गुण-ग्राहक दृष्टि को जागृत कीजिए

जिसके दोष देखने को हम बैठते है उसके दोष ही दोष दिखाई पड़ते है। ऐसा मालूम पड़ता है कि इस प्राणी या पदार्थ में दोष ही दोष भरे हुए हैं, बुराइयां ही बुराइयां उसमें संचित हैं। पर जब गुण ग्राहक दृष्टि से निरीक्षण करने लगते हैं तो हर प्राणी में, हर पदार्थ में कितनी ही अच्छाइयाँ, उत्तमताएं, विशेषताएं दीख पड़ती हैं।

वस्तुतः संसार का हर प्राणी एवं पदार्थ तीन गुणों से बना हुआ है। उसमें जहाँ कई बुराई होती हैं वहाँ कई अच्छाइयाँ भी होती हैं। अब यह हमारे हाथ में है कि उसके उत्तम तत्वों से लाभ उठावें या दोषों को स्पर्श कर दुखी बनें। हमारे शरीर में कुछ अंग बड़े मनोहर होते हैं पर कुछ ऐसे कुरूप और दुर्गन्धित हैं कि उन्हें ढके रहना ही उचित समझा जाता है।

इस गुणदोषमय संसार में से हम उपयोगी तत्वों को ढूंढ़ें, उन्हें प्राप्त करें और उन्हीं के साथ विचरण करे तो हमारा जीवन सुख मय हो सकता है। बुराइयों से शिक्षा ग्रहण करें, सावधान हों, बचें और उनका निवारण करने का प्रयत्न करके अपनी चतुरता का परिचय दें तो बुराइयाँ भी हमारे लिए मंगलमय हो सकती हैं। चतुर वैद्य वह है जो विषों को शोधन और मारण करके अमृतोपम औषधि बना लेता है, चतुर मनुष्य वह है जो बुराइयों से भी लाभ प्राप्त कर लेता है गुण ग्राहक दृष्टि को जागृत करके हम हर स्थिति से लाभ उठा सकते हैं।

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अगला अंक ‘गायत्री’ अंक होगा।

ऐसा बहुमूल्य ज्ञान भाग्यवानों को ही प्राप्त होता है।

आप अपने मित्रों से कहिए कि वे आज ही अखंड ज्योति के ग्राहक बनें और

इस अमूल्य रत्न भण्डार से वंचित न रहें।

अखण्ड ज्योति का अगला अंक गायत्री अंक होगा। उसमें वेद माता गायत्री के ऐसे रहस्यों का प्रकटीकरण किया जाएगा जो अब तक बहुत कम लोगों को विदित है। पृष्ठ संख्या साधारण अंक से ड्योढ़ी रहेगी पर इतने ही पृष्ठों में जो अमूल्य ज्ञान रहेगा उसकी तुलना ऊँट पर लदने लायक पोथों से भी नहीं की जा सकती।

‘वेद-हिन्दू’ संस्कृत के उद्गम स्रोत हैं, इन वेदों का उद्भव वेद माता गायत्री से हुआ है। इस महामंत्र में सूक्ष्म रूप से यह सब भरा हुआ है जो हमारे विविध धर्मशास्त्रों में सविस्तार कहा गया है। गायत्री के बारे में अधिक से अधिक जानना हर विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य है। इस, उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए यह अंक पाठकों के समक्ष उपस्थित किया जा रहा है।

पाठ्य सामग्री बहुत अधिक होने से उसे अप्रैल और मई दो अंकों में पूरा किया जायगा, लेख एक से एक उत्तम, अमूल्य और अत्यन्त खोज पूर्ण हैं। उनमें से कुछ लेखों की सूची नीचे दी जाती है। इनके अतिरिक्त और भी अनेकों लेख होंगे।

(1) गायत्री की उत्पत्ति कैसे हुई?

(2) वेदमाता गायत्री का तत्व ज्ञान।

(3) सतोगुणी ब्राह्मी शक्ति की वास्तविकता।

(4) आत्मबल और परमात्मा की प्राप्ति।

(5) गायत्री का महान् महात्म्य।

(6) दीक्षा और गुरुमंत्र का आधार गायत्री।

(7) गायत्री द्विजों का नित्य नियम।

(8) इस साधना की पाँच शर्तें।

(9) गायत्री शिक्षा से भूतल पर स्वर्गीय सुख।

(10) घोर विपत्तियों से छुटकारा।

(11) नौ अद्भुत सिद्धियों की प्राप्ति।

(12) गायत्री और यज्ञोपवीत का प्रगाढ़ संबंध।

(13) सूक्ष्म ग्रन्थियों का विकास।

(14) षट्चक्रों और कुँडलिनी का जागरण।

(15) गायत्री की त्रिविधि साधना।

(16) अलौकिक शक्तियों का आभास।

(17) सर्व पापनाशक प्रायश्चित का विधान।

(18) साधना की आवश्यक जानकारियाँ।

(21) गायत्री साधक को होने वाले अद्भुत अनुभव

(22) चौबीस शक्तियों का उद्भव।

(23) सब अशकुनों का परिहार।

(24) गायत्री द्वारा भौतिक और आत्मिक उन्नतियाँ।

(25) विघ्न विदारक सवालक्ष जप का अनुष्ठान

(26) महा अनुष्ठान से मंत्र सिद्धि।

(27) ध्यान की धारणा से समाधि।

(28) गायत्री साधना से समस्त मंत्रों का लाभ।

(29) मानवधर्म शास्त्र का निचोड़-गायत्री।

(30) एक एक शब्द में ज्ञान समुद्र का समावेश

जिन्हें यह अमूल्य सामग्री प्राप्त करनी हो वे शीघ्र से शीघ्र ग्राहक बन जायें। अंक उतना छपेगा जितने ग्राहक हैं। देर करने वालों को अमूल्य अंक से वंचित रहना पड़ेगा।

मैनेजर ‘अखण्ड ज्योति’, मथुरा

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दान में विवेक की आवश्यकता

दान लेने और देने वाले के मन में यह प्रश्न पूरी सतर्कता के साथ उपस्थित रहना चाहिए कि इस पैसे का उपयोग (1) यज्ञार्थय (2) विपद्, निवारणाय, इन दो कार्यों के अतिरिक्त और किसी तीसरे काम में तो नहीं होगा। जब यह पूर्ण निश्चय हो जाय तभी दान देना और लेना चाहिए। संसार में शारीरिक, मानसिक नैतिक, सामाजिक, आर्थिक आध्यात्मिक विभूतियों की संवृद्धि के लिए पंच पाप तापों को हटाने के लिए जो प्रयत्न होते हैं वे यज्ञ हैं और विपद् ग्रस्तों को अपने पैरों पर खड़ा कर देने के लिए एवं असमर्थों की जीवन रक्षा के लिए जो कार्य किये जाते हैं वे विपद् निवारण की श्रेणी में आते हैं। इन कार्यों में पैसा, समय, बल बुद्धि और आवश्यकता होने पर प्राण तक दे देने चाहिए। यह दान की शास्त्रीय मर्यादा है।

उपरोक्त शास्त्रीय मर्यादा के अतिरिक्त अन्य प्रयोजनों के लिए जो दान लिया या दिया जाता है वह सब प्रकार अनिष्ट कर, घातक, भयंकर परिणाम उत्पन्न करने वाला तथा पाप कर्म है। अशास्त्रीय भिक्षा-पाप, अनाचार, दुख, दुर्गुण एवं नरक की सृष्टि करती है। भिक्षा सचमुच एक लज्जा की चीज है। सर्वत्र भिक्षा माँगने को मृत्यु के समान कष्टदायक-अपमान जनक-कहा है। सचमुच अशास्त्रीय भिक्षा अत्यन्त ही गर्हित है। वह नीचता, हीनता, निर्लज्जता एवं पशुता को प्रकट करती है।

हमारे देश एवं धर्म का यह दुर्भाग्य है कि आज अशास्त्रीय भिक्षा पर जीविका निर्भर करने वाले मनुष्यों की संख्या लाखों तक पहुँच गई है, पिछली सरकारी जनगणना के अनुसार भारत वर्ष में भिखारियों की संख्या 56 लाख के लगभग पहुँच गई है। इनमें से भिक्षा के वास्तविक अधिकारी उंगलियों पर गिनने लायक निकलेंगे। लोक कल्याणकारी, जन सेवा के कार्यों में सर्वतोभावेन लगे हुए विद्वान निस्पृह ब्राह्मणों की संख्या अत्यन्त ही न्यून निकलेगी, सब कुछ त्याग कर संन्यासी होकर जनता जनार्दन की आराधना में प्रवृत्त साधु संन्यासी चिराग लेकर खोजने पड़ेंगे। आकस्मिक, घोर अनिवार्य विपत्ति से पीड़ितों एवं असमर्थ, असहाय दरिद्रों की संख्या भी बहुत ही कम निकलेगी। इन छप्पन लाख भिक्षुकों में पाँच हजार भिक्षुक भी कठिनाई से ऐसे निकलेंगे जो शास्त्रीय भिक्षा के अधिकारी हैं शेष साढ़े पचपन लाख तो ऐसे मिलेंगे जिन्होंने भिक्षा को एक लाभदायक व्यवसाय बना लिया है।

ब्रह्मणत्व के समस्त गुणों से रहित व्यक्ति भी अपने को इस आधार पर भिक्षा का अधिकारी बताते है कि हम ब्राह्मणों के वंशज हैं। यह झूठा दावा है। ब्राह्मणत्व कोई जागीर नहीं है जो पुश्त दर पुश्त विरासत में मिलती चली जाय। जो व्यक्ति ब्राह्मणत्व के गुण कर्म स्वभाव से युक्त है उसे भिक्षा जीविका करनी चाहिए पर यदि उसके बेटे में वे गुण न रहें तो उसे ब्राह्मणत्व के लिए मिलनी वाली भिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नहीं है। इसी प्रकार संसार को मुक्ति दिलाने के प्रयत्न में अपनी मुक्ति तक को त्यागे हुए जो संन्यासी हैं वे ही अपनी सेवा के बदले में संसार से भिक्षा ले सकते हैं। जो केवल मात्र अपनी निज की मुक्ति के लिए प्रयत्नशील हैं, दुनिया को झूठा कहते हैं, लोक सेवा से दूर रहते हैं वे पक्के स्वार्थी हैं। वे अपने निज के लाभ में ही तो प्रवृत्त हैं, चाहे वह लाभ धन का हो, स्वर्ग का हो या मुक्ति का हो। जैसे धन कमाने के लिए ही सदा अपने व्यापार में प्रवृत्त कोई व्यापारी भिक्षा का अधिकारी नहीं, वैसे ही अपनी निज की मुक्ति में तल्लीन योगी संन्यासी भी भिक्षा के अधिकारी नहीं। जब संसार झूठा है तो भिक्षा भी झूठी है। जब संसार की सेवा से उपेक्षा करते हैं और अपने को उससे अलग मानते हैं तो फिर भिक्षा से भी अलग रहना चाहिए, उसकी भी उपेक्षा करनी चाहिए। भजन करना व्यक्तिगत नित्य कर्म है, स्नान, भोजन, व्यायाम की भाँति भजन भी एक अत्यन्त लाभप्रद नित्यकर्म है। भजन भी एक अत्यन्त लाभप्रद नित्यकर्म है। भजन करना किसी दूसरे पर अहसान करना नहीं है। न इसके करने से किसी को भिक्षा लेने का अधिकार मिलता है।

देखा जाता है कि धर्म के नाम पर या दीनता के नाम पर नाना प्रकार के आडम्बरों, घृणित मायाचारों से भिक्षा उपार्जन की जाती है। इन मायाचारों से जहाँ जनता का पैसा बर्बाद होता है वहाँ उसके मस्तिष्क में अन्धविश्वास, भ्रम, भय, अज्ञान एवं अविचार का विष भी प्रवेश होता है। पुरुषार्थ, प्रयत्न, कर्म और साहस को छोड़ कर लोग आकाश में से देवताओं द्वारा स्वर्ण पुष्प बरसाये जाने की आशा करने लगते हैं। अनेकों व्यक्ति अपने कार्यों में दोष ढूंढ़ कर उन्हें सुधारने की अपेक्षा दैव कोप की अनिष्ट कल्पना करके हतोत्साह हो जाते हैं। धर्म का आडम्बर करके जीविका कमाने वालों के पास विद्या-बल, विवेक, ज्ञान, अनुभव, तप आदि महत्ताएं तो होती नहीं, इनके न होने पर वे झूठा आधार ग्रहण करते हैं। अपने आपको देवताओं का प्रतिनिधि, कृपापात्र या एजेन्ट साबित करते हैं जिससे भोली जनता उन्हें देव कृपा प्राप्त करने के लिए पूजे। यह मायाचार जनता में ऐसे विषैले अन्धविश्वास पैदा करता है, जो संसार में भयंकर अनिष्ट उत्पन्न करते हैं।

गरीबी का आडम्बर बना कर भिक्षा माँगने वाले अधिकाँश ऐसे व्यक्ति होते हैं, जिनके शरीर में श्रम करने की, जीविका उपार्जन करने की पर्याप्त क्षमता होती है, वे चाहें तो मेहनत मजदूरी करके आसानी से अपना गुजारा कर सकते हैं। पर उन्हें बिना परिश्रम किये, आसानी से जब भिक्षा मिल जाती तो पसीने बहाने के लिए क्यों तैयार हों? वे गरीबी के, बीमारी के, विपत्ति के झूठे बहाने बनाकर भिक्षा माँगते रहते हैं। कुछ अत्यन्त घृणित कोटि के भिक्षुक तो अधिक जीविका कमाने के लिए बड़े लोमहर्षक कार्य करते हैं। वे अपने शरीर में स्वेच्छापूर्वक घाव बनाते हैं, घावों को अच्छा नहीं होने देते, अपने बालकों के नेत्र हाथ, पैर, आदि तोड़ देते हैं, इस घृणित काम को वे इसलिए करते हैं कि दर्शक लोग दया द्रवित होकर उन्हें अधिक पैसा दें। गायों या बछड़ों को पाँच पैर का या अधिक अंग का बनाने के लिए कसाइयों द्वारा कलम लगवाई जाती है। एक बछड़े का पैर काट कर और दूसरे बछड़े की पीठ का माँस काट कर इन दोनों को कसाई लोग सी देते हैं। जब तक वह घाव अच्छा नहीं होता तब तक बछड़े को इस प्रकार जकड़ा रहने देते है कि वह जरा भी हिल न सकें। जब जुड़ जाता है तो इसे शिवजी का वाहन नन्दी बता कर भिखारी लोग भीख माँगते है। बहुत से बछड़ों के पैर की जगह माँस का लोथड़ा भी जोड़ देते हैं। इस क्रिया में एक बछड़ा तो आरम्भ में ही मार डाला जाता है, दूसरा जिसमें कलम लगाई गयी थी या तो मर जाता है या बड़ी मुश्किल से मृत्यु तुल्य कष्ट सह कर जी पाता है। ऐसे निर्दय हिंसा पूर्ण कार्य करते हुए उन्हें तनिक भी दया नहीं आती। धर्म जीवी भिक्षुकों में से भी अनेक ऐसे ही निर्दय हो जाते हैं। देवी-भैरव, भवानी, पीर, मसान आदि के नाम पर बकरा, भेड़ों, भैंसा, मुर्गा आदि पशु पक्षियों का गला काटते और कटवाते हैं।

अशास्त्रीय भिक्षा, पाप रूप है। ऐसा अन्न खाने वालों के रोम रोम में दुर्गुणों का समावेश हो जाता है। वे झूठ, चोरी, छल, व्यभिचार, मद्यपान, नशेबाजी, ढोंग, पाखण्ड, आलस्य, प्रभाव, हिंसा असहिष्णुता, अनुदारता आदि असंख्यों दोषों से ग्रसित हो जाते है। स्वाभिमान एवं स्वावलम्बन नष्ट होने के साथ साथ आत्मा की भव्य ज्योति झुक जाती है और उनसे मन मरघट में पैशाचिक कुविचार नंगा नृत्य करने लगते हैं। अशास्त्रीय भिक्षा का अन्न सद्बुद्धि पर बड़ा घातक आक्रमण करता है और ऐसा अन्न, खाने वाले को तो शीघ्र ही एक घृणित दयनीय नारकीय प्राणी के रूप में परिणत कर देता है। ऐसे प्राणियों की वृद्धि होना किसी भी देश या जाति के लिए एक भारी खतरा है क्योंकि वे प्राणी संक्रामक रोगों के कीटाणुओं की भाँति जहाँ भी फिरते हैं वहीं अनिष्ट उत्पन्न करते हैं।

सच्चे यज्ञार्थी भिक्षकों की अभिवृद्धि किसी भी समाज के लिए गौरव की बात है। त्यागी, परोपकारी, विद्वान, विशेषज्ञ, अपने सम्पूर्ण निजी स्वार्थों को तिलाँजलि देकर जन कल्याण के कार्य में जुटे रहें यह बड़ा ही ऊँचा आदर्श है। जहाँ थोड़ी सी योग्यता वाले मनुष्य अपनी योग्यता के बदले में प्रचुर धन कमा कर ऐश्वर्यवान् बन जाते हैं। वहाँ महान तप योग्यताओं को जनता जनार्दन के चरणों में अर्पित करके केवल मात्र भिक्षा के दानों पर निर्वाह करना दैवी त्याग है, ऐसे त्यागियों की वृद्धि होना गौरव की बात है। परन्तु खेद पूर्वक कहना पड़ता है कि ऐसे भिक्षा जीवी अब प्रायः विलुप्त हो चले हैं। अब तो व्यवसायी लोग इस यज्ञ सामग्री की भिक्षा की-लूट कर रहे हैं। यह शर्म की, कलंक की और दुःख की बात है।

भिक्षा वृत्ति का सदुपयोग हो सच्चे भिक्षुओं का हक, चोर लुटेरे न लूटने पावें इसके लिए भिक्षा देने वालों की जिम्मेदारी अब बहुत बढ़ गई है। उन्हें देखना चाहिए कि माँगने वाला यज्ञार्थाय या विपद् वारणाय ही माँगता है न? यदि इन दोनों में से कोई प्रयोजन न हो और वह मुफ्त माल पाने की वृत्ति से माँग रहा हो तो उसे एक तिनका भी देने से मनाकर देना चाहिए अविवेकपूर्वक, कुपात्रों को दिया हुआ दान, उस दान दाता को नरक में ले जाता है क्योंकि उन निठल्ले भिक्षुओं द्वारा फैलने वाली अनैतिकता का उत्तरदायित्व उन अविवेकी दानदाताओं पर ही पड़ता है। यदि उन्हें भिक्षा न मिले तो सीधे रास्ते पर आने के लिए स्वयं ही मजबूर होंगे परन्तु यदि अविवेकी दाता उनका घड़ा भरते रहेंगे तो उनके सुधारने की, सीधे रास्ते पर आने की कोई आशा नहीं करनी चाहिए।

दान में विवेक आवश्यक है। जो दान के अधिकारी हैं उन्हें जी खोलकर मुक्त हस्त होकर देना चाहिए। संसार में सात्विकता, सद्भावना, ज्ञान विवेक तथा सुख शान्ति बढ़ाने के लिए एवं विपत्ति ग्रस्तों को संकट से बचाने के लिए हर समय सहायता दी जानी चाहिए। शरीर से, बुद्धि से, पैसे से, यहाँ तक कि प्राण देकर विश्व के कष्ट मिटाने और सुख बढ़ाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। सच्चे ब्राह्मणों को, सच्चे साधुओं को, सच्चे ब्रह्म साधकों को, सच्ची संस्थाओं को ढूंढ़ कर उन्हें भिक्षा देनी चाहिये उनके पुष्ट होने से धर्म की, वैभव की, सुख शान्ति की पुष्टि होती है। विपद् ग्रस्तों को उठाकर छाती से लगाना चाहिए। परन्तु सावधान गौ का ग्रास शृंगाल न छीनने पावें, भिक्षा का हवन शाकल्य यज्ञ कुँड में पड़ने की जगह अपवित्र नाली में न बह जाय। यज्ञार्थाय और विपद् वारणाय प्रयुक्त न होकर वही आपका दान कुपात्रों द्वारा न लूट लिया जाय।

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‘ओउम्’ परिचय

(श्री स्वामी सर्वदानन्द जी)

यदि इन अर्थों का व्याकरण की रीति से विस्तार किया जाये जो यह ‘ओम्’ शब्द अनन्तार्थ का द्योतक हो सकता है।

किसी भी पुरुष में इन अर्थों का समावेश नहीं हो सकता, क्योंकि वह अल्पज्ञ, एकदेशी, न्यूनता सहित और पूर्णता रहित है, अतएव पूर्ण परमात्मा का ही यह मुख्य नाम है। इस ‘ओम्’ शब्द का विभक्ति से भेद, वचन से व्यत्यय और लिंग सूचक प्रत्यय से परिवर्तन कभी भी नहीं हो सकता है। यह वृद्धि-ह्रसशून्य-सदा एक रस रहने से अव्यय संज्ञक है। इसके आगे विभक्ति आते ही अपने रूप खो देती है, अतएव यह अभेद्य है।

‘अ’ से विराट् अग्नि और विश्व का ज्ञान, ‘उ’ से हिरण्य गर्म वायु और तेजस का बोध, ‘म्’ से ईश्वर आदित्य और प्राज्ञ का परिज्ञान होता है। यह परमात्मा से पवित्र नाम ‘ऊँ’ विद्यमान है।

यजुर्वेद 40 वे अध्याय के 15 वे मंत्र का एक अंश है- ‘ओउम् स्मर’ ओम् का स्मरण कर। कठोपनिषद् में नचिकेता ने यमराज से ब्रह्म के संबन्ध में पूछा कि वह क्या है? इसका उत्तर देते हुए यम ने कहा ‘ओम् इमेत्नम’ अर्थात् वह ओम् नाम वाला परमेश्वर है।

गीता ने ‘ओम् इत्येकाक्षरं ब्रह्म’ एकाक्षरी ॐ को ब्रह्म कहा है।

तैत्तरियोपनिषद् में ‘ओउम् इति ब्रह्म’ ओम् ब्रह्म बताया है। आगे चलकर वहीं ‘ओउम् इति सर्वम्’ पद आता है। जिसमें सर्वव्यापी परमात्मा को ओम् कहा है। हमें परमात्मा के इस वैदिक नाम ‘ओउम्’ का नित्य जप करना चाहिए।

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नीच कौन है।

विद्वानों और विचारकों की सभा लगी हुई है। भगवान वेदव्यास सभापति के आसन पर आसीन हैं। प्रश्न उपस्थित होता है कि ‘नीच कौन है?’ कई सभासद अपने अपने विचार प्रकट करते हैं।

एक कहता है-मेरा विश्वास है कि ‘गुणहीन जनो जघन्यः’ जो मनुष्य गुणहीन है वह नीच है।

दूसरा कहता है- जो कला रहित है वह नीच है। कहा भी है- ‘संगीत साहित्य कला विहीनः साक्षात् पशु पुच्छ विषाणहीनः’ अर्थात् जो संगीत साहित्य कला से रहित है वह बिना सींग पूँछ का साक्षात् पशु है।

तीसरा कहता है- सकल उच्चताएं धन से मिलती हैं, इसलिए जिसके पास धन नहीं वह नीच है। महर्षि चाणक्य ने धन की प्रशंसा में कहा है-

तानीन्द्रियाणि सकलानि तद्वेनामः साबुद्धिरप्रतिहता वचनम् तदेव। अथोष्मणा विरहितः पुरुष स एव, वाह्यः क्षणेन् भवतीति विचित्रमेतत्।।

अर्थात्- वही इन्द्रियाँ है, सबों के नाम भी वही है, वही तीक्ष्ण बुद्धि है, वही मधुर वचन है। परन्तु जो पहले था-वह एक धन नहीं है। उसी एक के न रहने से मनुष्य और का और दिखाई पड़ता है। यह है धन की महिमा। जिस के पास धन नहीं वह नीच ही तो गिना जाता है।

इसी प्रकार और भी अनेकों सभासदों ने अपने अपने भिन्न भिन्न मत प्रकट किये। विवाद बढ़ता जाता था-मतैक्य का कोई लक्षण दिखाई न देता था, निदान-फैसला सभापति जी के ऊपर छोड़ा गया।

भगवान् वेदव्यास ने कहा-मेरा विश्वास है कि- गुण, कला और धन के बिना कोई नीच नहीं बनता और न इसके होने से सच्चे अर्थों में कोई ऊँच बन सकता है। मेरा मत है कि- ‘नारायणस्मरण हीन जनो जघन्यः।’ जो लोग परमात्मा का स्मरण नहीं करते वे नीच हैं।

परमात्मा के स्मरण से मनुष्य अपने भीतर बाहर सर्वत्र सर्व व्यापक सत्ता को देखता है। उसके नियमों आशाओं पर चलने के लाभ और उल्लंघन के दंड को भली प्रकार समझता है। फलस्वरूप कुमार्ग से बच कर सन्मार्ग पर चलता है। सन्मार्ग पर चलने वाला ऊंच एवं न चलने वाला नीच होता है। जो परमात्मा को विस्मरण कर देता है वही नीच बनता है। जो परमात्मा को स्मरण रखेगा वह उसे अपने चारों ओर व्यापक देखकर बुरे काम, अधर्म आचरण कर ही नहीं सकता।

इसलिए हे सभासदों! परमात्मा का सदैव स्मरण रखते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिए। जो ऐसा नहीं करता वही नीच है।


Quotation

आलस्य भिक्षावृत्ति की कुँजी और सारे पापों की जड़ है।

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नैतिकता को ऊँची उठाओ।

(श्री दौलतराम जी कटरहा वी.ए.दमोह)

महात्मा एप्क्टेटस कहा करते थे कि भेड़ें जो घास-पात खाती हैं उसका ऊन बनाती हैं और अगर इंसान अन्न खाकर कुछ भी पैदा न करे तो वह पशुओं से भी बदतर है। संसार में जो प्राणी अपने आपको जीवित रहते हुए अधिक उपयोगी सिद्ध करते हैं उनकी नस्ल बनी रहती है और दूसरे काट डाले जाते हैं। बकरे को ही लीजिए। बकरा न तो दूध देने के काम का है और न बोझा ढोने का, इसलिए वह काट डाला जाता है पर बकरी दूध देती है इसलिए बकरियाँ कम काटी जाती हैं। अतएव यदि हम चाहते हैं कि हम संसार में भली भाँति बने रहें तो हमें चाहिए कि हम अपने आपको दूसरों के लिए उपयोगी साबित करें और अपनी उपयोगिता तथा सेवा -शक्ति को दिन प्रति दिन बढ़ाते रहें।

यदि हमारा जीवन उपयोगी है और जनता भी हमारी उपयोगिता को स्वीकार करती है तो हमें अपनी जीवन यात्रा के लिए सम्भल (पाथेय) कहीं भी मिल जायगा। उपयोगी व्यक्ति जहाँ कहीं भी जाता है वहीं उसे उसकी जीवन यात्रा के लिए मार्ग-व्यय मिल जाता है। उसके लिए उसे चिन्ता करने की जरूरत नहीं। आप यदि अपने पास की वस्तु दूसरों को देने के लिए सदा उत्सुक रहेंगे तो आपको बदले में जीवन-यात्रा के लिए कुछ मिलता भी है इसकी चिंता करने की अधिक जरूरत न पड़ेगी। आप अपना कार्य करते जाइये, जो कुछ बने समाज को भेंट करते जाइये, आपको गुजर के लिए पैसा मिलता जाएगा। क्योंकि जैसा कि महात्मा इमरसन ने कहा है कि “उपयोगी मनुष्य की संसार को इतनी जरूरत है कि यदि वह जंगल में भी डेरा डालेगा तो लोग जंगल तक एक पक्का रास्ता तैयार कर लेंगे” तो क्या फिर भी उस व्यक्ति को उदरपोषण की चिन्ता से परेशान होना पड़ेगा?

लोग कहेंगे कि महाशय यह आपका कोरा आदर्शवाद है। यथार्थता की कसौटी पर कसे जाने पर यह बात खरी नहीं उतरती। इस आक्षेप को हम स्वीकार करते हैं और मानते हैं कि बहुधा संसार का हित करने वाले लोग सूली पर चढ़ाए जाते हैं और मक्कारों की आव-भगत होती है। पहले जमाने में सुकरात, ईसा, मुहम्मद और दयानन्द जैसे समाज- सुधारकों के साथ लोगों ने जैसा व्यवहार किया वह तो लोग जानते ही हैं पर आज भी हम देखते हैं कि जिनका सिद्धान्त है कि ‘रोटी खाओ शक्कर से और दुनिया लूटो मक्कर से’ वे ही लोग संसार में ऐश आराम करते हैं और दूसरे सत्य-प्रिय लोगों को खड़े होने के लिए भी जगह नहीं मिलती। वेश्याएं जो दुनिया को बिगाड़ती हैं मजे मारती हैं पर सती स्त्रियों को भोजन वस्त्र भी कठिनता से मिलता है। जनता को उसकी लाचारी के कारण लूटने वाले लोग गुलछर्रे उड़ाते हैं पर जी तोड़कर रात दिन परिश्रम करने वाले लोगों को मुँह के नेवाले भी नसीब नहीं होते। लोग कहेंगे की यह अपना अपना भाग्य है- पर हम पूछते हैं कि क्या यह दरअसल में अपना अपना भाग्य है अथवा भाग्य और ईश्वर की आड़ में समाज का पाप है? हम तो समझते हैं कि वेश्या इसलिए ऐश लूटती हैं कि समाज में पाप-प्रबलता अधिक है। ईमानदार व्यवसायी की अपेक्षा नशीली वस्तुएं बेचने वाला इसलिए अधिक धन-धान्य सम्पन्न है कि समाज का नैतिक धरातल अत्यन्त नीचा है, वह नादान है और हितप्रद वस्तुओं की अपेक्षा अपना नाश करने वाली वस्तुओं का अधिक मूल्य चुकाता है। समाज अपने अभिषेक के कारण जिन दूषित वस्तुओं में सुख मानता है उसकी ये लोग पूर्ति करते हैं इसलिए ये लोग ऐश लूटते हैं। समाज को यदि व्यभिचार-सुख और नशीली वस्तुओं की आवश्यकता न रह जावे तो आपको सती स्त्रियाँ कंगाल और ईमानदार व्यवसायी कभी गरीब न दिखाई देंगे। ‘उपयोगी व्यक्ति सुखी होता है’ यह सिद्धान्त तो अक्षरशः इनके सम्बन्ध में भी सत्य उतरता है। प्रश्न केवल यह रह जाता है कि समाज द्वारा उपयोगिता का अर्थ क्या लगाया जाता है। समाज जिसे अधिक उपयोगी समझता है उसे अधिक धन-सम्पन्न कर देता है।

आज हमारी निगाहों में चेतन की अपेक्षा जड़ का अधिक मूल्य है। हम आध्यात्मिक सुख की अपेक्षा भौतिक सुख को अधिक महत्व देते हैं और भौतिक ऐश्वर्य भोगने वाले का, आध्यात्मिक पुरुषार्थ करने वालों की अपेक्षा अधिक सम्मान करते हैं। अतएव यही कारण है कि भौतिक सुख सामग्रियों को उत्पन्न करने वाले लोगों की आर्थिक सामाजिक एवं राजनैतिक स्थिति अध्यात्म पुरुषार्थियों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ होती है। अतएव यदि किसी आत्म पुरुषार्थी का किसी समृद्धिशाली की अपेक्षा कम सम्मान होता है तो भूल समाज की है। इससे आत्म पुरुषार्थी की उपयोगिता कम नहीं होती। उसकी अवहेलना तो समाज की ही अज्ञानता का परिचालक है। अतएव केवल उपयोगी बनने से ही काम न चलेगा। आपको यह भी देखना होगा कि समाज का नैतिक धरातल ऊँचा उठता है और आपकी उपयोगिता समाज द्वारा स्वीकृत होती है। आप समाज को जो कुछ देते हैं समाज में उसको ग्रहण करने की योग्यता होने पर ही आप समाज द्वारा समाहृत हो सकते हैं। इसलिए समाज का नैतिक धरातल ऊँचा उठाने का प्रयत्न करना भी आवश्यक है।

यदि समाज का नैतिक धरातल ऊँचा है तो उपयोगी बनना ही सच्चा धनी होना है। उपयोगिता एक ऐसी हुँडी है जिसे सर्वत्र भुनाया जा सकता है। प्राचीन काल में ब्राह्मण इतना उपयोगी था कि उसके राज दरबार में हाजिर होते ही राजा खड़ा होकर उसका अभिवादन करता था। ब्राह्मण नंगे पैर यात्रा करता था पर क्या हम कह सकते हैं कि उसे धन-धान्य की कमी थी? राजा उससे धन-धान्य स्वीकार करने की याचना करता था पर यह उसे स्वीकार न था। वह साक्षात भू देव था। जहाँ वह जाता वहीं उसको लक्ष्मी मिल सकती थी इसलिए वह उसे लिए लिए फिरने की मूर्खता क्यों करता? इस तरह हम देखते हैं कि अच्छे समाज में हमारी सेवा-शक्ति व हमारी उपयोगिता ही हमारा सच्चा धन है। इस समय हम अपनी सेवाओं के मूल्य की चिंता न कर केवल उपयोगिता के सहारे ही निश्चित दुर्भाग्य से आज हम सच्चे अर्थ में धनी होना भूल गए हैं। हम आज अपने धन को अपने सच्चे पुरुषार्थ और योग्यता का माप दण्ड नहीं कह सकते। आज हम अपनी उपयोगिता के कारण धनी नहीं बल्कि लोगों को कष्ट दे सकने के कारण, अथवा खोटा माल दे सकने के कारण धनी बनते हैं। जिस अफसर से लोगों को अधिक हानि हो सकती है वह धनी बन जाता है। व्यापारी भी जनता को कष्ट देकर ही धनी बनते हैं। एक समृद्ध व्यापारी सारे देश का नमक खरीद लेता है और जब नमक की कमी के कारण भाव तेज हो जाता है तो बेच देता है। दूसरा व्यापारी घी में आलू या वनस्पति घी मिलाकर लाखों बना लेता है। इस तरह उपयोगी बनने के स्थान में जनता अभिशाप बनकर आज लोग धनी बनते हैं। ईश्वर वह दिन शीघ्र लावें जब लोग अपनी सेवा-शक्ति को ही अपनी अमूल्य सम्पत्ति मानेंगे।


Quotation

जीवन एक छोटा सा दिवस है। किन्तु है वह काम का दिन (यानी छुट्टी का दिन नहीं है) सम्भव है कि किसी काम से तुम बुराई की ओर जा रहे हो, किन्तु काम न करना कभी अच्छाई की ओर नहीं ले जा सकता।

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ब्रह्मचर्य से बल प्राप्ति

(श्री अशर्फीलाल जी मुख्तार, बिजनौर)

संसार की प्रत्येक वस्तु तीन गुणों से युक्त है, तम, रज, और सत। जो पदार्थ भी हम खाते हैं। उसके तम भाग से स्थूल शरीर यानी हड्डी माँस आदि बनती हैं और शक्ति लेती हैं। रजो गुण भाग से कर्म इन्द्रियाँ बनती हैं और सतोगुण भाग से मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार बनते व पुष्ट होते हैं। हमारी स्थूल दृष्टि सूक्ष्म की ओर न जाकर स्थूल तक ही सीमित रहती है। इसलिए हम वर्तमान स्थिति में इसको असाध्य समझ बैठते हैं। ऐसा नहीं है। हम देखते हैं कि किसी-2 मोटे ताजे आदमी में कुछ भी शक्ति नहीं होती, पतला आदमी उससे अधिक काम कर लेता है। इससे यह निश्चय हो जाता है कि बल शरीर के मोटे या पतले होने पर निर्भर नहीं है तो फिर बल किन-किन बातों पर निर्भर है। यह पता लग जाने पर वर्तमान समय में भी बल प्राप्त हो सकता है। बल और उसका सही प्रयोग दोनों ही विचारणीय हैं। जिस मनुष्य की ज्ञान इन्द्रियाँ मन, बुद्धि और अहंकार आदि निर्बल हैं उसकी कर्मेन्द्रियाँ और शरीर मोटा ताजा होने पर भी असमर्थ होता है। इसलिए इन 10 इन्द्रियों की शक्ति की रक्षा और प्राप्ति आवश्यक हो जाती है। इन इन्द्रियों की शक्ति वीर्य पुष्टि और रक्षा पर निर्भर है। जिसकी ओर हमारा बिल्कुल भी ध्यान नहीं है। प्राचीन समय में वीर्य रक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया जाता था आरम्भ के 25 वर्ष तक बच्चों को ऐसे वातावरण में रखा जाता था कि जहाँ उनके विचार वीर्यपात के विषैले कारणों से बिल्कुल सुरक्षित रहते थे। यह समय ब्रह्मचर्य आश्रम का कहलाता था इसके पश्चात वह गृहस्थ आश्रम में भी सीमित मात्रा में केवल संतानोत्पत्ति के लिये स्त्री भोग करते थे और 50 वर्ष की उम्र में वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश कर इस ओर से फिर सदा के लिए सुरक्षित हो जाते थे। यह वीर्य रक्षा ही उनको शक्तिशाली बनाये रखती थी और अब वीर्य जैसे इस अनमोल रत्न को बेदर्दी के साथ बर्बाद करने से हम निर्बल और शक्तिहीन हो रहे हैं। प्राचीन समय में खाने को खूब मिलता था और उससे पैदा हुए वीर्य को सुरक्षित रखा जाता है। आजकल खाने को कम और वीर्य की बर्बादी ज्यादा- बिल्कुल उल्टा हो रहा है, तो काम कैसे चले। पौष्टिक खाना खाने की तो सबकी शक्ति नहीं है हाँ वीर्य की रक्षा अपने वश की चीज है तो हमको उसकी ओर खास ध्यान देने की आवश्यकता है। एक डॉक्टर साहब ने मुझसे पूछा कि “मुख्तार साहब! हमारे शास्त्र यह कहते है कि काम को काबू में करो क्या यह सम्भव है?” मुझे एक डॉक्टर के मुख से ऐसी बात सुनकर बड़ी हँसी आई मगर मैंने इसी को रोक लिया। डॉक्टर साहब का ख्याल यह था कि काम शक्ति तो कन्ट्रोल होनी असम्भव सी है। मैंने डॉक्टर साहब से कहा कि आप दवाई देकर सुस्ती के रोगी की काम इच्छा तीव्र कर देते हैं या नहीं? वह बोले हाँ ऐसा तो होता है। मैंने उनसे कहा कि इससे यह सिद्ध होता है कि काम शक्ति को तीव्र करने की शक्ति खाद्य पदार्थों में है। यदि तीव्र करने वाले पदार्थों का सेवन न करे तो काम शक्ति स्वयं ही दब जायेगी किसी भी परिश्रम की आवश्यकता नहीं होगी इसलिए यदि तीसरा पदार्थ और वह सब पदार्थ जो काम शक्ति को उत्तेजित करते हैं खाना छोड़ दे तो स्वयं ही वीर्य की रक्षा हो जायगी इन पदार्थों का खाना जारी रहा तो वीर्य की रक्षा हो ही नहीं सकती। इससे नतीजा यह निकला कि आहार शुद्ध और सात्विक होना पहली शर्त है। उसका बनाना और खाना भी गुरुजनों की बताई हुई विधि से होगा तो सोने में सुहागा हो जायगा। इस तरह से जो खाना हम खाते हैं उसे उत्तेजित वस्तुओं से मिश्रित कर लेते हैं इसलिये वह खाना जितना वीर्य बनाता है उससे अधिक वीर्य को बर्बाद करने का हेतु बन जाता है और नहीं तो स्वप्नदोष से ही वीर्य नष्ट होने लगता है। ऐसा भोजन शक्ति बढ़ाने की बजाय उल्टा शक्ति क्षीण करता है। यदि हम उसमें मिर्च मसाले आदि तीक्ष्ण पदार्थ न मिलावें और दूसरे उत्तेजित पदार्थों का भक्षण छोड़ दें तो वीर्य की रक्षा स्वयं ही हो जायगी और शारीरिक शक्ति का चमत्कार सामने आने लगेगा।

यह है शारीरिक बल प्राप्त करने की कुँजी। थोड़े दिनों रसना इन्द्री पर थोड़ा सा कन्ट्रोल करना पड़ेगा। काम शक्ति अपने अधीन हो जायगी। आग में ईंधन डालते रहोगे तो परिश्रम से भी नहीं बुझ सकेगी। इसलिए हमें बलवान बनने के लिए वीर्य रक्षा करनी चाहिए और वीर्य रक्षा तभी संभव है जब हमारा आहार विहार सात्विक हो।

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मृत्यु शोक की शान्ति।

(ले. पं. तुलसीराम शर्मा वृन्दावन)

पिता की मृत्यु के कारण दुखित भरत को श्री रामचन्द्र जी समझाते हैं-

तमेवदुखितंप्रेक्ष्य विलपंतयशस्रिनम्।

रामः कृतात्माभरतं समाश्वासयदात्मवाम्।

(वा0रा0 अयो0)

धीर और पवित्र हृदय वाले श्रीरामचन्द्रजी ने विलाप करते हुए यशस्वी भरत जी को समझाया।।

सर्वेक्षयान्ता निश्चयाः पतनान्ताः समुच्छ्र वाः संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं चं जीवितम्।।

जहाँ संयोग है वहाँ वियोग है जहाँ उन्नति है वहाँ अवनति है जहाँ संग्रह है वहाँ नाश है जहाँ जीवन है वहाँ मरण है।।

यथा फलानाँ पकवानाँ नान्यब पतनाद् भयम्। एवं नरस्य जातस्य नान्यत्र मरणाद्भयम्।।

जिस प्रकार फल पक कर गिरता अवश्य है उसी प्रकार जन्म वाले का मरण निश्चित है।।

यथा गाँरदृढ स्थूलं जीर्णं भूत्वावमीदति। तथा व सीदन्ति नरा जरा मृत्यु वशंगताः।।

जिस प्रकार मजबूत खंभे वाला मकान भी पुराना होने पर नष्ट हो जाता है उसी प्रकार जरा और मृत्यु के वश पड़े हुए मनुष्य नष्ट हो जाते हैं।

अहोरात्राणि गच्छन्ति सर्वेषाँ प्राणिनामिह। आयूँषिक्षप यन्त्याशु ग्रीष्मेजलमिवाँशवः।।

दिन रात बीत रहे हैं और संसार में सभी प्राणियों की आयु का नाश कर रहे हैं जैसे ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणें जल का नाश करती हैं।।

आत्मान मनुशोच्त्वंकिमन्य मनुशोचसि। आयुस्तुहीयते यस्य स्थितस्यार्थं गतस्य च।।

हे भरत! तुम अपने लिए (अपने आत्मा के उद्धार के लिए) सोचो, दूसरों के लिए क्यों सोचा करते हों। आयु तो सबकी घटती रहती है चाहे कोई चलता रहे चाहे बैठा रहे।।

यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयाताँ महार्णवे। समेत्यतुव्यपेयाताँ कालंमासादय कंचन।। एवं भार्याश्च पुत्राश्च ज्ञातयश्च वसूनि च। समेत्य व्यवधावन्ति ध्रुवोयेषाँ बिनाभवः।।

जैसे समुद्र में बहते हुए दो काष्ठ कभी मिल जाते हैं कभी अलग हो जाते हैं उसी प्रकार स्त्री, पुत्र, कुटुम्ब और धन कभी मिल जाते हैं कभी बिछुड़ जाते हैं इनका वियोग अवश्यंभावी है

मात्रकश्चिद्यथाभावंप्राणी समतिवर्तते। तेनतस्मिन्न सामर्थ्यं प्रेतस्यास्त्यनुशोचतः।।

हे भरत! इस संसार में कोई भी प्राणी यथा भिलाष (अपनी मर्जी तक) अपने भाई बन्धुओं के साथ सदा नहीं रह सकता। मौत पर किसी का वश नहीं। अतः मरे के लिये शोक करना व्यर्थ है।।

यथाहिसाथं गच्छन्तः व्रूयात् कश्चित्पथि स्थितः। अहमप्या गमिष्यामि पृष्ठतो भवता मिति।।

जिस प्रकार यात्रियों का दल रास्ते पर चला जाता है और राह में बैठा हुआ मनुष्य कहे कि तुम्हारे पीछे हम भी आते हैं।।

एवं पूर्वैर्गतोमार्गः पैतृ पितामहै ध्राव्म्। तमापन्न कथंशोचेद्यस्य नास्तिव्यतिक्रमः।। वयसः पतमानस्य स्रोतसोवानिवर्तिनः। आत्मासुखे नियोक्तव्यः सुखभाजः प्रजास्मृताः।।

इसी प्रकार बापदादे परदादों के चले हुए मार्ग पर आरुढ़ मनुष्य को क्यों शौच करना चाहिये। क्योंकि उस मार्ग पर चलने के अतिरिक्त और कोई गति नहीं।।

जिस प्रकार नदी की धार आगे ही बढ़ती है पीछे नहीं लौटती उसी प्रकार आयु घटती ही है बढ़ती नहीं यह देखकर आत्मा को सुख के साधन भूत धर्म कृत्यों में लगना उचित है क्यों कि यह प्रजा धर्म कृत्य करते हुए सुख भोगने के लिए है।।

सर्वेक्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रया। संयोगाविप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्।।

संचय के साथ क्षय अवश्य है जहाँ उत्थान है वहाँ पतन है जहाँ संयोग है वहाँ वियोग है जहाँ जीवन है वहाँ मरण है।।

पिता के शोक से दुखी भरत को श्री वशिष्ठ जी ने इस प्रकार समझाया।

शरीरं जड मर्त्यथ सपवित्रं विनश्वरम्। विचार्यमाणेशोकस्यनावकाश कथश्चन।।

शरीर जड़ अपवित्र नाशवान् है विचार करने पर इसके नाश होने में शोक के लिए कोई स्थान नहीं।।

तंशोचसि वृथैवत्व मशोच्यं मोक्षभाजनम्। आत्मानित्योऽव्ययः शुद्धोजन्म नाशादिवर्जितः।।

वे सर्वथा अशोचनीय मोक्ष के पात्र थे उनके लिये तुम वृथा शोक करते हो। आत्मा तो नित्य, अविनाशी, शुद्ध और जन्म नाशादि से रहित है।

पिता वा तनयोवापि यदि नृत्युवशंगतः मूढास्तमनुशोचन्ति स्वात्मताडनपूर्वकम्।।

यदि कोई पिता या पुत्र मर जाता है तो मूर्ख उसके लिए सिर फोड़ते हुए रोते हैं।।

निःसारेखलु संसारे वियोगो ज्ञानिनाँयदा। भवेद् वैराग्यहेतुः स शान्ति सौख्यं तनोति च।।

इस असार संसार में यदि ज्ञानियों को किसी से वियोग होता है तो वह उनके लिए वैराग्य का हेतु होता है सुख तथा शान्ति का विस्तार करता है।

जन्मवान्यदि लोकेऽस्मिंस्तर्हितंमृत्युरन्वगात्। तस्माद परिहार्योऽयं मृत्युँजन्मवताँसदा।।

यदि किसी ने इस लोक में जन्म लिया है तो मृत्यु भी अवश्य ही उसके साथ लगी है।

स्वकर्म वशतः सर्वजन्तूनाँ प्रभवाप्ययौ। विजानन्न प्यविद्वान्यः कथंशोचतिवाँधवान्।।

अपने कर्मानुसार ही सब जीवों के जन्म मरण होते हैं यह जानकर भी मूढ़ लोग बंधु बाँधवों के लिये क्यों शोक करते हैं।

ब्रह्माण्डकोटयोनष्टाः सृष्टयो बहुशोगतः। शुष्यन्ति सागराः सर्वे कै वास्थौ क्षणजीविते।

करोड़ों ब्रह्मांड नष्ट हो गए अनेकों सृष्टियाँ बीत गयीं। सम्पूर्ण समुद्र एक दिन सूख जायेंगे फिर इस क्षणिक जीवन में क्या आस्था की जाय।।

चलपत्रान्त लग्नाम्बु विन्दुवत्क्षणभंगुरम्। आयुस्त्यज्यत्यवेलायाँ कस्तत्रप्रत्ययस्तव।।

यह आयु हिलते हुए पते की नोंक पर लटकती हुई जलबिन्दु की समान क्षणभंगुर है। असमय छोड़कर चली जाती है उसका तुम क्या विश्वास करते हो।।

देही प्राक्तन देहोत्थ कर्मणा देहवान् पुनः। तद् देहोत्थेन च पुनरेवंदेहः सदात्मनः।।

इस जीवात्मा ने अपने पूर्व देह कृत कर्मों से यह शरीर धारण किया है और फिर इस देह के कर्मों से यह शरीर धारण करेगा। इसी प्रकार आत्मा को बार-बार शरीर की प्राप्ति होती है।

इतिसम्बोधितः साक्षाद् गुरुणा भरतस्तदा। विसृज्याज्ञानजं शोकं चक्रेस विधिवत् क्रियाम्

तब गुरु वशिष्ठजी के इस प्रकार समझाने पर भरत जी ने अज्ञानजन्य शोक छोड़कर पिता का अन्त्य कृत्य किया।।

हिरण्याक्ष के मारे जाने पर शोकाकुल माता दिति को हिरण्यकशिपु समझाता है कि-

भूतानामिहसंवासः प्रपायामिव सुब्रते। दैवे नैकत्रनीताना मुन्नीतानाँ स्वकर्मभिः।।

प्राणियों का जो समागम है वह प्याऊ पर इकट्ठे हुए पुरुषों के समान है। दैवयोग से इकट्ठे हो जाते हैं फिर बिछुड़ भी जाते हैं।

एक वृक्ष समारुढा नाना वर्णाविहड़्माः।

प्रभातेदिक्षु दशसु तत्रका परिदेवना।। चाणक्यनीति

सायंकाल को एक वृक्ष पर अनेक दिशाओं से आकर अनेक प्रकार के पक्षी इकट्ठे हो जाते हैं प्रातः काल होते ही चारों तरफ चले जाते हैं तो उसमें दुख किस बात का?

एकेऽद्य प्रातरपरे पश्चादन्येपुनः परे। सर्वेनिः सीम्नि संसारे यान्ति कः केनशोच्यते।।

कोई आज कोई कल कोई परसों इस प्रकार सब ही इस सीमा रहित संसार में चले जा रहे हैं तब कौन किसके लिए शोक करें?

येषाँनिमेषोन्मेषाँभ्याँ जगताँ प्रलयोदयौ। तादृशाः पुरुषा यातामादशाँ गण्नैबका।।

जिनके पलकों के खोलने मीचने से संसार की रचना व प्रलय होता है ऐसे पुरुष भी जब चले गये तब हम सरीखे पुरुषों की क्या कथा।

पृथिवी दह्यते पत्र मेरुश्चापि विशीर्यते। सुशोषसागर जलं शरीरे तत्रकाकाषथा।।

जहाँ प्रलय काल के समय पृथिवी जल जाती है सुमेरु पर्वत खण्ड-2 हो जाता है समुद्रों का जल सूख जाता है तब इस शरीर की क्या कथा।

एकासार्थ प्रयातानाँ सर्वेषाँ तत्रगामिनाम्। यद्यके स्त्वरितं यातस्तत्र का परिदेवना।।

किसी स्थान को एक साथ जाने वालों में से कोई एक शीघ्रता से चला गया तो उसमें दुख किस बात का?

माता पितृ सहस्राणि पुत्रदार शतानिच। तवानन्तानि यातानि कस्यते कस्यवाभवान्।।

तेरे हजारों माता, पिता, स्त्री, पुत्र आदि अन्नत हो गये जिसका तू और वे किसके अर्थात् कोई किसी का नहीं।

माशोकं कुरुतानित्ये सर्वस्मिनप्राण धर्मणि। धर्म कुरुत यत्नेन यो वःसह गमिष्यति।।

सम्पूर्ण प्राणी अनित्य हैं इस कारण मृत्यु प्राप्त का शोक न करें। यत्न पूर्वक धर्म कार्य को करो यह धर्म ही तुम्हारे साथ जायगा।

गंत्रीवसुमतीनाश सुदघिदैवतानिच। के न प्रख्यः कथंनाशं मत्यलोको नयास्यति।।

पृथ्वी, समुद्र, देवता, जब सभी का नाश है तो इस मृत्युलोक में किसका नाश न होगा।

पंचधा संभृतः कायो यदि पंचत्वमागतः। कर्मभिःस्व शरीरोत्थैस्तत्रका परिदेवना।।

पंचभूतों से बना हुआ यह देह यदि देह धारण जनित कर्मों के फल में पंचतत्व को प्राप्त हो जाय तो इसमें शोक किस बात का


Quotation

शैतान सब आदमियों का बहकाता है किन्तु आलसी आदमी शैतान को बहकाता है।

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अपने बच्चों को पहला पाठ आज्ञापालन का सिखाओ और दूसरा जो तुम्हारी इच्छा हो।

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हमें ईश्वर का सच्चा साक्षात्कार तभी होता है, जब हम उसके सामने अपनी याचनाएँ न लेकर किन्तु अपनी भेंटें लेकर जाते हैं।

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यदि कोई चाहे कि वह दुनिया में अपना स्वार्थ साधन भी करे और ईश्वर को भी प्राप्त कर ले, तो यह सम्भव है।

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सुधार से बहुत कुछ होता है, किन्तु प्रोत्साहन से और भी अधिक होता है। डाँट के पश्चात प्रोत्साहन ऐसा है जैसा वर्षा के बाद धूप।

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क्या हम अभागे हैं?

मानव जीवन एक अमूल्य सुअवसर है। सृष्टि के समस्त जीव जन्तुओं की स्थिति पर दृष्टिपात कीजिए, उनमें से एक भी ऐसा नहीं है जिसे मनुष्य के समान ऊँची स्थिति प्राप्त हो। बहुत थोड़े प्राणी ऐसे हैं जो शारीरिक दृष्टि से मनुष्य से अधिक सक्षम हैं। जो हैं उनकी आयु थोड़ी है। घोड़ा, गधा, बैल, भैंस, हिरन, रीछ, प्रायः बीस पच्चीस वर्ष से अधिक नहीं जीते। छोटे दर्जे के लोमड़ी, खरगोश, भेड़, बकरी, आदि पशु तो दस वर्ष से भी पहले मर जाते हैं। हाथी, सर्प, गिद्ध, कछुआ सरीखे दस पाँच प्राणी ही ऐसे ही जो मनुष्य से अधिक जीवित रहते हैं। कीट, पतंग, उद्भिज, अंडज, जीव जन्तुओं की आयु और शारीरिक शक्ति तो मनुष्य की तुलना में अत्यन्त ही न्यून है।

सभी पशु पक्षियों की अन्तः चेतना मनुष्य की अपेक्षा कम है। मन बुद्धि, चित्त, अहंकार का चतुष्टय इतना अद्भुत है कि इस विशेष उपहार के द्वारा मानव जीवन की सरसता अनेक गुनी बढ़ गयी है। बेचारे पशु पक्षी भोजन, निद्रा, प्रजनन तथा शरीर रक्षा के अतिरिक्त और कोई विशेष इच्छा आकांक्षा नहीं करते और न इसके अतिरिक्त अन्य किसी विषय में उन्हें आनन्द आता है। यह चार बातें ही उनका सारा जीवन काल समाप्त कर देती है। मनुष्य को इससे अनेक गुनी सुविधा मिली हुई है। उसका मन सुविकसित होने के कारण आनन्द और मनोरंजन के सैकड़ों मार्ग खुले हुए हैं। संगीत, साहित्य, कला, निर्माण, अन्वेषण, इन्द्रिय तृप्ति, पर्यटन, निरीक्षण, क्रीड़ा, विनोद, संगीत, मैत्री, नेतृत्व, कल्पना, संचय, उपार्जन, प्रशंसा, उपकार आदि नाना प्रकार से मनोरंजन कर सकता है। उसमें इतना बुद्धि कौशल मौजूद है कि स्थूल शरीर की साधारण समस्याओं को आसानी से हल कर लेता है। आठ घण्टे के परिश्रम में एक अशिक्षित मजदूर भी उतना कमा लेता है कि उसका तथा उसके आश्रित कई परिजनों का जीवन निर्वाह हो जाता है। शेष सोलह घण्टे उसे अन्य मार्गों से जीवन का आनन्द प्राप्त करने के लिए बच जाते हैं। चतुर मनुष्य तो इससे भी कम समय में स्वल्प श्रम से इतना अधिक कमा लेते हैं कि वे उनकी साधारण एवं स्वाभाविक आवश्यकता से वह कहीं अधिक होता है। यह सुविधा सृष्टि के किसी अन्य प्राणी को प्राप्त नहीं है। उन्हें तो शरीर यात्रा में ही समय बिताना पड़ता है और क्षुधाओं के निवारण की तृप्ति से ही संतुष्ट होना पड़ता है।

हममें से कई व्यक्ति अपने से अधिक धनी, सम्पन्न, शिक्षित, चतुर, सशक्त, सुन्दर, व्यक्तियों से तुलना करके अपने आपको दीन, दरिद्र, दुखी अनुभव किया करते है। सोचने का वह तरीका बहुत की गलत, दूषित एवं भ्रमपूर्ण है। इस दृष्टि से तो ईर्ष्या का कभी अन्त न होगा। जैसे जैसे अधिक सम्पन्नता बढ़ेगी वैसे वैसे तृष्णा और दीनता का दर्द भी अधिक होगा। कभी शान्ति न मिलेगी। सम्पत्तियों का कोई अन्त नहीं। एक से एक बड़े पड़े हुए हैं, उनसे अपनी तुलना करके दीन भाव मन में लाने की आवश्यकता नहीं, मानव प्राणी किसी भी दशा में दीन हीन नहीं है।

परमात्मा ने हमें सर्व श्रेष्ठ मानव जीवन प्रदान किया है। इसके आनन्दों का ठिकाना नहीं, इसके द्वारा आत्म कल्याण का सर्वोपरि मार्ग उपलब्ध होता है। गरीब से गरीब आदमी भी अपने अन्तःकरण चतुष्टय द्वारा इतने अधिक आनन्दों को प्राप्त करता है जिनके कारण उसे एक स्वर से सौभाग्यशाली, सम्पन्न तथा ऐश्वर्यवान् कहा जा सकता है। इतने ऊँची स्थिति को प्राप्त करके हमें प्रसन्न होना चाहिए। इतना महत्व प्राप्त करने पर भी जो अपने की गिरी हुई स्थिति में अनुभव करता है, भाग्य को कोसता है, ईश्वर को दोष लगाता है, उसे क्या कहा जाय?

एक बार गंभीरतापूर्वक सृष्टि के समस्त जीव-जन्तुओं की स्थिति पर एक एक करके विचार कीजिए। केंचुआ, मछली, मक्खी, मकड़ी, मेंढक, कछुआ, कबूतर, सारस, बकरी, गधा, बैल आदि की कठिनाईयों पर अपनी कल्पना शक्ति को केन्द्रित कीजिए, उनकी दिनचर्या कठिनाई, असुविधा, विवशता तथा आनन्द की तुच्छता पर विचार कीजिए तब आपको प्रतीत होगा कि मनुष्य की अपेक्षा कितने पिछड़े हुए हैं यदि वे बेचारे ईर्ष्या कर सकते तो हमारे लिए कहते कि उनकी अपेक्षा हम उतने सुखी एवं उन्नत हैं जितना कि हम अपने से ऊँचा स्वर्ग लोग के देवताओं को समझते हैं।

इतना आगे बढ़े चढ़े होते हुए भी सिर्फ इसलिए अपने को अभागा मानना कि चार आदमियों के पास हमसे भी अधिक धन या चतुरता या सुविधा है- कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है। हमें चाहिए कि अपने मनुष्य जीवन की महानता को पहचानें। अपनी शक्तियों सम्पत्तियों और सुविधाओं को अनुभव करें। अपने सौभाग्य को सराहें और इस सुअवसर का अधिक उत्तम सदुपयोग करने का प्रयत्न करें। जिससे और भी आनन्द मय भविष्य का निर्माण हो।

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देश काल और पात्र का ध्यान-रखो

(श्रीलक्ष्मीनारायण जी टंडन प्रेमी एम.ए. लखनऊ)

देश काल और पात्र के अनुसार धर्म नियमों में अवश्य अंतर हो सकता है। पश्चिमीय देशों में चुम्बन करना मिलने या विदा होने पर एक भद्रता का चिह्न है हमारे यहाँ अपनी स्त्री के अतिरिक्त अन्य स्त्री का चुम्बन करना पाप है। अपनी स्त्री का भी चुम्बन हम एकान्त में करते हैं किन्तु अंगरेज सबके सामने बिना किसी हिचक के यह करता है।

अपने ही देश में एक समय के नियमों का दूसरे समयों में पालन नहीं किया जा सकता। एक समय में “नियोग” धर्म था। अब कोई भी तैयार न होगा। एक समय “सती प्रथा” पुण्य कार्य था। आज वह अवांछनीय है। संसार परिवर्तनशील है। अतः जो कल के लिये लागू था वह आज के लिये भी लागू होगा ऐसा नहीं कहा जा सकता है। मुख्य प्रवाह-धारा को बाधा न देकर यदि बहाव इधर-उधर घुमाया जाय तो उससे लाभ ही होता है। रानाडे ने एक बार कहा था कि सुधारक को कोरी पटिया पर नहीं लिखना है। उसे तो अधूरे वाक्यों को पूरा करना तथा माली की भाँति काँट-छाँट करना है। धर्म नियमों में परिवर्तन हो सकता है और होना चाहिये इसके साक्षी स्वयं हमारे ही ‘धर्म’ हैं। “अपवाद” शब्द इसी बात का द्योतक है। एक स्वस्थ मनुष्य को नहा- धोकर पूजा पर बैठना चाहिये किन्तु एक अस्वस्थ रोगी खाट पर पड़े-पड़े मानसिक पूजा करने का अधिकार धर्म द्वारा पा जाता है। यह अपवाद क्या है? यह प्रमाण है कि धर्म नियमों में अन्तर हो सकता है।

मान लीजिये आप आर्कटिक सरकिल में ग्रीनलैंड में चले जायँ, यदि वहाँ आप नित्य नहा कर रेशमी कपड़ा पहन कर पूजा करने बैठें तो स्वयं बरफ हो जायेंगे। जब आप रोगी हो और प्राण का खतरा हो तो डॉक्टर के बताये अनुसार यदि शराब या प्याज खायें तो यह भी धर्म है। वैसे ही एक अधिकारी मूर्ति को ईश्वर नहीं समझेगा किन्तु ईश्वर के भाव आरोपित करेगा किन्तु अशिक्षित गवाँर को उसे ही ईश्वर समझने दीजिये। उसके लिए धर्म यह रियायत करती है। अतः अन्तर हो सकता है। धर्म नियमों में देश काल और पात्र के अनुसार।


Quotation

ग्लानि और दुःख के समय तथा आत्म-शुद्धि और चित्त की एकाग्रता के लिए उपवास बहुत सहायक होता है।

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मठा पिया कीजिए।

न तक्र सेवी व्यथते कदाचित्- न तक्र दग्या प्रभवन्ति रोगा। यथा सुराणाममृतं सुखाया, तथा नराणाम् भुवितक्रमाहुः।।

अर्थात्-तक्र यानी मट्ठा सेवन करने वाला मनुष्य कभी रोगों के जाल में नहीं फँसता और रोगी मनुष्य का तक्र सेवन से रोग जल जाता है और तक्र से जला हुआ रोग पुनः उत्पन्न नहीं होता। जिस प्रकार से देवलोक में अमृत हितकर है। ठीक उसी प्रकार भूमिलोक में मट्ठा मनुष्यों का हितकारक है।

मटठा पाँच प्रकार से बनाया जाता है (1) घोल (2) मथित (3) तक्र (4) उदश्वित और (5) लच्छिका।

(1) घोल-मलाई के सहित बिना जल डाले जो दही को मथा जाता है,ऐसे मट्ठे को घोल कहते हैं। इसमें शक्कर मिलाकर खाने से वात पित्त का नाश करता तथा आनन्द देता है।

(2) मथित- मथित और घोल में इतना ही अन्तर है कि मथित में से मलाई अलग कर देते हैं। यह कफ और पित्त का नाश करता है।

(3) तक्र- जिसमें मथते समय दही को चौथाई भाग पानी डाल दिया जाय। यह मल को रोकने वाला, कसैला, खट्टा, पाक में मधुर है और हल्का है। उष्णवीर्य (गरम) अग्नि दीपक, वीर्य, वर्धक, पुष्टिकारक और वातनाशक है।

(4) उदश्वित- जिसमें दही का आधा भाग जल मिले। यह कफ कारक बल बढ़ाने वाला और आम का नाश करता है।

(5) लच्छिका- (छाछ) जिससे मलाई निकाल ली गई हो और मथ कर वे हिसाब जल मिलाया जाय। यह शीतल, हल्का, पित्त, प्यास, और थकावट को दूर करता है। सेंधा नमक और वायुनाशक है।

अब दुग्धभेद से मट्ठे के गुणों को भी देखिये। दुग्धभेद से मट्ठा अनेक प्रकार का हो सकता है। यथा गाय, भैंस, बकरी, भेड़, घोड़ी, ऊँटनी आदि के दूध से भी मट्ठा बन सकता है परन्तु हम यहाँ केवल गाय, भैंस तथा बकरी के मट्ठे के गुणों की ही चर्चा करेंगे। गाय का मट्ठा बवासीर और उदर विकार का नाश करता है। तीनों दोषों को शान्त करता है। यह दीपन, रुचि कारक और बुद्धिवर्धक है। शरीर में बलवर्धक और हृदय को शक्ति देने वाला है। गाय का मट्ठा सब मट्ठों से विशेष गुणकारी है।

बकरी की मट्ठा- संग्रहणी, वायुगोला, बवासीर, शूल और पाँडु रोग को नष्ट करता है। यह हलका और चिकना होता है। तीनों दोषों को शान्त करता है और श्वाँस, कास में बड़ा गुणकारी है। भैंस का मट्ठा, अतिसार, बवासीर, संग्रहणी और प्लीहा नाशक है। यह कफकारी है तथा वात पित्त को शान्त करता है।

चरक में लिखा है कि तक्र दीपन, ग्राही और हलका होने के कारण ग्रहणी रोग में हितकर है। पाक में मधुर होने के कारण पित्त प्रकोष से बचाना है। मधुर, अम्ल, और चिकना होने से वायुनाशक है। कषाय और उष्ण होने से कफ में हितकर है।

प्रो. ड्यूकले और मैशिनी काफ आदि प्रसिद्ध जन्तु शास्त्र विशेषज्ञों का मत है कि मट्ठे में लैक्टिक जन्तु रहते हैं जो शरीर के विषैले कीड़ों का नाश करके हमारे शरीर के लिये विशेष उपकारी होते हैं।

ऋतुओं के अनुसार मट्ठे का सेवन निम्नलिखित वस्तुओं के साथ करना अधिक लाभदायक होता है।-

हेमन्त, शिविर और वर्षा ऋतु में मट्ठा या दही खाना उत्तम है, किन्तु शरद बसंत और ग्रीष्म में प्रायः यह हानिकारक है। दही या मट्ठा कफ कारक है। साथ ही पित्त को भी बढ़ाता है इस कारण बसन्त में हानिकारक होता है। क्योंकि इस ऋतु में तो कफ स्वयं ही बढ़ जाता है और रोग उत्पन्न करता है। ग्रीष्म ऋतु और शरद् ऋतु में पित्त कुपित हो जाता है इस कारण पित्त गुण वाला दही इन ऋतुओं में हानिकारक है। इसलिये भिन्न-भिन्न ऋतु में मट्ठा भिन्न -भिन्न प्रकार से सेवन करना चाहिये।

वर्षा ऋतु में सैंधा नमक, ग्रीष्म और शरद् में चीनी तथा शिशिर और बसन्त में सोंठ, पीपल, मिर्च और जवाखार मिलाकर मट्ठा सेवन करना चाहिये। इस प्रकार ऋतु अनुसार तक सेवन से विशेष उपकार होता है।

मट्ठे में निम्न गुण विशेष पाये जाते हैं। क्षुधा को बढ़ाता है। आँखों की पीड़ा को शान्त करता है और जीवनी शक्ति को बढ़ाता है। शरीर में माँस और रक्त की कमी को दूर करता है। आम को नष्ट करता तथा कफ और वायु को शान्त करता है।

इन्हीं गुणों को ध्यान में रखते हुए आयुर्वेद में स्वस्थ रहने के उपायों का निरूपण करते हुए लिखा है कि -

भोजनान्ते पिवेत्तक्रम्, निशान्ते च पिबेज्जलम्। निशा मध्ये पिवेद्दुग्धम्, किं वैद्यस्य प्रयोजनम्।।

अर्थात्-जो मनुष्य प्रातः काल उठते हो जल पीता है और भोजन के अनन्तर मट्ठे को व्यवहार करता है तथा शयन समय में दूध पीकर सोता है। उसे कभी किसी वैद्य या डॉक्टर की आवश्यकता नहीं होती है। यानी मट्ठे में अनेकों ऐसी विशेषतायें भरी पड़ी हैं। जिनका सर्वाशतः कह देना बड़ा दुष्कर है। मट्ठे से कायाकल्प तक किया जाता है।


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उपवास एक प्रकार का प्रायश्चित है। इससे पतित को अपने दोषों का मान और अनुमान होता है। इससे मन हलका और शान्त होता है।

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अपने दोषों को भी देखिये

पर छिद्रान्वेषण अर्थात् दूसरों के दोष देखना उनकी कमजोरियाँ निकालना, उनकी आलोचना करना मनुष्य को दोषी बनाता है किन्तु अपने दोषों को देखने और उनका निवारण करना आत्मोद्धार का अचूक उपाय है। महापुरुषों का वचन है-

यथाहि निपुणः सम्यक् परदोषेक्षणं प्रति तथाचेन्निपुणः स्वेषु को न मत्येत बन्धनात्।

अर्थात् “जैसे पुरुष परदोषों को निरूपण करने में अति कुशल हैं, यदि वैसे ही अपने दोषों को देखने में हों, तो ऐसा कौन है जो संसार के कठोर बन्धनों से मुक्त न हो जाय।” महापुरुष बनने का मार्ग आत्मशुद्धि है अतः चुन चुन कर अपने दोषों को निकाल डालिये। क्या आपके मन में दुर्बल विचार वासना से सनी हुई कुकल्पनाएँ आती हैं? क्या आप ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, व्यभिचार में लिप्त हैं? क्या शरीर के साज शृंगार के बन्धन आपको बाँधे हुए हैं? इन प्रश्नों का स्वयं उत्तर दीजिये। सचाई से आत्मविश्लेषण कीजिये।

अपने साथ कठोर रहिये, निष्पक्ष आलोचक बनिये। जो दोष हैं, उनके निवारण के लिए भीष्म प्रतिज्ञा कीजिये। उठिये, अपनी इन्द्रियों को वश में कीजिए और ब्रह्मचारी कह लाइए। अपनी इन्द्रियों की रखवाली वैसे ही करें जैसे एक कर्तव्यनिष्ठ सिपाही खजाने के दरवाजे की करता है। आत्मशुद्धि का मार्ग सर्वोत्तम है अतः इन्द्रियों पर पाप का कब्जा न होने पाये अन्यथा धर्म का खजाना रिक्त हो जायेगा। मन के संयम से स्वर्ग मिलता है, ब्रह्म के दर्शन होते हैं किन्तु अनियन्त्रित इन्द्रियाँ और विशेष कर कामेन्द्रियाँ तो प्रत्यक्ष नर्क की और दौड़ती हैं।

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आप डरें क्योँ?

(श्री किशोरीलाल जी मशरुवाला)


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‘मनुष्य का पहला कर्तव्य है- भय का नाश करना। हमें भय से मुक्त हो ही जाना चाहिये। जब तक निर्भय न होंगे, हम कुछ न कर सकेंगे। आदमी जब तक डर को अपने पैरों तले कुचल नहीं देता, उसके सभी कामों में गुलामों की-सी मनोवृत्ति और ऊपर का भपका- भरा रहता है, उसके विचार भी गुलामों और कायरों के से रहते है।’ - हीरोवशिंप कार्लाइल

मनुष्य निर्भय कैसे हो? इसका ठीक-ठीक जवाब तो वही दे सकता है, जिसने डर को भली भाँति जीता है। मैं अपने लिये इसका दावा नहीं कर सकता। फिर भी अपने जैसों के साथ विचार करने का यत्न करता हूँ।

एक किस्सा सुना है। किसी पंडित ने एक खलासी से पूछा-‘तुम्हारे बाप की मौत कैसे हुई?’ खलासी ने कहा- ‘एक बार जब वह जहाज पर सवार थे, जोरों का तूफान उठा और तूफान में जहाज के साथ वह भी डूब गये।’ पंडित न पूछा- और तुम्हारे दादा? खलासी- ‘सुना है, वह भी डूब ही गये थे, और उनके साथ मेरे दो चाचा भी मर गये थे।’ सुनकर पंडित तो दंग रह गये। कहने लगे-‘भले मानस, इतना होने पर भी तुम पानी का धन्धा नहीं छोड़ते? तुम्हें डर नहीं लगता?’ खलासी ने पूछा- ‘महाराज, आपके पिता जी की मौत किस तरह हुई थी’, पंडित ने कहा- ‘बहुत ही बूढ़े हो गये थे। कई दिनों तक बीमार रहे और घर में अपने बिछौने पर मर गये।’ खलासी- ‘अच्छा, और उनके पिता? पंडित- ‘वे भी उसी तरह बिछौने पर ही मरे।’ खलासी- ‘फिर भी आप बिछौने पर सोते हैं? आपको डर नहीं लगता?’

इन्हीं लोगों की विवाह-पद्धति का भी एक किस्सा सुना है। कहा जाता है, ब्याह के समय पुरोहित कन्या से पूछता है- ‘देखो बहन, यह दूल्हा दरिया में अपनी जिन्दगी बितायेगा, मस्तूल पर चढ़ेगा और वहाँ से गिरेगा। तूफान उठेगा और उसमें यह घिरेगा। बोलो, यह दूल्हा तुम्हें पसन्द है?” कन्या कहती है- “पसन्द है।” पुरोहित- “तो समझो, तुम्हारा ब्याह हो चुका आसीस देता हूँ।”

एक बनिये के लड़के को किसी ने कहा- ‘दो में से कोई एक चीज पसन्द कर लो- या तो अंधेरी रात में दस हजार रुपयों की थैली लेकर एक भयावने जंगल को पार कर आओ और थैली के मालिक बन जाओ, या पूर्वी अफ्रीका जैसे किसी कमाई वाले देश में हजार रुपये लेकर चले जाओ और अपनी तकदीर आजमा लो! बोलो, क्या पसन्द करते हो?’ लड़के ने छूटते ही कहा- ‘दूसरी चीज’। अंधेरी रात में इतनी बड़ी रकम के साथ अकेले जंगल पार करना उसे ज्यादा मुश्किल मालूम हुआ। अगर किसी राजपूत के लड़के से यही सवाल किया जाता, तो शायद वह पहली चीज पसंद करता। हजार रुपये की पूँजी पर रोजगार करने की बात में शायद उसे डर मालूम होता।

देहातियों को अंधेरी रात में बिना चिराग के कहीं भी जाने में कोई खतरा नहीं मालूम होता। शहर वाले अपने मकान के अहाते में भी बगैर चिराग के जाने की हिम्मत नहीं करते। जंगलों और पहाड़ों में रहने वाले लोगों को शेर वगैरह का उतना डर नहीं लगता, जितना देहातियों और शहरियों को लगता है।

दूसरी तरफ, अगर किसी देहाती को कलकत्ता या बम्बई-जैसे शहर में लाकर अकेला छोड़ दिया जाय, तो वह इस कदर घबरा जायगा, मानो जंगली जानवरों के बीच छोड़ दिया गया हो!

इससे एक सबक यह सीखा जा सकता है कि जिस तरह के जीवन और परिस्थिति से हमें डर लगता हो, उसका हमें कुछ अनुभव कर लेना चाहिये। एक बार, दो बार, दस बार अनुभव करते करते डर कम हो जाता है।

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बोलने का शऊर सीखिये

(श्री राजेश जी)

मनुष्य के विचारों की थाह, योग्यता का परिचय और विद्या, बुद्धि तथा स्वभाव का पता उसकी बातों से मिलता है, इसलिए उसे अपने विचारों को प्रकट करने के लिए बात चीत में बहुत सावधानी से काम लेना चाहिये। बोलचाल में सावधानी की आवश्यकता इसलिए भी है कि प्रायः कभी कभी सम्भावना की असावधानी के कारण ही क्रोध चढ़ जाता है। वास्तव में किसी कार्य की सफलता और असफलता उसके सम्बन्ध में कही जाने वाली बातचीत के ढंग पर ही निर्भर होती है। जो सभ्यता और शिष्टाचार पूर्वक बात करना नहीं जानता, लोग उससे बातें करना नहीं चाहते।

बोलते समय सुनने वाले की हैसियत (पद) के अनुसार ‘तुम’, ‘आप’ अथवा ‘श्रीमान’ आदि शब्दों का उपयोग करना चाहिये। ‘तुम’ का प्रयोग अत्यन्त साधारण स्थिति के लोगों के लिये और ‘श्रीमान्’ का उपयोग अत्यन्त प्रतिष्ठित सज्जनों के लिए किया जाना चाहिये। ‘आप’ शब्द इतना व्यापक है कि उसका उपयोग दोनों ही कोटि के लोगों के लिये किया जा सकता है। बहुत ही छोटे लड़कों के अतिरिक्त ‘तू’ का प्रयोग और किसी के लिये नहीं करना चाहिए।

किसी के प्रश्न के उत्तर में ‘हाँ’ या नहीं के लिये केवल सिर हिलाना असभ्यता का चिह्न है। सभ्यता और शिष्टाचार के नाते इस प्रकार के उत्तर ‘जी हाँ या जी नहीं’ आदि शब्दों में दिये जाने चाहिए। इस प्रकार रुक रुक कर बातचीत न की जाये कि लोग सुनते सुनते ऊब जायें। बहुत देर तक केवल अपनी ही बात नहीं कहते रहना चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो बातचीत सम्भाषण के रूप में चलनी चाहिए, जिससे दूसरों को भी बोलने का अवसर मिलता रहे और श्रोता और वक्ता का अनुराग सम्भाषण के विषय में बना रहे।

कोई ऐसी बात न कहनी चाहिये जिससे सुनने वाले का जी दुखी हो। जहाँ तक हो सके बातचीत में कटाव, व्यंग, आक्षेप, उपालम्भ और अश्लीलता से बचना चाहिये। अधिकार की अहंमन्यता में भी किसी को कटु शब्द कहना असभ्यता का परिचय देना है। कुछ लोगों को बातचीत के बीच बीच में, ‘जो है सौ’ ‘क्या नाम है’ आदि ‘तकिया कलाम’ कहने का अभ्यास पड़ जाता है। इन आदतों को सुधारना चाहिये, किन्तु दूसरों को उनके इन दोषों पर हँसना भी उचित नहीं है। बात चीत में सौगन्ध खाना बहुत बुरा है। बात बात में ‘गंगा की कसम’ या ‘ईमान से’ आदि शब्द कहना अभद्रता और ओछेपन का चिह्न है इसलिये सभ्य मनुष्यों को इन आदतों से बचना चाहिये।

बिना किसी अनिवार्य आवश्यकता के किसी की जाति, वेतन, अवस्था, वंशावली आदि पूछना उचित नहीं है। पूछते समय प्रश्नों की झड़ी नहीं लगानी चाहिए। यदि लगे कि कोई व्यक्ति जानबूझ कर आपके प्रश्न का उत्तर नहीं दे रहा है या नहीं देना चाहता तो उस प्रश्न के लिए उसके पीछे नहीं पड़ना चाहिए। नये व्यक्ति का परिचय प्राप्त करने में उत्सुकता और जल्दबाजी से काम नहीं लेना चाहिये।

बात चीत रोचक और विनोदपूर्ण ढंग से चलनी चाहिये। परन्तु हर वक्त हँसी ठटठ् करना हानिकारक है। कहने की शैली से आत्म प्रशंसा या श्रोता के लिये अपमान की झलक नहीं आनी चाहिए। भाषण में उपमा और रूपक का प्रयोग सावधानी से किया जाये। क्योंकि इसमें असावधानी बरतने पर अर्थ का अनर्थ हो जाता है। कहावतों और महापुरुषों के सुन्दर वाक्यों के प्रयोग से बातचीत में सरलता और प्रमाणिकता आ जाती है किन्तु इन्हीं का आधिक्य के साथ प्रयोग, बातचीत को बोझिल और नीरस बना देता है, इस बात का ध्यान रखना चाहिए।

यदि लोग आपको चुपचाप देखकर आपसे कुछ कहने की आग्रह करें तो ऐसी दशा में आपको सुन्दर बात या मनोरंजक विषय छोड़कर अवश्य उनकी इच्छा पूर्ति करनी चाहिये किन्तु आवश्यकता के बिना बात -बात में टाँग अड़ाना बुरा है। यदि कहीं कुछ लोग आपस में बात चीत कर रहे हों तो वहाँ अचानक जाना और बीच में अपनी बात छोड़ देना बहुत ही बुरा है। उनकी बातें जाकर सुनना भी अशिष्टता है। किसी को अशुद्ध उच्चारण करते देखकर हँस देना असभ्यता है। दूसरे की बात समाप्त होने पर ही अपनी बात आरम्भ करनी चाहिये। यदि बोलने वाला लगातार बोलता ही जाये और आपको बोलने का अवसर ही न दे तो आवश्यकता पड़ने पर नम्रतापूर्वक बोलने वाले से अपने बोलने की अनुमति लेनी चाहिए।

जहाँ किसी की असम्भव बातों में हाँ से हाँ मिलाकर चापलूसी करना उचित नहीं है वहाँ न्याय संगत और सच्ची बात सुनकर दुराग्रह से उसका खंडन करना भी अनुचित है। किन्तु कुछ सीमा तक दूसरे के मत का सम्मान और उसकी प्रशंसा करना और उसी प्रकार अपने मत के समर्थन में दूसरे के मत का खंडन करना सभ्य समाज में क्षंतव्य है। बातचीत में क्रोध के आवेश को रोकना चाहिये। जहाँ बहस मुबाहिसे के दौरान में कटु और उग्र शब्दों को प्रयोग होने की आशंका होने लगे वहीं बातचीत बन्द कर देना बुद्धिमानी है। नीति के अनुसार व्यंग वचनों का उत्तर व्यंग में देना उचित है तथापि शिष्टाचार के नाते आपको कम से कम एक बार उन्हें शान्तिपूर्वक सहन करना चाहिये। किसी की अनुपस्थिति में उसकी निन्दा करना अशोभनीय है। यदि बातचीत में किसी ऐसे सज्जन का उल्लेख हो तो उनके नाम के आगे या पीछे आदर सूचक शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। मतभेद का कारण उपस्थित होने पर किसी के मत का खंडन नम्रतापूर्वक, क्षमा प्रार्थना करके, ऐसी चतुराई से करना चाहिये कि विरुद्ध मत वाले को बुरा न लगे।

काल, पात्र और स्थान के अनुरूप परिस्थितियाँ देखकर बात करनी चाहिए। नवयुवकों से वेदान्त की चर्चा करना जिस प्रकार उचित नहीं उसी प्रकार वयो वृद्ध लोगों को शृंगार रस की विशेषतायें बतलाना अशिष्टता का प्रमाण है। सड़क पर खड़े होकर अथवा चलते हुए दूसरे घर की किसी स्त्री से बातें करना अशिष्टता है। रोगी व्यक्ति से अधिक समय तक बातचीत करना या उससे रोग की भयंकरता का उल्लेख करना हानिकारक है। जिस जगह कोई व्यक्ति किसी विचारात्मक कार्य में संलग्न हों वहाँ जोर से बातचीत करके उसकी विचार-शृंखला में बाधा डालना उचित नहीं है। बातचीत के दौरान में यदि कोई आपसे आपके अनुपस्थित मित्र या सम्बन्धी की अनुचित निन्दा करे तो उसे नम्रतापूर्वक समझा कर मनाकर देना चाहिए। यदि वह इस पर भी न माने तो किसी बहाने से उसके पास से चला आना चाहिये। ऐसा करने से उसे आपकी अप्रसन्नता और अपने कार्य के अनौचित्य का कुछ आभास अवश्य हो जायेगा। जो स्वयं दूसरों की अकारण निन्दा नहीं करता उसके पास औरों को भी ऐसी निन्दा करने का साहस नहीं होता। सभ्य तथा शिक्षित समाज में पर निन्दक को प्रायः अनादर की दृष्टि से देखा जाता है।


Quotation

जो अपनी उच्च वृत्तियों की ओर ध्यान देता है। वह ऊँचा हो जाता है। जो सदा अपनी छोटी वृत्तियों की ओर ही आकृष्ट होता है, वह वास्तव में छोटा रह जाता है।

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नीचे विचार हमारे सुख में भी हमें डंक मारते हैं और सद्विचार हमें कष्टों में भी सान्त्वना देते रहते हैं।

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गहरी साँस लिया कीजिए

(पं. रामनरायण शर्मा)

फेफड़ों के द्वारा शरीर के भीतर का मैल रात-दिन बाहर निकला करता है। परन्तु बहुत से लोग अपनी ही मूर्खता के कारण ही कुटेवों से फेफड़ों को कमजोर कर लेते हैं। शरीर का जो अवयव नित्य प्रति काम में आता रहता है वह बलवान् बना रहता है। विपरीत इसके जिस अवयव का नित्य नित्य उपयोग नहीं किया जाता वह दुर्बल पड़ जाता है। जो लोग सीधे हाथ का ही अधिकतर उपयोग किया करते हैं उनका बायाँ हाथ सीधे हाथ की अपेक्षा कमजोर पड़ जाता है। इसी प्रकार जो लोग फेफड़ों का बराबर उपयोग किया करते हैं उनके फेफड़े बलवान् बने रहते हैं। लेकिन जो लोग फेफड़ों का निरन्तर उपयोग नहीं करते उनके फेफड़े कमजोर पड़ जाते हैं। यदि तलाश किया जाये तो सौ में नब्बे मनुष्य ऐसे निकलेंगे जो फेफड़ों का ठीक ठाक उपयोग नहीं करते। कोई पूछे कि फेफड़ों का ठीक ठीक उपयोग होता किस तरह है? इस तरह होता है कि श्वास लेते समय जो वायु बाहर से भीतर जाती है उससे फेफड़े पूरे पूरे भरे जाएँ। हवा से जब फेफड़े पूरे पूरे भर जाते हैं, तब पहले पहल पेट और पेट के नीचे का भाग फूलता है। उसके बाद फिर छाती फूलती है। छोटे छोटे बालकों को साँस लेते और छोड़ते देखने से यह बात समझ में आ सकती है। क्योंकि छोटी उम्र के बालक प्रायः कुदरती तरीके से साँस लेते हैं। लेकिन बड़े होने पर उन्हें स्कूल में टेढ़े झुककर बैठने की आदत पड़ जाती है, और वे कमर कसकर धोती बाँधने लगते हैं। इससे उनका पेट वगैरह दबा रहता है और इस कारण फेफड़ों के नीचे का भाग भीतर गये हुए साँस से पूरा पूरा नहीं भर पाता। अतएव केवल छाती और फेफड़ों का ऊपरी भाग ही श्वास लेने और निकालने का काम करता है। फेफड़ों के नीचे का भाग काम में न आने के कारण दुर्बल पड़ जाता है। अतएव शरीर के आरोग्य के लिए जितनी हवा की जरूरत है उतनी हवा फेफड़ों में नहीं आती और परिणाम इसका फिर यह होता है कि शरीर के भीतर से फेफड़ों द्वारा जितना मैल बाहर निकलना चाहिए उतना नहीं निकलता। इसलिए फेफड़ों को पूरा पूरा हवा से भरने की और पूरा पूरा खाली करने की आदत प्रत्येक व्यक्ति को डालना बहुत जरूरी है। शास्त्रों में जो कहा गया है कि प्राणायाम करने वालों का आरोग्य बढ़ता है और उनके अनेक प्रकार के रोग मिट जाते हैं, इसका अभिप्राय यही है कि फेफड़ों में पूरी पूरी हवा भरने से और पूरी पूरी निकालने से उनके द्वारा शरीर के भीतर का बहुत सा मैल नित्य प्रति बाहर निकल जाता है। जिन लोगों को श्वास की बीमारी होती है। वे न तो पूरा पूरा श्वास ले सकते हैं और न निकाल ही सकते हैं, अतएव वे सदैव दुःख भोगते रहते हैं। जो व्यक्ति प्रत्येक श्वास के साथ फेफड़ों को पूरा पूरा भरते और खाली करते हैं, उनका खाया हुआ आहार बड़ी अच्छी तरह पचता है और उनके रोगी होने की संभावना बहुत कम रहती है। सुतराँ लम्बा और गहरा साँस लेना प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमोपयोगी और लाभदायक है। इस विचार से लम्बा साँस सीखने की सबको आदत डालनी चाहिए। जो लोग खूब कसकर धोती या पायजामा पहनते हैं, उन्हें चाहिए कि कमर के ऊपर का वस्त्र और छाती के ऊपर का कपड़ा ढीला पहनने का अभ्यास डालें और बूढ़ों की तरह झुककर बैठने की आदत परम हानिकारक है। इसलिए उसे भी छोड़ देना चाहिए। जो लोग लम्बा श्वास प्रश्वास लेने की आदत डालना चाहते हों उन्हें नीचे लिखी रीति पर आरम्भ करना चाहिए।

प्रातः काल उठकर जो घर में सुभीता हो तो घर में और नहीं तो दूसरी किसी ऐसी जगह में जहाँ स्वच्छ हवा आती हो, चित लेट जाओ। तकिया रखने की जरूरत नहीं है। कमर के ऊपर का कपड़ा ढीला कर दो, और शरीर के सभी अंग प्रत्यंगों को ढीला छोड़ दो। हाथों को दोनों तरफ लंबा लंबा फैला दो। इसके उपरान्त प्रसन्न चित्त से नाक के दोनों छेदों की राह से धीरे धीरे भीतर को श्वास खींचे। पहले तो धीरे धीरे पेट को भीतर खींचे हुए श्वास से भरो। पेट भर जाने के बाद फिर भी श्वास खींचते रहो, और तब तक खींचो जब तक कि छाती भी हवा से पूरी पूरी न भर जाय। छाती का ऊपर का भाग पूरा पूरा भर जाने तक श्वास बार बार खींचते रहो। इस रीति से फेफड़ों में जितनी हवा भरी जा सके उतनी भरो। इसके उपरान्त फिर नाक के छेदों से धीरे धीरे फेफड़ों में भरी हुई वायु को पूरी पूरी बाहर निकालो। यह श्वास लेने और निकालने की क्रिया पाँच मिनट से लेकर दस मिनट तक करो। बहुत से दुर्बल फेफड़ों वाले व्यक्ति एक ही दो बार इस रीति से श्वास लेने और निकालने में हाँफ जायेंगे और व्याकुल होकर श्वास प्रश्वास लेना बंद कर देंगे। परन्तु इस क्रिया से हाँफते लगना ही परम लाभदायक है। अभ्यास हो जाने पर इस तरह श्वास प्रश्वास लेना फिर परम सुगम हो जायगा। आरम्भ में बहुत से लोगों के फेफड़े दो या तीन सेकेंड में ही हवा से पूरे पूरे भर जायेंगे, अर्थात् दो या तीन सेकेंड में जितनी हवा श्वास के साथ भीतर जा सकता है। उससे अधिक फेफड़ों में नहीं खींची गई हवा से फेफड़े भरने का समय बढ़ता जायगा। पहले अठवाड़े में श्वास खींचकर फेफड़ों को भरने में चार सेकेंड और खाली करने में भी चार सेकेंड का समय लगाना चाहिए। दूसरे अठवाड़े में छः सेकेंड और चौथे में दस, इसी तरह फेफड़ों को हवा से भरने और खाली करने का समय उत्तरोत्तर बढ़ाते जाना चाहिए। शनैः शनैः अभ्यास बढ़ जायगा तो आधे मिनट तक खींची गई हवा फेफड़ों में भर सकेगी, और इतना ही समय फेफड़ों को हवा से खाली करने में लगा करेगा। बहुत से बढ़े हुए अभ्यास वाले व्यक्तियों के फेफड़ों में दो मिनट तक जितनी वायु खिंच सके उतनी भरती है। इसलिए धीरे धीरे अभ्यास को बढ़ाना ही मुख्य है। रात्रि को सोते समय भी यही क्रिया की जाय और दिन में जब अवकाश मिल सके तभी इसे कर लेना लाभदायक होगा। जितनी हो सके उतनी अधिक वायु फेफड़ों में जाने से और फिर फेफड़ों के पूरा पूरा खाली होने से खून बहुत अधिक शुद्ध होता है, आरोग्य की वृद्धि होती है, बुद्धि विशुद्ध होती है, मन स्वस्थ और विचार शक्ति तीव्र होती है। इनके अतिरिक्त और भी बहुत से लाभ होते हैं।

कसरत करने से फेफड़ों में अधिक वायु भरने का कार्य होता है। दौड़ने, कूदने और अन्यान्य प्रकार की कसरतों से भी साँस आने जाने का काम खूब तेजी के साथ चलना है जिससे कि बहुत सी वायु फेफड़ों में भरती और बाहर निकलती है और शरीर का मैल बहुत कुछ बाहर निकल जाता है। इसलिए शुद्ध हवा में कसरत भी परम लाभदायक है।

ऊपर कही हुई रीति से श्वास लेने और निकालने की तथा कसरत के द्वारा फेफड़ों में वायु भरने से शरीर के अनेक रोग मिट जाते है और नये रोग उत्पन्न होने से रुक जाते हैं।


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हर एक व्यक्ति, ईश्वर की दृष्टि में अपने पेशे का ऋणी है, क्योंकि उसी से उसकी जीविका चलती है। इसलिए उनका परम पावन कर्त्तव्य है कि वे उस पेशे के प्रति ईमानदार रहें और ऐसा कोई कार्य न करें जिससे उस पेशे का अपमान हो।

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यथाशक्ति लोगों के दुःख का निवारण करना ज्ञानी पुरुषों का कर्त्तव्य है।

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मेरी डायरी के पृष्ठों से

(डॉ. गोपाल प्रसाद ‘वंशी’, बेतिया)

बाहरी पदार्थों को अपने प्रति अनुसरण कराने के बजाय अपने मन को बाहरी पदार्थों के प्रति अनुसरण कराने का अभ्यास रखना यह सुख का सच्चा रहस्य है।

जिस प्रकार दिन के अन्त में रात और रात के अन्त में दिन आता है, उसी प्रकार हमेशा सुख के बाद दुख और दुख के बाद सुख होता है। जो इकट्ठा हुआ है, उसका क्षय होगा, जो ऊँचे चढ़ा है, वह नीचे गिरेगा, जिसका संयोग हुआ है, उसका वियोग होगा और जो जीता है उसका मरण होगा।

सारे भयों के ऊपर, निष्ठुर और निर्दय दैव के ऊपर और नीचे गरजती हुई अतृप्त तृष्णा के ऊपर ज्ञानी मनुष्य शान्त होकर स्थित रहता है।

बात बात पर विचार करो और सत्य को ढूँढ़ो।

सन्तोष जीवन का सबसे बड़ा धन है।

आकाँक्षा और इच्छा में अन्तर है। आकाँक्षा दया, प्रेम, सत्यता, पवित्रता आदि स्वर्गीय पदार्थों के लिये होती है, जिनसे आत्मिक सुख मिलता है। इच्छा- साँसारिक विषय वासनाओं और भोग-विलासों के लिये होती है, जिनसे इन्द्रिय-सुख मिलता है।

जहाँ वासना है वहाँ शान्ति नहीं। जहाँ शान्ति है, वहाँ वासना नहीं।

तुम अपनी स्थिति और अवस्था के स्वयं निर्माता हो। जितना तुम विषय वासनाओं में लिप्त होंगे और साँसारिक पदार्थों की इच्छा करोगे, उतना ही दुख उठाओगे और जितना तुम उनका त्याग करोगे, उतना ही सुख पाओगे।

स्वर्गीय राज्य के निवासी अपने जीवन से पहिचाने जाते हैं। प्रेम, हर्ष, शान्ति, संयम, नम्रता, दयालुता, सत्यता, सहनशीलता आदि गुण उनमें सर्वदा और सर्वत्र रहते हैं।

मन की वृत्तियों को रोकने का नाम मौन है।

अपने जीवन को स्वस्थ और सुखी रखना चाहते हो तो अपनी रुचि को स्वाभाविक और सरल बनाओ।

पवित्रता का जीवन सरोवर-सा शान्त, मन्द पवन-सा उन्मद और दुग्धफेन-सा उज्ज्वल होता है।

ईश्वर के लिये सम्पूर्ण जगत एक सुन्दर खेल मात्र है। जो निरा कंगाल है, उसे अपनी कंगाली को खेल समझना चाहिए। जो अमीर है, उसे अपनी अमीरी को खेल समझ कर भोगना चाहिये। विपद् आवे तो उसे भी मनुष्य सुन्दर खेल समझे और सुख मिले तो उसे भी सुन्दर खेल माने। जगत् केवल क्रीड़ा -क्षेत्र -खेल का मैदान है।

यदि तुम दुनिया को सुधारना और उसके दुखों एवं कष्टों को दूर करना चाहते हो, तो पहले अपने आपको सुधार लो।

जिस मनुष्य ने अपने हृदय को राग, द्वेष काम, क्रोधादि कषायों और कुत्सित इच्छाओं से रहित कर लिया है, उसके सुख और आनन्द की कोई सीमा नहीं।

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माँस से दूर रहिए

(डॉ. पी. आर. जैन)

मानव शरीर की बनावट और अवयवों को देखकर ही यह स्पष्ट हो जाता है कि माँसाहार उसके लिए उपयोगी नहीं है। माँसाहार की बुराइयां सभी ने स्वीकार की हैं, चाहे हमारे प्राचीन महापुरुषों को ले लीजिये या वर्तमान पूर्वी और पश्चिमीय विद्वानों को। माँस खाने से दाँत में रोग तो उत्पन्न हो ही जाता है साथ ही सन्धि-वात आदि रोगों का कारण भी माँस ही है शरीर के अतिरिक्त माँसाहार से मन पर भी बहुत असर पड़ता है और क्रोध की भावना माँस खाने वाले व्यक्तियों में अधिकता से पायी जाती है। क्रोध हमारे स्वास्थ्य को नष्ट करता है वह भी एक मानी हुई बात है। यही कारण है कि माँस खाने वाले व्यक्ति कभी भी नीरोग नहीं रहते और माँस से जो विकार पैदा होता है वह बराबर स्वास्थ्य को गिराता रहता है।

संसार में जितने भी महान् पुरुष हुए हैं सभी ने माँसाहार की बुराई की है। भारतीय ऋषियों महात्माओं के अतिरिक्त भगवान बुद्ध, महावीर, सम्राट अशोक आदि ने भली भाँति इसकी बुराई की है। विदेशी महान पुरुषों में सुकरात, अरस्तू, पैथागोरस मैथ्यू, गैरीबाल्डी मिल्टन, नेलसन, शेली, पोप, जेम्स, पीटर आदि ने इसे बुरा बताया है। महात्मा, टॉलस्टाय ने माँसाहार के सम्बन्ध में लिखा है-

कुछ लोग कहते हैं कि माँसाहार अनिवार्य नहीं तो किन्हीं दशाओं में आवश्यक है। मैं कहता हूँ कि यह आवश्यक नहीं है। माँसाहार से मनुष्य की पाशविक वृत्ति बढ़ती है, काम उत्तेजित होता है, व्यभिचार करने एवं शराब पीने की इच्छा होती है।’

बहुधा लोग यह कहा करते हैं कि माँसादि खाने से मनुष्य में विशेष रूप से ताकत आती है। यह भी एक बड़ा भारी भ्रम है। कितने ही जानवर या पक्षी जिनका माँस खाकर शक्ति बढ़ाने की बात कही जाती है वे सभी घास खाते हैं। क्या माँस खाकर कोई मनुष्य हाथी के समान ताकतवर हो सकता है? कदापि नहीं। इसके विपरीत जितने पहलवान हुए है वे विशेष रूप से दूध और फल का ही सेवन करते हैं मरुभूमि में ऊँट ही जीवनदाता सवारी है और उसके बिना वहाँ काम ही नहीं चल सकता। उसकी सहिष्णुता और ताकत देखकर दंग रह जाना पड़ता है। लेकिन क्या वह कभी माँस खाता है? गाय के दूध और घी में कितनी शक्ति है लेकिन क्या वह कभी माँस छूती है? लेकिन माँस खाने वालों में शेर का गोश्त भी कोई खाता है? क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो शरीर की ताकत बढ़ाने के लिये शेर आदि खूँखार जानवरों का माँस खाये? कदापि नहीं। इससे यह निश्चित है कि मनुष्य क्या जानवर तक को भी माँस उपयोगी नहीं है। स्फूर्ति में घोड़े, मृग आदि पशु केवल तृण खाते हैं।

कुछ समय पूर्व अमेरिका के येल विश्व विद्यालय के एक विद्वान प्रोफेसर ने इस सम्बन्ध में अनुसंधान किया था और उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला था कि माँसाहारी पहलवानों की अपेक्षा शाकाहारी पहलवान अधिक बली थे और उनमें सहिष्णुता कहीं अधिक थी। बैठक करने में माँसाहारी पहलवान अधिक से अधिक 400 और शाकाहारी पहलवान 700 से भी अधिक बैठक कर सके। अन्य यूरोपीय देशों में भी इसकी परीक्षा की गयी है और यह परिणाम निकाला गया कि शाकाहारी पहलवान अधिक ताकतवर होते हैं और उनमें कही अधिक सहिष्णुता होती है। लम्बी दौड़ में भी जितने विजयी होते हैं, वे अधिकाँश में फलाहारी होते हैं। खासकर अण्डा खाने वाला व्यक्ति तो अधिक दौड़ ही नहीं सकता क्योंकि उसके शरीर में तुरन्त गर्मी भर जाती है। अनेक बार ऐसी परीक्षा की गयी और सदैव यही परिणाम निकला कि वास्तविक ताकत शाक, फल और दूध से मिलती है- माँस, मछली और अण्डे से नहीं।

इसके अतिरिक्त डाक्टरों और आविष्कारक विशेषज्ञों ने लिखा है कि शारीरिक और मानसिक शक्ति के अलावा फलाहार से शरीर की सुन्दरता बढ़ती है और मुख पर कान्ति तो फल और दूध की देन है। स्त्रियों की सुन्दरता तथा बच्चों में स्फूर्ति, तेज और बुद्धि लाने के लिए फल और दूध का ही सेवन करना चाहिए। इससे यह स्पष्ट है कि माँस से शक्ति वृद्धि की दलील व्यर्थ है और उसमें कोई तर्क या आधार नहीं है।

फिर अहिंसा की रक्षा भी तो करनी है। अपना पेट भरने के लिये एक अन्य जीव की निर्दयतापूर्वक हत्या करना कहाँ का मनुष्यत्व है? जब नाना प्रकार के अन्न, शाक, फल और दूध मनुष्य के लिये हैं तो फिर माँसाहार की आवश्यकता ही क्या है। अधिकाँश में माँस उन्हीं पशुओं का खाया जाता है जो दूध देते हैं इससे दूध की कितनी कमी है यह भारतीय खूब जानते हैं। यदि आज घर घर में घी-दूध की कमी न हो तो फिर ताकत बढ़ाने के ढोंग को बनाये रखने के लिये माँस का आश्रय ग्रहण न करना पड़े। दूध और फल से चेहरे पर जो लाल और चमक आती है तथा दिमाग जितना तेज होता है माँसाहार से उतना ही शारीरिक और मानसिक विकार उत्पन्न होता है। नीचता, क्रूरता, अत्याचारादि का कारण प्रधानतया माँसाहार और मद्यपान है। वास्तव में माँसाहार और मद्यपान मानवोचित कार्य नहीं है।

संसार-प्रसिद्ध निरामिष भोजी महात्मा गाँधी की मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति संसार भर में विख्यात है और आज तक जितने भी पहुँचे हुए महात्मा तथा मनुष्य को उन्नति पथ पर चलाने वाले नेता हुए हैं, वे सब निरामिष भोजी थे। आज हम जिन टॉलस्टाय, एमरसन, थ्योरो, एडवर्ड, कारपेण्टर, रोमाँ रोलाँ आदि विदेशी मनीषियों का नाम सुन रहे हैं वे सभी जन्म से माँसाहारी होने पर भी अन्त जाकर निरामिष भोजन के परिणाम पर पहुँचे हैं। इससे मालूम होता है कि मनुष्यों के लिए निरामिष भोजन ही उपादेय है।

शाकाहार निरापद है परन्तु माँसाहार से अनेक रोग उत्पन्न हो सकते हैं। गो- माँस, शू-माँस और भेड़-माँस में अक्सर कोढ़ और अन्य रोग के कीटाणु रहा करते हैं। हिन्दुस्तान में अक्सर लोग बीमार जानवरों को ही लालच में बेचकर अपना पिण्ड छुड़ाते हैं, जिससे माँस खाने वालों को अक्सर बीमार जानवरों का माँस खाने को मिला करता है।

माँस अप्राकृतिक भोजन है। यही कारण है कि इससे शरीर में नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। कथित सभ्य समाज इसके सेवन से कैन्सर, क्षय, ज्वर, कृमि आदि भयानक रोगों से पीड़ित है और ये रोग एक से दूसरे में फैलता है। माँस, मछली, अण्डे आदि खाने से शरीर में भयानक रोग उत्पन्न होते हैं और यकृत, यक्ष्मा, राजयक्ष्मा, मृगी, फीलपाँव, संधिवात, नासूर और अन्य भीषण दोष उत्पन्न होते हैं।

पश्चिमीय वैज्ञानिक और डॉक्टर लोग अपने देशवासियों को माँसाहार का परिमाण घटाने की सलाह दे रहे हैं और यही कारण है माँस के बदले वहाँ दूध, फल, अनाज वगैरह का अधिकाधिक प्रचार होता जा रहा है। जब शीतप्रधान देशों में आमिष भोजन अनुपयोगी सिद्ध होता जा रहा है तब भारतवर्ष जैसे ग्रीष्म प्रधान देश के लिये तो माँसाहार और भी हानिकारक है।


Quotation

अपने को भरसक बुराइयों से बचाते रहना और अनिवार्य बातों से लाभ उठाना- यही कर्म का कौशल है।

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उदारतापूर्ण कार्य स्वयं अपना पारितोषिक है।

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सत्संग और वातावरण का प्रभाव

(श्री आदित्य प्रसाद कटरहा दमोह)

भौतिक जगत में हम देखते हैं कि जब एक वस्तु दूसरे के साथ रहती है तब उन वस्तुओं में उनके गुणों का परस्पर आदान प्रदान होता है। अग्नि जल को गर्म करती और जल अग्नि को ठंडा करता है। उसी प्रकार सत्संग द्वारा भी परस्पर गुणों का आदान-प्रदान होता है।

एक साधारण पुरुष जब महात्माओं के बीच में पहुँच जाता है तब वह क्रमशः शुद्ध होने लगता है। उसका वातावरण बदल जाता है और वह बदली हुई परिस्थिति में स्वयं भी बदल जाता है। मनुष्य अपनी परिस्थितियों से प्रभावित रहता है। यदि वह छली, कपटी और धूर्त लोगों के बीच में पड़ जाता है तो वह प्रत्येक व्यक्ति को सन्देह भरी दृष्टि से देखने वाला बन जायेगा। उसे सब लोग कपटी और स्वार्थी प्रतीत होंगे और वह किसी के साथ स्वतन्त्रतापूर्वक व्यवहार न कर सकेगा। किन्तु यदि वही व्यक्ति महात्मा पुरुषों के बीच में रहने लगे तो उनके त्यागपूर्ण व्यवहारों से उसे यह अनुभव होगा कि मनुष्य का स्वभाव दिव्य है। उसे उनके साथ किसी तरह का सन्देह न होगा एवं वह सबके साथ खुलकर व्यवहार करेगा। इस तरह का वातावरण जीवन के लिए एक विडम्बना है और हम देखते हैं कि मनुष्य या इस तरह के लोगों के बीच में रहता है। उसकी धारणाएं तदनुकूल हो जाती हैं और उसे व्यवहार से हम पता लगा सकते हैं कि वह किस प्रकार के वातावरण में पला है।

यदि कोई व्यक्ति ऐसे वातावरण में पहुँच जाये जहाँ लोग उसे मूर्ख, अस्पृश्य और घृणास्पद समझने लगें तो उसके चित्त में आत्महीनता की ग्रंथि का निर्माण होने लगेगा और उसकी शक्तियाँ कठिन होने लगेंगी। वह अपना आत्म विश्वास, आत्म-गौरव और निर्भीकता खो बैठेगा और दुखी बन जायेगा। भारतवर्ष के अछूतों का यही हाल हुआ है। उन्हें जन्म जन्मान्तर से बुरे संकेत दिए गए हैं, जिन्हें हम पुनर्जन्म के सिद्धान्त की आड़ में उचित और पाप-परिक्षालक कहते रहे हैं। इस संकेतों ने ही उन्हें दास-स्वभाव वाला बनाया है। ऐसा वातावरण सचमुच जीवन के लिए एक अभिशाप है।

जिन्हें अपनी श्रेष्ठता का अभिमान होता है उनके बीच में रहना मानो अपने जीवन को दुखी बना लेना है। किन्तु यदि हम महात्मा श्री के बीच में रहें तो निश्चय ही हमारे अन्तस्तल में उनके सद्व्यवहारों के कारण आत्म-हीनता की ग्रंथि का निर्माण नहीं हो सकता। उनके साथ रहने से तो उल्टे ही ये ग्रंथियाँ मिट जाती हैं। जिस तरह कोई मनः शास्त्र विशेषज्ञ अपनी सहानुभूति के द्वारा चिकित्सा करते समय रोगी के गुप्त मनोभावों और रहस्यों को उससे कहलवा लेता है और ग्रंथि पड़ने के कारण को जानकर उसका निराकरण कर देता है उसी तरह सन्त-समाज में हमारे हृदय की ग्रंथियाँ उनके प्रेमपूर्ण व्यवहार के कारण खुल पड़ती हैं और हम अनुभव करते हैं कि हमारा हृदय हल्का हो गया और हमारे दीर्घ रोग की चिकित्सा हो गई।

संतों के समागम में रहकर हमें जीवन के प्रति स्वास्थ्य प्रद दृष्टिकोण प्राप्त होता है। उद्देश्यहीन जीवन के स्थान में हमारा जीवन उद्देश्य-युक्त हो जाता है और हम दूसरों का अन्धानुकरण नहीं करते।

मनुष्य के आचार-विचार के लिए उसका वातावरण बहुत अधिक अंशों में उत्तरदायी है। अतएव यदि मनुष्य अपने वातावरण को बदल डाले तो उसके आचार-विचार और स्वभाव में परिवर्तन सहज ही हो जायेगा। किन्तु वातावरण को बदलना, कहने में जितना सरल है, वास्तव में वह उतना सरल नहीं। सच तो यह है कि वातावरण को बदलना ही परोक्ष रूप से अपने आचार-विचार को बदलना है अतएव उसका बदलना उतना ही कठिन है जितना कि आचार-विचारों का। उदार-हृदय सहृदय व्यक्तियों का संग सबके लिए सुलभ है। गीता आदि धर्मपुस्तकों का संग सबको सुलभ है। प्रत्येक व्यक्ति वे-रोकटोक उनका सत्संग कर सकता है। किन्तु फिर भी उनके सत्संग से अनेकों प्राणी वंचित रहते हैं। उनका चित्त ही उन्हें उस सत्संग से वंचित रखता है। उनके हृदय में जो पूर्व संस्कार हैं वे ही बाधा डालते हैं और उन्हें सत्संग रुचता नहीं। बिना आचार-विचार बदले न तो हम सत्संग के योग्य बनते हैं और न बिना संगी साथियों को बदले हमारे आचार-विचार ही बदल सकते हैं। हमारे आचार-विचार और परिस्थितियाँ परस्पर एक दूसरे के परिणाम अथवा प्रतिबिम्ब हैं। अतएव अच्छे आचार-विचार वाला व्यक्ति ही सत्संग कर सकता है और हम कह सकते हैं कि जो महात्माओं का संग करता है उसका मानसिक धरातल निश्चय ही उच्च होना चाहिए।

सत्संग द्वारा आचार-विचार बदलने से मनुष्य के जीवन का दृष्टिकोण भी बदलना अनिवार्य है। जो व्यक्ति आज प्रत्येक कार्य करते समय व्यक्तिगत लाभ का लेखा जोखा करता है वही व्यक्ति सत्संग के प्रभाव से उन्हीं कार्यों को सामाजिक लाभ अथवा लोक-संग्रह की दृष्टि से करने लगे, यह भी सम्भव है। गाँधी जी के प्रभाव में आकर अनेकों धनियों ने अपने दृष्टिकोण को बदला यह तो सभी जानते हैं।

सत्संग से हमें अपने ध्येय की ओर तीव्रगति से बढ़ने के लिये प्रेरणा मिलती है। अपने आध्यात्मिक विकास के लिए साधन करना जिनका सहज स्वभाव हो गया है, उनके लिए सत्संग की आवश्यकता भले ही न हो किन्तु इतने जनों के लिए यह उत्साहवर्द्धक है। जिस विद्यार्थी ने व्यायाम करना अभी अभी शुरू किया है वह घर पर नित्य नियमित रूप से अकेले ही कितने दिनों तक व्यायाम करेगा। किन्तु यदि वही विद्यार्थी, अन्य व्यायाम-प्रिय विद्यार्थियों का संग पा जाये, तो उसके उत्साह में शिथिलता न आने पायेगी और धीरे धीरे व्यायाम करना उसका सहज स्वभाव हो जायेगा और फिर वह अकेले रहने पर भी उसी उत्साह से व्यायाम करता जायेगा। अतएव यदि आरम्भिक अभ्यासी को तीव्रगति से उन्नति करना है तो उसके लिए उत्साह अनिवार्य है।

जिस तरह कीड़े पर भृंगी का प्रभाव पड़ता है। इसी तरह सत्संग के द्वारा भी साधकों पर श्रेष्ठजनों का प्रभाव पड़ता है। यदि आप एक साधारण लौकिक प्राणी हैं और आपको किसी महात्मा-पुरुष की कृपा प्राप्त है तो उससे पत्र व्यवहार करने में और उसके दर्शन करने में आपको जो समय बिताना पड़ेगा उसके कारण आपके विचार बहुत कुछ उसकी ओर खिंचे रहेंगे और आपके जीवन का एक पर्याप्त हिस्सा उनके सत्संग सम्बन्धी विषयों के विचार में ही व्यतीत होगा और आप भृंगी-कीट-न्याय की नाईं धीरे-धीरे उनके ढाँचे में ही ढलते चले जायेंगे। इसलिए कहा है “महत्संगो दुर्लभश्चामाधश्च।”


Quotation

हँसी की बात नहीं है, यह जीवन का सत्य है। मनुष्य मूर्ख है यदि वह अपना नुकसान देखकर रोता है। नुकसान होने पर ही आत्मा को विचार करने और ईश्वर को पूजने का समय मिलता है, और सत्य का दर्शन भी प्रभु तभी कराता है।

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कष्टों को कम करना और उनके कारणों को दूर करने का प्रयत्न करना मनुष्य के करने योग्य कार्य हैं।

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भ्रम (चक्कर) रोग

(आयुर्वेदाचार्य पं. कृष्णाप्रसाद त्रिवेदी बी.ए.)

यह रोग आजकल हमारे नव शिक्षित तरुण पुरुष स्त्रियों में बहुतायत से प्रचलित हो गया है। इस रोग के रोगी के खड़े होने पर या किसी अन्यान्य प्रकार की तुच्छ शारीरिक चेष्टा करने पर, उसके नेत्रों के नीचे अन्धकार छा जाता है कभी कभी ऐसी अवस्था में रोगी चक्कर खाकर गिर भी पड़ता है। यदि रोगी इस दशा में गिरे नहीं, किन्तु चक्कर के भँवर में ही पड़ जाये तो उसको निकट की सारी वस्तुएं घूमती हुई दिखाई पड़ेंगी या मालूम होंगी।

इस रोग की प्रथमावस्था आँखों तले अन्धकार लाती है, दूसरी अवस्था मस्तक में चक्कर उत्पन्न करती है और तीसरी अवस्था पृथ्वी पर गिरा देती है। इस अंतिम अवस्था के बाद रोगी की दशा मृगी रोग के जैसी हो जाती है। दौरा भी आरम्भ हो जाता है। किन्तु मृगी रोग और इसमें अन्तर इतना ही पाया जाता है कि मृगी का रोगी अपने मुख से झाग गिराता हुआ हाथ पैर पटकता है, कभी-कभी कफ भी गिराता है और व्याकुलता प्रकट करता है। किन्तु इस प्रस्तुत रोग (भ्रम रोग) का रोगी, अन्तिम अवस्था के बाद से, केवल चुपचाप रहता है।

रोग का कारण- यह रोग प्रायः सर की कमजोरी के कारण उत्पन्न होता है। मादक द्रव्यों (गाँजा, चरस, सुपारी, पान, तमाखू, तेज चाय, शराब, मद्य आदि) के सेवन से, नजला या जुकाम के बाद किसी भूल से, मस्तक में अधिक ठंडी हवा लगने से, ठण्डे पदार्थों के अधिक सेवन से, प्राणवायु के बिगाड़ और दूषित मल से (दूषितमल से एक प्रकार की विषैली भाप निकलती है जो प्राणवायु से टकरा कर यह अवस्था उत्पन्न कर देती है, पित्त की अधिकता से, गर्मागर्म भोजन से और अधिक स्त्री प्रसंग करने से भी यह रोग पैदा हो जाता है।

रोग का स्वरूप और चिकित्सा-यदि कमजोरी, मादक, द्रव्य या शीत के कारण यह रोग हो तो इसकी आरम्भिक अवस्था में कानों में गुनगुनाहट, पेशाब में झागों का होना, पपोटे फड़कना आदि लक्षण होते हैं। ऐसी अवस्था में सोना कम कर देना चाहिए छः घण्टे से अधिक नहीं सोना चाहिए। व्यायाम करना चाहिए। ठण्डी और अजीर्ण उत्पन्न करने वाली व भारी चीजें न खाना चाहिए। गुलबनपशाँ, कासनी के बीज और सोंफ 7-7 मासे, मुनक्का 6 नग और गाबजबाँ 5 मासे इन सबको रात्रि के समय गर्म पानी में भिगोकर तथा प्रातःकाल छानकर पीवे।

यदि यह रोग दूषित मल के कारण हो तो रोगी का चित्त हर समय चिंतितावस्था में रहता है। चुपचाप बैठे रहना अधिक पसन्द करता है। भयावने और झगड़ालू विचार उत्पन्न होते हैं, बुरे स्वप्न दिखलाई देते हैं, निद्रा बहुत कम आती है, कुपच होता है, अंधकार से भय मालूम देता है।

ऐसी अवस्था में समयानुकूल साधारण जुलाब लेना चाहिये। अजीर्ण पैदा करने वाले तथा मल संचय करने वाले पदार्थ जैसे शकरकन्द, अर्बी, लहसुन, प्याज, चने की दाल आदि नहीं खाने चाहिये। पित्तपापड़ा, चिरायता, सोंफ और गुलाब के फूल 7-7 मासे मुनक्का 9 नग से सब जल में मिला (जल 5 से 10 तोले तक) कुछ जोश देकर व छानकर तथा उसमें शरबत बनपशा 4 तोले मिला, आधा 2 प्रातः और संध्याकाल को पिलावे।

यदि यह व्याधि पित्त या गर्मी के कारण हो तो रोगी के सिर और आँखों में दर्द होता है आँखों में सूजन, मुख का वर्म पीलापन, प्यास की अधिकता, मुख का स्वाद कड़ुवा, पेशाब सुर्ख आदि लक्षण होते हैं। यदि रोगी का जी मचलता हो तो समझाना चाहिए कि असल कारण आमाशय में है। ऐसी अवस्था में पानी में नीबू का रस डालकर पिलाये। इससे यदि कैडडडडड हो जाय तो ठीक ही है। पित्त शीघ्र शाँत हो जाता है। गर्म पदार्थ न खायें। धूप में न फिरें, गुड़, तेल, लाल मिर्च, उड़द की दाल न सेवन करें। शारीरिक तथा मानसिक विशेष परिश्रम न करें।

इस पर कासनी बीज, खत्मीबीज, गुल बनफशा, नीम की कोफ्ल, नीलोफर और पित्त पापड़ा 7-7 मासे, उन्नाव 5 दाने, आलू बुखारा 5 नग इनको रात्रि के समय गर्म जल में भिगोकर प्रातः मल छानकर तथा उसमें शरबत नीलोफर दो तोला मिला सेवन करें। और श्वेत चन्दन को गुलाबजल में घिसकर कनपटी पर लेप करें।

यदि अधिक प्रसंग के कारण यह विकार हुआ हो तथा कुछ प्रमेह की भी शिकायत हो तो किसी सद्वैद्य द्वारा परीक्षा कराकर प्रमेद नाशक उपचार करें। ध्यान रहे वीर्यपात की अधिकता सैकड़ों रोगों की जड़ है। इस रोग का मूल कारण जो मस्तक की निर्बलता है वह भी प्रायः वीर्यपात ही से उत्पन्न होती है। अतः ब्रह्मचर्य धारण की परम आवश्यकता है।


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जिसके पास कुछ नहीं है वह गरीब नहीं कहा जा सकता। गरीब तो वह है जिसकी अभिलाषा अधिक है।

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आदम के लिए स्वर्ग घर था उसके वंशजों में भले आदमियों के लिए घर ही स्वर्ग है।

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जब तक तुम घमण्ड को छोड़ कर बच्चों की तरह सरल नहीं हो जाते जब तक तुम्हारा प्रवेश स्वर्ग के राज्य में नहीं हो सकता।

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दरिद्रता को कुछ वस्तुओं की आवश्यकता रहती है। विलासिता को अनेक वस्तुओं की और तृष्णा को समस्त वस्तुओं की।

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भगवान बुद्ध की वाणी।

(1) अपने को अपने आप उठा। अपनी आप परीक्षा कर। इस प्रकार हे भिक्षु! तू अपनी आप रक्षा करता हुआ और विचारशील होकर सुख लाभ करेगा।

(2) जटा, गोत्र या जाति से कोई ब्राह्मण नहीं होता। जिसमें सत्य और धर्म है वही ब्राह्मण है।

(3) मैं किसी को उसके कुल अथवा माता के कारण ब्राह्मण नहीं कहता चाहे उसका लोग सम्मान ही क्यों न करें। मैं तो उसको ब्राह्मण कहता हूँ जो अपरिग्रही और आप बन्धनों से रहित है।

(4) मैं उसको ब्राह्मण कहता हूँ जो क्रोधरहित, कर्तव्य परायण, शीलवन्त, इच्छारहित संयमी और मुक्ति के निकट है।

(5) मैं उसे ब्राह्मण कहता हूँ जो कर्कशता रहित, शिक्षा युक्त और सच्ची वाणी बोलता है जिससे किसी का दिल न दुखे।

(6) मैं उसको ब्राह्मण कहता हूँ जिसमें विषय वासना नहीं है, जिसने सचाई को जान लिया है। जिसके संशय छिन्न भिन्न हो गये हैं। जिसने अमृत पद के मार्ग को जान कर उसे ग्रहण कर लिया है।

(7) मैं उसको ब्राह्मण कहता हूँ जो नेता, प्रबल, वीर, महर्षि, विजित काम, पवित्र और बुद्ध है।

(8) अगर तुमको ऐसा निष्पक्ष साथी मिल जाये जो नेक और बुद्धिमान हो और किसी प्रकार की कठिनाई से न हारे तो तुम दत्त चित्त होकर उसके साथ चल दो।

(9) प्रमाद रहित हो अपने विचारों को सुरक्षित करो। कीचड़ में फंसे हुए हाथी के समान बुराइयों से ऊपर उठने का प्रयत्न करो।

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अपने विषय में चिन्ता न करें

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.)

चिन्ता एक महानाश करने वाली व्याधि है, जिससे मन की समस्त उत्तमोत्तम शक्तियाँ पंगु हो जाती हैं। एक बार की चिन्ता सारे दिन की संचित शक्ति को नष्ट कर डालती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अपने विषय में चिंतन करने से मनुष्य विकार ग्रस्त, रोगी दीन हीन रहता है। उसमें नए नए शक शुवे उठते हैं। वह कई ऐसी कमजोरियाँ अपने व्यक्तिगत में बढ़ा लेता है, जिसका अस्तित्व बिल्कुल नहीं होता। धीरे-धीरे ये कल्पित रोग न्यूनताएँ शरीर में विचार शक्ति के दुरुपयोग स्वरूप स्वतः प्रकट हो जाती हैं। व्यक्ति बीमार हो जाता है।

अपनी कमजोरी का एक भी विचार मन में नहीं जाना चाहिए, अन्यथा परिणाम बड़ा भयंकर होता है। चिन्ता संक्षय उत्पन्न करती है। अनेक बार बीमारियों के विज्ञापन देखते देखते कितने ही व्यक्तियों को यह भ्रम हो जाता है कि हम कमजोर हैं, नपुँसक हैं, उदर पीड़ित हैं या पीले पड़ते जा रहे हैं, हाजमा बिगड़ता जा रहा है, हम दुबले पतले होते जा रहे हैं। ये सब रोग भ्रमवश अंतर्मन में उमड़ उठते हैं और मनुष्य का क्षय करने लगते हैं।

चिन्ता द्वारा आंतरिक जगत् से कुछ ऐसे विष निकलते हैं, जिनसे हमारी बुद्धि क्षय होने लगती है, आनन्द मिट जाता है, उत्साह क्षीण हो जाता है और मस्तिष्क में गर्मी बढ़ जाती है। मस्तिष्क के श्वेत बालुका और ग्रे मैटर सूखकर कड़े हो जाते हैं, मस्तिष्क के राज्य में अस्त व्यस्तता फैल जाती है।

चिन्ता एक प्रकार की मानसिक आदत है। कुछ व्यक्ति अनहोनी बातों, बेसिर पैर की कल्पनाओं में रत रहते हैं। कहीं यह न हो जाय, वह हो जाय, नौकरी न छूट जाय, बालक न मर जाय, चीजें महंगी न हो जाएं? बच्चों की शादी कैसे होगी? कल घर में अमुक वस्तु नहीं है, क्या होगा? रात में कोई घर में न घुस आवे?-न जाने कितनी चिंताएँ हमारे सभ्य जीवन को अस्त व्यस्त कर रही हैं।

इस अस्वास्थ्यकर आदत को स्वभाव से दूर कीजिये। उन्मुक्त, मस्त रहना सीखिये। जब कल आयेगा, देखा जायगा। अभी से क्यों फिक्र करें। आज तो मानसिक स्वतन्त्रता का सुख लूट लें, कल अपनी फिक्र खुद करेगा। उत्तम पुरुष वही है, जो चिन्ता के स्थान पर सदैव शान्त और गंभीर रहता है। चिन्ता के मोहपाश में नहीं फँसता बल्कि उसके अंधेरे को साफ कर वास्तविक चीजों को पहचानता है। वह मानसिक समस्वरता प्राप्त कर रहा है।

हम ठीक तरह विश्राम करना नहीं जानते। इसी से विश्राम के क्षणों में भी चिन्ता आ दबाती है। बेफिक्री की नींद में जो स्वास्थ्य प्रदायिनी शक्ति है वह उस बच्चे को देखकर मालूम हो सकती है जो बिना किसी चिन्ता के खुर्राटे भरी नींद का मजा लूटता है।

चिन्ता हमारी छाया है। क्या हम अपनी परछांई से डर जायं? क्या हम इस परछांई को असली चीज समझ कर डर उठें?

चिन्ता पर विजय प्राप्त करने का सर्वोत्तम मार्ग यह है कि हम अन्य उत्तम कार्यों में अपना मन लगायें, अपने को छोड़कर और बातों पर मनन करें।


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अपने शरीर को अन्तरीप समझो जिसमें समुद्र की लहरें दिन रात टकराया करती हैं, लेकिन तब भी वह अपने स्थान को नहीं छोड़ता। इसी प्रकार जितनी आपत्तियाँ तुम पर आवें सभी को वीरता के साथ सहन करो और उनसे विचलित न हो।

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संगठित हूजिए-एक रहिए

मनुष्य प्राणी आज सृष्टि का मुकुटमणि है। उसने अनेक दिशाओं में आश्चर्यजनक उन्नतियाँ की हैं। साधारण श्रेणी के पशु से ऊपर उठकर वह उन्नति के उच्च शिखर पर जा बैठा है। इस उन्नति का मूलभूत कारण उसकी एकता शक्ति, मिलन शक्ति, सामाजिकता, मैत्री भावना, सहयोग परायणता ही है। मनुष्यों ने आपस में एक दूसरे को सहयोग दिया, अपनी स्थूल और सूक्ष्म शक्तियों को आपस में मिलाया इस मिलन से ऐसी ऐसी चेतनाएं, सुविधाएं उत्पन्न हुईं जिनके कारण उसके उत्कर्ष का मार्ग दिन दिन बढ़ता गया। दूसरे प्राणी जो साधारणतः शारीरिक दृष्टि से मनुष्य की अपेक्षा कहीं अधिक सक्षम थे, इस मैत्री भावना, सम्मिलन योग्यता के अभाव में जहाँ के तहाँ पड़े रहे, वे अति प्राचीनकाल में जैसे थे वैसे ही अब भी बने हुए हैं। मनुष्य की तरह उन्नति का सुविस्तृत क्षेत्र वे प्राप्त न कर सके। संघ शक्ति भी एक महान् शक्ति है उसे भले या बुरे जिस भी माँग में जिस भी मार्ग में जिस भी कार्य में लगाया जायगा उधर ही आश्चर्यजनक सफलता के दर्शन होंगे।

मनुष्यों में भी अनेक देश, जाति, वर्ग, समूह हैं। उनमें वे ही आगे बढ़े हैं, वे ही समुखत हुए हैं जिनमें अपेक्षाकृत अधिक सहयोग भावना है। व्यक्तिगत रूप से विचार किया जाय तो भी हमें वे ही व्यक्ति समृद्ध मिलेंगे जिन्होंने किसी भी उपाय से दूसरों का अधिक सहयोग प्राप्त किया है। कोई भी सेठ साहूकार बिना मुनीम, गुमास्ते कारचरदार, कारीगर, मजदूर, एजेन्ट आदि के सहयोग के बिना समृद्धिशाली नहीं हो सकता। चोर, उचक्के, ठग, डाकू, लुटेरे, जुआरी, आदि को जो सफलताएं मिलती हैं। उसमें उनके दल की संघशक्ति ही प्रधान कार्य करती है। गुप्त षड्यंत्रों के द्वारा रोमाँचकारी काण्ड होने की घटनाएं सामने आती हैं। उनके साहसिक कार्यों को देखकर सन्न रह जाना पड़ता है। इन विचित्र कारगुजारियोँ के अन्दर षड्यंत्रकारियों का संगठन ही होता है। इस संगठन के कारण वे अलभ्य साधनों को पर्याप्त मात्रा में जुटा लेते हैं। कुछ समय पूर्व के भारतीय क्रान्तिकारियों के साहसिक षड्यंत्र और इन दिनों संप्रदायवादियों द्वारा आयोजित सीधी कार्यवाही के काण्ड यह बताते हैं कि चंद मनुष्यों का घनिष्ठ सहयोग कैसे कैसे परिणाम उत्पन्न कर सकता है।

बुरे लोगों द्वारा, बुरे कार्य के लिए, आपसी घनिष्ठ संघ बनाकर अवाँछनीय साहसिक कार्य होते हुए हम अपने चारों ओर नित्य ही देखा करते हैं, उन उदाहरणों की कमी नहीं। पर साथ ही यह भी तथ्य सामने है कि श्रेष्ठ लोगों ने श्रेष्ठ कार्यों से बड़ी बड़ी महान् सफलताएं आपसी संगठन के कारण प्राप्त की हैं। बिजली, अग्नि, गैस, भाप की तरह जनशक्ति भी अनेक गुनी बढ़ जाती है। व्यक्तिवाद के स्थान पर समूहवाद की प्रतिष्ठापना का महत्व अब समस्त संसार पहचानता जा रहा है। प्रथक प्रथक रूप से छोटे छोटे प्रयत्न करने में शक्ति का अपव्यय अधिक और काम कम होता है। परंतु सामूहिक सहयोग से ऐसी अनेकों चेतनाओं और सुविधाओं की उत्पत्ति होती है जिसके द्वारा बड़े बड़े कठिन कार्य सरल हो जाते हैं। सम्मिलित खेत, सम्मिलित रसोई, सम्मिलित व्यापार, सम्मिलित संस्था आदि अनेकों दिशाओं में सम्मिलन का क्षेत्र विस्तीर्ण हो रहा है। इस प्रवृत्ति की वृद्धि के साथ साथ मानव प्राणी की सुख शान्ति एवं सफलताओं में भी आश्चर्यजनक रीति से अभिवृद्धि होगी।


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धीमी धीमी वर्षा बहुत देर तक होती है। किन्तु एकदम आने वाला तूफान थोड़ी देर रहता है।

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मानवता का क्रन्दन

(श्री महावीर प्रसाद विद्यार्थी, ‘साहित्यरत्न’, टेढ़ा उन्नाव)


मानवता का क्रन्दन

घोर हाहाकार मिट जाएगा धरातल का, पारावार दुख का अपार पट जाएगा?

हास बिखराएगा दिनेश का विकास मंजु, दामिनी का कुटिल विलास हट जाएगा।

गूँजेगी मधुर स्वर लहरी स्वमण्डल में, घन की घटा का कटु रोर मिट जाएगा।

छाएगा प्रभाव का प्रकाश मेदिनी में कब, तम-तोम-जाल यामिनी का कट जाएगा?

जाएगी अतल को जगत, की अशान्ति कब, भूतल पै शान्ति की पताका फहराएगी?

हिंसा वसुयाम रक्त-धारा है बहानी जहाँ, भ्रातृ-भाव-शीतल-समीर लहराएगी?

ग्राम, पुर, सरिता, विपिन, शैल, सिन्धु पर,नव्य भव्य युग की प्रभा अनूप छाएगी?

कब एक डोर में बँधेगी ये सकल सृष्टि, हर्ष की हिलोर चारों ओर सरसाएगी

भाई का बनेगा रक्त-शोषक न भाई कब, छल-छन्द की न भावना ये रह जायगी?

कब आँख खोलेगी मदान्ध ये मनुष्य-जाति, छोड़ेगी कुमार्ग,सत्य के सुगीत गाएगी?

अपने विनाश हेतु ज्ञान के विधान कर, रक्त ही से प्यास कब तक ये बुझाएगी?

कालिमा सकल मिट जाएगी हृदै की कब, दिव्य ज्ञान-ज्योति सुख-शान्ति सरसाएगी

घोर अविवेक की निशा में हो रहा है भ्रान्त, फूल क्या मिलेंगे तुझे शूल जब बोएगा?

भाव क्रूर आसुरी हृदै में भरे मानव! ये, कब तक नर-मुण्ड-माल तू पिरोएगा?

कब तक सोता तू रहेगा मोह-शय्या पर, पाएगा विषय फल, तब मूढ़ रोएगा।

सूखा जा रहा है अनजान रस जीवन का, चेत कब तक ये अमूल्य क्षण खोएगा?

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*समाप्त*