सर्व सिद्धि प्रदायिनी - गायत्री।

नित्ये, नैमित्तिके, काम्ये, त्रितये तु परायणः। गायत्र्यास्तु परं नास्ति इहलोके परत्र च।।

नित्य, नैमित्तिक एवं अभीष्ट-इन तीनों ही की प्राप्ति कराने में गायत्री से महान इस लोक और परलोक में अन्य कोई नहीं है।

अष्टाँग योगसिद्धवा च नरः प्राप्नोति यत्फलम्।

तत्फलं सिद्धि माप्नोति गायत्र्यातु जपेन वै।।

पुरुष जिस फल एवं सिद्धि को अष्टाँग योग सिद्धि से भी प्राप्त नहीं कर पाता वही फल गायत्री मन्त्र के जाप से प्राप्त होता है।

सर्व वेदोद्धतः सारः मन्त्रोऽयं समुदाहृतः। ब्रह्मादेव्यादि गायत्री परमात्मा समीरितः।।

यह गायत्री मंत्र समस्त वेदों का सार कहा गया है। गायत्री ही ब्रह्मा आदि देवता है गायत्री ही परमात्मा कही गई है।

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पुत्र एवं स्वर्ण घट की प्राप्ति

(श्री जोखूराम मिश्र विशारद, जमुनीपुर)

(1) प्रयाग जिले के छतौना ग्राम निवासी पं0 देवनारायण जी देव भाषा के असाधारण विद्वान और गायत्री के अनन्य उपासक हैं। तीस वर्ष की आयु तक अध्ययन करने के उपरान्त उनने गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया। पत्नी बड़ी सुशील एवं पति परायण मिली। परन्तु विवाद के बहुत काल बीत जाने पर भी जब कोई सन्तान न हुई तो अपने को बंध्यत्व से कलंकित समझ कर दुखी रहने लगी। पं0 जी ने उनकी इच्छा को जानकर सवालाख जप का अनुष्ठान किया। कुछ ही दिन में उनके एक प्रतिभावान मेधावी पुत्र हुआ जो आज कल देव भाषा की सर्वोच्च उपाधि प्राप्त करने की तैयारी कर रहा है।

(2) प्रयाग के पास जमुनीपुर ग्राम में एक विद्वान ब्राह्मण रहते थे। उनका नाम पं0 राम निधि शास्त्री था। शास्त्री जी विद्या के भण्डार होते हुये भी अत्यन्त निर्धन थे, पर वे गायत्री की साधना में भक्ति पूर्वक निरत रहते थे। तपश्चर्या में उनका शरीर अस्थि पंजर मात्र रह गया था।

एक बार शास्त्री जी ने गायत्री के नवाह्निकडडडडडडडडड पुरश्चरण का संकल्प किया। उन्होंने नौ दिन तक केवल जल पीकर ही साधना की, जब पुरश्चरण समाप्त हुआ तो अर्ध रात्रि को भगवती गायत्री ने बड़े दिव्य स्वरूप में उन्हें दर्शन दिये और वर दिया कि तुम्हारे सभी मनोरथ पूर्ण होंगे। तुम्हारे इस घर में ही अमुक स्थान पर एक स्वर्णघट रखा हुआ है उसे निकाल कर अपनी दरिद्रता दूर करो। तुम्हें शीघ्र ही पुत्र भी प्राप्त होगा। यह कह कर गायत्री देवी अंतर्ध्यान हो गईं । पं0 जी ने स्वर्ण से भरा हुआ घड़ा निकाला और वे निर्धन से धन पति हो गये। उनके घर एक गौर वर्ण पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम ‘गायत्री प्रसाद’ रखा गया।

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गायत्री द्वारा प्राण रक्षा

(पं. प्रभुदयाल शर्मा सं. सनाढय जीवन इटावा)

मेरे बड़े पुत्र की स्त्री को कई साल पूर्व कोई दुष्ट प्रेतात्मा लग गई थी। उससे उसे बड़ा कष्ट होता था। बार बार बेहोश हो जाती थी। उसे कभी प्रतीत होता था कि कोई उसका हाथ तोड़े डालता है, कभी मस्तक पर हथौड़े की चोटें मारता है। कभी हाथ पैरों को जलाये देता है। इसी प्रकार के कष्ट मस्तक के दर्द आदि की पीड़ा उसके बालकों को भी होती थी। हम इससे बहुत दुखी थे। झाड़ फूँक दवा दारु के बहुत प्रयत्न किये पर कोई लाभ न हुआ। अन्त में गायत्री का आश्रय लिया गया। गायत्री से अभिमंत्रित जल उन्हें पिलाया जाता उसी से उनका मार्जन किया जाता, इस उपचार से उस दुखदायी व्यथा से छुटकारा मिला।

(2)

मेरे ताऊ जी जो एक प्रसिद्ध वैद्य थे। बार दानापुर (पटना) गये हुए थे। स्नान करने के अनन्तर वे गायत्री का जप नित्य करते थे। वहाँ वे जप कर ही रहे थे कि उनके कान में एकदम शब्द हुआ कि जल्दी निकल! मकान गिरता है। एक बार सुनकर भी वे पूजा में व्यस्त रहे, किन्तु फिर वही शब्द और भी जोर से हुआ। वे पास की खिड़की से कूद कर भागे, मुश्किल से कुछ कदम ही गये होंगे की मकान गिर पड़ा। वे बाल-बाल बच गये।

(3) एक बार हमारे चचेरे भाई का पुत्र बहुत बीमार था। बीमारी काबू से बाहर थी। सब प्रकार जब निराशा दीखने लगी तो बालक की माता दादी आदि घर के लोग उसकी मृत्यु की आशंका से बुरी तरह रोने लगे। इतने में ताऊजी आ गये। उनने मृत्यु के मुख में अटके हुए बालक को गोदी में ले लिया और उसे लेकर एक घण्टे तक आँगन में चक्कर लगाते रहे तथा गायत्री का जप करते रहे। बालक पूर्ण स्वस्थ हो गया और आज वह 51 वर्ष का है।

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शास्त्रों और ऋषियों द्वारा गायत्री की महिमा।

ऋषयो वेद शास्त्राणि सर्वे चैव महर्षयः। श्रद्धया हृदि गायत्रीं धारयन्ति स्तुवन्ति च।।

(ऋषयः) ऋषि लोग (वेद शास्त्राणि ) वेद और शास्त्र (च) और (सर्वे महर्षयः) समस्त महर्षि (गायत्री) गायत्री को (श्रद्धया) श्रद्धा से (हृदि धारयनित) हृदय में धारण करते हैं। (च) और (स्तुवन्ति) उसकी स्तुति करते हैं।

सत्य इतना स्पष्ट होता है कि उसके सम्बन्ध में प्रायः सभी विचारशील व्यक्तियों की सम्मति एक होती है। दो और दो मिल कर कितने होते हैं, इस प्रश्न को कितने ही व्यक्तियों से पूछा जाय, सबका एक ही उत्तर होगा-चार। इस समय दिन है या रात? इस प्रश्न का उत्तर सभी विचारवान व्यक्ति एक ही देंगे, सूर्य निकल रहा होगा तो कहेंगे कि इस समय दिन है, सूर्य अस्त हो गया होगा तो कहेंगे कि अब रात है। यह प्रश्न चाहे जितने व्यक्तियों से पूछा जाय यदि उनका मस्तिष्क स्वस्थ और परिपक्व दशा में है तो एक ही प्रकार के उत्तर मिलेंगे।

(3) सत्यता से भरे हुए तथ्य इतने स्पष्ट होते हैं कि उनके संबंध में सभी को एक होना पड़ता है। अपनी कमजोरी के कारण कोई उन्हें कार्य रूप में परिणत करने में समर्थ भले ही न हो पर जहाँ तक मान्यता का प्रश्न है वहाँ तक प्रायः सभी विचारवान व्यक्ति सहमत हो जाते हैं। झूठा मनुष्य भी प्रत्यक्ष रूप से सत्य की महत्ता से इनकार नहीं कर सकता, ईमानदारी की श्रेष्ठता का खंडन करने का साहस चोर में भी नहीं होता गुपचुप रूप से कोई चाहे कुछ करे प्रत्यक्ष रूप से सचाई का विरोध नहीं कर सकता। कारण वह है कि सत्य की श्रेष्ठता सर्वोपरि है। उसमें अगर मगर भले ही जोड़ी जाय किन्तु स्पष्ट रूप से उसका विरोध नहीं हो सकता। जब चोरों की यह बात है तो श्रेष्ठ व्यक्तियों का तो कहना ही क्या? उन्हें तो सत्यता के तत्वों पर सहमत होना ही चाहिए। फिर चाहे ऋषि मुनि और सन्त महात्माओं के बारे में तो यह सूर्य की तरह स्पष्ट है कि वे लोग जिस बात को सत्य, उचित, आवश्यक एवं उपयोगी देखेंगे, उसके सम्बन्ध में एक मत होंगे ही।

गायत्री मंत्र की महत्ता एक ऐसी ही स्पष्ट सचाई है जिसके आगे सभी ऋषि मुनियों ने, सभी धर्म ग्रन्थों ने समान रूप से मस्तक झुकाया है, एक स्वर से उसका गुणगान किया है, एक सम्मति से उसका महात्म्य वर्णन किया है। गायत्री की महिमा का वर्णन इतने महा पुरुषों ने, इतने आप्त ग्रन्थों ने इतने विस्तार एवं स्पष्ट रूप से किया है कि उसके संबंध में किसी प्रकार का सन्देह रहने की गुंजाइश नहीं बचती। आप्त पुरुषों की प्रणाली यह रही है कि वे पहले किसी बात को परीक्षा की कसौटी पर कसते हैं, उसका मंथन करते हैं, सूक्ष्म दृष्टि से उसके अदृष्ट एवं दूरवर्ती भावी परिणामों पर विचार करते हैं। अपने अनुभव में लाते हैं,तब किसी बात का प्रकाश करते हैं। गायत्री को इन सब कसौटियों पर कसा गया है और जब देखा गया कि यह महिमामय तत्व एक उच्चकोटि का रत्न भण्डार है तब उसका सर्व साधारण के लिए प्रकाश किया गया है।

उसका साधारण प्रकाश नहीं किया गया है वरन् इतना महत्वपूर्ण समझा गया है कि प्रतिदिन नित्य, बिना नागा केवल एक बार नहीं अनेक बार, उसको अपनाने का आग्रहपूर्ण आदेश किया गया है। हम देखते हैं कि संध्यावंदन को धर्म शास्त्रों ने इतना ही आवश्यक माना है जितना कि भोजन निद्रा, स्नान आदि नित्यकर्मों को माना गया है। संध्या करना आवश्यक है, लाभप्रद है, अनिवार्य है इन तथ्यों को मनुष्य के मस्तिष्क पर जमाने के लिए अनेकों विधि वचन धर्म ग्रन्थों में मिलते हैं। ऐसे असंख्यों श्लोकों, मंत्रों, सूत्रों एवं आदेशों से हमारे आर्ष ग्रन्थ भरे पड़े हैं, उनमें अनेक प्रकार से यह कहा गया है कि सन्ध्या करना आवश्यक है। संध्या को प्रातः, मध्याह्न, सायंकाल तीन बार करने का विधान है, पर प्रातः सायं दो बार या कम से कम एक बार प्रातःकाल करना तो अनिवार्य जैसा बताया है। सन्ध्या की अनेकों पद्धतियाँ प्रचलित हैं, ऋग्वेदीय, यजुर्वेदीय, सामवेदीय संध्याएं तथा आर्यसमाजियों की संध्याएं पृथक हैं। इन सभी सन्ध्याओं में अन्य प्रकार के अन्तर भले ही हों पर गायत्री मंत्र सब में अवश्य होगा। बिना गायत्री के संध्या हो ही नहीं सकती। इस अनिवार्यता में एक बात स्पष्ट है कि गायत्री को हर हालत में प्रतिदिन कई कई वेलाओं में, अनेक वार जपना, अनेक वार हृदयंगम करना आवश्यक है। इस विधान पर विचार करने से सहज ही पता चल जाता है कि गायत्री के अंतर्गत कोई ऐसे तत्व हैं जिनकी हमारे आन्तरिक शरीर को उतनी ही आवश्यकता है जितनी भोजन की। भोजन भी तीन बार तक किया जाता है, गायत्री की आवश्यकता भी तीन बार है। कोई कोई निर्बल, वृद्ध या रोगी उदर की कमजोरी के कारण एक बार भोजन करना ही काफी समझते हैं इसी प्रकार अध्यात्मिक निर्बलता वाले व्यक्ति रुचि मंदता के कारण एक वेला में ही गायत्री जपते हैं। जिस प्रकार भोजन को अनेक ग्रासों में बार बार खाया जाता है उसी प्रकार गायत्री को भी अमुक संख्या में बार बार दुहराया जाता है।

गायत्री भोजन जैसी उपयोगी इसलिए है कि उसमें आत्मिक बल का केन्द्र है। बुद्धि की शुद्धि, उदर शुद्धि से भी अधिक आवश्यकता है। पेट में मल भरे हों विषैले पदार्थ जमा हों तो शरीर का स्वास्थ्य दिन दिन क्षीण होता जायगा भले ही कीमती भोजनों को खाया जाता है, इसी प्रकार यदि बुद्धि अशुद्ध है विकृत है, नीच तत्वों में लिप्त है तो उस बुद्धि से आत्म कल्याण नहीं हो सकता, सुख शान्ति का दर्शन नहीं हो सकता, चाहे कोई कितना ही बड़ा, कितना ही मूल्यवान कर्मकाण्ड क्यों न करें। उदर की शुद्धि होने पर किया हुआ भोजन शुद्ध रक्त बनाता है और बल वीर्य की वृद्धि करता है, इसी प्रकार शुद्ध बुद्धि से किये गये कार्य एवं विचार ही आत्मबल को बढ़ाने एवं आत्म कल्याण की ओर ले जाने वाले होते हैं। यदि किसी झरने के उद्गम में विष की खान हो तो उसका जल देखने में चाहे कितना ही शीतल, स्वच्छ स्वादिष्ट क्यों न हो पर उसको पीने से अनिष्टकर परिणाम ही उत्पन्न होगा, अशुद्धि बुद्धि का भी यही हाल है उससे चाहे कैसे ही चमत्कारी कार्य क्यों न कर दिखाये जायं, चाहे कितना ही धन, यश, वैभव इकट्ठा कर लिया जाय पर परिणाम बुरा ही होगा। इसलिए मूल केन्द्र को शुद्ध करना, अन्य सब कार्यों की अपेक्षा अधिक उपयोगी देखकर उसकी अनिवार्यता का प्रतिपादन किया गया है और गायत्री साधना को भोजन करने जैसा दैनिक कृत्य नियुक्त किया गया है।

सर्व साधारण के लिए यह आदेश किया गया है कि गायत्री को केवल एक विशेष साधना समझ कर उसकी उपेक्षा न करो वरन् एक अनिवार्य नित्यकर्म समझ कर प्रतिदिन कई कई बार उसमें गर्भित तथ्य को अपने अन्तःकरण में धारण करो। बुद्धि की शुद्धि करना, उसे सात्विक बनाना, आत्म निर्माण का सर्व प्रथम कार्य है, गायत्री इसकी शिक्षा देती है और सफलता प्रदान करने का मार्ग बताती है। यह इतना बड़ा लाभ है जिसकी तुलना और किसी लाभ से नहीं हो सकती। बुद्धि की शुद्धता प्राप्त होने पर आत्मिक आनंदों का समुद्र उमड़ पड़ता है और साथ ही भौतिक जगत् में जो उन्नति होती है वह स्थायी, एवं प्रतिष्ठा युक्त होती है, उस समृद्धि को भोगने से मनुष्य को भोग का सच्चा आनन्द मिलता है। अशुद्ध बुद्धि से उपार्जित किये हुए भोग ऐसे हैं जैसे शरीर में बादी भर जाने से उसका फूल कर फफ्फस हो जाना, ऐसे फूल कर फफ्फस हुए मनुष्य बाहर से चाहे कैसे ही मोटे दिखाई पड़े पर भीतर से उनका वह मोटापा उनके लिए भार स्वरूप, कष्टदायी होता है। श्लीपद रोग में पैर मोटे हो जाते हैं, शोथ में शरीर सूज जाता है, जलोदर में पेट फूला रहता है, अण्डवृद्धि में अण्डकोष बढ़ जाते हैं, यह सब बढ़ोतरी बाहर किसी नासमझ को सम्पत्ति भले ही दिखती हो पर भुक्तभोगी जानता है कि यह बढ़ोतरी मेरे लिए कितनी विपत्ति है। यही बात अशुद्ध बुद्धि से एकत्रित हुई सम्पत्ति के बारे में है। उसे पाकर कोई आत्मा सुखी नहीं हो सकती, उससे तो विपत्ति, अशान्ति, एवं उद्विग्नता ही बढ़ती है। सुख तो उन भोगों से ही मिलेगा जो सद्बुद्धि से उपार्जित किये गये होंगे। गायत्री हमारी बुद्धि को शुद्ध करती है, इसलिए वह आत्मिक आनन्दों के अतिरिक्त सच्चे भौतिक सुखों को को भी देती है। इसीलिए उसे “भुक्ति मुक्ति प्रदायिनी” कहा गया है। उससे भोग और योग दोनों की प्राप्ति होती है।

हमारे पूजनीय ऋषियों को, आर्ष ग्रन्थों के प्रणेताओं को, आत्मतत्व के सूक्ष्मदर्शी आचार्यों को जो बात लोक हित के लिए अधिक उत्तम प्रतीत हुई है। गायत्री को उन्होंने ऐसा ही पाया-इसलिए उन सबने एक मत से, एक स्वर से गायत्री का महत्व बताया है। साधना क्षेत्र में और किसी साधना का इतना सर्व सम्मत समर्थन नहीं हुआ जितना कि गायत्री का हुआ है अपने अपने ढंग से सभी ने उसका समर्थन किया है। आगे कुछ ऐसे ही अभिवचन दिये जाते हैं जिससे पाठक गायत्री के सम्बन्ध में आर्ष ग्रन्थों और आप्त पुरुषों का अभिमत जान सकें।

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गायत्री की महिमा

गायत्री की महिमा को वेद, शास्त्र पुराण सभी वर्णन करते हैं। अथर्ववेद में गायत्री की स्तुति की गई है जिसमें उसे आयु, प्राण, शक्ति, पशु, कीर्ति, धन, और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली कहा है।

स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्ता पावमानी द्विजानाम्। आयुः प्राणं प्रजा पशुँ कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्।

अथर्ववेद में स्वयं वेद भगवान ने कहा है।

मेरे द्वारा स्तुति की गई, द्विजों को पवित्र करने वाली, वेदमाता गायत्री आयुः, प्राण, शक्ति, पशु, कीर्ति, धन, ब्रह्मतेज उन्हें प्रदान करे।

यथामधु च पुष्पेभ्यो घृतं दुग्धाद्रसात्पयः।

एवं हि सर्ववेदानाँ गायत्रो सार मुच्यते।।

-व्यास

जिस प्रकार पुष्पों का सारभूत मधु, दूध का घृत, रसों का सार भूत दूध है, उसी प्रकार गायत्री मन्त्र समस्त वेदों का सार है।

तदित्युचः समो नास्ति मन्त्रो वेद चतुष्टये।

सर्वे वेदाश्च याज्ञाश्च दानानि च तपाँसि च

समानि कलया प्राहुभुनयो नतदित्यृचः।।

-विश्वामित्रः।

गायत्री मन्त्र के समान मन्त्र चारों वेदों में नहीं है। सम्पूर्ण वेद, यज्ञ, दान, तप, गायत्री मन्त्र की एक कला के समान भी नहीं हैं ऐसा मुनि लोग कहते हैं।

गायत्री छन्दसाँ मातेति।।2।।

-महानारायणोपनिषद्। 15।1

गायत्री वेदों की माता अर्थात् आदि कारण है।

त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादम्पादमदूदुहत्।

तदित्यृचोस्याः सावित्र्याः परमेष्ठी प्रजापति।।

मनु0 अ॰ 2।77

परमेष्ठी प्रजापति ब्रह्माजी ने तीन ऋचा वाली गायत्री के तीनों चरणों को तीनों वेदों से सारभूत निकाला।

गाय«यास्तु परन्नास्ति शोधनं पापकर्मणाम्।

महाव्याहृति संयुक्ता प्रणवेन च संजपेत्।।

सम्वर्त स्मृ0 श्लो0 228

पाप को नाश करने में समर्थ गायत्री के समान अन्य कोई मन्त्र नहीं है, अतः प्रणव तथा महा व्याहृतियों सहित गायत्री मन्त्र का जाप करे।

नान्नतोय समं दानं न चाहिंसा परं तपः।

न सावित्री समं जाप्यं न व्याहृति समं हुतम्।।

सूत संद्धिता यज्ञ वैभवखण्ड अ॰ 6।30।

अन्न और जल के समान कोई भी दान, अहिंसा के समान तप, गायत्री के समान जप, व्याहृति के समान अग्निहोत्र, कोई भी नहीं है।

हस्तत्राणप्रदा देवी पतताँ नरकार्णवे।

तस्मत्तामभ्यसेन्नित्यं ब्राह्मणो हृदये शुचिः।।

गायत्री देवी नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़ कर बचाने वाली है अतः नित्य ही द्विज पवित्र हृदय से गायत्री का अभ्यास करे अर्थात् जपे।

गायत्री चैव वेदाश्च तुलया समतोलयन्।

वेदा एकत्र साँगास्तु गायत्री चैकतः स्थिता।।

योगी याज्ञवलक्य

गायत्री और समस्त वेदों को तराजू से तोला गया षट्अंगों सहित वेद एक ओर रखे गये और गायत्री को एक ओर रखा गया।

सारभूतास्तु वेदानाँ गुह्योपनिषदो मताः।

ताभ्यः सारस्तु गायत्री तिस्त्रो व्याहृतयस्तथा।।

योगी या ज्ञ0

वेदों का सार उपनिषद् है और उपनिषदों का सार गायत्री और तीनों महा व्याहृतियाँ है।

गायत्री वेदजननी गायत्री पापनाशिनी।

गायत्र्यास्तु परन्नास्ति दिविचेह च पावनम्।।

गायत्री वेदों की जननी है, गायत्री पापों को नाश करने वाली है। गायत्री से अन्य कोई पवित्र करने वाला मन्त्र स्वर्ग और पृथ्वी पर नहीं है।

तद्यथाग्निर्देवानाँ, ब्राह्मणे मनुष्याणं,

वसन्त ऋतूनामेवं गायत्री छन्दसाम्।।

(गोपथ ब्राह्मण)

जिस प्रकार देवताओं में अग्नि, मनुष्यों में ब्राह्मण, ऋतुओं में बसन्त ऋतु श्रेष्ठ है, उसी प्रकार समस्त छन्दों में गायत्री छन्द श्रेष्ठ है।

अष्टादशसु विद्यासु मीमाँसा अति गरीयसी

ततोऽपि तर्क शास्त्राणि पुराणं तेभ्य एव च।

ततोऽपि धर्मशास्त्राणि तेभ्यो गुर्वीश्रुति द्विज।

ततोऽप्युपनिपच्छ्रेष्ठा गायत्री च ततोऽधिका।

दुर्लभा सर्वमन्त्रेषु गायत्री प्रणवान्विता।

वृह सं0 भा 0

अठारह विद्याओं में मीमाँसा अत्यन्त श्रेष्ठ है। मीमाँसा से तर्कशास्त्र श्रेष्ठ है और तर्कशास्त्र से पुराण श्रेष्ठ है।

पुराणों से भी धर्मशास्त्र श्रेष्ठ हैं, हे द्विज? धर्मशास्त्रों से वेद श्रेष्ठ हैं और वेदों से उपनिषद् श्रेष्ठ हैं और उपनिषदों से गायत्री मन्त्र अत्यधिक श्रेष्ठ है।

प्रणव युक्त यह गायत्री मन्त्र समस्त वेदों में दुर्लभ है।

नास्ति गंगा समं तीर्थं न देवाः केशवात्परः।

गायत्र्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति।।

वृ0 यो0 याज्ञ0 अ॰ 10।2।79

गंगा जी के समान कोई तीर्थ नहीं है, केशव से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं है। गायत्री मन्त्र के जप से श्रेष्ठ कोई जप न आज तक हुआ और न होगा।

सर्वेषाँ जप सूकानामृचाश्च यजुषाँ तथा।

साम्नाँ चैकाक्षरादीनाँ गायत्री परमो जपः।।

वृ0 पाराशर॰ स्मृति अ॰ 4।4।

समस्त जप सूक्तों में, ऋग् यजु सामवेदों में तथा एकाक्षरादि मन्त्रों में गायत्री मन्त्र का जप परम श्रेष्ठ है।

एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामाः परन्तपाः।।

सावित्र्यास्तु परन्नास्ति पावनं परमं स्मृतम्।।

मनु0 स्मृति अ॰ 2। 83।

एकाक्षर अर्थात् ‘ओऽम्’ पर ब्रह्म है। प्राणायाम परम तप है और गायत्री मन्त्र से बढ़कर पवित्र करने वाला कोई भी मन्त्र नहीं है।

गाय«या परमं नास्ति दिवि चेह च पावनम्।

हस्तत्राणप्रदादेवी पतताँ नरकार्णवे।।

शंख स्मृति अ॰ 12। 25

नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़कर कर बचाने वाली गायत्री के समान पवित्र करने वाली वस्तु या मन्त्र पृथ्वी पर तथा स्वर्ग में भी नहीं है।

गायत्री चैव वेदाश्च ब्रह्मणा तोलिता पुरा

वेदेभ्यश्च चतुस्त्रेभ्यो गाय«यति गरीयसी।।

वृ0 पाराशर स्मृति0 5।16

प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने गायत्री को वेदों से तोला। परन्तु चारों वेदों से भी गायत्री का पल्ला भारी रहा।

सोमादित्यान्वयः सर्वे राघवाः कुरवस्तथा।

पठन्ति शुचयो नित्यं सावित्रीं परमाँ गतिम्।

महाभारत अनु0 पर्व0 अ॰ 15।78

हे युधिष्ठिर! सम्पूर्ण चन्द्रवंशी, सूर्यवंशी, रघुवंशी तथा कुरुवंशी नित्य ही पवित्र होकर परमगति दायक गायत्री मन्त्र का जप करते हैं।

बहुना किमिहोक्तेन यथावत् साधु साधिता। द्विजन्मानामियं विद्या सिद्धा काभदुधास्मृता।।

यहाँ पर अधिक कहने से क्या लाभ? अच्छी प्रकार सिद्ध की गई यह गायत्री विद्या द्विज जाति को कामधेनु कहा गया है।

सर्ववेदोद्धृतः सारो मंत्रोऽयं समुदाहृतः। ब्रह्मादेव्यादि गायत्री परमात्मा समीरितः।।

यह गायत्री मंत्र समस्त वेदों का सार कहा गया। गायत्री ही ब्रह्मा आदि देवता है। गायत्री ही परमात्मा कही गई है।

या नित्या ब्रह्मगायत्री सैवगंगा न संशयः सर्व तीर्थमयी गंगा तेन गंगा प्रकीर्तिता।

गायत्री तंत्र

गंगा सर्व तीर्थ मय होने से गंगा कहलाती है। वह गंगा ब्रह्म गायत्री का ही रूप है।

सर्व शास्त्र मयीगीता गायत्री सैव निश्चिता ।

गयातीर्थं च गोलोकं गायत्री रूपमद्भुतम्।।

गायत्री तंत्र

गीता में सब शास्त्र भरे हुए हैं। वह गीता निश्चय ही गायत्री रूप है। गया तीर्थ और गोलोक वह भी गायत्री के ही रूप हैं।

अशुचिर्वा शुचिर्वापिगच्छन् तिष्ठन् यथा तथा।

गायत्रीः प्रजपेद्धीमान् जपात् पापान्निवर्त्तते।।

गायत्री तंत्र

अपवित्र हो अथवा पवित्र हो, चलता हो अथवा बैठा हो अथवा जिस भी स्थिति में हो, बुद्धिमान मनुष्य गायत्री का जप करता रहे। इस जप के द्वारा पापों से छुटकारा होता है।

मननात् पापतस्त्राति मननात् स्वर्ग मश्नुचे।

मननात् मोक्ष माप्नोति चतुर्वर्ग मयोभवेत्।।

गायत्री तंत्र

गायत्री का मनन करने से पाप छूटते हैं, स्वर्ग प्राप्त होता है और मुक्ति मिलती है। तथा चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) सिद्ध होते हैं।

गायत्री त परित्यज्य अन्य मंत्रमपासते। सिद्धान्नं च परित्यज्य भिक्षामटति दुर्मति।।

जो गायत्री को छोड़ कर दूसरे मंत्रों की उपासना करता है वह दुर्बुद्धि पुरुष पकाये हुए अन्न को छोड़ कर भिक्षा के लिए घूमने वाले पुरुष के समान है।। 43।।

नित्यनैमित्तिके काम्ये तृतीये ताप वर्धने। गायत्र्यास्तु परं नास्ति इहलोकेपरत्र च।।2।।

नित्य, नैमित्तिक, काम्य का सफलता तथा तप की वृद्धि के लिए इस लोक तथा परलोक में गायत्री से बढ़कर कोई नहीं है।

सावित्री जाप नित्तः र्स्वगमाप्रोति मानवः। तस्मात् सर्व प्रयत्नेन स्नानः प्रयतमानसः। गायत्री तु जपेद्भक्त्या सर्वपाप प्रणाशिनीम।।

शंख स्मृति

गायत्री मन्त्र जानने वाला मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त करता है। इस कारण समस्त प्रयत्नों से स्नान कर स्थिर चित्त हो समस्त पाप नाश करने वाली गायत्री देवी का जाप करे।

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गायत्री जप के लाभ

गायत्री का जप करने से कितना महत्वपूर्ण लाभ होता है, इसका कुछ आभास निम्न लिखित थोड़े से प्रमाणों से जाना जा सकता है। ब्राह्मण के लिए तो इसे विशेष रूप से आवश्यक कहा है क्योंकि ब्राह्मणत्व का सम्पूर्ण आधार सद्बुद्धि पर निर्भर है और वह सद्बुद्धि गायत्री में बताये हुए मार्ग पर चलने से मिलती है।

सर्वेषाँ वेदानाँ गुह्योपनिषत्सार भूताँ ततो गायत्री जपेत्।

(छाँदोग्य परिशिष्टम्)

गायत्री समस्त वेदों का और गुह्य उपनिषदों का सार है। इसलिए गायत्री मन्त्र का नित्य जप करे।

सर्ववेद सारभूता गायत्र्यास्तु समर्चना।

ब्रह्मादयोऽपि संध्यायाँ ताँ ध्यायन्ति जपन्ति च।।

दे0 भा0 स्कं0 16 अ॰ 16। 15

गायत्री मन्त्र का आराधन समस्त वेदों का सारभूत है। ब्रह्मादि देवता भी सन्ध्या काल में गायत्री का ध्यान करते हैं और जप करते हैं।

गायत्री मात्रनिष्णातो द्विजो मोक्षमवाप्नुयात।।

वे0 भा0 स्कं 012। अ॰ 890।

गायत्री मात्र की उपासन करने वाला भी ब्राह्मण मोक्ष को प्राप्त होता है।

ऐहिकामुष्मिकं सर्वं गायत्री जपतो मवेत्।

अग्निपुराण-

गायत्री जपने वाले को साँसारिक और पारलौकिक समस्त सुख प्राप्त हो जाते हैं।

योऽधीतेऽहन्यहन्येताँ त्रीणिवर्षाण्यतन्द्रितः। सब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः स्वमूर्तिमान्।।

मनुस्मृति 2।82।

जो मनुष्य तीन वर्ष तक प्रति दिन गायत्री जपता है वह अवश्य ब्रह्म को प्राप्त करता है और वायु के समान स्वेच्छाचारी होता है।

कुर्यादन्यन्न वा कुर्यात् इति प्राह मनुः स्वयं।

अक्षय मोक्षमवाप्नोति, गायत्री मात्र जापनात्।।

शौनकः

इस प्रकार मनु जी ने स्वयं कहा है कि अन्य देवताओं की उपासना करे या न करे, केवल गायत्री के जप से द्विज अक्षय मोक्ष को प्राप्त होता है।

बहुना किमिहोक्तेन यथावत साधु साधिता।

द्विजन्मानामियं विद्या सिद्धिः कामदुघास्मृता।।

(शारदायाँ)

यहाँ पर अधिक कहने से क्या? अच्छी प्रकार उपासना की गई गायत्री द्विजों के मनोरथ पूर्ण करने वाली कही गई है।

एतया ज्ञातया सर्व वाङ्मयं विदितं भवेत्।

उपासितं भवेतेन विश्वं भुवन सप्तकम्।।

योगी याज्ञ0

गायत्री के जान लेने से समस्त विद्याओं का वेत्ता हो जाता है और उसने गायत्री की ही उपासना नहीं की अपितु सात लोकों की भी उपासना कर ली।

ओंकार पूर्विकास्तिस्रो गायत्रीं यश्च विन्दति।

चरितब्रह्मचर्यश्च स वै श्रोत्रिय उच्यते।।।

यो0 याज्ञ0

जो ब्रह्मचर्यपूर्वक ओंकार, महा व्याहृतियों सहित गायत्री मन्त्र का जप करता है वह श्रोत्रिय है।

एतदक्षरमेता जपन् व्याहृति पूर्वकाम्।

सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेद पुण्येन मुच्यते।

मनुस्मृति अ॰ 2।78

जो ब्राह्मण दोनों सन्ध्याओं में प्रणव व्याहृति पूर्वक गायत्री मन्त्र का जप करता है। वह वेदों के पढ़ने के फल को प्राप्त करता है।

गायत्रीं जपते यस्तु द्वौ कालौ ब्राह्मणः सदा।

असत्प्रतिगृहीतापि सयाति परमाँ गतिम।।

अग्नि पुराण

जो ब्राह्मण सदा सायं काल और प्रातः काल गायत्री का जप करता है वह ब्राह्मण अयोग्य प्रतिगृह लेने पर भी परमगति को प्राप्त होता है।

सकृद्यादि जपेद्विद्वान गायत्रीं परमाक्षरीम्।

तत्क्षणत्संभवेत्सिद्धिर्ब्रह्म सायुज्यमाप्नुयात्

गायत्री पुरश्चरण-28

श्रेष्ठ अक्षरों वाली गायत्री को विद्वान यदि एक बार भी जपे तो तत्क्षण सिद्धि होती है और वह ब्रह्म की सायुज्यता को प्राप्त करता है।

जप्येनैव तु संसिद्धयेत् ब्राह्मणो नात्र संशयः।

कुर्यादन्यन्नवा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते।।

मनु।97

ब्राह्मण अन्य कुछ करे या न करे, परन्तु वह केवल गायत्री जप से ही सिद्धि पा सकता है।

कुर्यादन्यन्न वा कुर्यादनुष्ठानादिकं तथा।

गायत्री मात्र निष्ठस्तु कृतकृत्यो भवेद्विजः।।

गायत्री तन्त्र।8

अन्य अनुष्ठानादि करे या न करे, गायत्री मात्र की उपासना करने वाला द्विज कृतकृत्य हो जाता है।

सन्ध्यासु चार्घ्य दानं च गायत्री जपमेव च।

सहस्रत्रितयं कुर्वन्सुरैः पूज्यो भवेन्मुने।।

गायत्री तन्त्र श्लो0 9

हे मुने! सन्ध्याकाल में सूर्य को अर्घ्यदान और तीन हजार नित्य जपने मात्र से पुरुष देवताओं से भी पूजनीय हो जाता है।

यदक्षरैक संसिद्धेः र्स्पधते ब्राह्मणोत्तमः।

हरिशंकर कंजोत्थ सूर्य चन्द्र हुताशनैः।।

गायत्री पुर॰ 11

गायत्री के एक अक्षर की सिद्धि मात्र से हरिशंकर ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि देवता भी साधक से स्पर्धा करने लगते हैं।

दस साहस्रमभ्यस्ता गायत्री शोधिनी परा

लघु अत्रि संहिता

दस हजार जपी गई गायत्री परम शोधन करने वाली है।

सर्वोषाँचैव पापानाँ संकरे समुपस्थिते। दशसार्हासुकाम्यासे गायत्र्याः शोधनंपरम।।

समस्त पापों को तथा संकटों को दस हजार गायत्री का जप नाश करके परम शुद्ध करने वाला है।

गायत्री मेव यो ज्ञात्वा सम्यगश्चोच्यते पुनः।

इहामुत्र च युज्योऽसौ ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्।।

व्यासः

जो गायत्री को सम्यक् जानकर उच्चारण करता है वह इस लोक में और परलोक में ब्रह्म की सायुज्यता प्राप्त करता है।

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गायत्री से पाप और दुखों से निवृत्ति

गायत्री को अपनाने से पापों, दुखों और कषाय कल्मषों का नाश होता है। पूर्व संचित कितने ही कुसंस्कारों की जड़ उखड़ जाती है, जिसके कारण उनके द्वारा भविष्य में उत्पन्न होने वाले दुखों से भी छुटकारा मिल जाता है। कुसंस्कार स्वयं एक प्रकार के पाप हैं। चाहे उनके द्वारा प्रत्यक्ष पाप क्रिया कोई बड़ी मात्रा में न हो सके तो भी वे अपने जहरीले धुँऐ से मानस लोक को गंदा करते रहते हैं और उस गंदगी के फलस्वरूप बुरे फलों का प्राप्त होना स्वाभाविक है। वे मानस पापों की निरन्तर सृष्टि करते रहते हैं और उस सृष्टि का बुरा फल होता ही है। गायत्री साधना से यह कुसंस्कार उखड़ जाते हैं जिससे उन विषवृक्षों का वन नष्ट हो जाता है जो भविष्य में अपने लिए अथवा दूसरों के लिए घातक परिणामों को उपस्थित करता है।

अब केवल वे पाप रह जाते हैं जो पककर प्रारब्ध बन चुके हैं, और जिनको भुगते जाने का विधान प्रस्तुत हो गया है। यह प्रारब्ध बने हुए भोग भी गायत्री साधक के लिए बड़े सरल हो जाते हैं। जेल के अधिकारी अपनी जेल में आये हुए क्रूर प्रकृति के कैदियों की अपेक्षा उन कैदियों से नरम व्यवहार करते हैं जिनका सेवाभाव उत्तम, विनय युक्त एवं मधुर होता है। जब मनुष्य का स्वभाव बदल जाता है तो ईश्वर का दंड विधान भी अपेक्षाकृत नरम हो जाता है। इसके अतिरिक्त सद्बुद्धि वाले व्यक्ति की सहन शक्ति बढ़ जाती है, वह ईश्वरीय दंडों को हँसते हँसते झेल लेता है और “भगवान मुझे शीघ्र शुद्ध कर रहे हैं” ऐसा सोचकर उस बुरी स्थिति में भी आनंदित रहता है।

दुखों का सीधा संबंध मन की मान्यता से है। धन का मिलना या नष्ट होना बाह्य दृष्टि से कुछ महत्व नहीं रखता। कागजों का एक बंडल या धातु के टुकड़ों एक एक थैला अपने पास रहा या दूसरे के पास रहा इससे वैसा कोई विशेष बनता बिगड़ता नहीं पर, मन की मान्यता के अनुसार इनकी प्राप्ति में सुख और हानि में दुख होता है। विरक्त पुरुषों की स्थिति इससे उलटी होती है, ये प्राप्ति में दुख और त्याग में आनन्द मानते है। इससे प्रकट है कि सुख दुख मान्यता से संबंध रखने वाला एक काल्पनिक तथ्य है। सद्बुद्धि वाले व्यक्ति की धारणाएं बदल जाने से उसे वे आपत्तियाँ जिनमें पड़कर साधारण लोग भारी दुख अनुभव करते हैं उन्हें वैसा अनुभव नहीं होता। इस प्रकार सब दुःख वस्तुतः नष्ट हो जाते हैं। भले ही दूसरों की दृष्टि में वे अभावग्रस्त या दुखी प्रतीत हों।

गायत्री साधना से सब पापों की और सब दुखों की निवृत्ति के अनेक प्रमाण मिलते हैं जिनमें से कुछ नीचे दिये जाते हैं-

ब्रह्म हत्यादि पापानि गुरुपि च लघूनि च।

नाशयत्यचिरेणैव गायत्री जापको द्विजः।।

पद्यपु0

गायत्री जपने वाले को ब्रह्म हत्यादि सभी पाप, छोटे हों, चाहें बड़े हों शीघ्र ही समस्त नष्ट हो जाते है।

गायत्री जपकृद्भकत्या सर्व पापैः प्रमुच्यते।

पराशर

भक्तिपूर्वक गायत्री जपने वाला समस्त पापों से छूट जाता है।

सर्व पापानि नश्यन्ति गायत्री जपतो नृप!

भविष्य पुराण

गायत्री जपने वाला समस्त पापों से छूट जाता है।

गायत्र्यष्ट सहस्रं तु जापं कृत्वा स्थिते रवौ।

मुच्यते सर्व पापेभ्यो यदि न ब्रह्महा भवेत।।

अत्रिस्मृति। 3-15

सूर्य के समक्ष खड़े होकर यदि गायत्री का आठ हजार जप करे तो वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। यदि वह ब्रह्मा अर्थात् ज्ञानी पुरुषों की निन्दा करने वाला न हो, तो।

सहस्र कृत्वस्त्वभ्यस्य वहिरेतत्त्रिकं द्विजः।

महतोप्येनसो मासात्वचे वाहिर्विमुच्यते।।

मनुस्मृति ॰ 2।79

एकान्त स्थान में प्रणव महा व्याहृति पूर्वक गायत्री का 1000 एक हजार जप करने वाला द्विज बड़े से बड़े पाप से ऐसे छूट जाता है जैसे केंचुली से सर्प छूट जाता है।

जना यैस्तरति तानि तीर्थनि।

जिनसे पुरुषों के पाप दूर हो जाते हैं और वे इस संसार से तर जाते हैं उनको तीर्थ कहते “गायत्री” -इन तीन अक्षरों में वही तीर्थ विद्यमान् है-ग = गंगा। य = यमुना। त्र = त्रिवेणी समझनी चाहिए।

ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वांगना गमः।

महानि पातकान्यानि, स्मरणान्नाशमाप्नुयात्।।

गायत्री पु0 22।

गायत्री के स्मरण मात्र से ब्रह्म-हत्या सुरापान चोरी, गुरुस्त्री गमन आदि अन्य महा पातक भी नष्ट हो जाते हैं।

य एता वेद गायत्रीं पुन्याँसर्वगुणान्विताम्।

तत्वेन भरतश्रेष्ठ! स लोके न प्रणश्यति।।

महा भा0 भीष्म प॰ अ॰ 14।16।

हे युधिष्ठिर! जो मनुष्य तत्त्वपूर्वक सर्वगुण सम्पन्न पुण्य गायत्री को जान लेता है। वह संसार में दुखित नहीं होता है।

गायत्री निरतं हव्य कव्येषु विनियोजयेत्। तस्मिन्न तिष्ठते पापमब्बिंदु रिव पुष्करे।।

गायत्री जपने वाले को ही पितृकार्य तथा देवकार्य में बुलाना चाहिए, क्योंकि गायत्री उपासक में पाप उस प्रकार नहीं रहता जैसे कमल के पत्ते पर पानी की बूँद नहीं ठहरती।

गायत्रीम पठेद्विप्रो न पापेनलिप्यते।

लघु अत्रि संहिता

जो द्विज गायत्री को जपता है वह पाप से युक्त नहीं होता।

चरक संहिता में गायत्री साधना के साथ आँवला सेवन करने से दीर्घजीवन का वर्णन किया है।

सावित्री मनसा ध्यायन् ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः।

सम्वत्सरान्ते पौषीं वा माधीं वा फाल्गुनीं तिथिम्

चरक चिकित्सा0 आवं0 रसा0 श्लो0 9

मन से गायत्री का ब्रह्मचर्य पूर्वक एक वर्ष तक ध्यान करता हुआ वर्ष के उपरान्त में पौष मास अथवा माघ मास की अथवा फाल्गुन मास की किसी शुभ तिथि में तीन दिन क्रमशः उपवास कर उपरान्त आँवले के वृक्ष पर चढ़ जितने आँवले मनुष्य खायेगा उतने ही वर्ष जीवित रहेगा।

यदिहवा अप्येवं विद्वव्हिव प्रतिगृहणाति न हैव तद् गायत्र्या एकं च न पदं प्रति। स य इमाणं स्त्रीं ल्लोकान् पूर्णान् प्रतिगृहणीयात् सोऽस्या एतत्प्रथमं पदमवाप्नुयादथ यावतीयं त्रयी विद्या यस्तावत्प्रति गृहणीयात् सोऽस्याः एतत् द्वितीय पदमवाप्नुयादथे यावदिदं प्राणि यस्तावत् प्रतिगृहणयात सोऽस्याः एतत्तृ तीयं पदमवाप्नुयात् अथास्याः एवदेव तुरीयं दर्शनं पदं परोरजाय एष तपतिनैव केनचनाप्यं कुत उ एतावत्प्रतिगृहणीयात।

वृ0 5।14। 5-6

गायत्री को सर्वात्मक भाव से जपने वाला मनुष्य यदि बहुत ही प्रतिगृह लेता है तो भी उस प्रतिगृह का दोष गायत्री के प्रथम पाद उच्चारण के समान भी नहीं होता है। यदि समस्त तीनों लोकों को प्रतिगृह में लेवे तो उसका दोष प्रथम पाद उच्चारण से नष्ट हो जाता है। यदि तीनों वेदों का प्रतिगृह लेवे तो उसका दोष द्वितीय पाद में नष्ट हो जाता है। यदि संसार के समस्त प्राणियों को भी प्रतिगृह में लेवे तो उसका दोष तृतीय पाद में नाश हो जाता है, अतः गायत्री जपने वाले को कोई हानि नहीं पहुँचती, और गायत्री को चौथा पाद तो चौथा पर ब्रह्म है, इसके सदृश दुनिया में कुछ भी नहीं है।

यदह्नत्कुरुते पापं तदहात्प्रतिमुच्यते।

यद्रात्रियात्कुरुते पापं तद्रात्रियात्प्रतिमुच्यते।।

तै0 आ॰ प्र0 10 अ॰ 34

हे गायत्री देवि! तुम्हारे प्रभाव से दिन में किये पाप दिन में ही नष्ट हो जाते हैं और रात्रि में किये पाप रात्रि में ही नाश हो जाते हैं।

गायत्रीं तु परित्यज्य येऽन्य मन्त्रमुपासते।

मुण्डकरा वै ते ज्ञेया इतिवेदविदोविदुः।।

जो गायत्री मन्त्र को त्याग अन्य मन्त्र की उपासना करते हैं वे नास्तिक हैं ऐसा वेदवेत्ताओं ने कहा है।

गायत्री चिन्तयेद्यस्तु हृद्पद्मे समुपस्थिताम्।

धर्माधर्म विनिर्मुक्तः स याति परमाँ गतिम्।

जो मनुष्य हृदय कमल में बैठी गायत्री का चिन्तन करता है, वह धर्म, अधर्म के द्वंद्व से छूट कर परम गति को प्राप्त होता है।

सहस्र जप्ता सा देवी ह्युपपातक नाशिनी।

लक्ष्य जाप्ये तथा तच्च महापातकनाशिनी।।

कोटि जाप्येन राजेन्द्र! यदिच्छतितदाप्नुयात्।

एक सहस्र जप करने से देवी उपपातकों का विनाश करती है एक लाख जप करने से महा पातकों का विनाश होता है। एक करोड़ जाप करने से अभीष्ट सिद्धि प्राप्ति होती है।

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गायत्री उपेक्षा की भर्त्सना

गायत्री को न जानने वाले अथवा जानने पर भी उसकी उपासना न करने वाले द्विजों की शास्त्रकारों ने कड़ी भर्त्सना की है और उन्हें अधोगामी बताया है। इस निन्दा में इस बात की चेतावनी है कि जो आलस्य या अश्रद्धा के कारण गायत्री साधना में ढील करते हों उन्हें सावधान होकर इस श्रेष्ठ उपासना में प्रवृत्त होना चाहिए।

गायत्र्युपासना नित्या सर्ववेदैः समीरिता।

यस्या विनात्वधः पातो ब्राह्माणस्यास्ति सर्वथा।।

देवी भागवते स्कंध 12। अ॰ 8।9

गायत्री की उपासना नित्य ही समस्त वेदों में वर्णित है। जिस गायत्री के बिना सर्व प्रकार से ब्राह्मण की अधोगति होती है।।

साँगाश्च चतुरो वेदानधीत्यापि सवां मायान्।

सावित्रीं यो न जानाति वृथा तस्यपरिश्रमः।।

यो0 याज्ञवल्क्य0

सस्वर और साँगपूर्वक चारों वेदों को जानकर जो गायत्री मन्त्र को नहीं जानता, उसका परिश्रम व्यर्थ है।

गायत्रीं याः परित्यज्य चान्यमन्त्रमुपासते।

न साफन्यमवाप्नोति कल्पकोटि शतैरपि।।

वृ0 सन्ध्या भाष्ये

जो गायत्री मन्त्र को छोड़ अन्य मन्त्र की उपासना करता है, वह करोड़ों जन्मों में भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है।

विहाय ताँ तु गायत्रीं विष्णूपास्ति परायणः।

शिवोपास्तिरतो विप्रो नरकं याति सर्वथा।।

देवी भागवत

गायत्री को त्याग कर विष्णु और शिव की पूजा करने पर भी ब्राह्मण नरक में जाता है।

गायत्री रहितो विप्रः शूद्रादप्य शुचिर्भवेत्। गायत्री ब्रह्म तत्वज्ञाः सम्पूज्यस्तु द्विजोत्तमः।।

गायत्री से रहित ब्राह्मण शूद्र से भी अपवित्र है। गायत्री रूपी ब्रह्म तत्व को जानने वाला द्विज सर्वत्र पूज्य है।

एतच्चर्या विसंयुक्त काले च क्रियया स्वया।

ब्रह्मक्षत्त्रियविद् योनिर्गर्हणाँ याति साधुषु।।

मनु स्मृति अ॰ 2।80

प्रणव व्याहृति पूर्वक गायत्री मन्त्र का जप सन्ध्या काल में न करने वाला द्विज सज्जनों में निन्दा का पात्र होता है।

एवं यस्तु विजानाति गायत्रीं ब्राह्मणस्तुसः।

अन्यथा शूद्र धर्मस्याद्वेदानामपि पारगः।।

यो0 याज्ञ0

जो गायत्री को जानता है और जपता है वह ब्राह्मण है अन्यथा वेदों में पारंगत होने पर भी शूद्र के समान है।

अज्ञात्वा चैव गायत्रीं ब्राह्मण्यादेव हीयते।

अपवादेन संयुक्तो भयेच्छु तिनिदर्शनात।।

यो0 पा0

गायत्री को न जानने से ब्राह्मण ब्राह्मणत्व से हीन हो पाप युक्त हो जाता है ऐसा श्रुति में कहा गया है।

किं वेदैः पठितैः सर्वेः सेतिहास पुराणकैः।

साँगैः सावित्र हीनेन न विप्रत्वमवाप्नुयात्।।

वृ0 पराशर॰ अ॰ 5।14

इतिहास पुराणों के तथा समस्त वेदों के पढ़ लेने पर भी यदि गायत्री मंत्र से हीन हो तो वह ब्राह्मणत्व को प्राप्त नहीं होता है।

न ब्राह्मणो वेद पाठान्न शास्त्र पठनादपि।

देव्यास्त्रिकालभ्यासाद्ब्राह्मणः स्याद्द्विजोऽन्यथा

वृ0 सन्ध्या भाष्ये।

वेद और शास्त्रों के पढ़ने से भी ब्राह्मण नहीं हो सकता है। तीनों काल में गायत्री की उपासना से ही ब्राह्मण होता है अन्यथा वह द्विज ही रहता है।

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गायत्री के संबंध में महापुरुषों के अभिमत।

भारत वर्ष के प्रसिद्ध महापुरुषों ने वेदमाता गायत्री के संबंध में समय पर अपनी श्रेष्ठतम सद्भावनाएं प्रकट की हैं। उन श्रद्धाँजलियों को नीचे संकलित किया जा रहा है। पाठक इन अभिमतों में प्रकट करने वालों की महत्ता और इस विचार करने वालों की महानता का ध्यान रखते हुए विचार करें कि आधुनिक काल के महापुरुष भी वेदमाता गायत्री के प्रति उतनी ही उच्च श्रद्धा रखते हैं जितने कि प्राचीन काल में ऋषि मुनि करते थे। सचमुच गायत्री ऐसी ही महाशक्ति है जिसको हमें भी श्रद्धापूर्वक हृदयंगम करना चाहिए।

महात्मा गान्धी

“गायत्री के मंत्र का निरन्तर जप रोगियों को अच्छा करने के लिए इसका प्रयोग, प्रार्थना की परिभाषा -आत्मा एक उन्नत अवस्था से दूसरी उन्नत अवस्था को पहुँचने के लिए आतुर हो रही है-सर्वथा चरितार्थ करता है। यदि इसी गायत्री मंत्र का जप अनवरत चित्त और शान्त हृदय से राष्ट्रीय आपत्ति काल में किया जाता है तो उन संकटों को मिटाने के लिए प्रभाव और पराक्रम दिखलाता है।”

“जिन लोगों का यह विश्वास है कि ‘मंदिरों में जाकर गायत्री का जप करना, नमाज या प्रेयर करना मूर्खता या विडम्बना है’ वे भ्रम में फंसे हुए हैं। मैं तो यहाँ तक कह सकता हूँ कि ऐसी मान्यता से बड़ी भूल मनुष्य से ओर कोई नहीं हो सकती।”

-यंग इंडिया

“मैं मानता हूँ कि संस्कृत भाषा की बुरी तरह उपेक्षा की जा रही है। मैं उस पीढ़ी का आदमी हूँ जिसका प्राचीन भाषाओं की पढ़ाई में विश्वास था। जहाँ तक भारतवर्ष का सम्बन्ध है, यह बात किसी और प्राचीन भाषा की अपेक्षा संस्कृत पर अधिक लागू होती है। हर एक राष्ट्रवादी को संस्कृत पढ़नी चाहिए।

इसी भाषा में तो हमारे पूर्वजों के विचार और लेख हैं। यदि हिन्दू बच्चों को अपने धर्म की भावनायें हृदयंगम करानी हैं तो एक भी लड़के या लड़की को संस्कृत भाषा का ज्ञान प्राप्त किये बिना नहीं रहना चाहिए। देखिए, गायत्री का अनुवाद हो ही नहीं सकता। उसका एक खास अर्थ है। मूल मंत्र में जो संगीत है वह अनुवाद में कहाँ से आयेगा।”

-हरिजन सेवक

“वर्तमान चिकित्सा प्रणाली धर्म से सर्वथा शून्य है जो व्यक्ति उचित रूप से प्रति दिन नमाज पढ़ता है या गायत्री का जाप करता है, वह कभी रोग ग्रसित नहीं हो सकता एक पवित्र आत्मा ही पवित्र शरीर बना सकता है। मेरा दृढ़ निश्चय है कि धार्मिक जीवन के नियम आत्मा और शरीर दोनों की यथार्थ रूप से रक्षा कर सकते हैं।”

तिब्विया कालेज में भाषण

श्री जगद्गुरु शंकराचार्य जी

“गायत्री की महिमा का वर्णन करना मनुष्य की सामर्थ्य से बाहर है। बुद्धि का शुद्ध होना इतना बड़ा कार्य है जिसकी समता संसार के और किसी काम से नहीं हो सकती। आभा प्राप्ति करने की दिव्य दृष्टि जिस शुद्ध बुद्धि से प्राप्त होती है उसकी प्रेरणा गायत्री द्वारा होती है। गायत्री आदि मंत्र है। उसका अवतार दुरितों को नष्ट करने और ऋत के अभिवर्धन के लिए हुआ है।”

महर्षि रमण

“योग विद्या के अंतर्गत मंत्र विद्या बड़ी प्रबल है। मंत्रों की शक्ति से बड़ी अद्भुत सफलताएं मिलती हैं। मंत्र शक्ति से जादू जैसे चमत्कारों से भारतीय जनता भली प्रकार परिचित है। गायत्री मंत्र ऐसा मंत्र है जिससे आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार के लाभ मिलते हैं।”

महामना मालवीयजी

“महामना मालवीय जी गायत्री मंत्र के बड़े भक्त थे। हिन्दू विश्व विद्यालय के लिए प्रयत्न करने से पूर्व उन्होंने प्रयाग में त्रिवेणी तट पर एक करोड़ गायत्री कर पुरश्चरण करवाया था। उस तपस्या का फल आज सबके सामने प्रयत्न है। मालवीयजी नित्य एक हजार गायत्री का जप नियमित रूप से करते थे। गायत्री पुरश्चरण के अवसर पर उन्होंने अपने प्रवचन में कहा था।”

“ऋषियों ने जो अमूल्य रत्न हमें दिये हैं उनमें से एक अनुपम रत्न गायत्री है। गायत्री से बुद्धि पवित्र होती है। ईश्वर का प्रकाश आत्मा में आता है। इस प्रकाश में असंख्यों आत्माओं को भव बन्धन से त्राण मिला है। गायत्री में ईश्वर परायणता के भाव उत्पन्न करने की शक्ति है, साथ ही वह भौतिक अभावों को दूर रह करती। गायत्री की उपासना करना ब्राह्मणों के लिए तो अत्यन्त आवश्यक है। जो ब्राह्मण गायत्री जप नहीं करता वह अपने धर्म कर्तव्य को छोड़ने का अपराधी होता है।”

लोकमान्य तिलक

“भारतीय जनता आज अन्धकार में भटक रही है। उसका कल्याण केवल अन्न धन वृद्धि से ही न हो जायगा। आर्थिक दशा सुधर जाने पर भी मनुष्य सुखी नहीं हो सकता उसे आज ऐसे प्रकाश की आवश्यकता है जो उसकी आत्मा को प्रकाशित कर दे। जिस बहुमुखी दासता के बन्धनों में आज प्रजा जकड़ी हुई है उनका अन्त राजनैतिक संघर्ष करने मात्र से नहीं हो जायगा। उसके लिए तो आत्मा के अन्दर प्रकाश उत्पन्न होना चाहिए जिससे सत् और असत् का विवेक हो। कुमार्ग को छोड़ कर श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले। गायत्री मंत्र में वह भावना विद्यमान है। उसमें प्रकाश की कामना की गई है। अन्तः करण में प्रज्वलित ज्ञान ज्योति ही हमारा पथ प्रदर्शन कर सकती है और उसी के पीछे अनुगमन करने से आज की विपन्न दशा से छुटकारा पाया जा सकता है।”

श्री स्वामी शिवानन्दजी महाराज

“प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त में उठकर, नित्य कर्म से निवृत्त होकर गायत्री का जप करना चाहिए। ब्राह्ममुहूर्त में गायत्री का जप करने से चित्त शुद्ध होता है और हृदय में निर्मलता आती है। शरीर निरोग रहता है और स्वभाव में नम्रता आती है। बुद्धि सूक्ष्म होने से दूर दर्शिता बढ़ती है और स्मरण शक्ति का विकास होता है। कठिन प्रसंगों में गायत्री द्वारा दैवी सहायता मिलती है। उसके द्वारा आत्म दर्शन हो सकता है।”

स्वामी रामतीर्थ

“राम को प्राप्त करना सब से बड़ा काम है। गायत्री अभिप्राय बुद्धि को काम रुचि से हटाकर राम रुचि में लगा देना है। जिसकी बुद्धि पवित्र होगी वही राम को प्राप्त करने का काम कर सकेगा। गायत्री पुकारती है कि-बुद्धि में इतनी पवित्रता होनी चाहिए कि वह काम को राम से बढ़ कर न समझे।”

श्री रामकृष्ण परमहंस

“मैं लोगों से कहता हूँ कि लम्बे लम्बे साधन करने की उतनी जरूरत नहीं है। इस छोटी सी गायत्री की साधना को करके देखो। गायत्री का जप करने से बड़ी बड़ी सिद्धियाँ मिल जाती हैं। यह मंत्र छोटा है पर इसकी शक्ति बड़ी भारी है।”

योगी अरविन्द घोष

“पांडिचेरी के योगिराज श्री अरविन्द घोष ने कई जगह गायत्री जप करने का निर्देश किया है। उन्होंने बताया है कि गायत्री में ऐसी शक्ति समायी हुई है जो महत्वपूर्ण कार्य कर सकती है। उन्होंने कइयों को साधना के तौर पर गायत्री का जप बताया है।”

श्री स्वामी विवेकानंद जी

“परमात्मा से क्या माँगना चाहिए? क्या वह वस्तुएं माँगें जिन्हें अपने बाहुबल से आसानी के साथ कमाया जा सकता? नहीं, ऐसा उचित न होगा। बुहारी की आवश्यकता पड़ने पर उसे दो चार पैसे में बाजार से खरीद लिया जाता है। उसे कौन बुद्धिमान कहेगा जो बुहारी माँगने राजदरबार में जावे। राजा ऐसे माँगने पर हँसेगा और उसकी इस तुच्छ बुद्धि पर हँसेगा। राजा से वही वस्तु माँगी जानी चाहिए जो उसके गौरव के अनुकूल हो। परमात्मा से माँगने योग्य वस्तु सद्बुद्धि है। जिस पर परमात्मा प्रसन्न होते हैं उसे सद्बुद्धि प्रदान करते हैं। सद्बुद्धि से सत् मार्ग पर प्रगति होती है और सत्कर्म से सब प्रकार के सुख मिलते हैं। जो सत् की ओर बढ़ रहा है उसको किसी प्रकार के सुख की कमी नहीं रहती। गायत्री सद्बुद्धि का मंत्र है। इसलिए उसे मन्त्रों का मुकुटमणि कहा गया है।”

श्री स्वामी करपात्री जी

“जो गायत्री के अधिकारी हैं उन्हें नित्य नियमित रूप से गायत्री का जप करना चाहिए। द्विजों के लिए गायत्री का जप अत्यन्त आवश्यक धर्मकृत्य है।”

महात्मा उड़िया बाबा

“मैं जब आठ वर्ष का था तभी मुझे गायत्री मन्त्र की दीक्षा दी गई थी। मैंने श्रद्धापूर्वक उसकी उपासना की और ईश्वर की ओर मेरी प्रवृत्ति बढ़ती गई।

मनुष्य शरीर में बुद्धि का प्रमुख स्थान है। गायत्री बुद्धि को पवित्र करती है। जब बुद्धि पवित्र हो गई तो सब कुछ पवित्र हो गया समझना चाहिए। जिसकी बुद्धि पवित्र है उसके लिए संसार में कुछ भी अप्राप्य नहीं है। गायत्री ब्राह्मणों का तो प्रधान आधार है।”

स्व0 काली कमली वाले बाबा विश्रद्धानंद

“गायत्री ने बहुतों को सुमार्ग पर लगाया है। कुमार्ग गामी पुरुष की पहले तो गायत्री की ओर रुचि ही नहीं होती। यदि ईश्वर कृपा से हो जाए तो वह कुमार्ग गामी नहीं रहता। गायत्री जिसके हृदय में बास करती है उसका मन ईश्वर की ओर जाता है। विषय विकारों की व्यर्थता उसे भली प्रकार अनुभव होने लगती है।

कई महात्मा गायत्री का जप करके परम सिद्ध हुए हैं। परमात्मा की शक्ति ही गायत्री है। जो गायत्री के निकट जाता है वह शुद्ध होकर रहता है। आत्मकल्याण के लिए मन की शुद्धि आवश्यक है। मन की शुद्धि के लिए गायत्री मन्त्र अदभुत है। ईश्वर प्राप्ति के लिए गायत्री जप को प्रथम सीढ़ी समझना चाहिए”

प्रसिद्ध आर्यसमाजी महात्मा सर्वदानंदजी।

“गायत्री मन्त्र द्वारा प्रभु का पूजन सदा से आर्यों की रीति रही है। ऋषि दयानंद ने भी उसी शैली का अनुसरण करके सन्ध्या का विधान, यथाशक्ति सार्थक व्याख्यान तथा वेदों के स्वाध्याय में प्रयत्न करना बतलाया है। ऐसा करने से अन्तःकरण की शुद्धि तथा निर्मल बुद्धि होकर मनुष्य जीवन अपने और दूसरों के लिए हितकर हो जाता है। जितनी भी इस शुभ कर्म में श्रद्धा और विश्वास हो, उतना ही अविद्या आदि क्लेशों का ह्रास होता है। फिर विद्या के प्रकाश में उपासना, प्रभु के आस पास हो जाता है।

जो जिज्ञासु अर्थ पूर्वक इस मन्त्र का सप्रेम नियमपूर्वक उच्चारण करता है उसके लिए गायत्री संसार सागर संस्तरण की तरणि (नाव) और आत्म प्रसाद प्राप्ति की सरणि (सड़क) है।”

टी0 सुब्बाराव

“सविता नारायण की दैवी प्रकृति को गायत्री कहते हैं। वह आदि शक्ति होने के कारण इसको गायत्री या आद्यशक्ति कहते हैं। गीता में आदित्य वर्ण कहकर इन्हीं का वर्णन किया गया है। ब्राह्ममुहूर्त में सन्ध्योपासन द्वारा गायत्री की उपासना करना योग का सबसे प्रथम अंग है जो राजयोग में परमावश्यक है।”

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पुनीत गायत्री मंत्र

(डॉ0 रवीन्द्रनाथ टैगोर )

भारतवर्ष को जगाने वाला जो मन्त्र है वह इतना सरल है कि एक ही श्वास में उसका उच्चारण किया जा सकता है वह है-गायत्री मन्त्र।

ॐ भूर्भुवः स्वः

गायत्री के इस अंश का नाम व्याहृति के अर्थ हैं चारों ओर से इकट्ठा करके ले आना। पहले भूः भुवः स्वः इन तीनों लोकों, अर्थात्-सारे जगत् को मन में इकट्ठा करके लाना चाहिए। अर्थात् यह अनुभव करना चाहिए कि-

मैं किसी देश विशेष में रहने वाला नहीं हूँ, परन्तु विश्व जगत का अधिवासी हूँ। मैं जिस राजमहल का रहने वाला हूँ। ये लोक लोकान्तर उसकी केवल एक एक दीवार मात्र हैं

इस प्रकार स्वास्थ्य चाहने वाला मनुष्य अपनी तंग और बंद कोठरी से बाहर निकलकर प्रतिदिन प्रातःकाल अपरिमित खुले मैदान में शुद्ध वायु सेवन के लिए जाता है, उसी प्रकार प्रति दिन असंख्य नक्षत्रों से सुजटितडडडडडडड इस जगत में खड़ा होकर इस मन्त्र उच्चारण करना चाहिए।

तत्सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि।

धियो यो नः प्रचोदयात् ॐ

यह सारा जगत जिस शक्ति से विकसित हो रहा है उसी दिव्य ज्योति का हम ध्यान करते हैं। वह हमारी बुद्धियों का प्रेरक-चलाने वाला होवे।

ब्रह्म का ध्यान करने की भी यह प्राचीन पद्धति जैसी महान् उदार है, वैसे ही अत्यन्त सरल है। इसमें किसी प्रकार की व्यर्थता और बनावट का प्रवेश नहीं है।

बाह्य जगत और अन्तर बुद्धि-इन दोनों को छोड़कर हमारे पास है ही क्या? इस जगत और भी की भगवान अपनी अथक शक्ति से दिन रात प्रेरणा कर रहे हैं। इसी बात को अनुभव कर लेने से भगवान के साथ हमारा सम्बन्ध चिरस्थापित किया जा सकता है। मैं नहीं जानता कि किसी अन्य हुनर मन्दी सामग्री कृत्रिम साधन अथवा मानसिक विचारोद्वेग से होना असम्भव है।

इस पुनीत मंत्र के अभ्यास में अन्य किसी प्रकार का तार्किक ऊहापोह, किसी प्रकार के मतभेद अथवा किसी प्रकार के बखेड़े की गुंजाइश नहीं और न इसके अन्दर कोई विशेष व्यक्तिगत अथवा संकीर्णता पाई जाती है।

जीवनदात्री गायत्री -सर एस॰ राधाकृष्णन-

यदि हम इस सार्वभौमिक प्रार्थना गायत्री पर विचार करें तो हमें मालूम होगा कि यह हमें वास्तव में कितना ठोस लाभ देती है। गायत्री हम में फिर से जीवन का स्त्रोत उत्पन्न करने वाली आकुल प्रार्थना है। यह एक खोज है। साहसिक अनुसन्धान है। धार्मिक जीवन या खोज से इसका जितना सम्बन्ध है उस सम्बन्ध में इसे अन्तिम नहीं कहा जा सकता। फिलॉसफर या दार्शनिक शब्द का अर्थ सचाई को सिखाने वाला नहीं है यह तो मार्ग दर्शन के लिए किसी एक के साथ सचाई की खोज है। यह जन समूह में बैठकर नहीं की जाती। यह तो अलग अलग अपने अन्तस्तल में प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं मौन शान्त और एकान्त होकर करनी होती है। अंतर्नाद की पुस्तक-बाइबिल-में एक स्थान पर कहा गया है-जब फरिश्ते खुदा के सामने आये, आध घण्टे तक सब शान्त रहे यह मौन-शान्त भाव यदि फरिश्तों के लिए आवश्यक है तो मनुष्य के लिए तो इसकी और भी आवश्यकता है। उसमें भी पूरी ईमानदारी और पूरी सचाई चाहिए। ध्यान तो केवल साक्षात्कार है-अपनी आत्मा के साथ। इसी में तो हम अपनी आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध को-सम्बन्ध कराने वाली गाँठ को देख सकते हैं। गायत्री चाहती है कि हम लगातार इस खोज को जारी रखें।

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गायत्री जप की महिमा।

श्री स्वामी दयानन्द के जीवन में-

श्री स्वामी जी महाराज के जीवन-चरित्र (उर्दू) प्रथम संस्करण (Edition) बड़ी (Size) आकृति से उद्धृत।

इस गायत्री जप को स्मृतिकारों से ही इतना महत्व दिया गया है, यह बात नहीं वर्तमान युग के विद्या और बुद्धि पर आश्रित (Rationaclistic) धर्म के प्रचारक महर्षि दयानन्द भी इस गायत्री जप के महत्व को स्वीकार करते हैं। ग्वालियर में भागवत सप्ताह मनाये जाने के अवसर पर राजाजी की ओर से स्वामीजी से इसके माहात्म्य को पूछा गया तो स्वामी जी ने उत्तर दिया।

गायत्री पुरश्चरण करना चाहिये।

जयपुर रियासत में सच्चिदानन्द को स्वामी जी ने ईश्वर उपासना के मन्त्र का उपदेश दे रखा था इसलिए वह सायंकाल सूर्याभिमुख होकर उस मन्त्र का जप किया करता था यह मन्त्र गायत्री मन्त्र ही था।

मुल्तान में उपदेश के समय स्वामी जी ने गायत्री मंत्र का उच्चारण किया और कहा कि यह मंत्र सब से श्रेष्ठ है। तथा यह भी बतलाया कि चारों वेदों का यही मूल गुरुमन्त्र है। आदि काल में सभी ऋषि मुनि इसी का जप किया करते थे।

एक बार गायत्री सम्बन्धी किसी पूछे गये प्रश्न का उत्तर फर्रुखाबाद के पण्डितों को श्री स्वामी जी ने इस प्रकार दिया था।

गायत्री का जाप वेदोक्त रीति से करना चाहिये तभी अच्छा फल मिलता है। कारण-उसमें गायत्री के अर्थानुसार आचरण करना लिखा है।

रियासत जयपुर के इलाके के हीरालाल रायाल जो माँस, मदिरा का सेवन करते थे। उन्हें इस कुटेव से हटाकर गायत्री याद कराई। उन्हें रुद्राक्ष की माला और भस्म धारण कराई सन्ध्या तथा गायत्री की विधि भी पूरी बतलाई।

स्वामीजी की आज्ञानुसार अनूपशहर, दानपुर, कर्णवास, अहमदगढ़, रामघाट, जहाँगीराबाद से अनुमानतः चालीस के लगभग विद्वान् ब्राह्मण गायत्री का जाप करने के लिए बुलाये गये और जप अर्ध शुक्लपक्ष में पूरा हो गया।

श्री स्वामीजी ने घोड़लसिंह आदि के यज्ञोपवीत कराये इस समय भी हवन तथा गायत्री का जप भी कराया हवन सब ही दिन हुआ तथा गायत्री का जप भी कराया हवन केवल सब ही दिन हुआ किन्तु जप 10 दिन तक लगातार होता रहा।

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हमारा व्यक्तिगत अनुभव

(श्रीराम शर्मा आचार्य सम्पादक ‘अखंडज्योति’)

ईश्वर की कृपा से, उसके आशीर्वाद से हमारा जीवन प्रारंभ से लेकर अब तक साधनामय रहा है। स्वाध्याय, चिन्तन, आत्मनिर्माण, उत्तर दायित्वों की पूर्ति और लोक सेवा के साथ हमें आध्यात्मिक साधनाएं करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अनेक सुयोग्य और कई अयोग्य गुरुओं के संरक्षण में हमने अनेकों, दीर्घकालीन कष्ट साध्य साधनाएं की हैं, अनेकों तपश्चर्याओं में अपने को काफी तपाया है। इस लम्बे साधना काल में हमने जो अनुभव प्राप्त किये हैं, उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अन्य सब साधना विधियों की अपेक्षा गायत्री की साधना अपेक्षाकृत सरल है, शीघ्र सफल होने वाली और अधिक उत्तम परिणाम उत्पन्न करने वाली है। इस साधना में वैसा कोई विक्षेप नहीं आता जैसा कि अन्य साधनाओं में आता है।

ईश्वर प्राप्ति और आत्म दर्शन की दक्षिण मार्गी साधनाएं निर्वाध हैं। कथा, कीर्तन, भजन, व्रत, उपवास से आत्म शुद्धि होती है। इन्हें निरंतर करते रहने से मन के कषाय कल्मष दूर होते जाते हैं। यह पिपीलिका मार्ग कहलाता है। चींटी धीरे धीरे चलती हुई भी कालान्तर में सुदूर देशों की यात्रा कर लेती है।

दूसरा विहंगम मार्ग है। यह जल्दी का रास्ता है। इसे हट योग या वाममार्ग भी कहते हैं। इस मार्ग पर चलने वाला उग्र परिश्रम करता है, कष्ट साध्य तपश्चर्याएं करता है और उस साहसिकता के आधार पर देर के रास्ते को जल्दी ही पार कर लेता है। इस मार्ग में ऐसी छोटी पगडंडियाँ भी हैं जो किसी छोटी सकाम प्रयोजन को पूरा करने में विशेष रूप से फलवती होती हैं। ऐसी पगडंडियों को तंत्र मार्ग कहते हैं। हमने इन तीनों मार्गों का अभिगमन काफी दूर तक किया है और उसके भले बुरे परिणामों को देखा है।

इस साधना काल में हमें व्यक्तिगत रूप से कितने ही अनुभव हुए हैं। राजमार्ग में-पिपीलिका मार्ग में कथा, कीर्तन, संध्या, पूजा, प्रमुख हैं। इस मार्ग पर साधक को एक निष्ठा के साथ लम्बे समय तक चलते रहने की तैयारी करनी पड़ती है। यदि उसका मन फल की ओर झुका या साधना के परिणामों को स्थूल दृष्टि से नापना शुरू किया था, नवीनता के अभाव में मन ऊबने लगा तो उत्साह ठंडा पड़ जाता है। देखा है कि पिपीलिका मार्ग पर चलने वाले साधक कुछ समय पश्चात हतोत्साह हो जाते हैं और अपना प्रयत्न छोड़ बैठते है। हठ योग का मार्ग कष्ट साध्य है। उसमें इतनी गर्मी में अपने का तपाना होता है कि यदि साधक में पर्याप्त साहस, धैर्य और शौर्य न हो तो उसके पैर लड़खड़ा जाते हैं और थोड़ा बहुत आगे चल कर वह बैठ जाता है। तंत्र शीघ्र फलदाता है पर उसमें खतरे काफी हैं। साधना काल में तलवार की धार पर होकर गुजरना होता है। थोड़ी भी भूल हो जाने पर अनर्थ हो सकता है। उस साधना के समय में विशेष रूप से ऐसे भय और प्रलोभन उपस्थित होते हैं जिससे फिसल जाने से सारा प्रयत्न निष्फल हो जाता है और साधना भ्रष्ट होने के कारण कोई विपत्ति सिर पर आ जाती है।

राजमार्ग से प्रभु प्राप्ति और आत्म दर्शन का पारमार्थिक लाभ होता है। हठ मार्ग से अपने में कोई चमत्कारिक शक्तियाँ एवं सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं। तंत्र से कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध होता है और किसी अदृश्य प्राणी से ऐसा संबंध हो जाता है कि वह साधक का आज्ञानुवर्ती बनकर उसके बहुत से ऐसे कार्य पूरे करता है और साधारण नीति से होने कठिन हैं। इन तीनों मार्गों को क्रमशः सत, रज, तम का मार्ग कह सकते हैं। चूँकि लोगों में से अधिकों की वृत्ति तम की ओर होती है इसलिए उन्हें तंत्र का मार्ग रुचता है। उससे कम रज में प्रवृत्त होते हैं वे साधना द्वारा राजसिक फल चाहते हैं। बहुत कम संख्या के लोग सत् प्रधान हैं, इसलिए ईश्वर प्राप्ति के लिए विरले ही साधना को पकड़ते हैं। तीनों मार्ग की साधनाएं साधारणतः अलग अलग हैं। कई बार तो उनमें भारी अंतर होता है। राजमार्गी को अहिंसा का पालन करना होता है। राजमार्गी को अहिंसा का पालन करना होता है दूसरी ओर तंत्र मार्गी शाक्त, पशु बलि करने से भी नहीं हिचकते।

साधना क्षेत्र के इन वन उपवनों में परिभ्रमण करने के उपरान्त हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि गायत्री साधना में उपरोक्त तीनों भागों का समन्वय है। उससे तीनों प्रयोजन सिद्ध होते हैं और जो विघ्न अन्य साधनाओं में होते हैं वे इसमें नहीं होते और सफलताएं अपेक्षाकृत अधिक शीघ्रता पूर्वक मिलती है। हम ऐसे महात्माओं और महापुरुषों को जानते हैं जिन्होंने केवल गायत्री का आश्रय लेकर आत्मसाक्षात्कार किया है और ईश्वर के समीप पहुँचे हैं। समाधि सुख, परमानंद, जीवन मुक्ति और तुरीयावस्था का सर्वोच्च सुख उन्होंने गायत्री की कृपा से प्राप्त किया है। हमने अपनी आँखों ऐसे सिद्ध पुरुष देखे हैं, उनके साथ सहवास किया है जिन्होंने असाधारण आत्मिक बल संग्रह किया है और चमत्कारी सिद्धियाँ दिखाने की क्षमता प्राप्त की है। उनको वह सिद्धियाँ गायत्री द्वारा ही मिली हैं। हम ऐसे ताँत्रिकों को भी जानते हैं जिनका उपास्य इष्ट गायत्री है और उसी के द्वारा वे अन्य ताँत्रिकों की भाँति पिशाच विद्या के सम्पूर्ण कार्य तथा काम्य प्रयोजनों में सफल होते हैं। इस प्रकार हमने देखा है कि अकेली गायत्री में वह शक्ति मौजूद है जिससे विविध स्वभावों के मनुष्य अपने उद्देश्यों को लेकर अध्यात्म मार्ग में प्रवेश कर सके।

अपने इस निष्कर्ष के आधार पर हमने अपनी साधना का केन्द्र गायत्री को नियुक्त किया है। सवा करोड़ जप का पुरश्चरण कर चुकने पर हमें दृढ़ विश्वास हो गया है कि इससे कम परिश्रम और कम खतरे में इससे अधिक सत्य परिणाम उपस्थित करने वाला साधन शायद ही कोई होगा। जो सत्य परिणाम हमारे स्वयं के अनुभव में आये हैं उन सबका वर्णन यहाँ संभव नहीं, पर इतना कहा जा सकता है कि आत्मिक पवित्रता, ईश्वर की ओर प्रगति, तथा कष्ट ग्रस्त व्यक्तियों की सेवा में गायत्री शक्ति ने हमें महत्वपूर्ण सहायताएं दी हैं और संकटपूर्ण क्षणों में हमारा प्रत्यक्ष पथ प्रदर्शन किया है।

अपने व्यक्तिगत अनुभव तथा आर्य ग्रन्थों और आप्त पुरुषों का आदेश दोनों ही प्रकार से गायत्री के महत्व पर हमें अटूट श्रद्धा हुई है। उसी के आधार पर अपने पाठकों से इस पथ का अनुसरण करने का साहस हमने किया है। हमारा विश्वास है कि जो गायत्री का आश्रय लेगा वह खाली हाथ न लौटेगा।

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अनेक आपत्तियों से छुटकारा

(श्री आर. वी. वेद, घाट कोपर)

उस समय मैं प्रायः ध्यान मग्न रहा करता था, एक दिन, रात को स्वप्न में मुझे जब कि मैं काफी परेशान था एक दिव्य ध्वनि सुनाई पड़ी कि तुम अपनी सारी परेशानियों को भूलकर श्री जगदंबा के पास रक्षा के लिए जाओ। मुझे इस ध्वन्यात्मक चमत्कार से आश्चर्य हुआ, दूसरे दिन मैंने पुरश्चरण सम्बन्धी साहित्य जुटाना आरंभ किया। और सवा लाख मंत्र जप के पुरश्चरण का आरम्भ कर दिया और उसे अन्य ब्राह्मणों की सहायता से हवन तर्पण आदि के साथ 11 दिन में पूरा कर लिया, मैं सुबह जल्दी उठता और प्रति दिन जप और अग्नि होत्र करता। उससे मुझे चमत्कारी लाभ हुआ। सारी बीमारियाँ, सारी परेशानियाँ हवा की तरह छू मन्तर हो गईं मेरे पुराने दुश्मन भी दास हो गये।

माँ हमेशा अपने बच्चे की हिफाजत करती रहती है और वह वही सब करती रहती है जिससे बच्चा खुश रहे। मुझे अपने जीवन में इसके कई अनुभव हुए हैं-

मैं प्रति मंगल और रविवार को महालक्ष्मी दर्शन के लिए नियमित रूप से जाया करता था। जब मैंने पुरश्चरण करना आरम्भ किया तब मैं सोचने लगा कि यह सब कैसे होगा। क्योंकि मैं दर्शन करने के पश्चात ही भोजन किया करता था। यह सवाल अपने आप ही हल हो गया। मेरे मित्र ने जो कि मेरे घर के पास ही रहते हैं और किसी सरकारी विभाग में ऑफीसर हैं, आवश्यकता के समय अपनी मोटरकार को उपयोग करने के लिए मुझसे एक दिन मेरे घर आकर कहा। वे सोचते थे कि इनकी पत्नी बीमार है और कभी भी अचानक इन्हें कार की जरूरत पड़ सकती है। ( क्योंकि घाट कोपर पर सिर्फ 1 टैक्सी है और यहाँ से बम्बई 15 मील दूर है। ) मैंने उनसे कहा कि इन दिनों मेरे सामने सिर्फ महालक्ष्मी के दर्शनों की समस्या है क्योंकि मैं 11 दिन के लिए वेदमाता गायत्री का पुरश्चरण कर रहा हूँ और मैं अपने प्रत्येक काम के लिए इन्हीं पर निर्भर हूँ उन्होंने कहा कि तुम अवश्य पुरश्चरण आरंभ कर दो। सायंकाल 6 बजे जब कि जप आरती आदि से निवृत्त होंगे, यह कार तुम्हें दर्शन कराकर तुम्हारे भोजन के समय तक वापस ला देगी। इन दिनों मैं एक ही बार भोजन करता था। ये दिन बम्बई में साम्प्रदायिक दंगे के थे, और वह इलाका उन दिनों दंगा क्षेत्र घोषित था और इसीलिए 30-40 घण्टे का एक बार कर्फ्यू लगा हुआ था। इस कलियुग में भी यह चमत्कार हुआ। हमारी यात्रा में किसी प्रकार की न कोई मुसीबत आई ओर न विघ्न ही आया । एक बार तो हम सब कुछ कदम ही आगे बढ़े होंगे, कुछ गुण्डों ने वहाँ कोई विस्फोट कर दिया, परन्तु हम सुरक्षित निकल गये।

इन्हीं दिनों में से एक दिन रात्रि को 10:30 पर मेरी पत्नी को वमन होने आरम्भ हुए। आधे या पौन घण्टे बाद ही मेरे उठकर जप आदि करने का समय आता था। मैंने अपने गृह-चिकित्सक को बुलाया जोकि मेरे अत्यधिक अन्तरंग मित्र हैं। मैंने उनसे कहा, मैं अब क्या करूं। मैं पत्नी की तीमारदारी करूं या जप ? मेरे लिए एक कठिन समस्या खड़ी हो गई। पत्नी को मैं अत्याधिक प्यार करता हूँ और जप यदि एक दिन के लिए भी छूटता है तो सारा सिद्धि कार्य खत्म । डॉक्टर ने मुझे ढाँढस बंधाया और कहा कि अपनी साधना जारी रखो, माँ भगवती इन की रक्षा करेंगी। मैं स्नानादि से निवृत्त होकर जप करने बैठ गया, इसी समय मेरी आँखों के सामने पूर्ण वेग के साथ मेरी पत्नी को फिर वमन हुआ। मैंने प्रार्थना की-माँ अब मेरी लाज तेरे हाथ में है-और मैं पूजन में लग गया-सचमुच ही आश्चर्य की बात है कि सवेरे 6:30 बजे जबकि मैं पूजा से उठा मुझे बताया गया कि मेरी पत्नी को चमत्कारिक लाभ हुआ है और वे इस समय स्वस्थ व प्रसन्न हैं।

इसी तरह मेरी साधना के समय मेरे मुकदमे की एक तारीख थी, जिसमें मैं नहीं जा सकता था और जो एक महत्वपूर्ण मुकदमा था, वह भी मेरे अनुकूल हुआ, क्योंकि उस दिन दूसरे फरीक का वकील ही गैर हाजिर हो गया।

एक नहीं ऐसे अनेक चमत्कार मुझे देखने को मिले हैं।

मैं आज पूर्ण रूप से सुखी हूँ। मुझे कोई अभाव नहीं है इस सबका श्रेय भगवती वेदमाता जगदम्बा गायत्री की कृपा को है जो कि गायत्री जप से प्राप्त हुई है।

आत्मा की उन्नति, सुख और शान्ति के लिए गायत्री सर्वश्रेष्ठ शक्ति है। जो उसे अपनाते हैं वे परमपद पाते हैं।

--कात्यायन

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आत्म कल्याण की ओर

(श्री जटाशंकर नान्दी, पट्टन)

मेरी 75 वर्ष की आयु है। पिचहत्तर वर्ष की आयु में मैंने गत पचास वर्ष में अनेक लक्ष गायत्री जप किये हैं, इसका मूर्तिमंत फल यह आया है कि बिना प्रयत्न, सहज रीति से आपोआप गायत्री जप शुरू हो जाते हैं। व्यावहारिक कार्य से निवृत्त हुआ कि जप की शुरुआत हो जाती है। ये फायदा ऐसा वैसा गौरवहीन नहीं। मनुष्य जीवन के अंतकाल की स्थिति भावी जन्म पर बहुत असर करती है। दूसरा लाभ यह है कि जिन साँसारिक पदार्थों की प्राप्ति के लिये अगणित मनुष्य आयुष्य और आरोग्य की आहुति दे रहे हैं उन क्षण भंगुर पदार्थों पर मुझे उपेक्षा एवं विरक्ति उत्पन्न हुई है। जिस संसार को असार कहा जाता है वह मुझे सारगर्भित मालूम होता है इसलिए यम नियम का पालन सुगम हुआ है। ब्रह्मचर्य पालन, वाणी संयम और अहिंसा स्वभाव सिद्ध हुए हैं, कोई आफत के भावी प्रसंग आते हैं इससे दूर रहने के लिये स्वप्न में सूचना मिलती है जैसे लाल बत्ती दिखाने से रेलगाड़ी ठहर जाती है। इसलिये संकटों में सदा दूर रहता हूँ। अपेक्षित, शाँत, संतोषी और सुखी जीवन बहुत स्पृहणीय है।

जिस पंचेन्द्रिय जनित क्षणभंगुर आनन्दों की प्राप्ति के लिये असंख्य सामान्यजन अपने तन मन और धन की आहुति देकर व्याधि और अकाल मृत्यु को प्रतिक्षण आमंत्रण दे रहे हैं उन तुच्छ स्वार्थों पर देह दुश्मनों जैसी तिरस्कार वृत्ति उत्पन्न हुई है इसलिये आयुष्य घातक कुटेबों और दुर्व्यसनों से सदैव रक्षण मिला है।

आत्मा और ईश्वर को मिलाने वाली, सब पापों को हरने वाली और निर्मल प्रकाश देने वाली गायत्री को प्रणाम है।

--पिप्पलाद

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गायत्री मंत्र व मेरा अनुभव।

(चौधरी अमरसिंह, इन्दोरा, काँगड़ा)

मेरा अनुभव बहुधा पाठकों को अनोखा प्रतीत होगा, परन्तु सत्य लिखना व सत्य का प्रचार करना अच्छी बात है इस कारण बिना किंचितमात्र बढ़ाये घटाये सच्ची घटनायें लिखी जाती हैं। मेरी आयु इस वक्त 50 वर्ष से ऊपर है। बचपन से ही मुझे आध्यात्मिक विद्याओं का बड़ा शौक था 10 वर्ष की आयु में मैं मैस्मरेजम के बहुत से कार्य कर सकता था। पीछे तो मैं साधना द्वारा अपनी शक्ति को ओर भी बढ़ाता रहा। मैंने ईश्वरी शक्ति की प्रणव, दुर्गा बीजमंत्र, गायत्री मंत्र द्वारा उपासना की इसके द्वारा इस प्रकार लाभ हुआ कि एक बार मैं एक ऐसे स्थान पर था कि जहाँ वैद्य इत्यादि कोई न था। वह स्थान ज्वर का भंडार था कोई व्यक्ति इससे न बचता था। मुझे भी भयंकर ज्वर हुआ। परन्तु ईश्वरीय शक्ति की कृपा से शीघ्र इससे छुटकारा मिला व स्वप्न में यह बताया गया कि अमुक दिवस तुम ज्वर मुक्त हो जाओगे। चाकरी में एक बार एक दुष्ट अफसर ने बहुत तंग किया तो निज गुरुजी को वह सर्व ब्यौरा बताने पर उनके आग्रह से ईश्वरीय शक्ति से संकट निवारण की प्रार्थना की गई। प्रति दिवस 10 मिनट एक मास तक प्रार्थना करने पर बिना किसी असुविधा के उस संकट से छुटकारा मिला ईश्वरी शक्ति से बिना प्रार्थना किये भी कई बार घोर संकटों से बचने के उपायों के संकेत प्राप्त हुये। जिन पर चलने से संकटों से मैं बच गया। सबसे बड़ा व अमूल्य लाभ जो मुझे ईश्वरी शक्ति की उपासना से निष्काम भक्ति करते प्राप्त हुआ वह यह है आत्म शान्ति। मेरा मन बहुत शान्त रहता हैं।

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गायत्री का जादू

(श्रीमती चन्द्रकान्ता जेरल बी. ए., दिल्ली)

मुझे बचपन से ही गायत्री मंत्र सिखाया गया था- सो स्नान के बाद इसका 10 बार उच्चारण करने का स्वभाव हो गया था। पिताजी से ‘सत्यवादी’ होना तो सीखा हुआ था और फिर बापू की आत्म कथा से सर्व प्रेम करना निर्दोषी होना सीखा। क्युरो और नैन्हम की पामिस्टरी पढ़ कर हस्तरेखा का ज्ञान कुछ हासिल किया तो पता लगा कि मनुष्य अपने आप की बहुत कुछ हाथ देखकर अपनी भूलों का सुधार कर सकता है फिर हस्तरेखा को बदल सकता है। पता चला कि कुछ आत्म विश्वास कम है, सो दृढ़ निश्चय किया कि यह भी हासिल करना है। गायत्री मंत्र गायत्री ‘देवी’ को सूर्य में ध्यान करके पढ़ती या एक शब्द का अर्थ मन में समझ कर करती और प्रार्थना सदा ही रहती कि “विद्या, बुद्धि, भक्ति दो। जिससे देश की सेवा, लोगों की भलाई, स्वार्थ रहित होकर करूं।” मन्त्रोच्चारण भी करती पर प्रार्थना मुँह से यही निकलती ।

ऐसा एक साल किया होगा कि वाकई हस्तरेखाएं बहुत बहुत बदल गई। मेरा स्वभाव प्रकृति रहन सहन सब बदल गया। हाँ मैं प्राणायाम भी करती थी प्राणायाम एक दूसरा जादू है-पर गायत्री ने अपना रंग अकेले ही काफी दिखाया। वह यों-

मेरी माता जी बड़ी सख्त बीमार पड़ी। माता जी की टाँगें, पाँव बहुत सूजे हुए थे-बहुत दर्द होता उनके दर्द के कारण चिल्लाने की आवाज दूर दूर तक जाती हम सब बहिनों ने तीन-2 घंटे की ड्यूटी लगाई हुई थी-मैंने रात की ले रक्खी थी पर चित्त न मानता। चौबीस घण्टे ही उनके पास व्यतीत करती। जब उन्हें दर्द होता वह मुझे ही बुलाती मैं उनके पाँव को हाथों से पकड़ कर आँखें बन्द कर ‘गायत्री’ का जप शुरू कर देती। उनका दर्द जादू की तरह शान्त हो जाता। सो फिर तो जब मैं कभी सोई हुई भी होती तो माता जी यही कहती कि कान्ता को बुलाओ मैं फिर वैसे ही करती और वह शान्त हो जातीं-

उसके बाद मेरा छोटे पाँच वर्ष के भाई की पीठ और टाँग में जहरीला फोड़ा निकलने से दर्द होता। ऑपरेशन हुआ घाव में जब-2 दर्द अधिक उठता कहता मन्त्र पढ़ो-और मेरे मन्त्र पढ़ने के बाद ही शान्त होकर सो जाता-सो मुझे भी उसके शान्त होने पर अपार आनन्द मिलता। फिर तो जिस किसी के भी दर्द होता, कहीं भी कहता मेरे मन्त्र पढ़ दो-पिता जी हैरान हुए-पूछने लगे-कौन सा मन्त्र पढ़ती हो। पहले तो मैंने नहीं बताया-क्योंकि सुन रक्खा था कि बताने से मन्त्र की शक्ति कम हो जाती है। पर फिर पिता जी से तो मैं सदा ही जैसा कि उन्होंने सिखाया था, मित्र का सा सम्बन्ध रखती। सो मैंने बताया। सो यदि हम ध्यान से प्रेम से इस मन्त्र को पढ़ें तो वाकई जादू ही है।

उन दिनों तब तो मेरी इतनी आदत हो गई थी कि सोते भी यह मन्त्र मुँह में रहता-काम करते-2 भी गायत्री मन्त्र मुँह में रहता-मुझे पता भी न होता और गायत्री मन्त्र का उच्चारण होता रहता सो ‘गायत्री’ ने ‘जादू’ का ही असर दिखाया।

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दुर्भाग्य टला

(श्री पं. रामकरण शर्मा, बम्बई)

एक समय था जब मैं अच्छी तरह अपनी आजीविका चला रहा था परन्तु कुछ समय बाद ऐसे तूफान आने शुरू हुए कि काम काज भी कुछ नहीं रहा और कर्जा भी बेहद हो गया, बेकारी का सवाल सामने था, स्वतंत्र व्यापार के लिए पैसा नहीं-नौकरी कहीं रुचि के अनुसार प्राप्त नहीं हुई, तथा अनेक तरह तरह के विघ्न सामने आते रहे। विघ्न बाधाओं तथा आर्थिक परेशानियों से परेशान हो कर मैं किंकर्त्तव्यविमूढ़, हो गया। यहाँ तक कि मेरा दिमाग भी जवाब देने लगा। मैं अपने घर से बार-2 निकट के शहर में जाता-कई बड़ी कम्पनियों के प्रधानों ने वादा करके भी फिर वादा पूरा करने में असमर्थता प्रगट की।

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स्वर्गीय स्त्री द्वारा गायत्री के लिए उपदेश

(डॉ. रामनरायन भटनागर, इटौआ धुरा)

जब ऐसे रोगी को मैं औषधि देता हूँ तो औषधि को केवल 9 बार गायत्री मन्त्र से प्रभावित कर स्वयं अपने हाथ से एक हाथ रोगी के सिर पर रख कर मैं दवा छोड़ता हूँ और इसी तरह एक घूँट जल गायत्री मंत्र से प्रभावित कर पिला देता हूँ ? ऐसा अनुभव हुआ है कि 9 ही दिन उपरान्त काफी परिवर्तन जान पड़ा है, मुझे और देखने वालों को आश्चर्य ही आश्चर्य दीख पड़ा, इतना वायदा मैं ऐसे रोगियों से जरूर करा लेता हूँ, कि लेटे लेटे माला राम नाम की फेरते रहो। सात आठ रोगी तो मेरे द्वारा इस प्रकार अच्छे हुए हैं। इसके अतिरिक्त जो कुछ वेढव मसाला जब मेरे सामने होता है तो वही गायत्री माला मेरी कठिनाई को सरल करती रहती है ? और कोई अनुभव नहीं, सब कुछ आपकी किताब में जो कुछ है शब्द शब्द सत्य है। माता की साधना में ब्रह्मचर्य, शुचिता, सत्यता इन बातों का विशेष ध्यान रखा जावे।

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स्त्री और पुत्र की प्राण रक्षा

(श्री लक्ष्मीनारायणजी श्रीवास्तव बी.ए.,एल.एल.बी. कनुकुदा, हमीरपुर)

गायत्री जप का अनुष्ठान का मेरा अनुभव है वह संकटों के दूर करने के लिए सर्वोत्तम है। मेरी स्त्री के जब बच्चा पैदा होता था तब हमेशा ही सख्त बीमार हो जाती थीं और जीवन की आशा नहीं रहती थी। इस वार मैंने पहले से ही गायत्री माता से प्रार्थना करके संकल्प को लेकर जप किया फलस्वरूप इस बार कोई ऐसा घोर कष्ट नहीं हुआ और न हालत ही खराब हुई और कुछ दिनों पश्चात अच्छी होकर स्वस्थ निकली।

एक बार मेरा बड़ा लड़का जिसकी उम्र करीब 7 साल थी, मोतीझरा की बीमारी से ग्रसित हो गया। कई दिनों की बीमारी के पश्चात एक रात उसकी हालत बहुत खराब हो गई बिल्कुल बेहोशी की बात चीत करता था और जोरों से चिल्लाता था। बच्चे की दशा देखकर इतनी असहाय अवस्था का अनुभव कर रहा था कि आत्महत्या कर लूँ ताकि यह दशा न देखूँ। इसी विचार से रात के सुनसान समय में घर से निकल पड़ा और जंगल की ओर गया। सुनसान जंगल में जहाँ पर एक चिड़िया के बोलने की भी आवाज न आती थी, घबराया हुआ टहलता रहा इतने में एक कुँआ दिखाई दिया तो विचार किया कि इसी कुँआ में कूद पड़े अतः उसी ओर झपटा और कुँआ की जगत पर चढ़ गया। इसी समय गायत्री माता के शीतल हस्त कमल का ध्यान आया और रो रोकर माता से बच्चे के स्वस्थ होने की प्रार्थना करता रहा। अपनी उस दीन व असहाय अवस्था माता के सन्मुख कहता रहा। मुझे नहीं ज्ञान हुआ कि इस दशा में कितनी देर रहा जब कुछ होश आया तो अपने को उसी कुँआ की जगत में पड़ा पाया। धीरे-2 उठकर घर की ओर चला, चित्त में शान्ति थी। घर पहुँचकर देखा बच्चा सुख की नींद सो रहा है। थोड़ी देर बाद बच्चा जगा और कहा भूख लगी है। मैंने माता को कोटिशः धन्यवाद दिया और उस दिन से गायत्री माता में इतनी श्रद्धा हो गई कि आजन्म न भूल सकूँगा-

आपत्ति काल में गायत्री माता की सहायता की जितनी प्रशंसा की जावे वह सब थोड़ी है।

जप करते समय गायत्री माता के ओजस्वी स्वरूप का ध्यान अवश्य करना चाहिये। ध्यान हट जाने पर चित्त दूसरी जगह से हटाकर उसी में ध्यान जमाना चाहिये। प्रारम्भ में ध्यान हटकर अन्य साँसारिक वस्तुओं पर अवश्य चला जाता है परन्तु इससे निराश नहीं होना चाहिये। बल्कि फिर से ध्यान को माता के स्वरूप में ही लगाना चाहिये। कुछ समय के बाद धीरे धीरे ध्यान जमने लगता है और अनुष्ठान के पूर्ति के समय तक ध्यान पूर्ण स्थिर हो जाता है। फिर उसमें जो आनन्द आता है उसका वर्णन करना व्यर्थ है। क्योंकि वह तो स्वयं अनुभव करने की वस्तु है परन्तु मैं इतना अवश्य जोर देकर कह सकता हूँ कि गायत्री उपासना से सांसारिक जीवन में जो सहायता मिलती है वह अपार है। जो किसी उपाय से नहीं हो सकती वह गायत्री मंत्र की उपासना से अवश्य मिल जाता है यह अक्षरशः सत्य है। जिसे विश्वास न हो वह करके स्वयं देख लेवे।

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गायत्री पर अटूट विश्वास

(श्रीमती मेधावती देवी जी, नगीना)

गायत्री मंत्र ईश्वर उपासना के लिये मुख्य मंत्र है। मेरा तो इस पर अति अटूट विश्वास व श्रद्धा रही है मुझे बचपन की अपनी एक बात का स्मरण है अपने पास माला न होने के कारण मोटे से डोरे में 100 गाठें लगाकर मैं उसके गायत्री का जप करती थी एक दिन मेरे पिताजी ने मेरी माला देख ली और गायत्री में मेरा प्रेम समझ कर मुझे सच्चे मूंगों की माला दी थी। गायत्री जाप से मुझे ऐसा भासने लगता है मानो मैं अपने प्यारे पिता से बातें कर रही हूँ अथवा अपना कण्ठस्थ पाठ सुना रही हूँ। जब-2 मुझे आपत्तियों का सामना करना पड़ा तब-2 मैं गायत्री मंत्र द्वारा अपने प्रभु के समीप चली जाती हूँ और मुझे विश्वास होने लगता है कि अवश्य पिता मेरे दुख सुन रहें हैं और अवश्य निवारण करेंगे । एक बार नहीं अनेक बार मैं अपने पुत्र के इधर उधर फिरने और कुछ कार्य न करने से अति दुखित थी तब भी मैंने प्यारे पिता को स्मरण करके गायत्री माता की शरण ली और विधिपूर्वक इसका अनुष्ठान किया। (जिसकी विधि अखण्ड ज्योति में लिखी है) उसका चमत्कार आश्चर्यजनक हुआ जिस दिन प्रातःकाल मैं यज्ञ करने वाली थी रात्री भर यही विचार रहा कि यज्ञ में सम्मिलित होना उसका अति आवश्यक था और आत्मा से आवाज आ रही थी कि प्रातः वह कहीं से आ जावेगा प्रातः यज्ञ की तैयारी में मैं लग रही थी और उसके आने की ऐसी प्रतीक्षा लग रही जैसी सूचना आने पर लगी रहती है यज्ञ आरम्भ होने वाला था, वश देखती हूँ कि मेरा पुत्र सतीशचन्द्र आँगन में मेरे सन्मुख खड़ा है। इस प्रकार के चमत्कारिक अनुभव मुझे अनेकों बार हुए है।

प्राचीनकाल में सन्तान न होने पर पुत्रेष्टी यज्ञ किया करते थे। महाराजा अश्वपति ने सन्तानोत्पत्ति के लिये गायत्री मन्त्रों से यज्ञ किया था जिसके फल से एक कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम भी अश्वपति ने गायत्री के सदृश्य सावित्री रक्खा था। राजा जनक के जमाने में जब जनकपुरी में अकाल पड़ा और प्रजा भूखी मरने लगी तब जनकजी ने वर्षा होने के लिये गायत्री यज्ञ किया जिसके फलस्वरूप वर्षा भी हुई और सीताजी की उत्पत्ति भी हुई। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। गायत्री मंत्र का जप तथा यज्ञ करने से साँसारिक सफलता के साथ-2 हमारा ईश्वर भक्ति में भी प्रेम बढ़ता है मन के एकाग्रचित्त होने में अति सहायता मिलती है और आत्मा को एक विशेष प्रकार की शान्ति प्राप्त होती है यह आत्मशान्ति ही मनुष्य जीवन की सच्ची सफलता है।

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सर्वश्रेष्ठ और सर्व सुलभ साधना

(श्री रमेशचन्द्र जी दुबे हटा)

मैं अपनी कुटी में गायत्री की साधना किया करता था, तब मुझे बड़े दिव्य अनुभव होते थे। एक रात्रि को मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि दक्षिण दिशा से कोई सितार पर गाता हुआ मेरी कुटी के निकट आया और कुछ देर ठहर कर उत्तर दिशा की ओर चला गया। उठकर देखना चाहा तो अपने को असमर्थ पाया। शरीर ऐसा जड़ हो गया था जैसे लोहे की जंजीरों से जकड़ा हुआ हो। जब वह संगीत काफी दूर चला गया तब उठ सका वह उस समय प्रत्यक्ष दर्शन के लिए कुछ न था। उन दिनों मुझे और भी तरह-2 के अनुभव होते थे जैसे-अपने चारों ओर सिद्ध महात्मा घिरे दिखाई देना, उनके आदेश मिलना, शरीर पर बड़े सर्प चढ़ते उतरते दिखाई देना, भयंकर हिंसक पशुओं का आक्रमण होना। सुन्दरी स्त्रियों का दूषित हावभाव करते हुए मेरे निकट फिरना। इस प्रकार के विघ्नों से विचलित न होकर मैंने अपनी साधना की मंजिल पूरी कर ली।

साधना पूरी हो जाने पर अनेक प्रयोगों में मुझे आश्चर्यजनक सफलता दिखाई दी है। विषाक्त कीटाणुओं, रोग दर्द उन्माद आदि से पीड़ित व्यक्तियों को अच्छा कर देना, पथ भ्रष्टों में सुबुद्धि उत्पन्न होना, वस्तुओं का पारदर्शक दीखना आदि। मेरे लिए गायत्री की साधना सर्वश्रेष्ठ और सर्व सुलभ सिद्ध हुई है।

पुरश्चरण से जीवनोत्थान

दो वर्ष पूर्व मैंने गायत्री पुरश्चरण किया था। गायत्री मंत्र जपने में मुझे बड़ा आनन्द आता था चित भी उसमें मेरा खूब ही लगता। मैं इस कार्य को भार रूप नहीं समझता था। किन्तु मैंने गिनती से एक लक्ष सत्ताईस सहस्र जाप कर लिये थे।

गायत्री मंत्र पूर्ण रटा करता था। एक महीने के समय में मेरा चित बड़ा प्रसन्न रहा और अनेक रंग एवं प्रकाश नजर आये। जिस प्रकार अग्नि में स्फुल्लिंग उठते हैं वैसे नेत्रों के सन्मुख अनेक स्फुल्लिंग उठा करते थे और अब भी उठते हैं।

मैं यह नहीं लिखना चाहता कि गायत्री के साधन से मैंने क्या प्राप्त किया ? किन्तु मैं यह जरूर कहूँगा कि गायत्री पुरश्चरण मेरे जीवन के उत्थान का कारण अवश्य हुआ है।

स्त्री की रोग-मुक्ति और पुत्र-प्राप्ति

मेरी स्त्री संग्रहणी रोग से दो वर्ष से पीड़ित थी। अनेक औषधियों का प्रयोग किया लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। दैवयोग से अखंडज्योति के किसी अंक में गायत्री की साधना का लेख छपा था उसी के अनुकूल मैंने सवा लक्ष गायत्री मंत्र का अनुष्ठान पन्द्रह दिन में पूरा करने का संकल्प किया और पंद्रहवें दिन गायत्री मंत्र से हवन कराके ब्राह्मण भोजन कराया। अब डेढ़ वर्ष हो चुका है मेरी स्त्री पूर्ण स्वस्थ रहती है। ईश्वर की कृपा से रोग के बाद एक बालक पैदा हुआ है और मैं अगर गायत्री मंत्र से किसी को झाड़ दूँ तो वह अच्छा हो जाता है।

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गायत्री द्वारा प्राण रक्षा

(श्री शंकर लाल व्यास महेश विद्या भूषण, कसरावद)

एक समय मेरा बच्चा बीमार हुआ यहाँ तक की डॉक्टर वैद्यों ने भी हाथ टेक दिये थे। उस वक्त उस की बड़ी शोचनीय दशा थी मैंने दस हजार गायत्री जप का संकल्प कर दिया। प्रभु की कृपा से धीरे-2 उसे आराम होने लगा और भला चंगा हो गया। इसी प्रकार एक बार मैं घोड़े की सवारी से किसी ग्राम का जा रहा था। पहाड़ी प्रदेश होने के कारण विशेषकर पगडंडी की राह से जाना पड़ता है रात्रि का समय था मैं रास्ता भूलकर एक बीहड़ जंगल में जा फंसा जहाँ भटकते-2 कई घंटे व्यतीत हो गये जंगली पशुओं की यत्र तत्र आवाज सुनाई देने लगी उस समय मैंने मानसिक गायत्री जाप शुरू किया कुछ देर बाद मैं फिर आगे बढ़ा। चलते चलते एक मोटर की आवाज जैसी आहट होती हुई सुनी उस दिशा को जाने से सड़क मिल गई और उस भयंकर जंगल में मेरे प्राण बच गये।

अश्रद्ध को, अयोगियों, और अविश्वासियों को भी स्वयं अनुभव करने पर यह विश्वास हो जाता है कि गायत्री मंत्र की शक्ति साधारण नहीं है।

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जेल से छुटकारा

(श्री गुरुचरणजी आर्य विहिया)

अब तक तो मैं इसे यहीं तक सीमित रखता था। लेकिन जब मैंने ‘अखण्ड ज्योति’ में किन्हीं महानुभाव का गायत्री का चमत्कार लेख पढ़ा जो मनुष्य के भौतिक दुःखों पर भी प्रयोग करने पर तत्काल फलदायी होता है। तब लगा डूबकर गोता पर गोता लगाने और जिन जिन चीजों की प्राप्ति हुई और हो रही है उसको पाकर उसी में डूबा ही रह जाना चाहता हूँ। इस गायत्री की प्राप्ति के लिये मेरे शरीर का रोम-रोम जीवन भर ऋषि दयानन्द सरस्वती और आचार्य श्रीराम शर्मा का आभारी रहेगा।

महात्मा गान्धी का ‘भारत छोड़ो’, देश में अगस्त आन्दोलन की आँधी आकर जब चली गई तो अंग्रेजी सरकार की पुलिस मुस्तैदी निर्दोष काँग्रेस मैनों को पकड़ पकड़ कर जेलों में ठूँस रही थी। उन्हीं पकड़े जाने वालों में, एक मैं भी था। मुझ पर रेलवे गोदाम का ताला तोड़कर माल चुराने का झूठा आरोप लगाकर एक वर्ष की सख्त सजा और एक सौ रुपया जुरमाने का फैसला दिया गया। जेल आकर मैं झुझल रहा था। पुलिस वालों पर सरकारी हाकिमों पर और साथ ही अपने पर कि साल भर निर्दोष जेल में बन्द रहूँ ? पर मैं जेल की चहार दीवारियों से घिरा बाहर निकलने से रहा।

उन दिनों आरा जेल से बदल कर भागलपुर चला आया था। जेल वास में मेरे साथी तथा और लोग जहाँ कुछ खेल तमाशा करके अपना दिल बहलाने में लगे रहते थे वहाँ मैं अकेला एकान्त में बैठा जेल से बाहर जाने के लिये विशेष चिन्तित रहता था। मैं जिस वार्ड में रहता था उसके पास ही से जेल की ऊँची दीवारों को लाँघकर लंगूरों का एक बड़ा दल भीतर आता। जूठी रोटी भात खाकर फिर ऊँची दीवारों को सुगमता पूर्वक लाँघकर बाहर चला जाता। मैं उन लंगूरों और ऊँची दीवारों को बड़े गौर से देखता।

भागनपुर आये अभी कुछ दिन हुए थे। जेल मुझे असह्य प्रतीत हो रहा था और तब मैं मुक्ति ही के लिये विशेष रूप से गायत्री को जपने में लग गया। सुबह, शाम स्नान के बाद, अपने वार्ड के पीछे एकान्त में कम्बल पर आसन लगा बैठ जाता और घन्टों गायत्री जपता, फिर अकेले उसी में लीन रहता। यह सिलसिला अभी पूरा एक महीना भी नहीं चल पाया था कि जेल के चपरासी ने एक दिन आकर सूचना दी कि आपको जमानत पर रिहाई के लिये आज ही तार द्वारा आदेश आया हैं। मैं स्वयं आश्चर्य से चकित हो गया। मेरे सामने गायत्री का वद साहाय्य मूर्तिमान हो उठा। मैंने भक्तिपूर्ण उसे प्रणाम किया जेल से विदा हो घर आने पर एक रोज जज साहब के इजलास में हाजिर हुआ। अन्त में मैं जेल से पूर्णतया छुटकारा पा गया।

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निराशा में आशा

(श्री प्रकाश नारायणजी मिश्रा, मुन्द्रावज)

मुझे 10 वर्ष की अवस्था में गायत्री मंत्र की दीक्षा दी गई थी और तभी से मैं इस महा मंत्र की साधना करता हूँ मैंने इसका लाभ स्वयं आँखों देखा है। मेरे विद्यार्थी जीवन का अनुभव है कि मैं कक्षा 10 में अध्ययन करता था कि दैवी कुचक्र से छमाही परीक्षा के समय मेरे परिवार के आधार मेरे ताऊजी का स्वर्गवास हो गया। परीक्षा न दे सका और इसके 3 माह बाद ही मेरे पिताजी का देहान्त हो गया। मेरे अध्ययन में महा संकट उपस्थित हुए जब मेरे पिताजी का देहान्त हुआ वार्षिक परीक्षा के केवल 25 दिन रह गये थे। परन्तु मैं इसी महा मंत्र के विश्वास पर डटा रहा पिताजी की क्रिया समाप्त कर परीक्षा देने गया सफल होने की कोई आशा न थी पर परीक्षा के पश्चात ग्रीष्मावकाश में मैंने इस महामंत्र की साधना बढ़ा दी और इसी के प्रभाव से मैं परीक्षा में सफल हो गया।

इसके पश्चात मैंने जितने भी कार्य इस मंत्र के विश्वास पर किये अभी तक सफल होते गये हैं।

मेरे एक पितामह थे उनको गायत्री का ही इष्ट था। एक बार वे शत्रुओं के कुचक्र में पड़ गये थे और शत्रु उनको जेल भिजवाने का प्रयत्न कर रहे थे परन्तु सवा लक्ष महा मंत्र के जप से वे इस कुचक्र से बच गये और उनका शत्रु नष्ट हो गया यह मेरे आँखों देखा अनुभव है। वे प्रति दिन 10 माला जपा करते थे उनका देहान्त अभी 3 अप्रैल 48 को हुआ है, मृत्यु पर्यन्त भी उनके मुख की आभा ऐसी जान पड़ती थी मानो हँस रहे हैं। इस महामंत्र के विषय में जितना लिखा जावे कम है।

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दिव्य तेज का दर्शन

(श्री वासुदेव पाँडे, कन्नौज )

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प्रेतात्मा का शमन

(पं0 धारादत्तजी शास्त्री, वेदान्ताचार्य, वाराणसी काशी)

कुँए पर आकर ब्रह्मचारीजी ने जल से मण्डल बनाकर मुझे बैठा दिया और स्वयं नित्य-नियमों में लग गये।

मैंने सुस्पष्ट देखा कि वह प्रेतात्मा कभी मुख से कभी शिर से भयंकर अग्निज्वाला फेंकता है। कभी मनुष्य, कभी हिंसक जन्तु बनकर भयोत्पादन करता है। यह भ्रम नहीं था, सत्य घटना थी और करीब 1-1॥ घन्टे तक, वह अपना अनेक प्रकार का प्रदर्शन करता रहा।

क्षणिक घटना में भ्रम हो सकता है। इतने समय तक होने वाली घटना को कैसे भ्रम मान सकते हैं। वह भी तब जब हम पूर्ण होश में बुद्धि पूर्वक अध्ययन करें। जब मैंने बाबा से पूछा कि वह कौन था, तब उन्होंने कह दिया वह प्रेतात्मा था हम लोगों से छेड़ना चाहता था। हमने पूछा कि आप से कुछ न कह सका, तब उन्होंने कहा कि बेटा यह गायत्री मंत्र का प्रभाव है। ऐसे-2 अनेक भी आवें तो हमारा कुछ न बिगाड़ सकेंगे। तब उन्होंने कहा कि जब तुम्हारा जनेऊ करायेंगे तब वह मंत्र तुम्हें देंगे।

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जप मात्र से रोग मुक्ति

(डॉ. रामकृष्ण आर्य, लखनऊ)

गायत्री की साधना को निरन्तर कई महीने तक किया अरसा 14 मास का हुआ। अतः अपना रोज का कर्म है प्रातः सायं दोनों समय गायत्री का जाप। कोई नियम संख्या नहीं है। दिन में किसी समय भी मन में चिन्तन रहता है या गुनगुनाया करता हूँ।

अब कोई भी दुख महसूस नहीं होता गायत्री ध्यान में रहने से दुख भूला रहता है। किसी भी अकस्मात घटना के घटने से घबराहट पैदा नहीं होती। मेरा साहस बहुत बढ़ गया है।

हमारे एक मित्र हैं पं0 जीवनलाल अवस्थी महानगर, लखनऊ। उनके गाँव में बीमारों की सेवा का सौभाग्य हमें प्राप्त है। वहीं पर एक स्त्री को सात मास का गर्भ था। उस कठिन रोग ग्रस्त हुई का केस मेरे ही हाथ में था। जब मैं रात को 10 बजे हालत देखने गया तो दाँती बंध गई थी कोई उपचार न करके मैंने गायत्री जप करना शुरू किया। आधे घंटे बाद देखा तो मरीज का टेम्परेचर 100 था। दाँती खुल चुकी थी रोगिणी अच्छी हो गई ऐसे ही और भी कई रोगियों पर गायत्री के चमत्कारिक प्रयोग हुए उनकी कितनी ही कठिनाइयों में सहायता भी करता हूँ।

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स्वस्थता और सात्विकता

(श्री डाह्याभाई रामचन्द्र मेहता, अहमदाबाद)

मुझे गायत्री माता की उपासना में बहुत लाभ हुआ है। गायत्री उपासना ही मेरा नित्य नियमित विधान है। मैंने गायत्री उपासना का यथा शक्ति प्रचार भी किया है जिससे बहुत लोगों ने लाभ उठाया है। कई आदमियों को गायत्री उपासना का यथा शक्ति प्रचार भी किया है जिससे बहुत लोगों ने लाभ उठाया है। कई आदमियों को गायत्री उपासना से स्वप्न द्वारा उनके प्रश्नों के साफ साफ उत्तर मिले हैं। अनेकों को गायत्री द्वारा मनोवांछित लाभ हुए हैं।

श्री गायत्री माता की कृपा से मेरी आयु 77 वर्ष होने पर भी शरीर अच्छा है। मन, वाणी, कर्म सब में स्वस्थता और सात्विकता है और सब कार्य अच्छी तरह चल रहा है।

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गायत्री साधना से भाग्योदय

(पं0 भूरेलाल ब्रह्मचारी, वैद्य, हर्रई, छिंदवाडा)

स॰ 1815, 16 का जिक्र है कि पं0 नर्मदाप्रसाद शास्त्री भदरस, कानपुर के रहने वाले थे भाग्यवश हर्रई के राज मंदिर में आकर पुजारी हो गए थे, उनकी उद्भट विद्युत्ता पर मैं मुग्ध हो गया, और उनसे विनय की कि मैं इस वक्त निठल्ला हूँ व्यर्थ आ आकर आपका समय बर्बाद किया करता हूँ, कोई ऐसा उपाय बताइए कि मेरा लोक परलोक दोनों बनें। उन्होंने कृपाकर मुझ से कहा कि गायत्री का जप किया करो मैंने उनके आदेशानुसार गायत्री पूजन शुरू किया और सवा लाख गायत्री का मंत्र जपने का संकल्प किया, दिन रात में जब निश्चित होता था उसी वक्त स्नान कर साधना करता था, जितने दिन मैंने साधना की उतने दिन एक प्रकार का उल्लास सा मेरे दिल में बना रहता था और आनन्द मय दिन व्यतीत करता था।

इसके बाद ही मैं रोजी से लग गया पं0 जी का कहना मुझे अच्छी तरह याद है कि जो भी कुछ निश्चय हो गया है उसका फल अवश्य मिलेगा। रोजी से आज तक उत्तरोत्तर मेरी वृद्धि होकर धन-धान्य से परिपूर्ण हूँ । जिस कार्य में हाथ डालता हूँ उसी में भगवान की दया से सफलता हुई और होती जाती है। अनेक तरह के संकटों का निवारण आप ही आप हो जाता है इतना तो अनुभव मेरे खुद का गायत्री मंत्र जप करने का है।

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गायत्री की कृपा से प्रिंसिपल बना

(पं0 लक्ष्मीकान्त झा व्याकरण साहित्याचार्य, झाँसी)

गायत्री सिद्ध श्री काठिया बाबा

वृन्दावन में कुछ ही समय पूर्व एक परमसिद्ध महात्मा हुए हैं, जिनका पूरा नाम तो महात्मा रामदास था। पर काठ की कोपीन लगाने कारण उन्हें काठिया बाबा कहा जाता है। उन्हें अपनी साधना का वर्णन इस प्रकार किया है-

“विद्याध्ययन करने के अनन्तर मैं पितृगृह में लौट आया। मुझे सब से पहले गायत्री मन्त्र को सिद्ध करने की इच्छा हुई। हमारे ग्राम अन्त भाग में एक स्थान पर एक विशाल वट वृक्ष था, यह वृक्ष हमारे पिता के बगीचे के समीप था। मैंने गायत्री मन्त्र का शाप, शापोद्धार और कवच आदि यथा विधि सीखकर उस वट वृक्ष के नीचे बैठकर और विधि विधान के साथ गायत्री मंत्र का जप करना आरंभ कर दिया सवा लक्ष जप करने से यह मंत्र सिद्ध होता है यह जानकर मैंने इसी मात्रा में जाप करना निश्चित किया और एकान्त मन से जप करना आरंभ कर दिया। जब कि एक लक्ष जप पूरा हो गया और पच्चीस हजार जप करना शेष रहा तभी अकस्मात् आकाशवाणी हुई उस वाणी ने मुझे इस तरह आदेश दिया-बच्चे तुम शेष का पच्चीस हजार जप ज्वालामुखी पर जाकर पूर्ण करो। इस तरह करने पर मुझे सिद्धि मिलेगी।

इस आकाशवाणी को सुनने के पश्चात् मैं खूब उत्साहित हुआ और शीघ्र ही ज्वालामुखी की तरफ चल दिया। मेरे भाई का एक बेटा जो समवयस्क था, मेरा बड़ा सहचर था, वह मेरे साथ हो लिया। ज्वालामुखी और हमारे पिता के घर में 30-40 कोस की दूरी का अन्तर है। रास्ते में ही हमें एक तेजपुँज महात्मा मिले उन्हें देखकर मैं उनकी ओर आकर्षित हुआ और मैंने उनसे वैराग्य की दीक्षा ले ली। मेरा साथी जो मेरा भ्रातृ बेटा था उसने वैरागी होने से मुझे रोका परन्तु मैंने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया तब वह घर लौट गया और पिता को लिवा लाया। मेरे संन्यासी हो जाने का उन्हें दुःख हुआ और वे गृहस्थ में लौट आने के लिए कहने लगे। डर और भय भी दिखाया जब वे सफल न हुए तो मेरे गुरुजी को कहकर मुझे अपने गाँव ले आये। वहाँ मैंने अपने उसी वट वृक्ष के नीचे आसन लगाया जहाँ कि पहले गायत्री की साधना की थी। उसी रात हठात् आकाशमण्डल का भेदन करती हुई गायत्री देवी आविर्भूत हुईं और बोलीं-“वत्स, मैं तुम्हें सिद्ध हो गई। अब तुम्हें और अधिक जप करने की आवश्यकता नहीं। मैं प्रसन्न हूँ, तुम वर माँगो।” मैंने यथा-विधि अभिवादन पूर्वक कहा-माता, मैं इस समय साधु हो गया हूँ, मैंने संसार छोड़ दिया है, अब कोई वासना नहीं है। इस समय किसी भी वर को माँगने की आवश्यकता नहीं है। तुम मेरे ऊपर प्रसन्न रहो, यही मेरा वर है। देवी एवमस्तु कहकर अन्तर्ध्यान हो गई ।”

गायत्री की सिद्धि प्राप्त कर लेने के अनन्तर ऐसा कुछ भी शेष नहीं था जो काठिया बाबा को प्राप्त न हो। उनको दूर दृष्टि प्राप्त थी, वे कहीं भी कोई भी बात जान लेते थे और यदि उनके शिष्यों पर संकट आता तो वे उसे दूर भी कर देते। वाक् सिद्धि तो बड़ी विलक्षण थी। प्रायः जो महापुरुष होते हैं वे अपने आपको छिपाये रखते हैं। बाबाजी में आत्मगोपन की अलौकिक शक्ति थी। द्रव्य का अभाव तो कभी देखा नहीं गया यहाँ तक कि उनके परिचारकों को आश्चर्य होता था। बाबाजी काठ की लंगोटी लगाते थे, उनके परिचारक समझते कि बाबाजी ने बहुत सी अशर्फी जमा कर लीं हैं और वे वहीं रखते हैं और इसीलिए वे काठ की लंगोटी लगाये हैं। उनके परिचारकों ने उन्हें तीन बार विष-संखिया-और सो भी एक साथ दो दो तोला तक, लेकिन फिर भी उसका उन पर विशेष असर नहीं हुआ ।

इन्द्रिय जय की शक्ति तो उनकी गजब की थी, उन्हें कई बार-कई स्त्रियों ने गिराने की कोशिश की परन्तु किसी को सफलता नहीं मिली।

उनका आत्मतेज इतना बढ़ गया था कि कोई भी उनके सामने नहीं ठहर पाता था, जहाँ वे जाते बड़े से बड़े तक सब उन्हें आत्म समर्पण कर देते ।

अकेली गायत्री की साधना ने ही उन्हें महान सिद्ध बना दिया था। वे करने और न करने प्रत्येक कार्य को करने की शक्ति रखते थे और इसे उन्होंने कई बार अपने भक्तों के कल्याण के लिए प्रकट भी किया। लेकिन वे विज्ञापन और प्रसिद्धि से हमेशा ही दूर रहे। अपनी सिद्धता का कभी उन्होंने प्रदर्शन नहीं किया।

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प्रतिष्ठा और सम्पन्नता चौगुनी

(पं. तुलसीराम शर्मा, वृन्दावन)

“लगभग 10 वर्ष हुए होंगे। श्री उड़िया बाबा की प्रेरणा से हाथरस निवासी लाला गणेशीलाल जी ने गंगा किनारे कर्णवास में चौबीस लक्ष गायत्री का अनुष्ठान कराया था। उस समय से गणेशीलाल जी की आर्थिक दशा दिन दिन ऊँची उठती गई और अब उनकी प्रतिष्ठा तथा सम्पन्नता उस समय से चौगुनी है। मैं उस अनुष्ठान में मौजूद था।”

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आर्थिक कष्ट की निवृत्ति

(पं. हरिनारायण शर्मा काव्यतीर्थ, प्रतापगढ़)

मेरे एक निकट संबंधी ने एक महात्मा से काशी में धन प्राप्ति का उपाय पूछा। महात्माजी ने उपदेश किया कि 4 बजे प्रातःकाल उठकर शौचादि से निवृत्त होकर स्नान संध्या के बाद खड़े होकर हजार गायत्री जप नित्य किया करो। उसने ऐसा ही किया, फलस्वरूप उसका आर्थिक कष्ट दूर हो गया।

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अधूरी साधना में भी दिव्य अनुभव

(पं. रूपलाल शर्मा, विद्यारत्न, कानपुर)

एक समय था जब मेरे मन में गायत्री सिद्धि की बड़ी भारी अभिलाषा रहती थी। मैं पंडितों से पूछता तो कोई कहता कलियुग में गायत्री की सिद्धि होना बड़ा मुश्किल है, कोई कहता गायत्री को शाप लगा हुआ है इससे वह निष्फल होती है। कोई कहता सिद्धि करना हँसी खेल नहीं है, उल्टा परिणाम हुआ तो लेने के देने पड़ जायेंगे। इस प्रकार के निराशा उत्पन्न करने वाले आदेश सुनकर भी मेरा उत्साह ठंडा नहीं हुआ। मैं गायत्री विज्ञान के अनुभवी गुरु की खोज में लगा ही रहा।

एक बार की अचानक भेंट में एक दक्षणात्म सज्जन सोमनाथजी ने मुझे ग्वालियर में गायत्री विद्या के अनुभवी गुरु का पता बताया। मैं उनके पास ग्वालियर पहुँचा। उन्होंने कृपा पूर्वक अनुष्ठान की सारी विधि मुझे सविस्तार समझा दी और काशी जाकर साधना करने का आदेश किया। नियत विधि-विधान के साथ मैंने काशी के मणिकर्णिका घाट पर अनुष्ठान आरम्भ कर दिया। ग्यारहवें दिन से ही मुझे दिव्य से अनुभव होने लगे। स्वप्न में मुझे एक दिव्य मूर्ति देवी के दर्शन होते वह मुझसे कुछ कहती, उसके होंठ हिलते, पर मेरी समझ में कुछ न आता। यह स्वप्न बार -बार दिखाई दिया। देवी की वाणी अधिक स्पष्ट होती जाती थी ऐसा लगता था कि बहुत जल्द मैं उस वाणी को समझ सकूँगा।

पच्चीसवें दिन मैं घाट पर बैठा जप कर रहा था कि अचानक सफेद गैस की तरह एक भारी प्रकाश चमका, उससे मैं घबराकर हक्क वक्क सा रह गया। मेरी आंखें मुँद गई। अधिक न देख सका। उसी रात्रि को मैंने स्वप्न देखा कि एक शुभ्र वस्त्र धारी तेजवान ब्राह्मण मुझसे कह रहा है कि तुम अपने घर चले जाओ-वहाँ जरूरी काम है। मेरी नींद खुल गई और स्वप्न के संबंध में सोचने लगा।

दूसरे दिन सवेरे ही मुझे तार मिला तुम्हारे पिता सख्त बीमार हैं घर चले आओ। मैं अनुष्ठान अधूरा छोड़कर घर चला गया। नई परिस्थितियाँ आईं, नई जिम्मेदारियों में फँसा। अनुष्ठान अधूरा का अधूरा रहा। सोचता हूँ कि उसे फिर आरंभ करूं। थोड़े ही दिन की साथ में मुझे जो दिव्य अनुभव आये उनके आधार मेरा विश्वास है कि पूरी साधना करने वालों को अवश्य ही आशाजनक लाभ होगा।

“अखंडज्योति” के नये ग्राहकों को सूचना

साधारणतः प्रत्येक मासिक पत्रिका के ग्राहक उस मास से बनाये जाते हैं जिस मास से कि उसका वर्ष का आरंभ होता है। “कल्याण” आदि पत्रों का यही नियम है। अखंड ज्योति का वर्ष जनवरी से आरम्भ होता है इसलिए जो सज्जन नये ग्राहक बनते हैं उन्हें जनवरी से लेकर चालू मास तक के अंक भेज दिये जाते हैं और दिसंबर तक शेष अंक बराबर पहुँचते रहते हैं।

“अखंड ज्योति” खबरें छापने वाला अखबार नहीं है जो दूसरे ही दिन रद्दी हो जाय उसका अंक एक प्रकार की पुस्तकें हैं जो कभी पुरानी नहीं होते। पर जिन्हें विशेष आग्रह हो वे लिख दें कि हम चालू मास से ग्राहक रहना चाहते हैं। उनके वैसी व्यवस्था कर देने का भी हम किसी प्रकार प्रयत्न करेंगे ही पर कई सज्जनों की माँग और भी विचित्र होती है वे न तो वर्ष के आरंभ से ग्राहक बनना चाहते हैं न चालू से। वरन् मई या अप्रैल से ग्राहक बनने का आग्रह करते हैं। ऐसी माँगों को पूरा करने में हम सर्वथा असमर्थ हैं।

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क्षमा प्रार्थना

(लेखक -पं. श्री रमाशंकरजी मिश्र ‘श्रीपति’)


क्षमा प्रार्थना

(1) न मंत्रों को जाना नहिं यतन आती स्तुति नहीं, न आता है माता तब स्मरण आह्वन स्तुति ही, न मुद्राएं आती जननि? नहिं आता विलपना , हमें आता तेरा अनुसरण ही क्लेशहर जो।

(2) न आती पूजा की विधि न धन आलस्ययुत मैं, रहा कर्तव्यों से विमुख चरणों में रति नहीं, क्षमा दो हे माता? अयि सकल उद्धारिणि शिवो कुपुत्रों को देखा कबहुँक कुमाता नहिं सुनी

(3) धरित्री में माता सरल शिशु तेरे बहुत हैं, उन्हीं में तो मैं भी सरल शिशु तेरा जननि हूँ, अतः हे कल्याणी समुचित नहीं मोहि तजना , कुपुत्रों को देखा कबहुँक कुमाता नहिं सुनी।

(4) जगन्माता अंबे तव चरणसेवा नहिं रची, तुम्हारी पूजा में नहिं, प्रचुर द्रव्यादिक दिया, अहो! तो भी माता तुम अमित स्नेहार्द्र रहतीं, कुपुत्रों को देखा कबहुँक कुमाता नहिं सुनी।

(5) सुरों की सेवाएँ विविध विधि की, हैं सब तजी, पचासी से भी हे जननि वय बीती अधिक है, नहीं होती मुझपर कृपा तो अब भला , निरालंबी लंबोदर-जननि जाएँ हम कहाँ ?

(6) मनोहारी वाणी अधम जन चाँडाल लहते, दरिद्री होते हैं अभय बहु द्रव्यदिक भरे , अपर्णे?, कर्णों में यह फल जनींके प्रविशता अहो! तो भी आती जपविधि किसे है जननि हे!

(7) चिताभस्मालेपी गरल अशनी दिक्पट धरे,

जटाधारी कंठे भुजगपति माला पशुपति, कपाली पाते हैं इह जग जगन्नाथपदवी, शिवे! तेरी पाणिग्रहण परिपाटी फल यही।

(8) न है मोक्षाकाँक्षा नहिं विभववाँछा हृदय में, न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छा अब नहीं, यही याँचा मेरी निज तनय को रक्षित करो

मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानी जपति जो।

(9) नाना प्रकार उपचार किए नहीं हैं, रूखा न चिंतन किया वचसा कभी भी, श्यामे ! अनाथ मुझको लख जो कृपा हो, तो है यही उचित अंब! तुम्हें सदा ही ।

(10) आपत्ति से व्यथित हो तुमको भजूँ मैं , करो कृपा हे करुणार्णावे! शिवे !! मेरे शठत्व पर आप न ध्यान देना, क्षुधा तृषार्ता जननी पुकारते।

(11) जगदंब विचित्र यह क्या, परिपूर्ण करुणा यदि करो, अपराध करे तनय तो, जननी नहिं अनादर करे ।

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*समाप्त*