बहुमूल्य वर्तमान का सदुपयोग कीजिए।

मृत्यु और निर्माण के बीच में हम ठहरे हुए हैं। वर्तमान बड़ी तेजी से भूत की ओर दौड़ता है। भूत और मृत्यु एक ही बात है। कहते हैं कि मरने के बाद मनुष्य भूत बनता है। मनुष्य ही नहीं हर चीज मरती है और वह भूत बन जाती है। जब किसी वस्तु की सत्ता पूर्णतः समाप्त हो जाती है तो उसकी पूर्ण मृत्यु कही जाती है। पर आंशिक मृत्यु जन्म के साथ ही आरम्भ हो जाती है। बालक जन्म के बाद बढ़ता है, विकास करता है, उसकी यह यात्रा मृत्यु की ओर भी है।

संसार की हर वस्तु का-मनुष्य शरीर का भी- निर्माण उन्हीं तत्वों से हुआ है जो हर क्षण बदलते हैं। उनका चक्र भूत को पीछे छोड़ता हुआ और भविष्य को पकड़ता हुआ प्रति क्षण बड़ी तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है। विश्व एक पल के लिए भी स्थिर नहीं रहता। अणु परमाणुओं से लेकर विशालकाय ग्रह पिण्ड तक अपनी यात्रा अविश्रान्त गति से कर रहे हैं।

हमारा जीवन भी हर घड़ी थोड़ा थोड़ा करके मर रहा है, इस दीपक का तेल शनैः शनैः चुकता चला जा रहा हैं। भविष्य की ओर हम चल रहे हैं, और वर्तमान को भूत की गोदी में पटकते जाते हैं, यह सब देखते हुए भी हम नहीं सोचते के क्या वर्तमान का कोई सदुपयोग हो सकता है? जो बीत गया सो गया जो आने वाला है वह भविष्य के गर्भ है। वर्तमान हमारे हाथ में है। यदि हम चाहें तो उसका सदुपयोग करके इस नश्वर जीवन में से कुछ अनश्वर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।


“अखण्ड-ज्योति” द्वारा प्रकाशित अमूल्य पुस्तकें।”

यह बाजारू किताबें नहीं हैं। इनकी एक-2 पंक्ति में लेखकों का गहरा अनुभव एवं अनुसंधान है। इनमें जो पुस्तकें आपने अभी तक नहीं पढ़ी उन्हें आज ही मँगा लीजिए।

मैं क्या हूँ?

सूर्य चिकित्सा विज्ञान

प्राण चिकित्सा विज्ञान

परकाया प्रवेश

स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्भुत विद्या

मानवीय विद्युत के चमत्कार

स्वर योग से दिव्य ज्ञान

भोग में योग

बुद्धि बढ़ाने के उपाय

धनवान् बनने में गुप्त रहस्य

पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि

वशीकरण की सच्ची सिद्धि

मरने के बाद हमारा क्या होता है

जीव जन्तुओं की बोली समझना

ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?

क्या धर्म क्या अधर्म?

गहना कर्मणोगति

जीवन की गूढ़ गुत्थियों पर तात्विक प्रकाश

पञ्चाध्यायी धर्म नीति शिक्षा

शक्ति संचय के पथ पर

आत्म गौरव की साधना

प्रतिष्ठा का उच्च सोपान

मित्र भाव बढ़ाने की कला

आन्तरिक उल्लास का विकास

आगे बढ़ने की तैयारी

अध्यात्म धर्म का अवलम्बन

ब्रह्म विद्या का रहस्योद्घाटन

ज्ञान योग, कर्मयोग, भक्ति योग

यम और नियम,

आसन और प्राणायाम

प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि

तुलसी के अमृतोपम गुण

आकृति देखकर मनुष्य की पहचान

मैस्मरेजम की अनुभव पूर्ण शिक्षा

ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग

हस्त रेखा विज्ञान

विवेक सतसई

संजीवनी विद्या

गायत्री की चमत्कारी साधना

महान् जागरण

तुम महान् हो

गृहस्थ योग

अमृत पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति

घरेलू चिकित्सा

बिना औषधि के काया कल्प

पंच तत्वों द्वारा सम्पूर्ण रोगों का निवारण

हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं?

विचार करने की कला

दीर्घ जीवन का रहस्य

हम वक्ता कैसे बन सकते हैं

लेखन कला

प्रार्थना के प्रत्यक्ष चमत्कार

विचार संचालन विद्या

नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा

अध्यात्म शास्त्र

स्वप्नदोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा

सफलता के तीन साधन

शिखा और यज्ञोपवीत की रहस्यमय विवेचना

दूध की चमत्कारिक शक्ति

दैवी संपदाएं

अध्यात्म विद्या का प्रवेश द्वार

कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान

सुखी वृद्धावस्था

आत्मोन्नति का मनोवैज्ञानिक मार्ग

पाँच रुपये से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाकखर्च माफ, इससे कम की पुस्तकों का डाकखर्च ग्राहक के जिम्मे होगा।

पता :- “अखण्ड-ज्योति” कार्यालय, मथुरा।


मनुष्यता का उत्तरदायित्व

मनुष्य का पद बहुत ऊँचा पद है। चौरासी लाख योनियों में सबसे ऊँची मनुष्य योनि है। जब विकास करते करते जीव इस दर्जे को प्राप्त करता है जो परमात्मा के प्रत्यक्ष सान्निध्य में आने का अधिकारी है तो उसे मनुष्य शरीर मिलता है। यह बहुत बड़ी सफलता है।

जैसे जैसे उच्चता प्राप्त होती है वैसे ही उत्तरदायित्व बढ़ता है। प्रतिष्ठा और गौरव प्राप्त होने के साथ उसकी रक्षा का भार भी आता है। छोटा बच्चा नंग धड़ंग फिर सकता है, वह क्षम्य है, क्योंकि मनुष्य की जिम्मेदारी अभी उस पर नहीं आई है। जब बालकपन समाप्त होता है तो वह जिम्मेदारी आ जाती है उस समय कोई स्त्री पुरुष नंग धड़ंग होकर नहीं फिर सकता। और न इस प्रकार के आचरण कर सकता है जैसे कि बालकपन में किये जाते थे। पशु पक्षी काम सेवन के लिए मलमूत्र त्याग के लिए एकान्त की आवश्यकता अनुभव नहीं करते, उन्हें मानापमान की भी चिन्ता नहीं होती पर मनुष्य ऐसी स्थिति स्वीकार नहीं कर सकता। वयस्क होते ही वह उन सब उत्तर दायित्वों को स्वयं सिर पर उठा लेता है जो सभ्य मनुष्य कहलाने के लिए आवश्यक हैं।

शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक साम्प्रदायिक जिम्मेदारियाँ, उठाने के लिए हर मनुष्य को तत्पर होना पड़ता है। बीमारी से बचने की, स्वस्थ रहने की फिक्र अपनी समझ के अनुसार सब लोग करते हैं। अपने तथा अपने आश्रितों के भरण पोषण की, धन उपार्जन की आवश्यकता सब कोई अनुभव करता है। हिसाब किताब, साँसारिक परिचय, विविध विषयों की जानकारी प्राप्त करके मस्तिष्क को सुविकसित बनाने की, जरूरत सब लोग समझते हैं, और इसके लिए शिक्षा, स्वाध्याय, संगति, भ्रमण आदि साधनों का आश्रय लेते हैं। भाई, बहिन, माता, पिता, स्वजन, सम्बन्धी, मित्र पड़ौसी, ग्राहक, स्वजातियों, स्वदेशीयों के साथ किस किस तरह का व्यवहार करना तथा अन्य लोगों के साथ किस किस प्रकार के व्यवहार करना, इन सब बातों को भली प्रकार समझा जाता है। त्यौहार देवता, धर्म, पुस्तक, कर्मकाण्ड, मान्यताएं, आदि के सम्बन्ध में अपनी मति स्थिर करता है। इस प्रकार विविध प्रकार की जिम्मेदारियाँ अपने ऊपर उठा लेने के पश्चात् कोई मनुष्य एक सभ्य नागरिक कहलाने का अधिकारी होता है। जो इन जिम्मेदारियों को उठाने में जितनी ही आनाकानी करता है, वह उतना ही बेवकूफ, बेशर्म वेऐतकार समझा जाता है। दुनिया में उसे उतने ही अँशों में घृणा, अविश्वास की दृष्टि से देखा जाता है। आवश्यक जिम्मेदारियों को कंधे पर न उठाना, सचमुच जीवन के लिए एक कलंक की बात है। ऐसे कलंकी आदमी समाज में घृणास्पद समझे ही जाने चाहिए।

इन सब उत्तरदायित्वों से ऊँचा एक और उत्तर दायित्व है, वह है आध्यात्मिक उत्तरदायित्व। यही सब से बड़ी जिम्मेदारी है, जिसे कंधे पर उठाने से आत्मा अपने आत्म सम्मान की रक्षा करने में समर्थ होती है। ऊपर कहे कुछ साँसारिक उत्तरदायित्वों को निवाहने से मनुष्य की साँसारिक प्रतिष्ठा स्थापित होती है, इसलिए वह उनकी रक्षा के लिए कष्ट सहने को, संघर्ष करने को, त्याग बलिदान करने को, तैयार रहता है। स्वास्थ्य रक्षा के लिए, व्यायाम का, संयम का, कड़ुई औषधि पीने का कष्ट सहना पड़ता है। धन कमाने और उसकी रक्षा करने में काफी सावधानी रखनी पड़ती है और मौका पड़ने पर चोर, डाकू, ठग, उचक्कों से संघर्ष करना पड़ता है। मानसिक उत्तरदायित्व को संभालने के लिए चैन, आराम छोड़कर चित्त को सोचने में, चिन्तन में, मनन में, एकात्मभाव से लगाये रहना पड़ता है। मौका पड़ने पर मन को मारना और दबाना पड़ता है। सामाजिक प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए संगठित होना पड़ता है, समूह बनाना पड़ता है और सामूहिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़ना पड़ता है। जैसे साम्प्रदायिक जिम्मेदारियों के लिए, कथा, व्रत, उद्यापन, संस्कार, ब्रह्मभोज, प्रीतिभोज, पूजा, अनुष्ठान, त्यौहार आदि के खर्च तथा व्यवस्था का श्रम वहन करना पड़ता है, वैसे ही अध्यात्मिक उत्तरदायित्वों की पूर्ति के लिए भी मनुष्य को सदैव सचेत रहना पड़ता है। इन्द्रिय दमन करना पड़ता है, स्वार्थों पर अंकुश रखना पड़ता है, हीन भावनाओं को दबाना पड़ता है और अवसर आने पर कहीं अग्नि परीक्षा देने के लिए भी तैयार रहना पड़ता है।

आत्म सम्मान की रक्षा के लिए उन मर्यादाओं का ध्यान रखना होता है जिससे अपने व्यक्तित्व की सचाई, ईमानदारी, महत्ता, गौरव शालीनता पर आँच न आने पावे। बात का धनी, वचन का सच्चा, अपने विश्वासों के प्रति वफादारी, रखने वाला-खरा, आदमी, मर्यादा की रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी करने को प्राण देने तक को तैयार रहता है। इनका दृढ़ विश्वास होता है-

रघुकुल रीति सदा चलि आई।

प्राण जाँय पर बचन न जाई।

खरे आदमी वक्त पड़ने पर इसे चरितार्थ भी करते हैं। राजा हरिश्चन्द्र चाहते तो विश्वामित्र से अपना वचन मुकर सकते थे और स्त्री बच्चों को बेचने का, स्वयं भंगी के हाथों बिकने का, पुत्र की मृत्यु पर अपनी स्त्री से कर माँगने का कष्ट बचा सकते थे पर उन्होंने इन सब बातों को सहन करना ही वचन भंग करने की अपेक्षा उचित समझा। राजा मोरध्वज ने अपने बेटे को भिक्षुक साधु के लिए चीर दिया। वह चाहते तो भिक्षुक से वचन पलट सकते थे, उनने वचन रक्षा को ही महत्व दिया। हकीकत राय आज की कूटनीति को अपना सकते थे, वे उस वक्त मुसलमान होना स्वीकार करके अपनी जान बचा सकते थे, पर उन्होंने प्राण को तुच्छ समझा और अपने विश्वासों की रक्षा के लिए प्राणों को तिनके के समान तोड़कर फेंक दिया। बंदा बैरागी का खौलते कढ़ाव में जलना, ईसा का क्रूस पर चढ़ना, राणा प्रताप का घास की रोटी खाकर जंगलों में मारे मारे फिरना, वह सब रुक सकता था यदि वे अपनी प्रतिज्ञा छोड़ देते, विरोधियों के सामने जरा सा झुक जाते पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। विश्वास की रक्षा करना उनके लिए प्राण रक्षा से बहुत अधिक मूल्यवान था। चित्तौर की रानियाँ का अग्नि में आत्मदाह करना, सतीत्व को बचाना, आत्मगौरव की रक्षा का जीता जागता प्रमाण हैं। इतिहास का पन्ना-पन्ना इस प्रकार की घटनाओं से रँगा हुआ है। हमारी संस्कृति का नैतिक धरातल आत्म सम्मान की रक्षा को सर्वोपरि महत्व देने का रहा है।

आज हम देखते हैं कि मनुष्य समाज में इस नैतिक, आध्यात्मिक उत्तरदायित्व की रक्षा सम्बन्धी शिथिलता अत्यधिक बढ़ गई है। बात बात में झूठ बोलने वाले, वचन कह कर पलट जाने वाले, मिथ्या आडम्बर बनाने वाले, धूर्त, बेईमान, व्यभिचारी विश्वासघाती, लोभी, लम्पट, खुशामदी, चापलूस, गरीब को सताने वाले, बलवान्, अन्यायी का साथ देने वाले, लोगों की संख्या का अनुपात समाज में दिन दिन बढ़ता जाता है। थोड़े से लोभ का अवसर आने पर लोग अपनी जबान, प्रतिज्ञा और मर्यादा को तोड़ देते हैं। झट वचन पलटकर कुछ का कुछ कहने लगते हैं। इसे आत्मिक पतन की दुखदायी स्थिति ही कहा जा सकता है।

कुछ समय पूर्व लोग मूँछ का बाल उखाड़ कर गिरवी रख जाते थे, और उसे छुड़ाने के समय का चलन हुआ तो सफेद कागज पर आड़ी तिरछी रेखाएं खींच कर कर्ज लेने वाला सफेद पर स्याही कर देना था बस वह वायदा पत्थर की लकीर हो जाता था। परलोक के लिए कर्ज देने वाले कितने ही साहूकार थे जो कर्ज लेने वाले से किसी प्रकार की लिखा पढ़ी नहीं कराते थे, और कह देते थे कि इस जन्म में कर्ज न चुका सके तो अगले जन्म में इसे ब्याज के साथ अपना कर्ज वसूल करूंगा, इस प्रतिज्ञा को कर्ज लेने वाला बिलकुल सच्चा समझता था, और हर सूरत में कर्ज को इसी जन्म में चुका देता था, वह न चुका पाया तो अपने पुरखा के परलोक को ऋण मुक्त करने के लिए उसके बेटे पोते उस कर्ज को चुकाते थे। पर आज तो सच्ची लिखा पढ़ी, कागज तमस्सु झूठ ठहरा दिये जाते हैं। जबानी हिसाब किताब पर तो जरा सा मौका मिलते ही लोग पानी फेर देते हैं।

राम की सी पितृ भक्ति, भरत का सा भ्रातृ प्रेम, श्रवण कुमार की सी माता पिता की सेवा, आज दीपक लेकर ढूंढ़ना पड़ेगा। हरिश्चन्द्र के से आज्ञा पालक स्त्री बच्चे किसी विरले ही घर में मिलेंगे। दधीच से अस्थिदान करने वाले कर्ण से कवच कुण्डल उतार देने वाले, भामाशाह से सर्वस्व दान करने वाले ढूंढ़ना आसान काम नहीं रहा। बुद्ध महावीर शंकराचार्य से, और दयानंद से धर्म प्रचारक ढूँढ़ना आज कठिन है। जिधर देखिये उधर वंचकता फैल रही है। समाज का नैतिक स्वास्थ्य बहुत ही बुरी तरह नष्ट भ्रष्ट हुआ हम देख रहे हैं। मनुष्यता का मूल्य, धर्म के लिए, आत्मा की गौरव रक्षा के लिए, बलिदान की भावनाएं आज लुप्त होती सी दिखाई पड़ रही हैं। कूटनीति का नक्कारा चारों ओर बज रहा है।

महाभारत के शत्रु दल युद्ध बन्द होने पर रात को साथ साथ हँसते बैठते थे, विराम काल में, कोई हथियार न उठाता था, बिना शास्त्र के योद्धा पर तब तक दूसरा पक्ष हथियार न चलाता था, जब तक उसके हाथ में वह स्वयं तलवार न दे देता था। शिवाजी ने शत्रु की बेटी को अपनी बेटी कहकर उसकी सतीत्व रक्षा करते हुए उसके घर लौटा दिया था। रावण जैसे दुष्ट ने भी सीता के सतीत्व पर बलात्कार करने का साहस न किया था। पर आज तो साम्प्रदायिक दंगों में जो कुछ हो रहा है उससे शैतान भी शर्म से सिर झुका लेता है।

मनुष्यों! आत्माओं! आत्मिक उत्तरदायित्व से इस प्रकार इनकार मत करो। अपनी अमूल्य महानता इस प्रकार कौड़ियों के मूल्य मत बेचो। मनुष्यता के गौरव को इतना बदनाम न करो।

आत्म का, मनुष्यता का, इँसानियत का उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है उसे इस प्रकार तिलाञ्जलि मत दो। अपनी मर्यादा की ओर देखो। ऐसे काम करो जो मनुष्यता की महानता को कलंकित न करते है।


Quotation

सद्व्यवहार में शान्ति है। जो सोचता है कि मैं दूसरों के काम आ सकने के लिए कुछ करूं वही आत्मोन्नति का सच्चा पथिक है।


अन्धों की दुनिया

यह दुनिया अंधों का एक विचित्र मजमा है। विचित्र इसलिए कि लोग समझते हैं हमारी आँखें मौजूद हैं- हम देखते हैं तो भी वस्तुतः वे अंधे ही हैं। जरा आंखें मूँद कर देखिए तो सही इन आँख वालों में अधिकाँश अंधे ही अंधे भरे पड़े हैं।

लोभी पुरुष अन्धा है क्योंकि वह यह नहीं देखता कि इस संपत्ति का क्या करूंगा? जिस तरह इसे जोड़ने और जमा करने में जुटा हुआ हूँ इससे मेरा क्या हित होगा?

असंयमी अन्धा है। क्योंकि वह यह नहीं देखता कि-लगातार खर्च करने से, आमदनी से ज्यादा, खर्च करने से मेरा कोष चुक जायगा और शीघ्र ही दिवालिये की दुर्दशा भोगनी पड़ेगी।

युवा अंधा है। क्योंकि वह चमकती हुई जवानी को देखता है पर लाचारी भरे रूप बुढ़ापे को नहीं देखता। उसे नहीं मालूम कि आज का इठलाता हुआ यौवन कल पानी के बुलबुला की तरह बैठ जाने वाला है।

वृद्ध अंधा है क्योंकि वह मृत्यु को नहीं देखता। मौत की गोद में झूलते हुए भी, संसार से बहिष्कृत होते हुए भी भोगों में असमर्थ होते भी वह माया ममता को नहीं छोड़ता।

पुजारी अन्धा है क्योंकि वह पूजा का इतना आडम्बर तो करता है पर यह नहीं देखता कि ईश्वर को सब आडम्बरों से नहीं रिझाया जा सकता है।

तीर्थ यात्री अन्धा है क्योंकि वह दूर देशों में भ्रमण करता है, नहीं तालाबों और मन्दिरों, मठों में ईश्वर को तलाश करता है पर यह नहीं देखता कि जिसे तलाश करता हूँ वह तो मेरे अंदर ही बैठा है।

पापी अन्धा है क्योंकि वह तात्कालिक लाभ को देखता है पर उस पाप के कारण जो दुराह पीड़ा मिलने वाली है उसे नहीं देखता।

उपदेशक अंधा है क्योंकि वह यह नहीं देखता कि पाण्डित्यपूर्ण वक्ताओं का नहीं, क्रियात्मक आचरण का उपदेश ही दूसरों पर प्रभाव डालता है।

यशेच्छु अन्धा है जो अपने बनाये हुए ऊंचे शिवालय को अमर कीर्ति समझता है पर यह नहीं देखता कि उस दिन के बने विशाल भवन आज खंडहर मात्र रह गये हैं।

चोर अंधा है क्योंकि वह माल को देखता है पर ईश्वर को नहीं देखता। दूसरों की आँखों में धूलि झोंककर वह माल ले जाता है पर उसे नहीं मालूम कि शक्तिवान् सत्ता उसके सिर पर खड़ी यह सब देख रही है और जितना चुराया है उससे अधिक उगलवा लेने के लिए प्रबंध कर रही है।

विद्वान् अंधा है क्योंकि वह अपने ज्ञान को तो देखता है, पर अज्ञान को नहीं देखता। मैंने इतने ग्रन्थ पढ़े हैं यह तो उसे याद होता है पर याद नहीं होता कि जितने ग्रन्थ अभी पढ़ने शेष हैं, उनकी तुलना में पढ़े हुए ग्रन्थों का परिमाण इतना ही है जितना समुद्र के मुकाबले में एक बूँद।

साधु अन्धा है क्योंकि वह साधुता को देखता है असाधुता को नहीं। वह भूल जाता है कि उसके सीधेपन का अनुचित लाभ उठाकर कितने ही दुष्ट निर्भय होकर दुष्टता करते हैं। इस प्रकार उसकी साधुता असाधुता को बढ़ाने का निमित्त बनती है।

ईश्वर अन्धा है क्योंकि उसे यह नहीं दिखा कि मैं जिस संसार की रचना कर रहा हूँ, उसमें शैतान घुस पड़ा है और मेरी पुनीति कृति को कलंक की कलिया से पोत रहा है।

इन पंक्तियों का लेखक अन्धा है क्योंकि उसकी लिखी हुई इन पंक्तियों को एक उपहास मात्र समझा जायगा यह जानते हुए भी वह लिखता ही जा रहा है।

हे पवित्र!-


अपने को यज्ञ में झोंक दे!

स्वयं यजस्व दिवि देव देवान् किं ते पाकः कृणवद प्रचेताः। यधा यज ऋनुभिर्देवानेवा यजस्व तन्वं सुजात।

॥ ऋग्वेद 10।7।6॥

हे (देव) दिव्य स्वभाव वाले! तू (स्वयम्) अपने आप (दिवि) मस्तिष्क में विद्यमान (देवान्) देवों को, दिव्यभावों को (यजस्व) यज्ञ कर, समर्पण कर, (अप्रेचताः) मूढ़ अज्ञानी, (पाकः) परिपक्व पवित्र (ते) तेरा (किं) क्या (कृणवत्) कर सकता है। (यथा) जैसे तू (ऋतुभिः) ऋतुओं के अनुसार (देवान्) देवों को (अजयः) यजन करता है (एवा) ऐसे ही हे (सुजात) उत्तम से उत्पन्न हुए! (तन्वं) शरीर को (यजस्व) यजन कर।

हे दिव्य स्वभाव वाले, यज्ञ कर साधारण पाँच यज्ञ तो नित्य ही होते हैं। अलग अलग ऋतुओं में पर्वों पर, संस्कारों, उत्सवों, आयोजनों, अनुष्ठानों के अवसर नैमित्तिक यज्ञ भी होते ही रहते हैं। आज वेद भगवान इन नित्य के, निमित्त के, यज्ञों से, अग्निहोत्रों से भिन्न प्रकार का यज्ञ करने के लिये तुझे बुलाते हैं। यह यज्ञ विशिष्ट प्रकार को होगा। यह अध्यात्म यज्ञ है।

यह यज्ञ कहाँ होगा? कौन करेगा? किस देवता के लिये यह यज्ञ किया जायगा? किस सामग्री से हवन होगा? यह प्रश्न विचारणीय हैं। क्योंकि जब यह यज्ञ विशेष प्रकार का है तो उसका विधिविधान भी विशेष प्रकार का ही होगा। वेद ने इसी मन्त्र में वह सब कुछ समझा दिया है। उसने कहा है कि-तू अपने आप यज्ञ कर, स्वयं ही होता, स्वयं यजमान, स्वयं पुरोहित बन। इस यज्ञ का स्थान होगा-दिविधु लोक, मस्तिष्क। यह यज्ञ देवताओं के लिये किया जायगा। कौन देवता? वे देवता जो दिव्य भाव बनकर तेरे अन्दर निवास करते हैं। सामग्री के स्थान पर तुझे अपना शरीर ही होमना पड़ेगा। ऐसे दिव्य यज्ञ की वेद भगवान माँग करते हैं। हे दिव्य स्वभाव वाले! हे सर्वोत्तम परमात्मा से उत्पन्न हुए आत्मा! तू ऐसा यज्ञ कर सकता है क्योंकि तू परिपक्व है! पवित्र है!

गीता का कथन है-

सह यज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजायति।

अनेन प्रसविष्या ध्वमेथ वो ऽस्त्विष्ट कामघुक्।

इष्टान्भोगान्षि वो देवा दास्यन्ते यज्ञ भावितः।

।3।10।12।

प्रजापति, परमात्मा ने यज्ञ सहित प्रजा को रच कर कहा कि इस यज्ञ द्वारा तुम लोगों की मनोकामनाओं को पूरा करने वाला होवे। यज्ञ द्वारा प्रसन्न किये हुए देवता लोग तुम्हारे लिये बिना माँगे ही वाँछित भोगों को देंगे।

मनोवाँछित अभिलाषाओं को देव पूरा करते हैं, मनुष्य स्वयं उन्हें पूरा नहीं कर सकता। इच्छा पूर्ति का साधन जुटाया जाता है परन्तु इच्छा साधन से बढ़ जाती है। चाहे जितने साधन जुटाये जायं पर वे बड़े से बड़े साधक इच्छा की अपेक्षा छोटे ही रहते हैं। एक वस्तु मिली कि दूसरी की चाह हुई। धन, मान, बड़ाई, प्रशंसा, स्त्री, पुत्र, आदि चाहे कितने ही अधिक क्यों न हों मन उससे न अघाता है, न तृप्त होता है। मनोवाञ्छा पूरी होती ही नहीं, फलस्वरूप वह सदा अशान्त, इच्छुक, अभावग्रस्त, जरूरत, मन्द बना रहता है। इस विषम स्थित से बचाने की शक्ति देवों में हैं। वे देव यज्ञ से उत्पन्न होते हैं और प्रसन्न होने पर मनोवाञ्छा पूरी करते हैं।

दिव्य भावों को देव कहते हैं, वे द्युत लोक में मस्तिष्क के मध्य केन्द्र ब्रह्म रंध्र में रहते हैं दया, प्रेम, मैत्री, करुणा, सेवा, सहायता, आत्मीयता, प्रसन्नता सरीखे सूक्ष्म भावों में जब मनुष्य रमण करने लगता है तो उसे ऐसा उच्च कोटि का आत्मिक आनन्द आता है जिसकी तुलना में विषय भोग, धन और गर्व पोषण के सुख बहुत ही तुच्छ, बहुत ही नीचे दर्जे के दृष्टिगोचर होने लगते हैं। जिसने मिश्री नहीं चखी है उसके लिये गुड़ ही बढ़िया चीज है, पर जब वह मिश्री चख लेता है तो गुड़ को छोड़कर उसे ही अपनाता है। मन जिन साँसारिक भोगों की तृष्णाओं में भटक रहा था, उनसे ऊँची अधिक स्वादिष्ट, अधिक रसमयी, कोई वस्तु उसके अनुभव में आती है तो वह घटिया चीज को छोड़ देता है। इस परिवर्तन के होते ही मनोवाञ्छा पूर्ण होने लगती है। दिव्य भावों का, दिव्य ज्ञान का, प्रकाश मानस लोक में फैलते ही अन्धकार दूर हो जाता हैं। मन अंधेरे में टटोलना, अनिश्चित दिशाओं में भटकना छोड़कर एक सुनिश्चित आधार प्राप्त कर लेता है। छोटा बालक दुकानों की रंग−बिरंगी सभी चीजों के लिये ललचाता है, माँगता है और कभी कभी मचल भी जाता है पर बड़ा आदमी उन चीजों की असलियत समझता है और उसकी ओर आँख उठा कर भी नहीं देखता। यदि कोई चीज खरीदता है तो उपयोगिता और आवश्यकता को ध्यान में रखता है, बालक की तरह “चमकीली चीजों का संग्रह” उनकी नीति नहीं होती। बालक की तृष्णा-वयस्कता आने पर, चीजों की वास्तविकता का ज्ञान होने पर, अपने आप शान्त हो जाती है उसी प्रकार अशांतियों को हर घड़ी बेचैन बनाये रहने वाली अनेकों तृष्णाएं तब शान्त होती हैं जब आत्मिक वयस्कता है, जब ज्ञान का, दिव्यता का, प्रकाश होता है। साँसारिक सम्पदाओं की तुच्छता का तब अनुभव होता है, जब दिव्य भावों में रमण करने का रस उसे चखने को मिलता है। यह रसास्वादन उसकी तृष्णाओं को मनोवांछाओं को शान्त कर देता है और एक ऐसी स्थिति सामने ला देता है जिसे पाकर और कुछ पाने की अभिलाषा नहीं होती। इस प्रकार देवता-दिव्य भाव-हमारी सब मनोकामनाओं को पूरी कर देते हैं।

यह देवता-दिव्य भाव-बढ़ते किस समय हैं? जागृत किस तरह होते हैं? प्रसन्न किस तरह होते हैं? इसका उत्तर गीता और श्रुति दोनों एक स्वर में देती हैं-देवता यज्ञ से प्रसन्न होते हैं। सत्कर्म को यज्ञ कहा है। कर्म से भावों की पुष्टि होती है। केवल मात्र विचार करते रहने से, कल्पना की तरंगों पर उड़ते रहने से, मनसूबे बाँधते रहने से, योजनाएं बनाते प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। मन के मोदक खाने से भूख नहीं बुझती। भूख बुझाने के लिये तो थाली में परोसा हुआ अन्न सामने आना चाहिये। यह सत्य है कि कर्म से भाव की पुष्टि होती है। दो पहिये मिलकर जैसे एक गाड़ी को गतिवान बनाते हैं वैसे ज्ञान और कर्म मिल कर एक “साधन” बनता है। देवता यज्ञ से बढ़ते हैं। सत्कर्म करने से देवताओं का, दिव्य भावों का बल बढ़ता है, इसलिये यदि हम मनोवाञ्छाएं पूर्ण करने का अतुलित आनन्द उठाना चाहते हैं तो देवताओं को- दिव्य भावों को बढ़ाने वाले यज्ञों को, सत्कर्मों को करना चाहिये।

जो दिव्य भाव मन में उत्पन्न होते हैं, उन्हें कार्य रूप में परिणत करना चाहिये। अपनी भीतरी बुराइयों को ध्यानपूर्वक देखना चाहिये जो त्रुटियाँ अपने में हों उन्हें हटाने के लिये उनके विरोधी आचरण करने चाहिये। घड़ी में अलार्म भरकर या कोई जगाने वाला नियुक्त करके उस बुरी आदत का विरोधी आचरण आरम्भ कर देना चाहिये। इस विरोधी आचरण से ही उसका निवारण हो सकता है। इसी प्रकार जिन अच्छाइयों को बढ़ाने की आवश्यकता हो, उन्हें हठ पूर्वक बलात् करना चाहिये, मन न लगता हो तो भी बलपूर्वक इस काम को करना चाहिये। स्वाध्याय, आत्मचिन्तन, दान, सेवा, परमार्थ, आदि कार्यों में प्रायः मन की रुचि कठिनता से झुकती है पर दृढ़ निश्चय के साथ लगातार, प्रतिदिन, उन कार्यों की पुनरावृत्ति करने पर फिर उसी प्रकार की आदत पड़ जाती है और उसी प्रकार के आचरण करने का स्वभाव बन जाता है। दिव्यता की स्थापना का विचार ही करना संकल्प है। क्या दिव्यता स्थापित की जाय? किस प्रकार की जाय? यह योजना मिश्रित करना मन्त्र है, उस योजना के अनुसार कार्य आरम्भ कर देना यज्ञ है।

उस यज्ञ के लिये सामग्री क्या पड़े? श्रुति कहती है-हे उत्तम से उत्पन्न! हे परमात्मा के युवराज! ‘यजस्व तन्वं’ अपने शरीर को यजन कर डाल। अपनी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को सत्कर्म में लगा डाल। जैसे पैसे खर्च करके बाजार से हवन सामग्री खरीद ली जाती है और दक्षिणा देकर जप करने वाले, अग्निहोत्र कराने वाले बुला लिये जाते हैं उस प्रकार इस अध्यात्म यज्ञ में काम नहीं चल सकता। इस यज्ञ में तो अपना शरीर हवन करना पड़ेगा। अपनी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को लगाना पड़ेगा। केवल धन खर्च करके कोई विद्या नहीं खरीद सकता, इसी प्रकार धर्म भी नहीं खरीदा जा सकता, दिव्य ज्ञान भी नहीं खरीदा जा सकता। इस महान् यज्ञ में तो आत्म बलिदान करना पड़ेगा। मन को नियोजित करना पड़ेगा और शरीर का श्रम लगाना पड़ेगा।

शरीर की परवा मत करो। शरीर की इन्द्रियाँ जिन जिन विषयों की ओर दौड़ती हैं उनकी परवा मत करो, मन की परवा मत करो, मन की मायामयी भौतिक इच्छा, आकाँक्षा और तृष्णाओं की परवा मत करो। इनको सत्कर्म रूपी यज्ञ में झोंक दो। वेद कहता है-हे सुजात्! हे पवित्र! हे दिव्य! यज्ञ कर, देवताओं के लिये यज्ञ कर, अपने तन मन को सत्कर्म रूपी यज्ञ में झोंके दे। आत्ममेध की आहुति देकर, इस महान यज्ञ को पूरा कर।

यह श्रुति की वाणी, पुकार, याचना सुनकर आत्मन्! झिझको मत! यह मत सोचो कि पुराना स्वभाव, संस्कार, आत्म बलिदान के मार्ग से रोकेगा। पुराने साथियों का समाज विघ्न डालेगा और कहेगा, “सत्कर्म के, त्याग, बलिदान और लोक सेवा के पथ पर मत चलो, इस मार्ग में कठिनाई है, वह पुराना संचय और भोग प्रधान मार्ग ही इच्छा है।” पर तुम इस विघ्न से मत डरों। इससे मत झिझको, इस संकोच में मत रुको। क्योंकि यह अप्रचेता है, अज्ञान और मूढ़तामय है, तुच्छ है, उपेक्षणीय है। यह तुच्छ सा विघ्न तुम्हारा मार्ग नहीं रोक सकता। वह-’किं ते कृणवत्’ तेरा क्या कर लेगा? ठुकरा देने पर तेरा क्या बिगाड़ कर सकेगा? ठुकरा देने में किसी प्रकार का कुछ बिगाड़ नहीं है, इस मूढ़ भय को हटा देना ही श्रेयस्कर है।

वेद कहता है- हे मनुष्य! तू उत्तम से उत्पन्न हुआ है, नीच से नहीं। हे मनुष्य! तू दिव्य है, घृणित नहीं। हे मनुष्य! तू पवित्र है, अपवित्र नहीं। इसलिये अपने आत्म गौरव के अनुसार काम कर। देवता को बढ़ाने वाला यज्ञ कर। उस यज्ञ में अपने आप को झोंक दे।


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जिस सोने चाँदी के जमा होने में राजा का, अग्नि का, जल का, चोर का और अपने सगे सम्बन्धियों तक का भय बढ़ जाता है, भला वह भी कोई धन है? सच्चा धन तो आत्म ज्ञान है जिसके प्राप्त होते ही मनुष्य दसों दिशाओं से निर्भय हो जाता है।

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प्रयत्न से साँसारिक समृद्धि मिलती है, प्रयत्न से आत्मिक सम्पदाएं मिलती हैं, प्रयत्न से परमात्मा मिलता है, इसलिये प्रयत्न ही प्रधान है।


तैंतीस कोटि देवता क्या हैं?

हिन्दू धर्म में अनेक देवी देवताओं की मान्यता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीन प्रधान देवता हैं। दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती देवियाँ एवं इन्द्र, गणेश, वरुण, मरुत, अर्यमा, सूर्य, चन्द्र, भौम, बुद्ध, गुरु, शुक्र, शनि, अग्नि, प्रजापति आदि देवताओं का स्थान है। गंगा, यमुना, सरस्वती आदि नदियाँ, गोवर्धन, चित्रकूट, विन्ध्याचल आदि पर्वत, तुलसी, पीपल आदि वृक्ष, गौ, बैल आदि पशु, गरुण, नीलकण्ठ आदि पक्षी, सर्प आदि कीड़े भी देवता कोटि में गिने जाते हैं। भूत, प्रेतों से कुछ ऊँची श्रेणी के देवता भैरव, क्षेत्रपाल, यज्ञ, ब्रह्मराक्षस, बैतास, कूष्मांडा, पीर, वली, औलिया आदि हैं। फिर ग्राम्य देवता और भूत, प्रेत, मसान, चुड़ैल आदि हैं। राम, कृष्ण, नृसिंह, बाराह, वामन आदि अवतारों को भी देवताओं की कोटि में गिना जा सकता है।

इन देवताओं की संख्या तैंतीस कोटि बताई जाती है। कोटि के शब्द के दो अर्थ किये जाते हैं (1.) श्रेणी (2.) करोड़। तेतीस प्रकार के, तेतीस जाती के ये देवता हैं। जाति, श्रेणी या कोटि शब्द बहुवचन का बोधक है। इससे समझा जाता है कि हर कोटि में अनेकों देव होंगे और तेतीस कोटियों-श्रेणियों के देव तो सब मिलकर बहुत बड़ी संख्या में होंगे। कोटि शब्द का दूसरा अर्थ ‘करोड़’ है। उससे तैंतीस करोड़ देवताओं के अस्तित्व का पता चलता है। जो हो यह तो मानना ही पड़ेगा कि हिन्दू धर्म में देवों की बहुत बड़ी संख्या मानी जाती है। वेदों में भी तीस से ऊपर देवताओं का वर्णन मिलता है।

देवताओं की इतनी बड़ी संख्या एक सत्य शोधक को बड़ी उलझन में डाल देती है। वह सोचता है कि इतने अगणित देवताओं के अस्तित्व का क्या तो प्रमाण है, और क्या उपयोग? इन देवताओं में अनेकों की तो ईश्वर से समता है। इस प्रकार ‘बहु ईश्वरवाद’ उपज खड़ा होता है। संसार के प्रायः सभी प्रमुख धर्म ‘एक ईश्वरवाद’ को मानते हैं। हिन्दू धर्म शास्त्रों में भी अनेकों अभिवचन एक ईश्वर होने के समर्थन में भरे पड़े हैं। फिर यह अनेक ईश्वर कैसे? ईश्वर की ईश्वरता में साझेदारी का होना कुछ बुद्धि संगत प्रतीत नहीं होता। अनेक देवताओं का अपनी अपनी मर्जी से मनुष्यों पर शासन करना, शाप, वरदान देना, सजायता या विघ्न उपस्थित करना एक प्रकार से ईश्वरीय जगत की अराजकता है। कर्म फल के अविचल सिद्धान्त की परवा न करके भेट पूजा से प्रसन्न अप्रसन्न होकर शाप वरदान देने वाले देवता लोग एक प्रकार से ईश्वरीय शासक में चोर बाजार, घूसखोरी, डाकेजनी एवं अनाचार उत्पन्न करते हैं। इस अवाञ्छनीय स्थिति को सामने देखकर किसी भी सत्य शोधक का सिर चकराने लगता है। वह समझ नहीं पाता कि आखिर वह सब है क्या प्रपंच?

देवता वाद पर सूक्ष्म रूप से विचार करने से प्रतीत होता है कि एक ही ईश्वर की अनेक शक्तियों के नाम अलग अलग हैं और उन नामों को ही देवता कहते हैं। जैसे सूर्य की किरणों में सात रंग हैं उन रंगों के हरा, पीला, लाल, नीला आदि अलग अलग नाम हैं। हरी किरणें, अल्ट्रा वायलेट किरणों, एक्स किरणें, बिल्डन किरणें आदि अनेकों प्रकार की किरणें हैं उनके कार्य और गुण अलग अलग होने के कारण उनके नाम भी अलग अलग हैं उनसे पर भी वे एक ही सूर्य की अंश हैं। अनेक किरणें होने पर भी सूर्य एक ही रहता है। इसी प्रकार एक ही ईश्वर की अनेक शक्तियाँ अपने गुण कर्म के अनुसार विविध देव नामों से पुकारी जाती हैं। मूलतः ईश्वर तो एक ही है। एक मात्र ईश्वर ही इस सृष्टि का निर्माता, पालन कर्ता और नाश करने वाला है। उस ईश्वर की जो शक्ति निर्माण एवं उत्पत्ति करती है उसे ब्रह्मा, जो पालन, विकास एवं शासन करती है वह विष्णु, जो जीर्णता, अवनति एवं संहार करती हैं उसे शंकर कहते हैं। दुष्टों को दण्ड देने वाली दुर्गा, सिद्धिदाता गणेश, ज्ञान दाता सरस्वती, श्री समृद्धि प्रदान करने वाली लक्ष्मी, जल बरसाने वाली इन्द्र, इसी प्रकार हनुमान आदि समझने चाहिये। जैसे एक ही मनुष्य के विविध अंगों को हाथ, पैर, नाक, कान, आँख आदि कहते हैं, इसी प्रकार ईश्वरीय सूक्ष्म शक्तियों के उनके गुणों के अनुसार विविध नाम हैं वही देवता हैं।

कैवल्योपनिषद् कार ऋषि का कथन है- ‘स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रस्स शिवस्सोऽक्षरस्स परमः स्वराट्। स इन्द्रस्स कालानिस्स चन्द्रमाः।’ अर्थात् वह परमात्मा ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, शिव, अक्षर, स्वराट्, इन्द्र, काल, अग्नि और चन्द्रमा है। इसी प्रकार ऋग्वेद मं0 1 सू0 164 मं0 46 में कहा गया है कि- ‘इन्द्र मित्रं वरुणमश्माहुरथों दिव्यस्य सुपर्णो गरुत्मान्। एवं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्रि यमं मातरिश्वान माहु।’ अर्थात् विद्वान् लोग ईश्वर को ही इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, गरुत्मान्, दिव्य, सुपर्ण, यम, मातरिश्वा नाम से पुकारते हैं। उस एक ईश्वर को ही अनेक नामों से कहते हैं।

इनसे प्रगट होता है कि देवताओं का पृथक् पृथक् अस्तित्व नहीं है, ईश्वर का उसका गुणों के अनुसार देव वाची नामकरण किया है। जैसे-अग्नि-तेजस्वी। प्रजापति-प्रजा का पालन करने वाला। इन्द्र-ऐश्वर्यवान। ब्रह्मा-बनाने वाला। विष्णु-व्यापक। रुद्र-भयंकर। शिव-कल्याण करने वाला। मातरिश्वा-अत्यन्त बलवान। वायु-गतिवान। आदित्य-अविनाशी। मित्र-मित्रता रखने वाला। वरुण-ग्रहण करने योग्य। अर्यमा-न्यायवान्। सविता-उत्पादक। कुबेर-व्यापक। वसु-सब में बसने वाला। चन्द्र-आनन्द देने वाला मंगल-कल्याणकारी। बुध-ज्ञानस्वरूप। बृहस्पति-समस्त ब्रह्माँडों का स्वामी। शुक्र-पवित्र। शनिश्चर-सहज में प्राप्त होने वाला। राहु-निर्लिप्त। केतु-निर्दोष। निरंजन-कामना रहित। गणेश-प्रजा का स्वामी। धर्मराज-धर्म का स्वामी। यम-फलदाता। काल- समय रूप। शेष-उत्पत्ति और प्रलय से बचा हुआ। शंकर-कल्याण करने वाला। इसी प्रकार अन्य देवों के नामों का अर्थ ढूँढ़ा जाय तो वह परमात्मा का ही बोध कराता है।

अब यह प्रश्न उठता है कि इन देवताओं की विविध प्रकार की आकृतियाँ क्यों हैं? आकृतियों की आवश्यकता किसी बात की कल्पना करने या स्मरण रखने के लिये आवश्यक है। किसी बात का विचार या ध्यान करने के लिये मस्तिष्क में एक आकृति अवश्य ही बनानी पड़ती है। यदि कोई मस्तिष्क इस प्रकार के मानसिक रोग से ग्रस्त हो कि मन में आकृतियों का चिन्तन न कर सके तो निश्चय ही वह किसी प्रकार का विचार भी न कर सकेगा। जो कीड़े मकोड़े आकृतियों की कल्पना नहीं कर पाते उनके मन में किसी प्रकार के भाव भी उत्पन्न नहीं होते। ईश्वर एवं उसकी शक्तियों के सम्बन्ध में विचार करने के लिये मनःलोक में स्वतः किसी न किसी प्रकार की आकृति उत्पन्न होती है। इन अदृश्य कारणों से उत्पन्न होने वाली सूक्ष्म आकृतियों का दिव्य दृष्टि से अवलोकन करने वाले योगी जनों ने उन ईश्वरीय शक्तियों की-देवी देवताओं की-आकृतियाँ निर्मित की हैं।

चीन और जापान देश की भाषा लिपि में जो अक्षर हैं वे पेड़, पशु, पक्षी आदि की आकृति के आधार पर बनाये गये हैं। उन भाषाओं के निर्माताओं का आधार यह था कि जिस वस्तु को पुकारने के लिये जो शब्द प्रयोग होता था, उस शब्द को उस वस्तु की आकृति का बना दिया। इस प्रणाली में धीरे-धीरे विकास करके एक व्यवस्थित लिपि बना ली गई। देवनागरी लिपि का अक्षर विज्ञान शब्द की सूक्ष्म आकृतियों पर निर्भर है। किसी शब्द का उच्चारण होते ही आकाश में एक आकृति बनती है, उस आकृति को दिव्य दृष्टि से देखकर योगी जनों ने देवनागरी लिपि का निर्माण किया है। शरीर के मर्मस्थलों में जो सूक्ष्म ग्रन्थियाँ है उनके भीतरी रूप को देखकर षट्चक्रों का सिद्धान्त निर्धारित किया गया है। जो आधार चीनी भाषा की लिपि का है, जो आधार देवनागरी लिपि के अक्षरों का है, जो आधार षट्चक्रों की आकृति का है, उस आधार पर ही देवताओं की आकृतियाँ प्रस्तुत की गई हैं। जिन ईश्वरीय शक्तियों के स्पर्श से मनुष्य के अन्तः करण में जैसे संवेदन उत्पन्न होते हैं, सूक्ष्म शरीर की जैसी मुद्रा बनती है, उसी के आधार पर देवताओं की आकृतियाँ बना दी गई हैं।

संहार पतन एवं नाश होते देख कर मनुष्य के मन में वैराग्य का भाव उत्पन्न होता है इसलिये शंकरजी का रूप वैरागी जैसा है। किसी चीज का उत्पादन होने पर वयोवृद्धों के समान हर मनुष्य अपना उत्तरदायित्व समझने लगता है, इसलिये ब्रह्माजी वृद्ध के रूप में हैं। चार वेद या चार दिशाएं ब्रह्मा जी के चार मुख हैं। पूर्णता प्रौढ़ता की अवस्था में मनुष्य रूपवान, सशक्त, सपत्नीक एवं विलास प्रिय होता है, सहस्रों सर्प सी विपरीत परिस्थितियाँ भी उस प्रौढ़ के अनुकूल बन जाती हैं। शेष शय्या शायी विष्णु के चित्र में हम इसी भाव की झाँकी देखते हैं। लक्ष्मी बड़ी सुन्दर और कमनीय लगती हैं उनका रूप वैसा ही है। ज्ञान में बुद्धि में सौम्यता एवं पवित्रता है, सरस्वती की मूर्ति को हम वैसी ही देखते हैं। क्रोध आने पर हमारी अन्तरात्मा विकराल रूप धारण करती है, उस विकरालता की आकृति ही दुर्गा है। विषय वासनाओं की मधुर मधुर अग्नि सुलगाने वाला देवता पुष्प वाणधारी कामदेव है। ज्ञान का देवता गणेश हाथी के समान गंभीर है, उसका पेट ओछा नहीं जिसमें कोई बात ठहरे नहीं, उसके बड़े पेट में अनेकों बातें पड़ी रहती हैं और बिना उचित अवसर आये प्रकट नहीं होती। “जिसके पास अकल होगी वह लड्डू खायेगा” इस कहावत को हम गणेश जी के साथ चरितार्थ होता देखते हैं। उनकी नाक लम्बी है अर्थात् प्रतिष्ठा ऊंची है। ईश्वर की ज्ञान शक्ति का महत्व दिव्य दर्शी कवि ने गणेश के रूप में निर्मित कर दिया है। इसी प्रकार अनेकों देवों की आकृतियाँ विभिन्न कारणों से निर्मित की गई हैं।

तेतीस कोटि के देवता माने जायं तो अनेकों क्षेत्र में काम करने वाली शक्तियाँ तेतीस हो सकती हैं। शारीरिक, मानसिक, आत्मिक, धार्मिक, आर्थिक, पारिवारिक, वैज्ञानिक भौगोलिक आदि क्षेत्रों की श्रेणियों की गणना की जाय तो उनकी संख्या तेतीस से कम न होगी। उन कोटियों में परमात्मा की विविध शक्तियाँ काम करती हैं वे देव ही तो हैं। दूसरी बात यह है कि जिस समय देवतावाद का सिद्धान्त प्रयुक्त हुआ उस समय भारतवर्ष की जन संख्या 33 कोटि-तेतीस करोड़ थी। इस पुण्य भारत भूमि पर निवास करने वाले सभी लोगों के आचरण और विचार देवोपम थे। संसार भर में वे भू-सुर (पृथ्वी के देवता) कहकर पुकारे जाते थे। तीसरी बात यह है कि हर मनुष्य के अन्तःकरण में रहने वाला देवता अपने ढंग का आप ही होता है। जैसे किन्हीं दो व्यक्तियों की शक्ल सूरत आपस में पूर्ण रूप से नहीं मिलती वैसे ही सब मनुष्यों के अन्तःकरण भी एक से नहीं होते उनमें कुछ न कुछ अन्तर रहता ही है। इस भेद के कारण हर मनुष्य का विचार, विश्वास, श्रद्धा, निष्ठा के द्वारा बना हुआ अन्तःकरण रूपी देवता पृथक्-2 है। इस प्रकार तेतीस कोटि मनुष्यों के देवता भी तेतीस कोटि ही होते हैं।

देवताओं की आकृतियाँ चित्रों के रूप में और मूर्तियों के रूप में हम देखते हैं। कागज पर अंकित किये गये चित्र अस्थायी होते हैं। पर पाषाण एवं धातुओं की मूर्तियाँ चिरस्थायी होती हैं। साधना विज्ञान के आचार्यों का अभिमत है कि ईश्वर की जिस शक्ति को अपने में अभिप्रेत करना हो उसका विचार, चिन्तन, ध्यान और धारण करना चाहिये। विचार शक्ति का चुम्बकत्व ही मनुष्य के पास एक ऐसा अस्त्र है जो अदृश्य लोक की सूक्ष्म शक्तियों को खींच कर लाता है। धनवान बनने के लिये धन का चिन्तन और विद्वान बनने के लिये विद्या का चिंतन आवश्यक है। संसार का जो भी मनुष्य जिस विषय में आगे बढ़ा है, पारंगत हुआ है, उसमें उसने एकाग्रता और आस्था उत्पन्न की है। इसका एक आध्यात्मिक उपाय यह है कि ईश्वर की उस शक्ति का चिन्तन किया जाय। चिन्तन के लिये आकृति की आवश्यकता है उस आकृति की मूर्ति या चित्र के आधार पर हमारी कल्पना आसानी से ग्रहण कर सकती है। इस साधन की सुविधा के लिये मूर्तियों का आविर्भाव हुआ है।

धनवान बनने के लिये सबसे पहले धन के प्रति प्रगाढ़ प्रेमभाव होना चाहिये। बिना इसके धन कमाने की योजना अधूरी और असफल रहेगी। क्योंकि पूरी दिलचस्पी और रुचि के बिना कोई कार्य पूरी सफलता तक नहीं पहुँच सकता। धन के प्रति प्रगाढ़ प्रेम, विश्वास, आशा पाने के लिये आध्यात्मिक शास्त्र के अनुसार मार्ग यह है कि ईश्वर की धन शक्ति को-लक्ष्मी जी को-अपने मानस लोक में प्रमुख स्थान दिया जाय। चूँकि ईश्वर की धन शक्ति का रूप दिव्यदर्शियों ने लक्ष्मी जी जैसा निर्धारित किया है अतएव लक्ष्मी जी की आकृति गुण कर्म स्वभाव युक्त उनकी छाया मन में धारण की जाती है। इस ध्यान साधना में मूर्ति बड़ी सहायक होती है। लक्ष्मी जी की मूर्ति की उपासना करने से मानस लोक में धन के भाव उत्पन्न होते हैं और वे भाव ही अभीष्ट सफलता तक ले पहुँचते हैं। इस प्रकार लक्ष्मी जी की उपासना से श्री वृद्धि होने में सहायता मिलती है। यही बात गणेश, शिव, विष्णु, हनुमान, दुर्गा आदि देवताओं के संबन्ध में है।

इष्ट देव चुनने का उद्देश्य भी यही है जीवन लक्ष नियुक्त करने को ही आध्यात्मिक भाषा में इष्ट देव चुनना कहा जाता है। अखाड़ों में, व्यायामशालाओं में, हनुमान जी की मूर्तियां दिखती हैं। व्यापारी लोग लक्ष्मी जी की उपासना करते हैं। साधु संन्यासी शिवजी का इष्ट रखते हैं। गृहस्थ लोग, विष्णु (राम, कृष्ण आदि अवतार) को भजते हैं। शक्ति के इच्छुक दुर्गा को पूजते हैं। स्थूल दृष्टि से देखने में यह देवता अनेकों मालूम पड़ते हैं, उपासकों की साधना में अन्तर दिखाई देता है पर वास्तव में कोई अन्तर है नहीं। मान लीजिये माता के कई बालक हैं एक बालक रोटी खाने के लिये रसोई घर में बैठा है, दूसरा धुले कपड़ों की माँग करता हुआ कपड़ों के बक्स के पास खड़ा है, तीसरा पैसे लेने के लिए माता का बटुआ टटोल रहा है, चौथा गोदी में चढ़ने के लिये मचल रहा है। बालकों की आकाँक्षाएं भिन्न हैं वे माता के उसी गुण पर सारा ध्यान लगाये बैठे हैं जिसकी उन्हें आवश्यकता है। गोदी के लिये मचलने वाले बालक के लिये माता एक मुलायम पालना, या बढ़िया घोड़ा है। पैसे चाहने वाले बालक के लिए वह एक चलती फिरती बैंक है, भोजन के इच्छुक के लिये वह एक हलवाई है, कपड़े चाहने वाले के लिये वह घरेलू दर्जी या धोबी है। चारों बालक अपनी इच्छा के अनुसार माता को पृथक-2 दृष्टि से देखते हैं, उससे पृथक-2 आशा करते हैं फिर भी माता एक ही है। यही बात विभिन्न देव पूजकों के बारे में कही जा सकती है। वस्तुतः इस विश्व में एक ही सत्ता हैं-परमात्मा एक ही है। उसके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं, तो भी मनुष्य अपने विचार एवं साधना की दृष्टि से उसकी शक्तियों को प्रथक-2 देवताओं के रूप में मान लेता है।

श्रीमद् भागवद् गीता के अध्याय 9 श्लोक 23 में इस बात को बिलकुल स्पष्ट कर दिया गया है-

येऽष्यन्य देवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः।

तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्यविधि पूर्वकम्॥

अर्थात्- हे अर्जुन, जो भक्त अन्य देवताओं को श्रद्धापूर्वक पूजते हैं, वे भी अविधि पूर्वक मुझे ही पूजते हैं।

गीता अध्याय 11 श्लोक 29 में अर्जुन कहता है-

वायुर्यमोऽग्निवरुणः शशाँक प्रजापतिस्त्व प्रपितामहश्च। नमो नमस्तेऽस्तु सहस्त्र कृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।

अर्थात्- वायु, यम, अग्नि, वरुण, शशि, प्रजापति, आदि आप ही हैं, आपको बार बार नमस्कार है।

जैसे सब नदियों का जल समुद्र में जाता है, वैसे ही सब देवों को किया हुआ नमस्कार केशव के लिए ही जाता है- ‘सर्व देव नमस्कारं केशवं प्रति गच्छति।’

इन सब बातों पर विचार करने के उपरान्त हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि वस्तुतः निखिल विश्व ब्रह्माण्ड का एक ही देव परमात्मा है। विभिन्न देवता उसी की शक्तियों के विभिन्न नाम हैं। इन देवताओं का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।

देवताओं की मूर्तियाँ परमात्मा की उन शक्तियों का स्मरण दिलाने के लिये हैं। कागज पर लिखे हुए अक्षर स्वतः कोई वस्तु नहीं हैं पर उन अक्षरों को पढ़ने से वस्तुओं का स्वरूप सामने आ जाता है। जैसे ‘हाथी’ यह दो अक्षर जहाँ लिखे हैं उस स्थान पर कोई पशु अवस्थित भले ही न हो पर इन दो अक्षरों को पढ़ते ही उस विशालकाय हाथी का चित्र मस्तिष्क में दौड़ जाता है। भक्ति रस के भजन पढ़ने से मनुष्य का हृदय भक्तिभाव में सराबोर हो जाता है और घासलेटी पुस्तकें पढ़ने से विषय वासना, व्यभिचार आदि के दूषित भाव मन में घुड़दौड़ मचाने लगते हैं। अक्षर एक प्रकार के चित्र हैं, उन चित्रों से मन में कोई आकृतियाँ आती हैं और फिर उन आकृतियों से संबंधित भाव कुभाव मन में उत्पन्न होते हैं, महापुरुषों के चित्रों एवं मूर्तियों को यदि हम आनंदपूर्वक श्रद्धाँजलि चढ़ावें तो स्वभावतः उनके गुणों की प्रभाव छाया मनः पटल पर अंकित होती है। मूर्तियाँ एक प्रकार की पुस्तकें हैं वे अपने संबंधित विषय की भावनाएं दर्शक के मन में उत्पन्न करती हैं। मूर्ति पूजा का यही तात्पर्य है।

मन्दिरों की स्थापना, उनमें भोग, प्रसाद, भेंट, दक्षिणा चढ़ाना, क्यों होता है इसके संबंध में हम अपनी ‘ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?’ पुस्तक में सविस्तार लिख चुके हैं। मन्दिरों का प्रारम्भ एक धर्म संस्था के रूप में हुआ था, मन्दिर के साथ साथ पाठशाला, पुस्तकालय, औषधालय, व्यायामशाला, संगीतशाला, प्रार्थना भवन, उपदेश मंच आदि अनेकों सार्वजनिक प्रवृत्तियाँ जुड़ी रहती थी। उन प्रवृत्तियों का संचालन करने के लिये एक निस्पृह, त्यागी, विद्वान, परोपकारी ब्राह्मण रहता था जिसे गुरु पुरोहित, आचार्य या पुजारी कहते थे। उस पुरोहित के जीवन निर्वाह के लिये एवं मन्दिर से सम्बन्धित प्रवृत्तियों के आयोजन के लिये जनता स्वेच्छापूर्वक धर्मभाव से दान करती थी, यह दान मन्दिरों में देव मूर्तियों के सम्मुख भोग, प्रसाद, भेंट, दक्षिणा आदि के रूप में चढ़ाया जाता था। उस धन से मन्दिर रूपी सार्वजनिक संस्था चलती थी और जनता को उस भेंट पूजा की अपेक्षा अनेक गुना लाभ पहुँचाती थी।

आज समय के प्रभाव, अज्ञान एवं अन्धश्रद्धा के कारण देववाद में भारी दोष आ गये हैं। देवता के सामने निरीह पशुओं का बलिदान, मन्दिर के चढ़ावे का लोक सेवा में व्यय न होना, मन्दिर से संबंधित सार्वजनिक प्रवृत्तियों का न होना, देवताओं को घूसखोर, जालिम एवं पक्षपाती हाकिमों की तरह समझना, देवताओं की कृपा से बिना प्रयत्न के सम्पदाएं मिलने की आशा करना, उनमें अलौकिक चमत्कारों का मानना, मन्दिरों का व्यक्तिगत तुच्छ स्वार्थों के लिये उपयोग होना आदि अनेकों दोष आज ‘देवतावाद, के साथ जुड़ गये हैं, इनका संशोधन और निराकरण होना आवश्यक है। इन दोषों के कारण जनता को हानि होती है, और इस पवित्र एवं महत्वपूर्ण तथ्य को कलंकित होना पड़ता है।

हिन्दू धर्म देवताओं की पूजा करना स्वीकार करता है। ‘देव’ का अर्थ है- देने वाला। लेव का अर्थ है- लेने वाला। देव वे हैं जो परोपकारी, लोक सेवी, सदाचारी, सत्यनिष्ठ, विद्वान एवं सद्गुणों से परिपूर्ण हैं। ऐसे देवताओं की पूजा, प्रतिष्ठा, प्रशंसा, अर्थ व्यवस्था करना सर्व साधारण का पुनीत कर्तव्य है। उनका आदर्श हमें तथा हमारी भावी पीढ़ी को प्रकाश देता रहे इसलिये देवताओं के स्मारक स्थापित करना उचित एवं आवश्यक है।

परमात्मा की महा महिमा को हमारी मनोभूमि में भरने वाली उसकी महाशक्तियाँ यदि चित्र रूप में, मूर्ति रूप में, अक्षर रूप में, विचार या विश्वास रूप में हमारे सामने उपस्थित रहें तो उससे लाभ की ही आशा है। हमारा देवतावाद मिथ्या भ्रमों, अन्ध विश्वासों एवं निर्मूल कल्पनाओं के ऊपर अवलम्बित नहीं है वरन् मनोविज्ञान, अध्यात्म विज्ञान एवं सूक्ष्म शक्तियों के विज्ञान द्वारा अनुमोदित है। हमें देवत्व पर विश्वास करना चाहिये और उसकी उपासना भी।


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जैसे असावधानी के साथ पकड़ा हुआ कुश हाथ को काट देता है वैसे ही अज्ञानी का लिया हुआ संन्यास उसे क्लेश के गर्त में डुबा देता है।

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जब तक पाप फल का परिपाक नहीं होता तब तक वह उसे मधु सा मधुर लगता है पर जब पाप का फल सामने आता है तो उसके कष्ट की सीमा नहीं रहती।

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न तो अपने लाभ की उपेक्षा करो और न दूसरे के लाभ में विघ्न डालो।

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जैसे धींवर आँकड़ा डालकर मछली मारता है वैसे ही पाप, मनुष्य को लोभ के फन्दे में डालकर मारता है।


बीमारी एक अपराध है।

(श्री स्वामी सत्यभक्त)

बीमारी होना शर्म की बात है क्योंकि इससे अपने असंयम का लापरवाही और कमजोरी का परिचय मिलता है, और ये तीनों ही बातें बुरी हैं। अभी अभी “हरिजन सेवक” में एक लेख पढ़ा, जिसमें मि0 बटलर की एक किताब का जिक्र था जिसमें अपने ढंग से नये संसार का चित्रण किया गया था। उसमें निर्देश है कि मरीजों को जेलखानों में और अपराधियों को दवाखानों में रक्खा जाता है। बीमार होना एक काफी बड़ा अपराध माना गया है।

अभी-2 बंगाल में गाँधीजी के साथी इधर उधर केन्द्र बनाकर बैठे हैं। उनमें से जो बीमार पड़ता है, उन्हें सहायता मिलने के बदले गाँधीजी की तरफ से फटकार मिलती है। वे प्रायः लिखा करते हैं-”जो बीमार पड़े, या तो वहीं रहकर अच्छे हो जायं या वहीं मौत का खतरा उठालें।” अर्थ यह कि हम सब घरेलू या कुदरती इलाज से संतुष्ट रहें अर्थात् हवा, जल, मिट्टी इत्यादि पाँच महाभूतों की सहायता से अपना काम चलावें।

बीमारी एक अपराध है, तथा आने पर हमें प्राकृतिक तरीके से उसका इलाज करना चाहिये। हजार में एकाध अपवाद ऐसे मिलेंगे जिनमें डाक्टरी चिकित्सा की जरूरत पड़ेगी या वायुमंडल आदि के कृत्रिम रूप में विषैला होने पर कोई विशेष बीमारी फैल जाय और विशेष इलाज करना पड़े, यह दूसरी बात है, परन्तु साधारण बीमारियाँ असंयम और लापरवाही से पैदा होती हैं और प्राकृतिक चिकित्सा से दूर हो जाती हैं।

छह वर्ष पहले जब मैं लम्बा बीमार पड़ा था, तब तेरह दिन तक भोजन बन्द रक्खा और गरम पानी तथा मौसमी नींबू का रस लिया और बिना चिकित्सा के अच्छा हो गया। अभी गतमास मई मैं बीमार पड़ा तो लंघनों से अच्छा हुआ।


हमें फुरसत नहीं?

स्वाध्याय के लिए, आत्म चिन्तन के लिए, साधना के लिए अक्सर लोग यह कहा करते हैं कि “क्या करें, फुरसत नहीं मिलती।” वे अपने को बहुत कार्य व्यस्त बताते हैं। जरूरी कामों से फुरसत पाये बिना भला आध्यात्मिक कामों के लिए इन्हें किस प्रकार समय मिल सकता है।

विचार करना चाहिए कि- क्या वास्तव में उन्हें फुरसत नहीं मिलती? क्या वास्तव में वे इतने कार्य व्यस्त होते हैं कि आत्म निर्माण के लिए जरा भी समय न निकाल सकें? जिन कामों को वे जरूरी समझते हैं क्या वे वास्तव में इतने जरूरी होते हैं कि उनसे थोड़ा भी समय कम न किया जा सके? हम देखते हैं कि अपने को बहुत ही व्यस्त समझने वाले व्यक्ति भी नित्य काफी समय, गप, शप में, मनोरंजन में, मटरगस्ती में, तथा आलस्य में व्यतीत करते हैं। उनके कार्यों का बहुत सा भाग ऐसा होता है जो उतना आवश्यक नहीं होता। फिर भी वे अपनी रुचि एवं दृष्टि के अनुसार उसे जरूरी समझते हैं।

असल बात यह है- फुरसत न मिलना मतलब है- ‘दिलचस्पी न होना।’ जिस काम में आदमी को दिलचस्पी नहीं होती, जो उतना आवश्यक, महत्वपूर्ण, लाभदायक एवं रुचिकर प्रतीत नहीं होता, उसके लिए कह दिया जाता है कि इस काम के लिए हमें फुरसत नहीं है।

अपना सगा बेटा बीमार पड़ जावे तो तिजारत के सारे कामों को एक तरफ हटाकर पिता, अपने बेटे की चिकित्सा में लग जाता है। विवाह शादी के दिनों में सोने के लिए पूरा समय नहीं मिलता। विश्राम के घंटों का कार्यक्रम घटाकर उस समय को शादी संबंधी कामों में लगाता है। सिनेमा, नाटक, स्वाँग, तमाशे, देखने में लोग रातें बिता देते हैं। इस सब कार्यों के लिए फुरसत मिल जाती है पर कथा कीर्तन के लिए समय नहीं मिलता। दैनिक कार्यक्रम को बारीकी से देखा जाय तो हर आदमी के पास थोड़ा बहुत समय फालतू अवश्य मिलेगा। वह चाहे तो आसानी से थोड़ा समय आत्म साधना के लिए निकाल सकता है।

प्रश्न रुचि का है। विचार करना चाहिए कि क्या आत्म साधना ऐसी निरर्थक चीज है जिसके लिए दुनियादारी के साधारण कामकाजों में से बचाकर समय का एक टुकड़ा भी न फेंका जा सके? घर में कुत्ते और भिखारी को थोड़ा बहुत भोजन दिया जाता है सोचना चाहिए कि आत्मा का महत्व क्या कुत्ते और भिखारी से भी कम है जिसकी झोली में समय का एक छोटा सा टुकड़ा भी न डाला जा सके? शरीर की भूख बुझाने के लिए हम तरह तरह के बढ़िया-बढ़िया साधन जुटाते हैं, काफी समय खर्च करके भोजन सामग्री कमाते हैं, पर आत्मा की भूख बुझाने के लिए-स्वाध्याय, चिन्तन, मनन तथा साधन के लिए-थोड़ा भी समय नहीं लगाया जा सकता? क्या सचमुच आत्मा ऐसी तुच्छ वस्तु है, जिसकी शरीर के मुकाबले में इतनी उपेक्षा की जाय?

यह विचारणीय प्रश्न है। इसे इसी प्रकार अधर लटका रहने देने से काम न चलेगा। हमें सोचना होगा कि-क्या हम शरीर मात्र हैं? क्या हमारी प्राप्ति धनसंचय एवं इन्द्रिय भोगों से ही हो सकती है? क्या मानव जीवन का उपयोग शरीर पोषण और धन उपार्जन मात्र है? क्या साँसारिक उन्नति ही पूर्ण उन्नति है? इन प्रश्नों पर विचार करने से पता चलेगा कि जो कुछ हम कर रहे हैं, वह ही पूर्ण नहीं है। आत्मोन्नति भी एक कार्य है और वह कार्य शरीर पोषण से कम महत्व का नहीं है।

आत्मा की महत्ता पर विचार कीजिए आत्मोन्नति के महत्व को समझिए और तब निर्णय कीजिए कि आपको फुरसत है या नहीं?


दुःख छूटने का उपाय

[श्री धर्मपालसिंह एस. बी. ए. हरदुआगंज]

महाभारत युद्ध की समाप्ति के पश्चात जब श्री कृष्णचन्द्र द्वारिका के लिए विदा होने लगे, उनको जाते देख महारानी कुन्ती उनका रथ रोककर खड़ी हो गई! अब आप यहाँ से न जाइये। भगवान ने उत्तर दिया-देवी अब यहाँ पर पूर्णरूप से शान्ति स्थापित हो गई हैं, राज्य सम्पत्ति आप को प्राप्त हो गई है अब इसको सुख पूर्वक भोगिये। कुन्ती बोली, भगवन्! इस राज्य के बदले मुझे वही वन और विपत्ति चाहियें जिनमें सदैव तुम्हारा दर्शन होता था। इस राज्य सम्पत्ति के आगमन पर ही तो आज आप का वियोग हो रहा है।

तात्पर्य यह है कि साँसारिक सुख सम्पत्ति के मद में मदान्ध होकर प्राणी ईश्वर को भूल जाता है। अतएव धन्य हैं वे विवेकशील व्यक्ति जो आए हुए दुःख का प्रसन्नता से स्वागत करते हैं। जिनको कभी दुःख झेलने का अवसर नहीं मिला, अथवा जो दुःखों से भयभीत हो सदा डरते रहते हैं, वे संसार में बड़े मंदभागी पुरुष हैं। परन्तु यह विषयान्ध संसार उन पुण्यात्मा लोगों को जिन पर दुःख विपत्ति आते हैं उल्टा मन्द भागी कहा करते हैं। परन्तु इस सत्य को न भूलना चाहिये कि दुख रूप भट्टी में तप कर ही स्वर्णमय जीवन खरे, चमकते हुए आदर्श जीवन बनते हैं, यथा सत्य हरिश्चंद्र, भगवान राम कृष्ण, महाराणा प्रताप, शिवाजी भक्तिमति मीराबाई गुरुगोविन्दसिंह महात्मा ईसा आदि अनेक महापुरुष प्रसन्नता से दुःखों का स्वार्थ करके ही सदैव के लिए अमर हो गये हैं। कहाँ तक कहा जाय जीवन के अन्तिम लक्ष साक्षात्कार, भगवत् दर्शन की यह दुःख ही प्रथम झाँकी है, स्वार्थ रहित अकारण कृपालु, मंगलमय देव की यह दुःख ही अहेतु की कृपा है जिस के आते ही बरबश मन की सब चंचल वृत्ति एकाग्र होकर उनसे रक्षार्थ उन चरणों में लग जाती है उस समय से ही जीव का कल्याण होने लगता है।

दुख की निवृत्ति कैसे हो? यह जानने से पूर्व हमें दुःख का स्वरूप जानना अति आवश्यक है। एक मात्र सुख और आनन्द के केन्द्र श्री परमात्म देव को भूलकर अज्ञान और उसकी ही सन्तान मोह, तृष्णा और विषयासक्ति आदि मन के रोगों में उलझना दुःख का कारण है। रामायण में कहा है- “मोह सकल व्याधिन कर मूला-।” शरीर, धन, स्त्री, पुरुष, परिवार कीर्ति इनकी ममता में पड़कर मनुष्य विविध प्रकार कामनाएं किया करते हैं। शान्त चित्त में जब किसी वस्तु की प्राप्ति की तृष्णा जागती है तब शान्त चित्त में एक प्रकार की हलचल पैदा हो जाती है। और जब तक इच्छित वस्तु की प्राप्ति का कोई समुचित साधन दिखाई नहीं दे जाता तब तक यह हलचल हिलोर बढ़ती ही रहती है। बस यह शान्त चित्त की हलचल ही अशान्ति और निरन्तरता दुःख का स्वरूप है। ज्यों ही कार्य सिद्धि से तृष्णा दूर हुई तो पुनः चित्त अपनी शान्तावस्था में आ जाता है और सुख अनुभव होने लगता है। पर कुछ काल पश्चात ही दूसरी तृष्णा के जागने पर फिर वहीं हलचल, अशान्ति और दुःख आ विराजता है। यही इस अनित्य, अस्थिर साँसारिक सुख दुख का स्वरूप है।

यदि इच्छाओं का सर्वथा अभाव हो जाय और मन में साँसारिक विषयों की दाह नहीं रहे तो नित्य सुख के दर्शन सम्भव हो सकते हैं। परन्तु जब तक यह शरीर है तब तक इसको रखने के लिए इसके सुख के साधन स्त्री, पुत्र, परिवार, धन कीर्ति आदि का होना भी एक अनिवार्य वस्तु है। यह हो सकता है कोई कम से कम इनको उपयोग में लावे।

इसलिए इन सब वस्तुओं को विविध प्रकार से उन्नत और समृद्ध देखने की आकाँक्षा और प्रयत्न करना भी श्री भगवान के इस संसार रूपी नाट्यशाला की लीला को निरन्तर रखने के लिए अर्थात् लोक संग्रह के लिए, उत्तमोत्तम योग्य पात्रों का तैयार करना भी प्रत्येक साँसारिक का परम कर्त्तव्य है। इसलिए कामनाएं भी अनिवार्य हैं। पर इन कामनाओं में होकर जाते हुए इन कामनाओं से पार जाने के उपाय शास्त्रों और महात्माओं द्वारा भिन्न प्रकार से कहे हैं। रामायण में महात्मा तुलसीदासजी अपनी एक एक चौपाई में इस रहस्य को इस प्रकार कहते हैं। “धर्म ते वरति योगते ज्ञाना। ज्ञान मोक्ष प्रद वेद बखाना”॥ मनुष्य को चाहिये कि वह प्रथम वेद शास्त्र प्रतिपादित वर्णाश्रम धर्म के अनुकूल आचरण करे यथा :- नित्य भगवान का भजन, यज्ञ, दान, तप, स्वाध्याय सत्संग, विद्वान् महात्माओं की सेवा, न्याय पूर्वक जीवन का उपार्जन, सत्य भाषण, उच्च विचार, परहित कार्य, मृदुल स्वभाव, दया आदि शुभ गुणों और सत्कार्यों को जीवन में नित्य क्रियात्मक रूप में यथा साध्य उतारें, उसके ऐसे निरन्तर आचरण से श्री परमात्मदेव प्रसन्न होंगे और उन की कृपा द्वारा अंतःकरण शुद्ध होगा, ज्यों-2 अंतःकरण शुद्ध होगा उसमें प्रभु की भक्ति भागीरथी का उदय होगा, विषयों से स्वाभाविक घृणा उत्पन्न होगी फिर कामनाएं कहाँ? यथा-

रमा विलास राम अनुरागी।

तजत वमन इव नर बड़भागी॥


Quotation

अध भरे घड़े छलकते हैं, पर पूरे भरे हुए घड़े शान्त रहते हैं। इसी प्रकार छिछोरे बहुत बकवास करते हैं पर गंभीर पुरुष सार गर्भित बोलते हैं।

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कृपण का धन उस ढके हुए तालाब के समान है जो किसी के काम नहीं आता और निरर्थक पड़ा पड़ा सूख जाता है।

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घर त्यागने और वेश धारण करने से कोई साधु नहीं होता। साधु वह है जिसके विचार और व्यवहार साधुता पूर्ण हैं।


सत्संगी की परीक्षा

[श्री पथिकजी]

सत्संग-प्रेमी सज्जन व्यवहार शुद्धि के लिये निरन्तर विवेकपूर्वक सावधान रहते हैं। सतोगुणी प्रकृति दृढ़ रहने के लिये दूषित संग और तमोगुणी व रजोगुणी आहार नहीं करते हैं। अशुद्ध विचारों का निरन्तर सजग रहकर विरोध एवं परित्याग करते हुए शुद्ध, सात्विक विचारों को ही अपने मन व मस्तिष्क में स्थान देते हैं।

सत्संगी सदा शान्त, प्रसन्नचित्त, उत्साही, गम्भीर और दुखों के बीच में सहन-शील और निर्भय रहता है।

सत्संगी को मोह नहीं होता, प्रेम होता है। मोही वह है जो अपना सुख चाहता है। प्रेमी वह है जो प्रेमास्पद को ही सुखी देखने के लिये सब कुछ करता है।

सत्संगी किसी सम्बन्धी की मृत्यु में रोता नहीं लेकिन किसी के दुःख में उसे बहुत दुख होता है और दुखी के दुख निवारण के लिये उसके सभी प्रयत्न या कर्म होते हैं।

सत्संगी में गरीबों व दुखियों की सेवा के लिये तन, मन, धन से तत्परता रहती है। रात, दिन, जाड़ा, गर्मी, वर्षा आदि द्वंद्वों में भी सेवा के अवसरों में आलस्य या प्रमाद नहीं रहता। नीच जाति तथा पापीजनों से भी घृणा नहीं होती।

सत्संगी किसी की निन्दा नहीं करता और निन्दा करने वालों से बहुत बचता है, लेकिन अपनी निन्दा तथा अपने निन्दकों से विरोध या द्वेष नहीं करता। क्योंकि अपनी निन्दा से सत्संगी की बहुत उन्नति होती है, कई सद्गुणों का अभ्यास दृढ़ होता है, विनम्रता, सहनशीलता और निरभिमान आदि सद्भाव पुष्ट होते हैं।

सत्संगी अपनी सेवा नहीं कराता वरन् सेवा करता है। कभी-कभी दूसरों की प्रसन्नता के लिये, भाव विकास के लिये ही दूसरों को भी अपने प्रति सेवा का अवसर दे देता है।


मैत्री-भावना से मुक्ति

(श्री. दौलतराम कटरहा वी. ए. दमोह)

विचारों की शक्ति के संबंध में हमें जो कुछ भी थोड़ा बहुत ज्ञान प्राप्त हुआ है उससे हम आज दृढ़तापूर्वक कह सकते हैं कि विश्व के साथ मैत्री भाव रखने से न केवल विश्व में सुन्दर विचार तरंगें ही फैलती हैं जिससे कि विश्व का वातावरण न्यूनाधिक मात्रा में शुद्ध एवं परिष्कृत हो जाता है बल्कि साथ साथ व्यक्तिगत दृष्टि से मैत्री-भाव रखने वाले मुमुक्षु को महान लाभ होता ही है, साधक सब प्राणियों का सुहृद् बन जाने के कारण अजात रिपु हो जाता है, वह विश्व की ओर से निर्भय हो जाता है तथा उसे अनेकों झंझटें परेशान नहीं करती और न दुश्चिंताएं ही उसे मानसिक पीड़ा पहुँचाती हैं।

शत्रुत्व-भाव का पोषण करने के कारण साँसारिक जीवन जिन कठिनाइयों में उलझे हुए रहते हैं वह उनसे बिलकुल बच निकलता है किंतु मैत्री-भावना से उसे केवल यही अभावात्मक लाभ नहीं होता। उसके तो आह्लाद में भी वृद्धि होने से उसके चित्त की अवस्था समुन्नत हो जाती है। यदि कहीं उसकी मैत्री भावना और भी अधिक प्रबल हुई तो वह केवल मानसिक क्षेत्र तक ही सीमित न रहेगी बल्कि वह व्यक्ति उसकी प्रेरणा से आगे चलकर समस्त प्राणियों के हित-साधन में निरत हो जावेगा और “वसुधैव कुटुम्बकम्” के आदर्श को अपने आचरण में उतारने का प्रयत्न करेगा और तब उसका क्षद्र “न्व”, महत् ‘स्व’ में विलीन हो जावेगा अर्थात् उसके क्षद्र ममत्व और मोह के बंधन कट जावेंगे।

इसी महत् ‘स्व’ से एकात्म्य ही में तो क्रमिक विकास की परिसमाप्ति होती है अर्थात् यही उसकी परमावधि है। इसी तरह मैत्री-भावना हमें न केवल आनन्द या प्रसन्नता ही प्रदान कर सकती है वरन् वह हमें अच्छी तरह रस से सराबोर कर आध्यात्मिक अवस्था की चरम सीमा तक पहुँचाने में समर्थ है। रस-स्निग्ध होकर हम जिस रस की प्राप्ति करते हैं वही तो परमात्मा का स्वरूप है। उपनिषद् का वचन है ‘रसो वै सः’, अतएव प्रत्येक मुमुक्षु का कर्त्तव्य है कि वह न केवल यह मंगलमय कामना करे कि ‘सब सुखी हो, सब निरामय हो, सब श्रेय को देखें, बल्कि वह क्रियात्मक रूप से भी विश्व कल्याण में निरत हो जावे।

विश्व-हित में निरत हुए बिना, इन विचारों से हम अपना व्यक्तिगत कल्याण भले ही कर सकें, किंतु व्यक्तिगत हित-साधन तो जीवन का अपूर्ण आदर्श ही है। इस तरह तो हम अपने क्षुद्र ममत्व के दास ही बने रहेंगे और भले ही अनेकों साधनों द्वारा हमारे चित्त की अवस्था अत्यन्त उत्कृष्ट हो जावे किन्तु फिर भी हम किसी देह-विशेष में ही अपने को सीमित समझेंगे और जब कि हम यह जानते हैं कि सीमा-बंधन भी तो आखिर एक बंधन ही है तब हमें यह ससीमता मुक्ति कैसे दिला सकेगी? मुक्ति तो उसी पुरुष की होती है जिसका व्यवहार इस तरह होता हैं मानों वह सब भूतों के अन्दर वर्तमान है और सब भूत उसके अन्दर वर्तमान हैं अर्थात् मुक्ति उसी को प्राप्त होती है जो समष्टि के लाभ में अपना व्यक्तिगत लाभ देखता है और अपने व्यक्तिगत समष्टि अविरोधी हित में समष्टि का हित जानता है।

यदि कोई व्यक्ति अपनी अन्तःशक्तियों को जाग्रत कर उनका प्रसार करता है तो समाज का अंग होने के कारण, उसकी उन्नति से समाज की स्थिति की ही उन्नति होती है। पुनश्च यह भी संभव है कि उसकी विकसित शक्तियों के प्रयोग द्वारा समाज की पहिले से भी अधिक एवं श्रेष्ठ सेवा हो सके। अतएव व्यक्ति के समष्टि अविरोधी हित में समष्टि का हित भी अनिवार्य रूप से सन्निहित है। इसलिए हमारे लिए न केवल व्यक्तिगत साधना ही अभीष्ट है बल्कि सामूहिक अथवा राष्ट्रीय जीवन में भी हमें सक्रिय भाग लेने की आवश्यकता है। हमें न केवल स्वतः ही मुक्ति के पथ में अग्रसर होना पड़ेगा बल्कि दूसरों को भी इसी पथ पर अग्रसर होने के लिये प्रेरित करना पड़ेगा। तभी हमारे जीवन में पूर्णता आ सकेगी, तभी हम वास्तविक अर्थ में विश्व-मित्र हो सकेंगे और तभी हमारा सार्वभौम प्रेम फलदायक होगा। भगवान बुद्ध इस तत्व से पूर्णतया परिचित थे और इसीलिये उन्होंने यह इच्छा प्रकट की थी कि व्यक्तिगत मुक्ति तब तक न होगी जब तक कि विश्व का प्रत्येक जीव मुक्ति न हो जावेगा।

मैत्री-भावना के प्रसार विस्तार या उन्नयन से न केवल व्यक्ति-विशेष की ही आध्यात्मिक प्रगति होती है बल्कि उसके शान्ति-पूर्ण विचारों से विश्व का वातावरण भी प्रभावित होता है और उस व्यक्ति की भी उन्नति होती है जिसके कि प्रति वह व्यक्ति अपने विचारों को संचालित करता है। इस तरह उस व्यक्ति के चारों ओर एक अच्छा वातावरण तैयार हो जाता है जिससे कि उस व्यक्ति के लिये विश्व से तादात्म्यता की प्राप्ति के लिये अनुकूल परिस्थितियाँ भी उपस्थित होने लगती हैं। किन्तु प्रेम-भाव से व्यवहार करने वाले साधक को भी अनेकों अवसरों पर शत्रुत्व का व्यवहार करने वाले लोगों से सामना करना पड़ता है जिससे कि उसकी प्रगति अबाध गति से नहीं हो पाती। ऐसे अवसरों पर साधक को धैर्य न खोना चाहिये और यह विश्वास रखना चाहिये कि जो लोग उससे आज शत्रुता का व्यवहार करते हैं वे आगे चलकर अवश्य ही मित्रता का व्यवहार करने वाले बन जावेंगे। इस विश्वास के साथ साथ जब हम अपने विरोधियों के प्रति मैत्री-भावनाएं भी भेजते रहेंगे तो हमारी ये प्रेष्य भावनाएं उनके हृदयों में भी मैत्री भावनाओं को जाग्रत करना आरंभ कर देंगी। जिस तरह घृणा-सूचक भावों के उत्तर में घृणा के प्रयोग से घृणा की ही वृद्धि होती है उसी प्रकार प्रेम और मैत्री भाव के बार-बार प्रयोग होने से प्रेम-भाव की ही वृद्धि होती है। इस तरह उस व्यक्ति का वास्तविक आत्म-विकास होता है और तब वह हमारी तथा हमारे प्रेम पथ की श्रेष्ठता में आत्म-विकास के कारण अनुभव करने लगता है। वह नत-मस्तक हो जाता है और फिर शत्रु से मित्र भी बन जाता है। किन्तु यह तब ही संभव है जब कि हम मनुष्य की आसुरी प्रकृति पर उसकी दैवी प्रकृति की अन्तिम विजय में विश्वास रखें। मैं समझता हूँ कि भले ही कोई व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास न रखे किंतु यदि वह इस तथ्य में विश्वास रखता है तो वह सच्चे अर्थ में आस्तिक है। जो यह विश्वास नहीं रखता उसका सदाचारी होना बड़ा कठिन प्रतीत होता है।

यह विश्वास कि प्रत्येक व्यक्ति में जो अन्तर्द्वन्द्व होता रहता है उसमें अन्तिम विजय उसकी दैवी प्रकृति की ही होगी अर्थात् यह दृढ़ धारण कि प्रत्येक व्यक्ति सत्योन्मुखी है, हमें घृणा-हीन बनाए रखने के लिये अत्यावश्यक है। इसलिये यदि हम दूरदर्शिता खोकर किसी मनुष्य की वर्तमान परिस्थिति से ही उसके भले या बुरे होने की धारणा बनाने की भूल करेंगे और इस तरह उसे उसकी भावी उन्नत स्थिति के प्रकाश में भी देखना स्वीकार न करेंगे तो यह निश्चित ही है कि हम अवश्य ही धोखा खावेंगे। अतएव यदि हम यथार्थवादी हैं तो हमें स्मरण रखना चाहिये कि आदर्शोन्मुख यथार्थवाद ही हमारी जीवन समस्याओं का एकमात्र हल है। इसके अतिरिक्त इस तरह के विश्वास से हमको एक और प्रकार की भी सहायता प्राप्त होती रहती है। यदि यह विश्वास हमारे गले उतर गया है तो यह निश्चय है कि यह विश्वास ‘क’ के समान ही हमें अन्तिम विजय की सदा याद दिलाता रहेगा और हमें उत्साह, स्फूर्ति, शक्ति और धैर्य प्रदान करता रहेगा। सात्विक कर्त्ता के लिये सत्य की अन्तिम विजय में विश्वास रखना परमावश्यक है क्योंकि बिना इस विश्वास के धैर्य और उत्साह होना कठिन है।


कल्पना की अनन्त शक्ति!

(श्री. ठा. महिपालसिंह जी, निमदीपुर राज्य)

संसार में व्यवहारित अनेक शब्द ऐसे हैं जो गंभीर एवं महत्वपूर्ण प्रभाव रखने वाले हैं, परन्तु जनसाधारण में उनका व्यवहार अस्वाभाविक दशा में किया जाता है। उन अनेक शब्दों में से एक “कल्पना” शब्द भी है जिसको लोग किसी शोकाकुल परिवार को सम्वेदना सूचक प्रस्ताव के साथ मिलाकर कहते हैं कि संसार केवल कल्पना मात्र है-उनका ध्येय उस समय विश्व की निःसारता दिखलाकर साँत्वना दे पाना ही होता है-परन्तु ज्ञान दृष्टि से देखने वाले जानते हैं कि वस्तुतः कि कल्पना ही जगत है आत्मिक जगत की विशुद्ध कल्पनायें शारीरिक संसार की रचना करती हैं। जो बात आत्मिक क्षेत्र में बहुत पहिले बन चुकी होती हैं वह उसके बहुत पीछे शारीरिक क्षेत्र में आती हैं और कभी कभी उसकी पूर्ति के लिये एक से अधिक बार शारीरिक क्षेत्र में आना पड़ता है-जैसे किसी विचारशील महापुरुष के सद्विचार जब एकत्र होने लगते हैं तो वह मानसिक केन्द्र से निकलकर वाणी में उसके बाद लेखनी द्वारा निबंधित होकर पुस्तक रूप में व्यावहारिक जगत में वितरित होते हैं। एवं कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि वह सर्वसाधारण के सामने इतना लेट पहुँचते हैं कि उनका प्रेषक व्यावहारिक संसार से निकल चुका होता है।

कल्पना के दो रूप होते हैं, एक क्षणिक दूसरा स्थायी। सत्य और तत्व के आधार पर उठने वाली कल्पना जो अमर और अजेय होती है सदा एक रूप में चलती रहती है एवं स्वार्थ वाली निर्मूल कल्पनायें पानी के बुलबुलों की भाँति उठा और बुझा करती हैं जैसे सुषुप्तादशा में कोई स्वप्न देखते हुये अपने कल्पित जगत की रचना कर लेता है और उसकी उत्पत्ति तथा समाप्ति स्वप्न के साथ ही हो जाती है परन्तु दोनों प्रकार की कल्पना का प्रभाव स्थूल शरीर पर पड़ता ही-जिसकी अनेक अटकलें लगाई जाती हैं अथवा ऐसा भी अनुभव में आया है कि स्वप्न सत्य होते हुये भी देखे गये हैं। कारण यह होता है कि जब संयोग वशात् निश्चित कल्पना बंध जाती है तो वह स्वयं सत्य का ही रूप होती है।

आँतरिक शक्ति दृढ़ सत्य पूरित न्याय की स्विच दबाने से अपना दिव्य प्रकाश प्रकट कर देती है, जिसको देखकर व्यावहारिक संसार चकित हो जाता है-अनुभव हीन मनुष्य स्वार्थ प्रेरणा से जब उपरोक्त प्रकाश प्राप्त करने में विफल होता है तो वह अपनी त्रुटियों को न देखकर सिद्धाँत को ही भ्रम बतलाने लगता है- कारण यह होता है कि कनेक्शन तो कटा हुआ रहता है फिर स्विच दबाने से प्रकाश कैसे हो सकता है? सर्वप्रथम आन्तरिक शक्ति का अनन्त शक्ति से कनेक्शन मिलाने का अभ्यास करना चाहिये। निश्चित होकर बैठ जाइये स्वार्थ द्वेषादि दूषित मानसिक विकारों को दूर करने का प्रयत्न कीजिये। जब मानसिक उद्वेग शाँत होकर शिथिल हो जाय तो दृढ़ सत्य की कल्पना कीजिये कि यह आँतरिक शक्ति अनन्त शक्ति से मिलकर अब न्याय पूरित कार्यों को शारीरिक क्षेत्र से अलग रहकर करवा सकती है। सत्य न्याय की जो कल्पना उस समय उठेगी वह पूर्ण होकर ही रहेगी। कनेक्शन मिल जाने पर प्रकाश का होना निश्चित ही है- शाँतिमयी शुद्ध उपासना से जब कुवासनायें हट होती हैं तो भी कनेक्शन मिल जाता है जब कोई मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना चाहता है तो शारीरिक यात्रा आरम्भ होने से पहले मानसिक यात्रा का आवागमन समाप्त हो चुका होता है-एवं जैसे एक गणितज्ञ अनेक अंकों को यथा स्थान रखकर मिनटों में सत्य उत्तर दे सकता है वैसे ही सत साधक अपने कनेक्शन के आधार पर विश्व विभ्रम को दूर रखकर न्याय कर्म करवा लेने में समर्थ हो सकता है। कनेक्शन प्राप्त कल्पना-शक्ति सत्य का इंजेक्शन लगाकर अपने प्रभाव से समस्त अभाव दूर कर सकती है-एवं मन आनन्द में अपनी पवित्र कल्पना से सारे काम निकालने लगता है- उसे कठिनाई का रूप दिखाई ही नहीं पड़ता है-साधक अपनी सत्य प्रेरणा करके छुट्टी पा जाता है। बाधकों के प्रति प्रतिहिंसक भावना उठाने की उसे जरूरत ही नहीं पड़ती है क्योंकि वह काम तो स्वयं उसके ऊपर न होकर उसे अनन्त शक्ति पर होता है जो अपने अभिनय पात्र मूर्तियों में से किसी से भी ले सकता है अथवा नई रचना कर सकता हैं। जब ऋषियों को राक्षसों ने सताया तो उन्होंने अपनी आन्तरिक शक्ति को खटखटाया जिससे श्रीरामचन्द्रजी के रूप में दुष्टों के निधन का कार्य सम्पादित हुआ-न्याय पूरित कल्पना करने वाला केवल निश्चित परिणाम को जानता है-कार्य प्रणाली से उसको कोई काम नहीं, व्यावहारिक जगत की सभी बातें आन्तरिक क्षेत्र में निपटाई जा सकती है आँतरिक जगत इतना विशाल है कि शारीरिक क्षेत्र उसके सामने नहीं के बराबर है। शक्ति साधक साधुओं की कथा संसार बराबर कहता आता है परन्तु अब उदर पोषक लोगों ने उस अध्ययनशाला को भी निष्कलंक नहीं रहने दिया है। मारण, मोहन, उच्चाटन, वंशवृद्धि तथा अन्य धनोपार्जन के अनेक साधनों की वह एक एजेन्सी सी बन गई है। यह बात भुला दी गई है कि अनन्त शक्ति सत्य साधक की शुद्ध कल्पना से न्याय रक्षा अथवा उचित सत्व वितरण करने का काम स्वयं करती है-एवं उचित मार्ग में पड़ने वाली अनुचित बाधाओं को न्याय की धार से निपटाने का भार भी उसी पर है। वह अपनी प्रगति के अनुसार सब कुछ करने में समर्थ है।

न्याय रहित स्वार्थ की भावना से की जाने वाली कल्पना मनोवृत्ति को दूषित बनाकर दुष्ट नीति वालों को अपने आप दंडित कर देती है। जैसे किसी ने चाहा कि दूसरे का अनिष्ट होकर उसको सुख साधन प्राप्त हो जाय, परन्तु वह दूसरा उसका अनिष्ट नहीं चाहता इससे द्वंद्व युद्ध तो होता नहीं प्रत्युत हानिकर भावना जो पहले के हृदय में बैठ चुकी है उसी की हानि करती है। और भी स्पष्ट शब्दों में यह बतलाया जा सकता है कि यदि विष को किसी के मुख में डाला जाय परन्तु नाम दूसरे का लिया जाय तो जिसका नाम लिया जायगा वह न मरैगा-मरैगा वहीं जिसके गले से नीचे विष उतारा गया है। प्रारंभिक दशा में शुद्ध काल्पनिक को चाहिये कि वह अपनी आँतरिक शक्ति को अनन्त शक्ति का अंश मानकर कनेक्शन स्थापित कर अभाव से मानसिक भावना को दूर कर ले-शान्त होकर आनन्द का अनुभव प्राप्त करे। कुछ समय तक वह अपने कार्यक्रम लिख लिया करें। न्यायोचित अधिकार उसको स्वयं मिलने लगेंगे-शंका बढ़ाने वाली मान भड़कीली बाधायें स्वर्णमयी लंका के समान सामने जलती हुई दिखाई पड़ने लगेंगी। जब मानसिक क्षेत्र का काम बढ़ने लगेगा तो शारीरिक गतिविधि की भावना क्रमशः घटने लगेगी-कुछ समय इस तरह बीतने पर शक्ति उपासना सिद्धि होकर अमर आनन्द की वृद्धि करेगी। और यह बात सुगमता से समझ में आ जायगी कि अनन्त शक्ति की वह कल्पना जो एक से अनेक रूप रखकर विश्व रचना का कारण बनी हुई है प्राणिमात्र में विराजमान है, उसके न्यायोचित वितरण में कोई त्रुटि नहीं है अपनी भूल ही असफलता का कारण है।

आत्मिक आधार पर दृढ़ सत्य वाली कल्पनायें तत्काल पूरी होती देखी गई हैं-एवं ऐसी घटनाओं से इतिहास भरा पड़ा है। आज भी वैसे ही बातें हो रही हैं। जिनको शंका हो स्वयं अभ्यास करके कल्पना की अनंत शक्ति का चमत्कार प्रत्यक्ष करके देख लें।


Quotation

जिसके बाल सफेद हो गये हैं वह बड़ा नहीं, बड़ा वह है जिसके विचार और कार्य बड़प्पन के हैं।


विवाह की उपयोगिता

(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)

आधुनिक मनोविज्ञान इच्छाओं को पार करने का मार्ग दर्शाता है, उनका दमन मानसिक बीमारियाँ उत्पन्न करता है। इसी से अनेक बार मानसिक नपुँसकता उत्पन्न होती है। मनुष्य के अन्तस्थल में अनेक वासनाएं दबकर अंतःप्रदेश में छिप जाती हैं। इनसे समय-2 पर अनेक बेढंगे व्यवहार गाली देने की प्रवृत्ति, कुशब्दों का उच्चारण, आत्म हीनता की भावना ग्रन्थि की उत्पत्ति, स्मरण-विस्मरण, पागलपन, तथा प्रलाप हिस्टीरिया इत्यादि अनेक मानसिक व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। मानसिक व्यापारों में एक विचित्र प्रकार का संघर्ष चला करता है। मन की अनेक कोमल भावनाएं विकसित नहीं हो पातीं, मनुष्य शिकायत करने की मनोवृत्ति का शिकार बना रहता है। दूसरे के प्रति वह अनुदार रहता है, उसकी कटु आलोचना किया करता है। अधिक उग्र या असंतोषी, नाराज प्रकृति, तेज स्वभाव का कारण वासनाओं का समुचित विकास एवं परिष्कार न होना ही है। इस प्रकार का जीवन गीता में निंद्य माना गया है।

प्रत्येक स्त्री पुरुष के जीवन में एक समय ऐसा आता है, जब उसे अपने जीवन साथी की तलाश करनी होती है। आयु, विचार, भावना, स्थिति के अनुसार सद्गृहस्थ के लिए उचित जीवन साथी की तलाश होनी चाहिये। उचित शिक्षा एवं आध्यात्मिक विकास के पश्चात् किया हुआ विवाह मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ठीक है। आजन्म कौमार्य या ब्रह्मचर्य महान् हैं। उनका फल अमित है किन्तु साधारण स्त्री पुरुषों के लिए यह संभव नहीं है। इससे मन की अनेक कोमल भावनाओं का उचित विकास एवं परिष्कार नहीं हो पाता। वासना को उच्च स्तर एवं उन्नति भूमिका में ले जाने के लिए एक एक सीढ़ी चढ़कर चलना होता है। एक सीढ़ी को लाँघ कर दूसरी पर कूद जाना कुछ इच्छाओं का दमन अवश्य करेगा, जिससे फलस्वरूप मानसिक व्याधि हो सकती है। अतः प्रत्येक सीढ़ी पर पाँव रखकर उन्नत जीवन पर पहुँचना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

एक पिता तथा माता के हृदय में जो नाना प्रकार के स्वर झंकृत होते हैं, उन्हें भुक्त भोगी ही जान सकता है। दो हृदयों के पारस्परिक मिलन से जो मानसिक विकास संभव है, वह पुस्तकों के शुष्क अध्ययन से प्राप्त नहीं किया जा सकता। विवाह कामवासना की तृप्ति का साधन मात्र है ऐसा समझना भयंकर भूल है। वह तो दो आत्माओं के, दो मस्तिष्कों, दो हृदयों और साथ ही साथ दो शरीरों के विकास, एक दूसरे में लय होने का मार्ग है। विवाह का मर्म दो आत्माओं का स्वरैक्य है, हृदयों का अनुष्ठान है, प्रेम, सहानुभूति, कोमलता, पवित्र भावनाओं का विकास है। यदि हम चाहते हैं कि पुरुष-प्रकृति तथा स्त्री-प्रकृति का पूरा पूरा विकास हो, हमारा व्यक्तित्व पूर्ण रूप से खिल सके तो हमें अनुकूल विचार, बुद्धि, शिक्षा एवं धर्म वाली सहधर्मिणी चुननी चाहिए। उचित वय में विवाहित व्यक्ति आगे चल कर प्रायः सुशील, आज्ञाकारी, प्रसन्नचित्त, सरल, मिलनसार, साफ सुथरे, शान्तचित्त, वचन के पक्के, सहानुभूतिपूर्ण, मधुर भाषी, आत्म विश्वासी और दीर्घजीवी पाये जाते हैं।

कुँवारा प्रायः अतृप्त वासना, स्वप्नदोष, लड़कपन, संकोची और संकुचित दृष्टिकोण वाला रहता है, वह जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता, सामाजिक कार्यों में दिलचस्पी नहीं रखता, दूसरों के दुर्गुणों तथा न्यूनताओं में मजा लेता है। संघर्ष से दूर भागता है, वह विरोधी, वाचाल तथा ईर्ष्या से युक्त होता है, क्रोध, घृणा, भय, वासना और लज्जा से उसकी शान्ति सदैव भंग रहती है। आजन्म कौमार्य देश, धर्म, और समाज के लिए हितकर नहीं है।


गृहस्थ में योग साधना

(पद्म पुराण से)

एक बार भीष्म जी ने महर्षि पुलस्त से पूछा- हे ब्रह्मन्! सबसे अधिक पुण्यजनक जो अनुष्ठान हो उसका मुझसे वर्णन कीजिये।

पुलस्त ऋषि ने कहा- हे भीष्म! इसी प्रकार एक बार व्यास जी के शिष्यों ने भी उनसे यही प्रश्न पूछा था व्यासजी ने इन प्रश्नों के उत्तर में अपने शिष्यों को कुछ आख्यान सुनाये थे सो उन आख्यानों को ही मैं आपको सुनाता हूँ।

प्राचीन समय में एक नरोत्तम नामक युवक था। वह जब कुछ समर्थ हुआ तो वृद्ध माता पिता को निराश्रित छोड़ कर तप करने के लिए चला गया। बहुत दिन तप करने पर उसे कुछ आत्मशक्ति प्राप्त हुई। उसके गीले वस्त्र आकाश में अधर लटके रहकर सूखने लगे।

एक दिन वह वृक्ष के नीचे बैठा था। ऊपर एक पक्षी ने उसके ऊपर बीट कर दी। नरोत्तम को क्रोध आया। क्रोध भरी दृष्टि जैसे उसने ऊपर देखा वैसे ही पक्षी भस्म होकर नीचे गिर पड़ा। अपनी इतनी आत्म शक्ति देखकर उसे बड़ा अभिमान हुआ। अहंकार से उसका मन भर गया।

वह तपस्वी एक दिन भिक्षा के लिए नगर में गया। वहाँ जाकर उसने एक गृहस्थ के द्वार पर भिक्षा माँगी। भीतर से गृह स्वामिनी ने उत्तर दिया-भिक्षुक! कुछ देर खड़े रहिए। पति सेवा में लगी हूँ उसे पूरा करके भिक्षा दूँगी। तपस्वी को इस पर क्रोध आया, उसका चेहरा तमतमाने लगा। इस पर उस गृह-स्वामिनी ने कहा-क्रोधित मत हूजिए मैं पक्षी नहीं हूँ, जो आपके क्रोध से जल जाऊंगी।

स्त्री के यह वचन सुनकर तपस्वी को बड़ा आश्चर्य हुआ। मेरे पक्षी जलाने की गुप्त घटना इसे किस प्रकार विदित हो गई। निस्संदेह यह भी कोई आत्म शक्ति सम्पन्न देवी है। तपस्वी ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और पूछा- हे देवी! तुमने यह आत्मशक्ति घर में रहते हुए किस प्राप्त प्रकार कर ली? मैं तो इतनी तपस्या करने के बाद भी केवल क्रोध से पक्षी जलाने मात्र की सामर्थ्य प्राप्त कर सका हूँ। पर भूत भविष्य की बातें जानने की शक्ति अभी तक मुझ में नहीं है। पर तुम्हारी शक्ति मुझसे अधिक है यह जिस साधन से तुम्हें मिली है उसे हे कल्याणी! मुझ से कहो।

स्त्री ने कहा-हे तपस्वी! मैं मन, कर्म, वचन, से पति सेवा में लगी रहती हूँ। यही मेरी साधना है। इसके अतिरिक्त और कुछ जप तप मैं नहीं जानती। यदि आपको अधिक जानना हो तो तुलाधार वैश्य के पास चले जाइए।

तपस्वी तुलाधार के नगर को चल दिया। कठिन मार्ग को पार करके वहाँ पहुँचा। द्वार पर खड़े साधु को देखकर तुलाधार उठ खड़ा हुआ। उसने दंडवत प्रणाम किया और पूछा हे नरोत्तम साधु! आपको मार्ग में कुछ कष्ट तो नहीं हुआ! उस पतिव्रता स्त्री के कहने से आपको मेरे पास आने पर कष्ट हुआ! पर अब बताइए- आपका पक्षी जलाने का अहंकार दूर हुआ या नहीं?

इतने प्रश्न पूछने पर तपस्वी को और भी आश्चर्य हुआ। इतनी अज्ञात बातें इस वैश्य ने किस प्रकार जान लीं? निस्संदेह यह भी कोई सिद्ध पुरुष है।

नरोत्तम ने तुलाधार को प्रणाम किया और कहा-भगवान्! ईश्वर की कृपा से मार्ग में कोई कष्ट नहीं हुआ। आपको मेरा नाम, पक्षी जलाने का हाल, तथा उस देवी ने मुझे भेजा है, वह सब जिस शक्ति के द्वारा जाना है उस शक्ति को प्राप्त करने की साधना मुझे बतलाइए।

तुलाधार ने उत्तर दिया! भगवान् मैं साधारण वैश्य हूँ। सचाई का व्यापार करता हूँ। पूरा तोलता हूँ। खरा माल देता हूँ इसके अतिरिक्त मैं और कोई साधना नहीं जानता। इस साधना से ही मेरी शक्ति बढ़ी है। यदि आपको इस साधना विधि से संतोष न हो तो कृपया मूक चाण्डाल के पास चले जाइए। वह आपको आत्मशक्ति का रहस्य बता देगा।

तपस्वी, तुलाधार से विदा होकर मूक चाण्डाल के नगर को चल दिया। वहाँ पहुँच कर देखा कि मैले कुचैले वस्त्र पहने हुए वह, चाण्डाल अपने मल उठाने के काम में लगा हुआ है। चाण्डाल ने नरोत्तम को दंडवत किया और कहा-भगवन्! आप जिस प्रयोजन के लिए आये हैं सो मैं जानता हूँ। आप अभी जाकर विश्राम कीजिए। नियम कर्म से निवृत्त होकर आपसे मैं निवेदन करूंगा।

मूक चाण्डाल नियत कर्म से छुटकारा पाकर तपस्वी के सम्मुख उपस्थित हुआ उसने कहा भगवन्! मैं अपने माता पिता की दत्त चित्त से सेवा करता हूँ उन्हें अपना देवता और इष्ट देव मान कर उनकी सेवा सुश्रूषा में लगा रहता हूँ। यही मेरा साधन है। इस साधन के कारण ही मुझे आत्मशक्ति मिली है।

तब तपस्वी ने पूछा-हे मूक चाण्डाल! गृहत्यागी, वनवासी, योग साधक जिस शक्ति को चिरकाल तक कठोर साधन करके प्राप्त करते हैं, उसे गृहस्थ लोग इतनी सुगमता से किस प्रकार प्राप्त कर लेते हैं सो मुझे समझाइए।

चाण्डाल ने कहा-हे ब्रह्मन्! जप योग, तप योग, नाद योग, बिन्दुयोग, ध्यान योग की भाँति ही कर्मयोग भी एक आध्यात्मिक साधना है। अपने नियत कर्म को श्रद्धापूर्वक, कर्तव्य की धर्म भावना से जो अनन्य मन द्वारा करता है वह योग साधन ही करता है। उस पतिव्रता का पतिव्रत, तुलाधार का धर्म व्यापार, मेरा सेवा धर्म, यह सब भी योग साधन से भिन्न नहीं हैं। श्रद्धा के साथ इन साधनाओं में रत रहने से भी आत्म साक्षात्कार होता है और ब्रह्मनिर्वाण मिलता है।

चाण्डाल के वचन सुनकर नरोत्तम को अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ। वह वहाँ से सीधा अपने घर पहुँचा और वृद्ध माता पिता जो उसके वियोग में जर्जर हो रहे थे, उनके चरणों पर गिर पड़ा। और कहा-हे प्राणवान् देव प्रतिमाओं! मेरे अपराध को क्षमा करो। मैं अब आप लोगों की सेवा में ही रहूँगा। तीन सच्चे महात्माओं ने जो क्रिया युक्त उपदेश मुझे किये हैं उनके अनुसार अपना कर्तव्य पालन करता हुआ, आत्म कल्याण करूंगा।

इतने दिन बाद पुत्र को वापिस आया देखकर माता पिता को बड़ा आनंद हुआ। उनने उसे उठाकर बार बार छाती से लगाया और आशीर्वाद दिया कि तात! तुम्हारी साधना सफल हो। फिर जब तक माता पिता जीवित रहे नरोत्तम उनकी अनन्य भाव से सेवा करता रहा।

पुलस्त ऋषि ने कहा- हे भीष्म! व्यासजी ने जो आख्यान अपने शिष्यों को सो सुनाया था मैंने तुमसे कह दिया। अपने कर्तव्य धर्म को सच्चे मन से पालन करना यही सब से अधिक पुण्यजनक अनुष्ठान हैं। जो फल कठिन श्रम से प्रवीण साधकों को मिलता है वह कर्म योगी को सहज ही प्राप्त हो जाता। शास्त्र का भी यही वचन है-

सत्येन समभावेन जितंतेन जगत् त्रयम्। तेनातृप्यन्त पितरो देवा मुनिगणैः सह। भूत भव्यंप्रवृत्तंचतेन जानाति धार्मिकः। नास्ति सत्यात्परों धर्म नानृतात्पातकं परम्॥

सत्यता और समत्व की भावना जिसमें है वह तीनों लोकों को जीत लेता है। उससे पितर, देवता और मुनि प्रसन्न रहते हैं। वह धर्मात्मा भूत, भविष्य और वर्तमान की बातें जान लेता है। सत्य से बड़ा और कोई धर्म नहीं, असत्य से बड़ा और कोई पाप नहीं। इसलिए सत्यता पूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। इसी में मनुष्य का सच्चा कल्याण है।


बालक बन जाओ!

[कुमारी भारती]

उपनिषद् के ऋषि ने कहा है कि मनुष्य को सच्चा विद्वान् और ज्ञानी बनना चाहिये, ज्ञानी होने के बाद मनुष्य को बालक बनने का अभ्यास करना चाहिए।

यदि ज्ञानी होने के बाद मनुष्य बालक की तरह सरल पवित्र और निर्द्वन्द्व नहीं हो सका तो समझना चाहिए ज्ञान परिपक्व नहीं हुआ।

तुम बालक बनो, बालक का आदर करना सीखो, बालक को समझना सीखो।

बालक देव-लोक से आया है। वह छल कपट और दुराव नहीं जानता, तुम उससे यह सब सीखो। परन्तु यह नहीं होता तुम तो इसके विपरीत बालक को अपनी बुराइयाँ सिखा सभ्य और शिष्ट बनाने का दम्भ कर रहे हों। जब बालक नंगा रहकर मट्टी में लोटकर प्रकृति संपर्क बनाए रखना चाहता है तब तुम उसे रुलाकर भी प्रकृति से परे रखकर अपने धनवान् होने का दम भरते हो। अपना यह रवैया बदलो, तुम बालक को ही अपना पथप्रदर्शक बना लो, कभी यह करके तो देखो।

तुम्हारे कुछ शत्रु हैं और कुछ मित्र हैं। तुम चाहते हो तुम्हारा बालक भी तुम्हारे शत्रु को अपना शत्रु और तुम्हारे मित्र को अपना मित्र माने, परन्तु बालक के लिए तो शत्रु और मित्र दोनों, बराबर हैं उसके लिए काले और गोरे का भेद नहीं, गरीब और अमीर का फर्क कुछ नहीं, उसके लिए तो हरिजन और सवर्ण दोनों समान ही हैं। तुम अपने जीवन की विषमताओं को ही सभ्यता, उच्चता और पवित्रता समझते हो तुम्हारी मति भेद-प्रधान है जब कि बालक अभेद बुद्धि है।

तुम कुछ देर के लिए बालक के पीछे चलो। इस अभेद में और साम्य में अद्भुत आनन्द है तुम्हारा कभी किसी से झगड़ा हो जाय तो तुम उससे बदला लेने की फिक्र में रहते हो। अनेक वर्ष बीतने पर भी तुम किसी के उपकार को नहीं भूल सकते, मौका पड़ने पर तुम डंक मारने से नहीं चूकते। किसी ने तुम्हारे साथ कुछ भलाई भी की है यह तो तुम्हें याद नहीं रहता झट भूल जाता है दुःख में किसने साथ दिया, तुम्हारी उन्नति में किसका हाथ है, यह तुम्हें याद नहीं रहता परन्तु कब किसने तुम्हारे खिलाफ गवाही दी है यह तुम्हें कभी नहीं भूलता।

तुम इस बारे में बालक को ही अपना गुरु बनाओ। यदि किसी कारण से झगड़ा हो गया है तो उसे शीघ्र भूल जाओ। कुढ़ते न रहो, मन में कीरा न रखो दूसरों के अपकार को भूल जाओ उनके उपकार को कभी न भूलो। राग द्वेष से ऊपर उठने की यह कला बालक से सीखो।

बालक प्रेम का भूखा है! उसे जो प्यार करे उसी के पास चला जाता है। वस्तुतः ईश्वर भी प्रेम में ही रहता है इसीलिए बालक को गोपाल [बाल गोपाल] कहा है। प्रेम और सादगी में ही सच्चा सौंदर्य है। बालक को देखकर सभी उसे प्यार करना चाहते हैं। तुम बालक बनो सबके प्यारे बनो तुम्हें देखकर सब कोई तुम्हें प्यार करना चाहें।

सच्चा प्रेम बालक से होता है और बालक का ही प्रेम सच्चा होता है और सब प्रेम में स्वार्थ हो सकता है। बालक शुद्ध और ब्रह्म रूप है तुम भी शुद्ध पवित्र बनो।

तुम सदा बालक के गुरु और नेता बनते हो यह तुम्हारी भूल है। अब तुम बालक को ही अपना गुरु और नेता बनाओ। यदि तुम ऐसा कर सकोगे तो अपनी वैयक्तिक और राष्ट्रीय कठिनाइयों का सही हल कर पाओगे।


स्वच्छ रहिए

स्वच्छता मनुष्यता का प्रधान लक्षण है। जिसकी स्वच्छता जितनी विकसित है वह उतना ही उन्नतिशील कहा जायगा। पशुओं को स्वच्छता और सफाई का ध्यान नहीं होता पर जिसमें मनुष्यता का भाव बढ़ने लगता है वह स्वच्छता क्रमशः सफाई की ओर कदम बढ़ाता जाता है। सुअर गंदगी में लोटता विष्ठा खाता है उसे उसमें कोई द्वेष या घृणा नहीं होती पर जो जीव जितना विकसित होता जावेगा उतनी ही गंदगी से घृणा होती जायगी। वह स्वच्छ रहना, स्वच्छ वातावरण में रहना पसंद करेगा।

स्वच्छता का जितना अंश मनुष्य में रहता है उतना ही वह अस्वच्छ रहता है। कितने ही मनुष्य अस्वच्छ रहते हैं। शरीर में मैल, दाँतों पर मैल, नाक, आँखों बालों और नाखूनों में मैल, भरा रहता है। कपड़ों में पसीने की दुर्गन्ध आती है मैल से वे काले पड़े होते हैं। बिस्तर व चारपाई गंदगी से भरी रहती है। जहाँ जहाँ थूकना, कचरा पटक देना, वस्तुओं को अव्यवस्थित रखना खाद्य पदार्थ तथा पीने का पानी जैसे तैसे पड़े रहने देना, यह सब गंदी आदतें हैं। गंदे वातावरण से गंदगी उत्पन्न होती है। जिसके मन में न गन्दगी से घृणा है और न स्वच्छता से प्रेम वह चारों ओर निश्चित रूप से गंदगी जमा करता है। यह कहना ठीक नहीं कि गंदगी का कारण मनुष्य है। वास्तव में मनुष्य की कुरुचि, गलीजपना ही इसका कारण है। गरीब होते हुए भी मनुष्य अपने शरीर, वस्त्र तथा मकान को स्वच्छ रखता है। नहाने, धोने, झाड़ने, लीपने, पोतने, सफाई या वस्तुओं का यथास्थान रखने के लिए पैसे की उतनी जरूरत नहीं है, जितनी की स्वच्छता की।

मनुष्य सुन्दर वस्तुओं को पसंद करता है। उनकी ओर मन बरबस खिच जाता है। सौंदर्य स्वच्छता का ही दूसरा नाम है। गरीब आदमी अपनी झोंपड़ी को थोड़ा परिश्रम करके लीप पोत सकता है। झाड़ बुहार कर साफ रख सकता है। और लता पुष्पों से सजा सकता है। अव्यवस्थित ढंग से पड़ी हुई कीमती चीजें भी कूड़ा हैं, और यथा विधि ठीक स्थान पर रखा हुआ कूड़ा भी स्वच्छता है। फटे पुराने कपड़ों को मरम्मत करके उन्हें ठीक तरह धोकर स्वच्छ रखा जा सकता है। तरीके से पहने हुए सस्ते कपड़े-लापरवाही धनी की बेढंगी पोशाक की अपेक्षा अधिक भले मालूम पड़ते हैं।

व्यवस्था शक्ति जो कि जीवन का महत्वपूर्ण अंग है-स्वच्छता का ही विकसित रूप है। सब कार्य यथा विधि हों, सब से यथोचित व्यवहार हो यह सब सौंदर्य पूर्ण, दृष्टिकोण का फल है। कीचड़, आलसी, लापरवाह स्वभाव के आदमी समय की पाबन्दी की नियमितता का, हिसाब किताब का, लेन देन का, ठीक प्रकार ध्यान नहीं रखते उनके काम प्रायः अधूरे, अव्यवस्थित, उलझे हुए पड़े रहते हैं। इस बेढंगी स्थिति के कारण उसे हानि ही हानि उठानी पड़ती है।

अस्वच्छता, मनुष्यता का अपमान है। गरीब होना कोई बुरी बात नहीं, पर गन्दा होना घृणास्पद है। गन्दगी-बीमार का दूसरा नाम है। जिसकी आँतों में मैल जमा रहता है वह कब्ज का रोगी कहा जाता है, जिसके खून में विषैले विजातीय पदार्थ भरे हैं वह रक्त विकार का रोगी कहा जाता है। इसी प्रकार जिसका मन गन्दा है, वह मानसिक रोगी है, जिसका चरित्र गन्दा है वह नैतिक रोगी है। स्वभाव और व्यवहार का गन्दा एक सामाजिक रोगी है। इस प्रकार के रोगी न दूसरों को सुखी रहने देते हैं। गन्दे मनुष्य मनुष्यता के लिए अभिशाप हैं। हमें चाहिए कि हम स्वच्छ रहें! न केवल शरीर, वस्त्र, मकान और सामान को साफ रखें वरन् अपने स्वभाव, चरित्र, व्यवहार और मन को भी स्वच्छ रखें। सर्वांगीण स्वच्छता ही वास्तविक स्वच्छता है।


निर्माण-रहस्य


निर्माण-रहस्य

(श्री कुँ. हरिश्चन्द्र देव शर्मा ‘चातक’ कविरत्न)

मुग्धमना मृग ने सुन-सुन कर जिस दिन मृदु वीणा की तान।

प्राण दे दिये उसी दिवस से प्रकट हुआ आकर्षण ज्ञान॥

भ्रमरावलि ने खिली कली का जिस क्षण किया प्रथम चुम्बन।

गुञ्जल ही कह गया कान में हुआ उसी क्षण प्रेम सृजन॥

रूप दृगों में भर सरोजिनी जब रवि की करती थी चाह।

तब तन्मयता ने पहले-पहले देखी आने की राह॥

अस्ताचल गामी रवि-किरणें अन्तिम वार कमल छूकर।

चली गई सन्देश विरह का तब से ही फैला भू पर॥

बादल का घूँघट सरका कर जब सुधाँशु नभ से झाँका।

तब से ही आवरण रहित उस छवि का मूल्य गया आँका।

रात रात भर जाग कुमुदिनी ने जब प्रिय विधु को पाया।

तब से काय मिलन से मन का मिलन श्रेष्ठ कवि ने गाया॥

ताप तप्त जग को जब शीतल करने को निकले निर्झर।

तब दुखियों के दुःख मिटाने की जागी भावना प्रखर॥

कहरे के परदे को जिस क्षण चीर दिनेश निकल आया।

उस क्षण से ही साहस ने है जन्म मनुष्यों में पाया॥

जिस दिन से देखा मानव ने सरिता का प्रवाह उद्दाम।

उस दिन से ही ध्येय प्राप्ति के हित वह दौड़ रहा अविराम॥

जब देखा गुलाब काँटों में रहकर करते निज निर्माण।

तब जाना उन्नत होते हैं विघ्न व्यूह में पड़कर प्राण॥

जब पतझड़ की पीली पत्ती पवन उड़ा कर लाया पास।

तब जीवन की नश्वरता का मिला प्रथम जग को आभास॥

जब से यह देखा मानव ने पवन घूमता है स्वच्छन्द।

तब से ही स्वतन्त्र रहने की इच्छा उपजी उसे अमंद॥

कवि ने जिस क्षण सुना क्रौंची बध पर क्रौंच का करुण विलाप।

उस क्षण से ही स्रोत काव्य का बहा हृदय में अपने आप।

-कर्मयोग से

*समाप्त*