस की आन्तरिक स्थिति उतनी ही मजबूत होगी, मजबूत भूमि पर ही दया उदारता परोपकार, पवित्रता, संयम ईश्वर परायणता के पौधे उगते हैं। जैसे ऊसर भूमि में उत्तम बीज या तो जमते ही नहीं या जमते हैं तो अल्प काल में ही सूख जाते हैं उसी प्रकार जिनका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक स्वास्थ्य ठीक नहीं वे आत्म बल की सम्पन्नता प्राप्त नहीं कर सकते। बीमार आदमी कुछ कमाता नहीं वरन् जो मौजूद है उसे भी गँवाता रहता है इसी प्रकार शरीर मन और समाज क्षेत्रों में जो व्यक्ति अस्वस्थ है उसके लिए पुण्य कमाना कठिन है। निर्बलता एक पाप है-पाप से पाप ही उत्पन्न होता है। अनुचित स्थिति में पड़े हुए व्यक्ति के लिए उचित विचार और कार्य कर सकना असंभव नहीं तो अत्यन्त कष्ट साध्य अवश्य है।

आत्म सम्पदाओं से सुसज्जित बनने की आकाँक्षा रखने वालों को चतुर्मुखी उन्नति करने की आवश्यकता है। धर्म अर्थ, काम, मोक्ष चारों एक ही पलड़े के चार पाये हैं। शरीर मन समाज और अन्तःकरण चारों की स्वस्थता मिल कर एक पूर्ण स्वस्थता कहलाती है। इसलिए आत्मोन्नति के इच्छुकों को अपनी चतुर्विधि उन्नति के लिए सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए। ताकि आत्मोन्नति से सुरम्य पौधे उगने लायक अन्तःभूमि तैयार हो जाये।

इसके साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि इन उपार्जित सम्पदाओं को स्थायी बनाया जाय और सुरक्षित किया जाय। इसका वैज्ञानिक तरीका ‘दान’ है। सत्पात्रों को देना ऐसे निर्मित के लिए देना- जिससे सात्विकता की वृद्धि हो, लोक कल्याण हो दान कहलाता है। केवल धन का ही दान नहीं होता शरीर, मन, वाणी, प्रभाव, प्रयत्न तथा धन से अपने निज के स्वार्थ के लिए कम से कम उपयोग करना चाहिए और उनका अधिकाँश भाग दान कर देना चाहिए। सम्पत्ति को सुरक्षित रखने का यही सबसे अच्छा तरीका है। जो कमाता तो खूब है पर दान नहीं करता वह भूसी को कूटने के समान पानी को बिलोने के समान निरर्थक प्रयत्न में अपनी शक्ति बराबर करता है। सोने का पहाड़ जमा कर लेना गधे के बोझ की बराबर पुस्तकें रट लेना, भैंसे की बराबर बलवान् हो जाना, हौवा की तरह प्रसिद्ध हो जाना निरर्थक है, यदि इन शक्तियों का आत्मोन्नति के मार्ग में उपयोग न हो। दान करने से ही यह शक्तियाँ आत्मा के बैंक में जमा होती हैं। दान करते ही तुरन्त, उसी क्षण, एक आन्तरिक सन्तोष प्राप्त होता है, यह उस बैंक की रसीद है जिस रसीद को देख कर यह अनुभव किया जा सकता है कि कमाई हुई पूँजी सम्राटों के सम्राटों परमात्मा के रिजर्व बैंक में जमा हो गई। यह कमाना और जमा करना क्रिया योग कहलाता है।


Quotation

प्रलोभन और विपत्ति, यही दो मनुष्य के परीक्षा अवसर हैं। जो प्रलोभन पर फिसलता नहीं और विपत्ति में विचलित नहीं होता वही वीर पुरुष है।


मौन व्रत

कितने ही व्यक्तियों को ऐसी आदत होती है कि उनसे चुप नहीं रहा जाता। हर वक्त कतरनी की तरह उनकी जीभ चलती रहती है। कोई कहने योग्य आवश्यक बात हो या न हो, उन्हें कुछ न कुछ कहे बिना चैन नहीं पड़ता। व्यर्थ की, अनर्गल, झूठी, मनगढ़ंत, निष्प्रयोजन, गपशप करते हुए उन्हें बड़ा मजा आता है। वास्तव में यह एक बड़ा दुर्गुण है। वाणी हमारी पवित्र आध्यात्मिक एवं महत्वपूर्ण शक्ति है। इसके एक-एक अणु का सदुपयोग होना चाहिए।

लोग नहीं समझते कि शब्द के साथ हमारी कितनी विद्युत शक्ति, जीवनी शक्ति एवं प्राण शक्ति मिली रहती है। वाणी के साथ-साथ हमारी संचित शक्तियों का क्षरण होता है। देखा जाता है कि वाणी के द्वारा शत्रुओं को मित्र और मित्रों को शत्रु बनाया जा सकता है। किसी के शब्दों में रस बरसता है और अमृत झरता है किन्तु किसी की जीभ जब चलती है तो दुर्गन्ध, द्वेष, घृणा और विग्रह ही उत्पन्न करती है। इससे प्रकट है कि हमारे भीतरी तत्व वाणी के साथ सम्मिश्रित होते हैं। वाणी जब निकलती है तो अपने साथ हमारे शक्ति कोण को लपेट लाती है। इस कोण को यदि अकारण, अनुपयुक्त दिशा में खर्च किया जाय तो न केवल हमारी प्राणशक्ति नष्ट होगी वरन् बकवास की एक दूषित आदत भी हमारे पीछे पड़ जायगी।

महात्मा गाँधी अपना अधिक समय मौन में बिताते हैं। सप्ताह में एक दिन तो मौन उनका रहता ही है। इसके अतिरिक्त वे काम करते समय चुप रहते हैं महत्वपूर्ण राजनैतिक वार्ताओं में भी वे उतना ही बोलते हैं जितना बोले बिना काम नहीं चलता उनका कथन है कि- “मौन एक ईश्वरीय अनुकम्पा है, मौन के समय मुझे आन्तरिक आनन्द मिलता है।”

किसी वक्ता का भाषण सुनने के लिए हमें चुप होना पड़ता है। कोलाहल में हम पास के शब्द भी नहीं सुन पाते किन्तु निस्तब्ध वातावरण में दूर-दूर की शब्द ध्वनियाँ भी आसानी से सुनी जा सकती हैं। दिव्य लोकों से हमारे लिए जो दिव्य आध्यात्मिक सन्देश आते हैं उन्हें सुनने के लिए मौन होने की आवश्यकता पड़ती है। आत्मा के प्रति परमात्मा की जो सन्देश ध्वनियाँ आती हैं उन्हें मन और वाणी से मौन होकर ही सुना जा सकता है। यह एक दैवी रेडियो है। चुप रह कर अंतर्मुखी होकर साधक परमात्मा के प्रकाश को ग्रहण कर सकता है। जो लप लप हर घड़ी जीभ चलाता रहता है दुनिया भर की अगड़म बगड़म बकता रहता है उसके लिए अंतर्मुखी होना और मौन के दैवी लाभ को प्राप्त करना कठिन है।

एक बार ऋषि भाष्कलि ने अपने आचार्य से प्रश्न किया कि- ‘भगवान ब्रह्मा को कैसे प्राप्त किया जा सकता है?” आचार्य ने कोई उत्तर न दिया। भाष्कलि ने सात बार यह प्रश्न पूछा कि आचार्य सातों बार चुप रहे। अन्त में उनने कहा- भद्र! मैं बार बार उत्तर दे रहा हूँ, पर तू समझता ही नहीं। उस ब्रह्म को वाणी से कहा सुना नहीं जा सकता उसे तो मौन होकर ही समझा और प्राप्त किया जा सकता है।

ब्रह्मचर्य केवल वीर्य संचय को ही कहते हों सो बात नहीं, शक्तियों के क्षरण को रोकना ब्रह्मचर्य है। वाणी का संयम ‘वाक् ब्रह्मचर्य’ कहलाता है जिस प्रकार वीर्य के अपव्यय से रोग, जरा और अकाल मृत्यू की गोद में जाना पड़ता है वैसे ही वाणी का दुरुपयोग, अपव्यय करने पर मानसिक शक्तियों की न्यूनता होती जाती है। कहते हैं कि- “ जो गरजते हैं सो बरसते नहीं।” कारण स्पष्ट है बकवास में जिसकी शक्तियाँ अधिक खर्च हो जाती हैं। कार्य करते समय उसे उन शक्तियों की कमी पड़ जाती है। संसार के जितने भी रचनात्मक कार्य करने वाले महापुरुष, वैज्ञानिक ग्रन्थकार, सेनापति, एवं महात्मा हुए हैं वे सभी प्रायः मितभाषी थे। शक्ति के साधकों को मौन रहना चाहिए। मितभाषण को शास्त्रकारों ने मौन कहा है। जो भाषण किसी के लाभ हित या कल्याण के उद्देश्य से किया जाता है वह मौन है। उतना ही बोलना चाहिए जितना बोलना आवश्यक है। शेष समय में चुप रहना चाहिए।

योग शास्त्रों में चार वाणी बताई हैं। (1) परावाणी (2) पश्यन्ति वाणी (3) मध्यमा वाणी (4) वैखरी वाणी। इनमें से परा और पश्यन्ति सूक्ष्म तथा मध्यमा और वैखरी स्थूल हैं। मन में जो संकल्प उठते हैं, जो सोच विचार ऊहापोह, तर्क वितर्क आयोजन वियोजन होते हैं। उनमें सूक्ष्म वाणी का प्रयोग होता है। मध्यमा वाणी कन्ठ में और वैखरी जिव्हा में रहती है। घुस पुस, अस्पष्ट, वाणी कन्ठ से और स्पष्ट ध्वनि वाली वाणी जिव्हा से उत्पन्न होती है। इन चारों वाणियों का हमें संयम एवं सदुपयोग करना चाहिए।

जिव्हा खोलने से पहले शब्दोच्चार करने से पहले यह विचार करना चाहिए कि जो बात कहने जा रहे हैं वह किसी के लाभ के लिए कही जा रही है या नहीं? जितने विस्तार से कहनी चाहिए इन दोनों प्रश्नों को सामने रखकर भाषण करना इस प्रकार ध्यान रखकर जो वार्तालाप किया जाता है वह मौन है। लोक हित की, परमार्थ की दृष्टि से से कुछ कहा जाता है वह मौन ही है। निष्प्रयोजन फिजूल बातों से बचना मौन का प्रधान उद्देश्य है।

मन में उठने वाले विचारों में विविध कल्पनाएं होती हैं, उनमें दृश्य और वाणी दो अंग होते हैं। इसमें भी संयम बरता जाना चाहिए। लोक हितकारी, परमार्थिक, सात्विक, वास्तविक, उचित कल्पनाओं को ही मस्तिष्क में स्थान मिलना चाहिए व्यर्थ की चिंताएं कल्पनाएं तृष्णाएं मन में भरे रहने से परा एवं पश्यन्ति वाणियों का क्षरण होता है। आत्मिक शक्तियों का अपव्यय होता है।

मन और शरीर दोनों का मिलाकर ही एक पूर्ण कौन बनता है। जो एकाँगी है वह अधूरा है। जबान से चुप रहना और मन में तूफान चलाते रहना, यह तो अधूरी चीज हुई। मौनी का ही दूसरा नाम मुनि है मुनि से जीवन शक्ति दूर नहीं होती।

मौन की साधना।

मौन की अंतिम सफलता प्राप्त करने के लिए उसकी विधिवत साधना करनी चाहिए। सप्ताह में एक दिन या पखवाड़े में एक दिन मौन व्रत होना चाहिए। यह कम से कम 4 घन्टे लगातार का होना चाहिए। यदि प्रति 2 घन्टे की साधना हो सके तो और भी अच्छा। सुविधानुसार यदि समय और भी अधिक बढ़ाया जा सके तो और भी अच्छा है। मौन के समय अन्य शारीरिक कार्य न करने चाहिएं। पूर्ण विश्राम लेते हुए एकान्त स्थान में रहना चाहिए। मौन काल में पुस्तकें नहीं पढ़नी चाहिएं और न विविध विषयों पर मन ढ़ुलाना चाहिये इस समय चित्त को सब ओर से हटा कर इष्ट देव का या प्रकाश ज्योति का ध्यान करना चाहिए। मौन काल में भोजन नहीं करना चाहिए।

इस छोटी सी साधना को करते रहने से मौन में सफलता मिलती है। साधक मुनि बनता है। मौनी की वाणी बड़ी प्रभावशाली होती है। उसका शाप वरदान सफल होता है। चित्त में शान्ति रहती है और आत्म बल बढ़ता है।


अपने भगवान् से-


अपने भगवान् से

(श्री ठा. महिपालसिंहजी निमदीपुर)

करुणा निधान, भगवान्, दीन के दुःखों का अनुमान करो।

तुम अपने तुल्य आप ही हो, संतप्त हृदय का ताप हरो॥

दिन रात घात खल पाती है, उत्पात मचाने वालों की।

क्यों बात रोकली जाती है, इन दुःख उठाने वालों की॥

जो ध्यान आपका धरते हैं, डरते हैं अत्याचारों से।

हाँ! उन्हें निपटना पड़ता है अत्याचारी हत्यारों से॥

यदि कहने का विश्वास न हो तो दशा देखलो आकर के।

तुम भी कुचक्र से डरते हो, हाँ! चक्रपाणि कहला कर के ॥

सुन कर पुकार तुम भक्तों की, रुकने वाले भगवान् न थे।

निष्पक्ष न्याय के साथी थे, झुकने वाले भगवान् न थे॥

देखो पुकार है मची हुई दुनिया के कोने-कोने में।

क्या अब भी देर समझते हो, मायाघिप दुर्गति होने में॥

जब जब दुष्टों का जोर हुआ तब-तब रक्षा तुमने की है।

विश्वास आप पर था जिनका उन भक्तों की सुधि भी ली है॥

दिन रात हाथ धोकर पीछे ये उत्पाती हैं पड़े हुए।

इस ओर आपके विश्वासी, छाती खोले हैं अड़े हुए॥

प्रतिबन्ध नहीं क्या हो सकता? षड़यन्त्र रचाने वालों का।

अथवा हो सकता न्याय नहीं? अन्याय मचाने वालों का॥

दुख से क्यों द्रवित न होते हो? क्यों दया दिखाना भूल गये।

रावण का-खरदूषण का-दल, उत्पात मचाता नये नये॥

तुमसे तो सही न जाती थी, गतिविधि भी अत्याचारी की।

मानव समाज में मनोतीत पदवी थी गर्व प्रहारी की॥

क्या यह संकट का समय नहीं? या करुणा क्रन्दन थोड़ा है।

अथवा मारग ही भूल गये या जान बूझ मुख मोड़ा है॥

ऐसा तो लाखों बार हुआ है टेर लगाते देर हुई।

पर दीनों के हित दीन बन्धु को कभी न आते देर हुई॥

यह उदासीनता दीनों से अनुचित है दीनानाथ तुम्हें।

इस धर्म क्षेत्र में अर्जुन का देना है भगवन् साथ तुम्हें॥

*समाप्त*