सुहृद्भिराप्तैसकृद्विचारितं
स्वयं च बुद्ध्या प्रविचारितं पुनः
करोति कार्यं खलु पः स बुद्धिमान्
स एव सौख्यं बहुधा समश्नुते॥
मित्रों और बुद्धिमान पुरुषों से बार-बार सम्मति लेकर और स्वयं अपनी बुद्धि से विचार कर जो पुरुष काम करता है वह बुद्धिमान कहलाता है और सदा सुख पाता है।
षड्दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।
निद्रा, तन्द्रा, भयं, क्रोध आलस्यं, दीर्घसूत्रता॥
नींद, तन्द्रा भय, क्रोध, आलस्य और देरी से काम करना, ये छः दोष ऐश्वर्य चाहने वाले पुरुषों को त्यागने योग्य हैं।
षडेव तु गुणाः पुँसा न हातव्याः कदाचन्।
सत्यं दानमनालस्यमनसूया क्षमा धृतिः॥
पुरुषों को इन छः गुणों को कभी न छोड़ना चाहिये- सत्य, दान, आलस्यहीनता, दूसरों में दोष न देखना, क्षमा और धैर्य।
प्राप्यापदं म व्यथते कदाचित्
उद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः।
दुःखं च काले सहते महात्मा
धुरन्धरं तस्य विपद्विनश्येत॥
विपत्ति अपने पर कमी दुःखी न हो, बल्कि सावधान होकर उसके टालने का उद्योग करे। जो महात्मा समय पर दुःख सह लेता है वह संसार के भार को सहन कर सकता है, और उसकी विपत्ति भी नष्ट हो जाती है।
तावद्भयेन भेतव्यं यावद्भयमनागतम्।
आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशंकया॥
जब तक भय नहीं आवे तभी तक उससे डरना चाहिए, भय उपस्थित होने पर तो निश्शंक मन से उस पर प्रहार करना उचित है।
न यस्य चेष्टितं विद्यात् न कुलं न पराक्रमम्
न तस्य विश्वसेत् प्राज्ञों यदीच्छेच्छ्र यआत्मन्।
जिसकी चेष्टा, कुल और पराक्रम न मान्य हों, बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि यदि अपना कल्याण चाहे तो उसका कभी विश्वास न करें।
अत्यादरो भवेद्यत्र कार्य-कारण-वर्जितः।
तत्र शंका प्रकर्तव्या परिणामेऽसुखावहा॥
जहाँ बिना कारण अत्यन्त आदर हो, वहाँ परिणाम में दुःख होने की शंका करनी चाहिये। क्योंकि बिना मतलब कोई खुशामद नहीं करता।
असती भवति सलज्जा
क्षारं नीरं च निर्मलं भवति।
दम्भी भवति विवेकी
प्रियवक्ता भवति धूर्तजनः।
कुलटा स्त्री लज्जावन्ती बनती है, खारा पानी साफ और ठण्डा होता है, पाखंडी आदमी विवेकी बनता है और मधुर बोलने वाला प्रायः धूर्त्त होता है।
ये वै भेदनशीलास्तु सकामा निस्त्रया शठाः।
ये पाप इति विख्याताः संवासे परिगर्हिताः॥
जो भेद कराने वाले, मतलबी, निर्लज्ज, दुष्ट और पापी हैं, उनका साथ कभी न करना चाहिए।
देशाटनं राजसभा वेशनं शास्त्रचिंतनम्।
वैश्यादिसंगतिं विद्वन्मैत्रीं कुर्यादतन्द्रितः॥
देशान्तरों में भ्रमण, राजसभा में जाना, शास्त्रों का विचार करना, वैश्यों से संगति और विद्वान से मित्रता, ये बातें आलस्य छोड़ कर करनी चाहिए।
देशाँतरेषु बहुविधभाषावेषादि येन न ज्ञातम्।
भ्रमता धरणीपीठे तस्य फ लं जन्मानो र्व्यथम्।
जिसने देशान्तरों में जाकर अनेक प्रकार की भाषा और वेषादि का ज्ञान न प्राप्त किया, पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए उस मनुष्य का जन्म व्यर्थ है।
हमारे चारों ओर साम्प्रदायिक गुण्डेपन की बाढ़ सी आ गई है। घटनाओं का उल्लेख इन पंक्तियों में करने की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। क्योंकि हर जगह इन दिनों नृशंस आततायीपन की घटनाएं घटी हैं और घट रही हैं दुधमुँहे बालक, कलिका सी बालिकाएं, करुणा की मूर्ति माताएं, शय्या सेवी वृद्धोवृद्ध, रोगी, असमर्थ तथा सर्वथा निर्दोष व्यक्तियों की बड़ी भारी संख्या में निर्मम हत्याएं हुई हैं। इस पैशाचिकता को देखकर रावण, कंस और हिरण्यकश्यपु तो क्या साक्षात शैतान को भी अपनी तुच्छता माननी पड़ी है। गुण्डों ने आततायीपन में उन सबको मात कर दिया है।
हत्या, लूट, अग्निकाण्ड, अपहरण बलात्कार की धूम मचाने वाले आततायी बाजारों में मूछों पर ताव देते हैं। हत्या के समय छटपटाते हुए प्राणियों का दृश्य देखकर उनका कलेजा ठंडा होता है, अग्निकाण्ड की आतिशबाजी से मनोरंजन होता है। अपहरण और बलात्कार की मौज से उनकी बाँछें खिल उठती हैं। लूट में तो अब की बार उनके हाथों ऐसी फसल लगी है कि पीड़ियों तक के लिए वे निश्चिन्तता अनुभव करते हैं। इससे बड़ा, इतने अधिक लाभों वाला व्यवसाय भला और क्या हो सकता है? इस लाभ को वे तब तक नहीं छोड़ सकते, जब तक उन्हें कोई शक्ति छोड़ने के लिए मजबूर न कर दे।
दुर्भाग्य से भारत की राजनीति में कुछ समय से ऐसा दौर आया है कि उसमें गुण्डेपन को प्रोत्साहन दिया गया है। सन् 1921 से लेकर 1947 तक कांग्रेस ने विविध मोर्चों पर अंग्रेजी सरकार से लड़ाई लड़ी। सरकार ने इस लड़ाई को विफल बनाने के लिए साम, दाम, दंड के अतिरिक्त भेद नीति से भी खूब काम लिया। साम्प्रदायिक वैमनस्य को प्रोत्साहन देना उसकी नीति थी। इस कार्य के लिए दोनों ही जाति के गुण्डों को उकसाया जाता था। साधारण जनता में हिन्दू मुसलिम द्वेष का कोई आधार न था तो भी यह गुण्डे कोई न कोई बहाना लड़ने के लिए निकाल लेते थे और झगड़ा करा देते थे। रिश्वतखोर अफसरों के लिए यह झगड़े चाँदी बटोरने के स्वर्ण अवसर सिद्ध होते थे, इसलिए भी वे उन्हें पालते पोसते रहते थे।
उधर लीगी नेताओं ने साम्प्रदायिक वैमनस्य का धुआँधार प्रचार किया। राजनैतिक महत्वाकाँक्षाओं के लिए उन्होंने गुण्डेपन को उकसाया। उन्होंने औरंगजेब, नादिरशाह और चंगेज खाँ के दृश्य उपस्थित कर देने की धमकी दी। इशारा मिलने की देर थी, देश भर में मुट्ठी भर बदमाशों ने औरंगजेबी कत्लेआम के दृश्य उपस्थित कर दिये। यह दृश्य इतने भयानक हैं कि छुटकारा पाने के लिए पाकिस्तान मंजूर कर लेना पड़ा।
आज की स्थिति-
इतना सब हो जाने के बाद आशा थी कि विभाजन के बाद शान्ति स्थापित हो जायगी। पर वह आशा सफल होती नहीं दीख रही है। कारण यह है कि जनता के रोष, क्रोध और भावों पर तो काबू करना सहज है पर विजयोन्मत्त गुण्डों को एक बार सिर चढ़ा लेने के बाद उन्हें रोकना कठिन है। नोआखाली की प्रतिक्रिया बिहार में हुई, उसे दमन एवं प्रचार से एक सप्ताह में रोक दिया गया। पर पाकिस्तानी प्रान्तों में आज जो हो रहा है, वह हम सबके सामने है। उसे रोकना आसान नहीं है।
गुण्डेपन की वृद्धि देश के लिए एक भारी संकट है। बाहरी शत्रु के आक्रमण की अपेक्षा आन्तरिक शत्रुओं का हमला अधिक भयंकर होता है। आज आततायियों को आश्रय मिल गया है। उनकी पीठ ठोंकी जा रही है। वे अपनी जाति वालों से प्रोत्साहन, सहायता और सम्मान प्राप्त कर रहे हैं। यदि अनियंत्रित गुण्डापन रोका न गया तो इस देश को घोर दुर्भाग्य पूर्ण अन्धकार के दलदल में फंसना पड़ेगा। इसमें न हिन्दुओं का भला होगा न मुसलमानों का।
साम्प्रदायिक लड़ाई के प्रत्यक्ष आधार फिलहाल समाप्त हो गये हैं। लीग ने जो माँगा था उनकी मुँह माँगी मुराद पूरी हो गई। दोनों पक्षों ने बटवारा मंजूर कर लिया। फिर सीधी कार्यवाही क्यों चालू रहनी चाहिए? यदि कोई और महत्वाकाँक्षा शेष हो तो उसको पूरा करने के दूसरे तरीके हो सकते हैं। कई बार लड़ना जरूरी हो जाता है तो लड़ते भी हैं परन्तु लड़ाई में भी मनुष्यता और नैतिकता के नियम बरते जाते हैं। लड़ने वाले आपस में लड़ते हैं पर शत्रुओं के स्त्री बच्चों के साथ नृशंसता नहीं बरती जाती। आज की गुण्डागीरी तो मनुष्य जाति के लिए अभिशाप है। रास्ता चलते ही परदेशी की बगल में छुरा मार कर भाग जाना, असहाय स्त्री बच्चों के टुकड़े-2 कर देना, अल्पसंख्यकों का कत्लेआम करना, उनकी सम्पत्ति को भस्म कर देना ऐसा तो बर्बर जातियों में भी नहीं होता। इन कुकृत्यों से यदि किसी को कोई सफलता मिल भी जावे तो वह न तो अधिक दिन ठहर सकती है और न उससे कोई सुख शान्ति पा सकता है।
जो लोग आज पैशाचिक कृत्यों के लिए गुण्डों को उकसा रहे हैं, बढ़ावा दे रहे हैं वे भली प्रकार समझ लें कि इस प्रकार आस्तीन में पाले हुए साँप एक दिन उन्हें भी डसेंगे। हत्यारे नर पिशाचों का कोई धर्म नहीं, कोई मजहब नहीं, कोई जाति नहीं। जो चीत्कार करती हुई करुणामयी माता की गोद से उसके लाल को छीनकर छुरे से गोद डाल सकता है, बालिकाओं स्त्रियों के टुकड़े-2 काटते हुए मनोरंजन अनुभव करता है, ऐसा नर राक्षस धर्म और जाति से हजारों कोष दूर है। वह आज दूसरी जाति वालों के साथ जो व्यवहार करता है कल किसी भी छोटे मोटे स्वार्थ के लिए ऐसे ही कृत्य अपने जाति वालों के साथ करेगा। जिस बाघ की डाढ़ में मनुष्य के खून का चस्का लग जाता है वह सदा आदमी के मांस की तलाश में रह जाता है और जब तक मर नहीं जाता मनुष्यों का शिकार करता रहता है। यह नरभक्षी आततायी दूसरी जाति वालों को ही सतावेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं। चोरी, डकैती, लूट, हत्या में जिनकी डाढ़ लपक गई है वे अच्छे नागरिक और अच्छे पड़ौसी की तरह भविष्य में रह सकें यह मुश्किल है। ऐसे लोग जहाँ भी रहेंगे वहीं संकट उत्पन्न करेंगे।
इस आततायीपन को रोको-
गुण्डागीरी को रोकने के लिए दो बातें आवश्यक हैं। (1) मजबूत सरकार की कठोर नीति (2) जनता में गुण्डों के प्रति घोर घृणा और उनके दमन का दृढ़ निश्चय। बिना जातीय भेद भाव के ऐसे नर पिशाचों का दमन किया जाना चाहिए। पिछले दिनों मेवस्तान आदि के उपद्रवों को रोक सकने में पं. नेहरू ने इस लिए असमर्थता प्रकट की थी कि- उनके हाथ सीमित सत्ता है। पर अब तो वैसी बात नहीं है। हिन्दू मुसलिम एकता बड़ी अच्छी चीज है, पर वह इस तरह नहीं हो सकती कि किसी जाति के गुण्डों के साथ रिआयत का ढिलाई बरती जाय। रिआयत को गुण्डे कभी उदारता नहीं समझते वरन् इसे दूसरे पक्ष की कमजोरी और अपनी हेकड़ी कर स्वाभाविक परिणाम मानते हैं। इससे उनके हौसले बढ़ते हैं और वे दुगने उत्साह के एकता को नष्ट करने वाले काम करते हैं। सरकार को इस दिशा में अत्यन्त कठोर होना चाहिए।
जनता अक्सर गुण्डों का विरोध करते हुए डरती है। उसे भय होता है कि विरोध करने पर वे क्रुद्ध होकर आक्रमण न कर बैठें। यह कमजोरी अत्यन्त घातक तथा दुष्टता को बढ़ाने वाली है। इस कमजोरी को जितनी जल्दी निकाला जा सके उतना ही अच्छा है। उनका संगठित विरोध होना चाहिए। जो लोग उन्हें प्रोत्साहन एवं सहयोग करें उनकी भी खबर ली जानी चाहिए। महात्मा शेखसादी कहा करते थे कि जो “जो साँप को तरह देता है वह इन्सानों के साथ दुश्मनी करता है।” आततायियों को न तो तरह दी जानी चाहिए और न उनसे डरना चाहिए। उनके विरुद्ध निर्भय होकर गवाही देनी चाहिए और राजदंड दिलवाने की पूरी-पूरी कोशिश करनी चाहिए। इस संबंध में प्रत्येक नागरिक को एक सच्चे पुलिस मैन की तरह उत्साह दिखाना चाहिए। यदि सामूहिक रूप से जनता गुण्डागीरी के विरुद्ध जहाद बोल दे, डरना और तरह देना छोड़ दे तो आततायीपन का बहुत जल्द अन्त हो सकता है।
एक बात स्पष्ट है कि हमें आततायीपन का जवाब स्वयं आततायी बन कर किसी भी दशा में नहीं देना है। अत्याचार के विरुद्ध हर संभव उपाय से लड़ना और उसका अन्त करना वीरो चित्त मार्ग है। गुण्डों को उनकी करनी का मजा चखाने के लिए हर वैध उपाय काम में लाया जा सकता है। परन्तु यह कार्य स्वयं भी आततायी बनकर नहीं किया जा सकता। कोई हमारे स्त्री बच्चों का वध करता है तो आत्मरक्षा के लिए उस वधिक का जिस तरह भी मुँह तोड़ा जा सके उचित है, पर उसके स्त्री बच्चों से या उसकी जाति के अन्य निरपराधों को सताया जाना किसी प्रकार उचित नहीं। कैसी ही उत्तेजनाजनक स्थिति सामने क्यों न आवे, विवेक और मनुष्यता को हाथ से नहीं जाने देना है। बिना खुद आततायी बने भी आततायियों का मुकाबला किया जा सकता। निर्भयता, साहस, बहादुरी एवं संगठन की शक्ति इतनी महान है कि उससे गुण्डेपन को आसानी से परास्त किया जा सकता है।
यह गुण्डे न केवल नृशंसता पूर्वक धन जन की हानि कर रहे हैं वरन् आई हुई स्वतंत्रता को हाथ से निकल जाने देने और लम्बे काल तक देश को भारी दलदल में फंसा देने का आयोजन कर रहे हैं। विदेशों को शोषक शक्तियाँ यही चाहती हैं कि यह देश साम्प्रदायिक गृह युद्ध का अखाड़ा बन जाय फलस्वरूप उसे अप्रत्यक्ष रूप से, नई तरह की गुलामी के बन्धनों में पुनः कस लें और मनमाना शोषण करें। इन चालों को सफल बनाने में यह गुण्डाशाही मैदानी मोर्चा लड़ रही है। इसे विफल न किया गया तो जीती बाजी हाथ से निकल जायगी।
पाकिस्तानी प्रान्तों से अत्याचारों की रोमाँचकारी खबरें आ रही है। उन्हें सुनकर भी हमें अपना विवेक न खोना चाहिए। इन प्रान्तों के असहाय बन्धुओं की रक्षा के लिए भारतीय सरकार और भी अधिक जोरदार कदम उठावे इसके लिए उस पर दबाव डालना चाहिए साथ ही उसे मजबूत बनाने के लिए हर प्रकार का सहयोग भी करना चाहिए। जनता द्वारा जनता से बदला लिया जाना अदूरदर्शिता है। यह कार्य सरकार को ही करना चाहिए। भारतीय सरकार पाकिस्तानियों को इसके लिए विवश करे कि वह अपने क्षेत्र की गुण्डागीरी रोकें अन्यथा ढील देने का दुष्परिणाम उसे भुगतना पड़ेगा।
हमें अपने अन्दर छिपे हुए उस पौरुष एवं पराक्रम को जागृत करना होगा जिससे गुण्डेपन का मुँह कुबला जाता है। आइए, मनुष्यता मातृभूमि इज्जत आबरू एवं जान माल अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अपने सोये हुए शौर्य को जागृत करें।
को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यद नस्था विर्भार्त। भूभ्या असुरसृगात्माक्वस्वित्को विद्वाँ- समुपगात्प्रष्टुमेतत्।
ऋग् 1/164/4
(यत्) जिसको (अनस्था) अस्थिरहित अभौतिक (विभर्ति) धारण करता है, उस (प्रथमम्) आदि (जायमानम्) उत्पन्न होने वाले को (कः) कौन (ददर्श) देखता है? ये (असुः) प्राण तथा (असृक) रुधिर तो (भूभ्याः) भूमि से, प्रकृति से होते हैं। (आत्मा) आत्मा (क्वस्वित्) कहाँ है? (सतत्) इस तत्व को (प्रष्टुम्) पूछने के लिए (कः) कौन (विद्वाँसम्) विद्वान के (उपगात्) पास जाता है?
ढूँढ़ने में, खोज करने में, रहस्य पता लगाने में मानव बुद्धि बड़ी आतुर रहती है। प्रकृति के सूक्ष्म तत्वों की विज्ञान शालाओं में खोज हो रही हैं, परमाणु की सूक्ष्म गतिविधियों का, शक्तियों का पता लगाने के लिए भारी प्रयत्न हो रहे हैं। इन खोजों के परिणाम स्वरूप नित्य नये आश्चर्यजनक आविष्कार सामने आ रहे हैं। यह प्रयत्न हर दिशा में चल रहे हैं। आरोग्य शास्त्र की शोध हो रही हैं, शिल्प के भेद प्रभेदों को मालूम किया जा रहा है, आकाश स्थित ग्रह नक्षत्रों की गति विध का पता लगाया जा रहा है, पृथ्वी के गर्भ में छिपे हुए खनिज पदार्थों को ढूँढ़ा जा रहा है, समुद्र को छान छान कर उसके अन्दर छिपे हुए पदार्थों को तलाश किया जा रहा है। हिमि से अच्छादित ध्रुवों की, आकाश चुम्बी पर्वत शिखरों की शोध हो रही है। गणित, भूगोल, इतिहास, पुरातत्व, रसायन, मनोविज्ञान आदि विविध दिशाओं में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त की जा चुकी है और उससे आगे की जानकारी प्राप्त करने के लिए मनुष्य जाति बड़ी बेचैनी के साथ लगी हुई है।
विविध रहस्यों का पता लगाने के लिए मानव बुद्धि छटपटा रही है। अगणित स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय खुले हैं जिनमें लाखों अध्यापक पढ़ाते हैं और करोड़ों छात्र पढ़ते हैं। इन शिक्षा संस्थाओं में एक बड़ी जन संख्या पूछने और बताने के लिए एकत्रित होती है। छात्रों की जिज्ञासा का अध्यापक लोग समाधान करते हैं। प्रकृति के विविध विषयों पर चर्चाएं होती हैं। अशिक्षित, जानकारी से रहित बालक जानकार और विद्वान होकर निकलते हैं। इस आयोजन में समय, शक्ति और धन को प्रचुर मात्रा में लगाया जाता है।
नित्य करोड़ों की संख्या में छपने वाले अखबार जनता के इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए निकलते हैं कि ‘आज संसार में क्या हो रहा है?’ पत्र पत्रिकाओं का, पुस्तक पुस्तिकाओं का भारी प्रकाशन, जन साधारण की जिज्ञासाओं का समाधान करने के लिए होता है, प्रवचनों द्वारा, व्याख्याओं द्वारा, सत्संगों द्वारा, वे जानकारियाँ प्रकट की जाती हैं, जिनको जानने की मनुष्य की इच्छा है। वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास एवं धर्मग्रन्थों को निर्माण भी इसी प्रयोजन के लिए हुआ है। “ हम जानना चाहते हैं,” इस इच्छा के कारण ही जानकारी के विविध साधनों का निर्माण हुआ और हो रहा है। आपसी वार्तालापों का प्रयोजन भी यही होता है। एक मनुष्य दूसरे की जानकारी बढ़ाने के लिए ही कुछ कहता है और कोई किसी की बात इसी दृष्टि से सुनाता है। बिना किसी कारण के कोई वार्तालाप या तो होता ही नहीं यदि होता है तो उसके लिए अरुचि एवं उपेक्षा व्यवहृत होती है।
यह सब बातें हमें बताती हैं कि मनुष्य को जानने की बड़ी आकाँक्षा है, जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त, सदैव यह जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रयत्न शील रहता है। कभी उससे अघाता नहीं, कभी उससे थकता नहीं। यह भूख ऐसी है जो कभी तृप्त ही नहीं होती। पूछने और जानने की रुचि कभी मन्द ही नहीं पड़ती।
इतना सब होते हुए भी एक सबसे बड़ी, सबसे आवश्यक समस्या की ओर हम ध्यान नहीं देते और उसके संबंध में पूछने का प्रयत्न नहीं करते। उसकी ओर वेद भगवान हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं। ऋग्वेद का उपरोक्त मंत्र पूछता है कि उस आदि से उत्पन्न हुए, अस्थिरहित अभौतिक आत्मा को कौन देखता है? मनुष्यों! बताओ तो सही, तुममें से उसे कौन देखता है? विविध प्रकार के दृश्यों को, पदार्थों को तुम बड़ी रुचि पूर्वक देखते हो पर उस आत्मा को क्यों नहीं देखते? अपने आपको- अन्त में मुँह डालकर देखने का प्रयत्न क्यों नहीं करते? यदि कहो कि मैं अपने को देख तो रहा हूँ, यह शरीर मुझे दिखता तो है। तो यह उत्तर ठीक नहीं, क्योंकि यह प्राण वायु, रुधिर आदि का शरीर तो पृथ्वी आदि पंच तत्वों से बना हुआ है। तत्व अचेतन हैं उनमें चेतना शक्ति विचार, ज्ञान, जिज्ञासा, इच्छा शक्ति कहाँ से आई? यह शरीर आत्मा कहाँ है? जो इस शरीर से भिन्न है, वह कैसा है? कौन है? कहाँ है? इस तत्व को पूछने के लिए हममें से कौन- विद्वानों के पास जाता है? वेद भगवान इस मंत्र में उसको तलाश करते हैं जो आत्मा को पूछने विद्वानों के पास जाता है।
अपनी प्रिय वस्तु को सभी तलाश करते हैं। वेद भी अपने प्यारे की तलाश करते हैं। वे उसको ढूँढ़ते हैं जो आत्मा ज्ञान की चर्चा करने के लिए विद्वानों के पास जाते हैं क्योंकि ऐसे ही सच्चे जिज्ञासु वेद को पहचानते हैं, और प्राप्त करते हैं। जिसका जिस पर सच्चा प्रेम होता है, वह उसे प्राप्त होकर रहता है। भक्त भगवान को अपना आत्म समर्पण करता है, इसलिए भगवान भी भक्त को अपना आत्म समर्पण कर देते हैं। जो साँसारिक वस्तुओं की ही जानकारी में नहीं उलझा रहता, वरन् आत्मज्ञान के लिए विद्वान के पास जाता है, ऐसा जिज्ञासु वेद का वास्तविक भक्त है। सच्चा भक्त है। ऐसे भक्त को छाती से लगा लेने के लिए बाहु पसार कर वेद भगवान पुकारते हैं- वह कौन है? जो आदि में उत्पन्न हुए, अस्थिरहित, अभौतिक आत्मा को देखता है? वह कौन है? जो आत्मा तलाश करके विद्वान के पास जाता है? जो ऐसा हो वह आवे, उसकी मुझे तलाश है, उसे मैं छाती से लगाऊँगा। अपना सारा मर्म उसके अन्तस् में उड़ेल दूँगा। जो ऐसा जिज्ञासु हो, आगे बढ़कर आवे और भगवान के गले लग जाय।
ऐ दुनिया वालो, तुम बहुत पूछते हो तरह-2 की बातें जानने के लिए विद्यालयों में, सभाओं में, गोष्ठियों में जाते हो, विविध प्रकार से पढ़ते और सुनते हो, पर यह सब होता भौतिक, नश्वर, बाह्य संसार के बारे में ही है। कभी अपने आपके बारे में आत्मा के बारे में न तो किसी दूसरे से पूछते हो न अपने आपसे विचार करते हो। यह बड़े खेद की बात है। काजी जी शहर के अंदेशों से दुबले हुए जा रहे हैं पर अपने घर की खबर ही नहीं। शरीर क्षय से घुल रहा है, उसकी चिन्ता न करके पोशाकों की डिजाइनें पसन्द करने की माथा पच्ची करना कौन बुद्धिमानी है। आवश्यक कार्य की उपेक्षा करके साधारण कामों में जो उलझा रहता है, उसे बाल बुद्धि वाला कहा जाता है। उपनिषद्कार को ऐसे ही बाल बुद्धि वालों की अधिकता देख कर बड़ी निराशा और आश्चर्य होता है। कठोपनिषद् कहती है-
“श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोपि वहवो यन्न विधुः। आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लव्धाऽऽश्चर्या ज्ञाता कुशलानु निष्टः॥”
इस आत्मतत्व को बहुत से तो सुनते ही नहीं, बहुत से इसे सुनते हैं पर समझते नहीं, बहुत से सुनते, समझते हैं पर उसे प्राप्त नहीं करते। उसे वस्तुतः कहने वाले, सुनने वाले और प्राप्त करने वाले कुशल, बुद्धिमान कोई विरले ही होते हैं।
अपनी भूखी-प्यासी भौडडडडडड को बाड़े में बन्द करके, आकाश में उड़ने वाली पतंगों को गिनने वाले मनचले बालकों की तरह लोग तरह-2 की जानकारी प्राप्त करने में, बातें पूछने में तन्मय हो रहे हैं। पर ऐसे कुशल, चतुर कोई विरले ही होते हैं जो विद्वान के पास यह पूछने जावें कि वह आत्मा कैसा है? उसे प्राप्त कैसे करे? जो ऐसे कुशल हैं वेद भगवान उन्हें ही ढूँढ़ते हैं। उन्हें ही पूछते हैं, उन्हीं का पता लगाते हैं।
आत्म ज्ञान, सर्वोपरि ज्ञान है। इसके द्वारा ही सुख शान्ति के दर्शन होते हैं, इसी के द्वारा जन्म मरण की फाँसी कटती है, इसी से, स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति होती है। इसी से भगवान मिलते हैं। जीवन की पूर्णता, सफलता इस आत्म ज्ञान पर ही निर्भर है। इसलिए वृहदारण्यक उपनिषद् ने कहा है-
“आतमा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिव्यासितव्यो..........”
अरे! ओ!! इस आत्मा को देखो, इस आत्मा को सुनो, इस आत्मा का मनन करो, इसी का निदिध्यासन करो।
बाहरी ज्ञान कितना ही क्यों न इकट्ठा कर लिया जावे पर उससे आत्म कल्याण नहीं हो सकता, कानून, चिकित्सा, इंजीनीयरिंग, रसायन, भूगोल, गणित, भूगर्भ, साइंस, राजनीति, धर्म, साहित्य व्यापार आदि का कोई कितना ही बड़ा ज्ञाता, विद्वान, विशेषज्ञ क्यों न हो जाय, साँसारिक वैभवों से कुबेर और इन्द्र के समान सम्पन्न क्यों न हो जाय पर उसे शान्ति नहीं मिल सकती।
पाठको, सुनो, वेद भगवान पूछते हैं वह कौन है जो आत्म ज्ञान के लिए विद्वान के पास जाता है? ऐसे व्यक्ति की तलाश करते हुए वे कब से पुकार पुकार कर पूछ रहे हैं। क्या तुम ऐसे सच्चे जिज्ञासु हो? यदि हो तो जाओ भगवान की छाती से लग जाओ, वे कब से बाहु पसार कर तुम्हें अपनी गोदी में लेने के लिए खड़े हैं।
आरोग्यं भास्करादिच्छेत् धनामिच्छेद्धुता शनात्।
ज्ञान च शंकरादिच्छेत् मुक्ति मिच्छेत जनार्दनात्॥
शास्त्रकार का कथन है कि आरोग्य की कामना सूर्य नारायण से करे, धन की इच्छा हुताशन (अग्निहोत्र) द्वारा पूरी करें। ज्ञान के लिए शंकर जी की आराधना करें और मुक्ति के लिए जनार्दन का आश्रय ग्रहण करें।
इस श्लोक का स्थूल अर्थ तो यही है कि इन इन अभिलाषा इन इन देवताओं से करें। इन देवताओं की पूजा करें। पूजा अर्चना का साधारण अर्थ हम लोग गंध, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य, ताम्बूल, अर्ध, स्त्रोत, नमस्कार आदि ही समझते हैं, और इतना कर्मकाण्ड कर लेने मात्र से यह आशा करते हैं कि देवता लोग प्रसन्न होकर मनोवाँछित वस्तुएं प्रदान कर देंगे। परन्तु हम देखते हैं कि अनेकों मनुष्य इस प्रकार की पूजा अर्चनाओं में बहुत समय तक लगे रहते हैं तो भी उनकी इच्छा पूर्ण नहीं होती है। ऐसी दशा में उपरोक्त शास्त्र वचन की सत्यता पर संदेह सा होने लगता है।
परन्तु गंभीर दृष्टि से देखा जाय तो इस वचन में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है। असफलता का कारण हमारा एकाँगी दृष्टिकोण है। हम समझते हैं कि देवता को प्रसन्न करने के लिए धार्मिक कर्मकाण्ड की पूजा पत्री ही पर्याप्त है, पर वास्तविक बात ऐसी नहीं है। इन देवताओं का वास्तविक रूप समझना और उस मान्यता पर मन, कर्म, वचन से अपने को नियोजित करना यह सच्चा पूजा विधान है। इसके द्वारा प्रसन्न होकर देवता-मनोवाँछित फल दिया करते हैं।
सूर्य से आरोग्य की इच्छा करें। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि सूर्य की किरणों से घनिष्ठता रखें। शरीर को इतने वस्त्रों से न लपेटे की त्वचा तक प्रकाश और हवा की पहुँच न हो सके। सूर्य की किरणों में रोग कीटाणुओं को मारने की इतनी प्रचंड शक्ति है जितनी किसी कीमती से कीमती दवा में नहीं है। जो किसान मजदूर खुली धूप में खेतों में काम करते हैं वे सदा निरोग रहते हैं। कहते हैं कि “जहाँ धूप और हवा नहीं पहुँचती वहाँ डॉक्टर पहुँचते हैं।” फल वनस्पति, वृक्ष आदि का जो भाग धूप से सीधा संबंध रखता है वहाँ प्राण शक्ति अधिक पाई जाती है। फलों के शाक-भाजियों के, अन्नों के छिलके सूर्य की किरणों के सीधे संपर्क में आते हैं इसलिए भीतरी भाग की अपेक्षा उनके छिलकों में पोषक तत्व ‘विटामिन’ अधिक पाये जाते हैं। सूर्य स्नान, सूर्य किरण चिकित्सा, सूर्य नमस्कार, सूर्य सेवन, सूर्य उपासना, सूर्य महात्म्य आदि के संबंध में अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर पिछले वर्षों में अनेक बार चर्चा हो चुकी हैं। सूर्य शक्ति को जीवन में अधिक से अधिक व्यवहार करना यही सूर्य पूजा है, इससे आरोग्य वृद्धि होती है।
हुताशन- अग्निहोत्र का वास्तविक अर्थ है- साहस पूर्ण त्याग। अग्निहोत्र में पहले हम अपनी मूल्यवान हवन सामग्री श्रद्धा पूर्वक हवन करते हैं तब उस यज्ञ का फल मिलता है। जो लोग कठिन श्रम, जिम्मेदारी, ईमानदारी तथा जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं वे ही धन कमा पाते हैं। भाग्य के भरोसे बैठे रहने वाले, आलसी साहस हीन व्यक्ति कोई ऊँचा काम नहीं कर सकते और न धन कमा सकते हैं। किसान अपना अन्न खेद में बिखेर देता है, धैर्य पूर्वक छः महीने अपने खेत को अपने पसीने से सींचता रहता तब एक बीज के बदले सौ बीज उसे मिलते हैं। साहसी पुरुषों के गले में लक्ष्मी की जय माला पड़ते देखी जाती है, धैर्यवान, अग्नि तप सा कठोर परिश्रम करने वाले, अपने कारोबार पर एकाग्र चित्त से श्रद्धा रखने वाले लोग सफलता प्राप्त करते हैं। यही अग्नि पूजा है। अग्नि देवता की पूजा को जो सच्चा विधान समझता है वही लक्ष्मी का वरदान प्राप्त करता है।
ज्ञान के लिए शंकर की आराधना करनी चाहिए। शंकर जी संयमी, निस्पृह, त्यागी, योग स्थित (एकाग्र चित्त) देवता (उदार मना) हैं। इन गुणों से व्यक्ति सच्चे अर्थों में ज्ञानवान् बनते हैं। उन्हें तत्व दर्शन प्राप्त होता है। असंयमी, ममता ग्रस्त, लोभी, डाँवाडोल चित्तवाले, अनुदार वृत्तियों वाले लोग शिक्षा की उत्तम व्यवस्था होने पर भी, अधूरा और उल्टा ज्ञान प्राप्त करते हैं। वह ज्ञान नहीं एक प्रकार का अज्ञान है जिससे उनमें असत्य, छल, अपहरण, शोषण, अहंकार, असंयम जैसे दुर्गुणों की वृद्धि होती है। जिसमें शंकर तत्व की स्थिति मौजूद है वे कोई गुरु न होते हुए एकलव्य की तरह मिट्टी की मूर्ति को गुरु बना लेते हैं, कबीर की तरह, गुरु के बिना जानकारी में भी दीक्षा ले लेते हैं। दत्तात्रेय की तरह मकड़ी, मक्खी, कौवे, कुत्ते सरीखे निम्न कोटि के जीवों को गुरु बनाकर उनसे अपना ज्ञान भंडार भर लेते हैं। ज्ञान प्राप्ति के लिए अपने अन्दर शंकर तत्व की स्थापना आवश्यक है। यही शंकर पूजा है।
मुक्ति के लिए जनार्दन की पूजा की जाती है जनता जनार्दन की पूजा को- लोक सेवा को- अनेकों तत्वदर्शियों ने मुक्ति का साधन माना है प्राणि मात्र में समाये हुए सजीव भगवान की पूजा करना कितने ही महर्षियों ने निर्जीव प्रतिमा पूजा की अपेक्षा कहीं ऊँचा माना है। इस प्रकार लोक सेवा, ईश्वर पूजा ही ठहरती है, उससे मुक्ति का द्वार खुल जाता है।
जो व्यक्ति अपने चारों ओर भगवान को व्यापक देखता है। संसार के सब प्राणियों को जनार्दन मय समझता है, वह गुप्त या प्रकट रूप से किसी के प्रति कोई बुराई नहीं कर सकता। ऐसा सात्विक आचार और विचार वाला व्यक्ति अपने सतोगुण के कारण स्वयं जीवन मुक्त हो जाता है।
(श्री नरदेवजी शास्त्री, वेदतीर्थ)
विद्या ह वै ब्राह्मणमा जगाम गोपाल मा शेवधिष्टेऽहमस्मि। असूयकायनृजवेऽयताय न मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम्॥
विद्या ब्राह्मण के पास आई और कहने लगी ब्रह्मन्, मेरा निवेदन सुनो?
ब्राह्मण- क्या आज्ञा है, भगवती!
विद्या- मेरी रक्षा करो, मैं तुम्हारा कोष हूँ।
ब्राह्मण मैं तुम्हारी रक्षा अब किस प्रकार करूं? अब तक तुम्हारी रक्षा के लिए ही मेरे तन-मन-धन-प्राण व्यय हुए हैं। मेरे पूर्वज तुम्हारी रक्षा में ही अनन्त काल से संलग्न रहे हैं। कहो देवि। क्या कष्ट है? तुम्हारी रक्षा में क्या त्रुटि है?
विद्या-ब्रह्मन् आपसे यही प्रार्थना है कि आप निन्दक, कुटिल स्वभाव वाले, ब्रह्मचर्य-व्रत-शून्य शिष्यों को कभी न पढ़ाइए। यदि आप इस बात का ध्यान रखेंगे और अधिकारियों को भक्त-शक्त शिष्यों को ही मेरा दान करेंगे तो मैं अवश्य पराक्रम-शालिनी बनूँगी।
यमेव विद्याः शुचिमप्रमत्तं मेधाविनं ब्रह्मचर्य्योपपन्नम्। यस्तेन द्रुह्येत्कतमच्चनाह तस्मै मा ब्रूया निधिपाय ब्रह्मन्।
विद्या- जिसको आप जानें कि यह शुचि-शुद्ध है, मनसावाचा कर्मणा एक रूप है, अप्रमत्त-प्रमाद-रहित है, मेधावी है, ब्रह्मचारी है और किसी दशा में भी आपके साथ द्रोह-बुद्धि रखने वाला नहीं हैं, उसी को आप मेरा दान कीजिए। ब्रह्मन्, वही शिष्य सच्चा निधिष है, मेरी रक्षा करने वाला है। ब्रह्मन्, इस बात का यथेष्ट ध्यान रखिएगा।
विद्या शिष्यों के प्रति बोली-
य आतृणत्य वितथेन कर्णौ अदुःखं कुर्व्वन्, अमृतं सम्प्रयच्छन्। तं मन्येत पितरं मातरं च तस्मैन द्रुह्येत् कतमच्चनाह॥
विद्या- हे शिष्यों, जो मधुर उपदेशों से, विद्या दान द्वारा सत्य के प्रकाश से अज्ञान के बन्धनों को काटता है, ज्ञान-रूपी अमृत देता है, उसी को तुम अपना माता-पिता समझो। उसके साथ किसी दशा में भी द्रोह न करो। द्रोह करोगे तो मैं (विद्याँ) निष्फल हूँगी।
अध्यापिताँ ये गुरु नाद्रियन्तो विप्रा वाचा मनसा कर्मणा वा। यथैव ते न गुरोर्भोजनीयाः तथैव तान् न भुनक्ति श्रुतं तत्॥
विद्या- जो बुद्धिमान शिष्य उपर्युक्त तत्व को न समझ कर मन-वचन-कर्म के द्वारा गुरुओं का आदर नहीं करते, वे जिस प्रकार गुरु द्वारा रक्षा नहीं किये जाते, उसी प्रकार उससे पढ़ा हुआ सुना हुआ भी सफल नहीं होता-शिष्य का अध्ययन निरर्थक हो जाता है। शिष्यों, इस तत्व को हृदय में धार लो, जिसके साथ तुम द्रोह बुद्धि रखोगे, उस गुरु का हृदय-कमल तुम्हारे पढ़ाने के लिए कैसे खिलेगा और तुम ही उससे क्या प्राप्त कर लोगे?
यह है विद्या, गुरु और शिष्य की बातचीत, जो अलंकार रूप में निरुक्त तथा मन्वादि धर्मशास्त्रों में वर्णित है। कैसा सुन्दर उपदेश है। गुरु-शिष्य भाव को स्थिर रखने का विद्या को तेजस्वी बना कर सुरक्षित रखने का कैसा सुन्दर उपाय है। प्राचीन समय में प्रत्येक गुरु-गृह साक्षात् गुरुकुल था। आचार्य पिता और गायत्री माता थी। आचार्य पूर्व रूप, अन्तेवासी उत्तर रूप और प्रवचन संधान था। इन्हीं गुरुकुलों में ब्रह्मचर्यपूर्वक साँगोपाँग वेदाध्यापन होता था, इसी से वर्णाश्रम-धर्म सुरक्षित थे।
प्राचीन तपोधन ऋषि-मुनि-ब्राह्मणों के तप से आर्य जाति जीवित है यह क्या थोड़ी बात है? ईश्वर की इच्छा है कि अपने पापों के भुगतान के पश्चात् यह जाति फिर उठे और इसके द्वारा केवल भारत का ही भला न हो बल्कि अखिल संसार मात्र का भला हो
-एवमस्तु।
(माननीय शिक्षा-मंत्री श्री सम्पूर्णानन्दजी)
हम आशा करते हैं कि भारत में वास्तविक सुराज होगा, भारतीय संस्कृति की जड़ उस विचारधारा से परिपुष्ट होती है जिसका उद्गम सिन्धु और सरस्वती के किनारे आज से सहस्रों वर्ष पहिले ऋषियों के तपोवनों में हुआ था। जब-जब भारत उस उपदेश माला की ओर से पराँगमुख हुआ है तभी उसका पतन हुआ है। भारतीय संस्कृति का एकमात्र मूल-धर्म है। धर्म का अर्थ मजहब नहीं है, अनीश्वरवादी साँख्य, बौद्ध और जैन मतावलंबी भी ईश्वरवादी नैयायिक के समान ही धर्म के उपासक हैं।
आज डर लगता है कि हम धर्म को कहीं भुला न दें। स्वराज की सेना के अधिकार सैनिक हिंदू थे। स्वभावतः आज उनमें विजयोल्लास है। यह बुरा नहीं है, परन्तु उल्लास की सार्थकता इसमें है कि हिंदू यह समझे कि स्वराज को सुराज बनाने का दायित्व उस पर है। वह इस गुरु भार को तभी उठा सकेगा जब अपने स्व में अपनी धर्म मूलक संस्कृति में स्थिर होगा। यदि वह अपने को भूला तो देश को ले डूबेगा।
हमारे पड़ोस में पाकिस्तान बना है। हम नहीं जानते वहाँ अल्पसंख्यकों के साथ कैसा बर्ताव होगा। अब तक का अनुभव अच्छा नहीं है। इसीलिए कुछ लोग यह सीख दे रहे हैं कि युक्त प्रान्त जैसे प्रदेशों में जहाँ हिन्दुओं का बहुमत है मुसलमानों को दबाया जाय पाकिस्तान के पापों का प्रतिशोध लिया जाय। लोगों की बुद्धि को विकृत करने में उनको थोड़ी सी सफलता भी हुई है।
यह भयानक अवस्था है, चिन्ता की बात है। जिस दिन हिंदू इस मार्ग पर चलेगा वह हिंदू न रह जायगा। मान लिया जाय कि पाकिस्तान में अन्याय और अत्याचार होता है पर उसका बदला वहाँ कैसे लिया जाय? सिंध में किसी हिंदु का घर जल गया तो क्या यहाँ किसी मुसलमान का घर जलाने से वह बन जायगा? यहाँ मुसलमान को मारने से वहाँ का मरा हिंदू कैसे जी जायगा? हिंदू को तो बताया गया है कि उसे ‘मातृवत् पर दारेषु’ व्यवहार करना चाहिये। परायी स्त्रियों को माँ, बहिन, बेटी समझा चाहिये प्रताप और शिवा ने विजय और पराजय में इस नीति को नहीं छोड़ा। अब क्या हिंदू बदले के भाव से मुसलमान स्त्रियों पर बलात्कार करेगा? किसी ने मन्दिर तोड़ा तो उसका दुःख हम सबको होगा परन्तु यहाँ की मस्जिद तोड़ने से पंजाब का भग्न शिवालय कैसे फिर खड़ा होगा? दूसरे लोगों को चाहे जो सिखाया गया हो परन्तु हम तो यह कहते आये हैं:-
रुचीणाँ वैचित्र्यादृजुकुटिल नाना पथजुषाम्।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥
(जिस प्रकार सभी नदियां सीधे, टेढ़े मार्गों से घूम कर समुद्र में मिलती हैं, इसी प्रकार हे भगवान् अपनी-अपनी रुचि के अनुसार भिन्न-2 उपासना करते हुए भी सब मनुष्य तुमको ही प्राप्त होते हैं।)
चोर के साथ चोर, मूर्ख के साथ मूर्ख, शराबी के साथ शराबी, बनने से तो काम नहीं चलेगा। हम अपने को गिरा देंगे पर उसको न उठा सकेंगे।
हिंदुओं की संख्या हमारे यहाँ बहुत बड़ी है। वह सौ में छियासी है। युक्त प्रान्त के अल्पसंख्यक उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते। बल में, विद्या में, बुद्धि में, शौर्य में, तप में, यहाँ का हिन्दू किसी दूसरे से पीछे नहीं हैं। इसी से यह प्रदेश प्राचीनकाल से आज तक संस्कृति में अग्रणी रहा है और परार्थ साधन तथा लोकहित के लिए आत्मबलि का मार्ग दिखाता रहा है। आज विजय की बेला में उसे बहकना न चाहिये। वीर और बलवान को क्षमा ही शोभा देती है। जो संख्या में हम से कम हैं, हमारे प्रान्त में बसे हैं, हमारे आश्रित हैं, उनको अभयदान देना ही हमारी महत्ता के अनुरूप है। यदि हमको अपने ऊपर निष्ठा है, अपनी परम्परा पर श्रद्धा है, तो हमको यह विश्वास भी होना ही चाहिये कि इस प्रदेश की संस्कृति और सभ्यता पर हमारी अमिट छाप होगी।
मैं यह बातें हिंदू के नाते हिंदुओं से कहता हूँ। इस भूभाग की स्वाधीनता को अक्षुण्ण रखना, यहाँ के स्वराज्य को सुराज बनाना, इस प्रदेश को सभी वर्गों, सम्प्रदायों, व्यक्तियों की सेवाओं से अधिकतम लाभ उठाने का अवसर देना, हिंदुओं की सद्बुद्धि पर निर्भर है। जहाँ तक दूसरे लोगों की बात है, मैं आशा करता हूँ कि वह भी सद्बुद्धि से काम लेंगे। भारतीय ईसाई से अधिक नहीं कहना है क्योंकि उसने भारतीय संस्कृति को नहीं छोड़ा हैं। हमारे मुसलमान भाइयों को गंभीरता से विचार करना चाहिये, चीन का मुसलमान चीनी रहता है, ईरान का मुसलमान ईरानी रहता है, यूरोपियन मुसलमान यूरोपियन रहता है, सैकड़ों वर्षों से जावा निवासी मुसलमान हो गये हैं परन्तु उनमें आज भी सुकर्ण, सुधर्म जैसे नाम मिलते हैं। इन देशों के मुसलमान अपना रहन-सहन नहीं बदलते, नाम नहीं बदलते, अपने पूर्वजों को नहीं भूलते। भारतीय मुसलमान का अब तक का ढंग दूसरा था। वह अपने हिंदू पड़ोसियों से इतना दूर जा पड़ा था कि अपने बाप-दादों को भी पराया मानता था। पारसी रुस्तम, नौशेरवाँ, कैखुसरो, जमशेद को अपना समझता था, अपने पूर्वज भीम, राम, कृष्ण, अर्जुन, युधिष्ठिर, अशोक, चन्द्रगुप्त से कोई संबंध न था। भारतीय व्यास, कणाद, गौतम की अपेक्षा यूनानी प्लेटो, अरस्तु, पाइथागोरस, को अपने अधिक समीप मानता था। यह बात अब बंद होनी-चाहिये। मुसलमान चाहे जिसकी, जिस भाषा में, जैसे उपासना करे, चाहे जिन स्थानों को तीर्थ माने, चाहे जिन महात्माओं को पूज्य माने पर, अब उसे भारतीय बनकर रहना होगा, भारतीय परम्परा उसकी परम्परा होगी, भारतीय रहन-सहन उसका रहन-सहन होगा, भारतीय संस्कृति उसकी संस्कृति होगी, तभी वह यहाँ समान नागरिकता का अधिकारी हो सकता है।
हमको बहुत सी पुरानी बातें भूलनी हैं। आज से पहिले किसने हमारा विरोध किया था, इसका रोना कब तक रोया जायगा। इन दरिद्र, दुर्बल, निरक्षर प्राणियों को फिर से मनुष्य बनाना साधारण काम नहीं है। इस बोझ को कोई एक दल नहीं उठा सकता। इस काम में हम सबकी आवश्यकता है, सब के लिए जगह है।
एक बात हमारे सामने होनी चाहिये। जैसा मैंने पहले कहा है, भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र-धर्म है। पृथ्वी पर जो संघर्ष मचा हुआ है उसका एक महाकारण यह है कि आज सब अपने अधिकारों पर ही दृष्टि रखते हैं। यह भूल जाता है कि अधिकार का दूसरा पहलू कर्त्तव्य है, जो एक का अधिकार है वह दूसरे का कर्त्तव्य है। यदि सब अपने कर्त्तव्यों पर ध्यान दें तो सबके अधिकार आप ही प्राप्त हो जायं। अधिकार का भूखा कहता हैं, ‘दूसरों से मुझे अमुक-अमुक बातें प्राप्त होनी चाहिये।’ कर्त्तव्य का उपासक कहता है, ‘दूसरों को मुझसे अमुक-2 बातें प्राप्त होनी चाहिए।’ पहला भाव कटुता, दूसरा सौहार्द्र फैलाता है। यदि हम यह समझ लें कि सबका सब पर ऋण है, सबका सबके कल्याण से संबंध हैं, मुझे अपना ऋण चुकाना ही है, तो सभी अनायास श्रेय के भागी हों। इसी का नाम धर्म है। राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जीवन के लिए इससे अच्छा कोई मार्ग नहीं हो सकता।
भारत का नागरिक हिन्दू, मुसलमान, ईसाई या चाहे जो हो, उसको प्रत्येक काम धर्मबुद्धि से करना चाहिये। तभी भारत फिर अपने पूर्व गौरव को प्राप्त होगा और उसकी स्वाधीनता सार्थक होगी।
मानसिक रोग की अद्भुत चिकित्सा
(एक मनोवैज्ञानिक)
जो व्यक्ति जितना ही अधिक अपने आपको दूसरों के समक्ष खोलता है, दुराव नहीं रखता वह अपनी मानसिक जटिलता का अन्त करता है अर्थात् उसकी विचारधारा और कार्यक्रम स्पष्ट और स्वस्थ होता है। बुद्ध भगवान का कथन है कि ‘ढंके हुए को खोल दो, छिपे हुए को प्रसिद्ध कर दो, तो तुम अपने पापों से मुक्त हो जाओगे, क्योंकि छिपा ही पाप लगता है, उभरा हुआ पाप नहीं लगता।’ मनुष्य अपने कुचिंतन से अनेक प्रकार की मानसिक व्याधियाँ उत्पन्न करता है जो जितना ही अधिक अपने आपको दूसरों से अलग रखने की चेष्टा करता है, उसके विचार उतने ही दूषित हो जाते हैं। मनुष्य के मन में अनेक प्रकार की भावनाएं उठती हैं। जब तक वह अपनी इन भावनाओं को अपने मित्रों के समक्ष प्रकाशित करता रहता है, तब तक वे मानसिक जटिलता और परेशानी का कारण नहीं बनती, किन्तु हम अपनी सभी भावनाओं को अपने मित्रों के समक्ष प्रकाशित नहीं कर सकते। क्योंकि वे इतनी घृणित होती हैं कि हमारा विश्वास होता है कि उन्हें जान कर भी हमारे मित्र हमसे घृणा करने लग जायेंगे। इसी तरह हम अपने अनेक दुष्कर्मों को प्रकाशित होने से रोकते रहते हैं। यह मनोवृत्ति यहाँ तक बढ़ जाती है कि हम उन्हें अपने समक्ष भी स्वीकार नहीं करना चाहते। ऐसी ही अवस्था में मानसिक जटिलता और मानसिक रोगों की उत्पत्ति होती है। मानसिक रोग की अवस्था में मनुष्य के जटिल भाव अपने आप ही प्रकाशित होने लगते हैं चेतना इनका प्रकाशन नहीं रोक सकती। वह स्वयं निर्बल होकर टूक-टूक हो जाती है। आरोग्य लाभ के लिए जटिल भावों का इस प्रकार प्रकाशित होना आवश्यक भी है। वास्तव में हम जिसे रोग कहते हैं, वह वास्तविक रोग का बाह्यरूप मात्र है। वास्तविक रोग आँतरिक होता है। बाह्य रोग के द्वारा-वह आंतरिक रोग बाहर निकलता है। और इस तरह रोगी को आरोग्य लाभ कराने में लाभ पहुँचाता है। युग महाशय का कथन है कि किसी भी प्रकार का मानसिक रोग सदा नहीं ठहर सकता। बाह्य रोग के द्वारा जब भीतरी मानसिक विकार निकल जाता है तो व्यक्ति आरोग्य का अनुभव करता है।
मानसिक विकार के बाहर निकलने में सहानुभूति का भाव बहुत ही लाभकारी होता है रोगी उससे सहानुभूति रखने वाले व्यक्ति के समक्ष अपने मन के छिपे भाव प्रकाशित कर सकता है। जो व्यक्ति रोगी से घृणा करता है अथवा उससे तटस्थ रहता है उसके समक्ष रोगी अपने भाव कैसे प्रकाशित कर सकता है। पागल से घृणा करने वाले व्यक्ति को देखकर पागल का रोग और भी बढ़ जाता है। इसके प्रतिकूल सहानुभूति रखने वाले व्यक्ति के समक्ष पागल का पागलपन कम हो जाता है।
इस प्रसंग में डॉक्टर होमरलेन का प्रयोग उल्लेखनीय है। डॉक्टर होमरलेन ऐसे अनेक व्यक्ति शेलशाम के रोगियों को आरोग्य कर सके, जो डॉक्टर फ्रायड की विधि से चंगे न हो सके थे। इसका प्रधान कारण डॉक्टर होमरलेन का रोगियों के प्रति सहानुभूति का भाव था। जहाँ डॉक्टर फ्रायड के मौलिक स्वभाव को स्वार्थी और पाशविक मानते थे, डॉक्टर होमरलेन उसे दैविक मानते थे। इसलिए ही उन्हें रोगी के साथ सहानुभूति स्थापित करना आसान होता था। इस सहानुभूति के कारण रोगी खुलकर अपने मन की गाँठें और परेशानियाँ डॉक्टर होमरलेन के समक्ष खोल सकता था। रोगी के मन में अन्तर्द्वन्द्व होने के कारण ही रोग की उपस्थिति होती है। जब उस अंतर्द्वंद्व का अन्त हो जाता है तो रोग का भी अन्त हो जाता है। अन्तर्द्वन्द्व जब तक भीतर ही रहता है तब तक रोग के बाह्य लक्षण नहीं दिखायी देते, और जब वह बाहर आने लगता है तो मानसिक रोग की उपस्थिति होती है। अन्तर्द्वन्द्व का अन्त भीतरी और बाहरी मन में समरसता स्थापित होने से होता है, पर इसके लिए आवश्यक है कि रोगी की गुप्त भावनाएं उसकी चेतना के समक्ष आवें। उन भावनाओं के प्रति न उसकी चेतना सहानुभूति रखती है, न दूसरे लोगों की जब चिकित्सक रोगी की छिपी भावनाओं के प्रति सहानुभूति दर्शाता है तो वे धीरे-धीरे अपने आप बाहर आने लगती हैं। उनके बाहर आने पर उसके चेतन और अचेतन मन में एकता स्थापित होना सरल हो जाता है वास्तव में चिकित्सक के समक्ष अपने गुप्त भाव प्रकाशित करने और उसके द्वारा सहानुभूति से ही रोग का निवारण हो जाता है।
डॉक्टर को रोगी का विश्वासपात्र बनने के लिए उससे केवल बड़े ही प्रेम का व्यवहार करना पड़ता है वरन् अपने आपको भी उसके समक्ष खोलना पड़ता है। उससे कई बार अपने अनुभव भी कहने पड़ते हैं जिससे कि रोगी को आत्मस्वीकृति करने में प्रोत्साहन मिले। यदि किसी व्यक्ति को कोई मानसिक रोग काम-सम्बन्धी दुराचार से उत्पन्न हुआ है तो स्वयं चिकित्सक को अपने दुराचार के एक दो उदाहरण देने पड़ते हैं, जिससे रोगी उसके साथ अपनी आत्मीयता स्थापित कर सके। रोगों का रोग मुक्त होने के लिए डॉक्टर के समक्ष अपने छिपे मनोभावों को प्रकाशित करना आवश्यक नहीं, उसका अपने ही समक्ष अपने भावों का प्रकाशन करना आवश्यक है। रोग के विनाश के लिए आत्मस्वीकृति और आत्मीयता स्थापित होना आवश्यक है। जब मनुष्य अपने भाग्य को ही घृणा की दृष्टि से देखता है, तो वह रोगी बनता है, क्योंकि वह अपने घृणित भावों को दबाता है और उनको स्वीकार नहीं करता, वह अपने दुष्ट कर्म भूलने की चेष्टा करता है। इस तरह उसके रूप की जटिलता बढ़ती है। जब मनुष्य अपने वांछनीय समझे जाने वाले भावों का दमन न करके उन्हें स्वीकार करता है और उनको भी स्वभाविक मान लेता है तो उसकी विक्षिप्तता नष्ट हो जाती है। जो डॉक्टर सभी प्रकार के भावों को स्वाभाविक समझता है वही रोगी के प्रति सहानुभूति का भाव प्रदर्शित कर सकता है। ऐसा ही व्यक्ति रोगी को आरोग्य लाभ कराने में सहायक हो सकता है।
यहाँ डॉक्टर होमरलेन के कुछ प्रयोग उल्लेखनीय हैं। एक बार डॉक्टर होमरलेन के समक्ष एक ऐसी महिला आयी जिसे पेट में घोर पीड़ा थी। यह महिला अपना निवास स्थान नहीं बतलाना चाहती थी। उसका पति स्वयं पेट के रोग का विशेषज्ञ था और उसने अपनी स्त्री की पूरी चिकित्सा की, पर उससे उसका रोग न हटा। इस महिला को यह सूझ आयी कि सम्भवतः मेरे रोग का कोई मानसिक कारण है, अतएव वह डॉक्टर होमरलेन के पास गयी और उसने अपना नाम बदल कर बतलाया और अपने आपको अविवाहित कहा। डॉक्टर होमरलेन ने कुछ दिनों तक इसकी चिकित्सा की, पर कुछ लाभ न हुआ। डॉक्टर होमरलेन के समक्ष यह महिला अपनी सभी बातें प्रकट नहीं करना चाहती थी, अतएव उन्हें रोग का कारण ढूँढ़ना कठिन हो गया। डॉक्टर होमरलेन ने सोचा कि सम्भवतः कोई गुप्त प्रेम उसके रोग का कारण है। इस गुप्त प्रेम को स्वीकार करने के लिए अनेक प्रकार से उन्होंने समाज में प्रचलित रूढ़ियों के दोष दर्शाने प्रारम्भ किए। इस प्रकार वे उसके नैतिक प्रतिबन्ध शिथिल करने की चेष्टा करने लगे। डॉक्टर होमरलेन की इस प्रकार की बातचीत सुनकर वह महिला एकाएक उठकर वहाँ से चली गयी। पीछे उसने फोन-द्वारा सूचित किया कि वह कोई व्यभिचारिणी स्त्री नहीं, वरन् विवाहित स्त्री है और अपना निवास स्थान ठीक-ठीक न बताने का कारण भी उसने डॉक्टर को बता दिया।
अब रोग का पता लगाना सरल हो गया। इस महिला को पेट का रोग एक रोगी की अवस्था देखकर भय से उत्पन्न हो गया था। महिला का विश्वास था कि उसका पति रोग का विशेषज्ञ है, अतएव उसे यह रोग हो ही नहीं सकता। किन्तु उसने एक स्त्री को इसी रोग से अपने ही घर मरते देखा और उसका पति उसे न बचा सका। यह स्थिति देखकर उसके मन में असाधारण भय उत्पन्न हो गया। यही उसके पेट के रोग का कारण था। वास्तव में यह पेट का रोग शारीरिक रोग तथा मानसिक रोग मात्र था।
जो व्यक्ति मानसिक रोग की किसी प्रकार की चिकित्सा नहीं जानता, वह भी अपने प्रेम व्यवहार से रोगी को स्वास्थ्य लाभ करने में सहायक हो सकता है। मानसिक रोगी की इच्छा होती है कि कोई उसकी व्यथा सुने, पर इसे सुनने के लिए कोई तैयार नहीं होता। अतएव उसका आन्तरिक कष्ट बढ़ता ही जाता है। यहाँ हमें ध्यान रखना आवश्यक है कि रोगी अपनी व्यथा के रूप में जो बातें कहता है वे वास्तविक नहीं है। वे वास्तविक स्थिति की संकेत मात्र हैं। अतएव कोई मनोवैज्ञानिक ही पागल व्यक्तियों की गप्प सुनने में रुचि ले सकता है। साधारण मनुष्य उसके विचारों को जैसा का तैसा मानकर उसके साथ किसी प्रकार भी न तो सहानुभूति प्रदर्शित कर सकते हैं और न उसकी कल्याण रुचि दर्शा सकते हैं। सम्भव है कि जो दयनीय अवस्था आज पागल की है, वैसी अवस्था हमारी ही हो जाय। जब हम अपने मन के विषय में कुछ भी नहीं जानते तो ऐसा होना असम्भव नहीं। पागलों के प्रति सहानुभूति का व्यवहार रखने से उनमें कैसा मौलिक परिवर्तन हो जाता है, उसका निम्नलिखित एक उदाहरण है।
एक बार मेरा एक मित्र किसी राजनीतिक अपराध में एक ऐसे जेल में कुछ दिन तक रखा गया, जहाँ पागल आदमी पहले-पहल लाकर रखे जाते थे। वह उन पागलों से स्वच्छन्दता से मिल सकता था, उसने देखा कि बहुत से पागलों में मौलिक सुधार उसके व्यवहार से हो जाता था। एक के पागलपन में तो इतना सुधार हो गया कि जेल के डॉक्टर ने यह प्रमाणित कर दिया कि वह पागल नहीं है। पर इसके कुछ ही समय बाद वह जेल के वार्डन के कठोर व्यवहार के कारण फिर जैसा का तैसा हो गया।
साधारण पागलखानों में भेजने से पागलों में कोई सुधार नहीं होता, अपितु उसकी हालत और खराब हो जाती है। इसका कारण वहाँ का असहानुभूति पूर्ण वातावरण है। पागलों में किसी प्रकार का सुधार करने के लिए जितने परिश्रम की आवश्यकता होती है उतना परिश्रम पागलखाने के अधिकारी नहीं कर सकते। साधारण व्यक्तियों के पागलपन के निवारण में तो सहानुभूति बड़ी ही लाभप्रद होती है। कहा जाता है कि जब हम अपना दुख अपने मित्र के समक्ष प्रकाशित कर देते हैं तो हमारा हृदय हलका हो जाता है। उसी प्रकार यदि हम अपने मन के गुप्त मनोभाव की अपने मित्र के समक्ष प्रकट कर दें तो अपने मानसिक विकारों से मुक्त हो जाएं। मानसिक व्यथा से पीड़ित व्यक्ति से सहानुभूति प्रदर्शित करने से उसकी व्यथा कम हो जाती है तब तक कोई व्यक्ति अपने आपको किसी दूसरे के समक्ष खोलता नहीं तब तक उसकी व्यथा कम नहीं होती। पर संसार में बिरला ही व्यक्ति दूसरों के दुखों का रोना सुनना चाहता है। उसके पास न इसके लिए समय है और न रुचि है। अतएव कोई बिरला ही मनुष्य दूसरे की मानसिक व्यथा कम करने में सहायक होता है।
-’संसार’ से
(श्री गुलाब चन्द्र जैन)
साधारणतया प्रत्येक प्राणी में कुंडलिनी सुषुप्तावस्था में रहती है। यह सर्पाकार है तथा इसकी गति भी सर्प की ही तरह है। योगाभ्यासी के शरीर में यह चक्रवात गोल चलती तथा शक्ति वर्धन करती है। श्रीमती ब्लेवटस्की का कहना है कि इसकी चाल प्रकाश की अपेक्षा कहीं अधिक तेज है। प्रकाश 18,500 मील प्रति सेकेंड चलता है किन्तु कुण्डलिनी की गति 34,500 मील प्रति सेकेण्ड है। कुण्डलिनी मूलाधार चक्र में स्थिर होकर सोई रहती है। मूलाधार शरीर के 6 चक्राकार गतिमान शक्ति केन्द्रों में से एक है। वर्तमान शरीर-विज्ञान की दृष्टि से ये स्थान (Nervcs) नाड़ियों के समूह हैं। इनके नाम क्रमशः मूलाधार (Pelvice Plexus) स्वाधिष्ठान (Hypogastric Plexus) मणिपूर (Eqigastric Plexus) अनाहत (Cardiac Plexus) विशुद्ध (Carotid Plexus) तथा आज्ञा चक्र (Medulla Oblangata) हैं।
मूलाधार सुषुम्ना-दंड के निम्न भागों में स्थिर है। कुण्डलिनी इसी स्थान पर सोई रहती है। स्वाधिष्ठानचक्र प्लीहा के पास स्थित है। इसके पास ही मणिपूरक चक्र है जिसका स्थान नाभि है। मणिपूर के ऊपर हृदयस्थ अनाहत चक्र हैं। विशुद्ध चक्र, अनाहत चक्र के ऊपर पाया जाता है। इसका स्थान कण्ठ है। चुल्लिका ग्रंथियाँ (Thyroid glands) इसी से संबंधित है, विशुद्ध चक्र के ऊपर आज्ञा चक्र है। यह दोनों भौहों के बीच में कपाल में स्थित है। पीनल ग्लैंड (pineal glands) तथा पिट्यूटरी बॉडी (piluatory body) इससे संबंधित है।
कुण्डलिनी जाग्रत होकर मेरुदण्ड के मध्य में स्थित सुषुम्ना मार्ग से होकर इडा (सूर्यनाड़ी) पिंगला (चन्द्रनाड़ी) की सहायता से ऊपर की ओर प्रवाहित होकर इन षट्चक्रों को प्रज्ज्वलित एवं प्राणयुक्त करती हुई अन्त में सहस्रार में जाकर योगी को पूर्णावस्था की प्राप्ति करा देती है।
मेरुवंश में से होकर ऊपर जाते समय जिस-2 चक्र में से होकर यह गुजरती है उस-उस चक्र को यह जागरित करती तथा खोलती जाती है स्वाधिष्ठान चक्र के जागरित होने पर मनुष्य सूक्ष्मतर लोक में स्वच्छंद विहार करता है। मणिपूर की जागृति के साथ-साथ आत्मरक्षा की शक्ति उसमें अधिक हो जाती है। अनाहत चक्र के खुलते ही उसे अंतःदृष्टि प्राप्त होती है विशुद्ध चक्र का जाग्रत होना दिव्य श्रुति (ष्टद्यड्डह्द्बड्डह्वस्रद्बद्गठ्ठष्द्ग) का कारण है। आज्ञा चक्र के जाग्रत होते ही साधक को ‘दिव्यदृष्टि’ (ष्टद्यड्डह्द्बक्द्बह्यद्बशठ्ठ) प्राप्त हो जाती है। आज्ञाचक्र के ऊपर ब्रह्मरंध्र में सहस्रार चक्र है। सहस्रार चक्र का जाग्रत होना ही कुण्डलिनी साधक का चरम ध्येय है।
सहस्रार के जाग्रत होते ही शरीर और आत्मा अपनी स्वतंत्र स्थिति को प्राप्त होते हैं। आत्मा शरीर से बाहर निकल कर मन चाहे स्थान पर जाकर एवं लौट कर पुनः उसी देह में प्रवेश कर सकती है। योग क्रियाओं द्वारा कुण्डलिनी जाग्रत कर षट्चक्र रूप द्वारों को खोलते हुए मस्तिष्क में स्थित सहस्रार चक्र में उसे ले जाना ही योग की सिद्धि व सफलता है।
कुण्डलिनी के जाग्रत होने के साथ वेग उत्पन्न होने वाला प्रथम शब्द है ‘नाद’। नाद के 3 भेद हैं- महानाद, नादान्त और निरोधिनी। नाद से प्रकाश होता है और प्रकाश का व्यक्त रूप महा बिन्दु है।
सम्पूर्ण चक्र कमल के आकार के माने गये हैं किन्तु इनकी पंखड़ियों की संख्या में अंतर है मूलाधार चक्र में चार दल स्वाधिष्ठान में 6, मणिपूरक में 10, अनाहत में 12, विशुद्धिचक्र में 16, आज्ञाचक्र में 20, सहस्रार में 1000 दल हैं।
ये चक्र पंचतत्त्वात्मक हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत तथा विशुद्ध चक्र क्रमशः पृथ्वी, अप, तेज, वायु तथा आकाश के निदर्शक हैं। सहस्रार को शून्य चक्र भी कहते हैं। अब हम उपरोक्त चक्रों का ध्यान करने के फल पर विचार करेंगे। आधार चक्र का ध्यान करने से मनुष्य वक्ता, मनुष्यों में श्रेष्ठ, सर्वविद्याओं का जानने वाला आनंदित, आरोग्य तथा काव्य-प्रबंध में चतुर होता है। स्वाधिष्ठान चक्र का ध्यान करने से अहंकारादि विकार नष्ट होते हैं। वह श्रेष्ठ योगी, निर्मोही तथा गद्य-पद्य का कुशल रचयिता होता है। मणिपूरक चक्र का ध्यान करने वाला जगत का संहार व पालन करने में समर्थ होता है। जिह्वा पर सरस्वती निवास करती है और वाक्य-रचना में वह चतुर हो जाता है। अनाहत चक्र का ध्यान का फल ईशत्वसिद्धि, योगीश्वरत्व, इन्द्रियजीतता तथा परकाया प्रवेश शक्ति आदि है। विशुद्धाख्य चक्र के ध्यान में लीन योगी ज्ञानवान, उत्तम वक्ता, शान्तचित्त, त्रिलोकदर्शी, सर्वहितकारी, आरोग्य, चिरंजीवी तथा तेजस्वी होता है। आज्ञाचक्र के ध्यान से वाक्य सिद्धि प्राप्त होती। सहस्रार का ध्यान करते ही योगी अमर-मुक्त, उत्पत्ति-पालन में समर्थ, आकाशगामी तथा समाधि युक्त होता है।
कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होकर देहस्य कफ पित्तादि दोष एवं त्याज्य पदार्थों को नष्ट कर डालती है। उसके ऊर्ध्व गमन करते ही देह के तमाम व्यापार बंद हो जाते हैं। हृदय तथा नाड़ी की गति भी बंद हो जाती है। कुण्डलिनी के सहस्रार में प्रवेश करते ही योगी मोक्ष प्राप्त करता है। चक्रों का प्रकाश कुण्डलिनी जागृति का द्योतक है।
एक क्षुद्र झूठ को छिपाने के लिये बहुत झूठ का आश्रय लेना पड़ता है।
श्री रिवर्ड ग्रेग अमेरिका से महात्मा गाँधी को लिखते हैं- ‘न्यूयार्क के एक सत्र ने खबर दी है कि ‘आपने 125 वर्ष जीवित रहने की आशा छोड़ दी है। यदि यह खबर बिल्कुल ठीक है, तो मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप अपनी बात को बदल दें।’
उत्तर में महात्माजी ने लिखा, ‘जो खबर ग्रेग साहब ने पढ़ी वह बहुत हद तक ठीक है। जब मैंने जाना कि मुझमें काफी अनासक्ति नहीं है, तो मैंने 125 वर्ष जीने की आशा खो दी। अपने क्रोध की भावनाओं पर मैं इतना काबू नहीं पा सकता हूँ कि मैं 125 वर्ष जीने की आशा कर सकूँ। एक दिन इस दुःखद बात का मुझे अनुभव हुआ कि मुझमें जरूरी अनासक्ति नहीं हैं। जिस आदमी का जीवन सेवामय नहीं हैं, उसे जीने का कोई हक नहीं है। गीता में लिखा है कि जिसमें अनासक्ति नहीं हैं वह पूरी-2 सेवा नहीं कर सकता।
अपनी कमियों का सच्चा इकरार करने से आत्मा का भला होता है। इससे मनुष्य को अपनी कमियाँ दूर करने की शक्ति मिलती है ‘हरिजन’ के पाठकों को जानना चाहिए कि मैं अपनी कमियों को दूर करने की हर कोशिश कर रहा हूँ, ताकि अपनी खोई आशा को फिर पा लूँ। इस संबंध में मुझे यह दोहरा देना चाहिये कि जो कोई अपना जीवन मनुष्यों की सेवा में अर्पण कर देता है, उसे यह आशा रखने का हक जरूर है। उसे एक शेखचिल्ली का सपना हरगिज न समझना चाहिए। मुझे और मेरे जैसे दूसरे कोशिश करने वालों को इसमें सफलता न मिलें तो इससे स्पष्ट नहीं होता कि 125 वर्ष जिन्दा रहना असंभव है।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)
पिछले दिनों हम एक सार्वजनिक पाठशाला में गये। वहाँ हमने कक्षाओं की दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखे हुए देखे। कई विद्यार्थियों से उनके विषय में बातचीत की, तो ज्ञात हुआ कि उन वाक्यों का, उन आदर्शों का एक हल्का एवं ऊपरी प्रभाव तो बालकों पर जरूर पड़ा है, किन्तु वह उनके अंतर्गत तथा मानसिक संस्थान का अंग न बन सका। इसी प्रकार हम अनेक आदर्शवादी धर्मरत साधकों के जीवन में देखते हैं कि वे उत्तमोत्तम धर्म ग्रन्थ अपने पास रखते हैं, ऊँची किस्म की नारेबाजी लगाते हैं, किन्तु उनके चरित्र में उन धर्म ग्रन्थों का केवल एक हल्का तथा ऊपरी प्रभाव ही दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार के ऊपरी एवं जीवन से रहित ‘विचार पूजा’ उनमें आती हैं।
विचार-पूजी अन्य आदतों के समान ही एक आदत मात्र है। इसे बुरी आदतों में तो नहीं मान सकते किन्तु ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में कुछ अधिक उन्नति नहीं कर पाता। उसकी प्रवृत्ति तो उत्तम और दिव्य कार्यों की ओर है, वह चाहता है कि उन उपदेशों को जीवन में उतारे किन्तु अन्य बीजों के संग्रह की भाँति वह कुछ अच्छे ग्रन्थ, आदर्श वाक्य ही संग्रह कर पाता है। स्थायी रूप से उसके हाथ कुछ भी नहीं लगता। वह नहीं समझ पाता कि संग्रह करने की वृत्ति पाना एक बात है, उन उच्चादर्शों को जीवन में उतार कर स्थायी लाभ करना दूसरी बात।
विचार-पूजा वाले व्यक्ति के मानसिक संस्थान का निरीक्षण कीजिए उसमें सद्प्रवृत्ति है किन्तु उन उद्देश्यों में प्रेरणा नहीं है। निष्ठा एवं आत्म विश्वास की भारी न्यूनता है। यह प्रशस्त पथ का अनुगामी तो बनना चाहता है किन्तु जीवन में उस आदर्श को पालने की साधना नहीं करना चाहता। वह केवल उन विचारों, आदर्शों को तोते की भाँति रट लेना चाहता है, आत्मविश्वास को उनसे सम्बन्धित नहीं करना चाहता। उसमें आत्म बल नहीं। यदि है, तो बहुत कम। जिसका निश्चय दृढ़ हो, वही आत्मबली है। उसका निश्चय संसार को डिगा सकता है। विचार-पूजक का निश्चय क्षीण होता है। उसमें इतनी सामर्थ्य नहीं होती कि जिन्दगी पालन के लिए साधना कर सके।
बुद्धिमान व्यक्ति अपने जीवन को थोड़े से सरल नियमानुसार बनाता है। वह बहुत समझ-बूझ के पश्चात् आदर्शों का निर्णय करता है। एक बार निर्णय करने के पश्चात-वह साधनों से डिगता नहीं, वाद-विवाद नहीं करता प्रत्युत साधना में प्रवृत्त होता है। ऐसे व्यक्ति के विचार, संकल्प एवं कार्य सामयिक होते हैं। उसे किसी बात में विरोध नहीं जान पड़ता। समृद्धि एवं ज्ञान का अक्षय भंडार वह अपनी शक्तियों में पा लेता है।
हम प्रायः देखते हैं कि अध्यापक, उपदेशक, लेखक, नेता, कार्यकर्त्ता, सार्वजनिक शिक्षा संस्थाओं के सर्वेसर्वा संस्थाओं के मूल में निहित विचारों का प्रचार न कर, मिथ्या भावनाओं के जाल में लोगों को फंसाते हैं। उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि जीवन में उतरे हुए आदर्श वाक्य ही प्रेरणा का काम दे सकेंगे अन्यथा वह मिथ्या प्रदर्शन मात्र होकर हास्यास्पद होगा।
=कोटेशन============================
मौलिक एवं लिखित शिक्षा की अपेक्षा व्यावहारिक और सदाचरण रूपी शिक्षा का प्रभाव अधिक पड़ता है।
*****
यदि तुम अपने साथ किये गए अहसान को न मानकर कृतज्ञता प्रगट न करोगे तो फिर तुम्हें उससे अधिक आशा न रखनी चाहिये क्योंकि घूरे पर गुलाल को व्यर्थ ही में कोई बखेरना नहीं चाहता।
==================================
(श्री दौलतराम कटरहा बी. ए.)
राजकुमार सिद्धार्थ प्रातःकाल उपवन में भ्रमण कर रहे थे। थोड़ी देर बाद उन्होंने एक हंस को जमीन पर छटपटा कर गिरते हुए देखा। आतुर होकर उन्होंने उसे उठाकर गले से लगा लिया। उस बेचारे का शरीर बाण लगने से रक्ताक्त हो रहा था। थोड़ी देर बाद उनके भाई देवदत्त के सेवक ने आकर उनसे कहा कि यह हंस कुमार देवदत्त ने गिराया है और वे उसे माँग रहे हैं। बुद्धदेव ने दयार्द्र भाव से हंस की ओर देखते हुए जो उत्तर दिया वह आचार्य शुक्ल की भाषा में इस प्रकार है।
मरत जो खग-अवसि पावत ताहि मारनहार।
जियत है तब वासु तापै नाहिं कछु अधिकार?
दियों मेरे बंधुने बस तासु गति को आर।
रही जो इन मृदुल पच्छन की उठावनिहार॥
सिद्धार्थ ने कहा कि कुछ भी क्यों न हो इस हंस को मैं कुमार देवदत्त को नहीं दे सकता। बात न्यायालय तक गई और कुमार सिद्धार्थ विजयी हुए। मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है।
संसार में प्रत्येक जीव को जीने का अधिकार है। उसके इस अधिकार की जो रक्षा करता है वही उस स्वामित्व का वास्तविक अधिकारी है।
एक बार डाकुओं से लड़कर दो वीरों ने एक स्त्री को बन्धन -मुक्त किया। उसमें से एक उस स्त्री को अपनी पत्नी बनाना चाहता था और दूसरा उसके प्रति मातृ-भाव रखते हुए जब तक उसकी इच्छा हो तक तक के लिए आश्रय देना चाहता था। बात दूसरे लोगों तक गई और तय हुआ कि पत्नी भाव की अपेक्षा मातृ-भाव रखने वाला ही श्रेष्ठ रक्षक है और वही उसका अधिकारी है। भोग्य-भावना की अपेक्षा पूज्य-भावना रखने वाला ही बड़ा होता है।
सम्पत्ति की ओर भी अनेकों व्यक्तियों का पत्नी जैसा ही रुख होता है अतएव यह उनके पास नहीं ठहरती। भोग्य-भावना के कारण वे पैसे की कद्र नहीं करते। वेतन मिला नहीं कि उसे यहाँ वहाँ उड़ाना शुरू कर दिया और परिणाम यह होता है कि उन्हें हमेशा पैसे की तकलीफ ही बनी रहती है। किन्तु जो व्यक्ति लक्ष्मी की माता के समान हिफाजत करते हैं लक्ष्मी उनके घर से नहीं उठती।
भारतवर्ष में अनेकों धर्मों के लोग रहते हैं। भारतवर्ष में रहने का अधिकार समान रूप से सबको हो सकता है किंतु सच्चा अधिकार उसी को है जो भारत को माता मानता है एवं भारतवर्ष को अपनी मातृ-भूमि मानता है।
भूमि उसकी होती है जो मातृभाव से उसकी रक्षा करते हुए माता को रक्त दान दे सकता है। जो भी भारत-भू को अपनी मातृ-भूमि, पितृ-भूमि और पुण्य-भूमि समझेगा वही उसका वास्तविक अधिकारी होगा। उसे अपना क्रीड़ा-स्थल समझने वाले का अधिकार तो पाशविक शक्ति पर ही निर्भर है उच्च मनोभावनाओं पर नहीं, अतः वह उसका सच्चा अधिकारी नहीं। अधिकारों के लिये लड़ना वृथा है। महात्मा ईसा ने अपने शिष्यों से कहा कि तुमसे में जो सबसे बड़ा बनना चाहे वह सबका सेवक बने। अधिकारों को प्राप्त करने का उपाय यही है कि पहिले सेवा करो। जिस वस्तु के बदले में कर्तव्य न करना पड़े उसकी प्राप्ति के लिए तो सभी मुँह फाड़ सकते हैं।
संसार में अभी तक बहुत से अधिकार जन्म-सिद्ध और समय-सिद्ध होते आ रहे हैं जन्म ही अभी तक अधिकारों का निर्णय करता रहा है किंतु सर हेनरी मैन जैसे उद्भट कानून शास्त्री ने वैज्ञानिक ढंग से सिद्ध ही कर दिया है कि मानव समाज को अधिकारों का मनुष्य-मनुष्य के संबंधों का आधार क्रमशः पद (Status) से समझौता (contract) ही बनता जा रहा है। मालिक और नौकर के अधिकारों और कर्त्तव्यों का निर्णय अभी तक उनके पद से होता रहा है किंतु आज की बदली हुई परिस्थिति में उस निर्णय का आधार पारस्परिक समझौता ही है जिसमें मालिकों को, वह मालिक है इसलिए अधिकार नहीं मिलते बल्कि इसलिए मिलते हैं कि अधिकारों के बदले में वह उचित-मात्रा में सेवा भी करता है। आज के युग में तो देने पर ही कुछ मिल सकता है।
हमें जान लेना चाहिए कि संसार में एक वर्गहीन समाज का निर्णय होने जा रहा है। जिसमें पंडित, योद्धा, व्यापारी और परिचारक आदि आवश्यक प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यता के ऊपर अपना वर्ग स्वयं ही निर्धारित करने की अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता रहेगी जिसमें अधिकारों की दृष्टि से स्त्री और पुरुष में कोई भेद न रहेगा और जन्म के बल पर कोई व्यक्ति अन्य से अधिक अधिकारों का उपभोग न कर सकेगा। सौभाग्य से हमारे देश की विधान सभा के अंतर्गत बुनियादी अधिकार समिति ने इन अधिकारों को स्वीकार कर लिया है। हमें अपने आपको इस अपरिहार्य स्थिति के अनुकूल स्वेच्छा पूर्वक ही ढाल लेने की दूरदर्शिता दिखानी चाहिए क्योंकि रो-पीटकर और लड़-झगड़कर अन्त में विवशता के कारण किसी अपरिहार्य स्थिति को अपनाने की अपेक्षा पहले से ही स्वेच्छा तथा प्रसन्नता पूर्वक उसे अपना लेने में अधिक सौंदर्य है।
हिंदुओं के सम्मिलित परिवारों में आज भी पद द्वारा ही अधिकार प्राप्त होते हैं। सास-बहू से सेवा कराने की अधिकारिणी है। वह चूंकि सास है इसी आधार पर वह बहू पर अपना अधिकार कायम रखना चाहती है और वह इस प्राचीनतम पद-पद्धति पर अधिकार प्राप्त करने की प्रथा को बनाए रखने के लिए अन्तिम लड़ाई लड़ रही है। किंतु वह तनिक उदारता और विवेक से काम ले तो सारा झगड़ा ही मिट जावे। सास यदि बहू की प्रेमपूर्वक रक्षा करे तो निस्संदेह उसे उस पर शासन करने का प्रदत्त अधिकार प्राप्त हो सकता है। रामचरित मानस उठाकर देखिये भगवती कौशल्या महारानी सीता पर कितना स्नेह रखती है। राम से वे कहती हैं कि सीता तुम्हारे साथ वन जाना चाहती है पर वह इतनी सुकुमार है तथा मैं उसे इतना प्यार करती हूँ कि उससे दीपक की बत्ती भी डालने के लिये नहीं कहती। सीता सुकोमल शैया से उठकर गोद और हिंडोला में ही स्थान पाती रही है उसने कठोर भूमि पर पैर नहीं रखा। यदि हमारी माताएं अपनी बहुओं से इस तरह प्रेम करने लगें तो वे अपने दीर्घकालीन अनुभव के बल पर अवश्य ही उसकी उचित सहायता और रक्षा कर सकेंगी और उन्हें पद के अनुरूप ही उचित अधिकार अपनी उन सेवाओं के बदले में प्राप्त होगा।
चीन में आज भी सास को बहू पर बहुत से अधिकार प्राप्त हैं। वह चाहे तो बहू को आँगन में घंटों घुटनों के बल खड़ा रखे और चाहे तो उसकी जीभ में सुई तक चुभो दे। वहाँ पर पुत्र की स्थिति भी हिंदू-पुत्र की स्थिति से अच्छी नहीं हैं। कनफ्यूशियशिज्म के आधार पर बना हुआ वहाँ का समाज-संगठन समाज-परक है व्यक्ति-परक नहीं अतएव उसके खिलाफ आज सारा चीन बगावत करने जा रहा है। प्राचीन रोम में भी पिता को पुत्र के जीवन और संपत्ति पर पूर्ण अधिकार होता था यह सब इसलिए था कि उस समय समाज में पद को विशेष मान्यता प्राप्त थी।
राजा और प्रजा तथा पिता और पुत्र के अधिकारों और कर्तव्यों का निर्णय पहले पद के ही आधार पर होता था। किंतु आज पिता को पुत्र पर शासन करने का अधिकार तथाकथित समझौते पर ही निर्भर है क्योंकि पिता-पुत्र का पालन पोषण तथा रक्षा कर और उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति कर समझौते की शर्तों को पूरा करता है। कर्त्तव्य के बल पर ही पिता को पुत्र पर अधिकार प्राप्त हैं। आज की परिस्थिति में तो दंड देने का भी अधिकार उसी को है जो प्रेम और सेवा करता होवे। राजा के दैवी अधिकारों का आज कोई मूल्य नहीं है। राजा यदि शासन करने का अधिकार प्राप्त करना चाहता है तो उसे राम के प्रजा-पालन का आदर्श ग्रहण करना पड़ेगा एवं प्रजा की रक्षा और उसके सूत्रों की वृद्धि करनी पड़ेगी। राज्य-कर्मचारी भी इसी सिद्धान्त के आधार पर पहिले हमारे सेवक हैं बाद में शासक। यदि वे केवल हमें दण्ड देना ही जानें, हमारा दमन ही करें, तो यह निश्चय ही अन्याय है।
आधुनिकी युग में स्त्री-पुरुष से समानाधिकार की माँग करती है। किन्तु समानाधिकार का अर्थ हर बात में पुरुष की बराबरी प्राप्त करना नहीं हो सकता। समानाधिकार का अर्थ होता है अपने कर्तव्य और सेवाओं के अनुरूप ही अधिकारों की प्राप्ति। इस दृष्टिकोण से भी देखते हुए हम समझते हैं कि स्त्री को आज पर्याप्त अधिकार प्राप्त नहीं हैं। हमें चाहिये कि हम पद द्वारा अधिकार प्राप्त करने की बर्बर-युग की प्रवृत्ति को भूलकर अपनी सेवा-सहायता के बल पर ही स्त्री से अधिकार लें। मनु के अनुसार पति को पत्नी पर वही अधिकार है जो कि पिता को पुत्री पर। अधिकारों के लिए पत्नी पुत्रीवत् है किंतु आज के जमाने में पुरुष जाति इस अधिकार की रक्षा तभी कर सकती है जबकि वह भी पत्नी के लिए पिता तुल्य होवे। भगवान राम को ही लीजिए। लक्ष्मण पर तो वे पुत्रवत् स्नेह रखते ही थे किंतु उसी भाव से वे भगवती सीता की रक्षा करते थे। भगवान राम, लक्ष्मण और सीता दोनों की उसी प्रकार रक्षा करते थे जिस प्रकार के पलक नेत्र के गोलकों की रक्षा करते हैं। वात्सल्य-भाव केवल सन्तान के प्रति ही हो सकता है अतएव राम का सीता के प्रति वात्सल्य-भाव अवश्य ही अद्भुत आदर्श एवं अनुकरणीय है।
(डॉक्टर युगलकिशोर चौधरी अग्रवाल)
दुर्भाग्य से हमारे देश के लोग अभी इस बात को भली-भाँति अनुभव नहीं कर रहे हैं कि आरोग्य प्राप्ति व दीर्घजीवन के लिए तरकारियों की कितनी अधिक आवश्यकता है और यह कि वे कैसी महत्वपूर्ण उपयोगी खुराक हैं- इसीलिए उनका उपयोग भी अधिक न होकर उन्हें एक साधारण खुराक समझा जाता है। अफसोस तो इस बात का है कि लोग उन्हें बहुत अधिक उबाल पकाकर पानी फेंक देते हैं, और फिर अनेक प्रकार के हानिकारक मसाले मिलाकर खाते हैं।
कच्ची हरी तरकारियों के पत्ते और डंठलों में अत्यन्त रोग नाशक तथा पोषक तत्व होते हैं और इस लिए उन्हें बतौर शाक के न खाया जाकर भोजन का एक प्रमुख भाग समझ कर खाना चाहिए। उनका सलाद बनाकर, रस निकालकर अथवा सुखा कर भी इच्छा उपयोग हो सकता है।
जिन लोगों के दाँत हैं, वे तो अच्छी तरह से गाजर, मूली, शलजम, सलाद, पत्ता गोभी, गाँठ गोभी, पालक, अथवा बथुआ घीया, टिंडे, परमल आदि तरकारियों को कच्ची खा सकते हैं और उनसे पूर्ण लाभ उठा सकते हैं किन्तु कारोबारी लोग, या वे जिनके दाँत कमजोर हैं, तरकारियों का रस चूस-चूस कर कच्चा पीकर पूरा फायदा उठा सकते हैं। ठोस तरकारियाँ तो भली-भाँति नहीं चबाई जा सकती किन्तु हरी सब्जियों का बचाया हुआ रस अत्यन्त हितकारी, गुणदायक, रोग नाशक तथा शक्ति व बल वर्द्धक सिद्ध होगा।
रक्त को शुद्ध लाल व विकार रहित रखने लिए लोहे (Iron) की बड़ी भारी आवश्यकता होती है इसलिए हमें काफी मात्रा में लोह युक्त तरकारियाँ खानी चाहिए।
प्राचीन गौरव प्राप्त करने के लिये
आओ, अपनी कमजोरियों पर कुल्हाड़ा चलावें।
हिन्दू जाति इतिहास में अपनी एक विशेषता रखती है। पुरातत्व विज्ञान की जो शोधें हुई हैं उनसे सिद्ध है कि मानव विकास के आरंभ काल में भारतवर्ष के निवासियों ने ही प्रगति के पथ पर तेजी से कदम उठाये थे। संसार की सब से प्राचीन पुस्तक ऋग्वेद हैं। जब तक दुनिया के अन्य भागों में लिखना-पढ़ना तो दूर बोलने योग्य भाषा का भी प्रचलन न हुआ था, तब भारत में ऋग्वेद जैसा, ज्ञान भण्डार अवतीर्ण हो चुका था। अध्यात्म, धर्म, स्वास्थ्य, शिल्प, कला, संगीत, भाषा, काव्य, रसायन, कृषि, व्यापार, पशुपालन, अस्त्र, शस्त्र, युद्ध, शासन, भूगोल, खगोल आदि का ज्ञान इसी जाति ने आविष्कृत किया और उसे संसार भर में बाँटा। आज मनुष्य जाति के पास बहुत साधन हैं, उनकी सहायता से नित्य नये वैज्ञानिक आविष्कार करना उतना कठिन नहीं हैं जितना कि अति प्राचीन काल में जब कि साधनों का बिलकुल अभाव था छोटा-मोटा आविष्कार करना भी कठिन है। अमेरिका की विज्ञान परिषद् के अध्यक्ष प्रोफेसर हार्बल ने ठीक ही कहा है कि सृष्टि के आदि में जिसने अग्नि जलाने, उसे सुरक्षित रखने और उपयोग में लाने का आविष्कार किया उसका मस्तिष्क आज के परमाणु अन्वेषक वैज्ञानिकों की अपेक्षा अधिक सक्षम रहा होगा।
हिन्दू जाति में अपनी एक दैवी विशेषता है जिसके कारण उसने सृष्टि के आरंभ से ही अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। अपने गुणों के कारण युगों तक उसने समस्त भूमण्डल पर एकछत्र चक्रवर्ती राज्य किया है। इस शासन के लिए उसे आज के साम्राज्य-वादियों की नीति अपनाने की व तो आवश्यकता थी न इच्छा। जो अतुलित ज्ञान भण्डार उसके पास था उसे वितरण करने के लिए यहाँ के नर रत्न सुदूर देशों को परमार्थ भावना से जाते थे। वे जहाँ जाते थे वहाँ की जनता उन्हें देवदूत के रूप में देखती थी और अपनी उन्नति, सुरक्षा, तथा सुख शान्ति के लिए सर्वोच्च सम्मान के साथ अपने यहाँ रख लेती थी। यही आर्य साम्राज्य था लूट-खसोट एवं शोषण जैसा कोई प्रश्न ही उनके सामने न होता था। लोकसेवा ही उस शासन की नींव होती थी। राम ने रावण का संहार किया पर सोने के लंका में से एक लोहे की कील भी वे अयोध्या न लाये। लंका की राज्य लक्ष्मी की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखा और उसे उन्होंने बदले हुए शासक विभीषण को ज्यों की त्यों सौंप दी। ऐसा परमार्थ एवं लोकहित से प्रेरित आर्य साम्राज्य समस्त भूमंडल तक फैला हुआ था।
भारतवर्ष को संसार के निवासी स्वर्ग कहते थे। इस स्वर्ग का शासक ‘इन्द्र’ कहलाता था। यहाँ के निवासी सुर या देवता कहलाते थे। तेतीस कोटि देवताओं का तात्पर्य यहाँ के निवासी तेतीस करोड़ देवोपम सभ्य, सुसंस्कृत, सर्वगुण-सम्पन्न मनुष्यों से है। यह देवता संसार भर में स्वर्गीय दूत की तरह सम्मानित होते थे, पूजे जाते थे। ऐरावत हाथी, कामधेनु गौयें, अमृत सी औषधियाँ, चित्त नन्दन वन उपवन, नृत्य संगीत, पारंगत अप्सराएं, गंधर्व, किन्नर, धनाधिप कुबेर, विद्या के भण्डार, सुरगुरु बृहस्पति, विज्ञानाचार्य शुक्र इसी लोक में थे। वज्र (बिजली) के अस्त्र-शस्त्र इन सुरों के ही पास थे। इस प्रकार एक समय यह भारतभूमि स्वर्ग भूमि कहलाती थी। उसका गौरव सर्वोपरि था।
इस गौरव का कारण थे आर्यों के जातीय गुण। अपनी विशेषताओं के कारण उनने सम्पन्नता प्राप्त की थी। जगद्गुरु और चक्रवर्ती शासक के रूप में उनने संसार की आत्मिक और भौतिक नेतृत्व करने का सम्मान प्राप्त किया और लक्ष्मी, सरस्वती तथा दुर्गा के वरद पुत्र कहलाए। धन, विद्या और पराक्रम में उनका साथी दूसरा न था। अपने इन गुणों के कारण इस देश का प्रत्येक निवासी स्वर्गीय सुखों को भोगता हुआ जीवन व्यतीत करता था। आज हमारी वह दशा नहीं रही, तो भी पुरातत्व विज्ञान, भूगर्भ विज्ञान, नृविज्ञान, एवं इतिहास के पंडित एक स्वर से यह बता रहे हैं कि सभ्यता का आदि स्त्रोत भारत से ही प्रवाहित हुआ। निखिल भूमंडल की प्रजा को आर्य जाति ने ही संस्कृति एवं सभ्यता का पाठ पढ़ाया, जीवनोपयोगी अनेकों विज्ञानों की शिक्षा देकर, उन्नति, समृद्धि और सुख शांति के पथ पर अग्रसर किया।
आज भी हमारे पूर्वजों के यश एवं गौरव की धवल ध्वजा फहरा रही है। जैसे नर रत्न इस वीर भूमि ने प्रसव किये, वैसे अन्यान्य नहीं दिखाई पड़ते। नाम गिनाने का अवसर नहीं, हमारे इतिहास का प्रत्येक पृष्ठ एक से बढ़कर एक, अनुपम नर रत्नों के गौरव से जगमगा रहा है। हमारी प्राचीन गौरव-गरिमा आज एक चुनौती के समान हमारे सामने खड़ी है।
पर आज हमने उस नेतृत्व को गंवा दिया। उन अपनी जातीय विशेषताओं को खो बैठे जिनके कारण देव कहलाते थे, देवदूत की तरह सर्वत्र आदर पाते थे। इस संसार में ईश्वरीय विधान ऐसा ही है कि जो जिस वस्तु का पात्र है वह उसे मिलता है। पात्रता एक ऐसी अविचल कसौटी है जिस पर कसकर लोगों को वह वस्तुएं परमात्मा दिया करता है, जिसके वे अधिकारी हैं। रोगी को मोंठ का पानी पीते, पहलवानों को हलुआ रबड़ी खाते हुए हम नित्य देखते हैं। निर्बुद्धियों को धे की तरह लदते और बुद्धिमानों को शासन करते हुए देखा जाता है, सद्गुणियों के प्रशंसा और दुष्ट दुराचारियों की निंदा सुनाई पड़ती है, ‘चींटी को कन भर और हाथी को मन भर’ भोजन नित्य मिल जाता है। निर्बल पिसते और सबल मौज उड़ाते चारों ओर दीखते हैं। जिसके पास जितना शरीर बल, बुद्धि बल, जन बल, चातुर्य बल, आत्म बल है वह उसी अनुपात से सुसम्पन्न बनता है। आज भी योरोप अमेरिका के निवासी स्वस्थ, दीर्घजीवी, धनी, विद्वान एवं साधन सम्पन्न हैं, उनकी तुलना में हम भारत वासी अनेक दृष्टियों से पीछे हैं। अविद्या, अज्ञान, अस्वस्थता, गरीबी, बेकारी से हम लोग परेशान हैं। नानाविधि शोषण, उत्पीड़न, बन्धन, अपमान सहते-सहते तो हजार वर्ष होने को आये। आज स्वाधीनता मिल रही है तो उसका बोझ उठाने के लिए कंधों की बलिष्ठता और पचाने के लिए जठराग्नि उत्साहवर्धक जवाब नहीं दे रही है। नीतिकारों का वचन है कि वैभव को सुरक्षित रखने की क्षमता जिसमें नहीं है उसके पास लक्ष्मी का अधिक समय ठहरना कठिन है।
अपने प्राचीन गौरव को खोकर पिछले एक हजार वर्ष में मुट्ठी भर विदेशियों और विधर्मियों द्वारा नाना प्रकार से पददलित और पीड़ित होना पड़ा, इसका कारण इन आक्रमणकारियों की बलिष्ठता या परिस्थितियों की विलक्षणता नहीं वरन् हमारी भीतरी दुर्बलता थी जिसने अपने आकर्षण से अपने सिर पर आपदाओं की काली घटाएं घुमड़ाइ। यही कमजोरियाँ हैं- जो अल्पसंख्यक कहे जाने वालों से हमें जगह-जगह हमें पिटवाती हैं। अन्यथा यदि हमारा जातीय शरीर स्वस्थ रहा होता तो उसकी समर्थता समझते और आक्रमणकारी बनने की अपेक्षा कृपा पात्र बनने में अधिक लाभ देखते। पर आज दूसरी ही स्थिति है बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों को प्रसन्न करने के लिए सिर के बल चलना पड़ रहा है और धरती पर नाक रगड़नी पड़ रही है, फिर भी कुछ प्रयोजन सिद्ध होता नहीं दीखता। परिस्थिति संभलने में नहीं आती। इसमें दोष अल्पसंख्यकों का नहीं है, उन पर कोई आरोप लगाना भी व्यर्थ है, यह तो सृष्टि का अनादि नियम है। बेचारी मधु मक्खियों को मार कर उनका छत्ता लूटने का लोभ भला कौन त्याग सकता है? मधुमक्खियों के नाना विधि प्रस्ताव, भाषण, वक्तव्य, लेख, अपील, समझौते उनके प्राणों की, घर की मधु की रक्षा नहीं कर सकते। किसी एक मधु लोभी को मक्खियाँ किसी प्रकार मना भी लें तो इसकी क्या गारंटी है कि अन्य कोई मधु लोभी न आ धमकेगा?
इस बात में दो मत नहीं हो सकते कि हमने अपने प्राचीन गौरव को अपनी निर्बलताओं के कारण खोया और एक लम्बे समय से वैसी ही यातनाएं भुगतते चले आ रहे हैं जैसी कि जर्जर शरीर, रोग ग्रस्त, शैया सेवी, असहाय, अभागों को भुगतनी पड़ती है। आज भी वह कमजोरी हमारा पीछा नहीं छोड़ रही है। फलस्वरूप पराधीनता के बन्धन शिथिल होते ही- गृह-युद्ध की लपटें उठने लगी हैं। इसमें कितने ही फूल से कोमल बालक-बालिकायें, बहनें-बेटियाँ एवं निरपराध व्यक्ति जलभुन गये, लुट-मिट गये और न जाने अभी कितनी यातनाएं सहनी शेष हैं। यह हत्यारी कमजोरी सर्वभक्षी डायन की तरह हमारे पीछे मुंह फाड़ कर, दाँत निकाल कर विकराल रूप से दौड़ी आ रही है, भागने से, उसकी ओर से आंखें बन्द करने से, काम न चलेगा। यदि अपने प्राण बचाने हैं तो इससे लड़ना होगा, परास्त करना होगा अन्यथा निश्चित समझिए कल नहीं तो परसों वह हमारा नाम-निशान मिटाकर छोड़ेगी।
पिछले पचास वर्षों में राष्ट्रीय महासभा कांग्रेस ने राजनैतिक शक्ति संचार का प्रयत्न किया है। उस प्रयत्न से फलस्वरूप सर्वसाधारण में से हीनता और भय की भावना किसी कदर कम हुई हैं राजनैतिक क्षेत्र में कितने ही व्यक्तियों ने प्रशंसनीय त्याग भी किये हैं। इस थोड़ी सी शक्ति का ही यह परिणाम हुआ कि विदेशी शासकों को यह दीख गया कि जिस शिला के ऊपर हम बैठे थे वह डगमगा रही है। इसलिए उनने औंधे मुँह गिर पड़ने से पूर्ण ही अपना स्थान खाली कर देने की दूरदर्शिता से काम लिया है और शासन सत्ता हमारे हाथ में आ गई है परन्तु इस परिवर्तन से वह अन्दाज न लगा लेना चाहिये कि हमने उचित जातीय बल का प्राप्त कर लिया है, अभी उसमें भारी कमी है। उस कमी के कारण ही स्वर्ग से गिरा अमर फल आकाश में ही लटक गया वाली कहावत के अनुसार स्वाधीनता से प्राप्त होने वाले सुखों से हमें वंचित ही रहना पड़ रहा है। अब चेतना का युग आरंभ हो रहा है। अब चेतना का युग आरंभ हो रहा है, हमारे भाग्य ने करवट ली है इस संक्रान्ति बेला में आइए विचार करें कि-हम क्या थे? क्या से क्या हो गये? कितने दीर्घकाल तक अंधकार के गहरे गर्त में पड़े रहे? किन नगण्य शक्तियों के तुच्छ अंकुश से हमारा जातीय ऐरावत बन्दर की तरह नाचता रहा और आज भी हमारे पास अपार साधन होते हुए भी ऐसी हीन दशा का अनुभव करना पड़ रहा है? भूलों से शिक्षा ग्रहण करते हुए अज्ञान की निद्रा से उठना होगा और पुनः अपने उसी प्राचीन महान गौरव को प्राप्त करना होगा। यह सुनिश्चित है कि हिन्दू जाति में एक दैवी विशेषता है। संसार में इतिहास में अनेकों जातियों का उद्भव हुआ और वे नष्ट हो गई उनका कहीं अता-पता भी नहीं है, पर यह हिन्दू जाति ही है जिसने बड़े बुरे और भले समय देखे हैं पर अभी तक जीवित है। पराधीन और पददलित होते हुए भी उसकी कोख से गाँधी और जवाहर जैसे नर रत्न पैदा होते हैं। हम महान थे आज गिर गये हैं तो भी हमारा भविष्य महान है।-
सूचना- आज हमारी संस्कृति, जाति और मातृभूमि के सामने जीवन मरण की समस्याएं उपस्थित हैं। इन समस्याओं के संबंध में हम सबको गंभीरतापूर्वक विचार करने की और समुचित हल निकाल कर सुदृढ़ मार्ग अपनाने की आवश्यकता है। अखण्ड ज्योति अपने परिवार से विचार विनिमय कर के सामूहिक विचारों का निचोड़ आगामी अंक में उपस्थित करेगी। पाठक प्रतीक्षा करें।
नशेबाजी पहले पहले शौक में शुरू होती है। नौसिखिया पीने वाला यह नहीं समझता कि इसके कोई लाभ भी है। दोस्त लोग उसे चस्का लगाते हैं ‘लीजिए आप पीजिए’ के साथ मुफ्त में नशे की एक खुराक भेंट की जाती है। पीने वाला एक कौतूहल उमंग के साथ उसे पीता है। थोड़े दिन ऐसे ही सिलसिला चलता है, बाद में यह नशा, उसके स्नायु तन्तुओं पर कब्जा करके अपने वश में कर लेता है। फिर छोड़ना मुश्किल पड़ता है। समय पर नशा न मिले तो बेचैनी उठ खड़ी होती है।
नशेबाजी का शौक लगाने के लिए ‘लीजिए आप पीजिए’ का सत्कार एक ऐसी शैतानी माया है जिसकी भयंकरता को कहने वाला और स्वीकार करने वाला दोनों ही नहीं जानते। पर शैतान अपनी सफलता पर खड़ा-2 हंसता है कि मेरी जीत हो रही है यह दोनों मूर्ख खुशी-खुशी मेरा काम कर रहे हैं।
तमाखू को ही लीजिए। बीड़ी, सिगरेट, सिगार, हुक्का, सुँघनी, जर्दा आदि के रूप में इसका आजकल अत्याधिक प्रचलन है। अधिकाँश लोग इसके चंगुल में फंस कर अपने स्वास्थ्य और धन की छोली फूँकते रहते हैं। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार भारत वर्ष में प्रति वर्ष 12 लाख एकड़ भूमि में तमाखू कह खेती होती है। जिसमें करीब एक अरब रुपये का तमाखू उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त सिगरेट, सिगार तथा अन्य रूपों में 256 लाख रुपये की तमाखू विदेशों से आता है। इतनी बड़ी सम्पत्ति को लोग धुआँ बनाकर फूँक देते हैं। यदि इतनी भूमि में खाद्य पदार्थों की खेती होती तो उसमें करीब 2 करोड़ 35 लाख मन अन्न पैदा होता इतने अन्न से कंगाल जैसी भुखमरी और आज के खाद्य संकट को आसानी से रोका जा सकता था। परन्तु नशेबाजी ऐसा करने दे तब न!
तमाखू पीने से स्वास्थ्य पर कितना घातक असर पड़ता है इसके लिए साँर के कुछ अत्यंत लब्ध प्रतिष्ठ और ख्यातिनामा डाक्टरों की सम्मतियाँ नीचे दी जाती हैं-
डॉक्टर केलाँग लिखते हैं- किसी वस्तु को शरीर में सर्वत्र व्याप्त करने का सबसे सरल तरीका उसका धुँआ लेना है। तमाखू का धुँआ फेफड़ों में जाता है और उसकी दीवारों में से छनकर अन्य अंग-प्रत्यंगों पर अपना प्रभाव डालता है दिल में आने-जाने वाले खून को वह धुँआ अपना जहर बराबर देता रहता है फलस्वरूप खून के शुद्ध और सजीव परमाणु अशुद्ध और मूर्च्छित हो जाते हैं।
डॉक्टर रिचर्डसन लिखते हैं- तमाखू पीने वाले के पेट के भीतर कोमल त्वचात्मक भीतरी आवरण पर गोल-गोल दाग पड़ जाते हैं। खून पतला हो जाता है। फेफड़े कमजोर हो जाते हैं। हृदय की स्वाभाविक धड़कन के स्थान पर एक प्रकार का कम्प शुरू हो जाता है।
डॉक्टर फूट का कथन है- नपुँसकता के कारणों में तमाखू पीना एक मुख्य कारण है। मेरे पास गुप्त रोगों का इलाज कराने कितने ही रोगी आते हैं। मैं उनसे कह देता हूँ कि दो में से एक बात पसंद कर लो- पुँसत्क या तमाखू। तमाखू से प्यार हो तो काम सेवन की तरफ से तो निराशा हो जाओ। तमाखू के विष से आरम्भ में बड़ी कामोत्तेजना होती है जिससे प्रेरित होकर लोग अधिक वीर्यपात करते हैं। थोड़े दिनों में उनका कोष खाली हो जाता है और नसें शिथिल पड़ जाती हैं। फलस्वरूप वे नपुँसक हो जाते हैं।
डॉक्टर रश बारन का मत है- तमाखू का विष दाँतों की बड़ी हानि पहुँचाता है। दाँत पीले पड़ जाते हैं और समय से पूर्व ही उखड़ जाते हैं।
डॉक्टर कैलन ने लिखा है- मेरे अस्पताल में जितने भी कब्ज के रोगी आये वे सबके सब तमाखू पीने वाले थे।
डॉक्टर हासेक कहते हैं- मंदाग्नि का मुख्य कारण तमाखू है।
डॉक्टर रगलेस्टर- आमाशय, आँतें और जिगर तमाखू के विष से शिथिल पड़ जाते हैं और अजीर्ण रहने लगता है।
डॉक्टर सीलीमेन- तमाखू से श्वास नली और फेफड़ों में जख्म होकर सड़न पैदा हो जाती है और वहाँ से खाँसी, जुकाम तथा दम्भ की उत्पत्ति होती है।
डॉक्टर विलियम अलकाट- तमाखू से आँखों को बड़ी हानि पहुँचती है।
डॉक्टर एलिन्सन- तमाखू के धुएं से हृदय की धड़कन बढ़ जाती है तथा आँख, कान, जिह्वा एवं नासिका की शक्तियाँ शिथिल पड़ जाती हैं।
डॉक्टर निकोलस- जननेन्द्रियों पर तमाखू का बहुत बुरा असर पड़ता है। इससे संतानोत्पत्ति का कार्य कठिन हो जाता है। बच्चे दुर्बल, रोगी, बुद्धिहीन और कुरूप होते हैं। इसके अधिक पीने से स्त्रियाँ बन्ध्या और पुरुष नपुँसक हो जाते हैं।
डॉक्टर केविन ने स्त्रियों की एक सभा में कहा था कि- बहनों! मैं तुमको सलाह देता हूँ कि रोगोत्पादक, अत्यंत गंदे निंद्य तमाखू और शराब के दुर्व्यसनों में फंसे हुए पामर पुरुषों से सदैव दूर रहो। वे बड़े विषयान्ध होते हैं। नशेबाजी उन्हें दरिद्री, रोगी, चिड़चिड़ा और अल्प आयु बना देती है। तुम्हें चाहे जीवन भर कुमारी रहना पड़े पर नशेबाजों को अपना पति न बनाओ क्योंकि ऐसे पुरुष, पिता और पति बनने से सर्वथा अयोग्य होते हैं।
डॉक्टर नेलसन- दिमागी खराबी और पागलपन का सबसे बड़ा कारण तमाखू है।
डॉक्टर इर्स्टवेन्स- तमाखू स्मरण शक्ति को घटाती है और मानसिक शक्तियों को ढीला कर देती है।
डॉक्टर हिचकारक- इन्द्रिय दौर्बल्य, स्मरण शक्ति की कमी, अदूर दर्शिता, चित्त की चंचलता, चिड़चिड़ापन जैसे अनेक रोग तमाखू से उत्पन्न होते हैं। कितने ही बौद्धिक प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों की योग्यता को तमाखू ने धूल में मिला दिया है।
उपरोक्त सम्मतियों पर विचार करने से पाठक यह अनुमान लगा सकते हैं कि तमाखू का मंद विष यद्यपि तुरन्त ही मनुष्य को मार नहीं डालता तो भी धीरे-धीरे चालू रहने वाले इस दुर्व्यसन से हमारी अपार हानि होती है। इसलिए पाठको! तमाखू से बचो, इस शैतान की माया से अपने को दूर रखो। जो आपको ‘लीजिए आप पीजिए’ कह कर तमाखू भेंट कर रहा हो, उससे सावधान रहिए ऐसे स्वागत को स्वीकार कर दीजिए।
प्रेम, सेवा, त्याग सहानुभूति और मधुर भाषण ने किसको अपने वश में नहीं किया?
*****
सज्जन अपने साथ की गई भलाइयों को नहीं भूलते, हाँ! अपने साथ की गई बुराइयों को अवश्य भूल जाते हैं।
*****
दुनिया के साथ भलाई करता जा और भूल जा।
*****
जितना भारी आनन्द निष्कपटता और सत्य व्यवहार में है, उतना ही भारी दुःख, छल, कपट एवं दम्भ में है।
*****
जो मनुष्य दूसरों को तनिक सी छेड़ छाड़ से ही क्रोध से उत्तेजित हो जाते हैं वे दुर्बल हैं।
(जार्ज सिडनी अरेण्डल)
सच्ची सेवा वही है जो भार (बोझे) को हल्का कर दे- यह नहीं कि उसे एकदम हटा ही दे।
तुम तभी औरों की पूरी सहायता कर सकोगे तब तुम उन्हें अपने अपने आदर्श का गठित हुआ समझकर स्वीकार करोगे।
मनुष्य में जो उत्तम गुण हैं उसी से वह दूसरे की सेवा सहायता करने में समर्थ है। सेवा की उतनी ही भाँतियाँ संसार में हैं जितने सहाय्यापेक्षी मनुष्य हैं।
सुरभित सुन्दर सुमनों का सौरभ लेकर सर्व साधारण को घ्राणामोद पहुँचाने वाली हवा को ग्रीष्मातप क्लान्त तृषार्त्त पथिक को सुखाश्रय देने वाले शीतल जलान्वित कूप को गोदी में लिए हुए सघन विशाल वटवृक्ष देव को- इन दोनों सेवा पथ के पथिकों को- आदर्श बना कर चलो।
विचारो- दिन को एक एक मुहूर्त सत्सेवा के लिए है। कारण यद्यपि प्रतिक्षण दया पूर्ण कार्य करने का अवसर नहीं प्राप्त हो सकता है तथापि दयार्द्र भाव बनाये रखने का शुभ अवसर हर घड़ी सामने रहता है।
मनुष्य जितना ही अपने (सुख के) विषय में कम विचार करेगा उतना ही वह अपनी उन्नति का सहायक हो सकेगा। सेवा का छोटा से छोटा कार्य भी- सेवी के समक्ष- विश्व सेवक भाव की उत्तरोत्तर वृद्धि के रूप में दिखाई देता है।
यदि कोई मनुष्य तुम्हारी सेवा उस रूप में अंगीकार नहीं करता है जिस रूप में तुम देना चाहते हो तो कोई दूसरी (नई रीति) राह निकालो। तुम्हारी मनोकामना तो यहीं रहनी चाहिए किसी प्रकार से सेव्य पात्र की उचित सेवा बन पड़े। उसके प्रति तुम्हें यह कदापि प्रकट न करना होगा कि किस प्रकार तेरे द्वारा उसकी सेवा की जायगी।
किसी की सेवा करने में लज्जित मत हो। चाहे वह तुम्हारा परिचित हो या अपरिचित। उसकी आवश्यकता (चाह-दरकार) तुम्हें उसका भाई बना देती है किन्तु तुम्हारी लज्जा एक प्रकार का मोहमय गर्व है जो उसकी आवश्यकता पड़ने पर एक सहायक से उसे वंचित कर डालती है।
आप मन में कभी ऐसी भावना न आने दो कि तुमने आज औरों की कुछ सहायता की है बल्कि यही सोचते रहो कि तुम और अधिक सहायता किसी को पहुँचा सकते हो या नहीं। साथ ही साथ यह भी ध्यान रखो कि इस प्रतारणामूलक संसार के कितने प्राणियों का कष्ट निवारण करने में तुमने सहायता पहुँचाई है। अर्थात् तुम्हारी सेवा द्वारा कितने दुःखी जीव सुख प्राप्त कर सकते हैं।
जो लोग सद्गुरु के सच्चे शिष्य हैं वे ही लोग (समाज के) नेता हो सकते हैं क्योंकि जो आज्ञा-पालन करना नहीं जानता वह कदापि दूसरे को अपनी आज्ञा का वशवर्ती नहीं बना सकता।
यदि किसी मनुष्य को तुम अपनी सलाह मानने को बाध्य करना चाहते हो तो पूर्व ही से तुम स्वयं उसके सदुपदेशों के अनुसार चलने लग लाओ।
निष्कलंक एवं अनवद्य कार्य तुम तभी सम्पादन कर सकते जब तुम अपनी प्रशंसा या कीर्ति का विचाराँकुर अपने मानस क्षेत्र से एकदम ध्वंस कर दोगे। संसार में अमर होना चाहो तो बिना किसी लाग लपेद या स्वार्थ के अपनी सेवा व्यय करते जाओ। यदि सज्जनों द्वारा अपने अच्छे कार्य और विचारों के बदले में तुम अपनी प्रशंसा चाहते हो तो दूसरों के अच्छे कार्य और विचारों पर अपनी हार्दिक हर्ष और प्रशंसा वादिनी सम्मति प्रकट किया करो। अपनी भलाई चाहते हो तो दूसरों की भलाई करने का दृढ़ व्रत धारण कर लो।
(ले.- श्री एम. सरवैया मोती)
आलिश में जल रहा है ऐशो-अमन हमारा। बिजली फलक से टूटी या गिर पड़ा सितारा॥
बर्बाद हो रहा है आबाद घर हमारा। तुमने नहीं सुना है? हमने तुम्हें पुकारा!
हम मादरे-वतन के साए में रह चुके हैं।
मानिन्द घास के हम दर्या में बह चुके हैं॥
तूफानी सख्तियों के तूफाँ में रह चुके हैं।
दुश्मन की लाख सर पै तलवारें सह चुके हैं॥
बुझ-बुझ के जल रहा है फिर भी दिया हमारा। तुमने नहीं सुना है? हमने तुम्हें पुकारा!
लोहू से आज अपनी सूखी निगाह तर है।
अपनी तबाहियों की हमको नहीं खबर है॥
आहें हैं उफ्! लबों पर दिल में भरा जहर है।
गमगीन किसके गम में हिन्दोस्ताँ का घर है?
यजमुर्दगी से चेहरा रोशन नहीं हमारा। तुमने नहीं सुना है? हमने तुम्हें पुकारा!
हम बेखुदी में अपनी कुछ ऐसे भूल बैठे।
झूला समझ के तख्ते-फाँसी पै झूल बैठे॥
मक्कारियों से अपने धड़ पर से सडडडडडड गये हैं।
जिसने हमें बनाया हम उसके बन गये हैं॥
अपने लहू से दामन है सुर्खरु हमारा। तुमने नहीं सुना है? हमने तुम्हें पुकारा!
प्यासा नजर के आँसू खुद अपनी पी रहा है।
हैरत है इन्सा मुर्दा बनकर के जी रहा है॥
वो बेवफाई करके हमको वफा दिखाने है।
बुलबुल के चाक दिल को सैयाद सी रहा है॥
सीने से और ज्यादा सीना फटा हमारा। तुमने नहीं सुना है? हमने तुम्हें पुकारा!
जो यार थे वो देखो ऐय्यार बन गये हैं।
गुलशन के फूल अपने सब खार बन गये हैं॥
अहले-वफा थे जितने मक्कार बन गये हैं।
चाकू भी दुश्मनों के तलवार बन गये हैं॥
धारों की सख्तियों से कटता गला हमारा। तुमने नहीं सुना है? हमने तुम्हें पुकारा!
उड़-उड़ के गिध देखो मंदिर पै आ रहे हैं।
गम के सियाह बादल मस्जिद पै छा रहे हैं॥
कोई उदास अर्थी लेकर के चल रहे हैं।
कोई उठाके मैय्यत काँधे बदल रहे हैं॥
मरघट में दफन होगा दीनों-धर्म हमारा। तुमने नहीं सुना है? हमने तुम्हें पुकारा!
*समाप्त*