कर्त्तव्य का पालन कीजिए।

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‘कर्त्तव्य’ वह कार्य है जिसे करना हम लोगों का परम धर्म है और जिसके न करने से लोग और लोगों की दृष्टि से गिर जाते और अपने कुचरित्र से नीच बन जाते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में कर्त्तव्य का पालन बिना दबाव के नहीं हो सकता, क्योंकि पहले-पहले मन आप उसे करना नहीं चाहता। इसका आरम्भ पहले घर से ही होता है, क्योंकि यहाँ लड़कों का कर्त्तव्य माता-पिता की ओर और माता-पिता का कर्त्तव्य लड़कों की ओर देख पड़ता है। घर के बाहर हम मित्रों, पड़ौसियों और राजा-प्रजाओं के परस्पर कर्त्तव्यों को देखते हैं। इसलिए संसार में मनुष्यों का जीवन कर्त्तव्यों से भरा पड़ा है, जिधर देखो उधर कर्त्तव्य ही कर्त्तव्य देख पड़ते हैं। बस इसी कर्त्तव्य का पूरा-पूरा पालन करना हम लोगों का धर्म है, और इसी से हम लोगों के चरित्र की शोभा बढ़ती है।

हम सब लोगों के मन में एक ऐसी शक्ति है जो हम सभी को बुरे कामों के करने से रोकती और अच्छे कामों की ओर हमारी प्रवृत्ति को झुकाती है। यह बहुधा देखा गया है कि जब कोई मनुष्य खोटा काम करता है तब बिना किसी के कहे आप ही लजाता और अपने मन में दुखी होता है। एक दूसरा मनुष्य जो बुरा कार्य नहीं करता, सदा प्रसन्न रहता और उसके मन में कभी-कभी किसी प्रकार का डर तथा पछतावा नहीं होता। परन्तु जब हम कोई बुरा कार्य कर बैठते हैं तब हमारी आत्मा हमें कोसने लगती है। इसलिए हमारा धर्म है कि हमारी आत्मा हमें जो कहे, उसके अनुसार हम करें।

दृढ़ विश्वास रखो कि जब तुम्हारा मन किसी काम के करने से हिचकिचाये और दूर भागे तब कभी तुम उस काम को न करो। तुम्हें धर्म पालन करने में बहुधा कष्ट उठाना पड़ेगा पर इससे तुम साहस न छोड़ो। क्या हुआ जो तुम्हारे पड़ौसी ठग-विद्या और असत्यता में धनाढ्य हो गये और तुम कंगाल ही रह गये। क्या हुआ जो दूसरे लोगों ने झूठी चाटुकारी करके बड़ी-बड़ी नौकरियाँ पा लीं और तुम्हें कुछ न मिला और क्या हुआ जो दूसरे नीच कर्म करके सुख भोगते हैं और तुम सदा कष्ट में रहते हो। तुम अपने कर्त्तव्य-धर्म को कभी न छोड़ो और देखो इसमें सन्तोष और आदर मिलता है।

प्रलोभनों को देखकर मत फिसलो। पाप का आकर्षण आरम्भ में बड़ा लुभावना प्रतीत होता है पर वह अन्त में धोखे की टट्टी सिद्ध होता है, जो इस चंगुल में फँस गया उसे तरह-तरह की शारीरिक और मानसिक यातनाएं सहनी पड़ती हैं। इसलिए पाठको, सावधान रहो। प्रलोभनों में न फँसो। चाहे कितनी ही कठिनाई का सामना करना पड़े पर कर्त्तव्य पर दृढ़ रहो। कर्त्तव्य पर दृढ़ रहने वाले मनुष्य ही सच्चे मनुष्य कहलाने के अधिकारी हैं।

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वर्ष-10 संपादक-श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-4


जीवन-दीप

(डॉ. धर्मपाल गुप्त ‘शलभ’)


जीवन-दीप

जीवन के बुझते दीपों में, हम फिर नव ज्योति जगायेंगे।

जिन नयनों के खारे आँसू, प्रतिपल भू पर झर जाते हैं।

जिन प्राणों के अरमान सदा, निष्फल होकर मर जाते हैं॥

जिनके स्वप्नों का सत्य नहीं, जिनके भावों में नश्वरता-

हम ऐसे दग्ध विकल हृदयों को, नव संदेश सुनायेंगे॥

जो जगती के विस्तृत पथ पर, दो पग भी आगे बढ़ न सके।

जो मन में चिर उल्लास लिये, दुर्गम पर्वत पर चढ़ न सके॥

जो बैठ गये थोड़ा चलकर, जिनमें उठने की शक्ति नहीं-

हम उन मृतप्राय मानवों में, नव-बल संचार करायेंगे॥

जिनके अन्तस्तल में दारुण, दुख का सागर लहराता है।

जिनके सम्मुख आशाओं का, मरुथल सा बनता जाता है॥

जिनकी मन-वीणा टूट गयी, जिनके गीतों में नीरसता-

हम उनके बिखरे तारों को, स्वर-क्रम से आज सजायेंगे॥

रे उठो आज! रे सजों आज, संघर्षों का युग आया है।

बढ़ चलो वीर लेकर मशाल, जन-जन ने तुम्हें बुलाया है॥

तोड़ो बन्दी कारा अपनी, तोड़ो, बन्धन की जंजीरें-

हम आग लगा कर इस जग में, फिर दुनिया नयी बसायेंगे।


ब्राह्मणत्व की महान जिम्मेदारी

संसार में सबसे बड़ी गौरवास्पद वस्तु ‘बुद्धि’ है। बुद्धिबल की अधिकता से ही मनुष्य का बड़प्पन कूता जाता है। बड़प्पन प्राप्त करते ही उसके ऊपर अपने से छोटों के हित का ध्यान रखने की जिम्मेदारी आ जाती है। घर का प्रमुख, जिसे बाबा या दादा कह कर पुकारते हैं, स्वयं बहुत किफायतशारी का जीवन बिताता है और छोटे बाल बच्चों को अपनी कमाई के पैसों से खिला पिला कर पहना उढ़ाकर प्रसन्न होता है। विद्यावान भी ऐसा ही बुजुर्ग है जिसे अपने लिए उस तरह की चमक दमक की चीजें रुचिकर नहीं होती जैसी कि बच्चों को होती है। अपनी विद्या द्वारा अपना ही बड़प्पन बढ़ाना उसे निरा बालकपन और अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल दिखाई पड़ता है। दादी यदि नातनियों की जैसी बेल बूटे की, गोटे पट्टे की पोशाक पहनना आरम्भ कर दे तो लोग उसे देखकर हंसते लोट पोट हो जायेंगे, कहेंगे इस बुढ़िया को बुढ़ापे में कैसा शौक चर्राया है। यह बात उन ज्ञान-वृद्धों के संबन्ध में कही जायेगी जो विद्या का, बुद्धि का विवेक का महान गौरव ग्रहण करके बुजुर्ग बन चुके हैं परन्तु ऐश-आराम शौक-मौज और धन-संचय की बालक्रीड़ा में जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों का अपव्यय कर रहे हैं।

जब हम अपने प्राचीन इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं तो हमें विद्यावानों की ईमानदारी की निर्मल झाँकी होती है। जो जितना ही ज्ञान संपन्न है वह उतना ही त्यागी बनता है। ठीक भी है जो वृक्ष फलों से जितना लदता है वह उतना ही झुक जाता है, विद्या के भार से झुके हुए ब्राह्मण लोक सेवा के लिए अपना मस्तक झुका देते हैं और एक अकिंचन किंकर की तरह समाज हित के लिए जीवन व्यतीत करते हैं। ऋषियों का, मुनियों का, ब्राह्मणों का, ज्ञानियों का, विवेकवानों का जीवन सदा ही त्यागमय होता है। वनों में घास फूँस की झोपड़ी बनाकर वे अपना निर्वाह करते हैं, शरीर पर वही वस्त्र रखते हैं जो अत्यावश्यक है। घास का बिछौना, लकड़ी के जूते, कट्टू का कमंडल, काठ के पात्र उनकी सादगी के चिह्न हैं। संग्रह को पाप समझना, केवल उतनी ही चीजें रखना जो तात्कालिक आवश्यकता के लिये बहुत ही जरूरी हैं, उनकी नीति है। पीपल-वृक्ष के छोटे-छोटे फलों को खाकर गुजारा करने वाले ऋषि का नाम ‘पिप्पलाद’ पड़ जाता है। खेतों में गिरे हुए दाने-कण-बीज बीन कर काम चलाने वाले महर्षि को ‘कणाद’ कहकर पुकारते हैं। एक बड़े साम्राज्य का महामंत्री होने पर भी महर्षि चाणक्य अपनी कुटिया में ही निवास करते हैं और ब्राह्मणोचित सादगी के साथ त्यागपूर्ण जीवन बिताते हैं। कौरवों के गुरु होते हुए भी द्रोणाचार्य अपने लिए कोई जागीर नहीं लेते वरन् संतों के उपयुक्त सादगी के साथ रहते हैं। रघुवंशियों के गुरु वशिष्ठ जी की सलाह के बिना उन राजाओं का पत्ता नहीं हिलता था फिर भी वशिष्ठ जी का रहन-सहन सच्चे ब्राह्मण की मर्यादा से बाहर जाकर राजसी कभी नहीं हुआ। दो चार उदाहरण देने से काम न चलेगा, आदि से अन्त तक सभी ऋषि, सभी ब्राह्मण एक से एक बढ़कर विद्यावान हैं साथ ही उनका त्याग भी एक से एक का बढ़कर है। उन्होंने अपने लिए अपनी शक्तियों का न्यूनतम भाग खर्च किया है और शेष योग्यताओं को, बचे हुए सारे समय को, जनता के लिए, देश के लिए, समाज के लिए, धर्म के लिए, परमात्मा के लिए लगाया है। तभी तो यह भारत भूमि देव भूमि बन सकी थी, तभी तो वैदिक संस्कृति की ध्वजा आकाश में फहराती थी। तभी तो चक्रवर्ती आर्य साम्राज्य था, तभी तो हमारे घरों पर सोने के कलश रखे रहते थे और मोतियों के चौक पुरते थे। घर-घर में आनन्द मंगल होते थे, कहीं भी किसी प्रकार का कष्ट न था। ब्राह्मणों के तप का फल सारा राष्ट्र भोगता था।

उस स्वर्ग-युग की आज के विद्यावान, बुद्धिमान का, विवेकवान का नाम ही ब्राह्मण है। अमुक वंश में जन्म लेने मात्र से कोई ब्राह्मण नहीं होता, हाँ, ब्राह्मण बनने का दंभ कर सकता है। ब्राह्मण वही है जिसके पास विद्या, बुद्धि की पूँजी है। इस प्रकार के विद्या के धनी-ब्राह्मण आज कम नहीं हैं। हमारे विद्यालय (कालेज) और विश्वविद्यालय (यूनिवर्सिटियाँ) प्रतिवर्ष सहस्रों स्नातक (ग्रेजुएट) तैयार करती हैं। गैर सरकारी, धार्मिक प्रयोजन से चलने वाली शिक्षा संस्थायें भी प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में सुशिक्षित व्यक्ति तैयार करती है। अध्यवसाय और व्यक्तिगत प्रयत्नों से कितने ही मनुष्य बुद्धिबल प्राप्त करते हैं, यह सब मिलकर बहुत बड़ी संख्या हो जाती है। परन्तु हम देखते हैं कि विद्यावानों का यह ब्राह्मण वर्ग अपनी इस महत्वपूर्ण ज्ञान शक्ति को उस दिशा में प्रवृत्त करता है जिससे उनको अधिक पैसे मिल सकें और उन पैसों को उन कामों में खर्च करता है जिससे उन्हें अधिक ऐश-आराम, शान-शौकत, प्राप्त हो सके। पैसे जितने अधिक मिलते हैं उतनी ही उनकी आवश्यकताएं और तृष्णाएं बढ़ती जाती हैं। अन्ततः उस विद्या के बदले में प्राप्त हुए मर्यादित धन, उन अमर्यादित तृष्णाओं और बढ़ाई हुई आवश्यकता के मुकाबले में कम ही पड़ता रहता है और जी तोड़ प्रयत्न करने पर भी वह अपने को गरीब ही अनुभव करता रहता है।

जो लोग अपनी प्रचंड तर्क शक्ति और न्याय विशेषता के द्वारा लोगों को प्रभावित करके उन्हें अनीति से विरत कर सकते थे, न्याय का प्रचार कर सकते थे, अन्याय का निवारण कर सकते थे, झगड़ों को मिटा सकते थे, वे वकील अपने कानूनी पाण्डित्य को मुकदमेबाजों को प्रोत्साहन देने में खर्च कर रहे हैं। गवाहों को, मुवक्किलों को झूठ बयान सिखाने में अपनी चतुरता खर्च कर रहे हैं। इस रीति से बेशक उन्हें अधिक पैसे मिल जाते हैं पर जन-साधारण के लिए वह विद्या अभिशाप ही सिद्ध होती है। उनसे संसार में द्वेष की, असत्य की, मन मुटाव की, अपव्यय की वृद्धि होती है और लोगों में अशान्ति एवं क्लेश का ही अभिवर्धन होता है। क्या विद्या का यही प्रयोजन है? क्या विद्वानों का यही उत्तरदायित्व है?

कौन डॉक्टर रोगियों को प्राकृतिक आहार-विहार का महत्व समझाता है, निरोग रहने के नियमों पर सदा चलने के लिए रोगी को तैयार करता है। उनका तो कार्य आज इतना ही रह गया है कि मामूली बीमारी को भयंकर बताकर रोगी को डरा दें। जिससे वह घबराकर अधिक से अधिक पैसे देने को तैयार हो जाय, दूसरा कार्य उनका यह रह गया है कि मामूली दवा को भड़कीले नाम और पैकिंग के साथ वेश-कीमती बताकर मनमाने दाम वसूल कर लेना। कुछ समय के लिए वे एक रोग को दवा दे सकते हैं पर धीरे-धीरे रोगी का घर नाना प्रकार की बीमारियों का अजायब घर बनता जाता है। इस डाक्टरी से संसार का क्या लाभ हुआ? वे यदि चाहते तो निरोग रहने के नियमों पर चलने के लिए रोगी को तैयार कर सकते थे जिससे वह तथा उसका अनुकरण करने वाले अन्य लोग बीमारी और दवाई के चंगुल से बच जाते पर आज उस उत्तरदायित्व को कौन डॉक्टर पूरा करता है।

अध्यापक को लीजिए वह चाहे तो कच्ची लकड़ी की तरह मोड़कर, गीली मिट्टी की तरह दबाकर अपने छात्रों को चाहे जैसा बना सकते हैं। पर आज समर्थ गुरु रामदास कहाँ हैं, जिनके शिष्य शिवाजी निकले। आज संदीपन कहाँ हैं जिनके छात्र योगिराज कृष्ण बने, द्रोण कहाँ है, जिनके शिष्य धनुर्धर अर्जुन निकले, विरजानंद कहाँ है जिनके शिष्य दवानन्द बनें। आज तो वेतन भोगी मास्टर रह गये हैं जिनके स्टूडेंट सामने ही मुँहजोरी करते हैं और पीठ पीछे उन्हें उल्लू बनाते हैं। ट्यूटर डरते रहते हैं कि कहीं उनका विद्यार्थी नाराज न हो जाय नहीं तो ट्यूशन की नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा। आयोदधौम्य जैसे गुरु ही नहीं तो गुरु की आज्ञा पालन के लिए प्राणों की बाजी लगा देने वाले आरुणि और उपमन्यु जैसे छात्र कहाँ से आवें? अध्यापक वर्ग चाहता तो अपने उज्ज्वल चरित्र की छाप छात्रों के ऊपर लगाकर उन्हें किसी उत्तम साँचे में ढाल सकता था। पर वह दृष्टि हो तब न? ब्राह्मणत्व की आग किसके हृदय में जलती है? विद्या को ईश्वरीय अमानत कौन मानता है? पढ़ाना और बदले में रोटी कमाना एक सीधा सा व्यापार बन गया है। गुरु के महानपद का भार वे कैसे उठा सकते हैं जिनके सामने जीविका ही एक मात्र आधार है।

पंडित, पुरोहित, पुजारी, साधु, संन्यासी आदि का उत्तरदायित्व इन सबसे बड़ा है क्योंकि जनता केवल इसीलिए दान देकर उनके सारे खर्चे अपने ऊपर लेती है कि वे अर्थ उपार्जन की चिन्ता से मुक्त होकर अपना सारा समय मनुष्यों का बौद्धिक स्तर ऊंचा उठाने में लगावें। मन्दिर एक प्रकार से सार्वजनिक संस्था के रूप में स्थापित किये जाते थे जिनमें पाठशाला, व्यायामशाला, आरोग्यशाला, स्वाध्यायशाला, सत्संग, अध्यात्म साधन आदि की अनेकों लोकोपयोगी प्रवृत्तियाँ संचलित होती थी। इन प्रवृत्तियों का संचालन करने के लिए जो विद्वान सदाचारी कर्मनिष्ठ ब्रह्मवृत्ति का लोक सेवक रहता था उसे पुरोहित या पुजारी कहते थे। इस पुरोहित को सम्मान सहित जीविका देने के लिए भगवान का भोग मंदिर का चढ़ावा आदि निमित्त रखे गये थे। जिससे लोग भगवान की नियत पूजा की अनिवार्यता को न भूलें और पुरोहित के खर्च में कमी न पड़ने पावे। यही बात सोलह संस्कार यज्ञ आदि कर्मकाण्ड कथा पर चढ़ावा पर्वदान, ब्रह्मभोज आदि की दक्षिणा के नाम पर अन्य पुरोहितों की जीविका के लिए चालू की गई थी। इस प्रकार इन बुद्धि-जीवी ब्रह्म परायण व्यक्तियों को उपार्जन की चिन्ता नहीं करनी पड़ती थी और वे यजमानों को, उनके स्त्री बच्चों को सदैव बुद्धिदान देकर ज्ञान का प्रसार करते हुए घर-घर में आनन्द की वृद्धि किया करते थे, मनुष्य बना कर संसार की सबसे बड़ी सेवा किया करते थे। इतने बड़े, इतने महान कार्य के उपलक्ष में, उनके त्याग, संयम और बुद्धिबल से प्रभावित हुई जनता ब्राह्मणों में असीम श्रद्धा रखती थी, उनके चरण स्पर्श करती थी, उन्हें बड़े से बड़ा सामाजिक सामान प्रदान करती थी।

आज ऐसे ब्राह्मण कहाँ हैं? वंश विशेष में जन्म लेने मात्र से वे ब्राह्मण होने का अहंकार करते हैं, ब्रह्म सम्मान को प्राप्त करने का दावा करते हैं, यजमानों से दान दक्षिणा पाना अपना अधिकार समझते हैं। जनता श्रद्धा या असम्मान से, इच्छा या मजबूरी से किसी कदर अपना भाग अदा करती है, लाखों करोड़ों रुपया प्रतिमास दान के रूप में दिया जाता है परन्तु हम देखते हैं कि इन दानजीवी व्यक्तियों में से ऐसे लोक सेवक उंगली पर गिनने लायक मिलेंगे जो दान प्राप्त करने के फलस्वरूप स्वभावतः कंधे पर आने वाली लोक सेवा की जिम्मेदारी को पूरा करते हैं। मुफ्त का माल और बिना सेवा का सम्मान प्राप्त करने के फलस्वरूप उनमें नाना प्रकार के दोष दुर्गुण उत्पन्न हो चले हैं। आलस्य, ठगी, याचकता की निर्लज्जता, अहंकार मिथ्या विश्वासों का प्रसार करके अपने लाभ की वृद्धि करना, नैतिकता का पतन, दुर्व्यसन, हीनत्व की भावना, दंभ पाखंड आदि अनेकों दोष दुर्गुणों से दिन-दिन अधिक ग्रस्त होते चले जा रहे हैं। ऐसे लोग अपने आप में एक पाप के, एक पतन के, एक अनैतिकता के, एक बुद्धिहीनता के प्रतीक हैं। फिर वे दूसरों की नैतिकता को, मनुष्यता को, बौद्धिक-स्तर को ऊंचा उठाने में किस प्रकार समर्थ हो सकते हैं।

हम जिधर दृष्टि पसार कर देखते हैं उधर ही ब्राह्मणत्व का लोभ सा हो चला प्रतीत होता है। यों ब्राह्मण वंश के लोगों की संख्या भारतवर्ष में तीन करोड़ से अधिक है पर सच्चे ब्राह्मण जो वस्तुतः ब्राह्मणत्व की जिम्मेदारी पूरी कर रहे हों, अपने ज्ञान बल से जनता का विवेक जागृत करने में (सर्वतोभावेन) लगे हुए हों, उँगलियों पर गिनने लायक मिलेंगे। ऐसी दशा में यदि हमारा सारा समाज गिरी हुई अवस्था में पड़ा रहे तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं। जिस घर का मुखिया, गृहपति, परिवार के प्रति अपना उत्तरदायित्व ठीक प्रकार न चलित कर रहा होगा तो उसके आश्रित अन्य परिजनों को दीन-हीन दशा में रहना पड़ेगा। शराबी मजदूर के बाल-बच्चों को दुख-दारिद्र से ग्रस्त जीवन व्यतीत करना पड़ता है। जिस समाज में उदार हृदय एवं समुन्नत मस्तिष्क नहीं होते, त्यागी नेताओं की कमी होती है उस समाज वालों को पतित अवस्था में रहना पड़ता है। भारतीय समाज को भी चिरकाल से ऐसे ही दुख भोगने पड़ रहे हैं।

संसार में दुख तीन प्रकार के हैं (1) अज्ञान जन्य (2) अशक्ति जन्य (3) अभाव जन्य। लोग अपनी मूर्खता से, कमजोरी या वस्तुओं की कमी से दुख पाते हैं। इन तीनों में भी अज्ञान सर्वप्रधान कारण है। उलझे हुए मस्तिष्क के, भ्रान्त विचारों के, कुसंस्कारी, अविचारी, अन्धविश्वासी मनुष्य साधारण सी बात को लेकर मन में भारी क्लेश की स्थापना कर लेते हैं और उस क्लेश से उद्विग्न होकर अपने लिए तथा दूसरों के लिए भारी संकट उपस्थित कर लेते हैं। जिन बातों को एक विचारवान व्यक्ति बिल्कुल साधारण समझता है और उन्हें हँसकर टाल देता है उन्हीं के लिए अविवेकी मनुष्य इतने उद्विग्न एवं उत्तेजित हो जाते हैं मानों जीवन का ध्रुव केन्द्र वह घटना ही हो। और उन छोटी वस्तुओं के मिलने या चले जाने से उनका सर्वस्व नष्ट हो रहा हो। संसार में प्रतिदिन घटित होती रहने वाली घटनाओं का वास्तविक मूल्याँकन करने की योग्यता का नाम ही तत्व ज्ञान है और उनका न होना भ्रान्ति, माया या अज्ञान है। इस अज्ञान के कारण लोग बहुत छोटी और बाल विनोद जैसी मामूली बात को बड़ा भारी महत्व दे देते हैं और तिल का ताड़ बनाकर अपने चित्त को दुखाते रहते हैं। जो लोग वस्तुस्थिति का मूल्याँकन नहीं कर सकते, उन्हें आये दिन किसी न किसी बहाने संताप होता ही रहेगा। कल्पवृक्ष उनके आँगन में लगा दिया जाये तो भी वे सुखी नहीं रह सकते। जीवन का आनन्द केवल वे ही उठा सकते हैं जो घटनाक्रम का ठीक मूल्याँकन कर सकते हैं, यह योग्यता स्कूल कालेजों की शिक्षा से नहीं आती वरन् जीवन विज्ञान की उस शिक्षा से आती है जो त्यागी, तपस्वी, मनन शील, विद्वान और लोक सेवी ब्राह्मणों द्वारा प्राप्त होती है।

स्कूली शिक्षा की आज खूब वृद्धि हो रही है। गणित, भूगोल, इतिहास, भाषा, शिल्प, रसायन चिकित्सा, व्यापार, कला-कौशल आदि की शिक्षा के लिए अनेकों शिक्षण संस्थान मौजूद हैं। इनके द्वारा शिक्षार्थियों को रोटी कमाने का रास्ता मिल जाता है परन्तु वह रास्ता नहीं मिलता जिस पर चलकर पारस्परिक प्रेम, भ्रातृभाव, उदारता, स्नेह, सदाचार, संयम, नम्रता, शिष्टाचार, सहनशीलता तथा घटनाओं का ठीक मूल्याँकन करना सीखा जाता है और उसके फलस्वरूप साधारण परिस्थितियों में भी सुख, शान्ति पूर्वक जीवन बिताया जाता है और निकटवर्ती लोगों को आनन्दमय रखा जाता है। इस विद्या के ऊपर ही मानव जीवन की सुख शान्ति निर्भर है। जिस व्यक्ति में या जिस समाज में यह विद्या जितनी अधिक मात्रा में होगी वह उतना ही सुखी, स्वस्थ और सम्पन्न रहेगा।

विद्यावान और बुद्धिमानों के पास जो बुद्धि वैभव है उसका उपयोग स्वल्प बुद्धिमानों को अधिक बुद्धिमान बनाने के लिए किया जाना चाहिए। इस कार्य में विद्वानों को अपना निज का स्वार्थ छोड़ना पड़ेगा, ऐश आराम और संयम की तृष्णा को घटाना पड़ेगा। जीवन निर्वाह की वास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति तक ही सीमित रहना पड़ेगा। उनका यह त्याग बड़ा भारी त्याग है। बुद्धिमान मनुष्य ईमानदारी से भी काफी कमा सकते हैं फिर यदि वे बेईमानी पर उतर आवें तब तो कहना ही क्या है? अनेकों चतुर धनियों की तरह वे भी श्री सम्पन्न हो सकते हैं पर इस प्रलोभन से बचकर गुजारे मात्र से काम चलाना और शेष समय तथा शक्तियों को जनता जनार्दन की सेवा में समर्पित कर देना यही ब्राह्मणत्व का सच्चा आदर्श है, यह त्याग ही सच्चा तप है, तपस्वी ब्राह्मणों की इसी तपश्चर्या के फलस्वरूप सारा देश सारा समाज सुख सम्पन्नता का लाभ उठाता था। थोड़े सी नदियों से बड़े विस्तृत क्षेत्र धन धान्य से, वृक्ष वनस्पतियों से, फल फूलों से भरा-पूरा रहता है। यदि वे नदियाँ सूख जायं अथवा अपना जल दूसरों के उपयोग के लिए मुफ्त देने से इन्कार कर दें त्याग और सेवा के सिद्धाँत की अवहेलना कर दें तो वह नदियाँ पानी से चाहे कितनी ही भरी-पूरी क्यों न रहे यह निश्चित है कि वह प्रदेश शुष्क, कुरूप और श्री-विहीन हो जायगा। दुर्भाग्य से भारत भूमि और हिन्दू जाति को भी ऐसी ही बुरी स्थिति का सामना करना पड़ा है। ब्राह्मणों ने विद्या को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति समझकर उसका उपयोग स्वार्थ साधन तक ही सीमित रखा फलस्वरूप उचित नेतृत्व और पथ प्रदर्शन के अभाव में जनता पथ भ्रान्त हो गई और ऐसी दशा में उसकी दीनता, दासता, भ्रान्ति, अनैतिकता, स्वार्थ परता आदि की उलझन भरी झाड़ियों में भटक जाना स्वाभाविक ही था।

श्रेष्ठता के चिन्हों में ‘दया’ सर्वप्रथम गुण है। जो श्रेष्ठ होगा उसके हृदय में छोटों के प्रति, निर्बलों के प्रति, दुखियों के प्रति करुणा की भावना अवश्य ही प्रस्फुटित होगी। कहते हैं कि- “दया बिना सन्त कसाई” कबीर की उक्ति है कि-

कबीर सोई पीर है, जो जाने पर पीर।

जो पर पीर न जानई सो काफिर बे पीर॥

संस्कृत भाषा में एक सन्त ने अपनी कामना का दिग्दर्शन इस प्रकार कराया है-

नत्वहं कामये राज्यं न सौख्यं न पुनर्भवम्

कामये दुःख तप्तानाँ प्राणिनामार्तनाशनम्॥

अर्थात् मैं राज्य की, सुख की, अच्छे पुनर्जन्म की इच्छा नहीं करता। मेरी तो एक मात्र कामना दुःखी प्राणियों के दुःख दूर करने की है।

यह निश्चित है कि संसार में जितने दुःख शोक, पाप, रोग, क्लेश, कलह, द्वेष, सन्ताप, उद्वेग आदि कष्ट हैं उन सबका प्रधान कारण अज्ञान है। उस अज्ञान का विनाश केवल सद्ज्ञान की स्थापना से ही हो सकता है और इस कार्य को त्यागी, तपस्वी, सदाचारी, परमार्थ परायण, विद्वान-ब्राह्मण ही कर सकते हैं। यह ठीक है कि स्कूल कालेजों की शिक्षा का प्रसार सरकार द्वारा हो रहा है पर उतने से ही काम नहीं चल सकता। व्यक्तियों का नैतिक धरातल ऊंचा उठाने के लिए, उनकी संकुचितता, भ्रान्ति, स्वार्थपरता और लिप्सा दूर करने के लिए उस जीवन विद्या की आवश्यकता है जो अध्ययनशील, विचारवान, परिपुष्ट दूरदर्शी, मस्तिष्कों द्वारा अनुकरणीय आदर्श चरित्र के व्यक्तियों द्वारा-लोगों के अन्तःकरणों में भरी जाय। इस कार्य को तपस्वी ब्राह्मण ही कर सकते हैं।

हम देखते हैं कि आज विद्वानों, विचारवानों और परिपुष्ट मस्तिष्क के विद्वानों की कमी नहीं है। धर्म, दर्शन, नागरिकता, सहयोग, समता आदि के सिद्धांतों को भली प्रकार समझने वाले और उन्हें दूसरों को समझा देने की प्रतिभा एवं योग्यता रखने वाले विज्ञ मनुष्य काफी बड़ी संख्या में मौजूद हैं। दूसरी वह असंख्य जनता है जो सद्ज्ञान की तोता रटन्त की बावालता भले ही जानते हों पर जीवन विद्या से, सद्विचारों के महत्व से सर्वथा अपरिचित है और इसी कारण नाना प्रकार के दुखों में संतप्त रहती है। एक ओर मीठे शीतल जल का कुआँ मौजूद है दूसरी और प्यास से तृषित असंख्यों व्यक्ति छटपटा रहे हैं। बीच का वह सूत्र है- ब्राह्मणत्व। आज भारत भूमि का ऋषि पुत्रों का ब्राह्मणत्व मूर्छित पड़ा हुआ है। अज्ञान के संतप्त असंख्य जनता क्रन्दन कर रही है, पीड़ाओं से छटपटा रही है, पशुओं सा पतित जीवन बिता रही है, इतना सब होते हुए भी जिन आँखों में आँसू नहीं आते, जिन हृदयों में दर्द नहीं होता, जिन अन्तःकरणों में करुणा फूट नहीं पड़ती, उनके लिए कैसे कहा जाय कि इसमें ब्राह्मणत्व जाग्रत है जीवित है। जिनमें सहृदयता है, जिनमें सद्ज्ञान है, जिनमें श्रेष्ठता है उनकी छाती ऐसी स्थिति को देखकर पसीजे बिना नहीं रह सकती। वे यह सहन नहीं कर सकते कि अज्ञान ग्रस्त जनता अपने पैरों को कुल्हाड़े मार-मार कर काट रही हो, अपने घर को आप जला रही हो और वे इस मूर्खता को रोकने के लिए, कुछ प्रयत्न करें, अपने सुख साधन छोड़कर उनकी सहायता करने के लिए न दौड़ पड़ें।

शास्त्र कहता है कि -”विद्यावान, ब्राह्मण संसार के अज्ञान को अपने तप द्वारा दूर करें।” जिन व्यक्तियों को आज विद्या प्राप्त है, बुद्धि प्राप्त है, जिनके हृदय में दया है, जिनके हृदय में ब्राह्मणोचित तप त्याग की भावना है वे ही सच्चे अर्थों में ब्राह्मण हैं, चाहे वे किसी भी वंश में उत्पन्न क्यों न हुए हो। ऐसे ब्राह्मणों को गायत्री का प्रथम संदेश है कि-”बुद्धि संसार का सर्वश्रेष्ठ तत्व है, वह तुम्हारे पास एक ईश्वरीय अमानत है उसे शक्ति भर प्रयत्न के साथ जनता जनार्दन में वितरण करो, तुच्छ स्वार्थों से ऊपर उठो और अपना गौरव इस बात में समझो कि ईश्वर ने आपको योग्य और ईमानदार वितरण करने वाले के पद पर नियुक्त किया है। अपने कर्त्तव्य का पालन करो, अज्ञान दुख से संतप्त जनता को सुखी बनाने के लिए सद्ज्ञान रूपी अमृत का वितरण करो और स्वयं तपश्चर्या एवं परोपकार का स्वर्गीय सुख उपलब्ध करो।”

ब्राह्मणो! ऐसा मत सोचो कि हम परमार्थ में प्रवृत्त होंगे तो हमारा खर्च कैसे चलेगा, ईश्वर पर विश्वास करो, जनता में सद्ज्ञान कर प्रसार करने के लिए कदम बढ़ाओ, अपने उत्तम ज्ञान और उज्ज्वल चरित्र से अन्धकार से भरे हुए हृदयों में प्रकाश उत्पन्न करो, तुम्हें खर्च की कुछ कमी न रहेगी। मनुष्य की वास्तविक जरूरतें और भी कम होती हैं। जन्म से पूर्व दूध के भरे हुए ऐसे घड़े जो सदा भरे ही रहते हैं जिसने उपस्थित कर दिये थे वह ईश्वर इस सृष्टि से उठ नहीं सकता, ब्राह्मणत्व के प्रति असीम श्रद्धा का मानव हृदय में से मिट नहीं सकता, इन महान तत्वों पर विश्वास करो। कंकड़ मत समेटो, हीरों का व्यापार करो। शास्त्र कहता है कि- हे बुद्धि जीवियों! प्रलोभनों में मत पड़ो ब्राह्मणोचित कर्म करो, संसार में सद्ज्ञान का प्रसार करो।


Quotation

प्रतिष्ठा हीन जीवन बिना नींव का घर है। प्रतिज्ञा के बल पर ही यह संसार टिका हुआ है। प्रतिज्ञा न लेने का अर्थ अनिश्चित या डाँवाडोल रहना है।

-महात्मा गाँधी


इन्द्रियों को वश में रखिए।

(लोकमान्य तिलक)

अहिंसा, सत्य और अस्तेय के साथ इन्द्रियनिग्रह की भी गणना सामान्य धर्म में की जाती है। (मनु 10-63)। काम, क्रोध, लोभ आदि मनुष्य के शत्रु हैं, इसलिए मनुष्य जब तक इनको जीत नहीं लेगा तब तक समाज का कल्याण नहीं होगा। यह उपदेश सब शास्त्रों में किया गया है। विदुर-नीति और भगवद्गीता में भी कहा गया है-

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत्।

काम, क्रोध और लोभ ये तीनों नरक के द्वार हैं, इनसे हमारा नाश होता है, इसलिए इनका त्याग करना चाहिए (गीता 16। 21 डडडडडड 32। 70)॥ परन्तु गीता ही में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने स्वरूप का यह वर्णन किया है “धर्माऽविरुद्धोभुतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ”- हे अर्जुन! प्राणिमात्र में जो ‘काम’ धर्म के अनुकूल है, वही मैं हूँ (गीता 7/11) इससे यह बात सिद्ध होती है कि जो काम धर्म के विरुद्ध है, वही नरक का द्वार है। इसके अतिरिक्त जो दूसरे प्रकार का काम है अर्थात् जो धर्म में अनुकूल है वह ईश्वर को मान्य है। मनु ने भी यही कहा है “परित्यजेदर्थकामौ यौ स्याताँ धर्म वर्जितौ-” जो अर्थ और काम धर्म के विरुद्ध हों उनका त्याग कर देना चाहिए। (मनु 4,146)। यदि सब प्राणी कल ‘काम’ का त्याग कर दें और मृत्यु-पर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत से रहने का निश्चय कर लें तो सौ पचास वर्ष में ही सारी सजीव सृष्टि का लय हो जायगा और जिस सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान बार-2 अवतार धारण करते हैं उनका अल्पकाल में ही उच्छेद हो जायगा। यह बात सच है कि काम और क्रोध मनुष्य के शत्रु हैं, परन्तु कब? जब वे अनिवार्य हो जायं तब। यह बात मनु आदि शास्त्रकारों के सम्मत है कि सृष्टि का क्रम जारी रखने के लिए उचित मर्यादा के भीतर काम और क्रोध की अत्यन्त आवश्यकता है। मनु 5,56) इन प्रबल मनोवृत्तियों का उचित रीति से निग्रह करना ही, सब सुधारों का प्रधान उद्देश्य है। उनका नाश करना कोई सुधार नहीं कहा जा सकता क्योंकि भागवत (11/1/15) में कहा है-

लोके व्यवाया मिषमद्य सेवा,

नित्यास्ति जन्तोर्नहि तत्र चोदना।

व्यवस्थितिस्तेषु विवाह यज्ञ,

सुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा॥

इस दुनिया में किसी से यह कहना नहीं पड़ता कि तुम मैथुन, माँस और मदिरा का सेवन करो, ये बातें मनुष्य को स्वभाव ही से पसन्द हैं, इन तीनों की कुछ व्यवस्था कर देने के लिए अर्थात् इनके उपयोग को कुछ मर्यादित करके व्यवस्थित कर देने के लिए शास्त्रकारों ने अनुक्रम से विवाह, सोमयाग और सौत्रायणि यज्ञ की योजना की है परन्तु तिस पर भी निवृत्ति अर्थात् निष्काम आचरण इष्ट है। यहाँ यह बात ध्यान में रखने योग्य है कि जब निवृत्ति शब्द का सम्बन्ध पंचम्यन्त पद के साथ होता है तब उसका अर्थ अमुक वस्तु से निवृत्ति अर्थात् अमुक कर्म का सर्वथा त्याग हुआ करता है तो भी कर्म योग में निवृत्ति विशेषण कर्म ही के लिए उपयुक्त हुआ है। इसलिए निवृत्ति कर्म का अर्थ निष्काम बुद्धि से किया जाने वाला कर्म होता है, यही अर्थ मनुस्मृति और भागवत पुराण में स्पष्ट रीति से पाया जाता है। (मनु. 12/89 भागवत 11/10/1 तथा 7/15,97) क्रोध के विषय में किरात काव्य में (1/33) मारवि का कथन है-

अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना

न जात हार्देनन विद्विपादरः।

जिस मनुष्य को अपमानित होने पर भी क्रोध नहीं आता उसकी भिन्नता और द्वेष दोनों बराबर हैं। शास्त्र धर्म के अनुसार देखा जाए तो बिदुला ने यही कहा है-

एतावानेव पुरुषो यदमर्षी यदक्षमी।

क्षमावान्निरमर्षश्च नैव स्त्री न पुनः पुमान॥

जिस मनुष्य को (अन्याय पर) क्रोध आता है और जो (अपमान को) सह नहीं सकता, वही पुरुष कहलाता है। जिस मनुष्य में क्रोध या चिढ़ नहीं है वह नपुँसक के ही समान है। (म.भा.उ.162.33)। इस बात का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है कि इस जगत के व्यवहार के लिए न तो सदा तेज या क्रोध ही उपयोगी है और न क्षमा। यही बात लोभ के विषय में भी कही जा सकती है, क्योंकि संन्यासी को भी मोक्ष की इच्छा तो रहती है।


साधना का पथ

(योगिराज श्री अरविन्द)

साधक को पहले मन को तैयार करने की आवश्यकता है। मन को शान्त एवं स्थिर बनाने की आवश्यकता है। साधना के लिए मन के तैयार होते ही उसमें शान्ति आती है और बहुत बड़ी समता की स्थापना होती है। शान्ति का अर्थ अटल और अचल स्थिर भाव तथा प्रवृत्ति के सब तरह के घात प्रतिघातों से अविचल तथा निर्विकार रहने का अभ्यास। जिस प्रकार आज चंचलता मन का स्वभाव है, साधना की तैयारी में जुटते ही अविचल और निर्विकार भाव मन एवं बुद्धि का स्वभाव सिद्ध भाव हो जायगा इसके साथ ही साथ हमें आगे की तैयारी के लिए मन को विश्व मात्र के प्राणियों को रागद्वेष रहित होकर आह्लादपूर्वक हृदय से लगाने के भाव वाला हो जाना चाहिए। भगवान जिस प्रकार संसार के समस्त प्राणियों में अखण्ड भाव से विराजमान हैं, उसी प्रकार की अनुभूति के लिए हमें अपने मन को तैयार करने की आवश्यकता है, क्योंकि संसार के प्राणी होने के कारण हमारे भीतर भी भगवान अखण्ड भाव से विराजमान हैं इसलिए अपने भीतर स्थित भगवान को जहाँ हमें देखना है वहाँ समस्त संसार में भी उसका अनुभव करना है। इस तरह अपने में संसार के साथ अखण्ड संबंध की स्थापना शब्द से नहीं अनुभूति-पूर्वक करनी है। मन की इस शान्त सत्ता में सतत एक रस तल्लीन रहने का अभ्यास हो जाने पर विज्ञान का अभिव्यक्त होना आरंभ हो जाता है। परन्तु साधक को उतावला बनने की आवश्यकता नहीं है। अखण्ड निर्भयता के साथ साधना करते रहने पर भगवान स्वयं ही धीरे-धीरे सभी विघ्न, बाधाओं को दूर करके साधक को मन वाँछित स्थान पर पहुँचा देते हैं।

साधना के आरंभ में पहले अपने विचार में ज्ञान प्रवाह का अनुभव करना चाहिए। यह अनुभव ईश्वर की प्रेरणा के रूप में चित्त के भीतर करना चाहिए। यह प्रेरणात्मक ज्ञान भीतर के गुरु रूप से साधक को अपने आप ही सब कुछ दिखा सुना देगा। क्या करना चाहिए, किसमें कमी या अधूरापन है, क्या नहीं करना चाहिए से सारी बातें वह स्वयं ही कहना आरंभ कर देगा। इसी के प्रकाश के आगे का रास्ता साधक को तय करना पड़ेगा। साधना के लिए उत्पन्न हुई इच्छा के साथ सत्य ज्ञान का मिलान करना होगा। जिससे सत्य ज्ञान के साथ ही साथ इच्छा की वृत्ति भी उसके अनुकूल रहे। जब दोनों एक रूप हो जायेंगे तब दोनों ही अखण्ड स्वरूप में बदल जायेंगे।

जिस समय अन्तस्तल में यह प्रतीत होने लगेगा कि सबमें एक अनन्त भगवान ही निवास कर रहे हैं और उन्हीं की अनन्त शक्ति के योग से सब कुछ हो रहा है, साथ ही दृढ़ विश्वास भी हो जायगा, तब साधना का जो सिलसिला जारी होगा वह उत्तरोत्तर उन्नत ही होता जायगा। उस समय साधक को सब कुछ भगवान की इच्छानुसार ही होने देना चाहिए। अपनी किसी प्रकार की भी स्वतंत्रता, इच्छा या हठ को भी स्थान नहीं देना चाहिए। क्योंकि-”होइ है वही जो राम रचि राखा” साधक को अपनी किसी भी प्रकार की इच्छा नहीं करनी चाहिये सब भगवान के ऊपर छोड़ देना चाहिए और समझ लेना चाहिए कि भगवान की मंगलमय इच्छा ही सब घटनाओं को उत्पन्न कर रही है। भगवान में सम्पूर्ण श्रद्धा रखना चाहिए। भगवान जो कुछ कभी देखते हैं उसे दूर करने के लिए सब कुछ करते हैं। साधक को चाहिए कि भगवान के इस काम को भी वह साधना का एक अंग ही समझे, क्योंकि साधना के लिए इसकी बहुत बड़ी आवश्यकता है। भगवान कल्याण स्वरूप है इसलिए कल्याण साधना में भगवान के कल्याण स्वरूप का स्मरण रखना ही साधक का प्रमुख लक्ष्य है। तनिक भी विचलित न होकर अक्षुण्ण सम्पूर्ण और कल्याण करने वाली श्रद्धा भगवान के ऊपर रक्खो, श्रद्धा ही त्याग का आधार है, इससे अनन्त ज्ञान की प्राप्ति अवश्य होगी, इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं है। श्रद्धा ने ही सम्पूर्णता को प्राप्त कराने का भार ग्रहण कर रखा है, साधक को यह बात नहीं भूल जानी चाहिए।

साधक के लिए यह आवश्यक है कि वह संसार भर के प्रति प्रेम का भाव सम्पूर्ण रीति से हृदय में रखे, सबके लिए समान भाव से। किसी के लिए कम और किसी के लिए अधिक नहीं। सबके साथ समान रूप से गंभीर प्रेम करना ही त्याग करना है। त्याग और पूर्ण श्रद्धा होने से ही हृदय की सारी बाधायें दूर हो जाती हैं। भगवान समस्त बाधाओं को नष्ट कर डालते हैं।

चिंताएं मनुष्य को कुछ नहीं करने देतीं इसलिए साधक का कर्त्तव्य है कि वह अपने को समस्त चिन्ताओं से मुक्त कर ले। मन और बुद्धि को चिन्ताओं से खाली कर लेने पर एक स्तब्ध प्रसन्न शान्त भाव आता है। शान्ति की ऐसी अवस्था में वही कहता और करता है जो कि कथनीय और करणीय होता है।

मन के स्थित और शान्त होने पर ही सत्य का प्रकाश होता है अर्थात् मन के निश्चिन्त और स्थिर हो जाने पर भगवान अपने आप ही प्रकाशमान हो जाते हैं यानी उनका प्रकाश साधक को दीखने लगता है। चिन्ता युक्त मन रहने से जहाँ साधना में कठिनाई आती है वहाँ साधक को उलझन आने की भी संभावना रहती है। इसीलिए भगवान के प्रकाश को अविकृत रूप से धारण करने के लिए समता की अत्यन्त आवश्यकता है। इसके बिना भाव अधिकता के कारण मन तथा शरीर की अनेक प्रकार की विषमताओं के उत्पन्न होने का डर रहता है। भगवान की प्रस्फुटित ज्योति के लिए पूर्णोपयोगी आधार बनाये बिना उसके द्वारा शरीर और मन दोनों के ही विनष्ट होने की संभावना रहती है इसीलिए मन और बुद्धि को सम्पूर्ण रूप से कुछ दिनों तक खाली करके रखने से ही भय निर्मूल हो सकता है।


Quotation

प्रार्थना करना याचना करना नहीं है, वह तो आत्मा की पुकार है।

-महात्मा गाँधी

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शास्त्र का मुख से उच्चारण करना लाभकारी नहीं है। लाभकारी तो शास्त्र पर अमल करना है।

महात्मा गाँधी,


धर्म का सच्चा स्वरूप

(एक तुच्छ सेवक)

बहुत से लोग तो धर्म को केवल पुस्तकों में सुरक्षित रखने की वस्तु और वेद गीता आदि धर्म ग्रन्थों को अलमारियों में बन्द रहने की चीज समझते हैं। “इनका ख्याल है कि धर्म व्यवहार और आचरण में लाने की वस्तु नहीं-असली जीवन में उसका कोई सरोकार (सम्बन्ध) नहीं”। कोई-कोई तो ऐसी अनर्गल (बे सिर पैर की) बातें कहते हुए सुने जाते हैं कि “मैंने सब कुछ किया-चोरी की-जारी की, ठगी की-मक्कारी की, लेकिन धर्म नहीं खोया।” उस भोले भाले मानस से पूछो कि आखिर तुमने ‘धर्म खोना’ किस बात में समझ रखा है? यह तुरन्त उत्तर देगा कि “मैंने किसी के हाथ का छुआ नहीं खाया, दो-दो सौ मील का सफर किया, परन्तु कभी रेल में भोजन नहीं किया, चौके से बाहर पूड़ी, पराँठे की बात दूर, चने भी नहीं चाबे।

धर्म का वास्तविक रूप वह है जिसके धारण करने से किसी का अस्तित्व बना रहे, जैसे अग्नि का धर्म प्रकाश और गरमी है, अन्यथा राख का ढेर। इसी प्रकार मनुष्य का धर्म वह है जिससे उसमें मनुष्यत्व बना रहे-इन्सानियत कायम रहे, यदि किसी कार्य से इन्सान में इन्सानियत की जगह वहशीपन आ जावे और उसके कारण वह दूसरों को मारने लगे-उनसे लड़ने लगे, तो यह उसका धर्म नहीं। जिसके द्वारा मनुष्य में-इन्सान में इन्स अर्थात् प्रेम का भाव उत्पन्न हो एक दूसरे की सेवा और सहायता का ख्याल पैदा हो वह ही धर्म है। शास्त्रों में लिखा है “यतोऽभ्युदय निश्रेयस सिद्धिःस धर्म” जिसके द्वारा मनुष्य ऐहिक उन्नति करता हुआ साँसारिक ऐश्वर्य भोगता हुआ आवागमन के चक्र से छूटकर मुक्ति लाभ करे- मोक्षधाम (नजात) प्राप्त करे, वह ही मनुष्य का धर्म है।

दूसरे शब्दों में धर्म लौकिक और पारलौकिक दोनों सुखों का साधन है। जो भी पुस्तक ऐसे धर्म का प्रतिपादन करे वह ‘धर्म-ग्रन्थ’ कहलाने की अधिकारिणी है चाहे वह वेद हो, बाईबल हो, कुरान, तौरेत हो या जिन्दावस्ता।

जो पुस्तक एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य का शत्रु बनावे अथवा एक मनुष्य समुदाय को दूसरे मनुष्य समुदाय के नाश के लिए उद्यत करे, वह पुस्तक कदापि ‘धर्म-ग्रन्थ, ईश्वर की ओर से ‘इलहामी’ कहलाने के योग्य नहीं और न ऐसा धर्म ही ईश्वर की और से हो सकता है, ईश्वरीय धर्म तो वह है जो सब की भलाई चाहे-जिससे विश्वभर का हित साधन हो।

धर्म के लिए यदि कोई अंग्रेजी शब्द उपयुक्त (मौजूँ) हो सकता है तो Virtue (नेकी या सदाचार) अथवा Duty (कर्त्तव्य या फर्ज) है Religion (मजहब) नहीं।

धर्म किसी एक गुण या कार्य का नाम नहीं, जैसे वृक्ष की बहुत सी शाखाएँ होती हैं। इसी प्रकार धर्म के भी मानव धर्म शास्त्र मनुस्मृति में जो स्मृतियों में, सब से अधिक माननीय है, दस लक्षण गिनाये हैं-

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रहः।

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥

धैर्य क्षमा दम शौच शम, विद्या बुद्धि-विवेक।

क्रोध-त्याग-परधन-हरण, सत्य धर्म की टेक॥

ये धर्म के लक्षण पातंजल योग शास्त्र के पाँच यम और पाँच नियमों के आधार पर बने प्रतीत होते हैं। जो मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति के सर्वोपरि साधन और मोक्ष पद प्राप्ति की प्रथम दो सीढ़ियाँ हैं। परन्तु केवल इनके जान लेने से कुछ नहीं होता, असली चीज तो इन धैर्य क्षमा आदि धर्म के अंगों का पालन करना अर्थात् आचरण में लाना है जैसा कि श्रीकृष्ण महाभारत में धर्मोपदेश देते हुए कहते हैं- जैसे भोजन के बिना तृप्ति नहीं होती है वैसे ही कर्म न कर केवल वेदज्ञ हो जाने से ब्राह्मण कदापि मोक्ष नहीं पाते। भगवान-वृहस्पति ने इन्द्रिय विरोध कर ब्रह्मचर्य धारण किया था इसी से वह देवताओं के आचार्य हुये।

महात्मा गाँधी के कथनानुसार- “जिस धर्म का हमारे दैनिक आचार व्यवहार पर कुछ असर न पड़े वह एक हवाई ख्याल के सिवा और कुछ नहीं है। मैं तो धर्म को ऐसी ही आवश्यक वस्तु समझता हूँ जैसे वायु, जल और अन्न। जैसी चाह आजकल बहुत से नवयुवकों को सिनेमा और अखबारों की है कि बिना अखबार पढ़े, बिना सिनेमा देखे, चैन ही नहीं पड़ता, ऐसी ही भूख धर्म की लगनी चाहिये। प्रतिदिन कोई न कोई परोपकार कार्य, दूसरों की भलाई का काम, अवश्य हो जाना चाहिए और न होने पर सिगरेट की तलब और सिनेमा की चाह की तरह, दिल में एक प्रकार की तड़प उठनी चाहिए कि अफसोस! आज का दिन व्यर्थ गया।”


विचारों का केन्द्र बिंदु-’क्यों’?

(ले.- श्री अगरचन्द नाहटा बीकानेर)

जीवन एक विकट समस्या है इसमें न जाने कितने उतार-चढ़ाव आते हैं और स्मृति में विलीन हो जाते हैं। इनमें से कुछ ही विचार थोड़े समय के लिए हमारी स्मृति में रह पाते हैं पर उन पर भी हम सरसरी नजर भर डाल लेते हैं, गहराई से नहीं सोच पाते अन्यथा जीवन सबसे अधिक अध्ययन का विषय एवं ज्ञान का भंडार है। जीवन की प्रत्येक घटना के पीछे कार्यकारण परम्परा का अद्भुत रहस्य छिपा है। विचार करने पर छोटी से छोटी साधारण घटना जीवन का काया पलट कर देती है और विचार नहीं करने पर बड़ी से बड़ी घटनाओं का भी कोई असर नहीं हो पाता। कथाओं में हम प्रायः पढ़ते हैं कि अमुक व्यक्ति को बादलों के रंग देखकर वैराग्य हो गया। अमुक को रोगी, दीन, वृद्ध एवं मृतक को देखकर संसार से उदासीनता हो गई, पर हम इनको रात दिन देखते है। फिर भी हम पर इनका असर नहीं होता, आखिर ऐसा क्यों? इस पर विचार करना आवश्यक है। एक घोर पापी किसी महात्मा के एक उपदेश वाक्य से सजग हो उठा पर हमने उनके वाक्यों को अनेक बार पढ़ा और मनन किया फिर भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ। एक ही बात एक को भोग की ओर आकर्षित करने वाली होती है और दूसरे को त्याग की ओर। इससे स्पष्ट है कि वह शक्ति घटनाओं में नहीं, हमारे विचारों में ही है। विचारों से ही मनुष्य बनता है और उन्हीं से बिगड़ता भी है। अतः जीवन की हर एक समस्या-हर एक घटना पर, चाहे वह कितनी ही तुच्छ और साधारण क्यों न जान पड़े मनन करना आवश्यक है। उसका महत्व समझना आवश्यक है। प्रत्येक कार्य के कारण पर विचार किया जाय कि ऐसा हुआ तो क्यों हुआ? और ऐसा नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? अमुक मनुष्य कार्य कर सकता है तो मैं क्यों नहीं कर सकता? उसमें और मुझमें किन-किन बातों का क्या अन्तर है? मेरी और उसकी कार्य प्रणाली में कहाँ सामंजस्य हैं? कहाँ विषमता है? मेरी त्रुटि कहाँ है? मैं कैसे वैसा कर सकता हूँ या बन सकता हूँ? मैंने अमुक समय में वह कार्य किया तो क्यों किया? मुझे अमुक विचार आया तो क्यों आया? और अमुक कार्य या विचार नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? इस प्रकार “क्यों” की विचारधारा को आगे बढ़ाते जाने पर नया प्रकाश मिलता जायगा। नई समस्याओं के नये हल मिलेंगे और नए हलों के लिये नई समस्याएं। क्यों एवं कैसे- विचारों के विकास का मूल मंत्र है उसे अपना कर आप लाभ उठाइये, विचारक बनिए।


गायत्री मंत्र का अर्थ-संदेश

वेदमाता गायत्री का मंत्र छोटा सा है। उसमें 24 अक्षर हैं। पर इतने थोड़े में ही अनन्त ज्ञान का समुद्र भरा हुआ है। जो ज्ञान गायत्री के गर्भ में है वह इतना सर्वांग पूर्ण एवं परिमार्जित है कि मनुष्य यदि उसे भली प्रकार समझ लें और अपने जीवन में व्यवहार करें तो उसके लोक परलोक सब प्रकार सुख शान्तिमय बन सकते हैं।

आध्यात्मिक और साँसारिक दोनों ही दृष्टि कोणों से गायत्री का संदेश बहुत ही अर्थपूर्ण है। उसे गंभीरता पूर्वक समझा और मनन किया जाय तो सद्ज्ञान का अविरल स्रोत प्रस्फुटित होता है। नीचे संक्षिप्त सा गायत्री मंत्रार्थ दिया जाता है।

ओमित्येव सुनामध्येयमनघं विश्वात्मनो ब्रह्मणः।

सर्वेष्वेव हितस्य नामसु वसोरेतत्प्रधानं मतम्।

यं वेदा निगदन्ति न्याय निरतं श्रीसच्चिदानन्दकम्

लोकेशं समदर्शिनं नियमिनं चाकार हिनं प्रभुम्॥

अर्थ- जिसको वेद न्यायकारी, सच्चिदानंद सर्वेश्वर, समदर्शी, नियामक, प्रभु और निराकार कहते हैं। जो विश्व में आत्मा रूप से व्यापक है। उस ब्रह्म के समस्त नामों के श्रेष्ठ नाम पाप रहित पवित्र और ध्यान करने योग्य ॐ यह ही मुख्य नाम माना गया है।

भावार्थ- परमात्मा को प्राप्त करने और प्रसन्न करने का मार्ग उसके नियमों पर चलना है। वह निन्दा, स्तुति से प्रभावित नहीं होता, वरन् कर्मों के अनुसार फल देता है। परमात्मा को सर्वत्र व्यापक समझकर गुप्त रूप से भी पाप न करना चाहिए। प्राणियों की सेवा करना परमात्मा की ही पूजा है। परमात्मा को अपने अन्तर में अनुभव करने से आत्मा पवित्र होती है और सत् चैतन्यता तथा आनन्द की अनुभूति होती है।

भूर्वै प्राण इति ब्रु वन्ति मुनयो वेदान्त पारंगताः।

प्राणः सर्व विचेतनेषु प्रसृतः सामान्य रूपेण च॥

एतेनैव विसिद्धयते हि सकलं नूनं समानं जगत्।

दृष्टव्यं सकलेषु जन्तुषु जनैर्नित्यं ह्यतश्चाव्मवत॥

अर्थ- मुनि लोग प्राण को भूः करते हैं। यह प्राण समस्त प्राणियों में समस्त रूप से फैला हुआ है। इससे सिद्ध है कि यहाँ सब समान हैं। अतएव सब मनुष्यों और प्राणियों को अपने समान ही देखना चाहिए।

भावार्थ- अपने समान सबको कष्ट होता है इसलिए किसी को सताना न चाहिए। दूसरों से वही व्यवहार करना चाहिए जो हम दूसरों से अपने लिए चाहते हैं। सब में समत्व की दृष्टि रखनी चाहिए। कुल, वंश, देश, जाति, समुदाय स्त्री-पुरुष आदि विभागों के कारण किसी को नीच-ऊंच, छोटा-बड़ा नहीं समझना चाहिए। उच्चता और नीचता का कारण तो भले बुरे कर्म ही हो सकते हैं।

भुवर्नाशो लोके सकल विपदाँ वै निगदितः।

कृतं कार्य कर्त्तव्यमिति मनसा चास्य करणम्॥

फलाशा मर्त्याये विद्धति न वै कर्म निरताः।

लभन्ते नित्यं ते जगति हि प्रसादं सुमनसाम्॥

अर्थ- संसार में समस्त दुखों का नाश ही भुवः कहलाता है। कर्त्तव्य भावना से किया गया कार्य ही ‘कर्म’ कहलाता है। परिणाम के सुख की अभिलाषा छोड़कर जो कर्म करते हैं वे मनुष्य सदा प्रसन्न रहते हैं।

भावार्थ- मनुष्य का अधिकार कर्म करना है, फल देने वाला ईश्वर है। अमुक वस्तु प्राप्त होने पर ही सुख माना जाय ऐसा सोचने की बजाय ऐसा सोचना चाहिए कि कर्त्तव्य पालन ही हमारे लिए आनन्द का सर्वोत्तम केन्द्र है। जो अपने कर्त्तव्य कर्म को ही अपना लक्ष मान लेता है वह कर्मयोगी हर घड़ी सुखी रहता है, जो इच्छित फल की आशा के लिए लटका रहता है उस तृष्णावान को सदा बेचैनी रहती है और अनेक बार निराश एवं दुखी होना पड़ता है। सदुद्देश्य के लिए मनुष्य को सदा सत्कर्म करते रहना चाहिए। गीता के कर्म योग का यही तत्व है।

स्वरेषो वै शब्दो निगदति मनः स्थेर्य करणम्।

तथा सौख्यं स्वास्थ्य ह्यु पदिशति चित्तस्यचलतः

निमग्नत्वं सत्यव्रत सरसि चा चक्षत उत।

त्रिघाँ शान्तिह्येभिर्भुविच लभते संयम रतः॥

अर्थ- ‘स्वः’ शब्द मन की स्थिरता का निर्देश करता है। चंचल मन को सुस्थिर और स्वस्थ रखो यह उपदेश देता है। सत्य में निमग्न रहो यह कहता है। इस उपाय से संयमी पुरुष तीनों प्रकार की शान्ति को प्राप्त करते हैं।

भावार्थ- अनिच्छित परिस्थिति प्राप्त होने पर प्रायः मनुष्य शोक, दुख, क्रोध, द्वेष, दीनता निराशा, चिन्ता, भय, बेचैनी आदि से उद्विग्न होकर अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं और अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होने का अहंकार, मद, उद्दंडता, खुशी में फूलकर अस्वाभाविक आचरण करना, इतराना, अपव्यय, शेखी, आदि से ग्रस्त हो जाते हैं। यह दोनों ही स्थितियाँ एक प्रकार के नशे या ज्वर हैं, यह विवेक को अन्धा कर देते हैं। जिससे विचार और कार्यों की उचित शृंखला नष्ट भ्रष्ट हो जाती है और आदमी अंधा तथा बावला बन जाता है। इन सत्यानाशी तूफानों से आत्मा की रक्षा करने के लिए मन को स्थिर, संतुलित, स्वस्थ एवं वास्तविक बनाना चाहिए तभी मनुष्य को आत्मिक, बौद्धिक तथा शारीरिक शान्ति मिल सकती है।

ततोवैनिष्पत्तिः स भुविमतिमान् पण्डितवरः।

विजानन् गुह्यं जीवन मरणयोर्यस्तु निखिलम्॥

अनन्ते संसारे विचरति भयासक्ति रहितः।

तथा निर्माणं वै निज गति विधीना प्रकुरुते॥

अर्थ- तत् शब्द यह बतलाता है कि इस संसार में वही बुद्धिमान है जो जीवन मरण के रहस्य को जानता है। भय और आसक्ति रहित होकर जीता है और अपनी गतिविधियों का निर्माण करता है।

भावार्थ- मृत्यु सदा सिर पर खड़ी नाचती रहती है, इस समय साँस चल रही है अगले ही क्षण बन्द हो जाय इसका क्या ठिकाना है। यह सोचकर इस सुर दुर्लभ मानव जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग करना चाहिए। और थोड़े जीवन में क्षणिक सुख के लिए पाप क्यों किये जायं? जिससे चिरकाल तक दुख भोगने पड़ें ऐसा विचारना चाहिए।

यदि विद्याध्ययन, समाज सुधार, धर्मप्रचार आदि श्रेष्ठ कार्य करने हों तो ऐसा सोचना चाहिए कि जीवन अखण्ड है। यदि इस शरीर से यह कार्य पूरा न हो सका तो अगले में पूरा करेंगे। यह निर्विवाद है कि जो इस जीवन का सदुपयोग कर रहा है उसे मृत्यु के पश्चात भी आनन्द ही मिलेगा, परलोक पुनर्जन्म आदि में सुख ही प्राप्त होगा, पर जो इन जीवन क्षणों का दुरुपयोग कर रहा है उसका भविष्य अंधकारमय है। इसलिए जो बीत चुका उसके लिए दुख न करते हुए शेष जीवन का सदुपयोग करना चाहिए।

सवितुस्तु पदं वितनोति ध्रुवं,

मनुजोवलवान् सवितेवभवेत्।

विषया अनुभूति परिस्थितय,

श्च सदात्मन एवं गणेदति सः॥

अर्थ- सवितुः यह पद बतलाता है कि मनुष्य को सूर्य के समान बलवान होना चाहिए और सभी विषय अनुभूतियाँ अपने आत्मा से ही संबंधित हैं ऐसा विचारना चाहिए।

भावार्थ- सूर्य को वीर्य और पृथ्वी को रज कहा जाता है। सूर्य की शक्ति से संसार की सब क्रियाएं होती हैं। इसी प्रकार आत्मा अपनी क्रिया शीलता द्वारा विविध प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है। प्रारम्भ, भाग्य, दैव आदि भी अपने प्राचीन कर्मों का ही परिपाक मात्र है। इसलिए अपने लिए जैसी परिस्थिति अच्छी लगती है उसी के योग्य अपने को बनाना चाहिए। अपना भाग्य निर्माण करना हर मनुष्य के अपने हाथ में है। इसलिए आत्म निर्माण की ओर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए। बाहर की सहायता भी अपनी अन्तरंग स्थिति के अनुकूल ही मिलती है।

मनुष्य को तेजस्वी, बलवान, पुरुषार्थी बनना चाहिए। स्वास्थ्य, विद्या, धन, चतुरता, संगठन, यश, साहस और सत्य इन आठ बलों से अपने को सदैव बलवान बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।

वरेण्यंचैतद्वै प्रकटयति श्रेष्ठत्वमनिशम्।

सदा पश्येच्छेष्ठं मननमपि श्रेष्ठस्य विदधेत्॥

तथा लोके श्रेष्ठं सरलमनसा कर्म च भजेत्।

तदेत्थं श्रेष्ठत्वं व्रजति मनुजः शोभित गुणैः॥

अर्थ- वरेण्य यह शब्द प्रकट करता है कि प्रत्येक मनुष्य को नित्य श्रेष्ठता की और बढ़ना चाहिए। श्रेष्ठ देखना, श्रेष्ठ चिन्तन करना, श्रेष्ठ विचारना, श्रेष्ठ कार्य करना, इस प्रकार मनुष्य श्रेष्ठता को प्राप्त होता है।

भावार्थ- मनुष्य वैसा ही बनता है जैसे कि उसके विचार होते हैं। विचार साँचा है और जीवन गीली मिट्टी। जैसे विचारों में हम डूबे रहते हैं, हमारा जीवन उसी ढांचे में ढल जाता है, वैसे ही आचरण होने लगते है, वैसे ही साथी मिलते हैं। उसी दिशा में जानकारी, रुचि तथा प्रेरणा मिलती है। इसलिए यदि अपने को श्रेष्ठ बनाना है तो सदा श्रेष्ठ मनुष्यों के संपर्क में रहना, श्रेष्ठ पुस्तकें पढ़ना, श्रेष्ठ बातें सोचना, श्रेष्ठ घटनायें देखना, श्रेष्ठ कार्य करना आवश्यक है। दूसरों में जो श्रेष्ठताएं उनकी कद्र करना और उन्हें अपनाना, श्रेष्ठता में श्रद्धा रखना यह सब बातें उन लोगों के लिए बहुत आवश्यक हैं जो अपने को श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं।

भर्गोवेतिपदं च व्याहरति वै लोकः सुलोको भवेत्।

पापे पाप विनाशने त्वभिरतो दत्तावधानो वसेत्

दृष्ट्वा दुष्कृतिदुर्विपाक निचयं तेभ्यो जुगुप्सेद्धिच वन्नाशाय विधीयताँ च सततं संधर्षमेभिः सहः॥

अर्थ- भर्गः यह पद बताता है कि मनुष्यों को निष्पाप बनना चाहिए, पापों से सावधान रहना चाहिए। पापों के दुष्परिणामों को देखकर उनसे घृणा करें और निरन्तर उनको नष्ट करने के लिए संघर्ष करना चाहिए।

भावार्थ- संसार में जितने दुख हैं पापों के कारण हैं। अस्पतालों में, जेलखानों में तथा अन्यत्र नाना प्रकार के अन्य कष्टों से पीड़ित मनुष्य अब के या पुराने पापों से ही दुख भोगते हैं। नरक में भी पापी ही त्रास पाते हैं। सन्त और परोपकारी पुरुष दूसरों के पापों का बोझ अपने सिर पर लेकर दुख उठाते हैं और उन्हें शुद्ध करते हैं। चाहे दूसरों का दुख कोई सन्त सहे चाहे पापी स्वयं सहे। हर हालत में दुखों का कारण पाप ही है। इसलिए जिन्हें दुख का भय है और सुख की इच्छा है उन्हें चाहिए कि पापों से बचे, दूसरों को बचावें और भूतकाल के पापों के लिए प्रायश्चित करें। पापों से सावधानी रखना और उन्हें भीतर बाहर से नष्ट करने के लिए संघर्ष करना यह बहुत बड़ा पुण्य कार्य है। क्योंकि इससे अगणित प्राणी दुखों से छुटकारा पाकर सुखी बनते हैं। निष्पापता में ही सच्चे आनन्द का निवास है।

देवस्येति तुव्याकरोत्यमरताँ मर्त्योऽपि संप्राप्यते।

देवानामिव शुद्ध दृष्टि करणात् सेवापचाराद्भुवः

निःस्वार्थं परमार्थकर्म करणात् दीनाय दानात्तथा

बाह्यभ्यन्तरमस्य देव भुवनं संसृज्यते चैवहि॥

अर्थ- देवस्य यह पद बतलाता है कि मरणधर्मा मनुष्य भी अमरता अर्थात् देवत्व को प्राप्त हो सकता है। देवताओं के समान शुद्ध दृष्टि रखने से, प्राणियों की सेवा करने से, परमार्थ कर्म करने से, निर्बलों की सहायता करने में मनुष्य के भीतर और बाहर देवलोक की सृष्टि होती है।

भावार्थ- परमात्मा की बनाई हुई इस पवित्र सृष्टि से जो कुछ है पवित्र और आनन्दमय ही है। इस दृष्टि से संसार को प्रसन्नता की दृष्टि से देखना, उसमें मनुष्यों द्वारा उत्पन्न की गई बुराइयों को दूर करना और ईश्वरीय श्रेष्ठताओं को विकसित करना, प्रचलित करना, देव कर्म है। इस देव दृष्टि को धारण करने से मनुष्य देवता बन सकता है। जो अपने को शरीर न समझकर आत्मा अनुभव करता है। वह अमर है, उसके पास से मृत्यु का भय दूर चला जाता है। प्राणियों को प्रेम और आत्मीयता की पवित्र दृष्टि से देखना, अपने आचरणों को पवित्र रखना, अपने से निर्बलों को ऊँचा उठाने के लिए अपनी शक्तियों का दान करना, यह देवत्व है। इन गुणों वाले के लिए यह भूलोक भी देवलोक के समान आनन्दमय बन जाता है।

धीमहि सर्वविधं हृदये शुचि,

शक्तिचयं वयमित्युपदिष्द्वा।

नो मनुजोलभते सुखशान्ति,

मनेन विनेति वदन्ति हि वेदाः॥

अर्थ- हम सब लोग हृदय में सब प्रकार की पवित्र शक्तियों को धारण करें। वेद कहते हैं कि इसके बिना मनुष्य सुख शान्ति को प्राप्त नहीं होता।

भावार्थ- संसार में भौतिक शक्तियाँ अनेक हैं। धन, पद, वैभव, राज्य, शरीर बल, संगठन, शास्त्र, विद्या, बुद्धि, चतुरता, कोई विशेष योग्यता आदि के बल पर लोग ऐश्वर्य और प्रशंसा प्राप्त कर लेते हैं, पर यह अस्थायी होती है। इनसे सुख मिल सकता है और वह छोटे मोटे आघात में ही नष्ट भी हो सकता है। स्थायी सुख आध्यात्मिक पवित्र गुणों में है, जिन्हें “दैवी संपदाएं” या “दिव्य शक्तियाँ” भी कहते हैं। निर्भयता, विवेक, स्थिरता, उदारता, संयम, परमार्थ, स्वाध्याय, तपश्चर्या, दया, सत्य, अहिंसा, नम्रता, धैर्य, अद्रोह प्रेम, न्यायशीलता, निरालस्य, आदि दैवी गुणों के कारण जो सुख मिलता है उसकी तुलना किसी भी भौतिक सम्पदा से नहीं हो सकती, इसलिए अपना दैवी सम्पदाओं का कोष बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए।

धियोवोन्मथ्याच्छागमनिगम मंत्रान् सुमतिवान्।

विजानीयात्तत्वं विमल नवनीतं परमिव।

यतोऽस्मिन् लोके वै संशयगत विचार स्थलशते।

मतिः शुद्धैवाँछा प्रकटयति सत्यं सुमन से॥

अर्थ- बुद्धिमान को चाहिए कि वेद शास्त्रों को बुद्धि से मथकर मक्खन के समान उत्कृष्ट तत्व को जाने। क्योंकि शुद्ध बुद्धि से ही सत्य को जाना जाता है।

भावार्थ- संसार में अनेक विचारधाराएं हैं, उनमें से अनेकों आपस में टकराती भी हैं। एक शास्त्र के सिद्धान्त दूसरे शास्त्र के विपरीत भी बैठते हैं, इसी प्रकार एक विद्वान या ऋषि का विचार दूसरे विद्वान या ऋषि के विचारों में विचलित न होना चाहिए। देश, काल, पात्र और परिस्थिति के अनुसार जो बात एक समय बिल्कुल ठीक होती है वही भिन्न परिस्थिति में गलत भी हो सकती है। जाड़े के दिनों में जो कपड़े लाभदायक होते हैं, उनमें गर्मी में काम नहीं चल सकता, इसी प्रकार एक परिस्थिति में जो बात उचित है वह दूसरी परिस्थिति में अनुचित हो जाती है। इसलिए किसी ऋषि, विद्वान, नेता या शास्त्र की निन्दा न करते हुए हमें उनमें से वही तत्व लेने चाहिए जो आज की स्थिति के अनुकूल हैं। इस उचित अनुचित का निर्णय, तर्क, विवेक और न्याय के आधार पर वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए।

योनोवास्ति तु शक्तिसाधनचयो न्यूनाऽधिकश्चाथवा

भागं नूनतमं हितस्य विदधेमात्मप्रसादाय वै।

तत्पश्चादवशिष्ट भागमखिलं त्यक्तवा फलाशाँहृदि

तद्द्यीनेष्वमिलाषवस्तु वितरेमाँगीपुनित्यंवयम्॥

अर्थ- हमारी जो भी शक्तियाँ एवं साधन हैं चाहे वे न्यून हों अथवा अधिक हो उनके न्यून से न्यून भाग को अपनी आवश्यकता के लिए प्रयोग में लावें। शेष को निस्वार्थ भाव से उन्हें अशक्त व्यक्तियों में बाँट दें।

भावार्थ- भगवान ने मनुष्य को ज्ञान, बल तथा वैभव एक अमानत के रूप में इसलिए दिया है कि इन विभूतियों से सुसज्जित होकर अनेकों मान, यश, सुख तथा पुण्य का श्रेय प्राप्त करें परन्तु इनका लाभ अधिक से अधिक मात्रा में दूसरों को उठाने दें। अपने ऐश, आराम, भोग, संचय या अहंकार की पूर्ति में इनका उपयोग नहीं होना चाहिए। वरन् लोक हित के लिए अपने से निर्बलों की सहायता के लिए इनका उपयोग किया जाना चाहिए। विद्वान, बलवान या धनवान का गौरव इसी बात में है कि उनके द्वारा कम ज्ञान वालों को, निर्बलों को, निर्धनों को ऊंचा उठाने का प्रयत्न किया जाय। जैसे, वृक्ष, कूप, तड़ाग उपवन, पुरुष, अग्नि, जल, वायु, बिजली आदि श्रेष्ठ समझे जाने वाले पदार्थ अपनी महान शक्तियों को लोक हित के लिए सदैव वितरित करते रहते हैं। वैसे ही हमें भी अपनी शक्तियों का जीवन निर्वाह मात्र भाग अपने लिए रखकर शेष को जनहित के लिए समर्पित कर देना चाहिए।

प्रचोदयात् स्वं त्वितराँश्च मानवान्,

नरः प्रयाणाय च सत्य वर्त्मनि।

कृतं हि कमिखिल मित्थ मंगिना,

विपश्चितैर्धर्म इति प्रचक्षते॥

अर्थ- मनुष्य अपने आपको तथा दूसरों को सत्य मार्ग पर चलाने के लिए प्रेरणा दे। इस प्रकार किये हुए सब कामों को विद्वान लोग धर्म कहते हैं।

भावार्थ- प्रेरणा संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। इसके बिना सारी साधन सामग्री बेकार है चाहे वह कितनी ही बड़ी क्यों न हो। प्रेरणा से उत्साहित और प्रवृत्त हुआ मनुष्य यदि कार्य आरम्भ कर देता है तो साधन अपने आप जुटा लेता है, उसे ईश्वरीय सहायताएं मिलती हैं और अनेक सहयोगी प्राप्त हो जाते हैं। इसलिए अपने आपको सत्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा तथा प्रोत्साहन देना चाहिए तथा दूसरों को उत्तमता की दिशा में अग्रसर करने के लिए उन्हें प्रेरित करना चाहिए। वस्तुएं देकर किसी का उतना उपकार नहीं किया जा सकता जितना कि उसे प्रेरणा देकर उन्नत या समृद्ध बनाया जा सकता है। सत्कार्य के लिए प्रेरणा देना, इतना बड़ा पुण्य कार्य है कि उसकी तुलना में छोटी-मोटी पुण्य क्रियाएं बहुत ही तुच्छ बैठती हैं।


दूसरों के दोष ही गिनने से क्या लाभ

(श्री दोलतराम कटरहा बी. ए., दमोह)

भगवती पार्वती के दो पुत्र थे- स्वामिकार्तिक और गणेश। दोनों आपस में खूब लड़ते थे। गणेश, स्वामिकार्तिक की आँखें गिनते एक, दो, तीन, चार और स्वामिकार्तिक गणेश की सूँड़ नापते और फिर दोनों आपस में लड़ने लगते। पार्वती जी इनकी लड़ाई से तंग आ गई और एक दिन उन्होंने उन दोनों को कृपा सागर शिवजी के सामने हाजिर किया और कहा कि महाराज ये लड़ाके लड़के खूब लड़ते हैं, कृपा करके इन्हें किसी प्रकार समझा दीजिए। शिवजी ने उन्हें प्यार से गोद में बैठाकर समझा दिया कि दूसरों की बुराई देखना बुरी आदत है।

अगर है मंजूर तुझको बेहतरी,

न देख ऐब दूसरों का तु कभी।

कि बदबीनी आदत है शैतान की,

इसी में बुराई की जड़ है छिपी।

महात्मा ईसा ने कहा है कि “दूसरों के दोष मत देखो जिससे कि मरने के उपरान्त तुम्हारे भी दोष न देखे जावें” और तुम्हारा स्वर्गीय पिता तुम्हारे अपराधों को क्षमा कर दें। यदि आप दूसरों के दोषों को क्षमा नहीं करते तो आप अपने दोषों के लिए क्षमा पाने की आशा क्यों करते हैं?

मनुष्य का पेट क्यों फूला-फूला सा रहता है और उसकी पीठ क्यों पिचकी रहती है इसका कारण तनिक विनोद पूर्ण ढंग से एक महाशय इस प्रकार बताते हैं कि इन्सान दूसरों के पाप देखा करता है इसलिए दूसरों की पाप रूपी गठरी उसके सामने बंधी रहती है पर उसे अपने ऐब नहीं दिखाई देते, वह उनकी और पीठ किए रहता है इसलिए उसकी पीठ चिपकी रहती है।

एक बार भगवान बुद्ध के पास दो व्यक्ति परस्पर लड़ते-झगड़ते हुए हुए आए। एक दूसरे के लिए कहता था कि महाराज इसके आचरण कुत्ते जैसे हैं इसलिए यह अगले जन्म में कुत्ता होगा। दूसरा पहले के लिए कहता है कि महाराज इसके आचरण बिल्ली जैसे हैं और यह अगले जन्म में बिल्ली होगा। भगवान बुद्ध ने बात समझ ली ओर पहले से कहा कि तेरा साथी तो नहीं पर तुझे ही अगले जन्म में कुत्ता होना पड़ेगा क्योंकि तेरे हृदय में कुत्ते के संस्कार जम रहे हैं कि कुत्ता इस प्रकार आचरण करता है। इसी तरह उन्होंने दूसरे से कहा कि वह खुद बिल्ली होगा।

भविष्य में क्या होगा यह तो ठीक-ठीक नहीं जाना जा सकता पर यह तो बिल्कुल सही है कि जो दूसरों के ऐब देखता है वह अपना मिथ्या अहंकार बढ़ाता है और उसके स्वभाव में क्रोध और घृणा की वृद्धि होती है। वह दूसरों के सम्बन्ध में अहंकार पूर्ण धारणाएं बनाता है और अपने आपको सबसे अच्छा समझने लगता है। वह अपनी बुराइयों की ओर से अन्धा हो जाता है और उसमें एक तरह का छिछोरापन या चुगली खाने की आदत आ जाती है।

एक बार महात्मा ईसा के पास कुछ लोग एक स्त्री को लेकर आये और कहने लगे कि प्रभु इसने व्यभिचार किया है इसे पत्थर मार-मार कर मार डालना चाहिए। महात्मा ईसा ने कहा है कि अच्छी बात है पर इसे वह पत्थर मारे जिसने एक भी पाप न किया हो। उस स्त्री को मारने की किसी की हिम्मत न पड़ी और सब लोग एक-एक करके चुपचाप वहाँ से खिसक गए। तब महात्मा ईसा ने उस स्त्री से दयापूर्वक कहा कि अब आगे ऐसा न करना। अपने प्राण-रक्षक के इन शब्दों का इस स्त्री पर इतना प्रभाव हुआ कि वह स्त्री एक साध्वी महिला बन गई। सच है हमारे ऐब देखने वाले हमारे चरित्र को उतना नहीं सुधार सकते जितना कि हम पर दया और सहानुभूति रखने वाले। महात्मा ईसा ने उस समय यह भी बतला दिया कि कोई भी मनुष्य इतना पवित्र नहीं हो सकता कि वह दूसरों के व्यक्तिगत पापों पर निगाह डाले और उनके लिए उसे स्वयं दंड दे। केवल एक परमात्मा ही पूर्ण है और वही हमें हमारे व्यक्तिगत पापों के लिए दण्ड दे सकता है। अतएव हमें महात्मा कबीरदास की नम्रतापूर्ण उक्ति को सदा ध्यान में रखना चाहिए।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न दीखा कोय।

जो दिल खोजा आपना, मुझ सा बुरा न होय॥

दूसरों के व्यक्तिगत दोषों के प्रति हमारा क्या रुख होना चाहिए इसका विवेचन करते हुए महात्मा तुलसी दास लिखते हैं कि “साधुओं का चरित्र कपास जैसा निर्मल और शुभ्र होता है, उसका फल परम गुणमय होता है और वह स्वयं दुख सहकर दूसरों के पाप रूपी छिद्रों को ढकता है। इसी गुण के कारण वह संसार में वन्दनीय है। अतएव यदि हमें भी इस शुभ्र कपास जैसा वन्दनीय होना है तो हमें दूसरों की व्यक्तिगत भूलों के प्रति बड़ा सहृदय होना चाहिए। सहृदय होने पर ही, हम किसी व्यक्ति के हृदय में स्थान पा सकते हैं। तभी वह हमें अपना हितेच्छु जानकर हम पर अपने हृदय का भेद प्रकट कर सकता है और तभी हम उसके मन की गाँठें खोलने में उसकी सहायता कर उसका सच्चा सुधार कर सकते हैं।

हमें किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत दोषों के लिए जितना सहृदय होना है उतना ही हमें सामाजिक अपराध करने वालों के प्रति निर्मम होना पड़ेगा। सामाजिक अपराध करने वालों के उन अपराधों को हजार कान और आँखों से हमें सुनना और देखना पड़ेगा और उन्हें उनका दण्ड दिलवाना होगा।


स्वास्थ्य-सुधार के 21 सुनहरे नियम

इन्हें पालन कीजिए, आप निरोग और बलवान बन जायेंगे।

(1) प्रातःकाल शौच जाने से पूर्व एक गिलास पानी पिया कीजिए, इससे दस्त साफ होता है और रात का बिना पचा हुआ भोजन पचने में सहायता मिलती है।

(2) आपके लिए हल्का व्यायाम आवश्यक है। सुबह शाम तेज चाल से, दोनों हाथों को हिलाते हुए, सीना निकाल कर काफी दूर तक टहलने जाया करें। यह टहलना इतना होना चाहिए कि शरीर में गर्मी काफी बढ़ जाय और थोड़ा पसीना तक झलक आवे। कमजोर आदमियों के लिए यह सर्वोत्तम व्यायाम है। इससे समस्त रक्त का दौरा तेज होता है। कल पुर्जे ठीक प्रकार काम करने लगते हैं।

(3) प्रातःकाल की सहज धूप शरीर पर लिया करें। इससे रोगों के कीटाणु नष्ट होते हैं और जीवनी शक्ति प्राप्त होती है।

(4) स्नान से पूर्व शरीर पर धीरे-धीरे तेल मालिश किया करें। गर्मी के दिनों में सरसों का और जाड़े के दिनों में तिली का तेल प्रयोग करना चाहिए। तेल मालिश एक बड़ा ही उपयोगी व्यायाम है।

(5) आप ऐसे स्थान में स्नान किया करें जहाँ खुली हवा के झोंके न लगते हों। एक मोटे खुरदरे तौलिये को पानी में भिगो कर उससे धीरे-धीरे बहुत देर तक सारे शरीर को रगड़ते रहें जिससे त्वचा लाल हो जाये और शरीर के सारे छिद्र खुल जावें इससे शरीर के भीतर की विषैली गर्मी बाहर निकल जाती है और त्वचा तथा माँसपेशियों का व्यायाम हो जाता है। बीमार आदमी चारपाई पर पड़े-पड़े भी गरम पानी में तौलिया भिगोकर बिना भिगोये हुए भी घर्षण स्नान कर सकते हैं।

(6) नाश्ता करना छोड़ दें। करना ही हो तो दूध, मट्ठा, नींबू का शरबत आदि कोई पतली चीज थोड़ी मात्रा में ले लें। दोपहर और शाम दो बार ही नियत समय पर भोजन किया करें। भूख से कम खावें। प्रत्येक ग्रास को इतना चबावें कि वह खूब बारीक पिस जावे। पेट को एक चौथाई खाली रखना चाहिए। ठूँस-ठूँस कर खाने वाले और दिन भर बकरी की तरह मुँह चलाने वाले अपने दाँतों से अपनी कब्र खोदते हैं। भोजन के साथ कम से कम पानी पीना चाहिए।

(7) सुपाच्य, स्वादिष्ट फल, शाक तथा हरे अन्न हमारी सर्वोत्तम खुराक हैं। जो कच्चे नहीं खाये जा सकते उन्हें तथा पत्ती हर शाकों को उबाल कर खाना चाहिए। मेवे भी पौष्टिक हैं। अन्नों को दलिया या खिचड़ी के रूप में रसीला बनाकर उबाल कर रसीला बना लिया जाय तो वह रोटी की अपेक्षा हल्के रहते हैं। दूध, दही मट्ठा तीनों ही उपयोगी हैं।

तले हुए पूड़ी, पकवान, मिठाइयाँ, चाट, पकौड़ी, जली भुनी हुई चीजें सर्वथा हानिकारक हैं। भोजन ताजा होना चाहिए और स्वच्छतापूर्वक बनाना तथा खाना चाहिए।

(8) चाय, दूध आदि कोई चीज गर्म न लेनी चाहिए और न बर्फ अधिक या बर्फ मिश्रित अधिक ठंडी चीजें सेवन करनी चाहिए, इससे दाँत और आँत दोनों में ही विकार उत्पन्न होते हैं।

(9) पानी खूब पिया कीजिए। जाड़े के दिनों में 5-6 गिलास और गर्मी के दिनों में 8-10 गिलास तो कम से कम पीना ही चाहिए। पानी एक साथ सड़ाके से नहीं पी जाना चाहिए वरन् घूँट-घूँट कर पियें, जिससे मुँह की लार उसमें काफी मात्रा में मिल जाय। दूध, मट्ठा आदि अन्य पेय पदार्थ भी इसी प्रकार पीने चाहिए।

(10) चाय, तमाखू, भाँग, अफीम, गाँजा, शराब आदि नशीली चीजों से, हींग, गरम मसाला, मिर्च, लहसुन आदि उत्तेजक गरम, पदार्थों से तथा माँस मछली आदि अभक्ष वस्तुओं से बचते रहना चाहिए। यह चीजें स्वास्थ्य को बिगाड़ने वाली हैं। इनका पूर्णतया त्याग करना, न बन पड़े तो भी जितना कम किया जा सके करते चलना चाहिए।

(11) कपड़े जहाँ तक हो सके कम ही पहना करें। जो पहनें वे कसे हुए न हों। कड़ा शरीर से सदा वायु का स्पर्श होते रहना चाहिए, मुँह ढ़ककर न सोवें। बिस्तर को धूप में सुखाते रहना चाहिए। जिनमें पसीना लगता है ऐसे शरीर का स्पर्श करने वाले कपड़ों को नित्य धोना चाहिए।

(12) कमजोर और बीमारों को ब्रह्मचर्य से रहना चाहिए, ताकि शक्ति संचय हो। जितना कम काम सेवन किया जाय उतना ही अच्छा है।

(13) रात्रि को जल्दी सो जावें, सवेरे जल्दी उठें! अधिक रात्रि तक जागना और नेत्रों पर जोर डालने वाले काम करते रहना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।

(14) आलस्य और अति परिश्रम दोनों ही बुरे हैं। अत्यधिक दिमागी काम करना स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। चिन्ता, क्रोध, भय, निराशा, शोक, बेचैनी, घबराहट, ईर्ष्या, द्वेष, छल कपट आदि मनोविकारों से बचना चाहिए क्योंकि यह जिसके मस्तिष्क में रहते हैं उसका स्वास्थ्य चौपट कर देते हैं।

(15) सप्ताह में एक दिन उपवास करना चाहिए। निराहार रहना सबसे अच्छा है। न हो सके तो एक समय फल दूध आदि हल्की चीजें स्वल्प मात्रा में लेना उपवास है। यह भी न हो सके तो एक समय दलिया, खिचड़ी, साबुदाना आदि पानी में पकाये हुए अन्न ले सकते हैं। उपवास के दिन पानी खूब पीना चाहिए। यदि इच्छा हो तो पानी में नींबू, सोडा, नमक या शहद मिला सकते हैं।

(16) एक एनिमा यंत्र बाजार से खरीद लीजिए या किसी वैद्य डॉक्टर के यहाँ से माँग लिया कीजिए। उपवास के लिए प्रातःकाल शौच जाने के उपरान्त थोड़े गुनगुने एक सेर पानी में नहाने का साबुन घोलकर एनिमा द्वारा पेट में चढ़ाइए। चित्त लेट कर एनिमा की नली को गुदा मार्ग में लगा लेने से पेट में पानी पहुँचता है। जब पानी पेट में जा रहा हो तो पेट को धीरे-धीरे मसलते रहना चाहिए जिससे जमा हुआ मल इस पानी से घुल जाय। जब पानी पेट में चला जावे तब दस पाँच मिनट उसे रोकना चाहिए। इसके बाद शौच जाना चाहिए। इस विधि से पेट की सफाई बड़ी अच्छी तरह हो जाती है। रोगों की जड़ पेट में होती है। पेट साफ हो जाने से बीमारी तुरन्त हट जाती है और उपचार करने पर वह शीघ्र ही जड़मूल से दूर हो जाती है। सप्ताह में एक दिन एनिमा लेना और उपवास करना स्वास्थ्य ठीक करने का अनुभूत उपाय है। बीमार लोग उपवास एनिमा कई दिन लगातार जारी रख सकते हैं। इससे उनका रोग जल्द अच्छा होगा।

(17) कमजोर और बीमार को कुछ समय पूर्ण विश्राम करने के लिए समय निकालने का प्रयत्न करना चाहिए। नित्य कामों में काफी शक्ति खर्च होती रहती है। उसे बचा लिया जाय तो वह बची हुई शक्ति रोग दूर करने में सहायता करती है।

(18) खुली हवा और खुले प्रकाश में रहना चाहिए। रहने का मकान ऐसा हो जिसमें धूप और हवा भली प्रकार पहुँच सके। अच्छी जलवायु के स्थान में रहने से बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य भी सुधर जाता है। शरीर, मन, वस्त्र, घर, भोजन, पात्र तथा उपयोग में आने वाली अन्य वस्तुओं की सफाई पर पूरा ध्यान रखना चाहिए। गंदगी स्वास्थ्य की शत्रु है और सफाई मित्र।

(19) चित्त को प्रसन्न, चेहरे को हँसमुख, मस्तिष्क को शान्त रखने का बार-बार प्रयत्न करना चाहिए। दिन में कई बार ऐसा प्रयत्न किया जाय तो प्रसन्न रहने की आदत पड़ जाती है जो कि स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी है।

(20) अब तक जिन मिथ्या आहार-विहारों की आदत रही हो अब उनको दृढ़तापूर्वक छोड़ देने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए और नित्य प्रति परमात्मा से सच्चे हृदय से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह उन प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में सहायता प्रदान करें।

(21) मन ही मन बिना मुख से शब्द उच्चारण किये, नित्य प्रति गायत्री मंत्र का जप किया करें। इससे बड़े-बड़े संकट दूर हो जाते हैं और आनन्दमय परिस्थितियाँ प्राप्त होती हैं।


स्वप्न सच भी हो जाते हैं।

(श्री देवकीनन्दन बंसल)

‘आन्सर्स’ नामक पत्रिका में एक लेखक ने लिखा कि बहुत से लोगों को स्वप्न में चेतावनियाँ प्राप्त होती हैं। पोल जाति की एक लड़की ने जो इस समय इंग्लैंड में है और जो जर्मनी के आक्रमण के समय देश में घायल हो गई थी, स्वप्न में देखा कि उसके पिता की मृतात्मा आई हुई है और कहती है कि तुम्हारा पिता लड़ाई में मार डाला गया है। लड़की ने स्वप्न में यह भी देखा कि वह अस्पताल जिसमें वह मरीज की हालत में रहती है एक बम द्वारा पूर्ण रूप से विध्वंस हो गया है।

इस स्वप्न को देखने के कारण वह लड़की बहुत घबरा गई इतना ज्यादा कि दूसरे दिन उसे एक मित्र के घर जाने की इजाजत दे दी गई। उसके प्रस्थान करने के थोड़ी ही देर बाद वह अस्पताल एक हवाई हमले में बिल्कुल नष्ट हो गया। उसी दिन उस लड़की को पिता के मरने का समाचार भी प्राप्त हुआ।

प्रथम ब्रिटिश जंगी वायुयान का डिजाइन तैयार करने वाला जे. डब्ल्यू. डन था। उसने एक बार स्वप्न में देखा कि वह एक निराले हवाई जहाज में, जिसका उसने स्वयं आविष्कार किया है, उड़ा जा रहा है। उस समय वह हवाई जहाज बनाने के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानता था। अनेक वर्षों के बाद उसने उसी प्रकार के वायुयान का आविष्कार किया जैसा कि स्वप्न में देखा था।

गत यूरोपीय महायुद्ध के कुछ ही पूर्व डन ने एक दूसरा अद्भुत स्वप्न देखा। उसने देखा कि एक हवाई जहाज जमीन पर गिर कर नष्ट हो गया। उसे देखने के लिए वह दौड़ पड़ा। टूटे-फूटे वायुयान के दरमियान से एक युवक अफसर निकल कर उसकी तरफ चला। डन उस अफसर से परिचित था, किन्तु मुलाकात होने के पूर्व ही उसकी नींद खुल गई। कुछ ही समय बाद डन को यह समाचार मिला कि उसका परिचित युवक अफसर हवाई दुर्घटना में पड़कर मर गया। यह दुर्घटना लगभग उसी समय हुई थी जब कि डन उक्त स्वप्न देख रहा था।

कुछ वर्ष हुए लार्ड डफरिन ने वर्णन किया कि किस तरह एक स्वप्न ने उनकी जान बचा ली। उन्होंने स्वप्न में देखा था कि वे मर गये हैं और ताबूत मोटर में रखकर कब्रिस्तान की और ले जाया जा रहा है। मोटर के ड्राइवर का चेहरा बिल्कुल अजीब सा लगता था। स्वप्न देखने के कतिपय दिनों के बाद लार्ड डफरिन एक होटल में लिफ्ट में बैठने जा रहे थे। उन्होंने देखा कि लिफ्ट के पास जो नौकर होटल की और से तैनात है वह स्वप्न का ड्राइवर ही है। वे यह देखकर आश्चर्य में पड़ गये और झिझक गए। लिफ्ट ऊपर चली गई, वे उसमें बैठ नहीं सके ऊपर के मंजिल पर पहुँचने के पहले ही लिफ्ट का बन्धन टूट गया और वह नीचे जा पड़ी। उसमें जो व्यक्ति बैठे हुए थे वे सब मर गये।

लन्दन के भूतपूर्व लार्ड मेयर सर एडवर्ड कूपर ने एक बार एक स्वप्न की कथा वर्णित की थी, यह स्वप्न उन्होंने नहीं एक स्त्री ने देखा था जिसका लड़का एक जहाज पर उम्मीदवार की हैसियत से काम करता था। वह जहाज यात्रा पर जाने के लिए प्रस्थान करने वाला था। स्त्री ने स्वप्न में देखा कि वही जहाज अपने सभी कर्मचारियों के साथ समुद्र में डूब गया। यह स्वप्न देखकर वह घबरा उठी और अपने पति पर जोर डाला कि लड़के की नौकरी किसी दूसरे जहाज पर लगवा दो। एक जहाज पर उम्मीदवार रहकर दूसरे जहाज में जाने का निश्चय करना नियम विरुद्ध था और जुर्माना देकर ही कोई ऐसा कर सकता था। स्त्री जुर्माना दे देने के लिए भी तैयार हो गई। फलतः उसका लड़का एक दूसरे जहाज पर जाकर काम करने लगा। वह जहाज जिस पर वह पहले काम करता था, जब यात्रा करने के लिए रवाना हुआ तो फिर कभी लौटकर नहीं आया। वह एक चट्टान से टकराकर चकनाचूर हो गया और उस पर जितने आदमी बैठे थे सब डूब गये।

प्रसिद्ध उपन्यासकार श्री जे. वी. प्रीस्टले की स्त्री ने अपने एक स्वप्न का अनुभव बतलाया है जो कि बड़ा विचित्र है। उसने स्वप्न में देखा कि सड़क की एक दुर्घटना इतनी वास्तविक प्रतीत हुई कि जब वह जगी तो उसे मुश्किल से यह विश्वास होता था कि वह जीवित है। दूसरे दिन प्रातःकाल उसने एक अखबार में पढ़ा कि एक स्त्री जिसका नाम वही था जो स्वप्न देखने वाली स्त्री का विवाह के पूर्व था, काडिफ में मार डाली गई है। काडिफ की दुर्घटना उसी समय घटी थी जबकि औपन्यासिक की स्त्री स्वप्न देख रही थी। वास्तविक दुर्घटना उसी तरह हुई थी जिस तरह की स्वप्न में दिखाई पड़ी थी।

1856 में एक स्वप्न की सहायता से हत्यारे का पता लगाया गया और वह दण्डित किया। मानचेस्टर में रहने वाली एक स्त्री के दो बच्चे खो गये थे। उसने एक दिन स्वप्न में देखा कि उसका पति दोनों बच्चों को लेकर चेस्टर पहुँचा और वहाँ पर दोनों को मारकर उनकी लाशों को शिशु-गृह के पास वाले बाग में गाढ़ दिया।

जब उस स्त्री की नींद टूटी और स्वप्न याद आया तो वह बड़ी व्याकुल हो उठी। पुलिस में जाकर स्वप्न वाली बात कह सुनाई और प्रार्थना की कि जाँच पड़ताल की जाय। पहले तो पुलिस ने उपेक्षा की और हँसी में टाल दिया। किन्तु उस स्त्री के बहुत कहने सुनने पर पुलिस के सिपाही उसके साथ चेस्टर जाने के लिए राजी हो गये। यद्यपि वह स्त्री उसके पूर्व चेस्टर नगर में कभी नहीं गई थी लेकिन वह पुलिस के सिपाहियों को ठीक उसी स्थान पर ले गई जहाँ कि स्वप्न में उसने लाशों को गाढ़ते हुए देखा था। खोदने पर सचमुच लाशें मिलीं और पुलिस ने जाँच पड़ताल करके हत्यारे का भी पता लगा लिया।

कहते है कि स्वप्न देखने से कभी-कभी रोग भी दूर हो गये हैं। उदाहरणार्थ -1919 ई. में लिवरपुल में रहने वाले जेम्स नामक व्यक्ति ने जो पहले फौज में रह चुका था, और जो लड़ाई में घायल हो जाने के कारण बहरा हो गया था, तीन बार यह स्वप्न देखा कि वह सेण्ट बिनीफ्रेड के कुएं के पास खड़ा है। उसने स्वप्न को शुभ लक्षण समझकर उस कुएं के पास जाकर एक सप्ताह के लिए निवास किया। वहाँ वह प्रतिदिन उस कुएं के पवित्र जल में स्नान करता। सात दिन के बाद जब वह अपने घर को लौट आया तो देखा कि उसका बहरापन बिल्कुल दूर हो गया है।

उससे भी अधिक आश्चर्यजनक किस्सा है रेवरेण्ड फ्रीमैंन विल्स का। बचपन में उसका एक घुटना इतना खराब हो गया था कि डॉक्टर ने घोषित कर दिया था कि उनकी एक टाँग हमेशा टेढ़ी ही रहेगी, सीधी नहीं हो सकेगी। किन्तु एक रात में विल्स ने स्वप्न देखा कि एक देवदूत उनके पास आया और जो पैर टेढ़ा था उसे उसने स्पर्श किया। उसके छूते ही खराब पैर भी अच्छे पैर की तरह बिल्कुल सीधा हो गया। प्रातःकाल जब वे जागे तो उन्होंने अपने खराब पैर को सचमुच वैसा ही ठीक पाया जैसा कि स्वप्न में देखा था।

लेडी लन्दन दरी ने कुछ वर्ष पहले यह स्वप्न देखा था कि उसने एक दावत दी है जिसमें 13 व्यक्ति सम्मिलित हुए हैं। सबसे अन्त में जाने वाला तेरहवाँ व्यक्ति हत्यारों के हाथ का शिकार हो गया। उसका स्वप्न सुनकर उसके मित्र मुस्कुराते और सलाह देते कि स्वप्न में देखी हुई बात पर चिंता करना व्यर्थ है। लेकिन जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि सर हेनरी विलसन को कुछ आयरिश व्यक्तियों ने साजिश करके मार डाला है तो उन्हें आश्चर्य हुआ। उक्त दावत में तेरहवें अतिथि वही थे।

1937 ई॰ में जेना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर फ्रान्ज मेयर एक मरणासन्न विद्यार्थी के बिस्तरे के पास बुलाए गए। विद्यार्थी ने कहा कि मैंने एक स्वप्न देखा है और उसमें मुझे आगाह किया गया है कि मेरी मौत करीब है। उसने प्रोफेसर से यह भी प्रार्थना की कि मेरी अंत्येष्टि क्रिया हो जाने के बाद मेरे सन्दूक को खोलकर उस पत्र को पढ़ लिजिएगा जो कि उसमें बन्द है।

उसकी मृत्यु थोड़े ही समय के बाद हो गई और उसकी हिदायतों के अनुसार जब उसका और सन्दूक खोला गया तो उसमें उस विद्यार्थी के हाथ का लिखा हुआ एक पत्र मिला। पत्र में न केवल मृत्यु की ठीक-ठीक तारीख लिखी थी बल्कि ठीक-ठीक यह भी बतलाया गया था कि उसकी लाश कहाँ पर दफनाई जायगी। पत्र में लिखा था कि स्वप्न में विद्यार्थी ने अपनी कब्र भी देखी थी।

जान ली की रहस्यपूर्ण कथा भी लिखने के लायक है। वह 1844 ई. के एक हत्या के मामले में अपराधी ठहराया गया था और उसे फाँसी की सजा दी गई थी। जिस दिन फाँसी दी जाने वाली थी उसके पूर्व की रात में उसने स्वप्न देखा कि दूसरे दिन क्या होगा। उसने वार्डरों से स्वप्न की बात बतलाई किन्तु किसी ने विश्वास नहीं किया। फिर भी हुआ वही जो अभियुक्त ने स्वप्न में देखा था। स्वप्न में उसने देखा था वह फाँसी के तख्ते पर खड़ा किया गया है। जंजीर के खींचे जाने का भी शब्द सुनाई पड़ा तो भी किसी कारण फाँसी उसे लगी नहीं। जेल के अफसर उसे तख्ते से हटाकर अलग ले गए। दूसरी बार फिर फाँसी देने के लिए उसे खड़ा किया गया। लेकिन फिर वही नतीजा हुआ। तीसरी बार का प्रयत्न भी जब विफल सिद्ध हुआ तो वह जेल से उसी कमरे में पहुँचा दिया गया जहाँ कि वह रखा गया था। 20 साल तक जेल में रखे जाने के बाद वह मुक्त कर दिया गया।

स्वप्न में प्रकाश मिलने से महारानी हर बंस कुँवर स्मारक संकीर्तन भवन के अहाते से जो कि अभी बन रहा है एक 100 वर्ष पुराना ताम्र-पत्र मिला जिस पर संस्कृत में कुछ खुदा हुआ था।

हरि संकीर्तन सभा के एक पदाधिकारी श्री हरिदास को रात को स्वप्न में किसी ने कहा कि उक्त प्रकार का एक ताम्र-पत्र अहाते में गड़ा हुआ है। इस पर उस जगह की खुदाई की गई और वहाँ से 22 दिसम्बर 1845 की तारीख का उक्त ताम्र-पत्र मिला जिस पर संस्कृत में कुछ लिखा हुआ था।

ताम्र-पत्र की हिदायत के अनुसार देवता की मूर्ति की तलाश में 37 फीट गहराई तक जमीन खोदी गई। इसी बीच वह सन्देश पहुँचा कि महाराजा उक्त ताम्र-पत्र देखना चाहते हैं। तदनुसार श्री कोसल उसे लेकर राजमहल की और रवाना हुए लेकिन बीच में ही किसी ने उन पर आक्रमण कर, ताम्र-पत्र छीन लिया और भाग गया।


महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति सन्मार्ग से ही संभव है।

(ले.- श्री निरंजन प्रसाद गौतम, पटलौनी)

मनुष्य स्वभावतः महत्वाकाँक्षी है। उसकी इच्छा बड़प्पन प्राप्त करने की होती है, वह बड़ा बनकर रहना चाहता है। दूसरे लोग उसका सम्मान करें, उसे महत्वपूर्ण समझें, उसकी चर्चा करें उसकी सलाह का मूल्य समझें, उसका नेतृत्व स्वीकार करें ऐसी भावनाओं से वह प्रायः ओत-प्रोत रहता है। भोजन, निद्रा, मनोरंजन और दाम्पत्य जीवन की आवश्यकता पूर्ति के अतिरिक्त जो समय और शक्ति बचती है उसे प्रायः लोग महत्व प्राप्ति में ही लगाते हैं।

महत्व प्राप्ति की दो दिशाएं हैं। एक उचित दूसरी अनुचित। उचित वह है जिस और धर्म, यश और सद्गति की प्राप्ति होती है। दान, लोक सेवा, परोपकार, त्याग, संयम, ईश्वर भक्ति, स्वाध्याय, सत्संग आदि कार्यों द्वारा उत्तम महत्व की प्राप्ति होती है तथा ऐसे परिणाम प्राप्त होते है। जिनसे सुखदायक विकास होता है। दूसरी दिशा वह है जिस पर चलने से साँसारिक भोग विलास के साधन, धन-संपदा आदि को प्राप्त किया जाता है।

इन दोनों मार्गों में अन्तर यह है कि उचित मार्ग पर चलने वाला जहाँ आन्तरिक सुख, मानसिक शान्ति को उपलब्ध करता है, वहाँ उसे उचित साँसारिक आवश्यकताओं से भी वंचित नहीं रहना पड़ता। परन्तु जब उन्नति का वास्तविक तात्पर्य आन्तरिक उन्नति, आत्मोत्थान होता है तब विशेष रूप से अधिक मात्रा में वही मिलती है, भौतिक संपदाएं उतनी ही मिल जाती हैं जितनी कि जीवन स्थिर रखने के लिए आवश्यक है। जिस ओर विशेष आकर्षण होता है उस दिशा में विशेष सफलता मिलती है दूसरी ओर स्वभावतः उतना लाभ नहीं होता। इसलिए देखा गया है कि जो श्रेय मार्ग पर चलने वाले हैं वे प्रायः भोग ऐश्वर्य से सम्पन्न नहीं हो पाते।

दूसरी ओर जो इन्द्रिय भोग और धन दौलत, पद आदि साँसारिक सम्पन्नता द्वारा सुखी होना चाहते हैं, महत्व प्राप्त करना चाहते हैं वे इस लक्ष को प्रधानता देकर आगे बढ़ते हैं। आत्मोन्नति का लक्ष गौण हो जाता है। जब भोग में, संचय में, प्रवृत्ति अधिक बढ़ती है तो मनुष्य सोचता है कि अधिक से अधिक और जल्द से जल्द सफलता मिलनी चाहिए। भोगों को भोगने और धन को जमा करने में जो तात्कालिक सुख मिलता है। उसकी चाह इतनी तीव्र होती है कि आत्मोन्नति का लक्ष गौण भी नहीं रहता, वह उपेक्षित होता है और बहुत अंशों में उसे बहिष्कृत कर दिया जाता है क्योंकि प्रधान रूप से धर्म पालन ही वह बाधा प्रतीत होती है। जिसके कारण साँसारिक सम्पन्नताओं की प्राप्ति में रुकावट पड़ती इसलिए उन्हें धर्म को उठाकर ताक पर रख देना पड़ता है। और जैसे भी बने वैसे धन और भोग के साधनों को अधिकाधिक मात्रा में प्राप्त करने के लिए लगना पड़ता है। यह ऐसा ढालू मार्ग पर जिस पर फिसल पड़ने के बाद लुढ़कने की गति क्रमशः तीव्र होती जाती है और मनुष्य तेजी से प्रेम मार्ग पर चलते हुए आत्मिक पतन के गर्त में गहरा उतरता जाता है।

नाना प्रकार के प्रपंच, छल, ठगी, झूठी, दगाबाजी, आडम्बर, धूर्तता, चोरी, अपहरण आदि दुष्कर्मों का एकमात्र कारण यह है कि मनुष्य बहुत शीघ्र धनवान बनना चाहता है और धन के द्वारा जो साँसारिक सुख मिल सकते हैं उन्हें प्राप्त करना चाहता है, इस मार्ग पर आज अगणित मनुष्य चलते हुए दिखाई पड़ते हैं। पर हम यह भी देखते हैं कि जिस कामना से विपुल भोग ऐश्वर्य प्राप्ति की इच्छा से इस मार्ग पर उन्होंने तीव्र गति से पदार्पण किया था, उसमें वे प्रायः असफल ही रहते हैं। सारा जीवन रस निचोड़ देने पर भी उनके हाथ मृग तृष्णा में भटकते रहने के अतिरिक्त और कुछ नहीं आता। जीवन भर के कठोर श्रम के बदले से सुख तो नाममात्र का भोग पाते है अपितु पापों की एक भारी गठरी उनके पल्ले बँध जाती है, जिसकी अग्नि में उनका वर्तमान और भविष्य बुरी तरह झुलसता है।

हमारी स्वाभाविक आवश्यकताएं बहुत ही सीमित हैं, उन्हें आसानी से पूरा किया जा सकता है। पर आज तो कृत्रिम आवश्यकताएं उत्पन्न करना, दिन दिन अनाप-शनाप जरूरतें बढ़ाते जाना, और उन बढ़ी हुई जरूरतों की पूर्ति के लिए समस्त शारीरिक और मानसिक शक्तियों को निचोड़ देना आज की सभ्यता का प्रधान चिह्न बना हुआ है। “आग लगाना और फिर उसे घी से बुझाते दौड़ना” यह कुचक्र कभी बन्द नहीं हो सकता, इसकी प्रगति तो तीव्र ही होती चलेगी। जरूरतों की बढ़ोतरी का कोई अन्त नहीं, परन्तु अपनी सामर्थ्य का अंत है चाहे कितना ही प्रयत्न करे मनुष्य एक सीमा तक ही उपार्जन और उपभोग कर सकता है। ऐसी दशा में यह हो नहीं सकता कि सन्तोष, शान्ति और तृप्ति उपलब्ध हो सके। एक और अतृप्त तृष्णा की जलन दूसरी ओर पाप के दंडों की मार, इस चक्की में पिसता हुआ वह भोगैश्वर्यवादी प्राणी सदा पीड़ा और व्यथा अनुभव करता रहता है।

कितने ऐसे मनुष्य हैं जो इस गोरख धंधे की उलझन को सुलझा कर अपने लिए किसी सुनिश्चित लक्ष का निर्णय करते हैं। अधिकाँश को हम मृगतृष्णा में भटकता हुआ और दाने के लोभ से जाल में फँसे हुए कबूतर की तरह तड़पता देखते हैं। आश्चर्य यह है कि हम सब एक दूसरे को इस प्रकार की दुर्घटना में ग्रस्त देखते हुए भी स्वयं सावधान नहीं होते वरन् उसी सत्यानाशी मार्ग पर चलने के लिए कदम बढ़ाते हैं। क्या ही अच्छा होता, यदि हम अपनी जीवन दिशा को विवेकपूर्वक चुनते और उस और कदम बढ़ाते जिसमें जीवन यापन की सामग्री और आत्म शान्ति दोनों ही सुविधापूर्वक प्राप्त होती है और उस महान महत्वाकाँक्षा को प्राप्त करते हैं जिसकी क्षुधा हमारी आत्मा में हर घड़ी उठती रहती है। हमें स्मरण रखना चाहिए कि साँसारिक कोई भी संपदा आत्मा की महत्वाकाँक्षा को तृप्त नहीं कर सकती, उसकी तृप्ति तो परमात्मा की प्राप्ति से ही होती है और यह लाभ केवल श्रेयपथ पर, सन्मार्ग पर, चलने से ही प्राप्त हो सकता है।


अज्ञान के आवरण को हटाइए।

(श्रीमती ब्रह्मवती देवी, वारा)

आधुनिक समय में अधिकतर लोग दुःखी दिखाई देते हैं, परन्तु उस दुःख का कारण नहीं समझते कि इस दुःख की क्यों उत्पत्ति होती है? थोड़ा सा विचार करने पर हमें यह विदित हो जाता है कि हम दुःखी क्यों होते है? इसका एकमात्र कारण हमारी साँसारिक इच्छाओं का पूर्ण न होना ही है। ज्यों-2 हमारी ये इच्छाएं आवश्यकता से अधिक बलवती होती हैं त्यों-2 उनकी पूर्ति कठिन होती जाती है। एवं उनकी पूर्ति न होने से उतना अधिक दुःखी होते हैं। इसके अतिरिक्त यदि इच्छायें क्रमशः ज्यों-2 पूरी होती जाती हैं त्यों-2 उससे भी अधिक तृष्णा बढ़ती जाती है, कहने का तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण चक्रवर्ती राज्य मिल जाने पर भी अशान्ति बढ़ती जाती है और कभी भी शान्ति नहीं प्राप्त होती है।

इसका मुख्य अभिप्राय यह है कि इन वस्तुओं में लोभ और काम होता है। दोनों ही मनुष्यों को पतनावस्था पर पहुँचाने वाले हैं और जो जितना ही पतनावस्था पर होगा उतना ही दुःखी होगा ईशोपनिषद् में लिखा है कि-

हिरण्यमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्

तत्वम्पूषन्नपावृणु सत्यं धर्माय दृष्टये।

चमकीली वस्तुओं की इच्छा के ढक्कन से सत्यता का सुख ढ़का हुआ है। हे उन्नति चाहने वाले जीव! तु सत्य धर्म को देखने के लिए उसका मुख खोल।

हमें यह तृष्णा रूपी ढक्कन खोल देना चाहिए क्योंकि जब तक हमारे हृदय में इन चमकीली वस्तुओं की प्रबल इच्छा होगी हम सत्यता से कभी अपना जीवन नहीं व्यतीत कर सकते हैं। यही कारण है कि आजकल संसार अतिशय पीड़ित हैं। चोरी, डकैती, घूसखोरी, बेईमानी, व्यभिचार, स्वार्थपरता आदि इन सबका कारण यही भोग्य वस्तुओं के अति संग्रह की तृष्णा है, इन इच्छाओं को दूर करना ही दुःख से दूर रहना है। जब तक हम इस इच्छा से पृथक नहीं होंगे तब तक हमारा दुःखों से मुक्त होना और उन्नति करना असम्भव है, ये ही तृष्णायें अत्यन्त दुःखदायी हैं।

अज्ञानी लोगों का कथन है कि- “रुपया कमाये मक्कर से, रोटी खाये ही शक्कर से।” ऐसे व्यक्ति किसी हद तक सुखी देखे भी गये हैं परन्तु वे क्षणिक सुखी हैं। कहते है कि सर्प स्पर्श में कोमल प्रतीत होता है परन्तु काटने से मृत्यु हो जाती है इसी भाँति ये चमकीली तृष्णाएं हमें सत्य ज्ञान रूपी सुख से हटाकर अज्ञान रूपी दुःख के गर्त में धकेल देती हैं।

अतः हमें परमात्मा के आदेशानुसार इच्छा रूपी आवरण को जिससे सत्य का मुख छिपा हुआ है हटा देना चाहिए।


Quotation

जो ईश्वर से डरता है उसे मृत्यु से भय नहीं रहता। -महात्मा गाँधी,


क्रोध का स्वास्थ्य पर प्रभाव

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

स्वास्थ्य का मन से अकाट्य सम्बन्ध है। उत्तम स्वास्थ्य का उदय मन की शान्त, उत्साहपूर्ण, आशावादी, सचेष्ट सद्प्रेरणा मनः स्थिति से होता है। हमारी आन्तरिक प्रेरणाएं भाव, स्वयंभू वृत्तियाँ और इच्छाएँ गुप्त मन द्वारा संचालित होती हैं। मन के अन्दर से ही पोषक तथा संजीवनी क्रियाओं की उत्पत्ति होती है। गुप्त मन के संस्कार और अन्तःप्रेरणा शरीर में पोषण क्रिया रखती हैं। अन्तर के आदेश ही हमारी पाचन शक्ति को ठीक रखती, गुर्दे को क्रियाशील बनाती, यकृत का महत्वपूर्ण कार्य कराती हैं। मन को ठीक स्थिति में रखने तथा उससे पूरा-पूरा काम लेने की शक्ति होने के कारण ही मनुष्य का स्थान सब प्राणियों से ऊँचा है।

प्रकृति का नियम यह है कि यदि भोजन शान्त अवस्था में किया जाय तो उसका प्रभाव कल्याणकारी होगा पर यदि वही भोजन करते समय आप खिंचे हुए हों तो इष्ट का प्रभाव भी अनिष्ट हो आयेगा, पेटभर भोजन न किया जा सकेगा, कमजोरी आयेगी, रक्त दूषित होगा, पाचन शक्ति में निर्बलता आ जायेगी। खाद्य पदार्थों पर क्रोध के कारण दूषित प्रभाव पड़ता है।

कुदरत चाहती है कि हम शान्त रहें, प्रसन्न रहें और आशावादी बने रहें, मस्त और उन्मुक्त रहें-ऐसी निर्लिप्त अवस्था में ही दूध, फल, तरकारी, अन्न इत्यादि अपना शुभ प्रभाव दिखाते हैं। मानसिक तनाव या उद्विग्न अवस्था में अन्दर के अंग-प्रत्यंग अपना कार्य उचित रीति से नहीं कर पाते। सद्विचारों से ज्ञान तन्तु पुष्ट होते हैं, मनोविकारों से उनकी स्वाभाविक शक्ति ठंडी पड़ती है, प्राण शक्ति का क्षय होता है, शरीर यंत्र गतिहीन हो जाता है, मनुष्य पशु तुल्य बन जाता है। भोजन द्वारा स्वास्थ्य एवं जीवाणु तत्व प्राप्त करने के हेतु मन को उत्पादक स्थिति में रखना बड़ा कल्याणकारी है।

उस व्यक्ति के स्वास्थ्य की कल्पना करना सरल है जो भोजन करते समय कुढ़ता रहता है। जिसके मुख से कुत्सित शब्दों का उच्चारण होता रहता है और जो नाक भौं सिकोड़े मानसिक तनाव की अवस्था में जल्दी-जल्दी भोजन ठूँस लेता है। उसे भोजन में क्या स्वाद आयेगा? उससे कैसे पौष्टिक तत्व प्राप्त होंगे? भोजन अपना नैसर्गिक कार्य न कर सकेगा। ईर्ष्या और क्रोध दोनों दाहक हैं। देह और मन को जलाते हैं। मनुष्य को पनपने का अवसर नहीं देते। क्रोध से बनी विचार-मूर्तियाँ नीचे ऊपर, मानस पटल के प्रत्येक कोने पर छा जाती हैं और उसे मोहाच्छन्न कर देती हैं। इन विचार-मूर्तियों में एक प्रकार का कम्पन होता रहता है तथा ये जैसी है वैसी ही किरणें निकलती रहती हैं। साथ ही, जैसे-2 ये विचार मूर्तियाँ हमारे मानसिक जगत् में बनती है, वैसे ही, उसी क्षण, जिसके निमित्त ये बनी हैं, उनकी और दौड़ जाती हैं।

क्रोध के समय आपका मुख मंडल कैसा रहता है, जरा शीशे में देखिए। कैसा मुख लाल जो जाता है, कटु शब्दों का उच्चारण करने से शरीर काँपने लगता है, भुजाएँ फड़कने लगती हैं, भृकुटि चढ़ जाती है, नेत्र लाल हो जाते हैं, होठ चबने लगते हैं। मन में उद्वेग, विकलता, गर्व, उग्रता, अमर्ष इत्यादि अनुभव उदय होते हैं। प्रत्येक मानसिक व्यापार या क्रिया का सम्बन्ध चेहरे के सौंदर्य से है। मन के विकार का प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से शरीर के अवयवों पर लक्षित होता है। जिस प्रकार समुद्र के धरातल पर आने वाली सूक्ष्म तरंगों का प्रभाव समूचे समुद्र पर पढ़ता है, उसी प्रकार साधारण से होकर उन्नत एवं परिपुष्टतम विचार हमारी सूक्ष्म पेशियों को प्रभावित किया करते हैं। मन के आदेश से अनेक अहेतुकी क्रियाएँ हम किया करते हैं।

क्रोधी व्यक्ति बार-बार एक विशेष प्रकार की मुख मुद्रा बनाता है, परनिन्दा करता है। अपकारक या अनुचित शब्दों का प्रयोग करने से दुख की मुद्राएँ एक आदत बन जाती है। क्रोधयुक्त मुख ही स्थायी रूप धारण कर लेता है। सम्पूर्ण सौंदर्य विनष्ट हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों के मुख में आप नेत्र लाल देखेंगे, भृकुटि चढ़ी हुई होगी, होठ चबाये जा रहे होंगे, माथे और कपोलों पर झुर्रियाँ पड़ी हुई होंगी।

क्रोध सौंदर्य का शत्रु है। सौंदर्य में मन का शील, मधुरता, उत्तम स्वभाव, शुभ्र भावनाएँ, आध्यात्मिक सजीवता सम्मिलित है। सौंदर्य एक आत्मिक गुण है। यदि हम आनन्दमयी वृत्ति में रहेंगे, मन को शुभ कल्पनाओं, पूर्ण निर्दोष, स्वास्थ्यमय शुभेच्छाओं से भरी रक्खेंगे, तो ये हमारे अंतर्मन में प्रविष्ट हो जायेंगे। पुनः-पुनः इन्हीं शुभ भावनाओं का अभ्यास करने से ये हमारे मुख मंडल पर प्रकट हो जायेंगे। इसके विपरीत यदि हम क्रोधाग्नि में जलते रहेंगे। अपकारक विकारों या गर्व, उग्रता, अमर्ष इत्यादि मानसिक विषों से भरे रहेंगे, तो मुख भी विवर्ण हो जायेगा, चेहरा रौद्र रूप धारण कर लेगा। ऐसी भयानक सूरत दिखाकर हम यह प्रकट करते हैं कि हमारे शरीर में मानसिक उद्वेग हो रहा है।

क्रोध रहित होना उच्च जीवन, विचारशीलता और शुभ्र दैवी अंतःवृत्ति का परिचायक है। क्रोध, कुत्सित है, अस्वाभाविक और पापयुक्त है। यह छल, कपट, नीचता, हिंसा, अधर्मता, लज्जा, अनीति, का जन्मदाता है, तमोगुण का आवरण उत्पन्न कर मनुष्य का दैहिक, दैविक और आध्यात्मिक अहित कराने वाला दुष्ट शत्रु है। यह वह विष है जो शरीर के अंगों को बिगाड़ता, तेज, स्वास्थ्य, कान्ति, बल और आयु को क्षीण करता है। क्रोध में अविवेक उत्पन्न होता है।

संत प्रवर बिनोवा लिखते हैं- ‘क्रोध पर ही क्रुद्ध होने के अतिरिक्त इस दुर्जय पाप वृत्ति का अन्य कोई सदुपयोग नहीं हो सकता’। छिपाने से अन्य पाप वृत्तियों का पोषण संभव है, किन्तु क्रोध कभी छिपाया नहीं जा सकता। वह तो नेत्रों की दृष्टि से दीप्त अग्नि शिखा की तरह प्रकाशित होकर समग्र मुख मंडल को रक्तवर्ण का बना देता है। अग्नि की ही तरह सामने वह जिस किसी वस्तु को पाता है, उसी को जला देता है।

क्रोध आते समय उसे जितना दमन करना चाहोगे, उतना ही वह दुर्दमनीय हो उठेगा। कुछ व्यक्ति किसी प्रकार भी संयम या तिरस्कार के योग्य नहीं हो सकते। अन्य पाप वृत्तियों की सीमा हो सकती है, उनका शासन हो सकता है, किन्तु क्रोध के समान दुःशासन अन्य कुछ भी नहीं हो सकता कोई भी सीमा उसे सर्वत्र नहीं कर सकती। यहाँ तक कि जीवन के श्रेष्ठ और पवित्रतम बन्धन या आकांक्षाएं भी उसका प्रतिरोध करने में असमर्थ हो जाती हैं। क्रुद्ध हृदय से जब हम अभिसंघात करते हैं, अथवा मन ही मन, क्षुब्ध और विरक्त होते हैं, उस समय हमारे मन की वह अवस्था स्वर्ग राज्य के विरुद्ध प्रयत्न की तरह भयानक होती है, क्योंकि क्रोध से अन्धे होकर हम उस सर्व शक्तिमान विधान की निरन्तर सुलभ अपार करुणा को एकदम भूल जाते हैं। क्रोधान्ध व्यक्ति के विचार और कल्पना मदिरासक्त की तरह प्रमत्त होते हैं। वह किसी भी प्रकार के विरोध के आधीन नहीं हो सकता।


रजत-कण

(श्री गोपाल प्रसाद वंशी, वेतिया)

क्या तुम्हें जीवन से प्रेम है? तब समय को व्यर्थ नष्ट मत करो, क्योंकि जीवन उसी से बना है।

सतर्कता से अवसर की ताक में रहना, कौशल और साहस से अवसर को प्राप्त करना, शक्ति और दृढ़ता के द्वारा अवसरों को सर्वोत्तम सफलता पर पहुँचाना-निश्चय ही सफलता के देने वाले प्रधान सद्गुण हैं।

प्रत्येक आपत्ति श्राप के समान होती है। जीवन की प्राथमिक आपत्तियाँ बहुधा आशीर्वाद होती हैं। जीती हुई कठिनाइयाँ, न केवल हमें शिक्षा ही देती हैं, बल्कि भविष्य के प्रयत्नों में हमें साहसी बनाती हैं।

इसमें संदेह नहीं कि बड़े-बड़े कारखानों के मालिकों ने अपना जीवन ‘गरीब लड़कपन’ से शुरू किया था।

ज्ञान और धर्म का संचय शिक्षा का विकास ही है। संयम और त्याग का संचय सच्चा आदर्श है।

जो यह समझता है कि वह जानता है, तो यह समझ ही उसकी नासमझी की निशानी है। हाँ जो समझता है कि वह बहुत कम जानता है, उसी की समझ सच्ची राह पर है।

यदि आप अपने जीवन को सुखी करना चाहते हैं, तो प्रतिदिन उस बल स्वरूप परमात्मा से बल प्राप्त कर उसका उपयोग गरीब और असहाय लोगों को उन्नत बनाने में कीजिए, तभी सच्ची शान्ति मिल सकती है।

ठाली बैठे मनुष्य का दिमाग शैतान का कारखाना है। जो सर्वात्मा प्रभु को अपने में और सब में देखता है, उसे दुख नहीं होते।

मनुष्य को तुच्छ स्वार्थों का त्याग करना चाहिये, क्योंकि उसी के कारण वह संसार के बन्धनों में बंध जाता है। इस असन्त् निजत्व का त्याग करना ही सच्चा मार्ग है।

संसार के प्राणियों के प्रेम में अपने आपको भूल जाना और उनकी सेवा करने में अपना कुछ भी विचार न करना, इसी का नाम वास्तव में सच्ची सेवा है।

पुस्तक पढ़ने या परीक्षा में पास करने से ही तो विचारशील नहीं हुआ जाता, पुस्तक पढ़ना एक बात है और विचारक होना दूसरी बात।

पुराने सिद्धाँत केवल पुराने होने के कारण आदरणीय नहीं हो सकते।

जो नित्यों का भी नित्य है, चेतनों का भी चेतन है, जो अकेला ही बहुतों की कामनाओं को पूर्ण करता है, उस शरीरस्थ आत्मा का जिसको अनुभव होता है, उसी को शाश्वत शांति प्राप्त होती है।

जिसकी ईश्वर में दृढ़ विश्वास और अचल श्रद्धा होती है, वह दुख, क्लेश तथा अशाँतिमय जीवन कभी व्यतीत कर ही नहीं सकता।

वह सदा प्रसन्न-चित्त, शाँत और निर्भय रहता है। उसकी मुद्रा गंभीर दिखायी देती है। वह अपने लिए कुछ भी नहीं सोचता है और न किसी बात की चिंता करता है।


सत्पथ की ओर


सत्पथ की ओर

(अनुवादक- श्री मुँशीराम जी शर्मा, एम.ए. ‘सोम’)

पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्णत्राणि पर्येषि विश्वतः।

अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शतास इद्वन्तस्तत्समाशत॥

तुम्हारी बहती पाचन धार!

जिसके कण-कण में पवित्रता लहराती बल मार,

बृहत जगत्पति, जिससे व्यापक यह विस्तृत संसार।

जिसका मेरे अंग-अंग के चारों ओर प्रसार,

पर जो कच्चा है, जिसने तन तप से नहीं तपाया-

उसने इस पवित्र धारा को नहीं जगत में पाया।

पके हुए जो पूर्ण तपस्वी, तप से ताप समाप्त।

चलते हुए पुण्य-पथ पर वे करते इसको प्राप्त॥

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्।

दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

आओ, छोड़ विकृत जीवन को चलें प्रकृति की ओर सखे!

दिति की दानवता को त्यागें, चलें अदिति की ओर सखे!

यह बनावटी, बहु विकारमय जीवन कितना दुखदायी,

भव-सागर में हमें डुबोता इसने पशुता अपनायी,

इससे बचना है तो आओ पकड़ें दैवी नाव सखे!

स्वाभाविक जीवन अपनावें छोड़ें कृत्रिम भाव सखे!

स्वाभाविकता की यह दैवी नौका हमें बचा लेगी,

अपने विस्तृत फैले अंचल में हम को आश्रय देगी,

इससे ज्ञान-प्रकाश बढ़ेगा, कभी न होगी हानि सखे!

यहाँ पहुँचकर खुल जाएगी सुख की मंगल खानि सखे!

यह अखण्ड, परिपूर्ण, सुभग, पावन-पथ पर चलने वाली,

सद्गुण के पतवार लिये हैं, कभी नहीं रिसने वाली॥

हो जाओ निष्पाप, बना लो स्वाभाविक जीवन प्यारे!

चाहो यदि कल्याण जगत में टूटें भव-बन्धन सारे॥

-कल्याण से,

*समाप्त*