इस संसार रूपी समुद्र में असंख्य प्रकार के अत्यन्त मूल्यवान महत्वपूर्ण रत्न इंच-इंच भूमि में प्रचुर परिमाण में भरे पड़े हैं। यह रत्न राशि परमात्मा ने इस लिए बिछा रखी है कि उनका राजकुमार-मनुष्य-उसके द्वारा अपनी श्री वृद्धि करे। परन्तु यह है कि जो उन्हें प्राप्त करने की योग्यता सिद्ध करे उसे ही वे दिये जाएं। जैसे छोटे बालक को, या बुद्धिहीनों को बन्दूक नहीं सौंपी जा सकती, वैसे ही अयोग्य व्यक्तियों को यह रत्न राशि उपलब्ध नहीं होती। नाबालिगों को राज्य दरबार में अप्रमाणिक माना जाता है, उन्हें वे अधिकार नहीं मिलते जो एक साधारण नागरिक को मिलने चाहिएं किन्तु जैसे ही वह नाबालिग अपनी आवश्यकता का प्रमाण प्रस्तुत कर देता है वैसे ही उसे राज्य दरबार में प्रमाणिकता प्राप्त हो जाती है। मनुष्य की नाबालिगी उसकी लापरवाही और आलस्य है। जब तक सावधानी जागरुकता और परिश्रमशीलता जागृत नहीं होती तब तक वह नाबालिगी दूर नहीं होती और न तब तक संसार की बहुमूल्य संपदाएं प्राप्त हो सकती हैं। किन्तु जब अपनी उद्योगशीलता, परिश्रम प्रियता, जागरुकता प्रमाणित कर दी जाती है तो परमात्मा द्वारा इस सृष्टि में पग-पग पर बिछाये हुए रत्नों की राशि हमें आसानी से प्राप्त होने लगती है।
(ले.-श्री राल्फ वाल्टडी ट्राईन)
जिस क्षण हम भगवान् के साथ अपनी एकता, सगर सत्ता का अनुभव करना प्रारम्भ कर देते हैं, उसी क्षण हमारे हृदय में शान्ति का स्रोत बहने लगता है। अपने को सदा सुन्दर, स्वस्थ, पवित्र, आध्यात्मिक विचारों से ओतप्रोत रखना, वस्तुतः जीवन और शान्ति की प्राप्ति है। इस सत्य को सदा अपने हृदय-पट पर अंकित करना कि “मैं आत्मा हूँ भगवान् का अंश हूँ” और हमेशा ही इसी विचारधारा में उठते रहना शान्ति का मूलतत्व है। कितना करुणाजनक और आश्चर्य प्रदृश्य है कि संसार में हमें हजारों व्यक्ति चिन्तित, दुखी, शान्ति की प्राप्ति के लिए इधर-उधर भटकते हुए तथा विदेशों की खाक छानते हुए नजर आते हैं, परन्तु उन्हें शान्ति के दर्शन नहीं होते। इसमें तिलमात्र भी सन्देह नहीं कि इस प्रकार वे कदापि शान्ति नहीं प्राप्त कर सकते, चाहे वर्षों तक वे सब प्रयत्न करते रहें, क्योंकि वे शान्ति को वहाँ खोज रहे हैं, जहाँ कि इसका सर्वथा अभाव है। वे भोले मनुष्य बाह्य पदार्थों की ओर तृष्णा भरी निगाहों से देख रहे हैं जब कि शान्ति का चश्मा उनके अपने अन्दर बह रहा है। कस्तूरी मृग की नाभि में विद्यमान है, परन्तु मृग अज्ञानतावश उसे खोजता फिरता है। जीवन में सच्ची शान्ति अपने अन्दर झाँकने से ही मिल सकती है।
बाह्य संसार में शान्ति नहीं, शान्ति का उद्गम स्थान तो मनुष्य की आत्मा है। आप शान्ति की खोज में चाहे भले ही जंगलों में भटकते फिरें, शारीरिक वासनाओं, इच्छाओं और आवेशों की पूर्ति को ही शान्ति समझते रहें, तथा बाह्य पदार्थों की प्राप्ति द्वारा शान्ति का दिव्य आनन्द उपभोग करना चाहें पर सच जानिए, सच्ची शान्ति के दर्शन आपको नहीं होंगे। परन्तु इस सबसे मेरा यह तात्पर्य कभी नहीं कि आदमी को अपनी इच्छाओं, शारीरिक आवेशों और लालसाओं की पूर्ति करनी ही नहीं चाहिए, अपितु इन शारीरिक इच्छाओं और आवेशों की पूर्ति उस सीमा तक मनुष्य को करनी चाहिए, जहाँ तक यह हमारे स्वास्थ्य को कायम रखने में आवश्यक है। दिन रात इन्हीं आवेशों की पूर्ति में लगा रहने वाला व्यक्ति असन्तोष, चिन्ता और उदासी की काली छाया से घिरा होता है। सुन्दर, स्वस्थ जीवन बिताने के लिए शारीरिक आवेशों की पूर्ति नितान्त आवश्यक है, परन्तु सबसे बड़ी आवश्यकता है अपने मन पर नियन्त्रण की, मन को इन्द्रियों का दास नहीं अपितु उनका स्वामी बनना चाहिए।
शान्ति की प्राप्ति में बच्चों की सी स्वाभाविक सरलता और हृदय की निष्कपटता नितान्त आवश्यकता है। सन्त-महात्माओं की समुन्नति का प्रधान कारण यही सरल-हृदयता है, उनका मानसरोवर सदा स्फटिक की नाई शुद्ध रहता है और उनमें प्रेम, पवित्रता और प्रकाश के पुष्प प्रफुल्लित रहते हैं। जिस प्रकार एक बच्चा पूर्णरूपेण अपने को पिता के प्रति समर्पित कर देता है, अपने हृदय की कोई भी बात उससे गुप्त नहीं रखता, ठीक इसी प्रकार सन्त जन अपना भगवान् के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण कर देते हैं।
जो भगवान् के साथ अपनी एकता अनुभव करना प्रारम्भ कर देते हैं, वे सर्वथा निर्भय हो जाते हैं और सदा ऐसा प्रतीत होता है कि मंगलमय भगवान स्वयं उनकी रक्षा के लिए कटिबद्ध हैं। सच्चे सन्त अगर डरते हैं तो केवल भगवान् से। संसार की अन्य कोई भी ताकत उनकी आवाज को दबा नहीं सकती संसार की समस्त शक्तियाँ यदि एक ओर हो जाएं तब भी वे पराभूत नहीं किये जा सकते। इस असीम साहस और निर्भयता का स्रोत भगवान् ही हैं। जिन सन्त महात्माओं के जीवन में बिल्कुल समता की दृष्टि आ जाती है, पशु पक्षी तक भी उन्हें स्नेह की दृष्टि से देखने लगते हैं। किसी वस्तु से डरने का तात्पर्य यही है कि हम उसके साथ अपनी एकता अनुभव नहीं करते और और उसमें सत्य सनातन भगवान का अंश नहीं देखते।
जादू के खेल इन पंक्तियों के पाठकों ने अनेक बार अवश्य देखे होंगे। इन खेलों को देखकर सभी को आश्चर्य कौतुहल होता है। जैसे-जैसे ज्ञान का प्रकाश बढ़ता है वैसे-वैसे लोगों को समझ में यह आता जाता है कि यह खेल है। इसका आधार हाथ की सफाई और चतुरता है। परन्तु फिर भी ऐसे अनेक लोग हैं जो जादू के खेलों में भी किसी भूत प्रेत का, देवी देवता का या सिद्धि साधना का आधार देखते हैं। प्रशिक्षित, अनजान, भोले भाले, छल−छिद्रों के वातावरण से दूर रहने वाले, ग्रामीण ही नहीं, पढ़े लिखे शहरी और अपने को शिक्षित कहने वाले लोग भी भ्रम में पड़ जाते हैं और वे इन खेलों में किसी अदृश्य सत्ता का हाथ देखने लगते हैं।
अपरिपक्व बुद्धि के नवयुवक एवं अंध विश्वास के वातावरण में पले हुए तथा अदृश्य देवी देवताओं पर अधिक भरोसा करने वाले वयोवृद्ध लोग विशेष रूप से इन कौतुहलों से प्रभावित होते हैं। हमें भी अपने जीवन के प्रारंभिक दिनों में ऐसे ही वातावरण में होकर गुजारना पड़ा है। बालकपन में गाँव में बाजीगरों के अनेकों प्रकार के खेल हमने देखे थे। हमारी जन्मभूमि खुश हाल लोगों की बड़ी बस्ती में है, वहाँ भिक्षुक वृत्ति के लोग बहुत आया करते थे। रीछ वाले, बन्दर वाले, नट, बाजीगर, गवैये, स्वाँगिये, रासधारी, बाबाजी जैसे लोगों का ताँता लगा ही रहता था। उनके अनोखे-अनोखे चरित्र बड़ा कौतुहल उत्पन्न करते थे।
इन सब को देखने में हमें बड़ा रस आता था। बाजीगरों के खेल इन सब में विशेष रूप से प्रिय लगते थे क्योंकि उनमें रहस्य छिपे रहते थे। मनुष्य का स्वभाव छिपी हुई बातों को, रहस्यमय भेदों को, जानने के लिए विशेष रूप से उत्सुक होता है। जादूगर के तमाशे ऐसे अद्भुत होते हैं कि उनका कारण समझ में नहीं आता। अनहोनी बात जो संसार की साधारण व्यवस्था में आमतौर से दृष्टि गोचर नहीं होती पर जादूगर उन्हें कर दिखाता है। यह असाधारण, अलौकिक प्रदर्शन साधारण बुद्धि को स्तंभित कर देता है। मस्तिष्क उसका कारण ढूंढ़ नहीं पाता और संभ्रम में पड़ा रहता है। हमारी भी यही दशा थी। अपनी अपरिपक्व बुद्धि कुछ निर्णय निकालने में असमर्थ थी। बाजीगर खेल करते समय बीच-बीच में देवी देवताओं का आह्वान करता था और मंत्र पढ़ता था। इससे दर्शक पर यह प्रभाव पड़ता था कि यह अद्भुत बातें देवताओं के अथवा मंत्रों के बल से हो रही हैं। घर आकर जब बड़े बूढ़ों से पूछते तो वह भी “सेबड़े की विद्या” ‘देवी की सिद्धि’। आदि बातें कहते थे। उस समय जादू के रहस्य हमारे लिए एक प्रमुख पहेली थे।
खेल देखने के बाद कभी-कभी मस्तिष्क में विचारों कल्पनाओं और आकाँक्षाओं की घुड़दौड़ मच जाती। यदि यह विद्या हमें आ जाय तो फिर बड़े-बड़े काम किये जा सकते हैं। हाथ में धूल लेकर ऊपर से लकड़ी फिरा कर रुपया बना लिया करेंगे। इस प्रकार दो चार हजार रुपया नित्य बनाये जा सकते हैं। बाजीगर जैसे पिटारी में खरगोश, कबूतर, न्यौला आदि बना देता है वैसे ही हम घोड़े, हाथी, गाय, भैंसे आदि जब चाहें तब बना लिया करेंगे। तरह-तरह की चीजें देवी देवताओं के द्वारा मंगाना और पास की चीजों को गायब कर देना कितनी बड़ी शक्ति है। मित्रों के लिए, स्वजनों और संबंधियों के लिये उनकी जरूरत की चीजें तुरन्त मँगा लिया करेंगे और जो अपने से लड़ाई झगड़ा करेगा उसकी चीजों को जादू के जोर से उड़ा दिया करेंगे। फिर तो चारों तरफ हमारी धाक बँध जायगी, जहाँ जाओ वहीं राजाओं की सी आवभगत होगी। इस प्रकार की अनेकों कल्पनाएं मन में घुमड़तीं पर वे जहाँ की तहाँ रह जातीं। अपने जादूगर बनने का कोई मार्ग समझ में न आता था, कोई उपाय सूझ न पड़ता था।
गाँव के स्कूल की पढ़ाई समाप्त करके आगे की शिक्षा के लिए शहर में आना पड़ा। वहाँ भी कई बार एक से एक आश्चर्यजनक खेल देखे। देहाती फूहड़ बाजीगरों की अपेक्षा इन शहरी सफेदपोश जादूगरों के खेल और भी अधिक आकर्षक होते थे। बचपन की अटपटी कल्पनाएं तो अब न उठती थीं इतना तो समझ में आ गया था कि यह सब बनावटी बातें हैं परन्तु तो भी उनके प्रति काफी आकर्षण था, जिस प्रकार जादूगर लोग दूसरों को आश्चर्य में डालकर अपना सिक्का जमाते हैं, वैसी स्थिति प्राप्त करना भी कुछ कम आकर्षक न जँचता था। मन में यह इच्छा उठा करती थी कि किसी प्रकार “जादूगरी विद्या” सीख पाते तो बड़ा अच्छा होता।
इच्छा में बल शक्ति है। वह ऐसे ही अवसर प्रस्तुत करती रहती है जिस में अभीष्ट वस्तु प्राप्त हो सके। जादूगरों और बाजीगरों से संपर्क स्थापित करने की दिशा में कदम उठाया गया। वे लोग अपनी भेद रोजी का रहस्य प्रकट करके अपना व्यापार नष्ट करने के लिए आसानी से तैयार नहीं होते। अपने भेदों को बड़ी सावधानी से छिपाये रहते हैं। उन लोगों के इन मनोभावों के कारण सफलता बड़ी कठिनता से, बहुत धीरे-धीरे काफी धन खर्च करने और शिष्यत्व स्वीकार करके अत्यन्त विनम्र सेवा चाकरी करने पर मिली। थोड़ा-थोड़ा करके स्कूली शिक्षा में साथ-साथ पाँच वर्ष में जादूगरी भी सीख ली इन खेलों के सीखने में लगभग एक हजार रुपया हमें खर्च करना पड़ा और इतना समय लगाना पड़ा जिससे शिक्षा में काफी बाधा पड़ी, एक वर्ष तो फेल होते-होते ईश्वर की कृपा से ही बच गये।
जो खेल हमने सीखे हैं। उनकी संख्या इन पृष्ठों पर लिखे हुए खेलों की अपेक्षा अनेक गुनी है। उन सब को लिख कर इस महंगाई के समय में अधिक कागज खर्च करने की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। उनमें से कितनों ही की तो याद भी नहीं रही है कितने ही ऐसे हैं जो इन पृष्ठों पर लिखे हुए खेलों के आधार पर ही होते हैं। केवल वस्तुएं बदल जाती हैं, जैसे अँगूठी गायब करके बक्स के अन्दर से निकालना, और रुपया गायब करके लिफाफे में से निकालना यह दो खेल देखने में अलग-अलग दिखाई पड़ते हैं पर तरीका एक है। एक-एक तरीके से वस्तुएं बदल-बदल कर सैंकड़ों खेल बनाये जा सकते हैं। इस प्रकार दस पाँच तरीकों के आधार पर ही हजारों खेल दिखाये जा सकते हैं। इतना विस्तार करने का न तो हमें समय है और न पाठकों को लाभ। इन पृष्ठों को लिखने का केवल मात्र हमारा प्रयोजन यह है कि जिन लोगों को जादूगरी के खेलों को देख कर विशेष कौतुहल होता है और जो उनका ठीक कारण न जानने के कारण मन में गलत धारणाएं स्थापित करते हैं उनका भ्रम निवारण हो सके। अपरिपक्व अवस्था में हम स्वयं जितने इस दिशा में आकर्षित हुए थे, इसके आधार पर बड़ी-बड़ी निराधार कल्पनाएं करने लगे थे, तथा सीखने में बहुमूल्य समय एवं इतना धन व्यय करने को उद्यत हुए संभव है अन्य व्यक्ति इसी प्रकार लालायित हों उनकी उत्सुकता को शान्त करने के लिए यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं। हमारे पास प्रतिदिन सैंकड़ों पत्र आते हैं, उनमें से नित्य अनेक पत्र ऐसे आते हैं जिनमें जादूगरी और योग का क्या संबंध है इस विषय में जिज्ञासा प्रकट की जाती है कितने ही पाठक इन खेलों को सीखने की उत्सुकता प्रकट करते हैं ऐसे लोगों की उत्सुकता इन पृष्ठों को पढ़ने से दूर हो जायगी।
जादूगरी के खेलों में छल प्रधान है। हर एक खेल इस मनोवैज्ञानिक तथ्य पर निर्भर है कि इससे मनुष्य को धोखे में डाला जा सकता है। कोई व्यक्ति कितना ही चतुर तार्किक एवं होशियार क्यों न हो उसमें कुछ न कुछ विश्वास का अंश होता ही है। इस विश्वास के छोटे अंश के साथ ही छल किया जाता है और दर्शक भ्रम में पड़ जाते हैं। किसी खेल को दिखाते समय जादूगर मोटे तौर पर संदेह निवारण करा देता है, दर्शक उतने से ही सन्तुष्ट हो जाता है और अधिक गहराई में नहीं जाता, बस उसी भूल से लाभ उठा कर जादूगर अपने करतब करता है और अपनी सफलता पर प्रसन्न होता है। यदि दर्शक बिल्कुल अविश्वासी बन जावे और जरा भी विश्वास न करे हर चीज की तलाशी ले, तो सारी जादूगरी धूलि में मिल सकती है। चुनौती देकर एक भी खेल कोई आदमी नहीं दिखा सकता।
इन खेलों को दिखाने से मनुष्य का स्वभाव धोखा देने का, छल करने का और दूसरों के विश्वास का अनुचित लाभ उठाने का अभ्यास पड़ता है। यह बातें धीरे-धीरे स्वभाव में शामिल हो जाती हैं, जिससे मनुष्य का सदाचार चरित्र बल, नैतिकता, सात्विकता, पवित्रता, सरलता एवं सद्भाव नष्ट होता है। तेजाब को शरीर के किसी भी भाग में कितनी ही कम मात्रा में प्रयुक्त क्यों न किया जाय वहाँ हानि पहुँचाये बिना नहीं रह सकता। इस प्रकार छल चाहे मनोरंजन के लिए ही क्यों न किया जाय उसके मन में आने से आत्मिक पतन ही होता है। इसलिए अखंड ज्योति के पाठकों को हमारी यही सलाह है कि वे इन लेखों का रहस्य समझ कर इन की निरर्थकता का अनुभव कर लें, इनकी ओर प्रवृत्ति न बढ़ावें, अब आगे के पृष्ठों पर कुछ खेलों का तरीका बताया जाता है।
पिछले पृष्ठों पर कुछ थोड़े से जादू के खेलों का परिचय कराया गया है। हमने यह बताने की चेष्टा की है कि इन खेलों के पीछे क्या रहस्य छिपा होता है। चूँकि यह विषय पाठकों के लिए बिल्कुल नया है, इस विषय में उनकी पूरी जानकारी प्रायः नहीं के बराबर होगी, ऐसी दशा में पिछले पृष्ठों पर लिखे गये रहस्य उनकी समझ में भली प्रकार आ जावेंगे, इसकी हमें आशा नहीं है। जो विद्यार्थी ज्योमेट्री नहीं जानता उसके लिए कितने ही अच्छे ढंग से लिखी हुई ज्योमेट्री की पुस्तक अपने आप पढ़कर समझ में आ जाय यह कठिन है। उन पर बड़े अच्छे ढंग से लिखी हुई पुस्तकें मौजूद हैं, पर साधारण पाठक उन पुस्तकों को पढ़ कर कुछ विशेष लाभ नहीं उठा सकते। इस प्रकार की शिक्षा अध्यापक के समक्ष उपस्थित होकर प्रश्नोत्तर के साथ विद्यार्थी प्राप्त करता है। अध्यापक उसे प्रत्यक्ष, प्रमाण, उदाहरण के आधार पर समझाता है तब वह पुस्तकों में लिखी हुई शिक्षा विद्यार्थी की समझ में आती है। यही बात जादूगरी के रहस्यों के संबंध में है। हमने शक्ति भर यह प्रयत्न किया है कि खेलों का रहस्य सरल और सुबोध ढंग से लिख कर पाठकों को उनके भेदों को भली प्रकार समझाएं पर हमें यह आशा नहीं है कि पिछले पृष्ठों को पढ़ कर पाठक भली प्रकार उन बातों को समझ गये होंगे। पृष्ठ अधिक न बढ़ने पावें इस बात को ध्यान में रखकर संक्षिप्त ढंग से लिखने का भी ध्यान रखा गया है, ऐसी दशा में कठिनाई और भी बढ़ी है। यदि हर छोटे खेल को समझाने में तीन चार पृष्ठ लिखे गये होते तो संभव था कि पाठकों को समझने में अधिक सुविधा होती पर ऐसी दशा में इतने पृष्ठों पर आठ दस खेल से अधिक न लिखे जा सकते।
इन पंक्तियों को लिखने का हमारा उद्देश्य किसी को जादूगर बनाने को नहीं है, और न हम यह चाहते हैं कि इन पृष्ठों को पढ़ कर कोई व्यक्ति जादू के खेल दिखाने लगे। क्योंकि यह कला झूठ, छल, फरेब और धोखा प्रधान है। कोई खेल ऐसा नहीं है जिसमें यह चारों बातें न हों। मनोरंजन के लिए ही सही पर इन कुवृत्तियों का पोषण किसी भी दशा में उचित नहीं। मन में इनको स्थान मिलने से वे जीवन को अन्य दिशाओं में भी धर दौड़ती हैं और कलुषित तत्वों को एकत्रित कर देती हैं यही कारण है कि इस प्रकार के कारोबार करने वालों का खेल तमाशे दिखाने वालों का आत्मिक जीवन उच्चता की ओर अग्रसर नहीं हो पाता। इन बातों पर विचार करते हुए हम नहीं चाहते कि हमारा एक भी पाठक जादूगर बने। जादू के खेल दिखाकर किसी को भ्रम में डाले या इस प्रकार जीविका उपार्जित करे। इस लिए खेल दिखाने के लिए जितनी विस्तृत जानकारी की आवश्यकता है वह हमने अनावश्यक समझ कर लेखबद्ध नहीं की है। पोल खोलने के लिए संक्षिप्त रूप से लिख देने पर भी काम चल सकता है। पाठकों जादूगरी के फरेब को समझ जाएं यही हमारा उद्देश्य था और उद्देश्य की पूर्ति संक्षिप्त भाषा में वर्णन कर देने से भी हो सकती है यह समझ कर हमने लेखों के रहस्य को संक्षेप में ही लिखा है।
इन पृष्ठों को पढ़कर पाठक यह बात भली प्रकार समझ जावेगा कि जादूगरी का योग या आध्यात्म से कोई संबंध नहीं है। सेबड़े की विद्या मसान सिद्धि, जोगिनी की चौकी, मंत्र की शक्ति आदि भ्रान्त धारणाएं जो जादूगरों के संबंध में फैली हुई हैं, उनका अब नव नारायण की बेला में अन्त होना ही चाहिए। जादूगरों के पास कोई विशेष शक्ति, यह मान्यता बिलकुल भ्रम पूर्ण है। उन्हें कोई भूत पिशाच, देवी देवता, सिद्ध नहीं होता इसलिए पाठकों से हमारा अनुरोध है कि जादू के आकर्षण को मन से बिलकुल निकाल दें। जीव की सच्ची सिद्धि सच्चे योग में है। आत्म शुद्धि करके परमात्मा की समीपता के लिए हमें सच्चे हृदय से कदम बढ़ाना चाहिए। इस मार्ग में एक से एक आश्चर्यजनक सिद्धियाँ अपने आप मिलती हैं। यही कल्याण का मार्ग है।
(महाभारत शाँति पर्व अध्याय 110 से)
क्लिश्यमानेषु भूतेषु तैस्तेर्भावैस्तस्ततः।
दुर्गाणितित द्येन तन्में ब्रुहि पितामह॥
युधिष्ठिरजी ने भीष्मजी से पूछा कि हे पितामह। कष्टों से पड़ा हुआ मनुष्य किस प्रकार विपत्तियों से छुटकारा पा सकता है, उन उपायों को आप मुझे से कहिए।
ये दंभान्नाचरन्तिस्म येषा वृत्तिश्च संयतो।
विषयाँश्च निगृहणन्ति दुर्गाणियति तरन्तिते॥
भीष्म जी ने उत्तर दिया :- हे युधिष्ठर! जो ढोंग नहीं करते, जिनकी वृत्ति संयमित है जो विषयों पर काबू रखते हैं वे दुखों से छूट जाते हैं।
प्रत्याहुनोच्य मानाये न हिसन्ति च हिंसताः।
प्रयच्छन्ति न याचन्ते दुर्गाण्यति तरन्ति ते॥
किसी के निन्दा करने पर भी उसकी निन्दा नहीं करते, स्वयं पीड़ित होने पर भी दूसरों को पीड़ा नहीं देते, कुछ न कुछ औरों को देते हैं परन्तु स्वयं याचना नहीं करते, ऐसे लोग दुखों से छूट जाते हैं।
स्वेषु दोरेणु वतन्ते न्याय वृत्तिमृतावृतौ।
अग्नि होत्रपराः सन्तो दुर्गाण्यति तरन्ति ते॥
जो अपनी पत्नी से सन्तुष्ट हैं, न्याय से कमाया हुआ अमृत रूपी अन्न सेवन करते हैं, अग्निहोत्र परायण हैं (त्याग वृत्ति के हैं) वे कष्टों से तर जाते हैं।
आहवेषु च में शूगस्त्यक्त्वा मरणजं भयम्।
धर्मेण जयमिच्छन्ति दुर्गाण्यति तरन्ति ते॥
जो मृत्यु के भय को त्याग कर वीरों की भाँति जीवन युद्ध में प्रकृति होते हैं और धर्म से विजय पाना चाहते हैं वे कठिनाइयों से पार हो जाते हैं।
ये तपश्च तपस्यन्ति कोमार ब्रह्मचारिणः।
वेद विद्याव्रत स्नाता दुर्गाण्यति तरन्तिते॥
जो अपने को तपस्वी कष्ट सहिष्णु बनाते हैं, कुमार अवस्था से ब्रह्मचारी रहते हैं। नियमपूर्वक सत् विद्याओं की प्राप्ति में प्रयत्नशील रहते हैं वे कष्टों से छुटकारा पा जाते हैं।
ये च संशान्त रजसः संशान्त तमसश्च ये।
सत्वेस्थितामहात्मानो दुर्गाण्यति तरन्ति ते॥
जिनका रजोगुण (मद, तृष्णा, गर्व आदि) तथा तमोगुण (काम, क्रोध, लोभ, मोह) शान्त पड़ गया है, जो सत्वगुण (शम, दम, तितिक्षा आदि) का सेवन करते हैं वे सत्पुरुष दुखों से पार हो जाते हैं।
यात्रार्थ भोजन येवाँ, संतानाथं च मैथुनम्।
वाक् सत्य वचनार्थाय दुर्गाण्यति तरन्ति ते॥
जीवन निर्वाह के लिए जिनको भोजन है, जिह्वा के स्वाद के लिए नहीं। संतान के निमित्त मैथुन करते हैं। विषय वासना के लिए नहीं सत् वचनों के लिए बोलते हैं बकवाद के लिए नहीं ऐसे पुरुष दुखों से तर जाते हैं।
मधु माँसं च य नित्य वर्जयन् तीह मानवाः।
जन्म प्रभृति मद्यज्च दुर्गाण्यति तरन्ति ते॥
जो जीवन भर मद्य, माँस और नशीली चीजों का सर्व प्रकार परित्याग करते हैं वे कष्टों से पार हो जाते हैं।
येन मानित्वमिच्छन्ति मानयन्ति चये परान्।
मन्यमानान्नस्यमयन्ति दुर्गाण्यति तरन्ति ते॥
जो स्वयं मान की इच्छा नहीं करते परन्तु दूसरों को मान देते हैं और सम्माननीय सज्जनों के लिए नवते हैं वे कठिनाईयों को पार कर जाते हैं।
(श्री. महावीर प्रसाद विद्यार्थी, ‘साहित्य-रत्न’)
जिसे खोजता वन-वन में, तू खोज उसे अपने मन में।
मन की शीतल सुरभित कुँजों में मन मोहन रमता है।
जहाँ प्रेम की कालिन्दी का अमृत कल-कल करता है,
लीलामय वह उसी मधुर मधुबन में, करता है क्रीड़ा,
राग रसीला मुरली का वह रोम-रोम में भरता है॥
देख हृदय की आँखों से, प्रतिबिम्ब उसी का जीवन में।
जिसे खोजता वन-वन में, तू खोज उसे अपने मन में॥
कहाँ-कहाँ सुख की मृगतृष्णा मानव को भटकाती है।
यही, यही तो मानव को दानव-सा क्रूर बनाती है,
कौर छीन भूखों के मुँह से यह घर भरती है अपना,
पृथ्वी को कर पाप-रंक मय मन्द-मन्द मुसकाती है॥
फूल, शूल दोनों है चुन ले चाहे जो इस उपवन में।
जिसे खोजता वन-वन में, तू खोज उसे अपने मन में॥
सागर की मँझदार ओर तू नौका अपनी खेता है।
देख, क्षितिज-तल में विनाश तेरा अंगड़ाई लेता है,
दलन दूसरों का करके चाहता पहनना जय-माला,
तुझे ‘अहम्’ के आगे मानव! कुछ न दिखाई देता है॥
ढहकर तेरे महल तुझे ही कर देंगे विनष्ट क्षण में।
जिसे खोजता वन-वन में, तू खोज उसे अपने मन में॥
नव जीवन संचार करे मरु में तेरी जीवन धारा।
‘युक्ताहार विहार बने तेरा पथ-दर्शक ध्रुवतारा
इन्द्रिय भोगों की अतृप्त है तृष्णा अन्ध न हो मानव!
सुखमय वासस्थान बने तेरा यह पृथ्वीतल प्यारा॥
उतर स्वर्ग आएगा भू पर, रस छलकेगा कण-कण में।
जिसे खोजता वन-वन में तू, खोज उसे अपने मन में॥
*समाप्त*