गायत्री का अतुलित महत्व।

गायत्री चैव वेदाशच ब्रह्मखा तोलितापुरा। वेदेम्पश्च चतस्त्रेभ्यो गायेर्त्यति गरीयसीं॥ − षृ पाराशर स्मृति

प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने गायत्री को वेदों से तोला, परन्तु चारों वेदों से भी गायत्री का पल्ला भारी रहा।

नास्ति गंगा संम तीर्थ न देवः केशवात्परः। गायर्त्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति॥ − वृ पो याशवल्क

गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं। केशव से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं। गायत्री से श्रेष्ठ कोई जप न अब तक हुआ न आगे होगा।

गायर्त्या परमं नास्ति दिविचेह न पावन्। हस्तत्राणप्रदा देवी पतताँ नरकार्णये॥ − शंखस्मृति।

नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़ कर बचाने वाली, इस पृथ्वी और स्वर्ग में गायत्री के समान पवित्र वस्तु और कोई नहीं है।

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गायत्री के चौबीस अक्षर।

गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों के साथ अनेक कारण जुड़े हुए है। इसके साथ कई चौबीस रहस्यों का सम्मिलन है। नीचे कुछ ऐसे ही चौबीस अक्षरों के हेतु बताये जाते है−

(1) संसार की समस्त विद्याओं के भण्डार 24 महाग्रन्थ है। 4 वेद, 4 उपवेद 4 ब्राह्मण 6 दर्शन और 6 वेदांग इस प्रकार चौबीस हुए। तत्वज्ञों का ऐसा भी मत है कि गायत्री के एक 2 अक्षर से यह एक एक ग्रन्थ बना है। गायत्री के गर्भ में इन 24 ग्रंथों का मर्म छिपा हुआ है। गायत्री का मर्म इन 24 ग्रंथों में वर्णित है जो गायत्री का विस्तृत रहस्य जानना चाहे वे इन 24 महाग्रन्थों को पढ़कर उकसा मर्म समझ सकते है।

(2) हृदय जीवन का और ब्रह्मरंध्र ईश्वर का स्थान है। हृदय से ब्रह्मरंध्र 24 अंगुल देर है। एक एक अखर से एक एक अंगुल की दूरी को करके जीव गायत्री द्वारा ब्रह्म में लीन हो सकता है ऐसा योगी लोग कहते है। गायत्री के 24 अक्षर यह देते है संकेत करते है कि ईश्वर जीव से, हृदय मस्तिष्क से 24 अंगुल दूर है। हृदय में ईश्वर रहता है और मस्तिष्क में मन। अपने मन को ईश्वर के अर्पण कर दो तो कल्याण की प्राप्ति हो जाएगी।

(3) गायत्री के तीन विराम होते है, शरीर के भी तीन भाग है/प्रत्येक भाग के अंतर्गत आठ अंग होते है इस प्रकार शरीर रूपी गायत्री के 24 अक्षर हो जाते है। (अ) शिर, नेत्र, कर्ण प्राण =8 अक्षर (अ) मुख, हाथ, पैर, नाक =8 अक्षर (स) कण्ठ, त्वचा, गुदा, शिश्न =8 अक्षर। यह सब मिलकर 24 हुए गायत्री 1 के दो दो अक्षरों से इन बारह प्रमुख अंगों की रचना हुई है। यह स्वभावतः पवित्र है इन्हें सदा पवित्र ही रखने का प्रयत्न करना चाहिए।

(4) शरीर की सुषुम्ना नाड़ी में 24 कशेरुकाएं है (ग्रीवा में 7, पीठ में 12, कमर में 5=2) से कशेरुकाएं प्राणों का, मातृकाओं का ग्रन्थियों का और चक्रों का पोषण करने वाली है। यह पोषण गायत्री कहा जाता है और इन 24 कशेरुकाओं को 24 अक्षर कहते है।

(5) शरीर में प्राण सूत्र 24 है गायत्री में 24 अक्षर है। गायत्री का एक एक अक्षर सूक्ष्म शरीर के लिए उतना ही महत्व पूर्ण है जितना कि स्थूल शरीर के लिए ये 24 प्राण सूत्र है।

(6) शरीर में 5 ज्ञानेन्द्रियाँ 5 कर्मेंद्रियां 5 प्राण, 5 तत्व और 4 अन्तःकरण है। इन 24 के द्वारा ही शरीर जीवित रहता है। हमारे आध्यात्मिक शरीर में गायत्री की 24 शक्तियाँ इसी प्रकार ओत प्रोत है।

(7) गायत्री साधना से अष्ट सिद्धि, नव निद्धि और सात शुभ गतियों की प्राप्ति होती है यह 24 महीन लाभ गायत्री के अंतर्गत है।

(8) इस मंत्र में 24 ऋषियों और 24 देवताओं की शक्तियों की शक्तियाँ सन्निहित है (देखिए−गायत्री तंत्र)

(9) साँख्य दर्शन में वर्णित 24 तत्वों से सृष्टि का क्रम चलता है। उन 24 का प्रतिनिधित्व गायत्री के 24 अक्षर करते है।

(1) शरीर में प्रधानतः 24 अंग है। उसके प्रत्येक तृतीयाँश में भी 24−24 टुकड़े है। शरीर के तीन भाग है। शिर, धड़ और पैर। इन तीनों भागों में से प्रत्येक में 24−24 अवयव है। इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर में 24 तत्व है। इन दोनों शरीर के अवयवों की सृष्टि 24 अक्षर वाली गायत्री से होती है। ब्रह्म पुरुष के शरीर के 24 भाग गायत्री के 24 अक्षर है।

इस प्रकार के और भी अनेकों कारण है जो गायत्री के 24 अक्षरों का हेतु है। प्रत्येक अक्षर के पीछे बड़े बड़े महान् तत्व है जिसका विस्तृत वर्णन अन्यत्र करेंगे।

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साधना के चार नियम।

ब्राह्मे मुहूर्ते प्राच्यस्यों मेरुदण्ड प्रतन्यहि। पज्ञासनं समासीनः सन्ध्या वन्दन माचरेत्॥

(ब्राह्मे मुहूर्ते) ब्राह्म मुहूर्त में (प्राच्यास्याः) पूर्वभिमुख होकर (मेरुदंडं) मेरुदंड को (प्रतन्य हि) तानं कर अर्थात् सीधा कर (पऽसनं समासीनः) पऽसनं पर बैठ कर (सन्ध्या वन्दनं ) सन्ध्या वनदन (आचरेत्) करे।

गायत्री अभिनन्दन के लिए चार बातें भली प्रकार समझ लेने की है। क्यों कि इन नियमों के बिना किया हुआ साधन समुचित फल उत्पन्न नहीं करता। कोई कार्य कितना ही उत्तम, लाभ दायक और सुलभ क्यों न हो पर उसे यथा नियम करने से ही सफलता होती है। भोजन करना, जल पीना, स्नान, चलना फिरना, लेटना, बैठना, साँस लेना, पलक मारना, मल मूत्र त्यागना जैसे साधारण दैनिक कार्यों को भी यदि उनके नियत विधि विधान के साथ न दिया जाए तो उस अव्यवस्था के कारण भयंकर परिणाम उपस्थित हो सकते है। हर कार्य की एक प्रणाली होती है, अपने निर्धारित मार्ग पर चलने से सब वस्तुएं उपयोगिता प्रकट करती है, अवरोध की दशा में उन्हीं से भारी विपत्ति उत्पन्न हो सकती है। रेल गाड़ी अपनी पटरी पर चलती है, यदि पटरी हटा दी जाए और खेत खलिहानों में होकर चाहे जिधर उसे चलाया जाए तो रेलगाड़ी का स्तंभ यात्रियों को न मिल सकेगा। पर्वतों से निकल कर एक विशाल जल राशि नदियों के मार्ग से चलती हुई समुद्र तक पहुँचती रहती है। यदि उस जल को नियत मार्ग से जाने देने की अपेक्षा चाहे जहाँ होकर बहाया जाए तो उससे जल प्रलय के दृश्य उपस्थित हो सकते है। आकाश में असंख्यों ग्रह नक्षत्र अपने अपने मार्ग पर अतीत काल से द्रुतगति के साथ दौड़ते हुए अपना महान अस्तित्व बनाये हुए है वे अपनी विधि−व्यवस्था छोड़ दें और चाहे जिधर, चाहे जिस गति से दौड़ने लगे तो वे आपस में टकरा टकरा कर महा प्रलय उत्पन्न कर दें।

सृष्टि का प्रत्येक कार्य एक निर्धारित क्रिया प्रणाली से चलाता है, उस व्यवस्था में गड़बड़ी हो जाने से विपन्न अवसाद पैदा होती है प्रत्येक साधना की भाँति गायत्री साधना के संबंध में भी यही बात है। उसे नियमानुसार करने से ही लाभ प्राप्त होता है। अविधि पूर्वक करने से अन्य साधनाओं की भाँति वेद माता गायत्री कोई भयंकर अनिष्ट तो उपस्थित नहीं करती पर उसके लाभ से बंधित ही रहना पड़ता है। यह समय और श्रम की व्यर्थता भी एक हानि ही है इसलिए गायत्री साधकों को उन चार बातों को भली प्रकार समझ लेना चाहिए जो इस साधना के लिए आवश्यक है।

पहली बात यह है कि साधना को ब्राह्ममुहूर्त में करना चाहिए। सूर्योदय से एक घंटा पीछे तक ब्राह्ममुहूर्त रहता है। यह परम सात्विक शाँति दायक, चैतन्यता पूर्ण तथा दिव्य वातावरण से युक्त होता है। प्राणी रात्री में निद्रा लेकर अपनी थकान मिटाते है और विश्राम के द्वारा शक्ति संचय करके प्रातःकाल चैतन्य उठते है, उस समय हर एक के मन में स्फूर्ति, ताजगी एवं स्थिरता होती है। उस दशा में जो भी कार्य किया जाता है बहुत उत्तम होता है। जिस प्रकार प्राणी रात्रि में विश्राम लेकर सबेरे सक्षम हो जाते है उसी प्रकार सृष्टि के जड़ तत्व भी रात्रि में विश्राम करने के पश्चात् नई चेतना के साथ प्रकट होते है। दिन में सूर्य की गर्मी से हर एक पदार्थ में हलचल बढ़ जाती है, वह अपने अपने क्षेत्र में दौड़ धूप करता है। रात्रि आते ही वह गर्मी की उत्तेजना घट जाती है। अन्धकार छा जाता है, स्तब्धता आ जाती है, वैज्ञानिकों का कथन है कि रात्रि में वृक्ष वनस्पति तथा अन्य जड़ कहें जाने वाले पदार्थ भी सोते है। हमारे धर्मग्रन्थ तो सदा से ऐसा ही मानते आये है इसलिए उन्होंने रात्रि में पेड़ों के पत्ते न तोड़ने, जलाशयों में हलचल उत्पन्न करने को धर्म नियमों में सम्मिलित किया है। रात्रि की निद्रा लेकर प्रातःकाल भगवान भास्कर की नवीन सूक्ष्म किरणें, एक घंटा पूर्व से ही अपनी आरीं हो जाती है। पौ फटना, बहुत देर पहले शुरू हो जाता है यह प्राथमिक प्रकाश उन सूक्ष्म किरणें का ही होता है। यह सूर्य नारायण की अग्रदूती ऊषा ब्राह्मी चेतना है, वह जड़ चेतन सृष्टि को हलके हलके सोते से जगाती है। दयामयी माता जैसे प्रातःकाल बालक को लगाकर उसे मलमूत्र से निवृत्त कराती है, हाथ मुँह धुलाकर, स्नान कराकर, नवीन वस्त्र पहना कर सुसज्जित कर देती है, उसी प्रकार भगवती ऊषा इस समस्त सृष्टि को अपने ब्रह्म स्वन्दनों द्वारा जागृत चैतन्य और प्रफुल्ल बना देती है। इस प्रफुल्लता से बन उपवनों में पुष्प खिलखिला कर हँस पड़ते हैं। पौधे हरे भरे हो जाते है, पशु किलकारियाँ मारते हुए उछल कूद मचाने लगते है, पक्षी अपने मनोरम संगीत से दिशाओं को कलरव से गुँजित कर देते हैं। कीड़े मकोड़े अपने बिलों में से मुँह चमका कर इस नव चेतना का दर्शन और अभिवन्दन करते है। वायु मन्द मलय बहाता है, पृथ्वी अपनी गंध से वातावरण को सुगंधित कर देती है, जल की शीतलता चहुँओर अनुभव होती है, अग्नि का तेज, चैतन्यता वितरण करता है। अरुण प्राची दिशा को चित्र सा सुन्दर−रंग-बिरंगा चित्रित कर देता है। यह समय सब प्रकार से दिव्य है। वैज्ञानिक कहते है कि प्रातःकाल की वायु में ऑक्सीजन तथा ओनियम के प्राण प्रद तत्व अत्यधिक मात्रा में रहते है। आध्यात्मिक आचार्य कहते है कि ब्राह्ममुहूर्त में सतोगुण का प्रवाह बड़े संतोष जनक परिमाण में प्रवाहित होता है। सभी दृष्टियों से प्रातःकाल का समय सर्वश्रेष्ठ है। इस श्रेष्ठ समय का उपयोग जीवन के सर्वश्रेष्ठ कार्य में किया जाना चाहिए। ऐसा कार्य है−‘आत्मकल्याण। इससे बढ़कर और कोई महत्वपूर्ण कार्य जीवन में नहीं है। इसलिए प्रातःकाल का ब्राह्ममुहूर्त संध्यावन्दन के लिए नियोजित किया गया है। दो पहर, तीसरे पहर, रातविरात यों तो किसी भी समय भगवान का नाम ले सकते हैं− आत्म चिन्तन कर सकते है पर इस समय का महत्व निराला है। बजे तो चाहे जब बजते रहते है पर शादी, पुत्र जन्म, उत्सव आदि के समय पर बजने वाले बाजों में कुछ दूसरा ही उत्साह होता है। ब्राह्ममुहूर्त की साधना का आनंद भी कुछ ऐसा ही अनोखा है उसकी तुलना अन्यों समयों में नहीं हो सकता।

सन्ध्यावन्दन का अर्थ है−वह वन्दन जो संध्या काल में किया जाए। संध्या संधि काल को कहते है। रात्रि और दिवस का जिस समय मिलन होता है वह संधि कहलाती है और उस मिलन काल में की हुई उपासना संध्या है। प्रातःकाल और सायंकाल की, सूर्योदय और सूर्य अस्त की दोनों संध्याओं में आध्यात्मिक उपासनाओं का विधान किया गया है। पर इन दिनों में प्रातःकाल तो अत्यधिक आवश्यक है। क्योंकि उसकी श्रेष्ठता−सायंकाल की संधि से अनेक गुनी अधिक है। यदि छोड़ना हो तो सायंकाल की संध्या छोड़ी जा सकती है पर प्रातःकाल की उपासना के लाभ से तो किसी को वंचित रहना ही न चाहिए। उपासना में दूसरी जानने योग्य बात यह है कि− पूर्व की ओर मुँह करके साधन किया जाए। यह सर्वविदित है कि उत्तर दिशा में पृथ्वी का केन्द्र ध्रुव होने के कारण उधर से एक चुम्बक शक्ति प्रवाहित होती है। कुतुबनुमा यंत्र की सुई अपने आप उत्तर दिशा की ओर मुँह कर लेती है। उसे कितना ही घुमाइए सुई उत्तर में ही ठहरेगी। कारण यह है कि उत्तर ध्रुव का चुम्बकत्व उन सब पदार्थों को अपनी ओर खींचता रहता है जिसमें चुम्बकत्व शक्ति का अंश विद्यमान है। मनुष्य के मस्तिष्क में भी चुम्बकत्व शक्ति होती है यदि हम उत्तर को सिर करके सोते है तो रात्रि को मस्तिष्क चैन से नहीं बैठने पाता, उधर खिंचता रहता है और रातभर स्वप्न आते रहते है। इसीलिए कर्मकाण्ड ग्रन्थों में दक्षिण के पैर करके (अर्थात् उत्तर को शिर करके) सोने का निषेध किया गया है।

जैसा कि भौतिक चुम्बक ध्रुव उत्तर दिशा में है वैसा ही आध्यात्मिक ध्रुव पूर्व दिशा में है। सूर्य की दिशा पूर्व है। पृथ्वी पूर्व काल में जिस दिशा में थी उसे पूर्व कहते है। पूर्व की वायु में अधिक प्राण एवं चैतन्यता होती है। जब वह चलती है तो वर्षा होती है, अगणित उद्धत प्राणी उत्पन्न हो जाते है, वनस्पति जगत में नया प्राण उत्पन्न हो जाता है। पृथ्वी में भारतवर्ष को पूर्व कहा जाता है यहाँ आध्यात्मिक तत्वों की सदा से अधिकता रही है। हमारे इस सौरमंडल का केन्द्र सूर्य है जो कि पूर्व में है। समस्त सृष्टि का अध्यात्मिक केन्द्र−ब्रह्म लोक भी पूर्व में है। इसलिए आत्मतत्त्वों की अधिक मात्रा में प्राप्त करने के लिए हमें उसी दिशा में मुँह करके साधना करनी होती है। रेडियो यंत्र में लगी हुई सुई जिस दिशा की आकाशवाणी सुनने के लिए घुमा दी जाती है उधर की ही शब्दावली हम सुनने लगते है। हमारा मुख भी एक प्रकार के रेडियो की सुई है इसे जिस दिशा में घुमा देते है उस दिशा के सूक्ष्म तत्वों से हमारा सान्निध्य हो जाता है। ब्राह्ममुहूर्त में संध्या−वन्दन करने के लिए हमें पूर्व की ओर मुँह करके बैठना चाहिए जिससे ब्रह्म दिशा से प्रवाहित होकर आने वाले सूक्ष्म सतोगुणी तत्वों को हम अधिक मात्रा में ग्रहण कर सकें, उनसे लाभान्वित हो सकें।

जानने योग्य तीसरी बात है− मेरु दंड को सीधा रखना। डॉक्टर लोग बताते हैं कि शरीर की आधार शिला मेरुदंड है। यदि मेरुदंड−पीठ की रीढ़ की हड्डी−कट जाय तो मनुष्य का प्राण नहीं बच सकता। यह आधार दंड−छोटे छोटे 33 अस्थि घटकों से मिल कर बना है पर इसके भीतर बड़े बड़े आवश्यकीय तन्तुओं का गुन्थन है। मस्तिष्क की सूक्ष्म चेतनता को शरीर के अंगों से संबद्ध रखने वाली टेलीग्राफी की, विद्युत संचालन की, सारी मशीनरी इसी किले के अंदर रखी हुई है। शरीर शास्त्री मेरुदंड को महत्वपूर्ण मर्म स्थान मानते है और इनकी सुरक्षा के लिए वे सदा सीधा बैठने का आदेश करते है। मुझे 2 संदूकची कर कागज रखकर लिखा पढ़ी करने को डाक्टरों ने बुरा बताया है और मेज कुर्सी की सहायता से सीधा बैठ कर लिखा पढ़ी करने को ठीक प्रमाणित किया है। शिखा शास्त्रियों ने अध्यापकों को कड़ी हिदायतें दे रखी हैं कि विद्यार्थियों को झुककर बैठने की आदत न पड़ने दी जाय। कारण यह है झुक कर बैठने से रीढ़ की हड्डी मुड़ जाती है और इस पोले बाँस के अंदर भरे हुए तंतुओं का कार्य रुक जाता है, मोड़ पड़ने से उसमें रक्त का दौरा कम हो जाता है फलस्वरूप मानसिक चैतन्यता का संबंध शरीर से घट जाता है, यह त्रुटि स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध होती है।

स्थूल दृष्टि से, स्वास्थ्य की निगाह से, सदा कमर को सीधा रखकर बैठकर आवश्यक है। पर आध्यात्मिक दृष्टि से, विशेष कर साधना काल में तो वह अनिवार्य है। कारण यह है कि मेरुदंड में होकर इडा, पिंगला और सुषुम्ना नामक तीन नाड़ियां प्रवाहित होती है, जो मूलाधार चक्र में स्थित कुंडलिनी शक्ति तक प्राण वायु पहुँचाकर उसे रेचक कुँभक पूरक कराती रहती है। सुप्त कुंडलिनी के स्वभाविक प्राणायाम से शरीर में प्राण स्थिर रहता है मेरुदंड के मुड़ने से इस प्राणायाम में बाधा पड़ती है और प्राण निर्बल होता है। इस दोष के निवारण के लिए उचित तो यह है कि यथा संभव सदा सीधा ही रहने का प्रयत्न किया जाय पर साधन काल में तो इसकी सर्वोपरि उपयोगिता है, कुँडलिनी को पूरा प्राण पहुँचाने के लिए मेरु दंड का सीधा रखना आवश्यक है।

मस्तिष्क से लेकर गुदा मूल तक छः अध्यात्मिक चक्र शरीर में होते है जिन्हें आज्ञाचक्र, विशुद्धचक्र, अनाहतचक्र, मणिपूर चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र कहते हैं, इन चक्रों में कितनी कितनी श्रद्धुत शक्तियाँ है और उनके जागरण से किस प्रकार सिद्ध लोग अष्ट सिद्धि, नव निद्धि प्राप्त करते है इसके वर्णन तो स्वतंत्र रूप से करेंगे, यहाँ तो इतना ही जान लेना पर्याप्त होगा कि यह षट् चक्र मेरुदंड से संबंधित है। साधना काल में आत्मोन्नति के लिए जो विविध प्रकार के कर्म काण्ड किये जाते हैं उनसे इन चक्रों में निहित गुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती है और उस जागरण से आत्मबल बढ़ता है, दिव्यत्व की वृद्धि होती है और अलौकिक सम्पत्तियों का भंडार जमा होता है। यदि मेरुदंड झुका रहे, टेढ़ा रहे तो उसके भीतर होने वाली क्रिया प्रणाली पर स्वभावतः दबाव पड़ेगा और उस दबाव से शारीरिक और आत्मिक दोनों ही प्रकार की क्षति होगी। इन सब बातों को ध्यान में रखकर यह आवश्यक नियम बनाया गया है कि साधना काल में मेरुदंड सीधा रख जाय।

जानने योग्य चौथी बात यह है कि पऽसन से बैठा जाए। ब्राह्मी स्थिति में स्थित होने के लिए किस प्रकार बैठना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए योगियों को आदि काल की सूक्ष्मता तक पहुँचना पड़ा है। ब्रह्माजी ने वेद माता गायत्री से वेद का निर्माण कमल के आसन पर−पऽसन पर बैठ कर किया। इस पऽसन की दो और आकृतियाँ है क्षीर सागर में विष्णु का आसन सर्प है जो कुण्डली मारे हुए बैठा है उसके मध्य में विष्णु भगवान विराजमान है। दूसरे मनुष्य की प्राणधारिणी कुँडलिनी शक्ति भी सर्प की भाँति कुँडल बाँधे हुए अवस्थित है। कमल पुष्प स्थित ब्रह्मा, सर्प स्थित विष्णु और कुँडली धारी शंकर की स्थिरता का अनुकरण करके पैरों को उसी प्रकार कुँडल कार कमलवत् बना कर बैठना ठीक समझा गया।

नाभि से नीचे का अधोभाग वासनामय और ऊपर का भाग भावना मय माना गया है। पऽसन में पैरों को इस प्रकार मोड़ा जाता है कि नीचे के सभी वासना मय स्नायु खिंच कर बंध जाते है। महिषासुर मर्दनी का अलंकार पऽसन से लिया गया है। वासना को महिष कहा गया है। उसे पछाड़ कर उसकी छाती पर कुँडलिनी बैठती है। वासना मय अंगों स्नायुओं को ब्रह्मपाश में बाँध कर डाल दिया जाता है, पैरों को मोड़ कर इस प्रकार रखा जाता है कि पिंडलियों की नाड़ियां खिंच जकड़ और बंध जावें विघ्न कर्त्ता महिषासुर को बाँध कर पटक देने के पश्चात् निर्भयता पूर्वक निश्चिंतता के साथ साधना की जा सकती है, उसमें विक्षेप नहीं पड़ता। पऽसन के अनेक रहस्यों में से यह भी एक महत्व पूर्ण रहस्य है।

यों तो पऽसन के अनेकों प्रकार है और और उनके विनियोग भी पृथक है। पर हम अपने पाठकों को सौम्य पऽसन से बैठने की अनुमति देंगे। सीधे सीधे तरीके से जैसे भोजन करते समय पालती मार कर बैठते है जिसमें किसी अंग विशेष पर तनाव या दबाव नहीं पड़ता, जिस पर बैठने में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता उसे सौम्य पऽसन कहते है। प्रायः यही आसन सर्व साधारण के लिए उपयोगी होता है। अन्य कष्ट कारक प्रयत्न साध्य, पऽसन विशेष प्रयोजनों के लिए, खासतौर से हठयोग के लिए है।

भूमि को झाड़ बुहार कर उस पर जल छिड़के कुश का या अन्य किसी प्रकार की घास का आसन बिछावे, उस पर सौम्य पऽसन से पूर्व को मुख करके बैठे। मेरुदंड को सीधा रखें। हाथों को गोदी में रख लें अथवा उन्हें फैलाकर दोनों घुटनों पर रख लें। नेत्र अधखुले−ध्यान मुद्रा में हो, और चित्त में शाँति तथा स्थिरता रहे। इस प्रकार ब्राह्ममुहूर्त में किया हुआ संध्यावंदन सब प्रकार सफल होता है।

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साधना काल के विक्षेप।

कार्यतो यदि चोत्तिप्ठेन्मध्य एव ततः पुनः। जल प्रक्षालनं कृत्वा शुद्धै क्डैगरुपाविशेस्॥

(यदि च) और यदि (कार्यतः) किसी काम से (उत्तिष्टेत्) उठना पड़े (ततः) तो (पुनः) फिर (जल प्रक्षालनं कृत्वा) पानी से प्रक्षालन करके (शुद्धैः) शुद्ध (अंगैः) अंगों को करके (उपाविशेत्) बैठे।

कई बार साधना के समय−कारण वश बीच में ही उठना पड़ता है। मल, मूत्र, कफ, नाक आदि की शुद्धि के लिए कभी कभी बीच में उठने की आवश्यकता होती है। कुत्ते, बिल्ली, बन्दर आदि का उपद्रव, कोई वस्तु गिरना, जरूरी आदेश करना, भली हुई वस्तु उठाना, किसी आगन्तुक को आसन देना आदि कार्यों के लिए जब कोई दूसरा व्यक्ति नहीं होता और वह अपने को ही करना होता है तो उठना आवश्यक हो जाता है। वैसे ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि वहाँ तक हो सके ऐसे अवसर न आवें या कम से कम आवें, पर यदि आवें ही तो उठने के पश्चात् पुनः ज्यों का त्यों ही न बैठ जाना चाहिए, वरन् शुद्ध जल से हाथ पाँव तथा मुख धोकर आचमन करके तब आसन पर बैठना चाहिए।

बीच में विक्षेप आजाने से चलता हुआ साधना प्रवाह टूट जाता है। इस अवरोध से उसी प्रकार नियत क्रम में गड़बड़ पड़ जाती है जैसे पकती हुई देगची के नीचे की आग बुझ जाने से दाल ठंडी हो जाय और फिर दुबारा लकड़ी जलाकर उसे पकाया जाय। कुम्हार का ‘अवा’ पकने के लिए लगातार आग चाहता है, पर आधा पक कर वह ठंडा हो जाय और फिर दुबारा आग जलानी पड़े तो उसमें कुछ न कुछ दोष ही रह जाता है। इस गड़बड़ी को सुधारने के लिए कुछ विशेष प्रयत्न करने की आवश्यकता पड़ती है। सूत कातते समय तागा टूट जाय तो टूटे हुए स्थान को एक विशेष प्रकार से ऐंठ कर दोनों सिरे जोड़े जाते हैं, टूटे हुए लोहे को जोड़ने के लिए उसका विशेष संस्कार करना पड़ता है आग में तपा कर पीटना पड़ता है तब वह टुकड़े जुड़ते हैं। साधना की शृंखला टूटने पर भी एक विशेष संस्कार की आवश्यकता होती है, जिसे जल प्रक्षालन कहते है। जल शुद्धि से अवसाद चला जाता है और उत्साह जाता है। उचटा हुआ मन जल शुद्धि से पुनः शाँत एवं शीतल होकर अपने काम में लगता है और टूटी हुई साधना शृंखला पुनः जुड़ जाती है।

यदि वा साधना कालेऽसध्यायः स्यात्प्रमादतः। तदा प्रायश्चितं नूनं कार्य मन्येद्युरेव हिं। प्रायश्चितं समाख्यातं तस्मै सद्भिर्मनीषिमिः। दिन स्यैकस्य गायत्री मंत्राणामधिकं जपः।।

(यदि वा) अगर (प्रमादतः) भूल से वश (साधना काले) साधना काल में (अनध्यायः स्यात्) अनध्याय हो जावे (तदा) तो (अन्येद्यु एवं) दूसरे ही दिन (नूनं) निश्चय से प्रायश्चित करे। (तस्मै) उसके लिए (सद्भिमनीषिभिः) सत्पुरुषों ने (एकस्य दिनस्य) एक दिन के (गायत्री मंत्राणाँ) गायत्री मंत्रों को (अधिक जपः) अधिक जप करना (प्रायश्चित) प्रायश्चित (समाख्यातं) कहा है।

कभी कभी अपनी भूल से ऐसे हेतु उपस्थित हो जाते है जिनके कारण साधना की व्यवस्थित क्रिया प्रणाली में विक्षेप पड़ जाता है। रात्रि को कारण वश अधिक जागने में ऐसा हो सकता है कि प्रातःकाल देर तक सोते रहे और साधना का ब्राह्ममुहूर्त निकल जाए। कोई बीमारी उठ खड़ी होने, घर में कोई आकस्मिक घटना घटित हो जाने से, तथा किसी प्रकार की आपत्ति जनक परिस्थिति सामने आजाने से साधना में विघ्न पड़ सकता है। और कुछ समय के लिए साधन स्थगित करना पड़ सकता है। ऐसी दशा में यह नहीं समझ लेना चाहिए कि हमारा साधन खंडित हो गया।

यदि इच्छा पूर्वक किसी विशेष लाभ के लिए साधना को स्थगित रखा हो तो प्रतिदिन जितना जप करते है उतना एक दिन का जप प्रायश्चित्त स्वरूप, जुर्माने में करना चाहिए और उसे साधना पूर्ति की जप संख्या में नहीं गिनना चाहिए। कभी कभी कई दिन तक साधना बन्द रखने की स्थिति सामने आ सकती है।

ऐसी आकस्मिक स्थिति के कारण साधना में पड़े हुए विघ्न के लिए शास्त्रकारों ने एक प्रायश्चित्य बताया है वह यह कि एक दिन की छुट्टी के लिए एक हजार मंत्र अधिक जप करने चाहिए। यह एक प्रकार का जुर्माना है जो मूलधन में शुमार नहीं होता। जैसे किसी व्यक्ति ने दो दिन साधना बंद रखी तो उसे दो हजार मंत्र−नियत योजना कम के अतिरिक्त जपने होंगे। जहाँ तक हो सके ऐसे अवसर कम से कम आने देने चाहिए। क्योंकि टूटी हुई रस्सी को चाहे कितनी ही सावधानी और चतुरता से जोड़ दिया जाय तो भी वहाँ गाँठ तो रह ही जाती है।

जनन और मृत्यु के सूतक हो जाने पर शुद्धि न हो जाने तक जप को स्थगित रखना पड़ता है। यह दैवी कारण होने से इसमें मनुष्य का दोष नहीं है। सूतक के दिनों में अविधि पूर्वक मौन जप का क्रम तो चालू रखना चाहिए। पर व्यवस्थित क्रम बन्द रखना चाहिए। सूतक काल के दिन समाप्त होने पर जिस संख्या पर जप को विश्राम दिया था वहाँ से आगे आरंभ कर देना चाहिए।

यदावस्थासु स्याल्लोके विपन्नासु तदातुसः। मौनं मानसिकं चैव गायत्री जप माचरेत्॥

(यदा सः) जब वह (लोके) संसार में (विपन्नासु) विपन्न (अवस्थासु) अवस्थाओं में (स्यात्) हो (तदा) तब वह (मौनं) मौन (मानसिकं) मानसिक (गायत्री जपं) गायत्री जप (आचरेत्) करे।

कई बार ऐसे अवसर आते है जब मनुष्य को अपवित्र स्थिति में रहना पड़ता है। स्वयं रोगी हो जाने पर स्नान, शौच आदि की समुचित व्यवस्था नहीं हो पाती। कई बार किसी दूसरे रोगी या विपत्ति ग्रस्त की सेवा में रहने के कारण शुद्धि का प्रबंध नहीं हो सकता। ऐसी दशा में शुद्ध होकर की जाने वाली गायत्री साधना किस प्रकार हो? यह प्रश्न उपस्थित होता है।

शास्त्रकारों ने ऐसी विपन्न अवस्थाओं के लिए वह उपाय बताया है कि उस समय मौन होकर जप करे। अर्थात् केवल मानसिक जप करे अन्य किसी उपादान का प्रयोग न करें।

सामान्य त्रुटिभ्यस्तु प्रायश्चित्तं समादिशत्। सहस्त्राणं हि गायत्री मंत्राणामधिकं जपः॥

(सामान्य त्रु टिभ्यस्तु) साधारण भूलों के लिए (सहस्राणाँ गायत्री मंत्राणं) एक सहस्र गायत्री मंत्रों का (अधिकं) अधिक (जपः) जप करना (प्रायश्चितं) प्रायश्चित (समादिशत्) कहा है।

साधना के समय बोल जाना, अशुद्ध गुप्त अंगों का स्पर्श कर लेना, नींद की झपकी ले जाना, छींक आदि असावधानी से लेकर पूजा सामग्री को अशुद्ध कर देना आदि आकस्मिक भूलों के लिए प्रायश्चित स्वरूप एक हजार मंत्र जपने चाहिए।

आभ्यन्तरे तु गायर्त्या अनेके योग संचयाः। अन्तर्हिता विराजन्ते कश्चिदत्र न संशयः॥

(गायर्त्याः) गायत्री के (आभ्यन्तरे) अर्न्तगत (तु) तो (अनेके) अनेक (योग संचयाः) योग समूह (अन्तर्हिताः) छिपे हुए (विराजन्ते) रहते हैं (अब) इसमें (कश्चित्) कोई (संशयः) सन्देह (न) नहीं है।

घारयन् हृदि गायत्री साघ को धौतकिल्विषः। शक्तीरनुभवत्युग्राः स्वस्मिनात्मन्य लौकिकाः॥

(घौत किल्विषः) पाप रहित (साधकः) साधक (हृदि) हृदय में (गायत्री) गायत्री को (धारयनु) धारण करता हुआ (स्वस्मिन् आत्मनि) अपनी आत्मा में (अलौकिकाः) अलौकिक (उग्राः) तीव्र (शक्ति) शक्तियों का (अनुभवति) अनुभव करता है।

योग पद्धतियों की संख्या अनन्त है। राजयोग, हठयोग, लययोग, नाद योग, विन्दुयोग, ऋजुयोग, ज्ञान योग, भक्तियों कर्मयोज, कौलयोग, ब्रह्मयोग, परायोग, तंत्रयोग, शक्तियोग, जपयोग गुह्य योग आदि अनेकों योग पद्धतियाँ प्रचलित है। इनके विज्ञान, विधि विधान, फल, एवं कर्मकाण्ड प्रथक प्रथक हैं। भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में अनेक धर्म एवं दर्शन प्रचलित है उनके अंतर्गत भी बहुत सी योग पद्धतियों का विधान है। इतने असंख्य योगों का पार्थिक्य यद्यपि ऐसा प्रतीत होता है कि इनमें कोई भारी अन्तर है, एक दूसरे में कोई असाधारण मतभेद या असामंजस्य विद्यमान है अथवा एक दूसरे के विरोधी है। परन्तु गहराई तक प्रदेश करने के उपरान्त यह प्रकट हो जाता है कि वस्तुतः ऐसी कोई बात नहीं है। यह प्रथकता बाहर से ही दीखती है। खरबूजे की धारियाँ ऐसा भ्रम उत्पन्न है कि यह भीतर से टुकड़े टुकड़े निकलेगा पर वस्तुतः ऐसा होता नहीं। वे सब एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए हैं, उन सब साधना प्रहालियों की निर्धारित दिशा एक ही है। एक स्थान पर पहुँचने के अनेकों रास्ते होते है। जो पूर्व में है वह निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचने के लिए पच्छिम को चलता है और जो पच्छिम में है उसे पूर्व की ओर चलना पड़ता है। देखने में दोनों भिन्न दिशाओं में चलते हुए दीखते हैं, यह भिन्नता होते हुए भी वे एक ही स्थान पर जा पहुँचते है।

स्वामी विवेकानंद ने इस अनेकता में एकता सिद्ध करते हुए एक उदाहरण दिया है कि− जैसे खाँड की भरी एक बोरी है उस बोरी में अनेकों छेद है। बहुत सी चींटियाँ इन छेदों में होकर खाँड में भीतर घुसती है। वे सभी समान मधुरता का रसास्वादन करती है। यद्यपि उनके मार्ग प्रथक प्रथक है तो भी वे एक ही लाभ का अनुभव करती है। यही बात विविध साधनाओं के साधकों के संबंध में है। जिस शिक्षक ने जिस मार्ग से अनुभव किया है वह अपने अनुयायी को उसी मार्ग पर चलने की शिक्षा देता है इस परम्परा के अनुसार अनेकों मार्ग बन जाते है और वे स्वतंत्र नामों से पुकारे जाने लगते है। दूसरी बात यह है कि अलग अलग व्यक्तियों की मनोभूमि, इच्छा, स्थिति और आवश्यकता अलग अलग होती है। उसे देखते हुए अध्यात्म मार्ग के सुयोग्य शिक्षक साधकों को प्रथक प्रथक साधनाएं बताते है। वैद्य के औषधालय में अनेक प्रकार की दवाएं भरी रहती है। पर उनमें से रोगी को वही दी जाती है जो उसके रोग के अनुकूल है। जिस प्रकार सभी औषधियों का उद्देश्य रोग निवारण और स्वास्थ्य संस्थापन है वैसे ही सब योगों का उद्देश्य भी अनात्म तत्वों का निवारण और आध्यात्मिकता की स्थापना, बंधन का निवारण और मुक्ति की स्थापना है। परन्तु हर औषधि हर रोगी के लिए उपयोगी नहीं होती इसी प्रकार हर व्यक्ति के लिए हर योग ठीक नहीं होता। किसके लिए क्या औषधि चाहिए इसका निर्णय वैद्य करता है, इसी प्रकार सुयोग्य गुरु यह निर्णय करता है कि किस व्यक्ति को कौन सी साधना करनी चाहिए।

गायत्री मंत्र को एक औषधालय कह सकते है जिसमें सभी रोगों की औषधियाँ विद्यमान है। ‘अमृत धारा’ औषधि को अनुपान भेद से बहुत से रोगों पर काम में लाया जाता है। खाँसी, सिर दर्द, हैजा, दस्त, फुन्सी, आदि कितने ही रोगों पर यह एक ही दवा प्रयोग की जाती है, केवल सेवन विधि में अन्तर कर दिया जाता है। गायत्री साधना ऐसी ही आध्यात्मिक अमृत धारा है जिससे अनेक औषधियों की अनेक योग साधनाओं की आवश्यकता पूरी हो जाती है, अनेक रोगियों को, अनेक साधकों को, उपचार भेद से−साधना विधि में अन्तर कराकर इस एक ही औषधि से, एक ही मंत्र से चंगा किया जा सकता है, अभीष्ट उद्देश्य को प्राप्त कराया जा सकता है। इस रामबाण साधना में वे सब लाभ बल और रहस्य छिपे हुए है जो संसार भर की किसी भी साधना में पाये जाते है।

इस साधना के साधक पर सब से प्रथम प्रतिक्रिया यह होती है कि वह निष्पाप हो जाता है। पाप पुण्य की उलझन जिस श्रेणी के लोगों को परेशान करती है वह उससे ऊंचा उठ जात है। हमारा कोई अंग जब तक जल की सतह से नीचा रहता है तब तक वह पानी में भीगा रहता है पर जब वह ऊँचा उठ जाता है तो पानी उसे स्पर्श नहीं करता। जब तक मनुष्य का ‘अहम्’ संकुचित, सीमित, स्वार्थ रहा रहता है। अपने तुच्छ ‘अहंकार’ को तृप्त करने के लिए कार्य करता है तब तक किये हुए कार्य पाप पुण्य बनकर उसके पीछे पड़ते हैं और उनका परिणाम भोगने के लिए उसे विवश होना पड़ता है। पर जब वह अपने ‘अहम्’ को व्यापक बना लेता है, तुच्छता की केंचुली उतार कर अपने को विभु व्यापक एवं अजर अमर अनुभव करता है तो उसके कार्य में भी व्यापक दृष्टिकोण निहित हो जाता है। फलस्वरूप उसे पाप पुण्य के बंधन में नहीं बँधना पड़ता। एक कसाई एक प्राणी के शरीर में छुरा घुसेड़ कर रक्त बहाता है, दूसरी ओर एक डॉक्टर भी रोगी के शरीर में छुरी घुसेड़ता है और उसी प्रकार खून खच्चर करता है, हाड़ माँस आदि को काटता है। बाहर से देखने से दोनों क्रियाएं एक सी है पर एक को पाप लगता है दूसरे को नहीं। हत्यारा डाकू भी मनुष्यों के प्राण लेता है और जज भी अनेकों अभियुक्तों को फाँसी पर लटकवाता है, पर डाकू को पाप लगता है जज को नहीं। पाप पुण्य में ‘क्रिया’ प्रधान नहीं होती, कर्ता का दृष्टि कोण−प्रधान होता है।

एक व्यक्ति बुरे उद्देश्य की सिद्धि ने लिए दिखावे के रूप में कुछ पुण्य करके लोगों को उल्लू बनाना चाहता है, दूसरा आदमी किसी ऊँचे उद्देश्य के लिए बुरे प्रतीत होने वाले काम करता है तो उन कार्यों का फल क्रिया के अनुसार नहीं कर्ता की दृष्टि के अनुसार होता है। कभी ब्रह्मचर्य भी पाप हो सकता है और कभी व्यभिचार पुण्य भी। कभी सत्य भाषण पाप हो सकता है और असत्य भाषण पुण्य भी। कभी कभी दया, उदारता, दान आदि पाप बन जाते है और कभी कठोरता, हिंसा, अनुदारता और छल पुण्य रूप होते है। कौरव, पाण्डवों की माताओं ने वंश नाश होते देखकर व्यभिचार करके संतान उत्पन्न की थी / व्यासजी ने जब देखा कि सुपुत्र उत्पन्न करने की एक अमूल्य बेला व्यर्थ निकली जा रही है तो उन्होंने निषाद कन्या से व्यभिचार करके शुकदेवजी को जन्म दिया। देवताओं का संकट दूर करने के लिए योगेश्वर शंकर ने दूसरा विवाह भी किया और दो पुत्र भी उत्पन्न किये। स्वयं भगवान ने वृन्दा का सतीत्व नष्ट किया। वलि को साथ छल किया। यह सच बातें स्थूल दृष्टि से बुरी हैं, पाप हैं, पर ऊंचे दृष्टिकोण से निस्वार्थ भाव से किये जाने के कारण यह पाप नहीं ठहराई गईं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रान्तिकारियों ने लूट, चोरी डकैती, हत्या, छल आदि सभी कुछ किया, पर उद्देश्य ऊँचा होने के कारण वे पापी नहीं कहे जा सकते। इसके विपरीत दुर्भाव से नीच दृष्टि कोण से किये हुए पुण्य कार्य भी पाप बन जाते हैं। राजा नृग को गौदान करते हुए भी नरक में पड़ना पड़ा, त्रिशंकु को तप करते हुए भी उलटा लटकाना पड़ा, दक्ष का यज्ञ विध्वंस हुआ, कालनेमि का ब्रह्म भोज प्राण घातक सिद्ध हुआ।

गायत्री की साधक से मनोभूमि सात्विकता में विकसित हो जाने के कारण उसका दृष्टिकोण ऊंचा बन जाता है। उसके कार्य स्वभावतः लोक हितकारी और सतोगुणी होते हैं। भूल से था लोक हित की दृष्टि से वह कोई ऐसा काम कर बैठता है जो लोकाचार के अनुसार हेय समझा जाता है तो भी वह पाप का भागी नहीं बनता। शुद्ध हृदय से, परमार्थ के लिए, अपने व्यक्तिगत स्वार्थ का ध्यान न करते हुए जो कार्य किये जाते हैं वे गलत भले ही हों, पर उनके कारण कर्ता के पाप नहीं लगता। इस प्रकार ब्रह्म निष्ठ अध्यात्म वादी अपनी हृदयगत पवित्रता के कारण प्रत्येक दशा में निष्पाप रहता है। पूर्व संचित संस्कार जो पक चुके हैं, प्रारब्ध बन चुके हैं उन्हें तो भोगना ही पड़ेगा पर अब के कर्म आगे के लिए उसके लिए बन्धन नहीं बनते, मुक्ति में बाधा नहीं डालते।

निष्पाप अन्तःकरण वाला व्यक्ति अपने आप में ऐसी शक्तियों का अनुभव करता है जो अलौकिक होती है। अलौकिक उन्हें कहते हैं जो आमतौर से सब में नहीं होती। आत्मा, परमात्मा की संतान होने के कारण उसमें अपने पिता की समस्त योग्यताएं समस्त शक्तियां रहती है, परन्तु विषय विकारों के कारण वे वैसे ही अस्त व्यस्त और कुँठित हो जाती हैं जैसे राख से ढंका हुआ अंगार बाहर से छूने पर दाहक शक्ति से सर्वथा शून्य प्रतीत होता है। जब उस राख की हटा दिया जाता है तो शृंगार का जलता हुआ अग्नि स्वरूप पुनः प्रकट हो जाता है इसी प्रकार आन्तरिक कषाय, कल्मष हटते ही आत्मा अपने विशुद्ध स्वरूप में प्रकट होता है, उसकी जन्म जात, स्वाभाविक योग्यताएं स्वयमेव प्रकाश में, अनुभव में, आने लगती है।

साधन सम्पन्न आत्माएं अधिक सूक्ष्म हो जाती है। सूक्ष्म आकाश में विचरण करने वाले तत्वों को वे देख समझ और सुन सकती है। जो घटनाएं भूतकाल में घटित हो चुकी है उनके अंकन सूक्ष्म आकाश में फोटोग्राफ की तरह बने रहते हैं, उन्हें देखकर किसी का भूतकाल जाना जा सकता है। भविष्य में जो घटित होने वाला है, उसकी तैयारी के चक्रों को देखकर यह विदित हो जाता है कि भविष्य में क्या होने वाला है। उसकी आत्मशक्ति इतनी हलकी हो जाती है कि उसको दूसरों की सहायता में प्रयुक्त किया जा सकता है। आत्म निग्रह की सफलता के कारण हर घड़ी परमानंद का आस्वादन किया जा सकता है। वरदान को फलित किया जा सकता है। अज्ञात बातों को जाना जा सकता है। मानस संतानों (भूत प्रेत देवी देवता आदि) को पैदा करना और मिटाना संभव हो जाता है। इन सबको गिनाना न तो आवश्यक है और लाभ दायक, क्योंकि उनका कोई अन्त नहीं है। साधक का आत्म बल जितना ही ऊंचा उठता जाता है उतनी ही ईश्वरीय कलाएं उसमें बढ़ती जाती है, तदनुसार उतनी ही आलौकिक शक्तियों की मात्रा बढ़ती है। पातंजलि योग में वर्णन है कि अहिंसा, सत्य, अस्तेय ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि यम नियमों से एवं प्रत्याहार, धारण, ध्यान समाधि आदि साधनाओं से एक से एक बढ़कर चमत्कारी शक्तियां प्राप्त होती है। यह चमत्कार उन नियमों से या साधनाओं से होने वाले आत्म विकास द्वारा प्राप्त होते हैं। यह आत्म विकास अन्य साधनों से भी हो सकता है, और वे ही लाभ तथा उनके अतिरिक्त अन्य भी अनेकों लाभ प्राप्त हो सकते हैं।

गायत्री एक ऐसी साधना है जो किसी भी अन्य साधना से किसी प्रकार कम नहीं, इसके द्वारा आत्म विकास होता है और उस विकास के साथ साथ आलौकिक शक्तियां उत्पन्न होती हैं। साधक को उनका अनुभव होता है, आभास मिलता हैं, पर जैसे किशोर बालक अपने नव उत्पन्न वीर्य को सुरक्षित रखते हैं उसे बाहर नहीं निकलने देते उसी प्रकार बुद्धिमान साधक भी अपनी इन शक्तियों को अपने अन्दर ही धारण किये रहते हैं। प्रकट नहीं करते, उन्हें साँसारिक कर्मों में खर्च नहीं करते। वरन् आत्म कल्याण में परमानंद की प्राप्ति में, जीवन मुक्ति में उसे लगाते हैं। परमात्मा की सृष्टि का क्रम कर्म भोगों के आधार पर चल रहा हैं, कर्म की, प्रयत्न की, श्रम की प्रधानता से व्यक्ति की उन्नति होने का ईश्वरीय नियम है। सिद्धि प्राप्त व्यक्ति बड़ी सावधानी से इस बात के लिए सचेष्ट रहता है कि कहीं उसकी शक्तियां किसी ऐसे कार्य में प्रयुक्त न हों जिससे ईश्वरीय विधान में विक्षेप पड़े। आध्यात्मिक शक्तियों का उपयोग आत्मोन्नति के लिए ही हैं, बुद्धिमान साधक उसे उचित मार्ग में ही लगाता है। उससे प्रदर्शन नहीं करता।

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पापनाशक प्रायश्चित्य।

उच्चता पतितानाँ च पापानाँ पापनाषनम्। जायते कृपयैवास्याः वेदमातुरनन्तया॥

(पतितानाँ) पतितों को (उच्चता) उच्चता (च) और (पापानाँ) पापियों को (पापनाषनें) उसके पापों का नाष ये दोनों (अस्याः) इस (वेदमातुः) वेदों की माता गायत्री की (अनन्तया) अनन्त (कृपया) कृपा से (एव) ही (जायते) होते हैं।

प्रायष्चितं मतं श्रेष्ठं त्रुटीनाँ पापकर्मणाम्। तपष्चर्यैव गायत्रयाः नातोऽन्य दृष्यते क्वचित्॥

(त्रुटीनाँ) गलतियों का (पापकर्माणाँ) पापकर्मों का (प्रायष्चितं) प्रायष्चित (गायत्रयाः) गायत्री की (तपष्चर्यैव) तपष्चर्या ही (श्रेष्ठंमतं) श्रेष्ठ मानी गई हैं।

गायत्री की अनन्त कृपा से पतितों को उच्चता मिलती है और पापियों के पापनाश होते हैं। इस तथ्य पर विचार करते हुए हमें यह बात भली प्रकार समझ लेनी चाहिए कि आत्मा सर्वथा स्वच्छ, निर्मल, पवित्र, शुद्ध बुद्ध और निर्लिप्त है। स्वेत काँच का पारदर्शी पात्र अपने आप में स्वच्छ होता है उसमें कोई रंग नहीं होता, पर उस पात्र में किसी रंग का पानी भर दिया जाय तो वह उसी रंग का दीखने लगेगा। साधारणतः उसे उसी रंग का पात्र कहा जायेगा इतने पर भी पात्र का मूल रूप सर्वथा रंग रहित ही रहता है। एक रंग का पानी उस काँच के पात्र में भरा हुआ है उसे फैला कर यदि दूसरे रंग का पानी भर दिया जाय तो फिर इस परिवर्तन के साथ ही पात्र दूसरे रंग का दिखाई देने लगेगा। मनुष्य की भी यहाँ स्थिति है। आत्मा स्वभावतः निर्विकार है पर उसमें जिस प्रकार के गुण कर्म, स्वभाव भर जाते हैं वह उसी प्रकार का दिखाई देने लगता है।

गीता में कहा गया है कि−“विद्या विनय संपन्न, ब्राह्मण, गौ, हाथी, कुत्ता तथा चाण्डाल आदि को जो समत्व बुद्धि से देखता है वह पण्डित है।” इस समत्व का रहस्य यही है कि आत्मा सर्वदा निर्विकार हैं, उसकी मूल स्थिति में परिवर्तन नहीं होता, केवल मन बुद्धि चित्त अहंकार का अन्तःकरण चतुष्टय रंगीन−विकार ग्रस्त−हो जाता हैं जिसके कारण मनुष्य अस्वाभाविक, विपन्न, विकृत दशा में पड़ा हुआ प्रतीत होता है। इस स्थिति में यदि परिवर्तन हो जाये तो आज के ‘दुष्ट’ का कल ही ‘सन्त’ बन जाना कुछ भी कठिन नहीं है। इतिहास बताता है कि एक चांडाल कुलोत्पन्न भयंकर तस्कर बदल कर महर्षि वाल्मिकी हो गया। जीवन भर वेश्या वृत्ति करने वाली गणिका आन्तरिक परिवर्तन के कारण परम साध्वी देवियों को प्राप्त होने वाली परमगति की अधिकारिणी हुई, कसाई का पेशा करते हुए जिन्दगी गुजार देने वाला अजामिल और सदन परम भागवत कहलाये। इस प्रकार अनेकों नीच काम करने वाले उच्चता को प्राप्त हुए हैं और ही कुलोत्पन्नों को उच्च वर्ण की प्रतिष्ठा मिली है। रैदास चमार, कबीर जुलाहे, रामानुज शुद्ध, षटकोपाचार्य खटीक, तिरुवल्लुवर अत्यजवर्ण में उत्पन्न हुए थे पर उनकी स्थिति अनेकों ब्राह्मण से ऊंची थी। विश्वामित्र क्षत्री से ब्राह्मण बने थे।

जहाँ प्रति स्थान से ऊपर चढ़ने के उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है वहां उच्च स्थिति के लोगों के प्रतीत होने के भी उदाहरण कम नहीं है। पुलस्त्य के उत्तम ब्रह्म कुल में उत्पन्न हुआ चारों वेदों का महापंडित रावण, मनुष्यता से भी पतित होकर राक्षस कहलाया, खोटा श्रत्रडडडडडड खाने से द्रोण और भीष्म जैसे ज्ञानी पुरुष, अन्यायी कौरवों के समर्थक हो गये विश्वामित्र ने क्रोध में आकर वशिष्ठ के निर्दोष बालकों की हत्या कर डाली, व्यास ने घीवर की कुमारी कन्या से व्यभिचार करके सन्तान उत्पन्न की, विश्वामित्र ने वेश्या पर आसक्त होकर उसे लम्बे समय तक अपने रखा, चन्द्रमा जैसा देवता गुरु माता के साथ कुमार्ग गामी बना, देवताओं के राजा इन्द्र को व्यभिचार के कारण शाप का भाजन होना पड़ा, ब्रह्मा जी अपनी पुत्री पर ही मोहित हो गये, ब्रह्मचारी नारद मोहग्रस्त होकर विवाह कराने को स्वयंवर में पहुँचे, सड़ी गली काया वाले वयोवृद्ध च्यवन ऋषि को सुकुमार कन्या से विवाह करने की सूझी, बलिराजा के दान में भाँजी मारते हुए शुक्राचार्य ने अपनी आँख गंवादी, धर्मराज युधिष्ठिर तक ने अश्वत्थामा मरने की पुष्टि करके अपने मुँड पर कालिख पोती और धीरे से ‘नरोवा कुँजरोवा’ गुनगुना कर अपने को छझडडडडडड से बचाने की प्रवंचना की। कहाँ तक कहें−किस 2 कहें−इस दृष्टि से इतिहास देखते हैं तो बड़े बड़ों को स्थान च्युत हुआ पाते हैं। इससे प्रकट होता है कि आन्तरिक स्थिति में हेर फेर हो जाने से भले मनुष्य बुरे और बुरे भले बन सकते हैं।

शास्त्र कहता है कि जन्म से सभी लोग शूद्र पैदा होते हैं पर पीछे संस्कारों के प्रभाव से वे द्विज बनते हैं असल में यह संस्कार ही है जो शूद्र को द्विज और द्विज को शूद्र बनी देते हैं। गायत्री के तत्व ज्ञान को हृदय में धारण करने से पैसे संस्कारों की उत्पत्ति होती है जो मनुष्य को एक विशेष प्रकार का बना देते हैं। उस पात्र में भरा हुआ पहला लाल रंग निवृत्त जाता है और उसका स्थान पर नीलवर्ण परिलक्षित होने लगता है।

पतित कितनी देर में उच्चता को प्राप्त होगा यह उसके मानसिक परिवर्तन की स्थिति पर निर्भर है। वह शिथिल और मन्द कम से होगा तो प्रगति में भी मन्दता रहेगी और यदि तीव्र एवं सुदृढ़ परिवर्तन हुआ तो थोड़े से क्षणों के अन्दर पापी का धर्मात्मा बन जाना संभव है। यदि परिवर्तन मन्द गति से हो तो भी उसकी पतितावस्था में सुधार और उच्चता में अभिवृद्धि तो होने ही लगेगी। केवल गायत्री मंत्र के श्रवण, स्मरण, चिन्तन, मनन एवं जप करने मात्र से से सात्विकता के किन्हीं अंशों की निश्चित रूप से वृद्धि होती है, जितने यह अंश बढ़ेंगे उतने अंशों पुराने दूषित तत्वों में कमी होगी। एक वर्तन में जितना पानी भरा जाता है उतनी ही हवा उसमें से निकलती जाती है। इसी तरह जितने सात्विक अंश हृदय में भरते जाते हैं पतित अवस्था को निश्चित रूप से सुधार होता है। यह क्रम यदि दृढ़ता पूर्वक, अधिक तत्परता के साथ चलाया जाय तो अन्तःकरण चतुष्टय में सतोगुण की तीव्रगति से वृद्धि होती है और पतितावस्था विलीन होती जाती है।

पाप की बुराई को समझते हुए, उसका विरोध करने वाली आत्मा को कुचलते हुए, दुराग्रह पूर्वक वाली आत्मा को कुचलते हुए, दुराग्रह पूर्वक जो पाप किये जाते हैं, कालान्तर में वे पक कर प्रारब्ध का रूप धारण कर लेते हैं तब उनका पाप फल भोगना आवश्यक होता है, परन्तु अज्ञान वश, मनोभूमि की निर्बलावस्था में, कौतुहल वश, कुसंग में या ऐसे ही हल्के कारणों से जो छोटी मोटी बुराइयाँ बन पड़ती है यदि आगे चलकर मनुष्य उन्हें छोड़ते तो उन ‘निर्बल वीर्य’ पापों का फल नष्ट हो जाता है। माता पिता की की असावधानी से कई बार छोटे बच्चे उनकी कामकीहाएंडडडडड देख लेते हैं और फिर उन चेष्टाओं को कौतुहल वश आपस में दुहराते हैं। यद्यपि यह चेष्टाएं सर्वथा अवांछनीय है तो भी उन बालकों को उस श्रेणी का दोषी नहीं ठहराया जाता जिस श्रेणी का दोष कि तरुण लड़के लड़कियों पर उस प्रकार की चेष्टाएं करने का होता है। बच्चे भी चोरी करते देखे जाते हैं पर उन्हें बढ़ी आयु के चोर डाकुओं जैसा कठोर कारावास नहीं मिलता। कारण यह है कि मनोभूमि की निर्बलता और परिपुष्टता को न्यायकर्ता ध्यान में रखता हैं। ऐसे छोटे मोटे अपराधों का कुफल तभी मिलता है जब वह शृंखला लगातार लंबी चले और दिन दिन बढ़ती जाय। पर यदि यह शृंखला टूट जाती हैं, दिशा बदल जाती है तो रेत पर बने हुए पद चिन्हों की तरह वे पाप कृत्य भी मिट जाते हैं।

पापों की भी कई श्रेणियों है। हत्या, विश्वासघात, मिथ्या लाँछन, निर्दोषों का बलात्कार, सताया जाना, अभाव ग्रस्तों से भी अपहरण किया जाता, किन्हीं असमर्थों को निराश्रित कर देना, जीविका छीनना जैसे आत्मा को सीधी चोट पहुँचाने वाले, तिलमिला देने वाले, न्याय की हत्या करने वाले, ऐसे बाप जो दुष्ट बुद्धि से जान बूझकर किये गये ही सचमुच भयंकर छातडडडडडडड हैं और सताये जाने वाले की आह उसे ले डूबती है। पर कुछ पाप ऐसे हैं जिनमें यह बात तो नहीं हैं पर सामाजिक व्यवस्था की गड़बड़ पैदा करने के कारण बुरे माने गये हैं ऐसे पापों को स्थिति के अनुसार छोटे पापों में भी गिना जा सकता है। गप्पे हाँकना, बेकार फिरना, सुन्नाडडडडडडडड देखना, नशा पीना, अखाद्य खाना, दोनों पन्नों के सहयोग से हुए व्यभिचार इसी श्रेणी में आते हैं। ये पाप भी बुरे तो हैं ही पर चित्त वृत्तियों में अन्तर आजाने से उनका कुफल नष्ट हो जाता है। छोटी फुन्सियाँ मरहम लगाने से अच्छा हो जाता है पर पुराने नासूर के लिए आपरेशन कराना पड़ता है। इसी प्रकार अल्प वीर्य पापों का समूह गायत्री की सतोगुणी धारणा से नष्ट हो जाता है पर वे महापातक जो प्रारब्ध बन चुके हैं पर वे महापातक जो प्रारब्ध बन चुके हैं उनका भोगा जाना, उनका आपरेशन होना, आवश्यक है।

पापों का नाष आत्म तेज की प्रचण्डता से होता है। यह तेजी जितनी ही अधिक होती है उतना ही संसार का कार्य शीघ्र और अधिक परिमाण में होता है। बिना धार की लोहे की छह से वह कार्य नहीं हो सकता जो तीक्ष्ण तलवार से होता है। यह तेजी किस प्रकार आवे ! उपाय तपाना और रगड़ना है। लोहे को आग में तपा कर उसमें धार बनाई जाती है और पत्थर पर रगड़ कर उसे तेज किया जाता है। तब वह तलवार दुश्मन की सेना का सफाया करने योग्य होती है। हमें भी अपनी आत्म शक्ति तेज करने के लिए इसी तपाने, घिसने वाली प्राणी को अपनाना पड़ता है−इसे आध्यात्मिक भाषा में ‘तप’ या ‘प्रायश्चित’ नाम से पुकारते हैं।

अपराधों की निवृत्ति के लिए हर जगह दंड का विधान काम में लाया जाता है। बच्चे ने गड़बड़ी की कि माता की डाँट चपत पड़ी, शिष्य से प्रमोद किया कि गुरु ने छड़ी संभाला, सामाजिक नियमों को भंग किया कि पंचायत ने दंड दिया, कानून का उल्लंघन हुआ कि जुर्माना, जेल, कालापानी या फाँसी तैयार है, ईश्वर भी दैनिक, दैहिक, भौतिक दंड देकर पापों का दंड देता है। यह दंड विधान प्रतिशोध या प्रतिहिंसा मात्र नहीं है। ‘खून का बदला खून’ की जंगली प्रथा के कारण नहीं, दंड विधान का निर्माण उच्च आध्यात्मिक विज्ञान के आधार पर किया गया है। कारण यह है कि दंड स्वरूप जो कष्ट दिये जाते हैं उनसे मनुष्य के भीतर एक खलबली मचती हैं, प्रतिक्रिया होती हैं, तेजी आती है जिससे उसका सुप्त मानस चौंक पड़ता हैं और भूल को छोड़कर उचित मार्ग पर आ जाता है। ‘तप’ में ऐसी ही शक्ति है। तप की गर्मी से अनात्म तत्वों का संहार होता है।

दूसरों द्वारा दंड के रूप में चलात् तप कराके हमारी शुद्धि की जाती है। इस प्रणाली को हम स्वयं ही अपनालें अपने गुप्त प्रकट पापों का दंड स्वयं अपने को दे लें, स्वेच्छा पूर्वक तप करें तो वह दूसरों द्वारा चलात् कराये हुए तप की अपेक्षा असंख्य गुना उत्तम है। उसमें न अपमान होता है न प्रतिहिंसा एवं आत्म ग्लानि से चित्त क्षुधित होता है वरन् स्वेच्छा तप से एक आध्यात्मिक आनंद आता है, शौर्य और साहस प्रकट होता है तथा दूसरों की दृष्टि में अपनी श्रेष्ठता, प्रतिष्ठा बढ़ती है। पापों की निवृत्ति के लिए आत्म तेज की अग्नि चाहिए इस अग्नि की उत्पत्ति से दुहरा लाभ होता है एक तो हानिकारक तत्वों का कषाय कल्मषों का नाष होता है, दूसरे उसकी ऊष्मा और प्रकाश से दैवी तत्वों का विकास, पोष्य, एवं अभिवर्द्धन होता है। जिसके कारण तपस्वी मनस्वी सच्चे अर्थों में तेजस्वी बन जाता है। हमारे धर्म शास्त्रों में पग पग पर व्रत, उपवास, दान, स्नान, आचार विचार आदि के विधि विधान इसी दृष्टि से किये हैं कि उन्हें अपना कर मनुष्य इन दुहरे लाभों को उठा सके।

अपने से कोई भूल, पाप या बुराइयों बन पड़ी हों उनके अशुभ फलों के निवारण के लिए तथा आवश्यकताओं को छोड़कर उनके अभाव का कष्ट सहते हुए रहना व्रत कहलाता है। काम सेवन त्याग कर ब्रह्मचर्य से रहना, जूता न पहन कर नंगे पैर रहना या खड़ाऊं पहनना पलंग पर न सोकर तख्त या भूमि पर शयन करना, स्वल्प वस्त्र धारण करना, खाद्य पदार्थों में थोड़ी चीजों को स्वीकार करके शेष को त्याग देना, धातु के पात्रों में भोजन न करके पत्तल पर या हाथ पर भोजन करना, हजामत बनाने की मर्यादा निर्धारित कर लेना, पशुओं की सवारी पर न चढ़ना, खादी पहनना आदि अनेकों प्रकार के व्रत हो सकते हैं।

(4) कष्ट सहना−हठयोगी बड़ी बड़ी कठिन कष्ट साध्य साधनाएं करते हैं, एक बाहु को ऊपर उठाये रहना, चौरासी धूनी तपना, एक आसन से बैठना, रात्रि को न सोना जैसे साधनों को करते हैं पर हम अपने पाठकों को बिना किसी अनुभवी गुरु की आज्ञा के इस प्रकार के तीव्र कष्ट सहन का निषेध करते हैं क्योंकि इनमें थोड़ी भी भूल हो जाने से अनिष्ट का काफी खतरा रहता है। साधारणतः निम्न कष्ट सहन ऐसे है जिनमें से अपनी सुविधा और आवश्यकतानुसार किसी को अपनाया जा सकता है। गर्मी में पंखा, छाता और बरफ का त्याग, सर्दी में बिना गरम (ताजे) जल से स्नान, प्रातःकाल एक दो घंटा रात रहे उठकर नित्य कर्म में लग जाना, सर्दी में अधिक वस्त्रों का उपयोग अथवा अग्नि पर तापने का त्याग, अपने हाथ से भोजन बनाना, एक हाथ से कुँए से जल खींचकर अपने लिए पीने को रखना, पैदल तीर्थ यात्रा करना, अपने हाथ से अपने सब काम वस्त्र सीना, धोना, झाड़ू लगाना, बर्तन मलना आदि काम करना, दूसरों की सेवा और सहायता कम से कम लेना आदि ऐसे कष्ट सहन किये जा सकते हैं जिनमें उस कष्ट सहिष्णुता का कुछ प्रत्यक्ष लाभ भी होता हो।

(5) दान− अपने पास जो शक्ति हो उसमें से अपने लिए कम मात्रा में रखकर दूसरों को अधिक मात्रा में देना, समय, बुद्धि, शान, विद्या, सहयोग, उधार आदि का देना भी दान ही है। धन दान तो प्रसिद्ध है ही। सत्कार्यों में जीवन को नियोजित करने वाले ब्रह्म परायण लोकसेवी, सेवा संस्थाएं तथा आपत्ति ग्रस्त, दान के अधिकारी है। इसके अतिरिक्त अपनी उदार वृत्ति को चरितार्थ करने के लिए अनेकों प्रकार के ऐसे कार्य किये जा सकते हैं जिनसे उपयोगी प्राणियों की सुख वृद्धि होती हो। अन्न दान, पुस्तक दान, पाठशाला, औषधालय, अनाथालय, अवखाश्रयडडडडडडडड, पुस्तकालय, गौशाला, धर्मशाला, कुंआ, बावड़ी, प्याऊ, बगीचा आदि के लिए धन या समय देना। भाषण, लेखन, सत्संग द्वारा सद्ज्ञान का प्रसार करना आदि अनेकों लोकोपयोगी कार्य है। विद्याधन वाले भी सेवा समिति आदि लोक सेवा संस्थाओं को अपना समय देकर या स्वतंत्र रूप से स्थानीय आवश्यकता के अनुरूप सेवा करके दान का पुण्य फल प्राप्त कर सकते हैं। गौ, चींटी, चिड़ियाँ, कछुए, मछली आदि को थोड़ा बहुत भोजन देकर दान की भावना को स्वल्प व्यय में चरितार्थ किया जा सकता है। और भी अनेकों मार्ग हो सकते हैं।

(6) दोष प्रकाशन अपनी बुराइयों को या गुप्त पापों को छिपाये रहने से मन भारी रहता है और उसमें कलुषित भाव भरे रहते हैं। जिस प्रकार उदर में गंदा मल भरा रहे तो स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, इस दोष के निवारण के लिए जुलाब देकर पेट साफ कराया जाता है, तब स्वास्थ्य ठीक होता है। इसी प्रकार अपनी भूलों और पापों को छिपाने बैठे रहा जाय तो वह विषैला मल अध्यात्मिक स्वास्थ्य को ठीक नहीं होने देता। इसलिए प्रायश्चितों में दोष प्रकाशन का महत्वपूर्ण स्थान दिया है। गौ हत्या हो जाने का प्रायश्चित शास्त्रों ने यह बताया हैं कि मरी गौ की पूँछ हाथ में लेकर एक सौ गाँवों में वह व्यक्ति उच्च स्वर से चिल्ला−चिल्ला कर यह कहे कि मुझसे गौ हत्या हो गई हैं। इस प्रकार दोष प्रकाशन से गौ हत्या का दोष छूट जाता है। हमने जिसके साथ बुराई की हो उससे क्षमा माँगनी चाहिए। उसकी क्षति पूर्ति करनी चाहिए, और जिस प्रकार वह संतुष्ट हो वह करने का यथा शक्ति प्रयत्न करना चाहिए। यह न हो सके तो कम से कम अपने किन्हीं अभिन्न सच्चे विश्वासी मित्रों अथवा गुरु के सन्मुख अपने प्रत्येक दोष को सविस्तार प्रकट कर देना चाहिए। इससे भी बहुत हद तक मन स्वच्छ हो जाता हैं, और अन्तरात्मा पर रखा हुआ एक भारी बोझ हलका हो जाता है।

(7) साधना−गायत्री अनुष्ठान, ब्रह्मसंध्या, गायत्री हवन, पुरश्चरण गायत्री, योग आदि साधनों से आत्मबल सतेज किया जा सकता है।

अन्य उद्देश्यों के लिए अन्य अनेकों प्रायश्चित हो सकते हैं, पर यहाँ तो सर्व साधारण के उपयोगी सामान्य तपश्चर्याओं का ही वर्णन किया जा रहा है। पाठक किसी विज्ञ पुरुष से सलाह लेकर ही अपनी स्थिति को ध्यान में रख कर इस दिशा में कदम बढ़ावें, यदि आवश्यकता प्रतीत हो तो अखंडज्योति कार्यालय से भी इस संबंध में सलाह ले सकते है और गायत्री तत्वों की तपश्चर्या एवं प्रायश्चितों द्वारा पतितावस्था से उच्चता की ओर अग्रसर हो सकते हैं और पापों का नाष कर सकते हैं।

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साधक का आहार−व्यवहार।

आहारे व्यवहारे च विचारषु तथैवहि। सात्विकेन सदा भाव्यं साधकेन मनीषिण॥

(आहारे) आहार में (व्यवहारे) व्यवहार में (तथैव च) और उसी प्रकार (विचारेणु) विचारों में भी (मनीषिण) बुद्धिमान (साधकेन) साधक को (सदा) सर्वदा (सात्विकेन भाव्यं) सात्विक होना चाहिए।

कर्तव्यं धर्मतः कर्म विपरीतेषु यद्भवेत्। तत्साधकस्तु मतिमानाचेरन्न कदाचन॥

(यर्त्कम) जो काम (कर्तव्य धर्मतः) कर्तव्य धर्म से (विपरीतं) विपरीत (भवेत्) हो (तत्) वह कर्म (मतिमान् साधकः) बुद्धिमान साधक (कदाचत्) कभी (न) नहीं (आचरेत्) करें।

अपनी वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पुस्तक में हम सुविस्तार वह बता चुके हैं कि जितने भी आध्यात्मपरक दर्शन शास्त्र, जितने भी विचार, विश्वास एवं मान्यताएं हैं उन सबका एकमात्र हेतु मनुष्य को धर्मपरायण, कर्तव्य निष्ठ तथा समाज सेवी बनाना है। जीव चौरासी लाख पशु योनियों में भ्रमण करता हुआ मनुष्य योनि को प्राप्त करता है। उसके पिछले जन्मों के अनेक कुसंस्कार भी इस जन्म में साथ आते हैं, इन कुसंस्कारों पर नियंत्रण करके धर्म परायणता को हृदयंगम करने के लिए तत्वदर्शी आचार्यों ने अध्यात्म विचार विज्ञान की रचना की है। ईश्वर धर्म, पुनर्जन्म, कर्मफल, स्वर्ग−नरक आदि की विषद विवेचनाओं से हमारे धर्मशास्त्रों का सुविस्तृत साहित्य विनिर्मित हुआ हैं। इस इतने बड़े साहित्य के केवल मात्र दो उद्देश्य हैं (1) अपनी पाश्विक वृत्तियों का नियंत्रण करना (2) अपनी शक्तियों को समाज परक बनाना, उन्हें दूसरों के लाभ के लिए अधिक मात्रा में व्यय करना। इन दो तथ्यों को मानव अन्तःकरण पर अधिक गहराई से अंकित करने के लिए नानाप्रकार के उपाख्यानों, संवादों, विधि निषेधों की रचना हुई हैं। समस्त धर्मग्रन्थों का दृष्टि बिन्दु यही है।

उपरोक्त दृष्टि बिंदु को मनोविज्ञान के आधार पर मानव मन में वैज्ञानिक प्रक्रिया के साथ मानव मन पर अंकित कर देने के लिए विविध प्रकार के धार्मिक कर्मकाण्डों और अध्यात्मिक साधनाओं का आयोजन हुआ है। इनके द्वारा अंतर्जगत और दिव्यलोक के महत्व की ओर चित्त आकर्षित होता है और भोगोन्मुखी माया बंधनों में बाँधने वाली, स्वार्थपूर्ण तुच्छ वृत्तियों की ओर से मन विमुख होकर एक अदृश्य आनन्द की ओर अग्रसर होता है। उस अदृश्य आनन्द की प्राप्ति के लिए उसे जो कर्मकाण्ड और साधन करने होते हैं उनका सूक्ष्म निरीक्षण करने से पता चलता है कि इन सबकी साधक के अंतर्मन पर एक विशेष छाप पड़ती है और वह छाप उन दो मूल धर्म तत्वों का आत्म निग्रह और परमार्थ परायणता का−पोषण करती है। यह समस्त धर्म और आध्यात्म एक मानसिक शासन है जिसे विश्वासों और कर्मकाण्डों के आधार पर मानव मस्तिष्क के ऊपर स्थापित किया जाता है। इस भाव शासन में बंध कर मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य बनता है और उस आनन्द को प्राप्त करता है जो उसके लिए अभीष्ट है।

स्वस्थ विचार और स्वस्थ विश्वास का निश्चित परिणाम किया होती है। जो विचार था विश्वास किया रूप में परिणत न हो सके, केवल मन में ही घुमड़ता रहे उसे अपूर्ण, असक्त एवं अपरिपक्व समझना चाहिए। जिन दो आधारों के ऊपर धर्म और अध्यात्म का भवन खड़ा किया गया है यदि वे क्रिया रूप में परिणत नहीं होते, व्यक्तियों के आचरण में उनका समावेश न हो तो इस इतनी बड़ी प्रक्रिया को निरर्थक ही समझना चाहिए। इस बात को ध्यान में रखते हुए शास्त्रकारों ने इस बात की जाँच करते रहने की व्यवस्था की है कि धर्म की धारणा साधक के मन में भली प्रकार हुई या नहीं। इस जाँच की कसौटी साधक का आचरण ही हो सकता है।

गायत्री का साधक यदि वस्तुतः आत्मलाभ प्राप्त करना चाहता है तो उसे अपने व्यवहारिक जीवन में सात्विकता का अधिक से अधिक समावेश करना आवश्यक है। इसी लिए उपरोक्त श्लोक में कहा गया है कि साधक के आहार, व्यवहार और विचारों को सदा सात्विक रखना चाहिए। उसके आहार में सतोगुणी, सादा, सुपाच्य पदार्थ होने चाहिए। अधिक मिर्च मसाले वाले, घी तेल हुए पकवान्, मिष्टान्न, बासी, बुसे, दुर्गन्धित, मद्य माँस आदि से युक्त अभक्ष, उष्ण, दाहक, अनीति उपार्जित, अशुचि मनुष्यों के बनाये हुए आहार को ग्रहण न करने का आदेश किया गया है। साधक का आहार दूध, फल, शाक, दलिया, चावल, गेहूँ, मूँग जैसे पदार्थ होने चाहिए। स्वाद की दृष्टि से उन्हें अस्वाद ही रखना चाहिए। नमक मिर्च मसाले या मीठा भोजन के साथ न लिया जाय तो उनकी सात्विकता बढ़ जाती है। स्वास्थ्य की दृष्टि से यदि नमक या शक्कर की आवश्यकता प्रतीत हो तो उसे भोजन से आगे या पीछे लिया जा सकता है। व्यवहार में फैशन परस्ती, रात्रि में जागना, दिन में सोना, सिनेमा, नाच रंग देखना, किसी को चिढ़ाना, निन्दा करना, लड़ना, सताना, कटुवचन कहना, जैसे व्यवहार से बचना चाहिए। ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, कलह, चिन्ता, भय, शोक, स्वार्थ, वासना, व्यभिचार, चोरी, परिग्रह, निष्ठुरता, आलस्य, प्रमाद, अहंकार, मद, मत्सर, लालच, तृष्णा, घबराहट, कायरता जैसे मानसिक शत्रुओं को विचार क्षेत्र में स्थान नहीं देना चाहिए। कुविचारों कंटीले झाड़ झंखाड़ों को बीन बीनकर मनोभूमि में से दूर हटाते जाना चाहिए। मन जितना ही पवित्र होगा उतना ही साधना के लिए क्षेत्र उर्वर होगा। मन की पवित्रता स्वच्छ आहार और शुद्ध विचारों पर रहता है। यह उक्ति सर्वथा सत्य है कि “जैसा खावें अन्न−वैसा बने मन”।

दूसरे श्लोक में कुकर्मी से, निषिद्ध कार्यों से, अधर्मों से बचे रहने का आदेश किया गया है। चोरी, व्यभिचार, विश्वासघात, असत्य, दंभ, बेईमानी, हिंसा, शोषण, अपहरण, जुआ, अभक्ष−भक्षण, नशेबाजी, जैसे अधर्म मूलक त्याज्य कर्मों से यदि सदा ही बचे रहा जाय तो बहुत ही उत्तम है पर साधना काल में दो इनका अधिक ध्यान रखना चाहिए और जितना अधिक इससे बचे रहा जा सके।

साधनाओं से अनेक सिद्धियाँ मिलती है। उन सिद्धि दायक साधनाओं में आहार, व्यवहार और विचारों की सात्विकता एक स्वतंत्र साधना है। इसको बिना किसी जप तप आदि को क्रिया जाय तो भी वह आश्चर्य जनक ऋद्धियों को प्रदान करती है। पातंजलि ऋषि ने यम नियमों की, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि उत्तम आचरणों की साधना से अद्भुत सिद्धियाँ मिलने का वर्णन योग दर्शन में किया है। यदि गायत्री की साधना और सात्विक आचरण इन दोनों का एक साथ समन्वय हो जाने से दो साधनाओं का दुहरा फल मिलता है और योग विद्या का वह मूलभूत सिद्धान्त की पूरा होता है, जिसके अनुसार आत्मनिग्रह और परमार्थ परायणता के आधार पर मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने की व्यवस्था की गई हैं।

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आचार्य का चरण।

साधनायै तु गायत्रयाः निष्छलेन हि चेतसा। बरखीयः सदाचार्यः साधकेन सुभाजनः॥

(गायत्रयः) गायत्री की (साधनायै) साधना के लिए (तु) तो (साधकेन) साधक को चाहिए कि यह (निष्छलेन चेतसा) छल रहित वित्त से (सुभाजनः) योग्य (सदाचार्यः) श्रेष्ठ आचार्य का (वरणीयः) वरण करें।

सत्पात्रो यदि वाचार्यो न स्यात्संस्थापवेत्तदा। नारिकेलं षुचं कृत्वाचार्य भावेन चासने॥

(यदि) अगर (सत्पात्र) श्रेष्ठ एवं योग्य (आचार्यः) आचार्य (न स्यात्) न प्राप्त हो (तदा) तो (षुचं) पवित्रं (नारिकेलं) नारियल को (आचार्य भावेन कृत्वा) आचार्य भाव से वरण करके (आसने च) आसन पर (संस्थापयेत्) स्थापित करे।

बहुत सी शिक्षाएं जानकारियाँ, ऐसी होती होती हैं जो पुस्तकें पढ़ने मात्र से प्राप्त हो जाती हैं, साधारण रीति से सुनकर, देखकर या पूछ कर जिन्हें समझ लिया जाता है पर कुछ बातें ऐसी हैं जिनके लिए शिक्षक के अधिक सान्निध्य की आवश्यकता पड़ती है। शरीर की चीड़ फाड़ करने की शिक्षा प्राप्त करने के लिए कुशल सिविल सर्जनों के साथ रहना होता हैं, इसी प्रकार तरह−तरह की कारीगरी, चित्रकला, रसायन, संगीत, वस्तु निर्माण, शिल्प आदि के लिए शिक्षक की समीपता आवश्यक है। कोई आदमी सफल सुनार, हलवाई, लुहार, बढ़ई, जुलाहा, चित्रकार सब तक नहीं बन सकता, जब तक कि‍ वह इन सब बातों के लिए किसी अनुभवी का साथ न करे। आगे चलकर पुस्तकों द्वारा कोई मनुष्य स्वयमेव कितना ही ज्ञान प्राप्त कर ले पर आरंभ में उसे भाषा विज्ञान के लिए, बोलना और लिखना पढ़ना सीखने के लिए दूसरों की क्रियात्मक शिक्षा की आवश्यकता होती है।

जिन कार्यों के लिए शिक्षक की समीपता की आवश्यकता है उनमें से एक महत्व पूर्ण कार्य साधना भी है। आध्यात्मिक ज्ञान और साधना के संबंध में बहुत सारी पुस्तकें मौजूद हैं, उन्हें पढ़कर बहुत भारी लाभ उठाया जाता है, परन्तु जो साधना के मर्मस्थल है उनके लिए अनुभवी शिक्षक की क्रियात्मक सहायता ही चाहिए। डाक्टरी विज्ञान पर बड़े−बड़े ग्रन्थ मौजूद हैं, यह सभी ग्रन्थ अत्यन्त आवश्यक है और डाक्टरी शिक्षा के विद्यार्थी की उन्हें पढ़ना जरूरी है। क्योंकि इतना विस्तृत विज्ञान बिना समझे कोई छात्र अच्छा डॉक्टर नहीं बन सकता। लेकिन कोई छात्र यह कहे कि पुस्तकें निरर्थक हैं यह सब ज्ञान तो मैं गुरुमुख से ही प्राप्त करूंगा तो यह असंभव है। बेचारा शिक्षक कहाँ तक उस महाविज्ञान को कहेगा। यह कार्य तो पुस्तकों द्वारा ही हो सकता−परंतु हाँ, सर्जरी का−चीड़ फाड़ का−कार्य अवश्य ही ऐसा है जिसका व्यवहारिक ज्ञान गुरु के सम्मुख ही प्राप्त हो सकता है। अध्यात्मिक महा विज्ञान में साधना भी ऐसा ही मर्मस्थल है जिसके लिए अनुभवी गुरु की आवश्यकता है।

गायत्री के साधक को चाहिए कि अपनी साधना के लिए कोई शिक्षक−आचार्य−चरण करे। जिससे साधना संबंधी शंकाओं तथा समय समय पर उठने वाले प्रश्नों का, विघ्नों का समाधान उसके द्वारा होता रहे। बीच−बीच में ऐसी परिस्थितियाँ आती रहती हैं, ऐसे अनुभव होते रहते हैं जिनके कारण चित्त विचलित हो जाता हैं, मन में संकल्प विकल्प उठने लगते हैं, उन विक्षेपों का समाधान न हो तो साधनों में मन नहीं लगता हैं, संदेहों की वृद्धि से श्रद्धा और विश्वास में न्यूनता आ जाती है। इस प्रकार के विघ्नों को टालने के लिए ऐसे शिक्षक की आवश्यकता है जो उसकी मानसिक स्वास्थ्यता की रक्षा कर सकें।

आज कल गुरुडम काफी बदनाम हो चुका है। धूर्त, अर्थ−लोलुप, मूर्ख, भ्रष्ट चरित्र स्वार्थी एवं ब्रह्मत्व से रहित गुरुओं की बाढ़ सी आई हुई हैं। शिष्य का कान फूँक कर कुछ उलटा सीधा मंत्र बता देना और फिर सदा उनसे दक्षिणा की याचना करते रहना यही गुरुओं का कार्य रह गया है। इसके अतिरिक्त कभी कभी तो इन लोगों द्वारा शिष्यों के साथ भयंकर विश्वासघात अपहरण भ्रम में डाल देना चरित्र नाष आदि अनेक कुकर्म भी होते देखे जाते हैं ऐसी दशा में इन गुरु नाम धारियों के प्रति अविश्वास घृणा एवं तिरस्कार के भाव जन साधारण के मन में फैलना स्वाभाविक है। इतना होते हुए भी शिक्षक की आवश्यकता कम नहीं हो जाती है। वनस्पति घी दुकानों में पटा पड़ा है, गाँवों की झोपड़ियों तब उसका प्रवेश हो गया है तो भी असली घी के महत्व के कुछ कमी नहीं आई हैं। नकली सोने के जेवर और नकली जवाहरात प्रचुर परिमाण में बाजार में मौजूद है इस पर भी असली सोने और असली जवाहरात का गौरव तनिक भी नहीं घटता। आज का घृणित गुरुडम सर्वथा तिरस्कार का पात्र है इस पर भी आत्मोन्नति के लिए सच्चे शिक्षकों की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता। उनकी जैसी आवश्यकता प्राचीन काल में थी वैसी ही आज भी है।

एक आत्मा की शक्ति से दूसरी आत्मा को आत्मबल प्राप्त होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए गायत्री के साधकों को अपनी पीठ पर एक बलवान रक्षक और सामर्थ्यवान पोषक की नियुक्ति करनी होती हैं। यह दृढ़ पुरुष अथवा शिक्षक कहलाता है। इसे नियुक्त करने से पूर्व उसके ज्ञान आचरण और व्यक्तिगत अनुभव को देख लेना आवश्यक है। जिसमें यह तीनों बाते उचित मात्रा में हों उसे ‘आचार्य’ कहते हैं। परीक्षा करके संतोष प्राप्त कर लेने के उपरान्त इस आचार्य को निष्कपट भाव से, श्रद्धा और विश्वास पूर्वक अपना पथ प्रदर्शक मान लेना चाहिए। यदि वह गलत पथ प्रदर्शन करता हो तो भी साधना विषय में उसी की बात को प्रामाणिक मानना चाहिए। जब तक उस गुरु का परित्याग न कर दिया जाय तब तक साधना विषय उसका अनुशासन मान्य होना चाहिए। गलत पथ प्रदर्शन का दोष और दुष्परिणाम उस शिक्षक पर ही पड़ता हैं−शिष्य पर नहीं।

श्रद्धा और विश्वास के आधार पर अध्यात्म विज्ञान का सारा महल खड़ा हुआ है। यदि इन दो आधार शिलाओं को हटा दिया जाय तो वह सारी इमारत गिर पड़ेगी। इन दोनों महा तत्वों को सुदृढ़ बनाकर ही किसी महान् कार्य में लगाया जा सकता है और उसके द्वारा आलौकिक लाभों को प्राप्त किया जा सकता है। इस श्रद्धा और विश्वास की स्थापना और परिपुष्टि का प्रारंभिक अभ्यास ‘गुरु’ नामधारी व्यक्ति से किया जाता है क्योंकि अप्रत्यक्ष तत्वों पर श्रद्धा रोपण करने की अपेक्षा प्रत्यक्ष व्यक्तियों पर भक्तिभाव सुगम है। इस पहली सीढ़ी पर मजबूती से पैर जमा लेने के उपरान्त ऊपर की सीढ़ियों पर चढ़ना अधिक सुगम होता है। जितनी अधिक आत्मीयता, श्रद्धा, निष्कपटता, भक्ति भावना इस ‘शिक्षक’ के प्रति साधक ही होती है उतना ही उसका कार्य अधिक सरल हो जाता है। गुरु के ऊपर फेंकी हुई श्रद्धा उसी तरह लौट कर शिष्य के पास आ जाती है जिस प्रकार सामने की दीवार पर रबड़ की गेंद जितने जोर से खींच कर मारी जाती है उतने ही प्रतिघात के साथ लौटकर वापिस आती है। इस श्रद्धा से गुरु को कितना लाभ होता है, इसका हिसाब रखना आसान है, पर शिष्य को जो अपार लाभ होता है उसकी गणना नहीं हो सकती।

कई बार ऐसी कठिनाईयाँ सामने आती है कि ऐसे श्रेष्ठ, ज्ञान, आचरण और अनुभव से युक्त आचार्य हर स्थान पर नहीं होते, साधक का उनके पास सुदूर स्थानों में जाकर रहना कठिन होता है। ऐसी स्थिति में क्या किया जाय? क्या उन्हीं लंठ, गबीर, धूर्तराजों से काम फुँकवा कर काम चलाया जाय? नहीं, ऐसी अनुपयुक्त विलक्षणता को गले में बाँध लेने से कुछ लाभ न होगा। ऐसी स्थिति के लिए एक दूसरा मार्ग ‘आपश्रि धर्म’ की तरह शास्त्रकारों ने बताया है वह यह कि − नारियल के पवित्र फल को वरण करके आचार्य के आसन पर स्थान पर− स्थापित करे। अपनी श्रद्धा ही प्रधान है। उस श्रद्धा का आरोपण जिस वस्तु पर किया जाता है वह सजीव जैसी फल प्रदान करने वाली बन जाती है।

एकलव्य मील की कथा प्रसिद्ध है। वन में शिकार के लिए पाण्डव गये तो उनके कुत्ते के होठों को किसी अज्ञात व्यक्ति ने बाणों से सी दिया। कुत्ता पाण्डवों के पास लौटा तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि हमसे भी अधिक ऐसा कौन बाण विद्या का ज्ञाता है जिसने इस प्रकार से तीर चलाना सीखा है कि केवल होठों को ही सी दिया मुँह में अन्यत्र चोट न लगे। पाण्डव रक्त की बूंदों के टपकने के खोज पर उस व्यक्ति के पास जा पहुँचे। वह भील था। उससे पूछा गया तुमने ऐसी शस्त्र विद्या किससे सीखी। उसने बताया− द्रोणाचार्य से। पाण्डव अपने गुरु द्रोणाचार्य पर बड़े कुपित हुए कि उनने उन्हें ऐसी विद्या न सिखाकर एक भील को सिखाई, द्रोणाचार्य को स्वयं बड़ा आश्चर्य हुआ, वे वहाँ गये और एकलव्य से पूछा, भाई तू कैसा हमारा शिष्य? हमने तो तुझे देखा तक नहीं। उसने उत्तर दिया− भगवान्, आपकी मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उसी को मैंने गुरु माना और उसी की संरक्षकता में स्वयमेव बाण विद्या सीखी। पाँडवों के आग्रह पर द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरुदक्षिणा में दाहिने हाथ का अंगूठा माँगा जो उसने खुशी खुशी काट कर दे दिया। यह कथा बताती है कि मिट्टी के बनाये हुए गुरु इतनी अधिक शिक्षा दे सकते हैं, जितने सचमुच के गुरु नहीं दे सकते। स्वामी रामानंद के अनेकों शिष्यों में से इतना ज्ञानी कोई नहीं हुआ था। जितने की −कबीर। कबीर जुलाहे थे। जुलाहे को शिष्य बनाने के लिए रामानंदजी तैयार न हुए। एक दिन कबीर उस रास्ते पर जा लेटे जहाँ होकर रामानंदजी गंगास्नान को प्रातःकाल जाया करते थे। स्वामी जी का पैर कबीर की छाती पर पड़ा वे ‘राम राम’ कहते हुए पीछे हट गये। कबीर ने उस चरण स्पर्श को दीक्षा और राम राम को गुरुमंत्र मान लिया और इतने मात्र से उन्होंने वह लाभ उठाया जो अन्य किसी शिष्य को न मिला। महर्षि दत्तात्रेय के 24 गुरु थे यह सब पशु पक्षी थे, कौआ, कुत्ता, चील, मकड़ी, चींटी आदि से स्वयमेव शिक्षा ग्रहण करके उन्हें अपना गुरु माना था और इतना बड़ा ज्ञान भंडार एकत्रित किया था जितना कि बड़े बड़े ब्रह्मज्ञानी, वेद−शास्त्रों का पाठ करके भी एकत्रित नहीं कर पाते।

काष्ठ और पाषाण की मूर्तियाँ अपने भक्तों के ईश्वर बन जाती हैं। ईश्वर के समान फल देती हैं, फिर कोई कारण नहीं कि आचार्य भाव वरण किया हुआ नारियल आचार्य का फल दान न करे। श्रद्धा ही प्रधान है। श्रद्धा की इन प्रतिष्ठा कर देने से निर्जीव वस्तुएं सजीव हो सकती हैं। आचार्य के अभाव में नारियल को गुरुभाव से वरण किया जा सकता है पर उसमें किसी चैतन्य दिव्य आत्मा की भावना करनी आवश्यक है। किसी ऐसे व्यक्ति को मन में गुरु भाव से स्वीकार किया जा सकता है। जो समीप हो किन्तु उसके ज्ञान, आचरण और अनुभव से अपना विश्वास हो। उसके प्रतीक इस नारियल को उसी प्रकार बनाया जा सकता है जैसे कि भगवान का प्रतीक मूर्ति को बना लिया जाता है। फलों में नारियल का फल अधिक सात्विक, अधिक सजीव, अधिक प्राणयुक्त है। मनुष्य की खोपड़ी से बहुत कुछ सूक्ष्म समता उसमें होने से उसे खोपड़ा या खोपना कहकर भी पुकारते हैं। हमारे शिर पर जैसे बाल हैं उसके ऊपर भी जटाएं होती हैं। जटा के नीचे आँखों के छेद और नासिका का चिन्ह मिलता है। खोपड़ी के बाहरी अस्थि आवरण के भीतर जैसे भूरा कोमल, स्निग्ध मस्तिष्क रहता है वैसे ही उसके भीतर भी गिरी रहती है। यज्ञ में, बलिदान में, दान में, भेंट में, हर पुनीत कार्य में नारियल का फल श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि वह वृक्ष जगत में उसकी बहुत कुछ समता हमारे मस्तिष्क से है। वह सूक्ष्म भावनाओं को अपने में धारण करने की अद्भुत क्षमता रखता है। जैसी भावनाओं से ओत प्रोत उसे किया जाता है वह उन्हें आसानी से अपने में धारण कर लेता है। अपनी कोई भावना किसी को भेंट करनी होती है तो उसे नारियल के साथ अभिमंत्रित करके भेंट करते हैं। वह भावना के साथ साथ बहुत समय तक बनी रहती है। इस सब बातों को देखते हुए गुरुभाव से वरण करने के लिए नारियल का फल ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है ।

जिस आचार्य को गुरु वरण किया जाय उसका प्रतीक नारियल को बनाकर उत्तम आसन पर स्थापित कर लेना चाहिए। यह नारियल सड़ा घुना न हो नया चैतन्य और बढ़ा हो। उसे शुद्ध जल में स्नान कराके, कलावा − शुद्ध सूत− चारों ओर लपेट कर वरण करना चाहिए और भक्ति भाव से प्रणाम करके उसे उत्तम, पूजा योग्य, स्थान पर स्थापित कर देना चाहिए। यदि उस निर्धारित गुरु का चित्र मिल सके तो वह भी नारियल के साथ स्थापित करना चाहिए। उस पर नित्य अक्षत, पुष्प, धूप, चंदन आदि माँगलिक द्रव्य चढ़ाकर अपनी भक्ति भावना जागृत करनी चाहिए। कोई बात गुरु से पूछनी हो तो चित्त को स्वस्थ और शान्त करके ध्यानावस्थित हो और निर्धारित गुरु की सूक्ष्म प्रतिमा का दिव्य नेत्रों से चिंतन करें। अपने प्रश्न को उनके सामने रखकर चित्त को बिल्कुल खाली कर दें। कुछ समय में अपने आप आपके अंदर एक उत्तर सूझ पड़ेगा। यह स्फुरणा गुरु की मानकर तदनुसार कार्य करना चाहिए। साधक को अपनी सफलता के लिए आचार्य का वरण करना आवश्यक है। यदि ऐसा श्रेष्ठ व्यक्ति समीप में न मिले तो किसी दूरसिडडडडडडडडडडडड सत्पुरुष को नारियल के माध्यम से गुरु वरण किया जा सकता है। पहले गुरु दीक्षा ली जा चुकी है या नहीं इससे लावनडडडडडडड दीक्षा का को कोई संबंध नहीं। एक व्यक्ति के कई गुरु हो सकते हैं। दत्तात्रेय के 24 गुरु थे। अब भी दीक्षागुरु, तीर्थ गुरु, शिक्षा गुरु, संगीत गुरु, शिल्प गुरु, कुल गुरु, आदि अनेक गुरु होते हैं। यदि कान फूँकने की रस्म श्रद्धा कराई जा चुकी हो तो आत्म लाघनाडडडडडड के लिए गायत्री उपासना के लिए एक “साधना गुरु” का प्रथक से वरण किया जा सकता है। इस वरण से साधना की सफलता में बड़ी सहायता मिलती है।

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साधन सफलता के दश लक्षण

सफलः साधको लोके प्राप्नुतेऽनुभवान् नवान्। चित्रान् दश विघाँश्चैच साधना सिद्धयनन्तरम्॥

(लोके) संसार में (सफलः) सफल (साधकः) साधक (नवान) नवीन (चित्रान् च) और विचित्र (दश विधान) दश प्रकार के (अनुभवान) अनुभवों को (साधना सिद्धयनन्तरं) साधना की सिद्धि के पश्चात (प्राप्नुते) प्राप्त करता है।

गायत्री साधना से साधक में एक सूक्ष्म दैवी चेतना का आविर्भाव होता है। प्रत्यक्ष रूप से उसके शरीर या आकृति में कोई विशेष अन्तर नहीं आता पर भीतर ही भीतर भारी हेर−फेर हो जाता है। आध्यात्मिक तत्वों की वृद्धि से प्राणमय कोष, विशान्मयडडडडडडडड कोश और मनोमय कोषों में जो परिवर्तन होता है उसकी दाया अन्नमय कोष में बिलकुल ही दृष्टि गोचर न हो ऐसा नहीं हो सकता। यह सच है कि शरीर का ढांचा आसानी से नहीं बदलता, पर यह भी सच है कि आन्तरिक हेर फेर के चिन्ह शरीर में प्रकट हुए बिना नहीं रह सकते।

सर्प के माँस कोषों में जब एक नई त्वचा तैयार होती है तो उसका लक्षण सर्प के शरीर पर परिलक्षित होता है, उसकी देह भारी हो जाती है, तेजी से वह दौड़ नहीं सकता, स्फूर्ति और उत्साह से वह वंचित हो जाता है, एक स्थान पर पड़ा रहता है। जब वह चमड़ी पक जाती है तो सर्प बाहरी त्वचा को बदल देता है, इसे केंचुली पलटना कहते हैं केंचुली छोड़ने के बाद सर्प में एक नया उत्साह आता है, उसकी चेष्टाएं बदल जाती है, उसकी नई चमड़ी पर चिकनाई, चमक और कोमलता स्पष्ट रूप से दिखलाई देती है। ऐसा ही हेर फेर साधक में होता है जब उसकी साधना गर्म में पकती है तो उसे कुछ उदासी, भारीपन, अनुत्साह एवं शिथिलता के लक्षण प्रतीत होते हैं पर जब साधना पूर्ण हो जाती है तो दूसरे ही लक्षण प्रकट होने लगते हैं। माता के उदर में जब गर्भ पकता है तब तक माता का शरीर भारी, गिरा−गिरा सा रहता है उसमें अनुत्साह देखा जाता है पर जब प्रसूति से निवृत्ति हो जाती है तो वह अपने में एक हलकापन, उत्साह एवं चैतन्य अनुभव करती है।

साधक जब साधना करने बैठता है तो अपने अन्दर एक प्रकार का आध्यात्मिक गर्भ धारण करता है। तंत्र शास्त्रों में साधना को मैथुन कहा है। जैसे मैथुन को गुप्त रखा जाता है वैसे ही साधना को गुप्त रखने का आदेश किया गया है। आत्मा जब परमात्मा से लिपटती है, उसका आलिंगन करती है तो उसे एक अनिवर्चनीय आनन्द आता है, इसे भक्ति की तन्मयता कहते हैं, जब दोनों का प्रगाढ़ मिलन होता है, एक दूसरे में आत्मसात होते हैं तो उस स्खलन को “समािडडडड” कहा जाता है। आध्यात्मिक मैथुन का समाधि सुख अन्तिम स्खलन है। गायत्री उपनिषद् और सावित्री उपनिषद् में अनेक मिथुनों का वर्णन किया गया है। वहाँ बताया गया है कि सविता और सावित्री का मिथुन है। सावित्री की −गायत्री की− आराधना करने से साधक अपनी आत्मा को एक योनि बना लेता है। जिसमें सविता का तेजपुँज परमात्मा का तेज वीर्य गिरता है। इसे शक्तिपात भी कहा गया है। इस शक्तिपात विज्ञान के अनुसार अमैथुनी सृष्टि भी उत्पन्न हो सकती है। कुन्ती से कर्ण का, मरियम के पेट से ईसा का उत्पन्न होना असंभव नहीं है। देव शक्तियों की उत्पत्ति इसी प्रकार के सूक्ष्म मैथुन से होती है, समुद्र मंथन एक मैथुन था जिसके फल स्वरूप चौदह रत्नों का प्रसव हुआ। ऋण और धन (नेगेटिव और पाजेटिव) परमाणुओं के आलिंगन से विद्युत प्रवाह का रस उत्पन्न होता है। तंत्र शास्त्रों में स्थान स्थान पर जिस मैथुन को प्रशंसित किया गया है वह यही साधना मिथुन है।

आत्मा और परमात्मा का सविता और सावित्री का मिथुन जब प्रगाढ़ आलिंगन में आबद्ध होता है तो उसके फल स्वरूप एक आध्यात्मिक गर्भ धारण होता है। इसी गर्भ को आध्यात्मिक भाषा में भर्ग कहते हैं। भर्ग को जो साधक जितने अंशों में धारण करता है उसे उतना ही स्थान अपने अन्दर इस नये तत्व के लिए देना होता है। नये तत्वों की स्थापना के लिए पुराने तत्वों को पदच्युत होना पड़ता है, इस संक्रांति के कारण स्वाभाविक क्रिया विधि में अन्तर आ जाता है और उस अन्तर के लक्षण साधक में उसी प्रकार प्रकट होते हैं जैसे गर्भवती स्त्री को अरुचि, उबकाई, कोष्ठबद्धता आलस्य आदि लक्षण होते हैं। वैसे ही लक्षण साधक को भी उस समय तक जब तक कि उसकी अन्तः योनि में भर्ग पकता रहता है, परिलक्षित होते हैं। केंचुली में भरे हुए सर्प की तरह वह भी अपने को भारी भारी, विधा हुआ, जकड़ा हुआ, अवसाद ग्रस्त अनुभव करता है। आत्म विधा के आचार्य जानते है कि साधनावस्था में साधक को कैसी विषम स्थिति में रहना पड़ता है। इसलिए वे अपने अनुयायियों को साधना काल में बड़े आचार विचार के साथ रहने का आदेश करते हैं रजस्वला या गर्भवती स्त्रियों से मिलता जुलता आहार विहार साधकों को अपनाना होता है। तभी वे साधना संक्रांति को ठीक प्रकार से पार कर पाते है।

अण्डे से बच्चा निकलता है गर्भ से सन्तान पैदा होती है। साधक को भी साधना के फल स्वरूप एक सन्तान मिलती है जिसे शक्ति या सिद्धि कहते हैं। मुतिडडडडडड समाधि, ब्राह्मी स्थिति, सुर्यावस्था आदि नाम भी इसी के हैं। यह सन्तान आरंभ में बड़ी निर्बल तथा लघु आकार की होती है। जैसे अंडे से निकलने पर बच्चे बड़े ही लुँज पुँज होते हैं, जैसे माता के गर्भ से उत्पन्न हुए बालक बड़े ही कोमल होते हैं वैसे ही साधना पूर्ण होने पर प्रसव हुई नवजात सिद्धि भी बड़ी कोमल होती है, बुद्धिमान साधक उसे उसी प्रकार पाल−पोस कर बड़ा करते हैं जैसे कुशल माताएं अपनी संतान को अनिष्टों से बचाती हुई पौष्टिक पोषण देकर पालती हैं।

चालीस दिन का गायत्री अनुष्ठान, पुरश्चरण अथवा कोई अन्य साधना जब तक साधक के गर्भ में पकता रहता है, कच्चा रहता है तब तक उसके शरीर में आलस्य और अवसाद के चिन्ह रहते हैं, स्वास्थ्य गिर हुआ और चहरा उतरा हुआ दिखाई देता है पर जब साधना पक जाती है और सिद्धि की सुकोमल सन्तति का प्रसव होता है तो साधक में एक हलकापन, चैतन्य, उत्साह आ जाता है वैसा −जैसा कि केंचुली बदलने के बाद सर्प में आता है। सिद्धि प्रसव हुआ या नहीं इसकी परीक्षा इन लक्षणों से हो सकती है। यह दस लक्षण नीचे दिए जाते है।

1. शरीर में हलकापन और मन में उत्साह होता है।

2. शरीर में से एक विशेष प्रकार की सुगंध आने लगती है।

3. त्वचा पर चिकनाई और कोमलता का अंश बढ़ जाता है।

4. तामसिक आहार विहार से घृणा बढ़ जाती है और सात्विक दिशा में मन लगता है ।

5. स्वार्थ का कम और परमार्थ का अधिक ध्यान रहता है।

6. नेत्रों में तेज झलकने लगता है।

7. किसी व्यक्ति या कार्य के विषय में वह जरा भी विचार करता है तो उसके संबंध में बहुत सी ऐसी बातें स्वयमेव प्रतिमथित होती है। जो परीक्षा करने पर ठीक निकलती है।

8. दूसरों के मन के भाव जान लेने में देर नहीं लगती।

9. भविष्य में घटित होने वाली बातों का पूर्णाभ्यास मिलने लगता है।

शाप या आशीर्वाद सफल होने लगते हैं। अपनी गुप्त शक्तियों से वह दूसरों का बहुत कुछ भला या बुरा कर सकता है।

यह दस लक्षण इस बात के प्रमाण हैं कि साधक का मार्ग पक गया और सिद्ध का प्रसव हो चुका। इस शक्ति सन्तति को जो साधक सावधानी के साथ पालते पोसते हैं उसे पुष्ट करते है। वे भविष्य में आज्ञाकारी सन्तान वाले बुजुर्ग की तरह आनन्द परिणामों का उपभोग करते हैं किन्तु जो फूहड़ जन्मते ही सिद्धि का दुरुपयोग करते हैं उनकी स्वल्प शक्ति का विचार न करते हुए उस पर अधिक भार डालते हैं उनकी गोदी खाली हो जाती है और मृतवत्सा माता की तरह उन्हें पश्चात्यडडडडडड करना पड़ता है।

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स्वप्न में अनुभव

सततं साधनाभिर्योयाति साधकताँ नरः। स्वप्नावस्थासु जायन्ते तं दिव्या अनुभूतयः॥

(यः) जो (नरः) मनुष्य (सततं) निरन्तर (साधनाभिः) साधना करने से (साधकताँ) साधकत्व को (याति) प्राप्त हो जाता है (तं) उस व्यक्ति को (स्वप्नावस्थासु) स्वप्नावस्था में (दिव्या अनुभूतयः) दिव्य अनुभव (जायन्ते) होते हैं।

साधना से विशेष दिशा में मनोभूमि का निर्माण होता है। श्रद्धा विश्वास तथा साधना विधि की कार्य प्रणाली के अनुसार अन्तःकरण पर एक विशेष प्रकार की छाप पड़ती है तद्नुसार आन्तरिक क्रियाएं उसी दिशा में प्रवाहित होने लगती है? जिससे मन, बुद्धि और चित्त अहंकार का चतुष्टय वैसा ही रूप धारण करने लगता है। भावनाओं के संस्कार अंतर्मन में गहराई तक प्रवेश कर जाते हैं। गायत्री साधक की मानसिक गतिविधि में आध्यात्मिकता एवं सात्विकता का प्रमुख स्थान बन जाता है।

जैसी इच्छा आकाँक्षा भावना, श्रद्धा और निष्ठा मनुष्य की होती है उसी के अनुसार उसे अनुभव आते हैं वैसे ही विचार उत्पन्न होते हैं और वैसी ही क्रियाएं बनती हैं, उसी प्रकार के साधन, सहयोग एवं अवसर प्राप्त होने लगते हैं। अन्तः चेतना का निर्माण जिस आधार पर हुआ है उसी आधार पर जागृत अवस्था, स्वप्न अवस्था सुषुप्ति अवस्था तथा तुरीय अवस्था में मन की गति विधियाँ होती रहती है गायत्री का साधक जागृत अवस्था में उत्तम विचारों में रमण करता है, उच्च भावनाओं तथा दिव्य आकाँक्षाओं के साथ स्मरण करता है, साथ ही जब वह निद्राग्रस्त होकर स्वप्नावस्था में होता है तो उसे अपने इस नये अन्तःनिर्माण के अनुरूप दृश्य तथा भावों का अनुभव होता है। उसे वैसे ही स्वप्न आते हैं।

गायत्री साधकों को साधारण व्यक्तियों की तरह निरर्थक स्वप्न प्रायः बहुत कम आते हैं। उनकी मनोभूमि ऐसी अव्यवस्थित नहीं होती जिसमें चाहे जिस प्रकार के उल्टे सीधे स्वप्नों का उद्भव होता है, जहाँ व्यवस्था स्थापित हो चुकी हैं। वहाँ की क्रियाएं भी व्यवस्थित होती है। गायत्री साधकों के स्वप्नों को हम बहुत समय से ध्यान पूर्वक सुनते रहे हैं। तद्नुसार हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा है। कि ऐसे लोगों के स्वप्न निरर्थक बहुत कम होते हैं उनमें सार्थकता की मात्रा ही अधिक रहती है।

निरर्थक स्वप्न, अत्यन्त अपूर्ण होते हैं, उनमें केवल किसी बात की छोटी सी झाँकी होती है, फिर तुरन्त उनका तारतम्य विग्रह जाता है। दैनिक व्यवहार की असाधारण क्रियाओं की सामान्य स्मृति मस्तिष्क में पुनःपुनः जागृत होती रहती हैं और भोजन, स्नान, वायुसेवन, जैसी साधारण बातों की दैनिक स्मृति के अस्त, व्यस्त स्वप्न दिखाई देते हैं ऐसे स्वप्नों को निरर्थक कहा जा सकता है। सार्थक स्वप्न कुछ विशेषता लिए हुए होते हैं, उनमें कोई विचित्रता, नवीनता, घटनाक्रम एवं प्रभावोत्पादक क्षमता होती है। उन्हें देखकर मन में भय, शोक, चिन्ता, क्रोध, हर्ष, विशाद, लोभ, मोह आदि के भाव उत्पन्न होते हैं। निद्रा त्याग देने पर भी उनकी छाप मन पर बनी रहती है और चित्त में बार बार यह जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि इस स्वप्न का अर्थ क्या है।

साधकों के सार्थक स्वप्नों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। (1) पूर्व संचित कुसंस्कारों का निष्कासन (2) श्रेष्ठ तत्वों की स्थापना का प्रकटी करण (3) किसी भविष्य संभावना का पूर्वाभास इन तीन श्रेणियों के अंतर्गत विविध प्रकार के सभी सार्थक स्वप्न आ जाते है।

पूर्व संचित कुसंस्कारों के निष्कासन में इस लिए होता है कि गायत्री साधना द्वारा आध्यात्मिक नये तत्वों की वृद्धि साधक के अन्तःकरण में हो जाती है। जहाँ तक वस्तु रखी जाती है वहाँ से दूसरी को हटाना पड़ता है। गिलास में पानी भरा जाय तो उसमें पहले से भरी हुई हवा को हटाना पड़ेगा। रेल के डिब्बे में नये मुसाफिरों को स्थान मिलने के लिए यह आवश्यक है कि उसमें बैठे हुए पुराने मुसाफिर उतरें। दिन का प्रकाश आने पर अन्धकार को भागना ही पड़ता है। इसी प्रकार गायत्री साधक के अंतर्जगत में जिन दिव्य तत्वों की वृद्धि होती है, उन सुसंस्कारों के लिए स्थान नियुक्त होने से उससे पूर्व नियुक्त कुसंस्कारों का निष्कासन स्वाभाविक है। यह निष्कासन जागृत अवस्था में भी होता रहता है और स्वप्न अवस्था में भी। विज्ञान के सिद्धान्तानुसार विस्फोटक उष्णवीर्य के परार्थ जब स्थान च्युत होते है तो वे एक झटका मारते हैं। बन्दूक जब चलाई जाती है तो वह पीछे की ओर एक जोरदार झटका मारती है। बारूद जब जलती है तो एक धड़ाके की आवाज करती है, दीपक बुझते समय एक बार जोर से लो उठाता है। इसी प्रकार कुसंस्कार भी मानस लोक से प्रमाण करते समय मस्तिष्क तन्तुओं पर आघात करते हैं और उन आघातों की प्रतिक्रिया स्वरूप जो विक्षोभ उत्पन्न होता है उसे स्वप्नावस्था में भयंकर अस्वाभाविक, अनिष्ट, एवं उपद्रव के रूप में देखा जाता है।

भयानक हिंसक पशु, सर्प, सिंह, व्याघ्र भूत, पिशाच, चोर, डाकू, आदि का आक्रमण होना सुनसान, एकान्त डरावना जंगल, दिखाई देना, किसी प्रिय जन की मृत्यु अग्निकाण्ड जल की बाढ़ भूकम्प युद्ध आदि के भयानक दृश्य दीखना, अपहरण अन्याय, शोषण, विश्वासघात, द्वारा अपना शिकार होना, कोई विपत्ति आना, अनिष्ट की आशंका से चित्त घबराना आदि भयंकर दिल धड़काने वाले ऐसे स्वप्न जिनके कारण मन में चिन्ता, बेचैनी, पीड़ा भय, क्रोध, द्वेष, शोक, कायरता, ग्लानि, घृणा आदि के भाव उत्पन्न होते हैं वे पूर्व संचित इन्हीं कुसंस्कारों की अन्तिम झाँकी का प्रमाण होते है। यह स्वप्न बताते हैं। कि जनम जन्मान्तरों की संचित यह कुप्रवृत्तियां अब अपना अन्तिम दर्शन ओर अभिवादन करती हुई विदा ले रही है और मन में स्वप्न में इस परिवर्तन को ध्यान पूर्वक देखने के साथ साथ एक अलंकारिक कथा के रूप में किसी शृंखला बद्ध घटना का चित्र गढ़ डाला है और उसे स्वप्न रूप में देखकर जी बहलाया है।

कामवासना अन्य सब मनोवृत्तियों से अधिक प्रबल है। काम योग की अनियंत्रित इच्छाएं मन में उठती हैं। उन सबका सफल होना असंभव है। इसलिए वे परिस्थितियाँ द्वारा कुचली जाती रहती हैं, और मन मसोसकर वे अतृप्त, असंतुष्ट प्रेमिका की भाँति अंतर्गत के कोप भवन में खटपाटी लेकर पड़ी रहती हैं। यह अतृप्ति चुपचाप पड़ी नहीं रहती वरन् जब अवसर पाती है निद्रावस्था में अपने मनसूबों को चरितार्थ करने के लिए मन के लड्डू खाने के लिए मन चीते का स्वप्नों अभिनव रचती है। दिन में घर के लोगों के जागृत रहने के कारण चूहे डरते हैं और अपने बिलों में छुपे बैठे रहते है पर रात्रि को जब घर के आदमी सो जाते है तो चूहे अपने बिलों में से निकल कर निर्भयता पूर्वक उछल कूद मचाते हैं। कुचली हुई कामवासना भी यही करती है और अपनी क्षुधा का ख्याली पुलाव खाकर किसी प्रकार बुझाती है। स्वप्नावस्था में सुन्दर सुन्दर वस्तुओं का देखना उनसे खेलना, प्यार करना, जमा करना, रूपवती स्त्रियों को देखना, उनकी निकटता में आना, मनोहर नदी, तढाग, वन, उपवन, पुष्प, फल, नृत्य, गीत, वाद्य, उत्सव, समारोह जैसे दृश्यों को देखकर कुचली हुई वासनाएं किसी प्रकार अपने को तृप्त करती हैं। धन की, पद की, महत्व प्राप्ति की अतृप्त आकाँक्षाएं भी अपनी तृप्ति के झूठे अभिनय रचा करती हैं। कभी कभी ऐसा भी होता है कि अपनी अतृप्ति के दर्द का घाव की पीड़ा का और स्पष्ट रूप से अनुभव करने के लिए ऐसे स्वप्न दिखाई देते हैं मानों अतृप्ति और भी बढ़ गई। जो थोड़ा बहुत सुख या वह भी हाथ से चला गया अथवा मनोवांछा पूरा होते होते किसी आकस्मिक बाधा के कारण विघ्न उपस्थित हो गया।

अतृप्तियों को किसी अंश में या किसी अन्य प्रकार से तृप्त करने के एवं अतृप्ति को और भी उग्र रूप से अनुभव करने के लिए उपरोक्त प्रकार के स्वप्न आया करते हैं। यह दबी हुई वृत्तियां गायत्री की साधना के कारण उखड़कर अपना स्थान खाली करती हैं। इस परिवर्तन काल में वे अपने गुप्त रूप को प्रकट करती हुई विदा होती है। तद्नुसार साधक को साधना काल में प्रायः इस प्रकार के स्वप्न आया करते हैं। किसी मृतक प्रेमी के दर्शन, सुन्दर दृश्यों का अवलोकन, स्त्रियों से मिलना जुलना, मनोवाँछाओं का पूरा होना था। इच्छित वस्तुओं का और भी अधिक अभाव अनुभव होना आदि की घटनाओं के स्वप्न भी विशेष रूप से दिखाई देते हैं। इसका अर्थ है कि अनेकों दबी हुई अतृप्त तृष्णाएं, कामनाएं, वासनायें धीरे−धीरे करके अपनी विदाई की तैयारी कर रही हैं। आत्मिक तत्वों की वृद्धि के कारण ऐसा होना स्वाभाविक भी हैं।

दूसरी श्रेणी के स्वप्न वे होते हैं। जिनसे इस बात का पता चलता है कि अपने अन्दर सात्विकता की मात्रा में लगातार अभिवृद्धि हो रही है। सतोगुणी कार्यों का स्वयं करने या किसी अन्य के द्वारा होते हुए देखने के स्वप्न ऐसा ही परिचय देते हैं। पीड़ितों की सेवा अभावग्रस्तों की सहायता, दान, जप, तप, यज्ञ, व्रत, उपवास, तीर्थ, मन्दिर, पूजा, धार्मिक, कर्मकाण्ड, कथा, कीर्तन, प्रवचन, उपदेश, माता, पिता, साधु, महात्मा, नेता, विद्वान, गुरुजनों, की समीपता स्वाध्याय, अध्ययन, आकाशवाणी, देवी देवताओं के दर्शन दिव्य प्रकाश आदि आध्यात्मिक, सतोगुणी, शुभ स्वप्नों में मन अपने आप अपने अन्दर आये हुए नये शुभ तत्वों को देखता है और उन दृश्यों से शान्ति लाभ करता है।

तीसरे प्रकार के स्वप्न भविष्य में घटित होने वाली किन्हीं घटनाओं की ओर संकेत करते हैं। प्रातःकाल सूर्योदय से एक से दो घंटे पूर्व देखे हुए स्वप्नों में सचाई का बहुत अंश होता है। ब्रह्ममुहूर्त में एक तो साधक का मस्तिष्क निर्मल होता है दूसरे प्रकृति के अन्तराल का कोलाहल भी रात्रि की स्तब्धता के कारण बहुत अंशों में शान्त हो जाता है। उस समय सत तत्व की प्रधानता रहने के कारण वातावरण स्वच्छ रहता है अतएव सूक्ष्म जगत में विचरण करते हुए भविष्यों का, भावी विधानों का बहुत कुछ आभास मिलने लगता है।

कभी कभी अस्पष्ट और उलझे हुए ऐसे दृश्य दिखाई देते हैं। जिनसे यह तो मालूम होता है कि यह भविष्य में होने वाले किसी लाभ या हानि के संकेत हैं पर स्पष्ट रूप से यह विदित नहीं हो पाता कि इनका वास्तविक तात्पर्य क्या है। ऐसी उलझनों को स्वप्नों के कई कारण होते है। (1) भविष्य का विधान प्रारब्ध कर्मों से बनता है पर वर्तमान कर्मों से उस विधान में काफी हेर फेर हो सकता है। कोई पूर्व निर्धारित विधि का विधान, साधक के वर्तमान कर्मों के कारण कुछ परिवर्तित हो जाता है तो उसका निश्चित और स्पष्ट रूप बिगड़ कर अनिश्चित और अस्पष्ट हो जाता है। तदनुसार स्वप्न में उलझी हुई बात दिखाई पड़ती है। (2) कुछ भावी विधान ऐसे हैं जो नये कर्मों के नयी परिस्थितियों के, अनुसार बनते और परिवर्तित होते है। तेजी मंदी सट्टा लाटरी आदि के बारे में, जब तक भविष्य का भ्रूण ही तैयार हो पाता है पूर्ण रूप से उसकी स्पष्टता नहीं हो पाती तब तक उसका पूर्णमास साधक को स्वप्न में मिले तो वह एकाँगी एवं अपूर्ण होता है (3) अपने मन की सीमा जितने क्षेत्र में होती है वह व्यक्ति को ‘अहम’ की एक आध्यात्मिक इकाई होती है। इतने विस्तृत क्षेत्र का भविष्य उसका अपना भविष्य बन जाता है। भविष्य सूचक स्वप्न इस ‘अहम’ के सीमा क्षेत्र तक के अपने को दिखाई पड़ सकते हैं इसलिए ऐसा भी हो जाता है कि जो संदेश स्वप्न में मिला है वह अपनेपन की मर्यादा में आने वाले किसी कुटुंबी, पड़ौसी, रिश्तेदार, या मित्र के लिए हो। (4) साधक की मनोभूमि पूर्ण रूप से निर्मल न हो गई हो तो आकाश के सूक्ष्म अन्तराल में बढ़ते तथ्य अधूरे या रूपांतरित होकर दिखाई पड़ते है जैसे कोई व्यक्ति अपने घर से हमसे मिलने के लिए रवाना हो चुका हो तो उस व्यक्ति के स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति के आने का आभास मिले। होता यह है कि साधक की दिव्य दृष्टि धुँधली होती है जैसे दृष्टिदोष होने पर दूर चलने वाले मनुष्यों को पुतले तो दिखाई पड़ते है पर उनकी शकल नहीं पहचानी जाती। अब इस धुँधले अस्पष्ट आभास के ऊपर हमारी स्वप्न माया एक अकल्पित आवरण चढ़ा कर कोई झूठमूठ की आकृति जोड़ देती है और रस्सी को सर्प बना देती है। ऐसे स्वप्न आधे सत्य होते हैं आधे असत्य। परन्तु जैसे जैसे साधक की मनोभूमि अधिक निर्मल होती जाती है वैसे ही वैसे उसकी दिव्य दृष्टि स्वच्छ होती जाती है और उसके स्वप्न अधिकाधिक सार्थकता युक्त होने लगते हैं।

स्वप्न केवल रात्रि में या निद्रा ग्रस्त होने पर ही नहीं आते पर जागृत दशा में भी आते हैं। ध्यान को एक प्रकार का जागृत स्वप्न ही समझना चाहिए। कल्पना के घोड़े पर चढ़कर हम सुदूर स्थानों के विविधविधि, संभव और असंभव, दृश्य देखा करते हैं। यह एक प्रकार के स्वप्न ही है। निद्राग्रस्त स्वप्नों में अंतर्मन की क्रियाएं प्रधान होती है, जागृत स्वप्नों में बहिर्मन की क्रियाएं प्रमुख रूप से काम करती हैं। इतना अन्तर तो अवश्य है पर इसके अतिरिक्त निद्रित स्वप्न और जागृत स्वप्नों की प्रणाली एक ही हैं। जागृत अवस्था में साधक के मनोलोक में नाना प्रकार की विचार धाराएं और कल्पनाएं घुड़दौड़ मचाती है, यह भी तीन प्रकार की ही होती है, पूर्व कुसंस्कारों के निष्कासन, श्रेष्ठ तत्वों के प्रकटीकरण तथा भविष्य के पूर्वाभास की सूचना देने के लिए मस्तिष्क में विविध प्रकार के विचार भाव एवं कल्पना चित्र आते हैं। जो फल निद्रित स्वप्नों का होता है वही जागृत स्वप्नों का भी होता है।

कभी कभी जागृत अवस्था में भी कोई सूक्ष्म चमत्कारी, दैवी, अलौकिक, दृश्य किस किसी को दिखाई दे जाते हैं। इष्ट देव का किसी किसी को चर्मचक्षुओं से दर्शन होता है, कोई कोई भूत प्रेतों को प्रत्यक्ष देखते हैं, किन्हीं किन्हीं को दूसरों के चेहरे पर तेजोवलय और मनोगत भावों का आकार दिखाई देता है जिसके आधार पर वे दूसरों की आन्तरिक स्थिति को पहचान लेते हैं, रागी का अच्छा होना न होना संघर्ष में हारना जीतना, चोरी में गई वस्तु, आगामी लाभ हानि, विपत्ति सम्पत्ति जाति के बारे में कई मनुष्यों के अन्तःकरण में एक प्रकार की आकाश वाणी सी होती है और वह कई बार इतनी सच निकलती है कि आश्चर्य से दंग रह जाना पड़ता है। साधक जितना ही साधना पथ में अधिक बढ़ता है उसके निद्रित और जागृत स्वप्न अधिक स्पष्ट सार्थक और सत्य होते हैं।

यह स्वप्न सिद्धि भी गायत्री साधना की एक महत्वपूर्ण सिद्धि है।

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षट्चक्रों का जागरण।

एतस्माप्तुजपान्नुनं ध्यानमग्नेन चेतसा। जायते क्रमशश्चैव षट् चक्राणाँ तु जाग्रतिः॥

(नूनं) निश्चय ही (ध्यान मग्नेन चेतसा) ध्यान में रत चित्त के द्वारा (एतस्मात् जपात्) इस जप को करने से (क्रमशः) धीरे धीरे (षट् चक्राणाँ) षट् चक्र (जाग्रतिः जायते) जागृत हो जाते है।

षट् चक्राणि यदेतानि जागृतानि भवन्ति हिं। षट् सिद्धयोऽभिजायन्ते चक्रैरेतैस्तदानरम्॥

(हि) निश्चय से (यदा) जब (एतानि) ये (षट् चक्राणि) षट् चक्र (जागृतार्निभवन्ति) जागृत हो जाते है (तदा) तब (नरं) मनुष्य को (एतैः एतैः) इन चक्रों के द्वारा (षट्सिद्धयः) छै सिद्धियाँ (अभि जायन्ते) प्राप्त होती है।

कुण्डलिनी के शक्ति मूल तक पहुँचने के मार्ग में छह फाटक हैं, अथवा यों कहना चाहिए कि छह ताले लगे हुए हैं। यह फाटक या ताले खोलकर ही कोई जीव उस शक्ति केन्द्र तक पहुँच सकता है। इन छह अवरोधों को आध्यात्मिक भाषा में षट्चक्र कहते है।

सुषुम्ना के अंतर्गत रहने वाली तीन नाडियों में सब से भीतर स्थिर ब्रह्म नाडी से यह छह चक्र संबंधित है। माला के सूत्र में पिरोये हुए कमल पुष्पों से इनकी ऊष्मा दी जाती है। अन्यत्र दिये हुए चित्र में पाठक यह देख सकेंगे कि कौन सा चक्र किस स्थान पर है। आधार मूलाधार चक्र योनि की सीध में स्वाधिष्ठानचक्र पेडू की सीध में, मणिपूर चक्र नाभि की सीध में अनाहतचक्र हृदय की सीध में, विशुद्धाख्य चक्र कंठ की सीध में और आज्ञाचक्र भृकुटि के मध्य में अवस्थित है। इनसे ऊपर सहस्रार कमल है।

सुषुम्ना, तथा उसके अंतर्गत रहने वाली चित्रिणी आदि नाड़ियां इतनी सूक्ष्म हैं कि उन्हें साधारण नेत्रों से देख सकना कठिन है। फिर उनसे संबंधित यह चक्र तो और भी सूक्ष्म है किसी शरीर की चीर फाड़ करते समय इन चक्रों को नल नाडियों की तरह स्पष्ट रूप से नहीं देखा जा सकता क्यों कि हमारे चर्मचक्षुओं की तीक्ष्ण शक्ति बहुत ही सीमित है। शब्द की तरंगें, वायु के परमाणु, तथा रोगों के कीटाणु हमें आँखों से दिखाई नहीं पड़ते तो भी उनमें अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता इन चक्रों को योगियों ने अपनी योग दृष्टि से देखा है और उनका वैज्ञानिक परीक्षण करके महत्वपूर्ण लाभ उठाया है और उसके व्यवस्थित विज्ञान का निर्माण करके योग मार्ग के पथिक के लिए उसे उपस्थित किया है।

षट्चक्र एक प्रकार की सूक्ष्म ग्रन्थियाँ है जो ब्राह्मनाडी के मार्ग में बनी हुई है। इन चक्र ग्रन्थियों में जब साधक अपने ध्यान को केंद्रित करता है तो उसे वहाँ की सूक्ष्म स्थिति का बड़ा विचित्र अनुभव होता है। वे ग्रंथियाँ गोल नहीं होती वरन् उनमें इस प्रकार कोण निकले हो है जैसे पुष्प में पंखुरियाँ होती है इन कोण पंखुरियों को ‘डडडडडडडडडपऽ−दल’ कहते है। यह एक प्रकार के तन्तु गुच्छक है।

इन चक्रों के रंग भी विविध प्रकार के होते है। क्योंकि किसी ग्रन्थि में कोई और किसी में कोई तत्व प्रधान होता है। इस तत्व प्रधानता का तत् स्थानीय रक्त पर प्रभाव पड़ता है और उसका रंग बदल जाता है। पृथ्वी तत्व की प्रधान का मिश्रण होने से रक्त का रंग पीला, जल के मिश्रण से गुलाबी, अग्नि से नीला, वायु से शुद्ध लाल और आकाश से घुमैला हो जाता है। यही मिश्रण चक्रों का रंग बदल देता है।

धन नामक कीड़ा लकड़ी को काटता हुआ चलता है तो उस काटे हुए स्थान की कुछ आकृतियाँ भी बन जाती है। इन चक्रों में होता हुआ प्राण वायु आता जाता है उसका मार्ग उस ग्रन्थि की स्थिति के अनुसार कुछ टेढ़ा मेढ़ा होता है, इस गति की आकृति कई देवनागरी अक्षरों की आकृति से मिलती है, इसलिए उस वायु मार्ग को चक्रों के अक्षर कहते है।

द्रुतगति बहती हुई नदी में कुछ विशेष स्थानों में भ्रमर पड़ जाते है। यह पानी के भंवर कहीं उथले कही गहरे, कहीं तिरछे कहीं गोल कहीं चौकोर हो जाते है। प्राण वायु का सुषुम्ना प्रवाह इन चक्र में होकर जब द्रुतगति से गुजरता है तो वहाँ एक प्रकार के सूक्ष्म भ्रमर पड़ते हैं जिनकी आकृति चतुष्कोण अर्धचन्द्राकार, त्रिकोण, षट्कोण, गोलाकार, लिंगाकार तथा पूर्ण चन्द्रकार बनती है। अग्नि जब भी जलती है उसकी लौ ऊपर को उठती है जो नीचे मोटी और ऊपर पतली होती है, इस प्रकार एक अध्यवस्थित त्रिकोण सा बन जाता है। इसी प्रकार विविध आकृतियाँ वायु प्रवाह से बनती है। इन आकृतियाँ को चक्रों के यंत्र कहते है।

शरीर पंच तत्वों का बना हुआ है। इन तत्वों के न्यूनाधिक संमिश्रण से विविध अंग प्रत्यंगों का निर्माण और उनका कार्य संचालन होता है। जिस स्थान में जिस तत्व की जितनी आवश्यकता है उससे न्यूनाधिक हो जाने पर वह अंग रोग ग्रस्त हो जाता है। तत्वों का यथास्थान, यथा मात्रा में होना ही निरोगता का चिन्ह समझा जाता है। चक्रों में भी एक एक तत्व की प्रधानता होती है। जिस चक्र में जो तत्व प्रधान होता है वही उसका ‘तत्व’ कहा जाता है।

ब्रह्मनाडी की पोली नली में होकर जब वायु का अभिगमन होता है तो चक्रों के सूक्ष्म छिद्रों के आघात से उसमें एक वैसी ही ध्वनि होती है जैसी कि बांसुरी में वायु का प्रवेश होने पर छिद्रों के आघात से ध्वनि उत्पन्न होती है। हर चक्र में एक सूक्ष्म छिद्र है उस छिद्र की वंशी के स्तर छिद्र की सी प्रतिक्रिया होने के कारण स, रे, ग, म, जैसे स्वरों का एक विशेष ध्वनि प्रवाह होता है जो थँ, लँ, वँ, रँ, हँ, ऊँ, जैसे स्वरों में सुनाई पड़ता है। इसे चक्रों का बीज कहते है।

चक्रों में वायु की चाल में भी अन्तर होता है। जैसे बात, पित्त, कफ की नाडी कपोत, मंडूक, सर्प, कुकुट आदि की चाल से चलती है उस चाल को पहचान कर वैद्य लोग अपना कार्य करते है। तत्वों के मिश्रण, हेडा मेडा मार्ग, भ्रमर बीज आदि के समन्वय से प्रत्येक चक्र में रक्ताभिषरण और वायु अभिगमन के संयोग से एक विशेष चाल वहाँ परिलक्षित होती है। यह चाल किसी चक्र में हाथी के समान मंद गामी, किसी में मगर की तरह डुबकी मारने वाली, किसी में हिरन सी छलाँग मारने वाली, किसी में मेढक की तरह फुदकने वाली होती है उस चाल को चक्रों का वाहन कहते है।

इन चक्रों में विविध दैवी शक्तियाँ सन्निहित है, उत्पादन, पोषण, संहार, ज्ञान, समृद्धि बल आदि शक्तियों को देवता विशेषों की शक्ति माना गया है। अथवा यों कहिए कि यह शक्तियाँ ही देवता है। प्रत्येक चक्र में एक पुरुष वर्ग की उष्णवीर्य और एक स्त्री वर्ग की शीत वीर्य शक्ति रहती है। क्योंकि ऋण और धन, अग्नि और सोम दोनों तत्वों के मिले बिना गति और जीवन का प्रवाह उत्पन्न नहीं होता। यह शक्तियाँ ही सभी के देवी देवता है।

पंचतत्वों के अपने अपने गुण होते है। पृथ्वी का गंध, जल का रस, अग्नि का रूप, वायु का स्पर्श और आकाश का शब्द गुण होता है। चक्रों में तत्वों की प्रधानता के अनुरूप उनके गुण भी प्रधानता में होते है। यही चक्रों के गुण है।

यह चक्र अपनी सूक्ष्म शक्ति को वैसे तो समस्त शरीर में प्रवाहित करते है पर एक ज्ञानेन्द्रिय और एक कर्मेन्द्रिय से उनका संबंध विशेष रूप से होता है। संबंधित इन्द्रियों को वे अधिक प्रभावित करते है। चक्रों के जागरण के चिन्ह उन इन्द्रियों पर तुरन्त परिलक्षित होते है। इसी संबंध विशेष के कारण वे इन्द्रियाँ चक्रों की इन्द्रियाँ कहलाती है।

देव शक्तियों में डाकिनी, राकिनी, लाकिनी, शाकिनी, हाकिनी आदि के विचित्र नामों को सुनकर उनके भूतिनी, चुड़ैल, मसानी, जैसी कोई चीज होने का भ्रम होता है। वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। मुख से लेकर नाभि तक चक्राकार का से लेकर ह तक के समस्त अक्षरों की एक माला है, उस माला के दोनों को मातृकाएं कहते है। इन मातृकाओं को योग दर्शन द्वारा ही ऋषियों ने देवनागरी वर्णमाला के अक्षरों की रचना की है। चक्रों के देव जिन मातृकाओं से झंकृत होते है, संबद्ध होते है, उन्हें उन देवों की देव शक्ति कहते है। उ, र, ल, क, श आदि आगे मातृकाओं का बोधक ‘किनी’ शब्द जोड़ कर राकिनी डाकिनी, शाकिनी नाम बना दिये गये है। यही देव शक्तियाँ है।

उपरोक्त परिभाषाओं को समझ लेने के उपरान्त प्रत्येक चक्र की निम्न जानकारी को ठीक प्रकार समझ लेना पाठकों के लिए सुगम होगा। अब छहों चक्रों का परिचय नीचे दिया जाता है−

मूलाधार चक्र−

स्थान−योनि (गुदा के समीप)। दल−4। वर्ण−लाल। लोक भू।लोक। दलों के अक्षर− बँ, शँ, पँ, सँ। तत्व−पृथिवी, तत्व बीज−लँ। वाहन− ऐरावत हाथी। गुण−गंध। देव−ब्रह्मा। देव शक्ति−डाकिनी। यंत्र−चतुष्कोण। ज्ञानेन्द्रिय−नासिका। कर्मेन्द्रिय−गुदा। ध्यान का फल−वक्ता, मनुष्य में श्रेष्ठ, सर्व विद्या विनोदौ, आरोग्य, आनन्द चित्त, काव्य और लेखन की सामर्थ्य।

स्वाधिष्ठान चक्र−

स्थान−पेडू (शिश्न के सामने)। दल−छह। वर्ण−सिन्दूर। लोक−भुवः। दलों के अक्षर− बँ, भँ, मँ, रँ, लँ। तत्व− जल। तत्व बीज− बँ। बीज का वाहन− मगर। गुण− रस। देव− विष्णु। देव शक्ति−डाकिनी। यंत्र−चन्द्रकार। ज्ञानेन्द्रिय−रसना। कर्मेन्द्रिय−लिंग। ध्यान का पल−अहंकारादि विकारों का नाश, श्रेष्ठ योग, मोह निवृत्ति, रचना शक्ति।

मणिपूर चक्र−

स्थान−नाभि। दल−दस। वर्ण−नील। लोक−स्वः। दलों के अक्षर− उँ, ढँ, णँ, तँ, थँ, दँ, धँ, नँ, पँ, फँ। तत्व−अग्नि। तत्व बीज− रँ। बीज का बाहन−मेंढा। गुण− रूप। देव− वृद्ध रुद्र। देवशक्ति−लाकिनी। यंत्र−त्रिकोण। ज्ञानेन्द्रिय−चक्षु। कर्मेन्द्रिय−चरण। ध्यान का फल−संहार और पालन की सामर्थ्य, वचन सिद्धि।

अनाहत चक्र−

स्थान−हृदय। दल−बारह। वर्ण−अरुण। लोक−महः। दलों के अश्रर− कँ, खँ, गँ, घँ, डँ, चँ, छँ, जँ, झँ, जँ, टं, ठं। तत्व−वायु। तत्वबीज−यं। वाहन−मृग। गुण−स्पर्श। देव−ईश रुद्र। देव शक्ति−काकिनी। यंत्र− षट्कोण। ज्ञानेन्द्रिय−त्वचा। कर्मेन्द्रिय−हाथ। फल−स्वभित्व, योग सिद्धि, ज्ञान जागृति, इन्द्रिय जय, परकाया प्रवेश।

विशुद्धार चक्र−

स्थान−कंठ। दल−सोलह। दल−सोहल। वर्ण−धूम्र। लोक−जनः। दलो के अक्षर− अ से लेकर अः तक सोलह अक्षर। तत्व−आकाश। तत्व बीज− हँ। वाहन−हाथी। गुण−शब्द। देव−पंचमुखी सदाशिव। देवशक्ति−शाकिनी। यंत्र−शून्य (गोलाकार)। ज्ञानेन्द्रिय−कर्ण। कर्मेन्द्रिय−वाक। ध्यान फल−चित्त शाँति, त्रिकाल दर्शित्व, दीर्घजीवन, तेजस्विता, सर्वाहित परायणता।

आज्ञाचक्र−

स्थान−भ्रु मध्य। दल−दो। वर्ण−श्वेत। दलों के अक्षर− हँ क्षँ। तत्व−मह तत्व। तत्व बीज− ऊँ। बीज का वाहन−नाद। देव−ज्योति−लिंग। देवशक्ति−हाकिनी। यंत्र−लिंगाकार। लोक−तपः। ध्यान फल− सर्वार्थ साधन।

षट् चक्रों में उपरोक्त छह चक्र ही आते है। परन्तु सहस्रार कमल या सशस्त्र दल पऽ को भी कोई कोई योग सातवाँ शून्य चक्र मानते हैं। उसका भी वर्णन नीचे दिया जाता है।

शून्य चक्र−

स्थान−मस्तक। दल−सहस्र। दलों के अक्षर अं से क्षँ तक की पुनरावृत्तियाँ। लोक सत्यः। तत्व−तत्वों से अतीत। बीज तत्व−(ः) विसर्ग। बीज का वाहन−बिन्दु। देव−परब्रह्म। देव शक्ति महाशक्ति। यंत्र−पूर्ण चन्द्रवत् प्रकाश−निराकार। ध्यान फल−भक्ति, अमरता, समाधि, समस्त ऋद्धि सिद्धियों का करतलगत होना।

पाठक जानते है कि कुण्डलिनी, शक्ति का स्त्रोत है। वह हमारे शरीर का सबसे अधिक सजीव चैतन्य स्फुल्लिंग है, उसमें बीज रूप से इतनी रहस्य मय शक्तियाँ गर्भित है जिनकी कल्पना तक नहीं हो सकती। कुण्डलिनी शक्ति के इन छह केन्द्रों में, षट्चक्रों में भी उसका काफी प्रकाश है। जैसे सौर मण्डल में नौ ग्रह है, सूर्य उनका केन्द्र है और चन्द्रमा मंगल आदि उससे संबद्ध होने के कारण सूर्य की परिक्रमा करते है। वे सूर्य ऊष्मा, आकर्षणी, विलयिनी आदि शक्तियों से प्रभावित और ओत प्रोत रहते है वैसे ही कुण्डलिनी की शक्तियाँ चक्रों में भी प्रसारित होती रहती है। एक बड़ी तिजोरी में जैसे कई छोटे छोटे दराज होते है, जैसे मधु मक्खी के एक बड़े छत्ते में छोटे अनेक छिद्र होते है और उनमें भी कुछ अंश भरा रहता है वैसे ही कुण्डलिनी की कुछ शक्ति का प्रकाश चक्रों में भी होता है। चक्रों के जागरण के साथ साथ उनमें सन्निहित कितनी ही रहस्य मय शक्तियाँ भी जाग पड़ती है उनका संक्षिप्त का संकेत ऊपर चक्रों के ध्यान फल में बताया गया है। इनको विस्तार करके कहा जाए तो यह शक्तियाँ भी अद्भुत आश्चर्यों से किसी प्रकार कम प्रतीत नहीं होगी।

चक्रों का बेधन।

षट्चक्रों को बेधन करते हुए कुण्डलिनी तक पहुँचना और उसे जागृत करके आत्मोन्नति के मार्ग में लगा देना यह एक महा विज्ञान है। ऐसा ही महाविज्ञान−जैसा का परमाणु बम का निर्माण उसका विस्फोट करना एक अत्यंत उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य है। इसे यों ही अपने आप, केवल पुस्तक पढ़कर आरंभ नहीं कर देना चाहिए, वरन् किसी अनुभवी पथ प्रदर्शक की संरक्षकता में यह सब किया जाना चाहिए।

चक्रों को बेधन ध्यान शक्ति के द्वारा किया जाता है। यह सब जानते है कि हमारा मस्तिष्क एक प्रकार का बिजली घर है और उस बिजली घर भी प्रमुख धारा का नाम− “मन” है। मन की गति चंचल और बहुमुखी होती है। वह हर घड़ी चंचलता में मग्न और सदा उछल कूद में व्यस्त रहता है। इस उथल पुथल के कारण उस विद्युत पुँज का एक स्थान पर केन्द्री करण नहीं होता जिससे कोई महत्वपूर्ण कार्य सम्पादन हो, इस अभाव में जन जीवन के यों ही अस्त व्यस्त अन्त होते रहते है। यदि उस शक्ति का एकत्रीकरण हो जाता है उसे एक स्थान पर संचित कर लिया जाता है तो आतिशी शीशे द्वार एकत्रित हुई किरणें द्वारा आग की लपटें उठने लगना जैसे दृश्य उपस्थित हो जाते है। “ध्यान” एक ऐसा सूक्ष्म विज्ञान है जिनके द्वारा सबकी बिखरी हुई बहुमुखी शक्तियाँ एक स्थान पर एकत्रित होकर एक कार्य में लगती है फल स्वरूप वहाँ असाधारण शक्ति−स्त्रोत प्रवाहित हो जाता है। ध्यान द्वारा मनः क्षेत्र की केन्द्रीभूत इस बिजली से साधक षटचक्रों का बेधन कर सकता है।

षट्चक्र बेधन की साधना करने के लिए अनेक ग्रन्थों में अनेक मार्ग बताये गये है। इसी प्रकार गुस्डडडडडडडड परम्परा से चली आने वाली साधनाएं भी विविध प्रकार की है। इन सभी मार्गों से उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है, सफलता मिल सकती है पर शर्त यह है कि उसे पूर्ण विश्वास, श्रद्धा, निष्ठा और उचित पथ प्रदर्शक की संरक्षकता में किया जाए।

अन्य साधनों की चर्चा करना और तुलना करके उनकी आलोचना प्रत्यालोचना करना यहाँ हमें अभीष्ट नहीं है। इन पंक्तियों में तो हम एक ऐसी सुलभ साधना पाठको के सामने उपस्थित करना चाहते हैं जिसके द्वारा गायत्री शक्ति षट्चक्रों का जागरण बड़ी सुविधा पूर्वक हो सकता है और अन्य साधनाओं में आने वाली असाधारण कठिनाइयों एवं खतरों से स्वतंत्र रहा जा सकता है।

प्रातःकाल शुद्ध शरीर और स्वस्थ चित्त से सावधान होकर पऽसन से बैठिये। पूर्व वर्णित ब्रह्मा संध्या के आरंभिक पंच कोषों की क्रिया कीजिए, आचमन, शिखाबन्धन, प्राणायाम, अघमर्षण, और न्यास करने के बाद गायत्री के एक सौ आठ मंत्रों की एक माला जपिये।

ब्रह्म संध्या कर चुकने के पश्चात् मस्तिष्क के मध्य भाग त्रिकुटी में (एक रेखा एक कान से दूसरे कान तक खींची जाय और दूसरी रेखा दोनों ध्रुवों के मध्य में से मस्तिष्क के पीछे तक खींची जाए तो दोनों का मिलन जहाँ होता है उस स्थान को त्रिकुटी कहते है।) वेदमाता गायत्री का ज्योतिः स्वरूप ध्यान करना चाहिए। मन को उस ज्योतिर्लिंग के मध्य में इस प्रकार अवस्थित करना चाहिए जैसे लुहार अपने लोहे को गरम करने के लिए भट्टी में डाल देता है और जब वह लाल हो जाता है तो उसे बाहर निकाल कर ठोंकता पीटता और अभीष्ट वस्तु बनाता है। त्रिकुटी स्थित गायत्री ज्योति में मन को कुछ देर अवस्थित रखने से मन स्वयं भी तेज स्वरूप हो जाता है। तब उसे आज्ञाचक्र के स्थान में लाना चाहिए। ब्रह्मनाड़ी मेरुदंड से आगे बढ़कर त्रिकुटी में होती हुई सहस्रार को गई है। इस ब्रह्मनाड़ी की पोली नली में दीप्तिमान मन को प्रदेश करके आज्ञाचक्र में ले जाया जाता है। वहाँ स्थिरता करने पर वे सब अनुभव होते है जो चक्र के लक्षणों में वर्णित है। मन को−चक्र के दलों का, अक्षरों का, तत्व का, बीज का, देव का, देवशक्ति का, यंत्र का, लोक का, वाहन का, गुण का, रंग का, अनुभव होता है। आरंभ में यह अनुभव बहुत अधूरे होते है। चक्र के कुछ लक्षण स्पष्ट कुछ अस्पष्ट और कुछ विकृत परिलक्षित होते है। धीरे धीरे वे अधिक स्पष्ट होते जाते है। कभी कभी किन्हीं व्यक्तियों के चक्रों में कुछ लक्षण भेद भी होता है। उसे अपने अंदर के चक्र की आकृति का ही अनुभव होगा।

स्वस्थ चित्त से, सावधान होकर, एक मास तक एक चक्र की साधना करने से वह प्रस्फुटित हो जाता है, ध्यान में उसके लक्षण अधिक स्पष्ट होने लगते है और चक्र के स्थान पर उससे संबंधित मातृकाओं, ज्ञानेन्द्रियों कर्मेन्द्रियों में अचानक कम्पन, रोमाँच, प्रस्फुरण, उत्तेजना, दाह, खुजली जैसे अनुभव होते है, यह इस बात के चिन्ह है कि चक्रों का जागरण हो रहा है। एक मास या न्यूनाधिक काल में इस प्रकार के चिन्ह प्रकट होने लगें ध्यान में चक्र का रूप स्पष्ट होने लगे तो उससे बढ़कर नीचे की ओर दूसरे चक्र में प्रवेश करना चाहिए। विधि वही है− मार्ग वही है। गायत्री ज्योति में मन को तपाकर ब्रह्मनाड़ी में प्रवेश करना और उसमें होकर पहले चक्र में जाना−फिर उसे पार करके दूसरे में जाना−इस प्रकार प्रत्येक चक्र में लगभग एक मास का समय लगता है। जब साधन पक जाती है तो एक चक्र से दूसरे चक्र से दूसरे चक्र में जाने का द्वार खुला जाता है। जब तक साधन कच्चा रहता है− तब तक द्वार रुका रहता है। साधक का मन आगे बढ़ना चाहे तो भी उसे द्वार नहीं मिलता और वह उसी चक्र के तन्तु जाल की भूलभुलैयों में उलझा रह जाता है।

जब साधना देर तक नहीं पकती और साधक को आगे का मार्ग नहीं मिलता तो उसे अनुभवी गुरु ही सहायता की आवश्यकता होती है, वह जैसा उपाय बतावे वैसे उसे करना होता है। इसी प्रकार धीरे धीरे क्रमशः छहों चक्रों को पार करता हुआ साधक मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी तक पहुँचता है और वहाँ उस ज्वालामुखी, कराल काल स्वरूप, महाशक्ति सर्पिणी के विकराल रूप का दर्शन करता है। महाकाली का प्रचण्ड स्वरूप यही दिखाई पड़ता है। कई साधक इस सोते सिंह को जगाने का साहस करते हुए काँप जाते है।

कुण्डलिनी को जगाने में उसे पीड़ित करना पड़ता है, छेड़ना पड़ता है, जैसे परमाणु का विस्फोट करने के लिए उसे बीच में से तोड़ना पड़ता है उसी प्रकार गुप्त कुँडलिनी को गतिशील बनाने के लिए उप पर आघात करना होता है इसे आध्यात्मिक भाषा में कुण्डलिनी पीडन कहते है। इससे पीड़ित होकर क्षुब्ध कुण्डलिनी फुसकारती हुई जाग पड़ती है और उसका सबसे प्रथम आक्रमण मन में लगे हुए जन्म जन्मान्तरों के संस्कारों पर होता है, वह संस्कारों को चबा खाता है, मन की छाती पर अपने शस्त्रों सहित जड़ बैठती है और उसके स्थूलता, माया परायणता को नष्ट कर ब्रह्म भाव में परिवर्तित कर देती है।

इस कुण्डलिनी को जगाने और उसका जीव पर आक्रमण होने की क्रिया का पुराणों ने बड़े ही अलंकारिक और हृदयग्राही रूप से वर्णन किया है।

महिषासुर और दुर्गा का युद्ध इसी आध्यात्मिक रहस्य का प्रतीक है। अपनी मुक्ति की कामना करता हुआ, देवी के हाथों मरने की कामना से उत्साहित होकर−महिषासुर− (महि पृथ्वी आदि पंच भूतों से बना हुआ मन) चण्डी से− कुण्डलिनी से− लड़ने जाता है। उस चुपचाप बैठी हुई पर आक्रमण करता है। देवी कुद्ध होकर उससे युद्ध करती है उस पर प्रत्याक्रमण करती है। उसके वाहन महिष को− संस्कारों के समूह को−चबा डालती है। मन के भौतिक आवरण को− महिषासुर के शरीर को− दसों भुजाओं से −दसों दिशाओँ से−सब ओर से विदीर्ण कर डालती है और अंत में महिषासुर− साधारण जीव− चण्डी की ज्योति में भिन्न जाता है। महाशक्ति का अंग होकर जीवन लाभ को प्राप्त कर लेता है। भक्तिमयी साधना का यह रौद्ररूप बड़ा विचित्र है। इसे ‘साधन समझ’ कहते है।

जहाँ कितने ही भक्त, प्रेम और मौज द्वारा ब्रह्म को प्राप्त करते है, वहाँ ऐसे कितने ही भक्त है जो साधन समर में ब्रह्म से लड़कर उसे प्राप्त करते है। भगवान तो निष्ठा के भूखे है वे सच्चे प्रेमी को भी मिल सकते है और सच्चे प्रेमी को भी मिल सकते है और सच्चे शत्रु को भी। भक्ति योगी भी उन्हें पा सकते है और साधन समर में अपने दो दो हाथ दिखाने वाले हठयोगी तंत्र प्राणी भी उन्हें प्राप्त करते है। कुण्डलिनी जागरण ऐसा ही हठ तंत्र है। जिसके आधार पर आत्मा तुच्छ से महान और अणु को विभु बनकर ईश्वरीय सर्व शक्तियों से सम्पन्न हो जाती है।

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इन पुस्तकों की एक एक पंक्ति, हमारे अनुभव और अनुसंधान के साथ लिखी गई हैं।

(1) मैं क्या हूं।

(2) सूर्य, चिकित्सा विज्ञान

(3) प्राण, चिकित्सा विज्ञान

(4) परकाया प्रवेश

(5) स्वस्थ और सुन्दर बनने की विद्या

(6) मानवीय विद्युत के चमत्कार

(7) स्वर योग से दिव्य ज्ञान

(8) भोग में योग

(9) बुद्धि बढ़ने के उपाय

(1) धनवान बनने के गुप्त रहस्य

(11) पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि

(12) वशी करण की सच्ची सिद्धि

(13) मरने के बाद हमारा क्या होता है?

(14) जीव जन्तुओं की बोली समझना

(15) ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?

(16) क्या धर्म ? क्या अधर्म

(17) गहना कर्मणो गतिः

(18) जीवन की गूढ गुत्थियों पर प्रकाश

(2) शक्ति संचय के पथ पर

(21) आत्मगौरव की साधना

(22) प्रतिष्ठा का उच्च सोपान

(23) मित्रभाव बढ़ाने की कला

(24) आन्तरिक उल्लास का विकास

(25) आगे बढ़ने की तैयारी

(26) अध्यात्म धर्म का अवलम्बन

(27) ब्रह्म विद्या का रहस्योद्घाटन

(28) ज्ञान योग, कर्मयोग, भक्तियोग

(29) यम और नियम

(3) आसन और प्राणायाम

(31) प्रत्याहार, धारणा ध्यान और समाधि

(32) तुलसी के अमृतोपम गुण

(33) आकृति देखकर मनुष्य की पहचान

(34) मैस्मरेजम की अनुभव पूर्व शिक्षा

(35) ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग

(36) हस्तरेखा विज्ञान

(37) विवेक सतसई

(38) संजीवनी विद्या

(39) गायत्री की चमत्कारी साधना

(4) महान जागरण

(41) तुम महान हो

(42) गृहस्थ योग

(43) अमृत पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति

(44) घरेलू चिकित्सा

(45) बिना औषधि के कायाकल्प

(46) पंच तत्वों से सम्पूर्ण रोगों का निवारण

(47) हमें स्वप्न क्यों दीखते है?

(48) विचार करने की कला

(49) दीर्घ जीवन के रहस्य

(5) हम वक्ता कैसे बन सकते है

(51) लेखन कला

(52) प्रार्थना के प्रत्यक्ष चमत्कार

(53) विचार संचालन विद्या

(54) नेत्ररोगों की प्राकृतिक चिकित्सा

(55) अध्यात्म शास्त्र

(56) स्वप्नदोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा

(57) सफलता के तीन साधन

(58) शिखा और यज्ञोपवीत का रहस्य

(59) दूध की चमत्कारिक शक्ति

(6) दैवी संपदाएं

(61) अध्यात्म विद्या का प्रवेश द्वार

(62) कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान

(63) सुखी वृद्धावस्था

(64) आत्मोन्नति का मनोवैज्ञानिक मार्ग

(65) वैज्ञानिक अध्यात्मवाद

(66) प्रत्यक्ष फलदायिनी साधनाएं

(67) योग के नाम पर मायाचार

(68) जादूगरी या छल?

(69) सौभाग्य बढ़ाने की कला

(7) सम्मोहन विज्ञान

(71) उन्नति का मूलमंत्र ब्रह्मचर्य

(72) प्रभावशाली व्यक्तित्व

(73) प्रेम का रहस्य

(74) अमृत कण

मूल्य में कमी के लिए लिखा पढ़ी व्यर्थ। छह रु. से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ।

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आध्यात्म विद्या की नवीन शिक्षा।

आध्यात्म बाद एक ऐसा महा विज्ञान है, जिसके ऊपर शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक सब प्रकार की उन्नतियाँ निर्भर है। प्राचीन काल में गरीब से लेकर राजा तक अपने बालकों को शिक्षा के लिए योगियों के आश्रम में छोड़कर निश्चिन्त हो जाते थे। क्योंकि वे समझते थे कि आध्यात्म शिक्षा मानव जीवन को सुसंचालित करने की एक वैज्ञानिक पद्धति है, सफल जीवन बनाने की एक कला पूर्ण विद्या है। जिसके द्वारा बलवान, वीर्यवान, तेजस्वी, योद्धा, धनी प्रतिष्ठित, लोक प्रिय, उच्च पदारुढ, अधिकारी, विद्वान एवं महापुरुष बना जा सकता है। आज भिखमंगों ने योग के नाम को कलंकित करने में कुछ उठा नहीं रखा है, तो भी मूल तत्व की सत्यता पर जरा भी रखा है, तो भी मूल तत्व की सत्यता पर जरा भी आँच नहीं आया है।

आत्म−विज्ञान−नकद धर्म है। उसके फल की प्रतीक्षा के लिए परलोक की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती, वरन् ‘इस हाथ दे उस हाथ ले’ की नीति के अनुसार प्रत्यक्ष फल मिलता है। व्यापार में अधिक लाभ, नौकरी में सुविधा और तरक्की, पत्नी का प्रेम, पुत्र, शिष्य और सेवकों का आज्ञा पालन, मित्रों का भ्रातृ भाव, गुरुजनों का आशीर्वाद, परिचितों में आदर, समाज में प्रतिष्ठा, निर्मल कीर्ति, अनेक हृदयों पर शासन, निरोग शरीर, सुन्दर स्वास्थ्य, प्रसन्न चित्त, हर घड़ी आनन्द, दुख शोकों से छुटकारा, विद्वत्ता में वृद्धि, तीव्र बुद्धि, शत्रुओं पर विजय, वशीकरण का जादू, अकाट्य नेतृत्व, प्रभावशाली प्रतिभा, धन−धान्य, तृप्ति दायक भोग वैभव ऐश्वर्य, ऐश−आराम, सुख−संतोष, परलोक में सद्गति, यह सब सम्पदायें प्राप्त करने का सीधा मार्ग आध्यात्मवाद है। इस पथ पर चलकर जो सफलता प्राप्त की जाती है, वह अधिक दिन ठहरने वाली, अधिक आनन्द देने वाली और अधिक आसानी से प्राप्त होने वाली होती है। एक शब्द में यों कहा जा सकता है, कि सारी लौकिक और पारलौकिक इच्छा आकाँक्षी की पूर्ति का अद्वितीय साधन आध्यात्म बाद है।

प्राचीन पुस्तकों में ‘कल्पवृक्ष’ नामक एक ऐसे वृक्ष का उल्लेख मिलता है, जिसके समीप जाकर जो इच्छा की जाए, वह तुरन्त ही पूरी हो जाती है। ढूंढ़ने वालों को बहुत खोज करने पर भी किसी देश में ऐसा पेड़ अभी नहीं मिला है, लेकिन हम कहते है कि वह वृक्ष है और दूर नहीं, आपके अपने अन्दर छिपा हुआ है। यदि आप आत्म साधना द्वारा उसके समीप तक पहुँच जावें तो निःसंदेह आप अपनी समस्त आकांक्षायें पूर्ण कर सकेंगे, इस कल्पवृक्ष के पास पहुँचने का जो मार्ग है उसे ही आध्यात्मवाद, ब्रह्म विद्या या योग साधन कहते है। प्रफुल्ल, आनन्द मय और सन्तुष्ट जीवन बिताने के लिए हरएक व्यक्ति को इसी मार्ग से चलना पड़ता है।

पूज्यपाद स्वामी विवेकानन्द जी जब पाश्चात्य देशों का भ्रमण करके वापिस आये थे, तो उन्होंने कहा था कि गोरी जातियाँ आध्यात्म मार्ग के प्रारम्भिक सिद्धाँतों का पालन कर रही है और उसके फल स्वरूप जो शक्ति प्राप्त होती है, उससे राज सी सिद्धियों का सुख भोग रही है। भारतवासी योग के नाम पर बगल बजाते है, पर उसका आचरण

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*समाप्त*